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उनका जूस में थूक-पेशाब मिलाकर बेचना ठीक, पर बाबा रामदेव का ‘शरबत जिहाद’ से सावधान करना गलत: जुबैर ऐंड गैंग चाहता है आप पीते रहे ‘टॉयलेट क्लीनर’, वे उगाते रहे मस्जिद-मदरसे

हाल ही में योग गुरु बाबा रामदेव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वे पतंजलि उत्पादों का प्रचार कर रहे हैं। इस वीडियो में बाबा रामदेव ने ‘शरबत जिहाद’ का जिक्र किया है, जिससे इस्लामी कट्टरपंथी भड़क गए। बाबा ने कहा कि शरबत जिहाद से कमाई करने वाली कंपनी इसका एक हिस्सा मस्जिद और मदरसे बनाने में लगाती है।

दरअसल, 04 अप्रैल 2025 को पतंजलि प्रोडक्ट्स के अधिकारिक फेसबुक पेज पर जारी हुई वीडियो के कैप्शन में लिखा है, “शरबत जिहाद और कोल्ड ड्रिंक के नाम पर बिक रहे टॉयलेट क्लीनर के ज़हर से अपने परिवार और मासूम बच्चों को बचाएँ। केवल पतंजलि शरबत और जूस ही घर लाएँ।”

बाबा रामदेव इस वीडियो में बाकी जूस की कंपनियों की आलोचना करते हुए कहते हैं कि जो लोग गर्मियों में प्यास बुझाने के लिए सॉफ्ट ड्रिंक के नाम पर टॉयलेट क्लीनर पीते रहते हैं। एक तरफ ये टॉयलेट क्लीनर पर प्रहार है।

आगे कहते हैं, “एक कंपनी है जो शरबत बेचती है, उससे जो पैसा मिलता है, उससे मदरसे और मस्जिदे बनवाती है। अगर आप वो शरबत पीएँगे तो मस्जिद और मदरसे बनेंगे और पतंजलि का शरबत पीने से गुरुकुल, आचार्यकुलम, पतंजलि विश्वविद्यालय और भारतीय शिक्षा बोर्ड आगे बढ़ेगा।”

उन्होंने इसे “शरबत जिहाद” बताते हुए इसकी तुलना “लव जिहाद” और “वोट जिहाद” से की। बाबा रामदेव ने कहा कि जैसे कुछ लोग लव जिहाद और वोट जिहाद से बचने की सलाह देते हैं, ठीक वैसे ही अब लोगों को “शरबत जिहाद” से बचने की जरूरत है।

इस्लामी कट्टरपंथियों का विरोध

वीडियो को फेसबुक पर 3.7 करोड़ से अधिक बार देखा जा चुका है। कई लोग इस तरह खुलकर बात रखने पर उनकी तारीफ कर रहे हैं, लेकिन उनके बयान के बाद इस्लामी कट्टरपंथी बिदके हुए हैं।

इस्लामी प्रोपगेंडाबाज मोहम्मद ज़ुबैर बाबा रामदेव की वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “शरबत जिहाद? लाला रामदेव अब हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलकर घटिया क्वालिटी का पतंजलि शरबत बेच रहे हैं। उन्हें पता है कि भारतीयों को बेवकूफ बनाने का यही एकमात्र तरीका है। उसी रामदेव ने अपने पतंजलि उत्पादों को मध्य पूर्व में बेचा, इसके कुछ उत्पादों के लिए हलाल सर्टिफिकेशन प्राप्त किया, खासकर उन उत्पादों के लिए जो खाड़ी देशों को निर्यात किए जाने वाले थे।”

इसके साथ ही खुद को स्वतंत्र पत्रकार बताने का दावा करने वाले हबीब मसूद अल-अदरूस ने एक्स पर पोस्ट किया, “लव जिहाद, ज़मीन जिहाद, न्यूज चैनल जिहाद, सरकारी नौकरी जिहाद के बाद अब मार्केट में आया ‘शरबत जिहाद’।”

हबीब ने आगे लिखा, “बाबा रामदेव द्वारा पतंजलि के शरबत को बढ़ावा देने के लिए रूह अफज़ा को शरबत जिहाद कहना न केवल अपमानजनक है बल्कि खतरनाक भी है। अपने उत्पाद को आगे बढ़ाने के लिए धर्म का इस्तेमाल करना, व्यावसायिक लाभ के लिए समुदायों को विभाजित करने का एक जबरदस्त प्रयास है।”

एक्स यूजर वाजिद शेख ने बाबा रामदेव पर जनता को मूर्ख बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने पोस्ट किया, “शरबत जिहाद….? लाला रामदेव अब हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलकर अपने निम्न गुणवत्ता वाले पतंजलि का शरबत बेच रहा है…उसको पता है कि भारतीयों को मूर्ख बनाने का यही एकमात्र तरीका है…मध्य पूर्व में पतंजलि के उत्पादों को हलाल प्रमाण पत्र प्राप्त करके बेचने वाले बाबा रामदेव नुकसान भरने के लिए एक मामूली सी शर्बत बेचने के लिए हिंदू मुस्लिम कर रहा है…।”

शरबत जिहाद से पहले थूक और पेशाब जिहाद

गौरतलब है कि बाबा रामदेव की टिप्पणी सुनकर बिदके इस्लामी कट्टरपंथियों को आज ये खटक रहा है कि आखिर बाबा रामदेव ने ‘शरबत जिहाद’ शब्द का क्यों इस्तेमाल किया, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इन्हीं कट्टरपंथियों को कभी वो लोग नहीं खटके जो कि शरबत या जूस में थूक मिलाकर सरेआम बेचते हैं। ऐसे मामले आने पर इन्हें दिक्कत इस बात से होती है कि आखिर क्यों थूक या पेशाब मिलाकर बेचने वालों के नाम उजागर किए जा रहे हैं। इनके अपने प्रयास होते हैं कि ऐसे मामले दबे रहें और सजा उन्हें मिले जो ऐसे मामलों को उजागर करने की कोशिश करते हैं।

सितंबर 2024 में शामली जिले से थूक जिहाद होने की खबर आई। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुई थी, जिसमें जूस बेचने वाला आसिफ जूस में थूकता हुआ दिखाई दे रहा था। वहीं, पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपित को गिरफ्तार कर लिया था। हिंदू संगठनों ने आरोपित पर रासुका लगाने की माँग भी उठाई थी।

इससे पहले भी उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में एक दुकानदार लोगों को जूस में पेशाब मिलाकर पिलाता था। इस मामले में शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने आरोपित जूस विक्रेता और उसके 15 वर्षीय बेटे को गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस ने उसकी दुकान से पेशाब भरा कंटेनर भी बरामद किया था।

अमेरिका ने 75 देशों को दी राहत, चीनी माल पर 125% टैरिफ ठोका: फैसले से शेयर बाजार में उछाल, ट्रंप बोले- चीन का शोषण नहीं करेंगे बर्दाश्त

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ यानी आयात शुल्क की वृद्धि पर 90 दिन की रोक लगा दी है। इसका फायदा भारत समेत दुनिया के करीब 75 देशों को होगा। हालाँकि चीन को इस छूट से अलग रखा गया है। चीन पर अमेरिका ने टैरिफ की दरें 104% से बढ़ाकर 125% कर दी है। ऐसे में अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड वॉर का खतरा मंडरा रहा है।

नई ऊँचाई पर अमेरिकी शेयर बाजार

राष्ट्रपति ट्रंप की घोषणा का असर अमेरिका समेत विश्वभर के शेयर बाजारों पर दिखा। 9 अप्रैल 2025 को अमेरिका के शेयर बाजार डाउ जोंस में ऐतिहासिक 3000 अंकों की उछाल देखी गई। वहीं जापान का मार्केट 10 अप्रैल 2025 को खुलते ही 10 फीसदी उछल गया।

