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सरकारी प्रॉपर्टी पर नहीं कर सकेंगे दावा, बोर्ड में होंगे गैर मुस्लिम भी, खैरात देने के लिए इस्लाम का 5 साल पालन जरूरी: जानिए वक्फ बिल में क्या-क्या किए गए हैं प्रावधान

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 लगातार चर्चा में है। संसद में इसके पास होने से पहले यह जान लीजिए कि ये पुराने कानून से किस तरह अलग है और इसमें क्या क्या बड़े बदलाव किए गए हैं।

वक्फ अधिनियम, 1995 और वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 के बीच कई महत्वपूर्ण अंतर हैं, जो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, प्रशासन और संरचना में सुधार लाने के उद्देश्य से प्रस्तावित किए गए हैं।

वक्फ अधिनियम 1995 और वक्फ संशोधन विधेयक 2024 के बीच अंतर

वक्फ अधिनियम, 1995 का नाम मूल रूप से ‘वक्फ अधिनियम-1995’ था, जो उस समय के कानून की संरचना और सीमित दायरे को प्रतिबिंबित करता था। यह मुख्य रूप से वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और विनियमन पर केंद्रित था। दूसरी ओर वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 में इस अधिनियम का नाम बदलकर ‘एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास अधिनियम, 1995’ कर दिया गया है।

वक्फ की प्रक्रिया में बदलाव

साल 1995 के अधिनियम में वक्फ का गठन तीन तरीकों से संभव था: घोषणा, उपयोगकर्ता (लंबे समय तक उपयोग के आधार पर) और बंदोबस्ती (वसीयत या दस्तावेज के जरिए)। यह प्रावधान लचीलापन प्रदान करता था, लेकिन अस्पष्टता और दुरुपयोग की संभावना को भी बढ़ाता था, जैसे कि बिना औपचारिक दस्तावेज के संपत्तियों को वक्फ घोषित करना। इसके विपरीत, 2024 के संशोधन विधेयक में ‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’ के प्रावधान को पूरी तरह हटा दिया गया है।

अब वक्फ केवल औपचारिक घोषणा या बंदोबस्ती के जरिए ही बनाया जा सकता है और इसके लिए दानकर्ता को कम से कम पाँच साल से प्रैक्टिसिंग मुस्लिम होना अनिवार्य है। साथ ही यह सुनिश्चित किया गया कि पारिवारिक वक्फ में महिला उत्तराधिकारियों को उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह बदलाव दुरुपयोग को रोकने और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की दिशा में एक कदम है।

सरकारी संपत्ति पर नहीं हो सकेगा दावा

वक्फ अधिनियम-1995 में सरकारी संपत्तियों को वक्फ के रूप में घोषित करने या उन पर दावे को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। इस अस्पष्टता के कारण कई सरकारी और निजी संपत्तियों को वक्फ बोर्डों ने अपने अधिकार क्षेत्र में लेने की कोशिश की, जिससे विवाद बढ़े। उदाहरण के लिए दिल्ली और कर्नाटक में सरकारी भूमि पर दावे देखे गए। वहीं साल 2024 के संशोधन विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि कोई भी सरकारी संपत्ति वक्फ के रूप में मान्य नहीं होगी। यदि ऐसी संपत्ति पर वक्फ का दावा किया जाता है, तो जिला कलेक्टर इसकी जाँच करेगा और राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा। यह प्रावधान सरकारी संपत्तियों पर अनुचित दावों को रोकने और विवादों को कम करने के लिए लाया गया है।

संपत्तियों के सर्वे की प्रक्रिया में बदलाव

साल 1995 के अधिनियम के तहत वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण सर्वेक्षण आयुक्तों और अपर आयुक्तों की जिम्मेदारी थी। हालाँकि इस प्रक्रिया में देरी, विशेषज्ञता की कमी और समन्वय का अभाव आम समस्याएँ थीं, जिसके कारण कई राज्यों में सर्वे अधूरा रहा। इसके उलट साल 2024 के विधेयक में सर्वेक्षण का दायित्व जिला कलेक्टरों को सौंपा गया है, जो राज्य के राजस्व कानूनों के अनुसार काम करेंगे। यह बदलाव सर्वेक्षण को तेज और अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए किया गया है, क्योंकि कलेक्टरों के पास पहले से ही भूमि रिकॉर्ड और प्रशासनिक संसाधनों तक पहुँच होती है। इससे सर्वेक्षण की गुणवत्ता और समयबद्धता में सुधार की उम्मीद है।

केंद्रीय वक्फ परिषद (CWC) की संरचना

1995 के अधिनियम में केंद्रीय वक्फ परिषद के सभी सदस्यों का मुस्लिम होना अनिवार्य था, जिसमें कम से कम दो महिलाओं को शामिल करने का प्रावधान था। यह संरचना समुदाय-केंद्रित थी, लेकिन इसमें विविधता और बाहरी दृष्टिकोण की कमी थी। 2024 के संशोधन विधेयक में CWC की संरचना में बदलाव करते हुए दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रस्ताव है। अब सांसदों, पूर्व न्यायाधीशों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए मुस्लिम होना जरूरी नहीं होगा, हालाँकि मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधि, इस्लामी कानून के विद्वान और वक्फ बोर्डों के अध्यक्ष जैसे सदस्यों के लिए यह शर्त बरकरार रहेगी। इसके अलावा मुस्लिम सदस्यों में से दो महिलाएँ होना अनिवार्य रहेगा। यह बदलाव समावेशिता और प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने के लिए किया गया है।

राज्य वक्फ बोर्ड (SWB) की संरचना

साल 1995 के अधिनियम में राज्य वक्फ बोर्ड में दो निर्वाचित मुस्लिम सांसद, विधायक या बार काउंसिल सदस्य शामिल होते थे और कम से कम दो महिलाओं की नियुक्ति अनिवार्य थी। यह संरचना सीमित थी और इसमें विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं था। 2024 के विधेयक में SWB को अधिक विविध बनाया गया है। अब राज्य सरकार दो गैर-मुस्लिम सदस्यों, शिया, सुन्नी, बोहरा, आगाखानी, और पिछड़े वर्ग के मुस्लिम समुदायों से एक-एक प्रतिनिधि को नामित करेगी। साथ ही कम से कम दो मुस्लिम महिलाओं की नियुक्ति की शर्त बरकरार रहेगी। यह बदलाव बोर्ड को अधिक समावेशी और संतुलित बनाने का प्रयास है, ताकि विभिन्न हितधारकों की आवाज सुनी जा सके।

वक्फ न्यायाधिकरण की संरचना और अपील

1995 के अधिनियम में वक्फ न्यायाधिकरण में एक जज, अपर जिला मजिस्ट्रेट और मुस्लिम कानून का विशेषज्ञ शामिल होता था। इसके फैसलों को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की सीमित संभावना थी, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित होती थी। 2024 के संशोधन विधेयक में न्यायाधिकरण की संरचना में बदलाव किया गया है। अब इसमें मुस्लिम कानून के विशेषज्ञ को हटाकर जिला न्यायालय के जज (अध्यक्ष) और एक संयुक्त सचिव स्तर के राज्य सरकार के अधिकारी को शामिल किया जाएगा। इसके अलावा न्यायाधिकरण के फैसलों के खिलाफ 90 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में अपील की अनुमति दी गई है। यह बदलाव विवाद समाधान को अधिक निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने के लिए है।

केंद्र सरकार की शक्तियाँ

साल 1995 के अधिनियम में केंद्र सरकार की शक्तियाँ अपेक्षाकृत सीमित थीं। राज्य सरकारें वक्फ खातों का ऑडिट कर सकती थीं, लेकिन केंद्र का कोई प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं था। इसके विपरीत, 2024 के संशोधन विधेयक में केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। अब केंद्र को वक्फ पंजीकरण, खातों, और लेखा परीक्षा (CAG या नामित अधिकारी के जरिए) से संबंधित नियम बनाने का अधिकार होगा। यह प्रावधान केंद्रीकृत निगरानी और वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है, ताकि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन अधिक व्यवस्थित हो सके।

पुरानी मस्जिदों, दरगाहों, मजहबी स्थलों से छेड़छाड़ नहीं

सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार ने साफ कर दिया है कि पुरानी मस्जिदों, दरगाहों या किसी भी मुस्लिम मजहबी स्थल से छेड़छाड़ नहीं होगी। यह सुझाव सहयोगी दल जेडीयू ने दिया था, जिसे बीजेपी ने मान लिया। इसका मतलब है कि यह कानून पुरानी तारीख से लागू नहीं होगा। लेकिन दूसरी तरफ वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ाने का फैसला कई लोगों को नागवार गुजर रहा है। धारा 11 के तहत अब दो गैर-मुस्लिम सदस्य (हिंदू या अन्य धर्मों के लोग) बोर्ड में शामिल हो सकते हैं। साथ ही, राज्य सरकार का एक अधिकारी भी इसमें होगा।

