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मारा गया विकास दुबे का दाहिना हाथ अमर दुबे: CO देवेंद्र मिश्र को घसीट कर मारा था, ₹25000 का था इनाम

कानपुर में 8 पुलिसकर्मियों की जान लेने वाले विकास दुबे पर नकेल कसने की दिशा में यूपी पुलिस को बड़ी कामयाबी मिली है। पुलिस ने विकास के सबसे बड़े सहयोगी अमर दुबे को एनकाउंटर में मार गिराया है। हमीरपुर में बुधवार (जुलाई 8, 2020) की सुबह यूपी एसटीएफ और हमीरपुस पुलिस को एक संयुक्त ऑपरेशन के दौरान ये सफलता मिली। अमर दुबे मध्य प्रदेश की सीमा में घुस कर फरार होने की कोशिश में लगा था।

जब उसने देखा कि मध्य प्रदेश की सीमा पर यूपी पुलिस ने सख्ती बरती हुई है और वाहनों की चेकिंग की जा रही है, उसने वहाँ जाने का विचार त्याग दिया। इसके बाद वो हमीरपुर के मौदहा में अपने एक सम्बन्धी के यहाँ जाने की फ़िराक़ में था लेकिन एसटीएफ को उसके इरादों की भनक लग गई। उसके पास से एक बैग और एक ऑटोमॅटिक फायर आर्म बरामद हुआ है। फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने एनकाउंटर साइट पर पहुँच कर जाँच शुरू कर दी है।

इस एनकाउंटर में दो पुलिसकर्मियों भी घायल हुए हैं। एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (ADG, लॉ एंड आर्डर) प्रशांत कुमार ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को बताया कि कानपुर में पुलिसकर्मियों की हत्या मामले में अमर दुबे नामजद आरोपित था। उन्होंने बताया कि अमर दुबे के ऊपर 25,000 रुपए का इनाम रखा गया था। उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।पुलिस ने उन सभी को खँगालना शुरू कर दिया है।

बता दें कि अमर दुबे के बारे में एसटीएफ को तब जानकारी मिली, जब वो विकास दुबे के ठिकानों की तलाश में लगी थी।कानपुर के स्थानीय लोग उसे विकास दुबे का दाहिना हाथ मानते हैं। जैसे ही उसके ठिकाने के बारे में एसटीएफ को पता चला, हमीरपुर जिले के उक्त क्षेत्र को सील कर के व्यापक तलाशी अभियान शुरू कर दिया गया। पुलिस उसकी तलाश कर रही थी लेकिन घिर जाने के बाद उसने पुलिस पर गोलियाँ बरसानी शुरू कर दी।

बाद में पुलिस द्वारा की गई जवाबी फायरिंग में एक अपराधी के मारे जाने की सूचना मिली, जिसके पहचान अमर दुबे के रूप में की गई। बता दें कि गुरुवार और शुक्रवार के दिन अमर दुबे अपने आका विकास दुबे के घर में ही मौजूद था और पुलिस पर हमले की साजिश रचने और गोलीबारी करने में शामिल था। इसके बाद से ही वह 8 पुलिसकर्मियों की हत्या मामले में विकास की तरह ही फरार चल रहा था।

बताया गया है कि पुलिस उसे ज़िंदा पकड़ना चाहती थी लेकिन सरेंडर करने की अपील के बावजूद उसने फायरिंग की, जिसके बाद पुलिस को भी मजबूरन जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। उधर विकास दुबे भी अपने वकीलों की सलाह के बाद कोर्ट में सरेंडर की फिराक में है क्योंकि उसे डर है कि एनकाउंटर में उसे मार गिराया जा सकता है। फरीदाबाद में उसके दो क़रीबी हिरासत में हैं, जिनसे पूछताछ चल रही है।

अमर दुबे अपनी धाक जमाने के लिए दिखावे का शौक़ीन था और बंदूकें लेकर महँगी गाड़ियों के साथ फोटो क्लिक करवाता था। ‘दैनिक भास्कर’ के अनुसार, अमर और उसके साथी बिल्हौर के सीओ देवेंद्र मिश्र को घसीट कर विकास दुबे के मामा प्रेम कुमार पांडे के घर में ले गए और गोलियों से भून दिया था। मिश्र पर धारदार हथियार से भी वार किए थे। प्रेम कुमार पांडे पहले ही एनकाउंटर में मारा गिराया जा चुका है।

विकास दुबे के बारे में पता चला है कि वो मंगलवार को फरिदाबाद स्थित एक होटल में छिपने के लिए पहुँचा था। शक है कि उसने अपनी वेशभूषा बदल रखी थी। जब होटल के कर्मचारी ने उससे कहा कि उसे अपनी आईडी दिखा कर पेमेंट करना होगा, तो वो वहाँ से निकल गया। पुलिस ने होटल पहुँच कर उसके कुछ साथियों को दबोच लिया लेकिन वो फरार हो गया। कहा जा रहा है कि वो ऑटो और टैक्सी से घूम रहा है।

सबसे बड़ी संख्या ‘ग्राहम नंबर’ की खोज करने वाले महान गणितज्ञ रॉन ग्राहम का निधन, मौत के कारणों का पता नहीं

सोमवार (06 जुलाई, 2020) को 84 वर्ष की उम्र में महान गणितज्ञ रॉन ग्राहम का निधन हो गया। इनका पूरा नाम रोनाल्ड लेविस ग्राहम था। उन्होंने ग्राहम नंबर की खोज की, जो एक प्रमाण में इस्तेमाल किया गया सबसे बड़ा नंबर है। ग्राहम की संख्या मन-क्रम से भी बड़ी है। यह ब्रह्मांड की आयु -13.8 * 10 ^ 9 वर्ष या 4.343 * 10 ^ 17 सेकंड से भी बड़ी है।

ग्राहम की संख्या एवोगाद्रो की संख्या- 6.02214129 x 10^23, जोकि हाइड्रोजन के 1 ग्राम में पाए जाने वाले हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या है, से भी बड़ी है। यह ब्रह्मांड में परमाणुओं की कुल संख्या 10 ^ 78 – 10 ^ 82 से भी बड़ी है। इतना ही नहीं यह googol (10 ^ 100) से भी बड़ी है। दरअसल googol का नाम ही बाद में Google पड़ा था।

ग्राहम की संख्या अब तक खोजे गए सबसे बड़े प्राइम नंबर (2 ^ 57,885,161) से भी बड़ी है। इसमें 17,425,170 अंक हैं, जो वास्तव में बहुत ही बड़ी संख्या है। ज्ञात हो कि इसमें 10 ^ 100 में केवल 101 अंक होते हैं, लेकिन हम ग्राहम की संख्या के आसपास भी नहीं हैं।

ग्राहम की संख्या Googolplex (10 ^ Googol) से बड़ी है, जो अपने आप में बहुत बड़ा है। इसमें अंकों की संख्या Googol+1 है। दरअसल इस संख्या के बाद इस मुख्यालय का नाम Googleplex रखा गया।

