Home Blog Page 4755

मुकेश अंबानी के एंटीलिया को कब्जे में लेकर बना दो क्वारंटाइन सेंटर: BMC को CPI नेता प्रकाश रेड्डी ने लिखा खत

सीपीआई (CPI) ने बीएमसी (BMC) से मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया को अपने कब्जे में लेकर उसे क्वारंटाइन सेंटर में बदल देने को कहा है। इस संबंध में सीपीआई के मुंबई काउंसिल के सचिव प्रकाश रेड्डी ने बीएमसी को पत्र लिखा है।

बीएमसी को लिखे पत्र में रेड्डी ने कहा है कि मुकेश अंबानी के एंटीलिया टॉवर में 22 मंजिलें हैं। इसमें परिवार के केवल पाँच सदस्य रहते हैं। इनमें से प्रत्येक सदस्य के पास रहने के लिए एक मंजिल है। इसके बाद भी टॉवर में 17 मंजिलें शेष बचती हैं। शेष सभी मंजिलों को क्वारंटाइन सेंटर में तब्दील कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि शहर में कई भव्य बंगले और टॉवर हैं जिनका उपयोग बीएमसी कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए कर सकती है।

पत्र के माध्यम से प्रकाश रेड्डी ने बताया कि बीएमसी ने हाल ही में कोरोना वायरस मरीजों की सुविधा के लिए स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी (एसआरए) द्वारा पुनर्विकसित किए गए शेंटी टाउन और झुग्गियों को अपने नियंत्रण में लिया था। इसकी राजनीतिक गलियारे में बहुत चर्चा रही।

रेड्डी ने दावा किया कि यह झुग्गीवासियों के साथ घोर अन्याय है। वे वर्षों से बदतर जिंदगी जी रहे थे। अब उनसे कोरोना मरीजों के लिए अपने पुनर्विकसित घरों को छोड़ने के लिए कहा जा रहा है। रेड्डी ने कहा कि अगर बीएमसी पुनर्विकसित आवासों को इसी तरह से नियंत्रण में लेती रही तो वहाँ रहने वाले लोग अंबानी के घर में घुसने और उसमें मौजूद खाली जगह को अपने नियंत्रण में लेने के लिए दवाब बनाएँगे।

रेड्डी ने BMC से कोरोना वायरस मरीजों के लिए पुनर्विकसित की गई सेंटी टाउन को क्वारंटाइन सेंटर बनाने के निर्णय को वापस लेने की माँग की।

सीपीआई नेता ने बयान में आगे कहा कि यह सही नहीं है कि खाली पड़ी जमीन और बंद पड़ी फैक्ट्रियों और मिलों को बिल्डरों के हाथों में सौंप दें ताकि वे वहाँ पर मॉल और अपार्टमेंट का निर्माण कर सकें। इन स्थानों का इस्तेमाल सिर्फ अस्पतालों के निर्माण के लिए किया जाना चाहिए।

उन्होंने बताया कि शहर में अनगिनत गगनचुंबी इमारतें हैं, इनमें से कई इमारतें ऐसी हैं, जिन्हें अधिग्रहित नहीं किया गया है। ये सिर्फ निवेश के रूप में खरीदे गए हैं। सरकार को कोरोना वायरस मरीजों को रखने के लिए ऐसे अपार्टमेंटों को अपने नियंत्रण में लेने की योजना बनानी चाहिए।

आपको बता दें कि देश में महाराष्ट्र के अंदर कोरोना के मरीज सबसे अधिक हैं। यहाँ तेजी से कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ रही है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में कोरोना से मरने वालों की संख्या 3,950 हो गई है, जबकि इससे संक्रमित मरीजों की संख्या 1,07958 तक पहुँच गई है। इनमें से 53,030 सक्रिय मामले हैं। वहीं अकेले मुंबई शहर में करीब 30,000 से अधिक कोरोना के सक्रिय मामले हैं।

भारतीय उच्चायोग के 2 कर्मचारियों का पाकिस्तान में अपहरण, ISI का हाथ: मीडिया रिपोर्ट

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आज (जून 15, 2020) सुबह भारतीय उच्चायोग के 2 जूनियर अधिकारी लापता हो गए। अब इनकी तलाश की जा रही है। भारत ने अधिकारियों के लापता होने का मुद्दा पाकिस्तान सरकार के समक्ष उठाया है। लेकिन, पाकिस्तान की ओर से इस मामले पर कोई बयान नहीं आया है।

ताजा जानकारी के अनुसार (TimesNow के इंटरनल सिक्यॉरिटी एडिटर निकुंज गर्ग के अनुसार) दोनों ही जूनियर अधिकारियों का अपहरण ISI के द्वारा किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के 2 ड्राइवर ड्यूटी पर बाहर गए थे, लेकिन वे अपने निश्चित स्थान तक नहीं पहुँचे हैं। ऐसे में पहले से ही आशंका जताई जा रही थी कि कहीं उनका अपहरण तो नहीं कर लिया गया है। दोनों ही ड्राइवरों की तलाश जारी है।

गौरतलब है इससे पहले भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने नई दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग के 2 वीजा सहायकों को हिरासत में लिया था। इन पर भारतीय सुरक्षा तैयारियों सहित आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी सूचनाओं की जासूसी करने का आरोप था। पाकिस्तान के इन दोनों अफसरों को भारत ने पर्सोना-नॉन ग्रेटा घोषित किया था और वापस पाकिस्तान भेज दिया था।

इस घटना के बाद से ही इस्लामाबाद में काम कर रहे भारतीय राजनयिकों और दूसरे स्टाफ सदस्यों के लिए हालात मुश्किल और खतरनाक होने की आशंका पैदा हो गई थी। इस बीच भारत की कोशिश रही थी कि वहाँ काम कर रहे भारतीयों के लिए कोई परेशानी खड़ी न हो। 

यहाँ याद दिला दें कि इस घटना से पहले इस्लामाबाद में भारत के एक राजनयिक को डराने का मामला सामने आया था। खबर थी कि एक ISI एजेंट ने भारतीय राजनयिक का पीछा किया, उनकी जासूसी की। जिसके बाद भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था और अपनी शिकायत दर्ज कराई।

