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लुकआउट नोटिस के बावजूद बांग्लादेश भाग रहे जमाती, आँखें मूँदे बैठी है ममता सरकार: बंगाल के गवर्नर धनखड़

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर तबलीगी जमात मामले में गैर जिम्मेदार होने का आरोप लगाया है। राज्यपाल ने ममता बनर्जी पर तबलीगी जमात के विदेशी सदस्यों की तरफ आँख मूँदने का आरोप लगाया है।

उनका कहना है कि केंद्र सरकार की तरफ से लुकआउट नोटिस जारी होने के बावजूद ममता सरकार तबलीगी जमात के बांंग्लादेशी सदस्यों की हरकतों को नजरअंदाज कर रही हैं। इसकी वजह से बांग्लादेशी जमाती भारत छोड़कर अपने देश भागने में सफल हो पा रहे हैं।

इकॉनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेशी जमात सदस्य जाँच की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना, हरिदासपुर चेक-पोस्ट के माध्यम से भारत छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

धनखड़ ने ईटी को बताया कि उन्हें हाल ही में रिपोर्ट मिली थी कि कुछ दिनों पहले सीमा पर इमिग्रेशन ब्यूरो में 19 तबलीगी जमातियों को बांग्लादेश जाने के दौरान सीमा पर रोक दिया गया और हिरासत में लिया गया था।

राज्यपाल धनखड़ ने उन जमातियों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि ये बांग्लादेशी नागरिक कोलकाता के न्यू टाउन में मदीनात-उल-हुज्जाज के क्वारंटाइन सेंटर में थे, उन्हें बस द्वारा वापस बांग्लादेश भेजा जा रहा था। बांग्लादेश के लिए प्रस्थान करने के लिए हरिदासपुर पहुँचने पर पाया गया कि उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी था।

इन जमातियों को दिल्ली के क्राइम ब्रांच के डीसीपी ने ऑफिस में पेश होने का आदेश दिया था। इससे पहले ही वो चुपके से बांग्लादेश भागने की फिराक में थे। मगर इससे पहले कि वो बस लेकर बांग्लादेश के लिए रवाना हो पाते, उन्हें रोककर हिरासत में ले लिया गया। राज्यपाल धनखड़ ने इसे बहुत बड़ी चूक बताया।

बता दें कि विदेशी तबलीगी जमात के सदस्यों ने भारत के वीजा नियमों की धज्जियाँ उड़ा दी थीं। इसको लेकर उन पर कार्रवाई भी की जा रही है।

इसके अलावा धनखड़ ने ममता सरकार पर केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करने और लॉकडाउन को भी सही तरीके से लागू नहीं करने का आरोप लगाया।

एक तरफ ममता बनर्जी इन आरोपों को खारिज कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वे कोरोना के बढ़ते मामलों पर खुद को लाचार भी बता रही हैं। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने राज्य में कोरोना के बढ़ते मामलों पर शुक्रवार को कहा, “यह मेरे हाथ में नहीं रह गया। अब मुझे कुछ नहीं करना है। आप अपने बगल में कोरोना के साथ सो सकते हो। इसे अपना तकिया बनाएँ। मुझे माफ करें।”

क्या हिन्दू गौमांस खाते थे? वामपंथी कारवाँ मैग्जीन ने संस्कृत के अज्ञान के कारण फिर दिखाई मूर्खता

ततश्चानुदिनं धर्मः सत्यं शौचं क्षमा दया। कालेन बलिना राजन् नङ्‌क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः॥

भगवान कृष्ण द्वारा द्वापर युग के अंतिम दिनों में कलियुग के विषय में बोला गया ये श्लोक आज भी अंतिम सत्य है। इस श्लोक में कहा गया है कि कलियुग में धर्म, सत्यवादिता, स्वच्छता और सहिष्णुता के घटने के साथ-साथ असत्य का अत्यंत बोलबाला बढ़ेगा। मनुष्य केवल स्वयं के गलत विचारों को भी सच सिद्ध करने के लिए झूठ का इतना और इस तरह प्रयोग करेगा कि बहुसंख्य लोग उस झूठ को सच मानने के लिए विवश हो जाएँगे।

ऐसे ही कुछ प्रयास कुछ समय से वामपंथी विचारधारा वाले इतिहासकार और प्रकाशक कर रहे हैं। मार्क्सवादी इतिहासकार रोमिला थापर ने यह अवधारणा सिद्ध करने की कोशिश की कि प्राचीन हिंदू ऋषि-मुनियों ने न केवल मांस खाया, बल्कि अतिथियों को मांस परोसना भी सम्मानजनक माना गया।

स्क्रॉल और कारवाँ जैसे प्रकाशकों ने और आगे बढ़ते हुए ये प्रतिपादित करने का प्रयत्न किया कि वैदिक काल में भारतवर्ष में ब्राह्मणों और ऋषियों द्वारा गौमांस खाना एक बहुत ही स्वीकार्य वस्तु थी और अपनी इस कुचेष्टा को साबित करने के लिए ऋग्वेद और सनातन धर्म के दूसरे ग्रंथों के श्लोक और ऋचाओं के अर्थ को तोड़-मरोड़कर कुछ इस तरह प्रस्तुत किया कि कोई भी सामान्य व्यक्ति उस पर भरोसा कर ले।

ये सब सोचे-समझे प्रयास उस एक बड़े इकोसिस्टम का भाग है, जो एक साधारण भारतीय को सदैव हीन भावना से ग्रसित ही रखना चाहती है। इन्हीं कुटिल प्रयासों ने वेदों के विषय में सबसे अधिक प्रचलित एक शंका उत्पन्न कर दी है कि क्या वेदों में पशुबलि, मांसासाहार और गौमांस के सेवन आदि का विधान और उल्लेख है?

हमारे देश में वेद और वैदिक ज्ञान की दुर्दशा का कारण हमारे ही ऐसे अध्येता हैं, जो संस्कृत भाषा और व्याकरण को तो समझते थे, किंतु वेद और शास्त्रों के यथार्थ ज्ञान से कोसों दूर रहे। ऐसे लोगों ने जब वेद, पुराण और उपनिषदों का भाष्य किया तो केवल शाब्दिक अर्थ निकाले, किंतु उसमें छिपे गूढ़ भावार्थ को ये लोग समझ नहीं पाए, और जब ये खुद नहीं समझ पाए तो सही व्याख्या का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

इन्हीं भारतीय अध्येताओं से इन ग्रंथों का सीमित अर्थ पश्चिमी भाष्यकारों के पास गया और इन्हीं पश्चिमी भाष्यकारों का अनुकरण कर थापर जैसे कितने ही तथाकथित इतिहासकार और कारवाँ जैसे प्रकाशन हमारी सभ्यता और हमारे ग्रंथों का उपहास उड़ाने में सक्षम बन गए हैं।

वेदों की व्याख्या करना एक अत्यधिक जटिल गतिविधि है और ये केवल संस्कृत भाषा के ज्ञान से बहुत परे है। इसके लिए न केवल ज्ञान, बल्कि शिखा (ध्वनि-विज्ञान), व्याकरण, निरुक्त (दर्शन), निघंटु (शब्दावली), छंद (अधिकार), ज्योतिष (खगोल विज्ञान), और कल्प (समय अवधि या युग) की गहरी समझ की आवश्यकता होती है। साथ ही और कई अन्य पहलुओं की, जो केवल सनातन संस्कृति के भीतर रहने और समझने से जाना जा सकता है।

कारवाँ के लेख में इच्छानुरूप दिए गए कुछ ऋचाओं और श्लोकों के अशुद्ध और अपकार प्रयोगों का खंडन करने से पहले आइए कुछ ऐसे शब्द देखते हैं, जिससे लोगो को भ्रमित किया जाता है कि वेदों में पशुबलि, मांसाहार आदि का विधान है।

‘मेध’ 

मेध शब्द का अर्थ केवल हिंसा नहीं है। मेध शब्द के तीन अर्थ हैं- 1. मेधा अथवा शुद्ध बुद्धि को बढ़ाना, 2. लोगो में एकता अथवा प्रेम को बढ़ाना 3. हिंसा।

