Home Blog Page 4714

‘…तब पैगंबर मोहम्मद ने 300 मूर्तियों को नष्ट कर दिया था’ – इस्लामाबाद में पहले मंदिर के निर्माण पर उग्र कट्टरपंथी

पाकिस्तान के इस्लामाबाद में पहला मंदिर बनाने का निर्णय क्या लिया गया, इस्लामी मजहबी कट्टरपंथियों को ये रास नहीं आया और उन्होंने इसके ख़िलाफ़ फतवा जारी कर दिया। कहा जा रहा है कि ये इस्लामाबाद का पहला मंदिर होता। इस मंदिर की नींव रखने की प्रक्रिया कुछ ही दिनों पहले पूरी की गई है।

इमरान खान की सरकार ने भी मंदिर के निर्माण में 10 करोड़ रुपए का योगदान दिया था। लेकिन अब जामिया अशर्फिया की लाहौर यूनिट के मुखिया मुफ्ती जियाउद्दीन ने मंदिर निर्माण के ख़िलाफ़ कड़ा विरोध दर्ज कराया और फतवा जारी कर दिया।

जियाउद्दीन ने कहा कि सरकार को ज्यादा से ज्यादा अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थलों की मरम्मत या जीर्णोद्धार के लिए सरकारी कोष से रुपए खर्च कर सकती है लेकिन सरकारी धनराशि का प्रयोग दूसरे धर्मों के नए धार्मिक स्थलों के निर्माण में कतई नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को इसके लिए मंजूरी दी ही नहीं गई है। बकौल जियाउद्दीन, सरकारी कोष में लोगों के टैक्स का रुपया आता है और उन रुपयों को एक मंदिर के निर्माण में ख़र्च करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, ये गलत है।

हालाँकि, डर के माहौल के बीच भी वहाँ के हिन्दू मंदिर निर्माण में लगे हुए हैं। पाकिस्तान के हिन्दू सांसद लाल चंद मल्ही ने स्पष्ट कर दिया है कि विरोध होना है तो होता रहे, मंदिर निर्माण को नहीं रोका जाएगा।

बता दें कि 10 लाख की जनसंख्या वाले इस्लामाबाद में मात्र 3000 हिन्दू हैं और उन्हें भी प्रताड़ित किया जा रहा है। मामला अब अदालतों के दरबार में पहुँच गया है। इस्लामाबाद के कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी को वहाँ के हाईकोर्ट ने नोटिस भी जारी किया गया है।

मंदिर निर्माण के ख़िलाफ़ याचिका दायर किए जाने के बाद कोर्ट ने ये निर्णय लिया। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण राजधानी के लिए तैयार किए गए मास्टर प्लान का हिस्सा है ही नहीं है।

इस प्रोजेक्ट को इमरान खान सरकार के ही मंत्री पीर नूर उल हक कादरी ने एक बैठक के बाद शनिवार (जून 27, 2020) को मंजूरी प्रदान की थी। वहाँ के अल्पसंख्यक नेताओं मल्ही, शुनीला रूथ, जेम्स थोमद, डॉक्टर रामेह वाँकवानी और जय प्रकाश उकरानी ने इस प्रोजेक्ट का समर्थन किया था।

बता दें कि यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण का है। इस मंदिर का निर्माण इस्‍लामाबाद के H-9 क्षेत्र में 20,000 वर्गफुट में किया जा रहा है। मंगलवार को पाकिस्‍तान के ह्यूमन राइट्स के संसदीय सचिव लाल चंद्र मल्‍ही ने ही इस मंदिर की आधारशिला रखी थी।

नींव रखे जाने के इस कार्यक्रम के दौरान वहाँ उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए मल्‍ही ने जानकारी दी थी कि भारत और पाकिस्तान की आज़ादी से पहले इस्‍लामाबाद और उससे सटे हुए क्षेत्रों में कई हिंदू मंदिर हुआ करते थे।

इनमें सैदपुर गाँव और रावल झील के पास स्थित मंदिर शामिल है। हालाँकि, उन्होंने बताया कि इन मंदिरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया और कभी इस्‍तेमाल नहीं किया गया। वो पड़े रहे और प्रयोग में आए ही नहीं। जिस तरह से पाकिस्तान में हाल के दिनों में हिन्दू लड़कियों का जबरन अपहरण कर के उनके इस्लामी धर्मान्तरण के बाद निकाह करा दिया जाता है, उससे हिन्दू समुदाय पहले से ही भयाक्रांत है।

इस्लामाबाद हिन्दू पंचायत ने इस मंदिर का नामकरण किया है और साथ ही पाकिस्तान सरकार से विशेष सहायता की अपील भी की गई है। इसका नाम ‘श्रीकृष्ण मंदिर’ रखा गया है।

इसके लिए 2017 में ही ज़मीन के आवंटन का काम कर दिया गया था। लेकिन, बावजूद इसके तमाम औपचारिकताओं के बीच इस प्रोजेक्ट को 3 सालों तक लटका कर रखा गया। इस मंदिर परिसर में हिंदुओं के अंतिम संस्कार के लिए श्मशान बनाने को भी तैयारी है। हिन्दू मान्यताओं कर रीति-रिवाजों को पूरा करने के लिए अलग से जगह भी बनाई जाएगी।

बीबीसी के अनुसार, पंजाब विधान सभा के स्पीकर और PML के वरिष्ठ नेता परवेज़ इलाही ने मुफ़्ती मुहम्मद ज़कारिया के फ़तवे का समर्थन करते हुए कहा कि मक्का पर विजय पाने के बाद पैगंबर मोहम्मद ने काबा की क़रीब 300 मूर्तियों को नष्ट कर दिया था। पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार अल्पसंख्यकों को अच्छा माहौल देने के जो दावे करती है, उसकी पोल अब खुल रही है।

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में एक बार फिर से बड़ी संख्या में हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण का मामला सामने आया है। जानकारी के मुताबिक सिंध प्रांत के बाडिन जिले के अंतर्गत आने वाले गोलेरची में 102 हिंदुओं को जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया गया है। इन 102 हिंदुओं में पुरुष, महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। इतना ही नहीं यहाँ के स्थानीय मंदिर में रखी गई हिंदू देवताओं की सभी मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया था।

चाइनीज ऐप बैन करने के भारत के फैसले को मिला अमेरिका का साथ, कहा- राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी कदम

