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चीन पर अमेरिका की डिजिटल स्ट्राइक: ट्रम्प ने दी TikTok और वी-चैट पर पाबंदी के आदेश को मंज़ूरी

अमेरिका और चीन के बीच जारी खींचतान में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा कदम उठाया है। ट्रंप ने चीन की एप्लीकेशन टिक टॉक और वी चैट के मालिकों से किसी भी तरह का लेन-देन करने पर पाबंदी लगा दी है। कुछ ही दिन पहले ख़बर आ रही थी कि अमेरिकी टेक कंपनी टिक टॉक को खरीद सकती हैं। लेकिन अब ऐसा न होने की सूरत में अमेरिका ने टिक टॉक पर प्रतिबंध लगाने के लिए 15 सितंबर की सीमा तक तय कर दी है।    

अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर इस आदेश पर मुहर लगा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरूवार के दिन टिकटॉक और वी चैट पर पाबंदी लगाने के आदेश पर हस्ताक्षर किए। आदेश में यह बेहद साफ़ तौर लिखा है कि दोनों ही एप्लीकेशन को अमेरिका में 45 दिन के भीतर बंद कर दिया जाए। हाल ही में अमेरिकी सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए आदेश जारी किया था।  जिसके मुताबिक़ वह इस एप्लीकेशन का उपयोग नहीं कर सकते थे।   

एप्लीकेशन के आदेश पर आधिकारिक रूप से मुहर लगाने के बाद ट्रंप ने कहा कि यह पाबंदी बेहद ज़रूरी थी। टिकटॉक जैसे एप्लीकेशंस का भरोसा नहीं किया जा सकता है। यह एप्लीकेशन जिस तरह देश का डाटा (जानकारी) चुराते हैं उससे देश की आंतरिक सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता है। ट्रंप ने इस विषय पर बयान जारी करते हुए कई अहम बातें कहीं। ट्रंप ने कहा, “चीन के यह एप्लीकेशन अमेरिकी लोगों से संबंधित दो तरह की जानकारी चुराते हैं पहली निजी और दूसरी स्वामित्व से जुड़ी। इसके अलावा यह जानकारी चीन की कम्युनिष्ट पार्टी तक पहुँचाई जाती है।” 

इसके बाद ट्रंप ने कहा, “इसकी वजह से चीन की सरकार को अमेरिका के संघीय कर्मचारियों और संगठित – असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की जानकारी मिल जाती है। वह इस तरह की जानकारियों को ट्रैक कर सकते हैं। चीन की सत्ताधारी पार्टी इस तरह की निजी जानकारियों के आधार पर ब्लैकमेल करने का दस्तावेज़ तैयार कर सकती है। ऐसी जानकारियों का इस्तेमाल कॉर्पोरेट स्तर पर जासूसी के लिए भी किया जा सकता है।” 

हालाँकि, इस कार्रवाई पर फिलहाल टिकटॉक और वी चैट की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। इसके ठीक पहले अमेरिकी व‍िदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने बुधवार को कहा था कि वह अमेरिकी कार्रवाई को चीनी तकनीकी से निजी ऐप तक बढ़ा रहे हैं। उन्‍होंने इस मामले में टिकटॉक और वी चैट का ज़िक्र किया था। भारत में पहले ही सभी तरह के संदिग्‍ध ऐप पर प्रतिबंधित लगाया जा चुका है। 

हाल ही ऐसी ख़बरें आई थीं जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के साथ बढ़ते तनाव और जासूसी के आरोपों के बीच इसके संकेत दिए थे। इधर बाइटडांस (ByteDance) और माइक्रोसॉफ्ट के बीच सौदे को लेकर बातचीत चलने की बात हो रही थी। बाइटडांस टिकटॉक की पैरंट कंपनी है।

रिया पर पैसे के लिए दवाओं के ओवरडोज़ से सुशांत को ‘बीमार’ करने का आरोप: बिहार पुलिस ने SC में दायर की एफिडेविट

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत मौत के मामले में बिहार पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में केस सीबीआई को ट्रांसफर किए जाने के कारणों पर हलफनामा दायर किया है, जिसमें एक खुलासा किया गया है कि एक्ट्रेस रिया चक्रवर्ती सुशांत सिंह राजपूत को अपने घर ले जाकर उन्हें मानसिक रूप से बीमार करने की कोशिश किया करती थी। वह पिछले कई दिनों से लगातार सुशांत को दवाईयों की ओवरडोज दे रही थी।

इस हलफनामे (एफिडेविट) में बिहार पुलिस ने रिया चक्रवर्ती को लेकर एक और खुलासा करते हुए कहा है कि रिया और उसके घरवाले सुशांत के जीवन में पैसों के लालच से आए थे और रिया चक्रवर्ती उन्हें अपने घर ले जाकर दवाईयों की ओवरडोज दे रही थीं।

बिहार पुलिस के वरिष्ठ अधीक्षक ने सुप्रीम कोर्ट को दिए इस हलफनामे में बताया है कि रिया चक्रवर्ती, सुशांत को अपने घर ले गई थीं और वहीं उन्होंने सुशांत को दवाईयों के ओवरडोज देने शुरू कर दिए थे। बिहार पुलिस ने इन सबका सुशांत के पैसे हड़पने का एकमात्र मकसद बताया। दरअसल, ये आरोप असल में सुशांत के पिता केके सिंह ने रिया पर लगाए थे। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी कहा था कि रिया, सुशांत से झगड़ा कर उनका सारा सामान ले गई थीं।

सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या के मामले में सीबीआई ने रिया चक्रवर्ती और उनके भाई शोविक चक्रवर्ती के खिलाफ नई एफआईआर दर्ज की थी। बिहार पुलिस ने ये भी कहा है कि मुंबई पुलिस से किसी प्रकार की मदद ना मिलने के बावजूद उन्हें इस केस में कई चीजें मिली हैं, जिन पर जाँच की जा सकती है।

गौरतलब है कि सुशांत राजपूत की मौत मामले में जाँच करने मुंबई गई पटना पुलिस की टीम बीएमसी को चकमा देकर बृहस्पतिवार (अगस्त 06, 2020) को पटना पहुँच गई थी। आज सुबह मुंबई बिहार के आईपीएस अधिकारी विनय तिवारी को क्वारंटाइन से छोड़ दिया गया है। विनय तिवारी को उस समय क्वारंटाइन किया गया, जब वो सुशांत केस को लेकर मुंबई में जाँच कर रही बिहार पुलिस टीम का नेतृत्व करने के लिए पहुँचे थे।

