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कॉन्ग्रेस की राजस्थान सरकार ने 70 बसों से यूपी बॉर्डर तक बच्चों को भेजने लिए योगी सरकार को थमाया ₹36 लाख का बिल

कॉन्ग्रेस और बीजेपी सरकार में बसों को लेकर सियासी जंग जारी है। राजस्थान सरकार ने लॉकडाउन में फँसे कुछ छात्रों को कोटा से यूपी बॉर्डर तक छोड़ने के लिए यूपी सरकार से 36 लाख रुपए बसों का किराया और 19.50 लाख रुपए डीजल का वसूला है। जोकि उत्तर प्रदेश राज्य परविहन निगम द्वारा भुगतान कर दिया गया है।

जहाँ एक तरफ कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा मजदूरों की हितैषी बन उनके लिए लॉकडाउन के चौथे चरण में 1000 बसों को यूपी बार्डर पर भेजने का इंतजाम कर रही थी। वहीं राजस्थान के कॉन्ग्रेस सरकार की तरफ़ से बच्चों को वापस उनके गृहराज्य भेजने के लिए यूपी सरकार को 36 लाख का बिल थमा दिया गया।

शेष बच्चों के लिए यूपी सरकार ने माँगा था मदद

यूपी सरकार ने राजस्थान (कोटा) में लॉकडाउन की वजह से फँसे लगभग 12000 बच्चों के लिए 560 बसें यूपी से भेजी थी। सरकार ने अनुमान लगाया था कि इतनी बसों में सारे बच्चें आ जाएँगे। मगर सोशल डिस्टेंसिग के नियमों को देखते हुए बसों की संख्या कम पड़ गई।

जिसके चलते योगी सरकार ने राजस्थान सरकार से अपनी कुछ बसों से बचे हुए बच्चों को प्रदेश की सीमा स्थित फतेहपुर सीकरी और झाँसी तक पहुँचाने का अनुरोध किया। उसके बाद सीमा से वे बच्चों को वापस भेजने का इंतजाम कर देंगे। जिस पर राजस्थान सरकार ने 70 बसों का इंतजाम किया था। इसी बसों के किराया के लिए राजस्थान सरकार ने योगी सरकार को बिल भेजा था।

राजस्थान सरकार ने भेजा 19 लाख के डीजल का भी बिल

कॉन्ग्रेस की गहलोत सरकार की तरफ से भेजे गए बिल में कहा गया है कि राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम ने कोटा में फँसे उत्तर प्रदेश के छात्रों के लिए 70 बसें उपलब्ध कराई थी। इस के लिए 36,36,664 रुपए का खर्चा आया है। हालाँकि, राजस्थान सरकार की बसें जब छात्रों को लेने कोटा पहुँची थी, तभी डीजल के लिए उत्तर प्रदेश सरकार से 19 लाख रुपए ले लिया था, बावजूद इसके फिर से भारी भरकम बिल भेज दिया गया।

आपको बता दें, जहाँ एक तरफ राजस्थान सरकार ने बच्चों को यूपी बॉर्डर तक छोड़ने के लिए किराया वसूला वहीं दिल्ली बॉर्डर से जब उत्तर प्रदेश सरकार श्रमिक-कामगारों को ला रही थी, तब हरियाणा सरकार ने 350 बसें उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों तक भेजीं और उनका किराया भी नहीं लिया था।

‘घर पर सोई 10 माह की मासूम से रोजेदार मोहम्मद हमीद ने किया रेप’: अलवर में बकरी चराने वाला आरोपित गिरफ्तार

राजस्थान के अलवर में मोहम्मद हमीद ने घर पर सोई 10 माह की बच्ची का बलात्कार किया। 19 वर्षीय आरोपित मोहम्मद हमीद ने जब बच्ची का बलात्कार किया, उस समय वो घर पर सो रही थी। मोहम्मद हमीद बकरी चराता था और तीन दिन पहले की इस घटना में पुलिस ने हमीद को गिरफ्तार कर लिया है।

