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कॉन्ग्रेस की बैठक में राजस्थान के CM ने खड़े होकर बलिदानी सैनिकों को दी श्रद्धांजलि, लोगों ने पूछा- ‘मैडम’ क्यों बैठी हैं

कॉन्ग्रेस पार्टी ने मंगलवार (जून 23, 2020) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कार्य समिति की तीसरी बैठक का आयोजन किया। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कॉन्ग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) बैठक के दौरान खड़े होने की एक तस्वीर ट्वीट करते हुए कहा कि सीडब्ल्यूसी ने 20 बहादुर भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए दो मिनट का मौन रखा, जो गलवान घाटी में चीन के साथ हिंसक झड़प के दौरान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

अपनी तस्वीर साझा करते हुए अशोक गहलोत ने ट्वीट किया, “कॉन्ग्रेस कार्य समिति की आभासी बैठक में हमारे बहादुर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए दो मिनट का मौन रखा गया, जिन्होंने भारत-चीन सीमा पर बलिदान दिया”।

अशोक गहलोत ने दो तस्वीरें साझा कीं। एक तस्वीर में गहलोत खड़े दिखाई दे रहे हैं, जबकि दूसरे में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी बैठी हुई हैं। नेटिज़न्स ने तुरंत इस बात पर गौर कर लिया और पूछा कि जब समिति ने हमारे बहादुर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए दो मिनट का मौन रखा, तो “मैडम” क्यों बैठी रहीं।

एक ट्विटर यूजर ने कहा कि शायद सोनिया गाँधी देश के नुकसान से अप्रभावित हैं, उन्हें इससे कोई दुख नहीं है, इसीलिए उन्होंने हमारे बहादुर सैनिकों के लिए खड़े होने और श्रद्धांजलि देने की आवश्यकता महसूस नहीं की। इस पर एक दूसरे ने जवाब दिया कि भारतीयों ने सैनिकों को श्रद्धांजलि दी है, इटालियंस ने नहीं।

एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा, “वाह एक राज्य का मुख्यमंत्री खड़ा है और चमचों की राजमाता बैठी हुई हैं।”

एक यूजर ने लिखा कि वो चीनी आर्मी को श्रद्धांजलि देती है।

गौरतलब है कि भारत और चीन की सेनाओं के बीच लद्दाख बॉर्डर पर गलवान घाटी के पास हिंसक झड़प में चीन के 43 सैनिकों के हताहत होने की बात मीडिया में सामने आई है, जिसमें चीन के मारे गए, घायल और गंभीर घायल चीनी सैनिक भी शामिल बताए जा रहे हैं। वहीं, भारतीय सेना ने स्पष्ट किया है कि इस झड़प में 20 भारतीय सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई। बताया जा रहा है कि इस झड़प के दौरान किसी तरह की कोई गोली नहीं चली है, यानी हाथापाई और पत्थरबाजी हुईं, जिनमें सैनिकों को क्षति पहुँची है।

कश्मीर से लापता PHD स्कॉलर हिलाल हुआ आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन में शामिल, दिल्ली में करता था नौकरी

श्रीनगर का हिलाल अहमद डार नाम का PHD स्कॉलर आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन में शामिल हो गया है। इसकी जानकारी जम्मू पुलिस ने मंगलवार (जून 23, 2020) को दी है। हिलाल पिछले हफ्ते अपने दोस्तों के साथ सेंट्रल कश्मीर घूमने गया था। उसके बाद वह लापता हो गया।

हिलाल के परिवार ने उसे ढूँढने की बहुत कोशिश की। लेकिन कुछ मालूम नहीं चला। परिजनों ने परेशान होकर श्रीनगर में प्रेस एन्क्लेव के सामने विरोध प्रदर्शन भी किया। मगर, तब भी हिलाल का कुछ पता नहीं चल पाया। पर आज जम्मू पुलिस ने लापता युवक से संबंधित जानकारी दी।

प्रेस एनक्लेव के सामने विरोध प्रदर्शन करते हिलाल के परिजन

डीडी न्यूज श्रीनगर के अनुसार, आईजीपी विजय कुमार ने मीडिया से बातचीत में बताया कि श्रीनगर के बेमिना इलाके का हिलाल अहमद डार जो पिछले दिनों अपने दोस्तों के साथ ट्रैकिंग पर गया था और वहाँ से गायब हो गया था, वो अब आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन से जुड़ गया है।

आईजीपी ने हिलाल से जुड़ी जानकारी साझा करते हुए यह भी आश्वासन दिया कि अगर हिलाल के घरवाले उसे आतंकवाद के रास्ते से वापस ले आते हैं। तो वह उसे गिरफ्तार नहीं करेंगें।

परिवार के अनुसार, हिलाल दिल्ली में काम करता था। हाल ही में वह कोरोनावायरस महामारी फैलने के बाद कश्मीर आया था। उसने कश्मीर यूनिवर्सिटी से पीएचडी की हुई है।

बता दें हिलाल से जुड़ी इस जानकारी को जम्मू पुलिस ने सीआरपीएफ जवान सुनील काला के श्रद्धांजलि समारोह के दौरान साझा किया। जब पत्रकारों ने आगे की जानकारी माँगी तो उन्होंने कहा कि अभी ताजा अपडेट यही है कि वह आतंकी संगठन से जुड़ गया है।

उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के स्थानीय युवकों को आतंकवाद का रास्ता छोड़ घरवापसी करवाने के लिए पुलिस प्रशासन पिछले कुछ सालों से बहुत मेहनत कर रही है। पुलिस लगातार उन युवकों के परिजनों को अपने बच्चों को समझाने के लिए अपील करती है, जिन्होंने आम जिंदगी को छोड़कर आतंकवाद का रास्ता अपनाया।

बिहार: 5 विधान पार्षदों ने RJD छोड़ थामा जदयू का हाथ, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने भी पद से दिया इस्तीफा

