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रूस से लेंगे 12 सुखोई और 21 मिग-29: लड़ाकू विमानों की आपातकालीन खरीददारी को लेकर वायुसेना का प्रस्ताव

आपातकालीन खरीद के तहत रूस से 12 सुखोई और 21 मिग-29 खरीदने पर भारत विचार कर रहा है। भारतीय वायु सेना (IAF) ने रूस से 33 नए लड़ाकू विमान लेने के लिए सरकार के एक प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है। यह माँग ऐसे समय में की जा रही है, जब सीमा पर भारत और चीन के बीच सामरिक सम्बन्ध ठीक नहीं चल रहे हैं।

भारतीय वायुसेना (IAF) जिन 21 मिग-29 विमानों को खरीदने पर विचार कर रही है, वे रूस के हैं, जिन्होंने वायु सेना को नए लड़ाकू विमानों की आवश्यकता को पूरा करने में मदद करने के लिए इन विमानों को बेचने की पेशकश की है। यह माँग ऐसे समय पर की जा रही है, जब लद्दाख क्षेत्र में सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन के सैनिकों के बीच माहौल संवेदनशील है।

न्यूज एजेंसी ANI के अनुसार, सरकारी सूत्रों का कहना है कि वायु सेना कुछ समय से इस योजना पर काम कर रही है, लेकिन वो अब इस प्रक्रिया पर तत्परता से नजर रख रही है और 6,000 करोड़ रुपए से अधिक के प्रस्तावों की उम्मीद की जा रही है, जिसे अगले सप्ताह उच्च स्तर पर अंतिम मंजूरी के लिए रक्षा मंत्रालय के समक्ष रखा जाएगा।

इस प्रस्ताव में 12 एसयू -30 एमकेआई का अधिग्रहण शामिल है, जिनकी आवश्यकता विभिन्न दुर्घटनाओं में वायु सेना द्वारा खोए गए विमानों की संख्या को बदलने के लिए होगी। भारत ने अलग-अलग बैचों में 10 से 15 साल की अवधि में 272 Su-30 फाइटर जेट्स के ऑर्डर दिए थे।

गौरतलब है कि हाल ही में गलवान घाटी पर चीन की सेना ने जो धोखा किया, उसके कारण भारतीय सेना ने अपने कम से कम 20 जवान खोए। सीमा पर खड़े चीनी सैनिकों को इस दौरान भारत की ओर से मुँहतोड़ जवाब मिला। नतीजतन उनके कमांडिग ऑफिसर समेत 43 सैनिक मारे गए

हालाँकि, पहले इस झड़प को लेकर मीडिया में स्पष्ट सूचना नहीं आ रही थी। मगर, अब धीरे-धीरे सब साफ हो रहा है। ऐसे में भारतीय वायुसेना द्वारा नए लड़ाकू विमानों के अधिग्रहण का प्रस्ताव कई तरह की संभावनाओं को जन्म दे रहा है।

लॉकडाउन में समुदाय विशेष पर ही ज्यादा मुकदमे क्यों, जज साहब पूछ रहे… हम पूछते हैं इसमें समस्या क्या है, मुकदमे झूठे हैं?

तेलंगाना हाईकोर्ट में एक बड़ा अजीब वाकया सामने आया है। वहाँ अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हैदराबाद पुलिस को सिर्फ़ इसलिए फटकार लगा दी, क्योंकि राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान सबसे अधिक मामले समुदाय विशेष के लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज किए गए थे।

चीफ जस्टिस राघवेंद्र सिंह चौहान और जस्टिस बी विजयसेन रेड्डी की पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता शीला सारा मैथ्यूज की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस कार्रवाई पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने हैदराबाद पुलिस को फटकारते हुए पूछा कि क्या इसका मतलब यह है कि दूसरे समुदायों से किसी ने लॉकडाउन का उल्लंघन ही नहीं किया?

गौरतलब हो कि इस याचिका के जरिए शीला सारा मैथ्यूज नाम की सामाजिक कार्यकर्ता ने कोर्ट के समक्ष पुलिस के बर्ताव के ख़िलाफ़ शिकायत की थी। उन्होंने याचिका में उन घटनाओं का ही उल्लेख किया था, जब पुलिस ने मजहब विशेष के युवकों के साथ सख्त बर्ताव किया।

सारा मैथ्यूज ने अपनी याचिका में जुनैद नाम के लड़के के केस का हवाला दिया और बताया कि पुलिस की पिटाई के बाद उसे 35 टाँके आए। इसके अलावा एक मोहम्मद असगर नाम के लड़के का जिक्र किया। जिसे लेकर बताया गया कि असगर किराने का सामान लेने गया था। लेकिन पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया और टॉप फ्लोर से गिरने के कारण उसके दोनों पैर टूट गए।

हालाँकि, इस याचिका की सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से बहुत दलीलें पेश की गईं- जैसे मो. असगर को चोट छत से गिरने से आई है न कि पिटाई से। मगर, कोर्ट ने पुलिस की ओर से दी गई दलीलों को खारिज कर दिया।

साथ ही सारा मैथ्यूज की याचिका के आधार पर डीजीपी से मामले में एक्शन लेने को कह दिया। कोर्ट ने अब इस मामले में निर्देश दिया है कि 20 जून तक पुलिस अधिकारी आरोपित कॉन्स्टेबल पर अपनी कार्रवाई करें और कोर्ट में हलफनामा दाखिल करें।

अब आखिर ऐसी सोच का कारण क्या है?

वामपंथियों और इस्लामी कट्टरपंथियों को समर्थन देने वाली एक लॉबी हमेशा एक आँकड़ा ले कर आती है, और उसके द्वारा यह साबित करना चाहती है कि पुलिस और प्रशासन, और शायद कोर्ट भी, समुदाय विशेष के अपराधी साबित होने में पक्षपाती रवैया अपनाती है।

यदि ‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ की इस खबर को देखें तो यहाँ पर इन्होंने वही बात दोहराने की कोशिश की है जिसमें अखिल भारतीय स्तर पर समुदाय विशेष के अपराधी होने का प्रतिशत 15.8 रहा, जबकि उनकी जनसंख्या 14.2% तक ही जाती है। उसके बाद इन्होंने लिखा कि ‘अंडरट्रायल’, यानी वैसे आरोपित जो न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, उनका प्रतिशत और भी ज्यादा है, जो कि 20.9% है।

अब सवाल यह उठता है कि प्रतिशत में थोड़ा सा अंतर (1.6) यह साबित कर देता है कि पुलिस और प्रशासन समुदाय विशेष को लेकर पक्षपाती है? ऐसे सर्वे में यह क्यों नहीं देखा जाता कि इसी देश में 20-20 साल मुकदमा चलने के बाद आतंकियों को फाँसी दी गई है। अगर पक्षपात होता तो ऐसे लोगों पर इतना समय कैसे जाता?

