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2 बच्चों के अब्बा रजा खान ने जिम में हिंदू लड़की को फँसाया, राजा नाम बताकर किया रेप: पीड़िता बोली- धर्मांतरण का भी था दबाव, अलीगढ़ में केस दर्ज

यूपी में लव जिहाद का एक अलग तरह का मामला सामने आया है। एक जिम जाने वाली हिन्दू लड़की को जिम संचालक रजा खान ने पहले अपने प्रेम जाल में फँसाया। लड़की का रेप किया और पहचान उजागर होने पर मुस्लिम बनने के लिए मजबूर करने लगा।

प्रेम में फँसा कर रेप, वीडियो बना कर ब्लैकमेल

अलीगढ़ के थाना रोरावर पुलिस ने जिम संचालक रजा खान के खिलाफ शिकायत दर्ज की है। पीड़िता ने ये एफआईआर दर्ज कराते हुए पुलिस को सारी कहानी बयाँ की। पीड़िता ने कहा कि जिम संचालकर रजा खान ने अपना नाम छिपाया और राजा के रूप में उससे मिला फिर होटल ले जाकर रेप किया।

पीड़िता का अश्लील वीडियो भी बनाया और जब उसे रजा खान की असलियत का पता चल गया तो लड़की पर धर्म बदलकर मुसलमान बनने और उसके साथ निकाह करने का दबाव भी बनाने लगा।

नाम बदलकर रजा खान ने की दोस्ती

रजा खान शादीशुदा होने के साथ- साथ दो बच्चों का बाप भी है। पीड़िता ने कहा कि जब उसने जिम जाना शुरू किया तो वहाँ रजा खान ट्रेनिंग दिया करता था। बातचीत आगे बढ़ी और उसने अपना नाम राजा बताया। इस दौरान वो एकाध बार उसके साथ बाहर भी गई।

पीड़िता का कहना है कि जिम चलाने वाला रजा खान अपने नाम और धर्म छिपाकर दोस्ती की थी और होटल ले जाकर उसके साथ रेप किया। इस दौरान उसने अश्लील वीडियो फोटो बनाया। पहचान उजागर होने पर उसने पीड़िता को वीडियो दिखा कर ब्लैकमेल करने लगा। रजा खान पीड़िता को निकाह करने के लिए जोर देने लगा। रजा खान चाहता था कि पीड़िता नमाज पढ़ना शुरू कर दे।

पीड़िता ने उससे पीछा छुड़ाने की कोशिश की। उसके घरवालों ने उसकी शादी किसी दूसरी जगह तय कर दी इससे गुस्साए रजा खान ने लड़की की शादी जहां हो रही थी उन्हें वीडियो-फोटो भेज दिया। इससे रिश्ता टूट गया। तंग आकर घरवालों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

हेडली कनेक्शन से लेकर फिदायीन हमलावरों की ट्रेनिंग तक: तहव्वुर राणा से 18 दिन होंगे ताबड़तोड़ सवाल, कोर्ट ने 26/11 के साजिशकर्ता को NIA की रिमांड में भेजा

26/11 मुंबई आतंकी हमले का साजिशकर्ता तहव्वुर राणा को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 18 दिनों की रिमांड पर भेज दिया। 11 अप्रैल से एनआईए पूछताछ में जुट गई है। एनआईए ने तहव्वुर राणा की 20 दिन की रिमांड मांगी थी जिसे आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कोर्ट ने 18 दिनों की रिमांड पर भेज दिया। इसके बाद राणा की रात एनआईए मुख्यालय में कटी।

तहव्वुर का NIA के सवालों से सामना

मुंबई हमले से जुड़े सवालों की बात करें तो एनआईए इन अहम सवालों को तहव्वुर राणा से पूछ सकती है। तहव्वुर राणा 8 से 21 नवंबर 2008 के बीच क्यों आया था भारत? भारत के किन किन क्षेत्रों में गया और किन-किन लोगों से मुलाकात की? मुंबई हमले का एक और गुनहगार डेविड हेडली से राणा कब और कहाँ मिला, उनके बीच क्या बातें हुई? उन दोनों की पहली मुलाकात कब हुई थी?

एनआईए ये भी जानने की कोशिश करेगी कि क्या मुंबई के अलावा दूसरी जगहों पर भी आतंकी हमले की साजिश थी? किन-किन पाकिस्तानी अधिकारियों के संपर्क में आए और क्या निर्देश मिले?

राणा से ये भी पूछा जा सकता है कि लश्कर ए तैयबा और हाफिज सईद के साथ उसके संबंध कब से थे? हाफिज से कब मिला था? लश्कर और दूसरे आतंकी संगठनों के किस-किस लोगों से मिला है? डॉक्टर होने के बावजूद मेडिकल का पेशा छोड़कर आतंकी क्यों बना? एनआईए ऐसे सवालों के जवाब किसी भी हाल में राणा से निकलवाना चाहेगी। जाहिर तौर पर राणा के जवाब पाकिस्तान के लिए मुश्किलें पैदा करेंगी ।

तहव्वुर राणा को प्रत्यर्पण के बाद अमेरिका से भारत लाया गया है। कई सालों की लंबी कानूनी लड़ाई और भारत-अमेरिका संबंध की वजह से ये संभव हो पाया। 10 अप्रैल 2025 को दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचने के बाद उसे एनआईए ने पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया। इस दौरान एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि मुंबई हमले की तह तक जाने के लिए राणा से हिरासत में पूछताछ बेहद जरूरी है ।

मुंबई आने से पहले हेडली मिला था राणा से

एनआईए ने कोर्ट को बताया कि साजिशकर्ता डेविड हेडली के भारत आने से पहले तहव्वुर राणा ने उससे बात की थी। हेडली अपने सामान और संपत्तियों का ब्यौरा एक ईमेल के जरिए राणा को बताया था। राणा की साजिश में इलियास कश्मीरी और अब्दुल रहमान भी शामिल था। अब पूरी साजिश पर तहव्वुर राणा से एनआईए पूछताछ करेगी।

मोदी सरकार ने कर दिखाया… कौन है आतंकी तहव्वुर राणा, 26/11 की कैसे रची साजिश; कैसे दबोचकर लाई NIA

साल 2008 में हुए मुंबई में आतंकी हमलों का सरगना तहव्वुर राणा को अमेरिका से प्रत्यर्पित करके गुरुवार (10 अप्रैल 2025) को लाया गया है। भारत पहुँचते ही NIA ने उसे आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार कर लिया। हवाई अड्डे पर ही डॉक्टरों की एक पैनल ने उसका मेडिकल किया। इसके बाद उसे पाटियाला हाउस स्थित NIA कोर्ट में पेश किया जाएगा। इस दौरान सुरक्षा के अभूतपूर्व प्रबंध किए गए।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 64 साल के तहव्वुर को NIA के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक विशेष अमेरिकी विमान से लॉस एंजिल्स से दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर लाया गया। यह विमान गल्फस्ट्रीम है, जिसका कॉल साइन AOJ 96M है। दिल्ली एयरपोर्ट पर दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के SWAT कमांडो तैनात हैं। इसके अलावा, सुरक्षा को देखते हुए जगह-जगह बैरिकेडिंग की गई है।

NIA की DIG जया राय, IG आशीष बत्रा और SP प्रभात कुमार एनआईए की टीम को लीड कर रहे है। इनकी अगुवाई में तहव्वुर को पाटियाला हाउस कोर्ट में लाया जाएगा। कोर्ट को खाली करा लिया गया है। कोर्ट के आसपास किसी को भी जाने की इजाजत नहीं है। एनआईए मुख्यालय को भी सेनेटाइज कर लिया गया है। जगह-जगह डॉग स्क्वॉयड तैनात किए गए हैं।