भारत सरकार द्वारा लोगों की निजता का हवाला देकर चीन की 59 ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने के बाद से इसे लेकर दुनिया भर में मामला गरमाया हुआ है। एक तरफ जहाँ चीनी सरकार ने भारत को अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला देकर इस पर विचार करने के लिए कहा है तो वहीं बुधवार (जुलाई 1, 2020) को इस मामले में अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने भारत के फैसले पर कहा कि भारत का एप्स को हटाने का दृष्टिकोण भारत की संप्रभुता को बढ़ावा देगा और अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी सुदृढ़ करेगा।

भारत के 59 चीनी ऐप्स पर बैन लगाने के कदम का स्वागत करते हुए अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी को ‘निर्दयी’ बता डाला।

पॉम्पिओ ने बुधवार को कहा है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की निर्दयता का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। उन्होंने कहा, “हम कुछ मोबाइल ऐप्स पर बैन लगाने के भारत के कदम का स्वागत करते हैं।” पॉम्पिओ ने इन ऐप्स को CCP के सर्विलांस का अंग बताया और कहा कि भारत के ऐप्स के सफाए के कदम से भारत की संप्रभुता, अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा जैसा भारत की सरकार ने खुद भी कहा है।

गौरतलब है कि भारत ने सोमवार (जून 29, 2020) को 59 चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसमें बेहद लोकप्रिय टिकटॉक और यूसी ब्राउजर भी शामिल हैं। ये प्रतिबंध लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों के साथ मौजूदा तनावपूर्ण स्थितियों के बीच लगाए गए हैं।

प्रतिबंधित सूची में वीचैट, बीगो लाइव, हैलो, लाइकी, कैम स्कैनर, वीगो वीडियो, एमआई वीडियो कॉल – शाओमी, एमआई कम्युनिटी, क्लैश ऑफ किंग्स के साथ ही ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म क्लब फैक्टरी आदि शामिल हैं।

भारत सरकार ने इन 59 एप्स को ब्लॉक करने का निर्णय लेते हुए कहा था कि ये सारे ऐप्स भारत की संप्रभुता, अखंडता, प्रतिरक्षा, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं। सरकार ने भारतीय नागरिकों के डेटा की सुरक्षा और निजता पर चिंता जताते हुए कहा कि एंड्रायड और iOS प्लेटफॉर्म्स पर ये सारे ऐप्स डेटा चुराते हैं और विदेशों में स्थित सर्वर पर भेज देते हैं।

बर्खास्त कर्मचारी रेहाना फातिमा के ‘अर्धनग्न’ विवादित वीडियो से नाराज़ BSNL ने भेजा सरकारी आवास खाली करने का नोटिस

सरकारी दूरसंचार कंपनी भारत संचार निगम लिमेटेड (BSNL) ने नोटिस जारी कर विवादित कार्यकर्ता और बर्खास्त कर्मचारी रेहाना फातिमा को सरकारी आवास खाली करने को कहा है।

उल्लेखनीय है कि यह कार्रवाई ऐसे समय की गई है जब हाल में पुलिस ने उनके द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट वीडियो के सिलसिले POSCO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया और उनके घर पर छापेमारी की गई थी।

सरकारी दूरसंचार कंपनी ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई से उसकी छवि को धक्का लगा है। बता दें कि रेहाना फातिमा ने 19 जून को यूट्यूब वीडियो फेसबुक पर शेयर किया था। इसमें उनके बेटे और बेटी को उनकी सेमी न्यूड बॉडी पर पेंटिंग करते देखा जा सकता है। इस वीडियो के साथ उन्होंने हैशटैग #BodyArtPolitics पोस्ट किया था। रेहाना के मुताबिक, यह वीडियो उन्होंने इसलिए बनाया था, ताकि महिलाएंँ सेक्स और अपने शरीर को लेकर ज्यादा खुल सकें, वो भी ऐसे समाज में जहाँ यह दोनों चीजें प्रतिबंधित हैं।

जिसके बाद उनके खिलाफ केरल पुलिस एक्ट, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट के तहत केस दर्ज कर 25 जून को पनमपिल्ली नगर स्थित उनके सरकारी आवास की तलाशी ली गई थी।

27 जून को जारी बीएसएनएल के नोटिस में कहा गया है, ‘‘उपरोक्त घटना से बीएसएनएल की छवि खराब हुई है। इसलिए आपको निर्देश दिया जाता है कि नोटिस मिलने के 30 दिन के भीतर सरकारी आवास को खाली कर दें नहीं तो आवास से निकालने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।’’

नोटिस में आगे कहा गया है कि बीएसएनएल कर्मचारी के तौर पर उनकी सेवाएँ समाप्त कर दी गई है। इसलिए वह कंपनी के आवास में रहने के लिए अयोग्य हैं। उल्लेखनीय है कि बीएसएनएल ने सोशल मीडिया पर श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को भड़का कर अशांति पैदा करने के आरोप में इस साल मई में फातिमा को बर्खास्त कर दिया था।

एक्टिविस्ट फातिमा ने पिछले हफ्ते केरल उच्च न्यायालय का रुख किया था, जिसमें उन्होंने POSCO एक्ट के तहत गिरफ्तारी को लेकर अग्रिम जमानत की माँग की थी।

गौरतलब है कि केरल के पथनमथिट्टा जिले की रहने वाली रेहाना फातिमा ने दो साल पहले सबरीमाला स्थित भगवान अयप्पा के मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की थी। हालाँकि, उनके इस कदम की काफी आलोचना हुई थी। उन्हें अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए अयप्पा श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए 18 दिन जेल में भी बिताने पड़े थे। रेहाना ने यूट्यूब पर एक कुकिंग वीडियो भी डाली थी। वीडियो में रेहाना बीफ की रेसेपी बताती नजर आई थीं। मगर, वीडियो की शुरुआत के 20 सेकेंड में उन्हें बीफ की जगह गौ माता बोलते सुना गया था।

वो चेहरे, जिन्होंने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन को ‘दिल्ली दंगों’ में बदलने का काम किया

नागरिकता कानून के नाम पर शुरू हुए विरोध प्रदर्शन देखते ही देखते दिल्ली हिंसा में तब्दील हो गए। नागरिकता कानून से शुरू हुई दिल्ली हिंसा पर ऐसे दस्तावेज़ कम ही मिलते हैं, जिनके सहारे पूरा घटनाक्रम समझा जा सके। इतनी संवेदनशील घटनाओं से जुड़ी किसी भी बहस में दलीलें कई तरह की होती हैं, लेकिन दलीलों पर भरोसा करना उतना ही मुश्किल है।

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, दिल्ली के कुछ पूर्व छात्रों का एक समूह है ‘स्वतीर्थ’। छात्रों के इस समूह ने मुद्दे पर शोध किया और उस शोध के आधार पर एक ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट दिल्ली में हुए दंगों की सीधी लकीर खींचती है – असल में दंगों के लिए कौन लोग ज़िम्मेदार थे और परदे पर नज़र आने वाला घटनाक्रम हकीक़त में कैसा था?   