बीएमसी ने उन्हें 14 दिनों के लिए क्वारंटाइन किया, जिसके बाद इस मामले में काफी हंगामा देखने को मिला था। बाद में बिहार सरकार ने सुशांत केस को लेकर सीबीआई जाँच की सिफारिश की, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया।

रिया चक्रवर्ती को आज ईडी के सामने पेश होना था। लेकिन रिया ने अनुरोध किया है कि उनके बयान की रिकॉर्डिंग को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तक के लिए टाल दिया जाए। लेकिन ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत से जुड़े एक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अपने बयान की रिकॉर्डिंग को स्थगित करने के लिए रिया चक्रवर्ती की याचिका को खारिज कर दिया है।

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट स्थापित: 14 राज्यों के 80 संत-महामंडलेश्वर जुड़े, आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए शुरू होगा हस्ताक्षर अभियान

अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर भूमिपूजन के साथ ही अब मथुरा में 14 राज्यों के 80 संतों के साथ श्रीकृष्ण जन्मभूमि निर्माण न्यास की स्थापना की गई है। अयोध्या के बाद अब मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए आंदोलन की रणनीति पर चर्चा जोरों पर है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रस्ट के प्रमुख आचार्य देवमुरारी बापू ने कहा, “हमने 23 जुलाई को ‘हरियाली तीज’ के अवसर पर पंजीकरण कराया और वृंदावन से 11 संत आए, जो ट्रस्ट का हिस्सा हैं।”

आचार्य ने आगे कहा कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि की आजादी के लिए अन्य संतों और साधुओं को जोड़ने के लिए जल्द ही एक हस्ताक्षर अभियान शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा, “हस्ताक्षर अभियान के बाद, हम इस मुद्दे पर एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे। हमने फरवरी में अभियान शुरू किया था, लेकिन हम लॉकडाउन के कारण आगे नहीं बढ़े।”

ट्रस्ट में वृंदावन के 11 पदाधिकारी नियुक्त किए गए हैं। इसके अलावा 14 राज्यों के 80 संत, महामंडलेश्वर को जोड़ा गया है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा कर दी गई है, जिसमें निर्णय लिया गया है कि ट्रस्ट में वृंदावन के संत और महंतों को जोड़ने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा। 

मथुरा में शाही ईदगाह है विवाद का विषय

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में मुख्य विवाद का विषय शाही ईदगाह है, जो मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के निकट स्थित है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि निर्माण न्यास पहले से ही मस्जिद के बगल में साढ़े चार एकड़ भूमि पर दावा कर रहा है और चाहता है कि इसे और मंदिर के अधिकारियों द्वारा आयोजित धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों के लिए ‘रंग मंच’ के रूप में इस्तेमाल किया जाए।

अयोध्या के बाद अब मथुरा और काशी

वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद से विश्व हिंदू परिषद (VHP) दावा करती रही है कि मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर को ‘स्वतंत्र’ करना उसके एजेंडे में है।

उल्लेखनीय है कि मथुरा के शाही ईदगाह को ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ के तहत संवैधानिक प्रोटेक्शन मिलता है। दिसंबर 6, 1992 को बाबरी विध्वंस के बाद धीरे-धीरे ‘अयोध्या तो एक झाँकी है, काशी-मथुरा बाकी है’ के नारे राजनीतिक परिदृश्यों के चलते काशी और मथुरा ठंडे बस्ते में चले गए थे।

लेकिन बहुमत के साथ सत्ता में आते ही अयोध्या श्रीराम मंदिर पर केंद्र सरकार ने तत्परता से काम किया है। हालाँकि, इस बारे में अभी बिल्कुल साफ-साफ कहना जल्दबाज़ी होगी कि बीजेपी, काशी और मथुरा के मुद्दों को अयोध्या की तरह प्राथमिकता देगी या नहीं।

विश्व हिंदू परिषद का कहना है कि मथुरा में ठीक मस्जिद के स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था और वह मस्जिद नहीं बल्कि हमारी ज़मीन है। विहिप ने कहा था – “वह मस्जिद है ही नहीं, वह हमारी ज़मीन है।” इस मंदिर परिसर के ठीक बाहर मथुरा का सबसे पुराना मंदिर है, जिसका नाम है केशव देव जी महाराज मंदिर!

ऐतिहासिक तथ्यों से पता चलता है कि जनवरी 1670 में रमजान के महीने में औरंगजेब ने मथुरा के एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया था। इस मंदिर का नाम केशव राय मंदिर था, जिसे ओरछा के राजा बीर सिंह बुंदेला ने उस दौर में 33 लाख रुपए में बनवाया था।

इतिहासकार डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल ने कटरा केशवदेव को ही श्रीकृष्ण जन्मभूमि माना है। विभिन्न अध्‍ययनों और साक्ष्यों के आधार पर मथुरा के राजनीतिक संग्रहालय के दूसरे कृष्णदत्त वाजपेयी ने भी स्वीकारा कि कटरा केशवदेव ही कृष्ण की असली जन्मभूमि है।

इति‍हासकारों के अनुसार, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा बनवाए गए इस भव्य मंदिर पर महमूद गजनवी ने सन 1017 में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया था।

मौत से 1 दिन पहले निर्माता-निर्देशक संग अगली फिल्म पर चर्चा कर रहे थे सुशांत, रिया की माँ, बाप और भाई पर भी FIR

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में सीबीआई ने जाँच शुरू कर दी है। रिया चक्रवर्ती को मुख्य अभियुक्त बनाया गया है। इसी बीच खुलासा हुआ है कि अपनी मौत से 1 दिन पहले सुशांत प्रोड्यूसर रमेश तौरानी और निर्देशक निखिल आडवाणी के साथ फोन कॉल पर अगले प्रोजेक्ट की कहानी पर विचार-विमर्श कर रहे थे।

सीबीआई ने रिया के अलावा उनके पिता इंद्रजीत चकवर्ती, मॉं संध्या चक्रवारी और भाई सोविक चक्रवर्ती के खिलाफ भी FIR दर्ज की है। सुशांत के पूर्व मैनेजर सैमुअल मिरांडा का भी इस FIR में नाम है। उसे भी रिया ने ही हायर किया था। रिया की पूर्व मैनजर श्रुति मोदी के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज किया गया है।