सरकार ने पाकिस्तान को नोट लिखकर उसे चेतावनी दी कि उसका यह रवैया विएना कन्वेन्शन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशन्स, 1961 और बाइलेटरल 1992 कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन है, जो दोनों देशों ने राजनयिकों को सुरक्षा मुहैया कराने के लिए साइन किए थे। भारत ने पाकिस्तान से कहा था कि भारतीय उच्चायोग और उसके स्टाफ की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और उन्हें विएना कन्वेन्शन के मुताबिक काम जारी रखने की इजाजत दी जाए।

जतेक के बौउह नय ओतेक के लहठी: सैलरी से ज्यादा रघुराम राजन का सामान ढोने पर RBI ने किया था खर्च

रघुराम राजन अगस्त 2013 से लेकर सितम्बर 2016 तक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के गवर्नर रहे थे। यूपीए काल में उन्हें आरबीआई (RBI) गवर्नर नियुक्त किया गया था। ताज़ा खुलासे के अनुसार, आरबीआई में उनके कार्यकाल के दौरान उनकी आवभगत पर जम कर रुपए खर्च किए गए। रघुराम राजन के घरेलू समानों को शिकागो से मुंबई और फिर वापस शिफ्ट करने के लिए आरबीआई ने 71 लाख रुपए फूँक डाले।

कार्यकाल के दौरान राजन की सैलरी 1.69 लाख प्रति महीने हुआ करती थी। इस हिसाब से उन्हें उनके 3 साल के कार्यकाल में 61.2 लाख रुपए बतौर वेतन भुगतान किया गया लेकिन इससे 9.8 लाख रुपए ज्यादा केवल उनका समान शिफ्ट करने में ख़र्च कर दिए गए, वो भी आरबीआई (RBI) के फंड से।

संडे गार्जियन लाइव‘ को आरटीआई के तहत मिले जवाब से पता चलता है कि 22,26,416 रुपए रघुराम राजन का समान अमेरिका के शिकागो से मुंबई लाने पर खर्च किए गए। फिर वापस मुंबई से शिकागो शिफ्ट करने के लिए 49,41,253 खर्च किए गए।

आरबीआई (RBI) के अनुसार, बैंक में इस बारे में कोई नियम-क़ानून या लिखित नीति नहीं है कि किसी कर्मचारी के समानों को शिफ्ट करने के लिए कितने खर्च किए जाएँगे या फिर उसे वापस शिफ्ट करने का किराया कौन देगा। इसी कारण आरबीआई की डिसीजन मेकिंग बॉडी के लोगों ने फ़ैसला लिया। आरबीआई ने बताया है कि ‘सभी परिस्थितियों को देखते हुए’ इस ‘ख़ास केस के लिए’ फ़ैसला लिया गया।

इतना ही नहीं, ‘संडे गार्जियन लाइव’ ने ये भी बताया है कि फेयरवेल के रूप में रघुराम राजन को 5 पेंटिंग्स भी गिफ्ट की गई। हालाँकि, आरबीआई का कहना है कि वर्तमान नियमों के अनुसार रिटायर हो रहे आरबीआई गवर्नर को 50,000 रुपए तक के गिफ्ट दिए जा सकते हैं। हालाँकि, उन पेंटिंग्स की पुष्ट कीमत कितनी थी, इस बारे में कुछ पता नहीं चल सका है। आरबीआई ने आरटीआई के रिप्लाई में ये भी कहा है कि राजन ने 50,000 रुपए तक का गिफ्ट प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार की माँग नहीं रखी थी।

उन्हें गिफ्ट किए गए सारे पेंटिंग्स पुराने थे। इनमें से 4 को गोविन्द डुंबरे ने पेण्ट किया था, वहीं बाकी 1 गोपाल आदिवेरकर ने पेण्ट किया था। ये सभी पेंटिंग्स गवर्नर बँगले में लगी हुई थी, जहाँ से राजन को ‘कॉर्पोरेट गिफ्ट’ के रूप में दिया गया। डुंबरे की पेंटिंग्स का आकार 15*15 था, जबकि आदिवेरकर की पेंटिंग 16*20 आकार की थी। आरबीआई के अनुसार, इन पेंटिंग्स की कीमत 10,000 प्रति पेंटिंग आँकी गई है।

हालाँकि, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर डुंबरे की पेंटिंग्स 1 लाख और उससे भी ज्यादा रुपए में बेचीं जा रही है। जब रघुराम राजन गवर्नर बँगले में रहते थे, तब उनके बाथरूम में भी एसी फिट किया गया था। इस कार्य में 13,474 रुपए खर्च किए गए थे। ये सभी बातें आरबीआई द्वारा दी गई आरटीआई रिप्लाई से ही पता चला है। कॉन्ग्रेस की ‘न्याय योजना’ के वादे को भी रघुराम राजन के दिमाग की ही उपज बताया जाता है।

हाल ही में मोदी सरकार में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने कार्यकाल में सरकारी बैंकों की कथित बदहाली का बचाव करते हुए कहा था कि मनमोहन सिंह-रघुराम राजन काल में बैंकों की वित्तीय स्थिति का “सबसे बुरा दौर” था। बैंक अभी तक उसी से उबर नहीं पाए हैं। सीतारमण ने कहा था कि वह राजन के ही RBI प्रमुख रहने का समय था जब कर्ज महज़ भ्रष्ट नेताओं के फ़ोन कॉल से मिल जाया करते थे और भारत में पब्लिक सेक्टर बैंकों को आज तक उस दलदल से निकलने के लिए सरकार से पूँजी लेकर काम चलाना पड़ रहा है

थाईलैंड में VHP ने की लोगों की सहायता: जरूरतमंद परिवारों को बाँटे राशन, 9 जिलों में मदद पहुँचाने की योजना

कोरोना वायरस का कहर थमता नजर नहीं आ रहा। आए दिन कोरोना संक्रमितों की संख्या में लगातार इजाफा देखने को मिल रहा है। इसी बीच विश्व हिन्दू परिषद (VHP) विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे लोगों की सेवा में दिन-रात लगा हुआ है। विश्व हिन्दू परिषद लगातार जरूरतमंदों तक मदद पहुँचा रही है। ये मदद अपने देश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह संस्था विदेशों में भी जरूररतमंदों की सहायता कर रही है।

