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ट्रंप ने PM मोदी को बताया अच्छा दोस्त, कहा- पूरा भरोसा है कि भारतवंशी मुझे ही वोट देंगे

अमेरिका में इस साल नवंबर के दौरान राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों ही इसकी तैयारियों में जुट गए हैं। इस कड़ी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा मित्र बताते हुए भारतीय समुदाय के लोगों से चुनाव में साथ देने की अपील की है। ट्रंप ने ह्यूस्टन में हुए कार्यक्रम हाउडी मोदी और अपनी भारत यात्रा का भी ज़िक्र किया है। 

प्रेस वार्ता में ट्रंप ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं। वह इतने मुश्किल हालातों में भी बेहतर काम कर रहे हैं। यह वक्त सभी के लिए बुरा है ऐसे में बेहतर नतीजों के साथ काम करना आसान नहीं है।” उन्होंने कहा कि भारत के लोगों को एक महान व्यक्ति महान नेता के रूप में मिला है। 

ट्रंप ने अपने भाषण के दौरान कई बार यह संकेत दिए भले समय कितना भी कठिन हो वह ऐसे हालातों में भारत के साथ हैं। साथ ही ये विश्वास जताया कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लोग आगामी राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें ही वोट देंगे। 

इसके बाद ट्रंप ने अमेरिका के ह्यूस्टन में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम की यादें ताज़ा की। ट्रंप ने कहा वह एक शानदार अनुभव था और पूरा कार्यक्रम अविश्वसनीय था। प्रधानमंत्री मोदी इससे अधिक उदार नहीं हो सकते थे। हमें भारत के प्रधानमंत्री और वहाँ के लोगों का पूरा समर्थन मिल रहा है। 21 सितंबर 2019 को हुए इस कार्यक्रम में दोनों देशों के नेताओं की मुलाक़ात हुई थी। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने लगभग 50 हज़ार से अधिक भारतीय-अमेरिकियों को संबोधित किया था। 

इस कार्यक्रम के दौरान शामिल होने वाले लोगों ने नमो अगेन के नारे लगाए थे। इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र और दुनिया के सबसे नए लोकतंत्र के बीच अच्छे रिश्ते दिखाना था। इसके बाद अपनी भारत दो दिवसीय भारत यात्रा का उल्लेख करते हुए ट्रंप ने कई बातें कही। उन्होंने कहा हमारे लिए पूरी यात्रा का अनुभव अकल्पनीय था। भारत एक अद्भुत देश है वहाँ से जितना कुछ मिला वह भुलाया नहीं जा सकता है।

इंग्लैंड के बैंक में चीनी जासूस ने भेजे थे 500 मिलियन डॉलर, भारत में हवाला रैकेट चला रहा था चार्ली पेंग

चीनी जासूस चार्ली पेंग के मोबाइल फोन की फोरेंसिक रिपोर्ट सामने आई है। इसमें एक बहुत बड़े लेन-देन की बात सामने आई है। ख़बरों के मुताबिक़ यह लेन-देन कारण 500 मिलियन डॉलर का है। 9 नवंबर 2019 को यह राशि फाय यूं जॉइन नाम के व्यक्ति को भेजी गई थी। सीएनएन न्यूज़ 18 में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़ अभी तक इस लेन-देन से संबंधित कुल 5 दस्तावेज़ बरामद किए गए हैं। 

बरामद किए गए इन दस्तावेज़ों में सबसे अहम बैंक गारंटी लेटर और बैंक ड्राफ्ट की कॉपी भी है। आयकर विभाग ने इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय बैंक की स्थानीय शाखा से कई सवाल भी पूछे थे। विभाग ने संबंधित बैंक को इन दस्तावेज़ों की पुष्टि करने के लिए कहा था और ड्राफ्ट से जुड़ी जानकारी भी माँगी थी। 

चार्ली पेंग ने पूछताछ के दौरान इस संबंध में संतोषजनक जवाब नहीं दिए हैं। उसके मुताबिक़ 500 मिलियन डॉलर की राशि सिंगल ट्रांजेक्शन में स्थानांतरित की गई थी। ख़बरों में बताया जा रहा है कि चार्ली पेंग ने इस लेन-देन से जुड़े सभी कागज़ात अपने मोबाइल फोन से हटा दिए थे। लेकिन जैसे ही आयकर विभाग ने फोन को फोरेंसिक जाँच के लिए भेजा पूरी बात सामने आई। इससे पता चला कि चार्ली पेंग ने 500 मिलियन डॉलर (लगभग 3500 करोड़ रूपए) एचएसबीसी बैंक के इंग्लैंड शाखा में भेजे थे। 

इंग्लैंड स्थित एचएसबीसी बैंक ने इस मामले में आयकर विभाग को कोई भी जानकारी देने से साफ़ मना कर दिया है। बैंक की स्थानीय शाखा ने आयकर विभाग से यह कहा कि वह इस लेन-देन की जानकारी नहीं साझा कर सकते हैं। पूरे मामले पर दो ऐसे सबसे बड़े सवाल हैं जिनका अभी तक जवाब नहीं मिल पाया है। पहला इतने पैसे किसके थे? दूसरा इतनी बड़ी इतनी बड़ी रकम क्यों भेजी गई और यह कहाँ से आई थी? फाय यूं जॉइन नाम के जिस व्यक्ति को इतनी बड़ी राशि भेजी गई है, उसके बारे में भी अभी पता नहीं चल पाया है।

हाल ही में 1000 करोड़ रुपए के हवाला घोटाले के आरोपित चार्ली पेंग के बारे में बड़ा खुलासा हुआ था। चार्ली पेंग चीन का रहने वाला है और उसका असली नाम लुओ सैंग है। जाँच एजेंसियों को पता चला है कि चार्ली पेंग दिल्ली में कुछ लामाओं के संपर्क में था। पेंग के मामले की जाँच कर रही एजेंसियों को शक है कि वह बौद्ध धर्म के सर्वोच्च गुरु दलाई लामा और उनके सहयोगियों की जानकारी जुटा रहा था।

