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आतंकवादी के प्रति सहानुभूति जताने के लिए रूसी पत्रकार पर ₽5 लाख का जुर्माना, मानवाधिकर संगठनों ने जताया विरोध

आतंकवाद को जायज ठहराने के आरोप में रूस में एक पत्रकार पर जुर्माना लगाया गया है। ‘सिटी ऑफ Pskov’ में स्थित कोर्ट ने सोमवार (जुलाई 7, 2020) को पत्रकार स्वेटलाना प्रोकोप्येवा (Svetlana Prokopyeva) पर 5 लाख रूबल्स (5.25 लाख रुपए) का जुर्माना ठोका। स्वेटलाना प्रोकोप्येवा (Svetlana Prokopyeva) पर आरोप है कि उन्होंने आतंकवादी के साथ सहानुभूति जताई।

स्वेटलाना प्रोकोप्येवा (Svetlana Prokopyeva) पर रूस में लगे जुर्माने के बाद वहाँ ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ का रोना शुरू हो गया लेकिन सामान्यतः वहाँ इन आरोपों को बर्दाश्त नहीं किया जाता है। प्रोसीक्यूटरों की तो यहाँ तक माँग है कि स्वेटलाना को 6 साल के कारावास की सज़ा भी सुनाई जाए। दरअसल, नवम्बर 2018 में हुए एक आत्मघाती हमले में उत्तरी शहर Arkhangelsk में स्थित फ़ेडरल सिक्योरिटी सर्विस (FSB) दफ्तर के बाहर एक 17 वर्षीय युवा ने ख़ुद को उड़ा लिया था।

इस वारदात में उक्त हमलावर की तो मौत हो गई थी लेकिन साथ-साथ 3 FSB अधिकारी भी घायल हो गए थे। इस घटना पर स्वेटलाना प्रोकोप्येवा (Svetlana Prokopyeva) ने एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने सरकार की नीतियों को ‘दमनकारी’ बताते हुए कहा था कि आज युवाओं के पास असहमति दिखाने के मौके नहीं हैं और इसी तनाव के कारण वो हताश होकर ऐसी वारदातों को अंजाम देते हैं।

पत्रकार स्वेटलाना प्रोकोप्येवा (Svetlana Prokopyeva) फिलहाल ‘RFE/RL’s रसियन सर्विस’ में कार्यरत हैं। उन्होंने ख़ुद को निर्दोष बताते हुए अपने ऊपर लगे आरोपों को नकार दिया है और जुर्माने को अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन करार दिया है। उन्होंने कहा कि वो क़ानूनी संस्थाओं की आलोचना से नहीं डरती हैं और जहाँ भी सुरक्षा एजेंसियाँ ग़लत होंगी, वो बोलने से हिचकेंगी नहीं।

रूसी पत्रकार Svetlana Prokopyeva ने अपने फेसबुक पोस्ट में जुर्माने को बताया गलत

स्वेटलाना कहा कि अगर उन्होंने कुछ नहीं कहा या किसी ने भी असहमति में स्वर नहीं उठाए तो चीजें और भयानक रूप ले सकती हैं। उनका कहना है कि उन्होंने सिर्फ़ अपने पत्रकारिता का कर्त्तव्य निभाया है। बकौल स्वेटलाना प्रोकोप्येवा (Svetlana Prokopyeva), उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो पत्रकारिता के अंतर्गत नहीं आता। उन्होंने इस फैसले के ख़िलाफ़ अपील करने की भी बात कही है। कई मानवाधिकार संगठनों ने उनका समर्थन किया है।

भारत में भी मीडिया के एक धड़े द्वारा आतंकवादियों को क्लीन चिट देने की कोशिश की जाती रही है। इनका पहला कर्तव्य यह साबित करना तो है ही कि कश्मीर घाटी में सुरक्षबलों द्वारा मारे जाने वाले आतंकवादी निर्दोष होते हैं। साथ ही आतंकवादियों के ‘मानवीय’ चेहरे के नैरेटिव को दिशा देने का काम भी वामपंथी मीडिया संगठनों द्वारा किया जा रहा है। सोपोर में आतंकवादियों की गोली से मारे गए 65 वर्षीय बशीर अहमद के मामले में ऐसा ही किया गया था।

हाथ-गला काटकर खून से लिखा ‘भ्रष्टाचार मुर्दाबाद’: 5 साल से वेतन न मिलने पर सीतामढ़ी के शिक्षक ने किया आत्महत्या का प्रयास

पिछले दिनों बिहार के सीतामढ़ी में संजीव कुमार नाम के एक पंचायत शिक्षक ने 5 साल से वेतन न मिलने के कारण आत्महत्या का प्रयास किया। उन्होंने जिला मुख्यालय के डुमरा परेड स्थल मैदान में अपनी नस काटकर जान देने की कोशिश की।

इस दौरान उन्होंने अपने खून से दीवार पर ‘भ्रष्टाचार मुर्दाबाद’ भी लिखा और फिर वहीं पर बेहोश हो गए। खून से लथपथ हालत में शिक्षक को इलाज के लिए सदर अस्पताल में भर्ती करवाया गया।

उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होते ही ट्विटर पर कुछ लोग उन्हें मृत समझकर श्रद्धांजलि देने लगे। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में उन्हें अस्पताल में भर्ती बताया जाता रहा।

ऐसे में ऑपइंडिया ने संजीव कुमार की वर्तमान स्थिति जानने के लिए डुमरा थाना क्षेत्र के एचएसओ को संपर्क किया। एसएचओ ने हमें बताया कि संजीव की स्थिति फिलहाल स्थिर है। लेकिन उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज नहीं मिला है।

संजीव के वेतन पर सवाल पूछे जाने पर एसएचओ ने कहा कि वो शिक्षा विभाग ही बता पाएँगे। लेकिन सुनने में आया है कि कुछ वेतन मिल चुका है और कुछ बकाया है।

मामले में एक्शन लेने की बात पूछे जाने पर डुमरा एसएचओ ने बताया कि अभी शिक्षक की ओर से इस संबंध में लिखित रूप से शिकायत नहीं दायर करवाई गई है। उनका कहना है कि उन्हें किसी के ऊपर कोई दोष नहीं देना है।

