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‘ब्राह्मणों-जाटों ने मारा, गोमूत्र पिलाया’: 12 मुस्लिम परिवारों को हिन्दू बनाने की घटना को पुलिस ने बताया फर्जी

सोशल मीडिया पर एक ऐसी खबर को फैलाने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें दावा किया गया कि हिन्दू युवकों ने 12 मुस्लिमों का जबरन धर्मान्तरण कर उन्हें हिन्दू बनाया है। यह भ्रामक और बेबुनियाद खबर सबसे पहले ‘इंडिया टूमारो’ (India Tomorrow) नामक वेबसाइट पर प्रकाशित की गई। बाद में इसने सोशल मीडिया पर अपने लिए जगह बना ली।

क्या है प्रपंच

इंडिया टूमारो की इस खबर में लिखा गया है, “हरियाणा के सोनीपत जिले की सीमा से लगे दिल्ली के बवाना इलाके के हरेवली गाँव में 12 मुस्लिम परिवारों को जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि 5 मई को बवाना इलाके के हरेवली गाँव के 12 मुस्लिम परिवारों के लगभग 60 लोगों को गाँव के कुछ जाट दबंगों द्वारा हिंदू धर्म अपनाने के लिए बाध्य किया गया।”

@Amreen8Malik ने ट्विटर पर दिलशाद का एक बयान भी ट्वीट किया है –

लेकिन, इस घटना की जाँच और पुलिस से बातचीत के बाद हमने पाया है कि इस वेबसाइट द्वारा किए गए दावे वास्तविकता से एकदम अलग हैं। इस घटना को कुछ मुस्लिम युवकों द्वारा साम्प्रदायिक रंग देने के लिए सोच-समझकर भ्रामक तथ्य जोड़ तैयार किए जा रहे हैं।

ऑपइंडिया ने दरियापुर पुलिस चौकी, बवाना से संपर्क कर जो जानकारी जुटाई, उनसे पता चला कि इस प्रोपेगेंडा को मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार के रूप में साबित करने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि यह कुछ और ही था।

क्या है असली मामला

ऑपइंडिया से बातचीत में पुलिस अधिकारियों ने बताया कि बवाना इलाके के हरेवली गाँव का ही एक मुस्लिम युवक दिलशाद, तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल होकर भोपाल से लौटा था।

इसी बीच देशभर में तबलीगी जमात के उपद्रव के कारण खबरें सामने आने लगीं, जिनमें पता चला कि तबलीगी जमात देशभर में कोरोना संक्रमण का सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा था। गाँव के लोगों में इन सभी बातों से भय का माहौल था।

जब दिलशाद ने अपने तबलीगी जमात से लौटने की बात बताई तो क्वारंटाइन जैसी बातों को लेकर गाँव के ही कुछ युवकों के साथ उसकी बहस हो गई और बाद में यह बहस झड़प में बदल गई। लोगों को शक था कि युवक साजिशन कोरोना वायरस फैलाने के लिए गाँव में घुसा है।

युवकों ने कहा कि दिलशाद कोरोना संक्रमण का जरिया बन सकता है। पुलिस ने बताया कि इस घटना को लेकर गाँव के कुछ युवकों पर FIR भी दर्ज की गई और सम्बंधित जाँच अभी भी जारी है।

लेकिन यहाँ से दिलशाद और उसके कुछ साथियों ने इस घटना को चर्चा में लाने का जरिया बनाने का प्रयास किया और अपने बयानों को पूरी तरह से नया रंग दे दिया, जिन्हें कि सोशल मीडिया पर खूब शेयर भी किया जा रहा है।

हकीकत यह है कि यदि आप इन रिपोर्ट्स को पढ़ेंगे, या दिलशाद के बयान का वीडियो देखेंगे तो आप स्वयं इस नतीजे पर पहुँच जाएँगे कि इसे हिन्दुओं के खिलाफ उनकी छवि ख़राब करने के लिए एक सुनियोजित तरीके से दुष्प्रचार कर फैलाया जा रहा है।

रिपोर्ट्स और वीडियो में दिलशाद ने आरोपितों को अनगिनत बार हिन्दू कहा है। तब भी हिन्दू कहा है, जब कि सवाल उनके मजहब को लेकर नहीं बल्कि कुछ और ही था। यानी, यदि सवाल यह है कि वो तबलीगी जमात से कब लौटा था, तो इसके जवाब में भी दिलशाद यही कहते देखे जा सकते हैं कि ‘वो सब हिन्दू थे, वो जाट थे, वो ब्राह्मण थे’।

इंडिया टूमारो की रिपोर्ट में ही इसके प्रोपेगेंडा और मनगढ़ंत कहानी का तरीका इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है, जिन्हें आप इस वेबसाइट से लिए गए स्क्रीनशॉट में पढ़ सकते हैं –