ग्राहम की संख्या वास्तव में इतनी बड़ी है कि ब्रह्माण्ड में ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ इसे लिखा जा सके। लिखने में यह सचमुच बहुत बड़ी है, लेकिन यह संख्या परिमित है और इसके अकल्पनीय होने के बावजूद यह 3 से विभाजित है और 7 में समाप्त होता है! रॉन ग्राहम ने कम्प्यूटेशनल जियोमेट्री, शेड्यूलिंग थ्यौरी और रैमसे थ्यौरी में बहुत महत्वपूर्ण काम किया था,

आपको बता दें कि रॉन ग्राहम का जन्म वर्ष 1935 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में हुआ था। वह एक महान अमेरिकी गणितज्ञ थे। रॉन ग्राहम ने कम्प्यूटेशनल जियोमेट्री, शेड्यूलिंग थ्यौरी और रैमसे थ्यौरी में बहुत महत्वपूर्ण काम किया था। वह कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट फॉर टेलीकम्यूनिकेशंस एंड इंन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी में मुख्य वैज्ञानिक थे।

1993-94 के बीच ग्राहम अमेरिकन मैथ मेटिकल सोसायटी के अध्यक्ष भी रहे थे। इनका पूरा नाम रोनाल्ड लेविस ग्राहम था। हालाँकि, उनकी मौत के कारणों का अभी तक पता नहीं चल सका है।

कश्मीर की डल झील में रफीक अहमद डुंडू ने बंधक बनाकर दो माह तक किया था बलात्कार: ऑस्ट्रेलियाई महिला ने किया खुलासा

कश्मीर इलाके से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कश्मीर की डल झील में एक मुस्लिम रफीक अहमद डुंडू (Rafiq Ahmad Dundoo) ने ऑस्ट्रेलियाई महिला कारमेन ग्रीनट्री (Carmen Greentree) को दो महीने तक बंधक बनाकर रखा और उसके साथ हर रात बलात्कार किया गया। इस बात का खुलासा खुद पीड़िता ने अपनी एक पुस्तक में किया है।

जानकारी के मुताबिक घटना वर्ष 2004 में कश्मीर घाटी की है, कारमेन ग्रीनट्री उस समय 22 साल की थी। वो दिल्ली से धर्मशाला जाने की तैयारी कर रही थी। इसी बीच उन्हें एक गाइड द्वारा दिल्ली से कश्मीर और फिर वहाँ से धर्मशाला जाने के लिए सलाह दी गई। दिल्ली से कश्मीर पहुँचने के बाद वह ‘वाई एच सनबीम नाम की हाउसबोट पर सवार हुई।

वो कहती हैं, “इस बोट पर मुझे झाँसे में लेकर एक रात रोका गया। इसके बाद मुझे बोट पर बंधक बना लिया गया और रफीक अहमद डुंडू (Rafiq Ahmad Dundoo) द्वारा मेरे साथ हाउसबोट पर बार-बार दो महीने तक बलात्कार किया गया।”

फिलहाल, 37 वर्षीय शादीशुदा और तीन बच्चों के की माँ कामरेन ग्रीनट्री ने अपनी इस दर्दनाक और सच्ची घटना का जिक्र अपने द्वारा लिखी गई “ए डेंजरस परस्यूट ऑफ हैप्पीनेस” नामक पुस्तक में किया है। साथ ही महिला ने पुस्तक में यह भी बताया है कि आखिरकार वो कैसे इस जहन्नुम से बाहर निकलने में सफल रही।

पुस्तक के माध्यम से ऑस्ट्रेलियाई महिला कामरेन ग्रीनट्री ने बताया कि वह 2003 में महिला विश्व चैम्पियनशिप टूर क्वालीफाई करने से चूक गईं थी। इसके बाद कारमेन ने उत्तरी भारत में धर्मशाला में दलाई लामा के आश्रम में एक कोर्स करके आध्यात्मिक रास्ता तलाशने का विकल्प चुना, लेकिन नई दिल्ली पहुँचने पर कारमेन सरकारी पर्यटन ऑपरेटरों के रूप में प्रस्तुत करने वाले स्कैमर्स का शिकार हो गईं।

पीड़िता ने पुस्तक में लिखा कि उन्हें धर्मशाला की यात्रा करने के लिए श्रीनगर जाने के लिए मना लिया गया और इसके बाद कामरेन को हाउसबोट के एक कमरे में रहने के लिए मजबूर किया गया, जहाँ उसके साथ दो महीने तक बलात्कार किया गया और पीटा भी गया। मुझसे पहले ही आरोपित ने पासपोर्ट, दस्तावेज और सभी पैसों को ले लिया था। इसके बाद आरोपित ने उन्हें बैंक का डिटेल लेने के लिए मजबूर कर दिया था और उसके खाते से सभी 4,000 डॉलर निकाल लिए।

कामरेन ने बताया, “हालाँकि, इसके एक सप्ताह बाद आरोपित ने मेरे माता-पिता को फोन करने और अधिक पैसे माँगने के लिए मुझे मजबूर करना शुरू कर दिया। पुलिस ने आरोपित के स्थान को तलाश लिया और बोट से पुलिस ने मुख्य आरोपित और उसके भाई शब्बीर अहमद डुंडू को गिरफ्तार कर लिया। साथ ही पुलिस ने उसके पास से मेरे सभी दस्तावजों को बरामद कर लिया।”

पीड़िता ने बताया कि आरोपित डुंडू के परिवार में उसकी बुजुर्ग माँ और पिता, दो भाइयों और उसकी पत्नी ने भी उसकी मदद के लिए कुछ नहीं किया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बलात्कार के आरोप में उसने छह महीने जेल में काटे इसके बाद उसे रिहा कर दिया गया था।

डेली मेल की खबर के मुताबिक ऑस्ट्रेलियाई महिला ने बताया, “मुझे नहीं लगता था कि मैं कभी उस नाव से बाहर और उनके चुंगल से आजाद हो पाऊँगी। मुझे लगा कि मैं वहाँ इसी तरीके से मर जाऊँगी।”

ऑस्ट्रेलियाई लेखक ने आरोप लगाया कि उसे नाव में महिलाओं के साथ काम करने के लिए मजबूर किया गया। यहाँ तक कि वह बोट में पारंपरिक मुस्लिम पोशाक पहनने के लिए भी मजबूर थी।

कामरेन बताती है कि वह इस समय चिकित्सा के क्षेत्र में काम करती हैं और ऑस्ट्रेलिया के वोलोंगोंग के दक्षिण में स्थिक इलवारा झील के किनारे अपने पति ग्रांट और तीन बच्चों के साथ रहती हैं।

द कश्मीरियत नामक पोर्टल की खबर के मुताबिक इस सप्ताह के शुरू में कारमेन को ब्रिटेन के एक व्यक्ति द्वारा संपर्क किया गया था, जिसने बताया था कि नौ साल पहले उसी स्थान पर उसी वोट में उसे बंधक बनाया गया था और उससे सारा पैसा छीन लिया गया था। वहीं ऑस्ट्रेलियाई उच्चायोग के कर्मचारियों ने कहा था कि इस तरह की घटनाएँ पहले भी सामने आई हैं।