थाईलैंड में VHP का मदद कैंप

इसी कड़ी में VHP ने थाईलैंड में कोरोना प्रभावित परिवारों को मदद पहुँचाया। VHP थाईलैंड ने शनिवार (जून 13, 2020) को बैंकॉक में चोर्म थोंग जिले के 300 परिवारों की सहायता की। VHP थाईलैंड ने 9 जिलों में लोगों की मदद की योजना बनाई है। मदद की इस योजना के तहत चोर्म थोंग सातवाँ जिला था, जहाँ राशन व अन्य जरूरी सामानों का वितरण किया गया।

थाईलैंड VHP द्वारा स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुए मदद

इस दौरान संस्था के स्वयंसेवकों की तरफ से कोरोना वायरस महामारी की वजह से कठिनाइयों का सामना कर रहे परिवारों को 1500 किलोग्राम चावल, 300 बोतल सोया सॉस, 300 पैकेट शाकाहारी नूडल्स, 200 रुपए के भारतीय स्नैक्स और पानी उपलब्ध कराया गया।

VHP थाईलैंड लोगों की मदद करने के दौरान केंद्र सरकार द्वारा लागू सभी गाइडलाइन का पालन कर रही है और साथ ही स्थानीय प्रशासन से भी समन्व्य स्थापित करके सुचारू रूप से काम कर रही है।

थाईलैंड VHP मदद कैंप में लाइन लगे स्थानीय लोग

संस्था अभी तक सात जिलों में लोगों की मदद कर चुकी है और अगले दो हफ्तों में 2 और जिलों में जरूरतमंदों को सहायता पहुँचाने की योजना है। VHP ने 2 मई 2020 को बैंकॉक के सैथोर्न जिले में, 9 मई 2020 को क्लोग टोए जिले में, 16 मई 2020 को क्लोंग सैन जिले में, 23 मई 2020 को बैंकॉक वाई जिले में, 30 मई 2020 को यानवा जिले में, 6 जून 2020 को बंगरक जिले में और 13 जून 2020 को चोर्म थोंग जिले में राहत सामग्री वितरित किया।

भगवान गणेश के बैनर के सामने थाईलैंड के स्थानीय निवासी

इसके अलावा आने वाले हफ्तों में VHP थाईलैंड शेष दो जिलों में सहायता प्रदान करेगा। इस दौरान 20 जून 2020 को वत्थन जिले में और 27 जून 2020 को रतबराना जिले में राहत सामग्री वितरित की जाएगी।

सत्संग के नाम पर झारखंड में आदिवासियों का धर्मांतरण, गाँवों में चर्च के एजेंट हिंदू धर्म के खिलाफ उगल रहे जहर: विहिप का दावा

झारखंड में बीजेपी सरकार के रहते आदिवासियों का जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए सख्त कानून लाया गया था। लेकिन, राज्य में झामुमो, कॉन्ग्रेस और राजद गठबंधन के सत्तासीन होते ही धर्मांतरण ने जोर पकड़ लिया है। यह दावा विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने किया है।

विहिप के झारखंड-बिहार के क्षेत्रीय संगठन मंत्री केशव राजू और क्षेत्रीय मंत्री वीरेंद्र विमल ने रविवार को रॉंची में पत्रकारों से बात करते हुए इसका खुलासा किया। इनके मुताबिक सत्संग के नाम पर आदिवासियों का जबरन धर्मांतरण हो रहा है। चर्च के एजेंट गॉंवों में हिंदू धर्म के खिलाफ जहर उगल कर इन्हें भड़काते हैं। विहिप ने कहा है कि वह इन एजेंटों की सूची तैयार कर रहा है।

विहिप के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख और राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय ​शंकर तिवारी ने ट्वीट कर कहा है, “कोरोना संकट के समय जारी लॉकडाउन में जहॉं समाज का एक बड़ा वर्ग जरूरतमंदों की मदद में लगा रहा, वहीं ईसाई मिशनरियां धर्मांतरण के खेल में लगी थीं। इस दौरान गुमला, लोहरदगा, लातेहार, सिमडेगा, कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग जिलों में खूब धर्मांतरण कराया गया। यही है मिशनरियों का असली रूप।”

पत्रकारों से बात करते हुए विहिप के पदाधिकारियों ने कहा कि वे धर्मांतरण कराने वाले एजेंटों की सूची जल्द ही प्रशासन को सौंपेंगे। वीरेंद्र विमल ने कहा कि महागठबंधन की सरकार ने जबरन धर्मांतरण पर जान-बूझकर आँख मूॅंद रखा है। इसमें चर्चों की संलिप्तता की ओर इशारा करते हुए उन्हेंने कहा, “लॉकडाउन के दौरान जबरन धर्मांतरण की कई रिपोर्ट हमें मिली है। हम हर मामले में साक्ष्य जुटा रहे हैं। धर्मांतरण ने इस सरकार (महागठबंधन) के सत्ता में आने (दिसंबर 2019 के अंत में) के बाद जोर पकड़ा है।”

दैनिक जागरण की खबर के मुताबिक झारखंड के गुमला, लोहरदगा, लातेहार, सिमडेगा, कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग आदि जिलों में बड़े पैमाने पर ईसाई मिशनरियाँ धर्मांतरण कराने में जुटी हुई हैं। विहिप के पदाधिकारियों की मानें तो झारखंड में जगह-जगह धर्मांतरण कराने के लिए चर्च के एजेंट, पास्टर और नन प्रमुख रूप से लगे हुए हैं।

पदाधिकारियों का कहना है कि लगातार सामने आती घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि 2017 में धर्मांतरण विरोधी कानून बनने के बाद भी प्रशासनिक अधिकारी प्रलोभन देकर कराए जा रहे धर्मांतरण पर रोक लगाने में नाकाम हैं। झारखंड में लगातार बढ़ती धर्मांतरण की घटनाओं को देखते हुए विहिप ने राज्य सरकार को चेतावनी दी है और कहा है कि यदि सरकार धर्मांतरण के खेल में लगे लोगों पर कार्रवाई नहीं करती है तो VHP और जनजातीय समाज के लोग राज्य में बड़ा आंदोलन करने पर मजबूर होंगे।

