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शेख आसिफ ने हिन्दू नाबालिग का किया बलात्कार, पुलिस ने पकड़ा तो रिवाल्वर छीनकर किया हमला: ओडिशा पुलिस के एनकाउंटर में साथी सहित घायल

ओडिशा के झारसुगुड़ा में मुस्लिम युवक ने एक हिन्दू नाबालिग का अपहरण किया। इसके बाद उसके साथ रेप किया। विरोध करने पर पीड़िता के परिजनों को भी धमकाया। ओडिशा पुलिस ने जब उसे गिरफ्तार किया तो उसने भागने की भी कोशिश की। पुलिस ने उसका एनकाउंटर किया है। उसे साथी के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है।

यह घटना झारसुगुडा के बेलापहाड़ थाना क्षेत्र में हुई। शेख आसिफ नाम के एक मुस्लिम युवक ने बीते दिनों एक हिन्दू नाबालिग का अपहरण कर लिया। आसिफ ने हिन्दू बच्ची को डरा धमका कर उसका रेप किया। इस काम में उसका साथ अभिषेक बारीक नाम के एक लड़के ने दिया।

पीड़िता ने यह बात अपने परिवार को बताई। इसके बाद जब पीड़िता के परिजनों ने कार्रवाई के लिए पुलिस के पास जाने की बात कही तो शेख आसिफ के परिवार ने पीड़िता के परिवार को भी धमकाया। उन्होंने दबाव डाला कि यह बात वह किसी को भी ना बताएँ और पुलिस में FIR ना करवाएँ।

पीड़िता के परिजन दबाव के बावजूद पुलिस के पास पहुँचे और FIR लिखवाई। इसके बाद झारसुगुड़ा पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस उन्हें शनिवार (12 अप्रैल, 2025) को कोर्ट में पेश करने के लिए एक वैन में ले जा रही थी। इसी बीच शेख आसिफ ने एक पुलिसकर्मी का रिवॉल्वर छीन लिया।

उसने इसके बाद भागने का प्रयास किया और रिवॉल्वर से 3-4 फायर भी किए। पुलिस ने उसे और उसके साथी को पकड़ने के लिए वापसी फायरिंग की, इसमें दोनों घायल हो गए। पुलिस ने इसके बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया है। दोनों का इलाज चल रहा है।

इस मामले में ओडिशा के उत्तर रेंज के आईजी हिमांशु कुमार लाल ने ऑपइंडिया से बताया, “आसिफ शेख और उसके परिवार के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। एनकाउंटर में आसिफ शेख ज्यादा घायल हुआ है, उसका इलाज जारी है। हम मामले में दोनों आरोपित पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करवाएँगे।”

क्या पश्चिम बंगाल में नहीं लागू होगा वक्फ कानून, जानिए क्या कहता है संविधान: ममता बनर्जी को भाजपा क्यों बता रही ‘झूठा’

पश्चिम बंगाल में नए वक्फ कानून को लेकर मुस्लिम दंगाई सड़कों पर उतर गए हैं। राजधानी कोलकाता समेत कई जगह मुस्लिम भीड़ हिंसा कर रही है। मुर्शिदाबाद में मुस्लिम भीड़ ने 2 लोगों की हत्या भी कर दी है। उन्होंने पुलिस पर भी हमले किए हैं। इस बीच राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि वह पश्चिम बंगाल में नए वक्फ कानून को लागू नहीं करेंगी।

राज्य में जारी मुस्लिम हिंसा के बीच ममता बनर्जी के इस बयान ने एक बार फिर उनकी मंशा पर प्रश्न उठा दिए हैं। उनके क़ानून लागू ना करने वाले बयान के बाद एक बार फिर केंद्र सरकार के साथ सीधी लड़ाई की नौबत आ गई है। इससे पहले भी कई राज्य केंद्र सरकार के पास किए गए कानून को रोकने की बात कह चुके हैं।

CM ममता बनर्जी ने क्या कहा?

पश्चिम बंगाल में वक्फ पर जारी हिंसा के बीच CM ममता बनर्जी ने एक्स (पहले ट्विटर) पर इसके राज्य में लागू ना किए जाने को लेकर ऐलान किया। उन्होंने लिखा, “हमने यह कानून नहीं बनाया जिसके खिलाफ बहुत से लोग आंदोलन कर रहे हैं। यह कानून केंद्र सरकार ने बनाया है। इसलिए जो जवाब आप चाहते हैं, वह केंद्र सरकार से माँगिए।”

CM ममता बनर्जी ने आगे लिखा, “हमने इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है – हम इस कानून का कतई समर्थन नहीं करते हैं। यह कानून हमारे राज्य में लागू नहीं होगा। तो फिर दंगा किस बात के लिए हो रहा है?” CM ममता ने दंगा करने वालों एक्शन लेने की बात कही।

क्या सही में वक्फ कानून पश्चिम बंगाल में लागू नहीं होगा?

ममता बनर्जी के ऐलान के बाद प्रश्न उठ रहे हैं कि क्या वह वक्फ कानून को पश्चिम बंगाल में लागू नहीं होने देंगी। उन्हें भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने झूठा करार दिया है। उन्होंने कहा कि देश की संसद से पारित क़ानून को वह नहीं रोक सकती हैं। उन्होंने कहा कि लागू ना करने की यह बात सरासर झूठ है।

गौरतलब है कि वक्फ संशोधन विधेयक को संसद में अप्रैल माह की शुरुआत में पास किया था। लोकसभा और राज्यसभा में यह साधारण बहुमत से पारित हुआ था। सत्ताधारी भाजपा समेत कई पार्टियों ने इसका समर्थन किया था, जबकि कॉन्ग्रेस समेत कई विपक्षी दल इसके विरोध में थे। इसके पारित होने से पहले कई घंटे की चर्चा लोकसभा-राज्यसभा में हुई थी।

इस विधेयक को 5 अप्रैल, 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी दे दी थी। इसी के साथ ही यह देश का कानून बन गया था। केंद्र सरकार अब इस कानून के आधार पर नियम बनाएगी और वह लागू किए जाएँगे। यह नियम बनने के बाद नया वक्फ कानून प्रभावी हो जाएगा।

वक्फ कानून में संशोधन एक साधारण विधेयक था। यह कोई संविधान में संशोधन करने वाला अधिनियम नहीं था। ऐसे में संसद में इसे दो तिहाई बहुमत या फिर देश के कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी की आवश्यकता नहीं थी। यह संशोधन 1995 के वक्फ कानून में हुए थे।

वक्फ कानून के नए स्वरूप को केंद्र सरकार ही लागू करेगी और इसी के आधार पर राज्यों को इसके लिए गाइडलाइंस भेजे जाते हैं। ऐसे में राज्यों के पास इसे ना लागू करने का विकल्प नहीं बचता है। हालाँकि, इसके विरुद्ध राज्य सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। इसके बाद उन्हें कानून लागू ही करना पड़ेगा।

क्या कहता है संविधान?

