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‘आधे कॉन्ग्रेस नेता BJP से मिले… इन सबको निकालेंगे’: गुजरात में राहुल गाँधी ने अपनी पार्टी वालों पर ही साधा निशाना, बोले- ये हमें काम करने से रोकते हैं

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने गुजरात में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं से बड़ी बात कह दी। राहुल गाँधी ने कहा कि पिछले 30 साल से कॉन्ग्रेस गुजरात के लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई, क्योंकि पार्टी के कुछ नेता अंदर से बीजेपी के साथ मिले हुए हैं। राहुल ने दो दिन के दौरे पर अहमदाबाद में ये बात कही और साफ किया कि ऐसे लोगों को बाहर का रास्ता दिखाना जरूरी है, तभी गुजरात के लोग कॉन्ग्रेस पर भरोसा करेंगे।

राहुल गाँधी ने कहा कि गुजरात में कॉन्ग्रेस दो तरह के नेताओं से भरी पड़ी है। एक वो, जो जनता के साथ खड़े हैं और लड़ते हैं, जिनके दिल में कॉन्ग्रेस है। दूसरे वो जो ऊपर से कॉन्ग्रेस में हैं, लेकिन बीजेपी के लिए काम करते हैं। राहुल ने कहा, “ऐसे 20-30 लोगों को भी निकालना पड़े, तो निकालेंगे। अगर आप कॉन्ग्रेस में रहकर बीजेपी के लिए काम कर रहे हो, तो बाहर जाओ और खुलकर उनके लिए काम करो। वहाँ तुम्हें कोई भाव नहीं मिलेगा।” उनका मानना है कि ऐसा करने से गुजरात के लोग कॉन्ग्रेस में भरोसा करेंगे और पार्टी के दरवाजे उनके लिए खोलने पड़ेंगे।

राहुल ने ये भी कहा कि गुजरात में कॉन्ग्रेस के पास 40% वोट हैं, जो कोई छोटी ताकत नहीं है। तेलंगाना में पार्टी ने 22% वोट बढ़ाए थे, यहाँ सिर्फ 5% की जरूरत है। लेकिन इसके लिए पार्टी को साफ-सफाई करनी होगी। राहुल गाँधी ने कहा, “चुनाव जीतना या हारना अलग बात है, लेकिन कॉन्ग्रेस का खून नेताओं की रगों में होना चाहिए। मैं गुजरात के लोगों से सीधा रिश्ता बनाना चाहता हूँ। भारत जोड़ो यात्रा से हमने दिखाया कि कॉन्ग्रेस कश्मीर से कन्याकुमारी तक लोगों से जुड़ सकती है। हमें लोगों के घरों में जाना होगा, उनकी बात सुननी होगी।”

राहुल ने गुजरात की तारीफ करते हुए कहा कि महात्मा गाँधी और सरदार पटेल जैसे नेता यहाँ से निकले, जिन्होंने कॉन्ग्रेस को रास्ता दिखाया। राहुल ने कहा कि गुजरात के व्यापारी, किसान और छोटे उद्योग मुश्किल में हैं। डायमंड, टेक्सटाइल और सेरामिक इंडस्ट्री खत्म हो रही है। लोग नई सोच चाहते हैं, जो बीजेपी पिछले 25 साल से नहीं दे पाई। राहुल ने वादा किया कि वो गुजरात में कॉन्ग्रेस का छिपा हुआ जोश बाहर लाएँगे।

1983 का क्रिकेट वर्ल्ड कप फाइनल… जब ‘गरीब’ BCCI को इंग्लैंड ने माँगने पर भी नहीं दिया था 2 टिकट: अब पैसे के लिए वहीं के खिलाड़ी खेलते हैं IPL, भारत ने ऐसे बदल दी क्रिकेट की दुनिया

चैंपियंस ट्रॉफी-2025 का फाइनल मुकाबला भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेला जाएगा। ये मुकाबला दुबई में खेला जाएगा, जिसके पीछे की वजह भारत है। चूँकि इस बार चैंपियंस ट्रॉफी की मेजबानी पाकिस्तान कर रहा था, लेकिन मेजबान होते भी पाकिस्तान मेजबानी नहीं कर पा रहा है, बल्कि भारत की वजह से फाइनल और सेमीफाइनल मुकाबला दुबई में करवाना पड़ा रहा है। और इस बात ने पाकिस्तान की अच्छी-खासी किरकिरी करवा दी।

पाकिस्तान की ऐसी हालत देख कर इंग्लैंड क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान माइकल वॉन ने मजे ले लिए। माइकल वॉन ने एक्स पर लिखा, “दुबई ने #ChampionsTrophy की शानदार मेजबानी की है।”

माइकल वॉन का ये तंज साफ दिखाता है कि पाकिस्तान भले ही मेजबान हो, लेकिन असली कमान भारत के हाथ में है। वैसे, ये कोई नई बात नहीं है। भारत का क्रिकेट में दबदबा आज पूरी दुनिया देख रही है। लेकिन एक वक्त ऐसा भी था, जब भारत को भी ऐसी ही जिल्लत झेलनी पड़ी थी। आज की ये रिपोर्ट उसी कहानी को आगे बढ़ाती है, जिसमें भारत ने अपनी ताकत से क्रिकेट की दुनिया को हिला दिया।

भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट ड्रामा

चैंपियंस ट्रॉफी की मेजबानी को लेकर जो ड्रामा हुआ, वो कोई पहली बार नहीं है। भारत ने साफ कह दिया कि वो पाकिस्तान नहीं जाएगा। वजह सियासी भी थी और सुरक्षा से जुड़ी भी। भारत का ये रुख देखकर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के पास कोई चारा नहीं बचा। आखिरकार, ICC को बीच में आना पड़ा और हाइब्रिड मोड का रास्ता निकाला गया। इसके तहत भारत के सारे मैच दुबई में होंगे, चाहे वो लीग स्टेज हो, सेमीफाइनल हो या फिर फाइनल। बाकी टीमें भी अब पाकिस्तान से दुबई की यात्रा करेंगी।

पाकिस्तान के लिए ये बड़ा झटका है। मेजबान होने के बावजूद वो अपने घर में बड़े मैच नहीं खेल पा रहा। ऊपर से माइकल वॉन जैसे दिग्गजों के ताने सुनने पड़ रहे हैं। लेकिन ये सब देखकर हमें वो पुराना वाकया याद आता है, जब भारत भी ऐसी ही हालत में था। बात 1983 की है, जब भारत ने पहला वर्ल्ड कप जीता था। उस वक्त फाइनल में पहुँचने के बाद भी बीसीसीआई को इंग्लैंड में दो टिकट तक नहीं मिले थे। उस अपमान ने भारत को ऐसा सबक सिखाया कि आज वो क्रिकेट की दुनिया का बादशाह बन गया है।

1983 का वो अपमान, जिसने बदली तस्वीर

साल 1983 का वर्ल्ड कप फाइनल। भारत बनाम वेस्टइंडीज। जगह थी लॉर्ड्स, इंग्लैंड। कपिल देव की टीम ने इतिहास रच दिया और भारत को पहला वर्ल्ड कप जिता दिया। लेकिन इस जीत के पीछे एक कड़वी कहानी भी थी। उस वक्त बीसीसीआई के अध्यक्ष एनकेपी साल्वे को फाइनल के लिए दो एक्स्ट्रा टिकट चाहिए थे। उन्होंने इंग्लैंड के क्रिकेट बोर्ड से गुजारिश की, लेकिन जवाब में साफ मना कर दिया गया। बोला गया कि दो टिकट तो दे दिए, अब और नहीं मिल सकते। हैरानी की बात ये थी कि स्टेडियम में एक पूरा हिस्सा खाली था, क्योंकि इंग्लैंड फाइनल में नहीं पहुँचा था और वहाँ के बुलाए गए मेहमान नहीं आए। फिर भी भारत को टिकट नहीं दिए गए।

ये बात साल्वे साहब को चुभ गई। उन्हें लगा कि भारत को कोई औकात ही नहीं समझा जा रहा। उस वक्त क्रिकेट की दुनिया में इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज का दबदबा था। भारत और पाकिस्तान जैसे देशों को हल्के में लिया जाता था। लेकिन इस अपमान ने साल्वे के मन में आग लगा दी। उन्होंने ठान लिया कि अब क्रिकेट का केंद्र इंग्लैंड से हटेगा। इसके बाद जो हुआ, वो इतिहास बन गया।

