बॉलीवुड के जाने-माने एक्टर सुशांत सिंह राजपूत बीते रविवार यानी 14 जून को इस दुनिया को अलविदा कह गए। उन्होंने अपने घर के एक कमरे में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह खबर सुनकर पूरा देश सदमे में आ गया हैं। उनके अंतिम संस्कार के बाद अब पटना में उनकी अस्थियाँ भी गंगा में विसर्जित हो चुकी हैं। इस बीच मुंबई पुलिस उनकी मौत से जुड़ी हर कड़ी की जाँच कर रहीं है।
पुलिस जाँच में सुशांत को लेकर कई नई बातें सामने आई हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस सूत्रों ने बताया, सुशांत ने तीन दिन पहले ही घर में काम कर रहें सभी लोगों को पूरी सैलरी दे दिया था। साथ ही सुशांत ने यह भी कहा था, कि अब वे आगे की सैलरी उन्हें नहीं दे पाएँगे। जिस पर स्टाफ ने उनसे कहा था कि, “आप ने हमें इतना सम्भाला है, आगे हम कुछ न कुछ कर लेंगे।”
सुशांत की एक्स मैनेजर दिशा ने भी हाल ही सुसाइड कर लिया था। उसको लेकर भी एक बात पुलिस जाँच में सामने आई हैं। जहाँ सुशांत के एक मैनेजर ने पुलिस को बताया कि वह एक्स-मैनेजर दिशा से 14 करोड़ के एक वेब सीरीज में रोल करने के लिए टच में थे। हालाँकि, इससे कुछ खास बात सामने नहीं आई। रिपोर्ट के मुताबिक, सुशांत और दिशा ने वॉट्सऐप से मार्च में आख़िरी बार कॉन्टेक्ट किया था।
मैनेजर ने यह भी बताया कि दिशा के आत्महत्या कर लेने के बाद सुशांत पूरी तरह टूट चुके थे। वो लोगों से खुद को दूर रख एक कमरे में अपने आप को बंद रखते थे। सुशांत पहले से ही डिप्रेशन का शिकार थे, और वहीं दिशा की मौत के बाद वो और सदमे आ गए थे।
आपको बता दें सुशांत की आत्महत्या ने बॉलीवुड के पर्दे के पीछे की सच्चाई को सामने ला दिया हैं। कई बड़े एक्टर, फेमस सेलेब्रिटीज़ से जुड़ी कई बातें सामने आ रही हैं। आए दिन लोग नेपोटिज्म को लेकर भी खुलकर बात कर रहे हैं। जहाँ पहले सुसाइड किए कई एक्टर्स के मौत के पीछे करण जौहर, संजय लीला भंसाली, दिनेश विजान, एकता कपूर और कई नामी चेहरे का हाथ बताया जा रहा हैं। कहा जा रहा है इन लोगों ने काबिलियत को दरकिनार कर लोगों को मेंटली टॉर्चर किया है।
वहीं एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सुशांत और भंसाली की आपस में काफ़ी बॉन्डिंग थी। जयपुर में संजय पर हुए अटैक के बाद सुशांत ने अपने नाम से राजपूत तक हटा लिया था। भंसाली ने 4 फिल्में ऑफर की थी सुशांत को, जिसकी डेट फिक्स नहीं होने की वजह से वो फिल्में सुशांत के हाथ से निकल गई थी। अब इस खबर में कितनी सच्चाई हैं ये तो समय आने पर ही पता चलेगा।
सुशांत की आत्महत्या के पीछे कंगना रनौत ने नेपोटिज्म को बताया वजह
एक्ट्रेस कंगना रनौत ने एक वीडियो जारी करते हुए बोला, “सुशांत सिंह की मौत ने हम सबको झकझोर के रख दिया है। लेकिन वे लोग, जो इस चीज में माहिर हैं कि कैसे समानांतर नैरेटिव चलाया जाए, वो ये कहने लगे हैं कि जिनका दिमाग कमजोर होता है, वे डिप्रेशन में आते हैं और सुसाइड कर लेते हैं।”
“बॉलीवुड के लिए सुशांत ने इतनी अच्छी फिल्में कीं। मगर उन्हें कभी कोई अवॉर्ड नहीं मिला। उन्होंने काय पो छे से डेब्यू किया। उन्हें डेब्यू तक का अवॉर्ड नहीं मिला। उन्होंने 6-7 साल के अंतराल में केदारनाथ, धोनी और छिछोरे जैसी अच्छी फिल्में बनाईं। मगर, फिर भी उन्हें कोई अवॉर्ड नहीं मिला। कोई सराहना नहीं मिली। वहीं, गली बॉय जैसी वाहियात फिल्म को अवॉर्ड मिल जाते हैं।”
उल्लेखनीय है कि बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने रविवार (जून 14, 2020) को मुंबई के अपने घर में आत्महत्या कर ली थी। उनकी मौत उनके साथियों व प्रशंसकों के लिए किसी सदमें से कम नहीं है। आज भी सुशांत की आत्महत्या से हर कोई हैरान, स्तब्ध है। ऐसे में सोशल मीडिया पर कई तरह के पोस्ट देखने को मिले, जिसमें बिना सच्चाई को जाने-समझे लोगों ने उन्हें कोसा।
कोरोना वायरस की महामारी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 23 जून को पुरी (ओडिशा) के जगन्नाथ मंदिर में होने वाली वार्षिक रथ यात्रा पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर हमने इस साल रथयात्रा की इजाजत दे दी तो भगवान जगन्नाथ हमें माफ नहीं करेंगे।
[Breaking] "Lord Jagannath won't forgive us if we allow it", Supreme Court stays annual Rath Yatra in Puri due to COVID-19https://t.co/0uzsglVQHj
महामारी के खतरों के मद्देनजर, सुप्रीम कोर्ट ने 23 जून को होने वाली वार्षिक रथ यात्रा को रोक दिया। CJI ने आदेश दिया कि रथ यात्रा से जुड़ी कोई भी धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक गतिविधि इस साल नहीं होगी।
CJI orders:
We consider it appropriate that in the interest of public health and safety of citizens to restrain the Respondents from holding the Rath Yatra this year. We direct that no Rath Yatra will be held in the temple area of Odisha.
CJI SA Bobde की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने COVID-19 महामारी के मद्देनजर 23 जून को ओडिशा में होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा को स्थगित करने की माँग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला लिया है।
CJI ने आदेश में कहा – “हम इस वर्ष रथ यात्रा आयोजित करने से रोकना सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिकों की सुरक्षा के हित में उचित मानते हैं। हम निर्देश देते हैं कि ओडिशा के मंदिर क्षेत्र में कोई रथ यात्रा आयोजित नहीं की जाएगी।”
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जगन्नाथ रथयात्रा को लेकर चल रही सम्भवनाओं को विराम लग गया है। साथ ही, लगभग दो महीने से पुरी में चल रही रथयात्रा की तैयारियों को भी बड़ा धक्का लगा है। इस बीच मंदिर परिसर में रथ का निर्माण जारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए फैसला दिया है कि कोरोना महामारी के फैलने के डर और लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए रथयात्रा ना निकाली जाए। मंदिर प्रशासन ने राज्य सरकार से बिना भक्तों के रथयात्रा निकालने की अनुमति भी माँगी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगने के बाद से सरकार ने कोई गाइड लाइन जारी नहीं की थी।
गौरतलब है कि भुवनेश्वर के ओडिशा विकास परिषद एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर कर कहा कि रथयात्रा से कोरोना फैलने का खतरा हो सकता है। इसमें कहा गया था कि अगर लोगों की सेहत को ध्यान में रखकर कोर्ट दीपावली पर पटाखे जलाने पर रोक लगा सकता है तो फिर रथयात्रा पर रोक क्यों नहीं लगाई जा सकती?