11 दिसंबर के दिन नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) संसद में पारित हुआ। इस क़ानून को लेकर शुरुआती विरोध नज़र आया संसद के भीतर! उसके बाद विरोध का दायरा सड़कों तक बढ़ा, देश की पढ़ने लिखने वाली युवा पीढ़ी से लेकर उपद्रवी और अराजक तत्व भी इस विरोध में सड़क पर नज़र आए।

इसके बाद विरोध दंगों में तब्दील हुआ ही लेकिन इसके अलावा देश की राजधानी की शक्ल भी खराब हुई। लेकिन यह तो फिर भी आम लोग थे। इनके अलावा कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें एक बड़ी आबादी जानती है। ऐसे लोग, जो अपने-अपने क्षेत्र में सुने और समझे जाते हैं। जिनके चलते हालात सुधर सकते थे लेकिन हालात सुधारना तो दूर इन लोगों की बातों के बाद स्थितियाँ और बदतर ही हुईं। 

सोनिया गाँधी

इस कड़ी में सबसे पहला नाम है, भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की मुखिया सोनिया गाँधी का। सोनिया गाँधी ने राजधानी में जारी विरोध प्रदर्शन के दौरान एक वाक्य कहा, जिसका असर बेहद नकारात्मक पड़ा। दिसंबर 14, 2019 के दिन नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में ‘भारत बचाओ रैली’ हो रही थी, इस दौरान सोनिया गाँधी ने कहा, “यह आर पार की लड़ाई है।”

एक विरोध को दंगे की सूरत देने के लिए यह बात पर्याप्त थी। देश के विपक्षी दल की मुखिया होने के नाते उनसे इस बात की आशा करना गलत नहीं होता कि वह ऐसी बात कहें, जिससे स्थितियाँ सामान्य हों। वैसे कठिन परिस्थितियों में नेताओं के ऊपर यह ज़िम्मेदारी सबसे पहले आती है कि वह लोगों की सुरक्षा और शांति को तरजीह दें। अफसोस कि विपक्ष की सबसे दिग्गज नेता ने लोगों को उकसाना बेहतर समझा। 

हर्ष मंदर

हर्ष मंदर, ऐसा नाम जिसने विरोध के दौरान ऐसी बातों का ज़िक्र किया, जिनका प्रदर्शन से कोई लेना-देना ही नहीं था। इनकी बातों का एक मतलब यह भी था कि इन लोगों के लिए संसद और अदालत, लोकतंत्र के दो सबसे अहम पहलू बेमतलब हैं। इनका कहना था, “अब फैसला संसद में या सुप्रीम कोर्ट में नहीं होगा, सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या और कश्मीर के मामले में सेक्युलरिज्म की रक्षा नहीं की। इसलिए अब फैसला सड़कों पर होगा।”

इतना कुछ सैकड़ों-हजारों की भीड़ के सामने कहा गया, जिससे इस बात का अंदाज़ा लगा पाना आसान है कि राजधानी का माहौल बिगाड़ने में ऐसी बातों और ऐसे लोगों का हाथ कितना ज़्यादा रहा होगा। बेशक विरोध लोकतंत्र का सबसे मज़बूत पक्ष है, लेकिन अदालत और संसद को दोषी बता कर विरोध करना कैसे सही हो सकता है!

विरोध कर रहे छात्रों के साथ आईशी घोष

आईशी घोष, JNU की छात्रसंघ अध्यक्ष। जैसा कि यह देश के सबसे चर्चित संस्थान से आती हैं, ठीक वैसे ही इन्होंने अपने हिस्से की बात कहने के लिए पढ़े-लिखे लोगों की तरह सन्दर्भों का उपयोग किया। आईशी ने उकसाते हुए गृहमंत्री अमित शाह की बात के संदर्भ में कहा, “गृहमंत्री ने कहा था कि मुस्लिम महिलाओं को स्वतंत्र भाव से नहीं रहने दिया जाता है। अब आप लोगों ने गृहमंत्री को दिखाना है कि आप कितने ताक़तवर हैं।”

लेकिन संदर्भ गलत देने की वजह से आईशी का मकसद कुत्सित था क्योंकि गृहमंत्री ने तीन तलाक के कारण मुस्लिम महिलाओं को होने वाली परेशानी का उल्लेख किया था। आईशी ने लोगों के सामने कुछ इस तरह बात रखी जैसे गृहमंत्री ने कहा हो, ‘मुस्लिम महिलाएँ कमज़ोर हैं।’

इसके अलावा आईशी ने कहा, “हम कश्मीर वालों का दर्द नहीं भूल सकते हैं।” जिसका एक मतलब यह भी है कि उनका विरोध सीएए और एनआरसी तक ही सीमित नहीं था बल्कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्क्रीय करने को लेकर भी था। 

शरजील इमाम

शरजील इमाम, दिल्ली दंगों के दौरान निकल कर आया सबसे नया नाम। कहना गलत नहीं होगा कि राजधानी में हुए दंगों से पहले शरजील इमाम का नाम शायद ही किसी ने सुना होगा। प्रदर्शन के दौरान शरजील की कुछ बातें ऐसी थीं, जिससे विरोध करने वालों का एक नज़रिया साफ़ हो गया।

एक वायरल वीडियो में शरजील ने कहा कि हर गैर-मुस्लिम को अल्लाह ओ अकबर कहना पड़ेगा और मुस्लिमों के तय किए गए नियमों के हिसाब से चलना होगा। इसके बाद शरजील ने कहा कि अगर वो अपने समुदाय की एक बड़ी आबादी को समझा पाए तो देश के पूर्वोत्तर हिस्से को भारत से अलग कर सकते हैं।

