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20 रुपए के लिए हुआ विवाद तो मुस्लिमों ने 40 घर पर लगा दिए ‘यह मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले का गाँव मवीमीरा। यहाँ 20 रुपए को लेकर हुए एक विवाद को सांप्रदायिक रंग देते हुए समुदाय विशेष के करीब 40 लोगों ने अपने घरों पर ‘यह मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर लगा दिए हैं।

रिपोर्टों के अनुसार दौराला थाना क्षेत्र के इस गाँव में कुछ दिन पहले 20 रुपए की सिगरेट के उधार का तकादा करने पर विवाद शुरू हुआ था। तकादे से नाराज युवक ने कथित तौर पर तगादा करने वाले की पिटाई कर दी जो समुदाय विशेष का था।

ख़बरों के अनुसार पुलिस पर कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाते हुए समुदाय विशेष के लोगों ने पलायन के पोस्टर लगाए हैं। बताया जा रहा है कि नौशेर गाँव में ही अपने घर में किराने की दुकान करता है। 15 दिसंबर 2020 को गाँव का ही सुंदर नामक युवक उसकी दुकान पर सिगरेट खरीदने पहुँचा था। लेकिन नौशेर ने सिगरेट उधार देने से मना कर दिया। दुकान पर ही खड़े तैयब नाम के एक युवक ने अपनी गारंटी पर सुंदर को 20 रुपए की सिगरेट उधार दिला दी।

सुंदर ने बाद में दुकानदार को पैसे नहीं दिए तो वह तकादा करने लगा। 23 दिसंबर को सुंदर कुछ दोस्तों के साथ कहीं जा रहा था तो तैयब ने उससे दुकानदार के 20 रुपए देने को कहा। दोनों के बीच कहासुनी हुई तो बड़े-बुजुर्गों ने समझाकर मामला ठंडा कराया। आरोप है कि इसके कुछ देर बाद सुंदर और उसके साथियों ने तैयब के घर पर हमला किया। जमकर तोड़फोड़ की और परिवार के लोगों के साथ मारपीट की।

पोस्टर लगाए जाने की बात सामने आने के बाद स्थानीय पुलिस ने ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने कार्रवाई नहीं होने तक पोस्टर हटाने से इनकार कर दिया। पीड़ित पक्ष का कहना है कि पुलिस ने किसी आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित पक्ष के शकील अहमद, आरिफ का कहना है कि घटना में नामजद तहरीर देने के बाद भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।

वहीं, दौराला के इंस्पेक्टर किरणपाल सिंह का कहना है कि दो पक्षों में मारपीट हुई थी और पुलिस ने दोनों पक्षों के करीब एक दर्जन लोगों को मुचलका पाबंद किया है। उन्होंने बताया कि किसी भी पक्ष ने तहरीर नहीं दी है। दौराला के सीओ संजीव दिक्षित का कहना है कि ग्राम प्रधान चुनाव को लेकर कुछ लोग विवाद को तूल दे रहे हैं।

35 साल पहले निकाह में शामिल होने कराची से आई, फर्जी आधार-वोटर कार्ड बनवाया, ग्राम प्रधान बनी: बानो बेगम की पूरी डिटेल

पाकिस्तानी महिला बानो बेग़म 35 साल पहले एक शादी में शामिल होने के लिए भारत आई थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश स्थित एटा के एक गाँव की ग्राम प्रधान बन गई। वह कराची से यहाँ आई थी और फिर अख्तर अली से निकाह कर लिया। तब से वह अपने दीर्घकालिक वीज़ा की अवधि कई बार बढ़वा चुकी है। 

बेग़म बानो ने लड़ा था ग्राम पंचायत चुनाव 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बानो बेग़म ने 2015 में ग्राम पंचायत चुनाव लड़ा था और उसमें जीत दर्ज की थी। उसे एटा स्थित जलेसर तहसील के गुदऊ गाँव की ग्राम पंचायत का सदस्य चुना गया था। 9 जनवरी 2020 को पूर्व ग्राम प्रधान शहनाज़ बेग़म का निधन हो गया। नतीजतन सियासी समीकरणों की वजह से बानो बेग़म को ग्राम प्रधान चुन लिया गया। इसके बाद गाँव के निवासी कुवैदान खान ने 10 दिसंबर 2019 को डिस्ट्रिक्ट पंचायत राज ऑफिसर (डीपीआरओ) आलोक प्रियदर्शी से शिकायत की।

शिकायत में उन्होंने कहा था कि बानो बेग़म पाकिस्तान की नागरिक है। इस बात के सामने आते ही पूरे गाँव में हडकंप मच गया। फिर बानो बेग़म ने ग्राम प्रधान पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। डीपीआरओ आलोक प्रियदर्शी ने पूरे प्रकरण के बारे में ग्राम पंचायत सचिव और एटा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट सुखलाल भारती को सूचित किया। मजिस्ट्रेट सुखलाल भारती ने बानो बेग़म पर मामला दर्ज करने और जाँच शुरू करने का आदेश दिया है। 

बनवाए फ़र्ज़ी दस्तावेज़ 

जाँच के कुछ ही समय बाद यह पता चला कि बानो बेग़म भारत की नागरिक नहीं है। उसने नकली वोटर आईडी और आधार कार्ड बनवाए थे। आरोपों के मुताबिक़ गुदऊ ग्राम पंचायत सचिव ध्यान सिंह ने प्रधान पद के लिए बेग़म बानो के नाम का सुझाव दिया था। उन लोगों के खिलाफ़ भी जाँच की जा रही है जिन्होंने बेग़म को नकली दस्तावेज़ उपलब्ध कराने में मदद की। 

J&K: 40 साल से रह रहे पंजाबी की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या की, कुछ महीने पहले ही मिला था डोमिसाइल