देश के संविधान ने कानून बनाने सम्बन्धी शक्तियों का बँटवारा स्पष्ट तौर पर कर रखा है। संविधान के अंतर्गत कानून बनाने सम्बन्धी तीन सूचियाँ हैं। इनमें एक सूची केंद्र सरकार के विषयों की है, इन पर केवल संसद ही कानून बना सकती है। दूसरी सूची राज्य के विषयों की है, जिस पर राज्य कानून बनाते हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में संसद भी इन विषयों पर कानून बनाती है।

वहीं तीसरी सूची को ‘समवर्ती सूची’ कहा जाता है। इसमें आने वाले विषयों पर राज्य और केंद्र दोनों कानून बना सकते हैं। हालाँकि, जिस मामले पर केंद्र सरकार कानून बना देगी, उस पर राज्य कानून नहीं बनाएगा। संसद में दिए गए बयान के अनुसार, भाजपा सरकार ने यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर संविधान में दिए गए अनुच्छेद 25-28 के तहत बनाया है।

ऐसे में इसके पश्चिम बंगाल में लागू ना होने को लेकर प्रश्न नहीं उठते हैं। यदि ममता सरकार इसे नहीं लागू करती तो केंद्र सरकार इसके विरुद्ध कानूनी रास्ता तलाश सकती है। इसमें कोर्ट जाने से लेकर बाकी संवैधानिक कदम शामिल हैं।

पहले भी कानूनों को लेकर राज्यों ने किया है विरोध

वक्फ कोई पहला ऐसा कानून नहीं है, जिसका विरोध किसी राज्य सरकार ने किया है। तीन कृषि कानूनों से लेकर नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे कानूनों का भी विरोध केरल, तमिलनाडु और पंजाब आदि कर चुके हैं। मार्च, 2024 में लागू किए गए CAA को तमिलनाडु और केरल ने अपने यहाँ ना लागू किए जाने की बात कही थी।

इसके बाद विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया था कि यह राज्य CAA लागू करने को बाध्य हैं क्योंकि नागरिकता केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाला मामला है और इसमें राज्यों का कोई दखल नहीं हो सकता। राज्य सरकारें सिर्फ इसके विरुद्ध कोर्ट का ही रास्ता अपना सकती हैं, उनके पास क़ानून को लागू करने से रोकने सम्बन्धित कोई शक्ति नहीं होती।

कुछ राज्यों ने कृषि कानूनों की आलोचना करते हुए प्रस्ताव भी पारित किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर लगाई गई याचिका में स्पष्ट किया था कि ऐसे प्रस्ताव सिर्फ विधानसभा के विचार माने जाएँगे और उनका कोई कानूनी रोल नहीं होगा।

BJP नेता के घर ग्रेनेड अटैक करने वाला सैदुन अमीन दिल्ली से गिरफ्तार: बाबा सिद्दीकी के हत्यारे जीशान अख्तर ने दी थी ट्रेनिंग और नकदी, इस्लामी कट्टरपंथी वेल्डर के आतंकी संगठन से जुड़े होने का संदेह

पंजाब के जालंधर में बीजेपी नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मनोरंजन कालिया के घर पर हुए ग्रेनेड हमले के मामले में सैदुल अमीन नाम के इस्लामी कट्टरपंथी को गिरफ्तार किया गया है। केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों और पंजाब पुलिस ने सैदुल अमीन को दिल्ली से गिरफ्तार किया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब पुलिस ने केंद्रीय जाँच एजेंसियों और दिल्ली पुलिस के साथ मिलकर एक जटिल और तेज ऑपरेशन चलाया, जिसके बाद सैदुल अमीन को दिल्ली के जसोला इलाके से गिरफ्तार किया गया।

पंजाब पुलिस के महानिदेशक (डीजीपी) गौरव यादव ने इस कामयाबी की जानकारी देते हुए अपने आधिकारिक बयान में कहा, “जालंधर ग्रेनेड हमले के मामले में बड़ी सफलता हासिल हुई है। जालंधर कमिश्नरेट पुलिस ने केंद्रीय एजेंसियों और दिल्ली पुलिस के सहयोग से उत्तर प्रदेश के अमरोहा निवासी सैदुल अमीन को दिल्ली से सफलतापूर्वक गिरफ्तार कर लिया है। सैदुल अमीन बीजेपी नेता मनोरंजन कालिया के आवास पर 7-8 अप्रैल 2025 की मध्यरात्रि को हुए ग्रेनेड हमले का मुख्य आरोपित है।”

उन्होंने आगे बताया, “इस हमले के महज 12 घंटों के भीतर दो स्थानीय सहयोगियों को गिरफ्तार किया गया था, जिन्होंने मुख्य आरोपित की मदद की थी। इस हमले से जुड़े हैंडलर्स, वित्तीय समर्थकों और संभावित विदेशी कनेक्शनों का पता लगाने के लिए जाँच तेजी से आगे बढ़ रही है। पंजाब पुलिस संगठित अपराध को खत्म करने और पूरे राज्य में शांति व सद्भाव सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता में दृढ़ है।”

जानकारी के मुताबिक, इस गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने कई राज्यों में छापेमारी की थी। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में टीमें भेजी गईं। जालंधर पुलिस कमिश्नर धनप्रीत कौर ने बताया कि यह ऑपरेशन बेहद गोपनीय और सटीक था। सैदुल अमीन को पकड़ने के लिए पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, तकनीकी सबूतों और खुफिया जानकारी का सहारा लिया। इससे पहले, पुलिस ने इस मामले में दो अन्य आरोपितों सतीश कुमार उर्फ काका और हैरी को गिरफ्तार किया था। दोनों को जालंधर की एक अदालत ने छह दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया था। इन दोनों ने सैदुल को हमले में लॉजिस्टिक मदद दी थी, जैसे कि ई-रिक्शा और अन्य संसाधन देना।

अमरोहा का रहने वाला है सैदुल अमीन

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सैदुल अमीन 19 साल का युवक है और उत्तर प्रदेश के अमरोहा का रहने वाला है। वह पेशे से वेल्डर है। पुलिस के मुताबिक, सैदुल का व्यवहार रेडिकलाइज्ड है, यानी वह कट्टर विचारों से प्रभावित हो सकता है। उसका आतंकवादी गतिविधियों से कनेक्शन होने की आशंका है, जिसकी जाँच चल रही है। सैदुल ने खुद मनोरंजन कालिया के घर पर ग्रेनेड फेंका था।

पुलिस को पता चला कि वह करीब चार महीने पहले सोशल मीडिया खासकर इंस्टाग्राम के जरिए इस हमले के मास्टरमाइंड्स से जुड़ा था। उसे पहले पैसे का लालच दिया गया। फिर उसे ग्रेनेड फेंकने का काम सौंपा गया। सैदुल को ग्रेनेड पंजाब में ही उपलब्ध कराया गया था। उसने हमले से पहले दो-तीन दिन पंजाब में रुककर साजिश को अंजाम दिया और फिर अमरोहा लौट गया। पुलिस ने बताया कि सैदुल ने हमले के बाद अपने कपड़े बदले और जालंधर रेलवे स्टेशन पर करीब दो घंटे तक घूमता रहा, ताकि किसी को शक न हो। उसने एक चोरी का फोन भी इस्तेमाल किया था।

बता दें कि मनोरंजन कालिया के आवास पर यह हमला 7-8 अप्रैल 2025 की आधी रात को हुआ था, जब जालंधर के सेंट्रल टाउन इलाके में स्थित उनके घर पर ग्रेनेड फेंका गया। इस हमले में उनके घर की खिड़कियां टूट गईं, एक एल्यूमिनियम का दरवाजा क्षतिग्रस्त हो गया और बाहर खड़ी उनकी एसयूवी और मोटरबाइक को भी नुकसान पहुँचा। मनोरंजन कालिया ने बताया कि पहले उन्हें लगा कि यह बिजली के ट्रांसफॉर्मर में धमाका है। लेकिन जब बाहर धूल और धुआँ दिखा, तो उन्हें असलियत पता चली। उन्होंने तुरंत अपने गनमैन को पुलिस स्टेशन भेजा, जो उनके घर से महज 300 मीटर दूर था।