‘द वायर’ ने फिर फैलाया फेक न्यूज़, लिखा- ‘कोरोना प्रकोप के बाद NCPCR के पास दर्ज शिकायतों में हुई 8 गुना वृद्धि’

कोरोना वायरस महामारी के बीच कई मीडिया संस्थान सरकार का विरोध करने के लिए लगातार फेक न्यूज प्रसारित कर रहे है। ऐसे ही कई फर्ज़ी खबरों को प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की फैक्ट चेक टीम बेनकाब कर रही है। पीआईबी फैक्ट चेक ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे द कारवाँ, इंडियन एक्सप्रेस, स्क्रॉल और द वायर सहित कई अन्य मीडिया संस्थानों की फेक न्यूज का सच सबके सामने लाया है।

इन मीडिया संस्थानों ने अलग-अलग फेक न्यूज और वीडियों के माध्यम से सरकार की छवि खराब करने की लगातार कोशिश की है। रिपोर्टों का विश्वसनीयता से कोई सरोकार नहीं होता। वामपंथी वेबसाइट द वायर ने एक बार फिर से इसी ट्रैक पर चलते हुए झूठ फैलाया कि कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ने के बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के पास दर्ज शिकायतों में 8 गुना वृद्धि देखी गई।

The article published by The Wire on June 10, 2020

द वायर की “COVID-19 Lockdown Lessons and the Need to Reconsider Draft New Education Policy” शीर्षक से छपी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि COVID-19 के प्रकोप के बाद से राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पास दर्ज शिकायतों में भारी वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है, “पिछले साल NCPCR में लगभग 5,000 शिकायतें दर्ज की गई थी। कोरोना प्रकोप (मार्च 2020 की शुरुआत से) के बाद यह लगभग 8 गुना बढ़ गया है।”

The Wire’s article claiming thet NCPCR has seen a 8-fold surge in the number of complaints post lockdown

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि COVID-19 महामारी का बच्चों की शिक्षा पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है, विशेष रूप से सीमांत वर्गों के लोगों पर।

हालाँकि, प्रोपेगेंडा पोर्टल की रिपोर्ट में परोसे गए झूठ की पोल खुद पीआईबी ने फैक्टचेक कर खोली है। पीआईबी फैक्ट चेक की ट्वीट में कहा गया कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने शिकायत में 8 गुना वृद्धि को स्पष्ट रूप से नकार दिया है। इसमें कहा गया कि एनसीपीसीआर ने गलत सूचना प्रसारित करने को लेकर सावधान किया है और लोगों को गलत तथ्यों के हवाले से भ्रामक रिपोर्ट छापने के खिलाफ चेतावनी दी है।

पीआईबी के फैक्ट-चेक को नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन राइट्स ने भी समर्थन दिया है। नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन राइट्स ने पीआईबी के ट्वीट को रीट्वीट भी किया है।

गौरतलब है कि यह पहला मामला नहीं द वायर के द्वारा झूठ फ़ैलाने का, इनका लम्बा इतिहास रहा है, जैसे इससे बहुत पहले वामपंथी पोर्टल वायर की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने गोरखनाथ मंदिर को लेकर झूठ फैलाने की कोशिश की थी, जिसके बाद भारत के इतिहास के बारे में वामपंथी इतिहासकारों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने के लिए जाने जाने वाले ट्विटर हैंडल ट्रू इंडोलॉजी ने आरफ़ा खानम के ट्वीट पर एक के बाद एक ट्वीट कर फैक्ट-चेक कर दिया। 

इसी तरह अपनी एक रिपोर्ट में द वायर ने दावा किया कि पंजाब और हिमाचल की बॉर्डर रेखा के पास मुस्लिम समुदाय के कुछ बच्चे, औरतें, पुरुष नदी ताल पर बिना खाना-पीना के रहने को मजबूर हो गए हैं, क्योंकि उन्हें गाली देकर, मारकर उनके घरों से खदेड़ दिया गया है। बाद में होशियारपुर पुलिस को खुद इस पर संज्ञान लेना पड़ा और सबूत पेश करके साबित करना पड़ा कि द वायर झूठ फैलाने का काम कर रहा है और ऐसा कुछ भी नहीं हैं। द वायर ने गुजरात में वेंटिलेटर्स को लेकर भी झूठ परोसा था

मेघालय में 6 हिन्दू लड़कों पर 20 की भीड़ ने छड़, लाठी और बाँस से किया हमला: 11 आरोपित हिरासत में, जाँच जारी

मेघालय की राजधानी शिलॉन्ग के लॉसहटून इलाके में शुक्रवार (जुलाई 3, 2020) को छ: बंगाली हिंदू लड़कों की मॉब लिंचिग कर बुरी तरह से जख्मी करने के आरोप में 11 लोगों को हिरासत में लिया गया है।

बता दें कि शुक्रवार को 20 से 24 वर्ष के उम्र के 6 लड़कों पर लगभग 20 लोगों के एक समूह ने हमला किया, जो लोहे की छड़ और लाठी, बाँस आदि से लैस थे। सहायक पुलिस महानिरीक्षक जीके इंगराई के अनुसार, लॉसहटून में हमले की घटना शुक्रवार दोपहर 12:30 बजे हुई।

इंगराई ने बताया कि घायल लड़के शिलाॉन्ग के विभिन्न इलाकों से हैं। वो लॉसहटून ब्लॉक VI में बास्केटबॉल खेलने के लिए आए थे। उनका कहना था कि वो लोग पिछले दो हफ्तों से मैदान में आ रहे थे।

पुलिस ने बताया, “लगभग 12:30 बजे 20-25 अज्ञात लड़के, जो पहले से ही बास्केटबॉल कोर्ट में जमा हो गए थे, ने इन युवकों पर लोहे की छड़ और लाठी से हमला करना शुरू कर दिया। इस हमले में अरिंदम देब, सुभारशी दास पुरकायस्थ, सप्तर्षि दास पुरकायस्थ, बिनाक देब, बिशाल घोष और प्रीतिश देब बुरी तरह से जख्मी हो गए।”

घटना की सूचना मिलने पर पुलिस की एक टीम तुरंत घटना स्थल पर पहुँची। वहाँ उन्होंने बिशाल घोष और सप्तर्षि दास पुरकायस्थ को देखा, जो किसी तरह से जो बास्केटबॉल कोर्ट से भागने में सफल रहे थे। जीके इंगराई ने बताया, “पुलिस टीम ने इन दोनों युवाओं की स्थिति को देखते हुए उन्हें तुरंत चिकित्सा सहायता के लिए वुडलैंड अस्पताल पहुँचाया और अन्य चार पीड़ितों को भी इलाज के लिए उसी अस्पताल में ले जाया गया। अब उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।”