वहीं, तहव्वुर की ओर से एडवोकेट पीयूष सचदेवा कोर्ट में पैरवी करेंगे। दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने सचदेवा को नियुक्त किया है। पीयूष सचदेवा ने सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए अपनी तस्वीरें प्रसारित नहीं करने का मीडिया से अनुरोध किया है। तहव्वुर को NIA के विशेष जज चंद्रजीत सिंह की कोर्ट में पेश किया जाएगा। एडवोकेट सचदेवा और NIA के वकील नरेंद्र मान भी कोर्ट पहुँच चुके हैं।

तिहाड़ के हाई सिक्योरिटी सेल में रखा जाएगा तहव्वुर

अमेरिका से प्रत्यर्पित तहव्वुर राणा को दिल्ली स्थित तिहाड़ जेल में एक हाई सुरक्षा वार्ड में रखा जाएगा। उसके रखने के लिए जेल में सभी आवश्यक तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं। उसे तिहाड़ के अंडा सेल में रखा जाएगा। यह सेल हर तरफ से सुरक्षित मानी जाती है। इस सेल का आकार अंडे की तरह होता है, इसलिए अंडा सेल कहा जाता है।

अंडा सेल खूंखार अपराधियों एवं आतंकियों तथा हाई रिस्क वाले कैदियों के लिए बनाया गया है। इस सेल में कोई खिड़की भी नहीं होती है। सुरक्षा को देखते हुए इसमें बिजली भी नहीं होती है। इसलिए इसमें आमतौर पर दिन में भी अंधेरा जैसा होता है। इसकी दीवारों बेहद मोटी और लोहे-स्टील की मोटी-मोटी चादरों से बनी होती हैं।

कहा जाता है कि इस सेल पर बम का भी कम प्रभाव पड़ता है। इसमें कोई बाहर से हमला ना कर सके, इसको देखते हुए इसके चारों तरफ करंट वाले तार लगाए गए होते हैं। इस सेल के आसपास के हर क्षेत्र की निगरानी सीसीटीवी कैमरों से की जाती है और अपराधी पर 24 घंटे नजर रखी जाती है। इसकी निगरानी तिहाड़ में बने कंट्रोल रूम से की जाती है।

पीएम मोदी के प्रयासों से लाया गया खतरनाक आतंकी

मुंबई हमलों के इस मास्टरमाइंड को भारत लाने के लिए लगातार प्रयास किए जाते रहे हैं। अमेरिका में जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने तो इस प्रक्रिया में तेजी आ गई। फरवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तहव्वुर राणा के प्रत्यर्पण का ऐलान किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वॉशिंगटन में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने इसका ऐलान किया था।

उस समय डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था, “तहव्वुर राणा को भारत भेजा जाएगा, जहाँ उसे इंसाफ मिलेगा।” तहव्वुर राणा ने अपने भारत प्रत्यर्पण को रोकने के लिए कई उपाय किए थे। वह लगातार अमेरिकी कोर्ट का चक्कर लगा रहा था। हालाँकि, उसे राहत नहीं मिली। तहव्वुर ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में 27 फरवरी 2025 को ‘इमरजेंसी एप्लिकेशन फॉर स्टे’ दायर की थी।

यह याचिका जस्टिस एलेना कागन के पास भेजी गई थी, जो सुप्रीम कोर्ट की एसोसिएट जस्टिस और नाइंथ सर्किट की जस्टिस हैं। तहव्वुर ने दावा किया था कि भारत आने पर उसकी जान को खतरा है और उसे टॉर्चर का शिकार होना पड़ सकता है। उसने दलील थी कि उसका पाकिस्तानी मूल और मुस्लिम होना उसे भारत में खतरे में डाल सकता है।

हालाँकि, जस्टिस कागन ने उसकी अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने फिर से कोशिश की थी, लेकिन उसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने इस आतंकी को कोई राहत नहीं दी। बता दें कि भारत और अमेरिका के बीच प्रत्यर्पण संधि है। इसी संधि के तहत यह निर्णय लिया गया है। हालाँकि, उसके प्रत्यर्पण के लिए अमेरिका द्वारा कुछ शर्तें निर्धारित की गई हैं।

शर्तों के तहत तहव्वुरा राणा का प्रत्यर्पण

तहव्वुर राणा का अमेरिका से प्रत्यर्पण साल 1997 के भारत-अमेरिका प्रत्यर्पण संधि के तहत हुआ है। इस संधि के तहत भारत सरकार कुछ सख्त नियमों एवं शर्तों से बँधी हुई है। संधि के अनुसार, जिस व्यक्ति या अभियुक्त का प्रत्यर्पण होगा, उसके अधिकारों का सम्मान किया जाएगा। इसके तहत तहव्वुर राणा को भारत में केवल उसी अपराध के लिए मुकदमा चलाया जाएगा, जिसके लिए प्रत्यर्पण हुआ है।

अगर भारत सरकार किसी अन्य अपराध के लिए तहव्वुर पर कार्रवाई करना चाहती है तो यह संभव नहीं होगा। संधि की एक शर्त यह भी है कि प्रत्यर्पण से पहले किए गए किसी भी अपराध के लिए तहव्वुर राणा को किसी तीसरे देश के हवाले नहीं किया जा सकेगा। इसके अलावा, उसे उसके खिलाफ लगाए आरोपों की भी निष्पक्ष सुनवाई की जाएगी, यह संधि की शर्त है।

संधि के तहत फाँसी की सजा पर भी रोक का प्रावधान है। संधि के अनुच्छेद-8 की धारा-1 में कहा गया है कि जिस मामले में प्रत्यर्पण की माँग की जा रही है, अगर उसमें प्रत्यर्पण की माँग करने वाले देश में मौत की सजा का प्रावधान है और जिस देश से प्रत्यर्पित किया जाना है, उसमें मौत की सजा का प्रावधान नहीं है तो प्रत्यर्पण की अपील खारिज की जा सकती है।

समझौते के पैराग्राफ-1(B) में कहा गया है कि प्रत्यर्पण की माँग करने वाले देश को यह आश्वासन देना होगा कि आरोपित को फाँसी की सजा सुनाए जाने की दशा में सजा पर अमल नहीं होगा। इस अनुच्छेद की धारा-2 में कहा गया है कि प्रत्यर्पण की माँग करने वाले देश को आश्वासन देना होगा कि अगर उनकी कोर्ट की ओर से आरोपित को मौत की सजा देती है तो उस पर अमल नहीं किया जाएगा। 

कौन है तहव्वुर राणा और उसका साथी कोलमैन हेडली

अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने इस साल जनवरी के अंतिम सप्ताह में तहव्वुर राणा को भारत प्रत्यर्पित करने की मंजूरी दी थी। तहव्वुर पाकिस्तानी मूल का कनाडाई/अमेरिकी व्यवसायी है। वह शिकागो में ‘फर्स्ट वर्ल्ड इमिग्रेशन सर्विसेज’ नाम की फर्म चलाता था। तहव्वुर पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी ISI और वहाँ से संचालिक इस्लामी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का वह सक्रिय सदस्य है।

मुंबई हमले की जाँच करने वाली एजेंसी NIA ने 405 पन्नों की चार्जशीट में तहव्वुर राणा को आरोपित बनाया है। चार्जशीट में कहा गया है कि वह हमले का सरगना डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद सईद गिलानी की मदद कर रहा था। तहव्वुर और हेडली ने मुंबई हमले का ब्लूप्रिंट तैयार किया था। तहव्वुर ने आतंकियों को बताया था कि मुंबई में आतंकियों को कहाँ ठहरना है और कहाँ-कहाँ हमले करने हैं।