यही नहीं, रिपोर्ट को सांप्रदायिक रंग देने के लिए लिखा गया है, “दबंगों ने जबरन मंदिर ले जाकर गौ मूत्र पिलाया और कहा कि आज से कोई भी मस्जिद नहीं जाएगा और मुर्दों को कब्रिस्तान में नहीं दफनाएगा। सभी को हिन्दुओं की तरह मुर्दे को शमशान ले जाकर जलाना है।”

किसी स्थानीय व्यक्ति के हवाले से इस कथित रिपोर्ट में लिखा गया है कि वो सभी मुसलमान ही हैं, मगर उनके नाम हिन्दू नामों जैसे हैं जिस कारण उन्हें हिन्दू बनाया जा रहा है।

पुलिस का कहना है कि दिलशाद के साथ झगड़ा करने वाले युवकों पर FIR के बाद उन्हें गिरफ्तार भी किया जा चुका है, लेकिन दिलशाद और उसके कुछ साथी इसे जबरन साम्प्रदायिक साबित करना चाह रहे हैं।

हमने जाँच की, स्पेशल ब्रांच और आईबी ने भी जाँच में पाया कि यह सब काल्पनिक और बेबुनियाद पाए गए हैं। उन्होंने बताया कि उनके ही किसी स्थानीय साथी, जो कि पेशे से वकील हैं ने इससे सम्बंधित बयान यूट्यूब पर डाल दिया।

पुलिस ने बातचीत में बताया कि दिलशाद के साथ उसका एक मित्र भी भोपाल गया था, जो कि वहीं रुक गया था। लेकिन सिर्फ इस घटना को मजहबी रंग देने के लिए नए बयान देकर कहा जा रहा है कि दिलशाद ने अपने साथ हुई धर्म परिवर्तन की घटना के बाद उसे दिल्ली ना आने को कह दिया।

पुलिस ने बताया कि वास्तविकता यह है कि वो दिल्ली न आने के बजाए वहीं रुक गया था, क्योंकि उसका घर वहीं है, ना कि दिल्ली। इस वेबसाइट द्वारा जिस तरह से ये पूरा घटनाक्रम दिखाया जा रहा है उसका निचोड़ इसी रिपोर्ट के अन्त में लिखा भी गया है।

वास्तव में इस तरह के प्रोपेगेंडा को सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं की छवि को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से तैयार किया जा रहा है।

कोरोना वायरस के दौरान खुद को जबरन पीड़ित बताकर यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि जो उपद्रव देशभर में तबलीगी जमात और मुस्लिम समुदाय के ही अन्य लोगों ने किया है, शायद इस तरह के फर्जी नैरेटिव और कथानक तैयार कर उनकी भरपाई की जा सकेगी।

यह भी दिलचस्प बात है कि ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण मामले तब सामने आ रहे हैं, जब कुछ दिन पहले ही शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ ने एक लेख में लोगों को सलाह दी कि भारत में यदि सत्ता से लड़ना है तो प्रपंच और झूठ का सहारा लिया जाना चाहिए।

मिलेनियम पार्क को कब्रिस्तान बनाने की फिराक में दिल्ली वक्फ बोर्ड: ​उपराज्यपाल को VHP का खत

कोरोना संक्रमितों को दफनाने के नाम पर इंद्रप्रस्थ के मिलेनियम पार्क की जमीन हड़पने की साजिश रची जा रही है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अनुसार इसके पीछे दिल्ली वक्फ बोर्ड है। बोर्ड को दिल्ली सरकार के कुछ लोगों का भी समर्थन हासिल है।

VHP ने इस संबंध में दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल को पत्र लिखा है। पत्र में आरोप लगाया है कि दिल्ली वक्फ बोर्ड मिलेनियम पार्क की जमीन पर अवैध अतिक्रमण कर रहा है। इसलिए ‘जदीद कब्रिस्तान अहाले इस्लाम’ का बोर्ड पार्क के गेट से हटवाया जाए।

शिकायत के अनुसार, दिल्ली वक्फ बोर्ड ने कोरोना के नाम पर पार्क की जमीन पर अतिक्रमण करने की कोशिश की है। वे इस पार्क में कोरोना संदिग्धों को दफनाकर इसे कब्रिस्तान बनाने का प्रयास रहे हैं।

VHP का कहना है कि इस मामले के संबंध में स्थानीय नागरिक भी वक्फ बोर्ड की मंशा पर आपत्ति जता रहे हैं। विहिप ने बताया कि स्थानीय गाँव नंगली रजापुर के नागरिकों की सजगता से इंद्रप्रस्थ मिलेनियम पार्क में अतिक्रमण रुक गया है। लेकिन, इसे कब्जाने के प्रयास अब भी जारी है और लगातार पार्क में कोरोना संक्रमितों के शवों को दफनाने की कोशिश हो रही है, साथ ही पार्क के ताले भी तोड़े जा रहे हैं।

VHP के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने इस संबंध में ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया है। साथ ही लिखा है, “इसे जमीन जिहाद कहते हैं और दिल्ली वक्फ बोर्ड इसमें माहिर हैं।”