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में सियासी हलचल शुरू हो गई है। आज इसी क्रम में लालू प्रसाद की राजद को बड़ा झटका लगा है। दरअसल, राजद के पाँच विधान पार्षदों ने पार्टी का हाथ छोड़कर सत्ताधारी पार्टी जदयू का दामन थाम लिया है।

इसके अलावा पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्हें लेकर कहा जा रहा है कि वह रामा सिंह के पार्टी में शामिल होने की खबरों से नाराज थे। इसलिए उन्होंने ये फैसला किया। जबकि 5 विधान पार्षदों को लेकर खबर है कि वह राजद में मौजूद वंशवाद की राजनीति और तेजस्वी यादव के नेतृत्व से परेशान हो गए थे।

राजद से इस्तीफा देने वाले पार्षदों में दिलीप राय, राधा चरण सेठ, संजय प्रसाद, कमरे आलन, और रणविजय सिंह का नाम शामिल हैं। इन सभी विधान पार्षदों ने विधान परिषद के कार्यकारी सभापति को इस बाबत चिठ्टी भी सौंप दी है। वहीं, दूसरी ओर जदयू की रीना यादव के पत्र के बाद विधान परिषद ने राजद से आए जदयू के सभी सदस्यों को मान्यता दे दी। नवभारत टाइम्स के अनुसार इन 5 विधान पार्षदों के अलावा जेडीयू से जुड़ने वाले राजद नेताओं की संख्या में बढौतरी हो सकती है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो राजद में विधान परिषद (विप) उम्मीदवारों के नाम की चर्चा होते ही विवाद शुरू हो गया था। पार्टी नेता पूर्व मंत्री भोला राय के समर्थकों ने सोमवार को राबड़ी देवी के आवास 10 सर्कुलर रोड पर जाकर हंगामा किया। दरअसल, भोला राय के समर्थकों का दावा है कि उनको लालू ने भी विप भेजने का वादा किया था। पर अब तक की सूची में उनका नाम नहीं है।

JDU छोड़ RJD में भी शामिल हुए नेता

याद दिला दें, अभी बीते दिनों जदयू के पूर्व mlc जावेद इकबाल अंसारी ने पार्टी का दामन छोड़ राजद का हाथ थामा था। अंसारी के अलावा जेडीयू के पूर्व विधायक रामनरेश सिंह की बेटी शगुन सिंह ने भी पार्टी से किनारा कर तेजस्वी के साथ काम करने का फैसला ले लिया था। इसी तरह पूर्व एडीजी अशोक गुप्ता ने भी आरजेडी के साथ आ कर विधानसभा चुनाव में जाने का फैसला किया था।

उस समय आरजेडी प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने कहा था कि लोगों को अब आरजेडी में अपना भविष्य नजर आने लगा है। वे आरजेडी को सम्मानित कर रहे हैं और RJD उन्हें सम्मानित कर रही है। लालू यादव ने गरीबों का उत्थान किया है, ये वो जानते हैं।

9 सीटों पर चुनाव

बिहार विधान परिषद की 9 सीटों के लिए JDU, BJP, RJD और कॉन्ग्रेस में उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया अंतिम दौर में है। जदयू ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार को इसके लिए अधिकृत कर दिया है।

राजद में तीन सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम लगभग तय हो चुके हैं। लेकिन इनका नाम तभी सार्वजनिक होगा, जब लालू प्रसाद इसपर अपनी मुहर लगा देंगे। वहीं प्रदेश भाजपा ने संभावित उम्मीदवारों की सूची केंद्र को भेज दी है। उधर, कॉन्ग्रेस में अनेक दावेदारों के बीच एक उम्मीदवार का चयन पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौती है।

पेड़ों की कटाई पर शिवसेना का यू-टर्न: मेट्रो शेड का किया था विरोध, अब कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के लिए कहा – ‘अनिवार्य है काटना’

कोस्टल रोड प्रोजेक्ट, बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) की एक बड़ी और महत्वाकांक्षी परियोजना है। लेकिन अब इस परियोजना के आड़े लगभग 600 पेड़ आ रहे हैं, जिसमें से 140 पेड़ों को बीएमसी ने काटने का निर्णय लिया है और बाकी के पेड़ों का पुनर्रोपण किया जाएगा। इन पेड़ों को प्रिंसेस स्ट्रीट फ्लाइओवर से लेकर वर्ली के बीच 9 किलोमीट कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के तहत काटा जाएगा।

परियोजना के लिए 140 पेड़ों को काटने के खिलाफ संबंधित नागरिकों द्वारा उठाए गए 176 सुझावों और आपत्तियों का जवाब देते हुए नागरिक निकाय ने अपने बचाव में तर्क दिया है कि इस परियोजना से प्रदूषण और बाढ़ में कमी आएगी एवं हरियाली में वृद्धि होगी।

परियोजना की शुरुआत में मुंबई के उपनगरों को जोड़ने और शहर की सड़कों को जाम करने का प्रस्ताव दिया गया था। प्रिंसेस स्ट्रीट फ्लाईओवर और वर्ली के बीच कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के फेज -I के दौरान लगभग 90 हेक्टेयर जमीन को फिर से प्राप्त किया जाना है।

इस महत्वाकांक्षी कोस्टल रोड परियोजना के लिए 20 हेक्टेयर जमीन को आवंटित किया गया है, शेष 70 हेक्टेयर को ग्रीन कवर के लिए आरक्षित किया जाना है, जिसमें बीएमसी की बागान की योजना है।

BMC ने कहा कि कोस्टल रोड के उपयुक्त निर्माण के लिए ‘कुछ’ पेड़ों की कटाई ‘अनिवार्य’ है। शिवसेना द्वारा नियंत्रित निकाय ने सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार 1:3 के अनुपात में पुन: वनरोपण का आश्वासन दिया। बीएमसी ने कहा कि आम लोगों को कई तरह से फायदा होगा जैसे कि प्रदूषण में कमी, ग्रीन कवर में बढ़ोतरी और समय की बचत होगी।