साथ ही, जिसे यहाँ अल्पसंख्यक कहा जाता है, वो वाकई में अल्पसंख्यक है भी नहीं। दूसरी सबसे बड़ी आबादी है और एक-डेढ़ प्रतिशत के अंतर को ऐसे भुनाना जैसे उनकी जनसंख्या 14% हो और अपराधों में उनका हिस्सा 74% का हो रहा है। चाहे अपराधी हों, या अंडरट्रायल, प्रतिशत का अंतर इतना नहीं है कि इसमें पक्षपात ढूँढ लिया जाए।

यहाँ एक और बात आती है कि हम यह क्यों नहीं मानते कि समुचित न्यायिक प्रक्रिया के बाद 80% हिन्दुओं को भी तो सजा मिलती है? वहाँ पर ये सही हो जाता है? यह मानने में क्या समस्या है कि जो अपराध करता है, वो सजा पा रहा है। और हाँ, जो लोग खुला घूमते हैं, उनमें से ऐसा भी तो नहीं है कि एक ही धर्म के लोग न्यायिक प्रक्रिया को बंधक बनाकर बाहर हैं। जिसके भी पास पैसा और सत्ता है, वो तो आज भी बाहर है।

तीसरी बात, ये किस स्टडी में साबित हो गया किसी भी समाज के अपराध में अपराधियों का अनुपात उनकी जनसंख्या के अनुपात के समानांतर होगा? ऐसा नहीं होता। इसके उलट कुछ मजहबों के नुमाइंदों ने आतंकी वारदातों में अपनी एक्सक्लूसिविटी बनाए रखी है और वहाँ तो उनकी मोनोपॉली भी है।

तो क्या ऐसे समयों में हम यह कहते फिरें कि आतंकी घटनाओं में जो नाम आ रहे हैं, उससे लगता है कि पुलिस और प्रशासन एक खास मजहब के लोगों को पकड़ने में ज्यादा रुचि दिखाती है? या फिर हम ये मानेंगे कि ऐसी घटनाएँ लगातार एक मजहबी उन्माद के वश में आकर एक ही तरह के नाम वाले लोग कर रहे हैं?

आतंकी घटनाओं के बाद कुछ समुदायों की चुप्पी बताती है कि वो इन्हें लेकर स्वयं कितना पक्षपाती हैं। उसी तरह, ऐसी घटनाओं की जड़ में जो सोच है, वह इतनी कुत्सित है कि हम चाह कर भी उसकी उपेक्षा कर ही नहीं सकते।

अब अगर वर्तमान मामले की बात करें जहाँ कोर्ट ने लॉकडाउन में ऐसे मामलों में समुदाय विशेष के खिलाफ ज्यादा मुकदमे दर्ज क्यों हुए हैं, तो यह भी तो हो सकता है कि समुदाय विशेष ने ज्यादा बार नमाज के नाम पर, रमजान के नाम पर और ईद के नाम पर लॉकडाउन का उल्लंघन किया हो?

हमने तबलीगी जमात वाले समय से ही देखा कि कैसे कई इमाम, मौलवी आदि लगातार नमाज करने की सलाह दे रहे थे, और पुलिस की चेतावनियों के बाद भी मस्जिद न सही तो घरों की छतों पर इकट्ठा हो कर नमाज पढ़ रहे थे। तो क्या पुलिस भी अब हाथ में कैलकुलेटर ले कर चले कि जिसकी जितनी जनसंख्या है, उसी अनुपात में मुकदमे दर्ज होंगे?

यह भी तो हो सकता है कि कोई समुदाय शांतिप्रिय हो, और कोई समुदाय सिर्फ शांतिप्रिय कहलाता हो, लेकिन उपद्रव करने में अग्रणी हो? अगर किसी को झूठे मामले में फँसाया गया हो तो वो तो कोर्ट में साबित हो ही जाएगा, लेकिन न्यायाधीश द्वारा इस पर सवाल उठाने से पहले बेहतर होता कि वे बताते कि उनकी टिप्पणी का आधार क्या है? क्या पुलिस ऐसे मामलों में मजहब के आधार पर भेदभाव करना शुरू कर दे कि ये आदमी फलाँ मजहब का है, और इसके ज्यादा लोग हो रहे हैं, तो इसको न पकड़ा जाए?

मोदी सरकार ने लॉन्च की मोबाइल लैब: अब सुदूर गाँव-कस्बों में भी होगी कोरोना सहित TB और HIV की जाँच

पूरे देश भर में कोरोना के बढ़ते मामलों के मद्देनजर मोदी सरकार ने आज कोरोना टेस्टिंग की रफ्तार को तेजी देने के लिए एक मोबाइल लैब लॉन्च की है। ये मोबाइल लैब कोरोना टेस्टिंग में काम आएगी। गुरुवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने इसे लॉन्च किया है।

अपने ट्विटर पर इसकी जानकारी साझा करते हुए डॉ हर्षवर्धन ने लिखा, “भारत के ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में अंतिम मील परीक्षण को बढ़ावा देने के लिए कोविड-19 के लिए भारत की पहली मोबाइल लैब शुरू की गई।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये दूर-दराज के इलाकों में तैनात होगी। ये मोबाइल लैब प्रतिदिन 25 RT-PCR टेस्ट, 300 ELISA टेस्ट कर सकती है। खास बात ये है कि यह लैब टीबी और एचआईवी की जाँच भी कर सकती है।

इस लैब के लॉन्च के बाद स्वास्थ्य मंत्री ने मीडिया से बातचीत में कहा, “हमारे देश में फरवरी में कोरोना जाँच के लिए सिर्फ 2 ही लैब थी, लेकिन आज हमारे पास 953 लैब हैं। इनमें से करीब 700 लैब सरकारी हैं, ऐसे में अब देश में कोरोना वायरस के टेस्ट ज्यादा होंगे। वहीं इस मोबाइल लैब को लेकर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि दूर-सुदूर के इलाकों में टेस्टिंग के लिए इनका इस्तेमाल किया जाएगा।”

सरकार के मुताबिक, इन लैब का इस्तेमाल ऐसी जगहों के लिए किया जाएगा जहाँ पर लैब की सुविधा नहीं है। यानी गाँव-कस्बों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।

ICMR की ओर से लक्ष्य रखा गया है कि जून के अंत तक देश में रोज करीब 3 लाख टेस्ट किए जाएँ। अभी रोज करीब डेढ़ लाख टेस्ट ही हो रहे हैं। इससे पहले पीएम ने भी टेस्टिंग पर जोर देने की बात कही थी।

