Home Blog Page 4695

माँ और जाति की गाली देकर मुस्लिमों ने धारदार हथियारों से किया घायल: बेगूसराय में महादलितों का आरोप

बिहार के बेगूसराय से मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों द्वारा महादलितों की पिटाई करने और उन पर अत्याचार करने का मामला सामने आया है। ये घटना बरौनी थाना क्षेत्र स्थित पिपरा देवास गाँव की है, जहाँ शंकर पासवान और उनके परिवार वालों के साथ ज्यादतियाँ की गईं। ये इलाक़ा पहले से ही संवेदनशील है और यहाँ पहले भी इस तरह की घटना कई बार हो चुकी है। ऑपइंडिया ने इस सम्बन्ध में पीड़ितों से बातचीत की और उनका पक्ष जाना।

क्या कहते हैं स्थानीय हिन्दू संगठन और ग्रामीण?

‘हिन्दू संघर्ष समिति’ के युवाओं का कहना है कि पिपरा देवास पंचायत के वार्ड नंबर 13 में महादलित समुदाय के ऊपर अत्याचार किया गया। सोमवार (जुलाई 6, 2020) को जिले के बरौनी प्रखण्ड के पिपरा देवास पंचायत के शिव मंदिर के प्रांगण में ‘हिंदू संघर्ष समिति’ के बैनर तले ग्रामीण विजय पासवान की अध्यक्षता में आयोजित सभा में पीड़ित शंकर पासवान ने बताया कि मुस्लिम युवक नशे में धुत होकर महादलितों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं।

ताज़ा घटना में भी स्थानीय मुस्लिम युवकों पर महादलितों को ‘दुसाध-दुसाध’ बोल कर जाति के नाम पर अपमानित करने का आरोप लगाया गया है। शंकर पासवान का आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के असामाजिक तत्वों द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं को भी गालियाँ बकी जाती हैं।

उन्होंने बताया कि जब आरोपितों को मना किया गया तो उन्होंने असलहे, तलवार, लाठी-डंडे, लोहे के रॉड और भालों के साथ उनके मोहल्ले को घेर लिया और विधवा मुन्नी देवी के खपरैल घर को दारू की बोतलों और ईंट से मार कर चूर-चूर कर दिया।

वहीं विजय पासवान को प्रशासन से भी शिकायतें थीं। उन्होंने कहा कि घायलों पर FIR करना प्रशासन की दमनकारी नीति को दिखाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन के कारण दर्जनों हिन्दू परिवार प्रताड़ित होने को मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि घटना के 5 दिन बीतने के बावजूद असामाजिक तत्वों में से एक को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया, जो प्रशासन के तानाशाही रवैये का प्रदर्शक है।

‘हिन्दू संघर्ष समिति’ के ही एक अन्य सदस्य बिट्टू शाह का कहना है कि जिला प्रशासन ने अगर आरोपितों की गिरफ़्तारी नहीं की तो राष्ट्रवादी युवाओं द्वारा बड़ा आंदोलन किया जाएगा। भाजपा युवा मोर्चा के मंडल अध्यक्ष दीपक पोद्दार ने प्रशासन से अपील की है कि जल्द से जल्द इस मामले को संज्ञान में लिया जाए नहीं तो कोई भी अप्रिय घटना घट सकती है। ग्रामीणों में इस काण्ड को लेकर आक्रोश व्याप्त है।

थाने में दर्ज कराई गई FIR में क्या है?

थाने में दोनों ही पक्षों द्वारा FIR दर्ज कराई गई है। इसके अनुसार मोहम्मद छोटू और राजा मियाँ सहित मुस्लिम समुदाय के कुछ युवकों ने महादलित समुदाय से आने वाले विवेक कुमार के साथ गाली-गलौज किया और जातिगत टिप्पणी की। विवेक अपने अन्य साथियों के साथ एक दुकान पर गए हुए थे, तब ये घटना हुई। एफआईआर में शंकर पासवान ने लिखा है कि वो मजदूरी कर के घर लौटे थे, तभी उन्हें विवेक के साथ हुई घटना की सूचना मिली।

एफआईआर के अनुसार, विवेक जब रोते-रोते घर आए तो शंकर पासवान ने अपने समाज के कुछ लोगों के साथ जाकर दुकान पर जब इस बारे में शिकायत की तो मोहम्मद शाहनवाज, मोहम्मद खालिद, मोहम्मद ज़ुबैर, मोहम्मद इस्राइल, मोहम्मद शादिक मियाँ, मोहम्मद इमरान और मोहम्मद मंजूर आलम सहित अन्य मुस्लिम समुदाय के लोग उग्र हो गए। उन्होंने महादलित समुदाय के लोगों को गाली देना और जातिसूचक टिप्पणी करना शुरू कर दिया।

एफआईआर में कई मुस्लिमों पर मारपीट का आरोप

एफआईआर के अनुसार, मुस्लिम समुदाय के आरोपितों ने महादलितों के घर की बहू-बेटियों की इज्जत लूट लेने की धमकी दी और साथ ही पूछा कि भला एक ‘दुसाध’ क्या कर लेगा? इसके बाद शंकर पासवान के सिर पर ईंट से वार किया गया जबकि विवेक पर भी धारदार हथियार से हमला कर दिया गया। इससे अमित और सोनू सहित कई अन्य लोग घायल हो गए। शंकर पासवान ने शिकायत दर्ज कराई है कि उस तरफ से कई अन्य अभियुक्त लगातार ईंट-पत्थर चला रहे थे।

साथ ही मोहम्मद ज़ुबैर पर शंकर पासवान के गले से सोने का नकली हार भी छीन लेने का आरोप है, जिसकी क़ीमत 1000 रुपए बताई गई है। एफआईआर के मुताबिक, मुस्लिम समुदाय के आरोपित माँ की गाली देते हुए लगातार धमका रहे थे कि सारे महादलितों को उजाड़ कर भगा दिया जाएगा। साथ ही महादलित समुदाय की लड़कियों के साथ छेड़खानी किए जाने का भी आरोप लगाया गया है।

ऑपइंडिया से बोले पीड़ित शंकर पासवान

ऑपइंडिया ने बेगूसराय के पीड़ित शंकर पासवान से बातचीत की, जिन्होंने कहा कि उनके बच्चों के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, उससे उनके समाज का वहाँ रहना दूभर हो गया है। उन्होंने कहा कि विवेक तो बस दुकान से सामान लेने गया था लेकिन मामूली कहासुनी के बाद वो लोग मारपीट व गालीगलौज पर उतर आए। शंकर का कहना है कि वो लोग लगातार बोल रहे थे कि “तुम्हारा कोई हिन्दू बाप बचाने नहीं आएगा” और गाली दे रहे थे।

उन्होंने ऑपइंडिया को बताया कि वो लोग मजदूरी कर के अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उन्होंने कहा कि इलाक़े के अन्य हिन्दू भी खुल कर उनके समर्थन में बोलने में हिचक रहे हैं क्योंकि मुस्लिमों की संख्या वहाँ हिन्दुओं से कई गुना ज्यादा है। उन्होंने बताया कि मुस्लिम समुदाय के 20-25 लोगों ने उनके साथ मारपीट की जबकि इधर सिर्फ़ 4-5 लोग ही थे। उन्होंने कहा कि कइयों के हाथ-पाँव व सिर में चोटें लगी हैं।

पीड़ित शंकर पासवान द्वारा दर्ज कराई गई FIR

शंकर पासवान ने कहा कि उनकी गली में घुस पर छप्पर पर ईंट-पत्थर फेंके गए। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लोगों पर महादलितों के शोषण का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वो लोग ग़रीब हैं, इसीलिए उनकी कोई सुन भी नहीं रहा है। उन्होंने जानकारी दी कि पहले भी उनलोगों ने मारपीट की थी लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा बीच-बचाव करने के बाद समझौता करा दिया गया था। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में उनके बाल-बच्चों का क्या होगा, वो यही सोच कर काँप उठते हैं।

मुस्लिम पक्ष के FIR में क्या है?