नागरिक निकाय ने अनुमान लगाया है कि परियोजना से लगभग 600 पेड़ प्रभावित होंगे, जिसका उद्देश्य बांद्रा-वर्ली सी लिंक के दक्षिणी छोर के साथ मरीन ड्राइव को जोड़ना है। इस परियोजना के तहत 140 पेड़ों को काट दिया जाएगा और लगभग 460 पेड़ों का प्रत्यारोपण किया जाना है।

नागरिक पर्यावरणविद् ज़ोरू भाठेना ने कहा कि यह समझ से बाहर है कि पुनर्निर्मित जमीन पर बनी सड़क के लिए 600 पेड़ क्यों प्रभावित हो रहे हैं। कार्यकर्ता ने आरोप लगाते हुए कहा –

“हम समझ सकते थे कि पाँच-दस पेड़ काटे या रोपे जा रहे हैं, लेकिन 600 एक बड़ी संख्या है। इसके अलावा, बीएमसी का दावा है कि कोस्टल रोड बनने से बाढ़ की स्थिति में कमी आएगी। हालाँकि, ऐसा लग रहा है कि बीएमसी भौतिकी, भूगोल, इतिहास और पर्यावरण अध्ययन पर उनके खुद के बनाए सिद्धांतों का पालन करती है। यह बीएमसी का बेहद ही गलत उदाहरण है।”

समुद्री संरक्षणवादी प्रदीप पाटेडे ने दावा किया कि कोस्टल रोड के निर्माण के कारण बाढ़ कम नहीं होगी। उनका कहना है कि उन्होंने ऐसी तस्वीरें देखीं है, जिनमें अशांत पानी निर्माण क्षेत्र से टकरा रहा है। उन्होंने जोर देते हुए कहा यह एक सामान्य तर्क है क्योंकि जितना अधिक आप समुद्र में भरेंगे, उतना ही बाहर निकलेगा।

वहीं परियोजना के मुख्य इंजीनियर विजय निगोत ने दोहराया कि बीएमसी उस स्तर तक नहीं पहुँची है, जहाँ वह वनों की कटाई या पुनर्रोपण पर विचार कर सकती है। उन्होंने कहा कि बीएमसी के ट्री ऑथोरिटी से अभी तक हरी झंडी नहीं मिली है।

उन्होंने स्पष्ट किया, “इसके अलावा, हम इसलिए कह रहे हैं कि बाढ़ कम हो जाएगी, क्योंकि हम एक समुद्री दीवार बनाने जा रहे हैं, और इसके कारण तुलनात्मक रूप से बाढ़ कम हो जाएगी। हमने यह दावा नहीं किया है कि बाढ़ नहीं आएगी।”

गौरतलब है कि किसी भी राज्य में सरकार बदलने पर और किसी सरकार के सत्ता में आने पर किस तरह से वहाँ की स्थितियाँ बदलती हैं, ये उसी का उदाहरण है। जब बीजेपी की सरकार में कार शेड बनाने के लिए पेड़ काटे जा रहे थे, तो शिवसेना ने इसका भरपूर विरोध किया था।

उद्धव ठाकरे ने तो यहाँ तक कह दिया था कि आगामी सरकार हमारी होगी और एक बार हमारी पार्टी सत्ता में आई तो हम आरे में पेड़ों की हत्या करने वालों से अच्छे तरीके से निपटेंगे। उन्होंने कटाई का विरोध करते हुए कहा था कि ये जो हत्यारे अधिकारी बैठे हैं, वो पेड़ों के कातिल हैं, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। जिसके बाद उन्होंने खुद ही पेड़ों को काटने का आदेश दिया था और अब कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों को काटने की बात सामने आ रही है।

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगे: प्रेगनेंट सफूरा जरगर को ‘मानवता के आधार पर’ मिली जमानत

दिल्‍ली हाईकोर्ट ने जामिया मिलिया इस्‍लामिया विश्‍वविद्यालय की छात्रा और जामिया समन्वय समिति की सदस्य सफूरा जरगर को मंगलवार (जून 23, 2020) को ‘मानवता के आधार पर’ जमानत दे दी। साथ ही दिल्ली हाई कोर्ट ने सफूरा से किसी ऐसी गतिविधि में शामिल नहीं होने को कहा है, जिससे जाँच पर असर हो। उन्हें दिल्ली नहीं छोड़कर जाने को भी कहा।

बता दें कि उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों की आरोपित और जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा सफूरा जरगर के वकील ने चौथी बार उनकी जमानत के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इससे पहले तीन बार सफूरा की बेल याचिका खारिज की जा चुकी थी।

इससे पहले दिल्ली पुलिस ने 22 जून 2020 को हाई कोर्ट में सफूरा जरगर और उसके दिल्ली दंगों में संलिप्तता संबंधित रिपोर्ट पेश किया। पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार की गई छात्र सफूरा जरगर ने अशांति पैदा की और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला था।

अपनी स्टेटस रिपोर्ट में, दिल्ली पुलिस ने कहा था कि अभियुक्त सफूरा जरगर न केवल घृणा पैदा करने के लिए षड्यंत्रकारी डिजाइन का हिस्सा थी, बल्कि उसका षड्यंत्र किसी भी तरह के उपयोग से लोगों की मृत्यु और घायल होने का कारण बनता।

गौरतलब है कि जामिया की छात्रा सफूरा जरगर के खिलाफ दिल्ली विरोधी दंगों के मद्देनजर यूएपीए के तहत मामला चल रहा है। उसे 10 अप्रैल को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उस पर आरोप है कि उसने जाफराबाद-सीलमपुर में 50 दिनों के हंगामा की साजिश रची थी और वहाँ महिलाओं-बच्चों को बिठाने के लिए पूरा जोर लगाया था।