पुलिस ने घटनास्थल से एक ई-रिक्शा बरामद किया, जिसका इस्तेमाल हमले में किया गया था। सीसीटीवी फुटेज में दिखा कि दो लोग ई-रिक्शा में आए थे। एक शख्स बैग लिए सामने की सीट पर बैठा था। रिक्शा कालिया के घर के पास से गुजरा, फिर वापस आया। इसके बाद एक व्यक्ति उतरा और ग्रेनेड फेंककर भाग गया। विशेष पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) अर्पित शुक्ला ने बताया कि यह हमला पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और लॉरेंस बिश्नोई गैंग की साजिश थी। इसका मकसद पंजाब में सांप्रदायिक तनाव फैलाना था।

बाबा सिद्दीकी हत्याकांड से भी कनेक्शन

पंजाब पुलिस की गिरफ्त में आए सैदुल अमीन का कनेक्शन बाबा सिद्दीकी हत्याकांड से भी सामने आया है। दरअसल, बाबा सिद्दीकी हत्याकांड में शामिल मुख्य आरोपित जीशान अख्तर, जो इस हमले का मास्टरमाइंड भी है, वो फिलहाल यूरोप में छिपा हुआ है। जीशान अख्तर ने ही इंस्टाग्राम के जरिए सैदुल को ग्रेनेड फेंकने की ट्रेनिंग दी थी। उसने वीडियो भेजकर सैदुल को तैयार किया और पंजाब में उसे 50 हजार रुपये भी दिलवाए। जीशान अख्तर बाबा सिद्दीकी की हत्या में हथियार मुहैया कराने का भी आरोपित है। वह पहले अजरबैजान में छिपा था। पुलिस के मुताबिक, जीशान और सैदुल के बीच सोशल मीडिया पर लंबे समय से बातचीत चल रही थी।

सैदुल की गिरफ्तारी के बाद अब पुलिस इस साजिश के हर पहलू को खंगाल रही है। डीजीपी गौरव यादव ने कहा कि पंजाब पुलिस का लक्ष्य संगठित अपराध को जड़ से खत्म करना है। इसके लिए केंद्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है। जालंधर में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

राणा सांगा को ‘गद्दार’ कहने पर आगरा में करणी सेना का जमावड़ा: ‘रक्त स्वाभिमान सम्मेलन’ में सपा सांसद से माफी की माँग, भड़काने से बाज नहीं आ रहे अखिलेश

उत्तर प्रदेश में आगरा के एतमादपुर में शनिवार (12 अप्रैल 2025) को महाराणा संग्राम सिंह उर्फ राणा सांगा की 543वीं जयंती पर करणी सेना सहित हर वर्ग के कार्यकर्ता एकत्र हुए। इस दौरान लोगों ने समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन द्वारा राणा सांगा और हिंदू समाज पर की गई अपमानजनक टिप्पणी पर आक्रोश प्रदर्शित किया। इसको देखते हुए सुमन के घर की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

दरअसल, रामजी लाल सुमन ने 21 मार्च 2025 को राज्यसभा में राणा सांगा को गद्दार कह कर संबोधित किया था। इस इसके बाद करणी सेना सहित तमाम क्षत्रिय संगठनों ने रोष व्यक्त करते हुए सुमन से माफी की माँग की थी। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का सपोर्ट मिलने के बाद सुमन ने माफी से इनकार कर दिया। इसके बाद 26 मार्च को करणी सेना ने सुमन के घर के सामने पहुँचकर प्रदर्शन किया।

इसके बाद राणा सांगा की जयंती पर आगरा में एकजुट होकर प्रदर्शन की बात कही थी। प्रदर्शन के लिए शुक्रवार (11 अप्रैल 2025) की रात से ही अलग-अलग शहरों और जिलों से लोग आगरा पहुँचने शुरू हो गए थे। रैली में युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष ओकेंद्र राणा समेत करणी सेना के अध्यक्ष राज शेखावत एवं अलग-अलग राजनीतिक दलों एवं वर्गों के पदाधिकारी पहुँचे और सपा के विरोध में एकजुटता दिखाई।

‘रक्त स्वाभिमान सम्मेलन’ नाम के इस आयोजन में करणी सेना, क्षत्रिय महासभा से लेकर हिंदू सनातन सभा सहित विभिन्न संगठनों एवं राजनीतिक दलों के लोग भी आगरा पहुँचे हैं। राणा सांगा की जयंती के अवसर पर आगरा में करीब 2 लाख लोग जुटे हैं। सबके हाथ में केसरिया ध्वज और कुछ लोगों के हाथों में तलवारें हैं। संख्या को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, करणी सेना के इस प्रदर्शन पर सुमन ने कहा कि लोकतंत्र में सभी को विरोध का अधिकार है। अभिव्यक्ति की आजादी है। इस तरह का प्रदर्शन अराजकता है। वहीं, सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने भी कहा, “करणी सेना-वेना नकली है। ये सभी भाजपाई हैं। अगर कोई हमारे कार्यकर्ता या रामजी लाल सुमन का अपमानन करेगा तो हम समाजवादी लोग भी उनके साथ खड़े रहेंगे।”

वहीं, दूसरी ओर आगरा पहुँचे करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरज पाल अम्मू ने कहा, “हम राणा सांगा की जयंती मना रहे हैं। हर काम शांतिपूर्वक करेंगे। मैं इस बात का आश्वासन देता हूँ कि करणी सेना का कोई भी कार्यकर्ता रामजी लाल सुमन के घर की तरफ नहीं जाएगा।” हालाँकि, राज शेखावत ने कहा कि अगर सुमन माफी नहीं माँगेंगे तो उनके आवास का घेराव किया जाएगा।

वहीं, किसी भी तरह की अप्रिय घटना या अराजकता को लेकर पुलिस प्रशासन मुस्तैद है। प्रशासन ने सम्मेलन स्थल को छावनी में बदल दिया है। शहर में ट्रैफिक को डायवर्ट कर दिया गया है। वहीं, रामजी लाल सुमन की सुरक्षा को भी कड़ी कर दी गई है। उनके घर 1000 पुलिस जवान तैनात किए गए हैं। रास्ते में 500 जगह बैरिकेडिंग की गई है।

अब्दुल मजीद ने हिंदुओं की आराध्य देवी पर की आपत्तिजनक टिप्पणी, आक्रोशित लोग सड़कों पर उतरे: जबलपुर पुलिस ने NSA के तहत गिरफ्तार कर भेजा जेल, ऐसे ही एक अन्य केस में बेल पर है आरोपित

मध्य प्रदेश के जबलपुर में धार्मिक तनाव फैल गया, क्य़ोंकि अब्दुल मजीद S/o अब्दुल हफीज ने हिंदुओं की आराध्य देवी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की। अब्दुल मजीद ने हिंदू समुदाय की आस्था की केंद्र माता बूढ़ी खेरमाई को लेकर व्हाट्सऐप ग्रुपल में अमर्यादित और अभद्र टिप्पणी की। इसकी वजह से तनाव फैल गया। देखते ही देखते हिंदू समुदाय में गुस्सा भड़क उठा और सराफा चौक पर लोग इकट्ठा होकर विरोध करने लगे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जबलपुर में 2-3 दिनों से इसी वजह से तनाव फैल रहा था। जिसमें गोहलपुर के पुराने पुल के पास सिरसातले का रहने वाला अब्दुल मजीद की हरकतों के खिलाफ लोग प्रदर्शन कर रहे थे। इस मामले में हनुमानताल थाना पुलिस और सीएसपी सुनील नेमा ने कार्रवाई करते हुए आरोपित अब्दुल मजीद (36 साल) को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने लगाया NSA, भेजा जेल

