आठ वर्षों के अथक प्रयास और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नियमित निगरानी से नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट सपने से हकीकत में तब्दील हो गया है। मार्च 2026 में एयरोड्रम लाइसेंस मिलने और शनिवार (28 मार्च 2026) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फेज-1 के लोकार्पण के बाद यह एयरपोर्ट पूरी तरह संचालन के लिए तैयार है। उत्तर प्रदेश को वैश्विक एविएशन हब बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री योगी के विजन का यह सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मेगा प्रोजेक्ट को शुरू से ही अपनी प्राथमिकता दी। उनके कुशल नेतृत्व और समयबद्ध फैसलों की वजह से 2017 में शुरू हुआ सपना 2026 में पूरा हो गया। सीएम योगी ने हर कदम पर विभागों के बीच समन्वय सुनिश्चित किया और नियमित समीक्षा बैठकें कर प्रगति की निगरानी की।
'नया उत्तर प्रदेश' आज प्रगति की एक नई उड़ान भरते हुए उद्घोष कर रहा है कि जब संकल्प मजबूत हो, साहस अडिग हो तथा आत्मविश्वास अटल हो तो कोई भी लक्ष्य दूर नहीं रह सकता है और जेवर का यह एयरपोर्ट उसी संकल्प की सिद्धि की परिणति है।
परियोजना की शुरुआत 2017 में हुई जब जुलाई में साइट क्लीयरेंस और अक्टूबर में गृह मंत्रालय से एनओसी प्राप्त हुई। इसी वर्ष जेवर को विश्व स्तर के एयरपोर्ट के रूप में विकसित करने की नींव रखी गई। 2018 में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड का गठन कर परियोजना को संस्थागत रूप दिया गया। मुख्यमंत्री योगी ने इस दौरान भूमि अधिग्रहण से लेकर पर्यावरणीय मंजूरी तक हर प्रक्रिया को तेजी से पूरा कराया।
2020 में ज्यूरिख एयरपोर्ट इंटरनेशनल एजी को कंसेशनायर चुना गया और कंसेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए। सीएम योगी के निर्देश पर सभी औपचारिकताएं समय पर पूरी की गईं। अगस्त 2021 में फाइनेंशियल क्लोजर हो गया और मास्टर प्लान को मंजूरी मिली। अक्टूबर 2021 में अपॉइंटेड डेट घोषित कर निर्माण का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।
मार्च 2022 में निर्माण कार्य शुरू हुआ और टाटा प्रोजेक्ट्स को ईपीसी कॉन्ट्रैक्टर नियुक्त किया गया। 2022 से 2024 तक सभी महत्वपूर्ण टास्क समयबद्ध तरीके से पूरे किए गए। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई बार साइट का निरीक्षण किया और अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उनकी सक्रियता के कारण कोई भी बाधा लंबे समय तक नहीं टिक सकी।
28 मार्च, 2026 को PM मोदी और CM योगी Noida के जेवर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का करेंगे लोकार्पण
भारत का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट है जेवर हवाई अड्डा; पाँच वर्ष के रिकॉर्ड समय में बनकर हुआ है तैयार
अक्टूबर 2025 में कैलिब्रेशन फ्लाइट सफल रही और मार्च 2026 में एयरोड्रम लाइसेंस प्राप्त हो गया। सीएम योगी ने इस पूरे सफर में कभी भी लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उन्होंने एयरपोर्ट को केवल उड़ान भरने का स्थान नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के औद्योगिक लॉजिस्टिक्स और निवेश केंद्र के रूप में विकसित करने की रणनीति बनाई।
यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में अब तेजी से औद्योगिक विकास हो रहा है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लाखों रोजगार सृजित करेगा। यह निर्यात लॉजिस्टिक्स पर्यटन और निवेश को नई गति देगा। मुख्यमंत्री योगी के विजन के कारण उत्तर प्रदेश अब वैश्विक कनेक्टिविटी के नए युग में प्रवेश कर रहा है।
एयरपोर्ट के आगे का विकास मॉडल भी तैयार है। आसपास के क्षेत्रों में होटल शॉपिंग मॉल और मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट हब विकसित किए जा रहे हैं। सीएम योगी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यह एयरपोर्ट यूपी की आर्थिक शक्ति को और मजबूत करेगा।
इस उपलब्धि पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट यूपी की प्रगति का प्रतीक है। उनके अनुसार यह प्रोजेक्ट केवल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं बल्कि युवाओं के सपनों को उड़ान देने का माध्यम है।
जेवर एयरपोर्ट उत्तर प्रदेश को ग्लोबल कनेक्टिविटी का केंद्र बनाते हुए…
प्रदेश को स्केल और स्पीड के साथ विकास की एक नई ऊंचाई तक ले जाने का कार्य भी करेगा… pic.twitter.com/p7aNrgLAim
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फेज-1 के लोकार्पण के बाद एयरपोर्ट से नियमित उड़ानें शुरू हो जाएँगी। यह यूपी को दिल्ली एनसीआर के अलावा पूरे उत्तर भारत के लिए नया एविएशन हब बनाएगा।
मुख्यमंत्री योगी की कोशिशों से पूरा प्रोजेक्ट निर्धारित समय से पहले पूरा हो गया। आठ वर्षों का यह सफर अब नई उड़ान की शुरुआत है। यूपी सरकार का यह मॉडल पूरे देश के लिए उदाहरण बनेगा।
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट अब एविएशन इंडस्ट्री के फलक पर चमकने को तैयार है। सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी विकास की नई ऊँचाइयों को छू रहा है।
इस्लामी-वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ के नाम से एक कथित लेख का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वायरल स्क्रीनशॉट में दावा किया गया है कि ‘बहुजन’ कंटेंट क्रिएटर्स को पोर्न इंडस्ट्री पर ‘कब्जा’ करने की वकालत की गई है जिसे लेखक सूरज येंगड़े ने ‘आखिरी किला’ बताया है।
वायरल स्क्रीनशॉट के अनुसार, दलित अधिकार कार्यकर्ता ने तर्क दिया है कि अंबेडकरवादी विचारधारा को फैलाने के लिए पोर्नोग्राफी जैसे ‘फ्रंटियर’ में भी प्रवेश करना जरूरी है और इसके लिए ब्राह्मण महिलाओं को निशाना बनाया जाना चाहिए। हालाँकि, यह स्क्रीनशॉट भले ही येंगड़े और ‘द वायर’ के सवर्ण विरोधी रुख के कारण भरोसेमंद लगता हो लेकिन यह पूरी तरह से फर्जी और व्यंग्य के रूप में बनाया गया है।
इस वायरल स्क्रीनशॉट में जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ है। इस कथित लेख की हेडलाइन “The Case for Dalit ‘Porn’ – Why Bahujan Content Creators Must Conquer this Last Frontier” लिखी गई है।
वहीं, इसकी समरी में लिखा है, “हर विचारधारा को विस्तार के लिए पॉप-कल्चर के साधनों की जरूरत होती है। जहाँ अंबेडकरवादी विचारधारा के पास ऑटो-ट्यून गाने और रील्स जैसे माध्यम मौजूद हैं लेकिन हम पोर्नोग्राफी के क्षेत्र में पीछे हैं जो सबसे ज्यादा देखे जाने वाला कंटेंट है। भले ही यह सुनने में आपत्तिजनक लगे लेकिन बहुजन कंटेंट क्रिएटर्स को इस दिशा में काम करना चाहिए जैसे कि एक ब्राह्मण या यादव हाउस वाइफ को शौचालय साफ करने आए एक सफाईकर्मी के साथ सेक्स करते दिखाना।
ऑपइंडिया ने द वायर की वेबसाइट और उसके सोशल मीडिया हैंडल्स की जाँच की जिससे यह पता लगाया जा सके कि वायरल स्क्रीनशॉट में दिखाया गया लेख कभी प्रकाशित हुआ था, उसमें कोई बदलाव किया गया था या उसे हटाया गया था। पता चला कि सुरज येंगड़े द्वारा ऐसा कोई एंटी-ब्राह्मण लेख न तो लिखा गया था और न ही द वायर ने उसे प्रकाशित किया था। हमारी रिसर्च के अनुसार, वायरल स्क्रीनशॉट के फर्जी होने की पूरी संभावना है।
द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने 27 मार्च को X (ट्विटर) पर एक पोस्ट कर इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ‘जातिवादी और हिंदुत्व से प्रभावित हिंदुओं’ को यह फर्जी स्क्रीनशॉट बनाने और फैलाने का जिम्मेदार बताया। उनका दावा है कि इन लोगों ने एक झूठी कहानी गढ़ी और उसे ‘सम्मानित स्कॉलर’ सुरज येंगड़े और द वायर से जोड़ने की कोशिश की।
Hatred and perversity among casteist Hindus, especially those infected with Hindutva, knows no bounds. Some of them have gone to the extent of fabricating a fake 'story' based on their sick minds and tried to pin it on a respected Dalit scholar, and on The Wire. https://t.co/XKYd6g0R9X
भले ही सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मामले में तुरंत ‘जातिवादी’ हिंदुओं और हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराया और सुरज येंगड़े को ‘सम्मानित स्कॉलर’ बताया लेकिन यह फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को इसलिए असली लगा क्योंकि यह येंगड़े की पहले से चली आ रही एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी और द वायर की कथित एंटी-हिंदू लाइन के पैटर्न से मेल खाता हुआ दिखा।
येंगड़े ने पहले भी ‘ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ जैसे विषयों पर कई लेख लिखे हैं जिनमें ब्राह्मण महिलाओं पर खास फोकस देखा गया है। उनके लेखों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में अक्सर ऊँची जाति के हिंदुओं को इस बात के लिए निशाना बनाया जाता है कि वे ‘जाति शुद्धता’ के कारण अपनी बेटियों की शादी दलितों से नहीं करते। इसी तरह के पुराने बयानों और विचारों के कारण यह फर्जी स्क्रीनशॉट कई लोगों को पहली नजर में असली और भरोसेमंद लगा।
सुरज येंगड़े की एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी केवल अकादमिक टिप्पणी तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई बार खुले तौर पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने वाली भाषा तक पहुँच जाती है जैसा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स में देखने को मिलता है। ऐसे ही एक पोस्ट में येंगड़े ने लिखा था, “ब्राह्मण लड़कियाँ दलित पुरुषों के लिए लालायित रहती हैं। मुझसे पूछो।”
एक पोस्ट में सुरज येंगड़े ने एक ब्राह्मण की पोस्ट का जवाब देते हुए ब्राह्मण समुदाय से कहा कि वे अपनी बेटियों को दलितों को ‘दे दें’ जैसे वे कोई वस्तु हों। उन्होंने इसे इस तरह पेश किया मानो अपने ‘विशेषाधिकार’ (प्रिविलेज) को दलितों के साथ साझा करना चाहिए और इसके लिए महिलाओं को ऐसी चीज समझा जाए जिसे आपस में बाँटा जा सकता है।
येगड़े पर यह आरोप भी रहा है कि वो एंटी-ब्राह्मण बातों को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू इतिहास और शास्त्रों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।
ब्राह्मण महिलाओं को लेकर की गई आपत्तिजनक बातें और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने के अलावा येंगड़े उनके प्रति साफ तौर पर नफरत भी दिखाता है। उसने उन्हें ‘ध्यान भटकाने का हथियार’ बताते हुए कहा कि उनके लिए उसे कोई सहानुभूति नहीं है।
इस तरह की जातीय बदले की सोच और अतिवादी कल्पनाओं के कारण पोर्न इंडस्ट्री को ‘आखिरी किला’ बताने जैसे दावे भी लोगों को सच लगने लगते हैं। कई मौकों पर कुछ दलित ‘सामाजिक न्याय’ कार्यकर्ताओं द्वारा ऊँची जाति की महिलाओं को मानो इतिहास का बदला लेने के प्रतीक या ट्रॉफी की तरह ‘हासिल’ करने की बात भी कही गई है।
The so-called renowned & awarded scholar has already shown his mentality earlier.
भारत में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कुछ दलित कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट ने खुले तौर पर सामान्य (जनरल) वर्ग की महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया है। सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि कुछ IAS अधिकारियों तक के ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें यह कहा गया कि सामान्य वर्ग की महिलाएँ मानो कोई ट्रॉफी या वस्तु हैं जिन्हें ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे को सफल बनाने के लिए दलितों के साथ शेयर किया जाना चाहिए।
The so-called renowned & awarded scholar has already shown his mentality earlier.
साथ ही, पश्चिमी लिबरल विचारधारा के प्रभाव में जहाँ खाने, संगीत और साहित्य जैसी चीजों को भी गलत और सीमित श्रेणियों में बाँटने की प्रवृत्ति है, उसी तरह भारतीय लिबरल वर्ग के कुछ लोग भी इन विचारों को कॉपी-पेस्ट करके भारत में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। यह तरीका मूल रूप से गलत माना जाता है क्योंकि भारतीय सांस्कृतिक विविधता और उसके पहलू पश्चिमी समाज से अलग हैं और उसका विकास अलग परिस्थितियों में हुआ है। ऐसे में पश्चिमी ढाँचे में उन्हें फिट करने की कोशिश सही नहीं बैठती।
वाइस के एक आर्टिकल का स्क्रीनशॉट
दलित भोजन, दलित संगीत, दलित ‘देवता’, दलित परंपराएँ जैसे विषयों पर कई लेख और किताबें सामने आई हैं। इनमें कुछ भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूह पश्चिम की ‘सोशल जस्टिस’ विचारधारा से प्रभावित होकर भारत के समाज और संस्कृति को दलित बनाम ऊँची जाति जैसे सीमित खाँचों में बाँटने की कोशिश करते हैं। कई बार ये चर्चाएँ अजीब तुलना और गलत दावों तक पहुँच जाती हैं।
पोर्न को ‘कलंक खत्म करने के हथियार’ के रूप में सही ठहराने वाले एक लेख का स्क्रीनशॉट
इन्हीं बहसों के धीरे-धीरे आम हो जाने की वजह से वह वायरल स्क्रीनशॉट भी लोगों को काफी हद तक सच जैसा लगा। व्यंग्य (सटायर) समाज में चल रही चीजों को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने का एक तरीका होता है। यह तथ्य कि एक अलग ‘दलित पहचान’ की चीजों को वाम-उदारवादी ‘यौन स्वतंत्रता’ के सामान्य विचारों के साथ मिलाकर वह व्यंग्यात्मक स्क्रीनशॉट बनाया गया और वह कई लोगों को ‘सच’ लगा…यह अपने आप में भी एक तरह का व्यंग्य है।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
भारत के पास पर्याप्त तेल भंडार है। संसद के अंदर और बाहर सरकार कई बार साफ बता चुकी है कि देश में तेल और गैस की कोई कमी नहीं है। सरकार ने कालाबाजारी करने वालों को भी चेताया है। प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में भी इसे साफ किया है।
इसके बावजूद देश विरोधी ताकतें लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही हैं कि भारत में तेल-गैस का भंडार कम है। कोई कह रहा है कि 5 दिनों का रणनीतिक भंडार बचा है, तो कोई 9 दिनों का रणनीतिक भंडार होने का दावा कर रहा है। बीबीसी की हेडलाइन भारत विरोधी प्रोपेगेंडा को साफ जाहिर करता है।
बीबीसी फैला रहा झूठ
बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत के पास मात्र 5 दिनों का तेल भंडार है। रिपोर्ट में कैग के हवाले से बताया गया है कि भारत की कुल भंडारण क्षमता करीब 74 दिनों की है, लेकिन सीएजी की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, इन भंडारण सुविधाओं का सालों से पूरा इस्तेमाल नहीं है।
दरअसल रिपोर्ट में ये बताया गया है कि सरकार ने 74 दिनों के स्टॉक की बात कही है और लोगों को पैनिक नहीं होने के लिए कहा है। लेकिन लेख का शीर्षक ऐसे लिखा गया है, जैसे 5 दिनों के बाद भारत में तेल-गैस का हाहाकार मच जाएगा। ऐसी खबरें लोगों को गुमराह करती हैं।
Meet Jasmin Nihlani of BBC who is trying to spread panic in India by selective and incomplete reporting.