वहीं मुस्लिम पक्ष की तरफ से एक महिला ने FIR दर्ज कराइ है। जो मोहम्मद अब्बास नामक आरोपित की पत्नी हैं। उन्होंने महादलित समुदाय के लोगों पर उनके घर की महिलाओं के साथ छेड़खानी का आरोप लगाया। FIR में आरोप लगाया गया है कि आरोपित उनके घर के सामने आकर अड्डेबाजी करते हैं, परिवार के लोगों को ‘गालत नीयत से’ देखते रहते हैं और मना करने पर कहते हैं कि ये तुम्हारे बाप की जमीन नहीं है।

मुस्लिम पक्ष द्वारा दर्ज कराई गई FIR

मुस्लिम पक्ष की ओर से दर्ज की गई FIR में पूरे मामले के लिए हिन्दू समाज को ही दोषी ठहराया गया है। महिला ने कहा है कि पासवान समुदाय के लोग मुस्लिम मोहल्लों पर आक्रमण कर देते हैं, जो बाद में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक तनाव का रूप ले लेता है। साथ ही दोषियों पर कार्रवाई की माँग की गई है।

मुस्लिम पक्ष का क्या कहना है?

हमने मुस्लिम पक्ष द्वारा दायर FIR में मौजूद फोन नंबर से बात करने की कोशिश की। उन्होंने हमसे कहा कि वो फिलहाल कचहरी में थे और कल ही बात कर पाएँगे। ऑपइंडिया लगातार दूसरे पक्ष की बात जानने की कोशिश कर रहा है। जैसे ही हमारा सम्पर्क स्थापित होता है, हम इस खबर को अपडेट करेंगे।

पुलिस का क्या कहना है?

हालाँकि, पुलिस ने पक्षपात के आरोपों को नकार दिया है। बरौनी पुलिस ने बताया कि पुलिस ने इस घटना की सूचना मिलते ही कार्रवाई शुरू कर दी थी। पुलिस का कहना है कि महादलित समुदाय के घायलों को पुलिस की ही गाड़ी से अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ से उन सबको सदर अस्पताल रेफर कर दिया गया। पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है, जिसके बाद दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।

शंकर पासवान ने भी इस बात की पुष्टि की है कि पुलिस ने घायल महादलित समाज के लोगों को अपनी गाड़ी से अस्पताल पहुँचाया। हालाँकि उनका आरोप था कि पुलिस शांत होकर बैठी हुई है। जबकि पुलिस ने कहा कि दोनों तरफ के लोगों से शिकायतें मिली हैं और ऐसे मामलों में शांति बनाए रखना पहली प्राथमिकता होती है। इलाक़े में पुलिस अधिकारियों ने ही जाकर पूरे मामले को शांत कराया था।

राहुल गाँधी डॉक्टर नहीं, जो उन्हें वेंटिलेटर जाँचना आता हो: AgVa के प्रोफ़ेसर ने कहा- मैं उन्हें डेमो दिखाना चाहूँगा

मंगलवार (जुलाई 7, 2020) को अग्वा (AgVa) वेंटिलेटर के सह-संस्थापक प्रोफेसर दिवाकर वैश ने कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष  राहुल गाँधी के आरोपों पर स्पष्टीकरण दिया। वैश ने कहा कि राहुल गाँधी ने वेंटिलेटर की जाँच किए बिना ही उससे जुड़ी खबर को रीट्वीट कर दिया। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी डॉक्टर तो हैं नहीं, जो उन्हें वेंटिलेटर की जाँच करना आता हो। उन्होंने बिना वेरीफाई किए रीट्वीट कर दिया।

बता दें कि राहुल गाँधी ने रविवार (जुलाई 5, 2020) को सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था कि वह पीएस केयर्स फंड का इस्तेमाल कर कोविड-19 रोगियों के लिए घटिया वेंटिलेटर खरीद रही है। उन्होंने कहा था कि पीएम केयर्स में अपारदर्शिता से भारतीयों का जीवन खतरे में पड़ता जा रहा है और सार्वजनिक धन का इस्तेमाल घटिया सामग्री खरीदने में हो रहा है।

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय निर्माता नहीं चाहते हैं कि भारतीय वेंटिलेटर को बढ़ावा दिया जाए और इसलिए वे स्वदेशी प्रयासों को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए अगर राहुल गाँधी चाहें तो मैं उन्हें वेंटिलेटर कैसे काम करता है, इसका डेमो दिखा सकता हूँ।

वैश ने बताया कि वेंटिलेटर में एक प्रक्रिया होती है, जिसे FiO2 कहा जाता है। इसके माध्यम से पता चलता है कि ऑक्सीजन कितना डिलीवर हो रहा है और इससे पता चलता है कि कितनी फीसदी ऑक्सीजन का इस्तेमाल हो रहा है। 

उन्होंने कहा, “हवा में 21 फीसदी ऑक्सीजन होता है, लेकिन कोरोना मरीजों को जरूरत पड़ने पर 100 फीसदी ऑक्सीजन देना पड़ता है। इसलिए हमने अपने ऑक्सीजन को इस तरह तैयार किया है कि यह 21 फीसदी से लेकर 100 फीसदी तक ऑक्सीजन को मरीज को दे सकता है।”

राहुल गाँधी के आरोपों पर बोलते हुए वैश ने कहा, “कुछ लोग एफआईओ2 यानी ऑक्सीजन की मात्रा को लेकर हम पर आरोप लगा रहे हैं कि हम उसमें गड़बड़ी कर रहे हैं। हम लोगों को बताना चाहते हैं कि हर वेंटिलेटर के अंदर ऑक्सीजन सेंसर लगा होता है, जिसकी धीरे-धीरे दक्षता कम होती जाती है, इसलिए इसको संशोधित करना होता है। हर वेंटिलेटर के अंदर इसकी जाँच करने का विकल्प होता है।”

उन्होंने आगे कहा, “कई बार आप 100 फीसदी ऑक्सीजन का प्रयोग करते हैं, लेकिन आपको यह 90 फीसदी दिखाई देगा। इस दौरान आपको इसे संशोधित करना होता है और इसे सामान्य स्तर पर लाना होता है। उन्होंने बताया कि यह बात दुनिया के हर एक एनेस्थेटिस्ट को पता है और यही हम भी करते हैं।”

उन्होंने कहा कि अब कुछ वर्तमान कर्मियों और कुछ पूर्व कर्मियों को ये बात नहीं पता थी। उन्होंने मशीन में थोड़ा सा परिवर्तन किया और वह संशोधित होकर 100 फीसदी पर पहुँच गई। राहुल गाँधी को यह बात पता नहीं होगी क्योंकि वह डॉक्टर तो हैं नहीं।