‘टाइम्स नाउ’ की ख़बर के अनुसार, अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत क़रीब 15-20 मिनट तक निर्माता और निर्देशक के साथ व्हाट्सप्प कॉल पर थे। तौरानी ने भी स्वीकार किया है कि उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत की तरफ एक स्क्रिप्ट बढ़ाई थी, जिस पर चर्चा चल रही थी। कहा जा रहा है कि निखिल आडवाणी ने उन्हें एक स्क्रिप्ट का आइडिया दिया था और तब उनकी दिमागी हालत सामान्य दिख रही थी।

सुशांत सिंह राजपूत ने न सिर्फ़ स्क्रिप्ट को ध्यान से सुना बल्कि वो बीच-बीच में सवाल भी पूछ रहे थे, जिनके जवाब निर्देशक ने दिए। ये भी कहा जा रहा है कि सुशांत सिंह राजपूत ने इस बातचीत को लेकर संतुष्टि जताई थी। उनके कॉल रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि 12 मिनट के भीतर उन्होंने 5 लोगों से बातचीत की थी। वो अपने टैलेंट मैनेजर गौरी के साथ 368 सेकंड तक कॉल पर थे। इससे कई सवाल उठ रहे हैं।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मामला CBI के पास पहुँचने के बाद अब रिया चक्रवर्ती की कॉल डिटेल्स का खुलासा हुआ है। इन कॉल डिटेल्स से पता चला है कि रिया चक्रवर्ती कैसे सुशांत को उनके परिवार से दूर करने की कोशिश करती थी और कैसे उनके जीवन से जुड़े फैसले खुद लेती थी। रिया ने सुशांत को 20 से 24 जनवरी के बीच 25 कॉल किए थे, क्योंकि वह इस बीच अपनी बहन रानी से मिलने चले गए थे। रिया ऐसा नहीं चाहती थी।

ख़बरों के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सुशांत सिंह राजपूत के 4 बैंक अकॉउंट मिले हैं। सूत्रों ने बताया कि सुशांत सिंह राजपूत के दो खातों कोटक बैंक और एचडीएफसी बैंक के खाते से रिया चक्रवर्ती को रुपए ट्रांसफर किए गए थे। ये भी खुलासा हुआ है कि सुशांत ने कार के लिए भी लोन लिया था। प्रवर्तन निदेशालय को मुंबई की प्राइम लोकेशन में रिया चक्रवर्ती और उसके परिवार की 2 संपत्तियों का पता चला है, जो हाल ही में खरीदी गई थी।

चीन से $1 अरब का कर्ज लेकर सऊदी अरब का $1 बिलियन लोन चुकाएगा पाकिस्तान

पाकिस्तान ने करीब डेढ़ साल पहले सऊदी अरब से अरबों रुपयों का लोन लिया था। पाकिस्तान को यह लोन कुछ तय शर्तों व ब्याज दरों के साथ निश्चित समय के लिए मिला था। चरमराई आर्थिक स्थिति के कारण पाकिस्तान इसे लौटाने में अक्षम था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली छीछालेदर से खुद को बचाने के लिए उसने चीन से ऋण लेकर सऊदी अरब को देने का फैसला किया है।

पाकिस्तान की फाइनेंस मिनिस्ट्री और स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने इस बात का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि सऊदी अरब का बकाया चुकाने के लिए पाकिस्तान ने चीन से $1बिलियन डॉलर का लोन लिया है।

डेलीटाइम्स की रिपोर्ट् के मुताबिक सऊदी अरब ने साल 2018 में पाकिस्तान को $3 बिलियन का ऋण नकद सहायता के रूप में और $3.2बिलियन का लोन सालाना तेल व गैस सप्लाई जैसी अन्य सुविधाएँ मुहैया कराने के रूप में दिया था। कुल मिलाकर ये ऋण $6.2 बिलियन का था।

समझौते के अनुसार, सऊदी ने पाकिस्तान को यह कैश और तेल की सुविधा एक साल के लिए दी थी। वो भी इस शर्त के साथ कि वह या तो या तो साल के अंत तक सारा बकाया चुका दें या फिर वह उसे आगे 3 साल तक के लिए आगे बढ़ा दें।

अब चूँकि पाकिस्तान को $3 बिलियन सहायता के बदले 3.2 प्रतिशत का ब्याज देना पड़ रहा था, तो उन्होंने बिना अवधि बढ़ाए इसे पहले ही वापस कर दिया।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि पाकिस्तान को इस सहायता की पहली किश्त यानी $1बिलियन नवंबर 2018 में मिले। फिर $1 बिलियन की दूसरी किश्त 2018 के दिसंबर में मिली और तीसरी किश्त जनवरी 2019 में मिली थी।

गौरतलब है कि संयुक्त अरब अमीरात के प्रिंस जायद-अल-नाहियान कुछ समय पहले पाकिस्तान के दौरे पर गए थे। उसी समय इस ऋण को लेकर होने वाली घोषणा के कयास लगाए गए थे। इस बीच पाक अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से भी 8 अरब डॉलर की कर्ज सहायता के लिए बातचीत कर रहा था और इमरान खान स्वयं भी सऊदी दो बार जाकर उनसे $6.2 बिलियन का ऋण माँग कर चुके थे।

बता दें, इस खबर के अलावा पाकिस्तान और सऊदी अरब के आपसी संबंधों को लेकर एक अन्य बड़ी खबर आई है। दरअसल, कश्मीर मुद्दे में अरब का समर्थन न पाकर विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने एक न्यूज चैनल पर इस्लामिक सहयोग संगठन को धमकी दी है।

पाक विदेश मंत्री कुरैशी ने सऊदी अरब के नेतृत्‍व वाले इस्लामिक सहयोग संगठन यानी ओआईसी को कहा कि वह कश्‍मीर पर अपने विदेश मंत्रियों की परिषद की बैठक बुलाने में देरी करना बंद करे।

पाकिस्‍तान के एक लोकल न्‍यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में विदेश मंत्री कुरैशी ने कहा, “मैं एक बार फिर से पूरे सम्‍मान के साथ इस्लामिक सहयोग संगठन से कहना चाहता हूँ कि विदेश मंत्रियों की परिषद की बैठक हमारी अपेक्षा है। अगर आप इसे बुला नहीं सकते हैं तो मैं प्रधानमंत्री इमरान खान से यह कहने के लिए बाध्‍य हो जाऊँगा कि वह ऐसे इस्‍लामिक देशों की बैठक बुलाएँ, जो कश्‍मीर के मुद्दे पर हमारे साथ खड़े होने के लिए तैयार हैं और जो दबाए गए कश्मिरियों का साथ देते हैं।”