कम से कम 5 साल इस्लाम का पालन

विवाद की एक और बड़ी वजह है बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या का प्रस्ताव, जिसे बिल में शामिल कर लिया गया। इसके मुताबिक, कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति वक्फ में तभी खैरात (दान) कर सकेगा, जब वह कम से कम 5 साल से इस्लाम का पालन कर रहा हो। साथ ही दी गई संपत्ति में धोखाधड़ी न हो, इसका सबूत भी देना होगा।

ट्रिब्यूनल में बदलाव

वक्फ ट्रिब्यूनल में भी बदलाव हुआ है। पहले इसमें दो सदस्य होते थे, लेकिन अब तीसरा सदस्य एक इस्लामिक स्कॉलर होगा। पहले कलेक्टर वक्फ संपत्तियों की जाँच करता था, लेकिन अब यह जिम्मा किसी वरिष्ठ अधिकारी को दिया जाएगा, जिसे राज्य सरकार चुनेगी। वक्फ संपत्तियों की सूची को गजट में छपने के 90 दिनों के अंदर ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट करना होगा, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

जेपीसी की सिफारिशों को किया गया शामिल

इस बिल को तैयार करने में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की सिफारिशों का बड़ा हाथ है। जेपीसी ने 36 बैठकें कीं, 10 शहरों में दौरे किए और 97 लाख से ज्यादा ज्ञापन हासिल किए। मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद से लेकर पटना और लखनऊ तक, समिति ने हर कोने से लोगों की राय ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलमा-ए-हिंद और दारुल उलूम देवबंद जैसे संगठनों से भी बात हुई। सरकार का कहना है कि यह बिल वक्फ संपत्तियों को डिजिटल बनाने, सर्वे को तेज करने और गरीबों के कल्याण के लिए है।

इन सबके बीच सवाल यह है कि क्या यह बिल वाकई वक्फ संपत्तियों का भला करेगा? देश में करीब 5,973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ घोषित करने के मामले सामने आए हैं। आँकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2024 तक, 25 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के वक्फ बोर्डों के आँकड़ों से पता चलता है कि 5,973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ घोषित किया गया है। इनमें से कुछ के उदाहरण देख सकते हैं…

सितंबर 2024 में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार, 108 संपत्तियाँ भूमि और विकास कार्यालय के नियंत्रण में हैं, 130 संपत्तियाँ दिल्ली विकास प्राधिकरण के नियंत्रण में हैं और सार्वजनिक डोमेन में 123 संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया है और मुकदमेबाजी में लाया गया है।

वक्फ घोषित की गई अन्य गैर-मुस्लिम संपत्तियों के उदाहरण

तमिलनाडु: थिरुचेंथुरई गाँव का एक किसान वक्फ बोर्ड के पूरे गाँव पर दावे के कारण अपनी जमीन नहीं बेच पाया। इस अप्रत्याशित आवश्यकता ने उसे अपनी बेटी की शादी के लिए लोन चुकाने के लिए अपनी जमीन बेचने से रोक दिया।

गोविंदपुर गाँव, बिहार: अगस्त 2024 में, बिहार सुन्नी वक्फ बोर्ड के पूरे एक गाँव पर दावे ने सात परिवारों को प्रभावित किया, जिसके कारण पटना उच्च न्यायालय में मामला चला। मामला विचाराधीन है।

केरल: सितंबर 2024 में, एर्नाकुलम जिले के लगभग 600 ईसाई परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति में अपील की है।

कर्नाटक: वक्फ बोर्ड द्वारा विजयपुरा में 15,000 एकड़ जमीन को वक्फ भूमि के रूप में नामित किए जाने के बाद किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया। बल्लारी, चित्रदुर्ग, यादगीर और धारवाड़ में भी विवाद हुए। हालाँकि सरकार ने आश्वासन दिया कि कोई बेदखली नहीं होगी। इसके साथ ही कर्नाटक में 40 वक्फ संपत्तियों को अधिसूचित किया गया, जिनमें कृषि भूमि, सार्वजनिक स्थान, सरकारी भूमि, कब्रिस्तान, झीलें और मंदिर शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश और पंजाब: यूपी वक्फ बोर्ड द्वारा कथित भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के खिलाफ शिकायतें की गई हैं। तो पंजाब वक्फ बोर्ड ने पटियाला में शिक्षा विभाग की भूमि पर दावा किया है।

नए बिल में कलेक्टर से ऊपर के अधिकारी को संपत्तियों की जाँच का अधिकार दिया गया है, ताकि गलत दावों पर लगाम लगे। बहरहाल, गरीबों के लिए भी इस बिल से उम्मीदें हैं। डिजिटल पोर्टल से वक्फ संपत्तियों की निगरानी होगी, जिससे कुप्रबंधन और अतिक्रमण रुकेगा। इससे होने वाली आय को शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे कल्याणकारी कामों में लगाया जाएगा। लेकिन गैर-मुस्लिम सदस्यों की मौजूदगी और इस्लाम पालन की शर्त जैसे मुद्दों पर बहस छिड़ी हुई है।

Tesla की गाड़ियों पर हमले के पीछे नाजी चिह्न, लेकिन एलन मस्क बता रहे ‘स्वस्तिक’: जानिए हिन्दू प्रतीक से कैसे अलग है ईसाई ‘हेकेनक्रूज़’

अमेरिकी वाहन निर्माता टेस्ला की गाड़ियों और उसके सुपरचार्जर नेटवर्क पर बीते कुछ दिनों से हमले हो रहे हैं। उनको अमेरिका के अलग अलग हिस्सों में निशाना बनाया जा रहा है। यहाँ तक ​​कि यूरोप में भी हमले हुए हैं। मस्क के खिलाफ यह हमले ट्रम्प प्रशासन में सरकारी कामकाज में किफायत लाने वाले (DOGE) के प्रमुख के रूप में उनकी भूमिका के चलते किए गए हैं।

इन हमलों को मस्क के विरोध का नाम दिया जा रहा है। 31 मार्च को एक्स पहले ट्विटर) पर मस्क ने एक वीडियो पर प्रतिक्रिया दी। इसमें एक टेस्ला मालिक एक ऐसे आदमी से भिड़ता हुआ दिखाई दे रहा था जिसने उसकी टेस्ला EV पर नाजी चिह्न लगा दिया था।

इसका विरोध करने के लिए किए गए ट्वीट में मस्क ने इसे नाजी निशान हुक्ड क्रॉस बताने के बजाय इसे ‘स्वास्तिक’ कहा। मस्क ने एक्स पर लिखा, “जो कोई भी टेस्ला पर स्वास्तिक बनाता , उसने स्पष्ट रूप से घृणित अपराध किया है।”

बढ़ रहा टेस्ला विरोध का विरोध

टेस्ला कारों पर हमलों का सिलसिला सिर्फ़ अमेरिका तक सीमित नहीं रहा है। उन पर इटली में भी हमले हुए हैं। हाल ही में रोम में टेस्ला डीलरशिप के भीतर 17 वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। एलन मस्क ने इन हमलों की निंदा ‘आतंकवाद’ बता कर किया है।

इसके अलावा स्वीडन के स्टॉकहोम और माल्मो में, दो टेस्ला स्टोर में तोड़फोड़ की गई। फ्रांस में भी हाल ही में सेंट चामोंड में पार्किंग स्थल में 12 टेस्ला इलेक्ट्रिक सुपरचार्जर को आग लगा दी गई। अमेरिका में भी मस्क की कम्पनी की गाड़ियों को तोड़ाफोड़ा है।

इससे पहले भी, टेस्ला को लेकर हमले हुए हैं। ऐसी ही एक घटना में, कोलोराडो में एक महिला को टेस्ला डीलरशिप में आग लगाने की कोशिश करने के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था। इसके अलावा ओरेगन में टेस्ला के डीलरशिप पर गोलीबारी की गई।

टेस्ला विरोधी आंदोलन को तब और हवा मिली जब मस्क ने यूरोप के देशों में घोर दक्षिणपंथी दलों को समर्थन दिया। इस बीच टेस्ला EV की बिक्री यूरोप में 49% कमी देखी गई है। हाल में मस्क ने आरोप लगाया था कि फंड जुटाने वाला प्लेटफॉर्म एक्टब्लू टेस्ला विरोधी प्रदर्शनों को भड़काने में शामिल था।

