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हिंदू विरोधी और अर्बन नक्सलियों का संरक्षक DU का शिक्षक संघ: वामपंथी दुकान को दक्षिणपंथ की चुनौती

दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षकों की राजनीति की दिशा और दशा डूटा (दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ) के अध्यक्ष और उसकी क्रियाकलापों के इर्द-गिर्द घूमती है। DUTA अध्यक्ष के चुनाव में अधिकतर तो वामपंथियों का कब्ज़ा रहा है, लेकिन बीच के दौर में कई बार कॉन्ग्रेस समर्थित अध्यक्ष भी बने हैं।

राष्ट्रवादी शक्तियों को ये मौका बहुत कम मिला है। कई बार अच्छे प्रदर्शनों के बाद भी पिछले बीस वर्षों से डूटा अध्यक्ष का पद राष्ट्रवादी शक्तियों के खेमे में नहीं आ पाया है।

डूटा की राजनीति और उसकी कार्यकारिणी की संरचना कुछ ऐसी बनी हुई है, जिसमें सिर्फ अध्यक्ष का चुनाव सीधा होता है। बाकी पदाधिकारियों का चुनाव डूटा के उन पंद्रह कार्यकारिणी सदस्यों के बीच होता है जो चुनाव जीत कर सदस्य बनते हैं।

चुनाव में बाकी और विचारधारा वाले संगठनों की तरह राष्ट्रवादी शक्तियों के समर्थन से भी चार या पाँच उम्मीदवार ही खड़े किए जाते हैं। ऐसी संरचना में डूटा की राजनीति सिर्फ अपनी ही विचारधारा के अनुसार तय करना डूटा अध्यक्ष के लिए भी संभव नहीं होता है।

डूटा की कार्यकारिणी में हर विचारधारा के लोग आते हैं, इसलिए कार्यकारिणी में लिए गए निर्णय और उसी में किया गया पदाधिकारियों का चुनाव भी सिर्फ विचारधारा का ध्यान रखकर नहीं हो पाता है। इन परिस्थितियों में डूटा कार्यकारिणी सिर्फ शिक्षकों की अपनी मूलभूत सुविधाओं, अधिकारों और उनके आर्थिक हितों के मुद्दों पर ही एकमत हो पाते हैं।

वामपंथियों के लिए डूटा की ऐसी संरचना लाभदायक सिद्ध हुई है, क्योंकि दिल्ली राज्य और केंद्र में ना तो कभी उनके विचारधारा वाली सरकार रही और ना ही दूर भविष्य में आने की उम्मीद दिखती है। शिक्षक हितों के नाम पर उन्हें दिल्ली संसद पर आतंकी हमलों के संदिग्ध प्रो. जीलानी, प्रो. साईंबाबा और प्रो. हनी बाबू जैसे अर्बन नक्सलियों और हिन्दू विरोधी प्रो. केदार मंडल जैसे लोगों के हितों की रक्षा करने में मुश्किल नहीं होती है।

शिक्षा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अपने राष्ट्रविरोधी एजेंडे को भी वे अधिकारों की राजनीति के नाम पर खुले में बढ़ा ले जाते हैं। अलबत्ता राष्ट्रवादी शक्तियों को अपने कई मुद्दों को दरकिनार करके सिर्फ शिक्षक अधिकारों के मुद्दों की राजनीति करनी पड़ती है।

राष्ट्रवादी संगठन हमेशा से सिर्फ अधिकारों की ही नहीं, बल्कि शिक्षकों में कर्तव्यबोध बढ़ाने की भी पक्षधर रही है और यही बात उन्हें वामपंथी संगठनों से अलग भी करती है। मगर डूटा की राजनीति करने के दबाव में शिक्षकों के कर्तव्यों की बात आज की परिस्थिति में करना उनके लिए आज इसीलिए भी मुश्किल होता है, क्योंकि उन्हें सिर्फ सरकार का साथ देने की सोच कहकर बाकी सभी गुट उन्हें नकार देते हैं।

ऐसी संरचना के चक्रव्यूह में फँसकर शिक्षकों के बीच कार्यरत राष्ट्रवादी शक्तियाँ भी अब कर्तव्यों की बात छोड़कर सिर्फ अधिकारों और सिर्फ शिक्षक हितों के नाम की राजनीति करने को मजबूर हो गए हैं।

इसी राजनीति में फँसकर उन्हें सरकार की हर पॉलिसी का ना सिर्फ विरोध करना पड़ता है, बल्कि उन्हीं पॉलिसियों में निहित कुछ अच्छाइयों का वे ज़िक्र तक नहीं कर पाते। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जहाँ कुछ कमियाँ हो सकती है, मगर स्वतंत्र भारत में पहली बार शिक्षा का भारतीयकरण करने की कोशिश इस पॉलिसी में स्पष्ट रूप से किया गया है। मगर इस पक्ष को रखने से भी इन शक्तियों को बचना पड़ता है।

इसी नीति में स्पष्ट तौर पर सरकारी निवेश दुगुने से भी ज़्यादा बढ़ाने की बात लिखे होने के बाद भी इसे शिक्षा के व्यवसायीकरण की पॉलिसी कहने वाली डूटा का विरोध करने से इन्हें बचना होता है। समायोजन जैसे गंभीर और तर्कसंगत मुद्दे पर सिर्फ कई वर्षों से कार्यरत लोगों के समायोजन की माँग ना करके कल से लगे एडहॉक शिक्षकों के समायोजन की भी अतार्किक माँग का समर्थन, इसलिए करना पड़ता है क्योंकि ऐसा प्रस्ताव डूटा में पास हो चुका है।

शिक्षा में जहाँ प्राइवेट निवेश का अंधविरोध राष्ट्रवादी शक्तियाँ देश में कहीं और नहीं करतीं, वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में उन्हें ऐसा करना पड़ता है। यूजीसी (UGC) के 2018 के अभूतपूर्व रेगुलेशंस की प्रशंसा करना भी इन्हें इन्हीं कारणों से मुश्किल होता है।

कोरोना काल में जब ऑनलाइन शिक्षा विकल्प नहीं मजबूरी भी हो गई है, उस वक्त भी ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर डूटा का अंधविरोध राजनीति से प्रेरित है। लेकिन राष्ट्रवादी शक्तियों का भी इसे समर्थन देना एक मजबूरी हो जाता है।

अगर हम ध्यान दें तो राष्ट्रवादी शक्तियों को केंद्र में सरकार बनाने से दूर रखने के लिए भी धर्मनिरपेक्षता का एक अभेद्य चक्रव्यूह बनाया गया था और अटल जी की सरकार तक को भी यह विश्वास दिला दिया था कि इस चक्रव्यूह को तोड़ा नहीं जा सकता है।