गौरतलब है कि पिछले माह एक आदेश मे दिल्ली वक्फ बोर्ड ने मिलेनियम पार्क के पास कोरोना वायरस संक्रमितों को दफनाने के लिए जदीद कब्रिस्तान नाम से एक जगह निर्धारित कर शहर के मुस्लिमों को वहाँ शव को दफनाने से पहले क्रिया करने की इजाजत दी।

इस बारे में सूचना पाते ही नगली राजापुर के स्थानीय लोगों ने अतिक्रमण का विरोध किया और VHP के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि कोई मृतक शरीर वहाँ न दफनाया जाए।

लोगों का मत है कि वक्फ बोर्ड के यहाँ अतिक्रमण करने और यहाँ कोरोना शवों को दफनाने की अनुमति देने से बीमारी के फैलने का खतरा बढ़ सकता है। अपने पत्र में विहिप ने वक्फ बोर्ड पर आरोप लगाया है कि उन्होंने जहाँ जदीद कब्रिस्तान का बोर्ड लगाया है वह जगह पार्क की है।

संगठन का ये भी कहना है कि कब्रिस्तान पार्क के मुख्य गेट से जुड़ा हुआ है और बुद्धा स्तूपा भी उससे केवल 100 मीटर की दूरी पर है, जहाँ आवाजाही रहती है। वीएचपी ने पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया है कि 17 और 18 मई को बोर्ड ने यहाँ जेसीबी मशीन लगातार पार्क का गेट तोड़ने का प्रयास किया।

पत्र में विश्व हिंदू परिषद ने माँग की है कि पार्क में अनाधिकृत कब्जा करने वालों तथा उनका साथ देने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही हो तथा पार्क के गेट पर जड़े कब्रिस्तान के बोर्ड को अबिलम्ब हटाया जाए।

मुस्लिम पक्ष ने बताया रामजन्मभूमि में निकले अवशेषों को प्रोपेगेंडा, TheWire ने कहा था – बाबरी के नीचे मंदिर नहीं

मुस्लिम पक्ष ने अयोध्या रामजन्मभूमि के समतलीकरण के दौरान मिले अवशेषों जैसे- शिवलिंग और अन्य कलाकृतियों को लेकर बयान दिया है कि ये साक्ष्य मंदिर के नहीं हैं। मुस्लिम पक्ष ने यह भी कहा है कि ये अवशेष प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं।

अयोध्या रामजन्मभूमि की सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) के वकील और ऑल इंडिया बाबरी मस्जिद कमिटी के कन्वेनर जफरयाब जिलानी (Zafaryab Jilani) ने कहा कि शिवलिंग और जो भी प्राचीन कलाकृतियाँ वहाँ निकलने की बात कह रहे हैं, ये सब प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं, जिन्हें ये लोग बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दूसरे चुनावों में फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

यासूब अब्बास का कहना है कि ऐसे लोगों पर रोक लगानी चाहिए, जो कोरोना वायरस की महामारी के दौरान इन ख़बरों पर बात कर रहे हैं कि अयोध्या, काशी में क्या हो रहा है क्या नहीं।

उल्लेखनीय है कि रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण कार्य के दौरान आज ही भूमि समतलीकरण के दौरान वहाँ से कुछ प्राचीन अवशेष मिलने की खबर सामने आई थी, जिसके बाद यह चर्चा का विषय बन गई।

दिलचस्प बात यह है कि ‘द वायर’ जैसे प्रोपेगेंडा पोर्टल्स ने कुछ साल पहले ही अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अर्कियोलोजिस्ट्स को खुदाई के दौरान ‘बाबरी मस्जिद के नीचे’ मंदिर होने के किसी भी तरह के कोई साक्ष्य नहीं मिले थे।

जबकि टाइम्स नाउ चैनल पर जफरयाब जिलानी का कहना है कि जो आकृतियाँ और अवशेष आज दिखाए जा रहे हैं, उन पर सुप्रीम कोर्ट में भी बात हो चुकी है और वो पहले से ही वहाँ मौजूद थे।

गौरतलब है कि राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है, जहाँ खुदाई में प्राचीन अवशेष मिल रहे हैं। इस दौरान कई पुरातात्विक मूर्तियाँ, खंभे और शिवलिंग मिल रहे हैं। श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री चम्पत राय ने कहा कि मलबा हटाने के दौरान कई मूर्तियाँ और एक बड़ा शिवलिंग भी मिला है।

निर्माण कार्य के बार फिर शुरू होते ही 67 एकड़ के श्रीराम जन्मभूमि परिसर में समतलीकरण और बैरिकेडिंग के एंगल आदि को हटाने का काम तेजी से जारी है। इसी समतलीकरण और खुदाई के काम के दौरान कई सारी प्राचीन मूर्तियों और मंदिर के पुरावशेष मिल रहे हैं। इसके चलते ही एक बार फिर मुस्लिम पक्ष के इस बयान से इस मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई है।

‘पति कोरोना संक्रमित था, हॉस्पिटल से गायब है’: अस्पताल का दावा- परिवार को बता दाह-संस्कार किया