इतना ही नहीं, शरजील का कहना था कि असम को काटना समुदाय के सभी लोगों की ज़िम्मेदारी है। उसने यहाँ तक कहा कि असम में सीएए लागू हो चुका है, लोग डिटेंशन कैम्प में डाले जा रहे हैं और कुछ महीनों में पता चलेगा कि सारे बंगालियों को मार दिया गया है।

हैरान करने वाली बात यह थी कि इस तरह की बातों के बावजूद तमाम लोगों ने शरजील इमाम का बचाव किया। जबकि उससे जुड़े जितने भी पहलू सामने आए, उन सभी में शरजील की बातें देश की एकता पर चोट करती हैं। 

वारिस पठान

वारिस पठान, एआईएमआईएम के इस जाने-माने नाम ने भी देश में जारी विरोध को बढ़ावा देने का मौक़ा नहीं छोड़ा। कर्नाटक के गुलबर्ग में 20 फरवरी के दिन एक जन सभा हुई, जिसका मुख्य कारण था सीएबी, एनपीआर और एनआरसी का विरोध। यहाँ हज़ारों की भीड़ के सामने वारिस पठान ने कहा देश के 15 करोड़ मुस्लिम 100 करोड़ हिंदुओं पर भारी पड़ेंगे।

इस बात का सीधा मतलब था, समुदाय विशेष के लोगों को क़ानून अपने हाथ में लेने के लिए भड़काने की कोशिश। जिस तरह के वक्त में समुदाय के लोग अपने नेता से इस बात की उम्मीद करते हैं कि उनके लिए सकारात्मक माहौल तैयार करें, ऐसे में ये नेता खुद माहौल बिगाड़ने में लग जाएँ, तब लोगों पर इसका असर भयावह ही होगा। 

उमर खालिद

उमर ख़ालिद, इस नाम से जुड़े जितने भी तथ्य सामने लाए जाएँ, लगभग सारे ही कम पड़ जाएँगे। उमर ख़ालिद शुरुआती लोगों में शामिल था, जिसने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय जाकर छात्रों के बीच भड़काऊ भाषण दिया।

दिसंबर के दूसरे हफ्ते में जब विरोध प्रदर्शन तेज हुआ तब उमर ख़ालिद के मुताबिक़ देश का बहुसंख्यक समाज दूसरे समुदाय की आबादी के लिए पूर्वग्रहों से ग्रस्त था। इतना ही नहीं, उमर ने आज़ादी के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों का मज़ाक उड़ाया और उन्हें कायर भी बताया।

उमर जैसे युवा वो हैं, जो देश के विश्वसनीय और प्रतिष्ठित संस्थान से आते हैं, आने वाले कल का अच्छा या बुरा होना काफी हद तक इन पर निर्भर करता है। इन सारी बातों के बावजूद यह अक्सर गलत उदाहरण ही पेश करता है।  

प्रदर्शन के दौरान स्वरा भास्कर

स्वरा भास्कर, एक ऐसा नाम जिसके सामने आते ही लोगों का एक ही सवाल होता था, एक अभिनेत्री का विरोध प्रदर्शन से क्या संबंध? हालाँकि, स्वरा भास्कर ने राजधानी में हो रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान भाषण कम ही मौक़ों पर दिए। लेकिन मीडिया वालों से होने वाली हर बातचीत में स्वरा भास्कर का मत साफ़ हो जाता।

बेशक स्वरा भास्कर जैसे चर्चित नामों के पास एक मौक़ा था हालात सुधारने में अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का। लेकिन इसके ठीक उलट उन्होंने छात्रों को भड़काने की कोशिश करना और भीड़ को हिंसक बनाने में अपना योगदान देना ज़्यादा बेहतर समझा।

परदे पर नज़र आने वालों के लिए दर्शक का नज़रिया पहले ही सुलझा हुआ होता है, लोग उन्हें पसंद करते हैं, उनके काम की तारीफ करते हैं। जब नायक और नायिकाएँ ही गलत मिसाल पेश करने लगें तब परेशानियों का समाधान कैसे निकाला जा सकता है।  

यह तो फिर भी चंद नाम हैं, जिनके चलते देश की राजधानी दिल्ली का माहौल खराब हुआ। बहुत से नाम ऐसे भी थे, जिनकी कल्पना करना तक मुश्किल है, इन सभी नामों के चलते एक विरोध प्रदर्शन कब दंगों में बदल गया पता ही नहीं चला।

ट्विटर कर रहा है प्रतिबंधित चीनी ऐप चलाने के लिए फ्री VPN देने वाली ऐप का पेड प्रमोशन, ऐश्वर्या राय की तस्वीर का भी इस्तेमाल

भारत सरकार द्वारा 59 चायनीज मोबाइल ऐप को प्रतिबंधित किए जाने के फैसले का नतीजा अब यह हो रहा है कि कुछ चायनीज ऐप ही इन प्रतिबंधित ऐप को चलाने के लिए लोगों को निमंत्रण दे रही हैं और इस काम में उनका साथ दे रहा है ट्विटर!

ट्विटर पर ‘पांडा VPN’ (Panda VPN) पेड प्रमोशन कर लोगों को प्रतिबंधित ऐप को एक्सेज करने की ‘सुविधा’ दे रही है। इस पेड प्रमोशन में लिखा है – “अब आप पांडा VPN को मुफ्त में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके जरिए आप दुनियाभर में कोई भी वेबसाइट और मोबाइल ऐप चला सकते हैं। सिर्फ एक क्लिक से टिकटॉक, वीचैट, नेटफ्लिक्स आदि चलाएँ।”

हालाँकि, भारत में VPN इस्तेमाल करना अपराध नहीं है। लेकिन इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित वेबसाइट और ऐप के लिए करना अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन यहाँ पर महत्वपूर्ण यह है कि ट्विटर भी इस तरह के सन्देश और ऐड कैम्पेन को कुछ रुपयों के लिए अपने पोर्टल पर जगह दे रहा है।

पांडा VPN इस ऐड कैम्पेन के लिए बॉलीवुड अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन की तस्वीर का इस्तेमाल भी कर रहा है।

अब लोगों की माँग है कि सरकार अन्य मोबाइल ऐप के साथ इस VPN ऐप पर भी प्रतिबंध लगाए क्योंकि यह अन्य तरीकों से लोगों को प्रतिबंधित चायनीज ऐप इस्तेमाल करने का जरिया दे रहा है।

क्या होता है VPN

वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (Virtual Private Network) के जरिए यूजर्स अपने आईपी एड्रेस (IP address) को बदल सकते हैं और किसी भी प्रतिबंधित साइट्स को आसानी से एक्सेस कर सकते हैं।