आडवाणी जी का असमय जिन्ना प्रेम, गुजरात में मोदी की सरकार को खुलकर समर्थन ना दे पाना, राम मंदिर के नाम पर सक्रियता का अभाव, पाकिस्तान की आतंकी नीतियों के खुलकर विरोध में कमी और कांधार संस्करण में सरकार की कमजोरी, इसी का प्रमाण है। मगर मोदी की सरकार ने उस छद्म धर्मनिरपेक्षता की संकीर्ण मानसिकता से अपने आप को बचाकर सिर्फ राष्ट्रहित की नीतियों के आधार पर ही देश को एक मजबूत सरकार देने में सफलता हासिल की है।

समय आ गया है जब दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत राष्ट्रवादी शक्तियों को भी ये सोचना पड़ेगा कि डूटा अध्यक्ष बनने की दौड़ में अपनी पहचान खोना कहाँ तक तर्कसंगत है?

केंद्र की मोदी सरकार ने यह स्थापित किया है कि राष्ट्रवादी शक्तियों का भारतीय राजनीति में दबदबा उसकी राष्ट्रवादी नीतियों के कारण ही हुआ है। इतना ही नहीं, मोदी के नए भारत में उज्ज्वला जैसी पॉलिसी की सफलता ने यह भी सिद्ध किया है कि आज लोग अपने कर्तव्यों के प्रति भी सचेत हैं और सिर्फ अधिकारों और अवसरवादिता की राजनीति करने का काल अब नहीं रहा।

राष्ट्रवादी शक्तियों को डूटा के बनाए गए इस चक्रव्यूह को तोड़कर डूटा की सीमित राजनीति से मोहभंग करना होगा। उन्हें डूटा से अलग अपनी पहचान बनाने की पहल करनी पड़ेगी और तभी राष्ट्रवादी शक्तियाँ अपने आप को सही मायने में दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थापित कर पाएँगी।

शाहरुख पठान को जमानत देने से दिल्ली HC का भी इंकार, याचिका में कहा था- अम्मी-अब्बू की तबीयत खराब है

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगो के दौरान सरेआम पुलिसकर्मी पर पिस्तौल तानने वाले शाहरुख पठान को ज़मानत देने से दिल्ली HC ने इंकार कर दिया है। इसी के साथ शाहरुख ने ज़मानत अर्जी वापस ले ली है। वह उत्तर पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद इलाके में हुई हिंसा के मामले का आरोपित है।

शाहरुख पठान ने इस अर्जी में अपने पिता के ऑपरेशन का हवाला देकर जमानत माँगी थी। उसने कहा था कि उसका कोई पुराना अपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। चार्जशीट दायर हो चुकी है। माता-पिता (अम्मी-अब्बू) की सेहत खराब है, उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले शाहरुख पठान ने कोरोना का हवाला देकर जमानत माँगी थी। लेकिन उसकी जमानत अर्जी को कड़कड़डूमा कोर्ट ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने साफ कहा था कि अभी आरोपित शाहरुख पठान को जमानत नहीं दी जा सकती है।

आरोपित शाहरुख पठान के मामले की पैरवी कर रहे वकील असगर खान ने जमानत याचिका में दावा किया था कि जेल में बड़ी संख्या में कैदी हैं और वहाँ कोरोना वायरस संक्रमण की चपेट में आने का जोखिम बहुत अधिक है।

अदालत की कार्यवाही के दौरान, दिल्ली पुलिस के विशेष लोक अभियोजक डीके भाटिया ने जमानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा था कि ये पठान ही था, जिसने इलाके में भीड़ का नेतृत्व किया था। उन्होंने यह कहते हुए जमानत न देने का आग्रह किया कि फिलहाल जाँच जारी है।

इसके बाद जमानत याचिका को खारिज करते हुए, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजीव कुमार मल्होत्रा ने कहा, “विरोध करने का अधिकार लोकतंत्र में एक मौलिक अधिकार है, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध और सरकारी नीतियों की खुली आलोचना का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा डालने के लिए नहीं होता है।”

याद दिला दें गत फरवरी माह में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी (NRC) के विरोध में 23 और 24 फरवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के भारत दौरे से ठीक पहले उत्तर पूर्वी दिल्ली में हिंसा हुई थी। इस दौरान जाफराबाद-मौजपुर इलाके में लोगों को भड़काने और हलवदार पर पिस्तौल तानने के आरोपित शाहरुख को यूपी के शामली से 3 मार्च को गिरफ्तार किया गया था।

हिंसा के दौरान शाहरुख ने जाफराबाद इलाके में 8 राउंड फायरिंग की थी। उसके पास से एक पिस्तौल तथा दो कारतूस जब्त किए गए थे। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने दिल्ली में शाहरुख के घर से पिस्टल और तीन कारतूस बरामद किए थे। 

सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की कोशिश करने वाली रेहाना फातिमा बच्चों से करा रही थीं हाफ न्यूड बॉडी पर पेंटिंग, केस दर्ज

केरल के सबरीमाला स्थित भगवान अयप्पा मंदिर में घुसने की कोशिश करने और साजिशन अपनी सोशल मीडिया पोस्ट से श्रद्धालुओं की भावनाओं को भड़काने को लेकर विवादों में आई एक्टिविस्ट रेहाना फातिमा के खिलाफ राज्य की तिरुवल्ला पुलिस ने केस दर्ज किया है।

बतया जा रहा है कि फातिमा ने महिला सशक्तिकरण दिखाने के लिए अपने बच्चों से अपनी हाफ न्यूड बॉडी पर पेंटिंग करवाई थी। उन पर फिलहाल केरल पुलिस एक्ट, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है।

जानकारी के मुताबिक रेहाना फातिमा ने 19 जून को ही यूट्यूब वीडियो फेसबुक पर शेयर किया था। इसमें उनके बेटे और बेटी को उनकी सेमी न्यूड बॉडी पर पेंटिंग करते देखा जा सकता है। इस वीडियो के साथ उन्होंने हैशटैग #BodyArtPolitics पोस्ट किया था। रेहाना के मुताबिक, यह वीडियो उन्होंने इसलिए बनाया था, ताकि महिलाएंँ सेक्स और अपने शरीर को लेकर ज्यादा खुल सकें, वो भी ऐसे समाज में जहाँ यह दोनों चीजें प्रतिबंधित हैं।