वैश ने कहा कि इसलिए उन्होंने उस खबर को रीट्वीट कर दिया, जिसमें वेंटिलेटर के घटिया होने की बात कही गई थी। राहुल गाँधी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वेंटिलेटर में संशोधन प्रक्रिया क्या है और इसे कैसे किया जाता है। इसलिए हम कहना चाहते हैं कि वेंटिलेटर में कोई खामी नहीं है। 

प्रोफेसर दिवाकर वैश ने अपनी कंपनी के वेंटिलटर का मंगलवार को डेमो भी दिया। साथ ही उन्होंने कहा, “हमने रातभर में वेंटिलेटर का निर्माण नहीं किया है। हम तीन साल से मार्केट में हैं। चरणबद्ध तरीके से हमने इसे विकसित किया है। नॉर्मल वेंटिलेटर की तरह ही इसमें सभी पैरामीटर हैं। सामान्य वेंटिलेटर की तुलना में हमारे वेंटिलेटर की कीमत पाँच से दस गुना कम है। सामान्य वेंटिलेटर की कीमत 10 से 20 लाख रुपए है। हमारे वेंटिलेटर की कीमत मात्र 1.5 लाख रुपए रखी गई है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें माँग को देखते हुए निर्माण को बड़ी संख्या में करने का दबाव दिया गया, तो उन्होंने कहा कि हम पर कोई दबाव नहीं था। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जांच किए जाने के बाद हमें ऑर्डर दिया गया। वेंटिलेटरों की कई मरीजों पर जांच की गई। मंत्रालय द्वारा इसको लेकर पूरा विश्लेषण किया गया है। 

ऐसे नज़र आते हैं गैंगेस्टर विकास दुबे के सहयोगी, पुलिस ने जारी किया पोस्टर, सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीर

कानपुर में 8 पुलिस वालों की हत्या के आरोपी विकास दुबे के मामले से जुड़ी एक और खबर सामने आ रही है। खबर के मुताबिक़ विकास दुबे के सहयोगियों की तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहे हैं। पुलिस ने कुल 15 ऐसे लोगों का पोस्टर जारी किया है जिन पर विकास दुबे की मदद करने का संदेह है। पोस्टर में उन सभी सहयोगियों का नाम भी साफ़ तौर पर लिखा है। 

फ़िलहाल अभी तक पुलिस को इस मामले में कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी है, घटना के कई दिनों बाद भी 8 पुलिस कर्मियों की हत्या का आरोपित विकास दुबे पुलिस की गिरफ़्त से बाहर हैl पुलिस की 30 टीमें उसकी तलाश में जुटी हुई हैं और पुलिस ने उस पर 2.5 लाख रूपए का इनाम भी रखा हैl ऐसा बताया जा रहा है कि विकास दुबे की आख़िरी लोकेशन बिजनौर पता चली थी।  

पुलिस ने विकास के सहयोगी जय वाजपेयी के घर भी सर्च ऑपरेशन चलाया थाl अभी तक पुलिस ने अपनी तरफ से की गई कार्रवाई में दो बदमाशों को मुठभेड़ में मार गिराया था और उनके पास से लूटे गए हथियार भी बरामद किए थे। इसके अलावा विकास दूबे के 3 अन्य साथी पकड़े गए हैं और एक सहयोगी गिरफ्तार किया जा चुका है।   

पुलिस फिलहाल जय वाजपेयी से लगातार पूछताछ कर रही है, ऐसे में सवाल उठता है कि जय वाजपेयी कौन है? जय विकास का बेहद क़रीबी मित्र है, वह विकास दुबे के लगभग हर निजी कार्यक्रम में शामिल होता था। पुलिस के मुताबिक़ वह विकास को लग्ज़री वाहन उपलब्ध कराता था। पुलिस ने जय की 3 लग्ज़री गाड़ियाँ कानपुर के काकादेव से लावारिस हालत में बरामद की थी। अभी जय वाजपेयी से पूछताछ जारी है और पूछताछ के बाद ही पुलिस की इस पर प्रतिक्रिया सामने आएगी।

कुछ ही सालों में एक आम इंसान से करोड़पति बना जय वाजपेयी। साल 2012-13 के दौरान एक प्रिंटिंग प्रेस में नौकरी करता था और साझे में एक पान की दूकान भी चलाता था।

साल 2013-14 में विकास दुबे के संपर्क में आया। अगले ही साल से इलाके में ज़मीन खरीदने और बेचने का काम करने लगा। विकास दुबे के नाम के सहारे अवैध तरीके से भी खूब ज़मीनें खरीदीं। 2015-16 में ब्याज पर रूपए देना शुरू किया। साल 2016-17 के बीच तमाम मकान और फ़्लैट खरीदे। इसके बाद करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन गया।  

ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि लखनऊ कानपुर मार्ग पर इसका एक बेनामी पेट्रोल पम्प भी है (इस तथ्य की पुष्टि बाकी है) 2019 से 2020 के दौरान कानपुर में खुद को एक समाजसेवी और नेता के तौर पर पेश करने लगा।  

शिवसेना में वापस जाने के लिए कहा गया तो पार्टी से इस्तीफा दे देंगे, लेकिन वापस नहीं लौटेंगे: NCP में शामिल हुए पार्षद

महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार की मौजूदगी में शिवसेना से एनसीपी में शामिल होने वाले पारनेर के पाँच पार्षदों ने स्पष्ट तौर पर धमकी दी है कि अगर उन्हें शिवसेना में वापस जाने के लिए कहा गया तो वो इस्तीफे दे देंगे।

मंगलवार (जुलाई 7, 2020) को एनसीपी कार्यालय में उपस्थित पार्षदों ने टाइम्स नाउ से बातचीत में कहा कि उन्होंने स्थानीय नेतृत्व में विश्वास खो दिया है।

डॉ मुदस्सर सैय्यद ने कहा, “हम उद्धव ठाकरे या शिवसेना पार्टी से नाराज नहीं हैं बल्कि हम स्थानीय नेतृत्व से नाराज हैं। वर्तमान विधायक नीलेश लांके भी पहले शिवसेना के साथ थे, उन्होंने भी स्थानीय नेतृत्व के कारण पद छोड़ दिया और अब एनसीपी के साथ हैं। यदि एनसीपी हमें वापस जाने के लिए कहती है, तो हम इस्तीफा दे देंगे और एनसीपी की सदस्यता आम लोगों की तरह माँगेंगे, लेकिन हम शिवसेना में नहीं लौटेंगे।”

एक अन्य नगरसेवक नंदकुमार देशमुख का कहना है कि उन्हें पारनेर में पानी के मुद्दों को लेकर कुछ काम करने की उम्मीद थी।

उन्होंने कहा, “मैं इस उम्मीद में शिवसेना में शामिल हुआ था कि तत्कालीन स्थानीय विधायक (शिवसेना के विजय औटी) हमें जनता के लिए कुछ काम करने में मदद करेंगे। मगर न उन्होंने कुछ किया, और न ही हमें करने दिया। वह हमसे केवल उन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने की अपेक्षा करते थे जो उन्होंने तैयार किए थे। लोग हमसे पूछते थे कि पानी की समस्या का कोई समाधान क्यों नहीं है, जबकि हमारे शहर के आसपास के अन्य सभी स्थानीय निकाय इसका समाधान करने में सफल रहे हैं।”