गौरतलब है कि लद्दाख में जारी सीमा विवाद के बीच देशभर में चाइनीज उत्पादों के बहिष्कार की आवाज उठनी शुरू हुई हैं। ऐसे में भारत सरकार ने 59 चायनीज ऐप को प्रतिबंधित करने का बड़ा फैसला लिया।

भारत सरकार के इस फैसले से चीन चिंतित भी नजर आ रहा है, यही वजह है कि एक ओर जहाँ वह अपने मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के द्वारा भारत के खिलाफ कूटनीतिक एजेंडा चलाने के प्रयास कर रहा है, उसी समय चीन ने इन ऐप के बहिष्कार पर WTO (विश्व व्यापार संगठन) की शर्तों की भी दुहाई दे रहा है।

इस पर चीनी दूतावास के प्रवक्ता जी रोंग ने भी चाइनीज ऐप पर प्रतिबंध को लेकर कहा है कि चीन इस पर पूरी तरह से नजर रख रहा है और इस कार्रवाई का कड़ा विरोध जता रहा है।

TikTok को कॉन्ग्रेसी वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी बेसहारा छोड़ा, कहा, ‘नहीं लड़ूँगा केस!’

वरिष्ठ वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने बुधवार (जुलाई 1, 2020) को कहा कि वो चीनी ऐप टिकटॉक की तरफ से कोर्ट में पैरवी नहीं करेंगे। सिंघवी ने बताया कि टिकटॉक के लिए उन्होंने एक साल पहले सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की थी और वे जीते भी थे। हालाँकि, इस बार वो कोर्ट में चीनी ऐप के लिए खड़े नहीं होंगे।

इससे पहले देश के शीर्ष वरिष्ठ अधिवक्ताओं में शुमार पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने भी चीनी ऐप टिकटॉक का मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया। रोहतगी ने बुधवार को कहा कि वह एक चीनी ऐप के लिए भारत सरकार के खिलाफ अदालत में खड़े नहीं होंगे। टिकटॉक ने मामले की पैरवी के लिए रोहतगी से संपर्क किया था, लेकिन उन्होंने टिक-टॉक की तरफ से सरकार के खिलाफ पेश होने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि वह नहीं चाहते कि भारत सरकार के ख़िलाफ़ वो किसी चीनी कंपनी का प्रतिनिधि बनें।

वहीं भारत सरकार द्वारा 59 चायनीज ऐप पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज बुधवार को चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो (Weibo) छोड़ दिया है। चायनीज सोशल मीडिया वीबो पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वेरिफाइड एकाउंट मौजूद था और तकरीबन ढाई लाख फॉलोवर्स थे। पीएम मोदी ने साल 2015 में वीबो पर अपना एकाउंट बनाया था। 

गौरतलब है कि भारत ने सोमवार (जून 29, 2020) को 59 चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसमें बेहद लोकप्रिय टिकटॉक और यूसी ब्राउजर भी शामिल हैं। ये प्रतिबंध लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों के साथ मौजूदा तनावपूर्ण स्थितियों के बीच लगाए गए हैं।

प्रतिबंधित सूची में वीचैट, बीगो लाइव, हैलो, लाइकी, कैम स्कैनर, वीगो वीडियो, एमआई वीडियो कॉल – शाओमी, एमआई कम्युनिटी, क्लैश ऑफ किंग्स के साथ ही ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म क्लब फैक्टरी आदि शामिल हैं।

भारत सरकार ने इन 59 एप्स को ब्लॉक करने का निर्णय लेते हुए कहा था कि ये सारे ऐप्स भारत की संप्रभुता, अखंडता, प्रतिरक्षा, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं। सरकार ने भारतीय नागरिकों के डेटा की सुरक्षा और निजता पर चिंता जताते हुए कहा कि एंड्रायड और iOS प्लेटफॉर्म्स पर ये सारे ऐप्स डेटा चुराते हैं और विदेशों में स्थित सर्वर पर भेज देते हैं।

सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने अपने बयान में यह भी कहा था कि कई लोगों ने डेटा सुरक्षा को ले कर सरकार से शिकायत की थी। सरकार ने उसका संज्ञान लेते हुए इन्हें ब्लॉक करने का निर्णय लिया है, क्योंकि ये न सिर्फ डेटा चोरी करते हैं बल्कि बिना यूजर को बताए, उनका इस्तेमाल गलत तरीकों से करते हैं। इससे अंततः भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने आईटी कानून और नियमों की धारा 69ए के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इन एप्स पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया।

वाहवाही लूटते समय सांसद निधि पर स्पष्टीकरण देना भूल गए थे शशि थरूर, भाजपा सांसद के सवाल पर आया गुस्सा

एक आरटीआई याचिका से पता चला है कि केरल से कॉन्ग्रेस के सांसद शशि थरूर ने MPLADS (सांसद निधि योजना) से श्री चित्रा तिरूनल इंस्‍टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्‍नोलॉजी को COVID-19 रैपिड टेस्टिंग डिवाइस खरीदने के लिए 1 करोड़ रुपए अतिरिक्‍त देने की घोषणा तो की थी लेकिन उन्हें ऐसा कोई फंड प्राप्त नहीं हुआ है।

कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने हाल ही में दावा किया था कि COVID-19 टेस्ट किट बनाने के लिए उन्होंने श्री चित्रा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को फंड दिया। लेकिन केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन ने आरटीआई की एक तस्वीर पोस्ट करके शशि थरूर के इस दावे का विरोध किया है। जिसके बाद ट्विटर पर शशि थरूर ने कुछ स्पष्टीकरण शेयर किए हैं।

इस RTI के जवाब में श्री चित्रा तिरूनल इंस्‍टीट्यूट का कहना उन्हें R & D (रिसर्च एंड डेवलपमेंट) के लिए या टेस्ट किट खरीदने के लिए कॉन्ग्रेस नेता और सांसद शशि थरूर से किसी प्रकार का फंड नहीं मिला।

दरअसल, अप्रैल 17, 2020 को शशि थरूर ने एक न्यूज़ ट्वीट करते हुए इस बात का जिक्र किया था और कहा था कि उन्हें इस डोनेशन को देने पर गर्व है