जम्मू-कश्मीर में एक 70 वर्षीय पंजाबी स्वर्णकार (ज्वेलर) की श्रीनगर के बीच बाज़ार में गोली मार कर हत्या कर दी गई। घटना श्रीनगर के सराई बाला इलाके की है। गुरुवार (31 दिसंबर 2020) को बाइक सवार आतंकवादियों ने ज्वेलर पर गोली चलाई। मृतक पिछले चार दशक से जम्मू-कश्मीर में रह रहे थे। कुछ महीनों पहले ही उन्हें स्थायी निवास प्रमाण पत्र (डोमिसाइल) मिला था। इसके उन्होंने एक घर और दुकान भी खरीदी थी। 

मूल रूप से अमृतसर से ताल्लुक रखने वाले सतपाल निश्छल की हत्या की ज़िम्मेदारी पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली है। इस घटना को लेकर फेसबुक पर पोस्ट करते हुए TRF ने कहा है, “डोमिसाइल से जुड़ा नया क़ानून अस्वीकार्य है। मूल कश्मीरियों के अलावा यहाँ संपत्ति बनाने वाले हर किसी के साथ ‘कब्ज़ा करने वाले’ की तरह बर्ताव किया जाएगा। अभी बहुत कुछ होना बाकी है।”

इस आतंकी संगठन का नाम पहली बार मार्च 2020 में सामने आया था। यह खुद को यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ जम्मू-कश्मीर कहता है जो कि बाद में TRF बना। ये प्रतिबंधित आतंकी संगठनों जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैय्यबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन से भी जुड़ा हुआ है। डोमिसाइल से जुड़ा नया क़ानून प्रभावी होने के बाद निश्छल पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें इस तरह निशाना बनाया गया है। वह श्रीनगर स्थित निश्छल ज्वेलर्स के मालिक भी थे। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ उनके सीने पर तीन गोलियाँ लगी थीं। इसके बाद जैसे ही लोग उन्हें लेकर एसएमएचएस अस्पताल लेकर पहुँचे, उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। 2020 की शुरुआत में ही निश्छल को डोमिसाइल सर्टिफ़िकेट मिला था उन्होंने श्रीनगर स्थित हनुमान मंदिर के पास दुकान खरीदी थी और बादामी बाग़ क्षेत्र के सेना मुख्यालय स्थित इंदिरा नगर में घर खरीदा था।

उनके एक पारिवारिक मित्र ने मीडियाकर्मियों से बात करते हुए कहा था, “सराई बाला क्षेत्र में स्थित उनकी दुकान किफ़ायती दामों की वजह से नई नवेली दुल्हनों के बीच बेहद मशहूर थी।” सतपाल निश्छल के दो बेटे और एक बेटी हैं। उन पर गोली चलाने वाले आतंकवादियों ने इस वारदात को अंजाम देने के बाद ग्रेनेड भी फेंका था। जिसमें एक सीआरपीएफ़ सब इंस्पेक्टर घायल हो गए। वे घटना के वक्त दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले स्थित संगम क्षेत्र में पेट्रोलिंग कर रहे थे।  

2020 में JNU, 2021 में ट्विटर-इंस्टा पोस्ट: दीपिका पादुकोण की चर्चा में रहने की ट्रिक या फिर हैकर की शिकार?

महीना जनवरी का ही था। लेकिन साल 2020 था। दीपिका पादुकोण वामपंथी छात्रों के समर्थन में जेएनयू पहुँची थीं। अब 2021 का साल आ गया है। नए साल के पहले ही दिन दीपिका से जुड़ी एक और खबर सुर्खियों में है। अबकी बार उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स के सभी पोस्ट डिलीट कर दिए हैं।

यानी, अब आप दीपिका के ट्विटर और इंस्टाग्राम अकाउंट पर जाएँगे तो वहाँ उनके द्वारा पूर्व में शेयर की गई कोई पोस्ट नजर नहीं आएगी। इसने कई तरह के कयासों को जन्म दे दिया है। कुछ इसे खुद को चर्चा में रखने की दीपिका की ट्रिक बता रहे हैं तो कुछ उनके हैकिंग के शिकार होने के कयास लगा रहे हैं। दीपिका इस समय अपने पति रणवीर सिंह के साथ रणथंभौर में हैं। यहाँ रणबीर कपूर, आलिया भट्ट, नीतू कपूर, रिद्धिमा कपूर सहनी सहित कई लोगों से मुलाकात भी की है।

दीपिका के इंस्टाग्राम अकाउंट का स्क्रीनशॉट

कुछ रिपोर्टों के अनुसार दीपिका ने पोस्ट 2020 के आखिरी दिन यानी 31 दिसंबर को डिलीट किए। कुछ नेटीजन्स का कहना है कि शायद उनका अकाउंट हैक हो गया है। इसकी वजह बीते कुछ सप्ताह में कई सेलिब्रिटी का अकाउंट हैक होना है। इनमें सुष्मिता सेन की बेटी रेनी, विक्रांत मेसी, फराह खान जैसे नाम शामिल हैं। वैसे इस बार दीपिका की प्रतिक्रिया अभी तक सामने नहीं आई है।

दीपिका के ट्विटर अकाउंट का स्क्रीनशॉट

वैसे सितारों के लिए खुद को चर्चा में बनाए रखने के लिए नए नए तरीकों पर अमल करना भी नई बात नहीं है। हाल ही में नेहा कक्कड़ ने बेबी बंप के साथ अपनी तस्वीर पोस्ट कर लोगों को चौंका दिया था। बाद में पता चला कि अपने नए एलबम के प्रमोशन का उनका यह तरीका था। दीपिका ने भी इसी तरह पिछले साल ‘छपाक’ फिल्म के प्रमोशन के दौरान जेएनयू पहुँच कर सबको चौंकाया था। शुरुआत में इसे वामपंथी गैंग को उनका समर्थन कहकर प्रचारित किया गया, लेकिन बाद में यह प्रचार की पैंतरेबाजी ही निकली। जुलाई 2020 में भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के पूर्व अधिकारी एनके सूद ने दावा किया था कि अनिल मुसर्रत ने दीपिका को फोन करके जेएनयू जाने के लिए कहा था। उनका यह भी दावा था कि जेएनयू में प्रदर्शनकारियों के बीच जाकर सिर्फ़ खड़े होने के लिए पाकिस्तानी एजेंट मुसर्रत से उन्होंने करीब 5 करोड़ रुपए लिए थे और ईडी अब इसकी जाँच कर रही है।