शीर्ष स्तर के पुलिस अधिकारी ने इस पर जानकारी देते हुए बताया कि आरोपितों के खिलाफ आपराधिक मामला नंबर 71 (07) 20 और आईपीसी की धारा 326, 307, 506 एवं 34 के तहत लेबन पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया गया। जिसके बाद 3 जुलाई को 3 संदिग्धों को हिरासत में लिया गया था और 8 संदिग्धों को पुलिस ने 4 जुलाई को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया।

उन्होंने कहा कि पीड़ितों के बयानों को भी दर्ज किया गया है और मामले की आगे की जाँच जारी है। मेघालय पुलिस ने सभी गवाहों से अपील की है कि वे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की जानकारी देने के लिए आगे आएँ और अपराधियों की पहचान करने में जाँच टीम की मदद करें। पुलिस के शीर्ष अधिकारी ने कहा, “जो लोग पुलिस टीम की मदद करने के इच्छुक हैं उनकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी और इसका खुलासा नहीं किया जाएगा।”

इसके साथ ही मेघालय पुलिस ने सांप्रदायिक शांति और सद्भाव को उकसाने या तोड़ने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी चेतावनी जारी करते हुए कहा कि कानून के संबंधित प्रावधानों के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

इस घटना के चश्मदीद गवाह रहे एक व्यक्ति ने बताया कि हमलावर हथियारों से लैस थे। उन्होंने बास्केटबॉल कोर्ट के एंट्री गेट को बंद कर दिया था, ताकि लड़के भाग न सके। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस हमले के बाद कोर्ट में खून ही खून था।

नेपाल के विवादित नक्शे के विरोध का सांसद सरिता गिरी पर गाज, पार्टी ने की उनकी सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश

नेपाल की सांसद सरिता गिरी को नेपाल के एक संवेदनशील मुद्दे पर अपनी बात रखने की भारी कीमत चुकानी पड़ी है। दरअसल, सरिता गिरी ने भारत के कुछ इलाकों को नेपाल में शामिल करने वाले मानचित्र का विरोध किया था। जिसके बाद उनके राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी ने उनकी सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश कर दी है। 

मंगलवार के दिन समाजवादी पार्टी के महासचिव राम सहाय प्रसाद यादव की अगुवाई में दल के एक टास्क फ़ोर्स ने सरिता गिरी की पार्टी सदस्यता और संसदीय सीट समाप्त करने की सिफारिश की। इस टास्क फ़ोर्स के दूसरे सदस्य मोहम्मद इश्तियाक के अनुसार सरिता गिरी ने दल के संसदीय निर्देशों का पालन नहीं किया जिसके आधार पर उनके खिलाफ यह माँग उठाई गई है। यह संविधान संशोधन विधेयक कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा समेत मानचित्र में तमाम संशोधन करने के लिए प्रस्तावित किया गया था। जिसका सांसद गिरी ने विरोध किया और यह हमारे दल के निर्देशों का उल्लंघन था।  

हालाँकि, सांसद सरिता गिरी ने विधेयक पर एक संशोधन का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया था। जिस प्रस्ताव को उनके दल के मुख्य सचेतक उमा शंकर अरगारिया ने वापस लेने का निर्देश दिया था। जिसे गिरी ने सिरे से अस्वीकार कर दिया था, इसके बाद उनके दल के तमाम नेता उनके विरोध में उतर आए थे। 

दरअसल, पिछले कुछ समय से नेपाल के भीतर सरकार को कई मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन चुनौतियों और विरोध के स्वरों को दबाने के लिए केपी ओली शर्मा ने यह पैंतरा आज़माया था। क्योंकि मुद्दा राष्ट्र-वाद से जुड़ा हुआ था इसलिए कोई विरोध में खुल कर सामने नहीं आया लेकिन सभी के ठीक विपरीत सांसद सरिता गिरी ने अपनी आवाज़ उठाई। 

इसके बाद वह एक-एक करके लगभग सारे ही राजनीतिक दलों के निशाने पर आ गईं। उन्हें चौतरफा दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, उनके घर पर हमला हुआ और उन्हें लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। यहाँ तक कि उन पर खुद की पार्टी के लोग तक तंज कस रहे हैं, उन्हें भारत की भक्त तक कहा जा रहा है। 

सांसद सरिता गिरी का क़सूर केवल इतना है कि उन्होंने नए नक्शे के लिए संविधान में संशोधन के लिए सरकार से सवाल कर दिया। वह केवल इतना जानना चाहती थीं कि किस आधार पर तमाम इलाकों को नेपाल में शामिल करने का दावा किया जा रहा है? उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा पर दावा करने के लिए सरकार के पास कोई आधार नहीं है। 

इतना ही नहीं यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के भी खिलाफ है, जिस आदेश के मुताबिक़ अगर सरकार किसी राष्ट्रीय प्रतीक में बदलाव करना चाहती है तो उसके लिए आधार अनिवार्य रूप से होना चाहिए। सरकार ने इस विधेयक में नए मानचित्र को शामिल करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं दी हैं। ऐसे तो हमारा सीमा विवाद चीन के साथ भी है, हम उस क्षेत्र की ज़मीन को नेपाल में शामिल क्यों नहीं कर पा रहे है? 

अंत में उन्होंने नए मानचित्र का विरोध करते हुए अपनी पार्टी के खिलाफ जाकर सदन में एक संशोधन प्रस्ताव भी पेश किया। साथ ही इस बात की पुरजोर माँग उठाई कि पुराना मानचित्र ही प्रभावी रहे। जिसके बाद अध्यक्ष ने प्रतिनिधि सभा की रूल बुक की धारा 122 का हवाला देते हुए उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। अंत में सांसद सरिता गिरी सदन से बाहर की ओर चली गईं। 

जून की शुरुआत में नेपाल संसद की प्रतिनिधि सभा में संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया गया था। नेपाल के केपी शर्मा ओली सरकार की तरफ से जिस दिन विवादित मानचित्र संबंधित संविधान संशोधन प्रस्ताव को संसद में पेश किया गया था, उसी दिन नेपाल के राजपत्र में इसे प्रकाशित भी कर दिया गया था। इससे पहले इस विवादित नक्शे का विरोध करने के लिए समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता पार्टी का विलय कराकर नई पार्टी जनता समाजवादी पार्टी बनाई गई थी। इसी पार्टी से सरिता गिरि सांसद हैं।

लेकिन, इसके बाद संभावित विरोध की इस हालात में उनकी पार्टी उनके साथ नहीं खड़ी हुई थी। प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेपाली कॉन्ग्रेस तो पहले ही इस प्रस्ताव का समर्थन करने का ऐलान किया था। यह बात हैरान करने वाली थी कि अक्सर भारत के पक्ष में रहने वाली नेपाल की मधेशी पार्टी ने भी संसद में इस बिल का विरोध नहीं किया था। जनता समाजवादी पार्टी की सांसद सरिता गिरि ऐसी पहली सांसद सामने आईं जिन्होंने इस संविधान संशोधन का विरोध किया था। सरिता गिरि ने ये भी दावा किया था कि नेपाल की जनता भी नहीं चाहती है कि मानचित्र को लेकर भारत के साथ कोई विवाद हो। उनकी राय थी कि नेपाल का नया मानचित्र जारी करने से पहले नेपाल को भारत से बातचीत करनी चाहिए थी।

