जाने-माने शेफ़ से फ़िल्ममेकर बने विकास खन्ना, जो हाल ही बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद और पक्षपात की संस्कृति को उजागर करने वाली हस्तियों की लिस्ट में शामिल हो गए है, ने एक बार फिर से बॉलीवुड में फिल्म माफिया के खिलाफ अपनी नाराज़गी व्यक्त की है। उन्होंने बताया कि कैसे इंडस्ट्री में ‘फिल्म क्रिटिक्स’ उनकी फिल्म ‘द लास्ट कलर’ को हाई रेटिंग देने के लिए फिरौती माँग रहे है।
फिल्म निर्माता विकास खन्ना ने ट्विटर पर फिल्म इंडस्ट्री में प्रचलित ‘रिव्यू घोटाले’ को उजागर करते हुए कहा कि, क्रिटिक्स ने उनसे 3 स्टार के लिए 3 लाख, 4 स्टार के लिए 4 लाख की माँग की। खन्ना ने यह कहकर अपनी भड़ास निकाली कि वह यह बातचीत मरते दम तक नहीं भूल सकते।
गौरतलब है कि इससे पहले सेलेब्रिटी शेफ ने कुछ पॉवरफुल इंडस्ट्री इनसाइडर और फिल्म क्रिटिक्स के हाथों हुए बुरे अनुभव के बारे में ट्वीट किया था। विकास खन्ना ने कहा कि उन्हें ‘पक्षपात और भाई-भतीजावाद का पहला अनुभव’ हुआ जब क्रिटिक्स में से एक ने उन्हें उनकी फिल्म के रिव्यू के लिए पैसे देने के लिए कहा और इसके लिए राजी नहीं होने पर उन्हें बर्बाद करने की धमकी भी दी गई थी।
विकास ने ट्विटर पर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री कंगना रनौत को टैग करते हुए लिखा था कि जब कंगना फेवरिटिज्म, नेपोटिज्म पर बोल रहीं थी तब उन्हें बहुत बुरा लगा था। लेकिन अब वे भी कंगना की बात से पूरी तरह सहमत हैं। उन्होंने यह भी लिखा था कि बाहरी लोगों को एंट्री नहीं दी जाती है। भले ही उन्होंने अपना दिल और आत्मा आर्ट में डाल दी हो। यह सुनना बेहद दर्द देता है कि या तो आप पैसे दो या हम आपको बर्बाद कर देंगे।
गौरतलब है कि कंगना रनौत फिल्म माफिया और बॉलीवुड में प्रचलित भाई-भतीजावाद के खिलाफ बोलने वाली पहली सेलेब्रिटी थी। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के असामयिक निधन ने पिछले साल इस आंदोलन को एक दिशा दी थी, जिस वजह से बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद और माफिया कल्चर के खतरे के बारे में अधिक से अधिक लोग मुखर हो रहे हैं।
इस ट्वीट से पहले विकास खन्ना ने कहा था कि लोग अक्सर पक्षपात और भाई-भतीजावाद की निंदा करते हैं, लेकिन स्व-निर्मित को अवसर नहीं देते। उन्होंने कहा कि लोगों ने ‘गेटकीपर’ की प्रशंसा की लेकिन नए के लिए ‘निर्दयी’ हो गए थे। ‘द लास्ट कलर’ और स्टारर नीना गुप्ता के साथ अपने निर्देशन के पोस्टर को साझा करते हुए खन्ना ने दावा किया था कि प्रोत्साहन के बिना” नया” नहीं पनप सकता है। जब “नया’ उगता है, तो यह “अधिक नए” के लिए रास्ता बनाता है।
शेफ विशेष रूप से तथाकथित फिल्म बिरादरी के दिग्गजों के रवैए से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि कई लोगों ने उनसे पैसे माँगे और जब उन्होंने उनको दरकिनार कर दिया, तो उन लोगों ने उनकी फिल्म को 2 स्टार रेटिंग दी, ताकि उन्हें बर्बाद कर दिया जाए। क्रिटिक्स के कुछ पॉजिटिव रिव्यू को साझा करते हुए उन्होंने सभी से अमेज़न प्राइम पर फिल्म देखने का आग्रह किया।
उल्लेखनीय है कि दुनिया के प्रमुख शेफ में से एक विकास खन्ना ने द लास्ट कलर से डायरेक्टोरियल डेब्यू किया था। फिल्म 2019 में रिलीज हुई थी, जिसमें नीना गुप्ता लीड रोल में थीं। इस फ़िल्म को कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सम्मानित किया गया है। फिल्म ऑस्कर 2020 तक भी पहुँची और ऑस्कर की शॉर्टलिस्ट फिल्मों का एक हिस्सा थी। हालाँकि, नए फिल्म निर्माता अपनी पहली ही फ़िल्म से बॉलीवुड इंडस्ट्री की सच्चाई से रूबरू हो गए।
अमेजन प्राइम की वेब सीरीज तांडव (Tandav) को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में विवादित वेब सीरीज से जुड़े मेकर्स, डायरेक्टर और राइटर के खिलाफ केस दर्ज किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में अब एक नई एफआईआर मुंबई में और एक शिकायत इंदौर न्यायालय में भी दायर की गई है।
बता दें कि महाराष्ट्र के मुंबई में भी फिल्म के खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज हो गई है। मुंबई के घाटकोपर पुलिस स्टेशन में IPC की धारा 153 (A) 295 (A) 505 के तहत तांडव वेब सीरीज को लेकर FIR दर्ज हुई है। निर्माता, निर्देशक और कलाकारों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है।
इसके अलावा, तांडव वेब सीरीज के खिलाफ इंदौर न्यायलय में भी एक परिवाद दायर किया गया है। यह परिवाद ‘मित्र मेला सोशल वेलफेयर सोसाइटी’ के अध्यक्ष गोविंद सिंह बैस द्वारा न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष दायर किया गया है। जिसमें तांडव वेब सीरीज के निर्माता, निर्देशक, अमेज़न प्राइम की कंटेंट हेड, सैफ अली खान व अन्य के खिलाफ न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी के समक्ष भारतीय दंड संहिता की धारा 153a, 295, 505(1)(6), 502 (2), 469 एवं आईटी एक्ट की धारा 66f, 67 के तहत परिवाद प्रस्तुत किया गया।
वहीं, न्यायलय ने शिकायत पर संज्ञान लेते हुए पलासिया थाना पुलिस को मामले की जाँच का आदेश दिया है। न्यायालय द्वारा पुलिस को 2 दिन के भीतर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया गया है।
गौरतलब है कि सैफ अली खान की वेब सीरीज तांडव को लेकर छिड़ा विवाद दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। हिंदुओं और विभिन्न जातियों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली इस सीरीज के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध हो रहा है। अमेज़न प्राइम वीडियो पर आई अली अब्बास जफर निर्देशित ‘तांडव’ में सैफ अली खान और मोहम्मद जीशान अयूब ने मुख्य किरदार निभाए हैं।
इस वेब सीरीज में भगवान शिव का अपमान किए जाने और जातीय वैमनस्य को बढ़ावा देने के कारण इससे पहले उत्तर प्रदेश में भी केस दर्ज किया गया। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सूचना सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी ने कहा कि जन-भावनाओं के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