यहाँ बता दें शिक्षक संजीव कुमार बेला थाना क्षेत्र के नरगा गाँव निवासी हैं। उनकी प्रतिनियुक्ति बरियारपुर के प्राथमिक विद्यालय लपटी टोला में है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि शिक्षक की जेब से लंबित वेतनमान को लेकर डीएम को लिखा 28 जनवरी 2019 का आवेदन भी मिला है। हालाँकि, एसएचओ ने इस बात से इंकार किया है कि उनकी जेब से कोई पत्र नहीं मिला।

इधर, डीपीओ शैलेन्द्र कुमार ने मीडिया को बताया कि संजीव कुमार बरियापुर के पंचायत शिक्षक हैं। उनके बकाया वेतन मद का करीब छह लाख रुपया बैंक खाता में भेज दिया गया है। केवल प्रशिक्षण अवधि का अवैतनिक वेतन शेष है। यह भी विभागीय प्रावधान के पेच में फँसा है।

जख्मी शिक्षक संजीव के मुताबिक प्रशिक्षित टीचर होने के बावजूद उनका वेतन जुलाई 2015 से ही विभाग ने बंद कर रखा था। उन्होंने बताया कि अपने लंबित वेतन को लेकर वो पंचायत से लेकर जिला स्तर तक के अधिकारियों के दफ्तर के चक्कर काट कर थक गए। लेकिन किसी तरह का सहयोग न मिलने के कारण उसने हताशा में ये कदम उठा लिया।

उल्लेखनीय है कि शिक्षक के इस प्रयास के बाद पंचायत शिक्षकों के संगठन ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है। बिहार राज्य प्रारंभिक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष पवन कुमार व बिहार पंचायत नगर प्रारंभिक शिक्षक संघ जिलाध्यक्ष प्रकाश कुमार ने कहा समय पर संजीव के वेतन भुगतान हो जाता तो उनको ऐसा कदम नहीं उठाना पड़ता। उसके आत्महत्या के प्रयास के तुरंत बाद वेतन भुगतान में आने वाली सारी बाधाएँ दूर हो गईं। इससे साफ है कि विभागीय उदासीनता से शिक्षक भुखमरी के शिकार हो रहे हैं।

बाबासाहब आंबेडकर के घर ‘राजगृह’ में जम कर तोड़फोड़: CCTV तोड़ कर भाग निकले 2 अज्ञात

संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन रहे दिवंगत नेता बाबासाहब आंबेडकर के मुंबई स्थति निवास स्थान ‘राजगृह’ में जम कर तोड़फोड़ मचाई गई है। महाराष्ट्र पुलिस ने इस मामले में जाँच भी शुरू कर दी है। बुधवार (जुलाई 8, 2020) को मुंबई पुलिस ने इस संबंध मे जानकारी दी। कहा जा रहा है कि 2 लोग 3 मंजिला ऐतिहासिक परिसर में घुस गए और तोड़फोड़ मचाई। दोनों आरोपितों की अब तक पहचान नहीं हो सकी है।

बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के दादर स्थित निवास स्थान में ये घटना मंगलवार (जुलाई 7, 2020) की शाम को हुई। दोनों आरोपितों ने वहाँ रखे सामानों को एक-एक कर उठा कर पटकना शुरू कर दिया। इसके बाद उन्होंने सीसीटीवी कैमरों को तोड़ कर पटक दिया। ग्लास पैनल्स को क्षतिग्रस्त कर डाला गया। गमलों को पटक कर फोड़ने के बाद दोनों वहाँ से भाग निकले। पुलिस उनकी तलाश कर रही है।

रात को जैसे ही इस घटना की ख़बर वायरल हुई, दादर ही नहीं बल्कि मुंबई व उसके आसपास के इलाकों के दलित भी आक्रोशित हो गए और उनमें से कइयों ने बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के उक्त घर की ओर कूच कर दिया। आक्रोशित दलितों ने सोशल मीडिया के माध्यम से भी विरोध जताया। दलितों के गुस्से को देखते हुए पुलिस स्थिति पर नजर रख रही है। दलित संगठन भी इस विवाद मे कूद सकते हैं।

‘राजगृह’ में तोड़फोड़ के बाद का दृश्य, बिखरी पड़ी चीजें

बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के पोते और दलित नेता डॉक्टर प्रकाश आंबेडकर ने दलितों से अपील की है कि वो शांति बनाए रखें और ‘राजगृह’ की तरफ प्रस्थान न करें। उन्होंने इस घटना की भी पुष्टि की है। महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने इस घटना की निंदा करते हुए पुलिस को निर्देश दिया है कि जल्द से जल्द दोनों ही आरोपितों को पकड़ा जाए और उन्हें सजा दिलाने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

बाबसाहब भीमराव आंबेडकर अपने मुंबई प्रवास के दिनों मे अक्सर ‘राजगृह’ में ही रहा करते थे। वो पढ़ने-लिखने के काफ़ी शौकीन थे और उन्होंने ‘राजगृह’ का इस्तेमाल अपनी पुस्तकें और साहित्य को रखने के लिए किया था। कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन के बाद कई दिनों से ‘राजगृह’ को बंद ही रखा गया था। बाबासाहब ने मुंबई से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था लेकिन उन्हें बुरी तरह मात मिली थी।

‘राजगृह’ में तोड़फोड़ के बाद स्थिति का जायजा लेते पुलिसकर्मी

इससे पहले भी असामाजिक तत्वों द्वारा बाबासाहब आंबेडकर की प्रतिमाओं को तोड़फोड़ किया जाता रहा है। अप्रैल 2019 में देवरिया के गौरी बाजार में दलितों पर मुस्लिम भीड़ ने हमला बोल दिया था। हमले के दौरान मुस्लिम समुदाय ने बस्ती में स्थित बाबासाहब आंबेडकर की प्रतिमा को भी क्षतिग्रस्त कर डाला गया था। हालाँकि, ऐसी घटनाओं पर दलित संगठन सामान्यतः चुप्पी ही साधे रखते हैं।

राजीव और इंदिरा के नाम पर चल रहे 3 संगठनों की फंडिंग पर नकेल: ED के स्पेशल डायरेक्टर और कमिटी से जाँच