विहिप के झारखंड-बिहार के क्षेत्र संगठन मंत्री केशव राजू ने बताया कि कोडरमा के डोमचाच, चंदवारा, जयनगर व गिरिडीह के तीसरी व पीरटांड प्रखंड व लातेहार के गाँवों में चर्च के एजेंट सत्संग के नाम पर हिंदुओं को इकट्ठा करते हैं। इकट्ठा किए गए लोगों को हिंदू धर्म के प्रति भड़काया जाता है।

फिर प्रलोभन देकर उनका धर्मांतरण करवा दिया जाता है। उन्होंने बताया कि पैसे के लोभ में आकर कुछ हिंदू भी ईसाई मिशनरियों के साथ काम करते हैं और धर्मांतरण कराने में ईसाइयों का साथ देते हैं।

राजू ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान इस काम का कोई विरोध करने वाला नहीं था। इसी का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर लोगों का धर्मांतरण कराया गया। उन्होंने दावा किया है कि गिरिडीह में तीसरी प्रखंड के मनोज टुडू व सामेल मुर्मू व पीरटांड़ प्रखंड में पोल टुडू और बेंजामिन सोरेन धर्मांतरण के कार्य में लगे हुए हैं। कुछ इसी तरह लातेहार में विनोद उरांव स्वयं ईसाई बनने के बाद इस काम में आर्थिक सहयोग मिशनरियों को कर रहे हैं।

केशव राजू ने बताया कि अभी हम राज्य के सभी जिलों में धर्मांतरण के काम में लगे लोगों और प्रलोभन में आकर धर्म बदलने वाले लोगों का डाटा इकट्ठा कर रहे हैं। कार्य को पूरा होते ही इस सूची को प्रशासन को सौंपा जाएगा और प्रशासन पर इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए भी दबाव बनाया जाएगा।

उन्होंने बताया कि झारखंड लातेहार जिले के महुआडांड़ प्रखंड में कुल 14 पंचायतें हैं, जिनके अंतर्गत 106 गाँव आते हैं। ये सभी गाँव आज ईसाई बहुल्य हो चुके हैं। अब इसी गति से पलामू के रजहरा, नवाबाजार, चान्या, सुकबेरा, करमा, केराई आदि गाँवों में लोगों का धर्मांतरण कराया जा रहा है।

वहीं धर्म जागरण की के सौम्या मिश्रा के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान झारखंड गुमला के करौंदी, करमटोली, वृंदा, जोराग, डीबडीह व लोहरदगा के घाघरा, ताबील, जिलिंगसिरा, अरगी, टोटांबी, नवडीहा आदि गाँवों में धर्मांतरण का खेल फिलहाल जारी है। इतना ही नहीं उन्होंने दावा किया कि धर्मांतरण के बाद यहाँ के लोगों ने चर्च जाना भी शुरू कर दिया है।

देश में अभी 47481 वेंटिलेटर्स, अकेले PM CARES से आएँगे 50000 ‘मेड इन इंडिया’ वेंटिलेटर्स: ₹2000 करोड़ खर्च

पीएम केयर्स (PM CARES) फण्ड की विपक्ष ने जमकर आलोचना की थी। लेकिन इस फण्ड के उपयोग से जमीनी स्तर पर बदलाव लाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस इनिशिएटिव से हॉस्पिटलों में वेंटिलेटर्स पहुँचने शुरू हो गए हैं।

पीएम केयर्स से क्या फायदा हुआ है? दरअसल, इस फण्ड के प्रयोग से 50,000 वेंटिलेटर्स का उत्पादन किया जा रहा है। इसकी ख़ासियत ये है कि ये सब ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत किया जा रहा है। अर्थात, इससे स्वदेशी अभियान को भी बल मिल रहा है। साथ ही प्रवासी मजदूरों के लिए 1000 करोड़ रुपए की व्यवस्था भी पीएम केयर्स से ही की गई है। कोरोना से निपटने के लिए वैक्सीन बनाने के लिए जो रिसर्च चल रहा है, वहाँ भी पीएम केयर्स फण्ड से 100 करोड़ रुपए दिए गए हैं।

एक अध्ययन के अनुसार, अभी तक देश भर के अस्पतालों में कुल 47,000 वेंटिलेटर्स उपलब्ध हैं। क्या आपको पता है कि पीएम केयर्स के उपयोग के बाद ये संख्या कितनी हो जाएगी? दोगुनी से भी ज्यादा। यानी, 50,000 नए वेंटिलेटर्स सिर्फ़ पीएम केयर्स फण्ड से आने वाले हैं, वो भी स्वदेशी।

अध्ययन के अनुसार, जहाँ पब्लिक सेक्टर में 17,850 वेंटिलेटर्स उपलब्ध थे, वहीं प्राइवेट सेक्टर में 29,631 वेंटिलेटर्स मौजूद थे। यानी, कुल मिला कर 47,481 वेंटिलेटर्स।

केंद्र सरकार ने कहा है कि 50,000 नए वेंटिलेटर्स ख़रीदने के लिए पीएम केयर्स फण्ड से 2000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इसके करण से देश में उपलब्ध वेंटिलेटर्स की संख्या 97, 481 हो जाएगी। यानी, 1 लाख के क़रीब।

देश के सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में वेंटिलेटर्स की संख्या का अध्ययन

आलोचना का मुख्य बिंदु ये था कि जब पीएम रिलीफ फंड है ही तो फिर पीएम केयर्स की क्या ज़रूरत थी? दरअसल, पीएम रिलीफ फण्ड को इस तरह से डिजाइन नहीं किया गया था कि वो ऐसी आपदा की घड़ी में किसी प्रकार के सुधार कार्यक्रम के काम आ सके। हाँ, उसकी उपयोगिता ये ज़रूर थी कि किसी आपदा की घड़ी में पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए या फिर पीड़ित परिवारों की मदद की जाए। पीएम केयर्स पूरे के पूरे सेक्टर में रिफॉर्म की क्षमता रखता है।

पीएम केयर्स से रिसर्च के लिए फंडिंग की जा सकती है। इससे स्वास्थ्य और फार्मा सेक्टर को आधुनिक बनाने और उन्हें अपग्रेड करने में मजबूती मिलेगी। इंफ्रास्ट्रक्चर को और ज्यादा मजबूत बनाने में पीएम केयर्स का उपयोग किया जा सकता है, जो अभी हो रहा है। पीएम रिलीफ फण्ड के माध्यम से ये सब संभव नहीं है। पीएम रिलीफ फण्ड के बोर्ड में कौन-कौन लोग हैं, ये भी जानने वाली बात है।