हिंदू संगठनों की शिकायत पर हनुमानताल पुलिस ने मामला दर्ज कर जाँच की थी। इसमें पुलिस ने पाया कि उसकी पोस्ट से न सिर्फ धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं, बल्कि सांप्रदायिक तनाव की आशंका भी बढ़ गई थी। हिंदू संगठनों और धार्मिक गुरुओं ने इस घटना की कड़ी निंदा की। उनकी शिकायत पर पुलिस ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत अब्दुल मजीद को गिरफ्तार कर केंद्रीय जेल भेज दिया।

पहले भी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचा चुका है अब्दुल माजिद

यह पहली बार नहीं है जब अब्दुल मजीद ने ऐसा घिनौना काम किया हो। पहले भी वह माढ़ोताल थाने में दर्ज एक मामले में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का आरोपी रह चुका है। उस वक्त भी उसकी हरकतों ने इलाके में तनाव पैदा किया था।

इसी वजह से जबलपुर एसपी सम्पत उपाध्याय ने इसे गंभीरता से लिया और कलेक्टर दीपक सक्सेना को रिपोर्ट भेजी। जबलपुर के कलेक्टर ने तुरंत NSA के तहत वारंट जारी किया, जिसके बाद अब्दुल मजीद को जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा दिया गया।

बूढ़ी खेरमाई मंदिर जबलपुर के हिंदू समुदाय का आस्था का प्रतीक है। अब्दुल मजीद की हरकतों के खिलाफ लोगों ने सराफा चौक पर प्रदर्शन भी किया था। जिसके बाद मौके पर पहुँची पुलिस ने लोगों को भरोसा दिलाया कि दोषी को सजा मिलेगी। इस आश्वासन के बाद प्रदर्शन शांत हुआ।

एसपी सम्पत उपाध्याय ने साफ कहा कि सोशल मीडिया पर ऐसी हरकतें बर्दाश्त नहीं की जाएँगी। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे जिम्मेदारी से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें और किसी भी आपत्तिजनक पोस्ट की जानकारी पुलिस को दें।

अमेरिका में हिन्दुओं के खिलाफ घृणा फ़ैलाने पर होगा एक्शन, जॉर्जिया में ‘हिन्दूफोबिया’ पर बन रहा कानून: सीनेट में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन ने दिया समर्थन

अमेरिका में हिन्दुओं के खिलाफ घृणा फ़ैलाने वालों पर कार्रवाई के लिए अब कानून बनने जा रहा है। ‘हिन्दूफोबिया’ के खिलाफ अमेरिका के जॉर्जिया राज्य में विधेयक लाया गया है। ऐसा करने वाला जॉर्जिया पहला राज्य बन गया है। कानून बनने पर हिन्दुओं के खिलाफ घृणा फैलाने वालों पर तगड़ा एक्शन होगा।

जॉर्जिया की प्रांतीय सीनेट में हिन्दूफोबिया के खिलाफ लड़ने के लिए विधयक लाया गया है। इसका नाम अभी SB375 है। इसे 4 अप्रैल, 2025 को जॉर्जिया की प्रांतीय सीनेट में पेश किया गया था। इस पर बहस हो रही है। इस कानून को सीनेट में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन सदस्यों ने समर्थन दिया है।

डेमोक्रेट्स जेसन इस्टीव्स और इमेनुअल जोन्स तथा रिपब्लिकन शॉन स्टिल एवं क्लिंट डिक्सन ने इस कानून का पुरजोर समर्थन किया है। यह कानून इन्हीं सीनेटरों ने पेश किया है। सीनेटर स्टिल ने कहा, “पिछले कुछ वर्षों में, हमने देश भर में हिंदुओं के खिलाफ अपराधों में काफी बढ़त वृद्धि देखी है।”

अभी यह प्रस्ताव सीनेट से पास नहीं हुआ है। अगर यह पास होता है तो जॉर्जिया के स्थानीय कानूनों में बदलाव किया जाएगा। इसके बाद हिन्दूफोबिया को घृणा आधारित अपराधों में रखा जाएगा और इसके लिए सजा तथा हिन्दू हितों की रक्षा सम्बन्धित नियम बनाए जाएँगे।

कानून बनने की स्थित में खालिस्तानी और इस्लामी तत्व हिन्दुओ को परेशान नहीं कर पाएँगे। जॉर्जिया में कानून बनने से अमेरिका में बाकी राज्यों में भी ऐसे नियमों की राह प्रशस्त हो सकती है। वर्तमान में जॉर्जिया में 40 हजार से अधिक हिन्दू रहते हैं जबकि अमेरिका में 25 लाख से अधिक हिन्दू बसते हैं।

अमेरिका में बीते कुछ वर्षों में हिन्दुओं और उनके मंदिरों पर हमले के कई मामले सामने आए हैं। हिन्दूफोबिया ट्रैकर के अनुसार, अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को और न्यूयॉर्क में बीते कुछ वर्षों में खालिस्तानी तत्वों ने मंदिरों पर हमला किया है। हिन्दुओं पर अभद्र टिप्पणियाँ की गई हैं।

इस कानून के लिए वकालत करने वाले संगठन नार्थ अमेरिका हिन्दू कोएलिशन ने कहा, “हमें इस विधेयक पर सीनेटर शॉन स्टिल के साथ मिलकर काम करने पर गर्व है और हम जॉर्जिया और अमेरिका में हिन्दुओं का समर्थन करने के लिए सभी सीनेटर का धन्यवाद करते हैं।”

जॉर्जिया में इससे पहले भी हिन्दू हित के लिए काम होता रहा है। अप्रैल, 2023 में जॉर्जिया की सीनेट में हिन्दूफोबिया के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया था। जॉर्जिया की सीनेट ने इस प्रस्ताव में हिन्दू धर्म की तारीफ करते हुए कहा था कि विविधताएँ भरी कई संस्कृतियाँ इसका हिस्सा हैं।

जब औरंगज़ेब ने जारी किया सभी मंदिरों को ध्वस्त करने का फरमान… काशी-मथुरा ही नहीं, पुरी से लेकर सोमनाथ तक को भी नहीं छोड़ा: कालकाजी में ब्राह्मण ने उठाई तलवार

भारत के इतिहास में एक लंबा कालखंड ऐसा रहा, जब दिल्ली में इस्लामी शासन रहा और हिन्दुओं को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बनकर रहना पड़ा। इसमें सबसे लंबे समय तक दिल्ली की तख़्त पर मुग़लों का शासन रहा। मुग़ल अफगान तैमूर और मंगोल चंगेज खान के वंशज थे। उनके पूर्वज भी आततायी ही थे। इसके बावजूद मुग़लों को वामपंथी इतिहासकारों ने कुछ ऐसे पेश किया जैसे वो कला व संस्कृति के सबसे बड़े संरक्षक हों। हालाँकि, सच्चाई इसके इतर थी। मुग़ल राज में हिन्दुओं को जजिया कर देना होता था। मंदिर ध्वस्त किए जाते थे। इन्हीं मुग़ल शासकों में एक था – औरंगज़ेब।

औरंगज़ेब अंतिम सबसे प्रभावशाली मुग़ल शासक था, उसके बाद मुग़लों का राज सिर्फ़ दिल्ली और फिर लाल किले तक ही सीमित होकर रह गया। लेकिन, औरंगज़ेब के शासनकाल के 5 दशक हिन्दुओं के लिए किसी अंधकार युग से कम नहीं थे। पंजाब में गुरु गोबिंद सिंह, महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज और छत्रपति संभाजी महाराज, बुंदेलखंड में छत्रसाल, असम में लाचित बरफुकन और दिल्ली के आसपास जाटों ने उसकी नाक में दम करके रखा। अपने जीवन के अंतिम ढाई दशक उसने डेक्कन फ़तह करने की कोशिश में बिता दिए। अपनी इस सनक में औरंगज़ेब ने मुग़ल साम्राज्य का सारा संसाधन गँवा दिया।