गौरतलब है कि शिवसेना के 5 पार्षदों द्वारा NCP ज्वाइन करने को लेकर नाराज CM उद्धव ठाकरे ने डिप्टी सीएम अजित पवार को संदेश दिया है। उद्धव की तरफ से कहा गया है कि NCP ज्वाइन करने वाले सभी पार्षदों को वापस भेजा जाए। ये संदेश मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पर्सनल सेक्रेटरी मिलिंद नारवेकर ने डिप्टी सीएम अजित पवार को फोन के जरिए दिया है।

उल्लेखनीय है कि पुणे जिले के बारामती में परमार से शिवसेना के पाँच पार्षद डिप्टी सीएम अजीत पवार की उपस्थिति में एनसीपी में शामिल हो गए थे। बताया जा रहा है कि उद्धव ठाकरे इन प्रकरण को लेकर काफी नाराज हैं।

महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी सरकार में अनबन की खबरें पिछले साल सरकार बनने के बाद से अक्सर चर्चा में रही हैं। राज्य में शिवसेना, एनसीपी, कॉग्रेस की महागठबंधन की सरकार है, लेकिन राज्य में ज़िला स्तर पर कई जगहों पर गठबंधन धर्म का पालन नहीं हो रहा, जिससे सवाल खड़े होने लगे हैं कि क्या राज्य की महागठबंधन की ठाकरे सरकार में सब ठीक चल रहा है?

ताज़ा उदाहरण अहमदनगर के पारनेर नगरपाचंयत का है, जहाँ शिवसेना, एनसीपी ने मिलकर सत्ता हासिल की थी, लेकिन अब अगले चुनाव से पहले शिवसेना के पाँच पार्षदों ने एनसीपी में प्रवेश किया, जिससे पारनेर में शिवसेना की ताक़त कम होकर एनसीपी का वर्चस्व बना है। एनसीपी में शामिल होने वाले पार्षदों के नाम हैं- डॉ मुदस्सिर सैयद, नंदकुमार देशमुख, किसान गंधडे, वैशाली औटी और नंदा देशमान। इनके अलावा, शिवसेना के कुछ पदाधिकारियों ने भी एनसीपी का दामन थामा है।

हाल ही में मुंबई में हुए डीसीपी के ट्रांसफर से एनसीपी नाराज़ नज़र आई। कहा गया कि जब गृह मंत्रालय उनके खेमे में है तो फिर यह निर्णय उनसे पूछकर क्यों नहीं लिया गया, लिहाज़ा इस निर्णय को वापस लिया गया। हालाँकि एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने किसी भी तरह की अनबन की खबरों से इनकार किया।

राज्य में तीन पार्टियों के गठबंधन की सरकार है, तीनों पार्टियों का सत्ता के लिए मिलन तो हो गया, लेकिन क्या तीनों पार्टियों के विचारधारा का मिलन हो सका है। इससे पहले कॉन्ग्रेस के नेताओं ने खुलकर सरकार में अपनी हिस्सेदारी को लेकर नाराज़गी ज़ाहिर की थी।

‘अगर तुम मंदिर बनाओगे तो पाकिस्तानी कौम तुम्हारी गर्दनों को काटकर बाहर फिरने वाले कुत्तों के सामने डाल देगी’

इस्लामाबाद में हिंदू मंदिर की खबर आने के बाद सोशल मीडिया पर अभी तक हम बहुत कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया देख चुके हैं। इसी बीच एक अन्य वीडियो और सामने आई है।

वीडियो में एक मौलवी है। जो हिंदुओं से अपनी घृणा जाहिर करते हुए पाकिस्तानी हुकूमत को भी धमकाने वाले लहजे में सचेत कर रहा है।

वीडियो में देखा जा सकता है कि मौलवी कहता है, “मस्जिदों का निर्माण तो यहाँ चंदा से हो रहा है। लेकिन मंदिर का निर्माण पाकिस्तान के खजाने से पैसे निकालकर किया जा रहा है।”

आगे वो पाकिस्तान में ऊँचे पदो पर बैठे लोगों का उल्लेख करते हुए कहता है कि वह लोग भी इस बात पर ‘हाँ’ भर रहे हैं कि मंदिर बनेगा।

मौलवी आगे आवाज ऊँची करते हुए कहता है कि अगर तुम मंदिर बनाओगे तो पाकिस्तानी गैरतमंद कौम तुम्हारी गर्दने काट कर मंदिर के बाहर फिरने वाले कुत्तों को सामने डाल देंगी।

iq

ये पहली बार नहीं है जब मंदिर बनाने के फैसले पर किसी मौलवी या उलेमा ने इस तरह जहर उगला हो। इससे पूर्व भी फेसबुक पर एक वीडियो वायरल हुई थी।

वीडियो में मौलवी को कहते सुना गया था कि इस्लामी रियासत में काफिरों के लिए उनका इबादतखाना नहीं बनाया जा सकता। तो फिर आखिर कैसे इस्लामाबाद में मंदिर बनाने का ऐलान किया गया? मौलवी आगे कहता है, “हम इस फैसले को जूती के तलवे के ऊपर रखते हैं।”

गौरतलब हो कि गत माह में पाकिस्तान में यह ऐलान हुआ था कि वहाँ की राजधानी इस्लामाबाद में पहला हिंदू मंदिर बनेगा। जिसकी आधारशिला रख दी गई है। इस दौरान धार्मिक मामलों के मंत्री पीर नूरुल हक कादरी ने भी इसका ऐलान किया था कि सरकार इस मंदिर के निर्माण पर आने वाला 10 करोड़ रुपए का खर्च वहन करेगी।

इसके अलावा लाल चंद मल्ही ने मंदिर की आधारशिला रखते हुए कहा था कि पिछले दो दशकों में राजधानी में हिंदू आबादी काफी बढ़ी है, जिससे उनके पूजा करने के लिए मंदिर बनाना महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा था, इस्लामाबाद में हिंदू समुदाय लंबे समय से मंदिर बनाने की माँग कर रहा है। यहाँ कई हिंदू मंदिर खंडहर की हालत में हैं। इसके अलावा इस्लामाबाद में कोई श्मशान घाट नहीं है।

विनोद दुआ के वकील ने बचने के लिए ‘ऑपइंडिया’ वाले केस का दिया उदाहरण, कोर्ट ने कहा दोनों केस अलग

फेक न्यूज फैलाने के आरोपित पत्रकार विनोद दुआ ने पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में अपने ख़िलाफ़ हुई एफआईआर (FIR) को रद्द करने के लिए याचिका दायर की थी। इसी याचिका पर आज (जुलाई 7, 2020) जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई की।

इस सुनवाई में दुआ की ओर से केस संभाल रहे वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने पत्रकार अमीश देवगन और ऑपइंडिया की एडिटर नुपुर जे शर्मा के केस का हवाला देकर सभी एफआईआर पर स्टे लगाने की माँग की।

विनोद दुआ की ओर से दलील में सबसे पहले अमीश देवगन के मामले का हवाला दिया गया। उन्होंने कहा कि अदालत ने उनकी एफआईआर पर रोक लगाकर उन्हें भी संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया था। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ उनकी दलील को खारिज कर दिया और कहा कि दोनों पर लगे आरोप अलग हैं।