तहव्वुर ने यह भी बताया था कि उसे जानकारी थी कि हेडली किससे मिल रहा है और उनसे क्या बात कर रहा है। उसे हमले की योजना और टारगेट के बारे में भी बता था। तहव्वुर राणा अपने बचपन के दोस्त और आतंकियों के मददगार डेविड कोलमैन हेडली की आर्थिक सहित हर तरह से मदद करके इस्लामी आतंकियों का सपोर्ट कर रहा था।

कनाडाई-अमेरिकी नागरिक हेडली की माँ अमेरिका और उसके अब्बू पाकिस्तानी मूल के थे। अमेरिकी अधिकारियों ने अक्टूबर 2009 में हेडली को अमेरिका के शिकागो से गिरफ्तार किया था। अमेरिकी कोर्ट ने 24 जनवरी 2013 को मुंबई में आतंकी हमलों में शामिल होने का दोषी मानते हुए हेडली को 35 साल जेल की सजा सुनाई थी। भारत हेडली के प्रत्यर्पण की भी लगातार माँग कर रहा है।

तहव्वुर और हेडली बचपन के दोस्त हैं। हेडली भी शुरुआती 5 साल की पढ़ाई पाकिस्तान के हसन अब्दाल कैडेट स्कूल में की है। इसके बाद वह परिवार के साथ अमेरिका चला गया। तहव्वुर राणा भी इसी स्कूल में पढ़ा है। बाद में वह पाकिस्तानी सेना में डॉक्टर के रूप में काम करने लगा। फिर वह कनाडा चला गया। कुछ साल के बाद उसे कनाडा की नागरिकता मिल गई।

तहव्वुर की ‘फर्स्ट वर्ल्ड इमिग्रेशन सर्विसेज’ नाम की कंसल्टेंसी फर्म की एक शाखा मुंबई में भी थी। इसी फर्म के सहारे कोलमैन हेडली हेडली भारत आया था और हमले करने वाली जगहों की रेकी की थी। तहव्वुर राणा फिलहाल अमेरिका के लॉस एंजिल्स के मेट्रोपोलिटन डिटेंशन सेंटर में हिरासत में है। उसे एफबीआई ने साल 2009 में शिकागो से दबोचा था। 

बता दें कि 26 नवंबर 2008 को मुंबई में लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने हमला किया था। आतंकियों ने मुंबई के लियोपोल्ड कैफे, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, होटल ताज पैलेस, होटल ओबेरॉय ट्राइडेंट, कामा हॉस्पिटल, नरीमन हाउस, मेट्रो सिनेमा और सेंट जेवियर कॉलेज ने निशाना बनाया था। वे अपने साथ भारी मारा मात्रा में IED, RDX, हैंड ग्रेनेड और AK-47 लेकर आए थे।

इस हमले में 166 लोग मारे गए थे और 300 लोग मारे गए थे। मृतकों में अमेरिकी सहित कुछ विदेशी नागरिक भी शामिल थे। इन आतंकियों के खिलाफ NSG, मरीन कमांडो फोर्स, मुंबई पुलिस, RAF, CRPF, मुंबई फायर ब्रिगेड और रेलवे पुलिस फोर्स ने ऑपरेशन चलाया था। इस दौरान एक आतंकी अजमल कसाब को जिंदा गिरफ्तार किया था। साल 2012 में उसे फाँसी दी दे गई थी।

IT मंत्री अश्विनी वैष्णव ने जयराम रमेश के दावे की निकाली हवा, कहा- डेटा प्रोटेक्शन कानून से RTI खत्म नहीं हुआ: कॉन्ग्रेस नेता ने कहा था- आरटीआई कानून को बर्बाद कर रही सरकार

केंद्रीय सूचना और तकनीक मंत्री अश्विनी वैष्णव ने गुरुवार (10 अप्रैल 2025) को कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश के उस दावे का जवाब दिया, जिसमें रमेश ने कहा था कि डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 की धारा 44(3) ने सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई एक्ट 2005) को बर्बाद कर दिया है।

जयराम रमेश ने अपनी चिट्ठी में आईटी मंत्री से माँग की थी कि डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 की धारा 44(3) को हटा दिया जाए, क्योंकि ये आरटीआई एक्ट 2005 को खत्म कर देता है। रमेश ने लिखा था, “आरटीआई एक्ट 2005 की धारा 8(1)(j) में एक नियम था, जो आम लोगों को अपने विधायकों जितना ही सूचना का हक देता था, वो अब पूरी तरह से हट गया है।”

23 मार्च 2025 को लिखी गई जयराम रमेश की चिट्ठी का जवाब देते हुए आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 “पुट्टस्वामी फैसले में दी गई निजता के सिद्धांतों और आरटीआई एक्ट में तय की गई पारदर्शिता के सिद्धांतों के साथ पूरी तरह से मेल खाता है।”

अश्विनी वैष्णव ने आगे बताया कि पुट्टस्वामी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि निजता का अधिकार जिंदगी के अधिकार का अहम हिस्सा है, जो संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मौलिक अधिकार है। ये निजता का अधिकार निजी जानकारी की सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है।

वैष्णव ने अपनी चिट्ठी में लिखा, “इसलिए, समाज के लोगों और संसद के कई मंचों के साथ लंबी बातचीत के बाद ये साफ हुआ कि सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार में संतुलन जरूरी है। डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, जिसे संसद ने पास किया, इस जरूरत को पूरा करता है और साथ ही जनजीवन में पारदर्शिता भी बनाए रखता है। ये सब डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की धारा 3 के जरिए सुनिश्चित किया गया है।”

उन्होंने ये भी लिखा, “इस कानून के नियमों के तहत, ये लागू नहीं होगा… (c) ऐसी निजी जानकारी पर, जो… (B) किसी ऐसे शख्स द्वारा सार्वजनिक की गई हो, जिसे भारत में मौजूदा किसी कानून के तहत वो जानकारी सबके सामने लानी ही थी।”

आईटी मंत्री ने आगे कहा कि जो भी निजी जानकारी हमारे जनप्रतिनिधियों या कल्याणकारी योजनाओं जैसे मनरेगा आदि को चलाने वाले कानूनों के तहत सबके सामने लानी जरूरी है, वो आरटीआई एक्ट के तहत अब भी सामने आएगी। उन्होंने ये भी जोड़ा कि ये बदलाव निजी जानकारी को छुपाने के लिए नहीं है, बल्कि लोगों के निजता के अधिकार को मजबूत करने और कानून के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए है।

बंगाल में वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन हुआ हिंसक, तोड़फोड़ और भगवा झंडे फेंके गए: मंत्री सिद्दीकुल्लाह ने कोलकाता ठप करने की दी धमकी, CM ममता ने मुस्लिमों की संपत्ति बचाने की खाई थी कसम

पश्चिम बंगाल में वक्फ संशोधन बिल के पार्लियामेंट में पास होने के बाद से कई जगहों पर हिंसा हो रही है। प्रदर्शनकारी उस वक्त और जोश में आ गए, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुलकर वक्फ कानून का विरोध किया और अपने राज्य के मुस्लिमों को भरोसा दिलाया कि उनकी सरकार वक्फ की संपत्तियों को बचाएगी। पहले मुर्शिदाबाद, नदिया और मालदा में मुस्लिम प्रदर्शनकारियों की हिंसा की खबरें आई थीं। अब सांतरागाछी और कोलकाता से भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आ रही हैं।