ट्विटर पर इस अपराध की खबर ट्वीट करते हुए अधिवक्ता प्रशांत पटेल उमराव ने लिखा है- “दिनदहाड़े रोजेदार मोहम्मद हमीद द्वारा दस माह की मासूम से रेप। कुछ दिन पहले टोंक में भी रोजेदारों द्वारा गैंगरेप किया गया। राजस्थान में हैवानियत की हदें पार।”

प्रशांत पटेल ने कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी को इस खबर के स्क्रीनशॉट के साथ टैग करते हुए उनसे सवाल किया है कि क्या उनका महिला सुरक्षा मॉडल यही है?

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना अलवर के तिजारा थाना क्षेत्र के एक गाँव की है। पीड़ित बच्ची के पिता ने बुधवार (मई 20, 2020) को इसकी रिपोर्ट कराई और मासूम को अस्पताल में जाँच के लिए भर्ती किया।

मोहम्मद हमीद ने इस हैवानियत को उस समय अंजाम दिया जब मासूम के पिता चूड़ियाँ बेचने घर से बाहर गए थे और उनकी 10 साल की दूसरी लड़की छत पर खेल रही थी।

तभी मोहम्मद हमीद घर पर घुसा और 10 माह की मासूम से दुष्कर्म करने लगा। बच्ची के रोने की आवाज सुनकर छत पर खेल रही उसकी बड़ी बेटी कमरे में गई तो उसने हमीद को यह सब करते देखा और वो चिल्लाने लगी।

इसके बाद आरोपित हमीद वहाँ से भाग गया और शाम को जब उसके पिता घर पहुँचे तो उसने इस घटना की जानकारी दी।

उल्लेखनीय है कि आरोपित हमीद के माता-पिता नहीं हैं और वो गाँव में बकरियाँ चराने का काम करता है। मोहम्मद हमीद को गिरफ्तार कर लिया गया है और आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी है।

इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी लौटें अपने गृहराज्य: प्रदीप भंडारी से मजदूरों के हालात और आगे की जिंदगी पर बातचीत

चीनी कोरोनोवायरस महामारी ने इस दुनिया को बदल कर रख दिया है। लगभग हर इंसान की जिंदगी इसके चलते प्रभावित हुई है। दुनिया भर में लाखों लोग संक्रमित हुए हैं, जिनमें कुछ लोग ठीक हुए तो हजारों लोगों की जान गई है। इस प्रकोप को मद्देनजर रखते हुए भारत ने भी कई अन्य देशों की तरह, वायरस के प्रसार को रोकने और लोगों के जीवन को बचाने के लिए लॉकडाउन की घोषणा की। मगर एक अरब से अधिक की आबादी वाले भारत के पास अनेक चुनौतियाँ थी।

जहाँ एक तरफ घर पर रहना कई लोगों के लिए एक लक्जरी था, तो वही दूसरी तरफ लगभग पूरे भारत में हजारों प्रवासियों ने अपने कर्म स्थल को छोड़ अपने गाँव वापस जाने के लिए निकल पड़े थे। गरीब मजदूरों की ऐसी हालत ने सभी का दिल दहला कर रख दिया। इस महामारी के दौर में सेफोलॉजिस्ट प्रदीप भंडारी ने प्रवासी मजदूरों की आपबीती और जमीनी हकीकत को समझने और जानने के लिए एक महीने तक यात्रा की। मजदूरों को लेकर भंडारी ने ऑपइंडिया के साथ बातचीत की और इस बारे में बताया कि सरकारों ने कैसे काम किया और सरकारें इस संकट की घड़ी को कम करने के लिए और क्या-क्या कर सकती हैं।

1. आपने 38 दिनों की यात्रा की है, ज़मीनी स्तर पर प्रवासियों की स्थिति के बारे में आपका क्या कहना है?