वामपंथी इतिहासकारों ने किया औरंगज़ेब का बचाव

वो औरंगज़ेब का ही कालखंड था, जब काशी स्थित विश्वनाथ मंदिर और मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त करके वहाँ मस्जिदें खड़ी कर दी गईं। सन् 1669 में काशी में मंदिर को ध्वस्त कर उसके अवशेषों के ऊपर संरचना खड़ी करके उसे ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ नाम दे दिया गया। जबकि ज्ञान और वापी, दोनों ही संस्कृत शब्द हैं। इसका अर्थ है – विद्या का कुआँ। वामपंथी इतिहासकारों ने औरंगज़ेब का बचाव करने के लिए एक नया शिगूफा छेड़ा, वो लिखने लगे कि मंदिरों को ध्वस्त किए जाने के पीछे कोई मजहबी मंशा थी ही नहीं, ये सब राजनीतिक था।

औरंगज़ेब ने इन मंदिरों को क्यों ध्वस्त करवाया? अगर आप इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के को पढ़ेंगे तो वो लिखती हैं कि औरंगज़ेब के शासनकाल के अंत में भी सैकड़ों हिन्दू-जैन मंदिर खड़े रहेमंदिर वहीं एक अन्य इतिहासकार सिंथिया टैलबोट की मानें तो मथुरा में एक दंगा होने की वजह से वहाँ के मंदिर को ध्वस्त किया गया। हालाँकि, सच्चाई आपको औरंगज़ेब के समय की ही पुस्तक ‘मआसिर-ए-आलमगीरी’ में मिल जाएगी। इसके अनुसार, औरंगज़ेब ने ‘इस्लाम की स्थापना’ के उद्देश्य से ऐसा किया था। साथ ही उसका मानना था कि इन मंदिरों में ‘काफिर’ लोग अपनी ‘झूठी किताबें’ पढ़ाते थे।

यही कारण है कि औरंगज़ेब ने न केवल मंदिरों, बल्कि कई गुरुकुलों को भी ध्वस्त करवाया। भारत हमेशा से विद्या की धरती रही है। यहाँ वर्षों से ‘विद्या ददाति विनयं’, ‘विद्या नरस्य रूपमधिकं’, ‘नास्ति विद्यासमो बंधु’ और ‘विद्या नाम नरस्य कीर्तितुला’ पढ़ाया जाता रहा है। खगोलीय गणनाओं से लेकर जाती गणित तक, अर्थशास्त्र से लेकर नीतिशास्त्र तक, सैकड़ों वर्षों से छात्र इन सबका अध्ययन करते आ रहे हैं। बख़्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय ‘रत्नोदधि’ को जलाया था तो कई लाख पुस्तकें बर्बाद हो गई थीं। औरंगज़ेब भी हिन्दू धर्म के बृहद ज्ञान-भण्डार से खार खाया रहता था।

शरिया क़ानून के हिसाब से मंदिर ध्वस्त करना वैध

साफ़ है, उसने स्थानीय बगावतों का इस्तेमाल किया अपने मजहबी एजेंडे को पूरा करने के लिए। एक बहाने के रूप में राजनीतिक परिस्थितियों का इस्तेमाल किया गया, इसे एक आवरण बनाकर अपनी कट्टरपंथी कार्रवाइयों को ढँका गया। जहाँ तक कई छोटे-छोटे मंदिरों के उसके शासनकाल के अंत तक अस्तित्व में रहने का सवाल है – किसी बड़े मंदिर को ध्वस्त करना इस्लामी आक्रांताओं के लिए बड़ा सन्देश देने का कार्य करता, सिवाए छोटे मंदिरों को तोड़ने के। हालाँकि, इस्लामी फ़ौज राह चलते छोटे मंदिरों को भी ध्वस्त करते चलते थे। फिर भी, महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त किया जाना पूरे इस्लामी मुल्क़ में किंवदंतियों का आधार बना। अतः, भव्य मंदिर हमेशा से निशाने पर थे।

इस्लाम में ‘हनफ़ी’ क़ानून के तहत ये वैध था। आख़िर ऑटोमन साम्राज्य ने भी तो इस्ताम्बुल स्थित हागिया सोफिया चर्च को मस्जिद में तब्दील कर दिया था। सोशल मीडिया पर जो लोग ये कहते हैं कि औरंगज़ेब बादशाह था और जो चाहे वो कर सकता था, इसीलिए अगर वो मंदिरों को ध्वस्त करने पर आता तो देश में एक भी मंदिर नहीं बचते – ऐसा मानने वालों को इतिहास का ज्ञान नहीं है। निचले स्तर पर और सेना में अधिकतर हिन्दू ही होते थे, ऐसे में औरंगज़ेब जैसे बादशाह एकदम से सारे मंदिरों को ध्वस्त नहीं कर सकते थे। ये मौक़े की तलाश में रहते थे। मुग़ल दरबार में भी हिन्दुओं का प्रभाव था, ख़ासकर के जयपुर-आमेर राजघराने का।

1669 ईस्वी में ही औरग़ज़ेब ने एक फरमान जारी करके कई मंदिरों और विद्यालयों को ध्वस्त करने का आदेश दिया था। इसमें ख़ासकर के ठट्टा, मुल्तान और वाराणसी का जिक्र था। औरंगज़ेब का दावा था कि यहाँ ‘ग़लत पुस्तकें’ पढ़ाई जा रही हैं। हालाँकि, औरंगज़ेब का ये आदेश पूरा मुग़ल साम्राज्य में लागू नहीं किया जा सका, लेकिन कई मंदिर ध्वस्त किए गए। इसी तरह, सन् 1662 में औरंगज़ेब ने पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर को ध्वस्त किए जाने का फरमान जारी किया। लेकिन, जिन स्थानीय अधिकारियों को इस आदेश की तामील करानी थी उन्हें घूस दिया गया। मंदिर को बचाने के लिए इसे कई दिनों तक बंद रखा गया। सन् 1707 में औरंगज़ेब की मौत के साथ ही यहाँ दर्शन-पूजन फिर से शुरू किया जा सका।

तीर्थस्थलों से टैक्स वसूलते थे मुग़ल

एक और तथ्य पर ध्यान दीजिए, कई बड़े मंदिरों और तीर्थस्थलों से इन मुग़लों को पैसे मिलते थे। यहाँ तक कि कुंभ जैसे आयोजनों से भी इन आक्रांता शासकों की बड़ी कमाई होती थी। हिन्दुओं से टैक्स भी वसूलना था और इस्लाम का शासन भी स्थापित करना था। मजहबी लक्ष्य तो था ही, लेकिन लुटेरे प्रवृत्ति के इन आक्रांताओं ने जहाँ टैक्स से अधिक कमाई की संभावना थी वहाँ नरमी बरती। जैसे, 1724 में भी जगन्नाथ मंदिर को ध्वस्त करने का फरमान जारी किया गया था। रामचंद्र देव द्वितीय ने इस्लाम अपनाने का नाटक किया और प्रतिमाओं को छिपा दिया गया। बाद में प्रतिमाओं को पुनः स्थापित किया गया क्योंकि 9 लाख रुपए का नुकसान हुआ था।