प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने गुरुवार को 41 कोयला खदानों की नीलामी की प्रक्रिया को लॉन्च किया। इस लॉन्चिंग कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा, “इतने चुनौतिपूर्ण समय में इस तरह के इवेंट का होना, और आप सभी का उसमें शामिल होना एक बड़ी आशा जगाता है और विश्वास का एक बड़ा संदेश लेकर आता है। भारत कोरोना से लड़ेगा भी और आगे बढ़ेगा भी। भारत के लिए आपदा कितनी भी बड़ी क्यों ना हो, वह उसे अवसर में बदलने के लिए कृतसंकल्प है।
देश और विदेश से इस इवेंट में हिस्सा ले रहे सभी साथियों का बहुत-बहुत स्वागत है। इतने Challenging Time में इस तरह के इवेंट का होना, आप सभी का उसमें शामिल होना, अपने आप में एक बड़ा संदेश लिए हुए है: PM @narendramodi
बता दें, प्रधानमंत्री इस नीलामी प्रक्रिया के उद्घाटन कार्यक्रम को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित कर रहे हैं। कोरोना संकट के मद्देनजर गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मंत्र दिया।
उन्होंने कहा कि भारत आपदा में रोने वाला देश नहीं है, बल्कि संकट को अवसर में बदलने के लिए गंभीर है। उन्होंने बताया कि कैसे हम आयात पर निर्भरता कम करेंगे और युवाओं को रोजगार देकर भारत को मजबूत बनाएँगे।
पीएम मोदी ने कोल ब्लॉक्स पर अपनी बात शुरू करने से पहले कहा, “भारत कोरोना से लड़ेगा भी और आगे भी बढ़ेगा। भारत इस बड़ी आपदा को अवसर में बदलेगा। कोरोना के इस संकट ने भारत को आत्मनिर्भर भारत- Self Reliant होने का सबक दिया है।”
महीने भर के भीतर ही, हर घोषणा, हर रिफॉर्म्स, चाहे वो Agriculture Sector में हो, चाहे MSMEs के सेक्टर में हो या फिर अब Coal और Mining के Sector में हो, तेज़ी से ज़मीन पर उतर रहे हैं: PM @narendramodi
पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज एनर्जी सेक्टर में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। महीने भर के भीतर ही, हर घोषणा, हर रिफॉर्म्स, चाहे वो कृषि सेक्टर में हो, चाहे सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग के सेक्टर में हो या फिर अब कोल और खनन के सेक्टर में हो, तेजी से जमीन पर उतर रहे हैं।
पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि ये दिखाता है कि भारत इस आपदा को अवसर में बदलने के लिए कितना गंभीर है। आज हम सिर्फ निजी क्षेत्रों के लिए कोल ब्लॉक के लिए नीलामी की शुरुआत नहीं कर रहे हैं, बल्कि कोल सेक्टर को दशकों के लॉकडाउन से भी बाहर निकाल रहे हैं।
जो देश Coal Reserve के हिसाब से दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश हो, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा Producer हो, वो देश Coal का Export नहीं करता बल्कि वो देश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा Coal Importer हैं: PM @narendramodi
पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक मजबूत माइनिंग और मिनरल सेक्टर के बिना आत्मनिर्भर भारत संभव नहीं है, क्योंकि मिनरल्स और माइनिंग हमारी अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण पिलर्स हैं। इन रिफॉर्म्स के बाद अब कोल प्रोडक्शन, पूरा कोल सेक्टर भी एक प्रकार से आत्मनिर्भर हो पाएगा।
पीएम ने बताया जब हम कोल प्रोडक्शन बढ़ाते हैं तो पॉवर जेनेरेशन बढ़ने के साथ ही Steel, Aluminum, फर्टिलाइजर, सीमेंट जैसे तमाम दूसरे सेक्टर्स में Production और Processing पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है
पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश में 16 जिले ऐसे हैं, जहाँ कोयले के बड़े-बड़े भंडार हैं, लेकिन इनका लाभ वहाँ के लोगों को उतना नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था। यहाँ से बड़ी संख्या में हमारे साथी दूर, बड़े शहरों में रोजगार के लिए पलायन करते हैं। इन कोल ब्लॉक्स से इन लोगों को रोजगार मिलेगा और वहाँ रहने वाले लोगों को अधिक सुविधाएँ मिलेंगी।
पीएम के मुताबिक, साल 2030 तक करीब 100 मिलियन टन Coal को Gasify किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा, “मुझे बताया गया है कि इसके लिए 4 प्रोजेक्ट्स की पहचान हो चुकी है और इन पर करीब-करीब 20 हज़ार करोड़ रुपए निवेश किए जाएँगे।”
कोल सेक्टर में हो रहे रीफॉर्म, इस सेक्टर में हो रहा निवेश, लोगों के जीवन को, विशेषकर हमारे गरीब और आदिवासी भाई-बहनों के जीवन को आसान बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा: PM @narendramodi
पीएम ने कहा, “कोल सेक्टर में हो रहे रीफॉर्म, इस सेक्टर में हो रहा निवेश, लोगों के जीवन को, विशेषकर हमारे गरीब और आदिवासी भाई-बहनों के जीवन को आसान बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा।”
साल 2014 के बाद इस स्थिति को बदलने के लिए एक के बाद एक कई कदम उठाए गए। जिस कोल लिंकेज की बात कोई सोच नहीं सकता था, वो हमने करके दिखाया। ऐसे कदमों के कारण Coal Sector को मजबूती भी मिली: PM @narendramodi
गौरतलब है कि कोरोना संकट में प्रवासी मजदूरों के लिए मोदी सरकार द्वारा एक मेगा प्लान तैयार किया जा रहा है। इसके तहत मोदी सरकार गरीब कल्याण रोजगार अभियान को 20 जून को लॉन्च करेगी। इस अभियान के दौरान लॉकडाउन में अपने राज्यों और गाँव वापस लौटने वाले लाखों लोगों के रोजगार और पुनर्वास के लिए पूरा खाका तैयार किया गया है।
PM Modi to launch ‘Garib Kalyan Rojgar Abhiyaan’ on 20 June to boost livelihood opportunities in rural India. The campaign of 125 days across 116 districts in 6 states to work in mission mode to help migrant workers: Prime Minister’s Office (file pic) pic.twitter.com/nSu55zqH4H
PM Modi to launch ‘Garib Kalyan Rojgar Abhiyaan’ on 20 June to boost livelihood opportunities in rural India. The campaign of 125 days across 116 districts in 6 states to work in mission mode to help migrant workers: Prime Minister’s Office (file pic) pic.twitter.com/nSu55zqH4H
प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक 6 राज्यों के 116 जिलों में 125 दिनों तक यह अभियान चलेगा। अभियान के सरकारी तंत्र प्रवासी श्रमिकों की सहायता के लिए मिशन मोड में काम करेंगे।
PM नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार गरीबों, मजदूरों, किसानों के हितों के लिए कदम उठा रही है। चाहे वह 1.70 लाख करोड़ का गरीब कल्याण पैकेज प्रदान करना हो या, 20 लाख करोड़ के पैकेज से आत्मनिर्भर भारत बनाने का संकल्प हो। अब इस नई योजना से सरकार का उद्देश्य कोरोना संकटकाल में भी ग्रामीण भारत में रोजगार को बनाए रखना है।
भारत इस वक़्त चीन के द्वारा फैलाए गए कोरोना वायरस को निपटाने की पुरजोर कोशिश में लगा है। दूसरी ओर हमारे सैनिक सीमा पर दुश्मनों का मुकाबला कर रहे हैं। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस अपनी घटिया राजनीति से बाज नहीं आ रहा।
कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए पीएम केअर फंड से अस्पतालों में पहले बैच के वेंटिलेटर उपलब्ध कराए गए। जिसके बाद मंगलवार (16 जून, 2020) को कॉन्ग्रेस समर्थकों ने ट्विटर पर एक झूठी साजिश के तहत लाए गए वेंटिल्टर्स पर आरोप लगाते हुए इसे ‘वेंटिलेटर घोटाला’ बता कर वायरल कर दिया।
इस फर्जी खबर को फैलाने वाले साकेत गोखले पहले शख्स थे। उन्होंने ट्वीट कर पूछा, पीएम केयर्स फंड के तहत वेंटिलेटर खरीदने के लिए अलॉट किए गए फंड से 750 करोड़ से अधिक रुपए कैसे गायब हो गए?
Stunning details of embezzlement of 750+ crores by PM CARES:
Y’all must’ve seen this ventilator with PM CARES sticker that has been promoted by the BJP.
Read on to know how a whopping 750+ crores have been stolen by PM Modi & BJP with these ventilators.
वेंटिलेटर मॉडल skanray CV200 को मैसूर स्थित स्कैनरे टेक्नोलॉजिज से खरीदा गया है। गोखले ने आरोप लगाते हुए कहा कि स्कैनरे टेक्नोलॉजिज फिलिप्स वेंटिलेटर के निर्माण का लाइसेंस पार्टनर है, इसलिए स्कैनरे उसी फिलिप्स CV200 मॉडल को दे रहा है, जैसा कि भारत में बनाया गया है।
इसके बाद उन्होंने ‘फिलिप्स CV200’ मॉडल के लिए एक ई-कॉमर्स पोर्टल इंडिया मार्ट से इसकी प्राइस लिस्ट निकाली। इसमें दावा किया गया कि यह 2.5 लाख रुपए प्रति पीस पर इंडिया मार्ट पर बेचा जा रहा है।
Now, here’s a brochure for the Skanray CV200 ventilator allegedly procured through PM CARES.
At the bottom, it states that these are produced for Govt of India Epidemic Emergency Program.
Further, note that Skanray is also a licensed manufacturer for Philips Healthcare
गोखले इसके बाद हाई स्कूल स्तर का गणित लगाते हुए कहते हैं कि 50,000 वेंटीलेटर की खरीद के लिए पीएम केअर फंड के 3,100 करोड़ रुपए में से अलॉट किए गए 2,000 करोड़ रुपए में से सरकार 2.5 लाख रुपए के बजाय 4,00,000 रुपए प्रति वेंटिलेटर का भुगतान कर रही है।
इस खबर को देखते ही कॉन्ग्रेस के अन्य समर्थकों ने आँख बंद कर इस मनगढ़ंत सच्चाई को फैलाने में जुट गए। साथ यह भी दावा किया कि किस तरह वेंटिलेटर की आड़ में घोटाले को अंजाम दिया जा रहा है।
आम आदमी पार्टी को समर्थन देने वाले कुछ लेखकों ने भी इसे महत्वपूर्ण सूचना के तौर पर लिया। बता दें कि कोठारी ‘द लॉजिकल इंडियन’ की मैनेजिंग एडिटर हैं। ये वही हैं, जिन्होंने फेसबुक पर अरविंद केजरीवाल के फैन पेज के रूप में शुरुआत की थी।
कुछ लोगों ने तो गोखले की मनगढ़ंत कहानी को तथ्य मान लिया।
इससे पहले हम खबर की सच्चाई के बारे में आपको बताए, हम साकेत गोखले की कुछ मामूली बातें जान लेते हैं।
जिस “फिलिप्स सीवी 200” को लेकर गोखले का दावा था, वास्तव में वह इंडिया मार्ट पर 11 लाख रुपए में बिक रहा है।
और तो और, गोखले के ट्विटर थ्रेड को भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड के सीएमडी द्वारा खंडन किया गया। बीइएल भारत की एक प्रॉफेशनल डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक कंपनी है, जो भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के नवरत्न डिफेंस पब्लिक सेक्टर के अधीन है।
The information enclosed in the tweet is fabricated since there is no such model manufactured by Philips to the best of our knowledge. It appears as though a fictitious product under the brand name of Philips is being promoted on virtual marketplace, https://t.co/CuXA0CDAvD
बीईएल के सीएमडी ने कहा कि ट्वीट्स में इतनी सारी फर्जी जानकारी कैसे गढ़ी गई। क्योंकि उनकी जानकारी के अनुसार फिलिप्स ऐसे किसी भी मॉडल का निर्माण नहीं करता है। उन्होंने कहा कि इन ट्वीट्स को देख कर ऐसा लग रहा जैसे फिलिप्स के ब्रांड नाम के तहत एक काल्पनिक प्रोडक्ट को वर्चुअल मार्केटप्लेस पर प्रचारित किया जा रहा है।
ऐसे समय में पीएसयू के सीएमडी सोशल मीडिया पर इन मनगढ़ंत खबरों पर रिप्लाई दे कर इसे फर्जी साबित कर रहे हैं। जबकि उनके पास करने के लिए और भी कई जरूरी काम हैं। उन्होंने बताया कि कैसे CV200, 2 घंटे की बैटरी बैकअप के साथ एक उच्च कोटि का वेंटिलेटर है। साथ ही इसमें कई अन्य सुरक्षा विशेषताएँ भी हैं।
These safety features required for patient protection in terms of necessary pressure release & HEPA/Particle/Bacteria/HME filters. The components used for manufacture are from reputed global medical grade components supply-chain partners.