नाज़ी हेकेनक्रूज़ और स्वास्तिक के बीच अंतर

हिन्दुओं के लिए पवित्र स्वास्तिक और नाजी घृणा चिह्न हेकेनक्रूज़ के बीच बहुत बड़ा अंतर है। स्वास्तिक में ‘सु’ का अर्थ ‘अच्छा’ और ‘अस्ति’ का अर्थ ‘होना’ होता है। दूसरे शब्दों में, कल्याण। यह लगभग 6,000 साल पहले चट्टान और गुफाओं में बने हुए चित्र से जुड़ा है।

विद्वान भी इस बात पर सहमत हैं कि इसकी उत्पत्ति भारत में हुई थी। यह चिह्न हिंदुओं, बौद्धों और जैनियों के अलावा वाइकिंग्स और यूनानियों सहित अन्य प्राचीन संस्कृतियों के लिए सौभाग्य, समृद्धि और सभी शुभ चीजों का प्रतीक रहा है।

नाजी निशाना हेकेनक्रूज (बाएँ) और हिन्दू प्रतीक चिह्न स्वास्तिक

हिंदू परंपरा में, स्वास्तिक की भुजाओं के मोड़ के बाद सीधी रेखा को सरूप्य (ईश्वर के जैसा रूप होना), सालोक्य (ईश्वर वाले ही विश्व में होना), सामीप्य (ईश्वर के निकट होना) और सायुज्य (ईश्वर के जैसा रूप होना) कहा जाता है। ये दिव्य मिलन के विभिन्न स्तरों को दर्शाते हैं।

स्वास्तिक का उल्लेख सबसे पहले वेदों में किया गया था और यह सूर्य और सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जैसी चीजों का प्रतीक है। इसे शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है और यह सौभाग्य के देवता गणेश का प्रतीक भी है। हिंदू धर्म और जैन धर्म दोनों में, स्वास्तिक का उपयोग खाता बही, दरवाजे और दहलीज के शुरुआती पन्नों को चिह्नित करने के लिए किया जाता है।

2013 में, विश्व के सबसे पुराने यहूदी संगठनों में से एक, अमेरिकी यहूदी समिति ने हिंदू, जैन और बौद्ध संस्कृतियों द्वारा शताब्दियों से उपयोग किए जाने वाले स्वास्तिक और इसके नाजी संस्करण के बीच अंतर को स्पष्ट किया गया। वर्ष 2021 में, ओरेगन शिक्षा विभाग ने इस अंतर को कानूनी मान्यता दी थी।

पश्चिमी मीडिया लंबे समय से अपनी रिपोर्टों में नाजी हेकेनक्रूज़ के लिए जानबूझकर स्वास्तिक शब्द इस्तेमाल कर रही है, जबकि दोनों एकदम अलग हैं। पश्चिमी मीडिया चाहता है कि हिन्दू निशान को घृणा का प्रतीक माना जाए और इसे हिन्दुओं के विरुद्ध लोगों में क्रोध फैले।

मस्क की गलती का हिन्दुओं को उठाना पड़ सकता है नुकसान

एलन मस्क द्वारा नाजी निशान को स्वास्तिक कहना संस्कृति के विषय में जानकारी ना होने और असंवेदनशीलता का मामला है। एलन मस्क ने उस नाजी हेकेनक्रूज़ को समृद्धि के निशान स्वास्तिक बता दिया, जो यहूदियों के प्रति घृणा और नरसंहार का प्रतीक था। मस्क को टेस्ला वाहनों पर हमले का विरोध करने की पूरी छूट है, लेकिन इसमें स्वास्तिक घसीटना ठीक नहीं है।

एलन मस्क ने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है जब हिंदू और भारतीय अमेरिकी पहले से ही अमेरिका में घृणा का सामना कर रहे हैं। अमेरिका में हिंदूफोबिया भी बीते दिनों में बढ़ा है। अगर हिन्दुओं को लोग धोखे से नाजी समर्थक पाते हैं, तो उन पर खतरा और बढ़ेगा।

‘कमलेश तिवारी मौत का हकदार…’: जिसके Video के बाद रेता गया हिन्दू नेता का गला, नागपुर दंगों का भी वह मास्टरमाइंड: जानिए कौन है सैयद आसिम अली

नागपुर में 17 मार्च, 2025 को हुए दंगे हाल के वर्षों में घटी सांप्रदायिक हिंसा की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक हैं। हंसापुरी में अफवाह उड़ाई गई कि औरंगजेब की कब्र को हटाने के विरोध में चल रहे प्रदर्शन में हिंदू समूह ने कुरान जला दिया है। इसके बाद वहां इस्लामी कट्टरपंथियों ने दंगा शुरू कर दिया। 100 से भी अधिक वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। हिंदुओं की घरों और दुकानों की पहचान कर उनमें तोड़फोड़ और आगजनी की गई

इस दंगे में सैयद असीम अली का नाम सामने आया है। इसके ऊपर आरोप है कि 2019 में लखनऊ में हिंदू नेता कमलेश तिवारी की हत्या का सूत्रधार था। सीसीटीवी में भी असीम दंगे से जुड़ी गतिविधियों में शामिल दिखा। असीम को पुलिस नागपुर हिंसा का दूसरा मास्टरमाइंड मान रही है। सैयद असीम इस समय फरार है और पुलिस उसकी तलाश में दबिश दे रही है।

नागपुर हिंसा में पुलिस ने माइनॉरिटी डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) के शहर अध्यक्ष फहीम शमीम खान को गिरफ्तार किया गया था। उस पर भीड़ को हिंदुओं के खिलाफ भड़काने का आरोप है। जाँच में फहीम खान के सैयद असीम अली के साथ भी संपर्क में रहने के सबूत मिले हैं। इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स की मानें तो सैयद असीम अली हिंसा होने से कुछ समय पहले गणेश पेठ पुलिस थाने के आसपास इस्लामी कट्टरपंथियों को इकट्ठा करते हुए सीसीटीवी में कैद हुआ है।

कमलेश तिवारी हत्याकांड में सैयद असीम की भूमिका

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 18 अक्टूबर, 2019 को हिंदू महासभा के पूर्व नेता व ‘हिंदू समाज पार्टी’ के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की उनके घर पर बने कार्यालय में बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कमलेश तिवारी की हत्या के बाद सैयद असीम ने एक वीडियो भी अपलोड किया था। इसमें उसने हत्या को सही ठहराया था। आरोप था कि वह कमलेश के हत्यारों के संपर्क में था। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी।

नागपुर पुलिस आयुक्त रविंद्र कुमार सिंघल ने बताया कि सैयद असीम का इस हिंसा से जुड़ाव के कुछ सुबूत मिले हैं। उसकी तलाश के लिए टीमें बनाईं गईं हैं। नागपुर हिंसा की जाँच जारी है और पुलिस ने अब तक 100 से भी अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। इसके अलावा फहीम खान को इस दंगे का मुख्य आरोपित बनाया गया है। उस पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया है।

कौन है सैयद असीम अली?

सैयद असीम अली एमडीपी का पूर्व प्रत्याशी रह चुका है। 2019 में वह लोकसभा चुनाव में नितिन गडकरी के खिलाफ खड़ा हुआ, लेकिन उसे सिर्फ 600 वोट ही मिले थे। कमलेश तिवारी हत्याकांड में नाम सामने आने के बाद उसे गिरफ्तार किया गया। बाद में 2024 में उसे जमानत मिल गई। अली हमेशा से ही इस्लामी कट्टरपंथियों खासतौर पर मुस्लिम युवाओं को लामबंद करने में सक्रिय रहा। नागपुर हिंसा के बाद वह फरार हो गया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, 2017 में असीम ने ह्यूमैनिटी डेमोक्रेटिक पार्टी (HDP) बनाई। इस बैनर के तले उसने एक वीडियो जारी किया जिसमें उसने कहा था, “कमलेश तिवारी अपनी मौत के करीब है, सिर्फ मौत का हकदार है।” वीडियो के जरिए ईशनिंदा के नाम पर उनकी हत्या के लिए भड़काया गया था। लखनऊ कोर्ट ने असीम को आरोप गंभीर होने और सांप्रदायिक साजिश से गहरा संबंध होने के चलते 2020 में बेल देने से मना कर दिया था।

सेशन कोर्ट में अपनी जमानत याचिका में सैयद असीम ने ख़ुद को ‘विचारधारा के प्रचारक’ की तरह वर्णित किया। प्रॉसिक्यूशन ने यह भी कहा कि कमलेश के हत्यारे अश्फाक और मोइनुद्दीन वीडियो देखने के बाद उनसे जुड़े।