टीवी कार्यक्रम में कुरैशी ने कहा कि अगर ओआईसी विदेश मंत्रियों की परिषद की बैठक को बुलाने में विफल रहता है, तो पाकिस्तान ओआईसी के बाहर एक सत्र के लिए जाने को तैयार होगा। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अब और इंतजार नहीं कर सकता।

बता दें कि 57 मुस्लिम देशों के संगठन इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के विदेश मंत्रियों की बैठक बुलाने के लिए लगातार दबाव डाल रहा है। संयुक्‍त राष्‍ट्र के बाद ओआईसी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा संगठन है।

हिंदुओं के लिए वही घृणा, राम मंदिर पर वही जहर: अयोध्या में नींव से बिलबिलाए वामपंथी और मजहब परस्त

अयोध्या में राम मंदिर को लेकर सैकड़ों साल से चल रहे विवाद का न्यायपूर्ण तरीके से पटाक्षेप हुआ था। 5 अगस्त को अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन हुआ। लेकिन, अपने आराध्य रामलला की छत मिलने का जश्न मना रहे हिन्दुओं को देख कर वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथियों के गठजोड़ ने जहर उगलना शुरू कर दिया है।

ये वही लोग थे जो कभी कहते थे कि सुप्रीम कोर्ट सर्वोपरि है और वो उसका फैसला तहेदिल से मानेंगे। अब वही कट्टरपंथी क़ानून, सरकार और जनभावनाओं- तीनों के विपरीत जाकर अपना असली चेहरा दिखा रहे हैं।

सबसे पहले चर्चा करते हैं ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद साजिद रशीदी के बयान की, जिन्होंने धमकाया है कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को तोड़ा जा सकता है। उन्होंने इस्लाम के हवाले से कहा कि एक मस्जिद हमेशा मस्जिद ही रहेगी और उसे तोड़ा नहीं जा सकता है। उन्होंने कहा कि मस्जिद को ध्वस्त कर मंदिर बनाया गया, अब मंदिर ध्वस्त कर मस्जिद फिर से बनेगा।

इसी तरह ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बयान को देखिए। उसने कहा कि बाबरी मस्जिद हमेशा थी और रहेगी। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ही विरोध कर दिया और इसे बहुसंख्यक तुष्टिकरण का नाम देकर दमनकारी, अन्यायपूर्ण और शर्मनाक बताया। उसने इसके लिए तुर्की के हागिया सोफिया का उदाहरण दिया, जो पहले एक चर्च हुआ करता था, लेकिन उसे हाल ही में मस्जिद में तब्दील कर दिया गया।

इसी तरह उत्तर प्रदेश की संभल लोकसभा सीट से सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने कहा है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद थी, है और हमेशा रहेगी। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि पीएम मोदी ने ताकत के बलबूते संग-ए-बुनियाद (आधारशिला) रखी और सुप्रीम कोर्ट से अपने पक्ष में फैसला करा लिया। उन्होंने इसे जम्हूरियत का क़त्ल करार दिया और ये भी नहीं देखा कि वे जो कर रहे हैं, उसकी बुनियाद क्या है। 

इन तीनों के बयानों से साफ़ झलकता है कि इनके लिए क़ानून वही है, जो इनका इस्लाम कहता है। इनके लिए आदर्श वही है, जैसा कट्टर इस्लामी मुल्कों में होता है। आज़ादी के बाद से ही अल्पसंख्यकों के लिए दसियों योजनाओं से लेकर हज यात्रा तक की व्यवस्था की गई, लेकिन इतिहास में हुई एक गलती को क्या सुधारा गया, इनका देश की न्यायपालिका और विधायिका तो दूर, देश से ही भरोसा उठ गया।

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के बयानों को ही देख लीजिए। हर मंच पर भारत और इसके संविधान के प्रति आस्था जताने वाला ये व्यक्ति अब कहता है कि बाबरी था, है और रहेगा। बाबरी मस्जिद की तस्वीरें शेयर कर ‘इंशाअल्लाह’ लिखने वाले ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियाँ उड़ा दी। अगर सैकड़ों साल चले न्यायपूर्ण प्रक्रिया पर इन्हें भरोसा नहीं है तो फिर फैसला मक्का और मदीना में बैठे लोग करेंगे?

इस्लामी कट्टरपंथियों और तुष्टिकरण का खेल रच रहे नेताओं की ये कोशिश रहती है कि वो हिन्दुओं को ज्यादा से ज्यादा विभाजित कर सकें ताकि राम और रामायण के प्रति श्रद्धा रखने वालों की संख्या कम हो। यही कारण है कि गुलाम नबी आज़ाद संसद में ‘हिन्दुओं और दलितों’ को अलग-अलग बोल कर दोनों को अलग दिखाते हैं। फिर मॉब लिंचिंग के नैरेटिव में दोनों को पीड़ित दिखाया जाता है।

लेकिन, दलित हितों के लिए ज़मीन पर लड़ने संगठनों को ये सच्चाई पता है। तभी तो दलित पॉजिटिव मूवमेंट नामक संगठन ने गृह मंत्रालय और समाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय के समक्ष AIMPLB के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हुए कहा है कि संस्था ने हिन्दू दलितों के आराध्य भगवान श्रीराम के बारे में गलतबयानी कर के भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया गया है।

देश के कोने-कोने से लोकतान्त्रिक तरीके से साफ़ किए जा रहे हिंसक वामपंथियों के नेता भी आजकल सुप्रीम कोर्ट के जजों और केंद्र में बैठी सरकार से ज्यादा संविधान विशेषज्ञ बन कर बैठे हुए हैं। सीताराम येचुरी ने तो राम मंदिर भूमिपूजन को ही संविधान के विरुद्ध बता दिया। साथ ही उन्होंने दूरदर्शन द्वारा इसके लाइव टेलीकास्ट पर भी विरोध जताया। उन्होंने इसे राजनीतिक और शर्मनाक बता दिया।

सीताराम येचुरी सहित सभी वामपंथियों को जानना चाहिए कि दूरदर्शन को इस कार्यक्रम के प्रसारण से काफी फायदा हुआ है, क्योंकि भारत ही नहीं बल्कि पश्चिमी देशों से लेकर पाकिस्तान तक में इसे लाइव देखा गया। 200 से भी अधिक टीवी चैनलों में भारत में इसे दिखाया। क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सिर्फ इसीलिए पलट दिया जाए, क्योंकि किसी ने किसी मजहब की किताब में कुछ और लिखा है?

