लोकसभा में बुधवार (2 अप्रैल, 2025) को 12 घंटे से भी अधिक चली बहस के बाद आखिरकार पारित कर दिया गया। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी दिनभर संसद से गायब थे, लेकिन वोटिंग के वक़्त वो सदन में पहुँचे। जहाँ वक़्फ़ संशोधन विधेयक के पक्ष में 288 वोट पड़े, वहीं इसके विरोध में 232 वोट पड़े। AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी व कॉन्ग्रेस नेता KC वेणुगोपाल द्वारा सुझाए गए संशोधनों को भी लोकसभा ने ध्वनिमत से खारिज कर दिया।
ये विधेयक 1995 के वक़्फ़ एक्ट को संशोधित करता है। वहीं 1923 के मुसलमान वक़्फ़ एक्ट को ये पूरी तरह रद्द कर देता है। बता दें कि सरकार ने लोकसभा में 2 बिल पेश किए थे। पहला, वक़्फ़ संशोधन विधेयक, 2025 और दूसरा, मुसलमान वक़्फ़ रिपील बिल, 2024. भाजपा के सहयोगी दलों जदयू, TDP और लोजपा ने इस बिल के समर्थन में वोट किया। इसके साथ ही वक़्फ़ एक्ट की उस धारा-40 को भी हटा दिया गया है, जिसके तहत वक़्फ़ बोर्ड को किसी भी संपत्ति को वक़्फ़ घोषित करने का अधिकार था।
साथ ही अब सेन्ट्रल वक़्फ़ काउंसिल में 2 ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों को नियुक्त करने का रास्ता भी साफ़ हो गया है। मोदी सरकार ने स्पष्ट कहा कि वक़्फ़ बोर्ड कोई मजहबी संस्था नहीं है। साथ ही ये प्रावधान भी किया गया है कि कोई मुस्लिम शख्स अगर वक़्फ़ को संपत्ति दान में देता है, इसके लिए ज़रूरी है कि वो कम से कम 5 वर्षों से इस्लाम मजहब की प्रैक्टिस कर रहा हो। केंद्र ने ये भी साफ़ किया है कि राज्य सरकारों को पूर्ण अधिकार दिए जा रहे हैं, हर राज्य के वक़्फ़ बोर्ड्स हैं।
अब गुरुवार को इस विधेयक को राज्यसभा में पेश किया जाएगा। वहाँ भी NDA बहुमत में है, ऐसे में बिल को पास कराने के लिए सरकार कोई ख़ास जद्दोजहद नहीं करनी पड़ेगी। ये इसीलिए भी ख़ास है क्योंकि भाजपा केंद्र में अभी अपने दम पर पूर्ण बहुमत में नहीं है और JDU व TDP जैसी पार्टियाँ उसकी साथी हैं जो ‘सेक्युलर’ कही जाती रही हैं। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने बार-बार समझाया है कि इस बिल का मजहब से कोई लेना-देना नहीं है, ये संपत्तियों का मामला है।
भाजपा का बार-बार यही कहना रहा कि ये बिल अल्पसंख्यकों के हित में है। पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस केवल अल्पसंख्यकों की बातें करती रही। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे राजीव गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में शाहबानो नामक महिला को अधिकार न मिले और मुल्ले-मौलवी ख़ुश हों इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पलट दिया गया था। राज्यसभा में भी इस बिल को लेकर लंबी बहस होगी। बता दें कि इस बिल को संसदीय समिति JPC के पास भेजा गया था, फिर वापस लोकसभा में पेश किया गया।
वर्ष 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध ने इस उपमहाद्वीप का नक्शा बदल दिया। बांग्लादेश को इस युद्ध के बाद पश्चिमी पाकिस्तान से मुक्ति मिली। करोड़ों बंगालियों का अपने एक संप्रभु राष्ट्र का सपना पूरा हुआ। यह काम भारत के बिना हो ही नहीं सकता था। बांग्लादेश के निर्माण ने बंगाली लोगों की लुप्त होती आकांक्षाओं को पुनर्जीवित किया। बांग्लादेश के निर्माण के बाद भले ही कई चुनौतियाँ आई, लेकिन दोनों देशों के संबंध मधुर बने रहे।
अगस्त, 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद दोनों देशों के सम्बन्धों में खटास आई है। राजनयिक से लेकर बाकी स्तर पर बांग्लादेश और भारत के बीच रोज किसी ना किसी मुद्दे पर तल्खी बढ़ी है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस की तथाकथित अंतरिम सरकार की इस्लामी कट्टरपंथी नीति है। मुहम्मद यूनुस की सरकार हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के क्रूर उत्पीड़न को चुपचाप देख रही है। वह लगातार ऐसी हरकतें कर रही है, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव बढ़े।
पूर्वोत्तर राज्यों पर बांग्लादेश की नजर
भारत से लगातार टकराव मोल लेने का एक और उदाहरण हाल ही मोहम्मद यूनुस की चीन यात्रा में देखने को मिला यहाँ उन्होंने चीन को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के पास लगे इलाके में आमंत्रित किया। यूनुस ने कहा कि भारत के सात पूर्वोत्तर राज्य जमीन से घिरे हुए हैं।
उन्होंने कहा “भारत के 7 राज्य, भारत का पूर्वी हिस्सा, जिन्हें सेवेन सिस्टर्स (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा) कहते हैं। वे भारत के जमीन से घिरे हुए हैं। उनके पास समुद्र तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं है।”
इसके बाद उन्होंने बांग्लादेश को इस इलाके के समुद्र के एकमात्र मालिक के रूप में बताया और चीन को इसका फायदा उठाने के लिए न्योता दिया। मोहम्मद यूनुस ने कहा कि इस इलाके में आकर चीन उत्पादन और उनकी बिक्री कर सकता है। उन्होंने चीन के निवेश को रिझाने के लिए इस इलाके को मुफीद बताया और कहा कि यहाँ से निर्यात भी हो सकता है।
मोहम्मद यूनुस ने दावा किया कि बांग्लादेश के इस इलाके से चीन नेपाल और भूटान तक का फायदा उठा सकता है। मोहम्मद यूनुस ने यह सभी बातें यह जानते हुए कहीं कि इससे भारत की चिंताएँ बढेंगी। भारत कभी भी अपने इलाके से कुछ सौर किलोमीटर दूर चीन की मौजूदगी नहीं चाहेगा।
मोहमद यूनुस यह भी जानते हैं कि बांग्लादेश भारत के लिए पड़ोसी होने के साथ ही रणनीतिक महत्व भी रखता है, क्योंकि देश के कई स्थान ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ के पास स्थित हैं, जिसे अक्सर ‘चिकन नेक’ के रूप में जाना जाता है। यह लगभग 20 किलोमीटर चौड़ा संक्रा गलियारा है, जो पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है।
यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब मोहम्मद यूनुस ने ऐसा को गैर जिम्मेदाराना बयान दिया हो। इससे पहले अगस्त, 2024 में एक इंटरव्यू में कहा था, “यदि आप बांग्लादेश को अस्थिर करेंगे, तो इसका असर पूरे बांग्लादेश में फैलेगा, जिसमें म्यांमार और पश्चिम बंगाल और सेवेन सिस्टर्स भी शामिल हैं।”
मोहम्मद यूनुस 26 मार्च, 2024 को बांग्लादेश से चीन गए थे। वह 4 दिन की यात्रा पर चीन पहुँचे थे। यहाँ उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इस यात्रा को बांग्लादेश के उप विदेश मंत्री ने एक ‘सन्देश’ भेजने वाली यात्रा बताया।
यूनुस के बयान से खड़े हुए कान
मोहम्मद यूनुस की इस टिप्पणी का भारत में तगड़ा विरोध हुआ। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इसे ‘अपमानजनक और कड़ी निंदा योग्य’ बताया। उन्होंने चिकन नेक के इलाके के आसपास और नीचे नर रास्ते तलाशे जाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मोहम्मद यूनुस लगातार अपना एजेंडा लेकर चल रहे हैं।
The statement made by Md Younis of Bangladesh so called interim Government referring to the seven sister states of Northeast India as landlocked and positioning Bangladesh as their guardian of ocean access, is offensive and strongly condemnable. This remark underscores the…
राजनीति और सुरक्षा विशेषज्ञ क्रिस ब्लैकबर्न ने इस टिप्पणी को ‘चिंताजनक’ और ‘स्पष्टीकरण’ के लायक बयान बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि इस बयान में क्या यूनुस भारत के सेवेन सिस्टर्स राज्यों के पास चीन की भागीदारी की वकालत कर रहे थे।
It is very disturbing and needs clarification. Is Yunus publicly calling for China to get involved in the Seven Sister states of India? https://t.co/9jIqBxfGqO
अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य संजीव सान्याल ने इस मुद्दे पर लिखा, “दिलचस्प है कि यूनुस चीन से इस आधार पर सार्वजनिक अपील कर रहे हैं कि भारत के 7 राज्य चारों ओर से जमीन से घिरे हुए हैं।” उन्होंने इस बयान को लेकर शंकाएँ जताईं।
Interesting that Yunus is making a public appeal to the Chinese on the basis that 7 states in India are land-locked. China is welcome to invest in Bangladesh, but what exactly is the significance of 7 Indian states being landlocked? https://t.co/JHQAdIzI9s
लगभग 20 किलोमीटर चौड़ाई वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ के नाम से भी जाना जाता है, पूर्वोत्तर राज्यों और भारत के बीच एकमात्र रास्ता है। इसके एक तरफ बांग्लादेश तो दूसरी तरफ नेपाल और भूटान है। यह भारत के 2.62 लाख वर्ग किलोमीटर या भारत के कुल जमीन के 8% हिस्से को जोड़ता है।
इसमें बांग्लादेश के उत्तर दिनाजपुर जिले के उत्तरी क्षेत्र और दार्जिलिंग जिले के दक्षिणी क्षेत्र शामिल हैं। इन जिलों की सीमा बांग्लादेश के साथ ही बिहार के पूर्णिया और किशनगंज से लगती है, यह दोनों मुस्लिम बहुल जिले हैं।
पूर्वोत्तर राज्यों की 99% सीमाएँ पाँच पड़ोसी देशों: चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल से सटी हुई हैं। यह कॉरिडोर इन राज्यों की सुरक्षा और आर्थिक जरूरतों के लिए एक आवश्यक माध्यम बन जाता है। पूर्वोत्तर भारत अपनी लगभग सभी ज़रूरतों के लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भर है।