भारतीय शेयर बाजार पर इसका असर देखने को नहीं मिला है क्योंकि 10 अप्रैल को महावीर जयंती के मौके पर घरेलू शेयर बाजार बंद हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने जब भारत पर टैरिफ लगाया था तो भारत ने रणनीति के तहत जवाबी कार्रवाई नहीं की थी और बातचीत का रास्ता अख्तियार किया था। इसका नतीजा अब सामने आया है जब राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को राहत दे दी है।

अमेरिकी शेयर बाजार की बात करें तो डाउ जोंस पहली बार 7.87 फीसदी वृद्धि यानी 2963 अंक तक बढ़ा वहीं एसएंडपी 500 में 9.52 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। टेक्नोलॉजी शेयरों वाला नस्दक के लिए जनवरी 2001 के बाद 9 अप्रैल 2025 सबसे अच्छा दिन था।

राष्ट्रपति ट्रंप के चीन को चेताया

राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा है कि उन्होने टैरिफ पर 90 दिनों का विराम लगाया है, दूसरे देशों पर भी रेसिप्रोकल टैरिफ घटा कर 10% कर दिया है। ये फैसला तुरंत लागू हो गया है। चीन को लेकर ट्रंप ने कहा कि वे विश्व बाजारों के प्रति सम्मान नहीं रखते हैं। इसी वजह से अमेरिका चीन से अब 125% दर से टैरिफ वसूलेगा। चीन को समझना पड़ेगा कि अमेरिका समेत विश्व के तमाम देश उसका शोषण बर्दाश्त नहीं करेंगे।

बंगाल में मुस्लिम भीड़ का उत्पात: CM ममता बनर्जी ने वक्फ संपत्तियों की रक्षा की कसम खाई, TMC के समर्थन में इस्लामवादी विरोध प्रदर्शन में हुए शामिल

पश्चिम बंगाल में हालात बहुत बिगड़ गए हैं। इस्लामी भीड़ ने कई जगहों पर हंगामा मचा रखा है। ये सब नये वक्फ एक्ट के खिलाफ हो रहा है। कुछ इस्लामी लीडर और टीएमसी जैसी पार्टियाँ इसे मुसलमानों के खिलाफ कानून बता रही हैं। राज्य में हिंसा चल रही है और इसी बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुसलमानों का साथ देने की बात कही है।

ममता बनर्जी ने वक्फ प्रॉपर्टी की हिफाजत का वादा किया है। बुधवार (9 अप्रैल 2025) को कोलकाता में जैन समुदाय के एक कार्यक्रम में ममता ने कहा, “याद रखो, जब तक दीदी है, दीदी तुम्हें और तुम्हारी प्रॉपर्टी को बचाएगी।”

ममता पहले भी कह चुकी हैं कि अगर केंद्र में बीजेपी की सरकार चली गई तो वक्फ एक्ट खत्म हो जाएगा। उनका कहना है, “जैसे ही ये सरकार (बीजेपी वाली नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस) सत्ता से हटेगी और नई सरकार आएगी, ये बिल रद्द हो जाएगा।” वो लगातार इस कानून के खिलाफ बोल रही हैं। बता दें कि टीएमसी के राज में बंगाल में पिछले कुछ दिनों से मुस्लिम भीड़ की हिंसा कई जगहों पर देखी गई है। मुर्शिदाबाद, मालदा, नादिया और बहरामपुर में खूब बवाल हुआ है।

मुरशिदाबाद में पत्थरबाजी के साथ गाड़ियों को किया गया आग के हवाले

मुर्शिदाबाद जिले में मंगलवार (8 अप्रैल 2025) को वक्फ एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुआ। वहाँ की भीड़ ने जंगीपुर और उमरपुर में पत्थर फेंके और गाड़ियाँ जला दीं। हिंसक भीड़ ने सिक्योरिटी फोर्स से भिड़ंत की और नेशनल हाइवे 12 पर पुलिस पर पत्थरबाजी की। कई पुलिसवाले घायल हो गए। सिक्योरिटी फोर्स को भीड़ को हटाने के लिए बल और आँसू गैस के गोले इस्तेमाल करने पड़े।

जिला प्रशासन ने रघुनाथगंज और सुति थाना इलाकों में पाबंदियाँ लगा दीं। बाजार बंद करवा दिए गए और इंटरनेट सर्विस रोक दी गई। 800 से ज्यादा पुलिसवालों की टीमें जिले में तैनात की गई हैं ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे। एक सीनियर पुलिस अफसर ने बताया, “संवेदनशील इलाकों में पाबंदियाँ लगाई गई हैं, जो गुरुवार, 10 अप्रैल को शाम 6 बजे तक रहेंगी। राज्य सचिवालय ने ऑर्डर दिया है कि जंगीपुर सब-डिवीजन में 11 अप्रैल शाम 6 बजे तक सारी इंटरनेट सुविधाएँ बंद रहेंगी। ये कदम गलत खबरें और डर फैलने से रोकने के लिए उठाया गया है। अब हालात काबू में हैं।”

जंगीपुर के SP आनंद रॉय ने कहा कि पुलिस ने हिंसा में शामिल 22 लोगों को पकड़ा है। इसमें से 8 को हिरासत में लिया गया है। दो पुलिस गाड़ियाँ जलाई गई थीं। पुलिस जाँच कर रही है। SP ने कहा, “कल यहाँ हिंसा हुई थी। कानून-व्यवस्था की दिक्कत हुई। पुलिस ने एक्शन लिया और गिरफ्तारियाँ कीं। यहाँ 163 BNSS लागू है। इंटरनेट बंद है। चीजें काबू में हैं। पत्थरबाजी हुई थी। पुलिस की दो गाड़ियाँ जल गईं। हमने सारे कानूनी कदम उठाए हैं। 22 गुंडों को पकड़ा गया है, 8 को आगे की जाँच के लिए हिरासत में लिया गया है। केस दर्ज हो गया है।”

इस बीच, इस पूरे घटनाक्रम पर राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस ने राज्य सरकार से रिपोर्ट माँगी है।

नादिया में इस्लामी भीड़ ने पुलिस को दौड़ाया

नादिया जिले के कनाई नगर इलाके में भी मंगलवार (8 अप्रैल 2025) को ऐसी ही हिंसा हुई। बीजेपी IT सेल के हेड अमित मालवीय ने X पर कुछ वीडियो शेयर किए। उन्होंने कहा कि इस्लामी भीड़ ने पुलिस पर हमला किया। मालवीय ने ममता सरकार पर इल्जाम लगाया कि वो हिंसा को बढ़ावा दे रही है और पुलिस की हिफाजत नहीं कर पा रही। वीडियो में दिखा कि भीड़ एक पुलिसवाले को दौड़ा रही थी, जो पास के पेट्रोल पंप में छिपकर बचा।

मालवीय ने लिखा, “कल शाम नादिया के कनाई नगर में हालात बहुत खराब थे। ममता बनर्जी की शह पर इस्लामिस्ट भीड़ ने पुलिस पर हिंसक हमला किया। अपनी जान बचाने के लिए पुलिसवालों को पास के पेट्रोल पंप पर छिपना पड़ा। इतनी बड़ी घटना के बावजूद ममता बनर्जी, जो गृह मंत्री भी हैं, वो लोगों को गुमराह करने के लिए वक्फ बोर्ड पर बयानबाजी कर रही हैं। वो कानून-व्यवस्था की बात को छोड़ रही हैं। अपनी पुलिस को भी सुरक्षित नहीं रख पाईं। अब वक्त है कि बंगाल की पुलिस इस सियासी दुरुपयोग के खिलाफ खड़ी हो और राज्य में कानून-व्यवस्था बहाल करे।”

मालदा में इस्लामी भीड़ ने रोकी ट्रेनें

इस बीच, मालदा के निम्तिता रेलवे स्टेशन पर सोमवार (7 अप्रैल 2025) को वक्फ एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन कर रही मुस्लिम भीड़ ने घंटों तक ट्रेनें रोकीं। प्रदर्शनकारियों ने आजिमगंज-मालदा पैसेंजर ट्रेन को निम्तिता स्टेशन पर रोक दिया। रेलवे मालदा डिवीजन की प्रेस रिलीज के मुताबिक, सुजनीपारा में भी ट्रेनें रोकी गईं। रेलवे पुलिस फोर्स (RPF) ने दखल देकर हालात को काबू में किया।