इसलिए मेध से केवल हिंसा शब्द का अर्थ ग्रहण करना उचित नहीं है। अश्वमेध शब्द का अर्थ यज्ञ में अश्व की बलि देना नहीं है अपितु शतपथ 13.1.6.3 और 13.2.2.3 के अनुसार राष्ट्र के गौरव, कल्याण और विकास के लिए किए जाने वाले सभी कार्य “अश्वमेध” हैं। गौ मेध का अर्थ यज्ञ में गौ की बलि देना नहीं है अपितु अन्न को दूषित होने से बचाना, अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, सूर्य की किरणों से उचित उपयोग लेना, पृथ्वी को पवित्र या साफ रखना -‘गोमेध‘ यज्ञ है।

‘गौ’ शब्द का एक और अर्थ है- पृथ्वी। पृथ्वी और उसके पर्यावरण को स्वच्छ रखना ‘गोमेध’ कहलाता है। नरमेध का अर्थ मनुष्य की बलि देना नहीं है अपितु मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके शरीर का वैदिक रीति से दाह संस्कार करना नरमेध यज्ञ है।

मनुष्यों को उत्तम कार्यों के लिए प्रशिक्षित एवं संगठित करना नरमेध या पुरुषमेध या नृमेध यज्ञ कहलाता है। अजमेध का अर्थ बकरी आदि की यज्ञ में बलि देना नहीं है, अपितु अज कहते है बीज,अनाज या धान को। अजमेध का अर्थ कृषि की पैदावार बढ़ाना है। अजमेध का सीमित अर्थ अग्निहोत्र में धान आदि की आहुति देना है।

‘आलम्भ’ 

लभ्’ धातु से बनने वाला आलम्भ शब्द का अर्थ मारना नहीं अपितु अच्छी प्रकार से प्राप्त करना, स्पर्श करना या देना होता है। पारस्कर सूत्र 2 /2 /16 में कहा गया है कि आचार्य ब्रह्मचारी का आलम्भ अर्थात हृदय का स्पर्श करता है। यहाँ पर आलम्भ का अर्थ स्पर्श आया है। पारस्कर सूत्र 1 /8 /8 में भी कहा गया है कि वर-वधू के दाहिने कंधे के ऊपर हाथ ले जाकर उसके ह्रदय का स्पर्श करे। यहाँ पर भी आलम्भ का अर्थ स्पर्श आया है। अगर यहाँ पर आलम्भ शब्द का अर्थ मरना मानें तो यह कैसे युक्तिसंगत एवं तर्क संगत सिद्ध होगा? इससे सिद्ध होता है कि आलम्भ शब्द का अर्थ ग्रहण करना, प्राप्त करना अथवा स्पर्श करना है।

‘संज्ञपन’

संज्ञपन शब्द का अर्थ ज्ञान देना, दिलाना एवं मेल कराना है। अथर्ववेद 6/10/14-15 में लिखा है कि तुम्हारे मन का ज्ञानपूर्वक अच्छी प्रकार (संज्ञपन) मेल हो, तुम्हारे हृदयों का ज्ञान पूर्वक अच्छी प्रकार (संज्ञपन) मेल हो। इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण 1/4 में एक आख्यानिका है जिसका अर्थ है, “मैं वाणी तुझ मन से अधिक अच्छी हूँ, तू जो कुछ मन में चिंतन करता है मैं उसे प्रकट करती हूँ। मैं उसे अच्छी प्रकार से दूसरों को बतलाती हूँ (संज्ञपयामी) संज्ञपन शब्द का मेल के स्थान पर हिंसापरक अर्थ करना अज्ञानता का परिचायक है।”

‘गोघ्न’ 

गोघ्न शब्द में हन धातु का प्रयोग है, जिसके दो अर्थ बनते हैं- हिंसा और गति। गोघ्न में उसका गति अथवा ज्ञान, गमन, प्राप्ति विषयक अर्थ है। मुख्य भाव यहाँ प्राप्ति का है, अर्थात जिसे उत्तम गौ प्राप्त कराई जाए। हिंसा के प्रकरण में वेद का उपदेश गौ कि हत्या करने वाले से दूर रहने का है। ऋग्वेद 114 /10 में लिखा है, जो गोघ्न – गौ कि हत्या करनेवाला है – वह नीच पुरुष है, वह तुमसे दूर रहे।

वेदों के कई उदाहरणों से पता चलता है कि ‘हन्’ का प्रयोग किसी के निकट जाने या पास पहुँचने के लिए भी किया जाता है। उदहारण के लिए अथर्ववेद 6 /101 /1 में पति को पत्नी के पास जाने का उपदेश है। इस मंत्र का यह अर्थ है कि पति पत्नी के पास जाए उचित प्रतीत होता है ना कि पति द्वारा पत्नी को मारना उचित सिद्ध होता है। इसलिए हनन का केवल हिंसा अर्थ गलत परिपेक्ष में प्रयोग करना भ्रम फैलाने के समान है।

‘अतिथिनीर्गा’

कारवाँ मैग्जीन के लेख के अनुसार, ऋग्वेद के मंत्र 10 /68 /3 में अतिथिनीर्गा: का अर्थ अतिथियों के लिए गौओं का वध किया गया है। जिसका तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के आने पर गौ को मारकर उसके मांस से उसे तृप्त किया जाता था। यहाँ पर जो भ्रम हुआ है, उसका मुख्य कारण अतिथिनी शब्द को समझने की गलती के कारण हुआ है।

यहाँ पर उचित अर्थ बनता है ऐसी गायें जो अतिथियों के पास दानार्थ लाई जाएँ, उन्हें दान की जाए। Monier Williams ने भी अपनी संस्कृत इंग्लिश शब्दकोश में अतिथिग्व का अर्थ “To whom guests should go” अर्थात जिसके पास अतिथि प्रेमवश जाए। Bloomfield ने भी इसका अर्थ “Presenting cows to guests” अर्थात अतिथियों को गौ भेंट करने वाला ही बताया है। अतिथि को गौमांस परोसना कपोलकल्पित है।

‘माष’

माष शब्द का प्रयोग ‘माषौदनम्‘ के रूप में हुआ है। इसे बदल कर किसी मांसभक्षी ने मांसौदनम् अर्थ कर दिया है। यहाँ पर माष एक दाल के समान वर्णित है। इसलिए यहाँ मांस का तो प्रश्न ही नहीं उठता। आयुर्वेद (सुश्रुत संहिता शरीर अध्याय 2) गर्भवती स्त्रियों के लिए मांसाहार को सख्त मना करता है और उत्तम संतान पाने के लिए माष सेवन को हितकारी कहता है। इससे क्या स्पष्ट होता है। यही कि माष शब्द का अर्थ मांसाहार नहीं अपितु दाल आदि को खाने का आदेश है। फिर भी अगर कोई माष को मांस ही कहना चाहे, तब भी मांस को निरुक्त 4/1/3 के अनुसार मनन साधक, बुद्धि वर्धक और मन को अच्छी लगने वाली वस्तु जैसे फलका गूदा, खीर आदि कहा गया है।

प्राचीन ग्रंथों में मांस अर्थात गूदा खाने के अनेक प्रमाण मिलते हैं जैसे चरक संहिता में देखें आम्रमांसं (आम का गूदा), खजूरमांसं (खजूर का गूदा), तैत्तरीय संहिता 2.32.8 (दही, शहद और धान) को मांस कहा गया है। इससे यही सिद्ध होता है कि वेदादि शास्त्रों में जहाँ पर माष शब्द आता है अथवा मांस के रूप में भी जिसका प्रयोग हुआ है उसका अर्थ दाल अथवा फलों का मध्य भाग अर्थात गूदा है।

वाजिनम्

वाजिनम् का अश्व के साथ-साथ अन्य अर्थ है शूर, बलवान, गतिशील और तेज। यजुर्वेद के 25/34 मंत्र का अर्थ करते हुए सायण लिखते हैं कि अग्नि से पकाए, मरे हुए तेरे अवयवों से जो मांस- रस उठता है वह वह भूमि या तृण पर न गिरे, वह चाहते हुए देवों को प्राप्त हो। अश्व की हिंसा के विरुद्ध यजुर्वेद 13/47 मंत्र का शतपथकार ने पृष्ठ 668 पर अर्थ लिखा है कि अश्व कि हिंसा न करें।