FIR में इन सभी के खिलाफ IPC की धारा- 153A (उपद्रव पैदा करने वाले बयान देना या द्वेषभाव से निशाना बनाना), 295 (किसी धर्म के पवित्र स्थल का अपमान), 505(1)(b) (अशांति और अपराध को बढ़ावा देने वाला प्रसारण), 505(2) (विभिन्न वर्गों में शत्रुता/घृणा पैदा करने वाले कथन) और 469 (दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किसी का अपमान) के अलावा IT एक्ट की धारा- 66 (आपत्तिजनक कंटेंट्स), 66 F और 67 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
FIR में लिखा गया, “उच्चाधिकारियों के निर्देश पर उक्त वेब सीरीज को देखा गया तो पाया गया कि प्रथम एपिसोड के 17वें मिनट में हिन्दू देवी-देवताओं का विद्रूप ढंग से रूप धारण कर धर्म से जोड़ के अमर्यादित तरीके से उनका अपमान किया गया है और निम्न-स्तरीय भाषा का प्रयोग हुआ है। ये धार्मिक भावनाओं को आघात पहुँचाने वाला और लोगों को भड़काने वाला है। 22वें मिनट में जातिगत विद्वेष वाले डायलॉग हैं। सीरीज में ऐसे कई बयान हैं। भारत के पीएम के गरिमामयी पद का चित्रण अत्यंत अशोभनीय ढंग से पेश किया गया है। जातियों को छोटा-बड़ा दिखाने और महिलाओं के अपमान के दृश्य हैं।”
इस्लामी कट्टरपंथी प्रचारक डॉ. जाकिर नाइक ने इस बार एक और विवादित दावा किया है। यूट्यूब चैनल पर अपलोड किए गए अपने एक वीडियो में उसने दावा किया है कि ‘हर बच्चा मुसलमान पैदा होता है।’
नाइक ने दावा किया है, “पैगंबर मुहम्मद ने कहा है कि हर बच्चा जन्मजात एक धर्म में पैदा होता है। हर बच्चा एक मुसलमान के रूप में पैदा होता है। वह अल्लाह को नमन करता है। बाद में उसे बुजुर्ग, माता-पिता, शिक्षक प्रभावित करते हैं। वह सीधे रास्ते पर रह सकता है, वह अग्नि पूजक हो सकता है या फिर मूर्तिपूजक और ऐसा करते ही वह इस्लाम के दायरे से बाहर हो जाता है।”
वह आगे दावा करता है कि हिंदू, ईसाई या यहूदी परिवार में पैदा होने के बावजूद हर बच्चा मुस्लिम के रूप में जन्म लेता है। जाकिर नाइक ने दावा किया, “वह अपने को अल्लाह को समर्पित रहता है।” कट्टरपंथी इस्लामिक उपदेशक का दावा है कि जब कोई व्यक्ति इस्लाम में धर्मान्तरित होता है, तो उसके लिए ‘उपयुक्त’ शब्द है कि उसने अपने असली धर्म में वापसी की है। उसने दावा करते हुए कहा, “वह सीधे रास्ते पर था, वह गलत रास्ते पर चला गया और अब वह सीधे रास्ते पर वापस आ गया है।”
यह साबित करने के लिए कि प्रत्येक बच्चा मुस्लिम पैदा होता है, नाइक ने कपाकु और ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी जनजातियों के बारे में बात की। उनका दावा है कि ये लोग, जो सभ्यता से दूर थे, मुस्लिमों की तरह अपना जीवन जीते थे, जबकि वह नहीं जानते थे वह वास्तव में मुसलमान थे। हालाँकि, यह सच नहीं है। 16 वीं या 17 वीं शताब्दी के प्रारंभ में इंडोनेशिया से मुस्लिम विज़िटर्स के माध्यम से इस्लाम ऑस्ट्रेलिया आया था।
उल्लेखनीय है कि नाइक ने इस ’तथ्य’ का इस्तेमाल अपने दावे के आधार पर किया कि हर बच्चा मुस्लिम पैदा होता है। गौरतलब है कि इससे पहले पाकिस्तान में मंदिर में तोड़फोड़ की घटना को भारत से भागकर मलेशिया में शरण लेने वाले विवादित इस्लामिक प्रचारक भगोड़े जाकिर नाइक ने शर्मनाक वारदात को जायज ठहराया था।
नाइक ने कहना था कि किसी भी इस्लामी देश में मंदिर बनाए जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जाकिर नाईक का यह बयान 30 दिसंबर को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के करक जिले में उन्मादी भीड़ द्वारा मंदिर को हथौड़े से मारकर गिराए जाने की घटना के बाद आया था। आरोप था कि आतंकी समूह से समर्थन प्राप्त एक स्थानीय मौलवी ने लोगों को हिंदू समूदाय के खिलाफ भड़काया और मंदिर गिराने के लिए उकसाया।
अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के रूप में जो बाइडेन कुछ ही घंटों में शपथ लेंगे। कैपिटल हिल, हाल ही में जहाँ दंगे हुए थे, उनकी ईसाई जड़ों के गवाह बन जाएँगे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बाइडेन साल 1893 से संभाल कर रखी गई अपने परिवार की 127 साल पुरानी बाइबिल के साथ शपथ लेंगे।
राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के बाद बाइडेन अमेरिका के दूसरे कैथोलिक राष्ट्रपति होंगे। अमेरिकी के अधिकतर राष्ट्रपति प्रोटेस्टेंट रहे हैं, जबकि चार राष्ट्रपति Nontrinitarians थे। यह उल्लेखनीय है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के सभी राष्ट्रपति ईसाई रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक यह बाइबिल बाइडेन के पिता की ओर से है। जो कि 1893 से उनके परिवार के पास है। उन्होंने अपने सभी सात शपथ ग्रहण समारोहों के लिए एक ही बाइबिल का उपयोग किया है, जिसमें अमेरिकी सीनेटर और दो बार राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान अमेरिका के उपराष्ट्रपति के तौर पर लिया गया शपथ ग्रहण शामिल हैं। डेलावेयर के अटॉर्नी जनरल के रूप में उनके दिवंगत बेटे बीयू ने भी अपने शपथ के दौरान इसका इस्तेमाल किया था।
टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, यह बाइबिल लगभग 5 इंच मोटी है और इसके कवर पर एक सेल्टिक क्रॉस बना हुआ है। पिछले महीने बाइबिल के बारे में होस्ट स्टीफन कोलबर्ट से बात करते हुए ने कहा था, “यह बाइडन की ओर से एक पारिवारिक विरासत है और सारी महत्वपूर्ण तारीख भी उसमें है। उदाहरण के लिए, हर बार जब मुझे किसी भी चीज़ के लिए शपथ दिलाई जाती है, तो वह तारीख उसमें होती है और बाइबिल पर लिखी होती है।”
गौरतलब है कि जब 2009 में बाइडन ने सीनेटर के रूप में शपथ ली, तब उन्हें उनकी यह बाइबिल नहीं मिली। जिसकी वजह से समारोह में लेट हुआ था। उस समय बाइडन के हाथ में इतनी बड़ी पुस्तक देखने के बाद, तत्कालीन उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने कहा था, “जो, यह एक बड़ी बाइबिल है। बस उससे उन्हें मारना मत।”
उल्लेखनीय है कि, 30 अप्रैल 1789 को जॉर्ज वॉशिंगटन ने संयुक्त राज्य के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी। उस शपथ समारोह के दौरान उन्होंने सेंट जॉन लॉज नंबर 1 से उधार ली गई बाइबिल का इस्तेमाल किया, जो न्यूयॉर्क में सबसे पुरानी मेसोनिक लॉज थी। उसके बाद जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश, वॉरेन जी हार्डिंग, ड्वाइट डी आइजनहावर और जिमी कार्टर सहित कई उत्तराधिकारियों ने उसी बाइबिल का इस्तेमाल किया। जॉर्ज डब्ल्यू बुश 2001 में भी उसी बाइबिल इस्तेमाल करना चाहते थे लेकिन अपनी नाजुक प्रकृति के कारण नहीं कर सके। फिर उन्होंने अपने परिवार की बाइबिल का इस्तेमाल करने का फैसला किया था।