गौरतलब है कि दीपिका की अगली फिल्म ’83’ है। भारतीय क्रिकेट टीम पर बनी इस फिल्म में कपिलदेव बने रणवीर सिंह की पत्नी की भूमिका में दीपिका नजर आएँगी। इसके अलावा वे सिद्धांत चतुर्वेदी और अनन्या पांडे की एक फिल्म में भी महत्वपूर्ण किरदार निभा रही हैं।

सड़कों के नहीं होंगे मुस्लिम नाम: BBMP ने वापस लिया प्रस्ताव, BJP सांसदों ने जताई थी आपत्ति

बृहत बेंगलुरु महानगरपालिका (बीबीएमपी) ने बेंगलुरु के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों की सड़कों का नामकरण मुस्लिमों के नाम पर किए जाने का प्रस्ताव को रद्द कर दिया है। भाजपा नेता और आम जनता जमकर इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे थे।

भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने बताया कि बीबीएमपी ने जनता के पुरजोर विरोध के बाद प्रस्ताव को वापस ले लिया है। उन्होंने कहा, “एक जागरूक हिन्दू समाज इस तरह की घटिया मानसिकता वाले प्रयासों को नाकाम कर सकता है।” 

तेजस्वी सूर्या सहित कई बीजेपी सांसदों ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई थी। तेजस्वी सूर्या ने बीबीएमपी के आयुक्त एन मंजूनाथ प्रसाद को पत्र लिखकर इस पर विचार करने को कहा था। भाजपा सांसद ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से यह पत्र साझा किया था। 

तेजस्वी सूर्या ने कहा था, “मेरे संज्ञान में आया है कि बृहत बेंगलुरु महानगरपालिका ने पदारायणपुरा के वार्ड नंबर 135 की कई सड़कों का नाम कुछ तय हस्तियों के नाम पर रखने का प्रस्ताव रखा है। जिसमें बीबीएमपी ने केवल मुस्लिमों के नाम दिए हैं।”

भाजपा सांसद ने पत्र में आपत्ति जताते हुए कहा था, “मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सड़कों का नामकरण मुस्लिमों के नाम पर करना टू नेशन थ्योरी वाली सोच है। यह उसी तरह की सांप्रदायिक सोच है, जब मुस्लिम लीग ने हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग मतदाता सूची की माँग की थी। यह खतरनाक है जिसकी निंदा होनी चाहिए।”

उनका कहना था कि देश में गैर मुस्लिम महापुरुषों और राष्‍ट्रभक्तों की कमी नहीं है और उन्हीं नाम पर सड़कों का नामकरण होना चाहिए। अपने पत्र में उन्होंने सड़कों के नाम की सूची दोबारा से ठीक करने को कहा था। अनुरोध किया था कि सूचीगत सड़कों के नाम सिर्फ व्यापक सार्वजिनक चर्चा के बाद ही निर्धारित होने चाहिए।

बलिदानियों के नाम पर हो सड़कें: हेगड़े 

इसी तरह उत्तर कन्नड़ के भाजपा सांसद अनंत हेगड़े ने भी प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि सड़कों का नामकरण बलिदानियों के नाम पर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा था, “मेरे वार्ड के नामकरण के लिए सिर्फ मुस्लिम नामों का सुझाव दिया गया है। सामाजिक सरोकार की आड़ में लिया जाने वाला यह कदम सही नहीं है, यह सिर्फ एक समुदाय का प्रचार है और कुछ नहीं।”

भाजपा नेताओं द्वारा लिखे गए पत्र बीबीएमपी रेवेन्यू विभाग द्वारा 16 दिसंबर 2020 को पारित की गई अधिसूचना की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आए थे। बेंगलुरु सेंट्रल के भाजपा सांसद पीसी मोहन ने भी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र की सड़कों का नामकरण मुस्लिम नामों पर किए जाने का विरोध किया था। पिछले दिनों बीबीएमपी द्वारा शहर के इंदिरानगर में 100 फुट चौड़ी सड़क का नामकरण डॉ. एस के करीम खान के नाम पर करने पर इस मामले पर बहस शुरू हुई थी।   

किसान आंदोलन में चोरी हुआ ‘किट्टी पार्टी जर्नलिस्ट’ सबा नकवी का आईफोन, पत्थरदिल ट्रोल्स ने लूटी लहरिया

दिल्ली की सीमाओं पर कृषि सुधार क़ानूनों का विरोध जारी है। ऐसा विरोध-प्रदर्शन जिसमें मुफ्त पिज्जा, मसाज, पार्लर, वाईफाई समेत विलासिता भरी तमाम सुविधाएँ उपलब्ध हैं। अब वहाँ चोरों ने भी घुसपैठ कर दी है। स्वघोषित ‘पत्रकार’ सबा नकवी ने जानकारी दी है कि सिंघु बॉर्डर पर उनका फोन चोरों ने चुरा लिया। उन्होंने अपने फोन का नाम “I phone 11 pro” बताया है। उन्होंने अपने ट्वीट में बताया कि चोरों ने उन्हें धक्का दिया, फोन छीना और गायब हो गए। 