चिकन नेक कॉरिडोर के काफी छोटा होने के चलते पूर्वोत्तर भारत से बाकी देश को जोड़ने में बड़ी समस्याएँ आती हैं और वहाँ माल भेजना भी महँगा पड़ता है। अगर कभी युद्ध की स्थिति बने और इस हिस्से पर हमला हो तो बाकी भारत को पूर्वोत्तर से जोड़ना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए, इस कॉरिडोर को लेकर चिंताएँ अब भी बनी हुई हैं, इसका एक कारण चीन का लगातार विस्तारवादी नीतियाँ अपनाना भी है। कई सैन्य अधिकारियों समेत रक्षा विशेषज्ञों ने भी इस चिंता को लेकर बात की है। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज पांडे ने गलियारे को ‘संवेदनशील’ और भारत के लिए एक प्रमुख सुरक्षा प्राथमिकता बताया है।
अक्टूबर, 2024 में एक कॉन्क्लेव के दौरान पूर्वी कमान के पूर्व प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता ने कहा था कि म्यांमार में लड़ाई और बांग्लादेश में राजनीतिक संघर्ष के चलतेकलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और चटगाँव बंदरगाह के माध्यम से त्रिपुरा तक कनेक्टिविटी जैसे अन्य मार्ग बाधित हो गए हैं।
उन्होंने बताया था कि इसके चलते सिलीगुड़ी कॉरिडोर और भी महत्वपूर्ण चैनल बन चुका है। उन्होंने चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CMEC) के माध्यम से म्यांमार में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी बात की थी। इसके अलावा बांग्लादेश के दिनाजपुर के रंगपुर डिवीजन में चीनी मजदूरों की बढ़ती संख्या भी उतनी ही परेशानी वाली बात है।
बांग्लादेश के अलावा नेपाल में भी चीन का बढ़ता प्रभाव चिंता की बात है। विशेषकर इस गलियारे के पास लगती नेपाल सीमा के भीतर चीन के प्रोजेक्ट समस्या को और भी बढ़ाते हैं। 2017 में 73 दिनों तक चले डोकलाम विवाद के दौरान, चीन ने इस भूटान के माध्यम से घुसपैठ की थी। हालाँकि भारत ने इस घटना में चीन को पटखनी दी थी।
इन सबके साथ ही चीन जबरदस्ती कब्जाए गए तिब्बत के चुम्बी घाटी से भी सिलीगुड़ी कॉरिडोर को घेरता है। जनरल कलीता ने बताया था कि चीन ने तिब्बत के इस इलाके में कई इन्फ्रा प्रोजेक्ट चालू किए हैं। इनमें नए सैन्य अड्डे और नई एयरफील्ड शामिल हैं।
चीन ने कथित तौर पर LAC (वास्तविक नियंत्रण रेखा) के पास अरुणाचल के करीब 90 नई बस्तियाँ बनाई हैं। 2018 और 2022 के बीच इनमें से 600 से ज़्यादा नए घर या ऐसे ही ढाँचे सामने आए हैं। मई, 2024 में ली गई सैटेलाइट तस्वीरों में माजिदुनचुन और झुआंगनान जैसी जगहों पर नए निर्माण दिखाई देते हैं। नागरिक और सैन्य दोनों तरह के ढाँचे हैं।
तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के ल्होखा प्रान्त और न्यिंगची (अरुणाचल के पास) के आस-पास के कई इलाके LAC से 5 से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। जनरल कलीता ने बताया था कि अगर चीन की सभी हरकतों को एक नक़्शे पर उभारा जाए तो पता चलेगा कि यह सब सिलीगुड़ी कॉरिडोर को घेरने के लिए हो रहा है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर का महत्व ऐसे भी समझा जा सकता है कि रोज 10 लाख से अधिक वाहन इससे होकर गुजरते हैं। रोज इस कॉरिडोर से 2400 टन माल गुजरता है और इससे ₹142 करोड़ राजस्व की रोज कमाई होती है। जनरल कलीता ने स्पष्ट किया था कि चीन इस गलियारे को घेरने के लिए लगातार आक्रामक होता रहेगा।
इस कॉरिडोर की समस्याओं को देखते हुए भारत ने पूर्व में बांग्लादेश से कुछ समझौते किए थे। इसके चलते भारत पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुँचने के लिए बांग्लादेश की सड़कें और वहाँ के नदी वाले रास्ते उपयोग करता आया है। कोलकाता से अगरतला जाने वाली एक बस इसका उदाहरण है।
यह बस बांग्लादेश होते हुए अगरतला जाती है, इससे इसका सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र बचता है। भारत बांग्लादेश के चटगाँव बंदरगाह के माध्यम से पूवोत्तर में माल भेजता है, इसके चलते बांग्लादेश को बड़ी कमाई होता है। हालाँकि, यह कोई पक्का उपाय नहीं है क्योंक बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता के चलते किसी भी दिन यह समझौते टूट चुके हैं।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर दुश्मनों की रही है नजर
भारत के संबंध में सिलीगुड़ी कॉरिडोर एक हमेशा बने रहने वाले खतरे के रूप में है। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि भारत के दुश्मन इस कमजोरी को पहचानते हैं। वह इसका फायदा उठाने के भी प्रयास करते रहे हैं। मुहम्मद यूनुस का हालिया बयान इस्लामी कट्टरपंथियों की इस कॉरिडोर के विषय में धमकियों को भी याद दिलाते हैं।
CAA कानून के खिलाफ होने वाले प्रदर्शन के दौरान इस कॉरिडोर की कमजोरी को लेकर इस्लामी कट्टरपंथी शरजील इमाम ने बयान दिया था। उसने मुसलमानों से अपील की थी कि वह चिकन नेक को काट दें और पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से अलग कर दें।
शरजील इमाम ने कहा था कि यह सब करने के लिए उसे 5 लाख मुसलमानों की जरूरत है। उसने कहा था कि ऐसा होने पर भारत महीनों तक पूर्वोत्तर से अलग रहेगा और यहाँ भारतीय सेना को जाने के लिए हवाई रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ेगा। उसने दावा किया था कि असम में बंगालियों का नरसंहार हो रहा है।
शरजील इमाम ने इस दौरान यह भी साफ कर दिया था कि चिकन नेक कॉरिडोर के आसपास मुस्लिम बसते हैं और उन्हें इस कॉरिडोर तोड़ने के खिलाफ भड़काना होगा। उसने मुस्लिमों को चिकन नेक काटने के खिलाफ भड़काना जिम्मेदारी बताया था।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर 30 वर्ष पूर्व हिंदू बहुल था। हालाँकि, रोहिंग्याओं और हज़ारों बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ के चलते यहाँ की डेमोग्राफी बदल चुकी है। इस इलाके में बांग्लादेश और म्यांमार से मुस्लिमों के आने के चलते उत्तर बंगाल और असम के बांग्लादेश से लगने वाले अधिकांश जिले मुस्लिम बहुल हैं।
इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के एक पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर ने स्वराज्य की एक रिपोर्ट में बताया, “उत्तर बंगाल के बड़े हिस्से में यह डेमोग्राफी का बदलाव एक गंभीर मुद्दा बन गया है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गम्भीर खतरा भी है। पिछले कुछ दशकों में IB समेत बाक़ी एजेंसियों ने केंद्र सरकार को इस संबंध में रिपोर्ट सौंपी हैं।”
अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT), जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), जो अल कायदा और बांग्लादेश में ISIS से जुड़े संगठनों से जुड़ा है। इस इस्लामी आतंकी संगठन ने भी कॉरिडोर को काट देने की रणनीति बनाई थी। ये इस्लामी आतंकी संगठन इस इलाके की आबादी को कट्टर बनाने और चिकन नेक और बिहार में कई सभाएँ भी कर रहे हैं।
IB के पूर्व शीर्ष अफसर ने बताया, “इस क्षेत्र में रहने वाले मुस्लिम अवैध घुसपैठिए हैं या फिर बांग्लादेश और म्यांमार से आए घुसपैठियों के वंशज हैं। उनसे कहा जा रहा है कि वह भारत के खिलाफ आवाज उठाए क्योंकि यह कथित तौर पर मुस्लिमों पर अत्याचार करता है।”
आगे उन्होंने बताया, “उन्हें बताया जा रहा है कि वे इस क्षेत्र में बहुसंख्यक हैं और उन्हें भारत को हरा कर इस्लामी राज स्थापित करने में मदद करनी होगी। कई भड़काने वाले इस इलाके को बांग्लादेश में मिलाने के लिए वकालत कर रहे हैं।”
IB में काम कर चुके वाले एक उप निदेशक ने इस विषय पर कहा, “गजवा-ए-हिंद की वकालत करने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों की योजना के अनुसार, चिकन नेक कॉरिडोर में संचार को रोक कर और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमला करके भारत को खतरे में डाला जाए।”
उन्होंने बताया, “प्लान यह है कि हमले के समय में सरकारी कॉरिडोर में अपनी सारी शक्ति नहीं उपयोग कर पाएगी और युद्ध वाले मोर्चे पर फंसी होगी। इस कॉरिडोर में लम्बे समय तक विवाद चला तो बाहरी शक्तियां इसका फायदा उठा शक्ति हैं और यह भारत से लाग भी हो सकता है।”
IB में दशकों तक काम कर चुके अफसर के अनुसार, “इस्लामी कट्टरपंथियों की योजना के अनुसार सिर्फ़ चिकन नेक कॉरिडोर में रहने वाले मुसलमान ही विद्रोह नहीं करेंगे। बिहार के किशनगंज और पूर्णिया जिलों में रहने वाले उनके साथी घुसपैठिए भी विद्रोह में शामिल होंगे और उन सभी को बांग्लादेश में रहने वाले मुस्लिमों का समर्थन मिलेगा।”
मोदी सरकार ने चिकन नेक सुरक्षित करने को उठाए कदम
फरवरी 2025 में, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस बात की पुष्टि की थी कि मोदी प्रशासन इस कॉरिडोर के चलते आने वाली तमाम समस्याओं को पूरी तरह जानती है। इसलिए उसने पूर्वोत्तर के साथ निर्बाध संपर्क बनाए रखने के लिए एक रणनीति विकसित की है।”
Several anti national forces have threatened to block the “Chicken Neck” in order to cut off the North East from the rest of India.