गंभीर आरोपों के बावजूद मिल गई बेल

असीम ने बेल के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया लेकिन वहाँ भी ‘गंभीर सांप्रदायिक घृणा’ के आरोपों के आधार पर बेल नहीं मिली। इसके बाद जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को नकारते हुए उसे बेल दे दी। सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच का मानना था कि भले ही वह हत्यारों के सीधे संपर्क में रहा हो, उन्हें कानूनी सहायता देना चाहता हो लेकिन उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामले नहीं हैं। ऐसे में उसे बेल दे दी गई।

सोशल मीडिया पर सक्रिया है असीम

बेल मिलने के तीन महीने के अंदर ही 2 अक्बटूर, 2024 को असीम ने वीडियो जारी कर अपनी वापसी की जानकारी दी। अब भी असीम के फेसबुक और इंस्टाग्राम पेज सक्रिय हैं।

इसके अलावा वह चंद्रशेखर आजाद की ‘आजाद समाज पार्टी’ के संपर्क में था और कयास लगाए जा रहे थे कि वह पार्टी से जुड़ सकता है। 13 जनवरी को उसने खुद वीडियो डालकर चर्चा की पुष्टि की।

ऑपइंडिया ने असीम के फेसबुक पेज का 2018 का वह वीडियो भी खोज निकाला जिसमें उसने कमलेश तिवारी के मर्डर की बात खुलेआम कही थी। हत्या में अहम रोल होने के बावजूद आजाद समाज पार्टी ने उससे जुड़ने का निर्णय लिया।

रोज 10-12 किलोमीटर पैदल चल रहे अनंत अंबानी, 140 km चलकर द्वारकाधीश के करेंगे दर्शन: युवाओं से कहा – आस्था रखिए, सारी बाधा पार होगी

देश के सबसे अमीर उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी गुजरात के जामनगर से द्वारकाधीश मंदिर तक पदयात्रा पर हैं। वे रोज़ाना 10 से 12 किलोमीटर पैदल चलते हैं। रास्ते में मंदिरों के दर्शन भी करते हैं। लगातार पाँच दिन की पदयात्रा कर 60 किलोमीटर की दूरी तय कर चुके हैं। बता दें कि जामनगर में उनके घर से द्वारका की दूरी 140 किमी है।

ANI से बातचीत में अनंत अंबानी ने कहा, “पदयात्रा जामनगर में हमारे घर से द्वारका तक है। यह पिछले 5 दिनों से चल रही है और हम अगले 2-4 दिनों में पहुँच जाएँगे। मेरी पदयात्रा जारी है। भगवान द्वारकाधीश हमें आशीर्वाद दें।”

अनंत अंबानी ने युवाओं के लिए मैसेज भी शेयर किया। उन्होंने कहा, “मैं युवाओं से कहना चाहूँगा कि भगवान द्वारकाधीश में आस्था रखें और कोई भी काम करने से पहले भगवान द्वारकाधीश को याद करें। वह काम बिना किसी बाधा के अवश्य पूरा होगा और जब भगवान मौजूद हैं तो चिंता करने की कोई बात नहीं है।”

रिलायंस इंडस्ट्रीज के डायरेक्टर अनंत अंबानी की पदयात्रा की वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। वीडियो में अनंत अपनी जेड प्लस सुरक्षा और स्थानीय पुलिसकर्मियों के साथ पैदल चल रहे हैं। इस दौरान अभिनेता शिखर पहाड़िया भी उनके साथ हैं।

जन्मदिन से पहले भगवान का लेंगे आशीर्वाद

गौरतलब है कि अनंत अंबानी आगामी 10 अप्रैल को जन्मदिन मनाएँगे। माना जा रहा है कि जन्मदिन से पहले अनंत भगवान द्वारकाधीश का आशीर्वाद लेना चाहते हैं। अगले पाँच दिन में द्वारका पहुँचकर भगवान के दर्शन करेंगे। भगवान द्वारकाधीश की अंबानी परिवार के प्रति खास आस्था है। शुभ काम से पहले पूरा परिवार भगवान के दर्शन जरूर करता है।

बचपन से बीमारी ने जकड़ा

अंबानी परिवार के छोटे बेटे अनंत अंबानी को बहुत कम उम्र से ही ओबेसिटी ने घेर लिया था। अस्थमा का ट्रीटमेंट लेने की वजह से उनकी हालत बिगड़ती चली गई। इसके बाद उनका वजन बढ़ता चला गया। हाल ही में हार्वर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस के दौरान नीता अंबानी ने अपनी स्पीच में छोटे बेटे अनंत अंबानी की सेहत का जिक्र किया था। उन्होंने बताया कि अनंत को जीवन भर मोटापे से संघर्ष करना पड़ा। अनंत ने इन चुनौतियों को पूरे आत्मविश्वास के साथ पार किया है।

अनंत अंबानी देश को ‘वनतारा’ दिया

अनंत अंबानी पशु प्रेमी भी हैं। उन्होंने गुजरात के जामनगर में वाइल्ड लाइफ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर यानी वनतारा की स्थापना की। मार्च 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वनतारा का उद्घाटन किया। वनतारा को भारत सरकार की ओर से पशु कल्याण के क्षेत्र में ‘कॉरपोरेट’ कैटेगरी में भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘प्राणी मित्र’ राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

बता दें कि अनंत अंबानी मार्च 2020 से जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड, मई 2022 से रिलायंस रिटेल वेंचर्स लिमिटेड और जून 2021 से रिलायंस न्यू एनर्जी लिमिटेड और रिलायंस न्यू सोलर एनर्जी लिमिटेड के बोर्ड में निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।

‘ये हिंदू है, मारो सा@ को’: VHP कार्यकर्ता को अकेला देख ईद पर शराब पी रहे मुस्लिमों ने चाकुओं से गोदा, अलीगढ़ की घटना- 2 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में ईद पर शराब पी रहे मुस्लिमों ने एक विश्व हिन्दू परिषद (VHP) कार्यकर्ता पर जानलेवा हमला किया। हिन्दू व्यक्ति ने मुस्लिम युवकों को शराब पीने से रोका था। मुस्लिमों ने पूरे शरीर पर चाकू मारे और उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। पीड़ित हिन्दू का इलाज चल रहा है। मामले में FIR दर्ज करवाई गई है।

यह घटना अलीगढ़ के छर्रा थाना क्षेत्र के सलगवाँ गाँव में हुई है। इस मामले में पीड़ित विकास सिंह के मामा ने बताया है कि उनका भांजा ईद (31 मार्च, 2025) के दिन काम निपटा कर गाँव आ रहा था। गाँव के ही मोड़ पर उसे 3-4 लोग शराब पीते हुए दिखाई दिए।

विकास ने उन्हें सार्वजनिक स्थल पर शराब पीने से मना किया। इसके बाद मुस्लिम भड़क गए। उनमें से एक अमन ने विकास का नाम पूछा। विकास ने जब अपना नाम बताया तो अमन ने कहा कि यह व्यक्ति हिन्दू है और इसे मारो। इसके बाद अमन ने अपने साथी फरहत और अरबाज के साथ मिलाकर हमला कर दिया।

उन्होंने विकास को पकड़ कर चाकू मारे। इससे विकास गंभीर रूप से घायल हो गया। विकास इसके बाद किसी तरह यहाँ से बच कर निकला। उसके मामा ने बताया है कि मुस्लिम विकास को जान से मार देना चाहते थे। इसके बाद विकास को अस्पताल ले जाया गया। विकास को इस हमले में गंभीर चोटें आई हैं।

मामले में छर्रा थाने में FIR लिखवाई गई है। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी मौजूद है। पीड़ित विकास को गंभीर चोटों के चलते अलीगढ़ के एक अस्पताल रेफर किया गया है। मामले में अब पुलिस कार्रवाई कर रही है। उसने 2 मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार भी किया है।

मामले में छर्रा थाना CO धनंजय कुमार ने बताया है कि इस संबंध में FIR दर्ज कर ली गई है और 2 मुख्य आरोपितों को हिरासत में लिया गया है और उन्हें जेल भेजा जा रहा है। पुलिस ने बताया है कि वह अब आगे की कार्रवाई कर रही है।

ऑपइंडिया ने इस विषय में विश्व हिन्दू परिषद के बृज प्रांत के मीडिया प्रभारी प्रतीक रघुवंशी से भी बात की। उन्होंने बताया कि पीड़ित विश्व हिन्दू परिषद का कार्यकर्ता है और उस पर हमला करने वाले मुस्लिम उसे पहले से जानते रहे हैं। प्रतीक रघुवंशी ने बताया कि पीड़ित ड्राइवर का काम करता है और मुस्लिम उस पर शराब पीने से रोके जाने के चलते हमला किया।