हालाँकि नकवी ने ट्वीट यह बताने के लिए किया था कि इस घटना की वजह से वह फोन पर उपलब्ध नहीं रहेंगी। लेकिन ‘ट्रोल्स ’ ने इस बात को मौके की तरह देखा। इस घटना पर संवेदना जताने या फोन की अहम जानकारी रिकवर करने का तरीका बताने की बजाय ‘ट्रोल्स ’ ने पत्रकार और उनकी विचारधारा की ब्रांड का मज़ाक बनाना शुरू कर दिया। इस घटना से एक और बात साफ़ हुई कि सबा नकवी ‘ट्रोल्स ’ के बीच कितनी ‘मशहूर’ हैं।

मशहूर ट्विटर हैंडल BefittingFacts ने नकवी को याद दिलाते हुए कहा कि इस विचारधारा का ही तो वह समर्थन करती हैं, अमीरों से लिया और गरीबों को दिया। 

मौज लेते हुए ट्विटर की बाकी जनता ने भी कुछ ऐसी ही सूरत के विचार पेश किए। 

कुछ ट्विटर यूज़र्स ने नकवी पर आरोप लगाया कि वह किसानों को चोर कह रही हैं, क्योंकि उनके हिसाब से तो वहाँ पर सिर्फ किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। 

कुछ ट्विटर यूज़र्स ने चोरी की इस घटना को हाल ही में हुई घटना से जोड़ दिया, जिसमें ‘प्रदर्शनकारियों’ ने जियो मोबाइल टावर से जेनरेटर उखाड़ कर पंजाब के स्थानीय गुरुद्वारे को दान कर दिया था। लोगों की कल्पना कि शायद इसी तरह आईफोन भी किसी गुरुद्वारे में दान कर दिया गया होगा। 

वहीं कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी ही असली चोर हैं। 

कुछ ने तो सबा नकवी को कहा कि चोरी पर विलाप करने की ज़रूरत नहीं है और सुझाव दिया कि उन्हें इसको किसानों की पहल में योगदान समझना चाहिए। 

कई लोग यहाँ तक कहने लगे कि ‘भाजपा की अगुवाई वाली अर्थव्यवस्था’ में पत्रकार लगभग लाख रुपए के महँगे फोन कैसे रख सकते हैं, जैसा कि लिबरल गैंग अक्सर आरोप लगाती रहती है। 

आईफोन 11 प्रो सितंबर 2019 में भारत में लॉन्च हुआ था और इसकी शुरुआती कीमत 99,900 रुपए था। अब दाम में गिरावट आई है, जब एप्पल ने इस साल आईफोन 12 श्रृंखला के फोन लॉन्च किए। फिर भी बाज़ार में मौजूद तमाम फोन में सबसे महँगा आईफोन ही है।    

मुंगेर में दुर्गा विसर्जन के समय मारा गया अनुराग याद है आपको, बिहार सरकार भूल गई; लिपि सिंह को फिर से कमान

आप साल 2021 में प्रवेश कर चुके हैं। लेकिन 2020 का अक्टूबर याद है। इसी महीने बिहार के मुंगेर में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान लाठीचार्ज और फायरिंग में अनुराग पोद्दार की मौत हो गई थी। पुलिसिया क्रूरता की इस घटना ने एक अलग ही तस्वीर दिखाई थी। जब यह घटना हुई थी उस समय लिपि सिं​ह मुंगेर की एसपी हुआ करती थीं।

इस घटना के बाद उन्हें चुनाव आयोग ने हटा दिया था। उसके बाद से लिपि सिंह पर कार्रवाई को लेकर लगातार माँग भी उठती रही है। अब ताजा खबर यह है कि बिहार सरकार ने पोस्टिंग की प्रतीक्षा में रही लिपि सिंह को सहरसा का एसपी बनाया है।

देर रात बिहार सरकार ने बड़े पैमाने पर IAS-IPS अधिकरियों के तबादले किए। राज्‍य के 38 आइपीएस अधिकारियों का तबादला कर दिया गया है। 13 जिलों के एसपी भी बदले गए हैं। लेकिन इसमें सबसे चौंकाने वाला नाम लिपि सिंह का ही है। कई जिलों के डीएम और कई विभागों के सचिव भी बदले गए हैं।

मुंगेर गोलीकांड के बाद लिपि सिंह को ‘जनरल डायर‘ का नया नाम मिला था। दुर्गा पूजा समिति से जुड़े लोगों ने उस समय दावा किया था कि लिपि सिंह के सामने ला-ला कर विसर्जन में शामिल लड़कों को पीटा गया था। रात में वीरान सड़क पर माँ की प्रतिमा पड़ी हुई थी। अनुराग पोद्दार के पिता के बयान को आधार बनाते हुए पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पुलिस की चलाई गोली से उनके बेटे की हत्या हुई।

मुंगेर में फ़ायरिंग की घटना के बाद लिपि सिंह ने दावा किया था कि भीड़ द्वारा मचाए गए उपद्रव के बाद पुलिस ने गोली चलाई थी। पुलिस ने इस बात से भी इनकार किया था कि उसकी गोली से किसी की मृत्यु हुई थी, या फिर कोई घायल हुआ था। लेकिन सीआईएसएफ की रिपोर्ट से लिपि सिंह का दावा गलत साबित हुआ था। बाद में घटना के कई वीडियो भी सामने आए थे जिससे पुलिस की थ्योरी पर सवाल उठे थे।

वैसे अधिकारियों के तबादले या उन्हें जिले की कमान दिया जाना असामान्य बात नहीं है। लेकिन, इस मामले में जिस तरह पुलिसिया बर्बरता सामने आई थी वैसे में सरकार उन अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने से बच सकती थी जिनकी भूमिका पर सीधे सवाल हैं। दिलचस्प यह है कि लिपि सिंह जदयू सांसद आरसीपी सिंह की बेटी हैं। आरसीपी सिंह को नीतीश कुमार ने हाल ही में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है। गृह विभाग भी जदयू के पास ही है, जिसे राज्य की कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए पिछले दिनों विधान पार्षद संजय पासवान ने बीजेपी को सौंपने की माँग की थी।

