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सिक्किम… जो कभी नेपाल जैसा ही था एक स्वतंत्र देश, ऐसे बना था भारत का अभिन्न अंग

खड्ग प्रसाद ओली (KP Oli) नेपाल के प्रधानमंत्री हैं। और यही केपी ओली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (NCP) के अध्यक्ष भी हैं। कल की ही बात है, जब नेपाल की सरकार ने नया नक्शा जारी किया। इस नक्शे में भारत के कुछ हिस्सों को नेपाल का दिखाया गया है। मतलब कम्युनिस्ट पार्टी की नेपाली सरकार ने अपने वामपंथी पड़ोसी देश चीन की ओर आँखें नहीं उठाईं बल्कि लोकतांत्रिक देश भारत की मैत्री के साथ धोखा किया।

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली को विश्व राजनीतिक इतिहास से हालाँकि कुछ सीखना चाहिए। सीखना यह चाहिए कि अंततः किसी देश या क्षेत्र की जनता ही वहाँ का भविष्य लिखती है, ना कि कोई सत्ताधारी। इसके लिए पड़ोसी राज्य सिक्किम के इतिहास से बेहतर सीख और कहाँ मिलेगी! कभी वहाँ के राजा ने भी प्रजा के हाथ में सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया था, लेकिन उसी प्रजा ने उनकी राजगद्दी खींच ली और भारत की नागरिकता स्वीकार ली।

सिक्किम की कहानी और इतिहास के लिए प्रधानमंत्री केपी ओली को बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं। वो अप्रैल 14, 1975 का दिन था, जब सिक्किम ने एकमत से राजतन्त्र को हटाने के लिए मतदान किया। रिफ़रेंडम हुआ और सिक्किम की 97.55% जनता ने मिल कर इसे भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनाने के लिए वोट दिया। कुल 97,000 लोगों ने इस मतदान की प्रक्रिया में हिस्सा लिया था, जो कुल 63% वोटर टर्नआउट था। उस समय चोग्याल वंश का सिक्किम पर शासन था और चीन हिमालय पर बसे इस राज्य को हथियाने की फ़िराक़ में था। पाल्डेन थोंडुप नामग्याल तब सिक्किम का राजा था। वो गंगटोक स्थित महल में ही भारतीय सेना से घिरा हुआ था। उसकी पत्नी तब 2 बच्चों के साथ न्यूयॉर्क में रहती थी।

51 वर्षीय नामग्याल की पत्नी होप कुक अमेरिकन थी और और उन्होंने उस वक़्त इस मतसंग्रह को अवैध और असंवैधानिक करार दिया था। लेकिन, वही हुआ जो सिक्किम की जनता की इच्छा थी। काजी लेन्डुप दोरजी तक सिक्किम के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने भारतीय गणराज्य का पक्ष लिया था। उन्होंने केबलग्राम से वोटिंग का परिणाम तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी तक भिजवाया। उन्होंने गाँधी से आग्रह किया कि वो तुरंत जनता की इच्छानुसार निर्णय लें और जनमत को स्वीकार करें।

हालाँकि, तब चीन ने ज़रूर ये आरोप लगाए थे कि भारत जबरदस्ती सिक्किम पर कब्जा कर रहा है। लेकिन, इंदिरा गाँधी ने ये याद दिलाने में देरी नहीं की कि चीन ने किस तरह तिब्बत पर जबरदस्ती कब्ज़ा किया था और साथ ही ये भी बता दिया कि भारत सरकार वही कर रही है, जैसा सिक्किम की जनता ने निर्णय दिया है। इस मतसंग्रह से 2 साल पहले ही नामग्याल के ख़िलाफ़ लोगों ने आंदोलन चलाया था, जिसके बाद वो नाम का राजा रह गया था। उसकी 400 सदस्यीय फ़ौज को भारतीय सेना ने निःशस्त्र कर दिया था, ताकि कोई हिंसा नहीं हो। हालाँकि, ये आरोप ग़लत हैं कि नामग्याल को सेना ने नज़रबंद किया था।

तब स्थिति ही ऐसी बन गई थी कि वहाँ हिंसा भी हो सकती थी और नामग्याल की सुरक्षा के लिए ही भारतीय सेना ने उसके महल के चारों ओर डेरा डाला था। उसका कहना था कि अगर रेफेरेंडम होता भी है तो किसी ‘स्वतंत्र एजेंसी’ द्वारा होना चाहिए, सिक्किम के प्रशासन अथवा भारतीय चुनाव आयोग द्वारा नहीं। चीन आरोप लगाता रहा है कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने 2 साल तक चले गुप्त अभियान में सिक्किम की जनता में राजा के प्रति आक्रोश भरा। नामग्याल सिक्किम को भारत से लगातार दूर कर रहा था और अपनी अमेरिकन पत्नी के कहने अनुसार भारत के लिए लगातार समस्याएँ खड़ा कर रहा था।

भौगोलिक स्थिति को समझें तो भारत का उत्तर उत्तर-पूर्वी हिस्सा सामरिक और रणनीतिक रूप से देश का एक महत्वपूर्ण अंग है। यहाँ अभी भारत के आठ राज्य स्थित हैं- अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, असम, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय व सिक्किम। सिक्किम के उत्तर और उत्तर-पूर्व में तिब्बत स्थित है, जिस पर चीन अपना कब्ज़ा जताता रहा है। राज्य के पूर्व में भूटान है, जो भारत का मित्र राष्ट्र है लेकिन चीन उसे लुभाने की पूरी कोशिश करता रहा है। सिक्किम के पश्चिम में नेपाल है, जहाँ के सत्ताधारियों का झुकाव समय के हिसाब से कभी भारत तो कभी चीन की तरफ रहता है।

सिक्किम के इतिहास को देखें तो 1642 में फुंत्सोग नामग्याल यहाँ के पहले राजा थे। जब सिक्किम देश का 22वाँ राज्य बना, उससे पहले इस राजवंश ने 333 सालों तक वहाँ राज किया। ब्रिटिश और सिक्किम राजवंश के हित भी एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी राज्यों के ख़िलाफ़ दबदबा बढ़ाने के लिए चोग्याल राजाओं ने अंग्रेजों का उपयोग किया। ब्रिटिश के लिए गोरखाओं के ख़िलाफ़ सिक्किम एक दोस्त के रूप में मिला। 1814-15 के अंग्रेज-गोरखा युद्ध में गोरखाओं द्वारा हारे गए कई इलाक़े सिक्किम को मिले। अंग्रेजों ने भी सिक्किम के रूट का उपयोग नॉर्थ-ईस्ट राज्यों तक व्यापार के लिए किया।

