Home Blog Page 4104

लगातार तीसरे साल सबसे लोकप्रिय CM योगी आदित्यनाथ, चौथे नंबर पर फिसलीं ममता बनर्जी: इंडिया टुडे ने बताया देश का मूड

इंडिया टुडे के ‘Mood of the Nation’ सर्वे में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ तीसरी बार देश के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री चुने गए हैं। ममता बनर्जी इस सर्वे में खिसक कर चौथे पायदान पर आ गई हैं। उनसे ऊपर आँध्र प्रदेश के सीएम वाईएस जगनमोहन रेड्डी और दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं।

योगी आदित्यनाथ को इंडिया टुडे के इस सर्वे में 24% वोट मिले हैं। अरविंद केजरीवाल के हिस्से 15% वोट आए। जगनमोहन रेड्डी को 11% और ममता बनर्जी को सिर्फ 9% वोट मिले हैं।

Yogi Adityanath emerges as most popular choice for 'best CM' in India Today's Mood of the Nation survey

आजतक के पत्रकार रोहित सरदाना ने इस सर्वे के बाद सीएम योगी को बधाई दी है। उन्होंने लिखा, “उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देश के मुख्यमंत्रियों में ‘सर्वश्रेष्ठ’ चुने गए हैं। इंडिया टुडे हिंदी का ‘देश का मिज़ाज सर्वेक्षण’ हर छः महीने में ये अध्ययन करता है।”

सर्वे के कुछ और दिलचस्प नतीजे

बता दें कि इंडिया टुडे के इसे सर्वेक्षण के कुछ दिलचस्प नतीजे और भी हैं। जिनसे पता चलता है कि न केवल सीएम योगी, बल्कि पीएम मोदी भी देश की जनता की पहली पसंद हैं

इंडिया टुडे-कर्वे इनसाइट्स मूड ऑफ द नेशन पोल के अनुसार, सर्वे में भाग लेने वाले देश के लगभग तीन-चौथाई नागरिक मोदी सरकार द्वारा आर्थिक संकट से निपटने की नीति को लेकर खुश है। सर्वे में पाया गया है कि 73 प्रतिशत भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश में कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए किए गए कार्यों से संतुष्ट हैं।

सर्वे में कहा गया है कि 23% रेस्पोंडेंट ने कहा कि मोदी सरकार का काम आउटस्टैंडिंग रहा, जबकि 50% ने इसे अच्छा माना। अप्रूवल रेटिंग के संदर्भ में, 74% भारतीय पीएम मोदी से खुश हैं। गौरतलब है कि जहाँ अगस्त 2020 के सर्वेक्षण में 78% का आँकड़ा सामने आया था, वहीं इस बार के आँकड़े में बस मामूली सी गिरावट है।

MOTN सर्वे में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने महामारी की वजह से आर्थिक संकट को जिस तरह से हैंडल किया उससे 67 फीसदी भारतीय संतुष्ट हैं। 20% रेस्पोंडेंट ने इसे आउटस्टैंडिंग कहा तो वहीं 47% भारतीयों ने इसे अच्छा प्रदर्शन कहा। MOTN पोल के अनुसार 66 प्रतिशत रेस्पोंडेंट ने कहा कि महामारी के कारण उनकी इनकम कम हुई है, जबकि 19 प्रतिशत ने कहा कि उन्होंने इस दौरान अपनी नौकरियाँ खो दी हैं।

साथ ही सर्वे में यह भी अनुमान लगाया गया है कि अगर आज चुनाव करवाया जाए तो भाजपा भारी बहुमत से सत्ता में वापसी करेगी। द मूड ऑफ द नेशन पोल के मुताबिक बीजेपी 291 सीटें जीतेगी, जोकि अगस्त 2020 के सर्वे में मिले सीटों से आठ सीटे से ज्यादा है। अभी आए MOTN सर्वेक्षण के अनुसार, भाजपा की अगुवाई वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) लगभग 321 सीटें जीतेगी, जोकि अगस्त में 316 था।

सर्वे देख भड़के राजदीप सरदेसाई

अपने ही चैनल के इस सर्वे में आए नतीजों को देखने के बाद मीडिया गिरोह के राजदीप सरदेसाई काफी परेशान हैं। उन्होंने ट्विटर पर अपने मन की भड़ास ट्विटर पर निकालते हुए कहा कि यह उनके लिए ‘चौंकाने वाला’ था कि आर्थिक संकट और करोना महामारी के बावजूद पोल के नतीजों में भारतीयों ने मोदी सरकार के कामों सराहना की है।

राजदीप सरदेसाई ने सर्वेक्षण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह सर्वे पर विश्वास ही नहीं कर पा रहे, क्योंकि लगभग 85% लोग लॉकडाउन में अपनी आजीविका के अवसरों को खोने के बावजूद आर्थिक संकट से निपटने के लिए दो तिहाई से अधिक लोग सरकार की सराहना कर रहे हैं।

राम मंदिर, महर्षि वाल्मीकि और दीपोत्सव के दीये… गणतंत्र दिवस पर यूपी की झाँकी में दिखेगी अयोध्या की धरोहर

गणतंत्र दिवस के मौके पर देश की राजधानी दिल्‍ली में राजपथ पर होने वाली परेड पर पूरे विश्‍व की नजर होती है। इस जश्‍न में हर राज्‍य की झांकियाँ शामिल होती हैं। इस बार परेड में उत्तर प्रदेश की झाँकी बेहद खास होगी। यूपी की ओर से अयोध्या में बन रहे राम मंदिर की महिमा और भव्यता का प्रदर्शन गणतंत्र दिवस परेड की झाँकी में किया जाएगा। परेड के लिए राम मंदिर और दीपोत्‍सव की झलक वाली झाँकी तैयार हो गई है।

26 जनवरी को राजपथ पर आयोजित होने वाली परेड में अयोध्या की धरोहर, भव्य राम मंदिर की प्रतिकृति, दीपोत्सव की झलक और पौराणिक ग्रंथ रामायण के विभिन्न हिस्सों की झाँकी प्रदर्शित की जाएगी। अधिकारियों ने शुक्रवार (जनवरी 22, 2021) को यह जानकारी दी। बताया गया कि झाँकी के अग्रिम हिस्से में महर्षि वाल्मीकि की एक प्रतिमा विराजमान होगी, जिसके पीछे मंदिर का प्रारूप मौजूद होगा।