उन्होंने कहा, “निर्माण के लिए उपयोग किए जाने वाले कॉम्पोनेन्ट प्रतिष्ठित वैश्विक मेडिकल ग्रेड कंपोनेंट्स के सप्लाई चैन पार्टनर हैं। CV200 वेंटिलेटर की कीमत इसके विन्यास, विशेषताओं और प्रदर्शन को देखते हुए विचार विमर्श करके किया जाता है।”
सीएमडी ने आगे कहा कि वेंटिलेटर पर पीएम केअर फंड का लोगो इसलिए लगा है, क्योंकि वेंटिलेटर अलॉट किए गए फंड के तहत ही खरीदे जा रहे हैं। और इस पर लगाया गया लोगो इसकी पहचान और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
CV200 ventilators are manufactured by BEL under licence from Skanray Technologies, Mysore. Skanray Technologies is the only Indian company having CE certified products.
सीएमडी ने बताया कि कैसे डीआरडीओ ने कोरोनो वायरस प्रकोप के बीच वैश्विक लॉकडाउन स्थिति के बीच बड़ी संख्या में वेंटिलेटर के निर्माण के लिए आवश्यक व महत्वपूर्ण कंपोनेंटस के विकास और स्वदेशीकरण में सहयोग किया है।
आखिरकार इन मनगढ़ंत कहानियों का पर्दाफाश होने के बाद गोखले को विश्वास ही नहीं हुआ कि उसे जवाब देने वाला शख्स बीईएल का सीएमडी है।
Haha are you even a real account of the CMD of BEL?
Take legal action. Go ahead. These intimidation tactics don’t work on me. :man-shrugging::skin-tone-2:
In the event you’re the real thing, tell us the price at which PM CARES procured the CV200 ventilator instead of all the other gyaan :face_with_rolling_eyes: https://t.co/Dj2pPorBU6
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बिहार के सबसे लोकप्रिय फिल्म कलाकार शत्रुघ्न सिन्हा से सवाल पूछने का मन करता है कि आपने कितने बिहारी युवाओं को बॉलीवुड में प्रोमोट किया और संरक्षण दिया? सोचता हूँ कभी शत्रुघ्न सिन्हा ने सुशांत की फिल्में देखकर, उसकी सफलता के बारे में सुनकर फोन पर शाबासी दिया होगा या फिर उसे बुलाकर मिले होंगे!
बिहार के बॉलीवुड में स्थापित अन्य लोग मसलन मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी, शेखर सुमन, प्रकाश झा, संजय मिश्रा आदि से भी यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि सुशांत जैसे युवा कलाकारों के प्रति इन लोगों का क्या रूख होता होगा! यह सब इसलिए जानना चाहता हूँ क्योंकि ये सभी लोग अपने-अपने वक्त के सुशांत रहे हैं, जिन्होंने बॉलीवुड में बड़ा वजूद बनाया। फिर इन सबसे यह प्रश्न भी उठता है कि मुम्बई में अपने बिहारी भाई सुशांत के दाह संस्कार के वक्त ये सभी लोग क्या नैतिक तौर पर वहाँ उपस्थित होने या परिवार से मिलने का फर्ज नहीं निभा सकते थे? इन सबके बीच शुक्र है कि सुशांत के अंतिम यात्रा में पार्श्व गायक उदित नारायण न सिर्फ बहुत भावुक दिखे बल्कि पूरे तौर पर मौजूद भी रहे।
क्या मायानगरी में इतनी जानलेवा स्पर्धा है कि अपने ही जड़-जमीन से जुड़े दूसरे भाई के लिए आप खड़े तक नहीं हो सकते हैं! अगर ऐसा है तो फिर ये रंगीन पर्दे की शोहरत महज झूठ और छल- प्रपंच की बुनियाद पर खड़ी एक मायाजाल है।
प्रतिभाशाली सुशांत की लोकप्रियता और अहमियत का अंदाजा इससे भी लगा सकते हैं कि बिहार के बेटे की मृत्यु पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी गहरी संवेदना प्रकट करते हुए दुख व्यक्त किया है। लेकिन आश्चर्य होता है जब सुशांत की मौत के बाद दुख, पीड़ा, आक्रोश का इज़हार करने वालों को सोनाक्षी सिन्हा राजनीति न करने की सलाह देकर चुप रहने को कहती हैं। क्या वो अप्रत्यक्ष तौर पर खास बॉलीवुड ब्रिगेड के आकाओं का प्रवक्ता होने का संदेश देना चाहती हैं?
स्पष्ट है कि संघर्ष करके बड़े स्टार बने लोगों के मुम्बईया सिल्वर स्पून लॉलीपॉप बेटे-बेटी एक आम संघर्षशील बिहारी की भावना से नावाकिफ हैं, जिसका सोनाक्षी भी एक उदाहरण है। माफियाओं की चमचागिरी कर, उनके आगे नतमस्तक होकर बॉलीवुड में सफल होना अलग बात है लेकिन सुशांत सिंह राजपूत होना अलग बात है।
बिहार के छोटे से शहर का लड़का सुशांत आज के हर संघर्षशील बिहारी और पूर्वांचली युवाओं का प्रतिनिधि था, जिसके पाँव जमीन पर होते हैं और वो आसमान छूने के सपने देखता है। अपने सपने को पूरा करने का जज़्बा लिए वो किसी भी हद तक जा सकता है। इस पूरे उपर्युक्त संदर्भ में सुशांत सिंह राजपूत की मौत एक संघर्षशील बिहारीयत की मौत भी कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए।
सुशांत सिंह राजपूत के पास 7 फिल्में थीं लेकिन साजिश के तहत संबंधित डायरेक्टर-प्रोड्यूसरों ने अपनी फिल्मों से उन्हें निकाल दिया। सुशांत को माफियाओं के दबाव में फिल्मों से निकाल बाहर करने वाले लोगों की पहचान भी सार्वजनिक होनी चाहिए। आखिर ये कौन लोग हैं, जो बॉलीवुड में स्टारडम और सफलता-असफलता को तय करते हैं!
दिलचस्प तो यह है कि बड़े नाम वाले अभिनेता भी डर से बॉलीवुड माफियाओं के खिलाफ नहीं बोलते हैं बल्कि उन्हें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मान्यता प्रदान करते हैं।
बॉलीवुड आत्म-केंद्रित लोगों का जमावड़ा है। यहाँ माफिया सफलता-असफलता और भविष्य तय करते हैं। हकीकत है कि बॉलीवुड में सफलता सिर्फ मेहनत और संघर्ष के बूते ही तय नहीं होती है। बॉलीवुड में इंट्री बहुत मुश्किल है, घुस गए तो टिकना नामुमकिन है। जीवनयापन या गुजारा करने के लिए दाल-रोटी का जुगाड़ है लेकिन स्टारडम तक पहुँचना, फिर स्थापित होकर टिक जाना किसी के बूते की बात नहीं है।
यहाँ माफियाओं का खेमा काम करता है, जिनके चेले-चमचे बनकर और फिर मोहरे बन भी लोग सफल होते हैं। कुछ संघर्ष की राह में साजिशन मार दिए जाते हैं और कुछ धीरे-धीरे मर जाते हैं। सुशांत सिंह राजपूत बॉलीवुड के बने-बनाए किसी खाँचे में फिट नहीं बैठता था, जिसने बॉलीवुड माफियाओं के गिरोह को जाने-अनजाने चुनौती देने की हिमाकत कर दी थी।
सुशांत ने यह दिखलाने की कोशिश की कि वो बॉलीवुड में सफलता के मानकों से अलग है और विशुद्ध मेहनत, संघर्ष, जज़्बे की बदौलत स्थापित हो सकता है। सवाल तो यही है कि बिहार की धूल-माटी में खेलकर मुम्बई की फिल्म नगरी में अपने बूते वजूद बनाने वाले सुशांत सिंह राजपूत को नापसंद करने वाला माफिया कौन था?