1817 में सिक्किम ने ब्रिटिश के साथ ‘ट्रीटी ऑफ तितलिया’ पर हस्ताक्षर किया, जिससे अंग्रेजों को सिक्किम में कई राजनीतिक और व्यापारिक फायदे मिले। इससे एक फायदा ये भी हुआ कि सिक्किम ब्रिटिश की सीधी कॉलनी नहीं बना। लेकिन, ब्रिटिश के जाते ही कहीं-कहीं जनता में सिक्किम राजवंश के ख़िलाफ़ आक्रोश के स्वर उठने शुरू हो गए थे। 70 का दशक आते-आते राजवंश के ख़िलाफ़ आंदोलन और उग्र हो गया। आज भी चीन सिक्किम के एक बड़े हिस्से पर अपना दावा ठोकता रहता है और रह-रह कर अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करता है।

बता दें कि 15 अगस्त 1947 को जब भारत आज़ाद हुआ, तब सिक्किम भारतीय गणराज्य का हिस्सा नहीं था। सिक्किम को भारत के आज़ाद होने के 28 सालों बाद भारतीय गणराज्य में शामिल किया गया था। इसे भारतीय गणराज्य में मिलाने की प्रक्रिया पर विचार-विमर्श 1962 में हुए युद्ध के बाद शुरू किया गया। भारत-चीन युद्ध के दौरान भारत को मिली हार का एक कारण उत्तर-पूर्व में भारतीय सेना के पहुँचने में हो रही कठिनाइयों को भी माना गया। सिक्किम के राजा चोग्याल का चीन की तरफ ज्यादा झुकाव था और अपने विस्तारवादी चरित्र के कारण जाना जाने वाला ड्रैगन अपनी सीमा से सटे भारत के हर एक राज्य को हथियाना चाहता था।

आज भी चीन की वही नीति है, जिसके कारण अक्सर डोकलाम जैसे विवाद खड़े हो जाते हैं। इसे पंडित नेहरू की अदूरदर्शिता कहें या फिर उनके निर्णय लेने की क्षमता को सवालों के घेड़े में खड़ा किया जाए, उन्होंने अपनी उत्तर-पूर्व नीति अस्पष्ट रखी। भारत में स्थित अमेरिकी राजनयिकों ने USA के स्टेट डिपार्टमेंट को भेजी गई एक जानकारी में कहा था कि अगर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सरदार पटेल की बात मान ली होती तो सिक्किम 25 साल पहले ही भारत का अंग बन चुका होता। अमेरिका का ये भी मानना था कि भारत ने सिक्किम के विलय (annexation) के लिए कुछ ख़ास नहीं किया बल्कि वो तो सिक्किम की जनता थी जिसने उचित निर्णय लिया और भारत ने सिर्फ ‘परिस्थिति’ का फायदा उठाया। ये सूचनाएँ भारत में स्थित अमेरिकी राजनयिकों द्वारा अपने देश में तब भेजी गई थी जब इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में भारत सरकार ने ये फ़ैसला ले लिया था कि सिक्किम में सेना भेजी जाएगी। ये पूरा घटनाक्रम भी काफ़ी रोचक है और इसमें कई ट्विस्ट्स और टर्न्स हैं।

सोनिया गाँधी के खिलाफ FIR दर्ज, PM केयर्स फंड को लेकर गलत जानकारी देने का है आरोप

पीएम-केयर फंड को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा फैलाई जा रही लगातार गलत जानकारियों के बाद कर्नाटक के शिमोगा में कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। दर्ज FIR में सोनिया गाँधी पर भ्रामक और गलत जानकारी देने का आरोप लगाया गया है।

जानकारी के मुताबिक कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के खिलाफ आईपीसी की धारा 153, 505 के तहत ये एफआईआर दर्ज की गई है। एफआईआर में अपील की गई है कि सोनिया गाँधी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। दरअसल जिस सोशल मीडिया एकाउंट से पीएम केयर्स फंड को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे थे, उसमें कॉन्ग्रेस अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी की पहचान हैंडलर के रूप में की गई है।

कथित तौर पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने 11 मई को एक ट्वीट किया था, जिसमें पीएम केयर्स फंड के बारे में गलत जानकारी दी गई थी। दरअसल यह एफआईआर कर्नाटक में शिमोगा जिले के वकील प्रवीण द्वारा कराई गई है।

आपको बता दें कि इससे पहले सोनिया गाँधी ने कोरोना महामारी से लड़ने के लिए बनाए गए PM CARES यानी ‘प्राइम मिनिस्टर सिटीजन्स असिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशन’ कोष में जमा राशि को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में ट्रांसफर करने की माँग की थी, हालाँकि यह साफ नहीं हो सका है कि किस ट्वीट के खिलाफ सोनिया गाँधी पर यह FIR दर्ज की गई है।

गौरतलब है कि कोरोनो वायरस जैसी महामारी के खिलाफ लड़ने को लेकर सार्वजनिक रूप से दान प्राप्त करने के लिए इस वर्ष 27 मार्च को पीएम केयर्स फंड ट्रस्ट का गठन किया गया था। इस ट्रस्ट के अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और इसके सदस्य के रूप में रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री शामिल हैं।

PM केयर्स फंड से ही भारत सरकार ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में 3100 करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की थी। 3100 करोड़ रुपये में से, लगभग 2000 करोड़ रुपये की राशि वेंटिलेटर्स की खरीद के लिए, 1000 करोड़ रुपये का उपयोग प्रवासी मजदूरों की देखभाल के लिए 100 करोड़ रुपये वैक्सीन विकसित करने के लिए दिया जाएगा।

केंद्रीय सरकार की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक पीएम केयर्स फंड से लगभग 2000 करोड़ रुपए खर्च करके मेड-इन-इंडिया निर्मित 50000 वेंटिलेटर खरीदे जाएँगे। यह वेंटिलेटर सरकार द्वारा चलाए सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में चलाए जा रहे कोरोना अस्पतालों में दिए जाएँगे, जिससे गंभीर कोरोनो मरीजों का बेहतर इलाज किया जा सके। यह कदम देश भर में कोरोना वायरस के मामलों से निपटने के लिए सहायक साबित होगा।

इस्लामोफोबिया के नाम पर अब अलजजीरा ने फैलाया प्रोपेगेंडा, भारतीय मुस्लिमों की हालत उइगर जैसी बताई

वैश्विक कोरोना महामारी के इस दौर में इस्लामोफोबिया के नाम पर भारत को बदनाम करने की विदेशी मीडिया लगातार कोशिश कर रहा है। पिछले कुछ समय में हमने न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबारों में इसके नमूने कई बार देखे। अब ताजा मामला अलजजीरा का है। उसने दुनिया के किसी भी देश में मुस्लिमों की बिगड़ती स्थिति को बताने के लिए भारत के नाम का इस्तेमाल उदाहरण के तौर पर किया है।

दरअसल, कल अलजजीरा में एक लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख में लेखक को मुख्यत: श्रीलंका में मुस्लिमों की स्थिति पर बात करनी थी। लेकिन, लेखक उमर सुलेमान ने श्रीलंका में मुस्लिमों की गंभीर स्थिति से अपने पाठकों को अवगत कराने के लिए व अपनी बातों में वजन डालने के लिए यहाँ भारत के नाम का चुनाव किया। साथ ही लेख की हेडलाइन से लेकर लेख के आधे भाग तक वो भारत के विषय पर चर्चा में व्यस्त रहे।