राजीव गाँधी फाउंडेशन समेत 3 ट्रस्टों की फंडिंग को लेकर उपजे विवाद पर केंद्रीय गृह मंत्रालय सख्त है और अंतर-मंत्रालय जाँच बिठा दी गई है, जिससे गाँधी परिवार की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। ख़ुद गृह मंत्रालय के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर के इस बात की सूचना दी गई है। ये कमिटी फाउंडेशन द्वारा ली गई फंडिंग और नियमों के उल्लंघन को लेकर जाँच करेगी। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के डायरेक्टर इस कमिटी की अध्यक्षता करेंगे।

गृह मंत्रालय ने अपनी ट्वीट में कहा– “केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक अंतर-मंत्रालय कमिटी का गठन किया है, जो राजीव गाँधी फाउंडेशन, राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट और इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट की जाँच करेगी।” गृह मंत्रालय द्वारा गठित कमिटी PMLA एक्ट, इनकम टैक्स एक्ट और FCRA एक्ट के नियम-क़ानूनों के उल्लंघन के सम्बन्ध में जाँच करेगी, जिसके बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।

बता दें कि राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन से फंडिंग मिलने का खुलासा होने के बाद हंगामा शुरू हो गया था। इस फाउंडेशन के शीर्ष अधिकारियों में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गाँधी के नाम शामिल हैं। अब ऑपइंडिया आपको बताता है कि कैसे राजीव गाँधी फाउंडेशन और चीन के बीच इस तरह का संदेहपूर्ण संबंध 2018-2019 तक जारी रहा।

भारती फाउंडेशन द्वारा गृह मंत्रालय को प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि इसे कतर फाउंडेशन एंडोमेंट से वित्त वर्ष 2018-19 में लगभग 14 करोड़ रुपए मिले थे। बता दें कि कतर फाउंडेशन एक प्राइवेट चैरिटी संस्थान है, जो पूर्व अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल थानी और उनकी पत्नी शेखा मोझा बिंत नासिर द्वारा स्थापित किया गया था। कॉन्ग्रेस का यहूदी अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस के साथ भी काफी नजदीकी संबंध रहा है।

फाउंडेशन को पंजाब नेशनल बैंक में हज़ारों करोड़ रुपए के घोटाले के अभियुक्त मेहुल चोकसी से भी दान मिला था। उसने 2014-15 में सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाले इस फाउंडेशन में अघोषित दान किया था। दान नवराज एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड (Naviraj Estates Private Limited) के नाम से किया गया था और मेहुल चोकसी इस कंपनी के निदेशकों में से एक है। इसके बाद से ही भाजपा इन आरोपों को लेकर हमलावर है।

शोएब अख्तर के ओवर में काँपते थे सचिन, अफरीदी ने बिना रिकॉर्ड देखे किया दावा

खेल जगत के कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं जिनके खेल पर कम चर्चा होती है और उनसे संबंधित बातों पर ज़्यादा। क्रिकेट की दुनिया का एक ऐसा ही नाम है शाहिद अफ़रीदी, पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान। अक्सर अपने बयानों के चलते सुर्खियों में रहने वाले शाहिद अफ़रीदी ने एक बार फिर कुछ ऐसा कहा, जिसके बाद खेल की दुनिया में बहस ज़ोर पकड़ चुकी है। इस बार अफ़रीदी ने सचिन तेंदुलकर पर बयान दिया है। 

अफ़रीदी के मुताबिक़ सचिन तेंदुलकर को शोएब अख्तर के कुछ ओवर का सामना करने में डर लगता था। इसके पहले साल 2011 में अफ़रीदी इस बात का दावा कर चुके हैं कि सचिन जब मैदान पर शोएब अख्तर के सामने होते थे तब उनके पाँव काँपते थे। अफ़रीदी ने अपने बयान में कहा, “वह (सचिन तेंदुल्कर) शोएब अख्तर से डरते थे और यह मैंने खुद देखा है। मैं उस वक्त स्क्वायर लेग पर फील्डिंग कर रहा था और शोएब अख्तर के ओवर की शुरुआत होते ही सचिन के पाँव काँपने लगते थे।”

इसके अलावा अफ़रीदी ने यह भी कहा कि स्वाभाविक सी बात है सचिन खुद तो कहने से रहे कि उन्हें डर लग रहा है। कहते-कहते अफरीदी ने यह भी कह डाला कि सचिन ही नहीं दुनिया के तमाम अच्छे बल्लेबाज़ ऐसे थे, जो शोएब अख्तर का स्पेल शुरू होते ही डरने लगते थे और जब वो मिड ऑफ़ या कवर पर फील्डिंग करते हैं तब उनके लिए यह सब देखना आसान होता था।

अफरीदी का कहना है कि एक बल्लेबाज़ के तौर-तरीके से उन्हें अंदाज़ा लग जाता था क्योंकि अगर बल्लेबाज़ ज़रा भी दबाव में रहता है तो यह साफ़ नज़र आ जाता है भले वह कितना ही अच्छा बल्लेबाज़ क्यों न हो। इसके बाद अफ़रीदी ने कहा कि सचिन हमेशा शोएब अख्तर से डरे हुए रहते थे लेकिन उनके कुछ स्पेल ऐसे ज़रूर होते थे, जिसमें सचिन पूरी तरह दबाव में नज़र आते थे। इस कड़ी में केवल सचिन ही नहीं बल्कि दुनिया के कई मशहूर बल्लेबाज़ आते हैं। 

एक साक्षात्कार के दौरान अफ़रीदी ने यह भी कहा कि सचिन ऑफ़ स्पिनर सईद अजमल से भी डरते थे। अफरीदी के अनुसार साल 2011 के दौरान हुए विश्व कप में सचिन सईद अजमल के ओवर में डरे हुए नज़र आए थे। हालाँकि उन्होंने कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं है, अक्सर तमाम दिग्गज से दिग्गज खिलाड़ी भी दबाव में होते हैं। कभी-कभी खिलाड़ियों के लिए दबाव जैसे हालात बन जाते हैं, इसमें कोई हैरानी वाली बात नहीं है। 