चूँकि मुग़लों को मंदिरों को लूटकर धन कहीं ले तो जाना नहीं था, इसीलिए उन्होंने बड़ी चालाकी से हिन्दुओं पर टैक्स लगाकर हर साल की कमाई की व्यवस्था की। औरंगज़ेब ने जिन मंदिरों को ध्वस्त करने का फरमान जारी किया था, उनमें एलोरा का कैलाशा मंदिर भी शामिल था। एक पूरी की पूरी फौज इसे ध्वस्त करने के लिए लगाई गई थी, लेकिन स्थानीय लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। आज भी इस मंदिर को वास्तुकला के सर्वोत्तम उदाहरणों में से एक माना जाता है। उस समय भी इस मंदिर की मजबूत संरचना और श्रद्धालुओं के प्रतिरोध के कारण 3 साल प्रयास करने के बावजूद औरंगज़ेब इसमें सफल नहीं हो पाया। आज भी कैलाशा मंदिर खड़ा है, ये हिन्दू समाज की जिजीविषा का ही प्रमाण है।

कालकाजी से लेकर सोमनाथ मंदिर तक को करवाया ध्वस्त

इससे पहले औरंगज़ेब दिल्ली के कालकाजी मंदिर के ध्वस्तीकरण के लिए भी फरमान जारी कर चुका था। ये फरमान 3 सितंबर, 1667 को जारी किया गया था। कारण ये बताया गया था कि वहाँ बड़ी संख्या में हिन्दुओं का जुटान हो रहा है। इसके बाद औरंगज़ेब ने 100 मजदूरों को उस मंदिर को ध्वस्त करने के लिए भेजा। ‘सियाह अख़बारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला’ नामक मुग़ल दस्तावेज में ये जिक्र मिलता है कि एक ब्राह्मण ने उस दौरान तलवार निकाल कर मंदिर की रक्षा करने का प्रयत्न किया था। उसने एक को मार भी डाला। इसके बाद ब्राह्मण ने काज़ी पर हमला किया। अंततः उसे क़ैद कर लिया गया और पत्थर मार-मार कर सज़ा-ए-मौत दे दी गई।

इसी तरह, औरंगज़ेब ने सन् 1706 में सोमनाथ मंदिर को भी ध्वस्त करवाया। हालाँकि, इस आदेश की उतनी अच्छी तरह तामील नहीं हुई क्योंकि अगले ही वर्ष उसकी मौत हो गई थी। इससे पहले उसने नवंबर 1665 में भी इसे ध्वस्त किए जाने का आदेश दिया था। यानी, औरंगज़ेब के कालखंड में सोमनाथ मंदिर को दो-दो बार ध्वंस का सामना करना पड़ा। इससे पहले मजमूद गजनवी और अल्लाउद्दीन खिलजी के भाई उलुग खान ने सोमनाथ मंदिर का विध्वंस किया था। औरंगज़ेब को उसके अब्बा शाहजहाँ ने गुजरात का ही गवर्नर नियुक्त किया था, ऐसे में वो सोमनाथ मंदिर के महत्व को समझता था। औरंगज़ेब के समय मंदिरों की मरम्मत पर भी प्रतिबंध था।

हालाँकि, औरंगज़ेब के निधन के बाद मराठा शक्ति मजबूत हुई और दक्षिण भारत में हिन्दू राज्य का उदय हुआ जिसने बाद में दिल्ली को भी अपने नियंत्रण में ले लिया। औरंगज़ेब का मानना था कि एक मंदिर की तरफ देखना भी इस्लाम में हराम है। उसने गुजरात में हाटकेश्वर मंदिर को भी ध्वस्त करवाया। साथ ही उसने गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर के ध्वस्तीकरण का आदेश भी जारी किया था, लेकिन इसपर अमल नहीं करवा सका। इसके अलावा औरंगज़ेब ने हिन्दुओं पर जजिया टैक्स भी लगाया था। हिन्दुओं को झुककर मुग़ल अधिकारियों के सामने हाजिरी लगानी होती थी और टैक्स देना होता था।

₹77 लाख के ब्लैंक चेक, ₹11 लाख नकद, बंदूकें, जमीन के कागजात… लालू के करीबी MLA के 11 ठिकानों पर छापा, रंगदारी का भी मामला

बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं में से एक दानापुर के आरजेडी विधायक रीतलाल यादव का भी नाम आता है। अपने पुराने आपराधिक मामलों, दबंग छवि और राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव से नजदीकी के चलते वे अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। हालाँकि अभी पटना पुलिस ने कोर्ट के आदेश के बाद उनके 11 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की है, जिसके बाद से खलबली मच गई है। छापेमारी के दौरान लाखों की नकदी और 77 लाख रुपए के ब्लैंक चेक भी बरामद हुए हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामला मामला रंगदारी से जुड़ा है। पुनाईचक निवासी बिल्डर कुमार गौरव ने खगौल थाना में लिखित शिकायत दर्ज करवाई थी। जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि रीतलाल यादव और उनके साथियों ने उनसे कोथवाँ गाँव में निर्माण कार्य के दौरान रंगदारी की माँग की और जान से मारने की धमकी भी दी। इसी शिकायत के आधार पर पटना पुलिस ने विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कर, सर्च वारंट के साथ कार्रवाई की।

छापेमारी दानापुर के कोथवाँ स्थित आवास से शुरू हुई और अभियंता नगर, बिहटा सहित 11 ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई हुई। छापे के दौरान ड्रोन कैमरों, दर्जनों पुलिस वाहनों और करीब 200 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी रही। पुलिस ने रीतलाल यादव के घर से 11 लाख रुपये नकद, नोट गिनने की मशीन, तीन बंदूकें, पुराने स्टांप पेपर, भूमि से जुड़े दस्तावेज और ब्लैंक चेक बरामद किए।

रीतलाल यादव की प्रतिक्रिया  

रीतलाल यादव ने इस छापेमारी को लेकर एक्स पर पोस्ट किया। रीतलाल यादन ने कहा कि चुनाव से ठीक पहले उन्हें बदनाम करने की साजिश के तहत बिना वारंट उनके घर पर छापा मारा गया और परिजनों को परेशान किया गया।

रीतलाल यादव का रिकॉर्ड

रीतलाल यादव का आपराधिक रिकॉर्ड काफी बड़ा रहा है। साल 2003 में भाजपा नेता सत्यनारायण सिन्हा की हत्या के आरोप में वह चर्चा में आए थे। यह हत्या उसी दिन हुई थी, जब लालू यादव की गाँधी मैदान रैली आयोजित की गई थी। इस केस में उन्हें 2024 में निचली अदालत से बरी कर दिया गया, मगर सत्यनारायण सिन्हा की पत्नी और पूर्व विधायक आशा देवी ने पटना हाई कोर्ट में अपील दायर कर दी, जिसपर अब सुनवाई चल रही है।

बख्तियारपुर में चलती ट्रेन में रेलवे ठेकेदारों की हत्या, छठ के दिन विरोधी चुन्नू सिंह की हत्या और अवैध बालू खनन जैसे कई गंभीर आरोपों में भी उनका नाम जुड़ चुका है। स्थानीय लोगों का मानना है कि सोन और गंगा नदी में बालू खनन पर इनका एकछत्र राज रहा है और क्षेत्र में बिना इनकी मर्जी कोई बड़ा काम नहीं हो सकता।

जेल से ही बने थे एमएलसी

राजनीतिक करियर की बात करें तो रीतलाल यादव ने जेल में रहते हुए 2016 में एमएलसी का चुनाव जीता था, फिर 2020 में दानापुर से विधायक बने। 2010 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने सरेंडर किया था ताकि जेल से ही चुनाव लड़ सकें। उस समय उनकी हार हुई थी, लेकिन 2020 में उन्होंने आशा देवी को हराकर जीत हासिल की। फिलहाल पुलिस जाँच जारी है और हाई कोर्ट में कई मामलों की सुनवाई लंबित है।

 

गवर्नर ही नहीं, राष्ट्रपति के लिए भी तय कर दी डेडलाइन, जानिए तमिलनाडु विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्यों उठ रहे सवाल: क्या है ‘जेबी वीटो’