बंगाल में वक्फ एक्ट के खिलाफ हाल की भीड़ हिंसा की घटनाएँ दिसंबर 2019 में मुरशिदाबाद में शुरू हुए CAA विरोध की याद दिलाती हैं। CAA विरोध भी हिंसक प्रदर्शनों से शुरू हुआ था, जिसमें ‘प्रदर्शनकारियों’ ने मुरशिदाबाद में रेलवे स्टेशन कॉम्प्लेक्स को आग लगा दी थी और बेलडांगा रेलवे स्टेशन पर RPF कर्मियों पर हमला किया था। ट्रेन स्टेशनों को तोड़ने और ट्रेनें रोकने की ऐसी ही घटनाएँ बंगाल के अलग-अलग इलाकों में हुई थीं। वो प्रदर्शन जल्द ही 2020 के दिल्ली में हिंदू-विरोधी दंगों में बदल गए थे। CAA विरोध से लेकर वक्फ एक्ट विरोध तक, लगता है कि पश्चिम बंगाल इस्लामी भीड़ की हिंसा के लिए एकदम सही जगह बन गया है, जो किसी न किसी कानून के खिलाफ बहाने से हंगामा करती है।

जुबैर और प्रोपेगेंडावादियों ने कपिल मिश्रा के खिलाफ FIR के ऑर्डर का फैलाया झूठ, कोर्ट ने फेरा पानी: ऐसा कोई आदेश नहीं, सिर्फ आगे की जाँच की कही थी बात, उस पर भी लग गया स्टे

दिल्ली दंगों से जुड़ी एक खबर इस महीने की शुरुआत में काफी तेजी से फैली, जिसमें कहा गया कि दिल्ली कोर्ट ने बीजेपी नेता और दिल्ली के मंत्री कपिल मिश्रा के खिलाफ 2020 के दिल्ली दंगों में FIR दर्ज करने का ऑर्डर दिया है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि यमुना विहार के मोहम्मद इलियास की अर्जी पर कपिल मिश्रा के खिलाफ एफआईआर का आदेश दिया गया है, जबकि सच में ऐसा कुछ भी नहीं था।

इसके बावजूद फेक न्यूज फैलाने में माहिर, इस्लामी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले और खुद को फैक्ट चेकर कहने वाले मोहम्मद जुबैर और अन्य लोगों ने दावा किया कि कोर्ट ने कपिल मिश्रा पर शिकंजा कस दिया है और एफआईआर का आदेश दिया है। लेकिन अब सच सामने आया है कि कोर्ट ने ऐसा कोई ऑर्डर नहीं दिया था। दरअसल, 1 अप्रैल 2025 को मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया ने सिर्फ आगे की जाँच का आदेश दिया था, FIR का कोई जिक्र नहीं था।

इस मामले में इलियास की ओर से कहा गया था, कि कपिल मिश्रा और उनके साथियों ने दंगों में हिस्सा लिया। लेकिन दिल्ली पुलिस ने इसका विरोध किया और कहा कि मिश्रा को फँसाया जा रहा है, उनका दंगों से कोई लेना-देना नहीं। कोर्ट ने भी अपनी ऑर्डर में साफ किया कि दूसरी घटनाओं के लिए पहले से FIR दर्ज हैं, बस एक मामले में और जाँच की जरूरत है। फिर भी, मीडिया और जुबैर ने इसे FIR का ऑर्डर बताकर हंगामा मचा दिया।

बहरहाल, कपिल मिश्रा ने इस जाँच के ऑर्डर के खिलाफ अपील की और बुधवार (9 अप्रैल 2025) को राउज एवेन्यू कोर्ट की जज कावेरी बवेजा ने उनकी बात मान ली। कोर्ट ने कहा कि जब दूसरी FIR पहले से दर्ज हैं और केस चल रहा है, तो नई जाँच का ऑर्डर ठीक नहीं। इसलिए 21 अप्रैल 2025 तक उस ऑर्डर पर रोक लगा दी गई।

ये खबर दिखाती है कि कैसे गलत जानकारी तेजी से फैलती है। लोग हैरान हैं कि सच को तोड़-मरोड़कर कैसे पेश किया गया। कपिल मिश्रा के लिए ये राहत की बात है, लेकिन सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या सच को दबाने की कोशिश हुई या जल्दबाजी में गलती हुई। अब सबकी नजर 21 अप्रैल 2025 पर है, जब कोर्ट अगला फैसला सुनाएगी।

कम नंबर वाले को नियुक्ति, OMR शीट में हेरफेर और फिर इसे छिपाने के लिए कॉपियों को जलाना: बंगाल के शिक्षक भर्ती घोटाले में जानिए CBI को क्या मिला और कोर्ट ने क्या कहा

पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (WBSSC) के तहत साल 2016 में की गई शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती अब एक बड़े घोटाले के रूप में सामने आई है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल काॅन्ग्रेस सरकार की निगरानी में हुए इस भर्ती घोटाले ने न केवल शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि राज्य सरकार की विश्वसनीयता पर भी गहरा असर डाला है।

साल 2016 में कक्षा 9 से 12 के लिए सहायक शिक्षक और ग्रुप C एवं D के अंतर्गत गैर-शिक्षण स्टाफ की नियुक्तियों के लिए लिखित परीक्षाएँ और इंटरव्यू आयोजित किए गए थे। इस प्रक्रिया में ऑप्टिकल मार्क रिकॉग्निशन (OMR) शीट की स्कैनिंग और मूल्यांकन का जिम्मा ‘Nysa Communications’ नामक एक निजी कंपनी को दिया गया था। उसने इस घोटाले को अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चयन प्रक्रिया की शुरुआत से ही कई गड़बड़ियाँ सामने आईं। आयोग ने न तो प्राथमिक और न ही अंतिम चरण में अभ्यर्थियों की पूरी सूची जारी की और ही उनके अंक सार्वजनिक किए। इससे पारदर्शिता को लेकर संदेह गहराया। इसके अलावा भर्ती मानदंडों का उल्लंघन करते हुए योग्य अभ्यर्थियों को आयु में छूट नहीं दी गई, जिससे कई उम्मीदवारों को अदालत का रुख करना पड़ा।

इस मामले में पहली आवाज उठाने वाली थीं बैशाखी भट्टाचार्य, जिन्होंने साल 2016 में आयोग के खिलाफ सबसे पहला केस दर्ज कराया था। साल 2021 तक यह सामने आया कि कुल 25,753 नियुक्तियों में कई विसंगतियाँ हैं। इन नियुक्तियों में नियमों की अनदेखी, भ्रष्टाचार और सिफारिशों की भूमिका की आशंका जताई गई है।

मुख्य आरोपों में शामिल हैं –

रैंक जंपिंग – मेरिट लिस्ट में निचले स्थान पर रहे उम्मीदवारों को उच्च अंक वाले उम्मीदवारों की तुलना में वरीयता दी गई।

उम्मीदवारों के चयन में पिक एंड चूज़ पद्धति को अपनाया गया।

जो उम्मीदवार न तो मेरिट लिस्ट में थे और न ही वेटिंग लिस्ट में थे, उन्हें नियुक्त किया गया।

गैर-दागी उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र जारी किए गए, लेकिन उन्हें नौकरी में शामिल होने नहीं दिया गया।

समिति ने WBSSC अधिकारियों की धोखाधड़ी का पर्दाफाश किया

यह घोटाला केवल एक भर्ती प्रक्रिया की विफलता नहीं है, बल्कि यह राज्य की शिक्षा प्रणाली की नींव पर लगे उस दाग की तरह है, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा। अब देखना यह है कि अदालत और जाँच एजेंसियाँ इस मामले में कितनी तेजी और पारदर्शिता से कार्य करती हैं, और दोषियों को कब तक न्याय के कठघरे में लाया जाता है।

सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति रंजीत कुमार बाग की अध्यक्षता में समूह सी और डी के तहत गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्तियों को सत्यापित करने के लिए 4 सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। समिति में WBSSC के प्रतिनिधि, पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और एक अधिवक्ता भी शामिल थे।