शर्मनाक पहलू यह है कि सुशांत की मृत्यु के बाद भी शातिर माफियाओं ने उसे न बख्शने की कसम खा ली है। मृत्यु उपरांत प्रोफेशनली मीडिया के सहयोग से पब्लिसिटी एवं प्रोपेगेंडा करके सुशांत का चरित्र हनन कर पूरे मामले को भटका कर दूसरा रंग देने का प्रयास भी जारी है।
आज तक बॉलीवुड में जितने भी आत्महत्या के शक्ल में संदेहास्पद मौतें हुई हैं, किसी के निष्कर्ष के तौर पर सजा की बात तो दूर, कोई दोषी तक साबित नहीं हुआ है। क्या सचमुच बॉलीवुड एक माफिया गिरोह है, जो लाभ-हानि, सफलता-असफलता और फ्लॉप-हिट के कारोबार से ज्यादा कुछ नहीं। यहाँ मौतों पर संवेदना की हल्की ज्वार तो उठती है लेकिन थोड़ी हलचल के बाद माहौल फिर से यथावत पूरी तरह प्रोफेशनल हो जाता है।
बॉलीवुड की रंगीन गलियों में सुशांत की मौत का सच घूम रहा है, जिसके बारे में कंगना रनौत ने बेबाक कहा, अभिनव कश्यप ने खुलकर लिखा और शेखर कपूर ने दिल से महसूस किया लेकिन तथाकथित बड़े नाम वाले लोगों ने जान या करियर खत्म होने के डर से चुप्पी साध रखी है।
सुशांत की मृत्यु पर देश भर से प्रतिक्रिया आई, जिसे सोशल मीडिया पर एक स्वाभाविक स्वत:स्फूर्त आक्रोश के तौर पर देखा जा सकता है। बॉलीवुड माफियाओं ने सुशांत को नहीं बख्शा लेकिन सुशांत की मौत ने उन सभी का चेहरा पब्लिक डोमेन के आम चर्चे में ला दिया है।
मायानगरी के बेबी-बाबा एवं माफिया ब्रिगेड से हाथ जोड़कर गुजारिश है कि सुशांत सिंह राजपूत के निधन पर फोटो-ऑप एवं खबरों में सुर्खियाँ बटोरने के लिए घड़ियाली आँसू न बहाएँ और न दाँत निपोर कर फर्जी इमोशन की पब्लिसिटी कराएँ।
सुशांत के खिलाफ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष साजिश करने वाले सभी लोगों का और उनकी फिल्मों का बहिष्कार करने की बिहार एवं पूर्वांचलवासियों से अपील भी करता हूँ।
सुशांत के परिवार सहित हर संवेदनशील व्यक्ति और खासकर बिहार के लोगों की माँग है कि सुशांत की मृत्यु की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। इस साजिश का खुलासा भी बेहद जरूरी है ताकि मायानगरी के रौनकदार खुशबूदार कपड़ों और रंगीन चश्मे में छिपे बदनाम चेहरे बेनकाब हों और कोई दूसरा सुशांत साजिश की मौत न मरे।
हरियाणा के मेवात में हिंदुओं पर होते अत्याचारों को रोकने के लिए कल (जून 16, 2020) मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कई घोषणाएँ की। इस बीच उन्होंने सभागार में मौजूद दोनों पक्षों को सुना और पत्रकारों से बात की। उन्होंने आश्वासन दिया कि इलाके में न्यायव्यवस्था कायम करने की हर संभव कोशिश की जाएगी।
उन्होंने बताया कि धर्मांतरण व लव जिहाद को रोकने के लिए धर्मांतरण विरोधी कानून बनाया जाएगा, गोकशी मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुना जाएगा और हिंदुओं की धार्मिक व सार्वजनिक संपत्तियों पर से कब्जा हटाकर उनके लिए बोर्ड बनाया जाएगा। सीएम की इन घोषणाओं के बाद कई हिंदूवादी संगठनों और उन पत्रकारों में संतोष की स्थिति दिखी। जिन्होंने इस मुद्दे को उठाया और मेवात की धरती पर हिंदुओं को इंसाफ दिलाने के लिए अपनी जी जान लगा दी।
जस्टिस पवन कुमार की 4 सदस्यीय रिपोर्ट से संबंधी प्रेस रिलीज सामने आने के बाद ऑपइंडिया ने मेवात का यह मुद्दा 1 जून को ही उठाया था। हमने जस्टिस पवन कुमार से बात करते हुए अपनी खबर में उन सभी मामलों का उल्लेख किया था। जिसके कारण मेवात को दलितों का कब्रिस्तान बताया गया।
इसके बाद हमने मेवात के हालातों को जानने के लिए कई स्थानीय लोगों से संपर्क किया। इस बीच हमारी बात उन पत्रकारों से भी हुई। जिन्होंने इस मामले के प्रकाश में आने के बाद वहाँ ग्राउंड रिपोर्टिंग की और मेवात की हकीकत अपने चैनलों के माध्यम से दर्शकों के सामने पेश की। आज इन्हीं पत्रकारों की अनुमति से हम उनके अनुभव आपसे साझा कर रहे हैं।
क्या कहते हैं मेवात में रिपोर्टिंग करने के बाद पत्रकार, क्या है इनका अनुभव?
न्यूज नेशन के पत्रकार विकास चंद्रा से ऑपइंडिया की बातचीत के अंश
‘कश्मीर में भी अब वो हालात नहीं है, जो सालों से इस समय मेवात के हैं’- ये शब्द उस पत्रकार के हैं जिसने मेवात के गाँव-गाँव में घूमकर दलित हिंदुओं की हकीकत की परतें खोली। हम बात कर रहे हैं न्यूज नेशन के पत्रकार विकास चंद्रा की।
विकास चंद्रा ने मेवात का मुद्दा प्रकाश में आने के बाद अपनी जान जोखिम में डालते हुए वहाँ रिपोर्टिंग की और पीड़ित परिवार के ऐसे बयान लिए, जिसने सवाल खड़े कर दिए कि क्या मेवात वाकई हिंदुस्तान का हिस्सा है।
बकौल विकास चंद्रा, “मेवात में ऐसी कई जगह हैं जहाँ पर अब हिंदू अपने बच्चों के नाम मुस्लिमों वाले रखते हैं। ताकि अगर वे बाहर अपना नाम बताएँ, तो उनकी जान बच जाए। मेवात के हिंदू अपने यहाँ शादियो में गाने नहीं बजा पाते, क्योंकि मुस्लिम बहुल आबादी के लोग आकर सारा सामान तोड़कर चले जाते हैं। वहाँ पर लड़कियों का अपहरण होना। बारातियों को मारा जाना – ये सब बहुत आम बातें हैं।”
विकास कहते हैं मेवात में अधिकांश हिंदू लड़कियाँ पाँचवीं या छठी क्लास के बाद स्कूल नहीं जाती हैं। क्योंकि लोगों को डर होता है कि कहीं उनकी बच्चियों को उठा न लिया जाए। वहाँ धर्मपरिवर्तन के लिए तरह-तरह के हथकंडे आजमाए जा रहे हैं। जैसे-डराना, धमकाना, मारना- पीटना, जमीन-घर-श्मशान पर कब्जा कर लेना आदि।
विकास के अनुसार, मेवात से हिंदुओं को भगाने के लिए वहाँ पर श्मशान पर कब्जा कर लिया जाता है, जब हिंदू अपने शमशानों में शवों को ही नहीं जला पाएगा, तो या तो इस्लाम अपनाएगा या फिर मेवात छोड़कर भाग जाएगा। इसके अलावा वहाँ मुस्लिम बहुल आबादी के लोग हिंदुओं को भगाने के लिए या फिर उन्हें इस्लाम कबूल करवाने के लिए लड़कियों से बदसलूकी भी करते हैं।
विकास बताते हैं कि उनकी अपनी पड़ताल बताती है करीब 110 गाँव हिंदू विहीन हो चुके हैं। जिन गाँवों को लेकर पहले कहा जा रहा था कि वहाँ पर हिंदू हैं, वहाँ भी जब हम गए, तब कोई हिंदू घर नहींं था। पुलिस की यदि बात करें, तो वहाँ पुलिस प्रशासन भी संतोषजनक कार्रवाई करने में असफल रहता है।
वे मेवात पर अपने अनुभवों को हमसे साझा करते हुए कहते हैं कि हम रिपोर्टिंग के दौरान कई जगहों पर गए। लेकिन वहाँ रिपोर्टिंग करना आसान काम नहीं है। मुस्लिम बहुल आबादी के लोग मारने-काटने पर उतारू हो जाते हैं। कई बार कई जगहों से हमें भागना पड़ा, तो कहीं-कहीं तो लॉकडाउन या फिर खेती पर अपनी रिपोर्टिंग करनी पड़ी। ताकि वह भ्रमित हो जाएँ। मेवात घूमते हुए आपको हर कोने में मस्जिद मिलेगा, मदरसा मिलेगा, मरकज मिलेगा। जहाँ जगह खाली होगी वहाँ इनके निर्माण का काम जारी होगा।
विकास कहते हैं कि भले ही बिजनेस क्लास को लेकर मेवात में हिंदुओं की संख्या 11 प्रतिशत बताया जाता है। लेकिन किसी गाँव का यदि औसत निकालें तो मालूम चलेगा कि 98% समुदाय विशेष के लोग हैं। विकास, खुद को पुन्हाना में हुई लूटपाट की एक घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं और कहते हैं कि उनकी आँखों के सामने एक व्यक्ति की दुकान को लूट लिया गया। व्यक्ति की गलती सिर्फ़ इतनी थी कि उसने अपने दुकान के सामने एक युवक को पेशाब करने से मना कर दिया। जिसपर उस युवक ने दुकानदार को जवाब दिया कि ये क्या कम है कि तुम काफिरों पर या तुम्हारे शरीर पर नहीं कर रहे केवल दुकान के सामने कर रहे हैं।
मेवात के हालातों को समझाने के लिए विकास कहते हैं कि वहाँ हिंदुओं की हालत बिलकुल वैसी है, जेैसे 32 दांतों के बीच में जीभ। विकास, मेवात में रिपोर्टिंग करने के दौरान सबसे ज्यादा दुखी शासन प्रशासन के रवैये को देखकर होते हैं। अपनी निराशा व्यक्त करते हुए वे कहते हैं कि वहाँ वाकई में अपराधियों पर उपयुक्त कार्रवाई नहीं होती। वहाँ हत्या के मामलों को भी आत्महत्या में बदल दिया जाता है।
विकास के अनुसार, मेवात में 1992 से पहले वाकई हिंद-मुस्लिम मिलकर रहा करते थे। लेकिन बाद में तबलीगी और देवबंदियों ने वहाँ लोगों का माइंड वॉश करना शुरू किया। पहले वहाँ मुस्लिम भी हिंदुओं के रीति-रिवाजों को मानते थे। उनके त्यौहारों को मनाते थे। कोई मांस बेचने आता था, तो मना कर देते थे कि यहाँ हिंंदू भी रहते हैं। लेकिन 1992 के बाद सब बदलता गया। वहाँ मुस्लिमों के दिमाग के भरा जाने लगा कि तुम मुस्लिमों की तरह दिखो, उनकी तरह रहो, उनकी तरह बोलो, उनकी तरह खाओ। न्यूज नेशन पत्रकार दो टूक कहते हैं, “आज मुझे नहीं लगता, जितने कट्टर मेवात के मुस्लिम है, उतने कट्टर दुनिया में कोई और जगह के मुस्लिम होंगे।”
पंजाब केसरी अंबाला एडिशन के जिला इंचार्ज- दिनेश देशवाल