शुरुआती जाँच में पता चला है कि चार्ली पेंग ने दिल्ली में मजनू का टीला में कुछ लामाओं और अन्य व्यक्तियों को पैसे दिए थे। निगरानी से बचने के लिए, पेंग ने बातचीत करने के लिए चीनी एन्क्रिप्टेड एप्लिकेशन ‘वी चैट’ का इस्तेमाल करता था। भारत में रहकर हवाला रैकेट चला रहा चार्ली पेंग एक जासूसी नेटवर्क का भी हिस्‍सा था। उसने अन्‍य चीनी नागरिकों के साथ मिलकर चीनी शेल कंपनियों के नाम से बैंक खाते खोले और करीब 1000 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग की। 

फुटबॉल से चमकाई जा रही रोहिंग्या घुसपैठियों की छवि, हैदराबाद सहित कई शहरों में बनाए क्लब

भारत में घुसपैठ और यहाँ अवैध तरीके से रहने वाले रोहिंग्याओं को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा माना जाता रहा है। भारत में उनकी उपस्थिति को लेकर जाहिर की जा रही चिंताओं के बीच रोहिंग्याओं ने अपनी फुटबॉल टीमें बना ली है। साथ ही वो लोकल टूर्नामेंट्स में भी हिस्सा ले रहे हैं। अब ऐसा प्रतीत होता है कि फुटबॉल के जरिए घुसपैठ को नॉर्मलाइज करने की कोशिश की जा रही है।

इस फुटबॉल टीम का नाम रोहिंग्या FC है और इसने कई टूर्नामेंट्स में हिस्सा भी लिया है। यहाँ तक कि उन्होंने ये छिपाने की भी कोशिश नहीं की है कि वो फुटबॉल का इस्तेमाल घुसपैठ और अवैध प्रवास को सही साबित करने के लिए कर रहे हैं। दिल्ली के एक ‘युवा रोहिंग्या नेता’ अली जौहर का कहना है कि रोहिंग्याओं को एक ख़ास विचारधारा वाले चश्मे से देखा जाता है। उनका कहना है कि उनके समुदाय को लेकर काफी गलत सूचनाएँ और धारणाएँ हैं।

उन्होंने कहा कि फुटबॉल से सकारात्मक बदलाव आया है और वो लोग दुनिया को ये बताने में कामयाब रहे हैं कि वो उन्हीं में से एक हैं, एक सामान्य मनुष्य हैं। नेता ने आगे बताया कि इसके जरिए उनलोगों के भारत में भी कई दोस्त बने हैं। उन्होंने कहा कि फुटबॉल से सकारात्मक बदलाव तो आए हैं लेकिन इसे बनाए रखना एक चुनौती है। 2018 में रोहिंग्याओं ने ‘यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजीज’ द्वारा आयोजित एक टूर्नामेंट में भी हिस्सा लिया था।

ये टूर्नामेंट हैदराबाद के घांसी बाजार स्थित कुली क़ुतुब शाह स्टेडियम में हुआ था। इसमें 16 टीमों ने हिस्सा लिया था। इनमें जलापल्ली, किशनबाग और बालपुर रिफ्यूजी कैम्पों की 3 रोहिंग्याओं की फुटबॉल टीमें शामिल थीं। बालपुर के 24 वर्षीय खिलाडी अब्दुल्ला का कहना है कि वो फुटबॉल इसीलिए खेल रहे हैं, ताकि लोग रोहिंग्या को सकारात्मक दृष्टि से देखें। आयोजकों को भी रोहिंग्या टीमों के टूर्नामेंट में हिस्सा लेने से ख़ुशी है।

आयोजकों में से एक ‘सेव द चिल्ड्रन’ के जनरल मैनेजर ने कहा कि उनका उद्देश्य यहाँ रोहिंग्याओं की भागीदारी को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि यहाँ शरणार्थियों की बात करने का अर्थ है ‘रोहिंग्या शरणार्थी’, जिनकी संख्या सबसे ज्यादा है। उन्होंने कहा कि आधार कार्ड न होने के कारण उनके बच्चे शिक्षा तक नहीं पाते। तेलंगाना फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष ने भी 2018 में कहा था कि वो खेल सुधारने में रोहिंग्याओं की मदद के लिए तैयार हैं।

एसोसिएशन ने रोहिंग्याओं की टीम को प्रशिक्षण देने के लिए एक कोच की नियुक्ति से लेकर अपने खिलाड़ियों को उनके साथ प्रैक्टिस करने का भी ऑफर दिया। कई रोहिंग्या खिलाड़ियों के परिवार बांग्लादेश से आए हुए हैं। ‘रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ सहित कई मानवधिकार संगठन भी उनके समर्थन में उतर आए हैं। हालाँकि, भारत सरकार और इसके कई मंत्री रोहिंग्याओं के खिलाफ अपने रुख पर कायम हैं।

शिक्षक दिवसः नेहरू के यूरोपियन पाठ का सरकारी पर्व

स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति (जो कि पेशे से शिक्षक भी थे) सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को भारत सरकार शिक्षक दिवस के रूप में मनाती है। कहते हैं राधाकृष्णन ने ख़ुद ही अपने विद्यार्थियों के समक्ष यह इच्छा ज़ाहिर की थी कि उनके जन्मदिन को शिक्षक-दिवस के रूप में मनाया जाए। सरकार की सहमति के बाद सरकारी शिक्षण संस्थानों में बड़े तौर पर इस दिन को इसी तरह सेलिब्रेट करने की परंपरा शुरू हो गई।

बचपन से इस दिन को स्कूलों और फिर कॉलेजों में हमने बहुत भावुक मन से इसे सेलिब्रेट किया है। लगभग हर स्कूल में इसदिन विद्यार्थी शिक्षक की भूमिका में आकर जूनियर क्लासेज में कक्षाएँ लेते हैं और अपने शिक्षकों को इसदिन कक्षा लेने के कार्यभार से मुक्त रखते हैं। कॉलेज में शिक्षक समुदाय के समक्ष तरह-तरह के कार्यक्रम कर विद्यार्थी अपनी प्रसन्नता और शिक्षकों के प्रति अपने सम्मान को प्रकट करते हैं।

आज के दिन हर विद्यार्थी अपने संस्थान के शिक्षक समुदाय के प्रति अपनी कृतज्ञता और सम्मान को तरह-तरह से प्रकट करता है। एक परंपरा यह भी है कि सारे विद्यार्थी आज के दिन अपने शिक्षकों को उपहार के रूप में बुद्धि के देवता गणपति की मूर्तियाँ भेंट करते हैं।