उनके इस पोस्ट पर सोशल मीडिया पर लोगों ने नाराजगी जताई थी। कई लोगों ने तो इसे बच्चों के उत्पीड़न का मामला बताया। कुछ लोगों ने पूछा कि क्या अगर एक पिता अपनी बेटी के साथ ऐसा ही करेगा, तो ठीक होगा। रेहाना के खिलाफ कई लोगों ने शिकायत की है।

तिरुवल्ला पुलिस का कहना है कि रेहाना फातिमा के खिलाफ केस वकील एवी अरुण प्रकाश की शिकायत पर दर्ज किया गया है। उन पर आईटी एक्ट की धारा 67, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 75 और केरल पुलिस एक्ट की धारा 120 के तहत मामला दर्ज हआ है।

गौरतलब है कि केरल के पथनमथिट्टा जिले की रहने वाली रेहाना फातिमा ने दो साल पहले सबरीमाला स्थित भगवान अयप्पा के मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की थी। हालाँकि, उनके इस कदम की काफी आलोचना हुई थी। पूर्व में बीएसएनएल की नौकरी कर चुकीं फातिमा को बाद में जबरन रिटायर कर दिया गया।

उन्हें अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए अयप्पा श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए 18 दिन जेल में भी बिताने पड़े थे। रेहाना ने यूट्यूब पर एक कुकिंग वीडियो भी डाली थी। वीडियो में रेहाना बीफ की रेसेपी बताती नजर आई थीं। मगर, वीडियो की शुरुआत के 20 सेकेंड में उन्हें बीफ की जगह गौ माता बोलते सुना गया था।

अमेरिका में सिख की रेस्टोरेंट पर हमला कर उपद्रवियों ने मचाया उत्पात, देवी मूर्ति तोड़ने के साथ किया ₹75.6 लाख का नुकसान

अमेरिका के न्यू मेक्सिको के संता फे सिटी नगर में एक अमेरिकन सिख की दुकान पर रंगभेदी समूह के लोगों ने दिनदहाड़े हमला बोला और लाखों का नुकसान करके वहाँ से चले गए।

रेस्टोरेंट के मालिक बलजीत सिंह ने बताया कि इन सबके कारण उनका करीब 75.6 लाख रुपयों का नुकसान हुआ। अब स्थानीय पुलिस और संघीय जाँच ब्यूरो (FBI) मिलकर इसकी जाँच कर रहे हैं।

इस हमले के दौरान रंगभेदी समूह के लोगों ने बलजीत की दुकान के अंदर तरह-तरह के स्लोगन भी लिखे। जैसे-  ‘white power’, ‘Trump 2020’, ‘F**K ISIS’, and ‘go home’ आदि। 

वहाँ के एक स्थानीय अखबार के अनुसार, उपद्रवियों ने इस बीच रेस्टोरेंट में रखे सभी टेबलों को पलट दिया। दुकान में सामने रखे डेस्क को तोड़ दिया और रसोई को भी पूरी तरह नष्ट कर दिया। बलजीत कहते हैं, “मैं जब किचन में गया। मैनें वहाँ सब देखा। मैंने उन्हें कहा- रुको, ये सब क्या कर रहे हो?”

यहाँ बता दें कोविड-19 के चलते अमेरिका में बलजीत का रेस्टोरेंट काफी समय से बंद पड़ा हुआ था। अभी हाल में उन्होंने इसे दोबारा शुरू किया। लेकिन रेस्टोरेंट चालू होते ही ये सब हो गया। खबरों की मानें तो उपद्रव के दौरान दुकान में लगे शीशे भी चकनाचूर किए गए। वाइन रैक को भी खाली किया गया और दुकान में रखी देवी की प्रतिमा का सिर भी तोड़ दिया गया। इतना ही नहीं, उपद्रवी जाते-जाते अपने साथ कम्प्यूटर भी ले गए।

इस घटना के बाद अब एक गैर-लाभकारी नागरिक अधिकार संगठन, सिख अमेरिकन लीगल डिफेंस एंड एजुकेशन फंड (SALDEF) ने इस मामले के संबंध में बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने इस घटना की निंदा की।

SALDEF बोर्ड के सदस्य सिमरन सिंह ने कहा, “संता फ़े एक शांतिपूर्ण शहर है, और सिख समुदाय 60 के दशक से, यहाँ खूबसूरती से एकीकृत होकर रह रहे हैं।”

वहीं, SALDEF की कार्यकारी निदेशक किरण कौर गिल ने कहा कि नफरत और हिंसा की ऐसी घटनाएँ अस्वीकार्य हैं।

white supremacist

उल्लेखनीय है कि ये पहली बार नहीं जब सिखों को उनकी पगड़ी के कारण इस्लामिक या इरानी समझ लिया गया हो। इससे पहले यूएस में ऐसी घटनाएँ 9/11 के बाद सामने आई थी जब परिधान आदि देखकर सिखों का शोषण हुआ था। इसके अलावा 29 अप्रैल को अमेरिकन सिख लखवंत सिंह पर कोलोराडो के लेकवुड में भी बुरी तरह हमला करके देश छोड़कर जाने को कहा गया था।

इस हालिया मामले के संबंध में गवर्नर मिशेल लुजान ग्रिशम ने एक बयान जारी कर इस घटना की निंदा की है। एक ट्वीट में उन्होंने कहा, “हम न्यू मैक्सिको में इस तरह की नफरत को नहीं बढ़ने देंगे।” उन्होंने कहा कि उन्होंने बलजीत सिंह से बात की थी और उन्हें ये बताया था कि हमारा समुदाय उनके साथ है।

मेयर एलन वेबर ने इस पूरे वाकए को “घटिया और भयावह” घृणा अपराध कहा । उन्होंने उपयुक्त कानून के तहत दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि सिंह लोग यहाँ पर एक लंबे समय से सिख परिवार हैं, जिन्होंने अपने संसाधनों की मदद से संता के कई बेघरों का पेट भरा। उनके लिए इस प्रकार का हमला हमारे दिल को तोड़ देता है।

जमाल ने मज़हब छिपाकर फेसबुक पर की युवती से दोस्ती: शादी का झाँसा देकर रेप, धर्म परिवर्तन का दवाब, गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में पुलिस ने उत्तराखंड की युवती से मजहब छुपाकर फेसबुक पर दोस्ती के बाद शादी का झाँसा देकर दुष्कर्म करने के आरोपित जमाल को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपित के खिलाफ जनवरी में महिला थाने में केस दर्ज हुआ था। जिसके बाद से ही पुलिस आरोपित की तलाश में थी।

महिला एसओ ज्योति सिंह ने बताया कि आरोपित जमाल को सोमवार (जून 22, 2020) सुबह पुलिस लाइन मंदिर के पास से गिरफ्तार किया गया। इसके बाद आरोपित को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया है।