बीजेपी आईटी सेल के हेड अमित मालवीय ने हिंसा की घटनाओं से जुड़े वीडियो शेयर किए हैं, जो सांतरागाछी और कोलकाता में हुईं। मालवीय द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में एक बस ड्राइवर अपनी गाड़ी से भगवा झंडा हटाता दिख रहा है।

मालवीय का कहना है कि इस्लामवादी प्रदर्शनकारियों ने बस ड्राइवर पर इतना दबाव डाला कि वो भगवा झंडा हटा दे। वीडियो में बस ड्राइवर के चारों तरफ ढेर सारे मुस्लिम प्रदर्शनकारी दिख रहे हैं, जो वक्फ कानून के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। वहाँ कुछ पुलिसवाले भी खड़े हैं, और जब ड्राइवर भगवा झंडा हटाता है तो प्रदर्शनकारी चिल्लाते और तालियाँ बजाते हैं।

मालवीय के मुताबिक, ये घटना कोलकाता में हुई। उन्होंने एक्स पर लिखा, “भगवा सिर्फ एक रंग नहीं है – ये हमारी हस्ती और विरोध का प्रतीक है। इसे स्वामी विवेकानंद, स्वामी प्रणवानंद और न जाने कितने संतों ने गर्व से पहना, जिन्होंने इंसानियत की सेवा के लिए अपनी जिंदगी लगा दी। हमारे देश के झंडे में ये हिम्मत और कुर्बानी को दिखाता है। लेकिन कोलकाता में एक परेशान करने वाली घटना सामने आई है। एक बस ड्राइवर, जो अपना काम कर रहा था और यात्रियों को ले जा रहा था, उसे कथित तौर पर इस्लामिस्टों ने दबाव डालकर भगवा झंडा हटाने के लिए मजबूर किया, वो भी पुलिस की मौजूदगी में। क्या पश्चिम बंगाल में हिंदू होना गुनाह बन गया है, ममता बनर्जी?” मालवीय ने घटना का वीडियो भी शेयर किया।

अमित मालवीय ने एक और एक्स पोस्ट में दावा किया, “पश्चिम बंगाल के राज्य मंत्री सिद्दीकुल्लाह चौधरी कोलकाता को ठप करने की धमकी दे रहे हैं। उनका कहना है, ‘अगर हम चाहें तो कोलकाता को बंद कर सकते हैं। हम आसानी से शहर में ट्रैफिक जाम कर सकते हैं। हम कोलकाता को मुरमुरे, गुड़ और मिठाइयों से जाम कर देंगे। जिलों के बाद अब कोलकाता पर हम अपनी पकड़ मजबूत करेंगे। अभी तक हमने ऐसा नहीं किया, लेकिन आगे करेंगे।’ और वो ये सब ममता बनर्जी के पूरे समर्थन से बोल रहे हैं।”

मालवीय ने जो दूसरा वीडियो शेयर किया, उसमें कुछ मुस्लिम लोग, जिनके सिर पर टोपी है, एक कार को तोड़ते दिख रहे हैं। उस कार पर हिंदू धार्मिक चिन्ह लगा हुआ था। मालवीय का कहना है कि ये घटना सांतरागाछी में हुई। वीडियो में कुछ पुलिसवाले दिखते हैं, जो हमलावरों को रोकने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।

मालवीय ने लिखा, “देखिए सांतरागाछी, पश्चिम बंगाल में क्या हो रहा है – वक्फ विरोध के बहाने हिंदुओं की कारों को तोड़ा जा रहा है। हैरानी की बात ये है कि पुलिसवाले वहाँ मौजूद हैं, लेकिन चुपचाप देख रहे हैं। जिन गाड़ियों पर महादेव के स्टिकर लगे हैं, उन्हें खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है, यहाँ तक कि लातें मारी जा रही हैं। ये सब ममता बनर्जी की अगुवाई में हो रहा है।”

हालाँकि, मालवीय ने जिस रिपोर्ट का हवाला दिया, उसमें कहा गया कि उस गाड़ी पर हमला तब हुआ, जब प्रदर्शनकारियों की तरफ बंदूक तान दी गई थी।

स्कूल कहकर मिशनरी बनवा रहे थे चर्च, भांडा फूटा तो बिहार के ग्रामीणों ने तोड़ा: ₹1000 हजार और शादी का लालच देकर बनाते थे ईसाई, 3 साल पहले भी छपरा में पकड़ा गया था मतांतरण का खेल

बिहार के सारण जिले में छपरा के रिविलगंज इलाके में बुधवार (8 अप्रैल 2025) को कुछ गुस्साए लोगों ने एक निर्माणाधीन चर्च को तोड़ दिया। ये चर्च जसा टोला के वार्ड नंबर 10 में दलित गाँव में स्कूल की आड़ में बन रहा था। ग्रामीणों का आरोप है कि ईसाई मिशनरी लोग उन्हें लालच देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर कर रहे थे। इसके बाद पुलिस ने बीएनएसएस की धारा 163 (पहले सीआरपीसी की धारा 144) लागू कर दी। मिशनरी संगठन ने शिकायत दर्ज कराई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस को जैसे ही चर्च में तोड़फोड़ की खबर मिली, वो मौके पर पहुँची और हालात का जायजा लिया। सारण के एसएसपी कुमार आशीष ने गुरुवार (9 अप्रैल 2025) को एक प्रेस रिलीज में बताया कि तोड़फोड़ में चर्च से एक बिजली का मीटर और दो सेंटरिंग प्लैंक हटाए गए। मिशनरी संगठन की शिकायत पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर एक ग्रामीण को हिरासत में भी लिया है।

एसएसपी ने कहा कि बुधवार (8 अप्रैल 2025) को सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें इलाके में ईसाई धर्मांतरण की बात कही गई थी। गांव वालों की शिकायत पर थानेदार और सर्किल ऑफिसर ने जाँच शुरू की। पुलिस को अभी तक धर्मांतरण का कोई सबूत नहीं मिला, लेकिन मामला गंभीर होने की वजह से सब-डिविजनल पुलिस ऑफिसर, सदर-1 आगे जाँच कर रहे हैं।

जबरन धर्मांतरण में जुटे थे ईसाई मिशनरी

ग्रामीणों का आरोप है कि दो साल से चर्च का निर्माण चल रहा था। एक स्थानीय शख्स रामनाथ माँझी ने 3 अप्रैल 2025 को इसके खिलाफ शिकायत की थी। माँझी ने बताया कि जहानाबाद का ज्योति प्रकाश नाम का शख्स जमीन खरीदकर स्कूल बनाने की बात कह रहा था। ग्रामीणों ने भी स्कूल समझकर निर्माण में मदद की। लेकिन बाद में वहाँ चर्च का बोर्ड लगा देखकर सब चौंक गए। फिर मिशनरियों ने ग्रामीणों को ईसाई बनने के लिए लालच देना शुरू कर दिया। इससे लोग नाराज हो गए और चर्च के खिलाफ खड़े हो गए।

एक हजार रुपये के साथ होली वॉटर भी देते थे मिशनरी

रामनाथ माँझी ने बताया कि मिशनरी धीरे-धीरे निर्माणाधीन इमारत में आने लगे और हर रविवार को प्रेयर (प्रार्थना) करने लगे। जो भी प्रार्थना में शामिल होता, उसे लिफाफे में एक हजार रुपये दिए जाते। पैसे और राशन का लालच देकर लोगों को फँसाया जा रहा था। मिशनरियों ने कहा कि अगर वो ईसाई बन जाएँ तो उनकी बेटियों की शादी और बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाया जाएगा। साथ ही छठ पूजा जैसे हिंदू त्योहार मनाने से भी रोकने लगे।