भाजपा और मीडिया को बताया इस्लामोफोबिया का जिम्मेदार

लेखक ने कोरोना संकट में भारतीय मुस्लिमों की स्थिति को गंभीर बताया और मरकज का जिक्र करते हुए कहा कि भारत में हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी और मीडिया दोनों ही मुस्लिम समुदाय को कोरोना वायरस का सुपर स्प्रेडर्स और कोरोना आतंकी बताने की कोशिश कर रहे हैं। इसके कारण मस्जिदों में जाने वालों के साथ आतंकियों की तरह बर्ताव किया जा रहा है।

उस्मान मानते हैं कि भारत में कोरोना संकट को भारतीय सरकार ने देश में इस्लामोफोबिया फैलाने के लिए इस्तेमाल किया। उनका कहना है कि भारत सरकार ने कोरोना के आगामी परिणामों से लोगों का ध्यान हटाने लिए मुस्लिमों को बलि के बकरे की तरह उपयोग किया और ऐसा करके वह भारत की बहुसंख्यक आबादी के पूर्वाग्रहों को और मजबूत करने में कामयाब रहे।

श्रीलंका के मुस्लिमों की स्थिति को भारतीय मुस्लिमों की तरह बताया

इसके बाद लेखक ने इस्लामोफोबिया के नाम पर भारतीय मुस्लिमों की स्थिति पर पूरी भूमिका बनाकर श्रीलंका के हालात पर बात की। श्रीलंका के लिए लगभग वहीं सब बातें थी।

भारत की तरह श्रीलंका पर भी यही आरोप था कि कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों के हमलों के कारण वहाँ मुस्लिमों का बहिष्कार हो रहा है। वहाँ के मीडिया और राष्ट्रवादी लोग मुस्लिमों को निशाना बना रहे हैं। साथ ही बहुसंख्यक आबादी मुस्लिमों से कोई भी सामान खरीदने मना कर रही है।

लेखक की शिकायत है कि अप्रैल में वहाँ की सरकार ने इस्लामिक रिवाजों के विपरीत कोरोना संक्रमित की मौत होने पर दाह संस्कार को अनिवार्य कर दिया, जिससे न केवल मुस्लिमों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ अपितु लोगों में ये संदेश भी गया कि मुस्लिमों के रिवाज के कारण कोरोना संक्रमण फैल रहा है।

उइगर और रोहिंग्याओं की तुलना भारतीय मुस्लिमों से

बात लेख में केवल श्रीलंका के मुस्लिमों तक नहीं रुकी। अंत तक आते-आते उस्मान ने इस लेख में भारतीय मुस्लिमों की स्थिति को चीन के उइगर मुस्लिमों और म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों की स्थिति से जोड़कर भी दर्शा दिया और आरोप लगाया कि इन सभी देशों में भी कोरोना संकट का इस्तेमाल मुस्लिमों पर किए अत्याचारों को छिपाने के लिए किया जा रहा है। वहाँ भी मुस्लिमों के जीवन के खतरे बढ़ते जा रहे हैं।

कोरोना में इस्लामोफोबिया के नाम पर बढ़ा विदेशी मीडिया का कारोबार

अब हालाँकि, हम सब जानते हैं कि भारत में कट्टरपंथी सोच वालों को छोड़ दिया जाए, तो मुख्तार अब्बास नकवी जैसे अनेकों आम मुस्लिम भारत को अपने लिए सबसे सुरक्षित देश मानते हैं, जहाँ उन्हें धर्म से संबंधी हर प्रकार की आजादी है।

मगर, फिर भी पिछले कुछ समय में ऐसा माहौल तैयार हुआ है, जहाँ देश के लोगों ने ही देश में इस्लामोफोबिया की अफवाह को इस तरह फैलाया कि अरब देश भी भारत पर ऊँगली उठाने लगे और विदेशी मीडिया इस पर अपनी जोरदार कवरेज करने लगा।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने पिछले महीने एक लेख छापा और तबीलीगी जमात के कारनामों पर उठते सवालों को नफरत बताकर पेश किया। विदेशी मीडिया ने इस दौरान आरोप लगाया कि भारत में कोरोना वायरस ने धार्मिक दुर्भावना को हवा दी है। इसके चलते भारतीय अधिकारी इस्लामिक समूहों को प्रतिबंधित कर रहे हैं और मुस्लिमों को हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है।

द न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित खबर

इसी प्रकार टाइम्स ने 3 अप्रैल को एक लेख छापा। लेख की हेडलाइन दी गई भारत में मुस्लिम होना पहले से ही खतरनाक था और फिर कोरोना वायरस आ गया।

14 अप्रैल को द इंटरसेप्ट के लिए मेहंदी हसन ने एक लेख लिखा। इस लेख में भी भारत का उदाहरण देकर इस्लामोफोबिया और इस्लामोफोबिक विचारधारा पर बात की गई। साथ ही आरोप लगाया गया कि भाजपा सरकार ने भारत में कोरोना फैलाने के लिए मुस्लिमों को जिम्मेदार बताया है।

इमरान खान बार-बार ‘फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन’ वाला ट्वीट क्यों ‘कॉपी-पेस्ट’ कर रहे? खौफ का कारण बनी भारतीय सेना

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सोशल मीडिया से लेकर प्रेस वार्ता में लगभग 6 माह से भारत पर आरोप लगाते देखे जा रहे हैं कि भारत कश्मीर में फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन (छद्म युद्ध) की तैयारी कर रहा है।

आज ही ट्विटर पर Jeff M Smith ने एक ट्वीट करते हुए भी इस बारे में लिखा है कि यह छठी बार है जब पकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने ट्वीट किया है कि भारत पिछले अगस्त से कश्मीर में झूठा फ्लैग ओपरेशन शुरू करने की तैयारी कर रहा है। इसका मतलब क्या है? क्या उन्हें (इमरान खान) लगता है कि किसी को इस बात पर यकीन है?