इसके अलावा दिल्ली पुलिस ने सफूरा के मामले पर सुनवाई के दौरान कोर्ट को यह भी बताया था कि सफूरा जरगर ने भीड़ को उकसाने के लिए कथित तौर पर एक भड़काऊ भाषण दिया था, जिसके बाद फरवरी में दंगे हुए थे। इतना ही नहीं, सफूरा जरगर की एक वीडियो भी सामने आई थी। जिसमें उन्हें कहते सुना गया था, ‘दिल्ली तेरे खून से इंकलाब आएगा।’

सफूरा जरगर की गिरफ्तारी के बाद से ही उसके गर्भवती होने को लेकर मीडिया गिरोह लगातार विक्टिम कार्ड खेल रहा था। कभी उसके हालातों को गौर करवाते हुए भावनात्मक पोस्ट लिखे जा रहे थे। कभी गर्भवती हथिनी के समान रखते हुए भारत में मातृत्व के प्रति सम्मान पर सवाल उठाए जा रहे थे।

जानिए क्या है पतंजलि की दिव्य कोरोनिल टैबलेट जो कर रही है कोरोना खत्म करने का दावा

पतंजलि आयुर्वेद ने मंगलवार (जून 23, 2020) को ‘कोरोनिल और श्वासारी’ (Coronil and Swasari) को लॉन्च किया, जिसके बारे में कंपनी का दावा है कि यह नोवेल कोरोना वायरस या SARS-CoV-2 वायरस के कारण होने वाली साँस की बीमारी यानी, COVID -19 के इलाज का पहला आयुर्वेदिक इलाज है।

पतंजलि योगपीठ बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कोरोना वायरस से जंग को ‘दिव्य कोरोनिल टैबलेट’ समेत तीन दवाइयाँ लॉन्च की हैं। इस ‘कोरोना किट’ में कोरोनिल के अलावा श्वासारी वटी और अणु तेल भी हैं। रामदेव का कहना है कि तीनों को साथ इस्तेमाल करने से कोरोना का संक्रमण खत्म हो सकता है और महामारी से बचाव भी संभव है।

पतंजली कंपनी के अनुसार, कोरोना किट, जो 30 दिनों के लिए है, केवल ₹545 में उपलब्ध कराया जाएगा। रामदेव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इस दवा ने 3-7 दिनों के भीतर ‘100 फीसदी रिकवरी रेट’ दिखाया है।

बाबा रामदेव ने कहा कि पूरा देश और दुनिया जिस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था वह आज आ गया है, कोरोना की पहली आयुर्वेदिक दवा तैयार हो गई है। बाबा रामदेव ने कहा कि मेडिसिन के ट्रायल के दौरान तीन दिन के अंदर 69% संक्रमित इससे ठीक हो गए। इसके अलावा, मेडिसन के ट्रायल के दौरान सात दिन में 100% कोरोना मरीज नेगेटिव हो गए।

रामदेव ने प्रेस वार्ता में कहा कि पतंजलि द्वारा तैयार की गई ‘कोरोनिल’ में गिलोय, तुलसी और अश्वगंधा हैं जो कि शरीर की इम्युनिटी बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि यह कोरोना के साथ ही अन्य गंभीर बीमारियों से भी बचाव करती है।

इसे पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (निम्स) यूनिवर्सिटी, जयपुर ने मिलकर तैयार किया है। रामदेव ने निदेशक, राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान संस्थान, NIMS विश्वविद्यालय, जयपुर, डॉ बलबीर सिंह तोमर और अन्य सभी डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को दवा विकसित करने में मदद के लिए धन्यवाद दिया।

ED ने दिल्ली दंगो में मुख्य आरोपित AAP के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के 6 ठिकानों पर मारे छापे

दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में मुख्य आरोपित आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन (Tahir Hussain) के दिल्ली और नोएडा स्थित घर पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने 6 ठिकानों पर छापेमारी की है। ताहिर हुसैन के खिलाफ खिलाफ इसको लेकर चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है।

तकरीबन डेढ़ माह पहले ही प्रवर्तन निदेशालय ने ताहिर हुसैन पर मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत केस रजिस्टर किया था। ताहिर हुसैन पर आरोप था कि फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल कर करीब 1 करोड़ 16 लाख रुपए नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शनों (CAA Protest) और दिल्ली में दंगों के लिए कैश में फाइनेंस किया गया था।

प्रवर्तन निदेशालय ने ताहिर हुसैन के दिल्ली के कुछ ठिकानों पर इसी छानबीन को लेकर छापा मारा है, जिसमें से नार्थ ईस्ट दिल्ली में 4 लोकेशन्स पर रेड चल रही है। ED के मुताबिक दिल्ली के अलावा नोएडा के ठिकानों पर भी छापेमारी की कार्रवाई चल रही है।

उल्लेखनीय है कि ताहिर हुसैन फिलहाल आईबी स्टाफ अंकित शर्मा की हत्या और दिल्ली हिंसा में संलिप्तता के चलते गिरफ्तार है। आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा की हत्या करने के बाद उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था। मामले में गिरफ्तार अन्य आरोपित सलमान ने बताया था कि दंगाइयों ने अंकित का मजहब जानने के लिए उनके कपड़े उतारे थे। धर्म पुख्ता कर उन्हें चाकुओं से गोद डाला। सलमान ने बताया कि उसने खुद अंकित पर 14 बार चाकू से वार किए। अंकित के चेहरे पर काला कपड़ा डाल उन्हें आप के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन के घर में ले जाया गया था। अंकित का शव 26 फरवरी को चॉंदबाग के नाले से मिला था।

उल्लेखनीय है कि सीएए, एनआरसी विरोध के नाम पर 23-24 फरवरी को दिल्ली में शुरू हुई हिंदू विरोधी हिंसा में 53 लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी। 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस दौरान दंगाइयों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, बाबरपुर, घोंडा, चाँदबाग, शिव विहार, भजनपुरा, यमुना विहार इलाकों में सरकारी और निजी संपत्ति को काफी नुकसान पहुँचाया था।