जानकारी के लिए बता दें, थर्मल स्क्रीनिंग, वेंटिलेटर, कोविड-19 टेस्ट डिवाइस, 3 डी मास्क वगैरह बनाने वाली आंध्र प्रदेश की कंपनी एएमटीजे ने इसे आई-लैब का नाम दिया है।

‘मीरजाफर’ मिलते गए और चाओ-माओ बढ़ते गए: 1949 तक भारत से लगती भी नहीं थी चीन की सीमा

अमेरिकी लेखक जेम्स बाल्डिवन ने कहा है,

लोग इतिहास में उलझे हैं और इतिहास उनमें कैद है।

गूगल में मीरजाफर सर्च करते ही सबसे ऊपर लिखा आता है- गद्दारी की सबसे बड़ी मिसाल “मीरजाफर” है। असल में मीरजाफर बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला का सेनापति था। ये वो वक्त था जब ब्रिटिश, पुर्तगाली, डच, फ्रेंच सबकी कंपनियॉं भारतीय जमीन पर ठौर तलाश रहीं थीं। सिराजुद्दौला ने सभी कंपनियों को सर्शत व्यापार की अनुमति दी। नियम तोड़ने पर सबको दंड भी एक जैसा ही देता था। अंग्रेजों को ये बर्दाश्त नहीं हुआ।

1757 में प्लासी की लड़ाई हुई। अंग्रेजों की शह पर मीरजाफर ने गद्दारी की और सिराजुद्दौला हार गया। इसके बाद मीरजाफर बंगाल का नवाब बना और अंग्रेजों को मिली ज्यादा से ज्यादा व्यापारिक रियायतें। फिर अंग्रेज कैसे बढ़े और हम गुलाम हुए, इससे हम सब परिचित हैं।

आज के वक्त में किसी भी देश के लिए किसी अन्य राष्ट्र को राजनीतिक तौर पर गुलाम बनाना संभव नहीं रहा। इसलिए अर्थतंत्र के जरिए इस मंसूबे को आगे बढ़ाया जाता है। चीन सालाना भारत को करीब 70 अरब डॉलर का निर्यात करता है। लेकिन ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों से उसके व्यापारिक हितों को नुकसान पहुँचना तय है।

भारत ने सभी 61 सीमा सड़क 2022 तक पूरा करने का लक्ष्य तय कर रखा है। वह लद्दाख में सबसे ऊँचा पुल बना रहा है। केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का जो नक्शा जारी किया गया है, उसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला पीओके और चीनी कब्जे वाला अक्साई चीन भी शामिल है।

ये सब चीन की चिंताएँ बढ़ाने वाली हैं। भारत जैसे बड़े बाजार में संभावनाएँ सीमित होने का मतलब है, अरबों डॉलर का नुकसान और लाखों लोगों का बेरोजगार होना।

भारत के बाजार में चीन कैसे पैर पसार रहा है इसे आप नीचे दिए गए ग्राफ से समझ सकते हैं;

साभार: पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री

जिस तरह मोदी सरकार ने पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सुधारने के लिए लीक से हटकर प्रयास किए थे, वैसा ही चीन के साथ भी किया। बतौर पीएम मोदी पॉंच बार चीन की यात्रा पर गए। यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की सर्वाधिक चीनी यात्रा है। वे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से 18 बार मुलाकात भी कर चुके हैं।

लेकिन, मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही बाजार को लेकर अपने इरादे भी स्पष्ट कर दिए। इसी कड़ी में सितंबर 2014 में भारतीय कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ की पहल की गई। पिछले दिनों कोरोना संकट को अवसर में बदलने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ की शुरुआत की गई। ये सब पहले सीधे चीन के व्यापारिक हितों को चोट पहुॅंचाते हैं। दुनिया का साहूकार बनने के फेर में चीन ने इतने कर्जे बाँटे हैं कि यदि भारत का बाजार हाथ से निकल गया तो उसकी अर्थव्यवस्था का बुलबुला झटके में फूट जाएगा।

इन सबसे अपनी जनता का ध्यान बँटाने के लिए चीन के पास दो ही विकल्प बचते हैं। पहला, भारत को सीमा विवाद में उलझाकर रखा जाए, जिसकी कुव्वत उसे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दरियादिली से मिली है। दूसरी, अंग्रेजों की तरह मीरजाफर खड़े किए जाएँ।

ऐसे में ताज्जुब नहीं होता कि गालवन में चीनी धूर्तता के बाद राहुल गाँधी ने भारत सरकार से ही सवाल पूछ लिए।

असल में चीन जैसी छटपटाहट सत्ता सुख की आदी कॉन्ग्रेस में भी दिखती है। 2014 के बाद से वह लगातार सिकुड़ती, कमजोर होती जा रही है। इसी छटपटाहट में राहुल गाँधी गुपचुप चीनी दूतावास तब चले जाते हैं, जब डोकलाम में भारत और चीन के बीच गतिरोध चल रहा होता है। पहले इस मुलाकात से इनकार किया जाता है, लेकिन सबूत सामने आते हैं तो सफाई दी जाती है।

अगस्त 2008 में कॉन्ग्रेस ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से सूचनाओं के लेन-देन को लेकर बकायदा एक समझौता किया था। उस समय कॉन्ग्रेस की कमान सोनिया गॉंधी के हाथ में थी और मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। यह समझौता तब किया गया था जब वामपंथी वैसाखी के सहारे चल रही UPA-1 की सरकार में भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने विश्वास की कमी व्यक्त की थी।

ऐसा नहीं है कि चीन की मक्कारी से कॉन्ग्रेस परिचित नहीं है। या फिर चीन से नरमी उसका नया दृष्टिकोण है। यह नेहरू के जमाने से ही है।

1 अक्टूबर 1959 को मु​ख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा था, “भारत और चीन के बीच जो तनाव पैदा हो गया है, वह निश्चित तौर पर हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है। इसका मतलब यह नहीं कि हम बहुत अलार्म हो जाएँ या फिर बहुत गंभीर खतरों के बारे में सोचने लगें। मुझे निकट भविष्य में ऐसी कोई गतिविधि नजर नहीं आती, लेकिन बुनियादी तथ्य यही है कि भारत और चीन अलग हो गए हैं। और भले ही सरहद पर अपेक्षाकृत शांति बनी रहे, यह एक तरह की फौजी शांति ही होगी और भविष्य में लगातार तनाव बने रहने की आशंका दिखाई देती है। असल में यह भविष्य ही है जो मुझे ज्यादा परेशान कर रहा है, क्योंकि इसके कारण हमारे देश को मानसिक और भौतिक दोनों तरह के तनाव में रहना पड़ेगा।”

बावजूद 1962 हुआ। लेकिन इसके बाद भी चीन को लेकर कॉन्ग्रेस का ममत्व कम नहीं हुआ। यह नेहरू ही थे जिसके कारण भारत की सीमा तक चीन पहुॅंचा। वरना 1949 तक तो उसकी सीमाएँ भी भारत से नहीं लगती थीं।

1949 में कम्युनिस्टों का शासन स्थापित होने के बाद चीन ने ताइवान से समाजवादियों को खदेड़ दिया। 1950 में तिब्बत पर चढ़ाई कर दी। वह तिब्ब्त जो भारत और चीन के बीच बफर स्टेट था। वह तिब्बत जो 1000 साल से भी ज्यादा लंबे वक्त से भारत का सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक पड़ोसी था।

इतने अहम तिब्ब्त पर जब चीन ने चढ़ाई की तो भारत क्या कर रहा था?