अब्राहम लिंकन ने 1861 में अपने पहले शपथ ग्रहण समारोह में कॉन्ग्रेस की लाइब्रेरी में संग्रहित लिंकन बाइबिल का इस्तेमाल किया। वहीं राष्ट्रपति ओबामा और राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी अपने शपथ ग्रहण समारोहों के लिए उसी बाइबिल का इस्तेमाल किया। बता दें 2013 में दूसरे शपथ ग्रहण समारोह के दौरान, ओबामा ने डॉ मार्टिन लूथर किंग जूनियर से संबंधित एक बाइबिल का उपयोग किया था।
फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट सहित कई राष्ट्रपतियों ने पारिवारिक बाइबिल से शपथ लिया था। दिलचस्प बात यह है कि जॉन क्विंसी एडम्स और थियोडोर रूजवेल्ट ने समारोहों के लिए बाइबिल का उपयोग ही नहीं किया। दरअसल एडम्स को कानून की किताब से शपथ दिलाई गई थी, तो वहीं रूजवेल्ट ने एक मित्र के घर पर अपना शपथ ग्रहण समारोह पूरा किया था, क्योंकि राष्ट्रपति मैककिनले (McKinley) की मृत्यु हो गई थी।
उत्तराखंड राज्य का टिहरी गढ़वाल जनपद अक्सर ही कुछ अवैध मस्जिदों के निर्माण के कारण चर्चा में रहता आया है। लेकिन इन वैध/अवैध मस्जिदों से भी बड़ी पहचान यहाँ पर बना सुमन सागर है, जिसे दुनिया टिहरी बाँध के नाम से भी जानती है। इसी टिहरी बाँध को विकसित करने के लिए टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड (टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड) का गठन जुलाई, 1988 में किया गया था। इसी के अंतर्गत आने वाली एक जामा मस्जिद लम्बे समय से विवाद का विषय बनी हुई है।
समय के साथ टिहरी बाँध निर्माण की जटिल प्रक्रिया भी पूरी हो गई और एक महान विरासत के अंत की कीमत पर देश को एक बाँध मिला, जिससे बिजली उत्पादन भी होने लगा। यह प्रक्रिया बेहद जटिल थी। जटिल इसलिए क्योंकि इसके लिए कई किलोमीटर के दायरे को पूरी तरह विस्थापित करना पड़ा। विस्थापन सिर्फ घर और खेतों का ही नहीं हुआ, बल्कि मंदिर और मस्जिदों के साथ ही तमाम धार्मिक जगहों का भी किया गया था।
अब सवाल ये है कि पुरानी टिहरी से विस्थापन नीति के तहत जब मंदिर-मस्जिद का विस्थापन कर दिया गया था तो अब THDC क्षेत्र में जामा मस्जिद का क्या काम रह गया है? खासकर तब, जब कि यह आए दिन किसी नए विवाद को जन्म दे रहा हो। यही सवाल टिहरी के विधायक और भाजपा नेता धन सिंह नेगी (Dhan Singh Negi) निरंतर THDC से भी पूछते आ रहे हैं। बकौल भाजपा नेता धन सिंह नेगी, उनके तमाम विरोध और आपत्तियों के बावजूद THDC अभी तक भी इस अवैध मस्जिद को हटाने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है और यही नहीं, इसे बिजली और पानी भी उपलब्ध करा रहा है।
ऑपइंडिया से बात करते हुए विधायक धन सिंह नेगी ने कहा कि वह लम्बे समय से इस मस्जिद को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज करा रहे हैं लेकिन THDC इस पर संज्ञान नहीं ले रहा है। जबकि प्रशासन का कहना है कि यह जमीन THDC की सम्पत्ति है और इस पर बनी हुई जामा मस्जिद पर कोई भी अंतिम फैसला उन्हें ही लेना होगा।
क्या है मामला
भाजपा विधायक धन सिंह नेगी ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दिसंबर, 2020 में टिहरी-घनसाली रोड स्थित खांडखाला में THDC के अंतर्गत आने वाली जामा मस्जिद को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत में कहा गया था कि इस जमीन पर जितने भी धार्मिक स्थल थे, जिनमें कि मस्जिद भी शामिल थीं, उनका विस्थापन पुनर्वास नीति 1998 के अंतर्गत किया जा चुका है और पुरानी टिहरी से विस्थापित करने के बाद नई टिहरी में इन विस्थापित सम्पत्तियों का निर्माण किया जा चुका है।
साथ ही, यह भी शिकायत दर्ज की गई कि THDC (जेपी कम्पनी) के मालिक केके अग्रवाल के पास मस्जिद स्थापित करने के राज्य सरकार की तरफ से अधिकृत अधिकारी भी नहीं थे, ना ही जमा मस्जिद निर्माण के संदर्भ में किसी प्रकार की आपसी सहमति और समुदाय के साथ बैठक का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद है।
दिसंबर 10, 2020 को जिलाधिकारी कार्यालय से एक पत्र THDC को इस जामा मस्जिद के सम्बन्ध में भेजा गया। जिसके अनुसार, यह मस्जिद टिहरी विस्थापन से पूर्व दोबाटा के समीप वर्ष 1990 में स्थापित की गई और उसके बाद जेपी कम्पनी (THDC) के मालिक केके अग्रवाल के साथ जामा मस्जिद के पदाधिकारियों की भी बैठक के बाद आपसी समझौते से इस जामा मस्जिद की स्थापना की हुई थी। तभी से अब तक जामा मस्जिद में आसपास के मुस्लिम समुदाय के लोग जुम्मे की नमाज अदा करते आ रहे हैं।
जिलाधिकारी द्वारा THDC को भेजा गया पत्र
पत्र के अनुसार, पुरानी टिहरी में चली आ रही मस्जिद को THDC के द्वारा आपसी सहमति के आधार पर अस्थाई रूप से खांडाखाल नामक जगह पर संचालित किया गया। इस जामा मस्जिद को हटाने के सम्बन्ध में उप जिलाधिकारी द्वारा भी यह सुझाव दिया गया कि इसके लिए पहले THDC को सूचित करना आवश्यक होगा।
इस शिकायत के उत्तर में THDC की ओर से दिसंबर 24, 2020 को कहा गया कि जिस सम्पत्ति अर्थात जामा मस्जिद के सम्बन्ध में शिकायत दर्ज की गई थी, वह अवैध पाई गई है। हालाँकि, THDC ने अपनी जिम्मेदारी से किनारा करते हुए अपने जवाब में यह भी जोड़ दिया कि THDC के लिए इस पर कोई भी कार्रवाई कर पाना संभव नहीं है और वह प्रशासन के साथ सहयोग करने के लिए भी राजी है।
शिकायत के जवाब में THDC
हमने जब मंगलवार (जनवरी 19, 2021) शाम टिहरी की जिलाधिकारी से इस सम्बन्ध में बात की तो उन्होंने बताया कि इस पर THDC को ही आखिरी फैसला लेना होगा क्योंकि यह जामा मस्जिद उनकी जमीन पर है। उन्होंने कहा कि प्रशासन सिर्फ इतना कर सकता है कि यदि उन्हें इस अवैध मस्जिद को हटाने में किसी भी प्रकार की सहायता चाहिए तो प्रशासन उन्हें वो सहायता और पुलिस बल उपलब्ध कराएगा।
वहीं, भाजपा विधायक धन सिंह नेगी का कहना है कि वो इस सम्बन्ध में जिलाधिकारी और एसडीएम से फिर बात करेंगे और अपनी आपत्ति जाहिर करेंगे कि लगातार विवाद का विषय रहने वाली इस अवैध जामा मस्जिद को हटाने के लिए यदि वो निर्णय लेने में देर करते हैं और इस बीच किसी प्रकार कि कोई अप्रिय घटना घटती है तो फिर इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?