कोरोना के दौरान भारत से अनाथ बच्चों को इटली, माल्टा, जॉर्डन भेजा गया: संस्था के CEO दीपक और मिशनरियों का गिरोह इसके पीछे

अनाथ बच्चों के दत्तक प्रक्रिया का नियमन करने वाली संस्था केंद्रीय दत्तक-ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के सीईओ/मेंबर सेक्रेटरी दीपक कुमार को पद से हटाने के निर्णय के बाद कई खुलासे हो रहे हैं। ऑपइंडिया के सूत्रों का कहना है कि दीपक कुमार की अगुवाई में कारा में एडॉप्शन प्रक्रिया की धज्जियाँ उड़ाने की अनेक सूचनाएँ प्राप्त हुई हैं। ईसाई मिशनरियों का बोलबाला रहा। इनकी तानाशाही और अवैधानिक कार्यशैली के तमाम किस्से हैं जो अबतक दबाए जाते रहे हैं।

ईसाईयों के साथ दीपक कुमार की साँठगाँठ

मंत्रालय में दीपक कुमार के खिलाफ मिली दर्जनों शिकायतों को नजरअंदाज करने में वहाँ के एक शीर्ष ईसाई अधिकारी की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है। यह भी जानकारी मिली है कि उसी बड़े अधिकारी ने दीपक कुमार का कार्यकाल बढ़ाने के लिए अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने की कोशिश भी की लेकिन केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने दीपक कुमार का कार्यकाल बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया और हटाने का फरमान सुना दिया।

आश्चर्य की बात है कि मंत्रालय के उक्त तथाकथित ईसाई अधिकारी ने दीपक कुमार के रिलिविंग लेटर को भी रोक रखा था। आमतौर पर किसी प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारी को तीस दिन पूर्व रिलीव होने की सूचना दे दी जाती है लेकिन यहाँ दीपक कुमार के मामले में उन्हें मात्र एक सप्ताह पूर्व पत्र जारी किया गया। ऑपइंडिया के हाथ लगे दस्तावेजों के अनुसार, दीपक कुमार के कार्यकाल में प्रवासी भारतीयों (NRI) को बच्चा गोद लेने के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है।

ऐसे भारतीयों को कारा से बच्चा गोद लेने के लिए तीन से सात साल तक प्रतीक्षा सूची में रहना पड़ता है लेकिन विदेशी ईसाई परिवारों को बहुत कम समय में बच्चा मिल जाता है। ईसाई मिशनरियों के प्रभाव का आलम यह है कि कारा के सीईओ दीपक कुमार ने कोरोना संकट और लॉकडाउन के समय भी बच्चों को विदेश भेजा। अप्रैल माह में भी विशेष विमान से ये बच्चे इटली, अमेरिका, माल्टा और जॉर्डन भेजे गए।

हैरान करने वाली बात यह भी है कि जिस समय विशेष विमान से इटली बच्चे भेजे गए, उस समय इटली में कोरोना से मौतों का कोहराम मचा हुआ था। कोरोना से वहाँ दुनिया में सर्वाधिक मौतें हो रही थीं और स्थिति ये थी कि लाशें उठाने वाले भी लोग नहीं थे। अमेरिका की भी यही स्थिति थी। प्रवासी भारतीयों को प्रतीक्षासूची में रखना और इटली वाले ईसाईयों को विशेष विमान से कोरोना काल में बच्चे भेजने की व्यवस्था करने में दीपक कुमार की मंशा सवालों के घेरे में है।

ऑपइंडिया ने अंदरूनी सूत्रों से बात कर के पाया है कि विदेशी एडॉप्शन कराने वाली एजेंसियाँ अप्रत्यक्ष रूप से कारा के उच्च अधिकारियों को आर्थिक फायदा पहुँचाती हैं और मनमाने तरीके से काम करवाने में सफल हो जाती हैं। कहने को यह मामला मानवीय दृष्टि से सही जताया जा सकता है लेकिन जिस प्रकार की तेजी विदेशियों के मामले में दीपक कुमार द्वारा दिखाई जाती है वह उनकी कार्यशैली को संदेहास्पद बनाती है।

वर्ष 2016 में दीपक कुमार के कारा में कार्यभार संभालने के बाद से अप्रत्याशित रूप से विदेशी एडॉप्शन में बढ़ोत्तरी हुई है। आँकड़े बयान करते हैं कि दीपक कुमार के आने के बाद देश के भीतर गोद लेने की संख्या घटी और विदेशों में बच्चे भेजने की संख्या बढ़ गई। दिलचस्प यह है कि ज्यादातर बच्चों को ‘विशेष आवश्यकता (Special Need)’ की केटेगरी में डाल कर फॉरेन एडॉप्शन का खेल जारी है।

ऐसे ही एक मामले में CARA में बच्चों के हित के विरुद्ध कार्यशैली पर दीपक कुमार के विरुद्ध बाम्बे हाइकोर्ट में याचिका सं FAP-41-19 (फ़रवरी 17, 2020) तथा जबलपुर हाइकोर्ट द्वारा Writ Petition No. 28071/2018 (मार्च 19, 2020) में कोर्ट ने फटकार भी लगाई थी। दीपक कुमार ने अपनी एक टीम बना रखी थी, जिसमें दर्जन भर ऐसी महिलाओं की संविदा पर नियुक्ति कर रखी है जिनमें से अधिकांश ईसाई समुदाय से आती हैं और ‘Young Women’s Christian Association’ से किसी न किसी रूप में जुड़ी हैं।

CARA में चलता था ईसाई महिलाओं का सिक्का

इनमें Cecilia Maria और Libia Marium Paul जैसी कई ईसाई महिलाएँ हैं जो दत्तक प्रक्रिया को मनमाने ढंग से अंजाम दे रही हैं। गौरतलब है कि Cecilia Maria को अज्ञात कारणों से दो माह के भीतर ही जूनियर से सीनियर प्रोफेशनल के पद पर प्रमोट कर दिया गया। आश्चर्य है कि इनका दत्तक कार्यों से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। बताया जाता है कि ये पहले किसी मिशनरी स्कूल में कार्यरत थीं।

सूत्रों का कहना है कि दीपक कुमार की यह संविदा टीम केवल मिशनरियों, दक्षिण भारतीय या भावी ईसाई दत्तक माता-पिता (Missionaries & South Indian or Christian Prospective Adoptive Parents) को ही संरक्षण देते हैं और ईसाई मिशनरी के अनुयायियों के रूप में काम करते हैं। इनके कारण लगभग 70% दत्तक माता-पिता दक्षिण भारत से आते हैं। विदेशी के रूप में वे केवल ईसाई दम्पति का चयन करते हैं।