हैदराबाद में कोरोना संक्रमित व्यक्ति के अस्पताल में भर्ती होने के बाद लापता होने की घटना सामने आई है। मरीज की पत्नी ने आरोप लगाया है कि संक्रमण का शिकार होने के कारण उसके पति को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन अब वो वहाँ से गायब है।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, वनसथल्लीपुरम कॉलोनी की निवासी अलमपल्ली माधवी ने अपने पति की गुमशुदगी की सूचना ट्विटर पर राज्य के आईटी मंत्री केटी रमा राव को दी है।

दुखड़ा व्यक्त करते हुए महिला ने बताया कि उसका 42 वर्षीय पति, जो एक चावल की मिल में काम करता था, वो अस्पताल में भर्ती होने के बाद से लापता है।

उसने बताया कि उसके पति को 27 अप्रैल को किंग कोठी अस्पताल में भर्ती करवाया था। बाद में उसे 30 अप्रैल को गाँधी अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया। महिला के अनुसार, उसे और उसकी दो बेटियों को भी कोरोना वायरस के कारण अस्पताल में भर्ती किया गया था, पर 16 मई को ये तीनों डिस्चार्ज हो गईं। मगर, उसके पति का कुछ नहीं मालूम चल पाया।

अस्पताल प्रशासन का कहना है कि 1 मई को महिला का पति कोरोना संक्रमित पाया गया था। उसे साँस लेने में दिक्कत व निमोनिया की परेशानी थी। इसके कारण उसकी मौत हो गई। घर वालों को सूचित करके उसका दाह-संस्कार करवा दिया गया था।

वहीं, माधवी का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन ने उससे किसी प्रकार की अनुमति नहीं माँगी और न ही अपने दावे से जुड़े कोई सबूत पेश किया।

माधवी ने कहा, “16 मई को, जब हम डिस्चार्ज हुए, मैंने पति के बारे में पूछा, मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने पहले कहा कि वे वेंटिलेटर पर हैं लेकिन बाद में बोलने लगे कि वे जिंदा नहीं हैं। हम आपने निवेदन करते हैं कि मेरे पति के लापता होने की जाँच में हमारी मदद करें।”

माधवी ने संवाददाताओं से भी बातचीत में कहा कि उसे पूरा यकीन है कि उसका पति जिंदा हैं। उसने चुनौती देते हुए कहा, “उन्हें सबूत दिखाने दीजिए कि उन्होंने जानकारी दी और किससे उन्होंने सहमति या अनापत्ति पत्र प्राप्त किया।”

अस्पताल प्रशासन ने जारी किया बयान

गाँधी अस्पताल के सुप्रीटेंडेंट डॉ. एम राजा राव ने इस संबंध में दिए अपने बयान में महिला के प्रति सहानुभूति व्यक्त की और अस्ताल के डॉक्टरों पर इल्जाम लगाने को गलत बताया।

उन्होंने कहा, “प्रक्रिया के अनुसार, परिवार के सदस्यों को सूचित किया गया था और प्रोटोकॉल का पालन करते हुए, शव को पुलिस को सौंप दिया गया। जाँच करने पर ज्ञात हुआ कि जीएचएमसी द्वारा शव का अंतिम संस्कार किया गया था। जहाँ सभी नियत प्रक्रियाओं का पालन किया गया।”

अयोध्या: स्मृतियों को सहेजने की जरूरत ताकि दुनिया भूल न सके हिंदुओं का दमन

अयोध्या की पुण्यभूमि की खुदाई शुरू हो गई है। भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए इसे तैयार किया जा रहा है। 500 सालों तक ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ में दफन रहने वाला भारत का वास्तविक इतिहास प्रस्फुटित होने लगा है।

खुदाई के दौरान राम जन्मभूमि स्थल से मिले मंदिर के अवशेष और मूर्तियाँ

आजादी के 70 साल बाद तक वामपंथी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के ताकतवर गठजोड़ ने इन आवाजों को दबाने की कोशिश की। लेकिन वे असफल रहे। न्याय और सत्य में विश्वास रखने वाले सभी लोगों के लिए यह विजय का क्षण है।

हालाँकि यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के साथ यह जीत पूरी नहीं हुई है। अयोध्या में महज भव्य राम मंदिर का निर्माण ही वास्तविक जीत नहीं है।

वास्तविक जीत वह है, जब भारत के दबे-कुचले हिंदू पीढ़ियों की व्यथा को इतिहास के पन्नों में दर्ज किया जाएगा। इसके लिए इससे जुड़े साक्ष्यों को संरक्षित और सुरक्षित रखे जाने की आवश्यकता है, जिससे इसे पूरी दुनिया देख सके और याद रख सके।

वामपंथी इतिहासकारों की लॉबी 70 साल बाद भले ही बिखर गई हो, लेकिन अभी खत्म नहीं हुई है। दरअसल वामपंथी इतिहासकारों की बहुत बड़ी साजिश थी, जिसके तहत सैकड़ों वर्षों तक हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों को इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया गया। यह साजिश आज भी लगातार चल रही है।