कोरोनावायरस से संक्रमित होकर जान गँवाने वाले दिल्ली पुलिस के पहले जवान, कॉन्स्टेबल अमित कुमार की पत्नी ने 15 जनवरी को एक बच्ची को जन्म दिया है। परिवारवालों ने बताया कि, दिवंगत पुलिसकर्मी की इच्छा के अनुसार बेटी का नाम ‘एनी’ रखा गया है।
#Delhi Wife of Const Amit-1st #Covid19 death in @DelhiPolice -gave birth to baby girl on Jan 15.She got to know about her pregnancy on 13th day of his death.She’snamed her Annie-name desired by officer if he ever had a girl. Family still hasn’t rec 1cr ex-gratia announced by CM. pic.twitter.com/AIkFvshe1P
बता दें कोरोना वायरस का शिकार होकर कॉन्स्टेबल कुमार की 5 मई को मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद उनकी पत्नी पूजा और 3 साल का बेटा भी संक्रमण की चपेट में आ गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमित के निधन के 13 दिन बाद क्वारंटाइन सेंटर में पूजा को अपने गर्भवती होने का पता चला था।
कॉन्स्टेबल की पत्नी पूजा ने कहा, “अमित ने हमेशा कहा कि अगर हमारी बेटी होगी, तो हम उसका नाम एनी रखेंगे इसलिए मैंने उसका निकनाम एनी रखा है। हालाँकि, मैंने उसका असली नाम ‘ओजस्वी’ तय किया है।” हॉस्पिटल से सोमवार को डिस्चार्ज हुई पूजा का मानना है कि अमित एनी के रूप में उसके पास वापस आ गए है। पूजा ने आगे कहा, “यह मेरा विश्वास है… मैंने उसे उसी समय के आसपास कल्पना की थी जब उसने हमें छोड़ दिया था… वह अपने पिता की तरह ही दिखती है।
परिवार में नए सदस्य का आगमन हुआ है। वहीं परिवार के सदस्य अभी भी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा अमित की मृत्यु के समय दिए जाने वाले 1 करोड़ रुपए की मुवावजा राशि का इंतजार कर रहे हैं। बता दें केजरीवाल ने दिवंगत दिल्ली पुलिस अधिकारी द्वारा किए गए बलिदान के बारे में ट्विटर पर बताते हुए कुमार के परिवार को 1 करोड़ रुपए के मुआवजे की घोषणा की थी।
अमित जी अपनी जान की परवाह ना करते हुए करोना की इस महामारी के समय हम दिल्ली वालों की सेवा करते रहे। वे खुद करोना से संक्रमित हो गए और हमें छोड़ कर चले गए। उनकी शहादत को मैं सभी दिल्लीवासियो की ओर से नमन करता हूँ। उनके परिवार को 1 करोड़ रुपए की सम्मान राशि दी जाएगी। https://t.co/n1eNmZNNCw
दिवंगत अमित की पत्नी पूजा का कहना है कि परिवार को हाल ही में सूचित किया गया था कि उनके बेटे की फ़ाइल को दिल्ली सरकार ने अस्वीकार कर दिया है क्योंकि यह उनकी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। उन्होंने बताया कि परिवार ने सरकारी विभाग द्वारा कहे गए सभी आवश्यक दस्तावेज जमा किए थे, लेकिन बाद में उन्हें सूचित किया गया कि उनकी फाइल इस आधार पर खारिज कर दी गई है कि अमित कोविड-19 ड्यूटी पर नहीं थे।
हालाँकि, पूजा को पुलिस फ़ोर्स में नौकरी की पेशकश की गई, जिसके लिए उन्हें आधिकारिक सूचना दी गई है और मार्च में इसकी एक परीक्षा होनी है। उन्हें उम्मीद है कि वह यह टेस्ट पास कर लें और जल्द ही जॉब जॉइन करें।
इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री ने मंगलवार को दिल्ली पुलिस फ़ोर्स के “कोविड वारियर्स” को श्रद्धांजलि देने के लिए दिल्ली पुलिस मुख्यालय पहुँचे, जिनके नाम बोर्ड पर लिखे गए थे। दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के अनुसार, 33 पुलिस अधिकारियों की कोविड-19 से मृत्यु हो गई थी और उनमें से अभी तक किसी को भी दिल्ली सरकार द्वारा घोषित 1 करोड़ की सम्मान राशि नहीं मिली है।
उल्लेखनीय है कि पिछली एक रिपोर्ट में हमनें बताया था कि केजरीवाल सरकार ने ड्यूटी के दौरान कोरोना वायरस की वजह से मरने वाले 15 में से 12 पुलिसकर्मियों के परिजनों द्वारा दायर दावों को दिसंबर 2020 में खारिज कर दिया था। केजरीवाल सरकार ने इस आधार पर फाइलें खारिज कर दी थी कि पुलिस अधिकारी COVID-19 ड्यूटी पर नहीं थे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 31 पुलिस वालों ने ड्यूटी के दौरान कोरोना वायरस की वजह से अपनी जान गँवाई थी। इनमें से 15 पुलिसकर्मी ‘कोविड ड्यूटी’ पर थे। दिल्ली की सरकार ने इन 15 पुलिसवालों के परिवार वालों में 12 परिवारों के दावे खारिज कर दिए थे। वहीं 3 परिवारों का आवेदन लंबित है।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ पुलिस महकमे द्वारा भेजे गए आँकड़ों से इतर कुछ वादे आप नेताओं, सरकार और खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा किए गए थे।
दिल्ली सरकार द्वारा जारी किए गए अस्वीकृति पत्र के अनुसार, “मृतक रोज़मर्रा (रेगुलर) की ड्यूटी कर रहा था न कि कोविड 19 ड्यूटी जो कि 1 करोड़ रुपए का आर्थिक सहयोग प्राप्त करने के लिए सबसे अनिवार्य पैमाना है।” योगेंद्र प्रसाद यादव के पिता ने दिल्ली सरकार से ‘कोविड ड्यूटी’ की परिभाषा पूछी है। साथ ही दिल्ली के मुख्यमंत्री से अपना वादा निभाने का अनुरोध किया है।
इंस्पेक्टर संजय शर्मा की पत्नी अरुणा शर्मा, जिनकी अगस्त में कोरोनोवायरस से मृत्यु हो गई थी, ने कहा कि उन्हें भी दिल्ली सरकार से एक अस्वीकृति पत्र मिला है। उन्होंने कहा कि इस मामले में उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय से संपर्क कर मामले में अपनी बात रखने का अनुरोध किया था। हालाँकि, वह नहीं समझा पाई की उनके पति कोविड 19 के दौरान पुलिस नियंत्रण कक्ष इकाई में तैनात थे और साथ ही सभी रेड जोन एरिया का भी दौरा करते थे।
कंगना रनौत को लेकर सोशल मीडिया पर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। लिबरल गैंग हाथ धो कर उनके पीछे पड़ी है और वो खुद भी अपने बेबाक रवैये के कारण चुन-चुन कर सबको जवाब दे रही हैं। उनके हालिया ट्वीट में उन्होंने वामपंथियों का उल्लेख करके बाकायदा उनकी क्लास ली। इसमें उन्होंने जिक्र किया कि उनका अकॉउंट सस्पेंड करवाने की कोशिश चल रही है जिसके कारण उसे अस्थायी रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
Librus cried to their chacha @jack and got my account temporarily restricted, they are threatening me mera account/virtual identity kabhi bhi desh keliye shaheed ho sakti hai,magar my reloaded desh bhakt version will reappear through my movies.Tumhara jeena dushwar karke rahungi.