उदाहरण:-

यजुर्वेद 25/44 के यज्ञ में घोड़े की बलि के समर्थन में अर्थ निकालते हुए लिखा गया है कि हे अश्व! तू अन्य अश्वों कि तरह मरता नहीं क्योंकि तुझे देवत्व प्राप्ति होगी और न हिंसित होता है कि व्यर्थ हिंसा का यहाँ अभाव है। प्रत्यक्ष रूप में अवयव नाश होते हुए ऐसा कैसे कहते हो? इसका उत्तर देते हैं कि सुंदर देवयान मार्गों से देवों को तू प्राप्त होता है, इसलिए यह हमारा कथन सत्य है। इस मंत्र का सही अर्थ है कि जैसे विद्या से अच्छे प्रकार प्रयुक्त अग्नि, जल, वायु इत्यादि से युक्त रथ में स्थित हो कि मार्गों से सुख से जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान से अपने स्वरुप को नित्य जान के मरण और हिंसा के डर को छोड़कर दिव्य सुखों को प्राप्त हो।

अब चलते हैं उस श्लोक की ओर, जिसमें कारवाँ का लेख यह बताने का प्रयत्न कर रहा है कि इंद्र को प्रसन्न करने के लिए बैल का मांस पकाया जाता था।

उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः।।” (ऋ.10.86.14)

इस लेख को लिखने वाले भद्रपुरुष ने इस ऋचा के केवल तीन शब्दों को उठाया – “उक्ष्णो” (जिसका अर्थ उसने उक्ष (बैल) निकाला, दूसरा शब्द था “पञ्चदश” (जिसका अर्थ था पंद्रह) और तीसरा शब्द था “विंशतिम्” (जिसका अर्थ है बीस) और शब्दकोश से शाब्दिक अर्थ निकाल कर अनर्थ लिखा “At one place Indra states, “they cook for me fifteen plus twenty oxen”. अब इन सज्जन को कौन समझाए कि यहाँ पर उक्षण का अर्थ बैल नहीं किंतु थोड़ा गूढ़ है। 

आर्य विद्वान आचार्य वैधनाथ शास्त्री का ये भाष्य देखिए- पदार्थ- (पंचदश) दश प्राण और पंचभूत ये पन्द्रह पदार्थ, (मे) मेरे द्वारा बनाए गए (उक्ष्णः) सुखों के वर्षक शरीरों के (विंशतिम्) 20 अंगों या इंद्रियों को (साकम् हि) साथ ही (पचन्ति) पका कर पुष्ट करते हैं (उत) और (मे) मेरे द्वारा प्रदत्त शरीर के (उभाकुक्षी) दोनों पाश्र्वों को (पृणन्ति) पूर्ण करते हैं। (अहम्) मैं (पीव इत्) सर्वदा परिपुष्ट इस सबको प्रलयकाल में (अद्मि) अपने अन्दर समा लेता हूँ, (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् प्रभु (विश्वस्मात्) सब पदार्थों से सूक्ष्म और उत्कृष्ट है।   

भावार्थ- दश प्राण और पंचभूत परमेश्वर द्वारा बनाए गए शरीरों के बीस अंगों को साथ ही परिपक्व करके पुष्ट करते हैं और मेरे द्वारा प्रदत्त दोनों पाश्र्वों को भी परिपूर्ण करते हैं। मैं सर्वदा परिपुष्ट इन्द्र = परमेश्वर इन सबको प्रलयकाल में अपने अन्दर समेट लेता हूँ। परमैश्ववर्यवान् प्रभू सब पदार्थों से सूक्ष्म और उत्कृष्ट है। अर्थात् इंद्र मनुष्य की सभी इंद्रियों, प्राण, पंचभूत और अंतः करण को पुष्ट करते हैं। इस ऋचा का बैल के वध से कोई लेना-देना नहीं है।

ऋग्वेद की एक दूसरी ऋचा है – 

“हे इन्द्र ! त्वं यथा प्रातर्धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनं प्रातर्जुषस्व तथा नोऽस्मान् जुषस्व ॥१॥“

हे (इन्द्र) ऐश्वर्य के धारण करने वाले! इस भूंने हुए जौ और दधि के मिश्र को मंत्रों के साथ हम इसे आपको समर्पित करते हैं, इसे स्वीकार कीजिए।

तो अगर कोई अपने अज्ञान और अक्षमता के कारण इन वैदिक ऋचाओं का सही अर्थ नहीं कर सकता है, इस कारण केवल शब्दकोश से अर्थ उठाता है और वेदों में इंद्र के सोम का सेवन करने के बारे लिखा हुआ होने के बाद भी बैल के मांस को इंद्र द्वारा स्वीकारा हुआ बताता है तो यह अवश्य उस व्यक्ति विशेष के इसमें निहित स्वार्थ के कारण होगा।

लेख में इंगित दूसरी ऋचा “अग्निदेव” को समर्पित है।

उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे । स्तोमैर्विधेमाग्नये ॥

लेख के अनुसार – Second in importance to Indra is Agni… his main food being ghee. Protector of all men, he is, nevertheless, described in the Rigveda as “one whose food is the ox and the barren cow”. 

यहाँ पर भी लेखक का मत पक्षपात वाला है। यह ऋचा यज्ञ से सम्बंधित है और यज्ञ में जलती हुई अग्नि में घी की आहुति दी जाती है इसलिए अग्नि का मुख्य खाद्य घी होना सही है। लेखक ने “ उक्षान्नाय वशान्नाय” को अग्नि द्वारा गौ और बैल को खाया जाना बताया है, जो सरासर अनुचित है। ऊपर दी गई ऋचा का भावार्थ है – “हम उपासक (अग्नये) उस सर्वव्यापी जगदीश्वर की (स्तोमैः) विविध स्तोत्रों और मन से (विधेम) उपासना करें, जो ईश्वर (उक्षान्नाय) धनवर्षक सूर्य्यादिकों के भी अन्नवत् पोषक है, पुनः (वशान्नाय) स्ववशीभूत समस्त जगतों का भी अन्नवत् धारक और पोषक है, पुनः (वेधसे) सबके रचयिता भी हैं। ऐसे जगदीश्वर की उपासना करें ॥११॥”

अब आते हैं “गौ” शब्द पर। कारवाँ के लेख का लेखक लिखता है -The Taittiriya Brahmana unambiguously refers to the sacrificial killing of the cow which “is verily food” (atho annam vai gauh)”

यहाँ पर पुनः लेखक ने अपनी सीमित क्षमता का उपयोग कर गौ को गाय समझा और गाय को खाने की वस्तु बता दिया। वास्तव में वेदों में “गौ” शब्द का सम्बोधन पोषण प्रदायक दिव्य शक्तियों के लिए हुआ है। पशुरूप में भी “गौ” पर ये परिभाषा भली भाँति लागू होती है किंतु वेद के “गौ” सम्बोधन को व्यापक अर्थ में लेना ही सही होगा।

जैसे – “इमे लौका गौ” – ये लोक गौ कहे जाते हैं, “अंतरिक्षम गौ”- अंतरिक्ष को गौ कहा गया है, “गावो वा आदित्या”- गौ ही आदित्य है, “अन्नम वै गौ: – अन्न ही गौ है, “आग्नेयो वै गौ: – अग्नि ही गौ है”। तो उपरोक्त उदाहरण में क्योंकि अन्न हमें पोषण प्रदायक ऊर्जा देता है इसलिए उसे “गौ” कहा गया है ना कि “गौ” को खाने की वस्तु बताया गया।

आइए अब देखें कुछ उदाहरण वेदों से जिसमें “गौ वध” को जघन्य अपराध कहा गया है-

आचार्य सोमेश परसाई बताते हैं कि ऋग्वेद में गौ-वध को जघन्य अपराध घोषित करते हुए इसे मानव-वध के तुल्य माना गया है। ऐसा महापाप करने वाले के लिए ऋग्वेद दण्ड का विधान भी करता है।