इसके बाद विनोद दुआ के वकील की ओर से ऑपइंडिया एडिटर के केस का उल्लेख करते हुए कहा गया कि यह सब कुछ अनुच्छेद 19 (1) के तहत आता है। लेकिन पीठ ने यहाँ भी ये कह दिया कि दोनों मामले अलग-अलग तथ्यों पर निर्भर हैं।

इसके बाद दुआ की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने पूरी वीडियो की ट्रांस्क्रिप्ट को पढ़ा। साथ ही सवाल पूछा कि इसमें राजद्रोह कहाँ से आया? राजद्रोह तब होता है जब हिंसा भड़काते हैं। या जन सामान्य में अव्यवस्था को उकसाते हैं।

इस सुनवाई में बता दें दुआ की ओर से पक्ष रखते हुए यह भी कहा गया कि उनके मामले में सभी एफआईआर भाजपा शासित प्रदेशों में पार्टी कार्यकर्ताओं के द्वारा की गई है। वह बस इनपर रोक चाहते हैं।

इसके अलावा इस सुनवाई में दुआ की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने लगातार सवाल पूछे जाने का मामला भी उठाया। साथ ही यह बताया कि जिस तरह और जिस प्रकार से उनसे सवाल पर सवाल पूछे जा रहे हैं- वो सब प्रताड़ना है।

दुआ की ओर से कहा गया, “मुझे जाँच अधिकारियों को जवाब नहीं देना है कि मैंने सरकार की आलोचना क्यों की। मुझे जिम्मेदार पत्रकारिता करते 45 साल हो गए हैं।”

जस्टिस ललित ने इस दौरान सॉलिस्टर जनरल को पूरी जाँच की डिटेल सील कवर में देने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ता का तर्क सही पाया गया तो वह सभी एफआईआर पर रोक लगा देंगे। बता दें अब इस मामले पर अगली सुनवाई 15 जुलाई को की जाएगी।

विनोद दुआ के ख़िलाफ़ सबसे हालिया एफआईआर भाजपा नेता अजय शर्मा ने शिमला में दायर करवाई थी। अपने एफआईआर में उन्होंने पत्रकार पर आरोप लगाया था कि विनोद दुआ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मौत का और आतंकी हमलों’ का इस्तेमाल करके वोटबैंक की राजनीति करने का जिम्मेदार ठहराया। और, झूठी खबरें फैलाकर हिंसा भड़काने की कोशिश की।

गौरतलब हो कि विनोद दुआ ने यह याचिका 13 जून को दायर की थी। इस याचिका में उन्होंने अपने ख़िलाफ़ एफआईआर को रद्द कराने की माँग की थी। इसके बाद इस मामले पर छुट्टी वाले दिन यानी 14 जून को सुनवाई होना मुकर्रर हुआ।

और, शीर्ष अदालत ने विनोद दुआ को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान कर दी। साथ ही हिमाचल प्रदेश राज्य को एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया गया जिसमें पूरे मामले की स्थिति और जाँच की जानकारी हो।

विनोद दुआ पर मुख्यत: फेक न्यूज फैलाने का आरोप है। इसके अलावा उनके ऊपर यूट्यूब शो ‘द विनोद दुआ शो’ में शांति भंग करने और सांप्रदायिक तनाव को न्योता देने जैसे बयान देने का भी आरोप है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत लिबर्टी के लिए याचिका में गुहार लगाई है। 

इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दायर की गई एक एफआईआर (FIR) पर रोक लगा दी थी और जाँच रोक दी थी। दुआ ने दावा किया था कि हिमाचल पुलिस ने उनके घर आकर कुमारसैन पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगाने को कहा था।

पिछले दिनों अमेरिका में हो हुए दंगो के मद्देनजर विनोद दुआ ने अपने डेली शो में भारतीयों को उसी तरह से हिंसा और दंगा करने के लिए उकसाया था, विनोद दुआ ने दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट करने वालों को ‘मानवाधिकार के धर्मयोद्धा’ की संज्ञा दी थी। उनका कहना था कि अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ अपने आक्रोश को प्रदर्शित करने में विफल रहे।

इसके बाद भाजपा प्रवक्ता नवीन कुमार ने अपनी शिकायत में ‘द विनोद दुआ शो’ के माध्यम से फर्जी खबर फैलाने, अनर्गल बातों व फालतू के तर्कों को वीडियो के माध्यम से लाकर समाज में जहर फैलाने का आरोप लगाया था। 

ईद का बकरों की मौत से कोई लेनादेना नहीं, हम पशु हिंसा के विरोध में: PETA से एक्सक्लूसिव बातचीत

जानवरों की रक्षा व जीव-जंतुओं के हितों के लिए अभियान लिए चलाने का दावा करने वाली संस्था PETA की लखनऊ की एक होर्डिंग को लेकर खड़ा हुआ विवाद थमता नहीं दिख रहा है। इस सम्बन्ध में हमने अंतरराष्ट्रीय संस्था से संपर्क कर के विस्तृत रूप से उनका पक्ष जाना। उससे पहले ‘PETA इंडिया’ की उस होर्डिंग को लेकर खड़े हुए विवाद के बारे में जानते हैं जिसमें शाकाहारी बनने की अपील की गई थी और मुल्ला-मौलवी इससे ऑफेंड हो गए थे।

दरअसल, कई लोगों का कहना था कि इस पोस्टर में बकरे की तस्वीर लगाई गई है, जो बकरीद त्यौहार से पहले एक वर्ग विशेष को निशाना बनाने के लिए किया गया है। इसके बाद PETA की इस होर्डिंग को हटा दिया गया। सोशल मीडिया पर संस्था ने सफाई दी कि इसे उसने नहीं हटाया है। ऑपइंडिया ने जब केसरबाग SHO दीनानाथ मिश्रा से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि पुलिस ने होर्डिंग नहीं हटाई है।

केसरबाग थाना पुलिस ने कहा कि इस होर्डिंग को उन्होंने ही हटाया है, जिन्होंने इसे लगाया था। जबकि PETA का कहना है कि होर्डिंग हटाए जाने में उसकी सहमति नहीं है और वो जल्द ही दिल्ली, गुवाहाटी, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई की तरह लखनऊ में फिर से होर्डिंग लगाएगा। इस होर्डिंग में बकरे की फोटो लगा था और लिखा था कि मैं मटन नहीं हूँ। साथ ही जीव को बचाने की बात करते हुए शाकाहारी बनने की अपील की गई थी।

मौलवियों का कहना है कि मजहब विशेष वाले ‘कुर्बानी’ को महत्वपूर्ण मानते हैं और ये पोस्टर ग़लत सन्देश दे रहा है। उन्होंने इसे आपत्तिजनक करार देते हुए दावा किया था कि समुदाय विशेष इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। बकरीद 31 जुलाई को मनाया जाना है। ऑपइंडिया ने इन सभी सवालों को लेकर ‘PETA इंडिया’ से संपर्क किया, जिसके बाद संस्था ने अपने कैम्पेन्स कोऑर्डिनेटर राधिका सूर्यवंशी को हमारे सवालों का जवाब देने के लिए अधिकृत किया।

नीचे हम PETA की अधिकारी राधिका सूर्यवंशी के साथ ही बातचीत को पेश कर रहे हैं, जिसमें हमने उनसे लखनऊ की उक्त होर्डिंग को लेकर उपजे विवाद के अलावा हिन्दुओं के प्रति भेदभाव को लेकर भी सवाल पूछे हैं। मुल्ला-मौलवियों द्वारा लगाए गए आरोपों पर भी हमने PETA की प्रतिक्रिया जानी। सारे सवालों और PETA द्वारा दिए गए जवाब को हम विस्तृत रूप में आपके समक्ष पेश कर रहे हैं।

अगर PETA ने नहीं तो फिर होर्डिंग किसने हटाई? आप यह कहना चाहते हैं कि यह स्थानीय पुलिस-प्रशासन का काम है?