उत्तर प्रदेश की टीम के साथ आए राज्य सरकार के एक अधिकारी ने कहा, “अयोध्या हमारा पवित्र स्थान है और राम मंदिर मुद्दे से श्रद्धालुओं का भावनात्मक जुड़ाव रहा है। हमारी झाँकी में (अयोध्या) नगर की प्राचीन धरोहर को दिखाया जाएगा।” यूपी की झाँकी में नृत्य करती दो महिलाओं समेत कलाकारों का एक समूह दिखेगा। भगवान राम की वेशभूषा में एक व्यक्ति भी झाँकी में दिखेगा। शुक्रवार को दिल्ली छावनी स्थित गणतंत्र दिवस सांस्कृतिक शिविर में कुल 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विभिन्न झाँकियों से मीडिया को अवगत कराया गया।

पीले रंग की रेशम की धोती और गले में रूद्राक्ष की माला पहने तथा हाथ में धनुष लिए चंदौली जिल के रहने वाले अजय कुमार ने कहा, “मैं बहुत उत्साहित और खुश हूँ कि अयोध्या और इसकी धरोहर को झाँकी में प्रदर्शित किया जाएगा और मुझे भगवान राम की भूमिका निभाने के लिए चुना गया है।”

यूपी की झाँकी में एक ओर मिट्टी के बने दीये जगमगा रहे होंगे, जो अयोध्या के दीपोत्सव के प्रतीक होंगे। वहीं, अन्य भित्ति चित्रों (वॉल पेंटिंग्स) में भगवान राम द्वारा निषादराज को गले लगाते और शबरी के जूठे बेर खाते, अहिल्या का उद्धार, हनुमान द्वारा संजीवनी बूटी लाया जाना, जटायु-राम संवाद, लंका नरेश की अशोक वाटिका और अन्य दृश्यों को दिखाया जाएगा

झाँकी का शीर्षक ‘अयोध्या: उत्तर प्रदेश का सांस्कृतिक विरासत’ होगा। इसमें अयोध्या और विभिन्न देशों में भगवान राम से संबंधित संस्कृति, परंपरा और कला को भी चित्रित किया जाएगा। मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ खुद इस भव्‍य झाँकी का अवलोकन कर चुके हैं। भगवान राम के जन्मस्थान पर लंबे समय से प्रतीक्षित मंदिर के निर्माण के साथ अयोध्या धार्मिक पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र बन रहा है।

बता दें कि दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड में प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या में बन रहे भव्य और दिव्य मंदिर के वैभव की झाँकी दिखाए जाने का प्रस्ताव यूपी की योगी सरकार ने पिछले साल दिसंबर में केन्द्र सरकार को भेजा था। 

गौरतलब है कि 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर का भूमि पूजन किया था। नवंबर 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में विवादित भूमि पर दशकों से चली आ रही लड़ाई को समाप्त करते हुए राम मंदिर निर्माण की अनुमति दी थी।

बायकॉट, ब्लैकआउट और अब ट्रैक्टर परेड: 26 जनवरी पर अराजकता फैलाने का लिबरल-कट्टरपंथियों का पैंतरा पुराना

कथित तौर पर नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठनों ने इस साल 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस पर राजधानी में व्यापक स्तर पर परेड निकालने की योजना बना रखी है। कहा जा रहा है कि करीब 1 लाख ट्रैक्टर के साथ यह परेड निकाला जाएगा। इसको लेकर लोग कई तरह की आशंका जता रहे हैं और किसान संगठनों के नेताओं के मंसूबों पर सवाल उठा रहे हैं।

यह बेवजह भी नहीं है। ये संगठन न केवल सरकार के साथ बातचीत में अड़ियल रवैया अपनाए हुए हैं, बल्कि परेड को लेकर कानून प्रवर्तन एजेंसी के आदेश को भी चुनौती दे रहे हैं। इनके परेड को दिल्ली पुलिस की इजाजत नहीं है। सुरक्षा के लिहाज से इसी संबंध में पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय का भी दरवाजा खटखटाया था। लेकिन, कोर्ट ने ट्रैक्टर रैली को कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला बताते हुए कहा कि यह फैसला करने का पहला अधिकार पुलिस को है कि राष्ट्रीय राजधानी में किसे प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए और किसे नहीं।  

कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद चूँकि फैसला पुलिस को लेना था तो उन्होंने गुरुवार (जनवरी 21, 2020) को किसान संगठनों के साथ बैठक की। इसमें पुलिस ने प्रस्तावित ट्रैक्टर रैली को दिल्ली के व्यस्त बाहरी रिंग रोड की बजाय कुंडली-मानेसर पलवल एक्सप्रेस-वे पर आयोजित करने का सुझाव दिया, जिसे किसान संगठनों ने अस्वीकार कर दिया और अपनी बात अड़े रहे।

यहाँ सवाल यह है कि गणतंत्र दिवस के मायने जब सबको मालूम हैं तो आखिर ये जिद्द कैसी है और क्यों हैं?

आशंका जताई जा रही है कि 26 जनवरी को ऐसी कोशिशों के चलते अराजकता फैलाई जा सकती है। पूर्व में भी इस तरह के प्रयास लिबरल, कट्टरपंथी और हिंसक ताकतें कर चुकी हैं।

35 साल पहले एक ऐसी ही कोशिश सांसद सैयद शहाबुद्दीन ने की थी। 23 दिसंबर 1986 को अखिल भारतीय बाबरी मस्जिद कॉन्फ्रेंस का गठन कर मीडिया को बुलाया गया और 26 जनवरी का बायकॉट करने का ऐलान मुस्लिमों से किया गया। शुरू में इस ऐलान पर ज्यादा किसी ने ध्यान नहीं दिया लेकिन बाद में मामला तूल पकड़ता गया। सैयद शहाबुद्दीन ने उस साल मुसलमानों से गणतंत्र दिवस समारोह से अलग रहने की अपील की थी।

9 साल पहले कश्मीर में हुर्रियत के कट्टरपंथी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी ने लोगों से गणतंत्र दिवस समारोह के बहिष्कार का आह्वान किया था।  गिलानी ने कहा था कि शरीयत अदालत ने जिस तरह ईसाई मिशनरियों के खिलाफ फतवा जारी किया है, वैसा ही कश्मीर में भारत के कब्जे के खिलाफ भी फतवा जारी करना चाहिए। गिलानी का कहना था कि कि गणतंत्र दिवस समारोह का कश्मीर से कोई सरोकार नहीं है।