खबर के अंदर बताया गया है कि सरकार ने पिछले साल राज्यसभा को बताया था कि तेल विपणन कंपनियों के पास 64.5 दिन की माँग के बराबर स्टॉक है। आईएसपीआरएल की कुल 9.5 दिनों की क्षमता को जोड़ने के बाद ये 74 दिनों का हो जाता है। ये बताने के बावजूद लोगों को भ्रम में डालने के लिए हेडलाइन में सिर्फ 5 दिनों के स्टॉक की बात कही गई है।
यह सनसनी पैदा कर के गुमराह करने वाली हैडलाइन है ऐसी खबरों से पेट्रोल पंप्स पर लाइन लगती है और अराजकता फैलती है।
इस आर्टिकल में ही लिखा है कि भारत के पास 74 दिन का तेल भंडार है फिर हेडलाइन के माध्यम से संशय उत्पन्न करना वर्तमान परिस्थितियों में अफ़वाह फैलाने जैसा है ।
— प्रियंक कानूनगो Priyank Kanoongo (@KanoongoPriyank) March 28, 2026
ऐसी स्थिति में जब दुनिया के ज्यादातर देशों में पेट्रोल-गैस के दाम बढ़ चुके हैं। कई देशों में पेट्रोल पंप खाली पड़े हैं। भारत की रणनीति ही है, जिससे हमारे पास 74 दिनों का स्टॉक होने के बावजूद सरकार लगातार कई देशों से ऑयल मँगा रही है। पहले भारत जहाँ 27 देशों से ऑयल मँगाती थी, वहीं अब 40 देशों से ऑयल मँगाया जा रहा है।
ईरान हमले और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल टैंकरों के आने में बाधा होने के बावजूद ये सरकार की रणनीति की वजह से ही संभव हो पाया है कि हमारे तेल- गैस टैंकर एक के बाद एक सुरक्षित होर्मुज को पार कर देश पहुँच रहे हैं। भारत में रूस से भी तेल आ रहा है और अमेरिका से भी। इतना ही नहीं ईरान से भी एलपीजी से भरा टैंकर भारत आया है।
गैस-तेल का कोई संकट नहीं
एलपीजी की बात करें तो देश में रिफाइनरी उत्पादन में 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। दैनिक एलपीजी उत्पादन 50 टीएमटी तक पहुँच गया है, जबकि कुछ दैनिक जरूरत 80 टीएमटी है। यानी कुल 30 टीएमटी दैनिक एलपीजी की कमी है इसे पूरा करने के लिए लगातार आयात किया जा रहा है। कहने का मतलब है कि देश में एलपीजी का उत्पादन अभी भी आयात से ज्यादा है।
🚨सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि भारत के पास केवल “9 दिनों का तेल भंडार” बचा है#PIBFactCheck:
✅ भारत की कुल भंडारण क्षमता 74 दिनों की है, जबकि वर्तमान में लगभग 60 दिनों का स्टॉक उपलब्ध है। इसमें कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद और… https://t.co/sMzETu642z
घर में पाइप से आने वाले गैस यानी पीएनजी के लिए दूसरों पर निर्भरता यूँ भी काफी कम है। भारत पहले से ही 191 प्रतिदिन मिलियन मीट्रिक मानक घन मीटर की दैनिक आवश्यकता में से 92 प्रतिदिन मिलियन मीट्रिक मानक घन मीटर प्राकृतिक गैस का घरेलू उत्पादन करता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति के बावजूद, भारत को आज दुनिया भर के अपने 41 से अधिक आपूर्तिकर्ता देशों से पहले की तुलना में अधिक कच्चा तेल मिल रहा है। भारत की सभी रिफाइनरियाँ 100 प्रतिशत से अधिक क्षमता पर चल रही हैं। इंडियन ऑयल कंपनियों ने अगले 60 दिनों के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति पहले ही सुनिश्चित कर ली है। आपूर्ति में कोई कमी नहीं है।
भारत में कई बार तेल-गैस के पर्याप्त भंडार हैं, ये बातें कही गई है। दरअसल लोगों के पैनिक होने पर रेग्युलर सप्लाई के बावजूद कई जगहों पर लाइन इस वजह से लगी है कि आम दिनों से ज्यादा पेट्रोल लेने की कोशिश की जा रही है। इससे दिक्कत आई है। लेकिन यह उतना बड़ा मामला नहीं है। लोगों को पेट्रोल- डीजल और गैस नियमित तौर पर मिल रही हैं, इसे कोई नहीं झुठला सकता।
इसके बावजूद गलत तरीके से खबरों को पेश कर लोगों में भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है। न तो पीएम मोदी के आश्वासन पर भरोसा है और न ही पेट्रोलियम मंत्रालय पर। यहाँ तक कि संसद में ही पीएम मोदी ने कहा कि भारत के पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडारण है. उन्होंने कहा कि भारत ने कच्चे तेल के आयात को विविध बनाया है और संकट से निपटने के लिए भंडारण को प्राथमिकता दी है। देश में तेल और गैस की कमी नहीं है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर भी झूठ फैलाया जा रहा है। इसको लेकर पेट्रोलियम मंत्रालय ने नाराजगी जाहिर करते हुए भ्रम फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है।
मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित भ्रामक वीडियो और पोस्टों पर चिंता जताते हुए कहा कि दूसरे देशों में तेल गैस की आपूर्ति की कमी के फुटेज को भारत का बता कर प्रसारित किया गया और भारत में लॉकडाउन की झूठी खबर फैलाई गई। मंत्रालय ने फर्जी और मनगढ़ंत दावों को लेकर एक्शन लेने की बात भी कही है।
मंत्रालय ने साफ कहा है कि कुछ पोस्टों में जानबूझकर सरकारी आदेशों को संकट का संकेत बताते हुए प्रचारित किया गया है।
यही वजह है कि मंत्रालय ने साफ कहा है कि ईंधन और गैस की उपलब्धता संबंधी जानकारी के लिए केवल सरकारी सूचनाओं पर ही भरोसा करें। आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता के संबंध में गलत जानकारी फैलाना मौजूदा कानूनों के तहत अपराध है, लेकिन भ्रम फैलाने से देश विरोधी ताकतें बाज नहीं आ रही हैं। बीबीसी का लेख की हेडलाइन भी लोगों को बरगलाने वाली है। अंदर लेख में साफ बताया जा रहा है कि भारत में पर्याप्त भंडार है लेकिन हेडलाइन ऐसी, जिससे लोगों में भ्रम पैदा हो, ये पत्रकारिता की छवि को धुमिल करने वाली है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और एक 5 साल की बच्ची यशस्विनी के बीच की मासूम बातचीत ने सोशल मीडिया पर ‘लिबरल ब्रिगेड’ के पेट में दर्द कर दिया है। जहाँ एक ओर सीएम योगी ने उस बच्ची को खिलौने के रूप में छोटा सा बुलडोजर वापस कर पढ़ाई पर ध्यान देने की प्रेरणा दी, वहीं दूसरी ओर आरफा खानुम जैसी प्रोपेगेंडाई पत्रकार और उनके वामपंथी समर्थकों ने इसे ‘हिंदू कट्टरपंथ’ का नाम दे दिया। यह उस दोहरे मापदंड का पर्दाफाश करती है जो खिलौने में तो ‘आतंकवाद’ देख लेता है, लेकिन वास्तविक घृणा और अश्लीलता पर आँखें मूँद लेता है।
बुलडोजर से ‘शिक्षा’ की सीख: जब योगी ने नन्ही यशस्विनी को चॉकलेट और संस्कार दिए
गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर से एक बेहद भावुक और प्रेरक Video सामने आया। कानपुर की 5 साल की बच्ची यशस्विनी अपने परिवार के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँची थी। वह अपने साथ उपहार स्वरूप एक छोटा सा ‘खिलौना बुलडोजर’ लेकर आई थी। मुख्यमंत्री ने बड़ी आत्मीयता से बच्ची का स्वागत किया, उसे चॉकलेट दी और खिलौना हाथ में लिया। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई… सीएम योगी ने वह बुलडोजर बच्ची को वापस लौटाते हुए बड़े प्रेम से कहा, “इसे अपने पास रखो, इससे खेलो और खूब मन लगाकर पढ़ाई करो।”
मुख्यमंत्री का यह संदेश साफ था। कानून व्यवस्था के प्रतीक बुलडोजर को खिलौने के तौर पर स्वीकारना अलग बात है, लेकिन एक बच्चे के लिए उसका भविष्य उसकी ‘शिक्षा’ में है। योगी जी ने उस बच्ची को कट्टरपंथी बनाने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक बनने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। यह Video देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोगों ने मुख्यमंत्री के इस सहज और अभिभावक वाले रूप की जमकर तारीफ की।
आरफा खानुम का जहरीला एजेंडा: खिलौने में खोज लिया ‘हिंदू आतंकवाद’
लेकिन जहाँ दुनिया को इस Video में मासूमियत और सकारात्मकता दिखी, वहीं आरफा खानुम और उनके वामपंथी सहयोगियों को इसमें ‘खतरा’ नजर आया। आरफा ने इस Video को शेयर करते हुए लिखा, “इस तरह वे हिंदू बच्चों की पूरी पीढ़ी को कट्टरपंथी बना रहे हैं। वह भी मासूम छोटी लड़कियों को। हृदयविदारक और अत्यंत खतरनाक।”
This is how they are radicalizing a whole generation of Hindu kids. And that too innocent little girls. Heartbreaking and extremely dangerous. https://t.co/RUJwtcShLE
आरफा के इस जहर के बाद उनके वामपंथी समर्थकों ने भी सुर में सुर मिलाया। यासिर कलाम ने लिखा, “वे बच्चों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं और उन्हें भविष्य के लिए हिंदू आतंकवादी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, यह इस सरकार की नीति है। अद्भुत।”
वहीं, जावेद भट ने उपहास करते हुए लिखा, “सनातनियों का बहुत कम उम्र से ब्रेनवॉश हो रहा है।”
एक अन्य हैंडलर फरहान खान ने तो माता-पिता पर ही निशाना साधते हुए कहा, “इन बच्चों को क्या हो गया है, माता-पिता को शर्म आनी चाहिए है।”
इन टिप्पणियों से साफ है कि एक मासूम खिलौना और मुख्यमंत्री की ‘पढ़ने’ की सलाह इन लोगों के लिए ‘आतंकवाद’ है, जबकि असली कट्टरपंथ में इनको ‘शांति’ दिखती है।
जब कट्टरपंथ की असली तस्वीर पर प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा आँख मूँद लेती हैं
ऑर्गेनाइजर की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है कि कैसे कट्टरपंथ की असली जड़ों को छोटी उम्र से ही सीजा जाता है। रिपोर्ट बताती है कि कैसे छोटे बच्चों को ‘हम बनाम वे’ और ‘काफिर बनाम मोमिन’ के चश्मे से दुनिया देखना सिखाया जाता है। उन्हें आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा से दूर रखकर मदरसों में ऐसी जिहादी सोच वाली शिक्षा दी जाती है जो उनके दिमाग को केवल मजहबी दायरे तक सीमित कर देती है।
यही कारण है कि जब वे बड़े होते हैं, तो वे एक अच्छे नागरिक बनने बजाय एक कट्टरपंथी सोच के साथ विकसित होते हैं। इनका पहला प्रेम देश नहीं बल्कि मजहब होता है। यह वही मानसिकता है जो स्पेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी ‘पत्थरबाजी’ और अस्थिरता का कारण बन रही है।
आरफ़ा खानुम की ‘चुनिंदा’ चुप्पी और मासूमियत की आड़ में कट्टरपंथ का जहर
सोशल मीडिया पर वायरल हुए ये दो Video सोचने को मजबूर कर देते हैं कि इस उम्र में इस तरह की सोच और बोली कैसे पैदा हो सकती है। और तथाकथित लिबरल पत्रकारों, विशेषकर आरफा खानुम शेरवानी के दोहरे मापदंडों की पोल खोलते हैं। जब एक मुस्लिम बच्चा हाथ में खिलौने की जगह नफरत की भाषा और सीने में चक्कू घोंपने की बात करता है, जब वह अपने देश के प्रधानमंत्री से ज्यादा दूसरे मुल्क के मजहबी नेता खामेनेई के लिए आँसू बहाता है, तो यह स्पष्ट है कि इन मुस्लिम बच्चों के दिमाग में बचपन से ही ‘राष्ट्रवाद’ के बजाय ‘मजहबी कट्टरपंथ’ का जहर घोल दिया जाता है।
आरफा खानुम, जो अक्सर मानवाधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़तीं, इन Video पर अपनी आँखें मूंद लेती हैं। उनकी ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता को तब लकवा मार जाता है जब मुस्लिम बच्चे सरेआम योगी आदित्यनाथ को धमकी देते हैं और राम मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने या पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। यह चुप्पी न केवल खतरनाक है, बल्कि उन ताकतों को शह देती है जो भारत की अगली पीढ़ी को मुख्यधारा से काटकर नफरत की भट्टी में झोंक रही हैं। सवाल यह है कि क्या आरफ़ा खानुम में इतनी हिम्मत है कि वे इस ‘कट्टरपंथी परवरिश’ पर सवाल उठा सकें।
“योगी बाबा जाएंगे, तब हम बताएँगे, हमारा पहले वाला दौर लौट आएगा, राम मंदिर गिराकर मस्जिद बनाएंगे”
बरेली का शर्मनाक सच: गाँधी प्रतिमा के साथ अश्लीलता और आरफा का ‘चुनिंदा मौन’
आरफा खानुम के कट्टरपंथ वाले दावे की पोल तब खुलती है जब हम बरेली (उत्तर प्रदेश) में ईद के दौरान हुई घटना को देखते हैं। ईद के मौके पर कुछ मुस्लिम युवकों और बच्चों का एक Video Viral हुआ, जिसमें वे महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ अत्यंत घृणित और अश्लील हरकतें करते हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे ये बच्चे प्रतिमा के मुँह में उँगलियाँ डाल रहे थे, उन्हें थप्पड़ मार रहे थे और और गुप्तांगों से जुड़ी अश्लील हरकतें कर रहे हैं।
Brigadier Rudra Pratap Singh was visionary but still not visionary enough to imagine this
यह घटना उस नफरत का जीवंत प्रमाण है जो बच्चों के दिमाग में महापुरुषों और देश के प्रतीकों के खिलाफ भरी जा रही है। लेखक रतन शारदा ने इस पर सटीक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह गाँधी जी को कट्टरपंथियों की ‘श्रद्धांजलि’ है, जिन्होंने उन्हें भारत में बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था। लेकिन आरफा खानुम इस Video पर चुप क्यों हैं? क्या महात्मा गाँधी की प्रतिमा का अपमान ‘कट्टरपंथ’ की श्रेणी में नहीं आता? क्या अश्लीलता कर रहे उन मुस्लिम बच्चों के अम्मी-अब्बू को शर्मिंदा करने के लिए आरफा ने कोई ट्वीट किया था?
आरफा खानुम, अपनी कुंठा का इलाज कराइए
आरफा खानुम की पत्रकारिता नहीं, बल्कि यह ‘एजेंडा’ की दुकान है। सीएम योगी ने उस बच्ची को पढ़ाई की प्रेरणा दी, जो राष्ट्र निर्माण का काम है। लेकिन आरफा को इसमें ‘आतंक’ नजर आया क्योंकि खानुम की अपनी सोच घटिया, कुंठित और नफरत से भरी हुई है। जब मुस्लिम बच्चे देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ जहर उगलते हैं, भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने की बात करते हैं, गाँधी जी की मूर्ति का अपमान करते हैं या हाथ में पत्थर उठाते हैं, तब खानुम का ‘हृदयविदारक’ दर्द कहीं गायब हो जाता है, तब मुँह से ना तो एक शब्द निकलता है और ना ही पोस्ट की जाती है।
आरफा जैसे लोग ही समाज के असली दुश्मन हैं, जो एक तरफ तो हिंदू प्रतीकों को गाली देते हैं और दूसरी तरफ अपनी कौम की बुराइयों को ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ के नाम पर छुपाते हैं। योगी जी ने बच्ची को ‘किताब’ पकड़ने को कहा, जो खानुम को चुभ गया। असल में आरफा खानुम जैसे वामपंथियों को डर है कि अगर बच्चे पढ़-लिख गए तो इन जैसों की नफरत की दुकान बंद हो जाएगी। आपकी ये जमात है, जो एक मासूम खिलौने पर तो चिल्लाती है, लेकिन असली जिहाद और अश्लीलता पर मुँह में दही जमाकर बैठ जाती है।
हिंदुओं के त्योहारों को निशाना बनाना इस्लामी कट्टरपंथियों का नया ‘जुनून’ बनता जा रहा है। कुछ दिनों पहले जब ईद हुई तो देश में कई जगहों से तस्वीरें सामने आईं जहाँ हिंदू मुस्लिमों पर फूल बरसा रहे थे। उन्होंने उम्मीद थी कि शायद बदले में फूल ही मिलेंगे लेकिन कुछ दिनों बाद आई राम नवमी पर हिंदुओं को फूलों के बदले पत्थर मिले।
कट्टरपंथियों ने श्रद्धालुओं पर पत्थर फेंके, जिसके बाद कही पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा तो कही इस्लामी भीड़ को काबू में करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। इन हमलों में पुलिसकर्मियों समेत कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। अभी कुछ दिन पहले होली के अवसर पर भी इन कट्टरपंथियों ने जगह-जगह बवाल किया था।
झारखंड में रामनवमी पर इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं पर किया पथराव, गढ़वा में रामभक्तों को महावीर पताका लगाने से रोका
झारखंड के गढ़वा जिले के रमकंडा प्रखंड मुख्यालय में रामनवमी से ठीक पहले शुरू हुआ विवाद गुरुवार (26 मार्च 2026) को हिंसक झड़प में बदल गया। धार्मिक जुलूस के मार्ग, डीजे और महावीरी झंडा लगाने को लेकर मुस्लिम पक्ष ने जमकर बवाल किया। पत्थरबाजी के दौरान स्थिति को काबू में करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।
बुधवार (25 मार्च 2026) की देर शाम रमकंडा के बिचला टोला स्थित कौआखोह शिव चबूतरा के पास महावीर पताका स्थापित करने जा रहे रामभक्तों को त्रिवेणी चौक के पास मुस्लिमों ने रोक लिया। इसके बाद डीजे बजाने को लेकर भी भीड़ ने विवाद शुरू कर दिया। बहस करते-करते भीड़ नारेबाजी भी करने लगी और माहौल हिंसक हो गया।
देखते ही देखते विवाद बढ़ गया और दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। गुरुवार (26 मार्च 2026) को हालात और बिगड़ गए जब बड़ी संख्या इस्लामी भीड़ सड़कों पर उतर आई और पत्थरबाजी करने लगी, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और बाजार की दुकानें बंद होने लगीं।
हालात तब और गंभीर हो गए जब इस्लामी भीड़ की ओर से पुलिस बल पर भी पथराव की घटनाएँ सामने आईं। पुलिस की मौजूदगी में बाद में रामभक्तों ने कौआखोह शिव चबूतरा के पास महावीर पताका स्थापित किया। स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस ने पहले समझाने की कोशिश की, लेकिन हालात बिगड़ने पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए।
रामनवमी को लेकर थाने में आयोजित शांति समिति की बैठक के बावजूद मुस्लिमों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की। बैठक में दोनों पक्षों की ओर से शांतिपूर्ण तरीके से रामनवमी ओर रमजान मनाने पर सहमती बनी थी। हालाँकि रामनवमी पर मुस्लिम पक्ष ने न सिर्फ बवाल किया बल्कि पुलिस पर भी पत्थर फेंके।
मुंबई के मालवणी में रामनवमी पर भगवा पताका देख बिदकी खातून, ‘रामभक्त’ पर किया हमला
मुंबई के मालवणी (मलाड) इलाके में रामनवमी की तैयारियों के दौरान सांप्रदायिक तनाव की खबर सामने आई। रामभक्त जब इलाके में भगवा झंडे और पताके लगा रहे थे, तभी कट्टरपंथियों के एक गुट ने उनका विरोध किया और हमला करने की कोशिश की। हमले का Video भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
During the preparations on the eve of Ram Navami in Malad-Malvani, Mumbai. a Muslim woman attacked on rambhakt with the intention of creating communal tension. Soon after, a Radicals who were already gathered there attempted to attack other devotees.