उन्होंने आशंका जताते हुए लिखा है कि सम्भव है कि पाकिस्तान इस बात की तैयारी कर रहा हो कि जब कभी वो आतंकी हमला होगा तो इमरान खान के ये ट्वीट उन्हें बचाने का काम करेंगे।

इमरान खान ने भारत पर फ्लैग ऑपरेशन करने का सबसे ताजा फर्जी दावा मई 21 की अर्धरात्रि 12 बजकर 6 मिनट पर एक ट्वीट में किया है। इमरान खान ने इस ट्वीट में लिखा है –

“मैं फिर से दोहरा रहा हूँ कि IOJK में चल रहे नरसंहार से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए भारत की ओर से फॉल्‍स फ्लैग ऑपरेशन चलाया जा रहा है।”

फॉल्‍स फ्लैग ऑपरेशन: छद्म युद्ध

उल्लेखनीय है कि फॉल्‍स फ्लैग ऑपरेशन का मतलब ऐसी सैन्य या सामरिक गतिविधियों से होता है, जहाँ पर किसी भी ऑपरेशन को अंजाम देने वाले की पहचान को पूरी तरह से छिपा दिया जाता है। इसके साथ ही, इस तरह के ऑपरेशन को अंजाम देने वाला शख्स यदि पकड़ा जाता है, तो उसमें अपनी भूमिका से स्पष्ट रूप से मना कर दिया जाता है।

इस तरह के किसी भी ऑपरेशन को अंजाम देने वालों को इस बात की पूरी जानकारी होती है कि यदि वे पकड़े गए तो सरकार उन्‍हें किसी तरह से भी स्‍वीकार नहीं करेगी। इन्हें ही ‘कवर्ट ऑपरेशन’ भी कहा जाता है।

वास्तव में यह पहली बार नहीं है जब इमरान खान ने ऐसा दावा किया हो। यह बात अलग है कि हाल ही के कुछ दिनों में इमरान खान की ओर से ऐसे ट्वीट की मात्रा बढ़ी है।

इमरान खान के लम्बे समय से चले आ रहे फर्जी छद्म युद्ध के भय पर एक नजर

1 – अगस्त, 2019

भारत पर फॉल्‍स फ्लैग ऑपरेशन करने की सम्भावना पर पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री इमरान खान ने गत वर्ष अगस्त के माह में ट्वीट किया था। इसमें इमरान खान ने लिखा था – “मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगाह करना चाहता हूँ कि इस बात की पूरी सम्भावना है कि भारत सरकार IOJK (जम्मू-कश्मीर, जिसे पाकिस्तान लगातार भारत के कब्जे वाला जम्मू और कश्मीर लिखता है) में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं को दबाने के लिए फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन का प्रयास करेगा।”

2 – दिसम्बर, 2019

गत वर्ष दिसम्बर माह में दूसरी बार इमरान खान ने ऐसी सम्भावना की फिर से आशंका व्यक्त की थी। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा- “मोदी सरकार के पिछले 5 वर्षों में, भारत अपने हिंदूवादी वर्चस्व की फासीवादी विचारधारा के साथ हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है। अब नागरिक संशोधन अधिनियम के साथ, उन सभी भारतीयों को जो एक बहुलतावादी भारत चाहते हैं, विरोध करने लगे हैं और यह एक जन आंदोलन बन रहा है।”

इसके अगले ट्वीट में आदतन इमरान खान ने लिखा- “जैसा कि IOJK (इण्डिया ओक्युपाइड जम्मू-कश्मीर) में भारतीय कब्जे वाली सेनाओं की घेराबंदी जारी है और इसे हटाने पर खून-खराबे की आशंका है। जैसे-जैसे ये विरोध बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे भारत से पाक को खतरा भी बढ़ता जा रहा है। भारतीय सेना प्रमुख का बयान एक फॉल्‍स फ्लैग ऑपेरेशन की हमारी चिंताओं को बढ़ाता है।”

3 – जनवरी, 2020

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बीच-बचाव के लिए प्रार्थना करते इमरान खान ने ट्वीट में लिखा –

“जैसा कि भारतीय सेना की ओर से एलओसी के पार नागरिकों को निशाना बनाना और मारना जारी है, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कश्मीर विवाद के संयुक्त राष्ट्र मध्यस्थता (UN mediation of the Kashmir dispute) को भारत को LOC के IOJK से बाहर जाने की अनुमति देने की तत्काल आवश्यकता है। हमें भारतीय फॉल्‍स फ्लैग ऑपरेशन का डर है।”

एक और ट्वीट करते हुए इमरान खान ने लिखा – “मैं भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्पष्ट करना चाहता हूँ कि अगर भारत ने LOC के पार नागरिकों को मारने वाले अपने सैन्य हमलों को जारी रखा, तो पाकिस्तान को LOC पर मूक दर्शक बने रहना मुश्किल होगा।”

4 – मई 06, 2020

मई माह में इमरान खान ने पहला ट्वीट 6 मई को करते हुए लिखा –

“मैं पाकिस्तान को निशाना बनाने के प्रयासों में भारत के फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन के बहानों के बारे में दुनिया को आगाह कर रहा हूँ। एलओसी के पार ‘घुसपैठ’ के भारत द्वारा लगाए जा रहे नवीनतम आधारहीन आरोप इस खतरनाक एजेंडे का हिस्सा हैं। भारतीय कब्जे के खिलाफ स्वदेशी कश्मीरियों का विरोध भारत द्वारा कश्मीरियों के उत्पीड़न और क्रूरता का प्रत्यक्ष परिणाम है…”

“…आरएसएस-भाजपा गठबंधन की फासीवादी नीतियाँ गंभीर जोखिमों से भरी हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत के ऐसे कदमों से दक्षिण-एशिया में शांति और सुरक्षा को भंग करने के लिए कार्यवाही करनी चाहिए।”

5 – मई 17, 2020

अपने देश में कोरोना वायरस की स्थिति से निपटने के तौर-तरीक़ों को लेकर आलोचना झेल रहे इमरान ख़ान ने गत रविवार (मई 17, 2020) को ट्विटर पर एक के बाद एक कई ट्वीट किए।

इमरान खान ने कहा कि मोदी सरकार ‘बर्बर शक्ति प्रयोग’ और ‘अमानवीय तौर-तरीक़ों’ के ज़रिए जम्मू-कश्मीर पर ‘ग़ैर-क़ानूनी कब्जा’ रखना चाहती है। इमरान ख़ान ने ट्विटर पर लिखा –

“IOJK के बारे में मोदी, आरएसएस से प्रभावित सिद्धांतों के ज़रिए नीतियाँ बनाते हैं और ये बेहद स्पष्ट है: पहला, ग़ैर-क़ानूनी कब्ज़े के ज़रिए कश्मीरियों को आत्म-निर्णय के अधिकार से वंचित करना। दूसरा, उन्हें मनुष्य से कमतर आँकना और उनके साथ वैसा बर्ताव करना।”

पाकिस्तानी अख़बार ‘द डॉन’ के अनुसार, इमरान ख़ान ने मोदी सरकार के कोरोना वायरस के कारण जारी लॉकडाउन के फ़ैसले पर भी सवाल उठाते हुए इसे ‘अमानवीय लॉकडाउन’ ठहराया।

ट्वीट की कतारों में इमरान खान ने एक बार फिर लगे हाथ जिक्र करते हुए भारत की ओर से फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन की आशंका व्यक्त कर दी।

6 – मई 21, 2020

सबसे ताजा ट्वीट में इमरान खान ने लिखा –

“मैं फिर से दोहरा रहा हूँ कि IOJK में चल रहे नरसंहार से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए भारत की ओर से फॉल्‍स फ्लैग ऑपरेशन चलाया जा रहा है।”

