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चर्च पर चढ़ कर सैनिक ने लगाया ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा, अर्मेनिया में चर्चों की तबाही का सिलसिला तेज

रूस की पहल के बाद अजरबैजान और अर्मेनिया के बीच युद्ध पर भले ही विराम लग गया हो, लेकिन वहाँ अभी भी युद्ध और तनाव जैसी स्थिति बनी हुई है। अब एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें अजरबैजान का एक सैनिक चर्च के ऊपर चढ़ कर ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगाते हुए देखा जा सकता है। ये वीडियो करबाख का बताया जा रहा है, जहाँ कई महीनों से युद्ध चल रहा था।

बता दें कि जहाँ अजरबैजान इस्लामी मुल्क है, अर्मेनिया में ईसाईयों की जनसंख्या ज्यादा है। वीडियो में कई अन्य लोग भी दिख रहे हैं, जो चर्च के ऊपर चढ़े अजरबैजान के सैनिक के ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे के बाद पीछे से उसे दोहराते हुए उसका समर्थन करते हैं। कहा जा रहा है कि इसे करबाख के एक शहर में शूट किया गया, जिस पर अजरबैजान के सैनिकों ने फ़िलहाल कब्ज़ा कर के रखा हुआ है।

उक्त व्यक्ति ने चर्च के ऊपर चढ़ कर कई बार ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगाया। इससे पहले सुशी नामक अर्मेनिया के शहर के एक चर्च को तबाह किए जाने के बाद की एक तस्वीर वायरल हो गई थी, जिसके बारे में बताया गया था कि इस्लामी कट्टरवादी चर्चों को इसीलिए निशाना बना रहे हैं, क्योंकि अर्मेनिया ने एक इस्लामी मुल्क के साथ युद्ध किया। तुर्की जैसे देशों ने भी खुल कर अजरबैजान का समर्थन किया और उसे उकसाया।

इससे पहले अजरबैजान के नेतृत्व ने घोषणा की थी कि वो करबाख में न सिर्फ अर्मेनिया के लोगों की रक्षा करेंगे, बल्कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा का भी जिम्मा उठाएँगे। लेकिन, अब जिस तरह से वहाँ चर्चों को तबाह करने का सिलसिला चल निकला है, उससे लगता है कि उनकी सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। कई ईसाई संगठनों ने भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

बता दें कि इधर आर्मेनियन असेंबली ऑफ अमेरिका ने भी अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बायडेन को बधाई देते हुए माँग की है कि अमेरिका में अजरबैजान और तुर्की के प्रभाव को लेकर जाँच बिठाई जाए। उसने ISIS के साथ तुर्की के गठबंधन के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि क्षेत्र में अशांति के लिए तुर्की ही जिम्मेदार है और उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। अमेरिका में आर्मेनिया के नागरिकों ने भी तुर्की पर शिकंजा कसने की माँग की है।

शिवाजी की प्रशंसा वाली किताब ‘शिवबवनी’ पर पाबंदी में गाँधी जी भूमिका: गोडसे Vs गाँधी की एक कहानी यह भी

इस तरह के मुद्दों पर विमर्श की नींव रखने का अपना नैतिक ख़तरा है लेकिन अतीत के हमेशा से दो पक्ष रहे हैं। एक जो बड़े पैमाने पर स्वीकार किए जाते हैं और दूसरे जो हाशिये पर पड़े रह जाते हैं। नाथूराम गोडसे के इर्द गिर्द होने वाले राजनीतिक विमर्शों की सूरत भी कुछ ऐसी ही है। एक पक्ष आज तक सुना जाता है (वही अटल सत्य माना जाता है) और दूसरा चुनिंदा जनमानस तक सीमित है। इस विमर्श के दूसरे पक्ष को समझने के लिए ऐसे तो तमाम माध्यम हैं लेकिन सबसे सशक्त माध्यम हैं, गोपाल गोडसे। 

गाँधी की हत्या के मामले में मुख्य अभियुक्त और जिन्हें इस मामले में आजीवन कारावास सुनाया गया था नाथूराम गोडसे के अनुज, गोपाल गोडसे। इन्होंने अपने तमाम साक्षात्कारों में कई भ्रम नष्ट करने का यथोचित प्रयास किया है और अधिकांश में सफल भी हुए। इन्होंने तत्कालीन सत्ताधीशों/नेताओं के लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया था ‘सेक्युलर सुल्तान’, सरकार के ऐसे नुमाइंदे जिनके लिए ‘छद्म धर्म निरपेक्षता’ राष्ट्र की संकल्पना से बढ़ कर थी। बल्कि देश की आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए इस बात की कल्पना करना तक मुश्किल था, फिर भी बहुत कुछ ऐसा हुआ। 

आज़ादी के आस-पास के दौर तक अस्पृश्यता और जन्म पर आधारित जातिवाद एक बड़ी सामाजिक कुरीति थी। इस कुरीति को समाप्त करने के लिए ‘जातिवाद विरोधी भोज’ हुआ करते थे और ऐसे कई अवसर आए, जब भोज नाथूराम गोडसे ने आयोजित करवाए और इनका हिस्सा भी बने। नाथूराम ने समाजवाद और मार्क्सवाद पढ़ा, स्वामी विवेकानंद, गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, चाणक्य और रावण को भी पढ़ा था। यहाँ तक कि समाजवाद से लेकर मार्क्सवाद और गाँधी-सावरकर को सबसे ज़्यादा पढ़ा और उसके बाद सामाजिक-राजनीतिक अवधारणा बनाई। 

नाथूराम ने न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए तमाम बातें कही थीं, बल्कि पूरा बयान खुद में इतिहास का अहम दस्तावेज़ है। बयान के मुताबिक़ सबसे पहले रामायण ही अहिंसा के सिद्धांत का समर्थन नहीं करता है। रामायण और महाभारत का उपसंहार ही यही है कि आक्रमण का सशस्त्र प्रतिरोध गलत नहीं हो सकता है। नाथूराम को एक और बात पर विकट आपत्ति थी कि गाँधी ने भारत के स्वर्णिम इतिहास से जुड़े कुछ चेहरों को अहमियत नहीं दी। इसके उलट उन चेहरों के लिए प्रतिकार का रवैया रखा। इसमें 3 नाम सबसे अहम था – छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप और गुरु गोबिंद सिंह। 