उसमें प्रधानमंत्री के अलावा कॉन्ग्रेस पार्टी की अध्यक्ष और कॉर्पोरेट जगत की हस्तियाँ भी शामिल हैं। यानी प्राइवेट उद्योगों के प्रतिनिधि और एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष उस बोर्ड में शामिल हैं। जबकि पीएम केयर्स में प्रधानमंत्री के अलावा रक्षा, वित्त और गृह मंत्री शामिल हैं, यानी सारे चुने हुए प्रतिनिधि हैं जो सरकार का हिस्सा हैं। आखिर पीएम रिलीफ फंड में कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष की सदस्यता और भूमिका की व्यवस्था क्यों की गई है?

पीएम रिलीफ फंड के ऑडिटर्स में भी एमएस ठाकुर और वैद्यनाथ अय्यर जैसे लोग शामिल हैं। इस फण्ड की स्थापना रामेश्वर ठाकुर ने की थी, जो कि ज़िंदगी भर एक वफादार कॉन्ग्रेस नेता रहे थे। सोनिया गाँधी ने इसीलिए पीएम केयर्स का विरोध किया था, क्योंकि पीएम रिलीफ फण्ड के बोर्ड की वो आजीवन सदस्य हैं और ऑडिटर्स भी कॉन्ग्रेस के ही लोग थे। मोदी सरकार ने जिस एमएस सार्क एसोसिएट्स को पीएम रिलीफ फण्ड का ऑडिटर बनाया था, उसे ही पीएम केयर्स का ही ऑडिटर बनाया गया है। फिर हंगामा क्यों?

वो तो 2018-19 से ही पीएम रिलीफ फण्ड की ऑडिटिंग में लगा हुआ है, फिर जब पीएम केयर्स के लिए वही ऑडिटर्स हैं तो हंगामा का कारण यही है कि इसमें कॉन्ग्रेस वालों की कोई भूमिका नहीं है। तो यहाँ ये सवाल उठ सकता है कि क्या एमएस सार्क एंड एसोसिएट्स भाजपा की क़रीबी है?

दरअसल, ऐसा नहीं है। एमएस सार्क के सुनील गुप्ता उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरेश रावत, दिल्ली की दिवंगत सीएम शीला दीक्षित, बड़बोले कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर और पूर्व राष्ट्रीपति प्रतिभा पाटिल के साथ कई तस्वीरों में देखे जा सकते हैं।

मई के दूसरे हफ्ते में ही ख़बर आई थी कि पीएम केयर्स से कोरोना वायरस आपदा से निपटने के लिए 3100 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इससे ख़रीदे गए 50,000 ‘मेड इन इंडिया’ वेंटिलेटर्स को देश भर के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अस्पतालों में इनस्टॉल किया जाएगा। साथ ही 1000 करोड़ रुपए सभी राज्यों को स्थानीय स्तर पर कलक्टरों के माध्यम से ज़रूरी सुधार करने के लिए की गई।

पीएम केयर्स की स्थापना एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में हुई है, जबकि 1948 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने पीएम रिलीफ फण्ड की मौखिक रूप से घोषणा की थी। पीएम रिलीफ फण्ड का उद्देश्य था कि त्वरित सहायता पहुँचाई जाए, जबकि पीएम सिस्टेमेटिक ढंग से योजना बना कर वित्त उपलब्ध कराता है। पीएम रिलीफ फण्ड का कोई एडवाइजरी बोर्ड नहीं है, जबकि पीएम रिलीफ फण्ड में रिसर्च, क़ानून, स्वास्थ्य, समाजसेवा और विज्ञान के 10 प्रबुद्धजन एडवाइजरी बोर्ड में शामिल होने का प्रावधान है।

पीएम रिलीफ फण्ड में ट्रस्टियों की जिम्मेदारियाँ परिभाषित ही नहीं की गई हैं, जबकि पीएम केयर्स फण्ड में सभी ट्रस्टियों की जिम्मेदारियाँ वर्णित हैं। साथ ही इसके ऑडिटर्स का भी रोटेशन होगा, पीएम रिलीफ फण्ड की तरह आजीवन कोई कॉन्ग्रेसी ही नहीं बैठा रहेगा। एक और बात जानने लायक है कि पीएम रिलीफ फण्ड को उस समय पाकिस्तान से आए विस्थापित शरणार्थियों की त्वरित सहायता के लिए स्थापित किया गया था।

अब बाढ़, तूफ़ान या फिर भूकंप से पीड़ित लोगों को इसके माध्यम से त्वरित सहायता दी जाती है। लेकिन, कोई कोरोना जैसी अचानक बड़ी आपदा आ जाए तो उसके लिए पीएम केयर्स की स्थापना हुई है। पीएम केयर्स का अपना एक अलग वेबसाइट है, जहाँ से सारी जानकारियाँ मिल सकती हैं। जब कोई ऐसी आपदा आएगी जो पूरे देश को प्रभावित कर सके तो पीएम केयर्स के फण्ड का उपयोग किया जाएगा।

कोरोना वायरस व ऐसी अन्य प्रकार की महामारी से निपटने के लिए बनाए गए इस फण्ड को विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) से मुक्त करने के बाद विदेशों से दान के लिए खोला गया है। अब विदेशों से दान करने वाले लोग सीधे पीएम केयर्स पोर्टल से दान की रसीदें डाउनलोड कर सकते हैं। केंद्र द्वारा सोनिया गाँधी की माँग को ठुकरा दिया गया था कि इसमें प्राप्त हुई धनराशि को पीएम रिलीफ फण्ड में ट्रांसफर किया जाए।

दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजने के लिए कॉन्ग्रेस ने दी दलित की ‘बलि’: MP में चुनाव के बीच याद आया वडोदरा

पूर्वी दिल्ली का सीलमपुर। यहॉं दलितों की अच्छी-ख़ासी आबादी है। 27 मार्च 2014) को यहॉं नरेंद्र मोदी भाषण दे रहे थे। तब वे प्रधानमंत्री नहीं बने थे। लोकसभा चुनाव का प्रचार जोरों पर था। गुजरात के वडोदरा से मोदी के चुनाव लड़ने की घोषणा हो चुकी थी।