मैंने लगभग 8 राज्यों में 14000 कि.मी से अधिक की ज़मीनी यात्रा की थी। अपनी यात्रा के दौरान, मैं शायद ही किसी ऐसे व्यक्ति से मिला था जिसने लॉकडाउन का विरोध किया था, यहाँ तक ​​कि प्रवासियों में भी सामान्य भावना लॉकडाउन के पक्ष में ही थी, हालाँकि उनमें निराशा की भावना भी थी, जो उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी। उनकी निराशा और क्रोध के बीच एक पतली रेखा है कि प्रवासी मजदूर थोड़ा धीरज रख कर ट्रेन से अपने घर वापस जा सकते थे।

हालाँकि, जिनके गाँव में उनका परिवार अकेला था, और अपने ठेकेदारों से भी मजदूरी प्राप्त होना बंद हो गया था, उनके पास पैदल या साइकिल से घर जाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। साथ ही लौटने वाले प्रवासियों को जिस तरह से अस्थायी रोजगार प्रदान किया जाएगा वह आने वाले महीनों में प्रवासियों की उस स्थिति को निर्धारित करेगा।

2. क्या प्रवासी मजदूर मोदी सरकार के खिलाफ हो गए है?

जहाँ-जहाँ मैंने यात्रा की ज्यादातर प्रवासी मजदूर हिन्दी बोलने वाले थे (जिसमें यूपी, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, चंडीगढ़ और बिहार शामिल है।) और उनमें से किसी में भी मोदी के विरोध जैसी कोई भावना नहीं थी। यहाँ तक कि कई लोगों की राय थी कि अगर मोदी पीएम नहीं होते तो देश की स्थिति और खराब हो सकती थी।

पैदल यात्रा करने वाले थोड़े परेशान थे, उन्होंने अपनी इस तरह की यात्रा पर असंतोष की भावना व्यक्त की, जबकि जिन लोगों ने ट्रेन से यात्रा की वे लोग संतोष की भावना के साथ घर लौटे। अब आने वाले 3 महीने ही यह निर्धारित करेंगे कि प्रवासी मोदी समर्थक रहेंगे या नहीं। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा कल्याणकारी सेवाओं के वितरण पर यह निर्भर करता है।

3. प्रवासियों की स्थिति में सुधार लाने के लिए और क्या-क्या करने की आवयश्कता है?

यह बेहद महत्वपूर्ण होगा कि विभिन्न राज्य सरकार आने वाले महीनों में प्रवासियों से कैसे काम कराएँगी। लगातार प्रवासियों की आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य के लिहाज से देखभाल करना होगा। साथ ही अपने गृह राज्य वापस लौटने पर पहले उन्हें क्वारंटाइन किया जाना चाहिए। मुझे याद है कि नोएडा से महोबा (यूपी) के लिए साइकिल पर प्रवासियों का एक समूह मिला था। जब मैंने इस बारे में पूछताछ की कि वे घर पहुँचते ही क्या करेंगे, तो पहली बात उन्होंने कहा- “14 दिनों के लिए क्वारंटाइन।” जागरूकता और स्वैच्छिक जिम्मेदारी के स्तर, प्रवासियों में लचीलापन ने भारत को अब तक इस महामारी से निपटने में काफ़ी मदद की है।

यह अत्यंत आवश्यक है कि आने वाले दिनों में भोजन, और आश्रय का ध्यान रखा जाए। गृह राज्यों को एक राज्य प्रवासी डेटाबेस बनाने की आवश्यकता है, और केंद्र के पास भी एक सिंगल डेटाबेस में प्रवासियों का विवरण होना चाहिए। सरकार को समय के साथ उनके प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ को देखना चाहिए। मनरेगा बढ़ने से उन्हें फायदा होगा। इसके साथ ही उन्हें अधिक सार्वजनिक कार्यों में लगे रहने की भी आवश्यकता है। इससे पहले यह कभी नहीं हुआ है कि इतने सारे प्रवासी मजदूर एक साथ वापस अपने गृहराज्य आएँ हो। राज्यों को इस अवसर का उपयोग अपने राज्य केंद्रित मॉडल के विकास के लिए करना चाहिए।

4. आपके हिसाब से कौन से राज्य इस वक़्त अच्छा और कौन खराब प्रदर्शन कर रहे हैं?