फ्रांसीसी मूल के लेखक, पत्रकार और तिब्बत की इतिहास के जानकार क्लाउडे अर्पी (Claude Arpi) ने ‘विल तिब्बत एवर फाइंड हर सोल अगेन (Will Tibet ever find her soul again)’ में लिखा है कि उस वक्त नेहरू का भारत तिब्बत में घुसी चीनी सेना के लिए चावल का सप्लाई कर रहा था। भारतीय चावल खाकर चीनी सेना ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया।

गौर करने वाली बात यह है कि तिब्बत से एशिया की 9 बड़ी नदियों का उद्गम होता है। इस पर कब्जे से नदियों के जल पर कम्युनिस्टों का नियंत्रण हो गया। लेकिन, कॉन्ग्रेस का चीन से ममत्व कमजोर नहीं पड़ा।

उसने UNSC (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) की स्थायी सदस्यता चीन को उपहार में दी। असल में 1953 में स्थायी सदस्यता की पेशकश भारत को ही हुई थी। लेकिन नेहरू ने इसे अस्वीकार करते हुए चीन को UNSC की स्थायी सदस्यता की वकालत की थी।

इस बारे में सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ नेहरू में सर्वपल्ली गोपाल, खंड 11 के पेज संख्या 248 में लिखा है, “नेहरू ने सोवियत संघ की भारत को UNSC के छठे स्थायी सदस्य के रूप में प्रस्तावित करने की पेशकश को ठुकराते हुए कहा था कि भारत की जगह इसमें चीन को स्थान मिलना चाहिए।”

कॉन्ग्रेस की ऐतिहासिक भूलों का वह सिलसिला आज भी जारी है। इसका क्या कारण हो सकता है?

जब ऊपर जिक्र किए गए कड़ियों को हम जोड़ने की कोशिश करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि कॉन्ग्रेस और चीन के बीच एक अघोषित साँठगाँठ है। तुम सत्ता दोबारा हासिल करने में हमारी मदद करो और हम तुम्हें और बड़ा बजार भुनाने का मौका देंगे। कुछ-कुछ वैसा ही जिस तरह की डील मीरजाफर और अंग्रेजों के बीच हुई थी।

यह चीन के लिए भी फायदे का सौदा है, क्योंकि वह बखूबी जानता है कि लद्दाख में भारत के साथ परंपरागत युद्ध छिड़ने पर सप्लाई लाइन के हिसाब से भारतीय थल सेना और वायु सेना को उस पर बढ़त हासिल है। यह बढ़त तब और मजबूत होगी, जब सीमाई इलाकों में भारतीय परियोजनाएँ समय से पूरी हो जाएँगी। जब भारत के बाजार में चीन भरभरा कर गिरेगा, तो वह अपने ही लोगों के असंतोष से कुचला जाएगा।

यह असंतोष न चीन के कम्युनिस्टों के हक में होगा और न भारत के वामपंथियों और उनके पोषक कॉन्ग्रेस के हित में। इसलिए, नानजिंग के प्रेसिडेंशियल पैलेस और जनपथ की बेचैनियाँ आज एक सी दिख रहीं।

CSK के निलंबित टीम डॉक्टर ने माँगी माफी, बलिदानी सैनिकों पर किया था घटिया ट्वीट

बलिदानी सैनिकों पर घटिया ट्वीट के लिए डॉक्टर डॉ. मधु थोट्टापपिल्लई (Dr. Madhu Thottappillil) ने माफी मॉंगी है। इस ट्वीट के बाद आईपीएल फ्रेंचाइजी चेन्नई सुपरकिंग्स (CSK) ने टीम डॉक्टर को निलंबित कर दिया था।

डॉ. मधु ने लद्दाख क्षेत्र में 20 भारतीय सैनिक के बलिदान की खबरों के सामने आने के बाद ‘पीएम केयर्स’ पर कटाक्ष करते हुए अपने ट्वीट में लिखा था, “मैं ये जानने को उत्सुक हूँ कि जो ताबूत वापस आएँगे क्या उस पर ‘पीएम केयर’ का स्टीकर लगा होगा?”

अब माफ़ी माँगते हुए कहा है, “16 जून को, मैंने एक ट्वीट किया था, जिसके बाद मैंने यह महसूस किया कि मेरे द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द अनुचित और अनपेक्षित थे। मैंने उस ट्वीट को डिलीट कर दिया। लेकिन तब तक मेरे ट्वीट के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया में सर्कुलेट और शेयर किए जा चुके थे।”

उन्होंने लिखा है, “मेरा इरादा सेना और हमारे साहसी शहीदों और इस महान देश के सभी नागरिकों का ध्यान रखने में वाले माननीय प्रधानमंत्री मोदी और सरकार के प्रयासों को विफल करने का नहीं था।”

थोट्टापपिल्लई ने कहा है कि वह समझ सकते हैं कि उनकी पोस्ट ने हजारों लोगों की भावनाओं को चोट पहुँचाई है। उन्होंने लिखा, ‘‘मुझे खेद है कि मेरे ट्वीट को पढ़ने वाले लोगों को मैंने पीड़ा पहुँचाई और नाराज किया और इसके लिए तहेदिल से माफी माँगता हूँ। मैंने अनजाने में और गलती से ट्वीट किया। इसका किसी व्यक्ति या संगठन से मेरे जुड़ाव का कोई लेना-देना नहीं है।’’

उन्होंने आगे कहा, ” मैं यह बात जानती हूँ कि प्रधनमंत्री हमारे देश के बलिदानी सैनिकों की देखभाल का पूरा ध्यान रख रहे हैं। जिन्होंने देश की सेवा में अपनी जान न्यौछावर कर दिया हैं। जिनके बिना हम नागरिक सुरक्षित जीवन नहीं गुजार सकते हैं।”