मुख्यमंत्री सरमा ने बताया कि भारतीय रेलवे कनेक्टिविटी में सुधार के लिए चिकन नेक में 4 अतिरिक्त रेलवे ट्रैक बनाएगा। इसके अलावा, जल्द ही गलियारे में दो और रेलवे लाइनें शुरू करने की योजना है, जिससे असम और अन्य क्षेत्रों में रेलवे के इन्फ्रा को मजबूती मिलेगी।
इसके अलावा सरकार उन पर निगरानी रख रही है जो चिकन नेक को खतरे में डालने की बात कर रहे हैं। सरकार ने इस इलाके में निवेश बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए हैं। हाल ही में सम्पन्न हुए असम के इन्वेस्टर समिट में भी इस पर जोर था।
इस इलाके में इन्फ्रा भी मजबूत किया जा रहा है। भारत सिलीगुड़ी के माध्यम से एक मल्टीमॉडल कॉरिडोर बनाए जाने की योजना बना रहा है। इसमें हाईस्पीड रेल और सुरंगे तक शामिल होने वाली हैं। इसके अलावा भारत अरुणाचल फ्रंटियर हाइवे बनाने वाला है। यह देश की सबसे बड़ी इन्फ्रा परियोजनाओं में से एक होगा, इसकी लागत ₹42 हजार करोड़ होने की संभावना है।
पूर्वोत्तर राज्यों में कामों के लिए जिम्मेदार मंत्री ज्योतारिदित्य सिंधिया ने हाल ही में बताया, “पिछले 10 वर्षों में हमने करीब साढ़े पाँच हजार किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग बनाए हैं। जिस क्षेत्र में केवल 10,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग थे, आज वहाँ 16,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग हैं।”
उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों पर प्रश्न भी उठाए और आरोप लगाया कि उन्होंने पूर्वोत्तर राज्यों की अनदेखी की। उन्होंने बताया, “60 साल में क्या बना था? सारे इन्फ्रा का 60% 10 साल में बनाया गया है। पिछले 10 साल में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत ₹50,000 करोड़ की लागत से 45,000 किलोमीटर का निर्माण किया गया है।”
उन्होंने कहा, “यह राजमार्गों की बात है। अगर आप रेलवे को देखें, तो रेलवे ट्रैक बनाने की गति मोटे तौर पर पहले 6.5 किलोमीटर/महीने थी। यह अब बढ़कर 19 किलोमीटर/महीने हो गई है। पिछले 10 साल में 2,000 किलोमीटर रेलवे ट्रैक बनाए गए हैं।”
उनके अनुसार, पहले पूर्वोत्तर में मात्र हवाई अड्डे हुआ करते थे लेकिन अब इनकी संख्या बढ़ कर 17 हो चुकी है। उनोने बताया कि अब 1990 उड़ाने पूर्वोत्तर राज्यों से चलती हैं। इसके अलावा पानी के जरिए भी यातायात बढ़ा है। मंत्री सिंधिया ने बताया कि पहले मात्र एक जलमार्ग हुआ करता था जो अब बढ़ कर 20 हो चुके हैं।
अंग्रेजों ने बोए जहर के बीज
सिलीगुड़ी कॉरिडोर की समस्या अंग्रेजों की दी हुई है। यहाँ तक यह नाम भी उनका ही दिया है। अंग्रेजों ने 1905 में बंगाल को पहली बार विभाजित किया था। इसका उद्देश्य बंगाल में बढ़ते आंदोलन को रोकना था। इसके बाद 1911 में राज्य को मिलाया तो गया लेकिन धार्मिक विभागं के बीज बो दिए गए।
फोटो साभार: GeeksforGeeks
यही आगे चल के 1947 में भारत के विभाजन का एक कारण बना। बंगाल, असम और बाकी पूर्वोत्तर के राज्यों वह हिस्सा तोड़ के अलग कर दिया गया, जहा हिन्दू बसा करते थे। इस विभाजन के चलते भारत ने अपना महत्वपूर्ण भूभाग खो दिया।
अंग्रेज विभाजन का रास्ता हमेशा हिन्दुओं को कमजोर करने और अपने खिलाफ विद्रोह ना पैदा होने देने के लिए चलते करते थे। इस रणनीति को उन्होंने बार-बार अपनाया था। इसमें उनका साथ देने वाले इस्लामी कट्टरपंथी गुट भी होते थे। इन्होने पाकिस्तान बनाने में अंत में सफलता पाई। पाकिस्तान की बात सबसे पहले मुस्लिमों ने 1930 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में रखी थी।
पाकिस्तान बनाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना ‘हिन्दुओं के राज’ में नहीं रहना चाहता और इसलिए वह मुस्लिमों के अलग मुल्क चाहता था। उसकी बात को खाद पानी देने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवादी थे। इनमें एक नाम प्रधानमंत्री चर्चिल भी था। अंग्रेज मानते थे कि पाकिस्तान हमेशा ब्रिटेन का एक वफादार रहेगा।
अंग्रेजों की सोची-समझी ‘फूट डालो और राज करो’ आगे चल कर हिंसा में बदल गई। उन्होंने इस नीति के अंतर्गत लाहौर, सिंध और चटगाँव जैसे इलाकों में रहने वाले हिन्दुओं को बेदखल कर दिया और इसे मुस्लिमों को दे दिया।
भारत के विभाजन के चलते दोनों समुदायों की दुश्मनी ही नहीं बढ़ी बल्कि भारत के लिए दो इस्लामी देश, आतंकवाद और कूटनीतिक चुनौतियाँ भी सामने आ गई। विभाजन के चलते ही पूर्वोत्तर शेष भारत से अलग-थलग पड़ गया और उसका विकास दशकों तक नहीं हो सका। वह चीन भी घिर गया।
विभाजन के चलते ही पूर्वोत्तर से चटगाँव बंदरगाह छिन गया। यह हिस्सा इसके बाद बांग्लादेश को दे दिया गया। एकदम किनारे होने के चक्कर में नई दिल्ली इस इलाके पर ध्यान नहीं दे पाई और यह विकास की मुख्यधारा से पीछे छूट गया। यही कारण है कि यह इलाका अब आंतरिक और बाहरी खतरों के प्रति संवेदनशील है।
विभाजन ने जनजातियों के साथ भी किया अन्याय
पाकिस्तान बनाए जाने के समय भारत के पूर्वोत्तर के हिस्से लगभग 1000 मील का क्षेत्र काट दिया गया था। हालाँकि, इसका उस पाकिस्तान से कोई लेना देना नहीं था जो पश्चिम में बनाया गया था और जहाँ के रहने वाले अधिकतर पश्तून और पंजाबी हैं। बांग्लादेश में रहने वाले अधिकांश लोग बंगाली हैं और उनकी संस्कृति दूसरे हिस्से से बिलकुल अलग है।
प्राचीन भारत का पूर्वी क्षेत्र, जो काफी हद तक वर्तमान बांग्लादेश में है, महाजनपद काल में भी फल फूल रहा था। ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी के दौरान फला-फूला अंग साम्राज्य इसका एक बड़ा उदाहरण है। बांग्लादेश मौर्य और गुप्त साम्राज्यों सहित कई प्राचीन भारतीय साम्राज्यों का हिस्सा था।
फोटो साभार: IAS/Facebook
बांग्लादेश के चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र में कई भारतीय जनजातीय समूह रहते हैं। इनमें चकमा, संताल, गारो और त्रिपुरा शामिल हैं, जिन्हें स्वदेशी या जातीय अल्पसंख्यक माना जाता है। बांग्लादेश में 54 से ज़्यादा जनजातीय समूह रहते हैं। यह बांग्लादेश के कुछ समतल जमीन वाले जिलों में भी हैं।
बांग्लादेश की सरकार 50 जातीय समूहों के अस्तित्व को स्वीकार करती है, फिर भी वह इन्हें कोई संरक्षण नहीं देती। परंपरागत रूप से, इनमें से कई समूह ईसाई, बौद्ध या हिंदू रहे हैं जबकि उनमें से कुछ प्रकृति के पूजक भी हैं।
भारत के 1947 के विभाजन के दौरान चटगाँव वाले इस इलाके को पाकिस्तान को सौंपा गया था। इस पर विवाद भी हुआ था। स्थानीय लोग इससे भड़क गए थे। यहाँ तब कोई भी मुस्लिम नहीं बसते थे। लेकिन पाकिस्तान की सरकार ने इसके बाद यहाँ बंगाली मुस्लिमों को बसाना चालू कर दिया।
1964 में इसके विशेष दर्जे को भी पाकिस्तान सरकार ने समाप्त कर दिया। इसके बाद यहाँ और तेजी से बंगाली मुस्लिम बसाए जाने लगे। 1979 से 1983 के बीच पहाड़ी इलाकों में बंगालियों को बसाने के लिए बड़े पैमाने पर सरकार द्वारा योजना चलाई गई।
यह इसलिए बांग्लादेश सरकार ने किया ताकि यहाँ के जनजातीय लोगों की जमीन छीनी जा सके।बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद, जनजातीय लोगों के प्रतिनिधिमंडल ने नए प्रशासन से CHT इलाके को स्वायत्तता देने की याचिका दायर की, लेकिन इसे नहीं स्वीकार नहीं किया गया।
बांग्लादेश में लगातार सरकारों द्वारा उनके प्रतिरोध को हिंसक रूप से दबा दिया गया है। मौजूदा शासन के तहत उनकी स्थिति और भी खराब होती जा रही है। अंग्रेजों और मुस्लिमों के स्वार्थी हितों को पूरा करने के लिए बनाई गई सीमाओं के चलते यह जनजातीय लोग उपेक्षा झेलने को मजबूर हैं।
अब भारत के लिए ऐतिहासिक गलती सुधारने का समय
दुनिया के सभी बड़े देश जैसे कि रूस, चीन, इजरायल और अमेरिका आदि ने अपनी सीमाओं की सुरक्षा और सामरिक हितों को साधने के लिए विस्तार किया है। रूस का क्रीमिया पर कब्जा और यूक्रेन पर हमला इसी कड़ी का एक हिस्सा हैं।
हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड और पनामा नहर पर कब्जा करने की बात कही, यह उनकी विस्तारवादी नीति का ही परिणाम है। चीन तो लगातार भारत में ही घुसता आया है। उसकी विस्तारवादी नीति से उसके सारे पड़ोसी परेशान हैं।
कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र जबरदस्ती उकसावे को बर्दाश्त नहीं करेगा। और तब तो यह असहनीय होगा जब वह राष्ट्र आपको भड़काए जिसका निर्माण ही आपकी मेहनत से हुआ हो और वह आपसे कई गुना छोटा हो। भारत और बांग्लादेश के बीच बहुत बड़े अंतर हैं। भारत जमीन के मामले में तो बांग्लादेश से बड़ा है कि उसकी सेना भी बांग्लादेश के मुकाबले कई गुना मजबूत है।
भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है, वहीं बांग्लादेश के पास ढंग के मिसाइल भी नहीं हैं। मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद से लगातार बांग्लादेश भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है। वह कहीं चीन तो कहीं अमेरिका की गोद में बैठने को आतुर दिखाई देता है।
इसका सीधा अर्थ यह मालूम होता है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन भारत को नुकसान पहुँचाने के लिए किया गया है। ऐसा कुछ होने से रोकने के लिए अब कार्रवाई किए जाने की जरूरत है। ऐसे में भारत बांग्लादेश के उन इलाकों का विलय करने की सोच सकता है, जो इसके लिए रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण है।
इसलिए, अगर भारत बांग्लादेश के उन इलाकों पर जहाँ गैर-मुस्लिम या हिंदू आबादी बड़े रूप में मौजूद है पर कब्जा करता है इससे न केवल यूनुस और उनकी सरकार द्वारा खड़े किए गए खतरे का खात्मा हो जाएगा, बल्कि इससे सामरिक फायदा भी होगा। उदाहरण के लिए अगर भारत चटगाँव बंदरगाह कब्जा ले तो पूर्वोत्तर के राज्य जमीन से घिरे नहीं रहेंगे।
On the northern end of Bangladesh where our critical vulnerability of the chickens neck lies, significant strategic depth can be added. At its narrowest, it’s 75 odd km.