इतना ही नहीं 52 छंदों का अमूल्य संग्रह ‘शिवबवनी’ जिसमें शिवाजी की प्रशंसा की गई है, गाँधी जी ने इस पर पाबंदी लगाने में भी अहम भूमिका निभाई। यही दौर था, जब हिन्दी और उर्दू के मूल स्वरूप के साथ खिलवाड़ भी शुरू हुआ, ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा का उदय हुआ। जिसका न तो कोई व्याकरण था और न ही साहित्य, यह भाषा बस सामाजिक-राजनीतिक हितों के लिए रची गई थी। एक पड़ाव पर इस भाषा की आड़ में पाखण्ड का दायरा इतना बढ़ा कि राम बादशाह हो गए और सीता बेगम हो गई। नाथूराम ने इस तरह के तमाम छद्म और अव्यावहारिक प्रयोगों पर तार्किक शैली में आपत्ति जताई थी। 

हालाँकि लोकतंत्र में भिन्न विचारधाराओं की मौजूदगी सबसे शाश्वत प्रक्रिया है लेकिन इस पर गोपाल गोडसे का एक प्रश्न बहुत सटीक बैठता है। गाँधी की विचारधारा और शैली इतनी ही प्रभावी थी तो भगत सिंह और सुभाषचंद्र बोस जैसे सेनानियों ने उनका अनुसरण क्यों नहीं किया? इन सारी बातों से इतर सबसे अहम यह था कि नाथूराम ने जो किया, न्यायालय में पूरी जिम्मेदारी के साथ स्वीकार किया और सिलसिलेवार तरीके से कारण (लगभग 150) भी गिनाए। हत्या करने और हत्या का कारण गिनाने से अपराध वैकल्पिक या अपराधी निर्दोष नहीं हो जाता है फिर भी अपराधी को अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया जाता है। 

वह पक्ष निसंदेह सुना जाना चाहिए, इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अगर नाथूराम गोडसे ने अपना पक्ष नहीं रखा होता तो गाँधी के हिस्से के कार्य सामने नहीं आते। देश की संरचना और संकल्पना से जुड़े अनेक पहलू हैं, जिन पर गाँधी की नीति को लेकर प्रश्न खड़े करना स्वाभाविक हो जाता है लेकिन फिर भी हम सब कुछ नज़रअंदाज़ करते हैं। हमारे लिए एक कद असल तथ्यों और तर्कों से ऊपर उठ जाता है और अंततः हम अर्ध सत्य के चश्मे से दुनिया देखते हैं। 

नाथूराम ने उस चश्मे पर जमी मिथ्या की परत को हल्का करने का प्रयास किया था, उस प्रयास का तरीका गलत था और हमेशा रहेगा लेकिन उससे तत्कालीन राजनीतिक यथार्थ नहीं बदल सकता है। भले यह बात आज स्वीकार की जाए या आज से एक-दो शताब्दियाँ गुज़र जाने के बाद पर देश की आवाम ने गाँधी की नीतियों की बड़ी कीमत चुकाई है। इस बात को जनमानस के समक्ष लेकर आने और सिद्ध करने के लिए नाथूराम को इतिहास के पन्नों से मिटा पाना असंभव है।                    

‘एक भी बाल मजदूर मिला तो लोकसभा से इस्तीफा दे दूँगा’: पटाखों पर झूठ फैला रही पत्रकार को कॉन्ग्रेस नेता की चुनौती

पत्रकार रूपा सुब्रमण्या ने ऑपइंडिया की ‘मिशन ब्राइट एंड लाउड दीवाली 2021’ का विरोध करते हुए कुछ ऐसा कह दिया, जिससे कॉन्ग्रेस के एक नेता ही उनसे नाराज़ हो गए और जम कर फटकार लगा दी। रूपा ने कहा कि उन्होंने ऐसा कोई अभियान नहीं देखा, जिसमें इससे ज्यादा प्रदूषण को प्रमोट किया गया हो, या फिर ऐसे इंडस्ट्री का समर्थन किया गया हो, जो ‘बाल मजदूरी’ पर आश्रित है। उन्होंने ऑपइंडिया के लिए ‘पूप इंडिया’ शब्द का प्रयोग करते हुए कहा कि ये रोज नई गहराई की ओर जा रहा है। इस पर एक कॉन्ग्रेस नेता ने उन्हें लताड़ा।

ऑपइंडिया ने अपनी घोषणा में बताया था कि दीवाली 2021 प्रतिबंधों के चंगुल से निकले, इसके लिए परस्पर सहयोग के साथ एक ऐसा अभियान चलाया जाएगा, जिसमें क़ानूनी लड़ाई, एक्टिविज्म और रिसर्च का सहारा लिया जाएगा। इतनी से बात से भड़की रूपा सुब्रमण्या ने ट्विटर पर जहर उगल दिया। इसका जवाब दिया लोकसभा में कॉन्ग्रेस के व्हिप और और पार्टी की वर्किंग कमिटी के परमानेंट इन्वायटी मणिकम टैगोर बी ने।

दूसरी बार सांसद बने मणिकम तेलंगाना में कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रभारी भी हैं। उन्होंने इस दौरान तमिलनाडु के शिवकाशी की बात करते हुए कहा कि ये पटाखों की इंडस्ट्री 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है। उन्होंने कहा कि ये पूरी तरह से वैध इंडस्ट्री है, जिसमें 60,000 कर्मचारी कार्यरत हैं। उन्होंने अफवाहें न फैलाने की सलाह देते हुए कहा कि क्षेत्र में पटाखों के 1000 फैक्ट्रीज हैं और दिल्ली से मदुरै तक रोज दो फ्लाइट्स चलती हैं।

उन्होंने रूपा से कहा कि वो शिवकाशी आएँ, जो एयरपोर्ट से 70 किलोमीटर है और कैब बुक कर के वहाँ आया जा सकता है। उन्होंने अपना फोन नंबर देते हुए कहा कि रूपा वहाँ की फैक्ट्री में आएँ और वो फैक्ट्रीज के मैनेजर्स से कह देंगे वो उन्हें शिवकाशी की फैक्ट्री में घुमाएँ। उन्होंने चुनौती दी कि अगर पूरी फैक्ट्री या शिवकाशी में एक भी बाल मजदूर मिला तो वो अपनी लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफे दे देंगे।

साथ ही उन्होंने पूछा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्या रूपा शिवकाशी में एक भी बाल मजदूर न होने की बात पर लेख लिखेंगी? उन्होंने सलाह दी कि रूपा सुब्रमण्या को अगर कुछ पता नहीं है तो उन्हें पटाखा इंडस्ट्री में काम करने वाले हमारे भाइयों-बहनों के आत्म-सम्मान का अपमान नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक तरफ हम चीन के वैश्विक पटाखा बाजार से सामना कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ लोग अफवाह फैला रहे हैं।