ऑपइंडिया से बात करते हुए पंजाब केसरी अंबाला एडिशन के जिला इंचार्ज दिनेश देशवाल भी 1992 वाले एंगल का जिक्र करते हैं और बतौर स्थानीय व एक मीडियाकर्मी हमसे मेवात के हालात साझा करते हैं।
वे 1992 और 2020 की वोटर लिस्ट का हवाला देते हुए बताते हैं कि उन्होंने मेवात में कुछ हिंदू बहुल गाँवों को यदि छोड़ दिया जाए, तो जितने भी मुस्लिम बहुल गाँव हैं, वहाँ हर जगह हिंदुओं की संख्या घटी है। मेवात के एक हिंदू बहुल गाँव आलदो में रहने वाले दिनेश कहते हैं कि उन्होंने मेवात में रहते हुए अपने आसपास के गाँवों में ऐसी कई घटनाएँ देखी हैं और उन्होंने कई रिपोर्ट कवर भी की हैं। हालिया किसी घटना के बारे में पूछने पर दिनेश बताते हैं कि अभी हाल में एक पीड़िता परिवार ने यहाँ पर एक मीडिया चैनल को अपना बयान दे दिया था। जिसके बाद उनसे मारपीट की गई। यहाँ बता दें, ऑपइंडिया ने इस घटना की जानकारी मिलते ही पीड़ित परिवार से संपर्क करने की कोशिश की थी। मगर, जो नंबर हमें पीड़ित परिवार के नाम से मिला, वह गाँव के किसी और व्यक्ति ने उठाया। जिसके बाद हमने परिवार की सुरक्षा लिहाज से आगे उनसे पूछताछ नहीं की।
मेवात के युवा समाजसेवी पेज पर साझा पोस्ट (साभार: दिनेश देशवाल)
दिनेश दावा करते हैं कि उन्होंने स्वंय वोटर लिस्ट की छँटनी की है और अपनी सभी बाते वे सरकारी दस्तावेजों के आधार पर बता रहे हैं। उदहारण के तौर पर समझाने के लिए वे कहते हैं कि मान लीजिए अगर 1992 में मुस्लिम बहुल आबादी वाले किसी गाँव में हिंदुओं की 20 वोट थी तो अब 2020 में वह 8-10-12 ही बचे हैं। इसी प्रकार मुस्लिमों की वोटर लिस्ट देखें, तो वह 1992 में अगर 300 थे, तो आज ये संख्या 2020 तक 1000 या उसके पार पहुँच गई है। इसका मतलब तो यही है न कि इस बीच में मुस्लिमों की वोट अगर बहुत बड़ी संख्या में बढ़ी है, तो हिंदुओं की संख्या बहुत बढ़ी संख्या में घटी है।
दिनेश देशवाल द्वारा साझा की गई मेवात में एक वकील की हत्या की खबर
मेवात में पलायन के बारे में बताते हुए दिनेश कहते हैं कि 1992 में जब बाबरी विध्वंस हुआ, तो उसका असर यहाँ भी दिखा। उस समय तक हिंदू बाजार ज्यादा होते थे। लेकिन, 1992 की इस घटना के बाद मुस्लिमों ने हिंदुओं के बाजारों का बहिष्कार कर दिया था। इसके बाद जब भी कोई भी घटना होती है, जिसमें हिंदू विरोध करते हैं, तो यह लोग हिंदुओं के दुकानों से सामान लेने से मना कर देते हैं। जिसके कारण हिंदू पलायन करने को मजबूर हो गए।
मेवात में हिंदू बाजारों का बहिष्कार करने के लिए डाला गया पोस्ट (साभार: दिनेश देशवाल)
बाकायदा ‘बाजार जिहाद’ शब्द का जिक्र करते हुए दिनेश कहते हैं, आज ये लोग बड़े स्तर पर अपने बाजारों का विस्तार कर रहे हैं और हिंदुओं के बाजार का बहिष्कार कर रहे हैं। ऐसे में मानिए कि उन्होंने (मुस्लिमों ने) हमसे मारपीट नहीं भी की, हमारी बहन-बेटियों से बदसलूकी नहीं भी की… लेकिन जब कोई हमारे बिजनेस को ही प्रभावित कर देगा, उसका बहिष्कार कर देगा, तो इसका सीधा असर हम पर ही तो पड़ेगा। जाहिर है फिर हम यहाँ से निकलने का प्रयास करेंगे।
विकास चंद्रा की भाँति मेवात के स्थानीय व पंजाब केसरी के पत्रकार दिनेश देशवाल का भी यही मानना है कि मेवात में पहले हिन्दुओं की स्थिति ठीक-ठाक थी। लेकिन जमातियों के आने के बाद इनमें कट्टरपन आ गया और हालात ऐसे होते गए। गौतस्करी पर बोलते हुए वह बताते हैं कि कुछ दिन पहले जमाल गढ़ गाँव से 2572 गाय की खालें बरामद हुई थी।
सुदर्शन के पत्रकार गौरव मिश्रा से ऑपइंडिया की बातचीत
गौरव मिश्रा ने मेवात का मामला उठने के बाद वहाँ लगातार कई दिन ग्राउंड रिपोर्टिंग की। उन्होंने बताया कि वह 3 गाँवों में गए। उन्होंने वहाँ ऐसे घरों को देखा, जिनकी स्थिति एक समय में बहुत अच्छी रही होगी, घर बड़ा रहा होगा। लेकिन, उन घरों को लोगों ने वहाँ छोड़ दिया। जब गौरव ने इस संबंध में आसपास के लोगों से पूछा तो लगभग सबने एक जैसा जवाब बताया। जैसे- वहाँ अधिकांश हिंदू मानते थे कि अगर उनकी लड़की बड़ी हो गई। जवान हो गई है। तो उसके साथ कुछ भी हो सकता है।
गौरव कहते हैं कि मुस्लिम बहुल आबादी का इतना दबाव है कि कोई घटना घटने पर और कार्रवाई न होता देख भी लोगों ने गाँवों से पलायन किया है। वहाँ हिंदू परिवार या तो लड़कियाँ को छठी-सातवीं तक पढ़वाते हैं या फिर अगर स्थिति अच्छी है तो वह उसे हिम्मत करके 10वीं करवा देते हैं, लेकिन इससे आगे पढ़ाई नहीं करने देते।
लड़कियों को ज्यादा न पढ़ाने के पीछे का कारण बताते हुए गौरव कहते हैं कि वहाँ पर अधिकाँश शैक्षणिक संस्थान मुस्लिम बहुल इलाकों में हैं। ऐसे में जब लड़कियाँ वहाँ जाती हैं, तो मुस्लिम लड़के उन्हें छेड़ते हैं, उनपर फब्तियाँ कसते हैं।
इसके अलावा एक लड़की के साथ साक्षात्कार का हवाला देते हुए गौरव ने कहा कि उन्हें लड़की ने इंटरव्यू देते हुए बताया कि जब वह कॉलेज जाती हैं, तो मुस्लिम युवक ट्रैक करते हैं। जिसके कारण उन्हें पिता या भाई को बुलाने की जरूरत पड़ती है।
कई बार ऐसे मामले भी आते हैं कि मुस्लिम लड़कियाँ ही हिंदू लड़कियों के साथ मिलकर अपने मजहब और मुस्लिम लड़कों की बहुत तारीफ करती हैं। जिससे लव जिहाद की शुरुआत होती है। इसके बाद ऐसे लड़कों से भी मिलवाया जाता है जो कलावा पहनकर आते हैं या फिर माथे पर टीका लगाकर आते हैं, ताकि लड़कियाँ उनपर मोहित हों।
मेवात के मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू लड़कों की शादी के मुद्दे पर गौरव कहते हैं कि कई लोग इस बारे में वहाँ स्पष्ट नहीं बोलते। 100 में से 3-4 परिवार होंगे, जो बताते हैं कि यहाँ रहने के कारण बाहर के लोग उन्हें लड़की देने से मना कर देते हैं। उनका मानना है कि उनकी बेटी वहाँ सुरक्षित नहीं रहेगी।
मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पानी की समस्या पर भी गौरव हमसे बात करते हैं। वे कहते हैं कि एक गाँव है शहरी जिसे ‘शिरी’ भी कहा जाता है। बकौल गौरव, “इस गाँव में अधिकांश पानी के कनेक्शन मुस्लिम लोगों के पास हैं। इस गाँव में लगभग 50 घर हिंदुओं के बचे है, जिनमें साफ पानी नहीं आता। इस मामले में मैंने उस गाँव की एक बुजुर्ग महिला से बात की। जिन्होंने बताया कि जब वह लोग 1 km पानी लेने जाती हैं, तो उन्हें ‘कंजरी’ जैसे शब्दों से पुकारा जाता है। इसलिए वे वहाँ बहु-बेटियों को नहीं भेजतीं। खुद ही पानी लेने चली जाती हैं।”
गौरव के मुताबिक, कोरोना के समय में घर से निकलकर उन्हें गाँव में कुछ भी खाने को नसीब नहीं होता था। घर से ले गए चनों को चबाते-चबाते वह भरी दोपहरी में रिपोर्ट करते और उसके बाद भी वहाँ जल्दी कोई बात करने को तैयार नहीं होता। क्यूँकि जो लोग बात करते हैं उन्हें बाद में धमकियाँ मिल जाती हैं। वे कहते हैं कि जिन लोगों ने उनसे बात की उन्होंने मुँह पर कपड़ा बाँधा, या फिर कैमरे की ओर पीठ करके जवाब दिए।
बता दें, सीएम मनोहर लाल खट्टर के साथ हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में गौरव ने हिस्सा लिया था। उन्होंने बताया कि दोनों पक्षों के साथ हुई इस बैठक में कई लोगों ने गंगा-जमुनी तहजीब को बचाने का हवाला देकर कई बातें कहीं। मगर, सीएम को ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाए। सीएम ने कई अहम फैसले लिए। जिन्हें अगर लागू किया गया तो मेवात में निश्चित ही स्थिति में सुधार आएगा।
गौरव कहते हैं कि रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें कई मुसीबतें आईं। उनकी गाड़ी की वीडियो बनाई गई। उनसे आ आकर पूछा गया कि कौन से रास्ते से जाओगे। हिम्मत है तो उस रास्ते से जाकर दिखाना। तुमने मुद्दा दिखाकर अच्छा नहीं किया- जैसी कई धमकी भरी बातें बोलीं गई। इस संबंध में तो गौरव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक ट्वीट भी किया था।
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों के साथ मुलाकात चल रही है मौके पर पहुंचने पर सुदर्शन न्यूज़ को और मुझे यहाँ पहुँचने के बाद लगातार धमकियां दी जा रही है। मैंने ग़लत कर दिया है ये बोला जा रहा है
— Gaurav Mishra गौरव मिश्रा ?? (@gauravstvnews) June 16, 2020
इतना ही नहीं, कॉन्फ्रेंस के दौरान सवाल उठाने पर कई अन्य रिपोर्टरों ने उनका विरोध किया। जिसके कारण उन्हें उस समय बाहर कर दिया गया। लेकिन सीएम खट्टर ने बाद में उनसे ऑफ कैमरा बातें कीं, जहाँ उन्होंने मामले की जमीनी हकीकत दिखाने पर चैनल की तारीफ की और नाराजगी जताते हुए यह भी पूछा कि सुदर्शन न्यूज ने उनकी प्रतिक्रिया जानने का प्रयास क्यों नहीं किया?