समिति ने अपनी जाँच में गंभीर विसंगतियाँ पाईं और केंद्रीय आयोग के अधिकारियों पर आपराधिक साजिश (आईपीसी धारा 120 बी), जालसाजी (आईपीसी धारा 465 और 468), धोखाधड़ी (आईपीसी धारा 417) और कर्तव्य के प्रति घोर लापरवाही का आरोप लगाया। समिति ने यह पाया गया कि केंद्रीय आयोग ने उम्मीदवारों के रैंक में बदलाव किया।

इतना नहीं, आयोग ने उम्मीदवारों के रैंक में हेरफेर का सहारा लिया और ग्रुप सी एवं डी के तहत गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्तियों में अवैध प्रक्रिया को शामिल किया। 4 सदस्यीय समिति ने 5 अधिकारियों, अर्थात् सौमित्र सरकार, अशोक कुमार साहा, डॉ. शांति प्रसाद सिन्हा, डॉ. कल्याणमय गांगुली और समरजीत आचार्य के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई/एफआईआर की सिफारिश की।

सीबीआई द्वारा जाँच

बाद में यह मामला सीबीआई के हाथ में पहुँचा। सीबीआई की जाँच में बड़ा खुलासा हुआ है कि पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (WBSSC) ने टेंडर प्रक्रिया में नियमों को दरकिनार करते हुए ‘न्यासा कम्युनिकेशंस’ को चुन लिया। ‘न्यासा कम्युनिकेशंस’ ने आयोग से लिखित अनुमति लिए बिना ही ‘डेटा स्कैनटेक’ नाम की एक अन्य एजेंसी को हायर किया।

इस एजेंसी को ओएमआर शीट स्कैनिंग का काम सौंप दिया, जो स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है। ओएमआर शीट की स्कैनिंग पूरी होने के बाद न्यासा कम्युनिकेशंस ने सारे डेटा को हार्ड ड्राइव में डालकर अपने साथ नोएडा कार्यालय ले गई। वहीं, ओएमआर शीट की कॉपियों को WBSSC कार्यालय में ही छोड़ दिया गया।

सीबीआई ने 2016 की भर्ती परीक्षाओं से जुड़े WBSSC सर्वर का डेटा जब्त कर लिया है और 2022 में की गई एक छापेमारी में ‘न्यासा कम्युनिकेशंस’ के पूर्व कर्मचारी पंकज बंसल के घर से तीन हार्ड डिस्क भी बरामद की है। इन सब साक्ष्यों के आधार पर भर्ती घोटाले की परतें धीरे-धीरे खुलने लगी हैं और इसमें गहरी साजिश के संकेत मिल रहे हैं।

सीबीआई की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती घोटाले को लेकर चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। एजेंसी ने बताया कि पंकज बंसल की हार्ड डिस्क में मौजूद डेटा और आयोग के जब्त सर्वर डेटा का मिलान किया गया, जिसमें साफ तौर पर गड़बड़ी पाई गई। रिपोर्ट के अनुसार, कई अयोग्य उम्मीदवारों के लिखित परीक्षा अंकों को जानबूझकर बढ़ाया गया, ताकि उन्हें योग्य दिखाया जा सके।

यह अंतर इस बात का प्रमाण है कि अंकों में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया गया। सीबीआई ने यह भी खुलासा किया कि डब्ल्यूबीएसएससी के अधिकारियों, न्यासा कम्युनिकेशंस के कर्मचारियों और अन्य संबंधित लोगों के बीच हुए ईमेल आदान-प्रदान से यह पुष्टि हुई कि उम्मीदवारों के डेटा में हेरफेर योजनाबद्ध तरीके से किया गया था।

रिपोर्ट में यह भी गंभीर आरोप लगाए गए कि साल 2019 में आयोग ने न केवल मूल ओएमआर शीट्स को नष्ट कर दिया, बल्कि उनकी स्कैन की गई तस्वीरों को भी नष्ट कर दिया था। इससे जाँच एजेंसी को यह आशंका हुई कि यह कदम डेटा में की गई हेरफेर को छुपाने के उद्देश्य से जानबूझकर किया गया था।

सबसे अहम बात यह रही कि सीबीआई ने यह पाया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने न्यासा कम्युनिकेशन का पूर्व कर्मचारी और इस भर्ती घोटाले का मुख्य क्रियान्वयनकर्ता निलाद्री दास को कई अन्य सरकारी भर्ती परियोजनाओं का काम सौंप दिया। इससे यह संकेत मिलता है कि घोटाले में केवल तकनीकी ही नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण की भी भूमिका रही है।

निम्नलिखित 4 मामलों में ओएमआर शीट में हेराफेरी पाई:

कक्षा 9 और 10 के लिए 952 सहायक अध्यापक

कक्षा 11 और 12 के लिए 907 सहायक अध्यापक

ग्रुप सी से संबंधित 3481 गैर-शिक्षण कर्मचारी

ग्रुप डी से संबंधित 2823 गैर-शिक्षण कर्मचारी

WBSSC द्वारा कवरअप की की कोशिश

पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग नियुक्त उम्मीदवारों की मूल ओएमआर शीट प्रस्तुत करने में विफल रहा, उसने दावा किया कि उन्हें नष्ट कर दिया गया था। इसने 2018 से 2023 तक आरटीआई आवेदकों को ओएमआर शीट की स्कैन की गई प्रतियाँ प्रस्तुत की थीं, लेकिन बाद में अदालत में दावा किया कि उन्हें बरकरार नहीं रखा गया है।

इतना ही नहीं, WBSSC ने सहायक शिक्षकों (कक्षा 9-12) और ग्रुप सी एवं डी में गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए उपलब्ध रिक्तियों की तुलना में 2,355 अधिक नियुक्तियाँ कीं। बाद में इन अवैध नियुक्तियों को समायोजित करने के लिए ‘अतिरिक्त पद’ सृजित करने की आयोग से अनुमति माँगी।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि WBSSC ने उन उम्मीदवारों को भी नियुक्त कर दिया, जिन्होंने परीक्षा में खाली खाली OMR शीट जमा की थी या जिनकी रैंक काफी नीचे थी। इतना ही नहीं, आयोग ने भर्ती पैनल की वैध अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी अवैध रूप से नियुक्तियाँ जारी रखीं। साथी OMR शीट को नष्ट करके नियमों का भी उल्लंघन किया गया।

WBSSC (पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग) ने अपने कई अदालती हलफनामों में भर्ती प्रक्रिया में हुई गंभीर अनियमितताओं को स्वीकार किया है। आयोग ने माना है कि-

कई मामलों में रैंक जंपिंग हुई, यानी मेरिट सूची में पीछे रहने वाले उम्मीदवारों को ऊपर के स्थान पर नियुक्त किया गया।

पैनल में शामिल न होने वाले 1,498 उम्मीदवारों को अवैध रूप से नियुक्त किया गया।

926 उम्मीदवारों को जानबूझकर रैंक जंपिंग के ज़रिए नियुक्त किया गया।

4,091 उम्मीदवारों को उनके OMR स्कोर में गड़बड़ी के बावजूद नियुक्ति की सिफारिश की गई।

239 उम्मीदवार ऐसे थे, जिनके मामले में OMR में बेमेल और अन्य गड़बड़ियाँ दोनों पाई गईं।

इन सभी मामलों को जोड़ने पर अब तक कुल 6,276 अवैध नियुक्तियों की बात सामने आई है। हालाँकि, ये आँकड़ा अंतिम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आयोग ने OMR शीट्स की भौतिक प्रतियाँ नष्ट कर दी हैं और स्कैन की गई प्रतियों को भी बचाकर नहीं रखा है। इससे सत्यापन की प्रक्रिया अधूरी रह गई है।

कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

अप्रैल 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट की डिविजन बेंच ने पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (WBSSC) द्वारा 2016 में की गई 25,752 शिक्षकों की नियुक्तियों को पूरी तरह रद्द कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ये नियुक्तियाँ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती हैं, जो समानता और सार्वजनिक नौकरी में समान अवसर की गारंटी देते हैं।