मोपला में हजारों हिंदुओं के नरसंहार का जिम्मेदार हाजी बना मलयाली हीरो, उसे ‘राष्ट्रवादी’ दिखाने के लिए फिल्म की घोषणा

साल 1921 में केरल में हुए हिंदुओं के नरसंहार के लिए जिम्मेदार वरियमकुन्नथु कुंजाहम्मद हाजी (Variyam Kunnathu Kunjahammed Haji ) की जिंदगी पर आधारित फिल्म बनने वाली है। इस फिल्म को बनाने वाले का नाम आशिक अबु है। हाजी का किरदार निभाने वाले एक्टर पृथ्वीराज सुकुमारन हैं। और, फिल्म का टाइटल वरियमकुन्नन (Vaariyamkunnan) हैं। ये सब सूचना स्वयं अभिनेता पृथ्वीराज सुकुमारन ने अपने फेसबुक पर दी है।

उन्होंने अपनी नई फिल्म का ऐलान करते हुए हाजी को ब्रिटिशों के ख़िलाफ़ लड़ने वाली शख्सियत बताया है। साथ ही हाजी को न केवल एक नेता के तौर पर दर्शाया, बल्कि उसे एक फौजी और राष्ट्रवादी भी कहा।

इसके अलावा मालाबार में हुए हिंदुओं के नरसंहार के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को पृथ्वीराज ने मालाबार क्रांति का पहला चेहरा लिखा और जानकारी दी कि इसकी फिल्मिंग हाजी की 100वीं बरसी पर शुरू करेंगे।

यहाँ बता दें, इस जानकारी के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर एक नया विवाद खड़ा हो गया। लोग पूछने लगे कि आखिर हिंदुओं के नरसंहार के लिए जिम्मेदार व्यक्ति हीरो कैसे हो सकता है? या ये समझें कि ये फिल्म फिर से समुदाय विशेष के कुकर्मों को धोने का एक प्रयास है, जिसके जरिए सच्चाई को छिपाते हुए नया इतिहास समझाने की कोशिश हो रही है।

क्यों है विवाद? दरअसल, साल 2021 में रिलीज होने वाली यह फिल्म मोपला समुदाय के उस मजहबी नेता की जिंदगी पर आधारित है, जिसे साल 1921 में मालाबार में हजारों हिंदुओं के नरसंहार का जिम्मेदार बताया जाता है।

कौन था वरियम कुन्नथु हाजी कुंजाहम्मद हाजी?

वरियमकुन्नथु या चक्कीपरांबन वरियामकुन्नथु कुंजाहम्मद हाजी (Variyam Kunnathu Kunjahammed Haji), वही शख्स है जो खुद को ‘अरनद का सुल्तान’ कहता था। उसी क्षेत्र का सुल्तान जहाँ सैंकड़ों मोपला हिंदुओं का नरसंहार हुआ। जहाँ इस्लामिक ताकतों ने मिलकर लूटपाट की और अंग्रेजों के ख़िलाफ़ विद्रोह की आड़ में हिंदुओं का रक्तपात किया। मगर, फिर भी, उन आतताइयों के उस चेहरे को छिपाने के लिए इतिहास के पन्नों में उन्हें मोपला के विद्रोहियों का नाम दिया गया।

बता दें, मोपला में हिंदुओं का नरसंहार वही घटना है, जब हिंदुओं पर मजहबी भीड़ ने न केवल हमला बोला। बल्कि आगे चलकर पॉलिटिकल नैरेटिव गढ़ने के लिए उस बर्बरता को इतिहास के पन्नों से ही गुम कर दिया या फिर काट-छाँटकर इसपर जानकारी दी गई।

केरल के मालाबार में हिंदुओं पर अत्याचार के उन 4 महीनों ने सैंकड़ों हिंदुओं की जिंदगी तबाह की। बताया जाता है कि मालाबार में ये सब स्वतंत्रता संग्राम के तौर पर शुरू हुआ। लेकिन जब खत्म होने को आया तो उसका उद्देश्य साफ पता चला कि वरियमकुन्नथु जैसे लोग केवल उत्तरी केरल से हिंदुओं की जनसंख्या कम करना चाहते थे।

खिलाफत आंदोलन का सक्रिय समर्थक वरियमकुन्नथु ने अपने दोस्त अली मुसलीयर के साथ मिलकर मोपला दंगों का नेतृत्व किया। जिसमें 10,000 हिंदुओं का केरल से सफाया हुआ। जबकि माना जाता है कि इसके बाद करीब 1 लाख हिंदुओं को केरल छोड़ने पर मजबूर किया गया।

इस दौरान हिंदू मंदिरों को ध्वस्त किया गया। जबरन धर्मांतरण हुए और कई प्रकार के ऐसे अत्याचार हिंदुओं पर किए गए, जिन्हें शब्दों में बयान कर पाना लगभग नामुमकिन है।

बाबा साहेब अंबेडकर अपनी किताब में इस नरसंहार का जिक्र करते हैं। वे पाकिस्तान ऑर पार्टिशन ऑफ इंडिया नाम की अपनी किताब में लिखते हैं कि हिन्दुओं के खिलाफ मालाबार में मोपलाओं द्वारा किए गए खून-खराबे के अत्याचार अवर्णनीय थे। दक्षिणी भारत में हर जगह हिंदुओं के ख़िलाफ़ लहर थी। जिसे खिलाफत नेताओं ने भड़काया था।

इसके अलावा एनी बेसेंट ने इस घटना का जिक्र अपनी किताब में करते हुए बताया कि कैसे धर्म न त्यागने पर हिंदुओं पर अत्याचार हुए। उन्हें मारा-पीटा गया । उनके घरों में लूटपाट हुई। एनी बेंसेंट ने अपनी किताब में बताया कि करीब लाख से ज्यादा हिंदू लोगों को उस दौरान अपने घरों को तन पर बाकी एक जोड़ी कपड़े के साथ छोड़ना पड़ा था। उन्होंने लिखा, “मालाबार ने हमें सिखाया है कि इस्लामिक शासन का क्या मतलब है, और हम भारत में खिलाफत राज का एक और नमूना नहीं देखना चाहते हैं।”