इससे उन देशों को भी सबक मिलेगा जो भारत से कई गुना छोटे होने के बाद और मदद लेने के बाद आँख दिखाते हैं। इससे एक फायदा बांग्लादेश के हिन्दुओं और वहाँ की जनजातियों को भी होगा जो वर्तमान प्रशासन में अत्याचार झेल रहे हैं।
इन समुदायों को बलात्कार, हत्या और लूटपाट की घटनाओं का सामना करना पड़ा है, उनके मंदिरों और पूजा स्थलों को नष्ट और अपवित्र किया गया है, जबकि राज्य ने केवल इन अत्याचारों को बढ़ावा दिया है। हिंदुओं की घटती संख्या बांग्लादेश में उनकी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का प्रमाण है।
फोटो साभार: इंडियन एक्सप्रेस
बांग्लादेश में रहने वाले हिन्दुओं को उनकी मातृभूमि वापस दिलाना भारत की जिम्मेदारी है। यह तब और जरूरी हो जाता है जब पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच रिश्ते गहरे हो रहे हैं। 1971 में अलगाव के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सीधा व्यापार शुरू हुआ है।
कराची के पोर्ट कासिम से सरकार द्वारा स्वीकृत पहला माल रवाना हुआ। फरवरी की शुरुआत में, बांग्लादेश ने ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ पाकिस्तान (TCP) से 50,000 टन पाकिस्तानी चावल खरीदने पर सहमति जताई, जिससे सौदा अंतिम रूप ले लिया। बांग्लादेश लगातार भारत विरोधी बयान भी दे रहा है।
क्या है निष्कर्ष?
पाकिस्तान के जनरल AAK नियाज़ी ने बंगालियों की नस्ल बदलने की बात कही थी। उन्होंने कहा, “मैं इस ह*म*दी क़ौम की नस्ल बदल दूँगा। ये मुझे समझाते हैं।” मेजर जनरल (रिटायर्ड) ख़ादिम हुसैन राजा, पूर्वी पाकिस्तान में 14 डिवीज़न के जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग थे।
उन्होंने बताया है कि पाकिस्तानी अपने सैनिक बंगाली महिलाओं का रेप करने के लिए लगा देंगे। बंगाली अफसर इससे नाराज थे। इसके चलते एक बंगाली अफसर ने आत्महत्या तक कर ली। उन्होंने यह सारी बातें अपनी पुस्तक “ए स्ट्रेंजर इन माई ओन कंट्री: ईस्ट पाकिस्तान, 1969-1971” में लिखा है।
बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के बाद नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ भारत के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अब भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपने अतीत से सबक लेकर अपने और अपने लोगों के हित में काम करे। अब हिन्दुओं को इस्लामी शासन से मुक्त करवाने का भी समय है।
बंगभूमि, बंग सेना द्वारा चलाया गया एक आंदोलन था जिसका उद्देश्य एक बांग्ला हिन्दू राष्ट्र बनाना था। 1973 में बांग्लादेश को अपनी स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद भारत में इस संगठन की स्थापना की गई थी, ताकि देश से हिंदू शरणार्थियों की सहायता की जा सके, क्योंकि 1971 में बांग्लादेश में अत्याचारों के दौरान पाकिस्तानी सेना ने उन्हें निशाना बनाया था।
शायद अब समय आ गया है कि इस तरह की एक और पहल शुरू की जाए। इस बात में कोई शक नहीं है कि भारतीय सेना सिलीगुड़ी कॉरिडोर में किसी भी दुस्साहस को कुचल देगी। वह भारत को आने वाले कोई भी खतरे को खत्म कर देगी।
अगर बांग्लादेशऔर दुस्साहस दिखाता है तो नौसेना भी उसे भूखा मरने पर मजबूर कर सकती है। लकिन रंगपुर, राजशाही और खुलना के कुछ हिस्सों को लेकर, त्रिपुरा की सीमा पर स्थित चटगाँव को अपने देश में मिलाना एक स्थायी समाधान होगा। अब समय आ गया है कि चिकन नेक को हाथी की सूंड की तरह चौड़ा कर दिया जाएगा।
अमेरिका की एजेंसी USAID और जॉर्ज सोरोस के बीच एक ऐसा कनेक्शन सामने आया है, जिसने भारत में हलचल मचा दी है। Enforcement Directorate (ED) की जाँच में पता चला कि बेंगलुरु की कंपनी ASAR Social Impact Advisors को सोरोस की फंडिंग के साथ-साथ USAID से भी पैसा मिला।
टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ED पिछले कुछ समय से सोरोस के Soros Economic Development Fund (SEDF) से जुड़े मामले की जाँच कर रही थी, जिसमें बेंगलुरु की तीन कंपनियों – ASAR Social Impact Advisors, Rootbridge Services Pvt Ltd और Rootbridge Academy Ltd को 2021 से 2024 के बीच 25 करोड़ रुपये मिले। इसके साथ ही खुलासा हुआ है कि ASAR को 2022-23 में USAID से भी 8 करोड़ रुपये मिले।
ED को शक है कि फेमा (Foreign Exchange Management Act) का उल्लंघन हुआ है। ASAR ने सफाई दी कि USAID का पैसा दिल्ली के थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरोनमेंट एंड वॉटर (Council on Energy, Environment and Water (CEEW)) को दी गई सर्विसेज के लिए रीइंबर्समेंट था। सीईईडब्ल्यू का कहना है कि उनका काम हवा को साफ करने से जुड़ा था, जो अब खत्म हो चुका है। लेकिन एएसएआर (ASAR) के अधिकारी ये साफ नहीं बता पाए कि उन्होंने सीईईडब्ल्यू को क्या सर्विस दी और यूएसएआईडी इसमें कैसे शामिल हुआ। ये रहस्य अभी अनसुलझा है।
सीईईडब्ल्यू ने बयान जारी कर साफ किया, “हमारा जॉर्ज सोरोस या ओपन सोसायटी फाउंडेशन से कोई लिंक नहीं है। हमने कभी उनसे फंडिंग नहीं ली। ASAR को यूएसएआईडी के एक प्रोजेक्ट के लिए हायर किया था, जो अब खत्म हो गया। हमारा उससे अब कोई रिश्ता नहीं है।” सीईईडब्ल्यू (CEEW) ने ये भी कहा कि उनसे ईडी द्वारा कोई सवाल नहीं पूछा गया और वो अपने मिशन -भारत के सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए रिसर्च- पर फोकस्ड हैं। उनका कहना है कि उनका काम ट्रांसपेरेंट है और वो किसी भी जाँच में सहयोग करेंगे।
दूसरी तरफ, यूएसएआईडी (USAID) पर ट्रंप प्रशासन पहले ही ‘लेफ्ट, लिबरल और वोक’ एजेंडा फैलाने का आरोप लगा चुका है। अब ईडी ये जानना चाहती है कि यूएसएआईडी का पैसा भारत में किस मकसद से आया।
बता दें कि सोरोस की संस्था ओपन सोसायटी फाउंडेशन को 2016 में भारत के गृह मंत्रालय ने ‘Prior Reference Category’ में डाला था। इसका मतलब है कि इसे भारत में किसी भी नॉन-प्रॉफिट को फंड देने से पहले मंजूरी लेनी पड़ती है। ईडी अब ये जाँच रही है कि क्या ओएसएफ ने नियमों का पालन किया या नहीं। साथ ही सोरोस की फंडिंग सिविल राइट्स ग्रुप्स और थिंक टैंक्स तक कैसे पहुँची, ये भी जाँच का हिस्सा है।
रूटब्रिज सर्विसेज और रूटब्रिज एकेडमी को भी एसईडीएफ (SEDF) से पैसा मिला, जो ओपन सोसायटी फाउंडेशन का इनवेस्टमेंट आर्म है। ईडी के सूत्रों का कहना है कि इन फंड्स का मकसद और इस्तेमाल संदिग्ध है।
हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ गई है, और हिंदू समुदाय पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। सत्तारूढ़ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार हिंदू पूजा स्थलों, दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और घरों को निशाना बनाकर की जाने वाली हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ को रोकने में विफल रही है। ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति और अपराधियों के खिलाफ पुलिस की ढिलाई व निष्क्रियता ने स्थिति को और खराब कर दिया है। अकेले मार्च 2025 में पश्चिम बंगाल में हिंदू समुदाय पर 8 हमले हुए।
नाओदा में हिंदुओं की दुकानों और संपत्तियों पर हमला (9 मार्च)
भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी ने X (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी दी थी कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के नाओदा ब्लॉक के पटिकाबारी बाजार में हिंदू समुदाय की दुकानों और संपत्तियों पर हमला किया गया। अधिकारी ने ट्वीट किया, “कुछ घंटे पहले, बदमाशों ने मुर्शिदाबाद जिले के नाओदा ब्लॉक के पटिकाबारी बाजार में हिंदुओं की दुकानों और संपत्तियों में तोड़फोड़ की और आग लगा दी।” उन्होंने पश्चिम बंगाल पुलिस और राज्य के मुख्य सचिव से तत्काल हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। भाजपा नेता ने कानून और व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए सशस्त्र बलों की तैनाती की माँग की।
सुवेंदु अधिकारी ने स्थिति को शांत करने के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) की तैनाती की भी माँग की। उन्होंने कहा, “यदि आप स्थिति को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं हैं, तो कृपया माननीय बंगाल के राज्यपाल से BSF कर्मियों की तैनाती के लिए अनुरोध करें ताकि कानून और व्यवस्था की स्थिति बहाल हो सके।” भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने भी हिंदुओं की दुकानों और संपत्तियों पर हमले का वीडियो साझा किया। उन्होंने ममता बनर्जी के समर्थकों पर तोड़फोड़ और आगजनी की साजिश रचने का आरोप लगाया।
A couple of hours ago, miscreants have vandalised and set on fire Shops & Properties owned by Hindus at Patikabari Bazar; at Nawda Block of Murshidabad District. I am requesting DG @WBPolice & @chief_west to instruct the Murshidabad District Administration to immediately deploy… pic.twitter.com/LtTQx3qisK
बरुईपुर में देवी शीतला की मूर्ति में आग लगाई गई (7 मार्च )
पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बरुईपुर शहर में शेख इंदु नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति ने देवी शीतला की मूर्ति को तोड़ दिया और उसमें आग लगा दी। सोशल मीडिया पर कई पोस्ट में जली हुई मूर्तियों और क्षतिग्रस्त हिंदू मंदिर के दृश्य देखे जा सकते हैं।
The temple & idol of Goddess Shitala were demolished by Atrak Molla. This incident happened in Baruipur, West Bengal, not in Bangladesh.And the police are said to be extremely active in saving that miscreant!! I got the whole incident from Facebook, link – https://t.co/WyNMTXoNPBpic.twitter.com/dh3VaFKHhv
स्थानीय लोगों ने आरोपित को पकड़ लिया, जो तोड़फोड़ और आगजनी में शामिल था। बरुईपुर पुलिस ने 7 मार्च को ट्वीट कर दावा किया कि आरोपित ‘मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं’ से ग्रस्त है और उसे हिरासत में ले लिया गया है। पुलिस ने बताया कि मामले की जाँच जारी है और आरोपी बाहरी व्यक्ति है।
बरुईपुर पुलिस द्वारा किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट
बशीरहाट में काली मंदिर पर हमला (9 मार्च)
भाजपा नेता दिलीप घोष ने एक्स पर जानकारी दी कि पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट शहर के शंखचूरा बाजार में काली मंदिर पर हमला हुआ और हिंदू देवता की मूर्ति को तोड़ दिया गया। भाजपा नेता ने कहा कि मंदिर पर हमला स्थानीय टीएमसी नेता शाहनूर मंडल के नेतृत्व में हुआ।
पश्चिम बंगाल पुलिस ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि इस अपराध के पीछे कोई सांप्रदायिक पहलू नहीं है और आरोपित व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर है।
1.1 In a shocking incident, the idol of Goddess Kali was vandalized at the Kali temple in Shankhchura Bazaar, under the jurisdiction of the Basirhat Police Station. The act of vandalism reportedly took place under the leadership of Shahanoor Mondal (TMC) of Nindaria Panchayat. pic.twitter.com/9t3z5by2KG
— Dilip Ghosh (Modi Ka Parivar) (@DilipGhoshBJP) March 9, 2025
बशीरहाट पुलिस जिले द्वारा किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट
नंदीग्राम में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ी गईं (14 मार्च)
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अमित मालवीय ने एक्स पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम ब्लॉक 2 के कमालपुर गाँव में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को अपवित्र अवस्था में देखा जा सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूजा और राम नारायण कीर्तन को कुछ लोगों ने बर्दाश्त नहीं किया और स्थल पर तोड़फोड़ की गई।
अमित मालवीय के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
एक वीडियो में एक व्यक्ति को यह कहते हुए सुना गया कि “पुलिस की प्रतिक्रिया मौन है, आप देख सकते हैं कि पुलिस कुछ नहीं कर रही है।” वीडियो में एक पुलिसकर्मी को घटना को रिकॉर्ड कर रहे व्यक्ति को धमकाते हुए भी देखा गया।
मालदा के मोथाबारी में हिंसा गुरुवार (27 मार्च 2025)
मालदा जिले के मोथाबारी गाँव में हिंसक भीड़ ने हिंदुओं के स्वामित्व वाले व्यापारिक प्रतिष्ठानों और घरों को निशाना बनाया। एक हिंदू महिला ने बताया कि कैसे हिंदुओं के घरों को नष्ट कर दिया गया और लोग अपने बच्चों के साथ बिस्तरों के नीचे छिपने को मजबूर हुए।
एक पीड़िता ने कहा, “मुस्लिमों ने हिंदुओं के घर और दुकानें बर्बाद कर दीं और हमारा सामान लूट लिया। अब हम कैसे जिएँगे?” महिलाओं को अपनी धार्मिक पहचान छिपाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, और उन पर हिजाब जैसा सिर ढकने का दबाव डाला जा रहा है।
— Achintya Mondal অচিন্ত্য মন্ডল (@Achintya_Hindu) March 28, 2025
झाउबोना में हिंदुओं के स्वामित्व वाले पान के खेतों में आग लगाई गई शनिवार (29 मार्च 2025)
भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के झाउबोना में हिंदू समुदाय पर लक्षित हमलों के वीडियो साझा किए। उन्होंने कहा कि ‘जिहादी भीड़‘ ने हिंदुओं के स्वामित्व वाले पान के खेतों में आग लगा दी, दुकानों को लूट लिया और निर्दोष हिंदुओं पर हमले किए। उन्होंने ममता बनर्जी की तुष्टिकरण नीति को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।
Another horrifying attack on Hindus under Mamata Banerjee’s appeasement regime!