असल में मनुष्य एक उत्सवधर्मी प्राणी होता है। उसने अपने भीतर की खुशी और उर्जा को प्रकट करने के लिए ही विभिन्न पर्वों की सृष्टि की है। धरती पर जितनी भी जातियाँ हैं, जितने भी संप्रदाय हैं, जितने भी धर्म हैं, जितने भी लोग हैं सबकी अपनी-अपनी रीतियाँ हैं, तौर-तरीके हैं, पर्व हैं, त्योहार हैं। इन्हीं के माध्यम से लोग अपने होने को मानो प्रकट करते हों। आज भारत में परवर्ती पूँजीवाद का जन तो और ज़्यादा उत्सवधर्मी हो गया है। वह तो उत्सव मनाने और सेलिब्रेट करने के और-और बहाने खोजने लगा है। उसके पास पूँजीवाद ने इतना तनाव और अकेलापन सृजित कर दिया है कि वह छुट्टियों और सेलिब्रेशन के हर मौके पर एक तरह से टूट पड़ता है। यह जन इस दिन (शिक्षक-दिवस) को भी किसी ऐतिहासिक पर्व की तरह ही लहालोट होकर मनाता है।

साभार : सुदर्शन पटनायक

भारत के जन के लिए शिक्षक-दिवस भी एक आदर और सम्मान प्रकटीकरण का पर्व हो गया है और इसदिन को हर भारतीय विद्यार्थी अति भावुक मनःस्थिति से मनाता और प्रकट करता है। दुनिया के और देशों में शिक्षक-दिवस अलग-अलग दिन मनाए जाते हैं। सबके शिक्षक दिवस के अलग-अलग प्रतीक पुरुष और कारण हैं जैसे भारत के लिए सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन- कारण है।

यह लेकिन इतना सरल और सीधा मसला नहीं है जितना ऊपर-ऊपर दिख रहा है और विशेषकर भारत जैसे देश में तो यह और भी समस्यामूलक है क्योंकि भारत की समझ, उसकी संस्कृति किसी भी और देश से न सिर्फ भव्य और उन्नत है, बल्कि प्रतीक और मूर्ति पूजक होने के कारण भारतीय संस्कृति और ज़्यादा फोकस्ड और बोल्ड है।

यहाँ गुरु-पूर्णिमा का एक अनोखा पर्व मनाया जाता रहा है जो वेद-व्यास (पीठ) के जन्मदिन को सेलिब्रेट कम, उनके प्रति सम्मान प्रकट का पर्व ज़्यादा है। भारत की हिन्दूवादी विचारसरणी लेखकों और पुस्तकों को संस्कृति निर्माता के पद पर आसीन करती है। वह मानती है कि किसी भी संस्कृति और सत्य के निर्माता तथा अन्वेषक लेखक ही होते हैं। हिन्दूवादी विचारसरणी लेखकों को ऋषि और द्रष्टा कहकर पूजती रही है। इस विचारसरणी के लिए पुस्तकें केवल पुस्तकें नहीं, बल्कि धार्मिक महत्व की, पूजा की वस्तुएँ होती हैं।

पूरी दुनिया में हिन्दूवादी विचारसरणी के अतिरिक्त शायद ही कोई विचारसरणी या वैचारिकी होगी जो लेखकों, पुस्तकों और गुरुओं का ऐसा सम्मान करती हो। सिख, बौद्ध, जैन, नाथ आदि संप्रदाय तो गुरु को ही भगवान मानकर पूजते हैं। अब सवाल उठता है कि इस या ऐसे देश में अलग से एक शिक्षक दिवस की क्या आवश्यकता आन पड़ी होगी और यह दिन या पर्व कैसे और क्यों शुरू हुआ होगा?

असल में इसकी जड़ें थोड़ी पुरानी और गहरी हैं। इसके तार सात समुद्र पार यूरोप से जाकर जुड़ते हैं। बर्बर मध्यकालीन यूरोप ज्ञान के प्रकाश से रेनेसां कर सका और इस नवजागरणकालीन यूरोप ने अपनी उन्नति के मद में दुनिया को लाँघने का फैसला किया। इसी के अनंतर पूरी दुनिया में पहले व्यापार और फिर उनपर शासन का कार्य किया।

कहने का आशय है कि पूँजीवाद के उदय के साथ रेनेसां की पीठ पर सवार होकर यूरोप ने दुनियाभर को अपने अधीन कर लिया और शासित देशों को अपनी संस्कृति, अपने नियम, अपने सिविल कोड्स से लादकर उनके रीति-नीति और संस्कारों और नियमों को शिफ्ट कर दिया।

उन्होंने पूरी दुनिया को अपनी सुविधावाली जगह बना दी जिसे उपनिवेशवाद अथवा उनका ड्राइंग रूम कहा जाने लगा। इसी क्रम में उन्होंने जो सबसे ज़रूरी काम किया वह यह कि शासित देशों को अपनी तरह ढालने के लिए वहाँ अपनी तरह सोचने वाले दिमाग़ विकसित कर दिए जिन्हें साधारणतया नेटिव्स कहा गया।

2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में लॉर्ड मैकॉले ने उपरोक्त उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारत में लागू किए जाने वाली अपनी शिक्षा-नीति की पृष्ठभूमि को एकदम साफ-साफ प्रकट करते हुए कहा था-