इसी दौरान सीलमपुर में नरेंद्र मोदी ने एक विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था;

“कॉन्ग्रेस ने वडोदरा से उम्मीदवार बदल दिया है और इसका कारण ये है कि वे दलित थे। शहजादे को लोकतंत्र में विश्वास नहीं है। क्या दलित होना गुनाह है? कॉन्ग्रेस ने ऐसा कर एक दलित का अपमान किया है। शहजादे को एक दलित के साथ हुए अत्याचार का जवाब देना होगा। तोमर को एक प्रक्रिया के तहत उम्मीदवार चुना गया था। फिर भी उन्हें हटा दिया गया। उन्हें दलित होने की सज़ा दी गई है।

अब जानते हैं कि मोदी ने ऐसा क्यों कहा था? असल में नरेंद्र रावत जो कि कॉन्ग्रेस के प्रमुख भी थे, को लोकसभा चुनाव लड़ना था। लेकिन, जैसे ही नरेंद्र मोदी ने वहाँ से चुनाव लड़ने की घोषणा की, कॉन्ग्रेस ने उम्मीदवार बदल दिया

नए उम्मीदवार का नाम था मधुसूदन मिस्त्री, जो पहले साबरकाँठा से 2 बार सांसद रह चुके थे। वही लोकसभा क्षेत्र, जहाँ से भारत के प्रधानमंत्री रहे गुलजारी लाल नंदा ने हैट्रिक बनाई थी। बाद में रामानंद सागर के रामायण में रावण का किरदार निभाने वाले अरविन्द त्रिवेदी भी यहीं से सांसद रहे थे।

अब मिस्त्री रसूखदार थे, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के क़रीबी माने जाते थे, उन्हें टिकट मिलने के बाद हंगामा हुआ। हंगामे का कारण उन्हें टिकट मिलने से ज्यादा नरेंद्र रावत का टिकट काटना था।

मोदी के उस संबोधन को छह साल से भी ज्यादा हो गए, लेकिन कॉन्ग्रेस वहीं की वहीं है। बस इलाक़ा बदल गया है। ताज़ा मामला मध्य प्रदेश में होने जा रहे राज्यसभा चुनाव और वहाँ के बड़बोले नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से जुड़ा है। कॉन्ग्रेस के एक वर्ग की माँग थी कि अनुसूचित जाति से आने वाले फूल सिंह बरैया को राज्यसभा पहुँचाया जाए, ताकि दलितों के बीच पार्टी का आधार मजबूत करने में बल मिले।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेस में सब दिग्विजय के पक्ष में गोलबंद थे और सार्वजनिक रूप से आवाज़ नहीं उठी थी। कॉन्ग्रेस के ही नेता चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी ने ट्वीट कर कहा था कि दिग्विजय सिंह को इस बात की पहल करनी चाहिए कि फूल सिंह बरैया राज्यसभा चुनाव में प्रथम वरीयता का उम्मीदवार बनें। चौधरी राकेश सिंह ने दिग्विजय सिंह को त्याग का परिचय देने की सलाह दी थी। पर पार्टी ने उन्हें नज़रअंदाज़ किया।

बता दें कि दिग्विजय सिंह ने ही बरैया को राजनीति में एंट्री कराई थी, लेकिन अब उनकी राह में दिग्विजय ही बाधा बन गए। बरैया को राज्यसभा जाने का मौका नहीं मिला और दिग्विजय कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार बन गए। पिछले लोकसभा चुनाव में भोपाल से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने दिग्विजय को करारी मात दी थी। एक दलित की जगह चुनाव हारे हुए उम्मीदवार को तरजीह दी गई। तभी तो भाजपा ने इस पर बयान देते हुए कहा:

“कॉन्ग्रेस का दलित विरोधी चेहरा फिर सामने आ गया है। दिग्विजय सिंह राज्यसभा जाएँगे और फूल सिंह बरैया को बाहर का रास्ता देखना पड़ेगा। दिग्विजय सिंह का रवैया लगातार दलित विरोधी रहा है। जब कॉन्ग्रेस विपक्ष में थी तब भी बाला बच्चन को दिग्विजय सिंह ने नेता प्रतिपक्ष नहीं बनने दिया था। नेहरू ने बाबासाहब आंबेडकर को चुनाव हरवाया था। इंदिरा ने बाबू जगजीवन राम को अपमानित कराया था। सोनिया ने सीताराम केसरी को कमरे में बंद कर अध्यक्ष पद हथियाया था। नेहरू ख़ानदान की हर पीढ़ी ने अनुसूचित वर्ग का अपमान किया है।”

हालाँकि, अगर चुनावी समीकरणों की बात करें तो एक सीट कॉन्ग्रेस और दो सीटें भाजपा के पक्ष में जानी तय है। लेकिन, यहाँ एक ट्विस्ट आता है। दिग्विजय सिंह के बाद फूल सिंह बरैया को भी राज्यसभा प्रत्याशी बना दिया गया है, जबकि राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि उनकी हार तय है। भाजपा भी कहती है कि दलित बरैया को ‘दोयम दर्जे’ का प्रत्याशी बनाया गया है। यानी, दिग्विजय की राज्यसभा सदस्यता के लिए एक दलित की ‘बलि’ ले ली गई।

एक सवाल ये भी उठ सकता है कि जब कॉन्ग्रेस को दलित फूल सिंह बरैया को राज्यसभा भेजने का मन नहीं था तो उसने उन्हें आगामी विधानसभा उपचुनाव के लिए क्यों नहीं उतारा? कॉन्ग्रेस का एक धड़ा मानता है कि चम्बल-दियारा क्षेत्र में उनके उतरने से एक सीट तो पक्की हो ही जाती। अन्य सीटों पर भी दलितों के कुछ वोट कॉन्ग्रेस के पाले में आते। लेकिन, कॉन्ग्रेस ने ऐसा नहीं किया। क्या दाँव उलटा पड़ने का डर था?