भारतीय सेना का मिशन है इमरान खान के भय का कारण

वास्तव में, इमरान खान को जो भय सता रहा है, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण कश्मीर घाटी में भारतीय सेना द्वारा किए जा रहे आतंकवादियों के सफाया है। पाकिस्‍तान को लगने लगा है कि कश्‍मीर में आतंकियों के समूल नाश के अपने मिशन के साथ ही भारत, पाकिस्‍तान में बैठे उनके आकाओं और आतंकी कैंपों को भी खत्‍म करने के लिए कोई ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है।

इमरान खान के भीतर छद्म युद्ध को लेकर यह भय गत वर्ष भारतीय सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से गहराता गया है। भारत ने पुलवामा में हुए आतंकी हमले की प्रतिक्रिया में पाकिस्‍तान की सीमा में घुसकर सर्जिकल स्‍ट्राइक को अंजाम दिया था।

इस स्ट्राइक में पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्‍तान में एयर स्‍ट्राइक कर कई आतंकी ठिकानों को नष्‍ट किया था। हाल ही में भारतीय सेना ने घाटी में मौजूद कई बड़े आतंकवादियों को पकड़ने, मार गिराने से लेकर उनके गुप्त ठिकानों का भी पर्दाफाश कर हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठनों को लाचार कर के रख दिया है।

यही कारण है कि इमरान खान अब फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन के भय वाले अपने पुराने ट्वीट को ही दोबारा ‘कॉपी-पेस्ट’ कर के खुद की फजीहत छुपाने की कोशिश कर रहे हैं।

राम मंदिर निर्माण शुरू: समतलीकरण में निकल रही हैं शिवलिंग, प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ

राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है, जहाँ खुदाई में प्राचीन अवशेष मिल रहे हैं। इस दौरान कई पुरातात्विक मूर्तियाँ, खंभे और शिवलिंग मिल रहे हैं। श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री चम्पत राय ने कहा कि मलबा हटाने के दौरान कई मूर्तियाँ और एक बड़ा शिवलिंग भी मिला है।

दरअसल अयोध्या रामजन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद से ही राम मंदिर निर्माण कार्य शुरू हो गया था लेकिन इसी बीच कोरोना वायरस के कारण जारी लॉकडाउन के चलते यह निर्माण कार्य कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया था।

निर्माण कार्य के बार फिर शुरू होते ही 67 एकड़ के श्रीराम जन्मभूमि परिसर में समतलीकरण और बैरिकेडिंग के एंगल आदि को हटाने का काम तेजी से जारी है। इसी समतलीकरण और खुदाई के काम के दौरान कई सारी प्राचीन मूर्तियों और मंदिर के पुरावशेष मिल रहे हैं।

सदियों से विवादित रहे अयोध्या में हिन्दू आस्था के प्रतीक श्री राम मंदिर निर्माण के लिए निर्मित ट्रस्ट श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र का कहना है कि समतलीकरण के दौरान बड़ी मात्रा में पुराने अवशेष, जैसे – देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियाँ, पुष्प, कलश, दोरजाम्ब जैसी कलाकृतियाँ, भवन के मेहराब के पत्थर, 7 ब्लैक टच स्टोन के स्तम्भ, 8 रेड सैंड स्टोन के स्तंभ और 5 फिट आकार की नक्काशीयुक्त शिवलिंग की आकृति मिली है।

श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री चंपत राय ने बताया कि समतलीकरण कार्य में 3 जेसीबी, 1 क्रेन, 2 ट्रैक्टर और 10 मजदूर लगाए गए हैं। उन्होंने बताया कि 11 मई से चल रहे समतलीकरण कार्यक्रम के दौरान जहाँ हाई कोर्ट के आदेश पर एएसआई ने खुदाई करवाई थी, वहाँ और आसपास के क्षेत्र में काफी संख्या में देवी-देवताओं की मूर्तियों के पुरावशेष के साथ-साथ कई प्रकार की कलाकृतियाँ भी निकली है। 

‘हटो यहाँ से…’ – 8 साल की लाली पांडेय ने यह बात नहीं मानी तो साहिल, वसीम, एखलाक ने मारी गोली

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में 8 साल की मासूम लाली पांडेय को उस समय गोली मार दी गई, जब वो हैण्डपम्प पर नहा रही थी। प्रेमचन्द्र पांडेय की 8 वर्ष की मासूम को फ़ौरन अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से डॉक्टरों ने उसे प्रयागराज रेफर कर दिया। गोली मारने वाले आरोपित का नाम साहिल है, जबकि उसके साथ घटना के समय वसीम और एखलाक भी थे।

गोली चलने के बाद 8 साल की मासूम लाली पांडेय की चीख सुनकर जब तक उसके घरवाले वहाँ दौड़कर पहुँचे तब तक आरोपित साहिल, एखलाक और वसीम, तीनों गुंडे वहाँ से फरार हो चुके थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, बुधवार (मई 20, 2020) की दोपहर जिस समय लाली पांडेय के घर के सभी सदस्य सो रहे थे, तभी प्रेमचन्द्र पांडेय की 8 वर्ष की लाली घर के सामने लगे हैंडपम्प और सबमर्सिबल में नहाने निकल पड़ी।

उसी समय गाँव के तीन गुंडे साहिल, एखलाक और वसीम सबमर्सिबल पम्प पर पहुँचे और लाली को वहाँ से हटने को कहा। मासूम लाली ने उनकी बात नहीं मानी, जिस से तीनों आरोपित बौखला गए।

तभी साहिल ने पिस्टल से लाली पर फायर कर दी, और गोली लाली के पेट में लग गई। इतने में ही लाली जमीन पर गिरकर तड़पने लगी। गोली की आवाज सुनकर उसके घरवाले दौड़कर वहाँ पहुँचे और लाली को उठाकर अस्पताल ले गए।

लाली को गंभीर हालत में देखकर डॉक्टरों ने उसे प्रयागराज रेफर कर दिया। घटना की सूचना पुलिस को दी गई तो सीओ रानीगंज इलाकाई पुलिस के साथ मौके पर पहुँच कर आरोपितों की तलाश में जुट गए लेकिन तीनों आरोपित अभी भी फरार हैं।

रानीगंज CO का कहना है कि जैसे ही उन्हें रानीगंज के मुन्नी का पुरवा में गोली मारने की सूचना प्राप्त हुई, वैसे ही पुलिस बल वहाँ मौके पर पहुँच गए और तीनों आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए जाँच और पूछताछ शुरू कर दी गईं, लेकिन अभी तक इस घटना में कोई भी आरोपित पकड़ा नहीं गया है।

जातिसूचक विवाद में फँसी ‘पाताल लोक’, गोरखा समुदाय ने जताई आपत्ति: अनुष्का शर्मा को भेजा लीगल नोटिस