ओडिशा, तेलंगाना, केरल, यूपी इस महामारी से अच्छी तरह से लड़ रहें है। इसके अलावा बंगाल, बिहार और महाराष्ट्र में सुधार करने की आवश्यकता है। गुजरात और एमपी को भी कोरोना वायरस के प्रसार पर नज़र रखने की आवश्यकता है। बाकी लोगों ने प्रतिक्रिया के लिए सार्वजनिक धारणा में औसत से ऊपर प्रदर्शन किया है।

5. जमीन स्तर पर 20 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज किस प्रकार दिया जाएगा?

सरकार ने एमएसएमई, किसानों और सुधारों पर केंद्रित एक बड़े पैकेज की घोषणा की है। आने वाले दिनों में इस पैकेज की बारीकियों के बारे में ज़मीनी स्तर पर लोगों को बताना होगा। लोगों को यह तो पता है कि सरकार ने राहत पैकेज की घोषणा की है, लेकिन इस पैकेज से किस प्रकार लाभ हासिल किया जाएगा इसकी जानकारी अभी उनके पास नहीं है।

6. बंगाल से क्या खबरें आ रही हैं?

बंगाल की रिपोर्ट चिंताजनक है। वहाँ के लोगों से बात करने पर इस बात का पता लगा कि वहाँ के निवासी कोविड-19 को लेकर काफ़ी परेशान है। उन्हें इस महामारी के प्रसार के बारे में बहुत ही कम जानकारी है। ग्राउंड रिपोर्ट्स के अनुसार, बंगाल में सही तरह से लॉकडाउन लागू नहीं किया गया था। केंद्र को बंगाल में कोविड-19 की स्थिति का सूक्ष्मता से पता लगाने की आवश्यकता है क्योंकि वहाँ के निवासियों को राज्य सरकार पर पूरी तरह से विश्वास नहीं है कि वे अपने दम पर इस महामारी को रोकने का प्रयास कर रही है।

7. प्रवासी संकट के बीच उनकी जमीनी यात्रा कैसे हुई है? उनमें जागरूकता का स्तर कैसा है? क्या सोशल डिस्टेंसिग का पालन किया जाता है?

मेरी 14 हजार किमी की यात्रा में मेरा दृष्टिकोण सिर्फ लोगों की आवाज का प्रतिनिधित्व करना या उनके बीच पैनिक क्रिएट करना नहीं था। मेरा उद्देश्य पीड़ित प्रवासियों की मदद करना था। इसलिए यदि राजमार्ग पर एक प्रवासी नंगे पैर था, तो उसके दर्द को समझने के अलावा उस प्रवासी की बात को मदद के लिए संबंधित अधिकारियों तक पहुँचाना भी था। यदि रास्ते में सैनिटेशन की जरूरत पड़ी तो हमने सैनिटेशन किट भी वितरित किए।

इस तरह सड़कों पर कई लोगों की मदद कर हमने अपने आपको बहुत भाग्यशाली महसूस किया। मुझे याद है कि कुछ लोग यूपी जाने वाले थे लेकिन अपना रास्ता भटक चुके थे और लुधियाना पंजाब से उत्तराखण्ड के रुड़की पहुँच गए थे। इस स्थिति में हम कोशिश करते थे कि उन लोगों को आसपास से गुजरने वाली गाड़ियों से मेरठ तक छोड़ दिया जाए ताकि वे आसानी से पूर्वी यूपी अपने घर तक पहुँच जाएँ।