इस ऐतिहासिक फैसले में केवल एक उम्मीदवार सोमा दास को मानवीय आधार पर नौकरी जारी रखने की अनुमति दी गई है। सोमा दास कैंसर सर्वाइवर हैं। इस मामले में कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सभी अपात्र उम्मीदवारों को अपने अब तक के वेतन और लाभ 12% ब्याज के साथ चार सप्ताह के भीतर राज्य सरकार को लौटाने होंगे।

इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले को सीबीआई के हवाले करते हुए इसकी गहराई से जाँच करने का आदेश भी दिया। अदालत ने WBSSC को निर्देशित किया है कि वह जल्द से जल्द एक पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत नई भर्तियों की शुरुआत करे, ताकि योग्य उम्मीदवारों को न्याय मिल सके।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी नियुक्तियों को रद्द करने के कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की सीबीआई जाँच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, “सार्वजनिक नौकरियाँ बहुत कम हैं। अगर जनता का विश्वास खत्म हो जाए तो कुछ नहीं बचेगा। यह व्यवस्थागत धोखाधड़ी है। अगर नियुक्तियाँ गलत तरीके से होती हैं तो सिस्टम में क्या बचेगा?” सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, “या तो आपके पास डेटा है या नहीं है, दस्तावेजों को डिजिटल रूप में बनाए रखना आपका कर्तव्य था।”

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 3 अप्रैल 2025 को कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा [pdf] और 2016 के WBSSC भर्ती मामले में व्यवस्थागत अनियमितताओं, विसंगतियों/धोखाधड़ी का उल्लेख किया। भर्ती प्रक्रिया की समग्र अखंडता में समझौता होने के कारण इसे पूरी तरह से रद्द कर दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, “हमारे विचार में यह ऐसा मामला है, जिसमें पूरी चयन प्रक्रिया को दूषित कर दिया गया है और इसे सुलझाया नहीं जा सकता। बड़े पैमाने पर हेरफेर और धोखाधड़ी, साथ ही इसे ढकने के प्रयास ने चयन प्रक्रिया को इतना नुकसान पहुँचाया है कि इसे आंशिक रूप से भी सुधारा नहीं जा सकता। चयन की विश्वसनीयता और वैधता समाप्त हो गई है।”

WBSSC ने तर्क दिया था कि पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने तर्क में कोई दम नहीं पाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम इस तर्क को स्वीकार कर सकते थे यदि WBSSC के पास मूल भौतिक OMR शीट या OMR शीट की फोटो कॉपी होती। हालाँकि, WBSSC स्वीकार करता है कि उनके पास OMR शीट नहीं हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, “…क्योंकि उन्हें कक्षा IX और X और कक्षा XI और XII नियमों के नियम 21 के अनुसार नष्ट कर दिया गया था, जिसके अनुसार OMR शीट को केवल एक वर्ष तक रखना आवश्यक है।” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ग्रुप C और D कर्मचारियों के लिए OMR शीट नष्ट करने के पीछे कोई तर्क नहीं था, क्योंकि भर्ती पैनल की वैधता समाप्त होने के बाद भी भर्ती चल रही थी।”

सर्वोच्च न्यायालय ने भर्ती पैनल के विस्तार में अवैधता को भी रेखांकित किया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि कक्षा IX-X और XI-XII के लिए सहायक शिक्षकों के पद पर काउंसलिंग प्रक्रिया और नियुक्तियाँ पैनल की समाप्ति के बाद की गई थीं। यह अवैध और नियमों के विपरीत है।”

(यह रिपोर्ट दिबाकर दत्ता ने मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी है। इसे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

पुरुषों ने साड़ी पहन खिंचवाई फोटो, महिलाओं के नाम से बटोरे लाखों रुपए: कर्नाटक में MGNREGA में धाँधली, NMMS पोर्टल से खुली पोल

कर्नाटक के यादगीर जिले में सरकारी योजना MGNREGA में धाँधली का मामला सामने आया है। जहाँ कुछ पुरुषों ने साड़ी पहनकर महिला के रूप में मजदूरी कर तीन-तीन लाख रुपये भी कमा लिए। यहाँ से सब महिलाओं के नाम पर पुरुषों ने किया।

दरअसल, मामला सामने तब आया जब इस साल फरवरी में कथित तौर पर एक तस्वीर राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी सेवा (NMMS) में उपस्थिति के लिए अपलोड की गई, जिसमें कुछ पुरुष और महिला मजदूर नहर की खुदाई वाली जगह के पास खड़े दिखाई दे रहे थे। फोटो को जूम करके देखने पर सच्चाई सामने आई, जिसमें पुरुष ही महिला की साड़ी पहने और घूंघट ओढ़े हुए थे।

स्थानीय पंचायत ने मामले से किनारा किया

इस घटना से संबंधित अधिकारियों पर सवाल खड़े हुए हैं। मामले में जाँच के सख्त आदेश दिए गए हैं। वहीं, स्थानीय ग्राम पंचायत ने घोटाले के बारे में कोई भी जानकारी होने से इनकार कर दिया। किनारा करते हुए कहा कि घटना में कुछ आउटसोसर्स कर्मचारी शामिल थे।

मल्हार गाँव की पंचायत ने इस मामले से पल्ला झाड़ लिया। पंचायत विकास अधिकारी चेन्नाबसवा ने कहा, “मुझे इस घोटाले की कोई जानकारी नहीं थी। ये सब एक आउटसोर्स कर्मचारी ने किया। जब मुझे पता चला, तो उसे निलंबित कर दिया।” लेकिन सवाल ये है कि इतनी बड़ी गड़बड़ी कैसे छिपी रही? अब जाँच के सख्त आदेश दिए गए हैं, और लोग चाहते हैं कि दोषियों को सजा मिले। गाँव में अभी भी 2,500 मजदूर काम कर रहे हैं और पंचायत का दावा है कि अब सब कुछ ठीक चल रहा है।

मनरेगा क्या है?

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और गरीबी को दूर करने के लिए एक सामाजिक कल्याण योजना है। केंद्र ने इस योजना को शुरु किया है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकार मिलकर वित्तपोषण और परियोजना पर काम करने की जिम्मेदारियाँ साझा करती हैँ। यह योजना हर पंजीकृत ग्रामीण परिवार को हर साल 100 दिन का रोजगार देने की गारंटी देती है। मजदूरी के लिए धन पूरी तरह से केंद्र सरकार ही प्रदान करती है जबकि सामग्री लागत का 75 प्रतिशत केंद्र और 25 प्रतिशत राज्य सरकार को जाता है।

नरेंद्र यादव की डॉक्टरी की सारी डिग्री निकली फर्जी: जिस ‘मिशन हॉस्पिटल’ में करता था दिल का ऑपरेशन, उसकी पैरवी कर चुके हैं कपिल सिब्बल जैसे पुराने कॉन्ग्रेसी

मध्य प्रदेश के दमोह में एक ईसाई मिशनरी अस्पताल में लोगों की मौत के बाद बवाल मचा हुआ है। इसमें फर्जी डॉक्टर बनकर मरीजों का ऑपरेशन करने वाले एन जॉन कैम उर्फ नरेंद्र विक्रमादित्य यादव की डिग्रियाँ फर्जी पाई गई हैं। वहीं, इस अस्पताल को संचालित करने वाले पादरी अजय लाल पर दर्ज धर्मांतरण मामले की सुप्रमी कोर्ट में पैरवी कॉन्ग्रेस नेता विवेक तन्खा और कपिल सिब्बल ने की थी। पादरी अजय लाल विदेश भाग चुका है।

दरअसल, ईसाई मिशनरी अस्पताल में जनवरी-फरवरी 2025 में हार्ट सर्जरी के बाद 7 मरीजों की मौत हो गई थी। मामले की जाँच हुई तो ‘फर्जी’ यूके रिटर्न हार्ट स्पेशलिस्ट नरेन्द्र यादव का नाम आया। उस पर पिछले डेढ़ महीने में 15 हार्ट सर्जरी करने का आरोप लगा है। उसकी सारी डिग्रियाँ फर्जी मिली हैं। बड़े-बड़े अस्पतालों में काम करने का दावा करने वाला नरेंद्र खुद को डॉक्टर एन जॉन कैम बताता था।