इस घटना से जुड़ी रिपोर्ट

भारत ने कैसे बदली क्रिकेट की सूरत

1983 की जीत के बाद साल्वे ने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष नूर खान से हाथ मिलाया। दोनों ने मिलकर 1987 का वर्ल्ड कप इंग्लैंड से बाहर लाने का प्लान बनाया। ICC की बैठक में भारत और पाकिस्तान ने इंग्लैंड को 16-12 से वोटिंग में हरा दिया। पहली बार वर्ल्ड कप भारत और पाकिस्तान में आया। इसे “रिलायंस वर्ल्ड कप” कहा गया, क्योंकि धीरूभाई अंबानी ने इसमें बड़ा पैसा लगाया था।

हालाँकि, ये आसान नहीं था। इंग्लैंड ने खूब अड़ंगे लगाए। कहा कि भारत-पाकिस्तान में ढंग का इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं है। लेकिन साल्वे और उनकी टीम ने हार नहीं मानी। पैसा जुटाने के लिए सरकार से लेकर बड़े बिजनेसमैन तक, सबको साथ लाया गया। आखिरकार 1987 में क्रिकेट वर्ल्ड कप भारत में हुआ। भले ही भारत सेमीफाइनल में हार गया, लेकिन ये जीत क्रिकेट को इंग्लैंड से बाहर लाने की थी।

बीसीसीआई बना क्रिकेट का सिरमौर

साल 1983 के बाद भारत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1990 के दशक में जगमोहन डालमिया और आईएस बिंद्रा जैसे लोग बीसीसीआई में आए। इन्होंने क्रिकेट को पैसा कमाने की मशीन बना दिया। पहले दूरदर्शन का एकछत्र राज था, लेकिन डालमिया ने इसे कोर्ट में चुनौती दी और ब्रॉडकास्टिंग के अधिकार बीसीसीआई के नाम करवाए। 1993 में भारत-इंग्लैंड सीरीज के राइट्स 18 लाख में बिके। फिर 1996 वर्ल्ड कप के राइट्स 10 मिलियन डॉलर में। धीरे-धीरे ये आंकड़ा बढ़ता गया। आज बीसीसीआई के पास इतना पैसा है कि वो कई देशों के क्रिकेट बोर्ड को पाल सकता है।

IPL ने तो कमाल ही कर दिया। 2023-28 के लिए इसके मीडिया राइट्स 48,390 करोड़ में बिके। आईपीएल में इंग्लैंड के भी खिलाड़ी खेलते हैं। यही नहीं, आईपीएल के समय ऑस्ट्रेलिया हो या इंग्लैंड, कोई टीम इंटरनेशनल मैच भी नहीं खेलती और अपने खिलाड़ियों को एनओसी देकर आईपीएल में खेलने की इजाजत देती हैं, क्योंकि इससे खिलाड़ियों की ही नहीं, बोर्ड की भी मोटी कमाई होती है। कभी इंग्लैंड में जिल्लत झेलने वाली बीसीसीआई अब इंग्लैंड के ही नहीं, दुनिया भर के खिलाड़ियों की बोली लगवाती है और पाकिस्तान जैसे देश के खिलाड़ियों को एंट्री तक नहीं देती।

आज बीसीसीआई दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है। एक वक्त था, जब 1983 की जीत के बाद खिलाड़ियों को सम्मानित करने के लिए लता मंगेशकर को कॉन्सर्ट करना पड़ा था। और आज भारत के पास इतना दम है कि वो चैंपियंस ट्रॉफी जैसे टूर्नामेंट को अपनी शर्तों पर दुबई में करवा रहा है।

साल 1983 में दो टिकटों के अपमान से शुरू हुआ सफर आज 2025 में चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल तक पहुँच चुका है। उस वक्त इंग्लैंड ने भारत को हल्के में लिया था और आज पाकिस्तान भारत के आगे मजबूर है। माइकल वॉन का तंज हो या दुबई में फाइनल का आयोजन, ये सब भारत की ताकत की मिसाल है। क्रिकेट अब सिर्फ खेल नहीं, बल्कि भारत का दबदबा है।

तो दोस्तों, ये थी कहानी कि कैसे भारत ने क्रिकेट की दुनिया को अपने कदमों में ला दिया। 1983 में जो टीस हुई थी, वो आज जीत में बदल गई है। अब देखना ये है कि दुबई में होने वाला फाइनल भारत के नाम होता है या न्यूजीलैंड बाजी मार जाता है।

चर्च बना भैरवनाथ का मंदिर, ईसाई बन रहे हिंदू: राजस्थान के बाँसवाड़ा का वो गाँव जहाँ लोग कर रहे हैं घर वापसी, लगा रहे ‘जय श्रीराम’ के नारे

राजस्थान के बाँसवाड़ा जिले में एक चर्च को हिंदू मंदिर में बदला जा रहा है। जिस गाँव में यह बदलाव हो रहा है, उस गाँव के लोग कुछ साल पहले ईसाई में धर्मांतरित हो गए थे। यह चर्च भी उसी समय का बना हुआ है। अब लगभग पूरा गाँव फिर से हिंदू बन गया है। इसके बाद अब ग्रामीण चर्च को मंदिर में बदल रहे हैं। चर्च से मंदिर बनाने के बाद उसमें भैरव जी की प्रतिमा स्थापित की जाएगी।

यह मामला बाँसवाड़ा जिले के गांगड़तलाई स्थित सोडलादूधा गाँव का है। भारतमाता मन्दिर परियोजना के प्रयास से कुछ दिन पहले इस गाँव के 80 परिवारों ने घर वापसी करके हिन्दू धर्म अपना लिया है। घर वापसी के बाद गाँव के परिवारों ने भैरव जी का मन्दिर स्थापित करने का निर्णय लिया है। रविवार 9 मार्च 2025 को मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम निश्चित किया गया है।

दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, गाँव के गौतम गरासिया नाम के एक बुजुर्ग शख्स ने बताया कि 30 साल पहले वे ईसाई बन गए थे। वे धर्मांतरण करने वाले गाँव के पहले व्यक्ति थे। इसके बाद उनके परिवार के 30 सदस्यों ने भी ईसाई धर्म अपना लिया। उनसे प्रेरित होकर कुछ और लोगों ने भी ईसाई धर्म अपना लिया। हालाँकि, उनके छोटे भाई का परिवार हिंदू बना रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक, गौतम का कहना है कि उनके ईसाई बनने के बाद ईसाई समुदाय के लोगों का उनके गाँव में आवाजाही शुरू हो गई। गौतम हर रविवार को अपनी झोपड़ी में प्रार्थना सभा आयोजित करने लगे। इसके बाद उनकी झोपड़ी को चर्च में बदलने के लिए तीन पहले पहले उन्हें पैसे दिए गए। झोपड़ी जब चर्च बन गया तो उसमें बाहर से भी पादरी आने लगे।

वे गाँव के अन्य लोगों को भी ईसाई बनने के लिए प्रेरित करने लगे। प्रार्थना सभा में आने वाले ग्रामीणों को भी वे दान करने के लिए कहते थे। साथ ही उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए कहते थे। इन लोगों ने गौतम को गाँव के इस चर्च का पादरी भी बना दिया। इसके बदले उन्हें हर महीने लगभग 1500 रुपए दिए जाते थे।

गौतम के दो बेटों ने घर वापसी कर ली है, जबकि गौतम की पत्नी अभी ईसाई ही हैं। उन्होंने कहा कि गाँव के 45 लोगों में से 30 लोगों ने हिंदू धर्म को फिर से अपना लिया है। उन्होंने दावा किया कि बचे हुए 15 लोग भी जल्द घर वापसी करने वाले हैं। घर वापसी करने वाले लोगों का कहना है कि जो लोग अभी ईसाई हैं, उन्हें हिंदू बनने के लिए वे समझाते हैं।

अल-मतीन मस्जिद के विस्तार के लिए कहाँ से आ रहा पैसा? ₹40 लाख की जमीन दान करने वाला लगाता है जूते-चप्पल की दुकान: क्या विदेशी फंडिंग से बन रही मस्जिद?