वीडियो में देख सकते हैं कि एक मुस्लिम महिला दूसरी तरफ से साजिश के तहत आती है और रामभक्त पर हमला कर माहौल बिगाड़ती है। इसके बाद भारी भीड़ जमा हो जाती है। घटना उस वक्त शुरू हुई जब हिंदू संगठन के कार्यकर्ता रामनवमी के स्वागत के लिए सड़क पर झंडे लगा रहे थे।
जैसे ही वे एक मस्जिद के सामने वाली सड़क पर पहुँचे, वहाँ मौजूद इस्लामी पक्ष के लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। देखते ही देखते दोनों गुट आमने-सामने आ गए और अफरा-तफरी मच गई। यह एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा लग रहा था क्योंकि विरोध के तुरंत बाद बड़ी संख्या में लोग वहाँ इकट्ठा हो गए और भक्तों को धमकाना शुरू कर दिया।
महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में रामनवमी जुलूस के दौरान मस्जिद के पीछे से पत्थरबाजी
महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के श्रीरामपुर शहर में रामनवमी के अवसर पर निकाले जा रहे जुलूस के दौरान इस्लामी भीड़ की ओर से पथराव किया गया। मस्जिद के पास से गुजरने के दौरान हुई घटना में तीन लोग घायल हो गए, जिनमें से एक की हालत गंभीर है। पुलिस ने मस्जिद के मौलाना सहित 10 से 12 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जाँच शुरू की है।
घटना गुरुवार (26 मार्च 2026) की शाम करीब चार बजे की है, जब रामनवमी का जुलूस पूरे उत्साह के साथ श्रीरामपुर के सय्यद बाबा चौक से गुजर रहा था। जुलूस में शामिल लोग भजन-कीर्तन करते आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान जब जुलूस एक स्थानीय मस्जिद के सामने पहुँचा, तभी अचानक मस्जिद के पीछे की ओर से अज्ञात लोगों ने पत्थर फेंकने शुरू कर दिए।
And, it begins…
We are getting reports that stones were pelted at Ram Bhakts as the Ram Navami procession was crossing a mosque in Shrirampur, Ahilyanagar, Maharashtra.
इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें मस्जिद के पीछे से पत्थर आते साफ देखा जा सकता है। अचानक हुए इस पथराव से जुलूस में अफरा-तफरी मच गई और लोग इधर-उधर भागने लगे। इस दौरान तीन लोग पत्थरों की चपेट में आकर घायल हो गए। मामले में मस्जिद के मौलाना समेत 10 से 12 लोगों के खिलाफ श्रीरामपुर थाने में मामला दर्ज किया।
बंगाल में हिंदुओं पर हमला, मुर्शिदाबाद और पुरुलिया में रामनवमी शोभायात्रा पर उपद्रवियों ने फेंके पत्थर
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और पुरुलिया में रामनवमी के पावन पर्व पर हिंदुओं पर हमला हुआ। शुक्रवार (27 मार्च 2026) शाम रामनवमी शोभायात्राओं के दौरान उपद्रवियों ने जमकर पत्थरबाजी, तोड़फोड़ और आगजनी की, जिससे कई लोग घायल हो गए। हालात को काबू में करने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।
DIG अजीत सिंह यादव ने बताया कि कई दंगाइयों को हिरासत में लिया जा चुका है। मुर्शिदाबाद के जंगीपुर में शोभायात्रा जैसे ही मैकेंजी पार्क से निकलकर फुलतला मोड़ पहुँची, उपद्रवियों ने ईंट और पत्थरों से हमला बोल दिया। आरोप है कि यह हमला सुनियोजित था और शोभायात्रा के आगे बढ़ने पर दोबारा पत्थर फेंके गए।
পশ্চিমবঙ্গে পবিত্র রাম নবমীর দিনে সনাতনীদের পবিত্র গৈরিক ধ্বজ উত্তোলন কি অপরাধ? মুর্শিদাবাদের জঙ্গীপুরে ফুলতলা মোড়ে সনাতনীদের দ্বারা উত্তোলিত গৈরিক ধ্বজকে অবজ্ঞার সঙ্গে নামিয়ে এইভাবে ছুঁড়ে ফেলা পবিত্র গৈরিক ধ্বজের অপমান, সনাতন ধর্মের অপমান ও সনাতনীদের ভাবাবেগে সরাসরি আঘাত… pic.twitter.com/mYLVxynL8c
ठीक ऐसी ही हिंसक तस्वीरें पुरुलिया के पारा इलाके से भी सामने आईं, जहाँ शांतिपूर्वक निकल रही रैली को दंगाइयों ने निशाना बनाया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी के दावों के मुताबिक, उपद्रवियों ने पवित्र भगवा ध्वज को अपमानजनक तरीके से नीचे खींचकर फेंक दिया।
बीजेपी ने इस हिंसा के लिए ममता सरकार की तुष्टीकरण की राजनीति को जिम्मेदार ठहराया है। शुभेंदु अधिकारी ने पूछा कि क्या अपने ही राज्य में भगवा ध्वज फहराना अपराध है? फिलहाल, मुर्शिदाबाद और पुरुलिया में सुरक्षा एजेंसियाँ चप्पे-चप्पे पर नजर रख रही हैं ताकि कोई और अनहोनी न हो।
झारखंड के धनबाद में राम नवमी जुलूस के बीच पत्थरबाजी से 6 लोग घायल
झारखंड के धनबाद जिले के भिकराजपुर में शुक्रवार (27 मार्च 2026) की शाम रामनवमी के अवसर पर निकाली जा रही शोभायात्रा के दौरान अचानक तनाव की स्थिति पैदा हो गई। जुलूस अपने तय मार्ग से गुजर रहा था, तभी दो पक्षों के बीच किसी बात को लेकर कहासुनी शुरू हो गई। पुलिस के अनुसार, दूसरे समुदाय के कुछ लोगों ने पथराव शुरू कर दिया।
पत्थरबाजी के कारण मौके पर अफरा-तफरी मच गई और भगदड़ जैसी स्थिति बन गई। इस घटना में करीब छह लोग घायल हुए, जिन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार ने बताया कि यह विवाद दो समुदायों के किशोरों के बीच शुरू हुआ था, जो अचानक बढ़ गया।
हालात को देखते हुए बलियापुर के भिकराजपुर समेत आसपास के कई इलाकों में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है। इसके अलावा पुलिस ने 6 लोगों को हिरासत में भी लिया है। पुलिस ने कहा है कि घटना की जाँच जारी है, उपद्रव में शामिल असामाजिक तत्वों की पहचान कर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
राजस्थान में रामनवमी की शोभायात्रा पर पथराव
राजस्थान में रामनवमी के अवसर पर निकलने वाली शोभायात्रा पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हमला किया। जानकारी के मुताबिक, शोभायात्रा शांतिपूर्वक निकाली जा रही थी, इसी दौरान हिंदू श्रद्धालुओं पर पत्थरबाजी की गई। श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन को क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।
Rajsthan : Ramanavmi Shobhayatra was attacked by Muslims. They did heavy stone pelting on Hindu devotees. Govt has to deploy Heavy police force to ensure safety of Hindus.
इसके अलावा जोधपुर में शुक्रवार (27 मार्च 2026) की रात गणगौर पर्व के दौरान निकाली जा रही ‘भोलावनी’ शोभायात्रा पर भी अचानक पथराव किए जाने की घटना सामने आई। यहाँ मकराना मोहल्ला स्थित एक संकरी गली में परंपरागत रूप से शांतिपूर्ण ढंग से निकल रही शोभायात्रा अचानक हिंसा की चपेट में आ गई।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शोभायात्रा जब गली के पास पहुँची तो कुछ लोगों ने रास्ते से गुजर रहे ट्रैक्टर को रोकने की कोशिश की और देखते ही देखते पथराव शुरू कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उपद्रवियों ने न केवल शोभायात्रा को निशाना बनाया, बल्कि आसपास खड़े ऑटो-रिक्शा और मोटरसाइकिलों में भी तोड़फोड़ की, जिसमें कई लोग घायल हुए।
घटना की सूचना मिलते ही भारी संख्या में पुलिस बल मौके पर पहुँचा। इस दौरान कुछ संदिग्धों को हिरासत में भी लिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, CCTV फुटेज के आधार पर आरोपितों की पहचान कर आगे की कार्रवाई की जा रही है।
केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने एक्स पर लिखा, “जोधपुर ही नहीं देश के किसी भी शहर में संस्कृति और परम्परा से खिलवाड़ करना और उसे सांप्रदायिक रूप देकर सामाजिकता पर चोट करने की कुचेष्टा नहीं चलेगी, यह साफ है। जिसे भी यह लगता है कि वह ऐसा कर अपने षड्यंत्र में सफल होगा, उसे ऐसा सबक मिलना चाहिए कि जो इस तरह की मानसिकता वाले दूसरों के लिए भी उदाहरण बने। “
जोधपुर ही नहीं देश के किसी भी शहर में संस्कृति और परम्परा से खिलवाड़ करना और उसे सांप्रदायिक रूप देकर सामाजिकता पर चोट करने की कुचेष्टा नहीं चलेगी, यह साफ़ है।
जिसे भी यह लगता है कि वह ऐसा कर अपने षड्यंत्र में सफल होगा, उसे ऐसा सबक मिलना चाहिए कि जो इस तरह की मानसिकता वाले…
उन्होंने आगे लिखा, “हमें शांति के दुश्मनों के खिलाफ लोकतांत्रिक ‘शक्ति’ के प्रयोग से परहेज नहीं है। सज्जन शक्ति का संगठित संचय ही सुरक्षित भविष्य का एकमात्र मार्ग है।जानकारी मिलने के समय कल रात्रि से ही जिला और पुलिस प्रशासन से संपर्क में हूँ। निष्पक्ष जाँच कर दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।”
बिहार में राम नवमी के अवसर पर सांप्रदायिक तनाव
राम नवमी के दौरान बिहार के कुछ इलाकों से भी तनाव की खबरें सामने आई। इस पर राज्य के डीजीपी ने कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी देते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था खराब करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि CCTV फुटेज की मदद से उपद्रव करने वाले लोगों की पहचान की जा रही है और उन्हें जल्द पकड़ लिया जाएगा।
भारत अपने पारंपरिक उत्सवों और त्योहारों के लिए जाना जाता है, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी हमेशा इसी ताक में रहते हैं कि कब कोई त्योहार आए और बवाल करने में लग जाएँ। होली के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों से हिंसा और सांप्रदायिक तनाव की खबरें सामने आई। कहीं होली का त्योहार मना रहे हिंदुओं से मारपीट की गई तो कहीं मस्जिद की दीवारों पर रंग के छीटें पड़ जाने को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों ने बवाल किया। एक त्योहार बीता ही था तब तक इन कट्टरपंथियों ने रामनवमी पर भी हिंसा फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
पश्चिमी मीडिया अब आखिरकार उस सच्चाई को मानने लगा है, जिसे ऑपइंडिया काफी सालों से बता रहा है। यह पूरा मामला दुनिया भर में फैले उन एनजीओ (NGO), एक्टिविस्ट ग्रुप और मीडिया हाउस से जुड़ा है, जो असल में चीन की सरकार के लिए प्रचार (प्रोपेगेंडा) करने वाली मशीन की तरह काम कर रहे हैं। हाल ही में फॉक्स न्यूज (FOX NEWS) ने एक बड़ी पड़ताल की है, जिसमें नेविल रॉय सिंघम के चीन-समर्थक नेटवर्क का पर्दाफाश किया गया है।
अमेरिका के रहने वाले नेविल रॉय सिंघम एक बड़े बिजनेसमैन हैं, जिन्होंने 2017 में अपनी कंपनी लगभग 6,500 करोड़ रुपए ($785 मिलियन) में बेची थी और फिर चीन के शंघाई जाकर बस गए। अब यह साफ हो रहा है कि वे कैसे पैसों के दम पर खबरों का एक जाल बुनकर दुनिया भर में चीन की छवि चमकाने का खेल चला रहे हैं।
फॉक्स न्यूज की इस पाँच पार्ट वाली सीरीज की तीन रिपोर्ट से पता चलता है कि नेविल रॉय सिंघम का संगठन बड़ी चालाकी से खबरों का एक ऐसा जाल बुन रहा है, जहाँ मामूली विरोध-प्रदर्शनों को भी ‘बड़ा मुद्दा’ बनाकर पेश किया जाता है। सिंघम के पैसों से चलने वाला यह नेटवर्क इस तरह की खबरों को पूरी दुनिया में फैलाता है। इनका असली मकसद अमेरिका और भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में झगड़े और फूट पैदा करना है। साथ ही, ये चीन को एक ऐसे ‘नेक’ देश के रूप में दिखाते हैं जो दुनिया को अमेरिका के असर से बचा रहा है। क्यूबा में चल रहे वामपंथी आंदोलन में यह खेल साफ-साफ देखा जा सकता है।
इनके काम करने का तरीका बहुत सीधा है, ये किसी भी तरह दुनिया को यह यकीन दिलाना चाहते हैं कि चीन की ‘मार्क्सवादी-नक्सलवादी’ सोच ही सबसे बढ़िया और भली है। दूसरी तरफ, ये अमेरिका और उसकी व्यापारिक नीतियों को दुनिया की हर मुसीबत की जड़ और सबसे बड़ी बुराई के रूप में दिखाते हैं।
नेविल रॉय सिंघम का ‘चीन प्रेम’: प्रोपेगेंडा के दम पर दुश्मन देशों को बर्बाद करने वाली सैकड़ों संस्थाओं का खुलासा
मार्च 2026 की शुरुआत में, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और नेविल रॉय सिंघम के संगठन ‘हाउस ऑफ सिंघम’ के बीच संदिग्ध रिश्तों की सरकारी जाँच शुरू हो गई है। अमेरिका के अधिकारी अब इस बात की गहराई से छानबीन कर रहे हैं कि सिंघम को चीन से कितना पैसा मिल रहा है, मीडिया और राजनीति में उनकी कितनी पकड़ है और उनके इन कामों से अमेरिका के हितों को कितना नुकसान पहुँच रहा है।
चाहे अमेरिका में फिलिस्तीन के समर्थन में होने वाले प्रदर्शन हों, क्यूबा में वामपंथी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा हो या ईरान युद्ध के खिलाफ उठने वाली आवाजें, ऊपर से देखने में ये सब आम लोगों का गुस्सा लग सकते हैं, लेकिन असलियत कुछ और ही है। ये प्रदर्शन असल में एक बहुत बड़ी और सोची-समझी साजिश का हिस्सा हैं, जिन्हें मोटी फंडिंग और खास राजनीतिक मकसद के साथ चलाया जा रहा है। इन सबकी डोर नेविल सिंघम के उस नेटवर्क से जुड़ी है, जिसमें एनजीओ (NGO), मीडिया हाउस, बड़े-बड़े बुद्धिजीवी और मशहूर हस्तियाँ शामिल हैं।