घटना के खुलासे के बाद मध्य प्रदेश में हंगामा मच गया है, विपक्षी कॉन्ग्रेस पार्टी ने सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार पर हमला बोला है। हालाँकि, इस मामले की जाँच में कई खुलासे हुए हैं। नकली नाम, नकली रजिस्ट्रेशन नंबर और नकली डिग्रियों के सहारे नरेंद्र यादव पिछले 18 सालों से डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस कर रहा था।

फर्जी मेडिकल की डिग्री और नकली रजिस्ट्रेशन नंबर

नरेन्द्र यादव के पास कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की डिग्री है। उसकी दूसरी डिग्री नॉर्थ बंगाल मेडिकल कॉलेज से बैचलर ऑफ मेडिसिन और बैचलर ऑफ सर्जरी यानी एमबीबीएस की है। एमबीबीएस रजिस्ट्रेशन एक महिला डॉक्टर के नाम पर है। तीसरी डिग्री पांडिचेरी मेडिकल कॉलेज से डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की है। ये तीनों डिग्रियाँ फर्जी हैं।

एनडीटीवी के अनुसार, उसकी आंध्र प्रदेश मेडिकल काउंसिल का रिकॉर्ड भी संदिग्ध है। दमोह की एसपी श्रुतकीर्ति सोमवंशी के मुताबिक, “जो डिग्री पेश की गई है वो नकली लग रही हैं। ऐसा लग रहा है कि इसे मॉर्फ किया गया है। आरोपित का मोबाइल, टैब, ईमेल आदि सभी की जाँच की जा रही हैं। ये भी पता लगाया जा रहा है कि उसने अब तक कहाँ-कहाँ काम किया और क्या-क्या सीखा है।”

फर्जी डॉक्टर का कॉन्ग्रेस नेता से संबंध

फर्जी डॉक्टर नरेंद्र यादव को काम पर रखने वाले पादरी अजय लाल का प्रतिनिधित्व 2023 में सुप्रीम कोर्ट में कॉन्ग्रेस नेता विवेक तन्खा ने प्रतिनिधित्व किया। विवेक तन्खा इस समय कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं। विवेक तन्खा के अलावा, कॉन्ग्रेस से जुड़े रहे कपिल सिब्बल ने भी पादरी की पैरवी की थी। वे जनवरी 2024 तक पादरी अजय लाल की पैरवी कर रहे थे।

अजय लाल फिलहाल भारत से बाहर हैं। कॉन्ग्रेस के एक अन्य नेता अजय सिंह के साथ साथ भी उसकी तस्वीरें सामने आई हैं। दरअसल, नवंबर 2022 में पादरी अजय लाल पर एक दलित दंपति और उसके परिवार को जबरन ईसाई बनाने का आरोप लगा था। दलित पीड़ितों ने बताया कि चर्च के अधिकारियों ने उन्हें धमकाया और धर्म परिवर्तन के समय पहले दिए गए धन से चार गुना अधिक धन की माँग की थी।

पीड़ित ने कहा, “शुरू में उन्होंने हमें जबरन धर्म परिवर्तन करवाया और 1,20,000 रुपए दिए। उन्होंने हमें चर्च सेवा में शामिल होने और हिंदू धर्म का पालन करना बंद करने के लिए भी कहा। हमने शुरू में चर्च सत्र में भाग लिया, लेकिन बाद में हम नहीं जा सके। इसलिए उन्होंने हमें धमकाना शुरू कर दिया कि अगर हम ईसाई धर्म का पालन करने में विफल रहे, तो वे दी गई राशि को चार गुना ब्याज के साथ वसूल करेंगे।”

उस समय NCPCR के तत्कालीन अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने अजय लाल द्वारा संचालित ‘मिड इंडिया क्रिश्चियन सोसाइटी’ नामक ईसाई संगठन के 10 सदस्यों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कानूनगो ने कहा था कि सोसाइटी के बाल गृह में रहने वाले कई हिंदू नाबालिग छात्रों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया गया। मिशनरी अधिकारियों ने उन्हें भविष्य में पादरी बनाने का लालच दिया था।

छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष की कर सर्जरी, हो गई थी मौत

फर्जी डॉक्टर नरेन्द्र यादव ने दिसंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच मिशन अस्पताल में 15 हार्ट सर्जरी की है। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि साल 2006 में छत्तीसगढ़ विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की हार्ट सर्जरी करने का आरोप भी इसी फर्जी डॉक्टर पर लगा था। सर्जरी के बाद राजेंद्र शुक्ला की मौत हो गई थी।

यह ऑपरेशन बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में किया गया था। यह बात सामने आई है कि छत्तीसगढ़ में नरेंद्र यादव के ऑपरेशन करने के बाद 8 मरीजों की मौत हुई थी। तब भी जाँच हुई थी और एमबीबीएस की डिग्री पर शक जताया गया था, लेकिन एक्शन नहीं हुआ था। इन 18 सालों में उसने न जाने कितने मरीजों को मौत दे दी और परिजनों को बेपनाह दर्द।

बाउंसर, सूटकेस के साथ आता था अस्पताल

फर्जी डॉक्टर नरेन्द्र यादव मिशन अस्पताल में एक बाउंसर के साथ आता था, जो हमेशा सूटकेस लेकर चलता था। अस्पताल के मुताबिक, इस सूटकेस में पोर्टेबल ईको मशीन भी थी, जो अस्पताल की थी। अब ये मशीन गायब है। इसी रिपोर्ट थाने में दर्ज कराई गई है।

फर्जी डॉक्टर नरेश विक्रमादित्य यादव की गिरफ्तारी के बाद पेशी के दौरान गुस्साए लोगों ने पीटने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे बचा लिया। कोर्ट ने उसे 5 दिनों की पुलिस रिमांड में भेज दिया है। पुलिस उससे ‘सारा सच’ जानने की कोशिश कर रही है।

उसे अब घर के लड़कों से भी लगता है डर, क्योंकि 7 दिनों तक होता रहा रेप: पीड़ित पिता बोले- दानिश, साजिद, राज खान… ने बर्बाद कर दी बेटी की जिंदगी, अब तक 9 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 19 साल की लड़की के साथ गैंगरेप की दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। लड़की के पिता का कहना है कि उनकी बेटी के साथ जो कुछ भी हुआ, वो साजिश की तरफ इशारा करता है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में किसी को कोई जानकारी नहीं थी, बेटी जब होश में आई, तब उसने सारी बात बताई। पीड़िता के पिता ने बताया कि उसे (बेटी को) कई बार नशा दिया गया और उसके साथ गैंगरेप किया गया। हुक्का बार से लेकर अलग-अलग होटलों में उससे दरिंदगी की गई। वो अब घर के लड़कों से भी डरने लगी है।

पिता ने जताया साजिश का शक

पीड़ित लड़की के पिता का कहना है कि इतने सारे लोगों की संलिप्तता से साफ है कि यह एक सुनियोजित साजिश थी। प्राइवेट गाड़ी चलाकर घर चलाने वाले पीड़िता के पिता ने बताया कि उनकी बेटी स्पोर्ट्स टीचर बनना चाहती थी और इसके लिए वो बीपीएड की तैयारी कर रही थी। लेकिन इन दरिंदों ने उसका जीवन और करियर दोनों तबाह कर दिया।

पीड़िता के पिता के चार लड़कों के नाम लिए। उन्होंने कहा- दानिश, साजिद, राज खान और आयुष ने मेरी बेटी की जिंदगी को नर्क बना दिया। वो उसके क्लासमेट थे। उन्होंने मेरी बेटी को 7 दिन तक इतना नशा करवाया कि उसकी जिंदगी नर्क बन गई।