प्रतीक रघुवंशी ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई किए जाने की माँग की है। उन्होंने कहा है कि विश्व हिन्दू परिषद इस मामले में कार्रवाई ना होने पर सड़कों पर भी उतरेगा।

लतीफ आतंकियों को देता है पनाह, शंकर लाल का परिवार पैसे ठुकरा पुलिस को देता है सूचना: कश्मीर की वो कहानी जो लिबरल मीडिया आपको कभी नहीं बताएगी

जम्मू-कश्मीर के कठुआ में सुरक्षाबलों ने जैश-ए-मोहम्मद के तीन आतंकियों को घेर लिया है। यह कठुआ इलाके में बीते लगभग एक सप्ताह में तीसरी मुठभेड़ है। इससे पहले मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने 2 आतंकी मार गिराए थे। सेना, जम्मू कश्मीर पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) संयुक्त रूप से यह ऑपरेशन चला रहे हैं।

सोमवार (31 मार्च, 2025) रात को सुरक्षाबल और आतंकियों के बीच मुठभेड़ चालू हुई है। सुरक्षाबलों को इस एनकाउंटर से पहले इस इलाके में आतंकियों के छुपे होने की जानकारी मिली थी। यह ऑपरेशन मंगलवार सुबह भी जारी है। एक आतंकी के मारे जाने की भी सूचना है।

बताया गया है कि यहाँ पंजतीर्थी इलाके में आतंकी एक मंदिर के पास छुपे हुए हैं। संभवतः यह आतंकी सफियान इलाके में हुए ऑपरेशन के बाद भाग निकले थे। सेना ने इस इलाके में घेरा डाल दिया है।

सेना ने बताया- 31 मार्च को दिखी थी हलचल

सेना की राइजिंग स्टार कोर, जम्मू कश्मीर ने एक्स (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर इस ऑपरेशन की जानकारी दी है। उन्होंने बताया, “खुफिया सूचनाओं पर कार्रवाई करते हुए, भारतीय सेना, जम्मू कश्मीर पुलिस और CRPF द्वारा पंजतीर्थी, कठुआ में कई घेराबंदी की गई थी। 31 मार्च की रात को यहाँ संदिग्ध गतिविधि देखी गई, जिसके बाद गोलीबारी हुई। 1 अप्रैल 2025 को सुबह होते ही आतंकियों को खोज कर मारने का ऑपरेशन चालू कर दिया गया था। अभी यह ऑपरेशन जारी है।”

जम्मू कठुआ रेंज के DIG शिव कुमार शर्मा ने स्थानीय लोगों से अपील की है कि वे किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत सुरक्षा बलों को दें। उन्होंने कहा, “हमारा बल जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को समाप्त करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। कठुआ में अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक कि आखिरी आतंकवादी को मार नहीं गिराया जाता।”

शंकर लाल ने थाने में दी सूचना

इस इलाके में बीते कुछ दिनों से लगातार आतंकियों की गतिविधियाँ देखी जा रही हैं। वह इस इलाके में खाना-पानी ढूंढ रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने द्रब्बड इलाके में रुई गाँव में शंकर लाल के परिवार के एक घर में घुसकर बूढ़ी महिला से पानी माँगा। वह पानी लेने के बाद रसोई में घुस गए और यहाँ दिन में बनाकर रखी गई रोटियाँ और सब्जी उठा कर ले गए।

पीड़ित परिवार वालों ने इस बीच इन्हें मना किया लेकिन यह आतंकी नहीं माने। महिला ने बताया है कि तीनों में से एक घायल अवस्था में था। महिला ने बताया है इन तीनों ने उससे परिवार के सदस्यों के विषय में पूछताछ की थी। महिला ने उनसे स्पष्ट किया कि खाना अभी बना नहीं है।

आतंकियों ने पानी पीने और रोटी-सब्जी लेने के बाद रसोई के भीतर ₹500 के 2 नोट भी रखे। महिला ने यह नोट नहीं लिए और आतंकियों के हाथ में वापस कर दिए। यह परिवार इसके बाद किसी तरह बच कर थाने पहुँचा। वहाँ इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। इसके बाद सूचना के आधार पर एनकाउंटर चालू हुआ।

लतीफ़ के परिवार ने की आतंकियों की मदद

वहीं इस ऑपरेशन के बीच ही सेना और पुलिस ने यहाँ लतीफ़ नाम के एक शख्स के परिवार के 6 सदस्यों को उठाया है। इन पर 27 मार्च के एनकाउंटर में मारे गए आतंकियों को मदद का आरोप है। आरोप है कि इन्होने उन आतंकियों को खाना-पानी और रुकने की जगह दी।

पुलिस ने जिन लोगों को पकड़ा है, उनमें 4 महिलाएँ हैं। लतीफ़ आतंकियों के ओवर ग्राउंड वर्कर का काम कर चुका है। वह एक आतंकी हमले के मामले में पिछले वर्ष जेल जा चुका है। पुलिस अब इनसे पूछताछ कर रही है।

27 मार्च के एनकाउंटर में मारे गए थे 2 आतंकी

मीडिया से बातचीत के दौरान DIG शर्मा ने बताया कि उन्होंने उन पुलिसकर्मी तारिक अहमद के परिवार से मुलाकात की, जिन्होंने अपने तीन साथियों के साथ 27 मार्च 2025 को कठुआ में आतंकवादियों से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी। उन्होंने इन जवानों की प्रशंसा की।

गौरतलब है कि 5 दिन पहले 27 मार्च 2025 को कठुआ जिले में ही एक एनकाउंटर हुआ था। यह एनकाउंटर लम्बे समय तक चला था। इस एनकाउंटर के दौरान तीन पुलिसकर्मी वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके बाद से लगातार सर्च ऑपरेशन चल रहा है।

गोधरा नरसंहार के चश्मदीद ईसाई शख्स का वो पत्र, जिसने 23 साल पहले ही खोल दी थी साजिश की पोल: पढ़ लें ‘L2: एम्पुरान’ बनाने वाले

गुरुवार (27 मार्च, 2025) को मोहनलाल की मलयालम फिल्म ‘L2: एम्पुरान’ रिलीज़ हुई, लेकिन यह फिल्म कुछ ही घंटों में गंभीर आलोचनाओं का शिकार हो गई। इसका कारण था – फिल्म के भीतर 2002 के गोधरा दंगों का गलत चित्रण किया जाना। फिल्म में हिंदुओं को संवेदनहीन और बेरहम दिखाने के साथ-साथ गोधरा दंगों के संदर्भ में एक हिंदू-विरोधी संदेश भी दिया गया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, फिल्म के एक दृश्य में एक मुस्लिम परिवार को हिंदू दक्षिणपंथी चरमपंथियों द्वारा बर्बरता से मारे जाते हुए दिखाया गया है, जो कि विवाद का कारण बना।

इस भारी आलोचना के बाद, मोहनलाल ने रविवार (30 मार्च, 2025) को एक सार्वजनिक बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने ये स्वीकार किया कि फिल्म के कुछ हिस्सों से उनके कई प्रशंसकों को ठेस पहुँची है। अभिनेता ने यह स्पष्ट किया कि फिल्म में जो कुछ भी गलत तरीके से दिखाया गया, वह हटा दिया जाएगा।

मोहलाल ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, “मुझे यह जानकारी मिली है कि लूसिफ़र फ़्रैंचाइज़ के दूसरे भाग ‘एम्पुरान’ में शामिल कुछ राजनीतिक और सामाजिक प्रसंगों के कारण मेरे कुछ चाहने वाले परेशान हैं।” उन्होंने आगे कहा, “एक कलाकार के तौर पर मेरा यह कर्तव्य है कि मैं यह सुनिश्चित करूँ कि मेरी फिल्मों से किसी भी राजनीतिक विचारधारा, आंदोलन या धार्मिक समूह के खिलाफ नफरत या नकारात्मकता न फैले। इसलिए, मैं और मेरी फिल्म की पूरी टीम इस आपकी इस नाराज़गी के लिए सच्चे दिल से खेद व्यक्त करते हैं और इसकी पूरी जिम्मेदारी लेते हैं। हमने यह निर्णय लिया है कि ऐसे विषयों को फिल्म से हटा दिया जाएगा।”

इस प्रकार मोहनलाल और फिल्म टीम ने अपनी गलती को स्वीकार करते हुए, इस विवाद को शान्त करने के लिए फिल्म में आवश्यक बदलाव करने का निर्णय लिया।