क्या था मामला

दरअसल आईपीएल की टीम चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) की टीम के डॉक्टर डॉ मधु थोट्टापपिल्लई ने अपने आधिकारिक ट्विटर एकाउंट से भारतीय सेना की चीनी सैनिकों से झड़प में बलिदानी भारतीय सैनिकों के बारे में ‘पीएम केयर्स फंड’ (PM CARES Fund) पर कटाक्ष करते हुए ट्वीट किया था। इस ट्वीट को लेकर सोशल मीडिया में लोगों ने नाराजगी दिखाई थी। जिसके बाद डॉ मधु ने यह ट्वीट डिलीट कर दिया था। हालाँकि, उसके स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया में वायरल हो गए थे।

ट्वीट पर विवाद बढ़ता देख मधु ने अपना ट्विटर अकाउंट लॉक कर दिया था। इस ट्वीट को लेकर कई ट्विटर यूजर्स ने चेन्नई सुपरकिंग्स से शिकायत की और कहा कि ये शर्म की बात है कि मेडिकल पेशे से जुड़ा एक शख्स इतना असंवेदनशील हो सकता है और भारतीय सेना के जवानों की मौत पर मजाक बना रहा है।

विवाद बढ़ने के बाद आईपीएल की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स ने इसका जवाब देते हुए कहा था कि – “चेन्नई सुपर किंग्स प्रबंधन को डॉ मधु थोट्टापपिल्लई के व्यक्तिगत ट्वीट की जानकारी नहीं थी। उन्हें टीम डॉक्टर के रूप में उनके पद से निलंबित कर दिया गया। चेन्नई सुपरकिंग्स को उनके ट्वीट पर खेद है जो प्रबंधन की जानकारी के बिना किया गया और यह दुर्भावनापूर्ण था।”

उल्लेखनीय है कि अक्साई चीन क्षेत्र के गलवान घाटी में भारतीय सेना और चीनी सेना के बीच हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि 43 चीनी सैनिकों के मरने की खबर भी सामने आई हैं।

ऐसे में डॉ. मधु ने उस फंड पर निशाना साधने का प्रयास किया था, जिस ‘पीएम केयर्स फंड’ (PM CARES Fund) कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ लड़ाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से दान करने की अपील की थी, इसमें कई लोगों ने बड़ी मात्रा में अपना सहयोग दिया है जो कि विपक्ष के साथ ही मीडिया के लिए भी बड़ा सरदर्द बनकर उभरा है।

हर दिन मंदिर में काटी गाय, गिराए दसियों मंदिर: मोइनुद्दीन चिश्ती और उसके शागिर्दों का सच

अधिकांश सूफी संत या तो इस्लामिक आक्रांताओं की आक्रमणकारी सेनाओं के साथ भारत आए थे, या इस्लाम के सैनिकों द्वारा की गई कुछ व्यापक विजय के बाद। लेकिन इन सबके भारत आने के पीछे सिर्फ एक ही लक्ष्य था और वह था इस्लाम का प्रचार। इसके लिए उलेमाओं के क्रूरतम आदेशों के साथ गाने-बजाने की आड़ में हिन्दुओं की आस्था पर चोट करने वाले ‘संतों’ से बेहतर और क्या हो सकता था?

‘शांतिपूर्ण सूफीवाद’ का मिथक, कई सदियों तक इस्लामिक ‘विचारकों’ और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा खूब फैलाया गया है। वास्तविकता इन दावों से कहीं अलग और विपरीत है। वास्तविकता यह है कि इन सूफी संतों को भारत में इस्लामिक जिहाद को बढ़ावा देने, ‘काफिरों’ के धर्मांतरण और इस्लाम को स्थापित करने के उद्देश्य से लाया गया था।

इसी में एक सबसे प्रसिद्ध नाम आता है ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती (Khwaja Moinuddin Chishti) का, जिन्हें कि हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के नाम से भी पुकारा जाता है। सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ईरान में हुआ था, लेकिन उन्हें राजस्थान के अजमेर में दफनाया गया था।

‘काफिरों’ को लेकर सूफीवाद के महानतम विद्वानों का दृष्टिकोण ISIS के दृष्टिकोण से अलग है, यह कहना एकदम गलत है। इसका उदाहरण सूफी विचारधारा के सबसे बड़े प्रतीक माने जाने वाले मोइनुद्दीन चिश्ती और औलिया हैं, जिन्होंने वो काम सदियों पहले कर दिया था, जिसे ISIS और कट्टर इस्लामिक संगठन आज की सदी में कर रहे हैं।

इतिहासकार एमए खान ने अपनी पुस्तक ‘इस्लामिक जिहाद: एक जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत’ (Islamic Jihad: A Legacy of Forced Conversion, Imperialism, and Slavery) में इस बारे में विस्तार से लिखा है कि मोइनुद्दीन चिश्ती, निज़ामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग और शाह जलाल जैसे सूफी संत जब इस्लाम के मुख्य सिद्धांतों की बात करते थे, तो वे वास्तव में रूढ़िवादी और असहिष्णु विचार रखते थे, जो कि मुख्यधारा के जनमत के विपरीत था।

एमए खान की पुस्तक का अंश

उदाहरण के लिए, सूफी संत मोईनुद्दीन चिश्ती और औलिया इस्लाम के कुछ पहलुओं जैसे- नाच (रक़) और संगीत (सामा) को लेकर उदार थे, जो कि उन्होंने रूढ़िवादी उलेमा के धर्मगुरु से अपनाया, लेकिन एक बार भी उन्होंने कभी हिंदुओं के उत्पीड़न के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। औलिया ने अपने शिष्य शाह जलाल को बंगाल के हिंदू राजा के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए 360 अन्य शागिर्दों के साथ बंगाल भेजा था।

इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र किया है गया है कि वास्तव में, हिंदुओं के उत्पीड़न का विरोध करने की बात तो दूर, इन सूफी संतों ने बलपूर्वक हिंदुओं के इस्लाम में धर्म परिवर्तन में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। यही नहीं, ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्दों ने हिंदू रानियों का अपहरण किया और उन्हें मोईनुद्दीन चिश्ती को उपहार के रूप में प्रस्तुत किया।

गौरी के साथ भारत आकर अजमेर में लगाया था डेरा

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि चिश्ती, शाह जलाल और औलिया जैसे सूफी ‘काफिरों’ के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए भारत आए थे। उदाहरण के लिए- मोइनुद्दीन चिश्ती, मुइज़-दीन मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत आए और गोरी द्वारा अजमेर को जीतने से पहले वहाँ गोरी की तरफ से अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए अजमेर में बस गए थे। यहाँ उन्होंने पुष्कर झील के पास अपने ठिकाने स्थापित किए।