सीलमपुर के ब्रह्मपुरी इलाके में अल-मतीन मस्जिद का मामला फिर से गरमा गया है। यहाँ के हिंदुओं का कहना है कि मुस्लिम पहले चुपके से आते हैं, फ्लैट खरीदते हैं, फिर घर लेते हैं, मस्जिद बनाते हैं और धीरे-धीरे पूरे इलाके पर कब्जा कर लेते हैं। फिर मौका मिलते ही पूरी कौम एकजुट होकर हिंदुओं पर हमला कर देती है।

साल 2020 के हिंदू-विरोधी दंगों में इसी मस्जिद से गोलियाँ चली थीं, जिसके बाद हिंदुओं का डर गहरा गया। अब मस्जिद को गली नंबर-12 में शिव मंदिर के सामने तक बढ़ाने की कोशिश हो रही है। MCD के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए बिना नक्शा पास कराए काम शुरू हुआ। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि इसके लिए पैसा कहाँ से आ रहा है? ₹40 लाख की जमीन दान करने वाला शख्स चप्पल की दुकान चलाता है। क्या विदेशी फंडिंग का खेल है? ये कहानी सिर्फ मस्जिद की नहीं, बल्कि संदिग्ध फंडिंग, साजिश और हिंदुओं के डर की है। आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।

सबसे पहले जड़ को समझना जरूरी, कहाँ से खेल हुआ शुरू

ब्रह्मपुरी में अल-मतीन मस्जिद की कहानी 2013 से शुरू होती है। स्थानीय निवासी पंडित लाल शंकर गौतम बताते हैं, “2013 में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने गली नंबर-13 में एक फ्लैट खरीदा था। वहाँ नमाज शुरू हुई। किसी को कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन धीरे-धीरे उस फ्लैट को चार मंजिल की मस्जिद में बदल दिया गया।”

गौतम कहते हैं कि ये सब सोच-समझकर किया गया। पहले एक छोटी सी जगह ली गई, फिर उसे बढ़ाते गए। उनका मानना है कि मुस्लिम इस तरह इलाकों में घुसते हैं। पहले एक फ्लैट लेते हैं, फिर आसपास के घर खरीदते हैं और मस्जिद बना लेते हैं। शुरू में सब ठीक लगता है, लेकिन बाद में माहौल बदल जाता है। 2013 में जब मस्जिद शुरू हुई, तब गली नंबर-12 और 13 में हिंदू बहुमत में थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

साल 2020 के फरवरी महीने में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में दंगे भड़के। ब्रह्मपुरी और सीलमपुर में हिंसा ने 53 लोगों की जान ले ली। इस दौरान अल-मतीन मस्जिद का नाम खास तौर पर सामने आया। गौतम बताते हैं, “25 फरवरी को मस्जिद से निकली भीड़ ने गोलियाँ चलाई थीं। वीडियो सबूत भी सामने है। अचानक हजारों की भीड़ जमा हो गई। मस्जिद में आग लगाने की झूठी अफवाह फैलाई गई। फिर गली नंबर-13 में गोलीबारी हुई, जिसमें तीन हिंदू लड़के घायल हुए।”

हिंदुओं का कहना है कि ये सब सोचा-समझा था। मुस्लिम पूरी कौम एकजुट होकर हिंदुओं पर टूट पड़े। गौतम कहते हैं, “उस दिन हमें समझ आ गया कि मस्जिद सिर्फ नमाज के लिए नहीं है। ये उनकी ताकत दिखाने का अड्डा है।” दंगों के बाद हिंदुओं में डर बैठ गया। कई परिवार इलाका छोड़ गए। लोगों को लगने लगा कि मस्जिद के बहाने कुछ बड़ा खेल चल रहा है।

प्लानिंग के तहत मस्जिद को किया जा रहा बड़ा

साल 2020 के हिंदू विरोधी दंगों के बाद मस्जिद को बड़ा करने की कोशिश शुरू हुई। 2023 में मस्जिद वालों ने गली नंबर-12 में दो प्लॉट खरीदे। दोनों प्लॉट 75-75 गज के थे, यानी कुल 150 गज। एक प्लॉट कुलभूषण शर्मा का था, जो 1967 से उनके परिवार के पास था। दूसरा कुलदीप कुमार का था। गौतम कहते हैं, “पहले घर खरीदे, फिर तोड़ दिए। अब वहाँ मस्जिद का हिस्सा बन रहा है।”

योजना थी कि मस्जिद का नया गेट गली नंबर-12 में खोला जाए, जो 1984 से बने शिव मंदिर के ठीक सामने पड़ता है। हिंदुओं को ये बिल्कुल मंजूर नहीं। गली नंबर-12 में करीब 60 हिंदू परिवार रहते हैं। हिंदुओं को डर है कि मस्जिद बड़ी हुई तो भीड़ बढ़ेगी और 2020 जैसा हमला फिर हो सकता है। शंकर लाल गौतम कहते हैं, “अगर मस्जिद दो गुनी बड़ी हो गई तो सोचो, कितने लोग यहाँ जमा होंगे। फिर हमें कौन बचाएगा?”

मस्जिद के विस्तार के पीछे पूरा तंत्र सक्रिय, खास पैटर्न दिखा

अब बात फंडिंग की, जो इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल है। गली नंबर-12 में दो प्लॉटों की खरीद का तरीका संदिग्ध है। पहला प्लॉट कुलभूषण शर्मा से जनवरी 2023 में खरीदा गया। सैय्यद मुबश्शिर हुसैन, उबैद उर रहमान और अब्दुल खालिक ने 40 लाख 70 हजार रुपये में सौदा किया। ये प्रॉपर्टी कुलभूषण के पास 2013 से थी, जिसे उनके पिता किशन चंद ने 1967 में खरीदा था। उस वक्त यहाँ हिंदू बहुमत में थे। लेकिन 2013 में जब गली नंबर-13 में अल-मतीन मस्जिद शुरू हुई, तभी मुस्लिमों की नजर इस जमीन पर पड़ गई।

सौदे का तरीका ऐसा था-13 लाख 50 हजार रुपये तीन बार में बैंक ट्रांसफर से दिए गए। उबैद उर रहमान ने 30 दिसंबर 2022 को यूनियन बैंक से, अब्दुल खालिक ने 2 जनवरी 2023 को स्टेट बैंक से, और मुबश्शिर हुसैन ने 5 जनवरी 2023 को बैंक ऑफ बड़ौदा से 13 लाख 50 हजार रुपये ट्रांसफर किए। सिर्फ 20 हजार रुपये नकद दिए गए। रजिस्ट्री जनवरी 2023 में पूरी हुई। फिर 20 मार्च 2024 को ये जमीन अल-मतीन वेलफेयर सोसाइटी को दान कर दी गई, जिसके अध्यक्ष अब्दुल अलीम हैं। उनका पता निजामुद्दीन का है, जो ब्रह्मपुरी से काफी दूर है।

दूसरा प्लॉट अप्रैल 2023 में कुलदीप कुमार से खरीदा गया। समीर अहमद, मोहम्मद अलफहद और जहीन अहमद ने 40 लाख 70 हजार रुपये में सौदा किया। यहाँ भी वही पैटर्न था। 13 लाख 50 हजार रुपये तीन बार में ट्रांसफर हुए। 3 अप्रैल 2023 को यूनियन बैंक से, 5 अप्रैल 2023 को सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से चेक से, और 27 अप्रैल 2023 को पंजाब नेशनल बैंक से RTGS के जरिए पैसे गए। 20 हजार रुपये नकद दिए।

दोनों सौदों में कुल 81 लाख 40 हजार रुपये कुलदीप और कुलभूषण को मिले। रजिस्ट्री में 2 लाख 44 हजार 200 रुपये स्टांप ड्यूटी लगी। गिफ्ट डीड से जमीन ट्रांसफर करते वक्त 2 लाख 85 हजार 600 रुपये की स्टांप ड्यूटी दी गई, जिसमें 6% स्टांप के 2 लाख 4 हजार और 2% कारपोरेशन टैक्स के 81 हजार 600 रुपये शामिल थे। इस तरह 40 लाख 70 हजार की हर प्रॉपर्टी करीब 45-46 लाख में पड़ी। दोनों प्लॉटों के लिए 90 लाख से ज्यादा खर्च हुए।

दबी जुबान में कहा जा रहा है कि ये प्रॉपर्टी करीब ढाई करोड़ में खरीदी गई, चूँकि जमीन सौदों में बड़ी रकम नकद में दी जाती है, ताकि टैक्स का झंझट कम से कम हो। हालाँकि हम अभी सिर्फ ऑन रिकॉर्ड मौजूद राशि की ही बात कर रहे हैं।

मस्जिद के लिए 75 गज जमीन खरीदने के कागजात

चप्पल की दुकान से 13 लाख 50 हजार का जकात?