“मैंने भारतवर्ष के ओर-छोर का भ्रमण किया परन्तु मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो भिखारी हो, चोर हो। ऐसी अपार संपदा, इतने उच्च नैतिक आदर्श व इतने प्रतिभाशाली व्यक्तियों वाले देश को हम कभी जीत नहीं पाएँगे। लोगों के मन में आध्यात्मिक, धार्मिकता एवं अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति अटूट आस्था है। वे बड़े मनोबली हैं। यदि भारत को गुलाम बनाना है तो इस देश के मेरुदंड अर्थात् भारतीय आध्यात्मिक व सांस्कृतिक परम्पराओं को तोड़ना होगा। अतः मैं प्रस्ताव करता हूँ कि इसकी शिक्षा-पद्धति और इनकी संस्कृति को नष्ट करना होगा क्योंकि जब प्रत्येक भारतीय के मन में यह बात अच्छी तरह से घर कर जाएगी कि जो भी ‘विलायती’ है, वह उनके ‘देशी’ से श्रेष्ठ है, महान है, तब ये हीन-भावना से ग्रस्त होकर अपनी गरिमा, अपने संस्कार, स्वदेश-प्रेम व स्वाभिमान को खो देंगे। इनका मनोबल टूट जाएगा, तब हम वास्तव में अपने इरादे में कामयाब हो जाएँगे। तब सही मायने में भारत देश हमारा गुलाम बन जाएगा। इसलिए नई शिक्षा-नीति बनाकर वहाँ की प्राचीन शिक्षा प्रणाली एवं संस्कृति पर हमला किया जाए ताकि लोगों का मनोबल टूटे, वे विदेशी खासकर अँग्रेज़ी और अँग्रेज़ियत को अपनी तुलना में महान समझने लगें। तब वही होगा जैसा कि हम चाहते हैं। अपनी संस्कृति और स्वाभिमान को खोया हुआ भारत पूर्णतः गुलाम और भ्रष्ट भारत होगा।”

अँग्रेज़ों ने इसीलिए भारत में स्कूल-कॉलेज खोले। वे भारतीयों को शिक्षित नहीं बल्कि उनके अवचेतन में भारतीय ज्ञान और सभ्यता के प्रति हिकारत भरकर ईसाइयत और पश्चिम को श्रेष्ठ स्थापित करना चाहते थे। कमोबेश पूरी दुनिया में उन्होंने यही किया।

और मैकॉले की बातों में यह साफ-साफ प्रकट है कि उन्होंने भारत को खुद के देश से ज़्यादा सभ्य और मज़बूत संस्कृति वाला पाया था। तो असल में उनलोगों ने एक उन्नत संस्कृति वाले देश को नष्ट कर, आत्महीन कर अपनी संस्कृति को थोपने के लिए बस ज़मीन तैयार करने का काम किया था और नजीता सबके सामने है।

ऐसे उन्होंने भारत में यूरोप की नज़र से देखने वाला दिमाग़ तैयार किया जो 1947 में उनके जाने के बाद भी उनके प्रभाव से मुक्त नहीं हुआ और भारत को उसकी मूल संस्कृति से काटकर एक ऐसा देश बना दिया जो सच में, ज़मीन पर कहीं था ही नहीं। उसने यूरोप के मानकों के आधार पर भारत का निर्माण किया और यह नया भारत उस समय की राजनीति और उसके शीर्ष द्वारा ‘डिस्कवर्ड’ किया गया जिसकी कोई सच्ची ज़मीन थी ही नहीं।

दुनिया का कोई भी देश किसी अन्य की संस्कृति के आधार पर कभी भी सही मायने में उन्नत नहीं हो सकता। कोई भी देश अपनी विशिष्ट विशेषताओं और प्रवृत्तियों और संभावनाओं के आलोक में ही सच्ची गति पा सकता है। किसी और का तरीका उसकी मूल भावना की हत्या कर उसे एक कृत्रिम, मृत और नकलची पुतला ही बना सकता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

यहाँ अचानक नहीं था कि स्वतंत्र भारत में एक ऐसा बनावटी सिस्टम बना दिया गया जिसमें आमजन बाहर बैठकर उजबक की तरह टुकुर-टुकुर ताकने वाला बन गया। उन्हें इस नए बने सिस्टम में प्रवेश करने की इजाज़त ही नहीं थी। वे इस सिस्टम में असहज और अजनबी की तरह जीने को अभिशप्त हो गए।

कानून, संसद, सरकार, व्यवस्था, शिक्षा सब कुछ अंग्रेजी-यूरोपीय फ्रेम में ढाल दिया गया, जिसमें भारत का आमजन मिसफिट हो गया। इस नए बने कृत्रिम सिस्टम में भारत का आमजन खुद को ‘अन्य’ मानकर चलने लगा और उसे यह देश खुद से ज्यादा दूसरों का लगने लगा। यह सिस्टम बढ़ते-बढ़ते आज इतना बड़ा हो गया है कि अब अमीर और गरीब की खाई इतनी गहरी हो गई है कि पाटे नहीं पट रही है।

इसी क्रम में ही एक सभ्य और उन्नत संस्कृति वाले देश को उसकी जड़ों से काटकर अनाथ बना दिया गया ताकि अपने कोड्स, अपने तरीके लागू किए जा सकें। एक आत्महीन देश ही किसी ‘उन्नत’ देश को धन्यभाव से देखता और पिछलग्गू बन जाता है। नेहरू ने भारत को उसकी मूल संस्कृति से काटकर असल में ऐसा ही देश बना दिया जो अपनी हर गति, हर उन्नति के लिए परमुखापेक्षी हो गया।

ऐसा ही देश निर्माण की जगह बनी बनाई वस्तुओं की प्रतीक्षा का आदी हो जाता है, उपभोक्ता हो जाता है। आज भारत वस्तुओं से लेकर विचार तक और मनोरंजन से लेकर पर्वों तक यूरोप-अमेरिका की तरफ टकटकी लगाए देखता एक उपभोक्तावादी देश ही तो हो गया है।

इसी क्रम में अंग्रेज़ों ने भारत को असभ्य देश बता कर उसे हिकारत से देखा, उसकी रीढ़ तोड़ी और मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि यह कैसा देश है जिसमें न सभ्यता है और न व्यवस्था। डॉ. कामेश्वर उपाध्याय अपने लेख में लिखते हैं कि अंग्रेजों ने कहा यह हिन्दू धर्म बड़ा अज़ीब है, 365 दिनों में 1660 पर्व मनाता है। इन पर्वों ने इन्हें कुंद कर दिया है। अतः सभ्य करने के क्रम में उन्होंने भारत के उन पर्वों को असभ्यता और पिछड़ेपन की तरह प्रचारित करना शुरू कर दिया। अंग्रेज़ों की फ्रेम्ड शिक्षा-पद्धति से पढ़ा भारतीय जनमानस इस धारा में बह भी गया।