कॉन्ग्रेस को ये डर भी हो सकता है कि फूल सिंह बरैया को उतारने से कहीं ओबीसी या सामन्य वर्ग पार्टी के खिलाफ एकजुट न हो जाए। जहाँ उपचुनावों में ऐसी स्थिति में सत्ताधारी पार्टी की जीत का इतिहास रहा है, कॉन्ग्रेस यहाँ अपनी इज्जत बचाने उत्तर रही है, क्योंकि कमलनाथ सरकार के काम गिनाने के नाम पर उसके पास कुछ है नहीं। कर्जमाफी फ्लॉप हो गई और उलटा किसानों के गुस्से का कारण बनी।

क्या ध्रुवीकरण के इसी भय के कारण बरैया की ‘बलि’ दे दी गई?

अब आते हैं आंबेडकर वाली बात पर। दरअसल, वो पहले चुनाव में ‘शेड्यूल्ड कास्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ से खड़े हुए थे। कॉन्ग्रेस ने उनके खिलाफ उम्मीदवार उतारा, सीपीआई ने उनके खिलाफ प्रचार किया और उनकी हार हो गई। आंबेडकर चौथे नंबर पर रहे। नेहरू ने बॉम्बे नॉर्थ से नारायण शाडोबा काजरोलकर को उतारा था जो आंबेडकर के सहयोगी रहे थे। उनकी जीत हुई।

इसी तरह आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी से तंग आकर बाबू जगजीवन राम ने कॉन्ग्रेस छोड़ी थी। सोनिया गाँधी जब अध्यक्ष बनी थीं, तब तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को अपमानित किया गया था। यहाँ तक कि बूढ़े केसरी जब अपने घर पहुँचे तो वहाँ उन्हें रिसीव करने के लिए एक कुत्ते के अलावा कोई नहीं था। स्वाभाविक है कि ऐसी घटनाओं के मद्देनज़र कॉन्ग्रेस को उसका इतिहास याद दिलाया जाएगा।

दरगाह के पास 10वीं की छात्रा से रेप: इमरान, राशिद गिरफ्तार – कुछ दिन पहले पीड़िता के घर पेंट करने गया था राशिद

ग्वालियर में दसवीं की एक छात्रा के साथ गैंगरेप का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस केस में 2 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान इमरान खान और राशिद खान के रूप में हुई है। इन पर आरोप है कि इन्होंने पहले नाबालिग का अपहरण किया, फिर दरगाह के पास ले जाकर उसका रेप किया और विरोध करने पर लड़की को जान से मारने की धमकी दी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, घटना ग्वालियर के ख्वाजा थाना क्षेत्र की है। यहाँ 11 जून (गुरुवार) को 10वीं में पढ़ने वाली नाबालिग अपने घर से कुछ सामान लेने के लिए निकली थी।

इसी दौरान घर से कुछ दूरी पर इमरान और राशिद खान खड़े थे। छात्रा जब उनके पास से गुजरी तो इमरान ने उसका मुँह दबा लिया और राशिद गाड़ी को लेकर उसके पास पहुँचा।

इसके बाद दोनों ने उसे खींचकर गाड़ी में बिठाया और ख्वाजा खानून की दरगाह के पास ले गए। वहाँ उसका बलात्कार किया। इस बीच जब नाबालिग ने खुद को बचाने के लिए विरोध किया तो दोनों ने उसे जान से मार डालने की धमकी दी।

पीड़ित छात्रा, इमरान और राशिद के सामने रोती और गिड़गिड़ाती रही। लेकिन आरोपितों का दिल नहीं पसीजा। उन्होंने उससे मारपीट करते हुए वीडियो भी बनाया। बाद में उसे धमकी दी कि अगर मुँह खोला तो वीडियो वायरल कर देंगे।

इस पूरी घटना में लड़की बुरी तरह से घायल हो गई। बाद में किसी तरह अपने घर पहुँचकर उसने सारी जानकारी अपने परिजनों को दी। मामले की जानकारी होते ही लड़की के घरवाले थाने पहुँचे।

उन्होंने इस मामले में शिकायत दर्ज करवाई। इसके बाद पुलिस ने लड़की को अस्पताल पहुँचाया। जहाँ प्राथमिक इलाज के बाद लड़की को छुट्टी दे दी गई।

वहीं पुलिस ने इस मामले पर त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। इनके मोबाइल फोन भी जब्त कर लिए गए। इसके साथ ही इन्हें शुक्रवार को कोर्ट में पेश करके जेल भेज दिया गया। जाँच में पता चला कि राशिद खान कुछ दिनों पहले लड़की के घर पेंट करने गया था।

गौरतलब है कि नाबालिग के साथ दुष्कर्म का एक ताजा मामला दिल्ली में भी सामने आया है। यहाँ प्रीत विहार में बतौर सहायिका काम करने वाली 16 साल की लड़की झारखंड अपने घर जाने के लिए आनंद विहार की ओर गई थी। लेकिन वहाँ किसी ने उसे कहा कि झारखंड जाने वाली ट्रेन नई दिल्ली से मिलेगी।

इसके बाद वह किसी तरह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँची। यहाँ कुछ लोगों ने उसे सहायता का झांसा देकर ट्रेन में बैठाया, फिर सुनसान जगह पर उतारकर उसे शराब पिलाई और गैंगरेप किया।

लड़की बदहवास हालत में भटकते हुए कोतवाली इलाके में पहुँची। यहाँ महिला पुलिसकर्मी ने पहले उसे भोजन कराया, फिर उससे पूछताछ की। इसके बाद उसका मेडिकल कराके आरोपितों के ख़िलाफ केस दर्ज कर लिया गया। अब बच्ची को नारी गृह में रखा गया है।

कोरोना संक्रमितों को दफन करने के लिए छोटा पड़ा 5 बीघे का कब्रिस्तान, 300 कब्र अकेले शमीम ने खोदे: लॉकडाउन के बाद शव दोगुने

नई दिल्ली में ITO के पास है जदीद कब्रिस्तान। यह 45 एकड़ में फैला है। इसमें से 5 बीघा जमीना कोरोना संक्रमण से मरने वालों को दफन करने के लिए आरक्षित की गई थी। दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार, कुछ ही हफ्तों में इस 5 बीघे जमीन का 75 फीसदी हिस्सा भर चुका है।