उन्होंने ‘इंडिया टुडे’ की एक रिपोर्ट भी शेयर की, जिसमें बताया गया था कि किस तरह से पटाखों पर प्रतिबंध लगने से शिवकाशी इंडस्ट्री के कर्मचारियों को परेशानी हो रही है। इस रिपोर्ट में बताया था कि 8 लाख लोगों की आजीविका पर पटाखे बैन होने से प्रभाव पड़ा है। साथ ही हजारों करोड़ की इंडस्ट्री पर नुकसान की बात भी कही गई थी। ऊपर से कोरोना के कारण पहले से ही महीनों तक ये फैक्ट्रीज बंद ही पड़ी हुई थीं।

साथ ही उन्होंने वो ग्राफ भी शेयर किया, जिससे पता चलता है कि चीन किस कदर वैश्विक पटाखा बाजार पर कब्ज़ा कर के बैठा हुआ है। अमेरिका में जितने भी पटाखे इम्पोर्ट किए जाते हैं, उनमें से 94% अकेले चीन से आते हैं। इसके बाद क्रमशः स्पेन, हॉन्गकॉन्ग, जर्मनी, थाईलैंड, इटली और यूके का स्थान है। इसके जवाब में रूपा सुब्रमण्या ने ये कह कर इतिश्री कर ली कि काश शिवकाशी के लोगों के पास कोई और काम होता क्योंकि पटाखे बनाना अच्छा नहीं है। रूपा सुब्रमण्या के पास कॉन्ग्रेस नेता के तर्कों का कोई जवाब नहीं सूझा।

बता दें कि विराट कोहली ने भी 18 सेकंड का एक वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने कहा था, “मेरी तरफ से आपको और आपके परिवार को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। भगवान आपको इस दिवाली शांति, समृद्धि और खुशी प्रदान करें। कृपया याद रखें कि पटाखे न फोड़ें, पर्यावरण की रक्षा करें और इस शुभ अवसर पर एक साधारण दीए और मिठाई के साथ अपने प्रियजनों के साथ घर पर मस्ती करें। भगवान आप सबका भला करे। अपना ख्याल रखिएगा।”

नीतीश ‘हार’ कर भी पंजाब-महाराष्ट्र के कारण बने ‘विजेता’… लेकिन सोनिया का तो ‘चिराग’ ही बुझ गया

बिहार चुनाव परिणाम मेरी दृष्टि में हारे तो सिर्फ नीतीश और सोनिया हैं। लगभग सभी राजनीतिक विश्लेषकों ,पंडितों, महाघाघ पंडितों, ‘प्री पोल’ और ‘पोस्ट पोल’ के हवा-हवाई वैज्ञानिकों एवं मोदी विरोध के लिए ही जीवित रह रहे स्वनामधन्य महानुभावों के अनुमान, भविष्वाणी तथा मनगढ़ंत सारे कयासों पर अस्वीकृति का ठप्पा लगते हुए बिहार की जनता ने हाल में संपन्न हुए बिहार विधानसभा के चुनावों में एनडीए गठबंधन (मोदी-नीतीश) को ही निरंतरता देने का जनादेश दिया।

7 नवम्बर को तीसरे चरण का मतदान होने के साथ ही ‘इडियट बॉक्स’ में प्रसारित सभी चुनावी सर्वेक्षणों में बिहार में लालटेन युग आने की पुरजोर दलीलें दी गई थीं। अधिकांश चुनावी सर्वेक्षणों और हवाई दलीलों में इस बार सत्ता की चाबी महागठबंधन (लालू सुपुत्र एवं इनके सहयोगी दल) के पास होने की पुष्टि की गई। पटना में तेजस्वी यादव के राज्यारोहण की भविष्वाणी ही नहीं वरन ‘वर्चुअल’ बिसात ही बिछा दी गई।

एक-दो अथवा तीन-चार ही नहीं अपितु सभी मीडिया हाउस और सारे सर्वेक्षण (पोस्ट पोल) महागठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने की ढींगे हाँक रहे थे। 243 सदस्यीय बिहार विधान सभा में बहुमत की लक्ष्मण रेखा छूने के लिए आवश्यक संख्या 122 ही पर्याप्त थी या कहिए है लेकिन कुछेक ‘पोस्ट पोल’ तो महागठबंधन को 170 स्थानों में जीत मिलने की संभावना व्यक्त कर रहे थे। दस नवंबर को मत गणना प्रारम्भ होती है।

प्रारंभिक काउंटिंग में महागठबंधन लीड करता है। ‘पोस्ट पोल’ वालों की पता नहीं क्या फूलकर क्या हो जाती है! फिर 2-3 घंटों में तस्वीर बदल जाती है। एनडीए ‘लीड’ करने लगता है लेकिन शाम होते-होते भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती है। एनडीए 123-125 में चल रहा होता है तो महागठबंधन 107-110 की ताकत से पीछा कर रहा होता है। शाम 7 बजे तक यही रसाकस्सी चलती है। ऐसी परिस्थिति में कुछ भी अनुमान लगाना आसान नहीं था।

ऊँट किसी भी करवट बैठ सकता था। अब ऊँट किस करवट बैठेगा कौन कहे? असमंजस का प्रमुख कारण मतगणना हो रही 26 सीटों से बनी हुई थी। इन सीटों पर अग्र स्थान में चल रहे प्रत्याशी अपने निकटतम प्रतिस्पर्धी से हज़ार से भी कम वोटों से ही आगे चल रहे थे। फासला अधिक नहीं था। यह 26 सीट किसी भी गठबंधन के पार्टी कार्यालय में चल रही तैयारियों में ग्रहण लगाने के लिए पर्याप्त थी। टेलीविजन में बैठे नाना विश्लेषक और ‘ऐंकर’ बार-बार दोहरा रहे थे ‘पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त’! हाँ, यह सही भी था।

हज़ार से भी कम मत अंतर से मत गणना हो रही इन 26 सीटों के अंतिम परिणाम से ही स्पष्ट होना था कि नीतीश का तीर लक्ष्य भेदन करेगा या कि वर्षों से किसी कोने में पड़ी लालटेन फिर रौशन हो उठेगी। दोनों ही संभावनाओं के द्वार चरमराए नहीं थे। देर रात गए ही पिक्चर पूरी हो पाई। सभी परिणाम घोषित हुए। बिहार की जनता ने नीतीश की अगुवाई वाले एनडीए को स्पष्ट बहुमत का आँकड़ा पार कराते हुए 125 स्थानों में विजय का अनिवर्चनीय स्वाद चखने का अवसर दिया था।