फॉक्स न्यूज ने इस सच को सामने लाने के लिए हजारों टैक्स कागजात, संगठनों के रिकॉर्ड, पैसों के लेन-देन और सोशल मीडिया पोस्ट की जाँच की है। इस बड़ी पड़ताल के लिए आधुनिक एआई (AI) तकनीक और खुले सोर्स से मिली जानकारियों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे सिंघम के इस नेटवर्क की एक-एक परत खुल गई है।
फॉक्स न्यूज की एक बड़ी रिपोर्ट, जिसका नाम ‘तबाही मचाने वाला जोड़ा’ (Power Couple of Chaos) है, उसने नेविल रॉय सिंघम और उनकी पत्नी इवांस के काले कारनामों की पोल खोल दी है। जाँच में पता चला है कि 2017 से अब तक सिंघम ने चीन के समर्थन में माहौल बनाने के लिए सीधे तौर पर 2300 करोड़ रुपए फूँक दिए हैं। अगर 2025 तक के पूरे लेनदेन को देखें, तो यह आँकड़ा करीब 5000 करोड़ रुपए तक पहुँच जाता है। यह भारी-भरकम पैसा दुनिया भर की 1000 से ज्यादा संस्थाओं में बाँटा गया। इनमें से लगभग 200 संगठन तो ऐसे हैं जिनका काम ही सिर्फ चीन की तारीफ करना और अमेरिका व अन्य लोकतांत्रिक देशों की बुराई करना है।
रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघम और उनकी पत्नी इवांस ने पूरी दुनिया में करीब 2000 कट्टर वामपंथी संगठनों का एक ऐसा जाल बिछा दिया है, जो चीन, रूस, ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे तानाशाह देशों का पक्ष लेते हैं। एक्टिविस्टों के बीच ऐसे लोगों को ‘टैंकी’ (Tankies) कहा जाता है, यानी वो लोग जो अपनी ही लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ जाकर तानाशाही सरकारों का गुणगान करते हैं। इस समय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े कई बड़े नेता क्यूबा में बैठकर कम्युनिस्टों के लिए अभियान चला रहे हैं।
नेविल रॉय सिंघम पर आरोप है कि उन्होंने टैक्स बचाने और पैसा घुमाने के लिए फर्जी कंपनियों (शेल कंपनियों) का एक जाल बिछाया था। उन्होंने गोल्डमैन साच्स जैसी बड़ी संस्था से जुड़े एक खास फंड का इस्तेमाल किया ताकि करोड़ों रुपए बिना किसी रोक-टोक के इधर-उधर भेजे जा सकें। हालाँकि, मामला संदिग्ध लगने पर गोल्डमैन साच्स ने फरवरी 2024 में सिंघम के इस खाते को पूरी तरह बंद कर दिया।
चीन के समर्थन में काम करने वाले इस पूरे नेटवर्क की शुरुआत साल 2017 में हुई, जब नेविल सिंघम ने जोडी इवांस (Jodie Evans) से जमैका में शादी की। जोडी खुद एक एक्टिविस्ट ग्रुप की मालकिन हैं। इस शादी में दुनिया भर के 80 से ज्यादा बड़े वामपंथी नेता शामिल हुए थे, जिनमें विजय प्रसाद नाम के एक नक्सलवादी पत्रकार भी थे।
विजय प्रसाद ने बाद में सिंघम के इस नेटवर्क को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई और कई फर्जी कंपनियों के बोर्ड मेंबर बने। फॉक्स न्यूज की जाँच में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। सिंघम के ये ज्यादातर संगठन किसी बड़े दफ्तर के बजाय साधारण होटलों या कूरियर दुकानों (UPS Store) के पते पर रजिस्टर्ड हैं। ऐसा इसलिए किया गया ताकि पैसों के लेन-देन को छिपाया जा सके और किसी को कानों-कान खबर न हो कि ये पैसा कहाँ से आ रहा है और कहाँ जा रहा है।
जाँच में सामने आया है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका की 11 संस्थाएँ (NGOs) मुख्य केंद्र के रूप में काम कर रही हैं। इनका काम बहुत व्यवस्थित है। ये पैसा बाँटते हैं, विरोध-प्रदर्शनों की प्लानिंग करते हैं, खबरें और Video बनवाते हैं और लोगों को एक खास राजनीतिक विचारधारा की ट्रेनिंग देते हैं। इन्होंने ‘लिबरेशन सेंटर’ (मुक्ति केंद्र) भी खोले हैं, जो बिल्कुल पुराने चीनी नेता माओ जे़दोंग की ‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति जैसे हैं।
इस रणनीति का मतलब है कि अपने ‘खास लोगों’ को समाज के हर हिस्से, ‘जैसे मीडिया, मजदूर संगठनों और स्कूलों’ में इस तरह घुसा दो कि वे ऊपर से तो स्वतंत्र लगें, लेकिन अंदर ही अंदर अपने ही देश की सरकार और उसकी साख को दीमक की तरह खोखला करते रहें।
अगर पैसों की बात करें, तो नेविल रॉय सिंघम ने बड़ी ही चालाकी से पैसा घुमाया है। उन्होंने गोल्डमैन साच्स के एक फंड और दो फर्जी (शेल) कंपनियों का इस्तेमाल करके करीब 2,300 करोड़ रुपए छह अलग-अलग एनजीओ में डाले। यह भारी-भरकम रकम ही उस मशीनरी को चलाने के लिए पेट्रोल का काम कर रही है, जिसका इकलौता मकसद चीन की तारीफ करना और विरोधी देशों को कमजोर करना है।
जाँच से पता चला है कि नेविल रॉय सिंघम ने कई संस्थाओं (NGOs) को मालामाल कर दिया है। उन्होंने ‘पीपुल्स फोरम’ को करीब 185 करोड़ रुपए, ‘पीपुल्स सपोर्ट फाउंडेशन’ को लगभग 1400 करोड़ रुपए और ‘जस्टिस एंड एजुकेशन फंड’ को 570 करोड़ रुपए दिए। इस खेल में ‘ब्रेकथ्रू मीडिया’ और ‘कोडपिंक’ जैसे संगठन भी शामिल हैं (कोडपिंक की मालिक सिंघम की पत्नी जोडी इवांस ही हैं)। साथ ही, विजय प्रसाद नाम के पत्रकार की कंपनी ‘ट्राईकॉन्टिनेंटल’ को भी इस नेटवर्क से मोटी फंडिंग मिली है।
इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब सितंबर 2025 में अमेरिकी संसद की एक बड़ी कमेटी ने ‘द पीपुल्स फोरम’ के कागजात खंगालने शुरू किए। इस संस्था पर गंभीर आरोप हैं कि इसका सीधा रिश्ता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि यह संगठन एक तरफ तो अमेरिका में ‘NGO’ बनकर टैक्स बचाने का फायदा उठा रहा था, और दूसरी तरफ चोरी-छिपे चीन के करीबी नेविल सिंघम से करोड़ों रुपए ले रहा था।
अमेरिकी सांसद जेसन स्मिथ की रिपोर्ट ने ‘द पीपुल्स फोरम’ नाम के संगठन की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। इस संगठन ने न केवल इजरायल में हमास के आतंकी हमले को सही ठहराया, बल्कि अमेरिका के कॉलेजों में दंगे और हिंसा भड़काने का काम भी किया। खुद इस संस्था ने माना है कि उसे नेविल रॉय सिंघम से 165 करोड़ रुपए से ज्यादा की फंडिंग मिली है। असल में यह संगठन पढ़ाई के नाम पर ऐसे कोर्स चलाता है, जिनका मकसद सिर्फ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रचार करना है।
जाँच में सामने आया कि 2017 से 2022 के बीच सिंघम और उनकी पत्नी ने बड़ी चालाकी से फर्जी (शेल) कंपनियों के जरिए इस संगठन को पैसा पहुँचाया। यह अब पूरी तरह साफ हो चुका है कि ‘द पीपुल्स फोरम’ कोई स्वतंत्र संस्था नहीं, बल्कि सिंघम के उस नेटवर्क का हिस्सा है जो सिर्फ चीन के इशारे पर काम करता है।
नेविल रॉय सिंघम का रिकॉर्ड काफी पुराना और संदिग्ध है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1974 में ही FBI ने उनके खिलाफ जाँच शुरू कर दी थी क्योंकि वे उन गुटों से जुड़े थे जो अमेरिका के दुश्मन माने जाते थे। इतना ही नहीं, सिंघम ने सालों तक विवादित चीनी कंपनी हुवावे (Huawei) के लिए भी काम किया। बता दें कि हुवावे के रिश्ते चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से इतने गहरे हैं कि कंपनी ने खुद माना था कि उनके ऑफिस के अंदर चीन की सरकारी ‘पार्टी कमेटी’ बैठती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नेविल सिंघम का यह पूरा तामझाम असल में ‘खबरों की हेराफेरी’ (Information Laundering) करने का एक अड्डा है। इसका एक ही मकसद है ‘पूरी दुनिया में चीन की तारीफ करवाना और अमेरिका के भीतर झगड़े पैदा करना’।
हैरानी की बात यह है कि जो विरोध-प्रदर्शन देखने में आम जनता का गुस्सा लगते हैं, (जैसे ईरान युद्ध का विरोध या क्यूबा की सरकार का समर्थन) वे असल में पूरी तरह से स्क्रिप्टेड होते हैं। सिंघम के मीडिया चैनल (जैसे ‘ब्रेकथ्रू न्यूज’) इन प्रदर्शनों की प्रोफेशनल तरीके से शूटिंग करते हैं, उन्हें शानदार वीडियो और कमेंट्री के साथ तैयार करते हैं और फिर Social Media पर फैला देते हैं। यह सब इसलिए किया जाता है ताकि दुनिया को लगे कि ये कोई बहुत बड़ा ‘जन-आंदोलन’ है, जबकि हकीकत में यह एक सोची-समझी साजिश होती है।
इसी साल फरवरी में विशेषज्ञ एडम सोहन ने अमेरिकी संसद में इस जाल की पोल खोलते हुए कहा, “यह कोई आम जनता का विरोध नहीं है। यह एक ऐसा सेट सिस्टम है जिसे जब चाहे, जहाँ चाहे, अमेरिका के काम-काज को रोकने (जाम करने) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।”
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल के लिए पैसा अमेरिका के ही टैक्स कानूनों (NGO के जरिए मिलने वाली छूट) से आ रहा है, लेकिन इसका रिमोट कंट्रोल एक दुश्मन देश (चीन) के हाथ में है। सोहन ने चेतावनी दी कि यह हमारे देश की सुरक्षा में एक ऐसा छेद है जिसे हमें तुरंत बंद करना होगा।
हाउस कमेटी की वेबसाइट से लिया गया प्रासंगिक अंश
रॉय सिंघम और PSL से जुड़ा जिहादी ढेर: 2025 में अमेरिकी इजराइली दूतावास पर किया था हमला
रॉय सिंघम का नेटवर्क सिर्फ भाषण देने या विरोध-प्रदर्शन करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अब इसके तार हत्या और आतंक से भी जुड़ चुके हैं। मई 2025 में वॉशिंगटन डीसी (अमेरिका) में ‘एलियास रोड्रिगेज’ नाम के एक कट्टरपंथी ने ‘फ्री फिलिस्तीन’ के नारे लगाते हुए इजराइली दूतावास के दो कर्मचारियों का कत्ल कर दिया था। जब जाँच हुई, तो पता चला कि यह हत्यारा ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ (PSL) नाम के एक कम्युनिस्ट ग्रुप से जुड़ा था। चौंकाने वाली बात यह है कि इस ग्रुप को चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने वाले नेविल रॉय सिंघम और उनकी पत्नी मोटी फंडिंग देते हैं।
इतना ही नहीं, यह कातिल ‘ANSWER कोअलिशन’ जैसे कट्टरपंथी समूहों का भी हिस्सा रहा है और उनके लिए चंदा इकट्ठा करता था। रिपोर्टों से साफ हुआ है कि ये सभी संगठन ‘पीपुल्स फोरम’ नाम की संस्था से जुड़े हैं, जिसका सीधा कनेक्शन रॉय सिंघम के जरिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से है। इससे यह साफ हो जाता है कि चीन से आने वाला यह पैसा केवल राजनीति के लिए नहीं, बल्कि दुनिया भर में हिंसा और दहशत फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
चीन से पैसा पाने वाला संगठन ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ (PSL) लगातार भारत की मोदी सरकार को निशाना बना रहा है। इस ग्रुप ने भारत को बदनाम करने के लिए गुजरात दंगों से लेकर किसान कानूनों और बेरोजगारी जैसे छह बड़े मुद्दों को अपना हथियार बना रखा है। इस संगठन की पोल तब खुली जब इसने ‘न्यूज़क्लिक’ (NewsClick) का बचाव करना शुरू किया। जब भारत सरकार ने चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने के आरोप में न्यूजक्लिक पर एक्शन लिया, तो PSL ने इसे सरकार की तानाशाही बताकर शोर मचाना शुरू कर दिया।
हैरानी की बात तो यह है कि जब मशहूर अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स‘ ने न्यूजक्लिक और उसके एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ के चीन से जुड़े रिश्तों का पर्दाफाश किया, तो PSL ने उस अखबार के दफ्तर के बाहर ही विरोध प्रदर्शन कर दिया। इस संगठन का कहना है कि मोदी सरकार जानबूझकर वामपंथी विचारकों को ‘देशद्रोही’ बताकर उनकी आवाज दबा रही है। साफ़ है कि यह पूरा ग्रुप चीन के इशारे पर भारत की छवि खराब करने और चीनी एजेंटों को बचाने की एक बड़ी मशीन की तरह काम कर रहा है।
ब्रेकथ्रू न्यूज: सिंघम के पैसे से चलने वाली चीन की ‘प्रोपेगेंडा मशीन’
2019 में शुरू हुआ ‘ब्रेकथ्रू न्यूज‘ (BreakThrough News) कहने को तो एक न्यूज चैनल है, लेकिन असल में यह चीन के इशारे पर काम करता है। रिकॉर्ड बताते हैं कि नेविल रॉय सिंघम ने इस चैनल को ‘समाज सेवा’ के नाम पर करीब 9 करोड़ रुपए का मोटा चंदा दिया। यह चैनल एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है जिसका काम ही दुनिया भर में चीन की तारीफ करना और उसके विरोधियों को बदनाम करना है। इसकी हर खबर, चाहे वो इजरायल के खिलाफ हो या क्यूबा के समर्थन में, हमेशा चीन की पसंद के हिसाब से ही बनाई जाती है।
फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट ‘शंघाई सेबोटेज’ ने खुलासा किया है कि यह नेटवर्क अमेरिका को नीचा दिखाने के लिए पूरी प्लानिंग और स्क्रिप्ट के साथ काम करता है। मिसाल के तौर पर, क्यूबा में हुए एक प्रदर्शन को इस चैनल ने बड़े क्रांतिकारी अंदाज में दिखाया और इसे अमेरिकी सरकार के खिलाफ एक बड़ी बगावत बता दिया। इसके बाद, दुनिया भर के कम्युनिस्ट मीडिया संगठनों ने इस वीडियो को फैलाया ताकि लोगों के मन में कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति सहानुभूति पैदा की जा सके और चीन का नैरेटिव सेट हो सके।
"Trump thinks he can do anything, but the people are stronger."