शमीम के हवाले से दैनिक भास्कर ने बताया है कि जिस रफ्तार से मौतें हो रही है कोरोना संक्रमितों के लिए आरक्षित यह कब्रिस्तान हफ्ते भर से भी कम समय में भर जाएगा। उन्होंने बताया कि इसके बाद ऐसे लोगों का शव दफन करने के लिए कब्रिस्तान प्रबंधन कमिटी को और जमीन आवंटित करनी पड़ेगी। शमीम यहॉं शवों के लिए कब्र खोदने का काम करते हैं।

यहाँ बता दें, कब्रिस्तान में 5 बीघा जमीन के लिए बहुत पेड़ गिराने पड़े थे। ऐसे में अगर जमीन की जरूरत आगे पड़ती है, तो और पेड़ों को गिराना होगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, शमीम को प्रति दिन हरेक कब्र के लिए 100 रुपए मिलते हैं। वे दिल्ली के पहले ऐसे शख्स हैं जो कोरोना के कारमण मरने वालों का कब्र खोदने आगे आए। लॉकडाउन से अब तक वह 300 शव दफना चुके हैं। 25 दिन पहले 4,500 रुपए का उन्होंने खुद का कोरोना टेस्ट भी कराया था।

दैनिक भास्कर से बातचीत में शमीम बताते हैं कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद शवों में अचानक वृद्धि हुई है। लॉकडाउन में कब्रिस्तान में सिर्फ 5-6 शव आते थे। लेकिन, इसके बाद से 10-12 शव रोज आ रहे।

शमीम का कहना है कि हो सकता है कोरोना महामारी के चलते लोगों को अन्य गम्भीर बीमारियों के लिए अच्छा इलाज नहीं मिल पा रहा है। इसलिए ऐसा हुआ हो।

उल्लेखनीय है कि इस कब्रिस्तान में आमतौर पर पुरानी दिल्ली के लोग आते हैं। लेकिन कोरोना के कारण यहाँ दिल्ली के अलग-अलग जगहों से शवों को लाया जा रहा है। इनमें से कई शव तो ऐसे भी हैं जिन्हें 4-5 दिन बाद लाया गया। उनके मुताबिक यह देरी, कोरोना जाँच की रिपोर्ट के इंतजार में हो रही है।

याद दिला दें, पिछले हफ्ते, दिल्ली में कब्रिस्तान कमेटी के सदस्य मसरूर सिद्दीकी ने कहा था कि दरियागंज में एक कब्रिस्तान में रोजाना लगभग 10-12 शवों को दफाने के लिए लाया जा रहा है। जिसके कारण कब्रिस्तान की जगह जल्द भर जाएगी।

उन्होंने बताया था कि अप्रैल से अब तक यहाँ 300 शव दफन किए जा चुके हैं। अब केवल 100-150 के लिए जगह बाकी है। लेकिन जिस तरह से शवों का आना चालू है, उस हिसाब से लगता है कि जून के अंत तक ये कब्रिस्तान भर जाएगा।

जानकारी के लिए बता दें, दिल्ली के मंगोलपुरी, द्वारका, खादर और गाजीपुर में प्रोटोकॉल के अनुसार कोरोनॉवायरस पॉजिटिव लोगों के शवों को दफनाया जा रहा है। हालाँकि, दिल्ली गेट में शवों की संख्या बहुत अधिक है। जहाँ अब तक 299 शव दफन किए जा चुके हैं।

कश्मीर: महिला सरपंच को अगवा कर बनाया वीडियो, विजय रैना बोले- अजय पंडिता के बाद अगला निशाना मैं

जम्मू-कश्मीर के सोपोर में एक महिला सरपंच का अपहरण कर लिया गया। जाहिदा नामक इस सरपंच का आतंकियों ने एक वीडियो बनाया है। वीडियो में उससे कहवाया गया है कि वो अपने पद से इस्तीफा दे देंगी।

हालाँकि, वीडियो रिकॉर्ड करने के बाद महिला सरपंच को छोड़ देने की सूचना सामने आ रही है। हाल ही में सरपंच अजय पंडिता की हत्या कर दी गई थी।

अनंतनाग में अजय पंडिता की हत्या की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली थी, जो लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हुआ आतंकी संगठन है। इसके बाद पूरे देश में रोष प्रदर्शन हुआ था।

रविवार (जून 14, 2020) को कपिल मिश्रा के आह्वान पर दुनिया भर के 100 से भी अधिक शहरों के हिन्दुओं ने जम्मू-कश्मीर में सपरंच अजय पंडिता की आतंकियों द्वारा हत्या के खिलाफ ऑनलाइन विरोध-प्रदर्शन किया।

दक्षिणी कश्मीर के एक गाँव के सरपंच और भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता कश्मीरी पंडित विजय रैना को भी जान से मार डालने की धमकी मिली है। उन्होंने आशंका जताई है कि वे आतंकियों का अगला निशाना हो सकते हैं।

वे कुलगाम जिला भाजपा के प्रवक्ता भी हैं। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सुरक्षा की गुहार लगाई है और जम्मू-कश्मीर के सभी अल्पसंख्यक सरपंचों की सुरक्षा की व्यवस्था करने की माँग की है।

जहाँ तक सरपंच जाहिदा के अपहरण की ख़बर है, ये घटना शुक्रवार (जून 12, 2020) की है। सरपंच का वीडियो बनाकर इंटरनेट पर वायरल कर दिया गया। ‘जम्मू कश्मीर नाउ’ के अनुसार, जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में दहशत पैदा करने के लिए ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। उन्होंने आम नागरिकों से अपील की है कि वे इस वीडियो को वायरल ना करें, क्योंकि इससे आतंकियों को दहशत फैलाने में मदद मिलेगी। 

अजय पंडिता की हत्या के बाद कश्मीरी पंडितों ने कहा था कि कश्मीर में 700 साल से ज्यादा से कश्मीरी पंडितों का नरसंहार होता आ रहा है और हमारा जनेऊ हमेशा में रक्त में लिपटा रहा है। ये सिर्फ कश्मीरी पंडितों का ही नहीं सभी हिंदुओं का हाल है। बकौल कश्मीरी पंडित, अजय का अपराध बस इतना था कि उनका नाम अजय पंडिता था, वे जेनेऊधारी थे, इसीलिए उन्हें मौत की नींद सुला दिया गया।