3 साल पहले 2019 को मिजोरम में एनआरसी का विरोध करके सारे मामले को गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम की ओर घुमाया गया था। एक जगह 70वें गणतंत्र दिवस पर पूरा देश में धूम थी, वहीं मिजोरम के कई संगठनों ने राज्यव्यापी कार्यक्रमों के बहिष्कार की घोषणा की थी।

आज कृषि आंदोलन के नाम पर देश में वही माहौल बना दिया गया है कि पूरा राष्ट्र 26 जनवरी पर ध्यान केंद्रित करने की जगह एक ऐसी रैली पर ध्यान टिकाए बैठा है, जिसे न पुलिस मंजूरी दे रही है और न सरकार की। लोगों में सुरक्षा को लेकर संदेह है। उन्हें डर है कि कहीं देश के लिए इतने महत्वपूर्ण दिन इसका फायदा देशविरोधी ताकतें न उठा लें।

वैसे भी राकेश टिकैत जैसे लोग बोल चुके हैं कि जिसने भी उन्हें रोकने का प्रयास किया उसका बक्कल उतार दी जाएगी और खालिस्तानी ऐलान कर चुके हैं कि जो भी इस दिन इंडिया गेट पर उनका झंडा फहराएगा उसे वे न केवल भारी इनाम से नवाजेंगे, बल्कि विदेश में परिवार सहित  बसने का भी मौका देंगे।

ऐसे ही असुरक्षा के तमाम संकेत होने के बावजूद ‘किसान नेता’ सुनने को तैयार नहीं हैं। वह एक ऐसे दिन पर अपनी राजनीति करना चाहते हैं जिसके तार न केवल इतिहास से जुड़े हैं बल्कि भावनात्मक तौर पर भी यह तारीख लोगों के जहन में जिंदा है। 

1990 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन द्वारा राष्ट्रपति को लिखे एक पत्र से इसके मायने समझे जा सकते हैं। अपने पत्र में उन्होंने इस्लामी आतंवाद पर पहली मनौवैज्ञानिक जीत पर लिखा था, “यह वाकई चमत्कार था कि 26 जनवरी को कश्मीर बचा लिया गया और हम राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी उठाने से बच गए। इस दिन की कहानी लम्बी है और यह बाद में पूरे ब्यौरे के साथ बताई जानी चाहिए।

असल में उस साल 26 जनवरी जुमे के दिन थी। ईदगाह पर 10 लाख लोगों को जुटाने की योजना बनाई गई थी। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से लोगों को छोटे-छोटे समूह में ईदगाह पहुॅंचने को उकसाया जा रहा था। श्रीनगर के आसपास के गॉंव, कस्बों से भी जुटान होना था। योजना थी कि जोशो-खरोश के साथ नमाज अता की जाएगी। आजादी के नारे लगाए जाएँगे। आतंकवादी हवा में गोलियॉं चलाएँगे। राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाएगा। इस्लामिक झंडा फहाराया जाएगा। विदेशी रिपोर्टर और फोटोग्राफर तस्वीरें लेने के लिए वहॉं जमा रहेंगे। उससे पहले 25 की रात टोटल ब्लैक आउट की कॉल थी। गौरतलब है कि 19 जनवरी 1990 को ही कश्मीरी पंडितों के खिलाफ बर्बर अभियान शुरू हुआ था।

आज परिस्थितियाँ वैसी ही हैं। कथित किसान आंदोलन पर कट्टरपंथियों, खालिस्तानियों के कब्जे को लेकर कई खबरें सामने आ चुकी है। लेकिन, यह भारत है। उसका गणतंत्र है। लिबरल चोले में लिपटी कट्टरपंथी, अराजक, खालिस्तानी ताकतें परास्त होंगी।

हाथी पर जलता कपड़ा फेंका, दर्द से छटपटाया फिर तोड़ दिया दम: Video वायरल

तमिलनाडु के नीलगिरी में एक हाथी की मौत ने सभी को झकझोर कर रख दिया है। बताया जा रहा है कि किसी शख्स ने जलते कपड़े को हाथी के ऊपर फेंक दिया था, जिसकी वजह से हाथी बुरी तरह घायल हो गया और कुछ दिन बाद मंगलवार (जनवरी 19, 2021) को इलाज के लिए ले जाने के दौरान उसकी मौत हो गई। 

क्या है मामला 

पूरा मामला नीलगिरी के मसिनागुड़ी क्षेत्र का है। कथित तौर पर यहाँ किसी ने कपड़े में आग लगाकर उसे 40 वर्षीय एक हाथी के ऊपर फेंक दिया। जिसके चलते हाथी दर्द से इधर-उधर भागने लगा। इस दौरान उसके कान के आसपास का हिस्सा बुरी तरह झुलस गया। 

इलाज के दौरान तोड़ा दम 

घायल हालत में इस हाथी को देखकर वन रेंजर्स उपचार के लिए ले गए। हालाँकि, वन विभाग के स्टाफ द्वारा किए जा रहे तमाम प्रयासों के बावजूद भी हाथी को बचाया नहीं जा सका। इसके बाद हाथी को क्रेन के जरिए ट्रक पर लादकर अंतिम क्रिया के लिए ले जाया गया।

अधिकारियों को घटना का वीडियो भी मिला है। एमटीआर के उप निदेशक ने एक बयान में कहा, “मसिनागुड़ी क्षेत्र में घायल नर हाथी की बचाव और उपचार प्रक्रिया के दौरान 19.01.21 को मौत हो गई थी। हमने खुफिया जानकारी जुटाई और जाँच की और हाथी को आग से चोट पहुँचाने के बारे में एक प्रूफ वीडियो हासिल किया।”

वीडियो के आधार पर दो व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया है। इनकी पहचान प्रसाथ और रेमंड डीन के तौर पर हुई है। दोनों मावनाला के रहने वाले हैं। इसके अलावा रिकी रेयान नाम के एक और शख्स के इसमें शामिल होने की बात बताई जा रही है। 

अधिकारी ने बताया, “हिरासत में लिए गए दो लोगों को आज गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें रिमांड पर भेजा जाएगा। आगे की जाँच की जा रही है।”

एमटीआर के उपनिदेशक ने उन रिपोर्टों का भी खंडन किया कि हाथी पर जलते हुए टायर फेंके जाने के बात कही गई थी। उन्होंने कहा, “वास्तव में यह वह कपड़ा है जिसे हाथी का पीछा करने के लिए जलाया गया था और अंत में उस पर फेंक दिया गया था। यह आरोपित व्यक्तियों द्वारा भी स्वीकार किया गया।” बता दें कि कुछ मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हाथी के ऊपर जलता हुए टायर फेंका गया था।