उनके द्वारा निर्मित रेनेसां की अवधारणा और पैसे की ताकत ने उन्हें आधुनिकता और सभ्यता का प्रतीक पहले ही घोषित कर रखा था और लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा-नीति ने रही सही कसर भी पूरी कर दी और भारत की सांस्कृतिक रीढ़ टूट गई तथा वह एक आत्महीन, गौरवहीन, उपभोक्तावादी देश बन गया। तो ऐसा भारत आसानी से उनकी तरफ शिफ्ट हो गया। रही सही कसर अँग्रेज़ों के बनाए दिमाग़ (नेहरू आदि) ने पूरी कर दी। जिसने स्वतंत्रता के पश्चात भी भारत को अँग्रेज़ों से मुक्त होने नहीं दिया और आज भी भारत सांस्कृतिक-गुलामी का दंश झेलने को बाध्य है।

आज उन्हीं अँग्रेज़ों (ईसाइयों/यूएन) ने दुनियाभर में 1000 से भी ज़्यादा ‘डे’ घोषित कर दिए हैं। लेकिन यह उनकी नज़र में सभ्यता और व्यवस्था का सूचक है। यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि जिस देश में गुरु-पूर्णिमा जैसा पवित्र पर्व मनाया जाता रहा हो, उस देश में अलग से शिक्षक दिवस की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी, तो शायद ही जवाब मिले।

पूरी दुनिया में लेखकों और साहित्य का इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा कि एक कवि (वेद व्यास) के जन्मदिन के दिन को पर्व की तरह, किसी धार्मिक महत्व के पर्व की तरह सेलिब्रेट किया जाता हो। पूरी दुनिया में साहित्य का ऐसा सम्मान विरले है। जिस देश में पुस्तकों को साहित्य न मानकर धर्म के प्रतीक की तरह पूजा जाता हो, वैसा समाज और देश इस दुनिया में नहीं ही होगा इस तथ्य को लॉर्ड मैकॉले समझ गए थे, लेकिन नेहरू नहीं समझ सके और उन्होंने भारत को उसकी मूल संस्कृति से काटकर यूरोप की संस्कृति और सिविल कोड्स से जोड़ना ज़्यादा उचित समझा।

नेहरू का ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ असल में हिन्दू संस्कृति वाले भारत को शिफ्ट कर आधुनिक यूरोपीय नज़र से एक सांस्कृतिक उपनिवेशवादी भारत को गढ़ना ही था। वे ऐसे ही खुद को ‘एक्सिडेंटल हिन्दू’ नहीं कहते थे। उनके अंदर भी भारत के इतिहास और संस्कृति को लेकर कहीं-न-कहीं हीन भावना था तभी महात्मा गाँधी के भारतवादी मॉडल को रिजेक्ट कर यूरोपीय मॉडल को भारत के लिए उपयुक्त माना। महात्मा गाँधी ने अँग्रेज़ों के जाने के बाद नेहरू को दो ज़रूरी सुझाव दिए थे। पहला, कॉग्रेस को भंग कर दो और दूसरा, भारत को ग्राम आधारित समाज की तरह विकसित करो जिसे भारत की मूल विशेषताओं के आलोक में नया भारत बन सके। नेहरू ने दोनों ही सुझावों को मानने से इनकार कर दिया।

वे खुद अंग्रेजी माध्यम के पढ़े-लिखे व्यक्ति थे तथा उन्हें विलायत में रहने आदि का लंबा अवसर मिला था। उनकी जीवनशैली और रहन-सहन भी यूरोप से प्रभावित थी। इन्हीं सब के प्रभाव में उन्होंने महात्मा गाँधी के आदर्शों को हाशिए पर करके एक यूरोप की नज़र का भारत फ्रेम्ड कर दिया।

इस फ्रेम में आज आसानी से यूएन द्वारा घोषित और पोषित नीतियाँ लागू कर दी जाती हैं। पितरों को इतना महत्व देने वाला देश जो कि उनके मर जाने के बाद भी उनके लिए 16 दिन का महत्वपूर्ण पर्व मनाता है और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर उनकी शांति की कामना करता है उस देश को ‘फादर्स डे’ जैसा एक अलग प्रतीक दिवस डे दिया गया। 30 दिनों तक अलग-अलग तरीके से स्त्रियों की शक्ति और महत्त्व के आगे नतमस्तक होकर उनके गुणों का गान करने वाली विचारसरणी को ‘मदर्स डे’ जैसा पर्व पकड़ा दिया गया और नेहरू के यूरोप माइंडेड फ्रेम में यह सब आसानी से अपनाया जाता रहा है।

भूमंडलीकरण असल में है क्या, यूरोप अमेरिका की जीवनशैली को अपनाकर उन्हीं की तरह जीना ही न। आज बहुलतावादी भारत ईसाई यूरोप की तरह एकत्ववादी हो गया है। विभिन्न भाषाओं और बोलियों वाला देश एक भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने की माँग करता है, एक झंडा, एक संस्कृति, एक दृष्टि का हिमायती हो गया है, जबकि अँग्रेजों के आधार पर फ्रेमिंग के पहले इस देश में ऐसी कोई माँग या हिमायत नहीं थी। तमाम विविधताओं के बीच इस देश का मज़े में काम चलता था।

उस समय अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली आदि तमाम भाषाएँ थीं और सभी प्रसन्नतापूर्वक आत्मगौरव से रह रही थीं लेकिन आज अधिकतर भाषाएँ बोलियाँ होकर उपेक्षित, आत्महीन होने को अभिशप्त हो गई हैं। अँग्रेज़ों की तरह भारत को फ्रेम्ड करने से भारत की मूल आत्मा ही खो गई है। भारती की हिन्दूवादी विचारसरणी प्रकृत्या बहुलतावादी और अन्य को स्पेस देनेवाली विचारसरणी है, लेकिन इस नए फ्रेम ने उसे दबाकर एकत्ववाद को थोप दिया है।

यूरोप और उसकी दृष्टि ने असल में भारत को कुंद और संकुचित ही किया है। नेहरू ने यूरोप की तरफ मुँह करने की जगह अगर उसकी तरफ पीठ कर लिया होता और भारत को भारत की विशेषताओं के आलोक में गढ़ने का प्रयत्न किया होता तो संभवतः भारत बहुत पहले ही विश्व शक्ति बन गया होता।