सबसे चौंकाने वाली बात जहीन अहमद उर्फ गुड्डू की है। वो साप्ताहिक बाजार में चप्पल की दुकान लगाता है। उसने 13 लाख 70 हजार रुपये जमीन में लगाए और सालभर में दान कर दिए। गौतम कहते हैं, “चप्पल बेचने वाला इतना पैसा कहाँ से लाया? ये किसी को हजम नहीं होता।” जहीन के दस्तखत हिंदी में हैं, बाकी सबके अंग्रेजी में। मामला भाषा का नहीं, उसके बैकग्राउंड का है। चप्पल बेचकर घर चलाने वाला शख्स इतनी बड़ी रकम कैसे दे सकता है? हिंदुओं को शक है कि इसके पीछे विदेशी फंडिंग हो सकती है। अल-मतीन वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष का पता निजामुद्दीन में होना भी सवाल उठाता है। क्या ये कोई बड़ा नेटवर्क है?

फंडिंग में विदेशी हाथ?

इस 90 लाख से ज्यादा की जमीन को खरीदने और दान करने का पैसा कहाँ से आया? जहीन जैसे चप्पल बेचने वाले का इतना पैसा देना संदिग्ध है। हिंदुओं को लगता है कि विदेशी फंडिंग हो सकती है। अल-मतीन वेलफेयर सोसाइटी और निजामुद्दीन का कनेक्शन शक बढ़ाता है। गौतम कहते हैं, “पैसे की जड़ तक जाना जरूरी है। सरकारी एजेंसियाँ क्या कर रही हैं?” मस्जिद में बच्चों को दीनी तालीम दी जाती है। सरकार से मदद नहीं मिलती। रजिस्ट्रेशन भी शायद नहीं है। फिर इतना पैसा कहाँ से?

ये सारी बातें ब्रह्मपुरी में रहने वाले हिंदुओं को डराती हैं। उन्हें समझ में आ रहा है कि किसी भी इलाके में मुस्लिम एक पैटर्न से काम करते हैं। ब्रह्मपुरी में पहले फ्लैट, फिर घर, फिर मस्जिद। 2018 का तनाव, 2020 का हमला और अब संदिग्ध फंडिंग से विस्तार इसका सबूत है। ऐसे में अगर फंडिंग का रहस्य सुलझा लिया जाए, तो साजिश की परतें भी साफ हो ही जाएँगी।

ब्रह्मपुरी की अल-मतीन मस्जिद केस से जुड़ी अन्य ग्राउंड रिपोर्ट्स पढ़ें-

1- मस्जिद को बढ़ाना, शिव मंदिर के सामने उसका गेट खोलना… दिल्ली सीलमपुर (ब्रह्मपुरी) की इसी अल-मतीन मस्जिद से 2020 हिंदू-विरोधी दंगों में चली थी गोलियाँ: समझिए हिंदू क्यों लगा रहे ‘मकान बिकाऊ’ के पोस्टर

2- ब्रह्मपुरी की अल मतीन मस्जिद भी धोखे से बनी, अब मंदिर के सामने गेट खोलने की कोशिश: MCD का बोर्ड लगा मामले को दबाने की कोशिश, आखिर क्यों मस्जिद को बड़ा करने की जिद?

3- सीलमपुर के अल-मतीन मस्जिद मामले से समझिए, कैसे मुस्लिम आपके इलाके में घुसते हैं… खुद को फैलाते हैं और एक दिन आपको लगाना पड़ता है ‘मकान बिकाऊ’ का पोस्टर

राजस्थान में फिर ईसाई धर्मांतरण का पर्दाफाश, इस बार 150 जनजातियों का हो रहा था ब्रेनवॉश: हिंदू संगठन के पहुँचने से मचा हंगामा, पुलिस ने 4 को किया गिरफ्तार

राजस्थान धर्मांतरण का नया मैदान बनता जा रहा है। भरतपुर और बाँसवाड़ा के बाद अब सिरोही जिले में धर्मांतरण कराने का मामला सामने यहाँ है। जिले के रेवदर तहसील में लगभग 150 जनजातीय समाज के लोगों को ईसाई धर्म में धर्मांतरण करने का प्रयास किया जा रहा है। इसकी सूचना मिलते ही हिंदू संगठन मौके पर जूट कर हंगामा करने लगे। पुलिस ने चार आरोपितों को हिरासत में लिया है।

बताया जा रहा है कि रेवदर के करोटी में अनवर नागौरी के कुँए पर गुरुवार (6 मार्च 2025) की रात करीब 10 बजे चंगाई सभा का आयोजन किया गया। इसमें बहला-फुसलाकर आसपास के जनजातीय समाज के 150 से अधिक लोगों को बुलाया गया था। इनमें ज्यादातर महिलाएँ थीं। इन सबको झाँसा देकर उनका धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश की जा रही थी।

इसी दौरान इसकी जानकारी किसी ने विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल को दे दी। हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने घटनास्थल पर पहुँचकर चंगाई सभा आयोजित करने वाले लोगों पर सवाल उठाया तो उन्होंने कहा, “हम जनजातीय लोगों की बीमारी मिटाते हैं। हमें किसी का डर नहीं है।” लाउडस्पीकर के बारे में पूछने पर कहा कि ‘हम पर कोई कानून नहीं लगता है’।

इन लोगों ने हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं से झगड़ा करने की भी कोशिश की। हालाँकि, मौके पर पहुँचकर पुलिस ने चार लोगों को हिरासत में ले लिया। वहीं, एक आरोपित भागने में कामयाब रहा। पुलिस हिरासत में लिए गए आरोपितों से पूछताछ कर रही है। इनके पास से बाइबिल एवं ईसाई धर्म की अन्य पुस्तकें भी बरामद की गई हैं।

ASI रमेश दान चारण ने बताया कि जिन चार लोगों को पकड़ा गया है, उनकी पहचान निचली सिगरी के रहने वाले गजेंद्र खराड़ी, करेल (उदयपुर) के ललित एवं लंकेश तथा झामर (आबूरोड) के रहने वाले भारमा राम के रूप में हुई है। ये सभी वहाँ पहुँचे लोगों को हिंदू धर्म के बारे में भ्रामक जानकारी दे रहे थे।

इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने से जनजातीय समाज के लोग भड़क गए और रात में ही थाने के बाहर जुट गए। गिरफ्तार लोगों को छोड़ने की माँग करते हुए इन्होंने कहा, “अगर इन्हें नहीं छोड़ा तो हम खाना कैसे खाएँगे? हमारे तो दो ही ईश्वर हैं- एक ऊपर वाला और दूसरे वे लोग, जिन्हें थाने में बंद कर रखा गया है।”

हालाँकि, पुलिस ने बहुत समझा-बुझाकर उन लोगों को वापस उनके घरों को भेजा। सामने आए वीडियो में एक जनजातीय महिला कह रही है, “हमारे घर के लोग दारू पीकर नाली में गिरे रहते थे। उस समय कोई देखने नहीं आया, लेकिन अब प्रभु की कृपा से उन्होंने सब छोड़ दिया तो आप लोग कह रहे हैं कि अब हंगामा कर रहे हैं।”

DMK लगा रही थी केंद्र पर ‘हिंदी’ थोपने का इल्जाम, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कर दी ‘तमिल’ में इंजीनियरिंग-मेडिकल पढ़ाने की बात: भाषाई विवाद के बीच लोग कर रहे केंद्र सरकार की तारीफ

तमिलनाडु मुख्यमंत्री एक तरफ केंद्र सरकार पर आरोप लगा रही है कि वो राज्य पर हिंदी थोपने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने खुद तमिलनाडु सीएम एमके स्टालिन से कहा है कि राज्य में तमिल भाषा में इंजीनियरिंग और मेडिकल शिक्षा शुरू होनी चाहिए।

अमित शाह ने 7 मार्च 2025 को रानीपेट जिले के थक्कोलम में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के 56वें स्थापना दिवस समारोह के दौरान यह बात कही।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने बदलाव किए हैं, जिससे अब केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की परीक्षाएँ क्षेत्रीय भाषाओं में भी आयोजित की जा सकती हैं, जिसमें तमिल भी शामिल है।

शाह ने कहा, “मैं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री से छात्रों के लाभ के लिए राज्य में तमिल में इंजीनियरिंग और मेडिकल शिक्षा शुरू करने की अपील करता हूँ।” उन्होंने यह भी कहा कि कई अन्य राज्यों ने पहले ही अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में चिकित्सा और इंजीनियरिंग शिक्षा प्रदान करना शुरू कर दिया है। तमिल भाषा में भी इसकी शुरुआत होनी चाहिए।