आज मलयालम फिल्म को प्रोड्यूस करने वाले अधिकतर लोग मालाबार के समुदाय विशेष के लोग हैं। जिन्हें लगता है शायद इस तरह के प्रयासों से वह हिंदुओं पर हुई बर्बरता को लोगों की नजरों में धुँधला कर देंगे और अपनी कोशिशों से एक नया इतिहास नई पीढ़ी के सामने पेश करेंगे।

लेकिन, आपको बता दें, ये पहली बार नहीं है जब हाजी के आतताई चेहरे को नायक में तब्दील करने की कोशिश हुई। इससे पहले भी जामिया प्रदर्शन के समय सुर्खियों में आई बरखा दत्त की शीरो लदीदा ने हाजी का महिमामंडन किया था।

लदीदा ने स्पष्ट तौर पर इस्लामिक कट्टरपंथी विचारधारा उजागर करते हुए लिखा था, “हम हर जगह, हर पल मालकम एक्स, अली मुस्लीयर और वरियंकुन्नथ के बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों के रूप में उपस्थित रहेंगे। वो सभी नारे हमारी आत्मा हैं और हमने अपने पूर्वजों से ही सीखा है कि राजनीति कैसे की जाती है? तुम लोगों के लिए भले ही वो नारे बस नारे ही हो लेकिन हमारे लिए वो हमारी पहचान हैं, जो हमें औरों से अलग करती है। हम पर ऐसा कोई दबाव नहीं है कि हमें तुम्हारे सेक्युलर नारों का ही इस्तेमाल करना है। मैं स्पष्ट कर दूँ कि हम तुमसे बिलकुल अलग हैं, हमारे तौर-तरीके अलग हैं और हमारा आधार अलग है। इसीलिए, हमें सिखाने की कोशिश मत करो। हमारे बाप मत बनो।”

‘मैं एक महान दिवंगत आत्मा की माँ हूँ’: जब अब्दुल्ला के मित्र नेहरू ने बलिदानी मुखर्जी की माँ की माँग ठुकराई

जब किसी की मौत होती है तो पुलिस जाँच करती है। किसी की मौत के साथ जब जनभावनाएँ जुड़ी हों या जाँच से कोई संतोषजनक निष्कर्ष न निकला हो तो स्वतंत्र एजेंसियों से जाँच की भी व्यवस्था है। लेकिन, जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत की जाँच नहीं हो सकी।

मंगलवार (जून 23, 2020) को जब उनकी मौत को 67 साल होने आए हैं, देश सवाल तो पूछेगा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत की स्वंतंत्र जाँच क्यों नहीं कराई?

जून 2019 में भाजपा अध्यक्ष (तब कार्यकारी) जेपी नड्डा ने कहा था कि वो जवाहरलाल नेहरू ही थे, जिन्होंने डॉ मुखर्जी की मृत्यु की जाँच कराने से इनकार कर दिया था। बकौल नड्डा, इतिहास साक्षी है कि नेहरू ने पूरे देश की माँग को ठुकरा दिया था। बता दें कि हिन्दू राष्ट्रवाद के पुरोधाओं में से एक डॉ मुखर्जी ने ही 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी, जो बाद में भाजपा रूप में परिवर्तित हुआ।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की माता श्रीमती जोगमाया ने भी पंडित नेहरू को एक भावपूर्ण पत्र लिखकर अपने पुत्र की मृत्यु की निष्पक्ष जाँच की माँग की थी। लेकिन, एक माँ की माँग को भी नहीं माना गया। उनकी माँ जोगमाया ने नेहरू को भेजे पत्र में लिखा था कि वो एक महान दिवंगत आत्मा की माता हैं और ये माँग करती हैं कि स्वतंत्र व सक्षम व्यक्तियों द्वारा अविलम्ब एक पूर्णरूपेण निष्पक्ष और खुली जाँच होनी चाहिए।

उन्होंने आगे नेहरू को चेताते हुए कहा था कि यह एक महान दुःखान्त घटना है, जो स्वतंत्र भारत में घटी है और भारत की जनता ज़रूर निर्णय करेगी कि इसका कारण क्या था और इस बारे में आपकी सरकार ने क्या भूमिका निभाई? उन्होंने लिखा था कि किसी भी बड़े से बड़े व्यक्ति ने ही ये कृत्य क्यों न किया हो, क़ानून उसे सज़ा दे। साथ ही जनता सावधान हो जाए ताकि किसी और माँ को स्वतंत्र भारत में इस तरह से आँसू न बहाना पड़े।

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 50 के दशक की शुरुआत में ‘एक विधान, एक प्रधान, एक निशान’ आंदोलन शुरू किया था। जम्मू कश्मीर में तब ‘प्रधानमंत्री’ का पद होता था। संविधान, झंडा और दूसरे राज्यों के लोगों के वहाँ न बसने का नियम तो हालिया अनुच्छेद 370 के प्रावधान निरस्त होने तक मौजूद थे। डॉ मुखर्जी इसी भेदभाव को ख़त्म करने के पक्ष्धर थे, जो तब असंभव सा लगता था। मई 11, 1953 को जम्मू कश्मीर में घुसने पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया था।

श्रीनगर के जेल में ही उनकी मृत्यु हुई, जिसकी वजह हार्ट अटैक को बताया गया। तब शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री थे, जो उनके शव पर माल्यार्पण करने भी आए थे। अब जब पश्चिम बंगाल में भाजपा मजबूत बन कर उभर रही है और वहाँ अगले साल विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों के प्रभाव के बावजूद पहली बार कड़ी टक्कर होने जा रही है, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी आज एक बार फिर से भारतीय राजनीति में प्रासंगिक हो उठे हैं।