भारत के पर्ववादी मानस और यूएन के ‘डे वादी’ मानस में ज़मीन आसमान का फर्क है। यूएन के यहाँ जहाँ भोगवादी मनःस्थिति प्रमुख है तो भारत के पास पवित्रता और कल्याण की भावना प्रमुख है। इस लेख का उद्देश्य शिक्षक-दिवस का विरोध नहीं है, बल्कि अपने स्वर्णिम अतीत और परम्परा का ज्ञान कराना है, क्योंकि कहते हैं कि जो देश अपनी परम्परा को नहीं जानता वह आज नहीं कल मृत हो जाता है और भारत न कभी मरा है और न आगे मरेगा।

अतः भारत के लोगों को अपनी परम्पराओं को यूएन की प्रतीकवादी राजनीति के बरअक्स स्थापित कर दुनिया को एक भव्य विकल्प देना चाहिए। जैसे कोरोना काल में ‘नमस्ते’ के महत्व को दुनिया ने मान दिया, वैसे ही जब वे भारत की और परम्पराओं से अवगत होंगे तो निश्चय ही यूरोप-अमेरिका की भोगवादी संस्कृति को छोड़ भारत से जुड़ना चाहेंगे। आत्मनिर्भर भारत, विश्व गुरु भारत और क्या है।

मंदिर की जमीन पर मस्जिद कमेटी ने कर लिया था कब्जा, 2 दशक बाद 10 एकड़ जमीन कलेक्टर ने वापस ली

चेन्नई के विरुगंबक्कम (Virugambakkam) इलाके में अरुलमिगु सुंदरा वरदराज पेरुमल मंदिर (Arulmigu Sundara Varadharaja Perumal temple) की 10 एकड़ जमीन कलेक्टर ने मस्जिद कमेटी से वापस ले ली है।

स्वराज्य की खबर के मुताबिक, दो दशक पहले स्थानीय मस्जिद कमेटी ने इस पर अपना कब्जा किया था। कब्जे के बाद से ही श्रद्धालु व मंदिर से जुड़े कार्यकर्ता जमीन वापस पाने की कोशिशों में जुटे थे।

रिपोर्ट की मानें तो कलेक्टर ने अभी भी उस याचिका पर प्रतिक्रिया नहीं दी है जिसमें मंदिर के तालाब को वापस पाने की माँग की गई है। यह तालाब उसी मंदिर का है और करीब 2.5 एकड़ जमीन पर है। रिपोर्ट बताती हैं कि 1997 में तालाब को खाली किया गया था। मगर, कुछ स्वार्थी लोगों ने तालाब व उसके आसपास की 14 एकड़ जमीन को हथियाने का प्रयास किया, जबकि यह जमीन सुनगुवार ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने दान में दी थी।

बावजूद इसके, स्थानीय मस्जिद समिति ने सरकारी कर्मचारियों की मदद से अपने नाम पर कब्जे वाली 3 एकड़ जमीन को पंजीकृत करने में कामयाबी कर ली। जिसे जानने के बाद जल्द ही, हिंदू मुन्नानी और मंदिर कार्यकर्ता मामले में शामिल हो गए।

मंदिर उपासक सोसायटी के अध्यक्ष टी आर रमेश ने मामले में जनहित याचिका दायर की और मद्रास उच्च न्यायालय ने उनकी दलीलों को स्वीकार करते हुए पंजीकरण रद्द कर दिया। फिर हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।

हालाँकि, बाद में मामले की जाँच का काम जिलाधिकारी को सौंपा गया। जिसके मद्देनदर उन्होंने मस्जिद कमेटी के प्रतिनिधियों को बुलवाया। लेकिन इस पूछताछ के लिए वे उपस्थित नहीं हुए। नतीजतन 2 साल बाद भी इस पर कोई निष्कर्ष नहीं निकला।

इसके बाद घटनाक्रमों से अनजान, मंदिर कार्यकर्ता जेबमणि मोहनराज ने मंदिर के तालाब को पुनः प्राप्त करने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। दूसरी बार भी केस उसी जज के पास गया जिन्होंने पिछली बार फैसला सुनाया था। न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई करते हुए कलेक्टर को तुरंत अपनी जाँच पूरी करके यह निर्धारित करने के लिए निर्देशित किया कि क्या वहाँ एक तालाब मौजूद है?

बता दें, कलेक्टर ने इस मामले में जो फैसला सुनाया है उसमें जमीन को तालुक बोर्ड को देने की बात है। क्योंकि साल 1910 के रिकॉर्ड में जमीन उन्हीं के नाम है। जिसका मतलब है कि फैसले में वह जमीन मंदिर को वापस नहीं मिली। इससे उसके स्वामित्व पर अब भी सवाल है। वहीं तालाब को लेकर कोई फैसला नहीं आया है। स्वराज्य की माने तो मोहनराज ने मद्रास हाई कोर्ट ने इस मामले पर दोबारा याचिका डाली है।

रफीकुल अली ने मठ में की तोड़फोड़, आसन और भगवद्गीता में लगाई आग: पिछले साल लक्ष्मी मंदिर में की थी आगजनी

असम के बारपेटा जिले के गनक कुची गाँव के एक वैष्णव मठ में तोड़फोड़ करने और धार्मिक स्थल को अपवित्र करने के आरोप में पुलिस ने गुरुवार (3 सितंबर, 2019) को रफीकुल अली को गिरफ्तार किया। आरोपित बरपेटा कस्बे के भैला क्षेत्र के शांतिपुर का निवासी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अली ने गुरु आसान और श्री राम अता भिठी के मठ में रखी हिंदू पवित्र पुस्तक भगवद गीता को आग में झोंक दिया था। आरोपित ने मठ के प्रार्थना कक्ष में तोड़फोड़ भी की थी। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल पैदा हो गया। बता दे जिस वक्त घटना को अंजाम दिया गया, कोई भी मठ के भीतर मौजूद नहीं था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मठ 16 वीं शताब्दी में श्री माधवदेव द्वारा स्थापित किया गया था, जोकि श्रीमंत शंकरदेव के मुख्य शिष्य थे। गुरुवार को लगभग 2 बजे के आसपास रफीकुल ने मठ में प्रवेश किया। उसने पहले तोड़फोड़ की फिर गुरु आसन और अन्य वस्तुओं को मठ से बाहर लाकर आग लगा दी। इतना ही नहीं उसने मठ में रखे प्रसाद को भी फेंक दिया।