सूयवसाद  भगवती  हि  भूया  अथो  वयं  भगवन्त:  स्याम अद्धि  तर्णमघ्न्ये  विश्वदानीं  पिब  शुद्धमुदकमाचरन्ती – ऋग्वेद 1/164/40
इसी तरह यजुर्वेद में गाय को जीवनदायी पोषण दाता मानते हुए गौ हत्या को वर्जित किया गया है।

घृतं दुहानामदितिं जनायाग्ने  मा हिंसी: यजुर्वेद 13/49
सदा ही रक्षा के पात्र गाय और बैल को मत मारो।

आरे  गोहा नृहा  वधो  वो  अस्तु ऋग्वेद  7 /56/17
आचार्य परसाई के मुताबिक वेदों मेंं गाय को अघ्न्या कहा गया है। अघ्न्या अर्थात् जो किसी भी अवस्था में नहीं मारने योग्य हैं।

ऋग्वेद 10/87/16 में वर्णित है – 

य:  पौरुषेयेण  क्रविषा  समङ्क्ते  यो  अश्व्येन  पशुना  यातुधान:
यो  अघ्न्याया  भरति  क्षीरमग्ने  तेषां  शीषाज़्णि  हरसापि  वृश्च
मनुष्य, अश्व या अन्य पशुओं के मांस से पेट भरने वाले तथा दूध देने वाली अघ्न्या गायों का विनाश करने वालों को कठोरतम दण्ड देना चाहिए। 

सूयवसाद  भगवती  हि  भूया  अथो  वयं  भगवन्त:  स्याम अद्धि  तर्णमघ्न्ये  विश्वदानीं  पिब  शुद्धमुदकमाचरन्ती – ऋग्वेद 1/164/40
इसी तरह यजुर्वेद में गाय को जीवनदायी पोषण दाता मानते हुए गौ हत्या को वर्जित किया गया है-

घृतं दुहानामदितिं जनायाग्ने मा हिंसी: यजुर्वेद 13/49
सदा ही रक्षा के पात्र गाय और बैल को मत मार-

आरे  गोहा नृहा  वधो  वो  अस्तु ऋग्वेद  7 /56/17
आचार्य परसाई के मुताबिक वेदों मेंं गाय को अघ्न्या कहा गया है। अघ्न्या अर्थात् जो किसी भी अवस्था में नहीं मारने योग्य हैं।

ऋग्वेद 10/87/16 में वर्णित है –
य:  पौरुषेयेण  क्रविषा  समङ्क्ते  यो  अश्व्येन  पशुना  यातुधान:
यो  अघ्न्याया  भरति  क्षीरमग्ने  तेषां  शीषाज़्णि  हरसापि  वृश्च

मनुष्य, अश्व या अन्य पशुओं के मांस से पेट भरने वाले तथा दूध देने वाली अघ्न्या गायों का विनाश करने वालों को कठोरतम दण्ड देना चाहिए।
अन्तकाय गोघातं – यजुवेज़्द 30/18 अर्थात गौ हत्यारे का संहार किया जाए। 

मनुस्मृति में भी बार-बार मांसाहार को निषेध बताया गया है-

नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्व चित् ।
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत् ॥ ५.४८ ॥

समुत्पत्तिं च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम् ।
प्रसमीक्ष्य निवर्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात् ॥ ५.४९ ॥

न भक्षयति यो मांसं विधिं हित्वा पिशाचवत् ।
न लोके प्रियतां याति व्याधिभिश्च न पीड्यते  ॥ ५.५० ॥

अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥ ५.५१ ॥

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
अनभ्यर्च्य पितॄन् देवांस्ततोऽन्यो नास्त्यपुण्यकृत् ॥

सनातन धर्म के पाँचवे वेद महाभारत में भी मांसाहार के परित्याग और निषेध का बहुत बार उल्लेख मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व के 115वें अध्याय में पितामह भीष्म बाणों की शैय्या पर सोए हुए युधिष्ठिर को कहते हैं-

“यो यजेताश्वमेधेन मासि मासि यतव्रत:।
वर्जयेनमधु मांसं च सममेतद युधिष्ठिर।।

“हे युधिष्ठिर, जो पुरुष नियमपूर्वक व्रत का पालन करते हुए प्रतिमास अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करता है तथा जो केवल मद्य और मांस का त्याग करता है, उन दोनो को एक जैसा ही फल मिलता है।”

भीष्म आगे कहते हैं-

 “न हि मांसं तृणात काष्ठादुपलाद वापि जायते।
हत्वा जन्तुं ततॊ मांसं तस्माद दॊषस्तु भक्षणे।।”

अर्थात् तृण से, काठ से या पत्थर से मांस उत्पन्न नहीं होता, वह केवल जीव की हत्या करने पर ही उपलब्ध होता है, अतः उसके खाने में महान दोष है।

“Repeat a lie often enough and it becomes the truth”, is a law of propaganda often attributed to the Nazi Joseph Goebbels.

ऊपर उल्लेखित एक विशेष वर्ग वर्तमान समय में इस नियम का अक्षरशः पालन कर प्रयत्नशील है कि वो एक साधारण भारतीय को भ्रमित कर उसे उसकी जड़ों से पूरी तरह काट दे। ये “स्वयंभू विद्वान” वैदिक साहित्य के बुरे पश्चिमी अनुवादों के संदर्भ उद्धरणों का उपयोग करते हैं और उन्हें अपने व्यवसाय के एजेंडे में फिट करते हैं।

दुःख इस बात का है कि बहुधा प्राचीन शास्त्रों का उनका भ्रामक विश्लेषण निर्विरोध स्वीकार लिया जाता है। दुर्भाग्य यह है कि कथित हिन्दू समाज इन भाष्यकारों को छोड़ने तथा महर्षि दयानन्द सरस्वती एवं आर्य विद्वानों के भाष्यों को स्वीकार करने को आज भी उद्यत नहीं है वरना यह स्थिति नहीं आती।

सनातन धर्म के मानने वालों के मन में पुनर्जन्म और विभिन्न योनियों में अटूट विश्वास रहा है और अभी भी है। इसका अर्थ है कि मनुष्य अलग-अलग पशुओं के रूप में जन्म लेता रहता है जब तक कि मोक्ष ना मिल जाए। इसलिए दुर्घटना से भी, क्या आप पशु वध करना चाहेंगे और अपने पूर्वजों में से सम्भवतः किसी एक को भक्षण के लिए मार देंगे? नहीं ना? इसीलिए जो लोग खाने के लिए पशुओं को मारते थे, उन्हें राक्षस और पिशाच कहा जाता था।

अब्रहामिक धर्मों के विपरीत, हिंदू सोचते और मानते हैं कि इस पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक जीव की आत्मा होती है, इसलिए संस्कृति के रूप से सिर्फ खाने में उपभोग के लिए किसी पशु को मारना हमारे यहाँ पर वेदों द्वारा स्वीकार्य होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

लेखक: कृष्णानंद गौर

‘दल्ला पुलिस’: पिंजरा तोड़ की देवांगना की गिरफ्तारी से दिल्ली पुलिस पर भड़के प्रशांत भूषण

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दिल्ली पुलिस के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया है। प्रशांत भूषण ने प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ की एक ख़बर पर प्रतिक्रिया देते हुए दिल्ली पुलिस को ‘दल्ला पुलिस’ बताया है। ‘द वायर’ की उस ख़बर में कहा गया था कि दिल्ली पुलिस ने जेएनयू में पढ़ने वाली एमफिल की छात्रा देवांगना कलिता को पिछले 10 दिनों के भीतर तीसरी बार गिरफ़्तार किया है। अबकी क्राइम ब्रांच ने ये कार्रवाई की।

इसी ख़बर से प्रशांत भूषण भड़क गए। बता दें कि देवांगना कुख्यात संगठन ‘पिंजरा तोड़‘ की कार्यकर्ता है, जो दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के दौरान लोगों को भड़काने और महिलाओं को उकसा कर सड़क जाम करवाने में लगी हुई थी। देवांगना को तीन दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया है, जिससे प्रशांत भूषण को मिर्ची लग गई। दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने भी लोगों का ध्यान इस तरफ आकृष्ट कराया कि प्रशांत भूषण दिल्ली पुलिस के लिए कैसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं।