प्रतिदिन गाय का वध और मंदिरों को अपवित्र करते थे चिश्ती के शागिर्द

मध्ययुगीन लेख ‘जवाहर-ए-फरीदी’ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि किस तरह चिश्ती ने अजमेर की आना सागर झील, जो कि हिन्दुओं का एक पवित्र तीर्थ स्थल है, पर बड़ी संख्या में गायों का क़त्ल किया, और इस क्षेत्र में गायों के खून से मंदिरों को अपवित्र करने का काम किया था। मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय का वध करते थे और मंदिर परिसर में बैठकर गोमांस खाते थे।

इस अना सागर झील का निर्माण ‘राजा अरणो रा आनाजी’ ने 1135 से 1150 के बीच करवाया था। ‘राजा अरणो रा आनाजी’ सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता थे। आज इतिहास की किताबों में अजमेर को हिन्दू-मुस्लिम’ समन्वय के पाठ के रूप में तो पढ़ाया जाता है, लेकिन यह जिक्र नहीं किया जाता है कि यह सूफी संत भारत में जिहाद को बढ़ावा देने और इस्लाम के प्रचार के लिए आए थे, जिसके लिए उन्होंने हिन्दुओं के साथ हर प्रकार का उत्पीड़न स्वीकार किया।

मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेर

यहाँ तक कि आज भी इन सूफी संतों की वास्तविकता से उलट यह बताया जाता है कि ये क़व्वाली, समाख्वानी, और उपन्यासों द्वारा लोगों को ईश्वर के बारे में बताकर उन्हें मुक्ति मार्ग दर्शन करवाते थे। लेकिन तत्कालीन हिन्दू राजाओं के साथ इनकी झड़प और उनके कारणों का जिक्र शायद ही किसी इतिहास की किताब में मिलता हो।

पृथ्वीराज चौहान की जासूसी और उन्हें पकड़वाने में चिश्ती की भूमिका

खुद मोइनुद्दीन चिश्ती ने तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को पकड़ लिया था और उन्हें ‘इस्लाम की सेना’ को सौंप दिया। लेख में इस बात का प्रमाण है कि चिश्ती ने चेतावनी भी जारी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था – “हमने पिथौरा (पृथ्वीराज) को जिंदा पकड़ लिया है और उसे इस्लाम की सेना को सौंप दिया है।”

हिन्दू राजा की बेटी ‘बीबी उमिया’ का अपहरण और निकाह

मोइनुद्दीन चिश्ती का एक शागिर्द था मलिक ख़ितब। उसने एक हिंदू राजा की बेटी का अपहरण कर लिया और उसे चिश्ती को निकाह के लिए ‘उपहार’ के रूप में प्रस्तुत किया। चिश्ती ने खुशी से ‘उपहार’ स्वीकार किया और उसे ‘बीबी उमिया’ नाम दिया।

लेकिन संयोगवश ‘सूफी संत’ मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में इतिहास में दर्ज ये तथ्य बॉलीवुड की फिल्मों, गानों, सूफी संगीत और वामपंथी इतिहास से एकदम अलग हैं।

सिर्फ इस्लाम की स्थापना था उलेमा और सूफी संतों का लक्ष्य

अपनी पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम शासन की विरासत’ (Legacy of Muslim Rule in India) में इतिहासकार केएस लाल ने लिखा है, “मुस्लिम मुशाहिक (सूफी आध्यात्मिक नेता) उलेमाओं की तरह ही धर्मांतरण को लेकर उत्सुक थे, और सूफी ‘संतों’ को लेकर आम धारणा के विपरीत, हिंदुओं के प्रति दयालु होने के स्थान पर, वे चाहते थे कि यदि इस्लाम अपनाने से इनकार करते हैं तो उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर रखा जाए।”

‘द सिनिस्टर साइड ऑफ सूफीवाद’ में, लेखक राम ओहरी ने लिखा है, “कोई भी मुगल, न ही कोई सूफी, कभी भी हिंदू मंदिर में पूजा करने के लिए सहमत नहीं हुआ है, और न ही हिंदू देवी-देवताओं की छवियों के सामने कोई सम्मानपूर्वक तरीके से पेश आया है।”

भारतीय सेना पर जिस कँटीले तारों वाले हथियार से हमला हुआ, जिसने कर्नल संतोष की जान ली…

गलवान घाटी पर चीन की सेना ने जो धोखा किया, उसके कारण भारतीय सेना ने अपने कम से कम 20 जवान खोए। लेकिन सीमा पर खड़े चीनी सैनिकों को इस दौरान भारत की ओर से मुँहतोड़ जवाब मिला। नतीजतन उनके कमांडिग ऑफिसर समेत 43 सैनिक मारे गए। हालाँकि, पहले इस झड़प को लेकर मीडिया में स्पष्ट सूचना नहीं आ रही थी। मगर, अब धीरे-धीरे सब साफ हो रहा है।

इस बीच एक हथियार की तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई। जिसे लेकर दावा किया जा रहा था कि इन्हीं हथियारों से चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर हमला किया। लेकिन आर्मी ने यह स्पष्ट किया कि ये हथियार वो नहीं है, जिससे हमला हुआ। लेकिन ये इस बात की तरफ भी इशारा किया गया कि इसी तरह के हथियारों से चीन ने भारतीय सैनिकों पर वार किया।

गौरतलब है कि लद्दाख के गलवान घाटी में जो हुआ वो संक्षेप में कुछ यूँ है कि जब दोनों ही सेनाओं के सीनियर अफसरों के बीच, सेना को पीछे ले जाने पर समझौता हो गया, तो कुछ भारतीय सेना के जवान और अफसरों ने, बिना किसी हथियार के चीनी सैनिकों द्वारा बनाए गए कैंप की तरफ जा कर हटने को कहा।

चीनी सैनिकों ने इस बात पर पत्थरबाजी कर दी और कमाडिंग ऑफिसर, कर्नल संतोष समेत भारतीय पार्टी पर कँटीले तारों से लिपटे डंडे आदि से बुरी तरह हमला किया। जब तक भारतीय खेमे तक बात पहुँचती, भारतीय सैनिकों को चीनी सेना के दूसरे कैंप से आए सैनिकों ने घेर लिया था। कर्नल संतोष वीरगति को प्राप्त हो चुके थे।

दोनों तरफ से झड़प होती रही और यह बड़े इलाके में फैल गई। घाटी के नीचे तेज बहती नदी में कई जवान गिरे और दोनों ही तरफ से सैनिक बलिदान हुए। बाद में 17 घायल सैनिकों ने भयावह ठंड और ऑक्सीजन की कमी वाली इस ऊँचाई पर अपने जख्मों से लड़ते हुए अंतिम साँस ली।

चीन ने अभी तक आधिकारिक आँकड़ा नहीं दिया है और उसकी प्रोपेगेंडा साइट यह बताने में लगी हुई है कि भारत ही उनके इलाके में घुस आया था और चीन की सेना डरपोक नहीं है, मुँहतोड़ जवाब देगी। अलग-अलग सूत्रों से पता लगा है कि चीन के कम से कम 43 जवान मरे हैं और यह संख्या बढ़ भी सकती है।