आज पहली बार मैंने ये महूसस किया पत्रकारिता में अब चाटुकारिता बुरी तरह प्रवेश कर चुकी है। मुझे प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूर रखकर मेवात के मुश्लिम विधायकों और वहाँ के पत्रकारों को प्रशासन ख़ुद खुश करने में लगा हुआ था सर। संघर्ष भरी पत्रकारिता जारी रहेगी। https://t.co/evtOYlKqPX
— Gaurav Mishra गौरव मिश्रा ?? (@gauravstvnews) June 16, 2020
ऑपइंडिया का मेवात पर प्रयास
यहाँ बता दें ऑपइंडिया भी मेवात के इस मामले पर लगातार राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष, हरियाणा महिला आयोग अध्यक्ष और हरियाणा सीएम ऑफिस की प्रतिक्रिया जानने के लिए उनसे कई बार संपर्क करने का प्रयास कर रहा था। लेकिन संपर्क न हो पाने के कारण कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। इस बीच हमने स्थानीयों लोगों से बात की और इन पत्रकारों से भी उनके अनुभव जाने। ताकि हर पक्ष साफ हो सके।
आज भले ही कुछ तथाकथित सेकुलरिज्म का झंडा लेकर चलने वाले मेवात पर हुई इस रिपोर्टिंग को, इन पत्रकारों के अनुभवों को या हिंदूवादी संगठनों की माँग को एकतरफा करार दे दें। लेकिन उन प्रमाणों को, वीडियोज को, उन बयानों को, पूर्व जस्टिस की अध्यक्षता वाली जाँच रिपोर्ट को, अनेकों खबरों को झुठलाया नहीं जाया सकता। जो मेवात की स्थिति पर वाकई ये सवाल खड़ा करते हैं कि क्या आज का मेवात पाकिस्तान जैसा है या इसकी स्थिति वाकई सन 90 के कश्मीर से भी बुरी है, जहाँ इसी तरह कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार करके उन्हें घाटी से बाहर कर दिया गया था। आज मेवात में दलितों को आए दिन जिस तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है वो और भी गंभीर स्थितियों की तरफ स्पष्ट इशारा है।
हालाँकि, अब तसल्ली की बात बस यही है कि ये मामला लोगों के संज्ञान में आया है। कई संगठन इसपर लगातार नजर बनाए हुए हैं। मेवात के हिंदुओं को सुरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। वहीं मंगलवार को स्वयं मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इस मामले के मद्देनजर बकायदा बैठक करके कड़े फैसले लिए हैं। हिंदुओं को आश्वस्त किया है कि उन्हें इंसाफ मिलेगा। पानी से लेकर जमीन तक पर उन्हें उनका अधिकार दिलाया जाएगा।
आज सीएम की इन घोषणाओं को हम हिंदू समाज के प्रति जागरुक और इस मुद्दे को प्रकाश में लाने वालों की जीत के रूप में स्पष्ट तौर देख सकते हैं। साथ ही निष्पक्ष पत्रकारिता का दावे करने वाले उन मीडिया चैनलों की मंशा भी समझ सकते हैं। जिन्होंने चहुँओर मामले की चर्चा होने के बाद भी न इस मामले को प्राथमिकता दी और न इसपर कवरेज करना जरूरी समझा।
लद्दाख की गलवान घाटी में भारत-चीन सेना के बीच हुई आपसी झड़प के बाद नेपाल से सटी भारत की सोनौली सीमा पर सतर्कता बढ़ाते हुए SSB व पुलिस ने गश्त तेज कर दी है। सीमा के आसपास कड़ी नजर रखी जा रही है। सरहद की तरफ जाने वाले पगडंडी मार्गों पर जवान लगातार पैट्रोलिंग कर रहे हैं। इस बीच भारत-नेपाल की खुली सीमा पर सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजर है।
दैनिक जागरण की खबर के अनुसार, एसपी रोहित सिंह सजवान ने बताया कि बॉर्डर की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। सुरक्षा एजेंसियाँ भी लगी हुई हैं। नेपाल व भारत में आवाजाही के लिए सोनौली व ठूठीबारी बॉर्डर का इस्तेमाल किया जाता है। लॉकडाउन के कारण से इसको सील कर दिया गया है। शर्तों के साथ सोनौली बॉर्डर से एंट्री मिल रही है। खुली सीमा पर भारत की तरफ से SSB की तैनाती की गई है। संवेदनशील जगहों पर CCTV कैमरे भी लगाए गए हैं। उधर, बिहार के सीतामढ़ी में नेपाल पुलिस की ओर से फायरिंग व नक्शा विवाद को लेकर बॉर्डर पर अलर्ट जारी किया गया है।
कहाँ से शुरू हुआ भारत-नेपाल के बीच तनाव
दरअसल, अभी हाल में भारत ने लिपुलेख से धारचूला तक सड़क बनाई थी। जिसका उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किया। इसके बाद ही नेपाल की सरकार ने विरोध जताते हुए 18 मई को नया नक्शा जारी किया था। भारत ने इस पर आपत्ति जताई थी।
पिछले महीने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने नेपाली संसद में घोषणा की कि भारत के कब्जे वाले कालापानी क्षेत्र (पिथौरागढ़ जिला) पर नेपाल का ‘निर्विवाद रूप से’ हक है। इसलिए इस क्षेत्र को पाने के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक कदम उठाने जा रही है।
ओली की कैबिनेट ने नेपाल का एक नया राजनीतिक मानचित्र पेश किया है, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दिखाया गया। हालाँकि, इस खबर की सूचना पाते ही भारत ने इसका विरोध किया। लेकिन 13 जून को नक्शे में बदलाव से जुड़ा बिल शनिवार को पास कर दिया गया। वहाँ की संसद में इसके सपोर्ट में 258 वोट पड़े।
इसके बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, ”हमने गौर किया है कि नेपाल की प्रतिनिधि सभा ने नक्शे में बदलाव के लिए संशोधन विधेयक पारित किया है ताकि वे कुछ भारतीय क्षेत्रों को अपने देश में दिखा सकें। हालाँकि, हमने इस बारे में पहले ही स्थिति स्पष्ट कर दी है। यह ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है। ऐसे में उनका दावा जायज नहीं है। यह सीमा विवाद पर होने वाली बातचीत के हमारे मौजूदा समझौते का उल्लंघन भी है।”
लॉकडाउन में नेपाल पर बनी चौकियोंं पर नजर आई चीनी भाषा
लॉकडाउन में बॉर्डर पर नेपाल की ओर से अस्थाई चौकियाँ बनाने का मामला सामने आया था। इसके बाद पता चला कि बरगदवा सहित बॉर्डर की कई नेपाली चौकियों पर लगे टेंट पर चीनी भाषा का इस्तेमाल किया गया। जब मामले ने तूल पकड़ा तो एसएसबी ने छानबीन शुरू की, लेकिन तब कोई बड़ा मामला निकलकर सामने नहीं आया।
मगर, अब खुलासा हुआ है कि भारत से लगने वाली नेपाल की सीमा में हाल के फेरबदल के पीछे चीन का संबंध सामने आया है। दरअसल, खुफिया एजेंसियों को पता चला है कि नेपाल में चीन की युवा राजदूत होऊ यांगी ने इसमें अहम भूमिका निभाई और भारत के खिलाफ बड़ा कदम उठाने के लिए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को तैयार किया। इसी के बाद ओली ने ऐसी रूपरेखा तैयार की और राष्ट्रीय मानचित्र के विस्तार के इस प्रस्ताव पर विपक्षी नेपाली कॉन्ग्रेस भी सरकार के साथ आ गई। यहाँ बता दें ओली अपने पहले कार्यकाल में भी और मौजूदा कार्यकाल में भी चीन के साथ नए समीकरण बनाने की कोशिश कर चुके हैं।
वहीं, यांगी पहले पाकिस्तान में 3 साल काम कर चुकी हैं। वहाँ पर उनके काम को देखते हुए उन्हें नेपाल में स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका दिया गया। इसके बाद वह ओली के आवास पर भी धड़ल्ले से आने जाने लगी। बस इसी बात का संकेत मिलने के बाद ही थल सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे ने चीन का नाम लिए बगैर नेपाल के कदम को किसी की शह पर उठाया गया बताया था। साथ ही नेपाल के कदम पर हैरानी जताई थी कि चीन के प्रभाव में आकर ओली ने बिना सोचे समझे अप्रत्याशित काम कर डाला।
नेपाली नेताओं की क्या है प्रतिक्रिया?