वायरल वीडियो में उसी हाथी के होने की भी आशंका जताई जा रही है जिसमें एक रेंजर को रोते हुए देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर इस हाथी का जो वीडियो सामने आया है, उसमें एक वन रेंजर को ट्रक में मृत पड़े हाथी की सूँड़ पकड़कर रोते देखा जा सकता है। इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर कई लोगों को भावुक कर दिया और लोग हाथी के साथ इस बर्बर वारदात को अंजाम देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। वायरल वीडियो में अधिकारी को कहते हुए सुना जा सकता है, “मैं किससे बात करूँगा? मैं किसका ध्यान रखूँगा? हे भगवान, आइ एम सॉरी।”

तमिलनाडु में करंट लगने से हाथी की मौत

गौरतलब है कि इससे पहले तमिलनाडु में कोयंबटूर के बाहरी इलाके में स्थित एक गाँव के धान के खेत के आसपास लगाई बाड़ में बिजली का तार अवैध तरीके से जोड़ दिया गया था, जिसके संपर्क में आने के कारण 15 वर्षीय नर हाथी की मौत हो गई थी। वन अधिकारियों ने बताया था कि सेम्मेदु गाँव के निवासियों ने इलाके में हाथी की मौजूदगी के बारे में वन विभाग के अफसरों को सूचना दी थी। वन विभाग के पशु चिकित्सक ने हाथी की जाँच की और बताया कि उसकी मौत करंट लगने से हुई।

केरल में भी हो चुकी है ऐसी घटना

उल्‍लेखनीय है कि जून 2020 में केरल में भी ऐसा ही मामला सामने आया था, जब कुछ लोगों ने एक गर्भवती हथिनी को बारूद से भरा अनानास खिला दिया था। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर तब लोगों ने एक ऑनलाइन पिटिशन भी साइन किया था।

कोरोना की वैक्सीन बनाने वाली सीरम को आग से ₹1000 करोड़ का नुकसान, उद्धव बोले- चल रही जाँच

पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की इमारत में लगी आग और जान-माल के नुकसान पर कंपनी के सीईओ अदार पूनावाला ने प्रतिक्रिया दी है। पूनावाला ने कहा कि उस जगह वैक्सीन का निर्माण नहीं हो रहा था, जहाँ ये आग लगी थी। इससे कोरोना की वैक्‍सीन के काम पर असर नहीं पड़ा है। यह पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने बताया कि करीब 1,000 करोड़ से रुपए से अधिक की संपत्ति का नुकसान हुआ है।

पूनावाला ने कहा कि यह नया संयत्र था, जहाँ भविष्य के लिए बीसीजी और रोटावायरस वैक्सीन का उत्पादन होना था। वहाँ कोई वास्तविक वैक्सीन अभी बनाई ही नहीं जा रही थी। covishield के उत्पादन और संरक्षण का काम पहले की तरह चल रहा है। पूनावाला ने कहा कि आग से सिर्फ वित्तीय नुकसान हुआ है।

पूनावाला ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के साथ एक प्रेस कान्फ्रेंस में यह बात कही। उद्धव ठाकरे से जब अग्निकांड को लेकर पूछा गया तो उन्हें कहा आग लगने की वजह की जाँच की जा रही है। जब तक जाँच रिपोर्ट नहीं आती है, इसके बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकल सकता है।

मुख्यमंत्री ने कहा, “सौभाग्य से वह स्थान जहाँ टीका का निर्माण और भंडारण किया जाता है, प्रभावित नहीं हुआ। मुझे अदार और प्रबंध निदेशक सायरस द्वारा सूचित किया गया कि आग जहाँ लगी उससे दूरी पर COVID वैक्सीन का निर्माण किया जाता है।”

बता दें कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे ने आज (जनवरी 22, 2021) सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) के निर्माणाधीन भवन का दौरा किया। जहाँ आग लगने से पाँच लोगों की मौत हो गई थी। ठाकरे सीरम संस्थान के उस केन्द्र में भी गए, जहाँ कोरोना वैक्सीन कोविशिल्ड तैयार की जा रही है।

गौरतलब है कि पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट में गुरुवार (जनवरी 21, 2021) को आग लगने से पूरे इलाके में अफरा तफरा मच गई थी। सीरम इंस्टीट्यूट ने दुर्घटना में जान गवाँने वाले मजदूरों के परिजनों को 25 लाख रुपए देने का ऐलान किया था। SII के अध्यक्ष साइरस पूनावाला ने कहा था, “SII में हम सभी के लिए यह एक अत्यंत दुखद दिन है। हमें गहरा दुख हुआ है और दिवंगत परिवारों के प्रति हमारी संवेदना है। हम मानदंडों के अनुसार अनिवार्य राशि के अलावा, प्रत्येक परिवार को 25 लाख रुपए का मुआवजा देंगे।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इंस्टीट्यूट में आग लगने से हुए जानमाल के नुकसान पर अपना दुख व्यक्त किया था। पीएम मोदी ने ट्वीट किया था, “सीरम इंस्टीट्यूट में आग की वजह से जानमाल के नुकसान से दुखी हूँ। दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदना मृतकों के परिजनों के साथ हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ कि हादसे में जो लोग घायल हुए वो जल्द से जल्द ठीक हो जाएँ।”

बातचीत फिर बेनतीजा, किसान संगठनों पर सरकार सख्त: जानिए, क्यों ट्रेंड कर रहा है #खालिस्तानी_माँगे_कुटाई

केंद्र सरकार और नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे कथित किसान संगठनों के बीच शुक्रवार (22 जनवरी 2021) को 11वें दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही। संगठनों के अड़ियल रवैए को देखते हुए सरकार ने भी अब बातचीत की अगली तारीख नहीं दी है। अपनी ओर से दिए गए प्रस्तावों पर विचार करने को कहा है।

किसान नेताओं ने मीटिंग के बाद कहा, “सरकार द्वारा जो प्रस्ताव दिया गया था वो हमने स्वीकार नहीं किया। कृषि क़ानूनों को वापस लेने की बात को सरकार ने स्वीकार नहीं की। अगली बैठक के लिए अभी कोई तारीख तय नहीं हुई है।”

‘किसान’ नेताओं के अड़ियल रवैए से जनसामान्य का जीवन भी प्रभावित होने लगा है। राकेश टिकैत जैसे नेता हर सुरक्षा मानक को नकारते हुए 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली करने पर अड़े हैं। शुक्रवार को इस संबंध में परेड की रिहर्सल भी हुई।

अब कथित किसानों की इसी मनमानी को देखते हुए लोगों के सब्र का बाँध टूटने लगा है और लोग आंदोलन में शामिल उन अराजक तत्वों पर कार्रवाई की मॉंग कर रहे हैं जो किसानों को ये समझने नहीं दे रहे कि उनके हित में क्या है क्या नहीं?