असल में ये सब एक चाल के तहत किया जाता है। सीएए से भले ही कोई नुकसान न हो लेकिन इसके विरुद्ध लोगों को भड़का कर सरकार को इतना डरा दो कि वो एनआरसी लेकर आए ही नहीं। इसी तरह राम मंदिर को लेकर इतना हंगामा मचा दो कि अब हिन्दू मथुरा और काशी में इस्लामी आक्रांताओं द्वारा हुए अतिक्रमण पर कुछ बोले ही नहीं। शायद इन्हें पता नहीं कि इनके गीदड़-भभकी के दिन अब लद गए हैं।

वहीं सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद पक्ष के वकील रहे जफरयाब जिलानी का कहना है कि खास समुदाय वाले नहीं मानते कि अयोध्या में राम मंदिर था और सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि वहाँ मस्जिद थी जिसे गिराना आपराधिक कृत्य था। उनका कहना है कि इसके बावजूद फैसला हिन्दुओं के पक्ष में सुना दिया गया। यही टीवी चैनल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बातें करते थे। अब क्या हुआ?

असल में इन लोगों का इतिहास ही 16वीं शताब्दी से शुरू होता है। उससे पहले क्या था, इससे किसी को मतलब नहीं है। लेकिन दिसंबर 1992 से पहले वहाँ क्या था, इसका रट्टा उन्हें रोज मारना है। इनके इतिहास में गुरु नानक की अयोध्या यात्रा, वहाँ से मिले हिन्दू प्रतीक चिह्न, रामायण में दिया गया भूगोल, रामचरितमानस में सरयू की महिमा और भारत के सांस्कृतिक इतिहास का कथन- इन सबसे कुछ मतलब है ही नहीं।

इस मामले में कॉन्ग्रेस पार्टी अबकी कुछ अलग रुख अपना रही है। मध्य प्रदेश में जहाँ पूर्ण सीएम दिग्विजय सिंह अशुभ मुहूर्त का हवाला देकर हर एक बुरी घटना को राम मंदिर से ही जोड़ रहे हैं, वहीं एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भूमिपूजन का स्वागत करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ आयोजित करवाया।

प्रियंका गाँधी अपने बयान में राम और रामायण का गुणगान करते नहीं थक रही हैं तो राहुल गाँधी भी अब राम-राम जप रहे हैं। अब पार्टी के भीतर इसका विरोध शुरू हो गया है। शायद कॉन्ग्रेस को ये पता नहीं है कि दिखावे की आस्था और सचमुच की श्रद्धा में बहुत फ़र्क़ होता है और जनता इसे बखूबी समझती है।

अंत में ये याद रखने की ज़रूरत है कि जो सचमुच राम मंदिर के लिए लड़े थे, उन्होंने अपना कार्य पूर्ण किया। जिन्होंने हमेशा राम के अस्तित्व को नकारते हुए हिन्दुओं की भावनाओं का मजाक उड़ाया, आज उन्हें भी राम-राम करने को मजबूर होना पड़ रहा है।

रिया चकवर्ती समेत 6 पर CBI ने दर्ज किया मामला: सुशांत को मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती कराने की बनाई थी योजना

सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मामला CBI के पास पहुँचने के बाद अब रिया चक्रवर्ती की कॉल डिटेल्स का खुलासा हुआ है। इन कॉल डिटेल्स से पता चला है कि रिया चक्रवर्ती कैसे सुशांत को उनके परिवार से दूर करने की कोशिश करती थी और कैसे उनके जीवन से जुड़े फैसले खुद लेती थी।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक रिया ने सुशांत को 20 से 24 जनवरी के बीच 25 कॉल किए थे, क्योंकि वह इस बीच अपनी बहन रानी से मिलने चले गए थे। रिया ऐसा नहीं चाहती थी।

सुशांत ने पिछले साल नवंबर में अपनी बहन से मदद माँगने के लिए उसे कॉल भी की थी। तीनों बहनें और सुशांत उस समय चंडीगढ़ जाने को तैयार थे। चारों की टिकट भी बुक हो गई थी। लेकिन उस समय रिया ने सुशांत पर दबाव बनाकर उन्हें उनकी बहनों के साथ जाने से रोक लिया।

बाद में तंग आकर दिसंबर 2019 में सुशांत को अपना नंबर बदलना पड़ा। सुशांत ने अपने नए नंबर से अपनी बहन को दिसंबर में फिर कॉल किया। उन्होंने बताया कि रिया और उसका परिवार उन पर मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती होने के लिए दबाव डाल रहा है। लेकिन वह वहाँ नहीं जाना चाहते। उन्होंने यह भी कहा कि वह मुंबई छोड़कर हिमाचल प्रदेश में कहीं जाना चाहते हैं।

इसके बाद सुशांत एक दिन अपनी गाड़ी ड्राइव कर मुंबई से पंचकुला अपनी बहन रानी के पास चले गए। बहन के साथ सुशांत 20 से 24 जनवरी 2020 तक रहे। उन्होंने गाड़ी से यात्रा इसलिए की क्योंकि उन्हें गलत दवाई लेने की वजह से घुटन महसूस हो रही थी। वहाँ वे दो दिनों तक रहे और उनकी हालत में थोड़ा सुधार भी आया।

सिद्धार्थ पिठानी ने इस बीच रिया को सुशांत के चंडीगढ़ जाने के बारे में बता दिया। रिया ने फिर लगातार सुशांत को 25 कॉल किए और उन्हें धमकी देकर वापस बुलाया। इसके बाद सुशांत 24-25 जनवरी को मुंबई लौट आए।

CBI ने SIT का गठन करके 6 के ख़िलाफ़ किया मामला दर्ज

गौरतलब है कि सुशांत सिंह की मृत्यु का मामला धीरे धीरे कई राज से पर्दा उठा रहा है। रिया चक्रवर्ती, जिन्हें लेकर सुशांत के पिता ने अपनी शिकायत दर्ज करवाई है। उन पर शिकंजा कसता जा रहा है। सीबीआई ने भी इस मामले की जाँच मिलने के बाद अपनी कार्रवाई शुरू कर दी है।