जानकारी के मुताबिक जमाल ने फर्जी फेसबुक आइडी बना कर मज़हब छुपाकर उत्तराखंड की हिन्दू युवती से दोस्ती के बाद शादी का झाँसा देकर उसके साथ दुष्कर्म करता रहा। इस दौरान आरोपित वीडियो वायरल करने की धमकी देकर बार बार ब्लैकमेलिंग करता रहा।

ज्योति सिंह ने बताया कि उत्तराखंड के उत्तरकाशी निवासी युवती ने 23 जनवरी को मझोला थाना क्षेत्र के निवासी जमाल के खिलाफ दुष्कर्म, धोखाधड़ी और जान से मारने की धमकी देने का केस दर्ज कराया था। रिपोर्ट में पीड़िता ने आरोप लगाया था कि जमाल ने फेसबुक के जरिए लगभग छ: महीने पहले दोस्ती की थी। इस दौरान उसने खुद को उसके ही धर्म का बताया था।

फिर धीरे-धीरे उनके बीच दोस्ती बढ़ने लगी। दिसंबर 2019 में आरोपित जमाल ने शादी का झाँसा देकर उसे मुरादाबाद बुलाया। यहाँ वो उसे एक होटल में ले गया। वहाँ उसने उसके साथ दुष्कर्म किया। जब पीड़िता ने उससे शादी करने को कहा तो जमाल धर्म परिवर्तन करने के लिए दबाव बनाने लगा। इनकार करने पर उसने शादी करने से ही मना कर दिया। 

पीड़िता ने बताया कि जब उसने आरोपित जमाल के घर जाकर इसकी शिकायत की तो उसके परिवार के लोगों ने भी उसे ही जान से मारने की धमकी दी थी। इतना ही नहीं, पीड़िता का यह भी आरोप है होटल में जमाल ने उसकी अश्लील वीडियो भी बनाई थी। पुलिस में शिकायत करने पर वह उसे सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने की धमकी देने लगा था। इसी को वायरल करने की धमकी देकर अपने पास बुलाकर शारीरिक संबंध भी बनाता था।

वह कहती है कि जमाल ने उसे बताया था कि वह बीटेक कर चुका है। उसके पिता बाबू अंसारी मुरादाबाद में पीतल के बड़े कारोबारी हैं। पीड़िता ने जमाल के अलावा उसके पिता बाबू अंसारी और भाई तैय्यब के खिलाफ भी केस दर्ज कराया था। अब पुलिस आरोपित जमाल के पिता और भाई तैय्यब की भूमिका जाँचने में जुट गई है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मेरठ से लव जिहाद का मामला सामने आया था। यहाँ के मुंडाली थाना क्षेत्र के अजराड़ा निवासी वसीम अहमद ने हापुड़ निवासी एक हिंदू युवती को पहले पहचान छिपाकर अपने प्रेमजाल में फँसाया और फिर 2 साल तक उसके साथ दुष्कर्म करता रहा। पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर मुकदमा दर्ज कर आरोपित को गिरफ्तार कर लिया।

एकंबरेश्वर मंदिर: जहाँ माता पार्वती की परीक्षा लेने पहुँचे थे स्वयं भगवान शिव

एकंबरेश्वर मंदिर, तमिलनाडु के मंदिरों के नगर कांचीपुरम का सबसे विशाल एवं भव्य शिव मंदिर है। इसमें पीठासीन देवता के रूप में भगवान शिव हैं। भगवान शिव को यहाँ पृथ्वी के रूप में पूजा जाता है।

पिछली बार आपने पढ़ा था कि पञ्चभूत स्थल दक्षिण भारत में पाँच शानदार प्राचीन मंदिर हैं। इनका निर्माण मानव चेतना को विकसित करने के एक माध्यम के रूप में किया गया था।

इन मंदिरों में श्रीकलाहस्ति में वायु तत्व हेतु, कांचीपुरम में पृथ्वी तत्व, तिरुवन्नामलाई में अग्नि तत्व हेतु, चिदंबरम में आकाश तत्व एवं तिरुवनाईकवल में जल तत्च के लिए इन मंदिरों का निर्माण किया गया था।

इस यात्रा की शुरुआत के लिए डेरा जमाया गया था चेन्नई में, जहाँ मेरे मित्र तृषार इस यात्रा में साथ देने गुजरात से आने वाले थे। रास्ता बना लिया गया था, नाम लिख लिए गए थे।

पहला दिन कांचीपुरम और महाबलीपुरम में गुज़ारा गया था और रात को मदुरै के लिए प्रस्थान किया गया था।

आइए चलते है पंचभूत की यात्रा पर –

एकंबरेश्वर मंदिर

यहाँ शिव को एकंबरेश्वर के रूप में पूजा जाता है, और लिंगम द्वारा दर्शाया जाता है, उनकी मूर्ति को पृथ्वी लिंगम कहा जाता है। यह विशाल मंदिर अपने विशाल ‘गोपुरम’ के लिए प्रसिद्ध है, जो कांचीपुरम के मंदिर शहर के क्षितिज पर हावी है।

माना जाता है कि मंदिर हजारों साल पुराना है, लेकिन पल्लव वंश के राजाओं, पांड्या वंश, चोल वंश और विजयनगर के बाद के राजाओं द्वारा फिर से पुनर्निर्माण किया गया, विशेषकर राजा कृष्ण सेवा राय ने इस मंदिर में कई संरचनात्मक योगदान दिए।

गर्भगृह के सामने एक हजार-स्तंभों वाला अनूठा डिजाइन किया गया हॉल (ऐयाराम काल मंडपम) है, इसमें 1008 शिव लिंगम की मूर्तियाँ हैं और माना जाता है कि इसे राजा कृष्णदेव राय ने भी बनवाया था।

आम के इस पेड़ के नीचे माँ पार्वती ने भगवान महादेव शिव की पूजा की थी और माता पार्वती शिव जी को प्राप्त करने के लिए उसी आम के पेड़ के नीचे मिट्टी या बालू से ही एक शिवलिंग बना कर घोर तपस्या करनी शरू कर दी थी।

जब शिव ने पार्वती जी को तपस्या करते हए देखा तो परीक्षा लेने के उद्देश्य से अपनी जटा से गंगा जल से सब जगह पानी-पानी कर दिया। जल की तेज गति से पूजा मे बाधा पड़ने लगी तो माता पार्वती ने उस शिवलिंग जिसकी वह पूजा कर रही थी, उसे गले लगा लिया जिसे से शिव लिंग को कोई नुकसान न हो। शिव जी यह सब देख कर बहुत खुश हए और माता पार्वती को दर्शन दिए।