पीड़िता के पिता ने बताया, “मेरी बेटी 29 मार्च को अपनी सहेली से मिलने घर से निकली थी। इसके बाद उसके साथ ये सारी घटनाएँ हो गईं। उसने अपनी दोस्त के साथ गंगा घाट पर दिन बिताया और वहाँ कुछ लड़कों से उसकी मुलाकात हो गई। फिर 3-4 दिन तक उसका कोई पता नहीं चला। हम सब बहुत परेशान थे। समाज के डर से हमने पहले खुद उसे ढूँढने की कोशिश की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। फिर 3 अप्रैल को हमने पुलिस से मदद माँगी। पुलिस ने 4 अप्रैल को उसे ढूँढ लिया, लेकिन उसकी हालत बहुत खराब थी। इलाज के बाद जब वह ठीक हुई, तो उसने सारी बात बताई।”

पीड़ित के पिता ने आगे कहा, “बच्ची ने बताया कि उसे कई बार नशा दिया गया और कई लोगों ने उसके साथ गैंगरेप किया। इतने सारे लोगों का शामिल होना दिखाता है कि यह एक सोची-समझी साजिश थी। मेरी बेटी इंटर में कॉमर्स की पढ़ाई कर रही थी और वह स्पोर्ट्स में करियर बनाना चाहती थी। वह 19 साल की है। मैं किसी भी आरोपित को नहीं जानता और न ही पहचानता हूँ।

उन्होंने कहा, “मैं सीएम योगी आदित्यनाथ जी से यही आग्रह करूँगा कि जिस चीज के लिए वो जाने जाते हैं, ये दुनिया से छिपी नहीं है। मैं चाहता हूँ कि वो वही काम बाखूबी करें। हमें न्याय दें। मैं फाँसी की सजा की माँग नहीं कर रहा हूँ, लेकिन ऐसी सजा दी जाए कि कोई इस तरह का अपराध दोबारा न करे। ताकी बहुत सारी बच्चियों को इस तरह के अपराधों से बचाया जा सके।”

पुलिस ने 3 टीमें बनाई, 9 आरोपित गिरफ्तार

पुलिस के मुताबिक, इस मामले में तीन टीमें बनाई गईं। पहली टीम ने मालदीहिया इलाके के एक होटल से लड़की को बरामद किया, जहाँ उसे नशे की हालत में रखा गया था। दूसरी टीम ने सीसीटीवी फुटेज के जरिए लड़की के मूवमेंट को ट्रैक किया। तीसरी टीम ने 12 लोगों के बयान रिकॉर्ड किए, जिसमें 11 आरोपितों की पहचान हुई। इनमें राज विश्वकर्मा, अरुण धूसिया, साजिद, सुहेल, दानिश, इमरान, शब्बीर, सोहेल और अनमोल शामिल हैं। पुलिस ने बताया कि एक होटल में लड़की को कई बार नशा देकर उसके साथ गैंगरेप किया गया।

इस मामले में युवती की माँ की तहरीर पर 12 नामजद और 11 अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस ने इस मामले में 9 आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। सभी आरोपितों को जेल भेजने से पहले उनकी मेडिकल जाँच भी कराई गई।

ANI के खिलाफ आपमानजनक टिप्पणी हटाओ: दिल्ली हाई कोर्ट ने Wikipedia को दिया आदेश, कहा- तटस्थ रहो, ऑनलाइन ब्लॉग मत बनो

दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार (8 अप्रैल 2025) को विकिपीडिया की उसके ‘विचारपरक’ और ‘पक्षपाती’ कंटेंट के लिए आलोचना की। दरअसल, विकिपीडिया ने भारतीय न्यूज एजेंसी ‘एशियन न्यूज इंटरनेशनल (ANI)’ को अपने पेज पर केंद्र सरकार का ‘प्रोपगेंडा टूल’ यानी दुष्प्रचार उपकरण बताया था। इसके खिलाफ ANI ने अदालत का रूख किया था।

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता वाली दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि विकिपीडिया को ‘विश्वकोश’ के रूप में देखा जाता है। इसलिए इसे एक ऑनलाइन ब्लॉग की तरह दिखने के बजाय तटस्थ रहना चाहिए। यदि विकिपीडिया मध्यस्थ होने का दावा करता है तो वह मामले के गुण-दोष के आधार पर अदालत के फैसले को चुनौती नहीं दे सकता।

हाई कोर्ट ने कहा, “ईमानदारी से कहें तो हम सभी विकिपीडिया का उल्लेख करते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब बच्चे हाई स्कूल में होते हैं तो विकिपीडिया देखते हैं। बच्चों को इसके बारे में सिखा सकते हैं… शब्द ‘पीडिया’ विश्वकोश से आया है। एक विश्वकोश को बहुत तटस्थ होना चाहिए। विकिपीडिया इस तरह से एक महान सेवा कर रहा है… यदि आप इस तरह से पक्ष लेना शुरू करते हैं तो यह किसी ब्लॉग की तरह हो जाता है।”

विकिपीडिया के मध्यस्थ होने के दावे को लेकर खंडपीठ ने कहा, “आपने पहले ही दलील दी है कि आप एक मध्यस्थ हैं। IT नियमों के तहत उनका काम केवल अदालत के निर्देशों को लागू करना है। आप गुण-दोष के आधार पर इसका बचाव नहीं कर सकते। यदि आप एक मध्यस्थ हैं और अदालत आपको इसे हटाने का निर्देश देती है तो आप गुण-दोष के आधार पर बहस भी नहीं कर सकते।”

इससे पहले हाई कोर्ट की एकल जज ने 2 अप्रैल को अपने आदेश विकिपीडिया को ANI के खिलाफ अपमानजनक सामग्री हटाने और इस तरह के कंटेंट को आगे प्रकाशित करने पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। जज ने एएनआई के पेज में संपादन पर रोक लगाने के लिए लगाए गए प्रोटेक्शन स्टेट को भी हटाने का निर्देश दिया था।

इसमें थोड़ा संशोधन करते हुए डिवीजन बेंच ने कहा कि विकिपीडिया को अपमानजनक सामग्री को हटाना होगा, लेकिन यदि इसी तरह की सामग्री फिर से दिखाई देती है तो ANI को वह सूचित कर सकता है, जिससे आगे की कार्रवाई के लिए विकिपीडिया को प्रेरित किया जा सके। वहीं, ANI के पेज पर प्रोटेक्शन स्टेट हटाने के एकल जज के फैसले को भी स्थगित कर दिया।

दरअसल, एकल न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ विकिपीडिया ने दिल्ली हाई कोर्ट में डबल बेंच में अपील की थी। इसके बाद बेंच ने यह आदेश दिया। जुलाई 2024 में उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने विकिपीडिया को समन जारी किया था और उसे ANI के विकिपीडिया पेज पर संपादन करने वाले तीन लोगों के बारे में जानकारी का खुलासा करने का आदेश दिया था।

जब ANI ने शिकायत की कि विकिपीडिया ने इस निर्देश का पालन नहीं किया है तो एकल न्यायाधीश ने विकिपीडिया के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई और न्यायालय की अवमानना ​​का नोटिस जारी किया। विकिपीडिया के एक अधिकृत प्रतिनिधि को 25 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का भी आदेश दिया था। इसके बाद विकिपीडिया ने अपील में डिवीजन बेंच का रुख किया।

डिविजन बेंच में ANI और विकिपीडिया एक समझौते पर पहुँचे। इस समझौते के तहत विकिपीडिया ने उन यूजर्स को नोटिस देने पर सहमति जताई, जिन्होंने पेज का संपादन किया था। इसके बाद विकिपीडिया ने उन तीन उपयोगकर्ताओं को नोटिस दिया जिन पर एएनआई की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाले अपमानजनक संपादन करने का आरोप था।

गौरतलब है कि डिवीजन बेंच ने विकिपीडिया पर हाई कोर्ट के मामले से संबंधित ‘एशियन न्यूज इंटरनेशनल बनाम विकिमीडिया फाउंडेशन’ शीर्षक वाला पेज होस्ट करने के लिए भी आलोचना की और इसे हटाने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसके बाद जस्टिस नवीन चावला और रेणु भटनागर की बेंच ने मामले की सुनवाई बंद कर दी, क्योंकि जस्टिस नवीन चावला ने खुद को मामले से अलग कर लिया था।