देवांगना को इससे पहले उसकी साथी नताशा नरवाल के साथ 23 मई को गिरफ़्तार किया गया था। जमानत मिलने के बाद 28 मई को देवांगना को फिर गिरफ्तार किया गया। इस तरह से गिरफ़्तारी होने के बाद उसे 10 दिनों में तीसरी बार पुलिस ने शिकंजे में लिया है। देवांगना जाफराबाद में हिंसा फैलाने में लगी हुई थी। इससे पहले पुलिस ने 14 दिनों की कस्टडी माँगी थी, लेकिन 2 दिन की ही मिली। देवांगना के खिलाफ हत्या का प्रयास, आपराधिक साज़िश और दंगे फैलाने के आरोप हैं।

पिंजरा तोड़ के सदस्यों ने 22 फरवरी की शाम को नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के लिए स्थानीय निवासियों को भड़काया और उन्हें जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर इकट्ठा होने के लिए कहा। पूछताछ में खुलासा हुआ था कि नताशा और देवांगना ने दूसरे समुदाय को भड़काने के लिए पूरी रणनीति तैयार की थी। नताशा और देवांगना ने साजिश रच के 66 फूटा सड़क को ठप्प करवाया था। इन्होंने कई अन्य इलाकों में घूम-घूम कर लोगों को भड़काया और दंगों में भाग लेने को उकसाया।

बता दें कि ‘पिंजरा तोड़’ शुरू किया गया था हॉस्टल की समस्याओं को लेकर। लेकिन अब यह पूरी तरह से डीयू में वामपंथी प्रोपेगेंडा का महिला ब्रिगेड बन कर खड़ा हो चुका है जो हर उस विषय पर भीड़ की शक्ल लेकर पहुँच जाता है, जो वामपंथियों के वृहद एजेंडे का हिस्सा है। आप इनके फेसबुक पोस्ट्स को खँगालेंगे तो ‘पिंजरा तोड़’ की नेत्रियाँ दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों की पूरी आधारशिला रखती प्रतीत होती हैं।

शरजील हो या टुकड़े-टुकड़े गैंग, बख्शा नहीं जाएगा, भुगतने होंगे परिणाम: अमित शाह की दो टूक

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी को एक इंटरव्यू दिया है। इसमें उन्होंने अर्थव्यवस्था से लेकर प्रवासी संकट, पालघर लिंचिंग से लेकर चीन के साथ सीमा गतिरोध तक, हर सवाल के जवाब दिए हैं।

‘टुकडे टुकडे गैंग’ के संबंध में एक सवाल पर गृह मंत्री ने दोहराया कि किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वो शरजील इमाम हो या फिर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के ‘साजिशकर्ता’। अमित शाह ने कहा कि मोदी सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।

प्रवासी मजदूरों के सवाल पर अमित शाह ने कहा, “केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को 11,000 रुपए भेजे थे, ताकि शिविरों में रह रहे प्रवासियों की मदद की जा सके। हम इस बात से सहमत हैं कि कुछ कम्युनिकेशन गैप आए हैं, मगर हमें यह भी समझना चाहिए कि इन श्रमिकों को घर भेजने के लिए बसों और ट्रेनों को नियमित रूप से चलाया जा रहा है। 41 लाख प्रवासियों को बसों के जरिए भेजा गया। 54 लाख प्रवासी कामगारों को वापस भेजने के लिए 3,968 श्रमिक स्पेशल चलाए गए हैं।”

चीन के साथ सीमा गतिरोध के मुद्दे पर गृह मंत्री ने कहा, “नरेन्द्र मोदी सरकार देश की सीमाओं की सुरक्षा और देश के सार्वभौमत्व पर जरा भी आँच नहीं आने देगी। डिप्लोमेटिक स्तर पर और सेना के स्तर पर भारत-चीन मुद्दे पर बात हो रही है। मुझे भरोसा है कि स्थिति सँभल जाएगी। हम किसी का कुछ नहीं लेना चाहते हैं, लेकिन हमारा लेने की कोशिश करने वाले को मुँह तोड़ जवाब दिया जाएगा।”

पाकिस्तान के बारे में उन्होंने कहा, “भारत ने कभी भी विस्तारवादी नीति नहीं अपनाई है। मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि चाहे वह सर्जिकल स्ट्राइक हो या हवाई हमला, न तो भारत की सीमाओं का उल्लंघन बर्दाश्त किया जाएगा और न ही भारत के क्षेत्र पर हमला। हम किसी और के किसी भी चीजों की अभिलाषा या लोभ नहीं रखते हैं।”

इसके साथ ही गृह मंत्री ने कहा, “हम भारत को उत्पादन का हब बनाना चाहते हैं। अगर देश का व्यक्ति ये तय कर ले कि हम भारत में बनी चीजों का ही उपयोग करेंगे तो हमारे अर्थतंत्र को बड़ी गति मिलेगी। आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल की दिशा में हम आगे बढ़ेंगे।”

अमित शाह ने अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष में बात करते हुए कहा, “ये दोनों देश की एकता और अखंडता से जुड़े हैं। सीएए पर जिसने भी भ्रांति फैलाई है उसे अब चिंता हो रही है। हमने दिल्ली में षड्यंत्र का एक केस भी रजिस्टर किया है और उसके तहत जो जो भी दोषी होगा, उस पर कानूनी कार्रवाई होगी।”

उन्होंने आतंकवाद के लिए कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि घाटी में युवाओं को भड़काने का सबसे बड़ा कारण अनुच्छेद 370 था। इससे अलगाववाद और आतंकवाद की तरफ घाटी का युवा जाता था। 90 के बाद सबसे कम आतंकी घटनाएँ 370 हटाने के बाद और 2014-2020 के दौरान हुई है।

इसके साथ ही उन्होंने पालघर लिंचिंग पर कहा कि भारत सरकार इस पर मूक दर्शक बनकर नहीं बैठी है। हाईकोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया है। ये गंभीर मामला है और सरकार इस पर मूक दर्शक बनकर नहीं बैठेगी।

महाराष्ट्र CM कोरोना रिलीफ फंड में आए ₹342 करोड़, संक्रमण से लड़ने पर केवल ₹23.82 करोड़ खर्च: RTI से खुलासा

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कोरोना वायरस रिलीफ फंड में दानदाताओं की मदद से 18 मई तक 342.01 करोड़ रुपए जमा हुए थे। लेकिन अभी तक महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी सरकार ने COVID-19 संबंधित व्यवस्थाओं में कुल धनराशि में से केवल 23.82 करोड़ रुपए का इस्तेमाल किया है। इसका खुलासा एक RTI के जरिए हुआ।

बता दें कि मुंबई के आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने एक आरटीआई दायर की थी। इसमें कोरोना वायरस के खिलाफ राज्य की लड़ाई में प्राप्त धन और खर्च के बारे में जानकारी माँगी गई थी।

RTI के तहत मिले जवाब के अनुसार, 18 मई, 2020 तक कुल 342.01 करोड़ रुपए जमा किए गए। इनमें से 79.82 करोड़ रुपए इस फंड से खर्च किए गए। हैरत की बात ये है कि इनमें से केवल 23.82 करोड़ रुपए ही COVID-19 संबंधित मामलों में खर्च किए गए।

सीएम रिलीफ फंड के सहायक लेखाधिकारी मिलिंद काबाडी ने बताया कि 18 मई 2020 तक कुल 342.01 करोड़ रुपए की धनराशि जमा हुई है। इस धनराशि में से कुल 79,82,37,070 रुपए खर्च हुए हैं। खर्च हुई धनराशि से कोविड-19 पर केवल 23, 82,50,000 रुपए खर्च की गई है। इसमें से 20 करोड़ रुपए सेंट जार्ज अस्पताल मुंबई को आवंटित किया गया और 3,82,50,000 रुपए मेडिकल शिक्षा और संशोधन विभाग को दिया गया है।

इसके अलावा, महाराष्ट्र सरकार द्वारा खर्च की गई कुल राशि का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी मजदूरों को उनके मूल राज्यों में वापस भेजने में खर्च किया गया। वहीं प्रवासी मजदूरों के लिए जो रकम आवंटित की गई है, उसे राज्य जिलाधिकारियों को सौंप दी गई है ताकि रेलवे किराए का भुगतान समय पर हो सके। इसमें 36 जिला स्थित प्रवासी मजदूरों का किराया 53,45,47,070 रुपए बताया गया है। रत्नागिरी जिला स्थित प्रवासी मजदूर का रेलवे का किराया 1.30 करोड़ और सांगली स्थित मजदूर का रेलवे का किराया 44.40 लाख रुपए अदा किया गया है।