शिव जी ने माता पार्वती से वरदान माँगने को कहा तो माता पार्वती ने विवाह की इच्छा व्यक्त की। महादेव ने माता पार्वती से विवाह कर लिया। कहा जाता है कि इस पेड़ की हर शाखा पर अलग-अलग रंग के आम लगते है और इनका स्वाद भी अलग-अलग है।

मंदिर परिसर में मंडप युक्त एक सुंदर तालाब भी है, जिसे शिव गंगा तीर्थम कहते हैं। इस सरोवर के मध्य में शिव पुत्र भगवान गणेश जी की एक मूर्ति भी स्थापित है।

कामाक्षी अम्मा के मन्दिर में विष्णु जी को भी स्थापित किया गया है पर वो मुख्य मंदिर से ज़रा हट कर एक तालाब में विराजमान हैं।

चलते-चलते आपको गरुड़ स्तंभ दिखाता चलता हूँ जिसकी कहानी आपको @wh0mi_ यहाँ बता चुके हैं। अगली बार आपको मदुरै के मंदिर ले जाने से पहले महाबलीपुरम ले कर चलेंगे तब तक के लिए विदा लेता हूँ।

उद्दंड चीन और कॉन्ग्रेस के बेतुके बोल: वक्त सवाल पूछने का नहीं, सेना और सरकार के पीछे खड़े होने का है

गीता में भगवान् कृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा था- संशयात्मा विनश्यति। अर्थात, शत्रु जब सामने हो उस समय शंका का एक छोटा सा बीज भी देखते ही देखते मानसिक द्वन्द के विशाल वृक्ष के रूप में खड़ा हो सकता है।

यह मानसिक द्वन्द बड़े से बड़े योद्धा के उत्साह और शरीर को शिथिल कर देता है। यही भ्रम उसे पराजय की ओर ले जाकर नष्ट कर देता है। यह युद्ध जीवन की रोजमर्रा की लड़ाई हो भी सकती है और सीमाओं पर शत्रु के विरुद्ध लड़ा जाने वाला संग्राम भी। 

विश्वास मानव की प्रगति की कुंजी है, तो शंका उसके विनाश का दरवाज़ा। युद्ध की स्थिति में सिपाहियों और जनता के बीच संदेह का कीड़ा पैदा कर दिया जाए तो बड़ी से बड़ी सेना हार सकती है। 

हमारे 20 जवान धोखे से मार डाले गए हैं। यह भी सही है कि हमारे वीर सैनिकों ने चीन के भी कई जवानों को मार डाला है। आज चीन हमें खुली चुनौती दे रहा है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने तो इस कपटपूर्ण कार्रवाई के लिए भारत की सेना को ही दोषी बताया है।

गलवान घाटी में 15 जून को नियंत्रण रेखा की झड़प के बाद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकृत अखबार ‘ग्लोबल टाईम्स’ ने तो सीधी धमकी दे डाली है। अखबार लिखता है, “1962 के चीन-भारत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ भारत की मदद को आए थे, पर चीन ने भारत को फिर भी हराया था।” उसने आगे लिखा है कि इस समय तो चीन की अर्थव्यवस्था भारत से पाँच गुनी है। चीन फिर से भारत को सबक सिखाएगा। 

पिछले कुछ दिनों में एक बार नहीं बल्कि दसियों बार इस अखबार ने 1962 का जिक्र करके भारत को ताना मारा है और ‘देख लेने’ की धमकी दी है। यही नहीं सीधे-सीधे पाकिस्तान और यहाँ तक कि नेपाल को भड़काकर भारत पर तीन तरफ से हमला करने का दुस्साहस भी दिखाया है।

अख़बार ने 23 जून के एक लेख में लिखा है कि “भारत के चीन, पाकिस्तान और नेपाल के साथ सीमा के झगड़े चल रहे है।” इसलिए इसे एक साथ तीन मोर्चों पर युद्ध लड़ना पड़ेगा। यानी, भारत जब भी अपने बाजिव हकों की बात करेगा तो चीन युद्ध की धमकी देगा। 

आप इसका विश्लेषण किसी भी तरह करें, तो पाएँगे कि चीन की नीयत में खोट आ चुका है। निस्संदेह प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के साथ संबंध बेहतर बनाने की लाख कोशिशें की हैं। पर अब उसकी किसी भी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता। हम इस समय चीन के साथ युद्ध जैसी स्थिति में हैं।

इस युद्ध के कई मोर्चे हैं। मौजूदा संघर्ष सामरिक भी है, आर्थिक भी, वैचारिक भी और मनोवैज्ञानिक भी है। इसी बीच देश कोरोना से भी एक जंग लड़ रहा है। देश में साढ़े चार लाख से ज्यादा संक्रमण और 14 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। 

हम जानते ही हैं कि चीन बहुत ही चालाक, धूर्त और घातक शत्रु है। वह ‘हिंदी चीनी भाई-भाई’ के नारे की ओट में आपकी पीठ में छुरा भोंकता है। वह आपके साथ शिखर बैठक के समय नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ कर देता है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का अधिनायकवादी तंत्र दुनिया के किसी कायदे-कानून, पूर्व मान्य समझौते और नियम को नहीं मानता।

पिछले दिनों में हांगकांग के मामले में दुनिया ये देख ही रही है। अपनी आर्थिक और सामरिक धौंसपट्टी से सबको हाँकने की कोशिश करने वाले ऐसे मर्यादाहीन देश की चालबाजियों से समूचा विश्व हैरान है। हमें समझना होगा कि चीन अपनी टेक्नोलॉजी और एप्स जैसे कि ज़ूम और टिकटॉक तक का इस्तेमाल इस युद्ध के मनोवैज्ञानिक संघर्ष में कर रहा है। 

देखने की बात ये है की गलवान घाटी में लड़ाई की मूल वजह क्या है? इसकी दो मूल वजह हैं। पहली, भारत ने पिछले कुछ साल में अपनी पूर्वोत्तर क्षेत्र में लगातार सड़कें, पुल और  हवाई अड्डे बनाने का काम किया है। इससे चीन विचलित है। अगर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखा जाए तो 1962 के बाद हमने चीन की सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का काम किया ही नहीं।

उधर चीन ने लगातार सड़कें, रेल मार्ग, हवाई पट्टियाँ और पुल बनाए जिससे उसकी सेना तथा बड़े हथियार थोड़ी समय में ही मोर्चे पर पहुँच जाते हैं। इधर हम सोचते रहे कि अगर हम सड़क और पुल बनाएँगे तो चीन की सेना उनका इस्तेमाल कर सकती है। ऐसी नकारात्मक और कायरतापूर्ण सोच एक पराजित मानसिकता को ही दिखाती है। जो लोग आज सरकार से सवाल पूछ रहे हैं उनसे पूछा जाना चाहिए कि डर की यह मानसिकता क्या सही थी? 