बता दें कि गृहमंत्री अमित शाह का ये बयान लोगों में चर्चा का कारण बना हुआ है। इसे सुन कई नेटिजन्स मोदी सरकार की तारीफ भी कर रहे हैं। तमिल यूजर्स का भी कहना है कि केंद्र उनकी भाषा को सम्मान दे रही है, उसमें मेडिकल-इंजीनियरिंग पढ़ाने की बात कर रही है। वरना पिछले दिनों तो तमिलनाडु की राज्य सरकार ने नई शिक्षा नीति पर सवाल खड़ा करते हुए केंद्र पर खूब हमला किया था।

उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार हिंदी को थोपने की कोशिश कर रही है जबकि केंद्र का कहना था कि भाषाई स्तर पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। भाषा लोगों को संस्कृति से जोड़ती है।बावजूद इसके डीएमके इस बात पर अड़ी थी कि वे केवल दो-भाषा नीति का पालन करेंगे, जिसमें तमिल और अंग्रेजी शामिल हैं।

‘अयोध्या एक्सप्रेस को उड़ा देंगे RDX से’ : धमकी मिलने के बाद सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट, पुलिस कर रही आतंकी अब्दुल अंसारी की तलाश

एक अज्ञात शख्स ने शुक्रवार (7 मार्च) को फोन करके अयोध्या से दिल्ली जा रही अयोध्या एक्सप्रेस को बम से उड़ाने की धमकी दी। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियाँ हरकत में आ गईं और उन्होंने ट्रेन को रोककर गहन तलाशी ली। बम निरोधक दस्ते ने ट्रेन का एक-एक कोना छान मारा। हालाँकि, तलाशी में कुछ मिला नहीं है। इसके बाद ट्रेन को आगे की ओर रवाना कर दिया गया।

अधिकारियों का कहना है कि 14205 संख्या वाली अप ट्रेन अयोध्या से दिल्ली जा रही रही थी। इसके बाद रेलवे पुलिस को किसी ने फोन करके कहा कि अयोध्या एक्सप्रेस में बम रखी हुई है। फोन कॉल करने वाले व्यक्ति ने कहा कि ट्रेन को लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन से पहले बम से उड़ा दिया जाएगा। इसके बाद रेलवे प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गईं।

पुलिस के अनुसार, बाराबंकी से लेकर लखनऊ तक ‘हाई अलर्ट’ जारी कर दिया गया। खुफिया एजेंसियाँ भी सक्रिय हो गईं। हर रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा बढ़ा दी गई। इसके बाद ट्रेन को बाराबांकी स्टेशन पर रोक कर रखा गया और तलाशी अभियान चलाया गया। एक-एक डिब्बे की सघन तलाशी ली गई। पुलिस ने बताया कि ट्रेन के एस-8 बोगी के शौचालय में एक संदेश लिखा हुआ मिला।

उसमें बम को उड़ाने की बात लिखी हुई थी। उसमें लिखा हुआ था, ‘इस ट्रेन को लखनऊ चारबाग स्टेशन पर बम से उड़ा दिया जाएगा। प्लीज इसे फेक नहीं समझें और इसकी जानकारी पुलिस को दें या 139 पर फोन करें। वरना हजारों लोगों की जान चली जाएगी। यकीन कर दोस्त, मदद कर। बम को S-4/S-5 बैग में रखा गया है। अब्दुल अंसारी (आतंकवादी), मुरादाबाद।’

ट्रेन में लिखा हुआ मैसेज (साभार: आजतक)

इस संदेश में ‘बम मिनी RDX 8/7 UC 100 मिमी टाइमर’ का भी विवरण दिया गया था। इसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को दे दी गई। अधिकारियों ने इस धमकी को गंभीरता से लेते हुए सघन जाँच का आदेश दिया। यह तलाशी अभियान लगभग ढाई घंटे तक चली। इसमें रेलवे सुरक्षा बल (RPF), राजकीय रेलवे पुलिस (GRP), स्थानीय पुलिस और बम निरोधक दस्ता शामिल हुईं।

बाराबंकी के SP दिनेश कुमार सिंह ने बताया कि इस अभियान के लिए सेना के बम निरोधक दस्ते को भी बुलाया गया था। तलाशी के बाद ट्रेन में कुछ नहीं मिला और फिर उसे आगे की ओर रवाना कर दिया गया। SP दिनेश सिंह ने कहा कि फोन पर धमकी देने वाले व्यक्ति का भी पता लगाया जा रहा है। साथ ही मामले की जाँच की जा रही है।

सीलमपुर के अल-मतीन मस्जिद मामले से समझिए, कैसे मुस्लिम आपके इलाके में घुसते हैं… खुद को फैलाते हैं और एक दिन आपको लगाना पड़ता है ‘मकान बिकाऊ’ का पोस्टर

सीलमपुर का ब्रह्मपुरी इलाके की गली नंबर 13 में स्थित अल-मतीन मस्जिद को लेकर हिंदुओं में डर और गुस्सा है। लोग कहते हैं कि मुस्लिम पहले चुपचाप आते हैं, फ्लैट खरीदते हैं, फिर घर लेते हैं, मस्जिद बनाते हैं और धीरे-धीरे पूरे इलाके पर कब्जा कर लेते हैं। फिर एक दिन मौका मिलते ही पूरी कौम एकजुट होकर हिंदुओं पर हमला कर देती है।

साल 2020 के हिंदू-विरोधी दंगों में ब्रह्मपुरी और सीलमपुर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में यही हुआ था। अल-मतीन मस्जिद से गोलियाँ चली थीं, भीड़ जमा हुई और हिंदुओं का जीना मुश्किल हो गया। अब इसे बड़ा करने की कोशिश हो रही है, जिससे हिंदुओं को लगता है कि मस्जिद और बड़ी हुई तो उनका जीना हराम हो जाएगा। 2018 में भी गली नंबर-8 की मस्जिद को लेकर तनाव हुआ था, जिसके बाद 2020 में मुस्लिमों ने हिंदुओं पर गुस्सा उतारा। आइए, इसकी पूरी कहानी समझते हैं।

फ्लैट से मस्जिद और फिर बदलने लगता है माहौल

ब्रह्मपुरी में अल-मतीन मस्जिद की कहानी साल 2013 से शुरू होती है। लोकल आदमी पंडित लाल शंकर गौतम बताते हैं, “2013 में मुस्लिमों ने गली नंबर-13 में एक फ्लैट खरीदा। वहाँ नमाज शुरू हुई। कोई कुछ नहीं बोला। लेकिन धीरे-धीरे उस फ्लैट को चार मंजिल की मस्जिद बना दिया।” गौतम कहते हैं कि ये सब सोचा-समझा था। पहले छोटी जगह ली, फिर उसे बढ़ाते गए।

उनका मानना है कि मुस्लिम इस तरह इलाके में घुसते हैं। पहले एक फ्लैट, फिर आसपास के घर खरीदते हैं और मस्जिद बना लेते हैं। शुरू में सब ठीक लगता है, लेकिन बाद में माहौल बदल जाता है। हिंदुओं को लगता है कि ये सब उनकी जिंदगी पर कब्जा करने की तैयारी है।

साल 2018 में भी हुआ था तनाव, मस्जिद थी वजह

ब्रह्मपुरी में मुस्लिमों की ये कारगुजारी कोई नई बात नहीं है। साल 2018 में गली नंबर-8 में भी एक मस्जिद को लेकर हिंदुओं और मुस्लिमों में ठन गई थी। उस वक्त हिंदुओं ने इसका विरोध किया।

शीशपाल तिवारी कहते हैं, “वहाँ मस्जिद बन रही थी। हमने कहा कि ये गलत है। तब पुलिस ने दोनों तरफ से बात कराई। एक समझौता हुआ कि मस्जिद में सिर्फ गली के लोग नमाज पढ़ेंगे। बाहर से कोई नहीं आएगा।” लेकिन तिवारी का कहना है कि मुस्लिमों ने इस वादे को तोड़ा। अब्दुल रफीक नाम का शख्स बाहर से लोगों को बुलाने लगा। गली में भीड़ बढ़ने लगी। हिंदुओं को लगने लगा कि ये सब उन्हें परेशान करने के लिए हो रहा है। ये तनाव 2018 में शुरू हुआ और आगे चलकर 2020 में बड़ा बवाल बन गया।

एक बुजुर्ग कहते हैं, “हमें बाहर निकलने में डर लगता है। मस्जिद बड़ी हुई तो ये रोज का हाल होगा।” 2018 के समझौते को तोड़ने का भी गुस्सा है। वो कहते हैं, “अब्दुल रफीक बाहर से लोगों को बुलाता है। गली में शांति नहीं रहती।” हिंदुओं को लगता है कि मस्जिद के बहाने मुस्लिम उनकी जिंदगी पर कब्जा करना चाहते हैं। यहाँ हिंदू डरकर ही रहने को मजबूर हैं। दंगों के बाद से कुछ ज्यादा ही खौफ है।