देश की सबसे बड़ी अदालत ने राष्ट्र के मुखिया की शक्तियों पर कैंची चला दी है। तमिलनाडु के राज्यपाल के विधेयकों को रोकने से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए राष्ट्रपति की ‘जेबी वीटो’ से जुड़ी शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के पास भेजे गए विधेयकों पर एक्शन के लिए समय सीमा तय कर दी है।

इस फैसले के बाद देश में न्यायपालिका के सरकारी काम में हस्तक्षेप और शक्तियों के बँटवारे पर दोबारा बहस चालू हो गई है। राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर यह सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला है और इसमें समय सीमा वाली बात ने इसे और भी गंभीर बना दिया है।

क्या है मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल, 2025 को तमिलनाडु डीएमके सरकार द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई की। डीएमके सरकार ने यह याचिका राज्य के राज्यपाल RN रवि के विधेयकों को रोकने के खिलाफ लगाया था। तमिलनाडु की सरकार ने कहा कि उसके द्वारा पास किए गए विधेयकों को राज्यपाल मंजूरी नहीं दे रहे हैं।

तमिलनाडु की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि राज्यपाल RN रवि ने विधानसभा द्वारा पारित किए गए 10 विधेयकों को लटका रखा है। तमिलनाडु ने बताया था कि विधानसभा में 2 बार पारित किए जाने के बावजूद राज्यपाल ने इन विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए रोक रखा है।

इस मामले राज्यपाल पर ‘जेबी वीटो’ का इस्तेमाल करने की बात तमिलनाडु ने कही थी। तमिलनाडु ने बताया था कि यदि ऐसा होता रहा तो कानून लटक जाएँगे और शासन चलाना मुश्किल हो जाएगा। तमिलनाडु ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से माँग की थी कि वह इन विधेयकों को पारित करने सम्बन्धी कोई स्पष्ट नियम दे।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले अंतिम सुनवाई 8 अप्रैल, 2025 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने की। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की दलीलों को मानते हुए राज्यपाल द्वारा रोक रखे गए विधेयकों को मंजूरी दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ राज्यपालों को भेजे गए विधेयकों को लेकर समय सीमा भी तय कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों के संबंध में की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द किया जाता है। राज्यपाल के समक्ष पुनः प्रस्तुत किए जाने की तिथि से ही 10 विधेयकों को मंजूरी दे दी गई मानी जाएगी।” कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि राज्यपाल को विधानमंडल द्वारा भेजे गए विधेयक पर तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को भेजे जाने के एक महीने के भीतर उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। इसके अलावा अगर वह विधेयक वापस लौटाना चाहता है, तो यह काम तीन महीने के भीतर करना होगा और दोबारा भेजे गए विधेयक को एक माह के भीतर मंजूरी देनी होगी।

राष्ट्रपति पर क्या कह दिया?

तमिलनाडु मामले में फैसला सुनाते हुए जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की शक्तियों पर कैंची चलाई ही, उसने राष्ट्रपति की शक्तियों पर भी टिप्पणियाँ की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति को भेजे जाने के तीन महीने के भीतर उस पर एक्शन लेना होगा। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद भी विधेयक रोके जाने पर कारण बताने होगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर उस तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है, जिस दिन उसे यह भेजे जाएँगे। इस समय से अधिक किसी भी देरी के मामले में उचित कारणों को दर्ज किया जाना होगा और इस मामले में सम्बन्धित राज्य को भी जानकारी देनी होगी।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के किसी विधेयक को मंजूरी ना देने की स्थिति में राज्य अदालत का रुख कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति किसी कानूनी आधार पर विधेयक को रोकते हैं, तो इस संबंध में भी विधेयक की संवैधानिकता का फैसला वह स्वयं करेगा, ना कि राष्ट्रपति।

राष्ट्रपति के किसी विधेयक पर दिए गए फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट सुन सकता है, यह भी निर्णय में कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसे राज्यपाल के पास किसी विधेयक को लम्बे समय तक लटका कर रखने के लिए शक्ति नहीं है, यही बात राष्ट्रपति पर भी लागू होती है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं है।

क्या होता है ‘जेबी वीटो’?

‘जेबी वीटो’ या ‘पॉकेट वीटो’ उस शक्ति को कहा जाता है जब राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पास भेजे गए किसी विधेयक को लेकर कोई फैसला नहीं लेते। वह ना इस पर मंजूरी देते हैं और ना ही इसको वापस विधानमंडल को लौटाते हैं। इसके चलते वह विधेयक लंबित की श्रेणी में रहता है और क़ानून नहीं बनता।

राष्ट्रपति की यह शक्तियाँ संविधान में नहीं लिखी लेकिन विधेयक पर मंजूरी देने या ना देने की समय सीमा तय ना होने के चलते यह मानी जाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 201 में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा भेजे गए किसी विधेयक पर क्या निर्णय लेता है।

राष्ट्रपति विधेयक विधानमंडल को वापस लौटाने की बात राज्यपाल से कह सकता है या फिर उसे मंजूर भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में 6 माह के भीतर दोबारा विधानमंडल को राष्ट्रपति के पास अपना विधेयक भेजना होता है। वह इसे पुराने स्वरुप में ही भेज सकते हैं या बदलाव भी कर सकते हैं।

दूसरे मौके पर राष्ट्रपति इस पर क्या निर्णय लेता है, इस को लेकर संविधान में समय सीमा तय नहीं है। राष्ट्रपति सिर्फ राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक ही नहीं बल्कि संसद द्वारा पारित विधेयक के संबंध में भी कर सकता है। यह कदम राष्ट्रपति रहने के दौरान ग्यानी जैल सिंह ने उठाया था।

उन्होंने राजीव गाँधी की सरकार द्वारा 1986 में पारित भारतीय डाक कानून (संशोधन) को लटका कर रखा था और मंजूरी नहीं दी थी। यह कानून उसके बाद लटका ही रहा और इसे मंजूरी नहीं मिल सकी। राष्ट्रपति के ‘जेबी वीटो’ का यह एक बड़ा उदारहण था। हालाँकि संसदीय कानून के संबंध में अभी सुप्रीम कोर्ट ने कोई निर्णय नहीं दिया है।

‘न्यायिक दखल’ की क्यों हो रही बात?

सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति को लेकर दिए गए इस फैसले के बाद न्यायपालिका के दखल को लेकर चर्चा चालू हो गई है। संविधान में राष्ट्रपति को देश का प्रमुख बताया गया है। आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति के ऊपर समयसीमा लगाना उसकी शक्तियों को कतरने जैसा है। इसके अलावा उसके हर निर्णय को अपनी सुनवाई के दायरे में लाने पर भी यही बात कही जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रपति के ही निर्णय को न्यायिक दायरे में लाना इसलिए भी ज्यादा चर्चा में है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से होती है। इसी के चलते प्रश्न उठाए जा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियाँ करने वाले राष्ट्रपति को न्यायिक दायरे में कैसे खींचा जा सकता है।

इसे आलोचकों ने ‘न्यायिक दखल’ और ‘कार्यपालिका पर अतिक्रमण’ कहा है। गौरतलब है कि संविधान में स्पष्ट तौर पर न्यायपालिका और सरकार के काम बाँटे गए हैं। कई मौकों पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के कामों को लेकर फैसले दिए हैं, जिससे विवाद पैदा हुआ है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में भी CJI को शामिल कर दिया था। इसे भी न्यायिक दखल माना गया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पास किया गया NJAC कानून भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। आलोचक इन्हें न्यायिक दखल का उदाहरण मानते आए हैं।