संतोष की बात है कि देश ने अपनी इस कमजोरी को समझा और पिछले कुछ समय से भारत-चीन नियंत्रण रेखा तक पहुँचने के लिए नई सड़कें, पुल और हवाई अड्डे बनने लगे। इसीलिए चीन ने स्पष्ट कहा है कि मौजूदा तनाव का मूल कारण भारत का ये निर्माण ही है। इसका सीधा मतलब है कि अगर हम अपने इलाकों के विकास के लिए सड़क और पुल बनाएँगे तो चीन उनका विरोध करेगा और उसके विरोध में वह संघर्ष पर उतारू हो जाएगा।

सवाल है, जब चीन संघर्ष पर उतारू होगा तो क्या हम वहाँ से भागेंगे या फिर डटकर उसका मुकाबला करेंगे। गलवान घाटी में वही हुआ। हमारी सेना चीन के तेवरों से डरी नहीं। दृढ़ता से चीन की उद्दंड सेना का सामना किया। जिसमें कुछ बलिदान हमारे जवानों की हुई और काफी चीनी सैनिक भी मारे गए। मौजूदा संघर्ष भारत की इस नई सोच का उदाहरण है। जो भारत की संप्रभुता, सम्मान और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार है। इसलिए गलवान घाटी की घटना पर देश को गर्व करने की आवश्यकता है न कि इससे विचलित होने की।

मौजूदा भारत-चीन तनाव का दूसरा कारण है, चीन की आंतरिक स्थिति। कोरोना महामारी के बाद चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था संकट में है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा कोरोना की जानकारी दुनिया को समय पर न दिए जाने के कारण विश्वभर में चीन के प्रति आक्रोश है। स्वयं चीन के अंदर भी इसको लेकर असंतोष के स्वर उठ रहे हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी गलती मानने की बजाए पूरी दुनिया में देशों को धमकाना शुरू कर दिया है।

अगर आप देखें तो एक के बाद एक चीन ने ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, जापान, ताइवान,  कनाडा आदि कई देशों के साथ जबरन बैर मोल लिया है। हांगकांग में पहले से मान्य और स्वीकृत समझौते को उलट दिया है।

दरअसल कोरोना को पूरी दुनिया में फैलाने की जिम्मेदारी से बचने के लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने उद्दंडता का सहारा लेना शुरू किया है। लद्दाख क्षेत्र में नियंत्रण रेखा पर जो विवाद के मोर्चे चीन ने अब खोले हैं उन पर पहले अधिक विवाद नहीं था। इसका मतलब साफ है, अपनी नाकामी और आंतरिक मामलों से ध्यान हटाने के लिए भारत के साथ उसने यह मोर्चा खोला है।

दरअसल अपने देश में एक वर्ग ऐसा है जो अंदरखाने चीन के साथ सहानुभूति रखता है। देश के वामपंथी सोच रखने वाले तो चीन को अपना वैचारिक मसीहा मानते हैं, इसलिए उनके बर्ताव पर हैरानी नहीं होनी चाहिए। वे 1962 के दौरान भी ऐसा कर चुके हैं। समझा जा सकता है कि उनकी स्वाभाविक सहानुभूति चीन के साथ है। परंतु मुख्य विपक्षी दल कॉन्ग्रेस को सोचना चाहिए कि संकट की इस घड़ी में बेतुके सवाल उठाना क्या देश में शंका का माहौल पैदा करने जैसा नहीं है?  

ऐसे में सेना, उसकी तैयारी और देश के नेतृत्व के प्रति संदेह का वातावरण पैदा करना इस मनोवैज्ञानिक युद्ध में शत्रु का साथ देने के बराबर है। यह सही है की चीन में कम्युनिस्ट तानाशाही के उलट भारत एक प्रजातंत्र है। प्रजातंत्र पारदर्शिता और खुलेपन पर चलता है। पर जब सवाल देश की सुरक्षा, रणनीतिक दावपेंचों  और उसके सैन्य मनोबल का हो तो बेहद सतर्कता बरतना ज़रूरी है। प्रजातंत्र में सवाल पूछने का अधिकार विपक्ष को ही नहीं, देश के हर एक नागरिक को है।

इसी तरह सरकार का कर्तव्य है कि वह हर सवाल का उत्तर दे। परंतु कौन से सवाल पूछे जाए? इनका टाइमिंग क्या हो? यह भी बहुत महत्वपूर्ण है। क्या ये सवाल उस समय पूछे जाने चाहिए जिस समय गलवान घाटी में सेनाएँ एक-दूसरे के सामने खड़ी हुई हैं? क्या कुछ भी अनाप-शनाप सवाल उस समय उठाए जाएँ जब हमारी सेना के कमांडर चीन के साथ बातचीत के नाज़ुक दौर में हों?

जब चीन का पूरा प्रोपेगेंडा तंत्र भारत के खिलाफ प्रचार में लगा हुआ है उस समय देश की पार्टियाँ खासकर कॉन्ग्रेस ऐसा करने लगे तो बड़ी हैरत होती है। मेरे ख्याल से ये वक्त सवाल पूछने का नहीं, बल्कि बिना किसी किन्तु-परन्तु के देश की सेना और देश के प्रधानमंत्री के पीछे खड़ा होने का है। 

कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की इस हफ्ते ख़ास बैठक हुई। होना तो ये चाहिए था कि पार्टी एक लाइन का प्रस्ताव पारित करती कि इस नाज़ुक घड़ी में वह सेना और देश के साथ खड़ी हुई है। पर उस प्रस्ताव में तो बस सवालों की झड़ी लगी हुई है। और तो और, अपने दस साल के कार्यकाल के दौरान राजनीतिक मौन धारण करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस वक्त लम्बा चौड़ा बयान दे रहे हैं। राहुल गाँधी के ट्वीट्स और बयानों के बारे में तो कुछ न ही कहा जाए तो बेहतर होगा। 

जब संकट के बादल थम जाएँ; सेनाएँ पीछे लौट जाएँ; युद्ध जैसी स्थिति समाप्त हो जाए; उस समय संसद में सरकार और प्रधानमंत्री से खूब सवाल पूछे जाने चाहिए। परंतु इस समय ट्विटर पर अनर्गल प्रलाप करना और अटपटे सवाल पूछना देश की जनता के मन में संदेह के बीज बोना है।