हालाँकि, पीएम ओली द्वारा नक्शा लाए जाने के बाद नेपाल में कई जगह इस मैप का उत्साह मनाया जा रहा है। मगर, कुछ लोग ऐसे भी है, जो इससे बेहद नाराज हैं। दरअसल, नेपाल के विधायकों और कुछ नेताओं ने नेपाल के हालिया कदम पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। इन नेताओं ने कहा है कि नेपाल का नक्शा दोनो देशों की रिश्तों की डोर कमजोर कर रहा है।
नेपाल के मर्चवार क्षेत्र से कॉन्ग्रेसी विधायक अष्टभुजा पाठक, भैरहवां के विधायक संतोष पांडेय व राष्ट्रीय जनता समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता महेंद्र यादव ने कहा कि नेपाल की संसद ने नक्शे में बदलाव के लिए पहाड़ पर खींची जिस नई लकीर पर मुहर लगाई है, वह देश के मैदानी इलाकों में दरार का कारण बन रही है।
भारत से रोटी-बेटी का रिश्ता रखने वाले नवलपरासी, रूपनदेही समेत 22 जिलों के लगभग एक करोड़ मधेशी नागरिक इस नए नक्शे को स्वीकार नहीं कर पा रहे। लिपुलेख, कालापानी व लिंपियाधुरा के मुद्दे पर उपजे तनाव का असर भारत-नेपाल की 1751 km लंबी सरहद पर भी नजर आ रहा है, जहाँ मधेशी लोगों में किसी अनहोनी को लेकर संशय है।
रूपनदेही जिले में एक कार्यक्रम में इन नेताओं ने कहा कि भारत-नेपाल धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर जुड़े हैं। दोनों देशों की जनता में कटुता के लिए कोई जगह नहीं है। संसद के निचले सदन, प्रतिनिधि सभा में विवादित नक्शे को लेकर पेश संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी मिलने से तराई के सीमा के निकट रहने वाले लोग संशय में हैं।
मधेशी समुदाय
नेपाल की संसद में मधेशी समुदाय के 33 जनप्रतिनिधियों की सहभागिता होने के बाद भी यह समुदाय नेपाल में उपेक्षित है। इसके लेकर इन्होंने कई बार आंदोलन भी किए, सड़कों पर भी आए। लेकिन भी नेपाल के संविधान में मधेशी समुदाय को नेपाल के लोकतंत्र में जगह नहीं मिल पाई।
बता दें, इन सबका एक कारण यह भी बताया जाता है कि नेपाल के नवलपरासी, रूपनदेही, कपिलवस्तु, झापा, मोरंग, सुनसरी, सप्तसरी, धनुषा, भोजपुर समेत तराई के 22 जिलों में रहने वाले मधेशियों की बोली-भाषा, खान-पान, रहन-सहन पहाड़ी नेपालियों से अलग है। इसी कारण इन्हें वहाँ उपेक्षा झेलनी पड़ती है। इनके जनप्रतिनिधियों का कहना है कि नेपाल में भारत के खिलाफ मुहिम चला कर चुनाव जीतना अब यहाँ की परंपरा बन चुकी है।
चीन ने सितम्बर 1957 में शिजियांग से तिब्बत के गरटोक तक एक हाईवे का निर्माण कार्य समाप्त किया था। यह क्षेत्र अक्साई चिन के पठार यानी भारत के लद्दाख का सीमावर्ती हिस्सा है। इस सड़क निर्माण का एकमात्र उद्देश्य चीनी वामपंथी सरकार की विस्तारवादी नीतियों को बढ़ावा देने के लिए था। इसी के साथ जल्दी ही 28 जुलाई, 1959 को उत्तरी पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना ने घुसपैठ भी शुरू कर दी।
संभवतः यह भारत-चीन युद्ध की पहली एक आहट थी, जिसे तत्कालीन भारत सरकार ने समझने में चूक कर दी। एक महीने बाद ही 25-26 अगस्त को लोंग्जू में चीनी सेना दूसरी बार घुसपैठ कर चुकी थी। इस बार दोनों देशों की सेनाओं के बीच गोलीबारी की भी ख़बरें सामने आई थी।
इसी साल 20 अक्टूबर को चीन ने लद्दाख में फिर से घुसपैठ कर तीन भारतीय जवानों को बंधक बना लिया। इस दिन भारत और चीन की सेनाओं के बीच दूसरी बार गोलीबारी हुई, जिसमें कुछ भारतीय सैनिकों ने अपना बलिदान दिया। हालाँकि, इस मुठभेड़ में पहली बार चीन के कई सैनिक भी मारे गए थे।
इस मुठभेड़ के बाद 14 नवंबर, 1959 को हमारे सैनिकों को चीन के कब्जे से छुड़ाने के लिए दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता वार्ता बुलाई गई। परिणामस्वरूप 10 भारतीय जवानों को चीन सरकार ने वापस भारत को सौंप दिया।
इसी दौरान 1 सितम्बर, 1959 को द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने भारतीय सीमा के साथ चीन का एक नक्शा प्रकाशित किया। जिसमें अखबार ने चीन की विस्तारवादी नीति का उल्लेख करते हुए बताया कि वह कुल 57,000 वर्ग किलोमीटर के विदेशी भूभाग पर कब्ज़ा करना चाहता है – जिसमें भारत के असम – 17,000 वर्ग किलोमीटर और कश्मीर – 22,000 वर्ग किलोमीटर हिस्सा शामिल था।
अगले साल अप्रैल 1960 में चीन के प्रधानमंत्री झ़ोउ एनलाई की पांच दिवसीय भारत यात्रा प्रस्तावित थी। इसे ध्यान में रखते हुए भारत के मुख्य विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नेहरू को भारतीय पक्ष के संदर्भ में ठोस कदम उठाने की नसीहत दी। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच सीमा विवाद के समाधान के लिए कई बैठकें हुई लेकिन दुर्भाग्य से बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी।
हालाँकि, इन बैठकों में दोनों प्रधानमंत्री राजनायिक तौर पर सीमा विवाद को सुलझाने के लिए तैयार हो गए थे। इस प्रकार अधिकारी स्तर पर कुल तीन बैठकें हुईं – जिसमें आखिरी बैठक 7-12 दिसंबर, 1960 को हुई। जिसके बाद दोनों देशों के अधिकारियों ने सीमा पर वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट बनाकर अपने-अपने देश की सरकारों को सौंप दिया।
इन रिपोर्ट्स को 14 फरवरी, 1961 को प्रधानमंत्री नेहरू ने संसद के समक्ष पेश किया। दरअसल, प्रधानमंत्री ने दो रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी थी – इसमें एक भारतीय अधिकारियों की तरफ से तैयार की गई, और दूसरी चीन के अधिकारियों की रिपोर्ट शामिल थी। चीन की वास्तविक रिपोर्ट उनकी मन्दारिन भाषा में थी। इसे चीन की सरकार ने अंग्रेजी में अनुवादित कर भारत को सौंपा था लेकिन ऊपर ‘अनाधिकारिक’ लिख दिया था।
जब प्रधानमंत्री नेहरू ने चीन सरकार से इस बात का स्पष्टीकरण माँगा और बताया कि उन्हें परंपरा के अनुसार इस रिपोर्ट को संसद के समक्ष पेश करना है तो इस पर चीन की तरफ से जवाब आया कि अंग्रेजी की रिपोर्ट ‘अनाधिकारिक’ ही रहेगी क्योंकि उसमें कुछ गलतियाँ हो सकती हैं। चूँकि चाइनीज भाषा किसी संसद सदस्य को आती नहीं थी इसलिए मात्र इसी कारण से रिपोर्ट पर संसद में चर्चा नहीं हो सकी। (लोकसभा – 14 फरवरी, 1961)
यह भारत के प्रधानमंत्री नेहरू की विदेश नीति थी, जिसमें भाषाई कमियों को दूर करने का भी कोई समाधान नहीं था। अगर उस दिन संसद में रिपोर्ट पर चर्चा हो जाती तो संभवतः चीन की सोच का आकलन किया जा सकता था। अतः भारत की सीमा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक सामरिक रणनीति बनाई जा सकती थी। शायद एक साल बाद होने वाले भारत-चीन युद्ध में भी भारत को कोई लाभ मिल जाता।
एकतरफ प्रधानमंत्री की वार्ता निष्फल रही तो दूसरी तरफ उनके लिए महत्वपूर्ण सामरिक रिपोर्ट्स कोई मायने तक नहीं रखती थी। इस तरह वे भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने की बनावटी कवायदों में लगे हुए थे।
साल 1959 से लेकर 1961 तक भारत-चीन सीमा विवाद अपने चरम पर था। जब धीरे-धीरे मौके हाथ से फिसल रहे थे, तो प्रधानमंत्री के साथ उनके करीबी और खास समझे जाने वाले रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन पर भी सवाल उठने लगे। उस दौरान अधिकतर नेताओं और सेना अधिकारियों का मानना था कि भारत-चीन के बीच पैदा हो रहे गतिरोधों में कृष्णा मेनन की भूमिका संदिग्ध है। इसलिए उन्हें मंत्रिपद से हटाने के भरसक प्रयास किए गए।
इस क्रम में सबसे बड़ा कदम जनरल थिमैय्या ने उठाया – उन्होंने 31 मई, 1959 को मेनन के विरोध में प्रधानमंत्री नेहरू को अपना इस्तीफा सौंप दिया। हालाँकि, प्रधानमंत्री नेहरू ने उनके इस्तीफे को स्वीकार नहीं किया लेकिन मेनन को भी नहीं हटाया।
प्रधानमंत्री नेहरू के इस ‘मेनन प्रेम’ का नुकसान हमारी विदेश नीति के साथ-साथ भारतीय सेना को उठाना पड़ रहा था। इसका विरोध कॉन्ग्रेस के नेताओं सहित प्रमुख विपक्षी दलों के नेता भी कर रहे थे। इसमें प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता आचार्य कृपलानी और भारतीय जनसंघ के महामंत्री दीनदयाल उपाध्याय जैसे नाम शामिल थे।
उधर, कॉन्ग्रेस की कार्यसमिति के सदस्य मोरारजी देसाई और तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नीलम संजीवा रेड्डी ने भी प्रधानमंत्री से भारत-चीन सीमा विवाद को जल्दी सुलझाने के लिए अपील की थी। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष यूएन ढेबर का भी यही मत था। साथ ही उन्होंने इस पूरी समस्या का दोष भारत के कम्युनिस्टों पर मढ़ते हुए बताया था कि वे लोग भारत को चीन के साथ युद्ध की ओर धकेल रहे हैं। (द हिंदुस्तान टाइम्स – 29 अप्रैल, 1959)
आखिरकार, सितम्बर 1962 में प्रधानमंत्री नेहरू को जानकारी मिली कि लद्दाख की गलवान नदी तक के इलाके तक चीनी सेना अवैध कब्जा जमा चुकी है। एक महीने बाद दोनों देशों की सेनाएँ एक-दूसरे के सामने थीं। लगभग एक महीने चले इस युद्ध में चीन ने गलवान नदी तक अपनी स्थिति को बरकरार रखा। प्रधानमंत्री नेहरू ने भी इस इलाके को वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