शशि थरूर ने ट्वीट में लिखा था – “मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि मैंने अपने MPLADS फंड में से 1 करोड़ का उपयोग R&D को फंड करने के लिए इस्तेमाल किया, जिसके कारण तिरुवनंतपुरम के श्री चित्रा इंस्टीट्यूट में इस COVID-19 को लेकर बड़ी सफलता मिली। उनकी नई परीक्षण किट दो घंटे के नीचे नमूना-से-परिणाम लाएगी लेकिन श्री चित्रा इंस्टीट्यूट के पास इसके लिए पैसा नहीं था।”

जिस खबर को ट्वीट करते हुए शशि थरूर ने यह दावा किया था उसमें श्री चित्रा इंस्टिट्यूट द्वारा टेस्टिंग किट बनाने की बात कही गई थी।

आज ही भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय राज्य विदेश मंत्री वी मुरलीधरन ने एक ट्वीट में उस RTI का जिक्र करते हुए कहा कि श्री चित्रा इंस्टिट्यूट को शशि थरूर द्वारा कोई भी फंड नहीं मिला है और शशि थरूर का दावा झूठा है।

भाजपा नेता के इस ट्वीट के जवाब में शशि थरूर ने कहा है कि उनके द्वारा लगाए गए आरोप झूठे हैं और उन्हें अपने शब्द वापस लेने चाहिए। शशि थरूर ने इस पर स्पष्टीकरण पेश करते हुए कुछ ट्वीट किए हैं, जिनमें उन्होंने लिखा है कि 30 मार्च को भारत सरकार द्वारा निलंबित MPLADS निधियों से पहले ही इस फंड को अधिकृत किया गया था।

दरअसल, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संसद सदस्‍य को अप्रैल 01, 2020 से मिलने वाले भत्तों और पेंशन में एक वर्ष के लिए 30% की कटौती करने वाले संसद सदस्‍य वेतन, भत्‍ते और पेंशन अधिनियम 1954 में संशोधन के अध्यादेश को मंजूरी दी है।

इसी का जिक्र करते हुए शशि थरूर ने कहा कि उनकी घोषणा के अनुसार फंड आवंटन 30 मार्च के पत्र द्वारा किया गया था, जिसके अनुसार कि किट विकसित होने पर ही SCTIMST को धन प्राप्त होना था, और इसी के अनुसार 1 करोड़ देने की घोषणा की गई थी।

थरूर ने कहा – “इसके बाद जिला प्रशासन (MPLAD वितरण के लिए नोडल एजेंसी) और संस्थान व्यवस्थापक ने मुझे खरीद के लिए वित्त के रूप में यह राशि देने का अनुरोध किया। क्यों? सरकार के स्वयं के संशोधित MPLAD दिशानिर्देशों ने विकास के समर्थन की अनुमति नहीं दी।”

थरूर ने कहा कि खरीदने के लिए उत्पादन और उत्पादन के लिए सरकार द्वारा अनुमति होनी चाहिए जो कि नहीं दी गई और इसी वजह से यह आवंटन भी नहीं हो सका। थरूर ने यह भी कहा कि मुझसे वो 1 करोड़ रूपए माँगे जा रहे हैं, जिन्हें सरकार ने नहीं दिया तो भाजपा नेता को यह आरोप नहीं लगाना चाहिए।

हालाँकि, इससे पहले शशि थरूर श्री चित्रा इंस्टिट्यूट को फंड देने की बात कहकर कई बार ट्विटर पर वाहवाही बटोर चुके हैं। थरूर के ट्वीट से पता चलता है कि उन्होंने यह वाहवाही तब लूटी थी, जब सांसद निधि को लेकर उनके द्वारा दिए जा रहे तर्क लागू भी हो चुके थे।

यानी वाहवाही लूटते समय शशि थरूर ने यह स्पष्टीकरण देना बेहतर नहीं समझा था, लेकिन इस वाहवाही को लेकर जब उनसे सवाल किए गए तो उन्होंने विस्तार से समझाया कि सरकार उन्हें ऐसा नहीं करने दे रही है इस वजह से वो यहाँ दान नहीं दे सके थे।

MPLAD (सांसद निधि योजना)

बता दें कि हर संसद सदस्य को सांसद निधि के रूप में हर साल पाँच करोड़ रुपए की राशि मिलती है जो वह अपने क्षेत्र के विकास कार्यों में खर्च कर सकता है। MPLAD एक तरह का फंड है जिसके तहत सांसदों को साल में 5 करोड़ रुपए मिलते हैं, जो ढाई-ढाई करोड़ की दो किश्तों में जारी किए जाते हैं।

केंद्र सरकार यह पैसा लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 250 सांसदों से जुड़े ज़िलों के जिलाधिकारियों को भेजती है। जिसे जिलाधिकारी एक बैंक खाते में रखते हैं। फिर सांसदों के निर्देशों के पूरा करने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है। इस फंड और इससे होने वाले कार्य की निगरानी के लिए जिले में एक नोडल अधिकारी होता है।

डॉ अनवर को निर्दोष साबित करने के रवीश कुमार का प्राइम टाइम, दर्शकों को बरगलाने के लिए तथ्यों से की छेड़छाड़

हर बार नए झूठ के साथ खुद को पेश करना कोई आसान काम नहीं होता। मगर, एनडीटीवी पत्रकार रवीश कुमार इसे बखूबी करते हैं। रवीश हर बार अपनी ‘विशेष’ रिपोर्टिंग को नया एंगल देने के कारण विवादों में आते हैं और फिर हकीकत खुलते ही उन्हें फजीहत झेलनी पड़ती है। इस बार भी यही सब हुआ है। बस केंद्र बिंदु में अब की मामला दिल्ली दंगों में भीड़ को भड़काने के आरोपित डॉ अनवर से जुड़ा हैं।

डॉ अनवर वही शख्स है, जिसे मुस्तफाबाद में हुए दंगों का मास्टरमाइंड बताया गया। लेकिन रवीश कुमार ने अपनी रिपोर्ट में डॉ एम ए अनवर पर लगे आरोपों को एक सिरे से खारिज कर दिया और पुलिस प्रशासन पर इल्जाम मढ़ने के लिए व जनता को भड़काने के लिए पूरी खबर को नया कोण दिया।

अपने प्राइम टाइम में रवीश कुमार ने मुख्यत: इस बात पर जोर दिया कि दिल्ली दंगों के दौरान सैंकड़ों लोगों का इलाज करने वाले डॉक्टर पर दिल्ली पुलिस ने दिलबर नेगी की हत्या के मामले में केस दर्ज कर लिया है। जबकि आगे रवीश की रिपोर्ट में इस बात का अलग से उल्लेख किया गया, “हालाँकि डॉ अनवर आरोपित नहीं है। मगर उनका नाम चार्जशीट में है।”