जो भी ऐसा कर रहे हैं वे देश के दीर्घकालिक हितों को दरकिनार करते हुए सिर्फ अपनी छोटी-मोटी राजनीति तथा क्षुद्र स्वार्थों के लिए ऐसा कर रहे हैं। देश की सेनाएँ जब सीमा पर खून बहा रही हों, आपके शत्रु की नजर आपके एक-एक कदम पर ही नहीं आपकी भाव भंगिमा तक पर हो, उस समय 20-20 क्रिकेट मैच की तरह हर बॉल पर कमेंट्री की उम्मीद गैर जिम्मेदाराना और बेहद बेवकूफाना है।

‘बेफिक्रे’ में रणवीर, ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ में अर्जुन और ‘फितूर’ में आदित्य: जानिए कैसे 3 बड़ी फिल्मों से हटा दिए गए थे सुशांत

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद सामने आ रहा है कि उनके करियर पर किस तरह से सुनियोजित ढंग से ग्रहण लगाया जा रहा था। केवल 6 महीने में ही एक के बाद एक कर के उनसे 7 फ़िल्में छीन ली गई थीं। एक उभरते हुए अभिनेता के लिए ये काफ़ी बड़ा झटका था। अब हमें उन तीन बड़ी फिल्मों के बारे में पता चला है, जिनमें सुशांत सिंह राजपूत को लिए जाने की चर्चा थी लेकिन बाद में नेपोटिज्म और गुटबाजी कारण अन्य सितारों की झोली में चली गई।

सबसे पहले बात ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ की, जो मई 2017 में रिलीज हुई थी। फिल्म ने काफी अच्छा कारोबार किया था और इससे अर्जुन कपूर और आलिया भट्ट को अच्छी-ख़ासी चर्चा मिली थी। दोनों ही बॉलीवुड के प्रभावशाली परिवारों से आते हैं। ख़ुद चेतन भगत ने 2015 में ट्वीट कर के कहा था कि सुशांत उनकी पुस्तक पर आधारित फिल्म में लीड अभिनेता होंगे। फिर ऐसा क्या हुआ कि उनकी जगह बोनी कपूर के बेटे अर्जुन को ले लिया गया?

इसके बाद बात ‘फितूर’ की, जिसमें अजय देवगन ने गेस्ट रोल भी किया था। इसमें भी आदित्य रॉय कपूर ने लीड रोल निभाया लेकिन क्या आपको पता था कि इससे पहले इसमें सुशांत सिंह राजपूत को लिए जाने की चर्चा थी। बाद में ख़बर आई कि आदित्य को सुशांत की जगह ले लिया गया है। बता दें कि आदित्य रॉय कपूर यूटीवी के मालिक सिद्धार्थ रॉय कपूर के भाई और विद्या बालन के देवर हैं। वो भी पॉवरफुल परिवार से आते हैं।

तीसरी बड़ी फिल्म जो उनसे छीन ली गई, वो यशराज फिल्म्स की ड्रीम प्रोजेक्ट्स में से एक थी निर्देशक ख़ुद आदित्य चोपड़ा ने किया था। ‘बेफिक्रे’ के अलावा उन्होंने अब तक DDLJ, ‘मोहब्बतें’ और ‘रब ने बना दी जोड़ी’ का ही निर्देशन किया था और सब में शाहरुख़ खान ही थे। ‘बेफिक्रे’ में एन वक़्त पर सुशांत की जगह रणवीर सिंह को ले लिया गया। फिल्म ने कमाई भी अच्छी की और मीडिया द्वारा उन्हें पूरा अटेंशन भी मिला था।

हाल ही में शेखर कपूर ने भी सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के मामले में न्याय के लिए आवाज़ उठाते हुए कहा है कि कई लोगों की तरह उनके भी दिल से आवाज़ उठ रही है कि सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले में जो दिख रहा है, सच्चाई उससे कहीं परे हैं। शेखर सुमन ने गुटबाजों पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि फिल्म इंडस्ट्री के सारे शेर बनने वाले कायर सुशांत के चाहने वालों के कहर से चूहे बन कर बिल में घुस गए हैं, उनके मुखौटे गिर गए हैं।

इसी तरह फिल्म निर्देशक अभिषेक कपूर ने खुलासा किया है कि ‘केदारनाथ’ की रिलीज के बाद मीडिया ने सारा अली ख़ान को तो सिर-आँखों पर बिठा लिया था, लेकिन सुशांत सिंह राजपूत को नकार दिया था, जिससे वो बुझे-बुझे से रहते थे। इस फिल्म के डायरेक्टर अभिषेक ही थे। उन्होंने ही सुशांत की लॉचिंग फिल्म ‘काई पो चे’ को भी डायरेक्ट किया था। कपूर ने बताया कि मीडिया द्वारा इस तरह का भेदभाव किए जाने के कारण सुशांत अंदर से बुझे-बुझे से रहते थे।

‘परिवार’ और उसके चाटुकार एक राजवंश को ही विपक्ष मानते हैं, उनके सिवा सभी दल सरकार के साथ: चीन तनाव पर बोले नड्डा

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कॉन्ग्रेस के गाँधी परिवार पर निशाना साधते हुए कहा है कि भारत-चीन तनाव मसले पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सभी राजनीतिक पार्टियाँ सरकार के साथ खड़ी थीं लेकिन सिर्फ़ एक परिवार ऐसा था जो सरकार के साथ नहीं था। बुधवार (जून 24, 2020) को नड्डा ने बयान दिया कि पहले तो राजवंश झूठे बयान देता है और फिर उसके चाटुकार झूठ फैलाने में जुट जाते हैं।

भाजपा अध्यक्ष ने सोशल मीडिया पर कई ट्वीट्स के माध्यम से लिखा कि एक राजवंश और उसके चाटुकार एक ही परिवार को विपक्ष की तरह मान रहे हैं। उन्होंने पूछा कि क्या बाकी विपक्षी राजनीतिक दल विपक्ष की भूमिका में नहीं हैं? उन्होंने कहा कि एक राजपरिवार झूठ पर झूठ बोलता है और उसके वफादार उसे चारों ओर फैलाने में लग जाते हैं, अभी भी वो लोग इस वक्त ये सरकार से सवाल पूछ रहे हैं।