फिल्म ‘L2: एम्पुरान’ में मोहनलाल के सहायक अभिनेता सुकुमारन ने जायद मसूद नामक किरदार को निभाया था, उनके किरदार को गोधरा दंगों से जोड़ा गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फिल्म में गोधरा दंगों से संबंधित कुछ दृश्य को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। खासतौर पर, सुकुमारन के किरदार की पृष्ठभूमि में गोधरा दंगों का संदर्भ दिया गया है, जिसके चलते फिल्म को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है।

इस फिल्म में यह भी दर्शाया गया है कि कैसे 2002 के गोधरा दंगों के दौरान गुजरात की तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी, भाजपा, और उनके नेता नरेंद्र मोदी द्वारा केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया। फिल्म की शुरुआत एक परेशान करने वाले दृश्य से होती है, जिसमें गोधरा दंगों के बाद एक मुस्लिम गाँव को जलाए जाने का दृश्य प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद, फिल्म में कुछ और ग्राफिक और हिंसक दृश्य दिखाए जाते हैं, जिनमें एक मुस्लिम बच्चे को हिंदू पुरुषों द्वारा बेरहमी से पीटे जाते हुए और एक गर्भवती मुस्लिम महिला के साथ हिंसा करते हुए दिखाया गया है।

फिल्म को लेकर चल रहे इस विवाद के बीच, एक पुराना पत्र फिर से सामने आया है, जो जॉर्ज जोसेफ नामक एक ईसाई व्यक्ति ने 2002 में ‘मातृभूमि’ अख़बार में लिखा था। इस पत्र में गोधरा दंगों से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं का जिक्र किया गया था, जो आज भी इस पूरे मुद्दे पर चर्चा का विषय बने हुए हैं।

फिल्म में दिखाए गए इन विवादित दृश्यों ने न केवल दर्शकों बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

पत्र में गोधरा कांड में पूर्व नियोजित साजिश का खुलासा किया

20 अप्रैल, 2002 को, गोधरा ट्रेन अग्निकांड के लगभग दो महीने बाद, जिसमें अयोध्या से लौट रहे 59 हिंदू कारसेवकों की मौत हो गई थी, पझूर के जॉर्ज जोसेफ नामक एक ईसाई व्यक्ति ने ‘मातृभूमि’ डेली को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने घटना के दिन की अपनी आँखों-देखी गवाही दी, जो बाद में मलयालम अखबार में प्रकाशित हुई।

जॉर्ज जोसेफ 12 साल से गोधरा रेलवे स्टेशन के पास एक छोटा व्यवसाय चला रहे थे, और वह 2002 के गोधरा कांड के प्रत्यक्षदर्शी थे। पत्र में जॉर्ज ने उस दिन की घटनाओं का विस्तृत वर्णन किया, जिससे गोधरा कांड की वास्तविक तस्वीर सामने आई। उनके इस पत्र ने वामपंथी और लिबरल मीडिया द्वारा पिछले दो दशकों से फैलाए गए झूठ को उजागर किया है।

जॉर्ज जोसेफ द्वारा मातृभूमि दैनिक को लिखा गया पत्र (स्रोत: रामिथ18/X)

जॉर्ज ने लिखा कि गोधरा में एक लंबे समय से सांप्रदायिक तनाव था, और यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल था। उन्होंने आरोप लगाया था कि गोधरा कांड एक पूर्व नियोजित साजिश थी, जिसका मुख्य उद्देश्य तब के राजनीतिक वातावरण में अपनी ताक़त को साबित करना था। जॉर्ज ने यह भी खुलासा किया कि गोधरा कांड के बाद कॉन्ग्रेस के एक पार्षद और उसके गुंडों का हाथ था, जो स्टेशन के पास के इलाके में कई बार हिंसक घटनाओं को अंजाम देते थे।

पत्र में जॉर्ज ने यह भी बताया कि कैसे गोधरा कांड के बाद पुलिस ने कोई सख्त कदम नहीं उठाए और मुख्य आरोपी, जो एक कांग्रेस पार्षद था, के खिलाफ कार्रवाई करने से भी पुलिस हिचकिचाती रही। उनका यह पत्र न केवल गोधरा कांड की असली तस्वीर को पेश करता है, बल्कि उन लोगों को भी जवाब देता है जिन्होंने इस घटना के पीछे के वास्तविक कारणों को छिपाया है।

जॉर्ज जोसेफ द्वारा ‘मातृभूमि डेली’ को लिखा गया पत्र
स्रोत: रामिथ18/X

जॉर्ज जोसेफ ने पत्र में कहा कि गोधरा एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र था, और इसलिए वहाँ कई वर्षों से सांप्रदायिक तनाव और विभाजन की स्थिति बनी रही थी। गैर-मुस्लिम लोग इस क्षेत्र में अत्यधिक डर और निरंतर तनाव में रहते थे, क्योंकि देश में कहीं भी सांप्रदायिक अशांति होती, तो उसका गोधरा पर गंभीर असर पड़ता था। जॉर्ज के अनुसार, गोधरा नरसंहार के पीछे मुख्य आरोपित कॉन्ग्रेस के पार्षद थे। उनके साथियों ने स्टेशन के पास कई बार हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया। जॉर्ज ने दावा किया कि वो ख़ुद इन घटनाओं के गवाह थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर उन्होंने इनके खिलाफ शिकायत दर्ज की होती, तो वह आज जीवित नहीं होते और यह पत्र न लिख पाते।

जॉर्ज ने यह भी खुलासा किया कि ‘साबरमती एक्सप्रेस’ पर हमला एक पूरी तरह से पूर्व-नियोजित साजिश थी, जिसे कई हफ्तों पहले से योजना बनाई गई थी। उन्होंने लिखा, “उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन रेलवे स्टेशन के आसपास हजारों लोग बाबरी मस्जिद के पक्ष में नारे लगाते हुए मौजूद थे। पुलिस ने उन्हें नियंत्रित करने का प्रयास क्यों नहीं किया? इसका मुख्य कारण कॉन्ग्रेस पार्षद था। यहाँ तक कि पुलिस भी उसे छूने की हिम्मत नहीं करती थी।”

पत्र में जॉर्ज ने यह भी बताया कि जलती हुई बोगी से कूदने में सफल रहे यात्री, जिनमें बच्चे भी शामिल थे, उन्हें भीड़ ने बेरहमी से पत्थरों से मारा। जॉर्ज को अपनी जान बचाने के लिए वहाँ से भागना पड़ा, क्योंकि वहाँ रहकर इन घटनाएँ देख को पाना असंभव था। उन्होंने सवाल उठाया, “कॉन्ग्रेस पार्टी दोषियों की निंदा करने और उनके असली चेहरे को उजागर करने के लिए क्यों तैयार नहीं है? मीडिया हमारे जैसे प्रत्यक्षदर्शियों से क्यों बच रही है?” अंत में उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि यह सब वोट की राजनीति का हिस्सा है।

जॉर्ज ने लिखा था कि जब तक गोधरा की समस्याएँ हल नहीं हो जातीं, वे वहाँ वापस लौटने का विचार नहीं कर रहे हैं। उनके अनुसार, गोधरा में केवल मुस्लिम ही शांति से रह सकते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया, “जब सांप्रदायिक विवाद होते हैं, तो बिना समस्या की असली जड़ का विश्लेषण किए पूर्वाग्रह बनाना उचित नहीं है। आज भी कई लोग ‘साबरमती एक्सप्रेस’ के यात्रियों को केरोसिन और पेट्रोल से जिंदा जलाने जैसे निर्दयी कृत्यों को सही ठहराते हैं।”

पत्र का शब्दशः अनुवाद

शनिवार, 20 अप्रैल
गोधरा में क्या हुआ…

पिछले 12 वर्षों से, मैं गुजरात के गोधरा में रेलवे स्टेशन के पास एक छोटा सा व्यवसाय चला रहा हूँ। मैं उन घटनाओं के बारे में लिख रहा हूँ, जो मैंने अखबारों और सार्वजनिक बयानों में लगातार पढ़ी और सुनी हैं। मैं गोधरा कांड का चश्मदीद गवाह था।

जब हम गोधरा की बात करते हैं, तो यह स्थान वर्षों से सांप्रदायिक तनाव से घिरा हुआ रहा है, यह मुस्लिम बहुल इलाका भी है। यही कारण है कि हमारे जैसे गैर-मुस्लिमों के लिए यह बहुत भयावह स्थान बन जाता है। भारत में कहीं भी सांप्रदायिक मुद्दे उठते हैं, उनकी गूँज यहाँ भी महसूस होती है।

गोधरा कांड का मुख्य आरोपित, जिसे कॉन्ग्रेस का पार्षद बताया जाता है, एक अपराधी किस्म का व्यक्ति था। मैंने खुद देखा था कि उसका समूह स्टेशन के आसपास किस तरह की अराजकता फैलाता था। अगर मैंने इसका विरोध किया या शिकायत दर्ज की होती, तो शायद मैं आज इस पत्र को लिखने के लिए जीवित न होता।