सीबीआई ने इसके लिए स्पेशल टीम का गठन भी किया है। इस टीम में आईपीएस मनोज शशिधर, डीआईजी गगनदीप गंभीर और एसपी नुपूर प्रसाद शामिल हैं। ताजा अपडेट के अनुसार इस मामले में जाँच एजेंसी 6 आरोपितों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कर चुकी है। उनका कहना है कि वह लगातार इस केस को लेकर बिहार पुलिस के संपर्क में हैं।

जॉंच एजेंसी ने जिनके खिलाफ मामला दर्ज किया है उनमें रिया चकवर्ती, इंद्रजीत चकवर्ती, संध्या चकवर्ती, सौविक चकवर्ती, सैम्युल मिरांडा, श्रुति मोदी शामिल हैं।

बता दें, कि सीबीआई के अलावा इस मामले में अब ईडी भी सुंशांत के पैसों को लेकर हुई हेर-फेर की जाँच करने में जुटी है। सुशांत के पिता का आरोप है कि उनके बेटे के अकाउंट से ऐसे अकाउंट में पैसे ट्रांसफर हुए जो उसका था ही नहीं।

CM विजयन के साथ मेरा ‘कैजुअल’ रिलेशन: केरल सोना तस्करी में स्वप्ना सुरेश ने NIA के सामने कबूला

केरल में सोना तस्करी मामले की जाँच NIA ने अपने हाथों में ले रखी है। इस मामले में आरोपित स्वप्ना सुरेश ने स्वीकार किया है कि केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के साथ उनके ‘कैजुअल रिलेशन्स’ हैं। दोनों की साथ में कई तस्वीरें वायरल होने के बाद से ही ये सवाल उठ रहे थे।

इस मामले में कोच्चि स्थित NIA कोर्ट में सुनवाई चल रही है, जहाँ जाँच एजेंसी ने स्वप्ना सुरेश की जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि केरल के मुख्यमंत्री विजयन के मुख्य सचिव रहे एम शिवशंकर ने ही स्वप्ना सुरेश को बढ़ावा दिया था। अब इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार (अगस्त 10, 2020) को होगी। स्वप्ना सुरेश पहले तिरुवनंतपुरम में UAE की काउंसलेट के रूप में कार्यरत थी।

5 जुलाई को तिरुवनंतपुरम इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 30 किलो सोने की खेप जब्त की गई थी, जिसे डिप्लोमेटिक बैगेज के अंदर डाल कर तस्करी के लिए ले जाया जा रहा था। NIA ने बताया है कि इसके बाद स्वप्ना सीधा एम शिवशंकर के फ्लैट पर पहुँची थी और इस मामले में हस्तक्षेप करने को कहा था। हालाँकि, उस समय उन्होंने कोई मदद नहीं की। NIA की तरफ से असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल पी विजय कुमार ने दलीलें पेश की।

उन्होंने स्वप्ना के बयान के हवाले से बताया कि वो कभी-कभी शिवशंकर से सलाह-मशविरा करती रहती थी। साथ ही उसके 31 पेज के बयान में मुख्यमंत्री विजयन के साथ ‘कैजुअल सम्बन्ध’ होने की बात भी स्वीकार की है। हालाँकि, स्वप्ना के वकील का कहना है कि उनके क्लाइंट ने ये कभी कबूल नहीं किया है कि मुख़्यमंत्री कार्यालय में वो प्रभाव रखती थी। उन्होंने कहा कि NIA कह रही है कि स्वप्ना सीएम को जानती थी, लेकिन इससे कुछ भी साबित नहीं होता।

स्वप्ना सुरेश के वकील का कहना है कि उनकी क्लाइंट के पास से जो सोना जब्त किया गया, वो उन्हें शादी फंक्शन के लिए मिला था। उन्होंने कहा कि हिन्दू परिवारों में ये सब चलता है। उन्होंने कहा कि अगर ये गोल्ड बार होता तब स्थिति अलग होती, लेकिन फ़िलहाल इस मामले में कुछ भी गलत साबित नहीं होता।

बता दें कि तिरुवनंतपुरम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एयर कार्गो के माध्यम से यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) से आए एक राजनयिक के सामान से 30 किलोग्राम सोना जब्त किया गया था। इसका मूल्य लगभग 15 करोड़ रुपए बताया जा रहा है। इसके बाद उस व्यक्ति सरित कुमार को कस्टम विभाग ने हिरासत में ले लिया। पूछताछ में सरित ने बताया कि वह लगभग एक साल से हवाई अड्डे से इस तरह का सामान ले जा रहा था।

‘राम मंदिर का समर्थन घुटने टेकने जैसा’: कॉन्ग्रेस MP का सोनिया गाँधी को पत्र, प्रियंका से सहयोगी दल भी नाराज

राम मंदिर पर कॉन्ग्रेस दो गुटों में बँटी नजर आ रही है। हाल ही में कई कॉन्ग्रेस नेताओं ने भूमि पूजन के अवसर पर राम मंदिर का समर्थन किया। इसे देखकर केरल की कॉन्ग्रेस ईकाई आग बबूला हो गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता व लोकसभा सांसद टीएन प्रतापन ने तो खुलकर आपत्ति भी जताई है। पार्टी हाईकमान को पत्र लिखा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, त्रिशूर से लोकसभा सांसद टीएन प्रतापन ने सोनिया गाँधी को पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने मध्यप्रदेश नेताओं के ख़िलाफ़ शिकायत की है। उन्होंने अपना विरोध दर्ज कराते हुए कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के उन बयानों के ख़िलाफ नाराजगी जताई जिनमे उन्होंने राम मंदिर निर्माण का समर्थन किया।

उन्होंने कहा कि इस तरह राम मंदिर निर्माण का समर्थन का करना बिलकुल ऐसा है जैसा अस्थायी सफलता के लिए अपने घुटने टेकना। अपने पत्र में उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी को सॉफ्ट हिंदुत्व छवि अपनाने के लिए चेतावनी दी और कहा कि कॉन्ग्रेस को इस बीच उन लोगों को नहीं भूलना चाहिए जो बाबरी विध्वंस का दुख मनाते हैं और जिनके लिए वह हमला बिलकुल ऐसा था जैसा किसी ने उन पर हमला किया हो। वे कहते हैं कि नरम रवैये के साथ अतिधार्मिक राष्ट्रवाद के पीछे नहीं चल सकते। हमें स्थिति को समझना होगा और कोई और रास्ता खोजना होगा।

क्या कहा था कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने?