जेपी नड्डा ने स्पष्ट कहा कि जनता ने राजवंश को रिजेक्ट कर दिया है और अलग-थलग कर दिया है, इसीलिए वो अकेली राजनीतिक पार्टी नहीं है। उन्होंने दोहराया कि राजपरिवार ही सिर्फ़ विपक्ष नहीं है। बकौल नड्डा, आज जब देश हमारी सशस्त्र सेनाओं के पीछे एकजुट होकर खड़ा है और उनका मनोबल बढ़ा रहा है, ये एकता और सौहार्द दिखाने का समय है। उन्होंने कहा कि अनगिनत बार राजपरिवार के एक वंशज को लॉन्च किए जाने के लिए इंतजार किया जा सकता है।

हालाँकि, जेपी नड्डा ने ये भी कहा कि एक स्वस्थ लोकतंत्र में एक अच्छे विपक्ष का काम ही है सवाल पूछने का और सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष सभी विपक्षी नेताओं ने अपनी बात रखी और अपने सुझावों से सरकार को अवगत कराया। उन्होंने जानकारी दी कि सभी दलों ने मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों के प्रति विश्वास जताया और कहा कि वो इस समस्या को सुलझाएँ लेकिन एक परिवार अपवाद है। उन्होंने लोगों से कहा कि वो परिवार कौन है, आप पता कर सकते हैं।

जेपी नड्डा का कॉन्ग्रेस पर निशाना

जेपी नड्डा ने कहा कि एक परिवार का हित देशहित नहीं होता है और एक परिवार पूरा विपक्ष नहीं होता है। जेपी नड्डा ने याद दिलाया कि एक परिवार की गलती के कारण ही हमारे देश ने हजारों स्क्वायर किलोमीटर की जमीन गँवा दी। उन्होंने याद दिलाया कि कसी तरह सियाचिन का ग्लेशियर भी लगभग भारत से अलग होते-होते रह गया था। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि इन्हीं सब कारणों से देश की जनता ने उन्हें नकार दिया।

इससे पहले सर्वदलीय बैठक को लेकर विपक्ष के दुष्प्रचार का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने कार्यालय के माध्यम से बयान जारी कर कहा था कि  ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल (LAC)’ के साथ छेड़छाड़ करने की किसी भी प्रकार की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बकौल पीएम मोदी, पहले इस तरह की छेड़छाड़ पर सरकारें इसे नज़रअंदाज़ कर देती थीं लेकिन अब सेना के जवाब ऐसा करने वालों को रोकते-टोकते हैं।

पीएमओ ने कहा था कि भारतीय क्षेत्र की क्या परिभाषा है, ये आधिकारिक नक़्शे से तय होता है। पिछले 60 साल में किस तरह से देश की 43,000 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के कब्जे में चली गई, इस बारे में भी सभी दलों को बताया गया कि ऐसे समय में जब हमारे जवान सीमा पर हमारी सुरक्षा करते हुए खड़े हैं, पीएम मोदी के बयान को लेकर इस तरह का दुष्प्रचार फैलाया जाना उनके आत्मविश्वास को डिगाने वाली दुर्भाग्यपूर्ण हरकत है।

IMA ‘हलाल’ पोंजी घोटाला: निलंबित IAS विजय शंकर ने की आत्महत्या, ₹1.5 करोड़ घूस लेने पर हुई थी गिरफ्तारी

IMA ‘हलाल’ पोंजी घोटाले में आरोपित व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विजय शंकर ने बेंगलुरु के अपने आवास पर मंगलवार (जून 23, 2020) को आत्महत्या कर ली। SIT ने विजय शंकर को पिछले साल ₹1.5 करोड की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था। इसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था।

विजय शंकर की आत्महत्या की पुष्टि बेंगलुरु पुलिस आयुक्त भास्कर राव ने की है। उन्होंने बताया, “बेंगलुरु के पूर्व डिप्टी कमिश्नर विजय शंकर ने अपने घर पर सुसाइड कर ली है। ये असामान्य मौत है और हम इस मामले पर जाँच कर रहे हैं।”

इससे पहले विजयशंकर को SIT ने ₹4000 करोड़ के आईएमए स्कैम में संलिप्ता पाए जाने के बाद 8 जुलाई को गिरफ्तार किया था। उन्हें इस दौरान बेंगलुरु के परप्पना अग्रहारा जेल में न्यायिक हिरासत में रखा गया था। मगर, एक महीने बाद विशेष अदालत ने उन्हें जमानत दे दी थी।

इस मामले के संबंध में पिछले साल 30 अगस्त को सीबीआई ने 3 एफआईआर दायर की थी। इनमें से एक में जाँच एजेंसी ने आईएमए संस्थापक मंसूर खान समेत 19 लोगों को आरोपित बनाया था। विजय शंकर का नाम तीसरी एफआईआर में था।

बता दें कि शुरुआत में कर्नाटक सरकार ने विजयशंकर और एलसी नागराज को IMA घोटाले की छानबीन के लिए जाँच अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया था। लेकिन सीबीआई ने पाया कि इन्होंने तो अपनी रिपोर्ट आईएमए के समर्थन में दी, जिसके कारण हजारों लोगों का रुपया डूबा।

पूछताछ में दोनों ने स्वीकारा कि उन्होंने आईएमए निदेशकों से घूस ली थी। विजयशंकर को इस काम के लिए 1.5 करोड़ रुपए मिले थे। 11 जून 2020 को सीबीआई ने राज्य सरकार से विजय शंकर व दो अन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ पोंजी घोटाले में मुकदमा चलाने का अनुरोध किया।

IMA हलाल निवेश घोटाला 

आईएमए की हलाल पोंजी स्कीम को आईएमए ग्रुप के संस्थापक मोहम्मद मंसूर खान व उसके साथियों द्वारा संचालित किया जा रहा था। इसके तहत निवेशकों से वादा किया गया था कि उनका पैसा इस्लामी तरीके से निवेश करके उन्हें उच्च रिटर्न दिया जाएगा। इसी लालच में कम से कम 40 हजार निवेशकों ने अपने पैसे लगाए और 4000 करोड़ रुपए से ज्यादा के घोटाले को अंजाम दिया गया।

ये केस कर्नाटक में धोखाधड़ी के मामलों में सबसे बड़े केसों में से है। इसके कारण 40,000 से ज्यादा लोगों का नुकसान हुआ। लोगों को ज्यादा रिटर्न का लालच देकर फँसाया गया। सच्चाई पता चलने के बाद करीब 41000 शिकायतें IMA संस्थापक के ख़िलाफ़ दर्ज हुईं और मंसूर खान को गिरफ्तार किया गया। इस पूरे मामले में BZ जमीर अहमद खान और पूर्व विधायक रोशन बेग जैसे कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं का भी नाम सामने आया था। इसके कारण यह केस हाई प्रोफाइल केस बन गया था।