आज सुबह से ट्विटर पर खालिस्तानी_माँगे_कुटाई ट्रेंड कर रहा है। इस ट्रेंड पर अब तक 41 हजार ट्वीट हो चुके हैं। भारतीय फिल्म निर्देशक अशोक पंडित ने हैशटैग के अंतर्गत लिखा है, “तथाकथित किसान आंदोलन में सिख फॉर जस्टिस, खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स, बब्बर खालसा इंटरनेशनल और खालिस्तान टाइगर फोर्स जैसे आतंकी संगठन शामिल हैं। जरूरी है कि इन देश विरोधी ताकतों को कुचला जाए।”

आशीष शुक्ला इस हैशटैग के अंतर्गत किसान नेता राकेश टिकैत द्वारा बार बार ट्रैक्टर रैली करने की बात पर कहते हैं, “अगर 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली के ड्रामे के दौरान कोई भी दंगा हुआ तो दिल्ली पुलिस इसी पागल (psycho) व्यक्ति को यूएपीए एक्ट के तहत गिरफ्तार करना।”

समिता शर्मा ने जैजी बी की भड़काऊ वीडियो शेयर करके खालिस्तानियों पर निशाना साधा है। वह कहती हैं कि सरकार को धमकाना, झूठ बोलना, किसानों को अराजकता पैदा करने के लिए सड़कों पर उतरने के लिए उकसाना और ऐसे देश विरोधी प्रतिबंधित संगठनों की भागीदारी जो भिंडरावाला के नक्शेकदम पर चलती है- एक आंदोलन है जिसे किसान आंदोलन कहा जाता है।

इस हैशटैग में किसान आंदोलन के दौरान हुई किसानों की मृत्यु को लेकर राकेश टिकैत को जिम्मेदार बताया जा रहा है। लोगों का कहना है कि यही आदमी किसानों की भावनाओं से और भारत की अखंडता से खेल रहे हैं। लोग आरोप लगा रहे हैं कि इन लोगों को खालिस्तानी संगठनों से फंडिंग मिल रही हैं।

राकेश टिकैत की वीडियो शेयर करके कहा जा रहा है कि इन लोगों को कभी भी किसान नेताओं से लेना-देना नहीं था। इनका मकसद सिर्फ़ अराजकता पैदा करना था, हिंसा फैलाना था और वैश्विक स्तर पर मोदी के ख़िलाफ़ नैरेटिव गढ़ना था। ऐसे फर्जी किसानों/ खालिस्तानियों के साथ वहीं करना चाहिए जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद भिंडरावाले के साथ हुआ था।

वीडियो में टिकैत कहते सुनाई दे रहे हैं, “देश को गणतंत्र दिवस मनाने का अधिकार है। किसी के बाप की जागीर है गणतंत्र दिवस। ये गणतंत्र दिवस दुनिया का किसान मनाएगा। दुनिया की सबसे बड़ी परेड होगा। कौन रोकेगा किसान को।” वह दिल्ली को खबरदार करते हुए कहते हैं कि अगर ट्रैक्टर को रोका गया तो उसका इलाज होगा। अगर किसी ने रोका तो उसकी बक्कल उतार दी जाएगी। वह चिल्लाकर पूछते हैं कि कौन रोकेगा ट्रैक्टर को? कोई नहीं रोकेगा।

बता दें कि इस हैशटैग में कुछ लोग अराजक तत्वों का निवारण करने की बात कहकर इस बात पर गौर करवा रहे हैं कि आखिर केवल पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों के किसान ही इसमें शामिल क्यों हो रहे हैं? वहीं कुछ लोग इस हैशटैग को ट्रेंड करवाने वालों की मंशा पर सवाल उठा कर पूछ रहे हैं कि क्या किसान प्रदर्शन पर बैठे सिख वाकई खालिस्तानी हैं। 

गौरतलब हो कि इस खींचतान और 11वें दौर की बैठक के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का बयान आया है। उन्होंने कहा, “भारत सरकार PM मोदी जी के नेतृत्व में किसानों और गरीबों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है और रहेगी… विशेष रूप से पंजाब के किसान और कुछ राज्यों के किसान कृषि क़ानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “इस आंदोलन के दौरान लगातार ये कोशिश हुई कि जनता के बीच और किसानों के बीच गलतफहमियाँ फैलें। इसका फायदा उठाकर कुछ लोग जो हर अच्छे काम का विरोध करने के आदी हो चुके हैं, वे किसानों के कंधे का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए कर सकें।”

रूस में हिन्दू धर्म: इतिहास, रूसी समाज में स्वीकार्यता और कट्टरपंथी ईसाई द्वोरकिन के हमले

रूस में हिन्दुओं की आधिकारिक संख्या लगभग 1,40,000 बताई जाती है और हिन्दू धर्म अपने सर्वसमावेशी स्वभाव के कारण रूसी समाज में लगातार लोकप्रिय हो रहा है। इसमें सबसे बड़ा प्रचार कार्य अध्यात्मिक गुरु श्री प्रकाश जी के द्वारा किया जा रहा है, जो नब्बे के दशक में रूस गए थे और वहीं रह कर लोगों को भारतीय और सनातन संस्कृति के बारे में बताने लगे।

उनके स्वभाव और हिन्दू मूल्यों की सामाजिक स्वीकार्यता के कारण ऑर्थोडॉक्स चर्च समेत, कुछ ईसाई कट्टरपंथी उनके, उनके परिवार और अनुयायियों के ऊपर लगातार कानूनी हमले करने लगे। उन्हें आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से भी प्रताड़ित किया जाने लगा। अलेक्ज़ेंडर द्वोरकिन नामक व्यक्ति ने रूस समेत कई देशों में हिन्दुओं को ‘डीमन वर्शिपर’ (राक्षसों की पूजा करने वाले) आदि कह कर, धर्म को एक ‘कल्ट’ बताने की कोशिश की। उसने अपने दोस्तों की मदद से लगातार रूसी हिन्दुओं के प्रतिष्ठानों और उनके व्यवसायों को निशाना बनाया।