जनता ने उन्हें पूरी तरह से नकार दिया है। उनके अतिरिक्त बिहार की जनता ने सौ वर्ष पुरानी कॉन्ग्रेस को भी ‘अब न हम मिलेंगे दुबारा’ बोल दिया। कल की ही तो बात है। 2015 के चुनाव में 71 तीर लक्ष्य भेदन में सफल हुए थे नीतीश बाबू। पिछली विधान सभा में नीतीश का संख्या बल 71 हुआ करता था। लेकिन इस बार उन्हें और उनके दल को 28 सीटों का नुकसान हुआ। विधान सभा में उनकी सदस्य संख्या सिर्फ 43 रह गई। दल गत आधार के अनुसार जेडीयु विधान सभा का तीसरे नंबर के दल में खिसक गया। अब यह दूसरी बात है कि गठबंधन राजनीति के चलते भले ही जनता द्वारा अवमानित नीतीश फिर मुख्यमंत्री बन जाएँ।

इसी प्रकार सोनिया-राहुल के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस के पास पिछली विधान सभा में 27 सीट हुआ करती थी। इस बार के चुनाव में माँ-बेटे का दल 27 में से 8 गवाँ 19 में सिमट गया। वास्तव में बिहार के नए जनादेश ने नीतीश और सोनिया को पराजय का दर्पण दिखाया है। रही बात इस चुनाव में जीत किसकी हुई?

मेरे तमाम प्रगतिशील, धर्म निरपेक्ष, वामपंथी, हिन्दू विरोधी, धर्म धुंधकारी, मौका परास्त, बुद्धिहीन, अविवेकी एवं सभी प्रकार की निम्न मानसिकता, कुंठा एवं क्षुद्रताग्रस्त मित्रवर्गों की कुशल क्षेम चाहते हुए स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मित्रों इस बार बिहार की जनता ने आपके साथ छल करते हुए आपके ‘परमानेंट’ रिपु मोदी के गले में 74 कमल पुष्पों की माला डाल दी। हरजाई जनता ने पिछली बार के 53 कमल पुष्पों में देखिए तो ‘आपकी विचारधारा के प्रतिकूल सनातन परम्परा अपनाते हुए’ 21 शुभ संख्या की वृद्धि कर नवीन कमल पुष्प खिला दिए।

मैं आपका दर्द समझ सकता हूँ। अरे सीट बढ़ानी थी तो 22 बढ़ाते 19 बढ़ाते, किसी अन्य संख्या में बढ़ाते 21 ही क्यों बढ़ाई? व्यक्तिगत रूप से देखा जाए तो बिहार के इस चुनाव ने लालू के सुपुत्र तेजस्वी यादव को परिपक्व राजनीतिज्ञ बना दिया। तेजस्वी बिहार के राजनैतिक पटल में सशक्त रूप से स्थापित हो गए।

तेजस्वी के नेतृत्व में महागठबंधन के सबसे बड़े दल राजद ने 75 स्थानों में लालटेन जला दी। वैसे तो इस संख्या में पहले की अपेक्षा 5 सीटों की कमी हुई है। लेकिन याद रखना होगा 2015 के चुनाव में तेजस्वी यादव नीतीश के नेतृत्व में महागठबंधन का हिस्सा थे। इस बार तेजस्वी ने अपने ही बलबूते 75 सीट जीत राजद को बिहार का सबसे बड़ा दल बना दिया। आने वाले वर्षों में तेजस्वी बिहार की राजनीति के महत्वपूर्ण और मजबूत केंद्र बनेंगे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

इस चुनाव की सबसे रोचक बात तो यह रही कि सत्तापक्षीय गठबंधन और प्रमुख प्रतिपक्षीय गठबंधन की विधान सभा में उपस्थिति ज्यो की त्यों रही। चुनाव पूर्व भी सत्ताधारी के पास विधान सभा में 125 का संख्या बल था और विपक्ष के पास 110 का। नए जनादेश ने भी यही मंजर बनाया। नई विधान सभा में भी दोनों की उपस्थिति इतने ही नम्बरों के साथ होगी। अब आप इसे सहज पचाएँ या पचाने के लिए कोई बाहरी सहायता लें, बात तो ‘क्लियर’ है, बिहार चुनाव में मोदी का जादू चला है अन्यथा तेजस्वी के आगे नीतीश का तरकश खाली हो चुका था।

इसमें कोई शक अथवा किन्तु-परन्तु की गुंजाईश नहीं कि नीतीश बाबू को बिहार की जनता ने बोल दिया – हाथ कंगन को आरसी क्या, नीतीश बाबू पढ़े-लिखे को फारसी क्या? (आरसी को यहाँ आइना के सन्दर्भ में ले)। अभी से समझ लें तो बेहतर होगा नीतीश बाबू! अब आपका राजनीतिक भविष्य बिहार की प्रांतीय राजनीति में समाप्ति की ओर कूच कर चुका है।

अपना राजनीतिक भविष्य अब पटना छोड़ दिल्ली में तलाशना ही एक मात्र विकल्प बचा है आपके पास। इतना तो तय है, शिव सेना और अकाली दल के जाने के बाद भाजपा नीतीश के साथ किसी प्रकार की गुस्ताखी अथवा बेदिली दिखाने का साहस नहीं करेगी। भाजपा नीतीश को उनका मन चाहा पद देने के लिए बाध्य है और रहेगी।

नीतीश चाहे बिहार का सिंहासन माँगें, भाजपा देगी। अथवा वह पटना छोड़ दिल्ली का रुख करें तो भी उन्हें उच्च सम्मान सहित बड़ी जिम्मेदारी मिल जाएगी। नवंबर महीने में बिहार विधान सभा के साथ ही भारत के अन्य कई राज्यों में रिक्त हुई विधान सभा के लिए भी चुनाव हुए। सभी के परिणाम आ चुके हैं। इन परिणामों ने निःसंदेह भाजपा समर्थकों में दिवाली धूमधाम से मनाने की हौसला अफजाई की है। ‘मोदी है तो मुमकिन है’ एक बार फिर प्रमाणित हुआ है।

छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखण्ड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, उड़ीसा, तेलांगाना और उत्तर प्रदेश की 59 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने 40 स्थानों पर अपना परचम फहराया है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 7 में से 6 सीटें, तेलंगाना की 1 में 1, मणिपुर की 5 में 4, मध्य प्रदेश की 27 में 19, कर्नाटक की 2 में 2 और गुजरात की 8 में आठों सीटों पर जीत हासिल की है।

बिहार ही नहीं, इन राज्यों के चुनाव परिणाम ने भारतीय जनमानस में मोदी का ‘मैजिक’ यथावत रहने की पुष्टि की है। अरबों जनसंख्या वाले विशाल भारत देश में कोरोना कहर के चलते करोड़ों लोगों ने जीवन में कभी न देखे, न सुने, न भोगे असहनीय पीड़ा, दुःख, संताप, अभाव के साथ सभी किस्म की तकलीफें और बाधा व्यवधान झेले। अमेरिका में कोरोना के चलते राजनीतिक दृश्यावली बदल गई। भारत में हाल में संपन्न हुए चुनाव के परिणामों ने कोरोना कहर के दौरान मोदी सरकार के द्वारा किया गया आपदा प्रबंधन और राहत कार्यों को जनता ने हृदय से स्वीकार किया, ऐसा समझना क्या गलत होगा?