ध्यान दीजिए, पुलिस ने पिछले दिनों एक आरोपपत्र कड़कड़डूमा कोर्ट के महानगर दंडाधिकारी पवन सिंह राजावत के समक्ष दायर किया था। पुलिस ने इस मामले में डॉ अनवर के साथ ही नेहरू विहार निवासी अरशद प्रधान को आरोपित बनाया था।

पुलिस ने बताया था कि फारुकिया मस्जिद पर सीएए और एनआरसी के विरोध में जमा लोगों को 23 फरवरी की रात दंगों के लिए उकसाया गया और डॉक्टर अनवर व अरशद ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस बाबत एक एफआईआर दयालपुर थाने में दर्ज भी हुई।

आरोप-पत्र में कहा गया है कि 15 जनवरी के बाद से ही फारुकिया मस्जिद से कई वक्ताओं ने समुदाय के लोगों को उकसाना शुरू कर दिया था। यहाँ पर अवैध रूप से CAA और NRC का विरोध चल रहा था, जिसमें अलग-अलग तारीख में भाषण देकर लोगों को यह कहा जाता था कि NRC लागू होने के बाद उन्हें नागरिकता नहीं दी जाएगी, उन्हें डिटेंशन कैंप में डाल दिया जाएगा।

यहाँ गौरतलब हो कि डॉक्टर अनवर, न्यू मुस्तफाबाद स्थित अल हिंद हॉस्पिटल का मालिक है। अल हिंद हॉस्पिटल फारुकिया मस्जिद और उस मिठाई दुकान से एक किलोमीटर दूर है, जहाँ दिलबर नेगी काम करता था और दंगाइयों ने जहाँ पहुँचकर उसकी निर्मम हत्या कर दी।

पुलिस द्वारा दायर पत्र के अनुसार फारुकिया मस्जिद में होने वाले विरोध-प्रदर्शन के आयोजक अरशद प्रधान और अल हिन्द हॉस्पिटल के मालिक डॉक्टर एमए अनवर थे। लेकिन, अब रवीश कुमार की रिपोर्ट में इन बिंदु को पूर्णत: नजरअंदाज करते हुए डॉ अनवर को सिर्फ़ इस तरह पेश किया जा रहा है कि उन्होंने दिल्ली दंगों में कई दंगा पीड़ितों का इलाज किया था और वह (डॉ अनवर) अपने ऊपर लग रहे आरोपों से मना कर रहे हैं। फिर भी दिल्ली पुलिस दिलबर नेगी की हत्या के आरोप उनका नाम घसीट रही है।

उल्लेखनीय है कि सोशल मीडिया पर रवीश कुमार की इस अज्ञानता और प्रोपगेंडा फैलानी की कोशिश देखते हुए लोग उनकी थू-थू करते नहीं थक रहे। लोगों का कहना है कि ऐसी झूठी पत्रकारिता अपराध होनी चाहिए और ऐसे झूठ बोलकर दंगे भड़काने वाले पत्रकार को जेल में डाल देना चाहिए। इसके अलावा उनके झूठ का पर्दाफाश करते उनकी वीडियो भी शेयर हो रही है।

DSP देविंदर सिंह पर भी फैलाया रवीश कुमार ने झूठ

बता दें इससे पहले NDTV पर अपने प्राइम टाइम शो में पत्रकार रवीश कुमार ने निलंबित पुलिस अधिकारी देविंदर सिंह के बारे में झूठ बोला कि मामले में चार्जशीट दायर न होने के कारण उन्हें जेल से रिहा किया गया था।

इसके साथ ही रवीश कुमार ने भारत में पुलिस तंत्र पर आरोप लगाया कि फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम देना, निर्दोष लोगों के खिलाफ फर्जी आतंकी आरोप लगाना, उन्हें 10-20 साल के लिए जेल में बंद करना और इसी तरह की गतिविधियों को अंजाम देना भारतीय पुलिस का मजबूत पक्ष है।

हालाँकि, सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने और उनकी आतंकी गतिविधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की प्रतिबद्धता पर संदेह जताने को लेकर प्रोपेगेंडा फैलाने में व्यस्त रवीश कुमार ने निलंबित डीएसपी देविंदर सिंह के खिलाफ दर्ज मामले के विवरण को आसानी से नजरअंदाज कर दिया।

जहाँ अदालत ने देविंदर सिंह और वकील इरफान शफी मीर को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा उनके खिलाफ दायर मामले में जमानत दे दी थी। दरअसल, अदालत ने गौर किया कि 90 दिनों की अनिवार्य वैधानिक अवधि बीत जाने के बाद भी आरोप-पत्र दाखिल नहीं किया गया था। जिसकी वजह से उन्हें डिफॉल्ट जमानत मिल गई। उन्हें एक लाख रुपए के निजी बांड और इतनी ही राशि के दो मुचलकों पर यह राहत दी गई।

‘इस्लाम में समलैंगिकता हराम है’: जानिए क्यों हो रहा है #WhySoProud ट्रेंड

30 जून प्राइड मंथ के रुप में संपन्न हुआ। इस दौरान इस्लामवादियों ने ट्विटर पर #WhySoProud ट्रेंड कराने के साथ ही समलैंगिकता से जुड़े ट्वीट्स को ये दावा करते हुए ट्रेंड करवाया कि यह कैसे कुरान के खिलाफ है। कुछ लोगों ने कहा कि चूँकि वो अल्लाह के प्रति जवाबदेह हैं, इसलिए उन्हें यह समझने की आवश्यकता है कि इस्लाम में समलैंगिकता हराम है।

कुछ अन्य लोगों ने अपने साथियों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को सिखाएँ कि समलैंगिकता का समर्थन न करें क्योंकि यह ‘सामान्य हो रहा है’।

एक इस्लामवादी ने अपने होमोफोबिक ट्वीट में बच्चों को समलैंगिकों से बचाने के लिए #save_your_children_from_gays हैशटैग भी जोड़ा।

एक इस्लामवादी ने यह भी दावा किया कि एलजीबीटी समुदाय के लोग कुरान में ‘शापित लोग’ हैं।