साल 2020 में दिख चुकी है मुस्लिमों की एकजुटता

साल 2020 के फरवरी महीने में ब्रह्मपुरी और सीलमपुर में जो हुआ, वो हिंदुओं के लिए खौफनाक था। दंगे भड़के और अल-मतीन मस्जिद उसका बड़ा केंद्र बना। गौतम बताते हैं, “25 फरवरी को मस्जिद से गोलियाँ चलीं। अचानक हजारों की भीड़ जमा हो गई। कहा गया कि मस्जिद में आग लगाई गई, जो झूठ था। फिर गली नंबर-13 में गोलीबारी हुई। तीन हिंदू लड़के घायल हुए।”

हिंदुओं का कहना है कि ये सब सोचा-समझा था। मुस्लिम पूरी कौम एकजुट होकर हिंदुओं पर टूट पड़े। 53 लोग मारे गए, जिसमें ज्यादातर मुस्लिम थे, लेकिन हिंदुओं को भी निशाना बनाया गया। गौतम कहते हैं, “उस दिन हमें समझ आ गया कि मस्जिद सिर्फ नमाज के लिए नहीं है। ये उनकी ताकत दिखाने की जगह है।” दंगों के बाद हिंदुओं का भरोसा टूट गया।

मस्जिद का विस्तार हिंदुओं के लिए बढ़ते खतरे की घंटी

2020 के बाद मस्जिद को बड़ा करने की कोशिश शुरू हुई। 2023 में मस्जिद वालों ने गली नंबर-12 में बगल का एक घर खरीदा। वो घर हिंदू का था। शंकर लाल गौतम कहते हैं, “पहले घर खरीदा, फिर तोड़ दिया। अब वहाँ मस्जिद का हिस्सा बन रहा है।” प्लान ये था कि मस्जिद का नया गेट गली नंबर-12 में खोला जाए, जो ठीक सामने 1984 से बने शिव मंदिर के पास पड़ता है। हिंदुओं को ये बिल्कुल मंजूर नहीं। गली नंबर-12 में 60 हिंदू परिवार रहते हैं। उनमें से अधिकतर घरों के सामने ‘मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर दिख जाएँगे।

ब्रह्मपुरी की गली नंबर-12 में लगे ‘मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर

एक युवक ने कहा, “मंदिर बहुत पुराना है। हर सोमवार को पूजा होती है। मस्जिद का गेट सामने खुला तो हमारा जीना मुश्किल हो जाएगा।” हिंदुओं को डर है कि मस्जिद बड़ी हुई तो भीड़ बढ़ेगी और 2020 जैसा हमला फिर हो सकता है।

शंकर लाल गौतम कहते हैं, “अगर मस्जिद दो गुनी बड़ी हो गई तो सोचो, कितने लोग यहाँ जमा होंगे। फिर हमें कौन बचाएगा? 2020 में जो हुआ, वो दोबारा होगा।” हिंदुओं का मानना है कि मुस्लिम पहले इलाके में फैलते हैं, फिर मस्जिद बनाते हैं और मौका मिलते ही एकजुट होकर हमला करते हैं। ब्रह्मपुरी में यही पैटर्न दिख रहा है।

हिंदुओं के घरों के बाहर फेंकी जाती हैं जानवरों की हड्डियाँ और खून

हिंदुओं का कहना है कि मस्जिद के आसपास उनका जीना मुश्किल हो गया है। सुरेश कुमार अग्रवाल ने साल 2023 में न्यू उस्मानपुर थाने में शिकायत की थी। उन्होंने शिकायत में लिखा था, “साल 2017 से मुस्लिम समाज के लोग आए दिन मुझे भगाने के लिए मेरे घर पर कभी खून डाल देते हैं, कभी कुछ। इसी कड़ी में 10 अप्रैल 2023 को किसी जानवर के कटे हुए पैर मेरे घर के सामने डाल दिया गया।”

साल 2023 समेत कई बार हिंदुओं के घरों के सामने फेंके गए जानवरों के अवशेष, शिकायत की कॉपी

वो शिकायत में आगे लिखते हैं, “यह लोग (मुस्लिम) चाहते हैं कि हम हिंदू समाज के लोग अपना घर बेचकर यहाँ से चले जाएँ। जिसके कारण मेरे ही नहीं, कई हिंदू परिवारों के घरों पर, छतों पर जानवरों की हड्डियाँ और खून फेंका जाता है। इसकी सूचना कई बार पुलिस को दी भी जा चुकी है।” स्थानीय लोग इन आरोपों की पुष्टि करते हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम जानबूझकर ऐसा करते हैं, ताकि हिंदू परेशान हों। इस बात की शिकायत गृहमंत्री अमित शाह तक की गई थी।

मुस्लिम पक्ष को मामले के ठंडा पड़ते ही निर्माण कार्य शुरू होने का इंतजार

मस्जिद का विस्तार 2023 में शुरू हुआ। हिंदुओं ने शिकायत की तो पुलिस ने काम रुकवा दिया। फिर 23 नवंबर, 2024 को मस्जिद वालों ने MCD से इजाजत ली और फरवरी 2025 में काम दोबारा शुरू किया। लेकिन 13 फरवरी, 2025 को फिर शिकायत हुई। पुलिस ने जाँच की तो नक्शा गलत निकला। MCD ने काम रोक दिया। मस्जिद का संचालन करने वाली अल-मतीन वेलफेयर सोसायटी और इसका नक्शा पास करने वाले आर्किटेक्ट मोहम्मद दाऊद खान को शो कॉज नोटिस भी भेजा गया है। अब एक महीने से निर्माण बंद है।

मस्जिद कमेटी और भवन निर्माण का नक्शा पास करने वाले आर्किटेक्ट को एमसीडी ने भेजा नोटिस

हालाँकि गौतम कहते हैं, “MCD बोर्ड लगाकर दिखावा कर रही है। असल में कुछ नहीं हो रहा।” हिंदुओं को लगता है कि पुलिस और MCD सिर्फ ऊपरी कार्रवाई कर रहे हैं, जबकि मुस्लिम मौके की तलाश में हैं।

मस्जिद के नायब ईमाम सद्दाम हुसैन कहते हैं, “हमारी आबादी बढ़ रही है। मस्जिद छोटी पड़ गई। इसे बड़ा करना गलत कैसे है?” उनका कहना है कि हिंदुओं का डर बेकार है। वो कहते हैं, “हम शांति चाहते हैं।”

लेकिन हिंदुओं को ये बातें खोखली लगती हैं। अजय नाम के युवक ने कहा, “2020 में भी शांति की बात थी, फिर गोलियाँ चलीं। अब मस्जिद बड़ी हुई तो क्या होगा?” हिंदुओं को शक है कि मुस्लिम पहले फैलते हैं, फिर मौका देखकर हमला करते हैं।

साल 2020 के दंगों में हिंदुओं ने देखा कि मुस्लिम कैसे एकजुट हो जाते हैं। शंकर लाल गौतम कहते हैं, “मस्जिद से भीड़ निकली और हम पर टूट पड़ी। एक-एक घर को निशाना बनाया।” ब्रह्मपुरी और सीलमपुर जैसे इलाकों में मुस्लिम बहुल होने की वजह से उनकी ताकत बढ़ गई थी।

हिंदुओं का कहना है कि मस्जिदें इन हमलों का केंद्र बनती हैं। अगर अल-मतीन मस्जिद बड़ी हुई तो ये ताकत और बढ़ेगी। एक बुजुर्ग ने कहा, “हमें हर दिन डर में जीना पड़ेगा। मस्जिद जितनी बड़ी होगी, हमारा डर उतना बढ़ेगा।” यही वजह है कि लोगों ने अब पलायन को ही अपना भविष्य मान लिया है।

मकान पर लगे पोस्टर

हिंदू समुदाय मस्जिद निर्माण को एक ‘मोडस ऑपरेंडी’ मानता है। उनका कहना है कि पहले मस्जिद बनती है, फिर माहौल बदलता है, और हिंदू पलायन को मजबूर हो जाते हैं। 2020 के बाद से ब्रह्मपुरी में यह ट्रेंड देखने को मिला है। विनोद नाम की स्थानीय महिला ने कहा, “पहले भी दिक्कतें होती थी, लेकिन बात इतनी नहीं बढ़ती थी। लेकिन दंगों के बाद सब बदल गया। अब मस्जिद का विस्तार देखकर लगता है कि हमें यहाँ से पूरी तरह से भगाने की तैयारी है।”