लेखक: ज्ञानमित्र अच्युतानंद

फ्रांस एम्बेसी सहित कई दूतावासों ने दी अनोखे अंदाज में दिवाली की शुभकामनाएँ, देखें वीडियो

भारत में फ्रांसीसी दूतावास ने दिवाली के अवसर पर एक वीडियो साझा किया है। भारत में कई विदेशी दूतावासों ने भी ऐसे ही भारतीय नागरिकों को बधाई दी। लेकिन फ्रांस के बधाई देने के अंदाज ने सभी का मन मोह लिया। भारत में आधिकारिक राजदूत इमैनुएल लेनिन ने ट्वीट किया, “हम आप सभी को खुशी और समृद्धि के साथ दीपावली की शुभकामनाएँ देते हैं।”

लेनिन द्वारा साझा किए गए वीडियो में, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, पुदुचेरी और चेन्नई में महावाणिज्य दूतावास ने विशेष क्षेत्र की भारतीय भाषाओं में दिवाली के लिए शुभकामनाएँ साझा की थीं। उदाहरण के तौर पर, मुंबई में फ्रांसीसी वाणिज्य दूतावास जनरल सोनिया बारबी ने मराठी में दिवाली की बधाई दी, जबकि बेंगलुरु में महावाणिज्य दूतावास ने कन्नड़ में त्योहार की शुभकामना दी। कोलकाता में महावाणिज्य दूतावास ने बंगाली में एक संदेश साझा किया, उसके बाद महावाणिज्य दूतावास पुदुचेरी और चेन्नई में तमिल में बधाई दी।

गौरतलब है कि भारत में ऑस्ट्रेलिया के कमिश्नर बैरी ओ फैरेल ने एक वीडियो साझा किया था जिसमें हिंदी में दीवाली की शुभकामनाएँ दी गई थीं। वीडियो में कहा गया, “क्या आप जानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया ग्रह पर सबसे सुंदर और विविध देश है? हमें इस पर गर्व है। ऑस्ट्रेलिया में प्रत्येक 35 लोगों में 1 भारतीय मूल का व्यक्ति है। समुदायों के बीच संबंध इतने मजबूत हैं कि ऑस्ट्रेलिया में भी दिवाली मनाई जाती है। मैंने अपने दोस्तों के साथ कई मौकों पर दिवाली मनाई है।”

वीडियो में आगे कहा गया है, “इस विशेष अवसर पर, मैं ऑस्ट्रेलिया कमीशन की ओर से आपको शुभकामनाएँ देता हूँ। इस बार के समारोहों में शामिल चुनौतियों के बावजूद, मुझे उम्मीद है कि आप इस बार भी आसानी और सुरक्षा के साथ त्योहार मनाएँगे। दिवाली की शुभकामनाएँ।”

पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले TMC के दिग्गज नेता हो रहे बागी: नेताओं के इस्तीफे ने बढ़ाई CM ममता की चिंता

पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन उससे पहले ही ममता बनर्जी के खेमे में बगावत की सुगबुगाहट नज़र आ रही है। धीरे-धीरे टीएमसी के दिग्गज नेता पार्टी से बागी होते हुए नजर आ रहे है। जहाँ नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलन में ममता के साथ रहे सुवेंदु अधिकारी ने पार्टी छोड़ दी थी वहीं अब रबीन्द्रनाथ भट्टाचार्जी ने पार्टी से इस्तीफा देने की बात कह दी है।

बता दें तृणमूल कॉन्ग्रेस के लोकप्रिय नेता और परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बगावती तेवर दिखाते हुए नंदीग्राम दिवस पर टीएमसी से अलग रैली की। अधिकारी की रैली में सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तस्वीर भी नहीं थे। यहीं नहीं उन्होंने अपनी रैली में भारत माता की जय के नारे भी लगाए। माना जा रहा कि वह भाजपा की ओर रुख कर सकते हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, टीएमसी के एमपी कल्याण बंद्योपाध्याय (Kalyan Bandyopadhyay) ने पार्टी की जिला समिति और सिंगूर सहित 31 ब्लॉक और नगर समितियों की घोषणा की थी। इसमें रवींद्रनाथ समर्थक महादेव दास को पार्टी की सिंगूर ब्लॉक समिति के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। महादेव को भट्टाचार्जी का करीबी माना जाता है। बता दें भट्टाचार्जी ने टाटा के नैनो कारखाने के खिलाफ TMC के आंदोलन में ममता का साथ दिया था। इस आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

वहीं हरिपाल से विधायक बेचाराम मन्ना ने भी गुरुवार को पार्टी में चल रहे मतभेदों को देखते हुए इस्तीफा दे दिया। क्योंकि ऐसा ही बदलाव उनके इलाके में भी हुआ है। पार्टी नेताओं के बदलते रुख को देखते हुए टीएमसी में हलचल मच गई है।

तृणमूल नेतृत्व मामले की गंभीरता को देखते हुए मन्ना को मनाने में जुट गई। जिसके बाद भी मन्ना ने इस्तीफा देने का मन बना लिया। पार्टी के महासचिव सुब्रत बख्शी ने कोलकाता में तृणमूल कॉन्ग्रेस मुख्यालय में मन्ना को बुलाया और कथित तौर पर, ‘इस्तीफे को वापस लेने और दिमाग शांत रखने’ के लिए कहा।

कथिततौर पर मुन्ना का गुस्सा हाल ही में हुए घटनाक्रमों के मद्देनजर भी था। शुक्रवार सुबह उत्तरपारा के विधायक, प्रबीर घोषाल ने मन्ना से उनके आवास पर उनसे बात करते हुए बताया था, “दोनों नेताओं के बीच गलतफहमी थी, लेकिन मेरा मानना है कि मामला अब सुलझ गया है। अब कोई समस्या नहीं हैं। मन्ना सिंगूर आंदोलन का चेहरा हैं और पार्टी इसे स्वीकार करती है।”