ग्रामीणों का कहना है कि मिशनरियों ने उन्हें खास पानी की बोतलें दीं और 20 दिन तक पीने को कहा। ‘हालेलुइयाह’ बोलने की सलाह भी दी। एक स्थानीय महिला विद्यावती देवी ने बताया, “वो कहते थे कि अपने भगवान को पूजना छोड़ो, जीसस को मानो, तो दुख दूर हो जाएगा।”

पहले भी हो चुका है चर्च का विरोध

बता दें कि सारण में पहले भी धर्मांतरण का मामला सामने आ चुका है। साल 2022 में सदर प्रखंड के जटुआँ गाँव में एक चर्च का निर्माण किया जा रहा था, जिसका दलितों ने विरोध किया गया था। एक स्थानीय निवासी ने आरोप लगाया था कि हमें 1 लाख रुपए देने का लालच दिया गया था। ग्रामीणों के विरोध के चलते ईसाई मिशनरी से जुड़े लोग भाग खड़े हुए थे, वो सभी आंध्र प्रदेश के बताए जा रहे थे।

फोन पर ‘थ्री-सम सेक्स’ की डील कर रहा था IPS, खुलासा करने पर पंजाब पुलिस ने दिल्ली के पत्रकारों को ‘उठाने’ की कोशिश की: गृह मंत्रालय ने दखल देकर बचाया

पंजाब पुलिस ने पत्रकार आरती टिकू सिंह और रोहन दुआ को कथित तौर पर एक आईपीएस अधिकारी से जुड़े सेक्स स्कैंडल का पर्दाफ़ाश करने के आरोप में गिरफ्तार करने का प्रयास किया। यह घटना बुधवार (9 अप्रैल, 2025) को हुई, जब आरती टिकू ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के माध्यम से इस जानकारी को साझा किया। 

पत्रकार आरती के अनुसार, पंजाब पुलिस ने उन्हें और दुआ को गिरफ्तार करने की कोशिश की, लेकिन गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस के हस्तक्षेप के कारण पंजाब पुलिस की यह कोशिश फेल हो गई।

आरती ने दावा किया कि पंजाब पुलिस उन्हें और उनके सहकर्मी दुआ को परेशान कर रही है, क्योंकि उनके द्वारा संचालित मीडिया आउटलेट द न्यू इंडियन के माध्यम से कथित सेक्स स्कैंडल को उजागर किया था। उन्होंने दावा किया कि उनके सहकर्मी रोहन दुआ पर आईपीएस अधिकारी, दिल्ली से आम आदमी पार्टी का पूर्व विधायक और शराब घोटाले में शामिल एक आरोपित लगातार न्यूज को हटाने का दबाव बना रहा था।

आरती ने एक्स पर लिखा, “सबसे अजीब बात ये है कि हमारी टीम ने आरोपित पुलिस कर्मी की न तो पहचान जाहिर की और न ही उसका नाम कहीं लिया, फिर भी वही आईपीएस अधिकारी, दिल्ली का पूर्व AAP विधायक और शराब घोटाले में शामिल आरोपित लगातार मेरे सहकर्मी को फोन कर रहे थे। वो इस बात का दबाव बना रहे थे कि उस स्टोरी को डिलीट कर दिया जाए और उससे जुड़े एक्स पोस्ट को भी हटा दिए जाए। वो लगातार हमारे पीछे पड़े थे, क्यों?”

बता दें कि कुछ समय पहले ‘द न्यू इंडियन’ द्वारा जारी किए गए ऑडियो क्लिप्स में एक आईपीएस अधिकारी और एक महिला के बीच कथित तौर पर सेक्स से जुड़ी बातचीत सामने आई थी। पहले ऑडियो में कथित तौर पर आईपीएस अधिकारी उस महिला से उसके लिए एक एस्कॉर्ट की व्यवस्था करने के लिए कहता है और ‘उचित थ्रीसम’ की कीमत के बारे में पूछता है। वो ऑडियो में कड़ी बारगेनिंग भी करता सुना जा सकता है। यही नहीं, पूरी तरह से प्रोफेशनल एस्कॉर्ट की डिमाँड कर रहा था।

दूसरे ऑडियो में, कथित तौर पर वही आईपीएस अधिकारी उसी महिला से उसकी न्यूड तस्वीरें माँगता है। इस पर महिला कहती है कि वो वर्दी बदलने के बाद तस्वीरें भेजेगी। इसके बाद वो महिला से तस्वीरों को व्हाट्सऐप ग्रुप में पोस्ट करने के लिए कहता है।

द न्यू इंडियन द्वारा जारी इन ऑडियो में किसी अधिकारी की पहचान जाहिर नहीं की गई है। लेकिन ये पूरा मामला पंजाब पुलिस और राज्य की आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।

कभी हथौड़ा लेकर ‘शक्ति प्रदर्शन’, कभी शिक्षकों से बदसलूकी: गली के गुंडों की फोटोकॉपी बने छात्र नेता, अब बिगड़ैल राजनीति पर अंकुश समय की जरूरत

पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रौनक खत्री, जोकि कॉन्ग्रेस समर्थित छात्र संगठन NSUI से संबद्ध हैं, ने दिल्ली विश्वविद्यालय मुख्य परिसर स्थित जवाहर वाटिका के ताले हथौड़े से तोड़ दिए और रोकथाम करने वाले सुरक्षाकर्मियों को डराया–धमकाया। इसी प्रकार उन्होंने कुछ दिन पहले श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में घुसकर वहाँ के शिक्षक–शिक्षिकाओं के साथ अत्यंत अभद्र,अशालीन और अमर्यादित व्यवहार किया था। उनके इस व्यवहार से शिक्षा जगत खासकर दिल्ली विश्वविद्यालय स्तब्ध और क्षुब्ध है। श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स शिक्षक संघ और दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ सहित लगभग सभी शिक्षक संगठनों और हजारों छात्रों–शिक्षकों ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की थी।

रौनक खत्री ‘विजिलेंटी जस्टिस’ / कंगारू कोर्ट के नए रहनुमा बनने पर उतारू हैं। शान बघारने और सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए वह ऐसी निंदनीय स्टंटबाजी करते रहते हैं और उसकी रीलें बनाकर उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर वायरल कराते हैं। ऐसा लगता है मानो उनपर इस प्रकार की बदतमीजियों का रिकॉर्ड बनाने की सनक सवार है। आर्ट्स फैकल्टी के डीन प्रो. अमिताव चक्रवर्ती, लॉ फैकल्टी के चुनाव अधिकारी, अदिति कॉलेज की प्राचार्या के साथ बदतमीजी, केशव महाविद्यालय के “इंस्पेक्शन”, इंजीनियरिंग विभाग के चीफ इंजीनियर के साथ बदसलूकी जैसी घटनाओं की  फेहरिस्त लंबी है।

उनके सोशल मीडिया अकाउंट ऐसी वारदातों से अटे पड़े हैं। ऐसा आचरण घोर आपत्तिजनक, निंदनीय और अक्षम्य है। विवि प्रशासन को ऐसे अमर्यादित व्यवहार और हिंसक आचरण का गंभीर संज्ञान लेकर उसकी नकेल कसने की जरूरत है, अन्यथा यह बेलगाम होती प्रवृत्ति लाइलाज बीमारी बन बैठेगी। संबंधित राजनीतिक दल को भी ऐसे अमर्यादित आचरण का तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। ऐसे हिंसक और डरावने वातावरण में छात्र, शिक्षक और प्रशासनिक कर्मी निश्चिंततापूर्वक अपना कर्तiव्य पालन नहीं कर सकते।