इसी सिलसिले में ऑपइंडिया ने गुरु श्री प्रकाश जी के सुपुत्र प्रसून प्रकाश जी से रूस में हिन्दुओं की स्थिति, स्वीकार्यता, द्वोरकिन के हमलों समेत कई पहलुओं पर बातचीत की जिसे आप यहाँ क्लिक कर के देख सकते हैं।

मंदिर की दानपेटी में कंडोम, आपत्तिजनक संदेश वाले पोस्टर; पुजारी का खून से लथपथ शव मिला

कर्नाटक के एक मंदिर की दानपेटी से कंडोम और आपत्तिजनक संदेश वाला पोस्टर मिला है। वहीं उत्तर प्रदेश में एक शिव मंदिर के पुजारी का खून से लथपथ शव मिला है। दोनों घटनाओं के दोषियों की पहचान नहीं हो पाई है।

मंगलुरु के उल्लाल के पास कोरागाजा गुलीगाजा देवस्थान की दानपेटी में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और उनके बेटे बीवाई विजयेंद्र की छेड़छाड़ की गई तस्वीर वाला पोस्टर और कंडोम का एक सेट मिलने से शहर में तनाव का माहौल उत्पन्न हो गया है।

रिपोर्टों के अनुसार, शरारती तत्वों ने तटीय जिले में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश में मंदिर की हुंडी (दान पात्र) के अंदर कंडोम गिरा दिया। इसके अलावा सीएम बीएस येदियुरप्पा और उनके बेटे सांसद विजेंद्र के आपत्तिजनक संदेशों के साथ एक मॉर्फ्ड पोस्टर भी पेटी में मिला।

छेड़छाड़ किए गए पोस्टर में पीएम मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और अन्य बीजेपी नेताओं के चित्र भी थे। इस मॉर्फ्ड पोस्टर पर शरारती तत्वों ने कुछ आपत्तिजनक बातें भी लिखी थी।

पोस्टर पर लिखा गया था, “खबरदार! स्वर्ग से भगाए गए धोखेबाज स्वर्गदूत नकली देवता बन गए हैं और मूर्तियों के माध्यम से पृथ्वी पर मनुष्यों को भ्रष्ट कर रहे हैं। राजनेता, जो लोगों को लूटते हैं, वे खून चूसने वाले मच्छरों की तरह होते हैं। उन्हें पीट-पीटकर मार डाला जाना चाहिए।”

पोस्टर में सभी भ्रष्ट राजनीतिक नेताओं को मारने का आह्वान किया गया था। घटना के बाद उल्लाल पुलिस स्टेशन में दोषियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। यह घटना उस समय सामने आई जब 19 जनवरी को कोरागाजा सेवा समिति द्वारा हुंडी खोली गई।

मंगलुरु पुलिस ने मंदिरों में सीसीटीवी लगाने के लिए कहा

इस बीच, मंगलुरु पुलिस ने कहा कि कुछ दोषियों ने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए यह कृत्य किया था। उन्होंने कहा कि वे इस कृत्य के पीछे के लोगों का पता लगाएँगे।

मीडिया से बात करते हुए, पुलिस आयुक्त एन शशि कुमार ने कहा, “ऐसी घटनाएँ भक्तों की भावनाओं को आहत कर रही हैं।” पुलिस विभाग उन लोगों को नहीं बख्शेगा जिन्होंने इस तरह का अपराध किया है। आज या कल वे पकड़े जाएँगे। इस तरह के कृत्य को दोहराया नहीं जाना चाहिए।”

पुलिस आयुक्त ने कहा कि आरोपितों का पता लगाने के लिए एक विशेष टीम बनाई गई है। उन्होंने कहा, “धार्मिक भावनाओं को आहत करना एक दुखद बात है। इस तरह की शरारत करने वालों को पकड़ा जाएगा।”

कुमार ने मंदिरों और अन्य पूजा स्थलों के प्रबंधन अधिकारियों से इस तरह के अपराधों से बचने के लिए सीसीटीवी कैमरा लगाने के लिए कहा। उन्होंने कहा, “सीसीटीवी कैमरे होने से शरारत और चोरी की ऐसी वारदातों में शामिल लोगों को जल्द ढूँढने में मदद मिलेगी।” 

शहर के तीन अन्य मंदिरों में इसी तरह की घटना घटने के कुछ ही हफ्तों बाद चौंकाने वाली हरकतें सामने आईं। कुछ उपद्रवियों ने शहर के तीन अन्य मंदिरों में हुंडियों में अपमानजनक पोस्टर के साथ इस्तेमाल किया गया कंडोम और नकली नोट डाल दिया था।

नकली नोटों पर एक संदेश लिखा हुआ था, “मुसलमानों और सुअर जैसे हिंदुओं को पीट-पीटकर मार डाला जाना चाहिए। लॉर्ड जीसस क्राइस्ट इकलौते ईश्वर हैं जो पूजा के योग्य हैं।” यह शहर के अटावरा इलाके में स्थित भगवान श्री बाबुस्वामी क्षत्र और भगवान श्री दैवराजा कोरदाबू देवस्थान में पाए गए थे। ये सभी घटनाएँ मंदिरों से सामने आई हैं, जहाँ सीसीटीवी कैमरे नहीं हैं।

लखनऊ में पुजारी की निर्मम हत्या

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बाहरी इलाके में शिवपुर गाँव में एक शिव मंदिर के 85 वर्षीय पुजारी की बेरहमी से हत्या कर दी गई। पुलिस अधीक्षक, लखनऊ ग्रामीण, हिरदेश कुमार ने कहा कि पुजारी फकीरे दास का खून से लथपथ शव बुधवार (जनवरी 20, 2021) को मंदिर परिसर में उनकी झोपड़ी के अंदर मिला।  पुलिस के अनुसार पुजारी के सिर पर चोट के निशान हैं। एसपी ने कहा, “चोरी के कोई निशान नहीं हैं। मंदिर की दान पेटी में रखी नकदी भी चोरी नहीं हुई है।” पुजारी मूल रूप से सुल्तानपुर जिले के रहने वाले थे।

जून डो हजार इख्खीस टक लोखटांट्रिक टरीखे से चूना जाएगा खाँग्रेस पारटी का प्रेसीडेंट….