भीमा-कोरेगाँव: एक युद्ध जिसे इतिहासकारों ने जबरन जीत में बदल डाला

31 अक्टूबर, 1817 को रात 8 बजे ईस्ट इंडिया कंपनी के कप्तान फ्रांसिस स्टोंटो ने नेतृत्व में 500 सिपाही, 300 घुड़सवार, 2 बंदूकों और 24 तोपों के साथ एक सैनिक दस्ता पूना से रवाना हुआ। रातभर चलने के बाद अगले दिन सुबह 10 बजे यह छोटी टुकड़ी भीमा नदी के किनारे पहुँची तो सामने पेशवा बाजीराव के नेतृत्व में 20,000 सैनिकों की मराठा फौज खड़ी थी। इस विशालकाय फौज का उद्देश्य पूना को फिर से स्वतंत्र करवाना था, लेकिन कंपनी के उस दस्ते ने उन्हें रास्ते में ही रोक लिया।

कप्तान स्टोंटो की सेना में ब्रिटिश अधिकारियों के अलावा स्थानीय मुसलमान और दक्कन एवं कोंकण के हिंदू महार शामिल थे। दोनों तरफ के विश्लेषण में पेशवा की तैयारी ज्यादा कुशल और आक्रामक थी, जिसे देखकर कप्तान स्टोंटो ने नदी को पार कर सामने से हमला करने की बजाए पीछे ही रहने का फैसला किया। अपनी सुरक्षा के लिए उसने नदी के उत्तरी छोर पर बसे एक छोटे से गाँव कोरेगाँव को बंधक बनाकर वहाँ अपनी चौकी बना ली।

एक छोटी से चारदीवारी से घिरे कोरेगाँव के पश्चिम में दो मंदिर– बिरोबा और मारुति थे। उत्तर-पश्चिम में रिहाइश थी। बिरोबा को भगवान शिवजी का ही एक रूप माना जाता है और महाराष्ट्र की कई हिन्दू जातियाँ उन्हें अपने कुलदेवता के रूप में पूजती हैं, जबकि मारुति को भगवान हनुमान का पर्याय कहा जाता है जोकि रामायण के प्रमुख पात्र हैं।

खैर, कंपनी के दस्ते ने कोरेगाँव के मकानों की छतों का इस्तेमाल पेशवा की सेना पर नजर रखने लिए किया था। कप्तान स्टोंटो ने अपनी बंदूकों को गाँव के दो छोर- एक सड़क के रास्ते और दूसरी नदी के किनारे पर तैनात कर दी थी। अब वह पेशवा की तरफ से पहले हमले का इंतजार करने लगा। हालाँकि, अभी तक पेशवा ने कंपनी के दस्ते पर कोई हमला नहीं किया, क्योंकि वह 5,000 अतिरिक्त अरबी पैदल सेना का इंतजार कर रहे थे।

जैसे ही वह सैनिक टुकड़ी उनसे जुड़ गई तो पेशवा की सेना ने नदी को पार कर पहले हमला शुरू कर दिया। दोपहर के आसपास पेशवा के 900 सिपाही कोरेगाँव के बाहर पहुँच गए थे (कुछ पुस्तकों में इनकी संख्या 1,800 तक बताई गई है)। दोपहर तक दोनों मंदिरों को पेशवा ने वापस अपने कब्जे में ले लिया था। शाम होने तक नदी के किनारे वाली एक बंदूक और 24 तोपों में से 11 को मराठा सेना ने नष्ट कर दिया था।

हालाँकि, ब्रिटिश सरकार द्वारा साल 1910 में प्रकाशित ‘मराठा एंड पिंडारी वॉर’ में कंपनी के नुकसान के दूसरे आँकडे पेश किए हैं। पुस्तक के अनुसार 24 तोपों में से 12 को नष्ट/मार और 8 को घायल कर दिया था (पृष्ठ 57)। मराठा सेना ने विंगगेट, स्वांसटन, पेट्टीसन और कानेला नाम के 4 कंपनी अधिकारियों को भी मार डाला था। हमला इतना तीव्र था कि परिस्थितियों को देखते हुए कप्तान स्टोंटो से बची हुई टुकड़ी ने आत्मसमर्पण की गुहार लगाई। इस सुझाव को कप्तान स्टोंटो ने स्वीकार कर लिया और वर्तमान कर्नाटक के सिरुर गाँव की तरफ भाग गया।

कप्तान स्टोंटो के पीछे हटने के निर्णय के बावजूद भी ब्रिटिश इतिहासकारों ने उसकी तारीफ की है। लड़ाई के चार साल बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने कप्तान स्टोंटो और उसकी सेना के नाम कोरेगाँव में एक स्तंभ बनवा दिया। कुछ सालों बाद, यानी 25 जून, 1825 को कप्तान फ्रांसिस स्टोंटो मर गया और उसे समुद्र में दफना दिया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा सेना के इस टकराव के कई ऐसे पहलू है जिनका तथ्यात्मक विश्लेषण करना जरूरी है।

पहली बात– महारों की मराठाओं से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी। यह लड़ाई कंपनी और मराठा सेना के बीच में लड़ी गई थी जिसमें महारों ने कंपनी का साथ दिया। यह जाति पहले फ़्राँस के भारतीय अभियानों में भी उन्हें अपनी सैन्य सहायता दे चुकी थी। दूसरी बात- किसी भी इतिहास की पुस्तक में स्पष्ट तौर पर मराठा सेना की हार का कोई जिक्र नहीं है। सभी स्थानों पर कप्तान स्टोंटो द्वारा स्वयं की जान बचाने का उल्लेख है, जिसे ‘डिफेन्स ऑफ़ कोरेगाँव’ के नाम से संबोधित किया गया है।