अमेज़न प्राइम पर रिलीज हुई वेब सीरीज पाताल लोक आए दिन विवादों में घिरती हुई नज़र आ रही है। शो की प्रोड्यूसर अनुष्का शर्मा को लॉयर गिल्ड मेंबर वकील वीरेन सिंह गुरुंग ने एक लीगल नोटिस भेजा है। 18 मई 2020 को भेजे गए इस नोटिस में आरोप लगाया गया है कि सुदीप शर्मा द्वारा लिखी गई इस वेबसीरीज में जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल हुआ है, जिससे गोरखा समुदाय का अपमान हुआ है।

पाताल लोक में जातिसूचक शब्द का मामला

दरअसल इस वेब सीरीज के दूसरे एपिसोड में एक सीन है, जहाँ एक महिला पुलिस अफसर एक नेपाली व्यक्ति से इंटेरोगेशन के 3 मिनट और 41 सेकेंड पर पूछताछ के दौरान जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर उसकी बेइज्जती करती है। उस सीन में नेपाली कहने के साथ ही अन्य शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिसकी वजह से ही पूरा नेपाली समुदाय भड़का हुआ है।

गुरुंग ने द क्विंट को बताया, सीरीज के दूसरे एपिसोड में एक क्लिप में लेडी पुलिस ऑफिसर एक नेपाली किरदार से पूछताछ करते समय जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करती हैं। उनके अनुसार अगर सिर्फ नेपाली शब्द का इस्तेमाल किया जाता तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी मगर उसके बाद इस्तेमाल हुआ शब्द बिल्कुल मंजूर नहीं। क्योंकि अनुष्का शर्मा सीरीज की प्रोड्यूसर हैं, इसलिए उन्हें नोटिस भेजा गया है।

गोरखा समुदाय की माँग

द हिंदू में प्रकाशित खबर के मुताबिक, वेब सीरीज के जिस शब्द पर आपत्ति की जा रही है उसे म्यूट, सबटाइटल को ब्लर और वीडियो को एडिट किया जाए। भारतीय गोरखा युवा परिसंघ ने इस संबंध में एक याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने कहा है, ”सीरीज में एक किरदार का नाम मैरी लिंगदोह है, जो मेघालय के खासी समुदाय का कॉमन सरनेम है। एक पुलिसकर्मी द्वारा उसका अपमान किया जाना पूर्वोत्तर के लोगों के लिए रूढ़िवादिता को ही दर्शा रहा है।”

नेपाली 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक है और भारत में डेढ़ करोड़ लोग हैं, जो नेपाली को आम भाषा में बोलते हैं। गोरखा सबसे बड़ा नेपाली-भाषी समुदाय है और यह शब्द पूरे समुदाय पर असर डालता है। साथ ही समुदाय ने बिना शर्त माफी और डिस्क्लेमर की भी माँग की है।

अनुष्का की तरफ से नहीं आया कोई जवाब

गुरुंग ने मीडिया से बातचीत में बताया कि इस मामले में अब तक अनुष्का शर्मा की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है। अगर उन्हें जवाब नहीं मिलता है तो वह अपनी लीगल टीम के साथ मिलकर इस शो से जुड़े स्ट्रीमिंग पार्टनर समेत अन्य संबंधित व्यक्तियों को भी इस मामले में शामिल करेंगे। साथ ही सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय का इस मामले में हस्तक्षेप करने का भी अनुरोध करेंगे।

पाताल लोक और हिन्दू-घृणा

अमेजन प्राइम पर आए वीडियो सीरीज ‘पाताल लोक’ की कहानी में हिन्दू-घृणा कूट-कूट कर भरी हुई है। कहानी आउटर जमुना पार पुलिस स्टेशन की है। यही है पाताल लोक, जहाँ पुलिस अधिकरी पोस्टिंग होने से भागते हैं। शुरू में ही बता दिया जाता है कि कहाँ-कहाँ पोस्टिंग होना स्वर्ग लोक के समान है और कहाँ पृथ्वी लोक के सामान। ‘पाताल लोक’ का एक बना बनाया सिस्टम है, जो वैसे ही चला आ रहा है। अधिकतर मामलों में केस की जाँच शुरू होने से पहले ही फ़ैसला सुनाया जाता है और फिर परिणाम तक पहुँचा जाता है।

बता दें कि पाताल लोक’ को अनुष्का शर्मा की प्रोडक्शन कंपनी क्लीन स्लेट फिल्म्स के बैनर तले प्रोड्यूस किया गया है। पाताल लोक में जयदीप अहलावत, नीरज काबी, अभिषेक बनर्जी, स्वस्तिका मुखर्जी, निहारिका, जगजीत, गुल पनाग जैसे कलाकारों ने काम किया है। इस वेब सीरीज को सुदीप शर्मा ने लिखा है।

संघियों को बलात्कारी बताने वाला कॉन्ग्रेसी नेता पंकज पुनिया गिरफ्तार, अजय लल्लू 14 दिन की न्यायिक हिरासत में

कॉन्ग्रेस नेता पंकज पुनिया को हरियाणा के करनाल से गिरफ्तार कर लिया गया है। यह गिरफ्तारी सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में हुई है। उन्हें बृहस्पतिवार को कोर्ट में पेश किया जाएगा।

पंकज पुनिया के खिलाफ उत्तर प्रदेश के हजरतगंज और नोएडा पुलिस ने आईटी एक्ट सहित कई मामलो में FIR दर्ज की थी। हजरतगंज में उनके खिलाफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के मामले में केस दर्ज हुआ था।

गौतमबुद्ध नगर जिला पुलिस मुख्यालय के अनुसार, पंकज पुनिया ने सोशल मीडिया (ट्विटर) पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अभद्र टिप्पणी की थी।

पंकज पुनिया के खिलाफ इस मामले में बुधवार (मई 20, 2020) को नोएडा, सेक्टर 39 थाना पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। ये मुकदमा धारा 295ए, 500, 505, 153ए और 66 आईटी एक्ट के तहत दर्ज किया गया था।

इस मामले की जाँच के लिए जिला पुलिस मुख्यालय ने अपर पुलिस उपायुक्त नोएडा के निर्देशन में विशेष टीम का गठन कर दिया है।

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस नेता पंकज पुनिया ने मई 19, 2020 को अपने एक ट्वीट में ‘संघियों’ को बलात्कारी बताया, श्रीराम के नाम का गलत इस्तेमाल किया और योगी सरकार की आलोचना करते हुए उनके लिए आपत्तिजनक शब्द लिखे थे, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी गिरफ्तारी की माँग की जा रही थीं।

14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे गए यूपी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष

प्रवासी मजदूरों के लिए बसों के इंतजाम को लेकर उपजे विवाद पर उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू और विवेक बंसल को आगरा पुलिस ने गिरफ्तार किया था। मंगलवार को अजय कुमार आगरा भी पहुँचे थे, जहाँ उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया था। आगरा में न्यायालय से रिहा होने के बाद अजय कुमार राजधानी लखनऊ लौट रहे थे, जिन्हें लखनऊ पुलिस ने दबोच लिया।