बीत गए ‘कहाँ गई… बड़ा याद आती है’ वाले दिन, लौट आई ‘रिबेल किड्स’: अपूर्वा मुखीजा की नई सनसनी- दीवारों के भी कान होते हैं

आज से कुछ दशक पहले लोग चिट्ठी गायब होने पर पोस्टमैन को कोसते थे। अब इंस्टाग्राम पोस्ट गायब हो तो लोग सीधे ब्रह्मांड को दोष देने लगते हैं। अपूर्वा मुखीजा ने इंस्टा से सबकुछ डिलीट कर दिया!- जैसे ही ये खबर फैली, पूरे इंटरनेट में ऐसा कोहराम मचा, जैसे ‘कॉफी विद करण’ में कोई सलमान की शादी की तारीख बता दे।

‘द रिबेल किड’ यानी अपूर्वा, जिन्हें लोग इंस्टाग्राम की रंगीली विदूषी मानते थे, अचानक सबकुछ मिटा के गायब हो गईं। 21 दिनों तक उनकी कोई स्टोरी नहीं। कोई पोस्ट नहीं। एक बार को तो लगा कि शायद वो हिमालय चली गई हैं, फिल्टर के बिना ध्यान लगाने।

जब फॉलोअर्स हुए अनफॉलो

हमारे देश में दो चीज़ों का खास महत्व है- धार्मिक कर्मकांड और इंस्टाग्राम फॉलोअर्स। अपूर्वा ने एक झटके में दोनों की तरह अपने अकाउंट की पवित्रता का जलाभिषेक कर डाला। सभी को अनफॉलो किया और प्रोफाइल में ‘निंबू-मिर्ची’ टाँग दी। 2.9 मिलियन ‘रेबेलियंस’ को संपत्ति का दर्जा दिया।

अपूर्वा मुखीजा इंस्टाग्राम
‘द रेबेल किड’ उर्फ अपूर्वा मुखीजा का इंस्टाग्राम पर शून्य फॉलोइंग (साभार: Instagram – the.rebel.kid)

जनता ने सोचा, “कहीं किसी ने कुछ कह दिया होगा”। कुछ लोगों ने उनके डिलीटेड पोस्ट्स पर थ्योरी बनाई जैसे NASA वाले एलियन्स पर बनाते हैं। एक ट्रेंडसेटर ने यहाँ तक कह दिया, “यार, ये तो डिजिटल रिडेम्प्शन है, मैं भी आज सबकुछ डिलीट कर रहा हूँ।”

पर जनाब! डिलीट करने के बाद उनकी रील्स पर सिर्फ 42 लाइक्स आए और वह दोबारा अपूर्वा को फॉलो करने लगे। बस फर्क इतना था कि अब उन्हें फॉलो-बैक नहीं मिला।

टैलेंट तो गया पर ट्रोल्स आ गए

अब इस किस्से का सबसे मसालेदार हिस्सा आता है- ‘इंडियाज़ गॉट लैटेंट’। नाम से तो लगा था कोई मज़ेदार टैलेंट शो है, लेकिन निकला ऐसा अखाड़ा, जहाँ कंटेंट क्रिएटरों को नाटक, ड्रामा और धमकियों की तीर-कमान से नवाज़ा गया।

शो में अपूर्वा मुखीजा को बुलाया गया। सबने सोचा अब उनके ह्यूमर का जादू चलेगा। लेकिन हो गया उल्टा। एक और पैनलिस्ट ने ऐसा बयान दे डाला कि विवाद का मिर्ची पाउडर पूरे शो में छिड़क गया।

और फिर शुरू हुई असली चटनी – धमकियों की बाढ़, चरित्र हनन, ट्रोलिंग, मीम्स, ट्विटर थ्रेड्स और कानून के झंडे। रिपोर्ट्स के अनुसार, अपूर्वा पर FIR दर्ज कर दी गई जैसे वो कोई गैंगस्टर हों और इंस्टाग्राम की गली में कोई रील की डकैती कर ली हो।

21 दिन बाद जब ‘दीवारों के भी कान होते हैं’

21 दिन बाद, अपूर्वा का ‘कमबैक’ हुआ। हाँ वही जिसकी उम्मीद हमे अपने जीवन से है। अपूर्वा का इंस्टा ब्रॉडकास्ट एक लाइन से वायरल हो गई “दीवारों के भी कान होते हैं।”

अपूर्वा मुखीजा ब्रॉडकास्ट चैनल
अपूर्वा ने ब्रॉडकास्ट चैनल पर लिखा ‘दीवारों के भी कान होते हैं’ (साभार : Instagram Broadcast ‘Rebellions’)

जनता ने इसे ऐसे पढ़ा जैसे कुरान की आयत हो या गुरुजी का संकेत। कोई बोला, “ये उन ट्रोल्स के लिए है।” दूसरा बोला, “नहीं रे! ये शो के प्रोड्यूसर के लिए है।” तीसरा चिल्लाया, “मैं तो इसे अपनी एक्स को भेजूंगा!”

फिर आया दूसरा पोस्ट, “इसलिए शुक्रिया।” अब जनता का दिमाग पूरी तरह फ्राई हो गया। शुक्रिया किसे? धमकी देने वालों को? FIR करने वालों को? या फिर भगवान को जिन्होंने 21 दिन तक वाईफाई बंद रखा?

डिजिटल शांति या सोशल मीडिया का सन्नाटा?

21 दिनों तक अपूर्वा ने सोशल मीडिया पर ‘ब्रह्मचारी’ जीवन बिताया। न रील, न ट्रेंडिंग ऑडियो, न फोटो डंप। उनके फैन क्लब वालों ने एक याचिका तक बना दी, “Bring Apoorva Back, or We Quit Instagram”।

इधर ट्रोल्स भी कंफ्यूज थे। एक ने कहा, “हमने तो मज़ाक उड़ाया पर वो चली गई, अब किसपे मीम बनाएँ?” इतने में दूसरे ने कहा, “चुप रहो! वो वापस आई है और उसके पास स्क्रीनशॉट्स हैं।”

जिन्हें कहानियाँ सुनानी आती हैं, उन्हें चुप कराना मुश्किल

अपूर्वा की कहानी महज एक इंटरनेट सेंसेशन की नहीं बल्कि उस डिजिटल समाज की है, जहाँ एक लड़की जब बोलती है, तो ट्रोल्स की तलवारें खिंच जाती हैं। अपूर्वा की स्टोरी टेलिंग की प्रतिभा का हर कोई फैन है। इसीलिए उसे चुप कराना मुश्किल है।

वो इंस्टाग्राम पर हँसी-मज़ाक करती, फनी रील बनाती, समाज पर तंज कसती थी। लेकिन जैसे ही उसने एक मंच पर कुछ ऐसा कहा जो ‘व्यवस्था’ को पसंद नहीं आया, उसके खिलाफ धमकियाँ शुरू हो गईं। FIR तक हुई। और सबसे बड़ी विडंबना तो यह थी कि एक शो जिसका नाम ‘India’s Got Latent’ था, उसने असली टैलेंट को ही चुप करवा दिया।

अपूर्वा लौट चुकी है

आज की डिजिटल दुनिया में कोई लड़की ज़्यादा बोलती है तो ‘Feminism’ की कैटेगरी में आती है। कभी उसे ‘Attention Seeker’ कहा जाता है। कभी ‘Over Sensitive’ और जब वो चुप हो जाती है तो वही लोग कहते हैं – “कहाँ गई? बड़ा याद आती है!”

पर अब अपूर्वा लौट चुकी हैं। उनके पास शब्द भी हैं, स्क्रीनशॉट भी। उनके पास व्यंग्य भी है, व्यथा भी। और सबसे बड़ी बात- उनके पास उनके फॉलोअर्स का वो भरोसा है, जो जानता है कि ‘दीवारों के भी कान होते हैं’। पर ‘रिबेल किड’ की आवाज़ अब गूँगी नहीं रही।