यही कारण है कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तथ्यों के बजाय भावनाओं पर निर्णय लेने का आरोप लगाते हैं। इतना ही नहीं ये लोग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को भाजपा की राजनीतिक सफलता और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ के एजेंडे से जोड़ने के साथ अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।

वामपंथी इतिहासकार चाहते हैं कि दुनिया को यह लगे कि हिंदुओं पर अत्याचार कभी हुआ ही नहीं। हम यहूदी लोगों से सीख सकते हैं कि इस तरह के प्रोपेगेंडा को कैसे धराशायी किया जाए।

इसी तरह के अत्याचार झेलने वाली यहूदी लोगों की पीढ़ी ने दो संकल्प लिए। पहला, उन्हें एक महान यहूदी राष्ट्र बनाना है। दूसरा, दुनिया यह कभी नहीं भूले कि उनके साथ क्या हुआ था।

अपने साथ हुए अत्याचारों से संबंधित साक्ष्यों को इकट्ठा करना, उनका दस्तावेजीकरण कर उन्हें सहेजना सुनिश्चित किया। अत्याचारों की निशानियों से संबंधित संग्रहालय पूरे यूरोप के अंदर खोले गए। इनमें स्कूली बच्चों को ले जाया जाता, जिससे वे खुद जान सकें कि अतीत में उनके साथ क्या हुआ था। यहूदी लोगों के खिलाफ हुए भीषण अत्याचारों की गाथाएँ मानवता की अंतरात्मा को चुभती रहे।

उनका मानना था कि अत्याचारों की हकीकत आखिर में लोगों के सामने आएगी। सार्वजनिक स्मृतियाँ कभी भी विशेष रूप से अच्छी नहीं होती। समय के साथ नैरेटिव के युद्ध में वास्तविक इतिहास के खो जाने का भी खतरा है। इसके लिए आपको जनता के सामने वास्तविक इतिहास रखना होगा।

भारत में हम हिंदुओं के सामने भी इसी प्रकार का खतरा है। वामपंथियों की एक लॉबी इस देश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों से संबंधित सभी ऐतिहासिक दस्तावेजों को नकारने में लगातार लगी हुई है। वे हमारे ऊपर कथित गंगा-जमुनी तहज़ीब थोपते का प्रयास करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं। वे नहीं चाहते कि अयोध्या में जमीन की खुदाई हो और हकीकत सामने आए।

ऐतिहासिक साक्ष्य हर जगह है। लेकिन वे हमें इसके बारे में बात नहीं करने देंगे और इसके लिए सही शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

मैं आपको बताता हूँ कि यह कैसे काम करता है। यदि साक्ष्य जमीन के अंदर मिलते हैं तो वे कहेंगे कि मंदिर की जगह इस स्थान पर मंदिर होने की कहानियाँ महज किंवदंतियाँ हैं। अगर किसी दस्तावजों में साफ तौर पर लिखा हुआ मिलता है कि एक मंदिर को नष्ट किया गया था, तो वे कहते हैं कि वास्तविक उद्देश्य लूट था न कि किसी धर्म को थोपना। यदि दस्तावेज कहते हैं कि उनका उद्देश्य मूर्ति पूजा करने वालों को कुचलना था, तो वे पूछते हैं कि उन हिंदुओं के बारे में क्या कहोगे जिन्हें उस समय अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया गया था?

यदि आप वास्तव में पुराने मंदिर के अवशेषों को देखते हैं, तो वे कहेंगे कि यह इंडो-इस्लामिक वास्तुकला की एक अनूठी शैली है, जो गंगा-जमुनी तहज़ीब का हिस्सा है! तो सवाल उठता है कि हम इस प्रोपेगेंडा को कैसे धराशायी कर सकते हैं?

हमें बिल्कुल वही करना है जो यहूदियों ने खुद पर हुए अत्याचारों को लेकर किया था। हमें साक्ष्यों को एकत्रित करना, दस्तावेजीकरण करना और उन्हें संरक्षित करना शुरू करना होगा। हमें अयोध्या में राम मंदिर के साथ ही एक संग्रहालय स्थापित करना होगा, जहाँ दुनिया उन साक्ष्यों को देख सके, जो आज तक लोगों के सामने आए ही नहीं।

इसके बाद हमें इसे वैश्विक स्तर पर लाना होगा। हमें हिंदुओं के साथ हुए अत्याचारों के बारे में लोगों को बताने के लिए संग्रहालय बनाने, प्रदर्शनियाँ लगाने और स्कूली बच्चों के भ्रमण की शुरुआत करने की आवश्यता है। हमें यह याद रखने के लिए एक वैश्विक दिवस की आवश्यकता है कि हिंदुओं को अपनी ही भूमि पर क्या-क्या झेलना पड़ा।