आश्चर्यजनक रूप से CARA के अंदर संविदा पर नियुक्त इन सभी महिलाओं के पास ही दत्तक प्रक्रिया का प्रभार है। दीपक कुमार ने कारा में कार्यरत नियमित व स्थाई महिला अधिकारियों एवं कर्मचारियों को दत्तक मामलों से दूर रखा है। हमारे पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, कारा में मिन्नी जार्ज (Minnie George) नामक इसाई महिला संविदा पर कार्यरत हैं जो कि इसी मंत्रालय के अधीन दूसरे संगठन NIPCCD में ज्वाइंट डायरेक्टर केसी जार्ज की पत्नी हैं।

केसी जार्ज भी स्वयं CARA में संयुक्त निदेशक रह चुके हैं। उनके प्रभाव से ही इस महिला ने इस संस्था में नियुक्ति हासिल की। हाल ये है कि मिन्नी जार्ज के इशारे के बिना कोई भी विदेशी दत्तक प्रक्रिया (Foreign Adoption Process) पूरी नहीं हो सकती। आंतरिक सूत्रों का कहना है कि वह विदेशी ईसाई दम्पतियों को बच्चे दिलाने में अधिक रुचि रखती हैं। ये संविदा कर्मचारी गोद प्रक्रिया में गुप्त रूप से बेईमानी के खेल में शामिल हैं, जिसमें बच्चों को वर्षों तक रोकना भी शामिल है।

अपर्णा शर्मा और मिन्नी जार्ज ने दत्तक मामलों पर अपना एकाधिकार विकसित किया है। मिन्नी जॉर्ज के खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं, लेकिन CEO दीपक कुमार ने दबा दिया। अपर्णा शर्मा को भी बच्चों के आँकड़ों को गुप्त रखने/रोकने का दोषी पाया गया है। हैरानी की बात है कि ऑनलाइन सिस्टम में बच्चों की संख्या ब्लॉक करके रखा जाता है और गुप्त रूप से केवल ईसाई मिशनरियों को इसकी जानकारी दी जाती है अथवा उन देशों को ही ऑनलाइन बच्चे दिखाई देंगे जिनको ये लोग दिखाना चाहते हैं। हाल ही में ऐसे कई विदेशी पेरेंट्स लॉकडाउन के कारण भारत में ही फँस गए थे।

अपर्णा शर्मा को इसी मामले में कारा प्रशासन ने जनवरी 22, 2020 को दोषी पाया था लेकिन CEO दीपक कुमार ने वह फाइल दबा ली और काफी निचले स्तर के कुछेक कर्मचारियों को निकालकर खानापूर्ति कर दी। बताया जाता है कि ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में दीपक कुमार ने एक नियम बनवा लिया है कि कोई भी विदेशी एजेंसी भारत में अपना एजेंट नियुक्त कर सकती है और उसी एजेंट के माध्यम से वह विदेशी दत्तक (Foreign Adoption) की प्रक्रिया को सम्पन्न कर सकती है।

ईसाई संगठनों के एजेंटों को दी जाती है भारी-भरकम रकम

इसका मतलब ये है कि उन्हें प्रत्यक्ष उपस्थित न होने की छूट मिल गई। गौरतलब है कि जो भारत में एजेंट कार्यरत हैं, वे सभी ईसाई संगठनों के एजेंट हैं जिन्हें वेतन के रूप में बड़ी रकम दी जाती है। कारा के सूत्रों का कहना है कि दीपक कुमार तानाशाही प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में उन सभी लोगों को बर्बाद कर दिया जिसने उनके विरुद्ध थोड़ी भी आवाज उठाई। कारा में ही कार्यरत एक स्थाई महिला सहकर्मी ने दीपक कुमार पर प्रताड़ना की शिकायत की थी लेकिन मंत्रालय के कुछ अधिकारियों ने उन्हें बचा लिया।

इसके बाद उल्टा उस महिला का ही शोषण शुरू कर दिया गया था। हमें ये भी पता चला है कि ICMR के पूर्व वैज्ञानिक एसकेडी विश्वास ने कारा में प्रतिनियुक्ति के दौरान दीपक कुमार की कार्य़शैली पर सवाल उठाए थे। उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी तथा गृह मंत्री को पत्र लिखकर दीपक कुमार के कारनामों को उजागर किया था। लेकिन, अंततः वे इतने प्रताड़ित किए गए थे कि उन्होंने कारा छोड़ने का फैसला किया।

दीपक कुमार के नेतृत्व में विगत कुछ वर्षों में साजिश के तहत अनेक राष्ट्रवादी संस्थाओं पर जानबूझकर जुर्माना ठोका गया है और उनकी फंडिंग रोकी गई हैं ताकि ईसाई मिशनरियों को लाभ मिले तथा ये संस्थाएँ बदनाम हों जाएँ। पता चला है कि राष्ट्रवादी संस्थाओं को बदनाम कर के वनवासी क्षेत्रों में सक्रिय मिशनरियों को लाभ पहुँचाया गया है। दीपक कुमार ने अपने मूल विभाग के उच्च अधिकारियों की घर में बैठी पत्नियों को भी CARA में नौकरी दे रखा है।

शालिनी पीयूष उनके बॉस की पत्नी हैं जिनको दत्तक कार्य का कोई अनुभव नहीं है लेकिन CARA में वह अच्छे वेतन पर नौकरी कर रही हैं। मिन्नी जार्ज महाराष्ट्र की प्रभारी हैं। उन्होंने एक संस्था से एक बच्चे को बेल्जियम के एक अस्वस्थ ईसाई दंपत्ति को गोद लेने हेतु विभाग से अनापत्ति पत्र (NOC) जारी करवा दिया था। महाराष्ट्र की उस संस्था ने इसके विरुद्ध बाम्बे हाइकोर्ट में याचिका (संख्या FAP-41-19) दाखिल की थी।

उच्च न्यायालय ने उक्त प्रकरण मे CARA के निदेशक व ज्वाइंट डायरेक्टर को बुलाकर फटकार लगाई थी व इस संदर्भ मे दिनांक फ़रवरी 17, 2020 को आदेश पारित कर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए थे। न्यायालय ने अपने उक्त आदेश में CARA द्वारा बच्चे के भविष्य की परवाह न करने तथा अन्य अनियमितताओं का उल्लेख किया है। दीपक कुमार के इस रवैये पर मीडिया क्यों शांत है, ये भी चर्चा का विषय है।

ऑपइंडिया ने इससे पहले किया था दीपक कुमार का ईसाई मिशनरियों के साथ संबंधों का खुलासा

इससे पहले ऑपइंडिया ने खुलासा किया था कि जब से दीपक कुमार ने कारा (CARA) के सीईओ का प्रभार सँभाला, तभी से नियमों को ताक पर रख कर बच्चों को गोद दिए जाने की प्रक्रिया अपनाई जाने लगी। सूत्रों का ये भी कहना है कि दीपक कुमार ने अनियमितताएँ बरतते हुए अपने करीबियों को CARA में बिठाया और इसका एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह संचालन शुरू कर दिया। मंत्रालय को काफी शिकायतें मिलीं कि एडॉप्शन की प्रक्रिया में संविदा कर्मचारियों द्वारा रक़म की वसूली की जा रही है।