मठ से आग की लपटें और धुँए को उठता देख स्थानीय लोगों ने मौके पर पहुँचकर आरोपित को रंगेहाथ दबोच लिया। फिर उसे पुलिस को सौंप दिया गया। बारपेटा के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने मठ का दौरा किया। गनक कूची सत्र समिति ने मामले को लेकर पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है।

बता दें गुरु आसन एक सात-स्तरीय लकड़ी का सिंहासन है जो गुरु के बैठने और आसन का प्रतिनिधित्व करता है। यह आसन सातरा को मणिकुट में रखा जाता है, जिसकी तुलना मंदिरों के गुप्त पवित्रगृह से की जा सकती है। वहीं मूर्ति का खंडन होने की वजह से इसकी पूजा अब नहीं की जाएगी। वैष्णव सत्र और असम में नामघरों में खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं की जाती है।

गौरतलब है कि पिछले साल 8 अक्टूबर को भी रफीकुल अली ने लक्ष्मी मन्दिर में घुस कर आग लगा दी थी। उस पर इसके अलावा देवी के सोने-चाँदी के आभूषण चुराने, मन्दिर की फ़र्श तोड़ने और मन्दिर में लगे आगामी लक्ष्मी पूजा की जानकारी देने वाले पोस्टर फाड़ने का भी आरोप लगा था। लक्ष्मी मन्दिर बारपेटा के उत्कुची इलाके में स्थित है। उस समय भी घटना के बाद लोगों ने उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया था।

शौविक ने कबूला- बहन रिया के लिए खरीदता था ड्रग्स, सैमुएल के साथ एनसीबी ने गिरफ्तार किया

सुशांत सिंह राजपूत केस में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ड्रग्स एंगल की पड़ताल कर रही है। अब इस मामले में बड़ी खबर सामने आ रही है। रिया चकवर्ती के भाई शौविक और सैमुएल को एनसीबी ने गिरफ्तार कर लिया है।

इससे पहले मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया था शौविक चक्रवर्ती ने NCB के सामने कथित तौर पर स्वीकार कर लिया है कि रिया के कहने पर उसने ड्रग्स खरीदे थे। इतना ही नहीं, शौविक का दावा है कि रिया ने उसके अलावा सुशांत के पूर्व मैनेजर सैमुएल मिरांडा से भी ड्रग मँगाए, क्योंकि वह कई ड्रग तस्करों के संपर्क में था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार शौविक ने एनसीबी के सामने कबूल किया था कि वह अपनी बहन रिया के लिए ड्रग्स खरीदता था। वहीं, सैमुएल ने स्वीकार किया कि वह सुशांत के घर के लिए ड्रग्स खरीदते थे।

बता दें, इससे पहले सुशांत केस की जाँच में जुटी NCB ने ड्रग तस्कर कैजान इब्राहिम को गिरफ्तार किया था। यह इस मामले में जाँच एजेंसी द्वारा पाँचवी गिरफ्तारी थी। इसके अलावा रिपब्लिक टीवी का दावा है कि उनके स्टिंग में एक ड्रग तस्कर ने इस बात को स्वीकार किया है कि बॉलीवुड हस्तियों का पार्टियों पर ड्रग लेना बेहद आम बात है। अपने दावे के साथ उन्होंने स्टिंग की टेप भी जारी की है। इसमें उस तस्कर को कहते सुना जा सकता है कि बॉलीवुड सितारे अक्सर सफेद पदार्थ, कोकीन और हशीश ही लेते हैं।

रिपब्लिक वर्ल्ड की खबर के अनुसार उनके स्टिंग में मुंबई का ड्रग तस्कर उन्हें अच्छी क्वालिटी की चरस देने का वादा भी करता है। वह कहता है कि इस काम के लिए 20,000 रुपए लगते हैं और खरीदने वाले को एडवांस देना पड़ता है। खबर की मानें तो, तस्कर उन्हें नय्यर अस्पताल के दाहिनी तरफ आने को भी कहता है। साथ ही ये पूछे जाने पर कि क्या वो खुद पर्सनली जाकर डिलीवरी देता है? वह कहता है कि उन्हें ड्रग्स लेने खुद आना पड़ेगा। अब स्थिति पुरानी नहीं रह गई है।

ड्रग तस्कर कहता है, “पार्टियों में ड्रग का सेवन बहुत आम बात है। मैं ऐसे लोगों के पास जा चुका हूँ और यह आमतौर पर नियमबद्ध है। मैं आपको अच्छा माल दे सकता हूँ। मैं इसका इंतजाम सितारों के लिए करता हूँ और बॉलीवुड हस्तियाँ इसे खरीदती हैं।”

उल्लेखनीय है कि सुशांत केस में ड्रग्स के पहलू पर छानबीन करते हुए आज नार्कोटिक्स ब्यूरो ने रिया चक्रवर्ती के घर पर छापेमारी भी की थी। रिया के घर में लगभग 3 घंटे से पूछताछ हुई और इसके अलावा सैमुएल मिरांडा के घर भी छापेमारी हुई। सैमुएल के घर कई घंटे चली छापेमारी के बाद नार्कोटिक्स ब्यूरो ने उसे हिरासत में ले लिया था।

प्रियंका जी ने कहा राजस्थान जाइए, वहाँ कॉन्ग्रेस की सरकार है: डॉ. कफील खान ने ‘हमदर्दों’ से कहा शुक्रिया

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले में आरोपित डॉ. कफील खान हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर आए हैं। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कम्युनिस्ट पार्टी को सहयोग के लिए धन्यवाद दिया है।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान भड़काऊ टिप्पणी करने के लिए खान को मुंबई से गिरफ्तार किया गया था। जयपुर प्रेस क्लब में आज (4 सितंबर, 2020) एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान खान ने कहा कि उन्हें परिवार के साथ राजस्थान जाने की सलाह दी गई, क्योंकि यहॉं कॉन्ग्रेस की सरकार होने के कारण वे सुरक्षित रहेंगे।

उन्होंने कहा, “मुझे प्रियंका जी द्वारा जयपुर में सुरक्षित रहने का आश्वासन दिया गया। उन्होंने मेरी माँ और पत्नी से बात की थी और कहा था कि यूपी सरकार मेरे खिलाफ और आरोप लगा सकती है। हम यहाँ राजस्थान में सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।”