आज भी जर्मनी में ऐसे रेल कोच हैं जो एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं और लोगों को याद दिलाते हैं कि उनके साथ क्या अत्याचार हुए थे। दुनिया यह कभी नहीं भूलती, क्योंकि यहूदी लोगों ने ये सुनिश्चित किया कि इसे लोग भूल नहीं पाए।

भारत में हिंदुओं ने इस तरह की समस्याओं को झेला। मैं कहता हूँ कि अधिकांश हिंदू यह भूल गए हैं। पहले हमें हिंदुओं को बताना पड़ेगा कि उनके पूर्वजों ने क्या झेला। फिर हमें यह पूरी दुनिया को बताना होगा।

हिन्दूघृणा की फैक्ट्री है पाताल लोक: अजीत भारती का रिव्यू | Ajeet Bharti on PaatalLok and Hinduphobia in Bollywood

पाताल लोक वेबसीरीज की पटकथा लिखने वाले ने पहले ही सोच लिया था कि किस तरह का प्रोपेगेंडा फैलाना है और फिर इसी के इर्द-गिर्द कहानी रच दी गई। इसमें कुतिया का नाम सती सावित्री होता है। ब्राह्मण कान पर जनेऊ रखकर पराई स्त्री के साथ सेक्स करता है। सभी सवर्णों को नकारात्मक दिखाया गया है। साधु को मंदिर में माँस खाते हुए दिखाया गया। एक स्त्री इसलिए पानी लेने से मना कर देती है, क्योंकि उसे समुदाय विशेष के व्यक्ति ने छुआ होता है।

एक दृश्य में भगवान नरसिंह को गिरते हुए दिखाया जाता है। इससे पहले भी कई फिल्मों में भगवान का अपमान किया गया। आखिर हिन्दू के भगवानों के साथ ही ऐसा क्यों होता है? वो इसलिए होता है क्योंकि हिन्दू बहुत ज्यादा सहिष्णु है। उसे इन सब चीजों से फर्क नहीं पड़ता है कि उनके भगवान को गिरा दिया गया है। वहीं किसी भी वेबसीरीज में मजहब विशेष या ईसाई के प्रतीक को गिरते हुए नहीं दिखाया जा सकता। आखिर क्यों?

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें।

पाकिस्तानी अधिकारियों ने जकार्ता और टोक्यो में बेच दिया दूतावास का हिस्सा

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा अपने ही देश के दूतावासों का हिस्सा बेच देने का मामला सामने आया है। इतना ही नहीं देश के एक मंत्री पर अपने मंत्रालय का एक भवन बिजनेस पार्टनर को किराए पर देने का आरोप लगा है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इंडो​नेशिया की राजधानी जकार्ता में पाकिस्तानी दूतावास के एक भवन को बेचने के मामले में राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (नैब) ने विदेश मंत्रालय के कुछ अफसरों के खिलाफ मामला दर्ज करने की मॅंजूरी दी है।

डॉन के अनुसार नैब को जानकारी मिली है कि जकार्ता में दूतावास भवन की गैर कानूनी बिक्री को लेकर विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को जानकारी थी। बावजूद इसके घपलेबाजी को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर राष्ट्रीय खजाने को भारी नुकसान पहुँचाया।

नैब को इसी तरह की शिकायत जापान की राजधानी टोक्यो से भी मिली है। बताया जाता है कि वहॉं भी पाकिस्तानी दूतावास का एक हिस्सा अवैध तरीके से बेच दिया गया है।

इसके अलावा नैब ने धार्मिक मामलों के संघीय मंत्री नूर-उल-हक कादरी के खिलाफ दर्ज शिकायत की सत्यापन प्रक्रिया शुरू कर दी है। उन पर इस्लामाबाद स्थित अपने मंत्रालय का एक भवन बिजनेस साझेदार को देने का आरोप है। इसकी शिकायत उनके ही मंत्रालय के एक व्यक्ति ने की है।

डॉन ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि कादरी के खिलाफ जॉंच का फैसला नैब की बैठक में लिया गया। नैब मुख्यालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह हितों के टकराव का मामला है। कई अधिकारियों के खिलाफ पूछताछ को मॅंजूरी दी गई है। इनमें पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के राजनीतिक सचिव और पूर्व गृह मंत्री अकरम खान दुर्रानी के राजनीतिक सचिव रुखसाना बंगश का बेटा शामिल है।

राजीव गाँधी की छतरी सँभाले अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन: वीडियो का भोपाल गैस हादसे से क्या है कनेक्शन

जब कभी भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दुनियाभर में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ने की बात होती है, कॉन्ग्रेस समर्थक अक्सर एक वीडियो शेयर करते हैं। इस वीडियो में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गॉंधी और अमेरिका के राष्ट्रपति रहे रोनाल्ड रीगन नजर आते हैं।

वीडियो में रेगन छतरी सॅंभाले राजीव को उनकी गाड़ी तक छोड़ने आते हैं। इसे दिखाकर कॉन्ग्रेसी यह जताने की कोशिश करते हैं कि राजीव गॉंधी का अमेरिका में कैसा जलवा-जलाल था।