बाद के सालों में, इस टकराव को भीमा-कोरेगाँव युद्ध के नाम पर अंग्रेजों की मराठा सेना पर जीत में जबरन परिवर्तित कर दिया गया, जिसे रचने वाले खुद ब्रिटिश इतिहासकार थे। जिसमें रोपर लेथब्रिज द्वारा लिखित ‘हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ (1879); ‘द बॉम्बे गज़ेट’ (17 नवम्बर, 1880); जी. यू. पोप द्वारा लिखित ‘लॉन्गमैन्स स्कूल हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ (1892); आर. एम. बेथाम द्वारा लिखित ‘मराठा एंड डेकखनी मुसलमान’ (1908); जोसिया कोंडर द्वारा लिखित ‘द मॉडर्न ट्रैवलर’ (1918); सी.ए. किनकैड द्वारा लिखित ‘ए हिस्ट्री ऑफ़ मराठा पीपल’ (1925); और रिचर्ड टेम्पल द्वारा लिखित ‘शिवाजी एंड द राइज ऑफ़ द मराठा’ (1953) इत्यादि शामिल थे।

गौर करने वाली बात है कि इन सभी पुस्तकों में एक जैसा ही, बिना किसी परिवर्तन के, ब्रिटिश इतिहास का वर्णन मिलता है। हालाँकि, साल 1894 में अल्दाजी दोश्भई द्वारा लिखित ‘ए हिस्ट्री ऑफ़ गुजरात’ में एक अन्य तथ्य का जिक्र किया गया है। उन्होंने लिखा है कि पेशवा ने कोरेगाँव में ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं समझा क्योंकि कप्तान स्टोंटो को पीछे से ब्रिटिश सहायता मिल सकती थी। इसलिए उन्होंने वहाँ से निकलकर दक्षिण की तरफ जाने का फैसला किया। इस समय तक, दक्षिण भारत के कई हिस्सों में ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी पकड़ बना चुकी थी। पेशवा चारों तरफ से उनसे घिरे हुए थे और धीरे-धीरे उनके कई दुर्ग जैसे सतारा, रायगढ़ और पुरंदर हाथ से निकल गए थे।

‘मराठा एंड पिंडारी वॉर’ में भी बताया गया है कि जनरल स्मिथ के आने की खबर सुनकर पेशवा की सेना अगले दिन सुबह वहाँ से चली गई थी। कप्तान स्टोंटो को जनरल स्मिथ के कोरेगाँव पहुँचने के समय का सटीक अंदाजा नहीं था। इस बीच, उसके पास हथियारों की कमी हो गई थी, इसलिए वो वहाँ से चला गया। जनरल स्मिथ को 2 जनवरी से 6 जनवरी के बीच कोरेगाँव पहुँचा था लेकिन तब तक मराठा सेना और कंपनी की टुकड़ी वहाँ से रवाना हो गई थी। (पृष्ठ 58)

साल 1923 में प्रत्तुल सी गुप्ता द्वारा लिखित ‘बाजी राव II एंड द ईस्ट इंडिया कंपनी 1796-1818’ में पेशवा की हार का कोई उल्लेख नहीं है। बल्कि उन्होंने कंपनी के नुकसान के आँकड़े पेश किए है। प्रत्तुल सी. गुप्ता ने यह भी लिखा है कि रात के 9 बजे लड़ाई रुक गई थी। (पृष्ठ 179)

यहाँ एक गौर करने वाली बात है कि प्रत्तुल सी. गुप्ता के अनुसार रात्रि को लड़ाई रुकी थी। ‘मराठा एंड पिंडारी वॉर’ के मुताबिक पेशवा की सेना अगले दिन सुबह कोरेगाँव से रवाना हुई थी। इसका मतलब साफ़ है कि कप्तान स्टोंटो रात में ही भाग गया था, जबकि उसे पता था कि उसकी सहायता के लिए जनरल स्मिथ की एक बड़ी फौज उसके पीछे खड़ी थी। हालाँकि, उसके पास अपनी जान बचाने का वक्त भी नहीं था और न ही पर्याप्त हथियार थे।

कोरेगाँव के टकराव का एक अन्य विरोधाभास भी है। वर्तमान में, इस गाँव में कथित ब्रिटिश शौर्य का एक स्तंभ बनाया हुआ है, जिसमें 49 मरने वालों के नाम लिखे गए है। जबकि खुद ब्रिटिश इतिहासकारों जैसे रोपर लेथब्रिज ने साल 1879 (तीसरा संस्करण) में अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ में ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से 79 सैनिकों के मरने अथवा घायल होने की पुष्टि की है (पृष्ठ 191)। दो साल पहले यानी साल 1887 में सी कॉक्स एडमंड द्वारा लिखित ‘ए शोर्ट हिस्ट्री ऑफ़ द बॉम्बे प्रेसीडेंसी’ में कप्तान स्टोंटो के 175 सैनिकों के मारे जाने का उल्लेख है (पृष्ठ 257)।

भीमा-कोरेगाँव का यह टकराव ब्रिटिश क्राउन के लिए कोई बेहद महत्व का नहीं था। अगर ऐसा होता तो ब्रिटिश संसद में इसकी शान में कसीदे पढ़े गए होते। गौर करने वाली बात यह है कि वहाँ न भीमा-कोरेगांव और न ही फ्रांसिस स्टोंटो की कोई खबर है।

ऑपइंडिया के पाठकों के नाम सम्पादक का पत्र: आशा है 2021, 2020 जैसा न हो!