दीपक कुमार को इतना बड़ा पद दिए जाने के पीछे भी कुछ बड़े अधिकारियों की मिलीभगत थी। सूत्रों के अनुसार, एक साजिश के तहत 2016 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के ही कुछ बड़े अधिकारी उन्हें लेकर आए थे। वो आर्मी के सिग्नल कोर में फाइबर इंजिनियर थे और उनकी शिक्षा-दीक्षा भी इंजीनियरिंग में ही हुई है। CARA के कामकाज का जो तरीका है, उसे लेकर उन्हें न कोई अनुभव था और ही कोई ज्ञान।

 मनमाफिक कामकाज की प्रक्रिया अपनाने के लिए दीपक कुमार ने कारा के कई नियमों को बदल भी दिया था। उन्होंने अपने सम्बन्धियों को कारा में घुसाने के लिए भी बड़ी चालाकियाँ की। सबसे पहले तो उन्हें चपरासी के रूप में नियुक्ति दी और फिर धीरे-धीरे उनको कारा में एडवाइजर बना कर मोटी रकम देनी शुरू कर दी। भर्ती किए गए संविदाकर्मी फिर विदेशी एजेंसियों के साथ साँठगाँठ कर ख़ुद भी कमाई करने लगे।

इसमें भारतीय पेरेंट्स को जम कर इंतजार कराया गया और उनकी सीनियोरिटी को धता बताते हुए विदेशियों को प्राथमिकता दी गई। भारतीय पेरेंट्स इंतजार करते रहे। भारत में अगर किसी को इस प्रक्रिया में लाभ पहुँचाया भी गया तो उन्हें ही जो काफी संपन्न थे। मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को भी ख़ासी परेशानी हो रही है, जिन्हें उन संस्थाओं में रहने को मजबूर किया उनके देखरेख और पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की गई।

तूतीकोरिन में पुलिस हिरासत में हुई पिता पुत्र की दर्दनाक मौत की जाँच अब सीबीआई के हवाले, केंद्र ने दी मंजूरी

तमिलनाडु सरकार ने पिछले महीने ही यह स्पष्ट कर दिया था। जिस तरह पुलिस की हिरासत में पिता पुत्र की दर्दनाक तरीके से मौत हुई है, इसे देखते हुए हम यह मामला सीबीआई को सौंपने की सिफारिश करेंगे। केंद्र सरकार की तरफ से अधिसूचना जारी होने के बाद मद्रास उच्च न्यायालय ने भी एक आदेश जारी किया है। 

आदेश के मुताबिक़ जब तक सीबीआई अपनी तरफ से कार्रवाई शुरू नहीं करती है तब तक सीआईडी की विशेष शाखा सीबी-सीआईडी मामले की जाँच करेगी। ज़िले के संथाकुलम थाने में हुई पिता पुत्र की मौत के बाद 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। जिसमें एक इंस्पेक्टर समेत कुल 5 पुलिस वाले शामिल थे। 

तमिलनाडु में तूतीकोरिन में पुलिस हिरासत में पिता और बेटे की की मौत हुई थी। पुलिस ने तूतीकोरिन में पी जयराज (59) और उनके बेटे जे बेनिक्स (Benicks/Fenix) (31) को निर्धारित समय के बाद भी मोबाइल की दुकान खोले रखने पर 19 जून को गिरफ्तार किया था। जिसके बाद उनकी हिरासत में ही मृत्यु हो गई। आरोप है कि उन्हें हिरासत में यातना दी गई, जिससे उनकी मौत हो गई।

चेन्नई स्थित समाचार वेबसाइट ‘द फेडरल’ ने उन चश्मदीदों की बातों का जिक्र किया, जिन्होंने यह दावा किया था कि दोनों जेल में रहते हुए यौन उत्पीड़न के शिकार हुए थे। मृतक जे बेनिक्स के एक दोस्त राजकुमार ने कहा- “20 जून को सुबह 7 से 12 बजे के बीच, पिता और पुत्र ने कम से कम सात लुंगियाँ (शरीर के निचले भाग में पहना जाने वाला कपड़ा) बदली थीं, क्योंकि वे अपने मलाशय से खून बहने के कारण गीले हो गए थे।”

बेनिक्स के मित्र ने यह भी कहा कि उन्हें निर्देश दिया गया था कि वे दोनों को संथकुलम के सरकारी अस्पताल में ले जाने के लिए एक वाहन की व्यवस्था करें। फिर, पिता-पुत्र ने स्पष्ट रूप से अपने मलाशय में दर्द की शिकायत की थी। उन्हें काफी खून बह रहा था और उनकी लुंगी को अस्पताल ले जाते समय रास्ते में बदलना पड़ा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गिरफ्तारी के चार दिन बाद दोनों पिता-पुत्र की अस्पताल में मौत हो गई थी। परिजनों का आरोप है कि तमिलनाडु पुलिस ने पिता और बेटे की हिरासत में खूब पिटाई की थी और पुलिस द्वारा की गई मारपीट और हिंसा के निशान मृतकों के शरीर पर थे। घर वालों की माँग है कि आरोपी पुलिस कर्मियों पर हत्या का मामला दर्ज किया जाए।

मृतक जे बेनिक्स (फ़ेनिक्स) के मित्र राजकुमार ने कहा था कि पुलिस उसे जयराज समझकर 19 जून को स्टेशन पर ले गई। इसके बाद बेनिक्स ने स्टेशन पर जाकर पूछताछ की। राजकुमार के अनुसार, “जब उसने अपने पिता के खिलाफ पुलिस की बर्बरता पर सवाल उठाया, तो पुलिसकर्मियों ने उसे उसके कॉलर से पकड़ लिया और उसे दीवार की ओर धकेल दिया। 

सब-इंस्पेक्टर और कांस्टेबल सहित कम से कम पाँच पुलिसकर्मियों ने उसे हमारे सामने बुरी तरह से पीटा।” घटना के बाद तमिलनाडु के तमाम इलाकों में इसका काफी विरोध हुआ था और कुछ दिन बाद पूरे देश में इस घटना को लेकर काफी आक्रोश था। सोशल मीडिया, खासकर ट्वीटर और फेसबुक पर पिता – पुत्र के नाम का हैशटैग भी ट्रेंड में रहा था।  

केरल नन रेप केस में आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल की जमानत याचिका हुई खारिज, करना होगा ट्रायल का सामना

केरल हाई कोर्ट ने नन रेप मामले में आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। आरोपित बिशप ने खुद को इस मामले में बरी करने की अपील की थी। न्यायमूर्ति वी शिरसी ने मंगलवार (जुलाई 7, 2020) को जालंधर क्षेत्र के बिशप को निर्देश दिया कि रेप मामले में वह ट्रायल का सामना करे। 