गौरतलब है कि केरल सासंद का ये पत्र कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बयानों की प्रतिक्रिया में है। दरअसल दोनों नेताओं ने राम मंदिर निर्माण कार्य का स्वागत ये कहते हुए किया कि वह राजीव गाँधी ही थे जिन्होंने 1985 में राम जन्मभूमि का दरवाजा खोला।

कमलनाथ ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर डालते हुए यह भी कहा कि इस अवसर पर वह अपने भोपाल वाले घर में हनुमान चालीसा का पाठ रखेंगे और कॉन्ग्रेस की राज्य ईकाई की ओर से अयोध्या के लिए 11 ईंट भी देंगे। वहीं दिग्विजय सिंह ने यह दावा किया कि अयोध्या की नींव तो पहले ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी द्वारा रखी जा चुकी है।

इन दोनों नेताओं का विरोध करते हुए जहाँ त्रिशूर सांसद ने इस कार्यक्रम को संघ परिवार द्वारा प्रायोजित धार्मिक राजनैतिक कार्यक्रम बताया और कहा कि अगर हमारे नेताओं को नहीं बुलाया गया तो वह उसके लिए भीख क्यों माँग रहे हैं। वहीं, प्रतापन ने प्रियंका गाँधी का बचाव करते हुए कहा कि राम मंदिर को लेकर प्रियंका गाँधी ने जो रुख अपनाया वो स्वीकार्य है, क्योंकि उन्होंने एकता की बात की है।

वे कहते हैं, “हम निश्चित रूप से जानते हैं कि जहाँ तक ​​संघ परिवार की सत्ता है, वहाँ ऐसी एकता नहीं होगी। अंतत: फर्क इससे नहीं पड़ता कि हमने कितनी असफलताएँ देखीं। फर्क इससे पड़ता है कि हम अस्थायी सफलताओं के लिए झुक गए।”

केरल सीएम पिनरई विजयन ने भी किया विरोध

केरल के मुख्यमंत्री ने भी इन बयानों पर कॉन्ग्रेस पार्टी पर हमला बोला है। उन्होंने बुधवार को कहा कि वह प्रियंका गाँधी के बयानों से अचंभित नहीं हुए। उन्होंने पार्टी पर निशाना साधते हुए सॉफ्ट हिंदुत्व मुद्दे पर पार्टी को घेरा और कहा कि अगर पार्टी कभी सेकुलरिज्म पर तटस्ठ कदम उठाती तो आज ऐसी हालत नहीं होती।

उन्होंने कहा कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुद्दे में कॉन्ग्रेस पार्टी का रुख इतिहास का हिस्सा है, क्योंकि वह मस्जिद नष्ट होने पर “मूकदर्शक” बनी हुई थी।

कॉन्ग्रेस की सहयोगी पार्टी ने भी किया विरोध

केरल में कॉन्ग्रेस की सहयोगी पार्टी इंडिया यूनियन मुस्लिम लीग ने भी प्रियंका गाँधी के बयान पर अपना विरोध दर्ज करवाया है। उन्होंने कहा कि हम राम मंदिर मामले पर प्रियंका गाँधी के बयान के साथ अपनी असहमति जताते हैं। उनका बयान स्थिति से बिलकुल अलग है।

पार्टी ने इसके बाद घटना को तूल नहीं देने का फैसला किया और कहा कि वह इस पर चर्चा दोबारा शुरू करने को लेकर अनिच्छुक है। पार्टी ने कहा, ‘‘IUML ने उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वागत किया था और उसके बाद अब यह अध्याय समाप्त हो चुका है।”

बता दें कि प्रियंका गाँधी वाड्रा के जिस बयान पर इतना बवाल हुआ है उसमें उन्होंने कहा था कि भगवान राम सभी के हैं और उम्मीद जताई कि आयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए होने जा रहा भूमि पूजन राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और संस्कृति का उत्सव होगा।

उनके प्रपंच का गुंबद था अयोध्या, ढह गया, पर राम मंदिर के उत्साह में मथुरा-काशी का दर्द न दबे

अयोध्या में 5 अगस्त 2020 को भव्य श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन हुआ। यह केवल एक मंदिर की नींव नहीं है। यह इस्लामिक आक्रांताओं के उन गुंबदों के ढहने की शुरुआत है जो उन्होंने हथियारों के बल पर गढ़े थे। जिन्हें वामपंथियों ने आजाद भारत में अपने प्रपंचों से सींचा था।

इसका रास्ता बीते साल सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने खोला था। यदि आपको वह वक्त ध्यान हो तो याद आएगा कि फैसला आने से जो लोग कह रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट जो भी निर्णय देगा वह उन्हें मान्य होगा, वे फैसला आने के चंद मिनट के भीतर ही बदल गए थे। याद करिए सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी से लेकर असदुद्दीन ओवैसी और कमाल फारूकी जैसों के सुर बदल गए। लिबरल गिरोह को फैसला वीएचपी को पुरस्कार देने जैसा लगने लगा था। का लेख

असल में, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान ही दूसरा पक्ष जिरह की बाजी हार गया था। अपने दावे के पक्ष में कोई सबूत पेश नहीं कर पाए थे। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा भी है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ऐसे सबूत पेश नहीं कर पाया जिससे विवादित जमीन पर उनका हक साबित हो सके। दूसरे पक्ष को यह भी पता था कि पुरातात्विक सबूत​ उनके खिलाफ हैं। चाहे 1822 में सरकार को भेजी गई फैजाबाद अदालत के मुलाजिम हफीजुल्ला की रिपोर्ट हो या उस जमाने के दस्तावेज, सब इस बात की चुगली कर रहे थे कि मंदिर तोड़कर बाबर के सिपहसलार ने मस्जिद बनवाई थी। अंग्रेजों की अदालत में भी वे कानूनी लड़ाई हार थे।

दरअसल, उनके बदले सुर उस साजिश का हिस्सा थे जो वामपंथी इतिहासकारों, तुष्टिकरण की राजनीति के उस्तादों की शह पर अयोध्या मामले को लटकाने के लिए आजादी के बाद से ही रचा जा रहा था। अब यह प्रपंच रचा रहा है कि अयोध्या के उत्साह में बहुसंख्यक उस गुनाह को भूल जाएँ जो मथुरा-काशी में अक्रांताओं ने किया।