RTI में कहा गया है कि औरंगाबाद में हुए रेल हादसे में 16 मृतक मजदूरों के परिजनों को 80 लाख रुपए की आर्थिक मदद सीएम रिलीफ फंड कोविड -19 के अकाउंट से की गई है। 

अनिल गलगली के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार ने कोरोना वायरस को लेकर कुल जमा रकम में से सिर्फ 7 प्रतिशत रकम स्वास्थ्य सेवा पर खर्च की है। प्रवासी मजदूरों की रेलवे टिकट पर 16 प्रतिशत रकम खर्च की है और रेलवे दुर्घटना के मृतकों पर 0.23 प्रतिशत रकम खर्च की है।

आज भी सीएम रिलीफ फंड में 262.28 करोड़ रुपए की धनराशि हैं। अनिल गलगली ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को चिठ्ठी लिखकर स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए COVID19 फंड का इस्तेमाल करने का अनुरोध किया है।

राजदीप सरदेसाई की ‘लाश’ पत्रकारिता: बीमारी से राजकुमार की मौत, कहा- भूख से मरा, सरकारी मदद कहाँ

राजदीप सरदेसाई ने उत्तर प्रदेश के बाँदा में एक गरीब की मौत पर अपनी ‘गिद्ध वाली पत्रकारिता‘ करनी चाही। उन्होंने एक वीडियो पोस्ट किया और साथ में लिखा कि बुंदेलखंड के बाँदा में गरीबों की भूख से हालत खराब है। उन्होंने बताया कि उनकी पत्रकार मौसमी ने एक व्यक्ति से अपनी स्टोरी के दौरान बात की थी, जो अब चल बसा है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि अनाज गोदामों में रखे-रखे सड़ रहे हैं।

‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने पूछा कि आखिर सरकार के ये सारे पैकेज जनता के पास कब पहुँचेंगे? ऐसा कहने के पीछे उनका तात्पर्य था कि मृतक को सरकार ने सहायता नहीं मुहैया कराई थी, इसलिए उसकी जान चली गई। बाँदा के डीएम ने राजदीप सरदेसाई को सच्चाई से अवगत कराया। मृतक का नाम राजकुमार है, जो खम्हौरा गाँव का निवासी था। ये अंतर्रा प्रखंड के अंतर्गत आता है।

डीएम ने बताया कि मृतक राजकुमार की पत्नी मनोज कुमार अंत्योदय राशन धारक है। उन्हें अप्रैल 1, 2020 को 20 किलो गेहूँ और 15 किलो चावल दी गई थी। इसके बाद उसी महीने की 17 तारीख को ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ 5 किलो चावल दिया गया था। मई 6, 2020 को उन्हें पुनः अंत्योदय कार्ड से 20 किलो चावल और 15 किलो गेहूँ मुहैया कराया गया था। इन सबके बावजूद राजदीप ने बिना कुछ जाने झूठ फैलाया।

हाल ही में 18 मई 2020 को मृतक की पत्नी को फिर से ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना’ के तहत 5 किलो चावल और 1 किलो चना प्राप्त हुआ था। बता दें कि ये खाद्य सामग्रियाँ निःशुल्क दी गई है, इसके एवज में कोई पैसा नहीं लिया गया। साथ ही बाँदा प्रशासन ने साफ़ कर दिया है कि राजकुमार की मृत्यु भूख के कारण नहीं हुई है, बीमारी के कारण हुई है। इसके बाद लोगों ने राजदीप सरदेसाई को जम कर लताड़ा।

हालाँकि, राजदीप सरदेसाई ने बाद में बाँदा के डीएम का उनकी रिप्लाई के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि वो अपनी स्टोरी में उनकी इस प्रतिक्रिया को जोड़ने की कोशिश करेंगे। एक यूजर ने राजदीप से कहा कि वो अब जनता से माफ़ी माँगें। इसके बावजूद राजदीप सरदेसाई बाँदा के राजकुमार का वो इंटरव्यू लोगों को दिखाते रहे, जो उन्होंने तब दिया था जब वो जिन्दा थे। लोगों ने आरोप लगाया कि वो सरकार को बदनाम करने के लिए लगे हुए हैं।

फीस बढ़ाने को लेकर UP के निजी स्कूल पहुँचे हाईकोर्ट, कपिल सिब्बल ने स्कूलों का रखा पक्ष

उत्तर प्रदेश के प्राइवेट स्कूलों की एसोसिएशन ने एक तरफ फीस बढ़ाने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है तो वहीं दूसरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक ज्ञापन देकर प्राइवेट स्कूल एक्ट बनाने की माँग की है। हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका के बाद कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है।

हाईकोर्ट में सरकार के फैसले के खिलाफ जाते हुए प्राइवेट स्कूलों ने यह दलील दी कि वह लोग ऑनलाइन क्लासेज चला रहे हैं और उनको स्कूल में तैनात शिक्षकों की सैलरी को भी बढ़ाना है। इसके साथ-साथ स्कूल के खर्चे भी उन्हीं को चलाने हैं। ऐसे में सरकार फीस बढ़ाने के उनके अधिकार को नहीं रोक सकती।

प्राइवेट स्कूलों के एसोसिएशन की ओर से दाखिल की गई याचिका पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस देकर जवाब माँगा है। यह आदेश जस्टिस अनिल कुमार और जस्टिस सौरभ लवानिया की बेंच ने पारित किया है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 18 जून को की जाएगी।

दरअसल याचिका पर सुनवाई के दौरान प्राइवेट स्कूलों की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए थे।

प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष अतुल श्रीवास्तव ने बताया, “हम लोग लॉकडाउन में अभिभावकों की परेशानी समझ रहे हैं, लेकिन स्कूलों की परेशानी भी सरकार को समझनी पड़ेगी। हम ऑनलाइन क्लासेज चला रहे हैं। हम लगातार लॉकडाउन के बाद भी बच्चों को पढ़ा रहे हैं और जब तक लॉकडाउन रहेगा तब तक बच्चों को पढ़ाते भी रहेंगे, हमें शिक्षकों को बढ़ी हुई सैलरी भी देनी है।”

श्रीवास्तव ने कहा, “हम स्कूलों के खर्चे भी मेंटेन करते हैं। अगर हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं तो फीस बढ़ाने के हमारे अधिकार हमारे पास होने चाहिए। सरकार जैसे दूसरे क्षेत्रों को मदद कर रही है वैसे हमें भी मदद करें, हमें भी अनुदान दे या फिर अभिभावकों को कुछ अनुदान दें ताकि हमारे स्कूल भी चल सकें। अगर हम शिक्षकों की सैलरी नहीं बढ़ाएँगे तो हम अच्छे शिक्षकों को रोक नहीं पाएँगे। इसलिए हम लोगों ने फीस बढ़ाने के अपने अधिकार को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया है।”

मामले को लेकर उप मुख्यमंत्री और शिक्षा विभाग के प्रमुख दिनेश शर्मा ने कहा, “प्राइवेट स्कूल अगर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं तो हम भी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे। अगर कोरोना संकट के इस दौर में प्राइवेट स्कूल किसी तरह की फीस को बढ़ाने की मनमानी करते हैं तो भारी जुर्माना लगाया जाएगा।”

डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा ने कहा कि कोरोना संकट को देखते हुए सिर्फ एक साल के लिए आदेश निकाला गया है। लोगों की आर्थिक तंगी के चलते उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होगी, इसलिए जो स्कूल हैं, वह एक साल के लिए फीस नहीं बढ़ाएँ। हर महीने की फीस लें।

साथ ही एक बार में 3 महीने या 6 महीने की फीस न वसूली जाए, ऐसा भी आदेश राज्य सरकार ने जारी किया है। और अभी जब तक बस नहीं चलनी है तो कोई वाहन शुल्क ना लें, यह सरकार का आदेश है। यह मानना इन स्कूलों की बाध्यता है, लेकिन अगर यह लोग मनमानी करेंगे तो राज्य सरकार एक्शन लेगी।