फ्रेंको ने अपनी याचिका में दावा किया था कि उसे दोषी साबित करने के लिए सबूतों की कमी है। यह दलील दी गई कि गवाहों के दर्ज बयानों में विरोधाभास था और इसलिए मामले को आगे बढ़ाने के लिए कोई सबूत नहीं है।

हालाँकि, अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि फ्रेंको जानबूझकर मामले के मुकदमे में देरी करने की कोशिश कर रहा था। इस मामले में बिशप के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। FIR और पीड़िता द्वारा दिए गए गुप्त बयान में बिशप के घिनौने कृत्य के स्पष्ट प्रमाण हैं।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति शर्की वी की एकल पीठ ने बिशप की याचिका खारिज करते हुए अभियोजन के इस तर्क को स्वीकार किया कि रेप के मामले में मुलक्कल के खिलाफ प्रथम दृष्ट्या पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। इस वर्ष मार्च में निचली कोर्ट द्वारा बरी किए जाने की याचिका खारिज करने के बाद रोमन कैथोलिक गिरजाघर के वरिष्ठ पादरी ने समीक्षा याचिका दायर की।

गौरतलब है कि बिशप के खिलाफ कोट्टायम जिले में पुलिस ने रेप का मामला दर्ज किया था। हाई कोर्ट में दायर याचिका में पादरी ने कहा कि जब उन्होंने पीड़िता नन से वित्तीय लेन-देन को लेकर सवाल किया तो उसने उन्हें फँसा दिया।

पुलिस को जून 2018 में दी गई शिकायत में नन ने आरोप लगाए थे कि 2014 से 2016 के बीच बिशप ने उसका कई बार यौन शोषण किया। 2018 में पुलिस की एक विशेष जाँच टीम द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद बिशप ने 40 दिन जेल में बिताए। इसके बाद उसे जमानत मिल गई थी।

उल्लेखनीय है कि इस मामले की प्रमुख गवाहों में से एक सिस्टर लिसी ने पिछले दिनों आरोप लगाया था कि उनके वरिष्ठ लोग लगातार उन पर फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ दिए गए बयान को बदलने के लिए दबाव डाल रहे हैं। वहीं आरोपित बिशप को नोटिस जारी करने के बाद केरल पुलिस के एक अधिकारी का तत्काल तबादल कर दिया गया था।

पीएम ओली की कुर्सी बचाने में पूरी ताकत से जुटीं चीनी राजदूत, आतंरिक मामलों में दखल से नेपाल में बढ़ा विवाद

नेपाली पीएम केपी शर्मा ओली की कुर्सी को बचाने में चीन की राजदूत हाओ यांकी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। चीनी राजदूत एक के बाद एक बड़े नेताओं से मुलाकात कर अपना अहम रोल अदा कर रही हैं। खबर यह भी है कि चीनी राजदूत ने नेपाल के राष्ट्रपति से गुप्त मुलाकात भी की है। इसे लेकर नेपाल के अंदर ही उनका अब विरोध शुरू हो गया है। इतना ही नहीं नेपाल के कई पूर्व राजनयिकों और राजनेताओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है।

नेपाली अखबार काठमांडू पोस्‍ट के मुताबिक पिछले एक सप्‍ताह में चीनी राजदूत हाओ ने नेपाल की राष्‍ट्रपति बिद्या भंडारी, नेपाल कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के वरिष्‍ठ नेता माधव कुमार, झालानाथ खनल से मुलाकात की है। ये सब ऐसे समय में किया जा रहा है कि जब पीएम ओली पर उनकी ही पार्टी के नेता लगातार पीएम पद से इस्‍तीफा देने के ल‍िए दबाव बना रहे हैं।

खबरों के मुताबिक 3 जुलाई को चीनी राजदूत ने राष्‍ट्रपति बिद्या भंडारी से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद चीनी राजदूत और ज्‍यादा सवालों के घेरे में आ गईं है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस मुलाकात के बारे में नेपाली राष्‍ट्रपति के कार्यालय में तैनात विदेश मंत्रालय के अवर सचिव को भी अवगत नहीं कराया गया, जबकि संवैधानिक रूप से ऐसा करना जरूरी होता है।

नियम यह भी है कि ऐसी मुलाकात के दौरान विदेश मंत्रालय के अध‍िकारी मौजूद रहें, लेकिन उन्‍हें कोई सूचना ही नहीं दी गई। यही कारण है कि राष्‍ट्रपति और चीनी राजदूत के बीच क्‍या बातचीत हुई इसकी अभी तक किसी को कोई जानकारी नहीं है।

चीनी राजदूत के इस कदम को नेपाल की आंतरिक राजनीति में हस्‍तक्षेप माना जा रहा है। यही नहीं नेपाली विदेश मंत्रालय ने भी कहा कि चीनी राजदूत के मामले में राष्‍ट्रपति राजनयिक आचार संहिता का उल्‍लंघन कर रही हैं।

खबर यह भी है कि नेपाली राष्‍ट्रपति इन दिनों खुद ही अपनी पार्टी में विवादों में चल रही हैं। विद्या भंडारी को प्रचंड बनाम ओली की इस लड़ाई में ओली का समर्थक माना जाता है। याद रहे कि पुष्‍प कमल दहल प्रचंड, झालानाथ खनल समेत नेपाल कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के 44 में से 30 सदस्‍यों ने 30 जून को ओली से पीएम पद और पार्टी अध्‍यक्ष के पद से इस्‍तीफा देने के लिए कहा था।

पूर्व राजदूत लोकराज बरल कहते हैं, “मैं अपने नेताओं को आंतरिक मामलों में हस्‍तक्षेप का न्‍यौता देने के लिए आलोचना करता हूँ। इससे पहले भारतीय राजदूत इस तरह की चीजों में शामिल रहते थे और अब चीन की बारी है।” उन्‍होंने कहा कि नेपाल में अब भारत के साथ संबंध को चीन के मुकाबले ज्‍यादा संदेह के साथ देखा जाता है।

बरल ने कहा कि जब भारतीय राजदूत यह करते थे तो कहा जाता था कि यह हस्‍तक्षेप है, लेकिन यह चीन पर लागू नहीं हो रहा है। केवल मीडिया ही इस पर सवाल उठा रही है, कोई नेता इस पर आपत्ति नहीं कर रहा है।

इससे पहले ओली के राजनीतिक भविष्य पर निर्णय करने के लिए देश की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की स्थाई समिति की महत्वपूर्ण बैठक 8 जुलाई, 2020 तक के लिए टाल दिया है। पार्टी के शीर्ष नेता ओली के काम करने के तरीकों को निरंकुश बता रहे हैं।

नेपाल के भारत विरोधी एजेंडे के लिए होऊ यांगी जिम्मेदार बताई जा रही हैं। होऊ यांगी नेपाल में चीन की राजदूत हैं। पहले नेपाल के नए नक्शे के पीछे उनका ही हाथ बताया गया था। अब कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि होऊ यांगी की दखल नेपाल के आर्मी हेडक्वार्टर से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक है।