Jihadi mobs unleashed terror in Jhaubona, Naoda (Murshidabad), after the Mothabari rampage. Under the cover of darkness, they deliberately set fire to Hindu-owned betel farms, looted shops in… pic.twitter.com/zVLQZKOLmn
पूर्व मेदिनीपुर में पूजा पंडाल पर हमला शनिवार (29 मार्च 2025)
भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि पूर्व मेदिनीपुर जिले के दक्षिण बरबरिया गाँव में ‘हिंसक मुस्लिम भीड़‘ ने माँ चंडी के पूजा पंडाल पर हमला किया और धारदार हथियारों से 10 हिंदू भक्तों को घायल कर दिया। घायलों को इलाज के लिए मुगबेरिया अस्पताल ले जाया गया।
Selective targeting of Hindus continue unabated in West Bengal. Hindu religious events, properties and persons are being attacked by the Peaceful Community (শান্তির ছেলেরা). Today also such incidents happened in two places, one in Nowda; Murshidabad district and the other in… pic.twitter.com/O2MlX8rahi
दक्षिण दिनाजपुर में शीतला माता की मूर्ति तोड़ी गई रविवार (30 मार्च 2025)
भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि दक्षिण दिनाजपुर जिले के केशबपुर गाँव में श्री शीतला माता मंदिर में तोड़फोड़ की गई और देवी की मूर्ति को क्षतिग्रस्त किया गया। उन्होंने इस घटना की तत्काल जाँच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।
See the devastation at the Shri Shri Shitala Mata Temple in Keshabpur, Jahangirpur region of South Dinajpur. Under the cover of night, the temple was vandalized, and the idol of the goddess was shattered in a manner reminiscent of fundamentalist #jihadists in #Bangladesh.
पश्चिम बंगाल में हालिया घटनाएँ कानून-व्यवस्था की चिंताजनक स्थिति को उजागर करती हैं। भाजपा नेताओं ने हिंसा और हमलों के लिए राज्य सरकार की नीति को जिम्मेदार ठहराया है और BSF की तैनाती की माँग की है। इन घटनाओं ने हिंदू समुदाय के बीच असुरक्षा की भावना को और गहरा कर दिया है।
(ये ख़बर ऑपइंडिया पर अंग्रेजी में भी उपलब्ध है, पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे।)
तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में 70 साल के किसान राजगोपाल अपनी बेटी की शादी के लिए अपनी 1.2 एकड़ जमीन बेचने की तैयारी कर रहे थे। सपने संजोए हुए थे कि बेटी का हाथ पीले करके उसे विदा करेंगे। लेकिन जब वे सब-रजिस्ट्रार ऑफिस पहुँचे, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें 20 पन्नों का एक दस्तावेज थमाया गया, जिसमें लिखा था कि उनकी जमीन तमिलनाडु वक्फ बोर्ड की है।
सिर्फ उनकी जमीन ही नहीं, बल्कि उनका पूरा गाँव तिरुचेन्थुरई, जहाँ 1500 साल पुराना सुंदरेश्वरार मंदिर भी है, सभी को वक्फ की संपत्ति बता दिया गया। गाँव वाले हैरान थे, गुस्से में थे और डरे हुए भी। यह खबर जंगल की आग की तरह फैली और पूरे देश में वक्फ कानून पर बहस छिड़ गई।
यह कोई अकेला मामला नहीं था। आसपास के 18 और गाँवों को भी वक्फ की संपत्ति घोषित कर दिया गया। लोग सवाल उठाने लगे कि आखिर यह वक्फ बोर्ड है क्या, जिसके पास आज 9.4 लाख एकड़ जमीन है? यह करीब 3,804 वर्ग किलोमीटर का इलाका है, जो भारतीय रेलवे और भारतीय सेना के बाद देश का सबसे बड़ा जमींदार माना जाता है।
इसकी शुरुआत 12वीं सदी में दो गाँवों के दान से हुई थी, और आज यह एक विशाल साम्राज्य बन चुका है। केंद्र सरकार अब वक्फ संशोधन विधेयक ला रही है। ऐसे में चलते हैं वक्फ की जड़ों तक, और समझते हैं कि वक्फ क्या है, भारत में कैसे आया और आज क्यों विवादों में है।
वक्फ का मतलब क्या है?
वक्फ अरबी शब्द ‘वकुफा’ से आया है, जिसका मतलब है ठहरना या रोकना। इस्लाम में वक्फ का अर्थ है ऐसी संपत्ति जो जन-कल्याण के लिए दान की जाए। इसे एक तरह का स्थायी दान कह सकते हैं, जिसे न बेचा जा सकता है, न उपहार में दिया जा सकता है, और न ही विरासत में हस्तांतरित किया जा सकता है। जो इसे दान करता है, उसे ‘वाकिफ’ कहते हैं
वाकिफ यह भी तय कर सकता है कि उसकी संपत्ति या उससे होने वाली कमाई का इस्तेमाल किस काम के लिए होगा। मिसाल के तौर पर, अगर कोई कहे कि उसकी जमीन से होने वाली कमाई सिर्फ अनाथ बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो, तो ऐसा ही होगा।
इस्लाम में वक्फ की शुरुआत पैगंबर मोहम्मद के समय से मानी जाती है। एक कहानी है कि खलीफा उमर ने खैबर में एक जमीन हासिल की और पैगंबर से पूछा कि इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल क्या हो सकता है। पैगंबर ने कहा, “इसे रोक लो, बाँध लो, और इससे होने वाला फायदा लोगों की जरूरतों पर खर्च करो।” इसी तरह, मदीना में 600 खजूर के पेड़ों का एक बाग वक्फ किया गया था, जिसकी कमाई से गरीबों की मदद होती थी। यह वक्फ के सबसे पुराने उदाहरणों में से एक है।
भारत में वक्फ की शुरुआत
भारत में वक्फ की कहानी इस्लाम के साथ शुरू होती है। इस्लामिक परंपरा के महत्वपूर्ण हिस्से वक्फ की भारत में सैकड़ों सालों से मौजूदगी है। इसका मतलब है ऐसी संपत्ति को जन-कल्याण के लिए दान करना, जिसे न बेचा जा सके, न उपहार में दिया जा सके, और न ही किसी को विरासत में हस्तांतरित किया जा सके।
भारत में इसकी शुरुआत इस्लाम के आगमन से मानी जाती है, जो 7वीं सदी में अरब व्यापारियों के साथ शुरू हुई। लेकिन इसे शासकीय स्तर पर लागू करने की कहानी 12वीं सदी से शुरू होती है, जब मोहम्मद गोरी ने पहला कदम उठाया। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, मुगल शासकों, ब्रिटिश काल और 20वीं सदी में मोहम्मद अली जिन्ना से जुड़े मुस्लिम वक्फ एक्ट तक यह परंपरा विकसित होती रही। आइए, इसकी पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं।
मोहम्मद गोरी और वक्फ की शुरुआत
भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत का श्रेय अक्सर अफगानी आक्रमणकारी और लुटेरे शासक मोहम्मद गोरी को दिया जाता है। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत से आया एक तुर्की शासक था, जिसने 12वीं सदी के अंत में भारत पर कई हमले किए। 1175 में उसने मुल्तान के इस्माइली शासक को हराया और 1192 में तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हराकर दिल्ली और उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा किया। गोरी का मकसद सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं था, बल्कि इस्लामी संस्थानों को मजबूत करना भी था।
इतिहासकार विपुल सिंह की किताब इंटरप्रेटिंग मेडिवल इंडिया और अयनुल मुल्क मुल्तानी की फारसी किताब इन्शा-ए-महरु के अनुसार, गोरी ने 1185 में मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गाँव दान में दिए। इन गाँवों का मैनेजमेंट शेख-अल-इस्लाम को सौंपा गया, जो उस समय एक प्रमुख मजहबी नेता की उपाधि थी। यह भारत में वक्फ का पहला दर्ज उदाहरण माना जाता है।
विपुल सिंह की किताब का कवर (फोटो साभार: Amazon)
गोरी का यह कदम धार्मिक और सामुदायिक कल्याण के लिए था, ताकि मस्जिद की देखभाल और मुसलमानों की शिक्षा के लिए संसाधन जुटाए जा सकें। हालाँकि, कुछ वामपंथी इतिहासकार जैसे प्रोफेसर इरफान हबीब मानते हैं कि वक्फ की अवधारणा इससे पहले भी व्यक्तिगत स्तर पर मौजूद थी, लेकिन गोरी ने इसे शासकीय पहचान दी। इन दो गाँवों से शुरू हुई यह परंपरा आगे चलकर लाखों एकड़ तक फैल गई। गोरी की मृत्यु 1206 में हुई, लेकिन उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया।
कुतुबुद्दीन ऐबक और दिल्ली सल्तनत की नींव
मोहम्मद गोरी का गुलाम और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक साल 1206 में दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान बना। उसने 1206 से 1210 तक शासन किया और भारत में इस्लामी शासन की नींव रखी। ऐबक के दौर में वक्फ को औपचारिक रूप से लागू करने का कोई स्पष्ट दस्तावेज नहीं मिलता, लेकिन उसने इस्लामिक परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए, जो वक्फ के विकास में मददगार साबित हुए।