The first Nuestra América flotilla vessel arrived in Cuba Tuesday with 14 tons of food and medicine and 73 solar panels. @ldejesusreyes reports from Havana. pic.twitter.com/7WvuEaYCJE
आसान शब्दों में कहें तो, ये विरोध प्रदर्शन असल में एक सोची-समझी स्क्रिप्ट (नाटक) की तरह होते हैं। होता यह है कि रॉय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े लोग पहले एक प्रदर्शन आयोजित करते हैं, फिर उनके ही नेटवर्क के मीडिया चैनल उसे ‘सच्चा आंदोलन’ बताकर कवर करते हैं। बाद में इसे दुनिया भर में फैलाया जाता है ताकि लोगों की सहानुभूति जीती जा सके और सरकारों पर दबाव बनाया जा सके। इसका असली मकसद सिर्फ एक है, कम्युनिस्ट विचारधारा को फैलाना और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के लिए समर्थन जुटाना।
फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट ने इस बड़े जाल का खुलासा किया है। सिंघम का यह नेटवर्क अमेरिका में इजरायल विरोधी प्रदर्शन कराने से लेकर भारत में प्रोपेगेंडा फैलाने और दक्षिण अफ्रीका की लेबर यूनियनों को अपने कब्जे में लेने तक फैला हुआ है। यह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय खेल है, जो कई मुखौटा कंपनियों और एक ही पते के पीछे छिपा है। इनका एकमात्र मिशन दुनिया भर में मार्क्सवाद फैलाना और चीन को अमेरिका के मुकाबले दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनाना है।
हैरानी की बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम का परिवार विदेशी राजनीति को अपने हिसाब से चलाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा है। रॉय सिंघम की बहन शांति सिंघम और उनके पति डेनियल गुडविन ने न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव में एक खास राजनीतिक गुट को मोटा चंदा दिया। दिलचस्प बात यह है कि डेनियल पहले रॉय सिंघम की ही कंपनी ‘थॉटवर्क्स’ में बड़े पद पर काम कर चुके हैं। इससे साफ होता है कि यह परिवार सिर्फ बिजनेस ही नहीं, बल्कि विदेशों में राजनीतिक जोड़-तोड़ में भी लगा हुआ है।
चीन के कट्टर समर्थक रॉय सिंघम खुलेआम चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तारीफ करते हैं। वे दुनिया में चल रहे मौजूदा नियमों को ‘झूठ’ बताते हैं और कहते हैं कि पूरी दुनिया को माओ ज़ेदोंग के दिखाए रास्ते पर चलना चाहिए। वे अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों के सख्त खिलाफ हैं और चाहते हैं कि दुनिया चीन के हिसाब से चले।
सिंघम ने अपने एक भाषण में पश्चिमी देशों पर हमला करते हुए कहा कि ये देश लोकतंत्र की रक्षा का सिर्फ दिखावा करते हैं। उन्होंने दावा किया कि असल में सोवियत संघ और चीन के लोगों ने ही अपने बलिदान से मानवता को बचाया है। सिंघम का मानना है कि केवल समाजवादी सोच ही दुनिया की बड़ी ताकतों को हरा सकती है। कुल मिलाकर, वे चीन की ताकत और उसकी सोच को पूरी दुनिया पर थोपना चाहते हैं।
नेविल रॉय सिंघम का असली मकसद अब सबके सामने है। उन्होंने साफ कहा है कि अगर दुनिया को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी के हिसाब से चलाना है, तो हमें इतिहास की उन पुरानी बातों को बदलना होगा जिन्हें दुनिया अब तक सच मानती आई है। सिंघम चाहते हैं कि दुनिया वैसी ही दिखे और सोचे, जैसा चीन चाहता है।
हैरानी की बात यह है कि इस काम के लिए सिंघम ने अमेरिका के ही पैसे का इस्तेमाल किया है। ‘फॉक्स न्यूज’ की रिपोर्ट ने एक ऐसी ‘सीक्रेट पाइपलाइन’ का पर्दाफाश किया है, जिसके जरिए अमेरिका की तीन बड़ी संस्थाओं (NGOs) ने 2021 से अब तक करीब 75 करोड़ रुपए ($91 लाख) चीन भेजे हैं। यह पैसा सात बार में ‘शंघाई माकु कल्चरल कम्युनिकेशंस’ नाम की एक कंपनी को दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह कंपनी खुद सिंघम की ही एक आलीशान बिल्डिंग के पते पर चल रही है और इसका इकलौता काम इंटरनेट पर चीन के पक्ष में झूठा प्रचार (प्रोपेगेंडा) फैलाना है।
(सोर्स: फॉक्स न्यूज)
विजय प्रसाद, न्यूज़क्लिक और सिंघम: भारत में चीनी प्रोपेगेंडा का ‘तिगड़ा’
फॉक्स न्यूज की जाँच ने खुलासा किया है कि नेविल रॉय सिंघम ने भारत के खिलाफ एक बड़ा जाल बिछा रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघम की संस्था ने दिल्ली के न्यूज़ पोर्टल ‘न्यूजक्लिक’ (NewsClick) को लगभग 87 करोड़ रुपए (10.5 मिलियन डॉलर) का भारी-भरकम चंदा दिया। इसी वजह से भारत सरकार ने सिंघम के खिलाफ समन जारी किया है। उन पर भारत के चुनावों में दखल देने, पैसों की हेराफेरी (मनी लॉन्ड्रिंग) और अशांति फैलाने की साजिश रचने जैसे गंभीर आरोप हैं।
इस पूरे खेल में विजय प्रसाद एक मुख्य खिलाड़ी के रूप में सामने आए हैं। वे ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ (TriContinental) नाम की संस्था से जुड़े हैं, जो सिंघम के नेटवर्क का एक खास हिस्सा है। न्यूजक्लिक और विजय प्रसाद की भारत विरोधी हरकतों का खुलासा पहले भी होता रहा है।
सिंघम खुद ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ के सलाहकार बोर्ड में शामिल हैं और इसे चलाने के लिए मोटी फंडिंग देते हैं। आरोप है कि सिंघम अमेरिका की संस्थाओं का इस्तेमाल करके चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए पैसा पहुँचा रहे हैं। इतना ही नहीं, सिंघम ‘लेफ्ट वर्ड बुक्स’ और ‘ग्लोबट्रॉटर’ जैसी संस्थाओं के जरिए भी इस पूरे नैरेटिव को कंट्रोल करते हैं ताकि दुनिया भर में चीन की बात रखी जा सके।
विजय प्रसाद का मामला सिर्फ विचारधारा का नहीं है, बल्कि इनके तार सीधे भारत की राजनीति से जुड़े हैं। विजय प्रसाद माकपा (CPI-M) की बड़ी नेता वृंदा करात के भतीजे हैं। वृंदा करात के पति और दिग्गज नेता प्रकाश करात के कुछ ईमेल भी सामने आए थे, जिनसे पता चला कि उनके नेविल रॉय सिंघम के साथ बहुत करीबी रिश्ते हैं और वे न्यूजक्लिक के चीनी फंडिंग मामले में शामिल थे।
न्यूजक्लिक का नाम पहली बार 2021 में तब उछला जब ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने इसकी जाँच शुरू की। इस पोर्टल पर आरोप है कि इसने गलत तरीके से विदेश से करीब 38 करोड़ रुपए मँगाए। जब 2023 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने रॉय सिंघम और चीन के इस पूरे खेल का पर्दाफाश किया, तो विजय प्रसाद ने इसे सरकार की साजिश बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की।
विजय प्रसाद ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ नाम के एक अंतरराष्ट्रीय ग्रुप के बड़े सदस्य भी हैं। यह ग्रुप दुनिया भर के वामपंथी कार्यकर्ताओं को एक साथ लाता है। यह संगठन लगातार मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए ऐसे लेख छापता है जिनसे भारत की छवि खराब हो। इस मंच पर हर्ष मंदर जैसे लोगों के भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी लेख भरे पड़े हैं। इस ग्रुप में जयती घोष और ब्रिटेन के नेता जेरेमी कॉर्बिन जैसे लोग भी शामिल हैं, जो अक्सर भारत के खिलाफ बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं।
‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ का जाल सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार विवादित ‘टाइडस फाउंडेशन’ (Tides Foundation) से भी जुड़े हैं। यह फाउंडेशन हमास का समर्थन करने वाले संगठनों को पैसा देता है। चौंकाने वाली बात यह है कि इसी टाइडस फाउंडेशन का सीधा कनेक्शन नेविल रॉय सिंघम और न्यूजक्लिक (NewsClick) से भी पाया गया है।
टाइडस फाउंडेशन भारत और हिंदू-विरोधी गुटों को पैसा पहुँचाने के लिए बदनाम है। इसने ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) जैसे संगठनों को बड़ी मदद दी है, जिनके तार कट्टरपंथियों और खालिस्तानियों से जुड़े हैं। इस संस्था को बनाने के पीछे भी उन्हीं लोगों का हाथ था जो अमेरिका में बैठकर भारत के खिलाफ माहौल बनाते हैं।
इतना ही नहीं, टाइडस फाउंडेशन ने ‘अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट’ (AMAN) को भी पैसा दिया है। यह वही ट्रस्ट है जिसका नाम न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग घोटाले में सामने आया था। आरोप है कि चीन ने न्यूजक्लिक के जरिए भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचाने के लिए करोड़ों रुपए भेजे थे।
चीन के एजेंट रॉय सिंघम ने ‘पीपुल्स डिस्पैच’ जैसे कई विदेशी न्यूज पोर्टल्स में करोड़ों रुपए लगाए हैं। इन्हीं मंचों का इस्तेमाल करके विजय प्रसाद जैसे लोग लगातार भारत के खिलाफ लेख लिखते हैं और चीन के एजेंडे को बढ़ावा देते हैं।
‘पीपुल्स डिस्पैच’ नाम का पोर्टल खुद को जनता की आवाज कहता है, लेकिन असल में इसका इस्तेमाल खास एजेंडा चलाने के लिए होता है। उदाहरण के लिए, जनवरी 2020 में विजय प्रसाद ने इस पोर्टल पर जेएनयू (JNU) के प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया था और मोदी सरकार के खिलाफ जमकर निशाना साधा था। इससे साफ पता चलता है कि यह पोर्टल किस तरह की सोच को बढ़ावा देता है।
नेविल रॉय सिंघम ने अपनी बड़ी टीम में कुछ भारतीयों को भी जोड़ा था, जो ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ जैसे एनजीओ के लिए काम करते थे। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ये संस्थाएँ चीन के एजेंडे को फैलाने का काम कर रही थीं। सिंघम की इस टीम में प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद जैसे मुख्य नाम शामिल थे, जो भारत में बैठकर चीन के पक्ष में माहौल तैयार कर रहे थे।
इतना ही नहीं, विजय प्रसाद के रिश्ते पी साईनाथ से भी काफी करीबी रहे हैं। पी साईनाथ के पोर्टल ‘पारी’ (PARI) का नाम भी तब उछला जब सिंघम और चीन के प्रोपेगेंडा नेटवर्क का सच सबके सामने आया। जैसे ही यह विवाद बढ़ा, ‘पारी’ ने तुरंत अपने पोर्टल से सिंघम से जुड़ी सारी जानकारियाँ हटा दीं ताकि उनकी पोल न खुल जाए।
न्यूजक्लिक (NewsClick) का हिंदू-विरोधी रवैया तो पुराना है, लेकिन अब इसके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से रिश्तों की परतें खुल रही हैं। 2023 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया कि नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व में संस्थाओं और फर्जी कंपनियों का एक ऐसा जाल बिछाया गया है, जिसका सीधा कंट्रोल चीन के पास है। 2024 में दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में बताया कि इस पूरे खेल का ‘असली मालिक और पैसा देने वाला’ चीन ही है। आरोप है कि चीनी फंड का इस्तेमाल कश्मीर और किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ झूठ फैलाने के लिए किया गया। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है।
2021 में ही ‘ऑपइंडिया‘ ने न्यूजक्लिक के कनेक्शनों की जाँच की थी, जिसमें उन चेहरों का पर्दाफाश हुआ था जो लगातार भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। इसमें ‘अर्बन नक्सल’ से लेकर तीस्ता सीतलवाड़ और अभिसार शर्मा जैसे लोगों के नाम शामिल हैं। इससे साफ है कि न्यूजक्लिक एक न्यूज पोर्टल नहीं, बल्कि भारत विरोधी एजेंडा चलाने का एक अड्डा बन चुका है।
सीधी बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम का यह काम कोई ‘समाज सेवा’ नहीं, बल्कि चीन की एक सोची-समझी साजिश है। यह नेटवर्क एनजीओ और डिजिटल मीडिया का सहारा लेकर ‘स्वतंत्र न्यूज’ के नाम पर चीन की बातों को दुनिया में फैलाता है। जैसे अमेरिका अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है, वैसे ही चीन ने भारत और अमेरिका जैसे देशों के भीतर अपने ‘बौद्धिक मोहरे’ (Intellectual Assets) तैयार कर लिए हैं, जो अंदर ही अंदर लोकतंत्र को कमजोर करने में लगे हैं।
(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
पश्चिम एशिया में जारी तनाव, खासकर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने की खबरों ने वैश्विक तेल और गैस सप्लाई को लेकर आशंकाएँ बढ़ा दी हैं। भारत जैसे देश जो बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर हैं, स्वाभाविक रूप से सतर्क हो गए हैं।
इसी बीच देश के भीतर एक अलग ही बहस छिड़ गई कि क्या भारत में फिर से लॉकडाउन लग सकता है? क्योंकि ममता बनर्जी ने लॉकडाउन लगने की अफवाहों को फैलाना का काम जोरदार तरीके से किया। हालाँकि केंद्र सरकार ने उनकी इन हरकतो के सफल होने से पहले ही जनता तक संदेश पहुँचा दिया है कि लोग अफवाहों पर ध्यान न दें।
ममता बनर्जी का लॉकडाउन बयान: आशंका या सियासत?
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि केंद्र सरकार फ्यूल संकट के बहाने देश में लॉकडाउन लगा सकती है।
ममता बनर्जी ने गुरुवार (26 मार्च 2026) को पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में चुनाव प्रचार करते हुए कहा, “वे (केंद्र सरकार) लॉकडाउन लगा सकते हैं। लोग घरों में बंद रहेंगे। 2021 में लॉकडाउन के समय मैंने लड़ाई लड़ी थी, अब भी लड़ सकती हूँ।” उन्होंने LPG सिलेंडर की बुकिंग 25-35 दिन बाद मिलने की बात कही। उन्होंने कहा कि घरेलू सिलेंडर के दाम बढ़ गए। पेट्रोल की कीमत बढ़ गई। क्या केंद्र सरकार फिर लॉकडाउन की तैयारी कर रही है?
केंद्र सरकार के मंत्रियों ने खारिज किए अफवाह
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक्स पर लिखा, “लॉकडाउन की अफवाहें पूरी तरह झूठी हैं। सरकार के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं। हम ऊर्जा, सप्लाई चेन और जरूरी चीजों पर नजर रख रहे हैं। लोग शांत रहें, जिम्मेदार रहें।”
The global situation remains in flux, and we are closely monitoring developments across energy, supply chains, and essential commodities on a real-time basis.
Under the leadership of Hon’ble PM @narendramodi Ji, all necessary steps are being taken to ensure uninterrupted…
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा, “मैं लोगों को भरोसा दिलाना चाहती हूँ कि कोई लॉकडाउन नहीं होगा। कुछ नेता बेबुनियाद बातें कर रहे हैं। कोविड जैसा लॉकडाउन कभी नहीं होगा।”
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी अफवाहों को खारिज करते हुए कहा कि पीएम मोदी ने खुद पैनिक न करने को कहा है। जमाखोरी पर चेतावनी दी गई है। राज्य सरकारें होर्डिंग न करें। पूरी स्थिति केंद्र के नियंत्रण में है।
तो फिर डर क्यों फैला रही हैं ममता बनर्जी?