वहीं विधायक मुन्ना ने मामले को लेकर मीडिया से किसी प्रकार की बातचीत नहीं की है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि मन्ना अभी भी पार्टी से खुश नहीं हैं।

गौरतलब है कि टीएमसी के नेताओं के रवैये को देखते हुगली से बीजेपी सांसद लॉकेट चटर्जी ने ममता सरकार पर तंज कसा है। चटर्जी ने कहा, “तृणमूल कॉन्ग्रेस अब गुटबाजी से लड़ रही है। हुगली में टीएमसी नेता यह जानते हुए बाहर जाने की कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी यहाँ अपने वादों को पूरा नहीं कर पाई। सिंगूर ने ममता को सत्ता दिलाई थी और यही जगह उनसे सत्ता छीनेगी भी।”

CM योगी ने 14वें साल वनटांगियों के साथ मनाई दीपावली: उनके परिवारों को दी 65 लाख की परियोजनाओं की सौगात

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार 14वें साल शुक्रवार को दिवाली का त्यौहार मनाने के लिए वनटांगिया समुदाय के बीच पहुँचे हैं। वे साल 2007 से ही जंगल तिकोनिया नंबर-3 में बसे पाँच गाँवों में रहने वाले वनटांगिया समुदाय के साथ दिवाली मनाते आ रहे हैं। 

अयोध्‍या में भव्य दीपोत्‍सव के कार्यक्रम के बाद सीएम योगी सीधा गाँव पहुँचे। उन्‍होंने अनोखे तोहफे के तौर पर गाँव में विभिन्‍न योजनाओं का शिलान्‍यास और लोकार्पण किया। उन्होंने वनटंगिया परिवारों के लिए करीब 65 लाख रूपए की विकास परियोजनाओं का दिवाली गिफ्ट दिया है।

गोरखपुर के वनटांगिया गाँव जंगल तिनकोनिया नंबर 3 में पहुँचे मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने 22.39 लाख रुपए के कार्यों का लोकार्पण और 42.93 लाख रुपए की सड़क, नाली और बिजली से संबंधित विभिन्‍न परियोजनाओं का शिलान्‍यास और लोकार्पण किया।

सीएम ने परिषदीय विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को उपहार भी दिए। पुष्टाहार योजना के तहत 10 लाभार्थियों को ड्राई राशन पैकेट व वनटांगिया स्कूल के 10 बच्चों को अपने हाथों से स्कूल ड्रेस, स्वेटर वितरित किया। वनटांगिया गाँव के लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना का स्वीकृति पत्र भी सौंपा गया। मुख्यमंत्री ने वनटांगिया गाँव का भ्रमण कर विकास कार्यों का जायजा लिया।

अधिक जानकारी के लिए बता दें सीएम ने गाँव में खड़ंजा सड़क, रामगढ़ वनटांगिया ग्राम में आँगनबाड़ी केंद्र के भवन का लोकार्पण किया है। वहीं जंगल तिनकोनिया नंबर-3 में सामुदायिक शौचालय, पंचायत भवन, खड़ंजा सड़क कार्यों का शिलान्यास किया।

बता दें वनटांगिया समुदाय सीएम योगी के लिये विशेष स्थान रखता है। आजादी के 70 साल बाद भी यह समुदाय उपेक्षित था। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही वनटांगिया गाँव को राजस्‍व गाँव का दर्जा दिलाया तो साथ ही मतदान का अधिकार भी दिलवाया।

इस दौरान वनटांगियों के संघर्ष को याद करते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ भावुक भी नजर आए। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि देश को आजादी 1947 में ही मिल गई लेकिन वनटांगियों को वास्तविक आजादी पाने में उसके बाद भी सत्तर साल लग गए। यहाँ से जिला मुख्यालय पहुँचने में भले ही सत्तर मिनट से कम समय लगे लेकिन वनटांगिया लोगों को अपना हक पाने के लिए सत्तर साल का इंतज़ार करना पड़ा।

सीएम योगी ने वनटांगियों से निम्न प्रमुख बातें रखी:-

◆ सीएम ने कहा कि, सीधे अयोध्या धाम से आ रहा हूँ। वहाँ की दीपावली आप सब ने देखी होगी। पर्व किस उल्लास और खुशी के साथ मनानी चाहिए ये आपने कल देखा होगा। आज एक दीप शहीदों के नाम जलाइएगा। 492 साल बाद आज अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण कोई रोक नहीं पाएगा। डिजिटल दिवाली भी मना सकते हैं।

◆प्रधानमंत्री जी के आह्वान पर 3.5 साल से शिलान्यास का कार्यक्रम चल रहा है। शासन की योजनाओं का लाभ पहुँचने में यहाँ 70 साल लग गए। 70 मिनट में अब पैदल मुख्यालय तक पहुँच सकते हैं। मैं यहाँ से भलीभाँति परिचित था। इसलिए साथ के लोगों ने यहाँ प्लान किया। वनटांगिया गाँव में झोपड़ी में बैठना पड़ता था। आज यहाँ पक्का मकान बन गया है। यही सच्ची दिवाली है। 4 साल में आज हर सुविधा केंद्र और प्रदेश सरकार की योजनाओं का लाभ मिल रहा है। इससे अच्छी दीपावली नहीं हो सकती है।

◆विकास की योजनाओं में किसी भी तरह की जाति, मजहब को आधार नहीं बनाया गया। कोई वंचित नहीं रहेगा। बिजली और अन्य योजनाओं का लाभ प्रत्येक नागरिक तक पहुँचे। ये हर आम आदमी को सोचना चाहिए। लाभ की योजनाओं की जानकारी सांसद, विधायक और जन प्रतिनिधि को तो होती है। आम आदमी को भी होनी चाहिए। कोई प्रधानमंत्री आवास योजना में कोई गड़बड़ी करना चाहेगा तो नहीं कर पाएगा। शौचालय हर घर में होगा। किसी ने सोचा नहीं था। हर घर में शौचालय 2 करोड़ 61 लाख शौचालय 2.5 वर्ष में दिया।

◆इंसेफेलाइटिस को लेकर पूर्वी यूपी में बहुत से आंदोलन हुए। इंसेफेलाइटिस से गरीब का बच्चा मरता था। 1977 से लेकर 2017 तक कम से कम 50000 बच्चों की मौत हुई। हर साल 1000 से 1500 बच्चों की मौत होती थी। इस वर्ष सिर्फ 21 मौत हुई है। इसे भी जल्द खत्म कर देंगे।