ब्रह्मपुरी में हिंदुओं को लगता है कि मुस्लिम पहले फ्लैट खरीदते हैं, फिर घर लेते हैं, मस्जिद बनाते हैं और इलाके पर कब्जा कर लेते हैं। 2018 का तनाव और 2020 का हमला इसके सबूत हैं। अब मस्जिद के विस्तार से डर और बढ़ गया है। पुलिस अभी शांति बनाए है, लेकिन हिंदुओं को भरोसा नहीं। अजय कहता है, “मस्जिद बड़ी हुई तो हमारा जीना हराम हो जाएगा।” ये कहानी सिर्फ मस्जिद की नहीं, बल्कि हिंदुओं के डर और मुस्लिमों की बढ़ती ताकत की है। आगे क्या होगा, ये वक्त बताएगा।

Ground Report 1: मस्जिद को बढ़ाना, शिव मंदिर के सामने उसका गेट खोलना… दिल्ली सीलमपुर (ब्रह्मपुरी) की इसी अल-मतीन मस्जिद से 2020 हिंदू-विरोधी दंगों में चली थी गोलियाँ: समझिए हिंदू क्यों लगा रहे ‘मकान बिकाऊ’ के पोस्टर

Ground Report 2: ब्रह्मपुरी की अल मतीन मस्जिद भी धोखे से बनी, अब मंदिर के सामने गेट खोलने की कोशिश: MCD का बोर्ड लगा मामले को दबाने की कोशिश, आखिर क्यों मस्जिद को बड़ा करने की जिद?

‘शिव-दुर्गा को छोड़ो… यीशु को पूजो, नौकरी-एडमिशन सब मिलेगा’ : बिहार के गाँव में पादरी गरीबों का यूँ करता है ब्रेनवॉश, दावा- ‘धर्मांतरण केंद्र’ के लिए हिन्दू विधवा की जमीन कब्जाने में जुटा

बिहार के बक्सर में एक पादरी ने हिन्दू विधवा की जमीन कब्जाने की कोशिश की। उसकी जमीन पर वह ईसाई धर्म के लिए प्रार्थना करवाता था। पादरी धर्मांतरण का बड़ा रैकेट चला रहा था। लोगों से हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा बंद करके यीशु मसीह की प्रार्थना करने को कहता था।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के सीवान के एक गाँव में एक पादरी सुनील कुमार 2014 से धर्मांतरण का रैकेट चला रहा था। पादरी एक मकान में किराए का कमरा लेकर रविवार को प्रार्थनाएँ करवाता था। इस प्रार्थना में 100-100 लोग शामिल होते थे।

इस प्रार्थना में ज्यादातर महिलाएँ होती थीं। जब उसे उस मकान से भगाया गया जहाँ वह प्रार्थना करवाता था तो उसने एक झोपड़ी डाल कर यही काम करने लगा। इसके बाद उसने यहीं की एक गरीब हिन्दू महिला का फायदा उठाया। उसने महिला की आवश्यकता के दौरान ₹2 लाख लिए और उसका घर अपने धर्मांतरण रैकेट के लिए इस्तेमाल करने लगा।

पादरी ने हिन्दू महिला पर लगातार दबाव बनाया कि वह प्रार्थना में शामिल हो। जब हिन्दू महिला उससे प्रार्थना करवाने का विरोध करती तो वह अपने पैसे वापस माँगता था। महिला ने आरोप लगाया है कि पादरी सुनील उनके घर पर कब्जा करके इसे धर्मांतरण का केंद्र बनाना चाहता था।

यहाँ आने वाली महिलाएँ हिन्दू महिला से धर्मांतरित होने को कहती थीं। यहाँ तक कि वह और लोगों को ईसाई प्रार्थना में शामिल करने का दबाव बनाता था। दैनिक भास्कर से एक व्यक्ति ने बताया कि सुनील गाँव की महिलाओं को निशाना बनाता था और उनसे कहता था कि वह देवी-देवता पूजा करना बंद दें।

पादरी सुनील कुमार उनको ऑफर देता था कि वह यीशु की प्रार्थना करेंगे तो उनको नौकरी और कॉलेज आदि में एडमिशन देंगे। रिपोर्ट में बताया गया है कि सुनील कुमार ने यहाँ कई हरिजन महिलाओं का धर्मांतरण भी करवा दिया है। यहाँ महिलाओं ने कागजों पर अपना धर्म नहीं बदला लेकिन वह अब हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा नहीं करती।

यही पादरी सुनील कुमार धर्मांतरण के साथ ही हिन्दू महिलाओं को ठगता भी है। हिन्दू महिलाओं को वह नौकरी और पैसे का लालच देकर उन्हें ठगता भी है। पादरी सुनील कुमार पहले क्रिश्चियन स्कूल में भी पढ़ा चुका है। वह लोगों के रोग ठीक करने का भी दावा करता है। कुछ महिलाओं का उसने ब्रेनवॉश भी कर दिया है।

वह कहता है कि हिन्दुओं की समस्याएँ दुर्गा-शिव नहीं खत्म करेंगे बल्कि यह यीशु की आराधना से खत्म होंगी। उसका हाल ही में बजरंग दल वालों ने विरोध किया था। तब से वह गायब है। अभी तक उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है लेकिन ग्रामीण उससे गुस्सा हैं।

ब्रह्मपुरी की अल मतीन मस्जिद भी धोखे से बनी, अब मंदिर के सामने गेट खोलने की कोशिश: MCD का बोर्ड लगा मामले को दबाने की कोशिश, आखिर क्यों मस्जिद को बड़ा करने की जिद?

दिल्ली के ब्रह्मपुरी इलाके में अल-मतीन मस्जिद को लेकर फिर से हंगामा मचा हुआ है। ये मस्जिद पहले से ही गली नंबर-13 में थी, लेकिन अब इसे गली नंबर-12 में बढ़ाने की कोशिश हो रही है। खास बात ये है कि नया गेट ठीक सामने बने शिव मंदिर के पास खोलने की बात है। लोग कह रहे हैं कि ये मस्जिद धोखे से बनी थी और अब इसे और बड़ा करने की जिद साजिश का हिस्सा है। MCD ने निर्माण पर रोक लगा दी है, लेकिन उसका बोर्ड लगाकर मामले को दबाने की कोशिश भी दिख रही है। हिंदू डरे हुए हैं, क्योंकि 2020 के दंगों में इसी मस्जिद से गोलियाँ चली थीं। दूसरी तरफ, मुस्लिम कह रहे हैं कि शांति होने पर वो मस्जिद बना लेंगे। तो आखिर पूरा मामला क्या है? चलिए, इसे आसान भाषा में समझते हैं।

मस्जिद की शुरुआत: फ्लैट से मस्जिद तक का सफर

ब्रह्मपुरी की अल-मतीन मस्जिद की कहानी 2013 से शुरू होती है। यहाँ रहने वाले पंडित लाल शंकर गौतम बताते हैं, “2013 में कुछ मुस्लिम लोगों ने गली नंबर-13 में एक फ्लैट खरीदा था। पहले वहाँ नमाज पढ़ने लगे, किसी को दिक्कत नहीं हुई। लेकिन धीरे-धीरे उस फ्लैट को मस्जिद में बदल दिया गया।” गौतम कहते हैं कि पहले ये सिर्फ एक आम घर था, लेकिन बाद में इसे चार मंजिल की मस्जिद बना दिया गया। उनका मानना है कि ये सब सोच-समझकर किया गया, ताकि इलाके में मुस्लिमों की पकड़ मजबूत हो। शुरू में किसी को शक नहीं हुआ, लेकिन 2020 के दंगों के बाद लोगों की आँखें खुल गईं।

मस्जिद का विस्तार: साजिश या जरूरत?