PETA ने यह होर्डिंग नहीं हटाई। बिलबोर्ड हटाने के बाद हमें एजेंसी ने बताया की उस साइट के मालिक के कहने पर किसी लोकल वेंडर ने वह होर्डिंग हटाई है। PETA होर्डिंग हटाने पर सहमत नहीं था क्योंकि शाकाहारी खाने और जानवरों के प्रति दया की बात करने में कुछ गलत नहीं है और हमने इस होर्डिंग को दुबारा लगाने के लिए भी बोला है।

Islamic Centre of India के President मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महाली ने पूछा हैं कि बकरीद के त्यौहार से पहले ऐसी होर्डिंग क्यों लगाई गई? क्या वो गलत कह रहे हैं? आप इस पर क्या कहेंगे? होर्डिंग कब लगाई गई थी?

PETA India ने समुदाय विशेष के अपने सभी समर्थकों एवं सहयोगियों की ओर से यही संदेश लिखा और भी बहुत सी होर्डिंग्स दिल्ली, गुवाहाटी, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई में भी लगाई हैं। बकरे का माँस हर रोज़ खाया जाता है इसलिए इसका ईद से कोई लेना देना नहीं। हम जनता को जागरूक करना चाहते हैं कि हर रोज शाकाहारी खाना खाएँ। यह हमारे वीगन अभियान की नयी होर्डिंग है, इसी अभियान की अन्य होर्डिंग्स में मुर्गो, मछलियों व अन्य जानवरों के चित्र भी बने हैं जिनका आमतौर पर लोग ज्यादा माँस खाते हैं। यह सभी बोर्ड देश भर के कई शहरों में लगाए गए हैं।

माँस खाने के लिए भी तो बहुत से विज्ञापन दिए जाते हैं जैसे KFC कंपनी अपने माँसाहारी भोजन का विज्ञापन करती है। निर्दोष जीवों को मार कर खाने का समर्थन करने वाले यह विज्ञापन भी तो गलत हैं। तो क्या फिर उनके विज्ञापन बोर्ड नहीं हटाए जाने चाहिए ?

Director of Centre for Objective Research and Development (CORD) के अथर हुसैन कहते हैं बकरीद के त्यौहार पर समुदाय विशेष वाले बकरे की कुर्बानी देते हैं। PETA की होर्डिंग गलत संदेश दे रही है और इस पर हमें ऐतराज है। कौम इसका विरोध करती है। इस पर PETA की क्या प्रतिक्रिया है?

सभी धर्म दया एवं करुणा का संदेश देते हैं और वीगन खाना खाने की अनुमति भी। बकरियाँ बहुत ही संवेदनशील एवं चंचल जानवर होती हैं। वास्तव में सभी जानवर हमारी तरह दुःख एवं पीड़ा को महसूस कर सकते हैं व वह सभी भी जिंदा रहना चाहते हैं। बहुत से लोग शाकाहारी खाना बाँट कर, दान करके और गरीबों की मदद करके बकरीद का त्यौहार मानते हैं। वीगन खाना, हमारे दिल की तंदुरुस्ती के लिए बेहतर है और हमें कैंसर, हृदय रोग, डायबिटीज व और भी बहुत सी जानलेवा बीमारियों से बचने में मदद करता है।

क्या इस मामले में PETA इंडिया उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी कुछ माँग कर रहा है?

यह ध्यान रखने योग्य है कि “Prevention of Cruelty to Animals (Slaughter House) Rules, 2001” के अनुसार कि जानवर की हत्या केवल लाइसेन्स प्राप्त कत्लखानों में ही की जा सकती है। PETA इंडिया ने इससे पहले भी सभी राज्यों से अनुरोध किया था कि सरकार ईद के दौरान भी जानवरों के गैरकानूनी परिवहन एवं हत्याओं के खिलाफ सख्त कदम उठाए।

ईद के दौरान भी यह आमतौर पर देखने को मिलता है कि बहुत अधिक संख्या में जानवरों को छोटे ट्रकों में भरकर परिवहन किया जाता है, जिससे कत्लखानों तक जाते जाते दम घुटने और ठोकरे लगने से उनकी हड्डियाँ टूट जाती हैं। गाड़ियों से उतार कर कत्लखानों के अंदर ले जाने के दौरान जब डरे-सहमे जानवर धीमे चलने लगते हैं तो जबरदस्ती आगे बढ़ते रहने के लिए उनकी पूँछ को मरोड़-मरोड़ कर तोड़ दिया जाता है। कत्लखानों के अंदर खुले में अप्रशिक्षित कसाई इन जानवरों को एक-एक कर के एक-दूसरे के सामने उनका आधा गला काटकर धीर-धीरे तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ देते हैं।

क्या आपको कट्टरपंथियों की तरफ से धमकियाँ, मेल, फोन कॉल्स या मैसेज आ रहे हैं? अगर हाँ तो क्या आप उनका विवरण दे सकते हो? (इस मामले में या किसी अन्य मामले में भी)

नहीं, हमें कहीं से किसी भी प्रकार की धमकी नहीं मिली है। और हम स्थानीय निवासियों से यही अनुरोध करते हैं की जानवरों के प्रति दया की बात करना या वीगन खाने को बढ़ावा देने की बात करने में कुछ भी गलत नहीं है। अन्य सभी विज्ञापनों की तरह हमारा यह वीगन वाला बिलबोर्ड भी बस एक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए है।

इस आरोप में कितनी सच्चाई है कि PETA India हिंदुओं के त्यौहारों पर बहुत ज़ोर-शोर से हल्ला मचाता है लेकिन दूसरे मजहब के त्यौहारों पर चुप्पी साध लेता है?

देखिए, हम किसी धर्म और मजहब के हिसाब से अपने अभियान नहीं चलाते। PETA इंडिया कोई धार्मिक संस्था नहीं है और सभी धर्मों के लोग हमारे सहयोगी एवं समर्थक हैं। हम केवल पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता के खिलाफ हैं। इसमे अपने मनोरंजन के लिए जानवरों के साथ बदसलूकी करना भी शामिल है जैसे सर्कस, घुड़दौड़, बैल दौड़, शिकार, जल्लीकट्टू व और भी बहुत से अन्य आयोजन। हम हाथियों को कैद करके रखने और सर्कस, हाथीसवारी या त्यौहारों में उनको इस्तेमाल किए जाने के खिलाफ हैं। हम जानवरों की बलि और कुर्बानी दिए जाने के भी खिलाफ है चाहे वो कभी भी और कहीं क्यूँ न दी जाए।