‘साबरमती एक्सप्रेस’ पर हमला एक पूर्व नियोजित साजिश थी। हमले से कई सप्ताह पहले ही इसकी तैयारी शुरू हो चुकी थी। उस दिन जो कुछ हुआ, वह किसी भी इंसान के देखने लायक नहीं था। उस दिन हजारों लोग बाबरी मस्जिद के पक्ष में नारे लगाते हुए रेलवे स्टेशन के आसपास इकट्ठा हो गए थे। पुलिस ने उन्हें क्यों नहीं रोका? इसका मुख्य कारण कॉन्ग्रेस का पार्षद था। पुलिस में भी उसे छूने की हिम्मत नहीं थी। जो लोग जलती हुई ट्रेन से कूदने में सफल हुए, उन पर पटरियों से पत्थर फेंके गए। बच्चों को भी इस निर्दयता से नहीं छोड़ा गया। मुझे अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा, क्योंकि घटनास्थल पर रुकना असंभव था।

कॉन्ग्रेस पार्टी इस जघन्य अपराध में शामिल लोगों की क्रूरता की कड़ी निंदा क्यों नहीं करती, या उनके असली चेहरे को उजागर क्यों नहीं करती? मीडिया हमारे जैसे चश्मदीदों को क्यों नज़रअंदाज़ करती है? सब कुछ वोट की राजनीति के लिए है।

जब तक गुजरात के मुद्दों का समाधान नहीं होता, मैं वहाँ वापस जाने को तैयार नहीं हूँ। गोधरा में सिर्फ मुस्लिम ही शांति से रह सकते हैं। मैं यह अपनी व्यक्तिगत अनुभव से कह रहा हूँ। जब सांप्रदायिक तनाव बढ़ता है, तो पूर्वाग्रह खतरनाक हो जाते हैं। हमें असली मुद्दों की जांच करनी चाहिए। गोधरा में लोग निर्दोष रेल यात्रियों को केरोसिन और पेट्रोल से जिंदा जलाने को सही ठहराने के लिए तैयार थे – चाहे इसका कोई भी कारण हो।

मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि मुझे कोई भी मीडिया आउटलेट सच्चाई को रिपोर्ट करते हुए नहीं मिला। आज भी, ‘मातृभूमि’ जैसे निर्भीक मीडिया संस्थानों को जाति या धर्म की परवाह किए बिना वास्तविक मुद्दों को उजागर करने के लिए आगे आना चाहिए।

जॉर्ज जोसेफ, पझूर

गोधरा दंगों की सच्चाई

गोधरा दंगे देश के सांप्रदायिक दंगों के इतिहास में शायद सबसे अधिक गलत तरीके से पेश किए गए और राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए गए घटनाओं में से एक हैं। जहाँ एक तरफ दंगों का इस्तेमाल विभिन्न राजनीतिक दलों, मीडिया घरानों और वामपंथी विचारधारा के समर्थकों द्वारा हिंदू विरोधी दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए किया गया, वहीं दूसरी तरफ गोधरा दंगों के पूर्व हुए नरसंहार – जिसमें मुस्लिम भीड़ द्वारा साबरमती एक्सप्रेस के कोच में आग लगाई गई – इसका कभी उस पक्ष में उल्लेख नहीं किया गया।

बुधवार (27 फरवरी, 2002) को, ‘साबरमती एक्सप्रेस’ अपनी चार घंटे की देरी के बाद गोधरा स्टेशन पर सुबह 7:40 बजे पहुँची। उस समय ट्रेन के कोच S6 में 59 कारसेवक सवार थे, जो अयोध्या के रामजन्मभूमि स्थल से लौट रहे थे। ट्रेन के स्टेशन पर पहुँचने के कुछ ही मिनटों में, सिग्नल फलिया के मुस्लिम बहुल क्षेत्र से लगभग 2000 मुस्लिमों की भीड़ ने उस कोच को घेर लिया और उसमें आग लगा दी। ट्रेन के अंदर मौजूद सभी 59 कारसेवक, जिनमें 25 महिलाएँ और 15 बच्चे भी शामिल थे, जिंदा जल गए।

इसके बाद कई सालों तक चलने वाली न्यायिक सुनवाई में, ट्रायल कोर्ट ने 22 फरवरी, 2011 को गोधरा हत्याकांड के लिए 31 मुस्लिमों को दोषी ठहराया। 2017 में गुजरात उच्च न्यायालय ने भी इन दोषियों को दोषी ठहराया। इसके अलावा, फरवरी 2003 में एक आरोपित ने न्यायिक स्वीकारोक्ति दी, जिसमें उसने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया कि गोधरा कांड एक पूर्व नियोजित हमले का हिस्सा था।

(यह रिपोर्ट हमारी ही इंग्लिश टीम (ऑपइंडिया) के अनुराग द्वारा की गई है, इसे पढ़ने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक कर सकते है।)

‘अंबेडकर की सारी मूर्तियाँ तोड़ेंगे’: खालिस्तानी आतंकी पन्नू ने वीडियो में दी धमकी, पंजाब में बाबासाहब की प्रतिमा पर लिखा – ‘SFJ ज़िंदाबाद’

प्रतिबंधित आतंकी संगठन SFJ (सिख्स फॉर जस्टिस) के सबसे बड़े सरगना गुरपतवंत सिंह पन्नू ने अब बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया है। पंजाब के जालंधर स्थित फिल्लौर में एक घटना के बाद राज्य भर में तनाव की स्थिति पैदा हो गई है। नांगेल गाँव में डॉ अंबेडकर की प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ की गई है। पन्नू ने इसका वीडियो जारी किया। डॉ अंबेडकर की प्रतिमा के ऊपर अलगाववादी तत्वों ने ‘खालिस्तान ज़िंदाबाद’ लिख दिया गया। SFJ की इस दलित विरोधी करतूत के कारण दलितों में आक्रोश है। फिल्लौर पुलिस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

डॉ अंबेडकर की प्रतिमा के पास खालिस्तानी झंडा फहराया गया, साथ ही ‘सिख हिन्दू नहीं हैं’ और ‘खालिस्तान ज़िंदाबाद’ व ‘SFJ ज़िंदाबाद’ जैसे भड़काऊ नारे लिख डाले गए। हालाँकि, हम पन्नू द्वारा जारी किए गए वीडियो की पुष्टि नहीं करते हैं। इतना ही नहीं, पन्नू ने ये ऐलान तक कर दिया है कि आगामी 14 अप्रैल को राज्य भर में बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर की मूर्तियों को हटाया जाए। इसके पीछे उसकी दलील है कि ये भारत का संविधान ही है जिसके कारण सिखों को इस देश में कोई अधिकार नहीं मिला। अलगावादी पन्नू अक्सर ऐसे भड़काऊ वीडियो जारी करता रहता है।

हाल ही में एक तस्वीर सामने आई थी, जिसमें वो बुलेटप्रूफ जैकेट पहन कर जिम करता हुआ दिखाई दे रहा था। वो फ़िलहाल अमेरिका के न्यूयॉर्क में रह रहा है। कुछ दिनों पहले अमेरिका ने पन्नू की हत्या का आरोप भारत के एक पूर्व ख़ुफ़िया एजेंट पर लगाया था। कहा जा रहा है कि इसके बाद से ही पन्नू डरा-सहमा हुआ है और बाहर नहीं निकलता। कनाडा में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद से ही वो खौफ में था। ताज़ा घटना की बात करें तो फिल्लौर पुलिस फ़िलहाल इससे इनकार कर रही है।

पुलिस का कहना है कि पन्नू की वीडियो कहाँ की है, इसकी लोकेशन ट्रेस की जा रही है और जानकारी मिलने के बाद कार्रवाई की जाएगी। ये ऐसी पहली घटना नहीं है। इसी साल जनवरी में अमृतसर में बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा को खंडित कर दिया गया था। इसे लेकर कई जमकर राजनीति भी हुई थी। हालाँकि, इस करतूत को अंजाम देने वाला दलित ही निकला था। आकाशदीप सिंह नामक उस शख्स का वीडियो भी सामने आया था, जिसमें वो मूर्ति पर चढ़कर हथौड़े से वार करता हुआ दिखाई दे रहा था। उसे हिरासत में लेकर पुलिस ने FIR दर्ज की थी।