तृणमूल कॉन्ग्रेस और वामपंथी कैडरों में इसकी छटपटाहट देखी जा सकती है क्योंकि मार्च 2018 में जिस तरह से कोलकाता में जाधवपुर यूनिवर्सिटी के माओवादी समर्थक छात्रों ने डॉ मुखर्जी की प्रतिमा को तोड़ डाला, उससे वामपंथी दलों की बेचैनी प्रदर्शित होती है। उससे कुछ दिनों पहले ही त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने के बाद जनता द्वारा लेनिन की प्रतिमा गिराई गई थी। लेकिन, बंगाल में बंगाल के ही सपूत की प्रतिमा को भी वामपंथियों ने नहीं बख़्शा।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जवाहरलाल नेहरू ने पहले अंतरिम केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया था क्योंकि कॉन्ग्रेस और हिन्दू महासभा के अधिवेशन साथ-साथ होते थे और महात्मा गाँधी की भी यही सलाह थी। उनके बारे में एक बार दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बड़ी अच्छी बात कही थी। उनकी पार्टी छोटी थी लेकिन वो बिना बनाए ही विरोधी दल के नेता बन गए थे। किसी ने डॉक्टर मुखर्जी से कहा कि आपको तो नेता बनाया नहीं गया है, चुना नहीं गया है फिर भी आप विरोधी दल के मान्य नेता कैसे?

उस समय युवा अटल बिहारी वाजपेयी ने इस प्रश्न का जवाब देते हुए कहा- “जंगल में शेर को आज तक किसी ने राजमुकुट पहनाया है? वह तो स्वयं राजा है। डॉक्टर मुखर्जी जहाँ होंगे, वो वहीं अपनी आभा बिखेरेंगे। वो जहाँ होंगे, वहाँ विद्वता की बात करते हुए राष्ट्रप्रेम पर बल देंगे।” जब डॉ मुखर्जी गिरफ़्तार हुए थे तब वाजपेयी उनके साथ ही थे। उन्होंने वाजपेयी को वापस भेज दिया था।

उन्होंने कहा था कि अटल जाओ और दुनिया को बताओ कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने परमिट सिस्टम को तोड़ दिया है। तभी तो उनके बलिदान के कुछ ही दिनों बाद नेहरू को कश्मीर में परमिट सिस्टम हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा। तब क्षुब्ध अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कविता लिख कर अपना दर्द प्रकट किया था। ‘जम्मू की पुकार‘ शीर्षक की इस कविता की कुछ पंक्तियाँ आज भी झकझोड़ती है:

अत्याचारी ने आज पुन: ललकारा, अन्यायी का चलता है दमन दुधारा।
आँखों के आगे सत्य मिटा जाता है, भारत माता का शीश कटा जाता है।
क्या पुन: देश टुकड़ों में बँट जाएगा? क्या सबका शोणित पानी बन जाएगा?
कब तक जम्मू को यों ही जलने देंगे? कब तक जुल्मों की मदिरा ढलने देंगे?
चुपचाप सहेंगे कब तक लाठी गोली? कब तक खेलेंगे दुश्मन खून से होली?
प्रह्लाद-परीक्षा की बेला अब आई, होलिका बनी देखो अब्दुल्लाशाही।
माँ-बहनों का अपमान सहेंगे कब तक? भोले पाण्डव चुपचाप रहेंगे कब तक?
आओ खण्डित भारत के वासी आओ, कश्मीर बुलाता, त्याग उदासी आओ?

जब डॉक्टर मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया, तब अटल बिहारी वाजपेयी उनके राजनीतिक सचिव थे। वो तब तक सांसद भी नहीं बने थे और पत्रकारिता में अनवरत व्यस्त रहा करते थे। डॉक्टर मुखर्जी के बलिदान के बाद वीर सावरकर ने कहा था कि एक महान देशभक्त और महान सांसद शिष्ट नष्ट हो गया है। कहते हैं, उनके बलिदान के 8-9 महीनों बाद शेख अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी से देश चकित हो गया था।

नेहरू और अब्दुल्ला अनन्य मित्र थे, ऐसे में लोग ये सवाल ज़रूर पूछ रहे थे कि क्या अगर डॉक्टर मुखर्जी का बलिदान नहीं हुआ होता तो शेख अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी संभव होती? डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पाँच सूत्री माँगों में एक ये भी था कि पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर आए हिन्दुओं और सिखों के रहन-सहन की व्यवस्था की जाए। आज दशकों बाद सीएए के रूप में उनका ये स्वप्न पूरा हुआ।

सरदार पटेल ने भी इस बात की भविष्यवाणी की थी कि जवाहरलाल नेहरू अब शेख अब्दुल्ला की मैत्री के मोहजाल में फँसे हुए हैं लेकिन समय आते ही उन्हें अब्दुल्ला का असली रंग दिख जाएगा। महाराजा हरि सिंह भी अब्दुल्ला के इस चाल-चरित्र से वाकिफ थे, तभी उन्होंने उसे जेल में बंद किया था। लेकिन, नेहरू भारत में सत्ता हस्तांतरण के दौर के बीच भी महाराजा का विरोध करने कश्मीर दौड़ पड़े – अपने मित्र अब्दुल्ला के लिए!