यह वीडियो कई बार कॉन्ग्रेस शेयर कर चुकी है। पिछले साल जब नरेंद्र मोदी ने अपनी स्पीच के दौरान राजीव गाँधी को भ्रष्टाचारी बोला था, उस समय भी इस वीडियो को शेयर किया गया था। हालाँकि तब एक नया कोण इस वीडियो के पीछे का निकलकर सामने आया था।

दरअसल, पिछले साल जब वीडियो धड़ल्ले से शेयर की जा रही थी, तब मोनिका नाम की सोशल मीडिया यूजर ने इस पूरे वाकए के पीछे छिपे राज का पर्दाफाश किया था। मोनिका ने दावा किया था तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन पूर्व प्रधानमंत्री को वीडियो में जो इज्जत देते नजर आ रहे हैं, उसके पीछे गहरा राज है। इसके तार भोपाल गैस त्रासदी और उसके आरोपित वॉरेन एंडरसेन से जुड़े हैं।

मोनिका ने अपने ट्वीट में बताया कि यह वीडियो 1985 का है जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ने आदिल शहरयार को क्षमादान दिया था। उनका दावा था कि वीडियो में पूर्व पीएम को मिलने वाली इज्जत एक आपसी लेन-देन का नतीजा थी।

एक ऐसा लेन-देन जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने राजीव गाँधी से भोपाल गैस त्रासदी के मुख्य आरोपित वॉरेन एंडरसन को माँगा था और बदले में उन्हें वीडियो में नजर आने वाली इज्जत व उनका दोस्त आदिर शहरयार लौटाया था। बता दें आदिल शहरयार वही शख्स है, जिसे फ्लोरिडा की अदालत ने कई बार धोखाधड़ी का दोषी करार दिया था।

मोनिका ने अपने ट्वीट में लिखा, “अमेरिकी नागरिक वॉरेन एंडरसन के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन ने स्वयं राजीव गाँधी को फोन किया था और उनसे बात करके सुनिश्चित किया था कि एंडरसन को वे सुरक्षित अमेरिका भिजवाएँ। इसलिए राजीव गाँधी को मिलने वाली ये इज्जत देश को कॉरपोरेट के लालच में बेचने का बदला था।”

गौरतलब हो कि 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी के बाद एंडरसन के अमेरिका जाने के पीछे राजीव गाँधी का हाथ बताया जाता है। कहा जाता है तात्कालीन पीएम राजीव गाँधी के इशारे पर राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उनकी देश छोड़कर जाने में मदद की थी। एंडरसन को सरकारी प्लेन से कड़ी सुरक्षा के बीच भोपाल से दिल्ली पहुँचाया गया था, जिसके बाद वो अमेरिका वापस चला गया और कभी भारत लौट कर नहीं आया।

आधिकारिक तौर पर इस हादसे में 3,787 लोगों के मरने की बात कही गई। लेकिन कई मीडिया रिपोर्टों में यह संख्या 20-25 हजार बताई जाती है। पीड़ितों के संगठन की याचिका पर सुनवाई करते हुए 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 15,274 लोगों की मौत हुई और 5,74,000 लोग बीमार हुए थे।

इसके अलावा इंडियन एक्सप्रेस में प्रणब ढल सामंता भी इस बात का दावा करते हैं कि एंडरसन को सुरक्षित वापस अमेरिका भेजने के लिए अमेरिका का भारत पर दबाव था। ये तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि एंडरसन के अमेरिका पहुँचते ही कुछ दिन में आदिल को क्षमा दान मिल गया था।

वुहान में 5 साल के लिए जंगली जानवरों को खाने पर प्रतिबंध, यहीं से शुरू हुआ था कोरोना वायरस का संक्रमण

दुनियाभर को कोरोना महामारी देने वाले चीन ने आखिरकार वुहान शहर में जंगली जानवरों के खाने पर बैन लगा दिया है। वुहान वही शहर है जहाँ से कोरोना संक्रमण शुरू हुआ था। जंगली जानवरों को खाने पर पाँच साल का प्रतिबंध लगाया गया है। इसे 13 मई को लागू किया गया।

हुआनान सीफूड होलसेल मार्केट से ही कोरोना वायरस जन्म हुआ था। इसे 1 जनवरी को बंद तो कर दिया गया मगर उसके बाद भी इस वायरस ने दुनियाभर में तहलका मचा दिया। लोमड़ी, मगरमच्छ, भेड़िये, सांप, चूहे, मोर समेत कई जंगली जानवरों को खाने पर 5 साल का बैन लगाया गया है।

इस आदेश के साथ ही किसी भी संगठन या व्यक्ति को वाइल्डलाइफ या उससे जुड़े उत्पादों के प्रोडक्शन, जमीन के जानवरों और पानी के प्रोटेक्टेड जंगली जानवरों को खाए जाने के लिए आर्टिफिशल ब्रीडिंग की भी इजाजत नहीं होगी। मेडिकल संगठनों को रिसर्च के लिए जानवरों को हासिल करने के लिए लाइसेंस लेना होगा। ह्यूमन सोसायटी इंटरनेशनल (एचएसआई) के अनुसार, चीन में वन्यजीव की खपत का व्यापार 125 बिलियन युआन का है।