सचिन तेंदुलकर और शोएब अख्तर

दरअसल साल 2011 में आई शोएब अख्तर की किताब ‘Controversia।।y Yours’ में उन्होंने यह दावा किया था कि सचिन उनका सामना करने में डरते थे। हालाँकि इस बात में उतनी ही सच्चाई है कि भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले मुकाबले में शोएब अख्तर के ओवर में सचिन तेंदुलकर की बल्लेबाजी देखने के लिए लोगों में अलग ही तरह का जुनून होता था। चाहे विश्व कप हो या सचिन तेंदुलकर के करियर का शुरुआती दौर। 

सचिन ने तमाम मौक़ों पर शोएब अख्तर के ओवर में ऐसा प्रदर्शन किया है जैसा किसी दूसरे बल्लेबाज़ के लिए करना आसान नहीं होता। सचिन ने पाकिस्तान के खिलाफ कुल ऐसे 9 टेस्ट मैच खेले हैं, जिसमें शोएब अख्तर भी पाकिस्तानी टीम का हिस्सा थे। इन सभी मुक़ाबलों में सचिन ने 41.60 की औसत से 416 रन बनाए और शोएब अख्तर ने उन्हें 3 बार आउट किया।

वहीं एकदिवसीय मुक़ाबलों की बात करें तो सचिन ने ऐसे 19 मैच खेले, जिसमें शोएब पाकिस्तानी टीम का हिस्सा थे। इसमें सचिन ने 90.18 की स्ट्राइक रेट और और 45.47 की औसत से 864 रन बनाए। वहीं शोएब ने उन्हें कुल 5 बार आउट किया। 

तेलंगाना के प्राइवेट अस्पताल मनचाहा वसूल रहे दाम, हाई कोर्ट ने माँगा राज्य सरकार से रिपोर्ट

तेलंगाना हाई कोर्ट ने मंगलवार (7 जुलाई, 2020) को प्राइवेट अस्पतालों द्वारा कोविड-19 के मरीजों से निर्धारित राशि से अत्यधिक शुल्क लिए जाने को लेकर दायर याचिका पर नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने राज्य सरकार को इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।

कोविड-19 के बढ़ते मामले और अस्पतालों के रुख को देखते हुए यह जनहित याचिका (PIL) एडवोकेट श्रीकिशन शर्मा ने दायर की थी। जिसके तहत राज्य सरकार से यह आग्रह किया गया था कि वह निजी अस्पतालों में मरीजों से अत्यधिक बिल वसूलने को लेकर उनके खिलाफ कार्रवाई करें। साथ ही याचिका में कोरोना वायरस से संक्रमित सभी मरीजों के इलाज और उसकी बिलिंग के मामले में पारदर्शिता के लिए दिशा-निर्देश जारी करने के लिए भी कहा गया।

याचिकाकर्ता ने यह बताया कि महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते वहाँ के राज्य सरकार ने निजी अस्पतालों में ज्यादा बिल वसूलने को लेकर प्रतिबंध लगाया गया है। लेकिन इस तरह का कोई प्रतिबंध तेलंगाना सरकार ने अभी तक निजी अस्पतालों में नहीं लगाया है।

वहीं डिवीजन बेंच ने थुम्बे अस्पताल द्वारा एक दिन के इलाज के लिए 1 लाख रुपए से अधिक कीमत वसूलने पर उसके खिलाफ राज्य सरकार की तरफ से की गई कार्रवाई के बारे में अदालत को सूचित करने का निर्देश दिया है।

पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) का जवाब देने के लिए राज्य सरकार, चार निजी अस्पताल- मेडिसिन, यशोदा, सनशाइन एंड केयर के संस्थापक नेशनल कॉउन्सिल और स्टेट कॉउन्सिल को नोटिस जारी किया गया। इसके साथ पीआईएल में निजी कॉरपोरेट अस्पतालों पर क्लिनिकल इस्टैब्लिशमेंट रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन एक्ट, 2010 और इंडियन मेडिकल काउंसिल प्रोफेशनल कंडक्ट एटिकेट एंड एथिक्स रेगुलेशन, 2002 के प्रावधानों का उल्लंघन करने का भी आरोप लगाया है।

निजी कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा किए जा रहे शोषण को प्रमाणित करने के लिए याचिकाकर्ता ने पीआईएल में कोविड-19 मरीजों और अन्य रोगियों के बिल का हवाला भी दिया है। इस डिवीज़न बेंच में चीफ जस्टिस राघवेंद्र सिंह चौहान जस्टिस बी विजयसेन रेड्डी शामिल थे। जिन्होंने राज्य सरकार से इस मुद्दे को लेकर रिपोर्ट माँगी है।

कोर्ट ने इस मामले को 14 जुलाई तक बढ़ाते हुए केंद्र सरकार और निजी अस्पतालों को भी नोटिस जारी किया। वहीं निजी अस्पतालों द्वारा लिए जा रहे अधिकतम राशि को लेकर सोमवार (6 जुलाई, 2020) को लोगों ने ट्विटर के जरिए तेलगांना गवर्नर डॉ. तमिलिसाई सौन्दरराजन से इस मामले को लेकर शिकायत की थी, जिसको देखते हुए राज्यपाल ने निजी अस्पतालों की प्रबंधन टीमों के साथ एक वर्चुअल समीक्षा भी की।

इस वीडियो कॉन्फ्रेंस में अस्पतालों के विभिन्न प्रतिनिधियों जैसे कि किम्स (KIMS), यशोदा, बसवा तारकम, विरंचि, रेनबो और सनशाइन, कॉन्टिनेंटल और अन्य अस्पतालों लोग मौजूद थे। कॉन्फ्रेंस में राज्यपाल ने बेड की उपलब्धता, सुविधाओं के बारे में विवरण माँगा और निजी अस्पतालों पर भारी भरकम बिल वसूलने के आरोपों पर प्रबंधन से सवाल किया था।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही हैदराबाद का यशोदा हॉस्पिटल में कोरोना वायरस से संक्रमित मनोज कोठारी को हॉस्पिटल से 4.21 लाख रुपए का बिल थमाया था। जिसका भुगतान नहीं कर पाने पर हॉस्पिटल ने जबरन उसे कैद कर लिया था।