राजनीतिक फायदा उठाने के चक्कर में ममता डर फैला रही हैं। ममता बनर्जी जानती हैं कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ईंधन संकट का मुद्दा उनके लिए सोने का अंडा साबित हो रहा है। वे लोगों में डर पैदा करके कह रही हैं कि केंद्र सरकार लॉकडाउन लगा रही है, LPG 25 दिन बाद मिलेगा, खाना कैसे पकाएँगे, ट्रांसपोर्ट कैसे चलेगा।
लेकिन असल में केंद्र सरकार पहले से ही एक्शन ले रही है, जिसमें एक्साइज ड्यूटी कम की, एक्सपोर्ट पर ड्यूटी लगाई, सप्लाई चेन को मजबूत किया।
दरअसल, ममता का मकसद साफ है, वो है- आम जनता को भड़काना, मोदी सरकार को बदनाम करना और टीएमसी के वोट बैंक को मजबूत करना। वे जानती हैं कि डर का माहौल बन गया तो लोग सोचेंगे ‘मोदी सरकार फेल हो गई’।
दरअसल, ममता खुद के राज्य में LPG और पेट्रोल की सप्लाई सुधारने में कुछ नहीं कर रही। सिर्फ आरोप लगा रही हैं। चुनावी फायदे के लिए लोगों को अनावश्यक चिंता में डालना गलत है। आम आदमी पहले से परेशान है, उस पर ममता का ये डर और बढ़ा रहा है।
ममता बनर्जी ने पहले भी लोगों को भड़काया, वो हैबिचुएल ऑफेंडर
ममता बनर्जी का ये तरीका नया नहीं। वे हर मुद्दे को राजनीति बना लेती हैं। वो डर की राजनीति करती रही हैं शुरुआत से। कभी वामपंथ का डर दिखाकर, कभी कॉन्ग्रेस का डर दिखाकर, कभी बीजेपी का डर दिखाकर, तो कभी हिंदुओं का डर दिखाकर। देखें- कैसे लोगों को भड़काकर वोट बटोरती रही हैं ममता बनर्जी-
सीएए के नाम पर: जब नागरिकता संशोधन कानून आया तो ममता ने पूरे बंगाल में हंगामा मचा दिया। ममता बनर्जी ने कहा कि मुसलमानों के अधिकार छिन जाएँगे। उन्होंने पूरे बंगाल में शाहीन बाग स्टाइल में प्रदर्शन तक करवाए। लेकिन सच्चाई सामने आ गई कि सीएए किसी की नागरिकता नहीं छीनता, बल्कि पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देता है। इसके बावजूद ममता ने सिर्फ वोट बैंक बचाने के लिए भ्रम फैलाया और अब तक वो इस मुद्दे पर भ्रम ही फैला रही हैं।
एसआईआर के नाम पर: एसआईआर के दौरान जब कुछ जाँच एजेंसियाँ सक्रिय हुईं तो ममता ने इसे भी साजिश बताया। उन्होंने कहा कि आम मुसलमानों के वोट काटे जा रहे हैं। ममता ने इसे राजनीतिक हथियार बनाते हुए चुनाव आयोग के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया और दिल्ली तक प्रदर्शन कर डाले।
कोरोना के नाम पर: बता दें कि साल 2021 के चुनाव के समय आंशिक लॉकडाउन चल रहा था। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने दावा करते हुए कहा कि केंद्र ने कुछ नहीं किया, सिर्फ टीएमसी लड़ रही है। लेकिन असल में केंद्र ने वैक्सीन, ऑक्सीजन, फंड सब दिया। ममता ने इसका इस्तेमाल सिर्फ अपनी छवि चमकाने के लिए किया।
केंद्रीय योजनाओं के नाम पर: पीएम आवास योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत जैसी स्कीमों पर ममता हमेशा हमला करती हैं। कहती हैं केंद्र कुछ नहीं दे रहा। लेकिन हकीकत ये है कि बंगाल में लाखों लोग इन योजनाओं से फायदा ले रहे हैं। ममता सिर्फ क्रेडिट लेने के चक्कर में विरोध करती हैं।
इस तरह ममता हर बार डर और भ्रम फैलाकर वोट बटोरती हैं।
ममता की ये राजनीति आम आदमी को पहुँचा रही है नुकसान
आज ईंधन संकट है तो हर राज्य प्रभावित है। केरल, तमिलनाडु, असम के मुख्यमंत्री भी चिंतित हैं। लेकिन वे मीटिंग में समाधान ढूँढ रहे हैं। ममता अकेली हैं जो लॉकडाउन का डर दिखा रही हैं। उनका बयान सुनकर लोग पैनिक खरीदारी कर रहे हैं। LPG सिलेंडर की होर्डिंग बढ़ रही है। छोटे दुकानदार, ट्रांसपोर्ट वाले, गरीब परिवार सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं।
पश्चिम बंगाल के लोग जानते हैं कि ममता का रिकॉर्ड क्या है- संदेशखाली, टीएमसी के गुंडागर्दी, भर्ती घोटाले। अब ईंधन संकट को भी वोट में बदलने की कोशिश। लेकिन इस बार लोग समझ रहे हैं।
ममता का डर लोगों को नहीं, खुद को बचाने का है
ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार पर हमला कर रही हैं क्योंकि चुनाव आ रहे हैं। लेकिन असल में बंगाल की जनता महँगाई, बेरोजगारी, अपराध से परेशान है। ईंधन संकट राष्ट्रीय समस्या है। इसमें सबको साथ मिलकर लड़ना चाहिए। ममता अगर सच में चिंतित हैं तो राज्य में होर्डिंग रोकें, सप्लाई सुधारें, केंद्र के साथ मिलकर काम करें। लेकिन नहीं, वे तो बस डर फैलाकर वोट माँग रही हैं।
आम जनता के लिए सबसे जरूरी है कि वह अफवाहों से दूर रहे और केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करे। क्योंकि संकट के समय घबराहट नहीं, बल्कि समझदारी ही सबसे बड़ा हथियार होती है। वैसे भी, ममता बनर्जी की हरकतों को पूरा देश देख रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता भी देख रही है। डर की राजनीति अब पुरानी हो गई है। अब विकास और समाधान की राजनीति चाहिए। मोदी सरकार पहले की तरह इस संकट से भी देश को निकाल लेगी। ममता का डर सिर्फ चुनावी चाल है। लोग अब समझ चुके हैं।
दक्षिण गुजरात के शांत जनजातीय इलाकों में इन दिनों धर्म को लेकर एक बड़ी जंग छिड़ गई है। यह मामला कोई मामूली झगड़ा नहीं है, बल्कि उस ‘रक्षक’ पर सवाल उठ रहे हैं जिसे अपनी ही संस्कृति को खत्म करने का दोषी माना जा रहा है। तापी से BJP विधायक मोहन कोंकणी, जिन्हें जनजातीय समाज की आवाज उठाने के लिए चुना गया था, आज खुद धर्मांतरण (कन्वर्जन) के आरोपों में घिरे हैं। तापी और डांग जिलों में हजारों लोगों का गुपचुप तरीके से धर्मांतरण और विधायक के निजी जीवन में ईसाई रीति-रिवाजों का आना, पूरे गुजरात में चर्चा का विषय बन गया है।
ऑपइंडिया की जाँच और स्थानीय देव बिरसा सेना के खुलासे बताते हैं कि यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है। तापी जिले में पिछले कुछ सालों में 1500 से ज्यादा अवैध चर्च बना दिए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकारी कागजों में आज भी कोई ‘ईसाई’ नहीं बना है, फिर भी गाँव-गाँव पादरी घूम रहे हैं। यह दोहरा खेल इसलिए खेला जा रहा है ताकि धर्म बदलने के बाद भी जनजातीय स्टेटस और आरक्षण का फायदा मिलता रहे और धीरे-धीरे पूरे समाज की पहचान बदल दी जाए।
विधायक के ‘गृह प्रवेश’ में पादरियों का जमावड़ा
विवाद की सबसे बड़ी और हाल ही की वजह BJP विधायक मोहन कोंकणी का अपना ‘गृह प्रवेश’ कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम गाँधीनगर में विधायकों के लिए बने नए सरकारी आवास (MLA Quarters) के आवंटन के बाद आयोजित किया गया था। एक जनजातीय नेता को आवंटित सरकारी घर पर जहाँ पारंपरिक रीति-रिवाजों, मंत्रों की गूंज और शंख की आवाज होनी चाहिए थी, वहाँ ईसाई पादरियों की भीड़ जमा थी। पादरियों ने अपने धर्म के हिसाब से पूजा-पाठ कराया और अब विधायक इसे अपनी ‘निजी पसंद’ बताकर लोगों का मुँह बंद करने की कोशिश कर रहे हैं।
इस पर सामाजिक कार्यकर्ता काजल हिंदुस्तानी ने कड़ा सवाल उठाया और लिखा, “विधायक जी, जनता के प्रतिनिधि के लिए कुछ भी ‘निजी’ नहीं होता, जब आप जनजातीय समाज के लिए सुरक्षित सीट से चुनाव जीतकर आए हैं, तो आप पूरे समाज के जिम्मेदार हैं। गाँधीनगर के सरकारी क्वार्टर में पादरियों को बुलाकर यह कार्यक्रम करना दरअसल गाँव के अन्य जनजातीय लोगों को यह संदेश देने जैसा था कि ‘देखो, जब स्वयं विधायक अपनी परंपरा बदल सकते हैं, तो तुम क्यों नहीं?'”
गुजरात के आदिवासी समाज के विधायक “मोहन कोंकणी” अपने गृह प्रवेश पूजा में ईसाई पादरी को बुलाने पर स्पष्टीकरण दे रहे है की ये उनकी आस्था का विषय है, वे पादरी को भी बुला सकते है और वे ब्राह्मण को भी बुला सकते है, ये उनका निजी विषय है
BJP विधायक कोंकणी का एक Video भी खूब वायरल हो रहा है। इसमें वे किसी ईसाई सभा में बिल्कुल एक ‘पेशेवर पादरी’ की तरह ‘ईसा मसीह’ और ‘माता मरियम’ की तारीफें कर रहे हैं। वे मंच पर खड़े होकर बाइबल की बातें पढ़ रहे हैं और वहाँ मौजूद लोगों को उकसा रहे हैं कि ‘अगली बार अकेले मत आना, अपने साथ और लोगों को भी लेकर आना।’
देव बिरसा सेना के नेताओं का साफ कहना है कि बीजेपी विधायक जी सिर्फ कागजों पर जनजातीय बने हुए हैं, जबकि उनके काम और उनकी बातें पूरी तरह ईसाइयत वाली हैं। यह उस जनजातीय समाज के साथ सबसे बड़ा धोखा है, जिसने भगवान बिरसा मुंडा के आदर्शों को मानकर उन्हें अपना नेता चुना था।
घटना- व्यारा, जिला तापी (गुजरात)
गुजरात में खुलेआम हो रहा है वनवासियों का धर्मांतरण…!!
पिछले पाँच वर्षों में बहुत ही तेज़ी से दक्षिण गुजरात में बढ़ रहा है मिशनरीयो का धर्मांतरण का खेल
BJP विधायक मोहन कोंकणी की सफाई: ‘सबूत है तो कार्रवाई करो’
जब ऑपइंडिया ने इस पूरे विवाद पर BJP विधायक मोहन कोंकणी से सवाल किए, तो उन्होंने धर्मांतरण को बढ़ावा देने के आरोपों से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर वे ऐसा कुछ कर रहे हैं, तो इसके सबूत दिए जाने चाहिए और उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
जब BJP विधायक से पूछा गया कि उन्होंने ईसाई सभा में जाकर जनजातीय समाज के लोगों से यह क्यों कहा कि ‘आप भी आइए और अपने साथ दूसरों को भी लाइए,’ तो उन्होंने इसे राजनीति से जोड़ दिया। विधायक का कहना था कि एक जनता के प्रतिनिधि (नेता) होने के नाते उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में जाना पड़ता है और वहाँ अच्छी बातें कहनी पड़ती हैं।
जब उनसे अगला सवाल किया और पूछा कि तापी इलाके में जब कोई कागजी तौर पर ईसाई नहीं है, तो वहाँ देश भर से बड़े-बड़े पादरी सभा करने क्यों आते हैं? इसपर BJP विधायक ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि देश में हर कोई कहीं भी सभा करने के लिए आजाद है। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस ने इसकी इजाजत दी है, तो यह सवाल पुलिस से ही पूछना चाहिए।
विधायक ने यह भी दावा किया कि उनके पास इस विवाद को लेकर कोई लिखित शिकायत नहीं आई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वे अंदर ही अंदर ईसाई धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन विधायक बार-बार यही कहते रहे कि ‘अगर ऐसा है तो सबूत लाओ।’ यहाँ तक कि जब देव बिरसा सेना (जो जनजातीय हितों के लिए लड़ रही है) का जिक्र हुआ, तो विधायक ने साफ कह दिया कि वे ऐसी किसी संस्था को जानते ही नहीं हैं।
आस्था पर प्रहार: कुलदेवी के पहाड़ों पर चर्च का कब्जा और ‘नो-एंट्री’
धर्मांतरण की यह बीमारी अब जनजातीय समाज की आस्था के पुराने केंद्रों को खत्म कर रही है। सोनगढ़ का ‘गीधमाड़ी आया’ पहाड़, जो बरसों से जनजातीय समाज की कुलदेवी का पवित्र स्थान था, वहाँ अब हालात बदल चुके हैं। वहाँ से हिंदू धर्म के प्रतीकों और निशानों को हटाकर ईसाई मिशनरियों ने ‘मरियम माता’ का कब्जा जमा लिया है।
हैरानी की बात यह है कि आज वहाँ असली जनजातीय लोगों को अपनी ही कुलदेवी की पूजा करने से रोका जा रहा है। आरोप तो यह भी है कि BJP विधायक के अपने गाँव हरिपुरा के पास वाले पहाड़ पर भी एक अवैध चर्च खड़ा कर दिया गया है, जिसे प्रशासन की भी चुप्पी (मूक सहमति) हासिल है। सवाल यह उठता है कि जब रक्षक ही पादरियों के स्वागत में पलकें बिछाएगा, तो जनजातीय समाज की परंपराओं की रक्षा कौन करेगा?
आरक्षण और स्टेटस का ‘डबल गेम’: कागजों पर हिंदू, दिल से ईसाई
इस पूरे मामले का सबसे खतरनाक हिस्सा यह है कि धर्मांतरण पर कोई सख्त कानून न होने की वजह से पादरियों को खुली छूट मिल गई है। लोग ईसाई धर्म अपना रहे हैं, चर्च जा रहे हैं और पादरियों की बातें मान रहे हैं, लेकिन सरकारी कागजों में वे आज भी खुद को ‘हिंदू जनजातीय’ ही दिखाते हैं।
यह सब एक सोची-समझी चाल के तहत हो रहा है। ऐसा करने से न तो उनका सरकारी आरक्षण छिनता है और न ही उनकी राजनीतिक ताकत (Status) कम होती है। यही वजह है कि हिंदू संगठन अब पुरजोर माँग कर रहे हैं कि ऐसे ‘नकली जनजातीय’ लोगों को तुरंत लिस्ट से बाहर (डिलिस्ट) किया जाए। मशहूर कथावाचक मोरारी बापू ने भी हाल ही में अपनी कथा में इस बड़े खतरे की ओर इशारा किया था, लेकिन BJP विधायक कोंकणी ने उनके जैसे संत की बात को भी झुठलाने की हिम्मत दिखाई।
दक्षिण गुजरात में जनजातीय समाज पर धर्मांतरण का खतरा: मंदिर तोड़कर चर्च बनाने तक पहुँचा खेल
दक्षिण गुजरात के तापी और डांग जैसे जनजातीय इलाकों में गुपचुप तरीके से धर्म बदलवाने का खेल लंबे समय से चल रहा है। दिसंबर 2022 में तापी के जराली गाँव में एक हिंदू मंदिर को हटाकर वहाँ चर्च बना दिया गया। आज वहाँ के जनजातीय लोग अपनी ही जगह पर पूजा करने से डर रहे हैं क्योंकि उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। तापी में एक ही परिवार के 5 लोगों की गिरफ्तारी और सरकारी स्कूलों में गुरु पूर्णिमा पर बाइबल पढ़ाने जैसी घटनाओं ने साफ कर दिया है कि यहाँ जनजातीय संस्कृति को मिटाने की बड़ी साजिश चल रही है।
धर्मांतरण का यह जाल केवल तापी या डांग तक सीमित नहीं है, बल्कि नवसारी, वलसाड और सूरत तक फैल चुका है। नवसारी में हिंदू धर्म का अपमान करने वाले ईसाई शिक्षक दंपतियों की गिरफ्तारी हुई है, तो वलसाड के धरमपुर-कपराड़ा की पहाड़ियों पर अवैध रूप से बड़े-बड़े क्रॉस और ईसाई बस्तियाँ बसाई जा रही हैं। जनजातीय कार्यकर्ता रवि नायका का कहना है कि गाँवों में यह खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है, लेकिन मीडिया में इसकी चर्चा नहीं होती।
सूरत जैसे शहरों की हिंदू सोसायटियों में भी बिना वजह चर्च खड़े किए जा रहे हैं। हिंदू संगठनों ने चेतावनी दी है कि ये तो सिर्फ वो मामले हैं जो सामने आए हैं, असली संख्या इससे कहीं ज्यादा बड़ी है। अगर जल्द ही सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो जनजातीय समाज की सदियों पुरानी पहचान और संस्कृति पूरी तरह खत्म हो सकती है।
अस्तित्व की पुकार: जनजातीय समाज को सरकार से क्या उम्मीद है?