कॉन्ग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने ऐलान किया है कि जून 2021 तक पार्टी अपने अध्यक्ष पद को लेकर निर्णय ले लेगी। कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी की शुक्रवार (जनवरी 22, 2021) को हुई बैठक के बाद यह ऐलान किया गया। पार्टी का कहना है कि इस साल कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी संगठन का चुनाव करेगी, जिसमें अध्यक्ष पद का चुनाव सबसे अहम है।

अब पार्टी में चल रहे आंतरिक मतभेद के बाद जहाँ सार्वजनिक रूप से कॉन्ग्रेस की ओर से यह घोषणा हुई है। वहीं सोशल मीडिया में यूजर्स इस बात को बहुत हल्के में ले रहे हैं। वह पूछ रहे हैं कि आखिर तारीख पर तारीख देने से क्या होगा जब अंतिम जजमेंट सबको मालूम है कि अध्यक्ष पद गाँधी या वाड्रा परिवार के पास ही जाएगा। कुछ यूजर्स मीम बनाकर राहुल गाँधी के ही ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर कर रहे हैं। इसमें राहुल गाँधी ने लिखा था, “नीयत साफ नहीं है जिनकी। तारीख पे तारीख देना स्ट्रैटेजी है उनकी।”

यहाँ एक तरह से यदि देखें तो कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर जनता के तंज निराधार नहीं है। पिछले 23 सालों से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का पद लगातार गाँधी परिवार के पास है। 1996 में सीताराम केसरी इस पद पर नियुक्त हुए थे और मात्र 2 साल बाद ही उनके बदले सोनिया गाँधी को 1998 में यह पद सौंप दिया गया।

इसके बाद उन्होंने इस पद को पूरे 19 (1998-2017) साल तक पकड़े रखा। फिर 2017 में ये गद्दी राहुल गाँधी को सौंपी गई और जब 2019 में लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद राहुल गाँधी इस्तीफा देकर बैंकॉक की ओर रवाना हुए तो सोनिया गाँधी दोबारा कॉन्ग्रेस में अंतरिम अध्यक्ष पद के लिए चुन ली गईं। ये सब बिलकुल ऐसा था जैसे सोनिया गाँधी ने कुछ दिन राहुल का मन बहलाने के लिए उन्हें गद्दी दी और जैसे ही वह इसके लिए नाकाबिल साबित हुए तो वापस अपने हाथ में ले लिया।

2020 में जब इसके विरोध में आवाज उठनी शुरू हुई तो ऊपरी तौर पर सोनिया गाँधी ने ये कुर्सी छोड़ने की इच्छा जाहिर की। फिर उनके वफादार मोर्चे पर आए और गाँधी परिवार से अध्यक्ष को बनाए रखने के लिए खूब हल्ला किया। नतीजतन, अध्यक्ष फिर वही का वही रहा। हांँ, बीच में कई कॉन्ग्रेसी नेताओं ने इस तरह पार्टी के शीर्ष पद पर स्थिरता न होने पर आपत्ति जाहिर की। लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। बदले में आवाज उठाने वालों को ही विद्रोही करार देने की कोशिश होने लगी।

बता दें कि अध्यक्ष पद पर चुनाव को लेकर कपिल सिब्बल समेत 23 नेताओं ने सोनिया गाँधी को चिट्ठी लिखी थी। इसके बाद उन्होंने जल्द ही इस संबंध में फैसला लेने की बात भी की थी। हालाँकि बैठक के कुछ माह बाद भी जब निर्णय नहीं लिया गया तब कपिल सिब्बल ने दोबारा एक साक्षात्कार में इस मुद्दे को उठाया और उसके कुछ दिन बाद अब ये ऐलान हुआ कि इस पर फैसला अभी 5 माह बाद लिया जाएगा जब सारे राज्यों में विधानसभा चुनाव हो जाएँगे।

इसका एक मतलब हुआ कि तब तक सिर्फ़ सोनिया गाँधी ही अध्यक्ष रहेंगी और दूसरा ये कि यदि दोबारा कॉन्ग्रेस राहुल को ही अध्यक्ष बनाने का प्लान कर रही है तो वह भी आने वाले 5 महीने में सभी विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराए जाएँगे।

उल्लेखनीय है कि आज कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में भी पार्टी के दिग्गज नेता आनंद शर्मा और राजस्थान सीएम अशोक गहलोत के बीच इसे लेकर बहस हुई। अशोक गहलोत ने पार्टी नेतृत्व में स्थितरता की बात कर रहे असंतुष्ट नेताओं पर निशाना साधा। उन्होंने हुए कहा कि बार-बार चुनाव की माँग जो नेता कर रहे हैं क्या उन्हें पार्टी नेतृत्व पर भरोसा नहीं है, वहीं आनंद शर्मा ने सीडब्ल्यूसी सदस्यों का चुनाव करवाने की माँग उठाई।

JNU के ‘पढ़ाकू’ वामपंथियों को फसाद की नई वजह मिली, आइशी घोष पर जुर्माना; शेहला भी कूदी

जेएनयू में हुई हिंसा का चेहरा रही आइशी घोष फिर से चर्चा में हैं। उनके चर्चा में आते ही शेहला रशीद ने भी खुद को सुर्खियों में रखने का तरीका खोज निकाला है। इससे लगता है कि जेएनयू में पढ़ने वाले वामपंथी ‘कार्यकर्ताओं’ और कथित छात्रों को विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने की नई वजह मिल गई है। यह वजह है कैंपस के अंदर हॉस्टल के कमरों में अवैध रूप से प्रवेश करके कोविड-19 प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने पर कई छात्रों पर जुर्माना लगाया जाना।

रिपोर्टों के अनुसार, जेएनयू प्रशासन ने पिछले साल दिसंबर में कोरोना वायरस महामारी के बीच कई छात्रों को परिसर में हॉस्टल के कमरों में अवैध रूप से रहने के लिए जुर्माना देने के लिए कहा था। JNU के कुछ ‘छात्रों’ ने यूनिवर्सिटी में आधिकारिक रूप से दोबारा प्रवेश की अनुमति देने से पहले ही छात्रावास में प्रवेश किया था।