गौरतलब है कि आजादी के 70 साल बाद जब गाँव में प्रधानमंत्री और मुख्‍यमंत्री आवास योजना के तहत पक्‍के मकान के साथ बिजली पहुँची तो शिक्षा की अलख भी जग गई। सरकारी और मूलभूत सुविधाओं ने गाँव की तस्‍वीर ही बदलकर रख दी। वैश्विक महामारी कोरोना के बावजूद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हमेशा की तरह कोविड-19 के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए गाँव वालों के साथ दिवाली का उत्सव मनाने पहुँचे थे।

जम्मू-कश्मीर में 370 वापसी की माँग कर रहे गुपकार गैंग में शामिल हुई कॉन्ग्रेस, डीडीसी चुनाव में देगी साथ

जम्मू-कश्मीर में डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट काउंसिल यानी डीडीसी चुनाव की तैयारी कर रहे गुपकार घोषणापत्र गठबंधन में अब कॉन्ग्रेस भी उनका साथ दे रही है। जम्मू-कश्मीर प्रदेश कॉन्ग्रेस समिति (जेकेपीसीसी), शुक्रवार को गुपकार घोषणापत्र गठबंधन (पीजीएडी) में शामिल हो गई है। गुपकार घोषणा के लिए पीपुल्स एलायंस, जिसे बोलचाल की भाषा में गुपकार गैंग कहा जाता है, कई राजनीतिक दलों का एक गठबंधन है जो पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य की विशेष स्थिति की बहाली की माँग कर रहा है।

इसमें कोई चौकाने वाली बात नहीं है कि जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के खिलाफ बेहद मुखर रही कॉन्ग्रेस पार्टी भी इस विवादास्पद गठबंधन में शामिल हो गई है।

जम्मू और कश्मीर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी (पीसीसी) ने कथित तौर पर जम्मू में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की पाँच घंटे की संयुक्त बैठक में भाग लेते हुए जिला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनावों में उम्मीदवारों की रणनीति और चुनाव की तैयारियों से संबंधित कामों को अंतिम रूप दिया।

एनसी देवेंद्र सिंह राणा ने बैठक के बाद कहा, डॉ.फारूक अब्दुल्ला साहब को बताया गया – गुपकार घोषणा (पीएजीडी) के लिए पीपुल्स अलायंस के अध्यक्ष – कॉन्ग्रेस हाई कमान ने कहा कि कॉन्ग्रेस जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के लोगों के कल्याण और धर्मनिरपेक्ष ताने बाने को मजबूत करने के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसी सोच रखने वाली पार्टियों का समर्थन करना चाहती है।

इससे पहले शुक्रवार को पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के ‘फेयरव्यू’ निवास पर जीज गठबंधन की बैठक में कॉन्ग्रेस के दो नेताओं ने भाग लिया था। कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी मोंगा ने मुफ्ती के आवास के बाहर मीडिया से बात करते हुए कहा, “हम गठबंधन के साथ हैं।” विभाजनकारी ताकतों को हराने के लिए हम यह चुनाव लड़ेंगे।

नेकां मुख्यालय ‘नवा-ए-सुबाह’ में PAGD गठबंधन की एक और बैठक के बाद NC के प्रांतीय अध्यक्ष नासिर असलम वानी ने यह कहकर पुष्टि की कि कॉन्ग्रेस ने आश्वासन दिया है कि वह गठबंधन का हिस्सा होगी और डीडीसी के चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे पर चर्चा होगी।

कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रविन्द्र शर्मा ने कहा, “हमने अपने उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए नेकां और अन्य राजनीतिक दलों जैसे समान विचारधारा वाले धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ समायोजन प्रक्रिया शुरू की है। हमने उम्मीदवारों की उपयुक्तता पर चर्चा की है। व्यापक गठन किया जाएगा जिसमें बेहतर उम्मीदवारों को मैदान में उतारा जाएगा और हमने इस पर काम करने की बात भी की है।

गुपकार घोषणा (PAGD) के लिए नवगठित पीपुल्स एलायंस ने यह भी घोषणा की कि वे आगामी जिला विकास परिषद (DDC) चुनावों में भाजपा के खिलाफ एक सिंगल इकाई के रूप में भाग लेंगे।

गुपकार गैंग ने डीडीसी चुनावों के लिए 27 उम्मीदवारों की पहली सूची भी जारी की है। जिन उम्मीदवारों ने अपना नामांकन दाखिल किया, उनमें से 21 नेशनल कॉन्फ्रेंस के हैं, चार पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के हैं और दो पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के हैं।

नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के अलावा, पीपल्स कॉन्फ्रेंस, माकपा और अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस PAGD गठबंधन का हिस्सा हैं।

जम्मू और कश्मीर प्रशासन ने कथित तौर पर पिछले साल 5 अगस्त के बाद लगभग 37 लोगों की सूची सौंपी थी, जब तत्कालीन राज्य का विशेष दर्जा हटा दिया गया था। इस सूची में नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, जेके पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के विभिन्न नेताओं के नाम शामिल हैं, जिनमें अली मोहम्मद सागर, अब्दुल रहीम राथर, नईम अख्तर, सज्जाद लोन उनके भाई बिलाल लोन, वानी, बशारत बुखारी शामिल हैं।

प्रारंभ में, सूची तीन महीने के लिए वैध थी जिसे बाद में समीक्षा के बाद बढ़ा दिया गया था। हालाँकि, सूची को छँटनी के बाद वापस से अपडेट किया गया था। जिसके बाद इसमें संख्या 33 हो गई। दिलचस्प बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के नाम इस सूची में नहीं हैं।

IPL में भारी आतिशबाजी पर मौन विराट कोहली ने दीवाली पर दिया ‘लिबरल’ ज्ञान, सोशल मीडिया यूजर्स ने जमकर लताड़ा

भारत में दीवाली का त्यौहार बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। वहीं इस मौके पर कई दिग्गज सेलिब्रिटी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दीवाली की शुभकामनाएँ देते और हिन्दुओं को किस तरह इस त्यौहार को मनाना चाहिए यह सलाह देते हुए नजर आए। इसी तरह का संदेश भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने भी पोस्ट किया।

विराट कोहली ने 18 सेकंड का एक वीडियो पोस्ट किया। जिसमें उन्होंने कहा, “मेरी तरफ से आपको और आपके परिवार को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। भगवान आपको इस दिवाली शांति, समृद्धि और खुशी प्रदान करें। कृपया याद रखें कि पटाखे न फोड़ें, पर्यावरण की रक्षा करें और इस शुभ अवसर पर एक साधारण दीए और मिठाई के साथ अपने प्रियजनों के साथ घर पर मस्ती करें। भगवान आप सबका भला करे। अपना ख्याल रखिएगा।”