इक्कीसवीं सदी आते–आते मुख्यधारा की राजनीति में अपराधियों और धन–पशुओं का वर्चस्व और बोलबाला होने लगा था। छात्र संघ और छात्र राजनीति भी इस बदलाव से अछूती नहीं रह सकी। आज छात्र राजनीति मुख्यधारा की राजनीति का शॉर्टकट रास्ता है। उसमें घुसपैठ करने का प्लेटफार्म है। आज मुख्यधारा की राजनीति की जो भी बुराइयाँ हैं, वे छात्र राजनीति में भी साफ दिखाई देती हैं। बल्कि ये मुख्यधारा की राजनीत का पूर्वाभ्यास (रिहर्सल) बन गई हैं।

ल्लेखनीय है कि पिछले दो–तीन दशक से प्रमुख छात्र संगठनों से दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव लड़ने/जीतने वालों में अधिसंख्य जाट–गुर्जर समाज से हैं। ऐसा क्यों है? क्या इसका संबंध दिल्ली देहात और एनसीआर में जमीन की बढ़ती हुई कीमतों, खरीद–फरोख्त और किरायेदारी से है। यह विचारणीय प्रश्न है। आज छात्रसंघ चुनाव जीतने की अर्हता जाति, धनबल और बाहुबल बन गया है। लालच और डर का खुला खेल दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों में होता है।

लिंगदोह नियमावली की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। न सिर्फ कॉलेजों और दिल्ली विश्वविद्यालय की इमारतों को बल्कि दिल्ली भर की सरकारी/सार्वजनिक इमारतों और संपत्ति को विरूपित किया जाता है। करोड़ों की संख्या में पैंपलेट, पोस्टर, स्टीकर और होर्डिंग लगाए जाते हैं। प्रत्येक प्रत्याशी सैकड़ों बड़ी–बड़ी गाड़ियों का काफिला लेकर कैंपेन के लिए निकलता है। फार्म हाउस, क्लब, डांसबार, मल्टीप्लैक्स आदि की बुकिंग करके वहाँ पीने–खाने और नाचने–गाने की पार्टियाँ आयोजित की जाती हैं।

दिल्ली–एन सी आर के बेरोजगार नौजवान चुनावी महीने में यकायक बिजी हो जाते हैं। यारी–दोस्ती, मौज–मस्ती और लेन–देन उनकी उपलब्धता और सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करते हैं। सभी छात्र संगठनों में एक–दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी रहती है। जो प्रत्याशी या संगठन धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल नहीं करता, या उसके इस्तेमाल में झिझकता है; उसे कमजोर मान लिया जाता है। पूरी चुनावी व्यवस्था इतनी दूषित हो चुकी है कि सही और सकारात्मक  साधनों से लड़कर चुनाव जीतना लगभग असंभव है।

इसके लिए सिर्फ छात्र नेताओं को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उनके अलावा उनके संगठन, चुनावी तंत्र और मतदाता यानि कि छात्र समुदाय भी इस चतुर्दिक गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं। प्रत्याशियों की अकादमिक क्षमता, भाषण कला, मुद्दों की समझ और सक्रियता  के प्रति छात्रों (मतदाताओं) की उदासीनता दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। वास्तव में, आज छात्र राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि अधिकांश मामलों में राजनेता छात्र का वेश धारण करके छात्र राजनीति की आड़ में दबंगई और गुंडागर्दी कर रहे हैं और राजनीतिक कैरियर की जमीन तैयार करते दिखाई पड़ते हैं। जो छात्र ही नहीं हैं, वे भला कैसी छात्र राजनीति करेंगे, यह समझना कोई मुश्किल पहेली नहीं है। बढ़ती गुंडागर्दी और हिंसा के कारण कई राज्य सरकारों और कई विश्वविद्यालयों ने छात्र संघ चुनावों पर रोक लगा दी है।

उल्लेखनीय है कि इस बार दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में लिंगदोह नियमावली के उल्लंघन का गंभीर संज्ञान लिया था। लेकिन, उसके द्वारा की गई कार्रवाई नाकाफी साबित हुई है। पिछले कुछ सालों से देखने में यह भी आ रहा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुने हुए छात्रनेता शिक्षकों, प्रशासनिक कर्मियों और अधिकारियों आदि के साथ अभद्रता, गाली–गलौज और मारपीट तक करने लगे हैं। विभिन्न कॉलेज छात्रसंघ भी उनकी ऐसी करतूतों की नकल करते हैं। कोई भी छात्र संगठन इस दुष्प्रवृति का अपवाद नहीं है। पिछले साल भी ऐसी ही कुछ घटनाएँ वायरल हुई थीं, हालाँकि तत्कालीन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष दूसरे दल और समुदाय से थे।

विश्वविद्यालयों को गुंडों का चारागाह नहीं बनने दिया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब छात्रनेता कैंपस में मनमानी करेंगे और चौथ/लेवी वसूलेंगे। छात्रावासों और अतिथि गृहों पर अवैध कब्जे करके उन्हें अपने अड्डे बना लेंगे। जोर–जबरदस्ती, छेड़छाड़, मारपीट और मर्डर विश्वविद्यालय का रोजनामचा हो जाएगा। देश के दर्जनों विश्वविद्यालयों में ऐसा होना शुरू हो गया था। इसलिए वहाँ छात्रसंघ चुनाव पर रोक लगा दी गई है।

इसी प्रकार माननीय न्यायालय को भी इन घटनाओं का स्वतः संज्ञान लेकर ऐसे आपराधिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

चुनाव प्रक्रिया पर भी निरंतर निगरानी रखने की आवश्यकता है।

छात्रसंघ को मुख्यधारा की राजनीति की बुराइयों के पूर्वाभ्यास का मंच (प्लेटफार्म) नहीं बनने देना चाहिए। अगर हम निरन्तर बढ़ती ऐसी घटनाओं और प्रवृत्तियों पर अंकुश नहीं लगाएँगे तो इस अपराध के सहभागी माने जाएँगे। कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अकारण ही नहीं लिखा था –

“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध!
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध!!”

कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड, लिवरपूल, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे विदेशी संस्थानों में छात्रसंघ की अत्यंत सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल में सक्रिय स्टूडेंट्स गिल्ड छात्र राजनीति का उल्लेखनीय और अनुकरणीय उदाहरण है।

वे पठन–पाठन, सांस्कृतिक और खेलकूद गतिविधियों और कैंपस की बेहतरी के लिए समर्पित और सक्रिय सच्चे छात्र प्रतिनिधि होते हैं। ऐसा अन्य तमाम विदेशी विश्वविद्यालयों में भी सुनाई/दिखाई पड़ता है। सांस्थानिक हितों के लिए समर्पित ऐसे कर्तव्यनिष्ठ छात्र प्रतिनिधि ही लोकतंत्र को स्वस्थ और परिपक्व बनाने में अपना योगदान दे सकते हैं।

राजनीति में कैरियर बनाने की चाह में छात्र राजनीति को दूषित करने वाले भारतीय विश्वविद्यालयों के छात्रनेता अपनी परीक्षाओं के साथ–साथ मुख्यधारा की राजनीति में भी क्यों ‘फेल’ हो रहे हैं? उन्हें इस विषय पर आत्ममंथन करना चाहिए।

लोकतंत्र में छात्र संघों और छात्र नेताओं की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। छात्रसंघ युवा मन का सकारात्मक, संगठित और साकार रूप हैं। वे युवाओं की शक्ति और ऊर्जा के अभिव्यक्त और मान्य प्रतिनिधि रहे हैं। स्वाधीनता आंदोलन से लेकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन, आपातकाल विरोधी आंदोलन, राम मंदिर निर्माण आंदोलन, बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) द्वारा चलाए गए आंदोलन, आरक्षण संबंधी सामाजिक न्याय आंदोलन, श्रीनगर के लाल चौक पर राष्ट्रध्वज फहराने संबंधी तिरंगा आंदोलन और निर्भया कांड के बाद चले भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना/लोकपाल (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) आंदोलन तक सभी बड़े समाज–सत्ता प्रतिष्ठान बदलने संबंधी आंदोलनों में छात्रों और छात्र संघों की बड़ी भूमिका रही है।