मनोज 20 जून को यशोदा हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे। उन्होंने आरोप लगाया, “29 जून को मैं ठीक हो गया और हॉस्पिटल से डिस्चार्ज करने के लिए बोल दिया गया। लेकिन उसी 29 जून से मैं यहीं हॉस्पिटल में लगभग कैद हूँ। ना तो किसी से मिल पा रहा हूँ न ही किसी से बात करने दिया जा रहा है। अगर मुझे कुछ हो गया तो इसकी जिम्मेवारी कौन लेगा?” मनोज को बताया गया कि जब वो बाकी रकम का भुगतान करेंगे तो उन्हें डिस्चार्ज कर दिया जाएगा।

बता दें मनोज कोठारी का यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी से 5 लाख रुपए का बीमा है। जिसमें कंपनी ने केवल सिर्फ 1.2 लाख रुपए का ही भुगतान किया। इंश्योरेंस कंपनी के अनुसार तेलंगाना सरकार ने जो दर तय किया है, वो सिर्फ उसी का भुगतान करेगी। हॉस्पिटल जहाँ मनोज भर्ती हुए, उसका कहना है कि वो बाकी रकम खुद से जमा करें और घर जाएँ। बाद में इंश्योरेंस कंपनी से सेटलमेंट अमाउंट ले लें।

पायल रोहतगी का हैंडल सस्पेंड: ट्विटर ने नहीं बताया कोई कारण, नेपोटिज्म के खिलाफ चला रहीं थीं अभियान

बॉलीवुड में ‘ढोल’ और ’36 चाइना टाउन’ जैसी फिल्मों से चर्चा में आने वाली अभिनेत्री पायल रोहतगी इन दिनों सोशल मीडिया पर अपने बयानों के कारण अक्सर सुर्ख़ियों में रहती हैं और ट्विटर व इंस्टाग्राम पर उनकी अच्छी फैन फॉलोविंग है। अब ख़बर आई है कि ट्विटर ने पायल रोहतगी का हैंडल सस्पेंड कर दिया है। इसके बाद उनके प्रशंसक नाराज़ हो गए और ट्विटर को ‘हिन्दू विरोधी’ करार देते हुए फटकार लगाई।

बुधवार (जुलाई 8, 2020) को पायल रोहतगी ने इंस्टाग्राम के माध्यम से जानकारी दी कि ट्विटर न उनका अकाउंट सस्पेंड कर दिया है और कारण उन्हें भी नहीं पता है। उन्होंने अपने प्रशंसकों से अपील की है कि वो उनका ट्विटर अकाउंट रीस्टोर करने के लिए अभियान चलाएँ। उन्होंने ट्विटर के उस मैसेज का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया, जिसमें उनके हैंडल के सस्पेंड होने की बात लिखी है।

पायल रोहतगी ने कहा कि ट्विटर ने उनके ईमेल पर भी अकाउंट सस्पेंड किए जाने का कोई कारण नहीं बताया है। उन्होंने दावा किया कि वो न तो लोगों के साथ गाली-गलौज करती हैं और न ही किसी के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करती हैं, फिर भी उनका अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया। उन्होंने कहा कि ट्विटर पर लिबरलों और कट्टरवादियों की सत्ता चलती है, जिन्होंने उन्हें बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

ट्विटर ने सस्पेंड किया पायल रोहतगी का हैंडल

पायल रोहतगी ने कहा कि अगर ट्विटर ने उनका अकाउंट रीस्टोर नहीं किया तो फिर वो लोगों से बात कैसे कर पाएँगी? पायल की इस अपील के बाद ट्विटर पर कई बड़े नामों ने भी उनके पक्ष में अभियान चलाया। हिंदूवादी एक्टिविस्ट रमेश सोलंकी ने भी ट्विटर से इसका जवाब माँगते हुए पायल का अकाउंट रीस्टोर करने को कहा। अधिवक्ता प्रशांत पटेल ने भी ट्विटर की इस हरकत के लिए विरोध प्रकट किया।

इससे पहले जून में भी पायल का ट्विटर अकाउंट अब्यूजिव कंटेंट के तर्क के आधार पर सस्पेंड कर दिया गया था। उस दौरान इस पर क़ानूनी विवाद भी हो गया था। अभी वो सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद नेपोटिज्म के खिलाफ अभियान चला रहीं थीं। बता दें कि हाल ही में पायल रोहतगी ने यशराज फिल्म्स के कास्टिंग डायरेक्टर पर आरोप लगाए थे। बकौल पायल, उनके खिलाफ एक गैंग बन गया था, लेकिन वो विक्टिम नहीं बनीं।

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Why my Twitter Account is SUSPENDED ?????

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ट्विटर अकाउंट सस्पेंड होने के बाद पायल रोहतगी की अपील

पायल रोहतगी ने आरोप लगाया था कि बॉलीवुड में लोगों ने उनसे किनारा किया, जिसके बाद उन्हें टीवी का रुख किया। पायल रोहतगी ने आरोप लगाया था कि यशराज फिल्म्स की कास्टिंग डायरेक्टर शानू शर्मा ने उनसे एक मुलाकात के लिए 5000 रुपए की माँग की थी। इससे पहले उन्होंने फिल्म निर्माता-निर्देशक करण जौहर से पूछा था कि आलिया भट्ट ने ऐसा क्या किया, जो आपने उसे ब्रेक दिया?

इससे पहले दिसंबर 2019 में मोतीलाल नेहरू को लेकर सोशल मीडिया में आपत्तिजनक पोस्ट करने के आरोप में पायल रोहतगी को कोर्ट ने 24 दिसंबर तक के लिए जेल भेज दिया था। उन पर कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता चर्मेश शर्मा ने अपनी शिकायत में आरोप लगाए थे कि अभिनेत्री ने फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से नेहरू और उनके परिजनों के खिलाफ विवादास्पद वीडियो बनाकर पोस्ट किए हैं।

भारत यात्रा का नायक, सियासत का चिर युवा चंद्रशेखर; जिनके लिए PM मोदी को कहना पड़ा- हम चूक गए

गौहर रजा ने लिखा है: जुनूं के रंग कई हैं, जुनूं के रूप कई

आजाद भारत की सियासत के जुनूं (जुनून) का नाम ही चंद्रशेखर है। वो चंद्रशेखर जो सांसद से सीधे प्रधानमंत्री बने। इससे पहले न कभी किसी सरकार में कोई पद स्वीकारा, न पीएम की कुर्सी छोड़ने के बाद।