वहीं दूसरी तरफ एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन देकर प्राइवेट स्कूल एक्ट बनाने की माँग की है। साथ ही जो फीस वृद्धि एक साल तक रोकने का ऑर्डर निकाला गया है, उसे भी खत्म करने की माँग की गई है।

दरअसल कोरोना की रोकथाम के लिए देश में जारी लॉकडाउन के बीच उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने एक आदेश निकालकर सभी प्राइवेट स्कूलों में एक साल के लिए फीस वृद्धि पर रोक लगा दी थी। साथ ही वाहन शुल्क भी लेने से मना कर दिया था, जिसके खिलाफ एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट स्कूल उत्तर प्रदेश ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

एजेंडा के लिए हो रहा न्यायपालिका का इस्तेमाल, सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप के लिए लोग जा रहे SC: हरीश साल्वे

न्यायपालिका को कमजोर करने के लिए उस पर हो रहे हमलों पर बात करने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने शनिवार (मई 30, 2020) को एक वेबिनार में उपस्थिति दर्ज कराई। इस दौरान उन्होंने कई मुद्दों पर बात करते हुए बताया कि न्यापालिका की आलोचना में क्या दायरे होने चाहिए और क्या कहा जाना चाहिए और क्या नहीं। इस वेबिनार को ‘कैन फाउंडेशन’ द्वारा होस्ट किया गया था, जिसमें साल्वे ने ये बातें कहीं।

इस दौरान साल्वे ने हर्ष मंदर की जम कर आलोचना की, जो हाल ही में सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शनों में समुदाय विशेष को उकसाते हुए पाया गया था। मंदर दूसरे समुदाय को भारत सरकार के खिलाफ भड़काता रहा है और वो खुद को एक्टिविस्ट भी बताता है। साल्वे ने कहा कि कई ऐसे लोग हैं, जो रोज-रोज कोर्ट को गाली देते हैं। ऐसे लोग सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते हुए कहते हैं कि उन्हें न्याय की उम्मीद नहीं है और अगले ही दिन भागे-भागे कोर्ट में आते हैं।

साल्वे ने पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट को इन्हें नज़रंदाज़ करना चाहिए? उन्होंने कहा कि सबसे अच्छा विकल्प यही है कि इन्हें भाव ही न दिया जाए। इसके बावजूद साल्वे ने आत्ममंथन पर जोर दिया। उन्होंने मीडिया के एक लेख के बारे में बात करते हुए कहा कि उसमें भारतीय न्यापालिका को आशाहीन बताते हुए अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका से न्याय की उम्मीद जताई गई है। उन्होंने इसे दायरा लाँघना करार देते हुए कहा कि ये फ्रीडम ऑफ स्पीच और लिबर्टी ऑफ एक्सप्रेशन का उल्लंघन है।

साल्वे ने कहा कि कोर्ट के किसी फैसले के आधार पर आलोचना होना ठीक है लेकिन ये कहना कि अदालत ये करे और ये न करे, सही नहीं है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि आजकल लोग कोर्ट के किसी फैसले की आलोचना की जगह कोर्ट की ही आलोचना करते हैं और अपना एजेंडा पूरा करने के लिए अदालत जाते हैं। साल्वे ने सरकार से व्यक्तिगत मानहानि के लिए एक ट्रिब्यूनल के गठन की माँग की है। उन्होंने यूके का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ व्यक्तिगत मानहानि के मसलों को फ़ास्ट-ट्रैक आधार पर सुलझाया जाता है जबकि भारत में ऐसे केस सालों चलते रहते हैं।

उन्होंने इस दौरान प्रशांत भूषण के मामले का उदाहरण भी दिया। भूषण ने जस्टिस कपाड़िया के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। इस मामले में अटॉर्नी जनरल ने भी कुछ नहीं किया था, जिसके बाद साल्वे इस मुद्दे को लेकर कोर्ट गए थे। हालाँकि, जस्टिस कपाड़िया तो नहीं रहे लेकिन ये केस अभी भी लंबित पड़ा हुआ है। साल्वे ने कहा कि सामान्य ‘ट्रोल्स’ को नजरंदाज किया जा सकता है लेकिन जो लोग जनता को किसी मुद्दे पर प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, उनसे इन मामलों में सावधानी से निपटा जाना चाहिए। इनमें एक्टिविस्ट और ओपिनियन मेकर वगैरह आते हैं। साल्वे ने कहा:

“कई लोग सरकार को बदनाम करने का एजेंडा लिए कोर्ट में आते हैं। जब निर्णय उनके पक्ष में नहीं आता तो वो जज पर बेईमान होने का आरोप लगा देते हैं। एक जज को बिना डरे काम करने और ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की शपथ लेनी होती है लेकिन आज मीडिया दौर के दौर में एक जज के मन में हमेशा पब्लिक ओपिनियन उसके खिलाफ जाने का भय बना रहता है। अगर सोशल मीडिया में निंदा का ये दौर चलता ही रहा तो फिर आज से 20 साल बाद प्रैक्टिस करने के लिए कोर्ट का अस्तित्व ही न हो, ऐसा हो सकता है।”

लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित के मामले में एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन द्वारा किए गए मीडिया ट्रायल की भी साल्वे ने आलोचना की। उन्होंने बताया कि श्रीनिवासन जैन ने उन्हें कॉल कर के पूछा था कि आखिर पुरोहित को जमानत कैसे मिल गई? बकौल साल्वे, उन्होंने जवाब दिया कि आप इतने निश्चित कैसे हो कि बेल मिलना चाहिए था या नहीं? तब तो एडिशनल सोलिसिटर जनरल की जगह आपको ही कोर्ट में दलीलें पेश करनी चाहिए थीं?

उन्होंने बताया कि संचार एजेंसी पीटीआई ने एक बार प्रकाशित कर दिया था कि उन्होंने कोर्ट में कहा कि हाँ, उनके क्लाइंट ने टैक्स की चोरी की है। उन्होंने बताया कि एजेंसी के किसी सदस्य को किसी ने ऐसा बोल दिया कि ये साल्वे के शब्द हैं और उसने छाप दिया। उन्होंने कोर्ट में लगातार जाने वाली जनहित याचिका के बारे में कहा कि यह सरकार के कामकाज पर असर डालने का एक हथियार बन गया है। उन्होंने बताया कि एक समय था, जब जुडीसियरी ही सरकार चला रही थी।

बता दें कि हरीश साल्वे ने ही इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में पाकिस्तान की जेल में बंद कुलभूषण जाधव मामले में भारत का पक्ष रखा था। जाधव का पहरण कर के उन पर भारतीय जासूस होने का आरोप लगाया गया और फाँसी की सजा सुना दी गई। पाकिस्तानी सैन्य अदालत के इस फैसले पर अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने रोक लगा दी। हरीश साल्वे जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने का भी समर्थन कर चुके हैं।

बालों से दुखी सागिरका घोष ने माँगा बार्बर, केजरीवाल ने खोल दिए सैलून, ट्विटर पर बताया भी- जाइए कटवा लीजिए

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार (जून 1, 2020) को राज्य में कोरोना वायरस की स्थिति को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली के बॉर्डर एक हफ्ते के लिए सील होंगे। इस दौरान केवल पास के जरिए जरूरी सेवाओं से जुड़े लोग आवाजाही कर सकेंगे।

इस दौरान मुख्यमंत्री केजरीवाल ने बताया कि दिल्ली में सैलून खोलने की अनुमति है। केजरीवाल के इस फैसले से खुश महिला पत्रकार सागरिका घोष ने ट्वीट करते हुए लिखा कि ये उनके बालों की समस्या को लेकर लगाई गई गुहार का ही नतीजा है कि सीएम अरविंद केजरीवाल ने नाई की दुकान और सैलून खोलने की इजाजत दी। सागरिका ने इसके लिए सीएम को धन्यवाद कहा।