केरल के राज्यपाल राजेन्द्र आर्लेकर ने भी इस निर्णय को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने पूछा है कि यदि संविधान में बदलाव सुप्रीम कोर्ट कर रहा है, तो फिर विधानसभा और संसद किस लिए बनाई गई हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले को एक बड़ी बेंच को भेजा जाना चाहिए था।

राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह बीते समय में बड़ा फैसला है। ऐसे में इस पर आगे सरकार कोई एक्शन लेगी या नहीं, यह बात देखने वाली होगी।

‘बंगाल को बांग्लादेश बना रही ममता बनर्जी’: कई जिलों में हिंसा के बाद TMC सरकार पर BJP हमलावर, मंत्री बोले- हिंदू हजारों साल से लड़ रहे हैं और आगे भी लड़ेंगे, डरेंगे नहीं

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा वक्फ संशोधन कानून का विरोध करने के बाद पश्चिम बंगाल में हिंसा भड़क उठी है। सीएम का समर्थन मिलने के बाद राज्य के इस्लामवादी वक्फ कानून विरोध के नाम पर सड़कों पर उतर आए हैं। राज्य के कई जिलों में तोड़फोड़ और आगजनी की गई है। पुलिस ने करीब 120 लोगों को हिरासत में लिया है। भाजपा ने बनर्जी पर राज्य को बांग्लादेश बनाने का आरोप लगाया है।

दरअसल, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 9 अप्रैल 2025 को एक कार्यक्रम में कहा था, “याद रखो, जब तक दीदी है… दीदी तुम्हें और तुम्हारी प्रॉपर्टी को बचाएगी।” उसके पहले बनर्जी ने कहा था कि अगर केंद्र से भाजपा सरकार चली गई तो वक्फ एक्ट खत्म हो जाएगा। उन्होंने कहा था, “जैसे ही ये सरकार (भाजपा नेतृत्व वाली NDA) सत्ता से हटेगी और नई सरकार आएगी, ये बिल रद्द हो जाएगा।”

उनके इस बयान के बाद राज्य के मुर्शिदाबाद, मालदा, नादिया और बहरामपुर में कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ ने खूब बवाल किया था। अब एक बार फिर वक्फ कानून के विरोध के नाम पर पूरे राज्य को धीरे-धीरे हिंसा की आग में झोंकी जा रही है। एक बार फिर से मालदा, मुर्शिदाबाद के साथ-साथ नॉर्थ 24 परगना और साउथ 24 परगना जिले में बवाल हो गया है।

वक्फ कानून के विरोध के दौरान शुक्रवार (11 अप्रैल 2025) को मुर्शिदाबाद, नॉर्थ 24 परगना और मालदा में स्थिति बिगड़ गई। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-12 पर सरकारी बसों और कई वाहनों में आग लगा दी गई। इतना ही नहीं, इस दौरान पुलिस पर भी पथराव किया। सुती थाना क्षेत्र के साजूर क्रॉसिंग में मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर क्रूड बम फेंके।

दक्षिण 24 परगना के डायमंड हार्बर में भी हिंसा की गई है। अमतला चौराहे पर भी प्रदर्शन कर रही इस्लामी भीड़ ने पुलिस वाहन में तोड़फोड़ की थी। वेस्टर्न रेलवे ने बताया था कि अजीमगंज-न्यू फरक्का सेक्शन में दोपहर 2.46 बजे लगभग 5000 लोगों की भीड़ ने धुलियानगंगा स्टेशन के पास ट्रैक जाम कर दिया था। मुर्शिदाबाद की स्थिति और भी खराब है। शमशेरगंज में हिंदुओं के घरों-दुकानों को निशाना बनाया गया।

मुर्शिदाबाद में शनिवार (12 अप्रैल 2025) की सुबह से मुस्लिम भीड़ ने उत्पात शुरू कर दिया। जाँगीपुर में उपद्रवियों ने कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। वीडियो में गाड़ियों को धू-धूकर जलते हुए देखा जा सकता है। सुती थाना क्षेत्र के साजूर क्रॉसिंग में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर क्रूड बम फेंके गए। प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए पुलिस ने उन पर आँसू गैस के गोले दागे।

हिन्दुओं की कई व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भी आग के हवाले कर दिया गया, जिसमें ‘श्रीहरि हिन्दू होटल’ भी शामिल है। जलांगी में प्रखंड मुख्यालय में भी तोड़फोड़ मचाई गई। सरकारी दफ़्तरों को भी नहीं छोड़ा गया। बंगाल भाजपा के नेता दिलीप घोष ने कहा है कि मुर्शिदाबाद, मालदा, दिनाजपुर, नादिया, वीरभूम और हावड़ा से हिन्दुओं को साफ करने की साजिश है।

वेस्टर्न रेलवे ने बताया था कि 5,000 लोगों की भीड़ ने दोपहर लगभग 2.45 बजे अजीमगंज-न्यू फरक्का सेक्शन में धुलियानगंगा स्टेशन के पास ट्रैक जाम कर दिया था। इसके बाद बीएसएफ को बुलाना पड़ा था। मंगलवार से शुरू हुआ उत्पात अगले दिन शनिवार की रात तक चला था। इस दौरान 10 पुलिस कर्मी भी घायल हो गए हैं। बंगाल में यह हिंसा 7 अप्रैल से जारी है।

इलाके में इंटरनेट सेवा को बंद कर दिया गया है। इसके साथ ही इलाक़े में बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है। पुलिस ने चार जिलों से अभी तक 120 से अधिक हिंसक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, सूती थाना क्षेत्र से 70 लोगों को, शमशेरगंज इलाके से 41 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने राज्य में हिंसा का संज्ञान लिया है। उन्होंने इस विषय पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से चर्चा की है। उन्होंने केंद्रीय बलों को उपद्रवियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया है। गवर्नर बोस के बयान का एक वीडियो राजभवन ने जारी किया है। उसमें राज्यपाल ने कहा है कि सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध का स्वागत है, लेकिन हिंसा का नहीं। विरोध के नाम पर लोगों के जीवन से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। उन्होंने कहा कि जो उपद्रवी सोचते हैं कि वे कानून को अपने हाथ में ले सकते हैं तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

बांग्लादेश बनाना चाह रही हैं ममता: भाजपा का आरोप

हिंसा को लेकर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने राज्य की ममता बनर्जी सरकार पर हमला बोला है। भाजपा नेता ने कहा कि बंगाल में अराजकता की स्थिति है। वहाँ कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब होती जा रही है। शुभेंदु ने कहा, “कुछ कट्टरपंथी समूह संविधान और कानून का विरोध करते हुए खुलेआम हिंसा कर रहे हैं। आम लोग असुरक्षित हैं।”

भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ‘दूसरा बांग्लादेश’ बनाना चाहती हैं। उन्होंने कहा, “ममता बनर्जी को सत्ता में बनाए रखने के लिए बंगाल को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। वह राज्य को दूसरा बांग्लादेश बनाना चाहती हैं।” भाजपा का कहना है कि ममता सरकार की तुष्टिकरण की राजनीति की वजह से राज्य में कानून-व्यवस्था बिगड़ती जा रही है।

वहीं, बंगाल भाजपा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने भी ममता बनर्जी पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि हिंसा पर ममता बनर्जी के निर्देश पर पुलिस कुछ नहीं कर रही है। पुलिस चुपचाप बैठी हैं। ममता बनर्जी राज्य को बांग्लादेश बनाने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने कहा कि बंगाल में हिंदुओं को डराने की कोशिश हो रही हैं। हिंदू समाज हज़ारों सालों से लड़ता आया है और आगे भी लड़ेगा।