बागी बलिया की जमीन का असर कहें या कुछ और चंद्रशेखर ने हमेशा हवा को चुनौती दी। समाजवाद से सियासी सफर शुरू कर इंदिरा गाँधी का युवा तुर्क बनना, इमरजेंसी की कारागार यात्रा के बाद जनता पार्टी के अध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुॅंचना, उनकी यात्रा कई पड़ावों से गुजरी। लेकिन हर पड़ाव में जो बात एक सी है, वह है चंद्रशेखर का हर उस आदमी के सामने तनकर खड़े हो जाना, जिसे खुद के होने का गुमान था।

शायद यही कारण है कि धारा के खिलाफ चलने वाले भारतीय नेताओं में वे सबसे अलग नजर आते हैं। पिछले साल ही उनके इस पक्ष को याद करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, “उनकी (चंद्रशेखर) संस्कार और ​गरिमा प्रतिपल झलकती थी। आखिरकार जिस समय कॉन्ग्रेस पार्टी का सितारा चमकता हो, चारो तरफ जय-जयकार चलता हो, वो कौन सा तत्व होगा उस इंसान के भीतर, वो कौन सी प्रेरणा होगी कि उसने बगावत का रास्ता चुन लिया। शायद बागी बलिया के संस्कार होंगे। शायद बागी बलिया की मिट्टी में आज भी वह सुगंध होगी।”

देश के आठवें प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर बमुश्किल सात महीने इस पद पर रहे। लेकिन, वे याद प्रधानमंत्री बनने के कारण नहीं किए जाते। उन्हें याद करने की वजह वह ठसक है, जिसके कारण इस कुर्सी से इस्तीफा दे दिया। चुनौती देने का वो जज्बा है, जिससे इंदिरा से लेकर वीपी सिंह तक हर कोई सकते में रहा।

उत्तर प्रदेश के बलिया के इब्राहिम पट्टी में 17 अप्रैल 1927 को पैदा हुए चंद्रशेखर ने साल 2007 में 8 जुलाई को अंतिम साँसें ली थीं। ठसक की राजनीति का यह ‘बाबू साहब’ इतना संवेदनशील था कि राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा जैसे आज भी उनके मानवीय पक्ष को याद कर भावुक हो जाते हैं। उनकी यारी के किस्से में भी खूब सुने और सुनाए जाते हैं।

राजनीतिक यात्रा

लेकिन बात पहले उनकी राजनीतिक यात्रा की। चंद्रशेखर ने 50 के दशक में अपनी सियासी यात्रा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से शुरू की थी। आचार्य नरेंद्र देव तब उनके मेंटर हुआ करते थे। बाद में राममनोहर लोहिया के साथ रहे। लोहिया के साथ अपने मतभेदों को लेकर भी वे अक्सर चर्चा में रहते थे।

1962 में चंद्रशेखर ने अपनी संसदीय यात्रा उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने जाने से शुरू की। 1964 में कॉन्ग्रेस में आ गए। कॉन्ग्रेस पार्टी पर कब्जा जमाने और सिंडिकेट को मात देने के लिए इंदिरा गाँधी ने एक फौज बनाई थी, जिसे युवा तुर्क कहते थे। इसका एक प्रमुख चेहरा चंद्रशेखर थे।

लेकिन, चापलूसी भरे उस दौर में जिसकी परिणति देश ने ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ के नारे के तौर पर देखी, चंद्रशेखर तनकर ही रहे। कहते हैं कि एक बार इंदिरा गाँधी ने उनसे पूछा था कि क्या तुम कॉन्ग्रेस को समाजवादी मानते हो? उनका जवाब था: थोड़ा सा मानता हूँ, थोड़ा सा मनवाना चाहता हूँ, इसलिए आ गए। इंदिरा ने जब इसके मायने पूछे तो कहा कि कॉन्ग्रेस बरगद के एक बुढ़े पेड़ की तरह हो गई है। अगर मैं इसे समाजवादी रुख की ओर नहीं मोड़ सका तो पार्टी तोड़ दूॅंगा।

इस घटना से समझा जा सकता है कि चंद्रशेखर अलग ही मिट्टी के बने थे। वे उस इंदिरा को यह बात कह रहे थे जो देश की प्रधानमंत्री थीं, कॉन्ग्रेस की सर्वेसर्वा थीं और कॉन्ग्रेसी जुबान में कहें तो उनके कारण ही चंद्रशेखर सांसद थे।

इसके बाद आया 1975 जब आपातकाल लागू किया। कॉन्ग्रेस में रहते हुए भी जिसने इसके खिलाफ खुलकर आवाज उठाई, वो चंद्रशेखर थे। लिहाजा उन्हें भी गिरफ्तार कर विपक्षी नेताओं की तरह ही जेल में ठूँस दिया गया।

इमरजेंसी के बाद चंद्रशेखर जनता पार्टी के अध्यक्ष बने। आम चुनावों में जनता पार्टी की जीत हुई। कहा जाता है कि चंद्रशेखर नहीं चाहते थे कि मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनें। जयप्रकाश (जेपी) के कहने पर वे इसके लिए तैयार हुए। लेकिन जेपी की एक बात उन्होंने नहीं मानी और वह थी मोरारजी कैबिनेट में शामिल होना।

1980 के आम चुनावों में जनता पार्टी हार गई। 1984 इंदिरा की हत्या से पैदा हुई सहानुभूति में पार्टी की और बुरी गत हुई और वह 10 सीटों पर सिमट गई। बलिया में खुद चंद्रशेखर को हार देखनी पड़ी। इसके बाद 1988 में जनता पार्टी और अन्य धड़े मिलकर जनता दल के रूप में सामने आए। 1989 के चुनावों में जनता दल जीती। इस बार देवीलाल के एक दॉंव की वजह से पीएम की कुर्सी चंद्रशेखर से फिसल कर वीपी सिंह के हाथ लगी। कुछ महीनों बाद चंद्रशेखर ने समर्थकों के साथ जनता दल छोड़ समाजवादी जनता पार्टी बनाई और कॉन्ग्रेस के समर्थन से 10 नवंबर 1990 को प्रधानमंत्री बने।