‘ईद, रमजान पर कुछ नहीं कहा’: सुप्रीम कोर्ट द्वारा रथयात्रा रोकने पर सोशल मीडिया में बवाल

सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए फैसला दिया है कि कोरोना महामारी के फैलने के डर और लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए जगन्नाथ मंदिर में होने वाली वार्षिक रथयात्रा ना निकाली जाए।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सोशल मीडिया में लोगों ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर हमने इस साल रथयात्रा की इजाजत दे दी तो भगवान जगन्नाथ हमें माफ नहीं करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए इस फैसले के बाद लोगों में भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर पर कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की तुलना ईद और रमजान से करते हुए आपत्ति जताई है।

संदीप सिंह ने ट्विटर पर इस फैसले पर नाराजगी व्यक्त करते हुए लिखा – “सुप्रीम कोर्ट ने रमजान और ईद के लिए कुछ नहीं कहा। अगर सुप्रीम कोर्ट पक्षपाती है तो उसका पालन क्यों?”

एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा है – सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रसिद्ध जगन्नाथ यात्रा को रद्द किया जाना बहुत दुखद समाचार है। जब मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि खुल सकते हैं तो इसे रद्द क्यों किया गया। कृपया इसकी समीक्षा करें। हम सोशल डिस्टेंसिंग के साथ उत्सव मनाना चाहते हैं। 40 से 50 ही रथ यात्रा में जुट सकते हैं।

जगन्नाथ मंदिर रथ यात्रा को स्थगित करने के फैसले से लोग निराश हैं। कुछ लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले से दूर रहना चाहिए वहीं कुछ ट्विटर यूजर्स ने लिखा है कि इस मामले पर एक पुनर्विचार याचिका दायर की जानी चाहिए।

दरअसल, मंदिर प्रशासन ने राज्य सरकार से बिना भक्तों के रथयात्रा निकालने की अनुमति भी माँगी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगने के बाद से सरकार ने कोई गाइड लाइन जारी नहीं की थी।

गौरतलब है कि भुवनेश्वर के ओडिशा विकास परिषद एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर कर कहा कि रथयात्रा से कोरोना फैलने का खतरा हो सकता है। इसमें कहा गया था कि अगर लोगों की सेहत को ध्यान में रखकर कोर्ट दीपावली पर पटाखे जलाने पर रोक लगा सकता है तो फिर रथयात्रा पर रोक क्यों नहीं लगाई जा सकती?

चायनीज ‘धोखेबाजी वार’ से बचाव के लिए भारतीय सैनिकों को सुरक्षा कवच, पहला खेप पहुँचा लेह

15 जून को पीएलए के साथ गालवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए। इनमें से अधिकतर सैनिकों पर स्पाइक-स्टडेड क्लबों (ऐसे डंडे जिनमें कीलें धँसी थीं या कंटीली तारों से बँधे थे) से हमला किया गया था।

इस झड़प को देखते हुए सेना के उत्तरी कमान ने अपने सैनिकों को हल्के दंगा गियर से लैस करना शुरू कर दिया है। इन बॉडी प्रोटेक्टर्स में गद्देदार पॉली कार्बोनेट मटीरियल होते हैं और यह पहनने वालों को धारदार चीजों और पत्थरों से बचाता है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक फुल-बॉडी प्रोटेक्टर्स के 500 सेट की पहली खेप हवाई जहाज से लेह के लिए ले जाया गया। मुंबई के सप्लायर से लिए गए यह सूट एलएसी पर तैनात सैनिकों के बीच वितरित किया जाना है।

संदीप उन्नीथन की रिपोर्ट के मुताबिक एक वरिष्ठ सैन्य विश्लेषक ने यह जानकारी दी। सैनिकों के वीरगति को प्राप्त होने पर चिंता व्यक्त करते हुए सैन्य विश्लेषक ने अपना नाम न छापने की शर्त पर पर बताया कि सैनिकों को दंगा नियंत्रण वाली किट दी जा रही है। ऐसा करके जवानों की मानसिकता को पुलिसकर्मियों की तरह बनाया जा रहा है।

सेना की योजना एलएसी पर तैनात अपने सैनिकों को नुकीले क्लबों से लैस करने की भी है। इससे LAC पर तैनात सैनिक आगे से और भी सतर्क रहेंगे और धोखा नहीं खाएँगे।

15 जून को भारतीय सैनिकों पर धोखे से किए गए हमले के दौरान भी पीएलए (चीन) के सैनिक स्पाइक्स (ऐसे डंडे जिनमें कीलें धँसी थीं या कंटीली तारों से बँधे थे) से लैस थे। भारतीय सैनिक तब हैरान रह गए थे, जब पिछले महीने पीएलए के सैनिकों ने पैंगोंग झील के किनारे हुई झड़पों में भारतीय सैनिकों को निशाना बनाने के लिए कंटीले तारों से लिपटे क्लबों का इस्तेमाल किया था। उस दौरान कई भारतीय सैनिक घायल और कुछ गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

वैसे देखा जाए तो आधुनिक युद्ध में मध्यकालीन हथियारों का उपयोग कोई नया नहीं है। पिछली शताब्दी में हुए प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए तात्कालिक हथियारों में विशेष प्रकार के चाकू भी शामिल थे। इन्हें एक जड़े हुए धातु के हैंडगार्ड में लंबा चाकू और काँटेदार तार लगाकर गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाने के लिए डिज़ाइन किया गया था।

भारत और चीन के बीच हुए कई समझौतों में से एक प्रमुख प्रावधान को दरकिनार करते हुए पीएलए के सैनिकों ने बिना किसी गोली के भारतीय सैनिकों की जान ले ली। सीमाओं पर शांति कायम रखने के लिए दोनों पक्षों की ओर से फायरिंग करने वाले हथियारों को न रखने पर सहमति बनी थी। आखिरी बार भारत-चीन सीमा पर 45 साल पहले गोली चली थी। तब पीएल के एक गश्ती दल ने असम राइफल्स की एक टुकड़ी पर घात लगाकर हमला कर चार सैनिकों की हत्या कर दी थी।

1993 में भारत-चीन सीमा समझौते के बाद से सीमा पर हथियारों को नहीं दिखाया जाता है। इतना ही नहीं, अभ्यास के दौरान भी राइफल की नाल को जमीन की ओर झुकाकर पीठ पीछे रखा जाता है। इसके बाद भी सीमा पर हुए गतिरोधों के दौरान धक्का-मुक्की के साथ सैनिकों के बीच झड़पें तो देखने को मिलती रही हैं, लेकिन किसी ने भी अपने हथियार से गोलीबारी नहीं की।