ग्रैगोरियन कैलेंडर के हिसाब से नव वर्ष आ चुका है, शुभकामनाएँ! इस साल की जनवरी का पहला दिन, पिछले साल की जनवरी के पहले दिन की तरह ‘आंदोलन’ शब्द के सामूहिक शीलहरण के साथ हमें मिल रहा है। आम नागरिक इस नौटंकी से उब चुका है, लेकिन विवश है क्योंकि जिन लोगों को इस कैंसर को हटाने के लिए चुना है, वो इसे ले कर वैसे ही उदासीन हैं, जैसे पिछले साल थे।

जज साहब सर्दियों की छुट्टियाँ मना रहे हैं, यहाँ किसान के नाम पर मुफ्त की दारू बाँटने से ले कर डीटीएच और आम लोगों के टैक्स के पैसे का फ्री वाइ-फाइ दिया जा रहा है ताकि उन्हीं आम लोगों का जीवन झंड बना रहे।

ख़ैर, नई शुरुआत आशावान होनी चाहिए। कल से कोरोना वैक्सीन के लिए राज्य सरकारें तैयारी में जुट जाएँगी और इस वैश्विक महामारी से भारत एवम् विश्व को मुक्ति दिलाने की ओर एक और सार्थक कदम उठाया जाएगा। आर्थिक क्षति हुई, लोगों की नौकरियाँ गई, हमारे सोचने-समझने का तरीका बदला, हमारी जीवनशैली बदल गई। यह पूरा साल हमें यह बता गया कि प्रकृति से बलवान कुछ भी नहीं।

कोरोना की लड़ाई में उत्तर प्रदेश विशेष बधाई का पात्र है। चाहे श्रमिकों को ले कर, वामपंथी गैंग की करतूतों को कारण डर का वातावरण तैयार करने के बाद, अराजकता फैलाने की कोशिश हो, या फिर इतनी बड़ी जनसंख्या को लगातार टेस्टिंग के साथ बचाव हेतु तैयार रखना, योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सराहनीय कार्य किया है। वरना, हमने केरल के मॉडल पर किताबें भी देखी हैं, जो मई के बाद से मिसमैनेजमेंट का एक मॉडल बन कर सामने आया।

कोरोना के आने से पहले इस देश ने दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों को झेला था। कुल 53 लाशें गिरी थीं, जिनमें हिन्दुओं की लाशें सिर्फ बेजान शरीर नहीं थे, बल्कि इस्लामी घृणा की विस्तृत तहरीर थे। किसी को जलती आग में फेंकने से पहले हाथ-पाँव काटा गया, तो किसी को छः-सात लोग मिल कर चार घंटे तक, चाकुओं से गोदते रहे। हमें ऐसी विचारधारा से, इस घृणित हिन्दू-विरोधी सोच से छोटी से छोटी बात पर भी सँभल कर रहना होगा।

पिछले साल ने भारतीय संस्कृति की रक्त, मज्जा और फेफड़ों की वायु में बसे श्री राम भगवान के जन्मस्थान पर भूमिपूजन का भी शुभ उपहार हमें दिया। यह क्षण इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा और हमें उसी भगवान का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है कि हमारा जन्म इस समय में हुआ। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है, बल्कि हिन्दू आकांक्षाओं का, उनकी लगातार तोड़ी जाती रही सभ्यताओं का, उनकी वैचारिक लड़ाई की परिणति का वह प्रतीक है जिसके साकार होने का स्वप्न लिए हमारे माता-पिता, दादा-दादी स्वर्गलोक चले गए। हमारी आँखों से उन्होंने भी इस दैवीय क्षण को देखा है।

ऑपइंडिया के लिए 2021 के मायने

सर्वप्रथम, आभार आप सारे पाठकों का, यूट्यूब के दर्शकों का और स्नेही मित्रों का जिन्होंने अपना समय हमें दिया, धन दे कर हमारा सहयोग किया और इस पोर्टल को नई ऊँचाइयों तक ले गए। यह गौरव की बात है कि ऑपइंडिया हिन्दी के पहले साल पूरे होने के समय से ही, हमने वामपंथी पोर्टलों को लगातार पीछे रखा है। इस दूसरे साल में भी हमें आपका सहयोग अपेक्षा से अधिक मिला, और हमने वामपंथी गैंग के नैरेटिव को लगातार काटा, अपने नैरेटिव बनाए।

पिछले साल में हमारी लड़ाई गूगल, फेसबुक और ट्विटर से लगातार चली। कहीं किसी दुष्ट ने हमारे विज्ञापन हटवाने की कोशिश की, तो कभी फेसबुक ने स्वतः, अकारण ही हमारी रीच घटा कर दस प्रतिशत कर दी। ट्विटर तो खैर वामपंथियों की गोद में खेलने का अभ्यस्त हो चुका है। इसलिए भी, हमारी आवाज को और प्रबल करने का समय आ गया है। अब आपसे अपेक्षित है कि आप हमारे तीसरे साल में हमें इतना आगे बढ़ाएँ कि हमें वामपंथी प्लेटफॉर्म्स की नौटंकियों से प्रभाव न पड़े।

इस साल हमने स्वयं में कुछ सुधार भी किए। हमने दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों की ग्राउंड रिपोर्टिंग की थी, जो कि बाद में दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय के लिए एक गंभीर दस्तावेज के रूप में सामने आया। ऑपइंडिया को अपनी टीम पर गर्व है जिन्होंने दंगों के थमते ही लगातार वीडियो और टेक्स्ट के माध्यम से वामपंथियों के ‘विक्टिमहुड’ वाले नैरेटिव को काटने का काम किया।

फरवरी में दंगों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के बाद अक्टूबर-नवम्बर में हमने बिहार चुनाव के दौरान एक महीने, अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से ग्राउंड रिपोर्ट्स किए। साथ ही, ऑपइंडिया को छोड़ कर किसी भी बड़े या छोटे संस्थान ने चुनावों के परिणाम का सही आकलन नहीं किया। हम एक छोटी संस्था होते हुए भी बिलकुल सही अनुमान लगाते हुए, सारे एग्जिट पोल्स की पोल खोल गए।