समर्थन देते वक्त राजीव गाँधी को शायद लगा था कि कठपुतली सरकार चलाने को मिलेगी। ऐसा हुआ नहीं और इससे पहले की कॉन्ग्रेस समर्थन वापस लेती, चंद्रशेखर ने 21 जून 1991 को इस्तीफा दे दिया। इसके बाद भी वे कई सालों तक सांसद रहें। कुल मिलाकर आठ बार वे बलिया से लोकसभा पहुॅंचे।

भारत यात्रा

अब बात एक पदयात्रा की। गुलाम भारत में जैसे गाँधी ने पदयात्राओं के जरिए भारत की थाह ली, उसी तरह आजाद भारत के समस्याओं को चंद्रशेखर ने अपने पैरों से नापने की कोशिश की थी। उन्होंने 6 जनवरी 1983 को कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक से भारत यात्रा शुरू की। करीब 4200 किमी की यह पदयात्रा 25 जून 1984 को दिल्ली के राजघाट पर समाप्त हुई।

इस यात्रा के दौरान वे कई जगहों पर ठहरे और उनमें से कुछ को ​भारत यात्रा केंद्र के नाम से विचारों का केंद्र बनाया। इनमें से ही एक है लगभग 600 एकड़ में फैला भोंडसी स्थित भारत यात्रा केंद्र। बाद के वर्षों में सियासत का केंद्र बनने की वजह से भोंडसी आश्रम तो याद रहा, लेकिन वह यात्रा जेहन से मिटा दी गई।

बीते साल एक किताब आई थी- चंद्रशेखर द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स (The Last Icon of Ideological Politics)। हरिवंश और रवि दत्‍त बाजपेयी की लिखी इस किताब का विमोचन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। इस दौरान भारत यात्रा को भुलाए जाने की टीस उन्होंने जाहिर की थी।

पीएम मोदी ने कहा था, “आज छोटा-मोटा लीडर भी पदयात्रा करे तो 24 घंटे टीवी पर चलता है। मीडिया के पहले पन्ने पर छपता है। चंद्रशेखर जी ने पूर्णतया गाँव, गरीब, किसान को ध्यान में रखकर पदयात्रा की। यह चुनाव के इर्द-गिर्द नहीं हुआ था। देश को इसे जो गौरव देना चाहिए था, नहीं दिया। हम चूक गए।”

साथ ही प्रधानमंत्री ने इसके पीछे साजिशों की ओर इशारा करते हुए कहा था, “बहुत जान-बूझकर, सोची-समझी रणनीति के तहत चंद्रशेखर जी की उस यात्रा को डोनेशन, करप्शन, पूॅंजीप​तियों के पैसे, इसी के इर्द-गिर्द चर्चा में रखा गया। ऐसा घोर अन्याय सार्वजनिक जीवन में अखरता है।”

यहाँ यह जानना जरूरी है कि उस पदयात्रा के मर्म में कोई सियासत नहीं थी। केवल पाँच बुनियादी मसले थे;

  • सबको पीने का पानी
  • कुपोषण से मुक्ति
  • हर बच्चे को शिक्षा
  • स्वास्थ्य का अधिकार
  • सामाजिक समरसता

लेकिन विडंबना देखिए जब भी चंद्रशेखर की बात होती है, उनके सियासी जीवन के इस सबसे महत्वपूर्ण मोड़ की चर्चा कभी भी केंद्र में नहीं होती। आखिर इतनी महत्वपूर्ण यात्रा को सियासी पन्नों में दफना देने की साजिश किसने और क्यों रची होगी?

…और सिंह मेंशन

प्रधानमंत्री रहते हुए चंद्रशेखर ने कभी भी आधिकारिक निवास 7 रेसकोर्स रोड में रात नहीं गुजारी। वे या तो 3 साउथ एवेन्यू के अपने घर में सोते या भोंडसी के आश्रम में। भोंडसी के आश्रम जितना अजीज ही उन्हें झारखंड के धनबाद का भी एक घर था।

एनएच-32 पर स्टीलगेट के पास स्थित यह घर 80 के दशक में बना था। इसका नाम सिंह मेंशन है। इस घर की बुनियाद झरिया के विधायक रहे सूर्यदेव सिंह ने रखी थी। उनका परिवार आज भी यहॉं रहता है। सूर्यदेव सिंह की छवि कोयला माफिया की थी। उनसे चंद्रशेखर की गहरी यारी थी।

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे अपने इस दोस्त को नहीं भूले और न उसकी छवि को लेकर कभी कोई चिंता की। पीएम बनने के बाद वे भी सिंह मेंशन पहुॅंचे थे। जब पत्रकारों ने सवाल किया तो कहा, “हाँ, जिस सूर्यदेव सिंह को आप माफिया कहते हैं, वे मेरे दोस्त हैं।”

ऐसे ही थे चंद्रशेखर। इसलिए तो इमरजेंसी के बाद जब जेल से निकले तो कहा;

मुझे कैद करो या मेरी जुबाँ को बंद करो,
मेरे सवाल को बेड़ी कभी पहना नहीं सकते

साबिर अली ने गाय के साथ किया अप्राकृतिक सेक्स, CCTV में हो गया रिकॉर्ड: भोपाल से गिरफ्तार

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से इंसानियत को शर्मसार करने वाला एक मामला सामने आया है। वहाँ 55 वर्षीय एक व्यक्ति को गाय के साथ अप्राकृतिक सेक्स करते पाया गया।

आरोपित की पहचान साबिर अली के रूप में हुई। घटना 4 जुलाई को करीब 4 बजे की है। सीसीटीवी में कैद फुटेज देखने के बाद मामले की जानकारी पुलिस को दी गई। पुलिस ने सूचना पाते ही साबिर को हिरासत में ले लिया।

न्यूज एजेंसी एएनआई के अनुसार, अशोका गार्डन के थाना इंचार्ज ने बताया, “4 जुलाई को रामयादव की डेयरी में साबिर अली नाम का एक आदमी घुसा था। उसके माफी माँगने पर उसे छोड़ दिया था। लेकिन CCTV की जाँच में वो गाय के साथ अप्राकृतिक काम करते पाया गया। आज धारा 377 के तहत मामला दर्ज कर आरोपित को पुलिस हिरासत में ले लिया गया है।”