इन सब के बीच 15 जून को हुई घटना ने सारी सीमाओं को लाँघ दिया। 16 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो-कॉन्फ्रेंस के जरिए राज्य के मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए एक तरह से पूरे देश को संबोधित कर कहा, “हमारे जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।”

चीन के साथ कॉन्ग्रेस ने किया था ‘गुप्त’ समझौता… 2008 से लेकर कई बार हुई गुपचुप मुलाकात: पढ़ें खुलासा

भारत और चीन सेना के बीच हुई आपसी झड़प में भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। वहीं चीन ने भी कमांडिग ऑफिसर समेत अपने 40 से ज्यादा सैनिकों को खोया। इस बीच भारत सरकार लगातार तनाव को खत्म करने की कोशिशों में जुटी रही। लेकिन विपक्ष ने राष्ट्रीय सुरक्षा मामले पर केवल राजनीति खेली और चीन पर बिलकुल मौन रहीं। ऐसा क्यों?

पूरे मामले पर यदि गौर करें। तो पता चलता है वह कॉन्ग्रेस पार्टी जो भारत-चीन मामले पर लगातार मोदी सरकार की आलोचना कर रही थी। उसी कॉन्ग्रेस पार्टी के चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी के साथ गहरे संबंध हैं। जो स्पष्ट बताते हैं कि कॉग्रेस ने आखिर हमेशा चीन के प्रति अपना रवैया इतना नरम क्यों रखा? और क्यों भारतीय सेना पर हमला करने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने कभी चीन को लेकर एक शब्द नहीं बोला? जबकि दूसरी ओर अपने देश की सरकार पर सवाल उठाते रहे।

कॉन्ग्रेस ने ‘महत्वपूर्ण मुद्दों’ पर परामर्श के लिए CCP के साथ एक समझौते पर किए थे हस्ताक्षर

7 अगस्त 2008 को सोनिया गाँधी की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस और चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी के बीच एक समझौता हुआ था। शायद आज वही वजह है कि कॉन्ग्रेस चीन की नापाक हरकतों पर भी चुप्पी साधे हुए है। यूपीए के अपने पहले कार्यकाल के दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना ने उच्च स्तरीय सूचनाओं और उनके बीच सहयोग करने के लिए बीजिंग में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 

इस समझौता ज्ञापन ने दोनों पक्षों को महत्वपूर्ण द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विकास पर एक-दूसरे से परामर्श करने का अवसर प्रदान किया। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि 2008 में CCP और कॉन्ग्रेस के बीच समझौता ज्ञापन उस समय आया जब भारत में वामपंथी दलों ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली UPA-1 सरकार में विश्वास की कमी व्यक्त की थी।

खासबात यह है कि इस समझौता ज्ञापन को तत्कालीन कॉन्ग्रेस पार्टी के मुख्य सचिव राहुल गाँधी ने सोनिया गाँधी की उपस्थिति में साइन किया था। जबकि चीन की ओर से इसे स्वयं वहाँ के वर्तमान प्रधानमंत्री शी जिनपिंग ने हस्ताक्षर किया था। उस समय जिनपिंग पार्टी के उपाध्यक्ष थे। 

इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने से पहले सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी की शी जिंनपिंग के साथ आपसी हित के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए लंबी बैठक हुई थी।

साल 2008 में सोनिया गाँधी अपने बेटे राहुल, बेटी प्रियंका, दामाद रॉबर्ट वाड्रा और दोनों के बच्चों को साथ लेकर ओलंपिक खेल देखने पहुँची थीं। इसके अलावा उन्होंने और राहुल गाँधी ने चीन में कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया था।

राहुल गाँधी और चीन के संबंध

बात सिर्फ़ इस समझौते ज्ञापन की नहीं है। राहुल के संबंध चीन के साथ कुछ समय पहले डोकलाम विवाद पर भी उजागर हुए थे। जब उन्होंने चीन के साथ एक नहीं दो बार गुप्त बैठकें की थी।

पहली मीटिंग 2017 में हुई थी, जब उन्होंने चीनी राजदूत लुओ झाओहुई के साथ उस समय बैठक की थी, जब भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद छिड़ा था।

इस बैठक के संबंध में पहले तो कॉन्ग्रेस ने साफ इंकार कर दिया था। लेकिन जब चीन की एंबेसी ने खुद इसका खुलासा किया, तो कॉन्ग्रेस को इस मुद्दे पर काफी जिल्लत झेलनी पड़ी थी। यह बैठक विशेष रूप से संदिग्ध इसलिए भी थी, क्योंकि उस समय कॉन्ग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी, चीन के साथ चल रहे सैन्य गतिरोध पर अपने रुख पर कायम रहते हुए भारत सरकार पर तीखे हमले कर रहे थे।

इसके बाद कैलाश मानसरोवर मामले पर चीन के नेताओं से हुई गुप्त बैठक के बारे में तो राहुल गाँधी ने खुद ही खुलासा कर दिया था। राहुल उस समय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। जिसके कारण उनका इस तरह चीन अधिकारियों व नेताओं से बैठक करने ने कई सवाल खड़े कर दिए थे।

एक अन्य दिलचस्प कोण कॉन्ग्रेस और चीन के बीच का और देखिए। LAC पर भारतीय सेना पर आक्रमक रवैया रखने के कारण पार्टी नेता अधीर रंजन चौधरी ने चीन को लेकर लोकसभा में अपना गुस्सा जाहिर किया था। साथ ही भारतीय नेताओं को सराहते हुए चीन को चुनौती भी दी थी।

मगर, कुछ समय बाद अधीर रंजन चौधरी को चीन के ख़िलाफ़ अपने रवैया हल्का करना पड़ा और चीन पर किया अपना ट्वीट भी डिलीट करना पड़ा। ये शायद इसलिए हुआ क्योंकि चीन के ख़िलाफ़ अपने नेता के बोल कॉन्ग्रेस पार्टी को ही नहीं पसंद आए। जिसके मद्देनजर  राज्य सभा सदस्य और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता आनंद शर्मा ने सोशल मीडिया पर यह सफाई तक दी।

उन्होंने लिखा, “भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस भारत और चीन के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी को मान्यता और महत्व देती है। दुनिया की दो प्राचीन सभ्यताओं और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में, दोनों देशों को 21 वीं शताब्दी में एक महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए नियत किया गया है।”

कॉन्ग्रेस नेता ने आगे सफाई में लिखा, “चीन के बारे में कॉन्ग्रेस के लोकसभा नेता अधीर रंजन चौधरी के विचार उनके अपने हैं और पार्टी की स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।”