माँस खाने की परंपरा

चीन की परंपरा में कई तरह के जानवरों के माँस खाने का चलन रहा है। चीन के शहर वुहान में जंगली जानवरों के माँस का बड़ा मार्केट है। चीन में कई तरह के जानवरों का माँस खाया जाता है। वुहान में सांप-बिच्छू, मगरमच्छ, कुत्ते, चमगादड़ से लेकर घोड़े- गधे और ऊँट तक के माँस मिलते हैं। यहाँ इन जानवरों के माँस का इस्तेमाल सिर्फ खाने के लिए नहीं बल्कि मेडिसीन, कपड़े और गहने बनाने मे भी इस्तेमाल होता है।

पहले भी किया जा चुका है, कुछ जानवरों को बैन

2003 में चीन में सार्स नाम की बीमारी फैली थी। इसके चलते बिलाव (सीविट) और नेवले का माँस बेचने पर प्रतिबंध लगाया गया था। इस बीमारी का वायरस बिलाव या नेवले के माँस से इंसान के शरीर में आया था। सार्स के महामारी की तरह फैलने पर सांप के मांस की बिक्री पर भी रोक लगा दी गई थी। मगर फिर भी वहाँ के लोगों ने इनका माँस खाना नहीं छोड़ा। चूंकि चीन की प्राचीन परंपरा में कई तरह के जानवरों के मांस खाने का चलन रहा है, इसलिए इन्हें बैन करना आसान नहीं है।

चीन के लोग बताते हैं कि कोरोना वायरस की वजह से अभी लोगों ने जंगली जानवरों का माँस खाना बंद किया है। लेकिन जैसे ही वायरस का असर खत्म होगा। जानवरों का माँस लोग फिर से खाने लगेंगे।

‘अम्फान’ ने बंगाल, ओडिशा और बांग्लादेश में बरपाया कहर, 24 की मौत, राहत कार्य जारी

बंगाल की खाड़ी से उठे चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ ने 190 किलोमीटर की रफ्तार से पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बांग्लादेश में जमकर कहर बरपाया। इसकी चपेट में आने से 24 लोगों के मारे जाने की खबर है। इनमें 12 लोग बांग्लादेश, 10 पश्चिम बंगाल और 2 ओडिशा के हैं।

जानकारी के मुताबिक ज्यादातर मौतें दीवारों के गिरने, पानी में डूबने और पेड़ों के गिरने और उनकी चपेट में आने से हुई है। इसका असर पश्चिम बंगाल के कोलकाता और हावड़ा में चारों ओर तबाही के रूप में देखा जा रहा है। हावड़ा में एक स्कूल भवन की छत उड़ गई और नारियल के पेड़ व बिजली के खंभे बड़ी संख्या में तूफान की चपेट में आ गए।

राहत की बात यह है कि चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ फिलहाल पूरी तरह से शांत हो गया है। अम्फान के शांत होते ही एनडीआरआफ की टीमें राहत कार्य में जुट गई हैं। पश्चिम बंगाल में पाँच और ओडिशा से करीब डेढ़ लाख लोगों को एनडीआरआफ की टीमों ने सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दिए गए एक बयान के मुताबिक फिलहाल तूफान से राज्य को हुए नुकसान का आकलन करना मुश्किल है। उन्होंने बताया कि संचार पूरी तरह से बाधित हो गया है। क्षति की सीमा का पूरी तरह से आकलन करने में तीन-चार दिन लग सकते हैं।

पड़ोसी देश बांग्लादेश की बात करें तो अम्फान ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया है। विद्युत मंत्रालय द्वारा जारी बयान के मुताबिक कम से कम एक लाख लोग बिजली की समस्या से जूझ रहे हैं। तटीय इलाकों के सैकड़ों गाँव पानी में डूब गए हैं। यहाँ तक कि करीब एक दर्जन से अधिक बाढ़ सुरक्षा के बाँध टूट गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (21 मई 2020) को आश्वासन दिया कि उनकी सरकार प्रभावित लोगों की मदद के लिए हरसंभव प्रयास करेगी। चक्रवात अम्फान की तबाही के दृश्य पश्चिम बंगाल में देखे जा रहे हैं। इस चुनौतीपूर्ण समय में पूरा देश पश्चिम बंगाल के साथ एकजुटता के साथ खड़ा है। प्रभावित लोगों की मदद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।

आपकों बता दें कि बुधवार (20 मई 2020) की रात 2:30 बजे आया चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ पश्चिम बंगाल के दीघा और बांग्लादेश के हटिया द्वीप के बीच जमीन से टकराया था। 18 मई को गृह मंत्रालय ने अम्फान तूफ़ान (Amphan Cyclone) को लेकर चेतावनी जारी की थी।