आज समय ने सिद्ध कर दिया है कि नेहरू गलत थे और श्यामा प्रसाद मुखर्जी व सरदार पटेल जैसे लोग दूरद्रष्टा थे। जब ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ सरदार सरोवर बाँध के पास भारत का गर्व बन कर खड़ा है, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निरस्त होने और सीएए के अस्तित्व में आने से पता चलता है कि डॉक्टर मुखर्जी की नीतियाँ भविष्य के भले के लिए थीं। अफ़सोस ये कि उनकी मृत्यु की निष्पक्ष जाँच नहीं हो सकी।

शी जिनपिंग के करीबी जनरल झाओ ने दिए थे भारतीय सेना पर हमले के आदेश: US खुफिया एजेंसी का खुलासा

गलवान घाटी पर भारत-चीन सेना के बीच हुई आपसी झड़प के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने एक बड़ा खुलासा किया है। इस खुलासे में मालूम चला है कि भारतीय सैनिकों पर हमला करने के लिए चीन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें आदेश दिए थे। यानी ये हमला पहले से सुनियोजित था।

यूएस न्यूज के अनुसार, चीन के सबसे ताकतवर जनरल झाओ जोंगकी ने ही इस पूरे ऑपरेशन के लिए सेना को आदेश दिएl जोंगकी वेस्टर्न थिएटर का प्रमुख है। वह इससे पहले भारत के साथ कई तनातनी (डोकलाम जैसी) वाली घटनाओं को अंजाम दे चुका है। उसका उद्देश्य इस बार भी कुछ ऐसा ही था।

वियतनाम, डोकलाम, गलवान...चीन की शर्मिंदगी के सबब बने जनरल झाओ जोंगकी

रिपोर्ट की मानें तो जोंगकी सोचता था कि चीन को USA और उससे जुड़े देशों के सामने कमजोर नहीं दिखाई पड़ना चाहिए। इसलिए वह इस हमले के जरिए भारत को सबक सिखाना चाहता था। लेकिन उसकी चाल उसपर उलटी पड़ गई और पूरे हमले में चीन के 40 से ज्यादा सैनिक मारे गए। इसके अलावा हमले के बाद भारतीयों ने काफी तादाद में चीनी सामान और चीनी तकनीक का बहिष्कार भी शुरू कर दिया।

रिपोर्ट कहती है कि इस कार्रवाई के जरिए चीन भारत पर दबाव बनाना चाहता था। उसे लग रहा था कि ऐसी कोशिशें करके वार्ता के दौरान भारतीय पक्ष को दबाया जा सकेगा। मगर, उसके प्लान के मुताबिक कुछ नहीं हुआ। अमेरिका की इंटेलीजेंस रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीन की योजना इसलिए भी फेल रही क्योंकि भारत अमेरिका के पाले में आता दिखा।

क्या शी जिनपिंग को थी जानकारी?

यहाँ बता दें कि यूएस खुफिया एजेंसी की इस रिपोर्ट में इस बात को साफ नहीं किया गया है कि पूरी साजिश में राष्ट्रपति शी जिनपिंग किस सीमा तक शामिल थे। लेकिन चीनी सेना के विशेषज्ञों का यह मानना है कि उन्हें निश्चित रूप से इस हमले के आदेशों के बारे में सूचना रही होगी। क्योंकि आदेश देने वाले जनरल झाओ, शी जिनपिंग के बेहद करीबी माने जाते हैं।

दिलचस्प बात ये है कि अमेरिकी अनुमान के मुताबिक इससे पहले वर्ष 1979 में वियतनाम युद्ध के दौरान जनरल झाओ पीएलए में थे और माना जाता है कि उनके कुप्रबंधन की वजह से ही विवाद काफी बढ़ गया था। वर्ष 2017 में डोकलाम विवाद के दौरान भी जनरल झाओ शामिल थे। इस दौरान भी भारतीय सैनिकों ने सफलतापूर्वक चीनी सैनिकों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था।

याद दिला दें कि आपसी झड़प की खबर मीडिया में आने के बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने बयान दिया था कि भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों पर पहले हमला किया। लेकिन अब यूएस खुफिया एजेंसी की यह रिपोर्ट उन दावों से बिलकुल उलट है।

इस मामले पर अमेरिका का ये भी कहना है कि जनरल झाओ ने इस हमले में मारे गए चीनी सैनिकों की याद में एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया था। मगर, इस बारे में चीनी मीडिया में कुछ भी जानकारी जानबूझकर नहीं दी गई। यही नहीं चीन के सोशल मीडिया वेबसाइटों पर भी इस हार के बारे में काफी आलोचना की गई जिसे बाद में सेंसर कर दिया गया।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत-चीन मामले पर क्या कहा?

14-15 जून की रात हुई इस झड़प को लेकर अमेरिका राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा, “ये बहुत मुश्किल स्थिति है। हम भारत से बात कर रहे हैं। चीन से बात कर रहे हैं। उनके यहाँ बहुत समस्या है। वे लोग मारपीट पर उतर आए हैं। हम देखते हैं, आगे क्या होगा। हम उनकी मदद करने की कोशिश कर रहे हैं।”

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों गलवान घाटी में भारत चीन सैनिकों के बीच जो कुछ भी हुआ। उसमें दोनों देशों के जवान हताहत हुए। इसी के मद्देनजर भारत सरकार ने चीन का रवैया देखते हुए आर्मी को अपने मुताबिक कार्रवाई करनी की छूट भी दी। साथ ही बातचीत का रास्ता भी खुला रखा।

इसके बाद LAC पर जारी खींचतान के बीच सोमवार को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत हुई। एलएसी के दूसरी ओर चीन के हिस्से में मोल्डो इलाके में दोनों सेनाओं के अधिकारियों के बीच बैठक हुई। यह बैठक करीब 12 घंटे के बाद खत्म हुई। हालाँकि, इस बैठक के बाद कोई प्रभावी नतीजे नहीं निकलकर आए।

राहत की बात ये है कि चीन की नापाक इरादों को भाँपते हुए सीमा पर भारतीय सेना पहले से पूरी तरह से मुस्तैद हो गई है। वहीं, सैटेलाइट इमेज से पता चल रहा है कि चीन अपनी सीमा की ओर से कई तरह की हरकतें कर रहा है। जिसे देखते हुए भारतीय एयरफोर्स ने भी अपने फाइटर प्लेनों को तैनात कर दिया है।