खान ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें गलत तरीके से फँसाया। साथ ही उन्होंने सीएम योगी से अपने निलंबन को रद्द करने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनके निलंबन को वापस नहीं लिया गया तो वे इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे।

बता दें 2017 में ऑक्सीजन की सप्लाई में कमी के कारण गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 72 बच्चों की मौत हो गई थी। इसके बाद डॉ.खान को चिकित्सा लापरवाही के आरोपों के कारण निलंबित और गिरफ्तार भी किया गया था।

यूपी पुलिस द्वारा 2 साल किए गए जाँच के बाद उनपर लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप हटा दिए गए, लेकिन फिर भी उन पर निजी प्रैक्टिस चलाने सहित दो अन्य आरोप लगाए गए थे। 9 महीने जेल में बिताने के बाद उन्हें 2018 में रिहा कर दिया गया था। लेकिन अभी भी वे नौकरी से निलंबित है।

गौरतलब है कि प्रियंका गाँधी ने ट्विटर पर डॉ. कफील खान के रिहा होने के बाद खुशी जाहिर की थी। वाड्रा ने इस मामले में सीएम योगी आदित्यनाथ को चिट्ठी भी लिखा था। अब कयास लगाए जा रहे हैं कि 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव में कफील खान कॉन्ग्रेस पार्टी का मुस्लिम चेहरा बन सकते हैं।

केरल की अवैध बम फैक्ट्री में धमाका, बारूद तैयार कर रहे थे CPM कार्यकर्ता: रिपोर्ट्स

केरल के कन्नूर में अवैध बम निर्माण इकाई में धमाके की खबर आई है। घटना में कई लोगों के घायल होने की सूचना है। बताया जा रहा है घटनास्थल से कई स्टील बम बरामद हुए हैं। आरोप लग रहा है कि सीपीएम कार्यकर्ता धमाके के समय वहाँ बम बना रहे थे।

टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट के अनुसार, घटना पोन्नियम नामक जगह पर हुई। यह साफ़ नहीं है कि कितने लोग घायल हुए हैं। मगर, कहा जा रहा है कि घायल लोग सीपीएम के हैं। उन्हें इलाज के लिए अस्पाल ले जाया गया है।

इस धमाके में कुछ स्थानीय लोग भी घायल हुए हैं। वहीं सूचना पाते ही पुलिस भी घटनास्थल पर पहुँच गई है। घटना स्थल से उन्हें बम मिले हैं, जिन्हें कुछ पुलिसकर्मी थाने ले गए हैं और कुछ पुलिस मौके पर रहकर उस जगह की जाँच कर रहे हैं।

रिपोर्ट बताती है कि कन्नूर का पोन्नियम और आस-पास के क्षेत्र कुख्यात रूप से कम्युनिस्ट पार्टी के गढ़ के रूप में पहचाने जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों से पहले ऐसी कई घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ स्थानीय रूप से निर्मित कच्चे बमों ने सीपीआई (एम) और आरएसएस कार्यकर्ताओं दोनों को घायल किया है।

इस्लामी कट्टरपंथी और न्यूजलॉन्ड्री के ‘पत्रकार’ शरजील उस्मानी को बेल, ‘पढ़ाई’ का मिला फायदा

इस्लामी कट्टरपंथी और न्यूजलॉन्ड्री के शरजील उस्मानी को शुक्रवार को अलीगढ़ की एक स्थानीय अदालत ने जमानत दे दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दंगों को उकसाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए एएमयू के छात्र उस्मानी को जिला अदालत ने जमानत दी। सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शनों में कथित भूमिका के लिए उसे 29 जुलाई को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

विशेष न्यायाधीश नरेंद्र सिंह ने उस्मानी को जमानत देते हुए कहा कि उस्मानी एएमयू का मेधावी छात्र है और उसे मौका-ए-वारदात से गिरफ्तार नहीं किया गया था। न्यायाधीश के अनुसार, गिरफ्तारी के वक्त उसके खिलाफ कोई गंभीर सबूत भी नहीं पाया गया था।

अदालत ने न केवल उसकी शैक्षिक साख को संज्ञान में लिया, बल्कि दो मामलों में आरोपित उस्मानी को जमानत देते हुए यह भी उल्लेख किया कि वह लेख भी लिखता है।

बार और बेंच के अनुसार न्यायाधीश नरेंद्र सिंह ने कहा, “आरोपित को और जेल में रखने से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं होने वाला। इसलिए जेल में बंद अवधि और उसके शैक्षिक रिकॉर्ड को देखते हुए यह उसे जमानत देने का उचित समय है।”

जज ने कहा, “आरोपी का शैक्षिक रिकॉर्ड बताता है कि वह एक होनहार छात्र रहा है। उसने कई लेख लिखे हैं जो रिकॉर्ड में भी उपलब्ध हैं।” मामले के अन्य आरोपितों में से एक को पहले ही जमानत दे दी गई थी।

पिछले साल दिसंबर में एएमयू में हुए सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शन के बाद उस्मानी के खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत अलग-अलग मामले दर्ज किए गए थे। न्यूज़लॉन्ड्री के कॉलमनिस्ट शरजील उस्मानी दिल्ली में इस साल फरवरी में हुए हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान पुलिस पर रिवॉल्वर तानने वाले कट्टरपंथी शाहरुख पठान का महिमामंडन भी किया था।

उस्मानी ने भड़काऊ और देशद्रोही भाषण देने के आरोपित शारजील इमाम का भी समर्थन किया था। इमाम की गिरफ्तारी के तुरंत बाद उस्मानी ने झूठा प्रचार-प्रसार कर भारत में संप्रदाय विशेष के लोगों की कथित खराब हालत का दुष्प्रचार विदेश तक फैलाने की साजिश रची थी। उस्मानी ने घोषणा की थी कि वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर भारत में संप्रदाय विशेष के खिलाफ कथित घृणा अपराधों को दर्शाते हुए वीडियो डालेगा ताकि वैश्विक स्तर पर वे सोशल मीडिया के जरिए लोगों पर प्रभाव बना सके।

सोशल मीडिया और शरजील इमाम का भड़काऊ भाषण वायरल होने के बाद उस्मानी ने उसका बचाव भी किया था। उसने संप्रदाय विशेष के लोगों से जेएनयू के स्कॉलर से खुद को अलग न करने का आग्रह किया था।