उल्लेखनीय है कि आपातकाल विरोधी आंदोलन में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ और पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ की अग्रणी भूमिका थी। अरुण जेटली, विजय गोयल, सीताराम येचुरी, प्रकाश करात, देवी प्रसाद त्रिपाठी, नीतिश कुमार, लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी, रविशंकर प्रसाद आदि तमाम बड़े नेताओं की गिरफ्तारी हुई और लंबे संघर्ष और जद्दोजहद के बाद भारत देश में लोकतंत्र की बहाली हुई।

यह वह दौर था जब छात्र व्यवस्था में सुधार या बदलाव की सकारात्मक राजनीति करते थे। वे व्यक्तिगत स्वार्थों और महत्वाकांक्षाओं से परे जाकर सामाजिक–राष्ट्रीय मुद्दों और छात्रहित के लिए त्याग और समर्पण के साथ काम करते थे। वे सपने देखने वाले जुनूनी लोग थे। वे ‘कैरियरिस्ट’ नहीं थे। राजनीति उनके लिए कैरियर नहीं थी। वे पढ़ते–लिखते भी थे। सामाजिक–राजनीतिक मुद्दों की समझ रखने वाले अच्छे वक्ता होते थे। वे चुनाव जीतने के लिए स्थानीय थैलीशाहों और गुंडों के मोहताज नहीं थे। न उन्हें किसी बड़े घर का बेटा या राजनीतिक परिवार का उत्तराधिकारी होने की आवश्यकता थी। वे कॉमन स्टूडेंट्स में से निकले हुए असाधारण प्रतिभा वाले मेहनती और जुझारू लोग थे, इसलिए उनका छात्रों पर प्रभाव होता था। छात्र उनके आह्वान पर,उनकी एक आवाज पर जुड़ते और जुटते थे।

निश्चय ही, लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने हुए प्रतिनिधियों का बहुत अधिक महत्व होता है। सच्चे प्रतिनिधि व्यवस्था के प्रति असहमति व्यक्त करते हैं और असुविधाजनक सवाल भी उठाते हैं। मगर, कानून को अपने हाथ में लेने या गैर–कानूनी और हिंसात्मक हथकंडों का प्रयोग उनकी नैतिक आभा को धूमिल करता है। इसलिए साधन और साध्य की पवित्रता में संतुलन बनाते हुए छात्रों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने और आवश्यकता पड़ने पर व्यवस्था का विरोध भी किया जाना चाहिए।

ज्ञापन, संवाद, धरना–प्रदर्शन, अनशन, बहिष्कार,सविनय असहयोग /अवज्ञा आदि ऐसे बहुत से तरीके हैं जिनसे अधिकारों के लिए आवाज उठाई जा सकती है। अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जा सकती है, पहचान बनाई जा सकती है और व्यवस्था विरोध की लड़ाई भी लड़ी जा सकती है। लेकिन इन साधनों को अपनाने के लिए समझदारी, धैर्य और आत्मबल चाहिए। ये तीनों ही गुण वर्तमान समाज से लुप्तप्रायः हैं।

छात्र–समुदाय भी इसका अपवाद नहीं है। वर्तमान छात्र–राजनीति को अपने गौरवशाली इतिहास को जानने की आवश्यकता है। उन कारणों और साधनों को भी समझना जरूरी है जिनकी वजह से कोई आंदोलन गौरवशाली इतिहास का हिस्सा बनता है। जिस तरह मुख्यधारा की राजनीति रेवड़ी संस्कृति और रॉबिनहुडवाद की शिकार हो गई है। छात्र राजनीति को उसकी नकल करने से बचते हुए पॉपुलिस्ट मुद्दों को अपना लक्ष्य न बनाते हुए संस्थान हित और छात्र हित के लिए सतत संघर्ष का रास्ता चुनना चाहिए। उल्लेखनीय है कि पॉपुलिज्म और शॉर्टकट जितने आकर्षक लगते हैं, उससे कहीं अधिक अनर्थकारी हैं।

चाऊमीन का ठेला लगाने वाला बन गया कैफे मालिक, चलाने लगा ड्रग्स-सेक्स का गैंग: पहले खुद करता रेप, फिर दूसरों से भी करवाता; वाराणसी गैंगरेप में अब तक 12 गिरफ्तार

वाराणसी में 19 साल की मासूम छात्रा की जिंदगी को 23 दरिंदों ने 6 दिन तक नशे और हैवानियत की भेंट चढ़ा दिया। ये मामला सिर्फ गैंगरेप का नहीं, बल्कि एक संगठित सेक्स रैकेट का काला सच है, जिसका सरगना अनमोल गुप्ता नाम का शख्स निकला। कभी सिगरा में चाऊमीन का ठेला लगाने वाला अनमोल महज 2 सालों में कॉन्टिनेंटल कैफे का मालिक बन बैठा।

बाहर से साधारण सा दिखने वाला कॉन्टिनेंटल कैफे अंदर से ड्रग्स, शराब और देह व्यापार का अड्डा था। अनमोल ने 15 लड़कों की गैंग तैयार की थी, जो मासूम लड़कियों को फँसाते, नशा देते, रेप करते और फिर वीडियो बनाकर ब्लैकमेलिंग कर उनको भेड़ियों के सामने परोस देते।

इस गैंग का मास्टरमाइंड अनमोल बेहद शातिर है। उसने अपने गुंडों को अलग-अलग काम बाँट रखे थे। LLB की पढ़ाई कर रहा सोहेल ड्रग्स का आदी था, जिसे अनमोल ने अपना दाहिना हाथ बना लिया। गैंग का सदस्य राज विश्वकर्मा प्राइवेट नौकरी करता था। वो रेप में शामिल था और ड्रग्स की सप्लाई भी करता था। साजिद लड़कियों को फँसाने का माहिर था, तो आयुष स्कूल-कॉलेज के बच्चों को कैफे तक खींच लाता।

इस गैंग में शामिल तनवीर उर्फ समीर कार मैकेनिक था, लेकिन नशे की लत ने उसे कस्टमर लाने वाला एजेंट बना दिया। यही नहीं, इंटर में पढ़ने वाला इमरान दरिंदगी की वीडियो बनाकर लड़कियों की जिंदगी तबाह करता था। वहीं, दानिश सोशल मीडिया पर कैफे का ढोल पीटता था और उसके फोन में 18 से ज्यादा गंदे वीडियो मिले। वो कॉन्टिनेंटल कैफे का सोशल मीडिया पर प्रचार भी करता था। इसके अलावा शब्बीर आलम दुकान में काम करता था, पर रात को वो भी इस गंदे खेल का हिस्सा बन जाता।

इस मामले की परत दर परत तब खुलनी शुरू हुई, जब छात्रा इलाज के बाद नशे से बाहर आई। इससे पहले, नशे में बेसुध होने की वजह से वो 24 घंटे तक कुछ बोल नहीं सकी थी। होश में आने के बाद उसने अपनी माँ को अपनी आपबीती सुनाई। इस मामले में तहरीर के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और छापेमारी कर 9 दरिंदों को पकड़ा, जिसमें अनमोल, सोहेल, राज, साजिद, आयुष, तनवीर, इमरान, दानिश और शब्बीर के नाम थे। इसके बाद भी 14 फरार थे, लेकिन बाद में अमन, जैब और समीर को भी गिरफ्तार कर लिया गया। अब भी इस केस से जुड़े 11 दरिंदे फरार हैं, जिनकी पुलिस तलाश कर रही है।