ऐबक ने दिल्ली में कुतुब मीनार और कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की नींव रखी। ये मजहबी स्थल बाद में वक्फ संपत्तियों का हिस्सा बने। इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी की किताब तारीख-ए-फिरोज शाही के मुताबिक, उस दौर में शासक अक्सर मस्जिदों और मदरसों के लिए जमीनें दान करते थे। ऐबक का शासन छोटा था, लेकिन उसने इस्लामी कानूनों को लागू करने की शुरुआत की, जिसने वक्फ को मजबूत करने का रास्ता खोला। उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद इल्तुतमिश सत्ता में आया, जिसने वक्फ को और व्यवस्थित किया।
इल्तुतमिश और वक्फ का संगठन
दिल्ली सल्तनत का तीसरा सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश 1211 से 1236 तक शासक रहा। उसे भारत में इस्लामी शासन को मजबूत करने वाला पहला शासक माना जाता है। इल्तुतमिश ने न सिर्फ सल्तनत को संगठित किया, बल्कि इस्लामी कानूनों और परंपराओं को व्यवस्थित करने में भी अहम भूमिका निभाई। वक्फ इसकी एक बड़ी मिसाल है।
इल्तुतमिश के शासन में मस्जिदों, मदरसों और अन्य मजहबी कार्यों के लिए संपत्तियाँ दान करने की प्रथा बढ़ी। बदायूँ में शम्सी मस्जिद, जिसका निर्माण उसके शासनकाल में हुआ, एक वक्फ संपत्ति का उदाहरण है।
इतिहासकार विपुल सिंह लिखते हैं कि इल्तुतमिश ने वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए स्थानीय स्तर पर कमेटियाँ बनाईं, जिन्हें मुतवल्ली कहा जाता था। ये कमेटियाँ संपत्ति की देखभाल और उससे होने वाली आय को जन-कल्याण में लगाने का काम करती थीं। इल्तुतमिश के दौर में ज्यादातर संपत्ति शासकों के पास होती थी, इसलिए वे ही वाकिफ (दानदाता) बनते थे।
उसकी बनाई मस्जिदें और मदरसे वक्फ के तहत संरक्षित किए गए। विद्वान अमीर अफाक अहमद फैजी के मुताबिक, बदायूँ में मिरान मुलहिम की कब्र और बिलग्राम में ख्वाजा मजद अल-दीन का मकबरा भी इल्तुतमिश के समय की वक्फ संपत्तियों के उदाहरण हैं। इल्तुतमिश ने वक्फ को एक संस्थागत रूप दिया, जो बाद के शासकों के लिए आधार बना।
16वीं-17वीं सदी मुगल काल में वक्फ का विस्तार
मुगल काल में वक्फ ने नया आयाम लिया। बाबर (1526-1530) ने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई जीतकर मुगल साम्राज्य की नींव रखी। उसके बाद हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब जैसे शासकों ने वक्फ को और संगठित किया।
बाबर और हुमायूँ: बाबर ने अपने छोटे शासन में वक्फ को बढ़ावा दिया। उसने दिल्ली में मस्जिदें बनवाईं, जो बाद में वक्फ संपत्ति बनीं। हुमायूँ का शासन अस्थिर रहा, लेकिन उसने भी इस काम को जारी रखा।
अकबर (1556-1605): अकबर ने वक्फ को व्यापक रूप दिया। उसने लखनऊ में फरांगी महल को वक्फ किया, जो एक बड़ा इस्लामिक शिक्षण केंद्र बना। अकबर ने मजहबी कार्यों के लिए जमीनें दान कीं और वक्फ के प्रबंधन को मजबूत करने के लिए नियम बनाए।
शाहजहाँ (1628-1658): शाहजहाँ ने ताजमहल के रखरखाव के लिए 30 गाँव और एक परगना वक्फ में दिया। विद्वान अमीर अफाक अहमद फैजी लिखते हैं कि यह मुगल काल में वक्फ का सबसे बड़ा उदाहरण था। शाहजहाँ ने दिल्ली में जामा मस्जिद भी बनवाई, जो वक्फ संपत्ति का हिस्सा बनी।
औरंगजेब (1658-1707): औरंगजेब ने भी वक्फ को बढ़ावा दिया, लेकिन उसका फोकस मजहबी कार्यों पर ज्यादा था। उसने कई मस्जिदों और कब्रिस्तानों के लिए जमीनें दान की।
मुगल काल में वक्फ संपत्तियों की संख्या तेजी से बढ़ी। शासकों के अलावा आम लोग भी अपनी जमीनें दान करने लगे। ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम समुदाय के फैलने और धर्म परिवर्तन के साथ वक्फ का दायरा बढ़ता गया।
ब्रिटिश काल में वक्फ का औपचारिक ढाँचा
ब्रिटिश शासन में वक्फ को कानूनी और संगठित रूप मिला। उससे पहले यह व्यक्तिगत और समुदाय स्तर पर चलता था। प्रोफेसर इरफान हबीब बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने वक्फ को नियंत्रित करने की कोशिश की, ताकि उसकी संपत्तियों का प्रबंधन व्यवस्थित हो सके।
साल 1913 में वक्फ बोर्ड की शुरुआत: 1913 में ब्रिटिश सरकार ने मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट (Mussalman Waqf Validating Act, 1913) पारित किया। इसका मकसद वक्फ संपत्तियों की निगरानी करना और उनके दुरुपयोग को रोकना था। यह पहला मौका था जब वक्फ को सरकारी स्तर पर मान्यता मिली।
साल 1923 का वक्फ एक्ट: 5 अगस्त 1923 को मुसलमान वक्फ एक्ट 1923 लाया गया, जिसने वक्फ को कानूनी आधार दिया। इस एक्ट के तहत वक्फ संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन और प्रबंधन शुरू हुआ। बोर्ड बनाए गए, जिनमें समुदाय के लोग और सरकार के प्रतिनिधि शामिल थे।
हबीब कहते हैं, “ब्रिटिश काल में जमींदार और नवाब अपनी अतिरिक्त संपत्तियाँ दान कर दिया करते थे। यह प्रथा पहले से थी, लेकिन इसे संगठित करने की कोशिश ब्रिटिश सरकार ने की।” इस दौर में वक्फ की संपत्तियाँ मस्जिदों, कब्रिस्तानों और मदरसों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इसमें नकदी और इमारतें भी शामिल हुईं।
क्या था जिन्ना का मुस्लिम वक्फ एक्ट?
केंद्र सरकार वक्फ संशोधन बिल लोकसभा में लाई। इसे लेकर सरकार और विपक्ष में जमकर रस्साकसी चली। इसी बीच बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने मोहम्मद अली जिन्ना का जिक्र छेड़ दिया। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “1911 में जिन्ना मुस्लिम वक्फ एक्ट लेकर आए थे, और 1954 तक इसे ‘जिन्ना लॉ’ के नाम से जाना जाता था। हिंदुओं और मुसलमानों के अलग-अलग कानूनों ने इस देश में विभाजन को जन्म दिया।” तो आखिर क्या है ये जिन्ना का मुस्लिम वक्फ एक्ट? ये भी समझ लेते हैं।
मोहम्मद अली जिन्ना 20वीं सदी की शुरुआत में कॉन्ग्रेस का नेता था। वो एक बड़ा वकील था और उस समय तक उसका इस्लामी कट्टरता वाला चेहरा सामने नहीं आया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1911-1913 के दौरान जिन्ना ने ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के तहत इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में एक महत्वपूर्ण कानून को पेश करने में अहम भूमिका निभाई, जिसे मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट, 1913 कहा जाता है। यह एक्ट वक्फ संपत्तियों से संबंधित कानूनी विवादों को सुलझाने के लिए बनाया गया था।
1913 का एक्ट क्यों बना?
19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश अदालतों और प्रिवी काउंसिल ने कई फैसले दिए, जिनमें वक्फ की वैधता पर सवाल उठे। खास तौर पर, 1894 के अब्दुल फतह बनाम सईदन मामले में प्रिवी काउंसिल ने फैसला दिया कि अगर कोई वक्फ अपने परिवार के लाभ (वक्फ-अलाल-औलाद) के लिए बनाया गया है, तो वह इस्लामी कानून के तहत वैध नहीं होगा। इस फैसले ने भारत में मुस्लिम समुदाय में चिंता पैदा की, क्योंकि पारिवारिक वक्फ उनकी परंपरा का हिस्सा थे।
इस समस्या को हल करने के लिए मुस्लिम नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से एक नया कानून बनाने की माँग की। जिन्ना तब इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य था। उसने इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया। 7 मार्च 1911 को यह बिल पेश किया गया, जिसे बाद में संशोधनों के साथ 1913 में पारित किया गया। यह कानून 7 मार्च 1913 को लागू हुआ। इसका मकसद था कि पारिवारिक वक्फ को कानूनी मान्यता मिले और प्रिवी काउंसिल के फैसले से सामने आया असमंजस खत्म हो।
क्या सच में कहते हैं इसे जिन्ना लॉ?