यहाँ बता दें कि इससे पहले भी गाय के साथ दुष्कर्म करने के मामले पिछले दिनों सामने आए थे। गत वर्ष की यदि बात करें तो मंगलौर से गाय के साथ दुष्कर्म करने का एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया था। यहाँ मोहम्मद अंसारी नाम के शख्स को खेत में गाय के साथ अप्राकृतिक सेक्स करते हुए ग्रामीणों ने पकड़ा था।

ग्रामीणों ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया था कि अंसारी ने गाय के पाँवो को रस्सी से बाँधकर उसके साथ दुष्कर्म किया। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी। जिसमें अंसारी अपने कुकर्म को स्वीकारते नजर आया था। जबकि लोग कह रहे थे, “हम गाय को अपनी माँ की तरह पूजते हैं और तुम उसके साथ सेक्स कर रहे हो।”

गौरतलब हो कि इस घटना से पहले भी एक गर्भवती बकरी के साथ सेक्स करने का मामला मीडिया में उछला था। उस समय हरियाणा के कुछ युवकों ने उस बकरी के साथ दुष्कर्म किया था। इस घटना में हारून और जफर समेत 8 लोगों को बकरी के साथ गैंगरेप का दोषी माना गया था।

फिर, अक्टूबर 2018 में बागपत के तिलवाड़ा गाँव में एक बछड़े के साथ बलात्कार किए जाने की घटना सामने आई थी। बछड़े की मौत के बाद पुलिस ने आईपीसी 377 (अप्राकृतिक संबंध) और 429 (जानवर के साथ क्रूरता) की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू की थी। मुस्लिम समुदाय से आने वाला आरोपित नाबालिग था। 

फरीदाबाद के होटल से भाग निकला विकास दुबे: 4 IPS का ट्रांसफर, 68 पुलिसकर्मी लाइन हाजिर

कानपुर में 8 पुलिसकर्मियों की हत्या करने वाले विकास दुबे की तलाश में यूपी पुलिस ने ज़मीन-आसमान एक कर दिया है। पुलिस को फरीदाबाद में फरार विकास दुबे के छुपे होने की खबर मिली थी। इस सूचना इस के बाद मंगलवार (7 जुलाई, 2020) की शाम को फरीदाबाद के दिल्ली मथुरा हाईवे बडख़ल चौक स्थित होटल ओयो ‘श्री सासाराम‘ में छापा मारा गया था। लेकिन, पुलिस के पहुँचने से पहले ही विकास दुबे वहाँ से भाग निकला।

मगर फरीदाबाद पुलिस ने विकास दुबे के 2 साथियों को गिरफ्तार कर लिया। उसने इस बात की पुष्टि की है, कि विकास दुबे उसके साथ था। 30-35 पुलिस अधिकारियों ने सादे कपड़े में फरीदाबाद के होटल में छापा मारा था। साथ ही होटल में गोली चलने की भी खबर सामने आई थी। वहीं होटल के मालिक के अनुसार, पुलिस ने सिर्फ उनके स्टाफ से पूछताछ की थी। और किसी को भी होटल से गिरफ्तार नहीं किया गया है। होटल के मालिक ने फायरिंग की खबर को भी अफवाह बताया है।

पुलिस ने होटल रिसेप्शन से एक सीसीटीवी फुटेज बरामद किया था। जिसमें विकास दुबे की तरह दिखने वाला एक शख्स मास्क लगाए होटल में मौजूद था। लेकिन होटल के मालिक ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। फ़िलहाल अभी तक पुलिस ने होटल में किए रेड पर कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की है।

चार आईपीएस अफसरों का ट्रांसफर

विकास दुबे का मामला धीरे धीरे अब पुलिस अफसरों पर भी भारी पड़ रहा है। मंगलवार को योगी सरकार ने एसटीएफ के डीआईजी अनंतदेव तिवारी का तबादला कर दिया। साथ ही तीन अन्य अधिकारियों को भी इधर से उधर किया गया है।

बता दें 8 पुलिस अफसरों में शामिल सीओ देवेंद्र मिश्र की बेटी ने पुलिस को घर में रखी फाइल से एक पत्र निकल कर दिया था। जिसकी वजह से ही अनंतदेव तिवारी का ट्रांसफर किया है। पत्र में यह बात सामने आई थी, कि बलिदान देवेंद्र मिश्र ने पहले ही चौबेपुर के थानाध्यक्ष विनय तिवारी और विकास दुबे की साँठगाँठ की पोल खोली थी। जिसके बावजूद उप महानिरीक्षक अनंत देव तिवारी ने दोनों पर कोई कार्रवाई नहीं की थी।

चौबेपुर थाने के 68 पुलिसकर्मी लाइन हाजिर

विकास दुबे की मदद और दबिश मुखबरी जैसे कई गंभीर आरोपों का सामना कर रहे चौबेपुर थाने के सभी 68 पुलिसकर्मी लाइन हाजिर कर दिए गए हैं। मंगलवार शाम एसएसपी दिनेश कुमार ने ये कार्रवाई की है। कानपुर के चौबेपुर थाने में पोस्टेड सभी सब इंस्पेक्टर, कॉन्स्टेबल और हेड कॉन्स्टेबल का पुलिस लाइंस में ट्रांसफर कर दिया गया है। वहीं अब थाने में नए पुलिस कर्मियो की तैनाती की गई है।

इससे पहले कानपुर मुठभेड़ में आठ पुलिस कर्मियों की हत्या के बाद शक के घेरे में आए चौबेपुर के थानाध्यक्ष विनय तिवारी को निलंबित कर दिया गया था।

उल्लेखनीय है कि कानपुर में 8 पुलिसकर्मियों की जान लेने वाले विकास दुबे पर नकेल कसने की दिशा में पुलिस ने विकास के सबसे बड़े सहयोगी अमर दुबे को एनकाउंटर में मार गिराया है। हमीरपुर में बुधवार (जुलाई 8, 2020) की सुबह यूपी एसटीएफ और हमीरपुस पुलिस को एक संयुक्त ऑपरेशन के दौरान ये सफलता मिली। अमर दुबे मध्य प्रदेश की सीमा में घुस कर फरार होने की कोशिश में लगा था।

वहीं यूपी पुलिस ने 15 ऐसे लोगों का पोस्टर जारी किया है, जिन पर विकास दुबे की मदद करने का संदेह है। पोस्टर में उन सभी सहयोगियों का नाम भी साफ़ तौर पर लिखा है।