अब व्हॉट्सएप पर कुछ लोगों का दावा है कि वामपंथी कंगना से इसलिए नाराज हैं क्योंकि उन्होंने अल्लाह को लेकर कमेंट किया था। और इसीलिए उनके अकॉउंट पर कार्रवाई हुई। हालाँकि, इस दावे की सच्चाई क्या है यह मैसेज देखने से स्पष्ट नहीं है। अब ऐसे में सवाल है कि क्या वाकई में ट्विटर ने कंगना पर कार्रवाई इसलिए की, क्योंकि उन्होंने ‘अल्लाह’ का नाम लेकर वामपंथियों को ललकारा या फिर इसलिए कि मामला कुछ और है।
ऑपइंडिया ने इस संबंध में ट्विटर पर लिबरलों के रिएक्शन देखने के लिए #SuspendKanganaRanaut ट्रेंड को देखा। इसमें कई जगह कंगना के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग था लेकिन बहुत कम जगह पर उनके ‘अल्लाह’ वाले उस ट्वीट को शेयर किया गया था, जिसमें उन्होंने लिखा था, “माफी माँगने के लिए बचेगा कहाँ? ये सीधा गला काट देते हैं, जिहादी देश फतवा निकाल देते हैं, लिबरल मीडिया वर्चुअल लिंचिंग कर देती है, तुम्हें ना सिर्फ़ जान से मार दिया जाएगा बल्कि उस मौत को भी जस्टिफ़ाई किया जाएगा, बोलो अली अब्बास जफर, है हिम्मत अल्लाह का मज़ाक़ उड़ाने की?”
अब हो सकता है कंगना की टिप्पणी पर वामपंथी भड़कें हों लेकिन सेकुलर छवि को बनाए रखने के लिए वह उस ट्वीट को न शेयर कर रहे हों।
इस हैशटैग पर स्क्रॉल करते हुए हमें कंगना का एक कॉमन ट्वीट हर जगह दिखा। इस ट्वीट में उन्होंने भगवान कृष्ण और शिशुपाल से जुड़े प्रसंग की चर्चा की थी। कंगना ने इसमें लिखा था, “क्योंकि भगवान कृष्ण ने भी 99 बार शिशुपाल को माफ किया था। पहले शांति फिर क्रांति। समय आ गया है कि सर काटे जाएँ। जय श्री कृष्ण।”
हमने यही ट्वीट कंगना के टाइमलाइन पर देखा तो इसे डिलीट किया जा चुका था। जाहिर है, पूरा बवाल इसी के आधार पर हुआ और कंगना पर तरह-तरह के इल्जाम लगाए गए। दावा किया गया कि कंगना नफरत फैलाकर सिर काटने की बातें कर रही हैं और ट्विटर पर खुलेआम हिंसा फैला रही हैं।
हालाँकि, उनके इस ट्वीट का यदि संदर्भ देखें तो वह गलती करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से था। अतुल मिश्रा के ट्विटर से तांडव वेब सीरीज को भेजे गए समन पर एक ट्वीट किया था।। इसमें लिखा था, “…पहले हिंदुओं ने अपमान बर्दाश्त करना छोड़ा और अब सरकारी कदम उठाया है। लेफ्ट ने अक्सर हमारे गुस्से का मजाक उड़ाया है क्योंकि ट्विटर ने उन्हें ये अधिकार दिया। खैर ये अब नहीं होगा।”
अतुल के इसी ट्वीट को पढ़ने के बाद, कंगना ने अपना ट्वीट किया था। शायद दोनों ट्वीट पढ़कर साफ पता चलता है कि बात गलती के बदले जवाब देने को लेकर थी। लेकिन वामपंथियों ने इसे दूसरा रुख दे दिया और कंगना को नफरत फैलाने वाला कहा जाने लगा।
कंगना ने इसके बदले भी उन्हें जवाब दिया और लिखा, “जो लिब्रु डर के मारे मम्मी की गोद में रो रहे हैं। वो ये पढ़ लें कि मैंने तुम्हारा सिर काटने के लिए नहीं कहा। इतना तो मैं भी जानती हूँ कि कीड़े मकोड़ों के लिए कीटनाशक आता है।”
दिलचस्प बात यह है कि ऑल्ट न्यूज के सहसंस्थापक मोहम्मद जुबैर समेत कई लोगों ने कंगना के ट्वीट को लेकर दावा किया वो हिंसा फैला रही हैं। जबकि उनके गिरोह के पत्रकार न जाने कितनी बार भड़काऊ बातें करते पकड़े गए हैं, जिसके खिलाफ़ कभी किसी ने आवाज नहीं उठाई ।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से वादा किया था कि वो कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में अन्य देशों की मदद करेगा और अब उसने अपने वादे को निभाना शुरू कर दिया है। ‘वैक्सीन डिप्लोमेसी’ के तहत भारतीय वैक्सीन की खेप भूटान और मालदीव्स पहुँच चुकी है। भारत ने ‘सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (SII)’ द्वारा बनाई गई वैक्सीन इन देशों को भेजी है। दोनों देशों ने इसके लिए भारत को धन्यवाद दिया है।
पीएम मोदी ने साफ़ कर दिया है कि दुनिया की स्वास्थ्य ज़रूरतों को पूरा करने में भारत हमेशा से आगे रहा है और इसी क्रम में कोरोना वैक्सीन की सप्लाई भी शुरू की जा रही है। उन्होंने बताया कि आने वाले दिनों में अन्य देशों को भी भारतीय वैक्सीन दी जाएगी। केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कहा कि मानवता के लिए भारत बुधवार (जनवरी 20, 2021) से सभी देशों को वैक्सीन भेजने की शुरुआत कर रहा है।
India is one of the world’s largest vaccine producers.