अजय कुमार लल्लू को बुधवार (मई 20, 2020) को अदालत में पेश किया गया, जहाँ उनको जमानत मिल गई। इसके तुरंत बाद लखनऊ पुलिस ने अजय कुमार लल्लू को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहाँ से उनको 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। फिलहाल अजय कुमार लल्लू को 14 दिन तक अस्थायी जेल में रखा जाएगा।

ज्ञात हो कि प्रवासी श्रमिकों के लिए बसों के इंतजाम को लेकर उपजे विवाद पर अजय कुमार लल्लू और विवेक बंसल के खिलाफ थाना फतेहपुर सीकरी में आईपीसी की धारा 188 और 269 के अलावा महामारी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। इसमें अजय कुमार लल्लू और पूर्व विधायक विवेक बंसल के अलावा 67 अज्ञात लोग भी आरोपित हैं।

अजय कुमार लल्लू और प्रियंका गाँधी वाड्रा के निजी सचिव संदीप सिंह समेत अन्य के खिलाफ गत मंगलवार को धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज की गई थी। कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से प्रवासी श्रमिकों को घर पहुँचाने के लिए 1 हजार बस उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। लेकिन आरोपितों ने बस की सूची में हेराफेरी कर उसे स्थानीय प्रशासन को सौंपा था।

शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ ने बताए गुर, मोदी विरोधियों ने किया अमल: हाल के 5 मामले जब फेक न्यूज को दी गई हवा

शेखर गुप्ता ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रोपेगेंडा मीडिया पोर्टल ‘द प्रिंट’ के संस्थापक भी है। कुछ दिनों पहले ‘द प्रिंट’ ने एक लेख के जरिए विपक्ष को यह ज्ञान दिया था, नरेंद्र मोदी को हराने के लिए वह फेक न्यूज कैसे फैलाए।

द प्रिंट के लिए यह लेख शिवम विज ने लिखा था। विज वही पत्रकार हैं, जिन्होंने एक समय कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को ह्वाइटवॉश करने की कोशिश की थी। फेक न्यूज को लेकर लेख में अपनी बातों को सही ठहराने के लिए द प्रिंट ने अमेरिकी थिंक-टैंक रैंड कॉर्पोरेशन के लिए लिखे गए क्रिस्टोफर पॉल और मिरियम मैथ्यूज के एक लेख का हवाला दिया है।

‘द प्रिंट’ ने इसमें दावा किया था कि फर्जी खबरों से तैयार किए गए नैरेटिव विपक्षी पार्टियों को विशेष लाभ दे रहे हैं और ऐसे नेरेटिव्स को दुसरे फर्जी नैरेटिव से काटा जाना चाहिए। यह एक प्रकार से ‘लोहे को लोहे से काटने’ जैसी कहावत की ही एक परिकल्पना थी, जिसे ‘द प्रिंट’ ने राजनीतिक विचारों के साथ स्थान दिया।

यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि भारत में शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ की इस सलाह से भी काफी समय पहले से ही सत्ताधारी दल भाजपा के खिलाफ एक सुनियोजित तरीके से वामपंथी, उदारवादियों और विरोधी दलों, खासकर कॉन्ग्रेस ने फेक नैरेटिव, प्रोपेगेंडा और फर्जी खबरों, जो कि मूल रूप से प्रायोजित अफवाहें ही हुआ करती हैं, का जिहाद छेड़ रखा है।

ऐसी ही पाँच वो घटनाएँ, जिन्हें फैलाकर शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ की सलाह के अनुसार ही देश के विपक्षी दलों और वाम-उदारवादियों ने फर्जी खबरों का जमकर आतंक मचाया –

1 – ‘नए इंडिया का सच’ बताने वाले झूठे रणदीप सुरजेवाला

‘द प्रिंट’ द्वारा दी गई सत्य से आँख मोड़कर फर्जी नैरेटिव की सलाह को कॉन्ग्रेस ने ऐसे लपका जैसे मामा शकुनी की सलाह को दुर्योधन फ़ौरन लपक लेता था। इसमें पहला योगदान कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने दिया और एक नेपाली महिला की ‘मार्मिक’ तस्वीर को ट्वीट किया।

‘न्यू इंडिया का सच!’ कैप्शन के साथ सुरजेवाला ने 18 मई को रात के 11 बजकर 38 मिनट पर ये तस्वीर पोस्ट की थी। कुछ देर बाद ही बिना कोई कारण बताए डिलीट भी कर दिया, लेकिन तब तक यह बड़े स्तर पर शेयर की जा चुकी थी।

इस तस्वीर की सच्चाई यह थी कि यह जुलाई 03, 2012 को नेपालगंज में नरेंद्र श्रेष्ठा नाम के फोटोग्राफर ने यूरोपियन प्रेस फोटो एजेंसी (EPA) के लिए खींची थी।

यह तस्वीर एक नेपाली माँ की थी, जिसने अपनी पीठ पर अपने बच्चे को बाँध रखा था। साथ ही यह तस्वीर भारत की नहीं, बल्कि काठमांडू से करीब 573 किलोमीटर दूर स्थित नेपालगंज की ओर साइकल चलाकर जा रही महिला की थी। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि पहाड़ी रास्ते होने के कारण नेपालगंज में साइकल ही आने-जाने का मुख्य साधन मना जाता है।

2 – बसों की जगह ऑटो-रिक्शा-एम्बुलेंस

उत्तर प्रदेश में कथित तौर पर कॉन्ग्रेस पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी द्वारा भेजी गईं बसों की सच्चाई शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ से निकला हुआ ‘टार’ का ही एक उदाहरण माना जा सकता है। कारण यह कि शेखर गुप्ता के प्रोपेगेंडा पोर्टल में प्रकाशित लेख में अच्छी तरह से कहा गया है कि विपक्षी दलों को झूठे नैरेटिव का सहारा लेना चाहिए।

कॉन्ग्रेस का दावा है कि उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर बड़ी संख्या में बसें योगी सरकार की अनुमति का इंतजार कर रही हैं। अब ख़बर आई है कि इन बसों के ड्राइवरों ने कॉन्ग्रेस पार्टी के ख़िलाफ़ नारेबाजी की है। कहा जा रहा है कि इन ड्राइवरों को ठीक से खाना नहीं खिलाया जा रहा था, जिस कारण उन्होंने विरोध-प्रदर्शन किया।

इससे पहले कॉन्ग्रेस पार्टी ने यूपी सरकार को 1000 बसों की सूची सौंपने का दावा किया था। वो अलग बात है कि इनमें से 297 गाड़ियों में कोई न कोई गड़बड़ी है। 79 की फिटनेस नहीं है, 140 का बीमा समाप्त हो चुका है और 78 ऐसी हैं, जिनमें ये दोनों ही ख़त्म हो चुका है।