हमें यह सोचना चाहिए कि हाथी एक सामाजिक जानवर है जो जंगलों एवं घास पर रहने के लिए बना है। इंसान अपने फ़ायदों के लिए उन्हें कैद करके, शारीरिक एवं मानसिक यातनाएँ देकर सीमेंट के बने पक्के फर्श पर जंजीरों में जकड़ कर रखते हैं। बिना पर्याप्त भोजन-पानी और चिकित्सा के उनकी स्थिति दर्दनाक हो जाती है। उनके पैरों के नाखून उखड़ जाते हैं, तलवे कट जाते है, पैर सूज जाते हैं, घाव बन जाते हैं व वह हमेशा अपनी ही टट्टी-मूत्र में सने खड़े रहते हैं। एक अनुमान के अनुसार, कैद में रहने वाले 50 प्रतिशत हाथियों की मौत इन्हीं समस्याओं के कारण होती है।

कैद, सामाजिक जीवन के अवसर ना मिलना वा आज़ाद जीवन ना जी पाने के कारण यह जानवर गंभीर मानसिक तनाव का शिकार होते है व यह आसानी देखा जा सकता है जब हाथी अपने सिर को गोल गोल या दाएँ-बाएँ घुमाकर एक जैसी हरकत करते नजर आते हैं। पैरों में बँधी जंजीरें उनकी त्वचा को छील देती हैं व वहाँ गहरे जख्म बन जाते हैं। उन्हें नियंत्रित करने के लिए लोहे व धातु के बने नुकीले अंकुश इस्तेमाल किए जाते हैं।

बेकसूर एवं प्यारे जानवर ना सिर्फ ईद बल्कि हर रोज इसी तरह बेमौत तरीकों से मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। तेज़ धारदार चाकू से उनका आधा गला काट कर उन्हें तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। अंतर सिर्फ यह है कि बाकी दिनों में वह सड़कों पर नहीं बल्कि कत्लखानों में मरते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन पर होने वाली क्रूरता में कमी आ जाती है। पिछले साल बकरीद पर हमने मुंबई के देवनार बूचड़खाने के पास वाले पशु बाज़ार पर जाँच की थी।

बता दें कि पोस्टर हटाने के लिए लखनऊ के कैसरबाग थाने में दो अलग-अलग शिकायतें भी दर्ज कराई गई हैं। जिस पोस्टर पर बवाल हुआ है, उस पर लिखा है – “मैं जीव हूँ माँस नहीं, मेरे प्रति नज़रिया बदलें, वीगन बनें।” सेंटर ऑफ़ ऑब्जेक्टिव रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक अतहर हुसैन ने भी इस मामले में एक पत्र लिखा था। PETA ने इस तरह के पोस्टर पूरे देश की अलग-अलग जगहों पर लगाया है।

अर्नब गोस्वामी का मामला इसलिए तत्काल सुना गया क्योंकि यह मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़ा था: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि सक्षम अधिकारियों के आदेश को मद्देनजर रखते हुए अर्नब गोस्वामी के मामले को तत्काल सूचिबद्ध किया गया था। साथ ही यह मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ मामला था। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उस वकील की याचिका को खारिज करते समय की, जिसने आरोप लगाया गया था कि कुछ प्रभावशाली वकील और याचिकाकर्ता को रजिस्ट्री वरीयता देती है और उनका मामला प्राथमिकता के आधार पर लिस्टेड किया जाता है।

इस मामले को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता वकील पर 100 रुपए का जुर्माना भी लगाया था। अपनी याचिका में वकील रीपक कंसल ने 23 अप्रैल को दायर की गई अर्नब गोस्वामी बनाम यूओआई की ओर इशारा करते हुए कहा था कि यह याचिका बिना किसी अनुबंध के दायर की गई थी मगर उसमें कोई कमी नहीं निकाली गई और एक विशेष सूची उसी दिन अपलोड कर दी गई।

वकील ने आगे कहा, “इस संबंध में जनरल सेक्रेटरी से शिकायत की, लेकिन इस मामले में उसी दिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।” इस मामले पर मामले पर 19 जून को सुप्रीम कोर्ट ने रीपक कंसल द्वारा लगाए गए आरोपों पर गंभीर आपत्ति जताई थी। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस एम आर शाह की पीठ ने अर्नब गोस्वामी के मामले को ‘अधिमान्य प्राथमिकता’ का एक उदाहरण बताने पर याचिकाकर्ता पर नाराजगी व्यक्त की थी।

पीठ ने कहा था, कि “आप वन नेशन वन राशन कार्ड पर अपनी याचिका की तुलना अर्नब गोस्वामी से कैसे कर सकते हैं? क्या आग्रह था? आप क्यों बकवास बातें कह रहे हैं?”

पीठ ने कहा था, “रजिस्ट्री के सभी सदस्य दिन-रात आपके जीवन को आसान बनाने के लिए काम करते हैं। आप उन्हें हतोत्साहित कर रहे हैं। आप इस तरह की बातें कैसे कह सकते हैं?”

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने जोर देकर कहा था कि “रजिस्ट्री हमारे अधीनस्थ नहीं है। वे बहुत हद तक सुप्रीम कोर्ट का हिस्सा हैं।” याचिकाकर्ता पर “गैरजिम्मेदाराना” आरोपों की बात कहने के बाद पीठ ने मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया था।

आपको बता दें कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी करने और साम्प्रदायिकता फैलाने के आरोप में रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी के खिलाफ सौ से अधिक FIR राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और जम्मू कश्मीर में दर्ज कराई गई थीं।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी पर 3 सप्ताह के लिए रोक लगा दी थी और कहा था कि वे अग्रिम जमानत भी माँग सकते हैं।

गौरतलब है कि 22-23 अप्रैल की रात एडिट कॉल निपटा कर लौटते हुए अर्नब गोस्वामी और उनकी पत्नी पर कॉन्ग्रेस के दो मोटरसाइकिल सवार गुंडों ने हमला किया था। रिपब्लिक टीवी एंकर अर्नब गोस्वामी ने खुद इस हमले की जानकारी देते हुए बताया कि उनकी कार के आगे अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर दी और फिर हमला किया।

पुलिस और विकास दुबे के संबंधों पर वायरल हुआ लेटर नहीं पहुँचा कार्यालय, जाँच में जुटीं IG लक्ष्मी सिंह

कानपुर के बिकरू गाँव में 8 पुलिसकर्मियों की निर्मम हत्या मामले की जाँच में जुटी टीम के साथ अब लखनऊ की आईजी लक्ष्मी सिंह भी जुड़ चुकी हैं। इसी कड़ी में वह आज सुबह बिल्हौर स्थित सीओ दफ्तर पहुँची। यहाँ उन्होंने सीओ के सील दफ्तर की जाँच शुरू की और उनके कंप्यूटर को सील करते हुए कहा कि इसकी जाँच अब विशेषज्ञों से करवाई जाएगी।

इसके अलावा आईजी लक्ष्मी सिंह मामले से संबंधित उस पत्र की जाँच भी कर रही हैं। जिसमें विकास दुबे के साथ पुलिस की दोस्ती के सबूत थे। दरअसल, इस पूरे प्रकरण में सोमवार को एक लेटर सामने आया था। लेटर से कई महत्तवपूर्ण बातों का खुलासा हुआ था। लेटर में विकास दुबे और पुलिस कनेक्शन को उजागर किया गया था।

इस लेटर में बताया गया था कि कैसे विकास दुबे के अपराधों पर पुलिस द्वारा रवैया नर्म रखा गया। इस लेटर को लिखने वाले सीओ देवेंद्र मिश्र थे। जबकि जिनके नाम लेटर लिखा गया वह एसएसपी अनंत देव थे।