निशिकांत दुबे का दावा है कि 1954 तक इसे जिन्ना लॉ कहा जाता था, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों में कहीं भी इसका जिक्र नहीं मिलता। चूँकि यह जिन्ना के प्रयासों से आया था, इसलिए इसे जिन्ना लॉ के रूप में जोड़ा जाता है। लेकिन आधिकारिक तौर पर इसका नाम हमेशा मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट- 1913 ही रहा।
साल 1923 में मुसलमान वक्फ एक्ट 1923 पारित हुआ, जो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा था। आजादी के बाद भारत सरकार ने वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन के लिए 1954 में एक नया वक्फ एक्ट बनाया। इसके बाद 1995 और 2013 में इसमें संशोधन हुए और अब 2025 में वक्फ संशोधन बिल पेश किया जा रहा है।
सातवीं शताब्दी में इस्लाम के साथ दक्षिण भारत में आ गया था वक्फ
वक्फ की कहानी सिर्फ शासकों तक सीमित नहीं है। 7वीं सदी में अरब व्यापारियों ने दक्षिण भारत में इस्लाम के साथ वक्फ की परंपरा लाई। मालाबार क्षेत्र में मस्जिदें और कब्रिस्तान इसके शुरुआती उदाहरण हैं।
इतिहासकार सतीश चंद्रा की किताब मेडिवल इंडिया के मुताबिक, दक्कन के बहमनी सल्तनत और विजयनगर साम्राज्य के बीच संपर्क में भी वक्फ का जिक्र मिलता है। स्वतंत्रता के बाद 1954 में वक्फ एक्ट आया, जिसे 1995 और 2013 में संशोधित किया गया। आज वक्फ बोर्ड के पास 9.4 लाख एकड़ जमीन है, जो इसे देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बनाती है।
सतीश चंद्रा की किताब का कवर पेज (फोटो साभार: Amazon)
वक्फ के विस्तार के साथ ही बढ़े विवाद
दो गाँवों से शुरू हुआ वक्फ आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुँच गया है। इसमें 8.7 लाख से ज्यादा संपत्तियाँ शामिल हैं। मस्जिदें, दरगाहें, कब्रिस्तान और इमामबाड़े इसके बड़े हिस्से हैं।
वामपंथी इतिहासकास इरफान हबीब की चिंता है, “जिस संपत्ति का कोई मालिक नहीं होता, उसके सब मालिक बन जाते हैं। वक्फ के साथ भी यही हुआ। कई जगह इसका दुरुपयोग हुआ।” वे कहते हैं कि लोग संशोधन बिल पर शक करते हैं कि सरकार इसके जरिए जमीनों पर कब्जा करना चाहती है। हबीब कहते हैं, “वक्फ समाज के लिए बना था। इसे उसी भावना से चलाना चाहिए।”
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली कहते हैं, “वक्फ में कोई गैर-कानूनी कब्जा नहीं होता। यह आरोप बेबुनियाद हैं। मुसलमानों ने अपनी जमीनें दान की हैं।” मौलाना खालिद कहते हैं, “वक्फ इस्लाम में नमाज और हज जितना अहम है। यह 1400 साल से चली आ रही परंपरा है।” लेकिन वे मानते हैं कि इसमें नीयत बदल गई है।
आज वक्फ बोर्ड की ताकत और उससे जुड़े विवाद सरकार के लिए चुनौती हैं। यह संशोधन कितना कारगर होगा, यह वक्त बताएगा। लेकिन राजगोपाल जैसे लोगों का दर्द और सवाल अभी अनसुने हैं।
लोकसभा में बुधवार (2 अप्रैल, 2025) में वक़्फ़ बिल को पेश करते हुए इस तर्क पर सवाल खड़ा किया कि वक़्फ़ बोर्ड में ग़ैर-मुस्लिम कैसे आ सकते हैं। उन्होंने कहा कि इसका मजहब से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने इस सवाल पर भी सवाल उठाया कि सरकार मस्जिदें छीन लेंगी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि हम सब किसी न किसी राज्य/केंद्रशासित प्रदेश से आते हैं, लेकिन सब भारतीय हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों को अधिकार दिए गए हैं कि जो संपत्ति पंजीकृत है, उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। उन्होंने बताया कि जो विवादित संपत्तियाँ हैं और अदालत में पेंडिंग हैं, उनमें सरकार कैसे हस्तक्षेप कर सकती है?
इसी तरह, उन्होंने याद दिलाया कि कैसे CAA बिल के समय कुछ लोगों ने कहा था कि इसके लागू होने से मुस्लिमों की नागरिकता चली जाएगी, आज ये क़ानून लागू है लेकिन ग़लत साबित होने के बावजूद ऐसी बातें करने वालों ने माफ़ी नहीं माँगी। उन्होंने कहा कि कोई भी मुस्लिम जब वक़्फ़ क्रिएट करता है तो उस परिवार में महिला का अधिकार सुनिश्चित करने के बाद ही वो ऐसा करेगा। उसी प्रॉपर्टी पर वक़्फ़ क्रिकेट किया जा सकता है जिसमें शत-प्रतिशत हिस्सा हो, महिलाओं-बच्चों का अधिकार नहीं छीना जा सकता है।
किरेन रिजिजू ने कहा कि समाज में महिलाओं को दबाने का काम करने वाले यहाँ जोर-जोर से बोल रहे हैं। उन्होंने बताया कि JPC का सुझाव मानते हुए कलक्टर के ऊपर के अधिकारियों को विवादित वक़्फ़ संपत्ति के मामले में जाँच का अधिकार दिया गया है। उन्होंने बताया कि जनजातीय समाज के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्रावधान किया गया है कि अनुसूचित जनजाति की संपत्तियों में वक़्फ़ संपत्तियाँ क्रिएट नहीं की जा सकेंगी। वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ अब कोर्ट भी जाया जा सकता है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि किसी भी जमीन को वक़्फ़ संपत्ति घोषित करने वाले प्रावधान को हटा दिया गया है। जमीन हड़पने के लिए इस प्रावधान का ग़लत इस्तेमाल किया गया।
किरेन रिजिजू ने कहा कि आज पूरे देश का ईसाई समुदाय और चर्चों के लोग आज कह रहे हैं कि वक़्फ़ संशोधन बिल जल्दी पारित हो, क्योंकि इसके सेक्शन-40 का दुरूपयोग होता था। उन्होंने इस दौरान विपक्षी दलों को याद दिलाया कि इस बिल का विरोध करने पर उन्हें केरल के ईसाईयों का विरोध झेलना पड़ेगा। उन्होंने तमिलनाडु के तिरुचांदुराई स्थित 1500 वर्ष पुराने मंदिर को और यमुनानगर में स्थित एक गुरुद्वारे के अलावा केरल में 600 ईसाई परिवारों की जमीनों को वक़्फ़ संपत्ति घोषित किए जाने का विरोध करते हुए कहा कि उन्हें अब जमीन वापस मिल जाएगी।
किरेन रिजिजू ने कहा कि अब भी मौका है, विपक्षी दल इस वक़्फ़ बिल का समर्थन करें। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके जैसे एक साधारण व्यक्ति को इस पुण्यकार्य का मौका दिया है, करोड़ों ग़रीब उन्हें दुआ देने वाले हैं। उन्होंने अपील की कि सब इस दुआ में शामिल हों, ये दुआ उन्हें अकेले क्यों मिले। उन्होंने अंत में एक शेर के साथ अपनी बात खत्म की:
मेरी हिम्मत को तो सराहो, मेरे हमराही बनो मैंने एक शमाँ जलाई है हवाओं के ख़िलाफ़
अल्पसंख्यक कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने वक़्फ़ बिल पर चर्चा के दौरान संसद में कहा कि वक़्फ़ का मामला संपत्ति का है, इन संपत्तियों का प्रबंधन मुतव्वली करते हैं। उन्होंने इस दौरान सदन में 3 मामलों का जिक्र किया, ताकि समझा सकें कि वक़्फ़ का मजहब से कोई लेना-देना नहीं है।
पहला, सैयद फजल पूकोया थंगल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया। इसमें केरल हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया था कि वक़्फ़ बोर्ड एक नियामक संस्था है, ये मुस्लिमों की प्रतिनिधि संस्था नहीं है। दूसरा, हाफिज ज़फर अहमद बनाम यूपी सुन्नी सेन्ट्रल वक़्फ़ बोर्ड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि वक़्फ़ बोर्ड का काम सिर्फ़ संपत्तियों का प्रबंधन है, मुनव्वलियों के कामकाज की प्रकृति सेक्युलर है, मजहबी नहीं। तीसरा, तिलकायत श्री गोविंदलाल जी महाराज बनाम राजस्थान सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिरों की संपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार सेक्युलर मामला है, धार्मिक नहीं।
किरेन रिजिजू ने 2014 में हुए संशोधन की बात करते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव से पहले 123 संपत्तियों को दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड को ट्रांसफर कर दिया। ये सरकारी संपत्ति थी। उन्होंने कहा कि लोग समझदार हैं, ऐसे काम करने से वोट नहीं मिलता है। उन्होंने बताया कि 1995 में जो प्रावधान नहीं थे, उन्हें 2013 में जोड़ा गया था। इसमें बताया गया है कि वक़्फ़ बोर्ड को जमीन वही व्यक्ति दान कर सकता है, जिसने कम से कम 5 वर्ष इस्लाम की प्रैक्टिस की हो। वक़्फ़ बोर्ड में सब शिया, सुन्नी, बोहरा और पिछड़े मुस्लिम भी रहेंगे, महिलाएँ भी रहेंगी। इसमें मुस्लिम विशेषज्ञों को भी जोड़ा जाएगा।
उन्होंने कहा कि ‘सेन्ट्रल वक़्फ़ काउंसिल’ में 4 ग़ैर-मुस्लिम सदस्य रह सकते हैं और 2 महिलाएँ होनी ही चाहिए। साथ ही किसी भी धर्म/मजहब के 3 सांसद इसमें रहेंगे। इसके अलावा 10 सदस्य मुस्लिम समिति से होंगे, इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के 2 पूर्व जज रहेंगे। एक वकील भी रहेगा। 4 प्रतिष्ठित लोग विभिन्न क्षेत्रों से रहेंगे। एक अधिकारी भी रहेंगे। 10 मुस्लिम सदस्यों में ही 2 महिलाएँ रहेंगी।
किरेन रिजिजू ने बताया कि वक़्फ़ बोर्ड में जो प्रावधान ज़रूरी नहीं थे, उन्हें देश के क़ानून के हिसाब से कर दिया गया है। किरेन रिजिजू ने इस आँकड़े की भी चर्चा की, जिसमें बताया गया है कि रेलवे और डिफेन्स के बाद सबसे अधिक जमीनें वक़्फ़ बोर्ड की है। उन्होंने बताया कि रेलवे की संपत्तियाँ देश की संपत्ति है, इसी तरह डिफेन्स की संपत्ति भी देश की है। वहीं उन्होंने कहा कि वक़्फ़ की प्रॉपर्टी प्राइवेट होती है, दुनिया में सबसे अधिक वक़्फ़ संपत्ति भारत में है।