कोशिश हो रही है ‘यह तो पहली झॉंकी है, मथुरा-काशी बाकी है’ की आवाज को दबाने की। इसकी शुरुआत उसी दिन हो गई थी जब यह खबर सामने आई कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अपने दावे से पीछे हटने को राजी है और इसके लिए उसकी तीन शर्तें हैं। इन शर्तों का लब्बोलुबाब यह था कि मस्जिद के लिए दूसरे मजहब को नई जमीन मिले, बहुसंख्यक हिंदुओं के टैक्स से आए पैसे को सरकार मस्जिदों पर खर्च करें और अयोध्या के अलावा हिंदू अपने किसी भी ऐसे पवित्र स्थल पर दावा न कर सकें जिन्हें आक्रांताओं ने हथियार के जोर पर तबाह किया। कब्जा किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उन्हें मस्जिद के लिए पॉंच एकड़ जमीन मिल गई है। वे शोर केवल इसलिए मचा रहे कि बहुसंख्यक समाज मथुरा-काशी में अपना हक न मॉंगे। यानी, मथुरा-काशी पर हिंदुओं का दावा दफन करने की साजिश चुपचाप रची जा रही है। आजाद भारत में मथुरा-काशी को मु​क्त कराने की लड़ाई अयोध्या के साथ ही बनी थी। यह दूसरी बात है कि अयोध्या इस लड़ाई का केंद्र रहा। इसलिए, उनका पहला

आज भले सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अयोध्या पर उनके प्रपंच का गुम्बद ढह गया है। लेकिन बाबरी मस्जिद बनाने के बाद से अयोध्या का करीब 500 साल का इतिहास जोर, छल और प्रपंच का ही गवाह रहा। हथियारों का जोर, जिसके दम पर एक मुगल शासक का प्यादा अपनी वफादारी साबित करने के लिए मंदिर ध्वस्त कर मस्जिद बनाता है। वामपंथी इतिहासकारों का छल, जो आजाद भारत में राम को कल्पना साबित करने पर तुला रहा। कॉन्ग्रेस का धर्मनिरपेक्षता का प्रपंच, जिसके तहत उसके नेता ने कभी राम की मूर्ति हटानी चाही तो कभी बाबरी मस्जिद को फिर से बनाने खम ठोंका। इन सबके बीच, विवादित जमीन पर अस्पताल, संग्रहालय, स्कूल बनाने के विचारों का प्रपंच भी।

अयोध्या विवाद लिबरलों, वामपंथियों और खास मजहब वालों की जिद की नींव पर ही बुलंद था। वरना, सुलह के मौके तो अतीत में कई बार मिले थे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी रहे केके मुहम्मद तो कई मौकों पर कहा था कि मजहब के लोगों को अयोध्या, मथुरा और काशी हिंदुओं को सौंप देना चाहिए ताकि हिंदू भी अक्रांताओं द्वारा रौंदे गए अपने शेष 39,997 स्थानों पर दावे से पीछे हट जाएँ।

मुहम्मद वही शख्स हैं, जिन्होंने सबसे पहले बताया था कि अयोध्या में खुदाई से इस बात के सबूत मिले हैं कि मंदिर तोड़ कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। अपनी किताब ‘मैं हूॅं भारतीय’ में वे लिखते हैं, “समुदाय के एक व्यक्ति के लिए मक्का-मदीना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण एक हिंदू के लिए अयोध्या है। मक्का-मदीना अन्य धर्मावलंबियों के हाथ पड़े तो… समुदाय वाले इसकी कल्पना नहीं कर सकते। लेकिन, हिंदुओं के बहुसंख्यक होने पर भी उनका पुण्यतीर्थ अन्य धर्मावलंबियों के अधीन हो गया। मजहब के प्रवाचक मुहम्मद नबी से अयोध्या का कोई संबंध नहीं है। सहावी से, खुलफाउराशीदी से संबंध नहीं। ताबिउ, औलिया और सलफुस्सालीहिन से भी कुछ रिश्ता नहीं। मुगल संस्थापक बाबर से मात्र इसका संबंध है। इस तरह की एक मस्जिद के लिए क्यों जिद्दी हो जाते हैं?”

लेकिन, मजहब के लोगों ने उनकी नहीं सुनी। अटल बिहारी वाजपेयी ने तो 1986 में बंबई की एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि समुदाय यदि स्वेच्छा से सारा ढाँचा हिंदुओं को सौंप दे तो इस पूरे विवाद का हल निकल जाएगा। लेकिन, उनकी भी नहीं सुनी गई। 1822 में फैजाबाद अदालत का मुलाजिम हफीजुल्ला सरकार को एक रिपोर्ट भेजता है। उसमें कहता है कि राम के जन्मस्थान पर बाबर ने एक मस्जिद बनाई। लेकिन, मजहब के लोग पीछे नहीं हटे।

17 मार्च 1886 को फैजाबाद का जिला जज कर्नल एफईए कैमियर अपने फैसले में लिखता है कि मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थान पर बनी है। वह 356 साल पुरानी गलती को सुधारने से इनकार कर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देता है। लेकिन, मजहब के लोगों का बड़ा दिल इस फैसले के बाद भी नहीं दिखा। उलटे, 1912 में बहुसंख्यकों की भावनाओं को भड़काने के लिए अयोध्या में गौहत्या की जाती है, जबकि म्यूनिसिपल कानून के तहत 1906 में ही अयोध्या में गौहत्या पर पाबंदी लगा दी गई थी।

2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आता है। विवादित गुंबद राम का जन्मस्थान माना जाता है, फिर भी जमीन के तीन टुकड़े कर दिए जाते हैं। अदालत में पेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट से यह प्रमाणित हो गया था कि बाबरी मस्जिद से पहले उस जगह मंदिर था। लेकिन, मजहब के लोग तब भी पीछे नहीं हटे। उन्होंने तो सुप्रीम कोर्ट में भी साक्ष्यों को झुठलाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि एक खास किस्म की सांप्रदायिकता और कट्टरता को गंगा-जमुनी तहजीब के तले छिपाने की कोशिश तो नहीं हो रही? कहीं, फिर से तो ​आपकी मान्यताओं और विश्वास को छलने की साजिश तो नहीं रची जा रही? इसलिए, सचेत रहें। अयोध्या के उत्साह में इस कदर न डूबें कि मथुरा-काशी याद न रहे। वैसे भी इनकी विश्वसनीयता का कोई भरोसा नहीं है।