इस पत्र के वायरल होने के बाद इस मामले में जाँच शुरू हुई। जाँच में पाया गया कि यह चिट्ठी तो पुलिस कार्यालय तक पहुँची ही नहीं। यहाँ बता दें कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस लेटर में चौबेपुर थानेदार विनय तिवारी की भूमिका संदिग्ध होने पर इशारा किया गया था।

लेटर में लिखा था कि एक दुर्दांत अपराधी के प्रति उनकी सहानुभूति सत्यनिष्ठा को संदिग्ध करती है। यदि तत्काल कार्रवाई नहीं की गई तो किसी बड़ी घटना से इनकार नहीं किया जा सकता।

इस लेटर में इस बात का भी उल्लेख था कि विकास के खिलाफ दर्ज एक मुकदमे से तत्कालीन थानेदार विनय तिवारी ने वसूली के लिए धमकी की धारा 386 हटा दी थी।

गौरतलब है कि पत्र वायरल होने के बाद इस संबंध में चौबेपुर थाने के दरोगा से पूछताछ और रिकॉर्ड देखकर यह स्पष्ट हो गया था कि चिट्ठी में लिखी सभी बातें सही हैं। दरोगा ने भी यह स्वीकार किया कि थानेदार के कहने पर ही उसने मुकदमें से धारा 386 हटाई।

यहाँ बता दें, वायरल रिपोर्ट के अनुसार देवेंद्र मिश्र ने 14 मार्च को चौबेपुर थाने का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्हें पता चला कि 13 मार्च को विकास के खिलाफ वसूली के लिए धमकी, बलवा, मारपीट, जान से मारने की धमकी के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी। जिसकी जाँच अजहर इशरत को सौंपी गई। लेकिन, अजहर ने अगले दिन थानेदार के कहने पर धारा हटा दी।

सीओ ने जब इस एक्शन के पीछे की वजह पूछी तो दरोगा ने कहा कि यह काम उसने थाने दार के कहने पर किया है। इसी के बाद सीओ ने तुरंत विनय तिवारी के खिलाफ़ एसएसपी को रिपोर्ट भेजी। रिपोर्ट के मुताबिक विनय का विकास के घर पर आना-जाना था।

कोर्ट ने दिल्ली दंगों में छत पर गुलेल और पेट्रोल बम केस में राजधानी स्कूल के मालिक फैसल फारुख को हिरासत में भेजा

उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगा मामले में गिरफ्तार शिव विहार के राजधानी स्कूल के मालिक फैजल फारुख से पूछताछ के लिए कड़कड़डूमा कोर्ट ने पुलिस को एक दिन का रिमांड सोमवार (जुलाई 6, 2020) को दे दिया। हालाँकि, इससे पहले मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने फारुख का पुलिस रिमांड देने से इनकार कर दिया था।

कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के 24 जून के आदेश को खारिज करते हुए फैजल से पूछताछ के लिए पुलिस को एक दिन का रिमांड दिया। हालाँकि कोर्ट ने निर्देश दिया कि रिमांड के दौरान पुलिस उसे दिल्ली से बाहर नहीं ले जा सकती। 

पुलिस ने रिमांड माँगते हुए कहा था कि आरोपित से यह पूछताछ करनी है कि दंगों में बड़ी गुलेल को राजधानी स्कूल की छत पर कैसे लगाया गया और इस गुलेल का प्रयोग इलाके में आगजनी के लिए कैसे किया गया।

करीब डेढ़ घंटे दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि इस मामले की जाँच जरुरी है और पुलिस के पास जाँच के लिए एक दिन का ही हिरासत लेने का अधिकार बचा है। उसके बाद कोर्ट ने फैसल फारुख को एक दिन की पुलिस हिरासत में भेजने का आदेश दिया। 

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “जिस तरह से 24 फरवरी को दंगे भड़के और खासतौर पर राजधानी स्कूल और उसके आसपास, उससे स्पष्ट है कि स्थानीय स्तर पर कोई साजिश रची गई। स्थानीय व्यक्ति ने स्थानीय प्रदर्शनकारियों को एकत्र किया। हमारे सामने प्रश्न यह है कि कैसे इतनी बड़ी गुलेल इमारत के ऊपर लगाई गई जो फारुख की है।” अदालत ने पूछताछ के दौरान कोरोना वायरस को लेकर जारी गाइडलाइन्स का भी ध्यान रखने को कहा।

इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा, “मैं आरोपित के अधिकारों के प्रति सजग हूँ। इसके साथ ही उतना ही जाँच एजेंसी के हक के प्रति भी सजग हूँ। अब स्थानीय पुलिस के पास प्रतिवाद (फारुख) की हिरासत लेने के लिए एक दिन का समय है, इसलिए मैं पुराने आदेश को निरस्त कर प्रतिवादी की एक दिन की हिरासत जाँच अधिकारी/ थाना प्रभारी दलायलपुर को इस शर्त पर देता हूँ कि वह प्रतिवादी को दिल्ली के बाहर नहीं ले जाएँगे।” 

गौरतलब है कि उत्तर पूर्वी दिल्ली में 25 फरवरी को हुए दंगे के दौरान शिव विहार स्थित राजधानी स्कूल के मालिक फैजल फारुख को दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। हालाँकि फैजल के खिलाफ कोई ठोस सबूत न पेश कर पाने पर निचली अदालत ने उसे जमानत दे दी थी, लेकिन पुलिस ने दंगे से जुड़े दूसरे मामले में उसे गिरफ्तार कर लिया था।

मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ऋचा परिहार ने पिछले 24 जून को फैजल फारुख को पुलिस हिरासत में भेजने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में चार महीने की देरी की गई है जबकि जाँच अधिकारी को घटना के पहले दिन से उसकी जानकारी थी। 

उल्लेखनीय है कि इससे पहले दिल्ली पुलिस ने अदालत में दायर चार्जशीट में फैजल फारुख को एक मुख्य साजिशकर्ता के रूप चिन्हित करते हुए कहा था कि जब पूर्वोत्तर दिल्ली में दंगे हो रहे थे, उस समय वो तबलीगी जमात के प्रमुख मौलाना साद के करीबी अब्दुल अलीम के संपर्क में था।

जाँच के दौरान यह पाया गया था कि हिंसा बड़ी साजिश के तहत हुई और राजधानी स्कूल का मालिक फैजल फारुख हिंसा के ठीक पहले पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के कई नेताओं, पिंजरा तोड़ ग्रुप, निज़ामुद्दीन मरकज़, जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी और देवबंद के कई मौलवियों-आलिमों के संपर्क में था। उसके मोबाइल से इस बात के सबूत मिले हैं।

दंगे के दौरान फैजल फारुख के स्कूल की छत पर एक बड़ा गुलेल लगाया गया था। इसकी मदद से हिंदुओं और उनकी संपत्तियों और पेट्रोल बम से निशाना बनाया गया था। दंगों में इस स्कूल को कोई नुकसान नहीं पहुॅंचा था। लेकिन इसके ठीक बगल में स्थित डीआरपी पब्लिक स्कूल तबाह हो गया था। पुलिस को राजधानी स्कूल की छत की चारदीवारी पर लगाई गई गुलेल और अन्य ज्वलनशील पदार्थ बरामद हुए थे।