वर्तमान में केवल अंतिम वर्ष के पीएचडी, एमफिल और साइंस स्ट्रीम से एमटेक छात्रों को ही परिसर के अंदर रहने की अनुमति है। लॉकडाउन के दौरान, छात्रों को कैंपस में कोरोना वायरस मामलों की बढ़ती संख्या के कारण अपने घर लौटने के लिए कहा गया था। विश्वविद्यालय ने अभी तक परिसर में छात्रावासों के खुलने की सूचना नहीं दी है। केवल कुछ छात्रों को ही छात्रावास में रहने की अनुमति दी गई है।

JNUSU अध्यक्ष आइशी घोष अवैध रूप से हॉस्टल में रह रही

JNUSU अध्यक्ष और JNU दंगा मामले में आरोपित आइशी घोष और कुछ अन्य छात्रों ने हॉस्टल के कमरों पर अवैध तरीके से कब्जा कर लिया। इसके बाद यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने नोटिस भेजकर उन्हें अवैध रूप से रहने के लिए जुर्माना भरने को कहा है।

कोयना छात्रावास में रहने वाली आइशी घोष को हाल ही में अवैध रूप से रहने के लिए नोटिस भेजा गया और 2,000 रुपए का जुर्माना देने को कहा गया। वरिष्ठ वार्डन द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस में कहा गया है, “सुरक्षा गार्ड द्वारा हमारे संज्ञान में लाया गया कि आइशी घोष को कोयना हॉस्टल में 5 नवंबर को सुबह 4.30 बजे देखा गया। इसलिए समिति घोष पर 2,000 रुपए का जुर्माना लगाने का फैसला करती है।”

उन्होंने कहा, ”आपको 2,000 रुपए का जुर्माना (सात दिनों के भीतर) जमा करना होगा। इस जुर्माने को जमा करने में असफल रहने पर आपसे प्रति सप्ताह 2,000 रुपए और शुल्क लिया जाएगा।”

सपना रतन शाह के अनुसार, कोयना हॉस्टल के एक वरिष्ठ वार्डन ने कहा कि छात्रों ने कमरों के ताले तोड़े और अवैध रूप से हॉस्टल में घुस गए। इसलिए, वार्डन समिति ने उन पर जुर्माना लगाने का फैसला किया, क्योंकि इंटर-हॉल एडमिनिस्ट्रेशन (IHA) का दिशा-निर्देश बताता है कि जुर्माना उन छात्रों पर लगाया जाएगा जो अनधिकृत प्रविष्टि में संलग्न हैं। बता दें कि IHA एक निकाय है, जो 18 JNU छात्रावासों का प्रबंधन करता है।

आइशी घोष और उनके समर्थकों ने परेशान करने का दावा किया

इस बीच, विवादास्पद जेएनयूएसयू अध्यक्ष आइशी घोष ने ट्विटर पर कहा कि उन्हें 2,000 रुपए का भुगतान करने के लिए कहा गया है। दावा किया है कि छात्रों को परेशान किया जा रहा है, क्योंकि ‘वे छात्रावास में वापस आना चाहते हैं और फिर से शैक्षणिक गतिविधियों को शुरू कर रहे हैं।’ आइशी घोष ने जेएनयू के अधिकारियों से प्राप्त नोटिस को भी साझा किया, जिसमें उसे अवैध रूप से हॉस्टल में रहने के लिए जुर्माना भरने के लिए कहा गया है।

उसने कहा, “हम में से कई 30 सितंबर के बाद आए, प्रशासन ने 8 अक्टूबर तक एक सर्कुलर नहीं निकाला कि क्या छात्र वापस लौट सकते हैं। हमने वार्डन और हमारे अन्य अधिकारियों को अपनी वापसी के बारे में सूचित किया, लेकिन हमें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।”

मामले को हवा देने के लिए शेहला रशीद भी कूद पड़ी

फ्रीलांस प्रदर्शनकारी और अपने ही ‘बायलॉजिकल’ पिता को धमकी देने की आरोपित शेहला रशीद ने मामले में कूदकर विश्वविद्यालय परिसर के अंदर और अराजकता पैदा करने की स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश की।

जेएनयू में एक लंबे समय तक रहने वाली रशीद ने झूठे दावे करने के लिए ट्विटर का सहारा लिया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “उड़ानें, शादी, चुनाव, क्रिकेट टूर्नामेंट, धार्मिक कार्य, संगीत कार्यक्रम- सब कुछ हो सकता है, लेकिन छात्र अपने स्वयं के छात्रावास के कमरों में प्रवेश नहीं कर सकते हैं! घोर कलयुग।” शेहला रशीद ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों से छात्र जुर्माना वापस करने की माँग की।

प्रदर्शनकारी से नेता बनी शेहला रशीद ने यह दावा करने के लिए कुछ कथित शोध-पत्र भी जारी किए कि महामारी के दौरान महिला शिक्षाविदों को यह महसूस करना पड़ा कि विश्वविद्यालय को महामारी प्रोटोकॉल को दरकिनार कर छात्रावास खोलना चाहिए।

इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने की कोशिश में शेहला रशीद ने ट्विटर पर लिखा, “दुर्भाग्य से, जेएनयू प्रशासन के विचार केवल राजनीतिक हैं। छात्रों को परिसर से बाहर रखने का कदम विशुद्ध रूप से राजनीतिक है। ऐसा लगता है जैसे COVID केवल JNU में मौजूद है, जबकि शेष विश्व प्रतिरक्षात्मक है।”

हालाँकि, शेहला राशिद के दावों के विपरीत, अधिकारियों ने महामारी के दौरान कुछ गतिविधियों पर कई प्रतिबंध लगाए हैं, जिसमें निजी और सार्वजनिक गतिविधियाँ शामिल हैं। राज्य और केंद्र दोनों ने समय-समय पर सार्वजनिक डोमेन में कई अधिसूचनाएँ जारी की हैं, जिसमें जनता को ‘क्या करें’ और ‘क्या न करें’ के बारे में विस्तार से बताया गया, ताकि वे सामूहिक रूप से चीनी महामारी से लड़ सकें।

इसी तरह से, जेएनयू के अधिकारियों ने भी अपने छात्रों को महामारी के खिलाफ एहतियाती कदम उठाने के लिए परिसर के अंदर कुछ प्रोटोकॉल का पालन करने के लिए कहा है और इसे सख्ती से लागू कर रहे हैं। हालाँकि, शेहला रशीद बेशर्मी से महामारी के कठिन समय में भी एक राजनीतिक एंगल खोजने की कोशिश करते हुए अपने फर्जी प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ा रही है।