इस घटना पर इसीलिए भी ख़ूब हंगामा हुआ था, क्योंकि स्वर्ण मंदिर की तरफ जाने वाली हेरिटेज स्ट्रीट पर स्थित टाउन में ये घटना हुई थी। वहाँ से गोल्डन टेम्पल की दूरी बहुत अधिक नहीं है। ये अमृतसर में डॉ अंबेडकर की सबसे लंबी प्रतिमा थी। इस घटना को लेकर भाजपा ने राज्य की सत्ताधारी AAP पर निशाना साधा था। भाजपा ने कहा था कि अरविंद केजरीवाल की अनुमति के बिना ऐसी घटना संभव नहीं है। इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने संसद में अंबेडकर के अपमान का आरोप लगाते हुए इसे मुद्दा बनाया था और अमित शाह को घेरा था।

आग वाली रात मेरे घर में किसी ने नहीं देखा नोटों का बंडल, मुझे जले हुए नोटों की बोरियाँ भी नहीं दिखाई: रिपोर्ट में दावा- जस्टिस यशवंत वर्मा ने कैश की बात नकारी, CJI ने पूछे थे 3 सवाल

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने घर से कैश मिलने की बात को सिरे से नकार दिया है। उन्होंने CJI संजीव खन्ना को दिए गए जवाब में बताया है कि घर पर नोट मिलने की बात सही नहीं है। उन्होंने नोट मिलने के दौरान खुद के घर में मौजूद होने की बात भी नकार दी है।

न्यूज18 की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा से तीन स्पष्ट प्रश्न पूछे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा से यह प्रश्न दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय के माध्यम से पूछे हैं। इसको लेकर उन्होंने एक पत्र डीके उपाध्याय को लिखा है।

CJI खन्ना ने यह प्रश्न जस्टिस डीके उपाध्याय द्वारा प्राप्त इस मामले में रिपोर्ट के बाद पूछे थे। यह जवाब उन्हें 22 मार्च, 2025 तक देने थे। इसके बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था। उनके खिलाफ अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमिटी जाँच कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा से अपना फोन और उसका डाटा सुरक्षित रखने को कहा है।

CJI ने पूछे ये तीन सवाल

CJI खन्ना ने जस्टिस उपाध्याय से जस्टिस वर्मा से यह तीन प्रश्न पूछने को कहा था-

1- वह अपने परिसर में स्थित कमरे में धन/नकदी की उपस्थिति का हिसाब कैसे देते हैं?

2- उस कमरे में मिले धन/नकदी का स्रोत क्या है, इसके विषय में भी बताएँ।

3- वह व्यक्ति कौन है जिसने 15 मार्च, 2025 की सुबह कमरे से जले हुए पैसे/नकदी को निकाला था?

फोटो साभार: News18 India

जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया जवाब

जस्टिस यशवंत वर्मा ने इन तीनों सवालों के जवाब CJI को भेज दिए थे। उन्होंने क्रमिक तरीके से यह उत्तर दिए थे। उन्होंने अपने जवाब में कहा।

1- पहले प्रश्न के उत्तर में जस्टिस यशवंत वर्मा ने कहा, “मुझे कभी भी घर के स्टोर रूम में पड़े किसी पैसे या नगदी के बारे में जानकारी नहीं थी। ना तो मुझे और न ही मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को कैश यानी नकदी के बारे में कोई जानकारी थी। ना ही इसका मुझसे या मेरे परिवार से कोई संबंध है। मेरे परिवार के सदस्यों या कर्मचारियों को जिस रात को आग लगी उस रात को ऐसी कोई मुद्रा या नकदी दिखाई नहीं गई।”

2- दूसरे सवाल का जवाब देते हुए जस्टिस वर्मा ने कहा, “पहले प्रश्न के जवाब से साफ तौर पर जाहिर है कि दूसरे सवाल का जवाब यानी नकदी का स्रोत स्पष्ट करने का कोई प्रश्न ही नहीं बनता है।

3- तीसरे प्रश्न के उत्तर में जस्टिस यशवंत वर्मा ने बताया, “मैं इस आरोप को बिलकुल नकारता हूँ कि हमने कोई नोट स्टोररूम से निकाले हैं। जैसा कि मैंने ऊपर वाले प्रश्न में बताया है कि हमें जले हुए नोटों की बोरियाँ न दिखाई गईं और न ही सौंपी गई। कमरे के अंदर आग लगने के बाद जिस मलबे को बचाया गया वह भी घर में एक जगह मौजूद है।”

जस्टिस वर्मा ने बताया कि वह और उनकी पत्नी भोपाल से 15 मार्च को लौटे थे और कुछ भी हटाए जाने सम्बन्धी उन्हें कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया है कि घटना के दौरान उनके कर्मचारियों को कोई नकदी या मुद्रा मिली थी।

होली वाले दिन लगी थी आग

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर होली वाले दिन (14 मार्च, 2025) को आग लग गई थी। इसके बाद अग्निशमनकर्मियों को बुलाया गया था। उन्हें आग बुझाने के दौरान घर के एक कमरे से बड़ी मात्रा में नकद मिला था।

इसका वीडियो भी सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनके विषय में एक रिपोर्ट भी जारी की थी। सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने उनका ट्रांसफर इस घटना के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में कर दिया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक जाँच कमिटी बना दी है, इसमें तीन जस्टिस शामिल हैं। इसकी रिपोर्ट आने तक तक यशवंत वर्मा को न्यायिक काम से हटा दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यशवंत वर्मा ने खिलाफ FIR की माँग करने वाली याचिका को भी सुनने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अभी FIR दर्ज करने का समय नहीं है।

हरिद्वार का औरंगजेबपुर बना शिवाजी नगर, मियांवाला हुआ रामवाला… उत्तराखंड में 17 जगहों के बदले नाम: बोले CM धामी- भारतीय संस्कृति-विरासत के आधार पर किया बदलाव

उत्तराखंड में 4 जिलों के 17 जगहों के नाम में बदलाव किया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने सोमवार (31 मार्च 2025) को बदले हुए नामों की घोषणा की। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और विरासत को ध्यान में रखते हुए नाम बदले गए हैं। वहीं, कॉन्ग्रेस ने फैसले को बीजेपी द्वारा जनता का असली मुद्दे से ध्यान भटकाने का नाटक करार दिया।

प्रदेश में बदले गए स्थानों की लिस्ट मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने अपने अधिकारिक ‘X’ अकाउंट पर पोस्ट की। सीएम ने लिखा, “हरिद्वार जनपद का औरंगज़ेबपुर अब शिवाजी नगर के नाम से जाना जाएगा…जनभावनाओं के अनुरूप हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल और उद्धम सिंह नगर जनपदों में स्थित विभिन्न स्थानों के नाम परिवर्तित किए गए हैं।”

सूची के मुताबिक, हरिद्वार जिले में औरंगजेबपुर का नाम शिवाजी नगर गाजीवाली का नाम आर्यनगर, चांदपुर का नाम ज्योतिबा फुले नगर, मोहम्मदपुर जट का नाम मोहनपुर जट, खानपुर कुर्सली का नाम अंबेडकर नगर, इदरीशपुर का नाम नंदपुर, खानपुर का नाम श्री कृष्णपुर, अकबरपुर फाजलपुर का नाम विजयनगर, आसफनगर का नाम देवनारायण नगर और सलेमपुर राजपूताना का नाम शूरसेन नगर रखा गया है।

देहरादून जिले में वर्तमान स्थान मियांवाला का नाम रामजीवाला, पीरवाला का नाम केसरी नगर, चांदपुर खुर्द का नाम पृथ्वीराज नगर और अब्दुल्लापुर का नाम अब दक्षनगर किया गया है।

नैनीताल जिले में नवाबी रोड अब अटल मार्ग और पनचक्की से आईटीआई मार्ग को गुरु गोवलकर मार्ग नाम से जाना जाएगा। साथ ही उधम सिंह नगर जिले में नगर पंचायत सुल्तानपुर पट्टी का नाम बदलकर अब कौशल्या पूरी हो गया है।

बीजेपी ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उत्तराखंड के मीडिया सचिव मनवीर चौहान ने कहा कि विभिन्न स्थानों के नाम बदलने का काम जनभावना और भारतीय संस्कृति एवं विरासत के अनुरूप किया जा रहा है। इससे लोग भारतीय संस्कृति और इसके संरक्षण में योगदान देने वाले महापुरुषों से प्रेरणा ले सकेंगे।

वहीं, कॉन्ग्रेस से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा, “नाम बदलना बीजेपी का एजेंडा बन गया है क्योंकि उनके पास असली काम दिखाने के लिए कुछ नहीं है। पिछले आठ साल विफल रहे हैं। अब जनता उनसे सवाल कर रही है। सवालों से ध्यान भटकाने के लिए वे नाम बदलने का नाटक कर रहे हैं।”