उन्होंने सवाल उठाया कि इसके बावजूद देश के मुस्लिम ग़रीब क्यों है? उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार दलित मुस्लिमों के लिए कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि चंद वोटों और सत्ता के लिए मुस्लिमों को गुमराह किया जा रहा है। किरेन रिजिजू ने कहा कि 2006 में 4.90 लाख वक़्फ़ संपत्तियाँ थीं, जिसकी आय थी 163 करोड़ रुपए। 2013 में बदलाव के बाद भी मात्र 3 करोड़ रुपए ही आय बढ़ी है। उन्होंने आगे कहा कि सच्चर कमिटी ने भी कहा है कि अच्छे से प्रबंधन होता तो उसी वक़्त वक़्फ़ प्रॉपर्टी से 12,000 करोड़ रुपए का राजस्व आता। किरेन रिजिजू ने कहा कि सोचिए इससे कितने मुस्लिमों को फ़ायदा होता। आज कुल वक़्फ़ संपत्तियाँ 8.72 लाख वक़्फ़ संपत्तियाँ हो गई हैं।
तिरुवनंतपुरम में आईबी अधिकारी सुलेखा (बदला हुआ नाम) की आत्महत्या के मामले में परिवार ने उनके दोस्त सुकांत सुरेश का आरोप लगाया है। परिजनों का कहना है कि सुकांत के यौन उत्पीड़न के बाद सुलेखा ने आत्महत्या कर ली थी। सुकांत उसी के साथ काम करता था। उसके बारे में मृतका ने अपनी माँ को बताया था।
पिता ने बताया कि पिछले साल राजस्थान में ट्रेनिंग के दौरान दोनों का रिश्ता शुरू हुआ था। रिपोर्ट्स के अनुसार, परिवार का आरोप है कि सुकांत सुरेश का उनकी बेटी की आत्महत्या में बड़ा हाथ है। मृतक के पिता ने कहा, “सुकांत ने मेरी बेटी से धोखे से 3.5 लाख रुपए लिए थे। उसकी मौत के बाद हमने उसके बैंक ट्रांजैक्शन जाँच की तो पता चला कि वह अपनी सैलरी सुकांत को भेजती थी।”
पिता ने आगे कहा, “पेट्टा पुलिस को हमने फोन रिकॉर्ड्स के साथ बेटी के बैग से मिले अन्य सुबूत भी दे दिए हैं। सुकांत को एक लुकआऊट नोटिस जारी किया गया है, ताकि वह देश छोड़ कर भाग न सके। पुलिस ने भी हमें बताया है कि मेघा की आत्महत्या में उसकी भूमिका नजर आ रही है, जिस पर वे जाँच कर रहे हैं।”
बता दें कि केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में मृतका की लाश 24 मार्च 2025 की सुबह रेलवे ट्रैक पर मिली थी। वह आठ महीने पहले ही तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन डिपार्टमेंट में आई थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, मृतका सुबह सात बजे की शिफ्ट पूरी करके एयरपोर्ट से निकली। इसके बाद पेट्टा और चकाई के बीच रेलवे ट्रैक पर पुणे-कन्याकुमारी एक्सप्रेस के सामने कूद कर आत्महत्या कर ली।
पुलिस ने बीएननएस की धारा 194 के तहत मामला दर्ज कर लिया है। सुकांत को खोजने के लिए पुलिस ने कोच्चि और मलप्पुरम में दबिश दी, लेकिन वह नहीं मिला। जाँच को आगे बढ़ाने के लिए पेट्टा पुलिस केरल से बाहर भी जाएगी और सुकांत के परिचितों एवं रिश्तेदारों से पूछताछ करेगी। इसके अलावा महिला आईबी अधिकारी और सुकांत के बीच हुए वित्तीय लेनदेन की भी पड़ताल कर रही है।
झारखंड की राजधानी राँची में सरना पंथ के त्योहार सरहुल के आयोजन पर इस्लामी हमला किया गया है। बता दें कि सरहुल जनजातीय समाज के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसमें प्रकृति की पूजा की जाती है और स्त्री-पुरुष आग गोल-गोल घूमते हुए नृत्य करते हैं। जहाँ तक ताज़ा घटना की बात है, पिठोरिया थाना क्षेत्र के हेठबालू में मंगलवार (1 अप्रैल, 2025) को शाम क़रीब सधी 4 बजे शोभा यात्रा निकल रही थी, इसी दौरान ये हमला हुआ। घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, वहीं घटनास्थल पर पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है।
जनजातीय समाज ने इस मामले में प्राथमिकी भी दर्ज कराई है और आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की है। घटना का कारण ये है कि मुस्लिम समाज के लोगों ने सड़क के दोनों तरफ बिजली की लड़ियाँ लगाई हुई थीं। इसी दौरान जनजातीय समाज ने सरहुल के मौके पर वहाँ सरना झंडा लगाया। एक दिन पूर्व भी दोनों पक्षों के बीच इसे लेकर तनातनी हुई थी। मंगलवार को जब सरहुल मनाने के लिए जनजातीय समाज के लोग यहाँ पहुँचे तो एक बार फिर से झड़प हुई। बहस के बाद मारपीट शुरू हो गई। लाठी-डंडे निकल आए, ईंट-पत्थर चलने लगे।
सरहुल शोभायात्रा का नेतृत्व कर रहे पाहन सहित 8 लोग इस हिंसा में घायल हुए हैं। वहीं मुस्लिम समाज का कहना है कि उनकी तरफ भी 4 लोगों को चोटें आई हैं। घायलों में नगदेव पाहन, रवि मुंडा, करण मुंडा, संदीप मुंडा, अरविंद मुंडा, अजय मुंडा और विजय मुंडा शामिल हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मारपीट के दौरान आरिफ अंसारी ने हथियार लहराए। उसे पकड़ के पुलिस को सौंप दिया गया है, लेकिन पुलिस ने अभी तक आरोपों की पुष्टि नहीं की है। घटना के बाद पंचायत प्रमुख और उप-प्रमुख जैसे नेताओं के अलावा DSP व थाना प्रभारी जैसे पुलिस अधिकारी मौके पर पहुँचे।
डीएसपी अमर कुमार पांडेय का कहना है कि साज-सज्जा को लेकर दोनों पक्षों में झड़प हुई थी। उन्होंने समझा-बुझाकर मामले को शांत किए जाने की जानकारी देते हुए बताया कि फ़िलहाल स्थिति नियंत्रण में है। उधर पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने भी इस मामले को सोशल मीडिया के जरिए उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शासनकाल में समुदाय विशेष का दुस्साहस बढ़ गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन न तो सरना स्थलों की रक्षा कर पा रहे हैं, न ही सरहुल उत्सव की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहे हैं।
हेमंत सोरेन के शासन में समुदाय विशेष का दुस्साहस इतना बढ़ गया है कि कल रांची के पिठौरिया में सरहुल पर्व के उत्सव में बाधा पहुंचाई गई और पवित्र झंडे का अपमान किया गया।@HemantSorenJMM जी, फिर एक नौटंकी करिये। जैस आपने पहले सरना स्थल आंदोलनकारियों पर मुक़दमा दर्ज कराया, फिर कारवाई… pic.twitter.com/kTh8ngw1Ny
बाबूलाल मरांडी ने कहा, “हेमंत सोरेन जी, फिर एक नौटंकी कीजिए – जैसे आपने पहले सरना स्थल आंदोलनकारियों पर मुक़दमा दर्ज कराया, फिर कारवाई रोक कर वाहवाही बटोरने का प्रयास किया। ठीक उसी तरह अब जनजातियों से से प्राथमिकी दर्ज कराइए, फिर उसे निरस्त कर वाहवाही बटोरिए। और ऐसे ही कुटिल राजनीति के माध्यम से जनजातीय समाज को बेवक़ूफ़ बनाकर भ्रमित करते रहिए।” बाबूलाल मरांडी ने सरहुल जुलूस में बाधा उत्पन्न करने वाले उपद्रवियों पर बिना विलंब सख्त कारवाई करने की अपील राँची पुलिस से की है।
निधन के लगभग 6 महीने बाद टाटा समूह के पूर्व अध्यक्ष रतन टाटा की वसीयत को लेकर ख़बर सामने आई है। रतन टाटा की वसीयत में हर किसी के लिए कुछ न कुछ सौगात शामिल है। यहाँ तक कि वसीयत में रसोइया राजन शॉ और सुब्बैया और उनके पालतू कुत्ते टीटो का भी हिस्सा तय किया गया है। उनकी वसीयत 23 फरवरी, 2022 को ही तैयार कर ली गई थी। वसीयत में परिवार, दोस्त, चैरिटिबल फाउंडेशन समेत सभी का हिस्सा तय है।
रतन टाटा की वसीयत के अनुसार, मुंबई के जुहू में स्थित 13 हजार वर्गफुट का दो मंजिला घर, अलीबाग में समुद्र किनारे का बँगला और 350 करोड़ रुपए से अधिक के फिक्स्ड डिपॉजिट को परोपकारी कार्यों में लगाया जाएगा।
‘इकोनॉमिक टाइम्स‘ की रिपोर्ट के अनुसार, रतन टाटा ने अपनी संपत्ति का लगभग एक तिहाई हिस्सा, यानी लगभग 3800 करोड़ रुपए दान कर दिए हैं। इसके अलावा ‘रतन टाटा एडोमेंट फाउंडेशन’ (RTEF) जैसी चैरिटी संगठनों के लिए भी अपनी व्यक्तिगत संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा रतन टाटा ने दिया है। इसमें ‘टाटा संस’ की 0.82% हिस्सेदारी शामिल है।
रतन टाटा की 10,000 करोड़ रुपए की अनुमानित संपत्ति के बँटवारे के लिए प्रोबेट की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रोबेट का अर्थ है कि मृत व्यक्ति की वसीयत की वैधता को न्यायालय में प्रमाणित करना और उसके बाद वसीयत के अनुसार संपत्ति के लिए नामित व्यक्ति को उसका अधिकार देना। उनकी मृत्यु 9 अक्टूबर, 2024 को हुई थी।
परिवार को मिला हिस्सा
रतन के भाई जिम अविवाहित हैं। उन्हें जुहू बँगले का एक हिस्सा दिया गया है। उनकी हिस्सेदारी काफी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा सौतेली बहन शिरीन और डिनना जेजीभॉय को एक अन्य वित्तीय संपत्ति का लगभग एक तिहाई हिस्सा मिला है। इसके तहत लगभग 800 करोड़ रुपए की वैल्यू के बैंक की FD व पेंटिंग्स समेत अन्य चीजें शामिल हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, वसीयत में टाटा समूह की पूर्व कर्मचारी मोहिनी दत्ता को भी एक तिहाई हिस्सा मिला है। सौतेले भाई नोएल टाटा को ‘टाटा ट्रस्ट’ का चेयरमैन बनाया गया है। इसके अलावा रतन टाटा के सबसे करीबी सहयोगी और दोस्त शांतनु नायडू को स्टार्टअप ‘गुडफेलोज’ में टाटा की हिस्सेदारी मिली है। शांतनु, रतन टाटा के निजी सहायक रहे और ‘टाटा ट्रस्ट्स’ में डिप्टी जनरल मैनेजर हैं। रतन टाटा की सेक्रेटरी दिलनाज गिल्डर को ₹10 लाख रुपए मिलेंगे।
पालतू जानवर को भी मिली जगह
रतन टाटा की संपत्ति में से उनके रसोइए सुब्बैया को ₹30 लाख मिलेंगे, वहीं रसोई के ही राजन शॉ और उनके परिवार के लिए ₹50 लाख की राशि नामित की गई है। राजन को ही पालतू कुत्ते टीटो की देखभाल का जिम्मा भी दिया है। इसके अलावा ₹12 लाख रुपए की राशि उनके सभी पालतू जानवरों की देखभाल के लिए दिए हैं। इसमें से हर तीन महीने ₹30 हजार रुपए का खर्च निर्धारित किया गया है।