जानने वाली बात है कि भारत दुनिया भर में वैक्सीन का सबसे बड़ा निर्माता है। दुनिया भर में जितने भी वैक्सीन बनते हैं, उसका 60% भारत में ही बनता है। हर साल भारत 150 से भी अधिक देशों को 1.5 बिलियन से भी अधिक डोजेज मुहैया कराता है। WHO भी अपने 70% इम्यूनाइजेशन वैक्सीन भारत के साथ शेयर करता है। पीएम मोदी पहले ही कह चुके हैं कि वैक्सीन के मामले में भारत पूरे ट्रायल के बाद विश्वसनीय तरीके से काम करता है।
भूटान को 1.5 लाख और मालदीव्स को 1 लाख कोरोना वैक्सीन भेजी गई है। बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार और सेशेल्स को भी वैक्सीन की आपूर्ति की जानी है। केंद्रीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भारत आगामी हफ्ते व महीने में चरणबद्ध तरीके से सहयोगी देशों को कोविड-19 टीकों की आपूर्ति करने वाला है। श्रीलंका, अफगानिस्तान और मॉरीशस को भी वैक्सीन दी जा रही है, जिसके लिए दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया जारी है।
बांग्लादेश को भी भारत की तरफ से कोरोना कोविशील्ड की 2 मिलियन डोज गिफ्ट मिलने वाला है। इतना ही नहीं, नेपाल को भी भारत सरकार बिलकुल मुफ्त में कोरोना वैक्सीन देगी। इस तरह से चीन की वैक्सीन डिप्लोमेसी के खिलाफ भारत ने अपनी तैयारी को और मजबूत कर दिया है, जिसका असर पड़ोसी देशों के साथ भारत के सुधरते संबंधों पर भी दिखेगा। अब तक चीन ही इस मामले में आगे था। हालाँकि, भारत में वैक्सीन लेने और न लेने को लेकर कुछ दिशानिर्देश भी दिए गए हैं। गर्भवती महिलाओं के साथ-साथ नवजात को स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी कोरोना का टीका न लेने की सलाह दी गई है। इसके अलावा जिन्हें बुखार हो, उन्हें भी कोरोना वैक्सीन नहीं लेनी है। ऐसे लोगों को पहले मेडिकल सलाह लेनी चाहिए। जिन लोगों को एलर्जी है या वो किसी अन्य गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं, उन्हें भी कोरोना वैक्सीन लेने से पहले अपने बारे में ये सारी जानकारी ज़रूर मुहैया करानी चाहिए।
1990 में घाटी से कश्मीरी पंडितों को बुरी तरह तरह से प्रताड़ित कर के, उनके साथ क्रूरता कर के और हिंसा को अपना हथियार बना कर वहाँ से भगाया गया था, ये किसी से छिपा नहीं है। जो इस क्रूरता के भुक्तभोगी या गवाह रहे हैं, आज भी इन घटनाओं को याद करते ही उनका कलेजा काँप जाता है। इसी तरह के कुछ अनुभव IANS समाचार एजेंसी की विदेश मामलों की संपादक आरती टिकू सिंह ने यूट्यूब चैनल ‘डिफेंसिव ऑफेंस’ पर साझा किए हैं।
कश्मीरी पत्रकार आरती टिकू सिंह तब मात्र 12 वर्ष की थीं, जब उन्हें अपने घर को छोड़ना पड़ा था। वो मूल रूप से अनंतनाग की हैं। उन्होंने बताया कि इस हादसे से पहले 1986 में भी पंडितों का दक्षिण कश्मीर वालों के साथ संघर्ष हुआ था और पहली बार उन्होंने कर्फ्यू देखा, लेकिन उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि आगे होने वाली सारी घटनाएँ इसी से जुड़ी हुई हैं। कई लोगों ने इसे भाँप लिया था और वो 1986 में ही निकल गए थे।
आरती टिकू सिंह ने बताया कि यही वो साल था, जब वहाँ के हिन्दुओं को समझ आया कि हिन्दू-मुस्लिम विवाद का कोई अस्तित्व है क्योंकि उससे पहले सेक्युलरिज़्म वाला माहौल था और उनका पालन-पोषण भी इसी तरह से हुआ था। उनकी माँ की भी श्रद्धा एक सूफी मजार को लेकर थी। भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान कश्मीरी बच्चों के पाकिस्तान का साइड लेने की खबरें आती थीं। अगले 3 साल में धीरे-धीरे स्थिति बिगड़ती चली गई।
जम्मू कश्मीर में 1987 के चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस ने गठबंधन किया था, जबकि दूसरी तरफ एक मुस्लिम फ्रंट था। बकौल आरती, उनके घर में एक मुस्लिम लड़का काम करता था। उनका परिवार अनंतनाग जिले में अख़बार डिस्ट्रीब्यूशन का काम करता था। आरती बताती हैं कि उस लड़के को उसकी माँ बहुत प्यार करती थी और वो साथ में ही खाता-पीता था। लेकिन, कुछ दिनों बाद वो भविष्यवाणी करने लगा कि आज फलाँ जगह बम विस्फोट होगा, या कोई ऐसी-वैसी घटना होगी।
आरती और उनके परिवार वालों को जब शंका हुई कि उसे ये सब कहाँ से पता चल रहा है, तो उन्होंने उससे सवाल पूछा। उसने बताया कि मस्जिदों से ये घोषणाएँ की जाती हैं। अर्थात, किसे मारना है और कितने लोगों को – इन सबका निर्णय मस्जिद में लिया जाता था और वहीं साजिशें भी रची जाती थीं। 1989 में रुबिया सईद (मुफ़्ती मोहम्मद सईद) का अपहरण हुआ, तभी कश्मीरी पंडितों को आशंका हो गई थी कि अगर इसके बदले आतंकियों को छोड़ा गया तो फिर हिन्दुओं की शामत आनी तय है।
आरती ने बताया कि उन्हें इसका पूरा घटनाक्रम याद है, जब इस खबर को सुन कर कश्मीरी पंडितों ने अपना माथा पीट लिया। इसके कुछ ही दिनों बाद एक कश्मीरी पंडित की हत्या हुई, जिसके लाश देख कर आरती को अब भी सपने आते हैं, इसका खौफ उनके मन में बैठ गया। उन्होंने बताया कि समुदाय के लोग चुन-चुन कर मारे जा रहे थे, कश्मीरी पंडितों के नेताओं को भी मारा जाने लगा और सीरियल मर्डर्स का माहौल शुरू हो गया।
सबसे बड़ी बात थी कि उस समय कश्मीरी पंडितों को समझ आ गया था कि सरकार उनके लिए कुछ नहीं कर सकती। आरती ने बताया कि उनके घर काम करने वाला लड़का तक बोलता था कि कश्मीर अब पाकिस्तान बनने वाला है, आपलोग यहाँ से चले जाओ। लोग पाकिस्तान का झंडा खड़ा करने की बातें करने लगे थे। आरती कहती हैं कि आज़ादी वाला नैरेटिव तो बाद में गढ़ा गया, पहले पाकिस्तान की बातें होती थीं।
आरती टिकू सिंह ने याद किया कि आतंकी संगठनों ने कई अख़बारों को अनइस्लामिक करार देकर उन्हें प्रतिबंधित कर दिया था। उनके परिवार की छवि भी भारतीय राष्ट्रवादी की थी, तो उन्हें भी टारगेट में रखा गया था। 1989 में अनंतनाग में उनके परिवारी कारोबार पर 2 हमले हुए। उन्होंने याद किया कि एक बार कर्फ्यू के दौरान वो लोग छत पर धूप में बर्फ खा रहे थे और मोहल्ले की अन्य लड़कियाँ थीं, तभी दूर से आग की लहरें उठने लगीं और जोर की आवाज़ें आने लगीं।