प्रियंका गाँधी द्वारा भेजे गए बसों की सूची में से 31 ऑटो थे, 69 एंबुलेंस, ट्रक या फिर अन्य वाहन थे। इसके साथ ही 70 ऐसे वाहनों की लिस्ट दी गई थी, जिसका कोई डेटा ही उपलब्ध नहीं था।

3 – मार्मिक वीडियो: कॉन्ग्रेस ने कार्यालयों को रसोई बना दिया

गत 18 मई को ही ट्विटर पर कोरोना वायरस के कारण जारी लॉकडाउन का ‘मार्मिक चित्रण’ करने के सदियों पुराने और घिसे-पिटे वामपंथी नैरेटिव का इस्तेमाल करते हुए एक वीडियो शेयर किया। इसके साथ संदेश था –

“फर्क- मानवता का है। भाजपा ने कोरोना संकट के दौरान खाने के लिए तरसते गरीब देशवासियों से मुँह मोड़ लिया, जबकि कॉन्ग्रेस ने संकट की इस घड़ी में देशवासियों के लिए अपने कार्यालयों को ‘रसोई’ बना दिया।”

लेकिन कॉन्ग्रेस का यह फर्जी वीडियो भी जल्दी ही फैक्टचेक कर लिया गया, वो भी सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा। वही यूजर्स जो चुनावों के समय मतदान करते हैं। वही यूजर्स जिनके लिए कॉन्ग्रेस आरोप लगाती है कि वह वोट तो उसके लिए डालते हैं लेकिन बटन भाजपा का दब जाता है।

कॉन्ग्रेस ने जो वीडियो शेयर किया, उसमें से जिस वीडियो में कॉन्ग्रेस ने भाजपा पर निशाना साधा था, वह अगस्त 2019 का वीडियो निकला।

इस वीडियो को YouTube चैनल OMG के पेज 2 पर पिछले साल 21 अगस्त को एक कैप्शन के साथ अपलोड किया गया था – ‘कृपया अपना भोजन बर्बाद न करें।’ वीडियो में 0.21 सेकंड पर, एक व्यक्ति रेल की पटरियों पर बचे हुए लोगों के बीच भोजन के लिए छानबीन करता हुआ देखा जा रहा था।

यह आजकल शेयर करने के पीछे कॉन्ग्रेस का मकसद यह साबित करना था कि यह वीडियो लॉकडाउन के बीच का है, जहाँ इस दौर में कॉन्ग्रेस गरीबों की मसीहा बनी हुई है तो वहीं भाजपा देश के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए कुछ नहीं कर रही है, जिस कारण गरीबों को इस तरह के हालातों का सामना करना पड़ रहा है।

4 – प्रियंका की शान में NDTV मैदान में

NDTV के पत्रकार उमाशंकर सिंह ने अपने ट्विटर हैंडल से एक फोटो शेयर करते हुए लिखा, ‘बढ़िया खबर, यूपी सरकार ने कॉन्ग्रेस की तरफ़ से भेजी गई बसों को चलाने की इजाज़त दे दी है।”

लेकिन दुर्भाग्यवश जिस फोटो को NDTV के पत्रकार उमाशंकर सिंह ने पोस्ट किया था वह फोटो प्रयागराज में पिछले वर्ष लगे कुंभ मेले में फरवरी 28, 2019 की निकली, जहाँ विश्व की सबसे लंबी बस परेड का वर्ल्ड रेकॉर्ड बनाया गया।

तब कुंभ मेले के आयोजन के बीच उत्तर प्रदेश परिवहन निगम और प्रयागराज मेला प्राधिकरण की ओर से कुंभ की 503 शटल बसों को शहर के एक 3.2 किमी लंबे रूट पर एक साथ संचालित कराया गया था।

लेकिन कॉन्ग्रेस की शान में नेहरू के नमक के कर्ज में डूबे NDTV का तो प्रोपेगेंडा ही एकमात्र लक्ष्य तब से है, जब शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ ने फर्जी नैरेटिव के जरिए विपक्ष को बढ़त बनाने की सलाह भी नहीं दी थी।

5 -‘द हिंदू’ तथ्यात्मक रूप से फर्जी रिपोर्ट

मई 16, 2020 को, वामपंथी मीडिया संगठन, ‘द हिंदू’ ने, ‘उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुए दंगे और न्याय का सवाल’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें यह दावा किया गया था कि दिल्ली में दंगा पीड़ितों के प्रति दिल्ली पुलिस पूर्वाग्रही थी।

‘द हिन्दू’ की इस रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली पुलिस, विशेष रूप से दिल्ली दंगों से संबंधित मामलों में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में पक्षपाती थी। रिपोर्ट ने उत्तर-पूर्व के दंगों के मामलों में पुलिस को न्याय करने में दुर्भावना का परिचय देते हुए इन दंगों को पूर्व निर्धारित साजिश के रूप में पेश करने का प्रयास किया।

दिल्ली के दंगों के दूसरे मजहब के पीड़ितों, जो कुल 53 में से 38 थे, का हवाला देते हुए अपने लेख में कहा है कि दिल्ली पुलिस सीएए के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, क्योंकि वे दूसरे मजहब से हैं।

दिल्ली पुलिस पर सांप्रदायिक पूर्वाग्रह का आरोप लगाते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने हिंदू हमलावरों को छोड़ दिया, जबकि वे समुदाय विशेष के खिलाफ विशेष रूप से कठोर हो गए हैं, जिसमें ‘दूसरे मजहब वालों की अवैध गिरफ्तारी’ भी शामिल है और यह भी कहा गया कि पुलिस ने एफआईआर रिपोर्ट दर्ज करने में दूसरे मजहब के साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया।

हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने तुरंत इस लेख को बेबुनियाद और सांप्रदायिकता से पूर्ण कहते हुए फटकार लगाई। लेख को वाहियात बताते हुए, दिल्ली पुलिस ने एक आधिकारिक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि जिस PUDR रिपोर्ट के आधार पर यह लेख लिखा गया है, उसने सिर्फ चुनिंदा एफ़आईआर को ही शामिल किया है, ताकि दिल्ली पुलिस को एक समुदाय विशेष के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रस्त साबित किया जा सके।

बयान में पुलिस ने सपष्ट किया कि दिल्ली दंगों के मामलों में दिल्ली पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी वैज्ञानिक और तकनीकी सबूतों के आधार पर ही आधारित थी।

आर्थिक पैकेज की समझ नहीं है तो बोलता क्यों है? अजीत भारती का वीडियो । Ajeet Bharti on Ravish kumar

रवीश कुमार की आर्थिक पैकेज पर अज्ञानता; श्रमिकों की चिंता है, लेकिन योगी बस की स्थिति चेक न करे; Y2K पर विशुद्ध झूठ; लोगों को भड़काने की कोशिश जारी है।

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