सीएम केजरीवाल ने इसका जवाब देते हुए लिखा, “जाइए कटवा लीजिए।” दिल्ली बीजेपी के मीडिया प्रभारी प्रत्यूष कंठ का कहना है कि सीएम केजरीवाल ने महज 60 सेंकेंड के अंदर सागरिका के ट्वीट का जवाब दे दिया। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि दिल्ली बीजेपी चीफ मनोज तिवारी लगातार सीएम से पूछ रहे हैं कि उन्होंने टीवी और प्रिंट विज्ञापनों, नए हॉस्पिटल बेड और वेंटीलेटर आदि पर कितने खर्च किए, मगर वो जवाब नहीं दे रहे हैं। उन्होंने सागरिका घोष से मदद माँगी है, क्योंकि सीएम केजरीवाल ने उन्हें तुरंत जवाब दिया।

वहीं सोशल मीडिया पर भी इस ट्वीट को लेकर दिलचस्प प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। वोक श्री सनीचर नाम के एक यूजर ने लिखा, “बालों से दुखी महिला पत्रकार ने लगाई गुहार, केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा – ‘कटवा लीजिए”

एक यूजर ने लिखा, “आप स्वयं जाकर काटोगे?”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “सेठजी को आम जनता की सुखकारी के आलावा सब कुछ मालूम है। सेठ एक खास बिरादरी के हेयर कट तक की सेवा कर देंगे। दंगाई बलात्कारी के लिए पैसे हैं। पैसे नहीं है तो सिर्फ आम नागरिक और दिल्ली के कर्मचारी के लिए। वरना 12 मिनट की कोरोना की समझ देनी हो पेपर में तीन-तीन पन्ने की ऐड पैसे तो हैं।”

आशीष सिंह माही नाम के यूजर लिखता है, “दिल्ली में कोरोना विस्फोट हुआ है और मुख्यमंत्री कह रहे हैं एन्जॉय करिए, इतनी संवेदनहीनता लाते कहाँ से हैं अरविंद केजरीवाल?”

एक ने लिखा, “दिल्ली में लाश के ऊपर लाश रखी हुई है। अस्पतालों में मरीजों के इलाज की जगह नहीं है। पूरी दिल्ली खुल गई है। अब ऑटो में भी चार सवारी बैठ सकती है। आने वाला समय किस कदर होने वाला है। इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। लेकिन यह धूर्त बाल कटवाने की वकालत कर रहा है।”

एक यूजर लिखता है, “दिल्ली वालों के लिए साफ पानी सप्लाई के लिए भी कोई खास वर्ग आगे आकर इसी तरह माँग करे तो उनकी भी माँग पूरी हो सकती है।”

इकबाल अहमद नाम के शख्स ने लिखा, “पत्रकार का पॉवर! एक दिन पहले सैलून खोलने का ट्वीट दूसरे दिन सैलून खुल भी गया। खास बात कि ट्वीट कर के मुख्यमंत्री बता भी दिए जाइए सैलून खुल गया। यह फैसला उस वक़्त जब दिल्ली की सीमा सील की जा रही है। काश मज़दूरों के ट्वीट पर इसी तरह फौरन एक्टिव होते मुख्यमंत्री जी।”

बता दें कि सागरिका घोष ने 30 मई को एक ट्वीट करते हुए सीएम केजरीवाल से गुहार लगाई थी कि दिल्ली में हेयर कट सर्विस को चालू कर दिया जाए।

पाकिस्तानी उच्चायोग की ‘असली कार’ में घूम रहे थे ‘नकली आधार’ वाले जासूस: जानें, कैसे पकड़े गए

नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में तैनात दो कर्मचारी 31 मई 2020 को जासूसी करते रंगे हाथ पकड़े गए थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इन्होंने खुद को भारतीय बताने के लिए फर्जी आधार कार्ड बनवा रखा था।

उच्चायोग के वीजा विभाग में कार्यरत इन जासूसों की पहचान आबिद हुसैन और ताहिर हुसैन के तौर पर की गई है। दोनों को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने ट्रेनिंग दी थी। दोनों को उनके ड्राइवर जावेद हुसैन के साथ 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने को कहा गया है।

रिपोर्टों के अनुसार इन्होंने भारत छोड़ दिया है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के हवाले से वाघा बॉर्डर के जरिए इनके वापस लौट आने की पुष्टि की गई है।

पत्रकार आदित्य राज कौल ने एक वीडियो शेयर किया है। जिससे पता चलता है कि दोनों जासूसी के लिए पाकिस्तानी उच्चायोग के आधिकारिक वाहन का इस्तेमाल करते थे। इस गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर 89 CD 106 है। कार का शीशा टूटा हुआ था और पकड़े जाने के बाद इन्होंने भागने की कोशिश भी की थी।

पाकिस्तानी उच्चायोग इस कार को बेचने की फिराक में था। इसकी ब्रिकी के लिए कुछ दिन पहले उच्चायोग की ओर से लोकल न्यूजपेपर में विज्ञापन दिया गया था।

आबिद हुसैन और ताहिर खान फर्जी आधार कार्ड लेकर इसी कार से घूम रहे थे। आबिद ने नासिर गौतम के नाम से आधार बनवा रखा था। इन्हें जब पकड़ा गया तब ये करोलबाग में संवेदनशील जानकारी हासिल करने के लिए एक ‘डिफेंस कर्मचारी’ से मिलने गए थे। इनके पास से 15 हजार रुपए और दो आईफोन भी मिले हैं।

कौल ने 2.20 मिनट का एक वीडियो भी शेयर किया है। इसमें 42 वर्षीय आबिद हुसैन एक रेस्तरां में किसी से बात कर रहा है। कौल ने वीडियो में दिख रही तिथि गलत है डिस्क्लेमर के साथ इसे साझा किया है। यह वीडियो वायरल हो रहा है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार सैन्य खुफिया ईकाई को कुछ हफ्ते पहले आबिद और ताहिर हुसैन के बारे में विश्वसनीय जानकारी हाथ लगी थी। पता चला था कि वे सेना के बारे में गोपनीय जानकारी जुटाने की कोशिश में लगे हैं। उनके निशाने पर आर्मी से जुड़े लोग थे। उनसे ये नकली भारतीय पहचान के साथ संपर्क करते थे।

इसके बाद से ही सैन्य खुफिया ईकाई की इन पर नजर थी। सूत्रों के अनुसार ISI ने इन्हें ऐसे लोगों की सूची भी दे रखी थी जिन्हें अपने जाल में फॉंसना था। इनके करोलबाग जाकर किसी से मिलने की सूचना मिलने के बाद सैन्य खुफिया ईकाई ने दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के साथ जाल बिछाया और इन्हें धर-दबोचा।

जब इनसे इनकी पहचान को लेकर सवाल किया गया तो आबिद ने खुद को गीता कॉलोनी निवासी नासिर गौतम बताया। उसने इसकी पुष्टि के लिए आधार कार्ड भी दिया। लेकिन अधिकारियों को जल्द ही पता चल गया कि यह फर्जी है। कार्ड पर ‘Gautam’ की जगह ‘Gotam’ लिखा था। पूछताछ में दोनों ने पाकिस्तानी नागरिक होने और दिल्ली स्थित उच्चायोग में तैनात होने की बात कबूल ली।

गौरतलब है कि इससे पहले 2016 में, पाकिस्तान उच्चायोग के अधिकारी महमूद अख्तर के पास से संवेदनशील दस्तावेज मिलने के बाद उन्हें persona non grata घोषित किया गया था।

पूछताछ के दौरान, अख्तर ने खुलासा किया था कि वह पाकिस्तान सेना की बलूच रेजिमेंट से संबंधित था और डेपुटेशन पर पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी इंटर-सर्विस इंटेलिजेंस (ISI) में शामिल हो गया था। वह सितंबर 2013 से नई दिल्ली के पाकिस्तानी उच्चायोग में तैनात था।

पाकिस्तान के उच्चायुक्त को तत्कालीन विदेश सचिव ने बुलाया और अख्तर की गतिविधियों पर भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। पाकिस्तान ने उसी दिन बदले की नीयत से इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग के एक सहायक कार्मिक और वेलफेयर अधिकारी सुरजीत सिंह को persona non grata घोषित कर दिया था। इस बार भी अपने दो जासूसों की पोल खुलने के बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है।