मीडिया के सामने पीड़िता के पिता का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने अपना दर्ज बयान करते हुए कहा, “मेरी बेटी की जिंदगी बर्बाद कर दी। वो अब घर में भी डरती है। हर शख्स को सजा मिले, हम इंसाफ चाहते हैं।”

वाराणसी गैंगरेप केस ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है। इन दरिंदों ने एक मासूम लड़की को इस तरह नोचा जैसे भूखे भेड़ियों का झुंड किसी शिकार पर टूट पड़ता है। 6 दिन तक 23 हैवानों ने नशे में धुत उसकी जिंदगी को तार-तार किया, वीडियो बनाए, ब्लैकमेल किया और उसे होटलों से कैफे तक घसीटा। लड़की के पिता ने शुरू में ही बड़ी साजिश की आशंका जताई थी, जो अब सच साबित हुई।

अनमोल गुप्ता और उसके गुंडों का ये सेक्स रैकेट कोई एक दिन का खेल नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी, जो शायद सालों से चल रही थी। एक लड़की की आपबीती तो सामने आ गई, लेकिन सोचिए, ऐसी कितनी मासूम बेटियाँ होंगी जो डर और समाज के तानों से चुप हैं।

ये मामला सिर्फ एक छात्रा की बर्बादी की कहानी नहीं है। दानिश अली के फोन से 18 रेप के वीडियो बरामद हुए हैं, जो चीख-चीख कर बता रहे हैं कि शिकार और भी हो सकते हैं। हर वीडियो के पीछे शायद एक टूटी हुई जिंदगी की दास्तान छुपी है। क्या पता, जाँच आगे बढ़े तो ऐसे कितने राज खुलें कि वाराणसी की गलियों में घूमते इन दरिंदों ने कितनी बेटियों को निशाना बनाया। ये सिर्फ पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की चुनौती है कि इन हैवानों को बेनकाब करे।

अब सवाल ये है कि क्या इन दरिंदों को वाजिद सजा मिल पाएगी? फिलहाल, पुलिस ने 12 को पकड़ा है, लेकिन 11 अब भी फरार हैं। हालाँकि असली लड़ाई सजा से आगे की है – ऐसी साजिशों को जड़ से उखाड़ना। हर गली, हर कैफे, हर कोने में नजर रखनी होगी, ताकि कोई और बेटी इन भेड़ियों का शिकार न बने। दानिश के वीडियो की जाँच से शायद और पीड़िताओं की पहचान हो और ये पता चले कि वाराणसी में कितने अनमोल जैसे शैतान छुपे हैं। ये वक्त सिर्फ इंसाफ माँगने का नहीं, बल्कि समाज को जगाने का है, ताकि डर की दीवारें टूटें और हर बेटी की आवाज सुनी जाए।

कौन हैं नरेंद्र मान, जिनके ऊपर आतंकी तहव्वुर राणा को सजा दिलाने की है जिम्मेदारी: NIA ने 3 साल के लिए किया नियुक्त, 35 साल का है करियर

मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमलों के मुख्य साजिशकर्ता तहव्वुर राणा को अमेरिका से प्रत्यर्पित करके गुरुवार (10 अप्रैल 2025) को भारत लाया गया। भारत में अब उसके खिलाफ केस चलेगा। इसके लिए सरकार ने अधिवक्ता नरेंद्र मान को स्पेशल पब्लिक प्रॉसक्यूटर (विशेष सरकारी वकील) नियुक्त किया है। ये नियुक्ति तीन साल की अवधि के लिए की गई है।

सरकार ने इस संबंध में बुधवार (9 अप्रैल 2025) की देर रात को अधिसूचना जारी की। अधिसूचना के मुताबिक, नरेंद्न मान की नियुक्ति NIA के केस नंबर RC-04/2009/NIA/DLI से संबंधित है। यह के मुंबई आतंकी हमले से संबंधित पाकिस्तानी मूल के आतंकी तहव्वुर हुसैन राणा और उसके सहयोगी दाऊद सईद गिलानी उर्फ डेविड कोलमैन हेडली के खिलाफ है।

इन दोनों आरोपितों पर मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए इस्लामी आतंकी हमलों की साजिश रचने के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 121A, आतंकवाद निरोधक कानून ‘गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA)’ की धारा 18 और सार्क कन्वेंशन (आतंकवाद की रोकथाम) धारा 6(2) के तहत मामला दर्ज है।

NIA ने यह मामला 11 नवंबर 2009 को दर्ज किया था। दोनों आरोपितों पर लश्कर-ए-तैयबा जैसे प्रतिबंधित आतंकी संगठन को सहयोग देने और भारत में आतंकी हमले की साजिश रचने का गंभीर आरोप है। एनआईए ने 24 दिसंबर 2011 को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में इस केस में चार्जशीट दाखिल की थी, जिसमें कुल 9 आरोपितों को नामजद किया गया था।

अधिवक्ता नरेंद्र मान इस मामले की पैरवी दिल्ली स्थित NIA की स्पेशल कोर्ट और संबंधित अपीलीय कोर्ट मे करेंगे। उनकी जिम्मेदारी होगी कि तहव्वुर को सख्त सजा दिलाई जाए। वे NIA कोर्ट और अपीलीय कोर्ट में सरकार का पक्ष रखेंगे। अगर आतंकी तहव्वुर के खिलाफ ट्रायल तीन साल से पहले पूरा हो जाता है तो एडवोकेट नरेंद्र मान का काम वहीं खत्म हो जाएगा।

बता दें कि पाकिस्तानी मूल के कनाडाई नागरिक तहव्वुर राणा को अमेरिका से प्रत्यर्पित किया गया है। NIA के अधिकारी गुरुवार (10 अप्रैल 2025) को विशेष विमान से आतंकी तहव्वुर राणा को लेकर भारत आए हैं। यह विमान दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर उतरा है। यहाँ से आतंकी तहव्वुर राणा को सीधे राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के मुख्यालय ले जाया गया।

CBI के खास अभियोजक रहे नरेंद्र मान

अधिवक्ता नरेंद्र मान पिछले 35 सालों से वे दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत कर रहे हैं। वे 10 साल तक CBI के विशेष लोक अभियोजक भी रहे हैं। इस दौरान उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल मामलों को सँभाला है। इनमें साल 2018 का कर्मचारी चयन आयोग (SSC) पेपर लीक मामला, मेडिकल काउंसिल घोटाला, एआईसीटीई घोटाला, सीजीएचएस सोसायटी घोटाला आदि प्रमुख है।

इसके अलावा, उन्होंने सीडब्ल्यूजी मामले, एफसीआरए के तहत मामले, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामले, बैंकिंग धोखाधड़ी सहित कई अन्य मामलों में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अधिवक्ता मान दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश माथुर के चैंबर से हैं। उन्होंने दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातक और दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की है।

दिल्ली के हौज खास में रहने वाले नरेंद्र मान 10 साल तक सीबीआई के वकील रहे हैं। कई बड़े मामलों में पहले से पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की भूमिका निभा चुके नरेंद्र मान को अब सरकार ने तहव्वुर राणा केस की जिम्मेदारी भी सौंप दी है। इसके अलावा, आपराधिक मामलों के विशेषज्ञ सीनियर एडवोकेट दयान कृष्णनन तहव्वुर राणा के खिलाफ प्रॉसिक्यूनश टीम की अगुवाई करेंगे।