एक ने यह भी दावा किया कि समलैंगिकता पर संपूर्ण ग्लोबल ‘उम्मा’ में पाप होने पर आम सहमति है।

कुछ लोगों ने अल्लाह की मदद से ‘प्राइड’ को दूर करने की भी कसम खाई है।

समलैंगिकता और इस्लाम

कुरान के अनुसार, ‘लूत के लोग’ अल्लाह के ‘क्रोध’ से नष्ट हो गए थे क्योंकि पुरुष पुरुषों के साथ यौन संबंध रखते थे। कुछ हदीस संग्रह भी समलैंगिकता और ट्रांसजेंडर कृत्यों की निंदा करते हैं।पुरुष समलैंगिक कृत्यों में मृत्युदंड निर्धारित है। कई इस्लामी देशों में समलैंगिकता के लिए मौत की सजा है।

आतंकी की गोली से मरा कश्मीरी, नैरेटिव बनाने की कोशिश की CRPF ने मार डाला: फैक्ट चैक

उत्तरी कश्मीर के सोपोर में बुधवार (जुलाई 01, 2020) सुबह सीआरपीएफ (CRPF) के गश्ती दल पर हुए आतंकी हमले में एक सीआरपीएफ के हेड कांस्टेबल की भी मौत हो गई, जबकि तीन सुरक्षाकर्मी घायल हो गए। यह हमला एक बाजार में हुआ जहाँ चहल-पहल भी थी। इसी कारण आतंकियों के हमले का शिकार एक नागरिक भी हुए। इसके बाद एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसमें एक तीन साल का बच्चा अपने नाना जी के शव के ऊपर बैठा हुआ देखा गया।

बशीर अहमद के शव पर बैठा तीन साल का सुहैल

मृतक की पहचान 65 वर्षीय बशीर अहमद (Bashir Ahmad) के रूप में हुई। दरअसल, बशीर अहमद अपने 3 साल के नाती सोहेल को लेकर बाजार गए थे, लेकिन एनकाउंटर के बीच बशीर को आतंकवादियों की गोली लग गई और वह वहीं गिर पड़े। बशीर अहमद मुस्तफा कॉलोनी एचएमटी शहर के रहने वाले थे। जम्मू-कश्मीर पुलिस के अनुसार, सोपोर में आतंकवादी हमले के दौरान गोलियों की चपेट में आने से पुलिस ने एक 3 साल के बच्चे को बचाया है।

इसके बाद सोशल मीडिया के जरिए एक बार फिर भारतीय सेना और सुरक्षाबलों की छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से एक फर्जी नैरेटिव रचने का प्रयास किया जा रहा है कि बशीर अहमद की मृत्यु CRPF की गोली लगने से हुई।

एक वीडियो शेयर किया गया है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि मृतक बशीर अहमद के बेटे ने अपने पिता की मौत के लिए कथित तौर पर CRPF को जिम्मेदार ठहराया है। जबकि इस वीडियो को देखने और सुनने पर पता चलता है कि उन्होंने अपने पिता की हत्या के लिए CRPF को दोषी नहीं ठहराया है।

इस वीडियो में वह कह रहे हैं – “वो सवेरे छह बजे अपने काम से सोपोर निकले थे। तो वहाँ फायरिंग स्टार्ट हो गई तो सीआरपी ने फायरिंग की, मार डाला।”

हालाँकि, वीडियो में यह कहीं भी स्पष्ट जिक्र नहीं किया गया है कि मृतक के बेटे ने कहा हो कि CRPF ने उनके पिता को मार डाला। ऐसे में यह भी सम्भव है कि वह कह रहे हों कि CRPF की फायरिंग के बाद उन्हें आतंकियों की गोली ने मार डाला।

ट्विटर पर सोपोर पुलिस के अकाउंट ने इस घटना के बाद बने इस फ़ेक नैरेटिव पर ट्वीट करते हुए लिखा है – “यह खबर कुछ सोशल नेटवर्किंग साइटों पर सामने आई है कि बशीर अहमद को गाड़ी से उतारकर मार दिया गया। यह पूरी तरह से बेबुनियाद है और तथ्यों से परे है, सोपोर पुलिस खबर का खंडन करती है और झूठी रिपोर्ट और अफवाहों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की जाएगी।” इसके साथ ही इस ट्वीट में कश्मीर पुलिस के ट्विटर अकाउंट को भी टैग किया गया है।

घटनास्थल से तीन साल के बच्चे को सुरक्षित निकालने के बाद सुरक्षाबलों के बयान का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो बता रहे हैं कि किस प्रकार सामने से होने वाली फायरिंग में नागरिक की मौत के बाद उनकी पहली प्राथमिकता बच्चे को बचाना था। जवान इसमें कह रहे हैं कि उन्होंने बच्चे की सुरक्षा के लिए गोलियों की दिशा को ब्लॉक किया और उसके बाद बच्चे को वहाँ से सुरक्षित निकाल लिया।

कश्मीर की घटनाओं को इस्लामिक रंग देने के लिए कुख्यात ‘कश्मीर वाला’ वेबसाइट ने तो यहाँ तक कहा है कि मृतक बशीर की पत्नी ने कहा कि सरकार ने खुद उन्हें मारा, फिर बच्चे को उनके शव पर बिठाया।

कुछ लोगों ने एक ऐसे सीक्रेट ग्रुप को भी इस नैरेटिव के लिए जिम्मेदार ठहराया है, जिसमें इस हत्या का इल्जाम CRPF पर डालने का नैरेटिव तैयार करने की बात कही गई है। ट्विटर यूजर्स का कहना है कि उज़ैर नाम का आदमी इस फ़ेक नैरेटिव को फैला रहा है।

बताया जा रहा है कि आतंकियों ने घात लगाकर पैट्रोलिंग कर रहे जवानों पर खुलेआम फायरिंग कर दी थी। इस दौरान तीन जवानों और एक नागरिक को गोली लग गई। फिलहाल, सुरक्षाबलों की अतिरिक्त टुकड़ी मौके पर पहुँच गई है और पूरे इलाके को घेर लिया गया है।

आज ही जम्मू कश्मीर पुलिस के एक आईपीएस अधिकारी इम्तियाज हुसैन ने एक खुलासा करते हुए बताया है कि 2001 में उनकी चचेरी बहन की एक आतंकी घटना में मौत होने के बाद उनके परिवार पर लोगों द्वारा दबाव बनाया गया था कि वो इसका आरोप बीएसएफ़ (BSF) पर लगाएँ।