देव बिरसा सेना के नेता अरविंद वसावा ने ऑपइंडिया के जरिए सरकार से गुहार लगाई है कि दक्षिण गुजरात में चल रहे धर्मांतरण के इस खेल को तुरंत रोका जाए और जो अवैध चर्च या ढांचे खड़े किए गए हैं, उन्हें हटाया जाए। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि सरकार को हमारी संस्कृति बचाने के लिए आगे आना चाहिए और हमारी पीड़ा सुननी चाहिए।
अरविंद वसावा की चेतावनी डराने वाली है। उन्होंने कहा, “हमारी जनजातीय संस्कृति, हमारी परंपरा, भाषा और हमारा वजूद बचा रहे, इसके लिए सरकार और समाज को साथ देना होगा। आज हालात इतने बुरे हैं कि कई गाँवों में केवल 10 असली जनजातीय लोग बचे हैं, बाकी सब ने अपने पूर्वजों की परंपरा और अपनी कुलदेवी को छोड़ दिया है।”
उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि जनजातीय संस्कृति को खत्म करने के लिए विदेशी ताकतों के साथ अब हमारे अपने लोग भी मिल गए हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “सरकार से हमारी कोई बड़ी माँग नहीं है, हमें धन-दौलत नहीं चाहिए। हम बस इतना चाहते हैं कि हमारे पूर्वजों के रीति-रिवाज, हमारी विरासत और हमारी पहचान बची रहे। हम सरकार से खुली अपील करते हैं कि वह इस मुश्किल वक्त में हमारा साथ दे और हमारी जड़ों को कटने से बचाए।”
जनजातीय समाज के साथ बड़ा धोखा और विश्वासघात
BJP विधायक मोहन कोंकणी का यह कहना कि ‘मैं अपने घर किसे बुलाता हूँ, यह मेरा निजी मामला है’, पूरी तरह से गलत और जिम्मेदारी से भागने जैसा है। विधायक जी, आपने उस जनजातीय समाज का अपमान किया है जिसने आपको अपनी पहचान और संस्कृति बचाने के भरोसे पर चुना था। ब्राह्मणों को छोड़कर पादरियों से घर की पूजा करवाना यह साफ दिखाता है कि आपकी वफादारी भारत की मिट्टी और परंपराओं के प्रति नहीं है। बल्कि आप उन ताकतों के साथ खड़े हैं जो जनजातीय समाज का नामो-निशान मिटाना चाहती हैं।
यह सिर्फ एक छोटा सा कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है। जिस ईसाई धर्म के खिलाफ भगवान बिरसा मुंडा ने ‘उलगुलान’ (बड़ा विद्रोह) किया था, आज उसी को आप अपने घर में बढ़ावा दे रहे हैं। पुलिस-प्रशासन का चुप रहना और एक विधायक का पादरियों के एजेंट की तरह काम करना एक बहुत बड़े खतरे की घंटी है। अगर आज जनजातीय समाज ने इस ‘सफेदपोश धर्मांतरण’ के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, तो कल उनके पवित्र पहाड़, उनकी अनोखी संस्कृति और उनकी पहचान, सब कुछ पादरियों के कब्जे में होगा।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती भाषा में लिखी है। गुजराती की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
खुद को ‘ज्ञान का भंडार’ बताने वाला विकिपीडिया, हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर: द रिवेंज’ को लेकर एक खास तरह की इमेज बनाने में जुटा है। वह बार-बार इन फिल्मों को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) साबित करने की कोशिश कर रहा है। रणवीर सिंह की इन फिल्मों के चर्चा वाले पेज (टॉक पेज) को देखने से पता चलता है कि कुछ संपादक जानबूझकर लेख में राजनीति से जुड़े शब्द डाल रहे हैं।
वहीं, कुछ दूसरे संपादकों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि जानकारी को अपनी पसंद से चुन-चुनकर (चेरी-पिकिंग) एकतरफा कहानी थोपी जा रही है। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि फिल्म को बुरा बताने के लिए यूट्यूबर ध्रुव राठी की बातों को एक ‘पक्के सबूत’ की तरह इस्तेमाल किया गया है। इससे विकिपीडिया के काम करने के तरीके पर बड़े सवाल खड़े होते हैं। विवाद इतना बढ़ गया है कि फिलहाल इन पेजों पर कोई बदलाव न हो सके, इसलिए इन्हें ‘लॉक’ कर दिया गया है।
विकिपीडिया पर ‘प्रोपेगेंडा’ नैरेटिव की साजिश
विकिपीडिया पर फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) बताने का फैसला सबकी मर्जी से नहीं लिया गया था। असल में, यह एक बहुत बड़ा विवाद था जिसका कई संपादकों ने जमकर विरोध किया। फिल्म के चर्चा वाले पेज (टॉक पेज) को देखकर साफ पता चलता है कि कैसे एक तरफा कहानी थोपने की कोशिश को रोकने की पूरी कोशिश की गई थी। [आर्काइव लिंक 1] [आर्काइव लिंक 2]
एक संपादक ‘KabirDH’ ने तो इस पक्षपात की पोल ही खोल दी। उन्होंने साफ कहा कि भले ही फिल्म का कुछ हिस्सा किसी पार्टी के पक्ष में लग सकता है, लेकिन इसे गलत साबित करने के लिए जो ‘सबूत’ (Sources) दिए जा रहे हैं, वे नफरत और पक्षपात से भरे हैं। उन्होंने इन सबूतों पर सवाल उठाते हुए कहा, “यह साफ दिख रहा है कि ये बातें एक ऐसी वेबसाइट या व्यक्ति (जैसे कलकत्ता टेलीग्राफ) की ओर से आ रही हैं जो एक खास पार्टी का समर्थक है और दूसरी पार्टी का विरोधी, और वह बस अपने निजी विचारों को फैला रहा है।”
सोर्स: विकिपीडिया
यह मामला सिर्फ भेदभाव तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यहाँ विकिपीडिया के अपने नियमों की भी धज्जियाँ उड़ाई गईं। संपादक ‘KabirDH’ ने साफ चेतावनी देते हुए कहा, “सिर्फ एक ही खबर या सोर्स के भरोसे पूरी फिल्म की कैटेगरी बदल देना और शुरुआत में ही उसे ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ लिख देना विकिपीडिया के ही कायदे-कानूनों (जैसे WP:NPOV, WP:DUE और WP:OR) के खिलाफ है।” उनका कहना था कि बिना ठोस आधार के इतना बड़ा दावा करना नियमों का पूरी तरह उल्लंघन है।
सोर्स: विकिपीडिया
एक और संपादक, UnpetitproleX ने भी इस बात को पूरी तरह गलत बताया कि भरोसेमंद खबरों ने फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) मान लिया है। उन्होंने साफ किया, “सच्चाई तो यह है कि ‘द इंडिपेंडेंट’ (The Independent) जैसे बड़े अखबार ने अपनी रिपोर्ट में कहीं भी इस फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ नहीं कहा है।”
उन्होंने दोनों पक्षों की बात रखने पर जोर देते हुए कहा, “हमारे पास ऐसी ढेर सारी खबरें और सबूत मौजूद हैं जो इस फिल्म को प्रोपेगेंडा नहीं मानते… हम उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते। विकिपीडिया के नियमों (WP:DUE weight) के मुताबिक, किसी भी नतीजे पर पहुँचने के लिए हमें सभी तरह की भरोसेमंद खबरों को ध्यान में रखना होगा, न कि सिर्फ अपनी पसंद की।”
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विवाद की गहराई समझाते हुए UnpetitproleX ने आगे कहा, “मुद्दा यह है कि फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ कहने पर पहले से ही झगड़ा चल रहा है। ऐसे में विकिपीडिया का अपनी तरफ से इसे एक ‘सच’ (Fact) की तरह लिखना, इस विवाद में किसी एक पक्ष का साथ देने जैसा होगा। जबकि विकिपीडिया का नियम (निष्पक्षता नीति) हमें साफ तौर पर कहता है कि ‘हमें विवाद के बारे में बताना चाहिए, न कि खुद उस विवाद का हिस्सा बनना चाहिए।'”
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फिल्म पर बार-बार ‘प्रोपेगेंडा’ का ठप्पा लगाने की कोशिशों से दूसरे संपादक काफी नाराज थे। संपादक KabirDH ने तंज कसते हुए कहा, “बिना किसी आपसी सहमति के फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ बताया जा रहा है। अब यह सब देखकर बहुत निराशा होती है।”
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संपादकों के बीच कोई एक राय नहीं बनी है। उन्होंने आगे कहा, “जब सब एक बात पर सहमत नहीं हैं, तो लेख की पहली ही लाइन में ‘प्रोपेगेंडा’ शब्द जोड़ देना विकिपीडिया के नियमों और पुरानी परंपराओं का सीधा उल्लंघन है।”
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खबरों और सबूतों के सही होने पर भी बड़े सवाल उठाए गए। संपादक ARandomName123 ने साफ तौर पर कहा, “‘ग्रैंड पिनेकल ट्रिब्यून’ की खबरें AI (कंप्यूटर प्रोग्राम) द्वारा लिखी गई हैं। विकिपीडिया के नियमों के मुताबिक, ऐसी खबरों को भरोसेमंद सबूत नहीं माना जा सकता।”
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कुल मिलाकर, इस पूरी बहस से यह साफ है कि फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) कहना कोई पक्का सच नहीं था, बल्कि एक विवादित दावा था। कई संपादकों ने इस बात का जमकर विरोध किया। उन्होंने साफ कहा कि यह भेदभाव है, खबरों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और विकिपीडिया के निष्पक्ष होने के नियमों को तोड़ा जा रहा है।
धुरंधर केस: विवादों के केंद्र में कौटिल्य3
बिल्कुल यही खेल फिल्म के पहले भाग में भी खेला गया था। फिल्म ‘धुरंधर’ के पुराने चर्चा वाले पेजों (Talk Pages) से साफ है कि इसे ‘प्रोपेगेंडा’ बताने की साजिश बहुत पहले ही शुरू कर दी गई थी। इस पूरी कहानी को गढ़ने और हवा देने में विवादित संपादक ‘कौटिल्य3’ का सबसे बड़ा हाथ था। [Archive Link 1] [Archive Link 2]
फिल्म के पहले भाग पर चर्चा के दौरान, कौटिल्य3 ने सिर्फ आलोचकों की बातों का ही सहारा नहीं लिया, बल्कि फिल्म के मतलब को अपनी निजी सोच के हिसाब से पेश किया। उन्होंने एक कड़वी टिप्पणी करते हुए लिखा कि यह फिल्म सीधे तौर पर मोदी सरकार की आतंकवाद-विरोधी नीतियों का प्रचार (प्रोपेगेंडा) करती है।
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उन्होंने इसे किसी और की राय बताकर पेश नहीं किया, बल्कि फिल्म को देखने के अपने निजी नजरिए और चुनिंदा स्रोतों के आधार पर खुद एक नतीजा निकाल लिया। अपनी बात को और विस्तार से समझाते हुए, उन्होंने ‘प्रोपेगेंडा’ शब्द के इस्तेमाल को सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया, “प्रोपेगेंडा का मतलब है… ‘ऐसी जानकारी, जो विशेष रूप से पक्षपाती या भ्रामक हो और जिसका इस्तेमाल किसी खास मकसद को बढ़ावा देने के लिए किया जाए…’… और इस मामले में, हमारे पास [सोर्स] मौजूद हैं।”
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एक अन्य टिप्पणी में, उन्होंने अपने इरादे और भी साफ कर दिए। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ दावा किया, “मेरा टेक्स्ट… यह कहता है कि यह फिल्म मोदी सरकार की नीतियों का ‘प्रचार’ (प्रोपेगेंडा) करती है। और यह एक सच्चाई है कि यह ऐसा करती भी है।”
इस तरह के बयान साफ तौर पर दिखाते हैं कि कैसे केवल आलोचना को रिपोर्ट करने के बजाय, एक खास विचारधारा वाली व्याख्या को ‘तथ्य’ (Fact) बनाकर पेश करने की कोशिश की गई। इस रवैये को कई अन्य संपादकों ने तुरंत चुनौती भी दी।
बाकी योगदानकर्ताओं ने इस नैरेटिव की बड़ी खामियों को उजागर किया। एक संपादक ने टाइमलाइन (समय-सीमा) पर ही सीधा सवाल उठाते हुए पूछा, “यह फिल्म मोदी सरकार का प्रचार कैसे कर सकती है, जबकि 2008-09 में तो वह सत्ता में थे ही नहीं?”
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एक अन्य संपादक ने स्रोतों के चयन में असंतुलन और नैरेटिव गढ़ने के तरीके पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया, “विशेष रूप से 3-4 चुनिंदा स्रोतों का ही हवाला दिया जा रहा है… आपने बिना किसी चर्चा के सचमुच एक पूरा निबंध लिख डाला है, जैसे कि आप जानबूझकर इस पेज को नकारात्मक रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हों।”
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विवाद केवल बयानों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि ‘तथ्यात्मक सटीकता और राजनीतिक संदेश’ (Factual accuracy and political messaging) नाम से एक पूरा सेक्शन बनाने पर भी बार-बार आपत्तियाँ जताई गईं। कई संपादकों का मानना था कि यह सेक्शन जानबूझकर कुछ गिने-चुने आलोचनात्मक नजरियों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए बनाया गया था। एक संपादक ने तो स्पष्ट माँग की, “‘प्रोपेगेंडा’ शब्द को हटाओ और ‘तथ्यात्मक सटीकता और राजनीतिक संदेश’ वाले इस निबंधनुमा सब-हेडर को भी खत्म करो।”
यह विरोध केवल कंटेंट तक सीमित नहीं था, बल्कि संपादक के व्यवहार पर भी सवाल उठे। कौटिल्य3 पर आरोप लगा कि वे अन्य संपादकों के सुधारों को बार-बार हटा रहे थे (Reverting edits) और विरोध के बावजूद अपना ही नैरेटिव थोप रहे थे। एक संपादक ने तीखी टिप्पणी की, “उन्होंने बिना किसी चर्चा के अकेले ही सब कुछ लिख डाला और पेज पर किसी दूसरे को कुछ भी नहीं करने दे रहे हैं।”
एक अन्य संपादक ने उन पर अपनी पसंद की जानकारी चुनकर (Cherry-picking) एक खास नजरिया थोपने का आरोप लगाया और कहा कि वे ‘चुनिंदा सोर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और अनुचित तरीके से तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं।’
इन तमाम आपत्तियों के बावजूद, कौटिल्य3 ने विकिपीडिया की नीतियों ‘विशेष रूप से विश्वसनीय स्रोतों और तटस्थता (Neutrality) से जुड़े नियमों’ का हवाला देते हुए लगातार अपने रवैये का बचाव किया। एक जवाब में उन्होंने कहा, “विकिपीडिया पर चर्चाएँ व्यक्तिगत विचारों के आधार पर नहीं, बल्कि WP:V (सत्यापन योग्यता) और WP:NPOV (तटस्थ दृष्टिकोण) के आधार पर चलती हैं।”
हालाँकि, अन्य संपादकों ने तर्क दिया कि इसी ढाँचे (Framework) का इस्तेमाल ‘चुनिंदा’ तरीके से किया जा रहा था, ताकि कुछ खास विचारों को हावी होने दिया जाए और बाकी को ‘अविश्वसनीय’ या ‘अप्रासंगिक’ बताकर खारिज कर दिया जाए।
इस चर्चा से यह भी उजागर हुआ कि कैसे अप्रत्यक्ष स्रोतों के जरिए विवादित रायों को ऊपर उठाया जा रहा था। एक बार फिर ध्रुव राठी की आलोचना का संदर्भ सामने आया, जिस पर कई संपादकों ने सवाल उठाया कि उनके विचारों को इतनी अहमियत क्यों दी जा रही है। एक संपादक ने सीधे तौर पर पूछा, “ध्रुव राठी की राजनीतिक बयानबाजी एक स्पष्ट सोर्स कैसे हो सकती है?”
सोर्स: विकिपीडिया
एक अन्य संपादक ने तंज कसते हुए कहा, “आपने फिल्म ‘धुरंधर’ पर ध्रुव राठी की राय को बतौर सबूत पेश किया है…वाह!”