साल 2020 के बाद मस्जिद को बड़ा करने की कोशिश शुरू हुई। 2023 में मस्जिद वालों ने गली नंबर-12 में इसके बगल का एक प्लॉट खरीदा। ये प्लॉट पहले एक हिंदू परिवार का था। गौतम कहते हैं, “पहले उस घर को खरीदा, फिर तोड़ दिया और वहाँ मस्जिद का हिस्सा बनाने लगे। ये सब बहुत सोच-समझकर हुआ।”

ब्रह्मपुली अल मतीन मस्जिद और विस्तार कार्य की मौजूदा स्थिति

योजना थी कि मस्जिद का नया गेट गली नंबर-12 में खोला जाए, जो ठीक सामने 1984 से बने शिव मंदिर के पास पड़ता है। हिंदुओं को ये बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। गली नंबर-12 में करीब 60 हिंदू परिवार रहते हैं। इनमें से 25-30 परिवारों ने अपने घरों पर ‘मकान बिकाऊ’ के पोस्टर लगा दिए। उसी गली में रहने वाले एक युवक सोनू (नाम बदला हुआ) ने कहा, “मंदिर यहाँ बहुत पुराना है। हर सोमवार को पूजा होती है, होली पर होलिका दहन होता है। अगर मस्जिद का गेट सामने खुला तो रोज झगड़ा होगा। हम 2020 जैसा कुछ नहीं चाहते।”

हिंदुओं को डर है कि मस्जिद बड़ी हुई तो भीड़ बढ़ेगी और उनके लिए खतरा और ज्यादा हो जाएगा। गौतम का कहना है, “2020 में जो हुआ, वो हम भूल नहीं सकते। अगर मस्जिद दो गुनी बड़ी हो गई तो सोचो, कितने लोग यहाँ जमा होंगे। ये हमारे लिए खतरे की घंटी है।” दूसरी तरफ, मस्जिद के नायब ईमाम सद्दाम हुसैन कहते हैं, “हमारी आबादी बढ़ रही है। मस्जिद छोटी पड़ गई थी। इसमें गलत क्या है? हम शांति से रहना चाहते हैं।”

हिंदू विरोधी दंगा डर की बड़ी वजह

साल 2020 में फरवरी के महीने में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में जो दंगे हुए, वो ब्रह्मपुरी के लोगों के लिए आज भी एक डरावना सपना हैं। उस वक्त सीलमपुर, जाफराबाद और ब्रह्मपुरी में खूब हिंसा हुई। 53 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। इस दौरान अल-मतीन मस्जिद का नाम खास तौर पर सामने आया।

शंकर लाल गौतम बताते हैं, “25 फरवरी को मस्जिद से गोलियाँ चली थीं। वहाँ हजारों लोग अचानक जमा हो गए। कहा गया कि मस्जिद में आग लगाई गई, जो झूठ था। इसके बाद गली नंबर-13 में गोलीबारी हुई, जिसमें तीन हिंदू लड़के घायल हुए।” उस घटना के बाद से हिंदुओं में डर बैठ गया। लोगों को लगने लगा कि मस्जिद यहाँ सिर्फ इबादत के लिए नहीं, बल्कि कुछ और मकसद से बनाई गई है। दंगों के बाद कई हिंदू परिवार यहाँ से चले गए और अपने घर बेच दिए।

मस्जिद का काम कई बार रुका, अब MCD पर लग रहे आरोप

इस मस्जिद के विस्तार का मामला 2023 से चल रहा है। पहले जब काम शुरू हुआ तो लोगों ने पुलिस में शिकायत की और निर्माण रुक गया। फिर मस्जिद वालों ने 23 नवंबर, 2024 को MCD से परमिशन ली। इसके बाद फरवरी 2025 में काम दोबारा शुरू हुआ। लेकिन 13 फरवरी, 2025 को उत्तर-पूर्वी जिला पुलिस को फिर शिकायत मिली। पुलिस ने जाँच की तो पता चला कि मस्जिद का नक्शा गलत तरीके से पास कराया गया था। MCD ने फौरन काम रोक दिया और मस्जिद वालों को नोटिस भेजा। अभी तक निर्माण करीब एक महीने से बंद है। 3 मार्च को इलाके में पथराव की खबर भी आई, लेकिन पुलिस को कोई सबूत नहीं मिला।

निर्माण कार्य से संबंधित बोर्ड मौके पर लगाए गए हैं-ये हिस्सा गली नंबर 12 में है, जहाँ गेट खोलने की तैयारी

हालाँकि, हिंदुओं को लगता है कि MCD मामले को दबाने की कोशिश कर रही है। शंकर लाल गौतम कहते हैं, “अभी बोर्ड लगा है कि एमसीडी की अनुमति से निर्माण कार्य चल रहा है, जबकि उस पर रोक है। इसके बावजूद बोर्ड को हटाया नहीं गया। पहले तो गलत नक्शा पास किया, अब दिखावा कर रहे हैं।” उनका मानना है कि ये सब ऊपरी दबाव में हो रहा है।

मुस्लिमों को भरोसा, आगे जरूर पूरा होगा निर्माण कार्य

मस्जिद के लोग कहते हैं कि वो हार नहीं मानेंगे। नायब ईमाम सद्दाम हुसैन बताते हैं, “हमें भरोसा है कि मामला ठंडा होने के बाद ये निर्माण कार्य जरूर पूरा होगा। अभी पुलिस और MCD का दबाव है, लेकिन ये ज्यादा दिन नहीं चलेगा।” कुछ लोकल मुस्लिमों का कहना है कि वो इंतजार कर रहे हैं कि कब माहौल शांत हो। एक दुकानदार कहता है, “अभी सब चुप हैं, लेकिन मौका मिलते ही काम शुरू हो जाएगा। हमें अपनी मस्जिद चाहिए।” लेकिन हिंदुओं को ये बात और डरा रही है। उन्हें लगता है कि ये शांति सिर्फ ऊपरी है और बाद में कुछ बड़ा हो सकता है।

कम्युनिटी सेंटर का बहाना: सच या झूठ?

अब मस्जिद वाले कह रहे हैं कि वो गली नंबर-12 में मस्जिद नहीं, बल्कि कम्युनिटी सेंटर बना रहे थे। सद्दाम हुसैन का दावा है, “हम बच्चों की पढ़ाई के लिए जगह बनाना चाहते थे। स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर भी बुलाने की सोच थी। ये कोई साजिश नहीं है।” लेकिन हिंदुओं को ये बात हजम नहीं हो रही। गौतम कहते हैं, “ये सब बहाना है। पहले मस्जिद बनाने की बात थी, अब जब विरोध हुआ तो कहानी बदल दी।” कुछ लोकल मुस्लिम भी मानते हैं कि असल में मस्जिद ही बन रही थी। एक शख्स कहता है, “कम्युनिटी सेंटर की बात बस लोगों को चुप कराने के लिए है।”

दिल्ली विधानसभा चुनाव तक सबकुछ ठप, कोई खास प्लान?

इस मामले में एक सवाल ये भी उठता है कि दिल्ली में विधानसभा चुनाव की वोटिंग तक सब खामोश क्यों थे। कुछ लोगों को लगता है कि मस्जिद वालों को उम्मीद थी कि अरविंद केजरीवाल की सरकार फिर आएगी और उनके हक में फैसला होगा। शंकर लाल गौतम कहते हैं, “विधानसभा चुनाव की वोटिंग से पहले कोई हलचल नहीं थी। शायद उन्हें लगता था कि केजरीवाल की सरकार हमें दबा देगी। अब जब सत्ता बदली है, तो दबाव बढ़ गया।” हिंदुओं को शक है कि कम्युनिटी सेंटर की बात भी इसी दबाव की वजह से निकाली गई, ताकि विवाद थोड़ा ठंडा पड़े।

बता दें कि 2020 के दंगों के बाद से ब्रह्मपुरी में हिंदुओं का पलायन बढ़ गया है। गली नंबर-12 और 13 में पहले दोनों समुदाय साथ रहते थे, लेकिन अब ज्यादातर घर मुस्लिम खरीद रहे हैं। एक बुजुर्ग कहते हैं, “पहले यहाँ सब ठीक था। दंगों के बाद डर लगने लगा। अब मस्जिद का विस्तार देखकर लगता है कि हमें भगाने की तैयारी है।” लोग मानते हैं कि पहले मस्जिद बनती है, फिर माहौल बदलता है और हिंदू मजबूरी में चले जाते हैं। मुस्लिम कहते हैं, “हम अच्छे पैसे दे रहे हैं, इसलिए लोग बेच रहे हैं।” लेकिन हिंदुओं का कहना है कि ये डर की वजह से हो रहा है।

ब्रह्मपुरी का ये विवाद सिर्फ मस्जिद के बारे में नहीं है। ये डर, अविश्वास और पुराने जख्मों की कहानी है। हिंदुओं को लगता है कि मस्जिद के बहाने उन्हें भगाया जा रहा है। मुस्लिम कहते हैं कि उन्हें जगह चाहिए। MCD और पुलिस ने अभी शांति बनाई है, लेकिन लोग डरे हुए हैं कि ये कब तक चलेगा। क्या सचमुच कम्युनिटी सेंटर बन रहा था, या ये मस्जिद को बचाने का बहाना है? जवाब अभी साफ नहीं है, लेकिन ब्रह्मपुरी के लोग डर और उम्मीद के बीच जी रहे हैं।