गौरतलब है कि 18 सेकेंड के इस वीडियो में विराट कोहली ने हिंदुओं की भावनाओं को झकझोर दिया। सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो को लेकर यूज़र्स जमकर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं।

बता दें हिंदुओं के हर त्यौहार पर हमेशा सेलेब्रिटीज़ यह बताने के लिए सामने आ जाते है कि उन्हें कैसे त्योहारों को मनाना चाहिए और कैसे पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। वहीं दीवाली जैसे शुभ त्यौहार पर इन लोगों ने वहीं पुराना राग अलापना शुरू कर दिया।

यहाँ यह बात नोट करने वाली है कि जो लोग महँगी पेट्रोलिंग वाली एसयूवी चलाते हैं, दुनिया भर में चार्टर्ड फ्लाइट से आते जाते है, खेलने के लिए लाखों पेड़ो की बलि चढ़वा देते है, हर वक्त एयर कंडीशनिंग कमरे में बैठते है वो अब ज्ञान देने लग गए है कि कैसे पर्यावरण को बचाना चाहिए।

जैसे ही विराट कोहली ने वीडियो ट्वीट किया कई नेटिज़न्स कोहली को तुरंत लताड़ते और उनके दोहरे पाखंड की आलोचना करते हुए नजर आए।

सोशल मीडिया यूज़र्स ने उनके पटाखे न छोड़ने वाली बात को आईपीएल से तुलना करते हुए उनपर तंज कसा कि काश यह ख्याल उन्हें आईपीएल जीतने के बाद धड़ल्ले से पटाखे फोड़ते वक्त आया होता।

कुछ अन्य लोगों ने बताया कि कोहली किस तरह से बेंटले, ऑडी और कई लग्जरी कारों के मालिक है और उसमें इस्तेमाल हो रहे पेट्रोल और उससे पर्यावरण को पहुँच रहे नुकसान लेकर उन्हें कोई चिंता नहीं है। लोगों ने उन्हें बताया कि दिवाली पर इस्तेमाल होने वाले पटाखों की तुलना में यह गाडियाँ पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुँचाती हैं।

कुछ अन्य लोगों ने यह भी बताया कि किस तरह क्रिकेट के फील्ड को बनाने के लिए पेड़ों को काटा जाता है।

नेटीज़न्स ने यह भी पॉइंट किया कि कैसे अनुष्का के परफॉर्मेंस के वक्त पटाखे फोड़े गए थे। जिस दौरान विराट को पर्यावरण की कोई चिंता नहीं हुई।

विराट का यह मैसेज सोशल मीडिया यूज़र्स नहीं भाया। लोगों ने अपने अपने तरीके से विराट पर अपना गुस्सा जाहिर किया।

सेलेब्रिटीज़ जिन्हें यह बात समझनी पड़ेगी की लोग सिर्फ उनके कला की वजह से उन्हें पसंद करते है। न कि अगर वे उनके धार्मिक भावनाओं को ठोस पहुँचाएँगे तब भी उन्हें सराहा जाएगा।

इजरायल के सीक्रेट दस्ते ने ईरान में घुसकर अलकायदा के नंबर-2 को मार गिराया, लादेन की बहू भी ढेर

केन्या और तंजानिया में अमेरिकी दूतावास पर 1998 में हुए आतंकी हमले के मास्टरमाइंड अबू मोहम्‍मद अल मस्‍त्री के मारे जाने की खबर आ रही है। इन हमलों को आतंकी संगठन अलकायदा ने अंजाम दिया था। हमलों के 22 साल बाद इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के जवानों ने ईरान की राजधानी तेहरान में छिपे अलकायदा के नंबर दो सरगना अबू मोहम्‍मद अल मस्‍त्री (58) को मार ग‍िराया। हमले में अलकायदा सरगना ओसामा बिना लादेन की बहू भी मारी गई। 

हमले में मारे गए थे 224 लोग 

अमेरिकी दूतावास पर अलकायदा के आतंकी हमले में 224 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि दर्जनों लोग घायल हो गए। इस हमले का मास्टरमाइंड अबू मोहम्मद को माना जाता है। न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स की रिपोर्ट के मुताबिक अलकायदा के दूसरे नंबर के नेता अबू मोहम्‍मद ऊर्फ अब्‍दुल्‍ला अहमद अब्‍दुल्‍ला को उसकी बेटी के साथ गत 7 अगस्‍त को तेहरान की सड़कों पर गोली मार दिया गया।

अबू मोहम्मद पर था एक करोड़ डॉलर का इनाम

जानकारी के मुताबिक इस हमले को इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के सीक्रेट दस्‍ते ने अंजाम दिया है। अफ्रीकी देश केन्‍या और तंजानिया में अमेरिकी दूतावास पर 9 अगस्‍त 1998 को हुए भीषण हमले में 224 लोग मारे गए थे और हजारों लोग घायल हो गए थे। अबू मोहम्मद पर एफबीआई की ओर से एक करोड़ डॉलर का इनाम घोषित किया गया था। 

न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने कहा कि अबू मोहम्‍मद की हत्‍या अभी तक सीक्रेट थी। रोचक बात यह थी कि ईरान के सरकारी मीडिया ने इस घटना की खबर दी थी और मारे जाने वाले व्‍यक्ति का नाम हबीब दाउद और उसकी 27 साल की बेटी मरियम बताया था। ईरानी मीडिया ने कहा कि हबीब दाउद लेबनान का इतिहास का प्रोफेसर था। न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने कहा कि दाउद नाम का कोई व्‍यक्ति मौजूद नहीं था और इस फर्जी नाम का इस्‍तेमाल ईरान की खुफिया एजेंसी के अधिकारी करते थे। ईरान के एजेंटों ने उसे शरण दे रखी थी।

मरियम की शादी ओसामा बिना लादेन के बेटे हमजा से हुई थी

बताया जा रहा है कि अलकायदा सरगना गत 7 अगस्‍त को अपनी कार से रात को 9 बजे जा रहा था। इस दौरान दो लोगों ने कार रुकवाई और अबू मोहम्‍मद और उसकी बेटी मरियम को गोली मार दी। मरियम की शादी ओसामा बिन लादेन के बेटे हमजा बिन लादेन से हुई थी। हमजा पहले ही मारा जा चुका है। सीक्रेट दस्ते ने साइलेंसर लगी बंदूक का इस्‍तेमाल किया जिससे किसी को हमले का अहसास नहीं हुआ। अभी तक इस हमले की किसी भी देश ने जिम्‍मेदारी नहीं ली है। अलकायदा ने भी अभी अबू मोहम्‍मद की मौत का ऐलान नहीं किया है।