जब वो लोग नीचे उतरीं तो परिवार के सभी लोग रो रहे थे। मोहल्ले के सभी मर्द जब आए तो उनके कपड़े फटे हुए थे, किसी के शरीर से खून बह रहा था। बाद में पता चला कि उनकी दुकानें और गोदाम पर हमला कर के आतंकियों ने लूट मचाई और उन्हें आग के हवाले कर दिया, जिसे बचाने के चक्कर में सबका ये हाल हुआ। आरती ने बताया कि पुलिस भी आतंकियों के साथ थी और उन्होंने मिल कर इन घटनाओं को अंजाम दिया।
इसके बाद 1990 में एक और घटना हुई, जिसके बाद उनके परिवार को लगने लगा कि कश्मीरी पंडित अब कश्मीर में नहीं रह सकते। उस दौरान सभी आतंकी और अलगाववादी नेता सड़कों पर उतर आए थे और मस्जिदों से लाउडस्पीकर्स से मजहबी नारे लगाए गए और कहा गया कि कश्मीर में निजाम-ए-मुस्तफा चलेगा। उपद्रवियों को रोकने की किसी में हिम्मत नहीं थी। केंद्र सरकार क्या कर रही थी, किसी को नहीं पता।
आरती ने उस घटना को याद करते हुए बताया कि उनके घर के सभी मर्द घर के बाहर खड़े थे और औरतों ने सभी लड़कियों को इकठ्ठा कर के कहा कि अगर ‘वो लोग’ मोहल्ले में घुसने में कामयाब होते हैं तो लाइटर और दियासलाई से गैस सिलिंडर में आग लगा देनी है। यानी, मौत को गले लगा लेना है – आत्महत्या करनी है। आरती ने बताया कि उन्हें उस वक़्त कुछ खास समझ में नहीं आया क्योंकि वो सिर्फ 12 साल की थीं और उन्हें कई चीजों की समझ नहीं थी।
उन्होंने बताया कि कश्मीर में ‘लड़कियों को रखेंगे, लड़को को मार डालेंगे’ का नारा भी लगा था। इस घटना के 10 दिन बाद ही उनके परिवार ने बच्चों को बाहर भेजने का निर्णय ले लिया। ट्रक से लड़कियों और बच्चों को भारी पत्थरबाजी और गोलीबारी के बीच दुबक कर बाहर निकाला गया। जबकि वयस्क लोग वहीं रहे। आरती टिकू सिंह अपने चाचा के यहाँ गईं, जहाँ मात्र 1 कमरे में वो पत्नी, बच्चे, माता-पिता और सभी बच्चों के साथ रहते थे।
एक समय ऐसा आया जब उस एक कमरे में 25 लोग तक रह रहे थे और लोगों को छत पर सोना पड़ता था। आरती याद करती हैं कि रिफ्यूजी कैम्प्स बनाए गए, तब कई हफ़्तों तक लाइन में खड़ा रहने के बाद वहाँ एक टेंट में जगह मिली। आरती ने कहा कि कश्मीरी पंडितों की एक टेंट तक की भी औकात नहीं रही थी। पहली बार कश्मीरी पंडितों को गर्मी के मौसम में निकलना पड़ा। महीनों रहने-खाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। आरती ने आगे बताया:
“मेरे पिता सरकारी सेवा में थे। उन्हें नहीं पता था कि वो छोड़ कर जाएँगे तो सरकार उनके लिए क्या व्यवस्था करेगी। मेरे यहाँ काम करने वाले मुस्लिम लड़के के बलबूते वो अनंतनाग में रहे। रात को वो लोग किसी तरह नाइट ड्रेस में ही कुछ गहनें और ज़रूरी कागजात लेकर निकले। कम से कम 10-15 वर्ष रिफ्यूजी कैंप में ही बीते। हमारे माता-पिता स्कूल बस के लिए 50 पैसे देते थे, लेकिन हम पैदल स्कूल जाते थे और ठंडा पानी के लिए उस पैसे का बर्फ खरीदते थे। हमने काफी मेहनत की। हमारे पास कुछ नहीं था लेकिन हमें अपना अस्तित्व बचाना था। किसी तरह हम आर्थिक रूप से सशक्त हुए। मेरे भाई का एक बच्चा तो शरणार्थी कैंप में ही पला-बढ़ा। आज भले सब सेटल्ड हैं, लेकिन हमने क्या-क्या खोया इसका कहीं कोई हिसाब-किताब नहीं। मेरे ग्रैंड पेरेंट्स घर के सपने देखते हुए मरे। हमसे हमारा बचपन छीन लिया गया। बुद्धिजीवी वर्ग ने कभी हमारे बेघर होने और नरसंहार पर बात नहीं की।”
आरती को ये याद कर सबसे ज्यादा दुःख होता है अख़बारों-पत्रिकाओं में छपवाया गया कि राज्यपाल जगमोहन मुस्लिमों को मरवाना चाहते हैं, इसीलिए उन्होंने ही कश्मीरी पंडितों को वहाँ से निकाला। इसीलिए, वो मीडिया पर भी सच छिपाने का आरोप लगाती हैं। पत्रकार होने के कारण वो कई बड़े पत्रकारों से प्रभावित थीं, लेकिन उन्हें कश्मीरी पंडितों पर बात करते न देख कर उन्हें दुःख होता था। लेकिन, कश्मीर को लेकर उन पत्रकारों के नैरेटिव अलग थे।
बकौल आरती, उनके नैरेटिव ऐसे नहीं थे जिनका उनके अनुभव से कुछ लेना-देना नहीं हो। यानी, देश को कुछ और ही बताया जा रहा था। उन्हें ये लगने लगा कि सच का पता लगाना होगा क्योंकि उनका अनुभव कुछ और कहता था, जबकि बड़े पत्रकारों ने कुछ और नैरेटिव बनाया था। अभी TOI और HT जैसे मीडिया संस्थानों में काम कर चुकीं आरती को तब पत्रकारिता के बारे में कुछ खास पता नहीं था। उन्होंने जम्मू में 10-15 कॉपी बेचने वाले अख़बार के साथ अपना करियर शुरू किया।
उन्होंने खुद काम कर के अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी की क्योंकि उनके माता-पिता के पास न तो भोजन और कपड़े के अलावा कुछ अन्य चीजों के लिए रुपए होते थे और न ही उनसे माँगा जा सकता था। वो आगे बताती हैं कि उन्हें मीडिया में आकर पता चला कि पत्रकारों ने ऐसा नैरेटिव क्यों बनाया। वो कहती हैं कि असल में वो कभी सत्ता के खिलाफ जा ही नहीं सकते थे। कश्मीरी पंडित सत्ता में नहीं थे, इसीलिए उनके साथ जो हुआ उसे भुला दिया गया।
वो कई वर्षों बाद वापस कश्मीर में उसी पुराने घटनाक्रम को खँगालने गईं और बतौर पत्रकार कई लोगों से मिलीं। उन्हें तब भी डर लगता था, इसीलिए उन्हें अपनी पहचान और नाम छिपानी होती थी। लोग पूछते थे कि आप लोग यहाँ से भाग गए? कोई ये नहीं पूछता था कि उन्हें भगाया गया। आरती ने बताया कि उन्होंने कश्मीर में अपना एक नेटवर्क बनाया और कई परिचित बने तो उनकी बातों को सुनने लगीं। आरती ने कहा:
“कश्मीरी पंडितों के मामले में मीडिया ने भी प्रोपेगंडा चलाया। नब्बे के दशक से पहले अधिकतर पत्रकार कश्मीरी पंडित थे। कई मारे गए, कइयों को भगाया गया। पत्रकारिता की नई इंडस्ट्री बनी और उसमें वो लोग आए, जिनके हित पाकिस्तान से जुड़े थे। हुर्रियत से जुड़े हुए थे। उन्होंने राज्यपाल जगमोहन को विलेन बना कर नैरेटिव खड़ा किया। बरखा दत्त यहाँ तक कह बैठीं कि कश्मीरी पंडित इसीलिए निशाना बनाए गए, क्योंकि वो इलीट थे और अपर-कास्ट थे। क्या उन्हें इतिहास पता है? उन्होंने कुछ पढ़ा है कि कौन गरीब था और कौन अमीर? महाराजा हरि सिंह की शक्तियाँ शेख अब्दुल्ला को दी गई, जिन्होंने लैंड रिफॉर्म्स के नाम पर महाराजा और उनके साथ काम करने वालों की जमीनों की बंदरबाँट की। नैरेटिव बना दिया गया कि कश्मीरी पंडितों के साथ ठीक हुआ, क्योंकि वो इलीट और अमीर थे। मीडिया ने हमें ही अत्याचारी दिखाया। मानवाधिकार उल्लंघन कश्मीरी मुस्लिमों के साथ हो रहा, पंडितों के साथ नहीं – ऐसा नैरेटिव बनाया गया।”
आरती टिकू सिंह ने साझा किए कश्मीरी पंडितों के पलायन से जुड़े अनुभव
आरती टिकू सिंह के अनुसार, कश्मीरी पंडितों के साथ हुए नरसंहार के लिए उलटा जगमोहन, RSS और हिन्दुओं को जिम्मेदार बताया गया, लेकिन वीपी सिंह की सरकार केंद्र में और राज्य में फारुख अब्दुल्लाह की सरकार को कुछ नहीं कहा गया। मुफ़्ती मोहम्मद सईद देश के गृह मंत्री थे। इस्लामी कट्टरवाद को नया बताने वालों से उन्होंने पूछा कि 1989 की घटना पर वो क्या कहेंगे, जब मस्जिदों से शरिया कानून बनाने की बातें की जाती थीं।
आरती ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि लड़कियों के जीन्स पहनने पर पाबन्दी लगा दी गई थी, जैसा तालिबान करता है। उन्होंने कहा कि 80 के दशक में आधुनिकता थी और इस्लामी कट्टरता के साथ सब चला गया। इस्लामी कट्टरवादियों ने अख़बारों में एडवर्टाइजमेंट देकर नियम-कानून तय किए। आरती भारतीय उप-महाद्वीप के 1930 के दशक राजनीति को ही इन बदलावों के लिए जिम्मेमदार ठहराती हैं।
ये वो समय था, जब मोहम्मद अली जिन्ना ने घोषित किया कि हिन्दू-मुस्लिम साथ नहीं रह सकते हैं और पाकिस्तान के रूप में इस्लामी मुल्क की बात होने लगी। शेख अब्दुल्लाह ने महाराजा हरि सिंह के खिलाफ मजहब के नाम पर अभियान चलाया। उनकी पार्टी का नाम ही रहा ‘मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’, जिसमें हिन्दू महाराजा पर मुस्लिमों के साथ क्रूरता के आरोप लगाए गए। उनका मानना है कि मुस्लिम लीग ही अंत में ‘मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट’ बन गया, जिसने 80 के दशक में चुनाव लड़ा।
वो जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले करने की माँग करते थे। खिलाफत आंदोलन के समय भी इस्लामी कट्टरता थी। आरती ने अंत में कहा कि जहाँ आप अपनी व्यक्तिगत-सार्वजनिक जीवन मजहब को सौंप दें और शासन-प्रशासन को भी इस्लाम के हिसाब से चलाना चाहे, यही तो इस्लामी कट्टरवाद है। उनका कहना है कि हिज्बुल मुजाहिद्दीन से लेकर JKLF और लश्कर-ए-तैयबा तक ने भी यही किया। सभी ‘इस्लामी कानून’ चाहते हैं।
इसी तरह भारतीय स्तंभकार सुनंदा वशिष्ठ ने वाशिंगटन डीसी में टॉम लैंटॉस एचआर द्वारा आयोजित यूएस कॉन्ग्रेस की बैठक में बताया था कि कैसे उनके लोगों को आतंकियों ने उस रात केवल 3 विकल्प दिए थे। या तो वे कश्मीर छोड़कर भाग जाएँ, या फिर धर्मांतरण कर लें या फिर उसी रात मर जाएँ। सुनंदा वशिष्ठ के अनुसार, उस रात करीब 4 लाख कश्मीरी हिंदुओं ने दहशत में आकर अपनी घर- संपत्ति सब जस का तस छोड़ दिया और खुद को बचाने के लिए वहाँ से भाग निकले।
महज एक सप्ताह बाद गणतंत्र दिवस की परेड के अवसर पर नई दिल्ली में राजपथ पर ‘स्वामीये शरणम् अय्यप्पा’ के पवित्र मंत्र का जाप सुनाई देने वाला है। 861 ब्रह्मोस मिसाइल रेजिमेंट (Brahmos Missile Regiment), जो भारत की सबसे घातक सेनाओं में से एक है, राष्ट्रीय राजधानी में गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लेगी और इस अवसर पर भगवान अयप्पा की मंत्रमुग्ध करने वाली प्रार्थनाओं का जाप करने जा रही है।
भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट का एक हिस्सा 861 मिसाइल रेजिमेंट, राजपथ पर इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल का प्रदर्शन करेगी। रेजिमेंट का ‘वॉर क्राई’ (युद्ध के दौरान लगाए जाने वाले नारे) ‘स्वामीये शरणम् अय्यप्पा’ है।
हाल ही में, 861 मिसाइल रेजिमेंट और उसके ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम ने 15 जनवरी को मनाए गए 73वें भारतीय सेना दिवस में भाग लिया था। इस अवसर पर भगवान अयप्पा के पवित्र मंत्रों को पहली बार सुना गया था, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब लोकप्रिय हुआ था।
संयोग से, ये युद्ध घोष यानी, वॉर क्राई रेजिमेंट द्वारा दुर्गा माता की जय और भारत माता की जय के नारों के साथ दोहराए गए। ब्रह्मोस रेजिमेंट का वॉर क्राई भगवान अयप्पा को श्रद्धांजलि के रूप में देखा जाता है क्योंकि उन्हें एक धनुष और तीर पकड़े बाघ के ऊपर सवार होकर बुरी ताकतों को पराजित करने का प्रतीक माना जाता है।
इसके अलावा, भारतीय सेना के नए भर्ती किए गए राफेल लड़ाकू जेट भी गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होंगे। वायु सेना ने घोषणा की है कि परेड एक ‘वर्टिकल चार्ली’ संरचना में होगी। वर्टिकल चार्ली एक विमान प्रदर्शन करने की एक विधि है जो कम ऊँचाई पर उड़ान भरती है और ऊपर की ओर उछलती है।
861 ब्रह्मोस मिसाइल रेजिमेंट
गौरतलब है कि 861 मिसाइल रेजिमेंट, भारतीय सेना में वर्तमान में तीन ब्रह्मोस रेजिमेंटों में से एक है। यह 20 जून 1963 को पहली बार 863 लाइट बैटरी से अपग्रेड किया गया था, जिसमें 35 हेवी मोर्टार रेजिमेंट की बैटरी के साथ 121 (स्वतंत्र) हैवी मोर्टार बैटरी (कांगो) को मर्ज किया गया था। पहले कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल सेवा राम थे। रेजिमेंट ने ऑपरेशन मेघदूत, ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन पराक्रम में भी भाग लिया।