इस कथित विदेश नीति के तहत जम्मू-कश्मीर का 37,544 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा चीन के कब्जे में चला गया। साल 1963 में पाकिस्तान ने 5,180 वर्ग किलोमीटर का इलाका भी गैर-कानूनी रूप से चीन को दे दिया। इस तरह अक्साई चिन, मनसार और शाक्सगाम घाटी का कुल 42,735 वर्ग किलोमीटर का भूभाग चीन अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (सीओजेके) कहलाता है।
एक बार सरदार पटेल ने भी चीन से उभरते खतरे की तरफ प्रधानमंत्री नेहरू का ध्यान दिलाने की कोशिश की थी। उन्होंने 7 नवंबर, 1950 को प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर कहा, “चीन सरकार ने शांतिपूर्ण इरादों के बल पर हमें बहकाने की कोशिश की है… हालाँकि हम खुद को चीन का मित्र मानते हैं, चीनी हमें अपना मित्र नहीं मानते।”
सरदार पटेल चीन के संबंध में भारत की विदेश नीति को ठोस और सुरक्षित रखना चाहते थे। हालाँकि, प्रधानमंत्री नेहरू हमेशा उचित सलाह नजरंदाज कर दिया करते थे और इसी बात का खामियाजा आज तक भारत को भुगतना पड़ रहा है।
मध्यप्रदेश में तीन राज्यसभा सीटों के लिए 19 जून को चुनाव होने वाले हैं। इस बीच प्रदेश में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। खबर है कि सपा, बसपा, समेत निर्दलीय विधायकों का झुकाव भाजपा की ओर है। बुधवार (जून 17, 2020) को तो यह खास विधायक कॉन्ग्रेस पार्टी की अहम बैठक छोड़कर भाजपा कार्यालय में हुए डिनर तक में नजर आए। जिससे कॉन्ग्रेस को बड़ा झटका लगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुधवार को ये सभी विधायक भाजपा दफ्तर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रकाश जावड़ेकर, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा समेत तमाम दिग्गज नेताओं से मुलाकात के बाद बाहर निकले।
भाजपा दफ्तर में दिखने वाले नेताओं में विधायक रामबाई, संजीव सिंह कुशवाह, सपा विधायक राजेश शुक्ला निर्दलीय विधायक विक्रम सिंह राणा और सुरेंद्र सिंह शेरा शामिल थे। न्यूज 18 की खबर के अनुसार, इन सभी विधायकों ने साफ किया है कि वह राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के लिए वोट करेंगे।
उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीय विधायकों के इस फैसले से भाजपा में खुशी की लहर है। वहीं कॉन्ग्रेस अब भी परेशान है। हालाँकि 3 तीन सीटों पर होने वाले इन चुनावों में कॉन्ग्रेस के खाते में एक सीट पक्की मानी जा रही है। जबकि 2 भाजपा के पाले में जानी स्पष्ट दिख रही हैं।
3 सीटों के लिए होने वाले चुनाव के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी की ओर से नियुक्त पर्यवेक्षक केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और पार्टी महासचिव बैजयंत जय पांडा बुधवार को भोपाल पहुँचे। वहीं, कॉन्ग्रेस के महासचिव और प्रदेश के नए प्रभारी मुकुल वासनिक भी मध्यप्रदेश पहुँच गए। वासनिक ने कॉन्ग्रेस के विधायकों के साथ बुधवार को बैठक की।
यहाँ बता दें 230 सीटों वाले MP विधानसभा में फिलहाल 24 सीट खाली हैं। इनमें से 2 सीट तो विधायकों के निधन की वजह से रिक्त हुई। जबकि 22 सीटों पर कॉन्ग्रेस विधायकों ने सिंधिया के समर्थन में इस्तीफ़े दिए।
सीटों की गणित के हिसाब से देखें तो कॉन्ग्रेस के 114 में से 22 विधायक कम हुए हैं। इसलिए उनका मौजूदा आँकड़ा 92 है, जबकि बीजेपी के पास अभी 107 विधायक है। 4 निर्दलीय, 2 बीएसपी और 1 एसपी।
बीजेपी को अपने दोनों उम्मीदवारों की जीत के लिए 104 वोट चाहिए। जबकि उसके पास 107 वोट हैं। एक सीट पर जीत हासिल करने के लिए 52 वोटों की जरूरत है। इस हिसाब से कॉन्ग्रेस को तीसरी सीट मिलने की पूरी संभावना है। राज्यसभा के लिए कॉन्ग्रेस की पहली प्रमुखता दिग्विजय सिंह हैं।
भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अस्थाई सदस्य के तौर पर चुना गया। बुधवार (17 जून, 2020) को हुए इस चुनाव में भारत ने जनरल असेम्बली में 192 वैध वोटों में से 184 वोट हासिल किए। इस चुनाव में भारत के साथ-साथ आयरलैंड, मैक्सिको और नॉर्वे भी अस्थाई सदस्य चुने गए हैं।
भारत आठवीं बार सुरक्षा परिषद का अस्थाई सदस्य चुना जा रहा है। जोकि हर एक भारतीय के लिए गर्व की बात हैं। इसके पहले 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12 में भारत यह जिम्मेदारी निभा चुका है।
Deeply grateful for the overwhelming support shown by the global community for India’s membership of the @UN Security Council. India will work with all member countries to promote global peace, security, resilience and equity.
इंडिया एट यूएन, एनवाई ने इस जानकारी को आधिकारिक ट्विटर हैंडल के ज़रिए शेयर किया हैं। जिसमें भारत की इस बड़ी कामयाबी पर टीएस त्रिमूर्ति ने अपने एक वीडियो संदेश के साथ लिखा, “सदस्य देशों ने भारी समर्थन के साथ साल 2021-22 के लिए सुरक्षा परिषद की गैर-स्थाई सीट के लिए भारत का चुनाव किया। भारत को 192 मतों में से 184 मत पड़े।”
Member States elect India to the non-permanent seat of the Security Council for the term 2021-22 with overwhelming support.
बता दें 193 सदस्यों वाले संयुक्त राष्ट्र में जीत के लिए दो-तिहाई यानी 128 सदस्यों का समर्थन होना चाहिए। जिसमें भारत को 184 वोट्स मिले हैं। हर साल पाँच अस्थाई सदस्य चुने जाते हैं। अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल दो साल होता है।
भारत अब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में शामिल होगा। इसका कार्यकाल 1 जनवरी 2021 से शुरू होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 देश हैं। इनमें पाँच अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन स्थाई सदस्य हैं। वहीं एस्तोनिया, नाइजर, सेंट विंसेंट, ग्रेनैडिनेस, ट्यूनीशिया और वियतनाम इन 10 देशों को अस्थाई सदस्यता दी गई है। इसी क्रम में बेल्जियम, डोमिनिकन रिपब्लिक, जर्मनी, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका का दो साल का कार्यकाल इस साल के अंत में समाप्त हो जाएगा।
सोशल डिस्टेंसिग का पालन करते हुए कराएँ गए चुनाव
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपने 75वें सत्र के लिए अध्यक्ष, सुरक्षा परिषद के पाँच अस्थाई सदस्यों और आर्थिक एवं सामाजिक परिषद के सदस्यों के चयन के लिए विशेष मतदान व्यवस्था के तहत बुधवार को चुनाव शुरू किया था। जिसमें कोविड-19 संबंधी पाबंदियों के चलते मतदान के लिए विशेष बंदोबस्त किए गए थे। इस सभा में पश्चिमी यूरोपीय और अन्य राज्यों के बीच से समर्थित उम्मीदवार तुर्की के डिप्लोमेट और पॉलिटिशियन वोलकान बोज़किर को अध्यक्ष के रूप में चुना गया था।
यह चुनाव बुधवार सुबह करीब नौ बजे चुनाव आरंभ हुआ। इससे पहले के वर्षों में, चुनाव के दौरान महासभा का हॉल खचाखच भरा होता था। संयुक्त राष्ट्र में राजनयिक, कर्मचारी तथा अन्य अधिकारी महासभा के हॉल में मास्क पहनकर आए और मतदान करने के तुरंत बाद वहाँ से चले गए
कोरोना वायरस को मद्देनजर रखते हुए 193 सदस्य राज्यों द्वारा मतदान के लिए आठ अलग-अलग स्लॉट तय किए गए थे। मतदान सुबह नौ बजे से शुरू हुआ और दोपहर एक बजे तक चला। अतिरिक्त आधे घंटे का समय उन सदस्यों के लिए रखा गया था जो निर्धारित वक्त पर मतदान नहीं कर पाए। भारत को वोट देने लिए 11.30 से 12.00 बजे का समय निर्धारित किया गया था।
जनरल असेम्बली में चुनाव की पूरी प्रक्रिया को संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष तिजानी मुहम्मद बंदे (Tijjani Muhammad-Bande) की निगरानी में सम्पन्न हुआ।
अमेरिका ने किया भारत का स्वागत
अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के अस्थाई सदस्य चुने जाने पर गर्मजोशी से स्वागत किया है। अमेरिका ने कहा कि हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की जीत पर हम उन्हें बधाई देते हैं। हम अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के मुद्दों पर एक साथ काम करने के लिए तत्पर हैं।
We extend a warm welcome to India&congratulations on India’s successful election to UN Security Council. We look forward to working together on issues of international peace&security-a natural extension of US-India Comprehensive Global Strategic Partnership:US Department of State pic.twitter.com/mz53QVwepg
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र संघ के 6 प्रमुख हिस्सों में से एक है। जिसका उत्तरदायित्व है अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ में नए सदस्यों को जोड़ना और इसके चार्टर में बदलाव से जुड़ा काम भी सुरक्षा परिषद के काम का हिस्सा है। परिषद को अनिवार्य निर्णयों को घोषित करने का अधिकार भी है। ऐसे किसी निर्णय को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव कहा जाता है। इसे विश्व का सिपाही भी कहते है क्योंकि वैश्विक शांति और सुरक्षा की जिम्मेदारी इसी के पास में है। अगर दुनिया के किसी हिस्से में मिलिट्री ऐक्शन की जरूरत होती है तो सुरक्षा परिषद रेजोल्यूशन के जरिए उसे लागू भी करता है।