नए वर्ष में हमारी योजना है कि लम्बे आलेख, ज्यादा ग्राउंड रिपोर्ट्स, विषयों में विविधता, वीडियो में बेहतर तकनीकी गुणवत्ता लाई जाए। वीडियो को ले कर हमारी योजना पिछले साल के अप्रैल की ही थी, लेकिन कोरोना के कारण शूटिंग, स्क्रिप्टिंग, लाइटिंग, एडिटिंग, अपलोडिंग आदि सारे काम मुझे स्वयं ही करने होते हैं। जबकि ये कार्य सामान्यतया तीन लोगों का है। लेकिन, हम सब एक विचित्र समय में हैं, और हमें उसी में से बेहतर विकल्प तलाशने हैं।

एक-दो बातें हैं जो पाठकों के तौर पर आपसे माँगना चाहता हूँ। पहली माँग यह है कि एकजुट होने पर ध्यान दीजिए, और अपने बीच के लोगों को माफ करना सीखिए। हम कई बार छोटी बातों पर, अपनी आशाओं का भार लाद कर, सामने वाले से ऐसी उम्मीद करने लगते हैं कि वो हमारी ही तरह व्यवहार करे। यह सर्वथा अनुचित है। हर व्यक्ति की हर बात आपको सही नहीं लग सकती, लगनी भी नहीं चाहिए, इसलिए उसे ट्रोल करने, अपशब्द कहने से पहले एक बार पूछिए स्वयं से कि यह कहाँ तक उचित है।

जहाँ थोड़ी देर के लिए मुँह फेरने, आँख बंद करने से आपका काम बन रहा है, वहाँ माफ कीजिए और आगे चलिए। अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो वामपंथी लम्पट इसका फायदा उठाएँगे और आपको तोड़ेंगे। दूसरी बात यह है कि हमें अपने तरह के विचार के लोगों को प्रत्यक्ष सहयोग देना होगा। हम इस भरोसे नहीं बैठ सकते कि कोई और यह कार्य करेगा। आपसे सहयोग का तात्पर्य, आपका पाठकधर्म है। आप हमें, हमारे जैसे लोगों को पढ़िए, शेयर कीजिए, आगे ले जाइए।

वस्तुतः, हम एक संवेदनशील समय में हैं। ऑपइंडिया सिर्फ पत्रकारिता नहीं है, यह एक मुहिम है जो सनातन आस्था की प्रतिरक्षा के लिए है। यह सिर्फ रिपोर्टिंग का काम नहीं है, बल्कि वामपंथियों के कैंसरकारी नैरेटिव को काटने के लिए अपना नैरेटिव बनाने का काम है। यह पत्रकारिता से आगे वैचारिक युद्ध का उद्घोष है, जिसके भागीदार हम सब हैं। हमें अपने पात्रों को समुचित रूप से निभाना होगा, वरना जहरीले कुकुरमुत्तों की तरह वामपंथी गिरोह हावी हो जाएगा और भारत को बर्बाद कर देगा।

एकजुट होइए, सार्थक चीजें पढ़िए, विचारों में लोच रखिए लेकिन वामपंथियों की हर बात को नकारिए। हमें एक साथ आगे बढ़ना है, एक साथ कई सीढ़ियाँ चढ़नी हैं। ऑपइंडिया आपके स्नेह के लिए सदैव आभारी है।

ऑपइंडिया परिवार की तरफ से आपके अच्छे स्वास्थ्य, आपकी समृद्धि, आपके परिवार की उन्नति और राष्ट्र को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की कामना के साथ, इस नव वर्ष की बधाई!

‘मुस्लिमों के नाम पर सड़कें टू नेशन थ्योरी वाली सोच’: तेजस्वी सूर्या ने कहा- गैर मुस्लिम महापुरुषों पर रखें नाम

बेंगलुरु में सड़कों का नामकरण मुस्लिमों के नाम पर किए जाने पर भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने आपत्ति जताई है। उन्होंने बृहत बेंगलुरु महानगरपालिका (बीबीएमपी) के आयुक्त एन मंजूनाथ प्रसाद को पत्र लिखकर इस पर विचार करने को कहा है। बीजेपी सांसद ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से यह पत्र साझा किया है।

तेजस्वी सूर्या ने मामले को उठाते हुए कहा, “मेरे संज्ञान में आया है कि बृहत बेंगलुरु महानगरपालिका ने पदारायणपुरा के वार्ड नंबर 135 की कई सड़कों का नाम कुछ तय हस्तियों के नाम पर रखने का प्रस्ताव रखा है। जिसमें BBMP ने केवल मुस्लिमों के नाम दिए हैं।”

भाजपा सांसद ने पत्र में अपनी आपत्ति जताते हुए कहा, “मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सड़कों का नामकरण मुस्लिमों के नाम पर करना टू नेशन थ्योरी वाली सोच है। यह उसी तरह की सांप्रदायिक सोच है, जब मुस्लिम लीग ने हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग मतदाता सूची की माँग की थी। यह खतरनाक है जिसकी निंदा होनी चाहिए।”

उनका मत है कि देश में गैर मुस्लिम महापुरुषों और राष्‍ट्रभक्तों की कमी नहीं है और उन्हीं नामों में से सड़कों का नामकरण होना चाहिए। अपने पत्र में उन्होंने सड़कों के नाम की सूची दोबारा से ठीक करने को कहा है। अनुरोध किया है कि सूचीगत सड़कों के नाम सिर्फ व्यापक सार्वजिनक चर्चा के बाद ही निर्धारित होने चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बीबीएमपी के अधिकारियों ने पत्र पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन विवाद का कारण बताया गया है कि पिछले दिनों बीबीएमपी द्वारा शहर के इंदिरानगर में 100 फुट चौड़ी सड़क का नामकरण डॉ. एस के करीम खान के नाम पर करने पर इस मामले पर बहस शुरू हुई थी।