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दिलचस्प बात यह है कि जहाँ अन्य संपादक ध्रुव राठी के विचारों पर सवाल उठा रहे थे, वहीं कौटिल्य3 ने उन्हें एक ‘उल्लेखनीय सोर्स’ (Notable Source) करार दिया।
सोर्स: विकिपीडिया
फिर भी, जैसा कि इसके सीक्वल (दूसरे भाग) की चर्चा में भी देखा गया, एक बार जब इन व्यक्तिगत रायों को मीडिया आउटलेट्स द्वारा रिपोर्ट कर दिया गया, तो उन्हें विकिपीडिया के ‘सोर्सिंग’ नियमों के तहत वैध बताकर उनका बचाव किया गया।
फिल्म के पहले भाग के ‘टॉक पेज’ से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि ‘धुरंधर’ को ‘प्रोपेगेंडा’ के रूप में पेश करने की कोशिश कोई आपसी सहमति का नतीजा नहीं थी। इसके बजाय, यह एक सोची-समझी संपादकीय जिद, तथ्यों की चुनिंदा व्याख्या और कुछ गिने-चुने सोर्स पर बार-बार निर्भरता का परिणाम था।
वही तर्क, वही विरोध और विवाद का वही पुराना पैटर्न बाद में फिल्म के सीक्वल (दूसरे भाग) की चर्चाओं में भी फिर से दिखाई दिया। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि एक खास दिशा में नैरेटिव गढ़ने की कोशिशें लगातार जारी थीं।
गौरतलब है कि उदय रेड्डी, जो ब्रिटेन (UK) स्थित विकिपीडिया संपादक कौटिल्य3 है, उनपर 2024 में मणिपुर पुलिस द्वारा मामला दर्ज किया गया था। उन पर मणिपुर में समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और ‘मैतेई’ समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप है।
ऑपइंडिया का खुलासा: विकिपीडिया का पक्षपात और ‘धुरंधर’ कनेक्शन
विकिपीडिया के पक्षपात पर ऑपइंडिया (OpIndia) की रिपोर्ट (डोजियर) ने पहले ही यह साफ कर दिया था कि यह तथाकथित ‘विश्वकोश’ केवल जानकारी दर्ज नहीं कर रहा, बल्कि संपादकों के एक नेटवर्क, चुनिंदा सोर्स और ‘पॉलिसी’ की आड़ में जानबूझकर नैरेटिव गढ़ रहा है। डोजियर में बताया गया है कि कैसे संपादकों का एक छोटा सा समूह अक्सर पेजों पर कब्जा कर लेता है, केवल अपने पसंदीदा ‘स्वीकार्य’ प्रकाशनों के भरोसे रहता है, और विकिपीडिया के आंतरिक नियमों का इस्तेमाल अपनी खास विचारधारा थोपने के लिए करता है।
फिल्म ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर: द रिवेंज’ से जुड़े घटनाक्रम ठीक उसी पैटर्न में फिट बैठते हैं जिसका जिक्र उस डोजियर में किया गया था। जैसा कि ‘टॉक पेज’ की चर्चाओं से साफ है, फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ बताने की जिद किसी व्यापक आपसी सहमति से नहीं उपजी थी। इसके बजाय, यह कुछ खास संपादकों द्वारा गिने-चुने आलोचनात्मक विचारों को एक ‘तय नैरेटिव’ बनाने की बार-बार की गई कोशिशों का नतीजा था।
अन्य संपादकों द्वारा जताया गया विरोध, जिन्होंने यह साफ कहा था, “कुछ चुनिंदा लेखों को चुनकर उन्हें सामान्य बयान बना देना बेहद संदिग्ध (Fishy) लगता है” और “गिने-चुने अखबारों की 3-4 राय पूरी फिल्म का आधार नहीं बन सकतीं”, सीधे तौर पर ऑपइंडिया (OpIndia) के निष्कर्षों में जताई गई चिंताओं की पुष्टि करता है।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट (डोजियर) में खास तौर पर बताया गया था कि विकिपीडिया कैसे सिर्फ गिने-चुने ‘भरोसेमंद सूत्रों’ (Reliable Sources) के सहारे चलता है, जिससे एकतरफा बातों को जरूरत से ज्यादा बढ़ावा मिलता है। फिल्म ‘धुरंधर’ के मामले में भी यही खेल दिखा। यहाँ मुट्ठी भर अखबारों और ध्रुव राठी जैसे लोगों की नकारात्मक बातों को बार-बार लेख में डालने का दबाव बनाया गया, जबकि फिल्म की तारीफ करने वालों और दूसरे नजरिए रखने वालों की बातों को या तो अनसुना कर दिया गया या पूरी तरह हटा दिया गया।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट से एक और बड़ी बात सामने आई थी। वह यह कि विकिपीडिया पर कुछ ‘रसूखदार’ संपादक ही अपनी मर्जी चलाते हैं। फिल्म ‘धुरंधर’ के मामले में भी संपादक कौटिल्य3 पर बिल्कुल यही आरोप लगे। एक दूसरे संपादक ने तो यहाँ तक कह दिया कि ‘इन्होंने बिना किसी से पूछे अकेले ही सब कुछ लिख डाला और दूसरे किसी को पेज पर कुछ करने ही नहीं दे रहे।’ एक और व्यक्ति ने उन पर आरोप लगाया कि वे ‘सिर्फ अपनी पसंद की खबरें चुन रहे हैं और गलत तरीके से अपनी बात थोप रहे हैं।’
यह ऑपइंडिया के उस दावे को सच साबित करता है कि विकिपीडिया कहने को तो सबके लिए खुला है, लेकिन असलियत में यहाँ नियमों की आड़ लेकर कुछ मुट्ठी भर संपादक ही राज करते हैं। ये लोग आम लेखकों के मुकाबले पूरी कहानी (नैरेटिव) को अपने कब्जे में रखने में कहीं ज्यादा माहिर होते हैं।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट ने यह भी साफ किया था कि कैसे घुमा-फिराकर बाहरी और विवादित बातों को विकिपीडिया के लेखों में डाल दिया जाता है। ध्रुव राठी की बातों को आधार बनाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। विकिपीडिया के ‘टॉक पेज’ पर दूसरे संपादकों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए पूछा था, “ध्रुव राठी की राजनीतिक बयानबाजी को सही जानकारी (Source) कैसे माना जा सकता है?” और “किसी यूट्यूबर की राय पर भला कैसे भरोसा किया जा सकता है?” इसके बावजूद, यह दलील दी गई कि चूंकि कुछ मीडिया घरानों ने उन बातों को छापा है, इसलिए उन्हें विकिपीडिया पर रखा जा सकता है।
साफ है कि फिल्म ‘धुरंधर’ के साथ जो हुआ, वह कोई इकलौता मामला नहीं है। यह उसी पुरानी समस्या को दोहराता है जिसका खुलासा ऑपइंडिया पहले ही कर चुका है। इससे पता चलता है कि विकिपीडिया का काम करने का तरीका पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है, बल्कि नियमों का बहाना बनाकर इसका इस्तेमाल किसी खास एजेंडे या सोच को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है।
ज्ञान का भंडार या नैरेटिव गढ़ने का औजार?
अगर हम फिल्म ‘धुरंधर’ के विवाद और ऑपइंडिया की रिपोर्ट को साथ मिलाकर देखें, तो विकिपीडिया की साख पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। जिसे दुनिया ‘सबकी जानकारी वाला’ एनसाइक्लोपीडिया मानती है, वह असल में एक ऐसी जगह बनता जा रहा है जहाँ जानकारियों को काट-छाँटकर एक खास दिशा में मोड़ा जाता है।
फिल्म ‘धुरंधर’ को ‘प्रोपेगेंडा’ बताने की जो बार-बार कोशिश हुई, भले ही दूसरे संपादक इसके खिलाफ थे और ठोस सबूत भी नहीं थे, उससे साफ है कि कैसे नियमों का फायदा उठाकर अपनी बात थोपी जा सकती है। जब कोई संपादक यह दावा करता है कि ‘यह फिल्म मोदी सरकार की नीतियों का प्रचार करती है’ और इसे ‘एक सच’ बताता है, तो वह निष्पक्ष जानकारी देने के बजाय अपनी निजी राय को सच बनाकर पेश करने लगता है।
इसके अलावा, जो लोग इन बातों का विरोध करते हैं, उन्हें विकिपीडिया के नियमों के जाल में फँसाकर चुप करा दिया जाता है। उनकी सही बातों को भी ‘निजी राय’ या ‘बिना सबूत की बात’ कहकर खारिज कर दिया जाता है, भले ही वे तथ्यों की कमी उजागर कर रहे हों। इसका नतीजा यह होता है कि ‘निष्पक्षता’ अपने आप नहीं आती, बल्कि वे लोग इसे अपनी मर्जी से तय करते हैं जो विकिपीडिया के सिस्टम को चलाना जानते हैं।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट ने पहले ही आगाह किया था कि विकिपीडिया का सिर्फ गिने-चुने अखबारों या वेबसाइटों को ही ‘भरोसेमंद’ मानना, असल में एक खास सोच को थोपने का तरीका है। फिल्म ‘धुरंधर’ के मामले में यही खेल खुलकर दिखा। एक बार जब कोई बात इस खास दायरे (जैसे चुनिंदा लेख या रिव्यू) में आ जाती है, तो उसे विकिपीडिया के पेज पर एक ‘बड़ी सच्चाई’ के रूप में डाल दिया जाता है, फिर चाहे उस दायरे के बाहर उस बात पर कितना भी विवाद क्यों न हो।
यह पूरा मामला लोगों की सोच को प्रभावित करने में विकिपीडिया की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े करता है। जब लाखों लोगों द्वारा पढ़े जाने वाले पेज किसी एकतरफा या विवादित राय को ‘बड़े सच’ की तरह दिखाने लगते हैं, तो इसका असर सिर्फ विकिपीडिया तक नहीं रहता। इससे यह तय होता है कि आम जनता किसी भी मुद्दे को कैसे समझेगी और उस पर क्या राय बनाएगी।
अब सवाल यह नहीं रह गया है कि क्या विकिपीडिया पक्षपाती (Biased) है, बल्कि सवाल यह है कि यह पक्षपात होता कैसे है। ऑपइंडिया की रिपोर्ट और फिल्म ‘धुरंधर’ के विवाद से जवाब साफ है, यह सब दबंग संपादकों, अपनी पसंद की खबरों को चुनने और नियमों का बहाना बनाकर अपनी बात थोपने का एक मिला-जुला खेल है।
भले ही विकिपीडिया खुद को निष्पक्ष होने का दावा करे, लेकिन उसके खिलाफ अब काफी सबूत हैं। हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद गूगल (Google) जैसा बड़ा सर्च इंजन आज भी किसी भी विषय (जैसे हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’) की जानकारी और सारांश दिखाने के लिए सबसे ज्यादा विकिपीडिया पर ही भरोसा करता है।
(यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
मोदी सरकार ने बुधवार (25 मार्च 2026) को लोकसभा में विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA को बदलने वाला विधेयक पेश किया। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने यह विधेयक पेश किया। उन्होंने कहा कि इसका मकसद विदेश से मिले पैसे की पारदर्शिता बढ़ाना और उसका सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना है।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि यह विधेयक ‘खतरनाक’ तो है, लेकिन उन लोगों के लिए खतरनाक है जो इस पैसे का गलत इस्तेमाल करके धर्म परिवर्तन कराते हैं और अपना फायदा उठाते हैं।
उन्होंने चेतावनी दी, “मोदी सरकार विदेशी फंडिंग के किसी भी दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं करेगी और ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी।”
बता दें कि किसी गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ को विदेश से आर्थिक मदद लेने के लिए FCRA के तहत रजिस्ट्रेशन जरूरी है। साल 2010 का मूल कानून इसमें बनी संपत्ति के लिए कोई कानूनी ढाँचा नहीं देता था, सिर्फ पैसे के आने-जाने को नियंत्रित करने का एक प्रावधान था।
कौन होता है Key Functionary?
विधेयक ने एनजीओ में ‘KEY फंक्शनरी’ की परिभाषा को बढ़ा दिया है। अब इसमें ऑफिस बियरर या डायरेक्टर ही नहीं, बल्कि डायरेक्टर, पार्टनर, ट्रस्टी और हिंदू अविभक्त परिवार के कर्ता के साथ-साथ सोसाइटी, ट्रस्ट, ट्रेड यूनियन या एसोसिएशन की गवर्निंग बॉडी या मैनेजिंग कमेटी के ऑफिस बियरर या सदस्य और कोई भी व्यक्ति जो संगठन के कामकाज या मामलों पर नियंत्रण रखता हो या उसके लिए जवाबदेह हो, शामिल हो गए हैं।
एनजीओ को विदेशी योगदान से बनी किसी भी संपत्ति को बेचने, गिरवी रखने या किसी अन्य तरीके से इस्तेमाल करने से पहले केंद्र सरकार की पहले से अनुमति लेनी होगी।
इसके अलावा अगर वे यह साबित नहीं कर पाते कि उन्हें जानकारी नहीं थी या उचित सावधानी बरती थी, तो संशोधन बड़े कर्मचारियों को FCRA उल्लंघन के लिए जवाबदेह ठहराएगा।
नए प्रावधानों के तहत अगर रिन्यूअल आवेदन जमा नहीं किया गया, केंद्र सरकार ने अस्वीकार कर दिया या समय से पहले रिन्यू नहीं किया तो प्रमाणपत्र की वैधता खत्म होते ही उसे समाप्त माना जाएगा। विधेयक में कहा गया है, “जिस व्यक्ति का प्रमाणपत्र समाप्त हो गया है, वह विदेशी योगदान न तो प्राप्त करेगा और न ही इस्तेमाल करेगा जब तक प्रमाणपत्र रिन्यू न हो जाए।”
‘नियुक्त प्राधिकारी’ की भूमिका को बनाया गया अहम
विधेयक की एक मुख्य विशेषता यह है कि जब किसी संगठन का FCRA रजिस्ट्रेशन निलंबित, समाप्त, समर्पित या किसी अन्य कारण से खत्म हो जाता है तो विदेशी दान से बनी संपत्तियों को सीधे संभालने के लिए एक समयबद्ध और व्यापक व्यवस्था बनाई गई है। एक ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी’ नियुक्त की गई है जो इन संपत्तियों का नियंत्रण लेगी, रिकॉर्ड और इन्वेंटरी रखेगी, उनकी स्थिति सुरक्षित रखेगी और उनका वैध इस्तेमाल या निपटान सुनिश्चित करेगी।
यह स्थायी रूप से हस्तांतरित संपत्तियों को सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर सकती है, जैसे उन्हें केंद्र सरकार या राज्य सरकार के किसी मंत्रालय, विभाग, प्राधिकरण या एजेंसी या किसी स्थानीय निकाय को ट्रांसफर करना या उन्हें बेचना और प्राप्त राशि को ‘भारत की संचित निधि’ में जमा करना और विदेश से बचे हुए किसी भी सहायता को भी।
अगर ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी’ में स्थायी रूप से हस्तांतरित संपत्ति या उसका कोई हिस्सा पूजा स्थल है तो उसकी धार्मिक प्रकृति को बनाए रखना होगा और उसे चुने गए व्यक्ति को प्रबंधन या संचालन सौंपा जाएगा, साथ ही वे शर्तें जो निर्धारित की जा सकें। इसके फैसले को केवल अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
अगर कोई व्यक्ति जिसे विदेशी सहायता लेने की अनुमति दी गई थी, अब अस्तित्व में नहीं है या निष्क्रिय या बंद घोषित कर दिया गया है, तो बचे हुए मुख्य कार्यकर्ताओं को केंद्र सरकार को निर्धारित प्रारूप, तरीके और समय-सीमा में सूचित करना होगा। ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी’ उनके फंड और बनी संपत्तियों का स्थायी स्वामित्व रखेगी।
विधेयक में कहा गया है, “डिजाइनेटेड अथॉरिटी और प्रशासक को इस अधिनियम के तहत अपने कार्यों को पूरा करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के तहत सिविल कोर्ट की सभी शक्तियाँ होंगी, जैसे किसी व्यक्ति को समन करना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना, शपथ पर उसकी जांच करना, दस्तावेजों की खोज और उत्पादन की माँग करना, हलफनामे पर सबूत लेना, कमीशन जारी करना और ऐसी अन्य बातें जो निर्धारित की जा सकें।” आदेश के खिलाफ जिला न्यायाधीश की अदालत में जाने के लिए 90 दिन की अवधि दी गई है।
दोषियों के लिए जेल की सजा
विधेयक ने सजाओं को तर्कसंगत बनाने का सुझाव दिया है और FCRA उल्लंघन के लिए अधिकतम सजा को पहले के 5 साल से घटाकर 1 साल, जुर्माना या दोनों कर दिया है, किसी भी व्यक्ति के लिए जो किसी प्रावधान या नियम का उल्लंघन करके किसी व्यक्ति, राजनीतिक दल या समूह को विदेशी स्रोत से कोई योगदान, मुद्रा या सुरक्षा लेने या मदद करने में शामिल हो।
मूल अधिनियम की धारा 43 को भी बदल दिया गया है, जिसमें किसी भी कानून प्रवर्तन एजेंसी या राज्य सरकार को FCRA से संबंधित आरोपों की जाँच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पहले से मंजूरी लेनी होगी।
अगर इस अधिनियम, किसी नियम या आदेश का उल्लंघन किसी व्यक्ति के अलावा किसी इकाई द्वारा किया गया है, तो उस समय का हर मुख्य कार्यकर्ता जो व्यापार के संचालन का प्रभारी और जवाबदेह था, अपराधी माना जाएगा और उसके अनुसार मुकदमा चलाया जाएगा और सजा दी जाएगी।
सरकार के इस कदम का मकसद
आधिकारिक दस्तावेज में कहा गया है, “विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम, 2010 विदेशी योगदान और विदेशी आतिथ्य के स्वीकार और उपयोग को नियंत्रित करता है ताकि यह राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले। यह अधिनियम 1 मई 2011 को लागू हुआ था और 2016, 2018 और 2020 में संशोधित किया गया था। वर्तमान में इस अधिनियम के तहत लगभग 16,000 संगठन रजिस्टर्ड हैं और सालाना लगभग 22,000 करोड़ रुपए प्राप्त करते हैं।”
हालाँकि कई परिचालन और कानूनी कमियाँ पाई गई थीं, खासकर विदेशी योगदान और उनसे बनी संपत्तियों के संचालन के मामले में जब रजिस्ट्रेशन रद्द, सौंप दिया गया या अन्यथा रोक दिया गया हो। इसमें बताया गया, “इसके अलावा, जाँचों की बहुलता, सजाओं में असंगति, उपयोग के लिए समय-सीमा की कमी, रजिस्ट्रेशन समाप्ति के लिए स्पष्ट प्रावधान की कमी और निलंबन के दौरान संपत्तियों के उपचार को लेकर अस्पष्टता के कारण कार्यान्वयन में चुनौतियाँ आई हैं।”
इसलिए नया विधेयक विदेशी योगदान और संपत्तियों के वेस्टिंग, निगरानी, प्रबंधन और निपटान के लिए एक व्यापक ढाँचा बनाने का लक्ष्य रखता है, जिसमें अस्थायी और स्थायी वेस्टिंग शामिल है, साथ ही रजिस्ट्रेशन निलंबन के दौरान संपत्तियों के संचालन को नियंत्रित करना, प्रमाणपत्र की समाप्ति, रिन्युअल न होने या अस्वीकार होने पर प्रमाणपत्र की समाप्ति और सजा को तर्कसंगत बनाना तथा जाँच शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की पहले से मंजूरी लेना।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)