साथ ही हम उन्हें अधिकारियों के फ़ोन नंबर भी उपलब्ध कराते थे जिससे कि कोई दिक्कत आने पर वे उनसे मदद ले सकें। मैंने अपने विवेक के साथ अन्याय किया होता तो अगर मैं सिर्फ प्रवासियों के दर्द तक खुद को केंद्रित रखता, लेकिन दर्द को कम करने का प्रयास नहीं करता तो।

अंतत:, हर भारतीय इस मुश्किल घड़ी में एक साथ है। गाँवों में आत्मविश्वास की भावना है कि वे अधिक इस कोरोना महामारी प्रतिरोधी हैं। उन्होंने बाहरी लोगों को गाँव में प्रवेश करने पर रोक लगा दी थी, यहाँ तक कि उत्पादन भी गाँव में स्थानीय रूप से किया जाता था। वे चेहरे को ढकने के लिए गमछे का इस्तेमाल करते थे।

बता दूँ कि सभी स्थानों पर समाजिक दूरी का कड़ाई से पालन नहीं किया गया। सड़क पर प्रवासी सिर्फ़ वापस घर पहुँचने के लिए उत्सुक थे। सैकड़ों किमी की यात्रा ने उन्हें अधीर बना दिया था और उनकी पहली प्राथमिकता सामाजिक दूरी नहीं थी, बल्कि जल्द से जल्द घर पहुँचना था। हालाँकि, वे स्वेच्छा से वापस पहुँचने पर क्वारंटाइन के बारे में जानते थे।

मुझे लगता है कि प्रवासी इस हालात में भी सबसे अच्छा कर रहे हैं। सौभाग्य से हर दिन स्थिति में सुधार हो रहा है क्योंकि प्रवासियों की संख्या पहले की तुलना में कम हो रही है। 15 लाख से अधिक प्रवासी वापस अपने गृहराज्य पहुँच चुके हैं और आने वालें दिनों में श्रमिक ट्रेनों में वृद्धि और नियम में बदलाव के कारण अब राज्य सरकार की अनुमति की भी जरूरत नहीं है ताकि जल्द से जल्द स्थिति फिर से सामान्य हो सके।

बाबरी ढॉंचे के नीचे बिरियानी बनाता मिला मुगल, आज भी है चूल्हे में आग: शेख की दाढ़ी चूसने वाले लिबरलों ने देखा

मुस्लिमों का महिमामंडन एक बार फिर चर्चा का विषय है। या यूँ कहें कि एक वर्ग की पहचान ही मुस्लिमों का महिमामंडन रह गया है। अयोध्या रामजन्मभूमि निर्माण कार्य के दोबारा शुरू होने के बाद निर्माण स्थल से प्राचीन अवशेष और मन्दिर की कलाकृतियाँ मिली हैं।

इनमें शिवलिंग हैं। मन्दिर के मेहराब हैं। ऐसी ही कई और चीजें समतलीकरण की प्रक्रिया में ऊपर आई हैं, जिन्होंने मुगलों की महानता के दोहे गाने वाले नव-उदारवादियों को एक बार फिर रोजगार दे दिया है।

मन्दिर निर्माण की जगह से मिल रहे साक्ष्यों के फौरन बाद मुस्लिम पक्ष के वकील ने बयान दिया कि ये साक्ष्य मन्दिर के नहीं हैं। बदले में लोग उनका शुक्रिया कहना भूल गए कि उन्होंने ये नहीं कहा कि जो शिवलिंग आज निकला है, उसकी स्थापना बाबर ने की थी और लगे हाथ ये भी साबित हो जाता कि बाबर सेकुलर आक्रांता था।

रसीले आम का शौक़ीन शेख

सभ्यताओं के ‘मुगलीकरण’ से एक कहानी याद आती है। एक बार अरब का एक शेख व्यापार के लिए भारत की ओर आया और रसीले आमों का गुलाम हो गया। वो वहाँ अपने पूरे दल-बल और लाव-लश्कर के साथ पहुँचा था।

मेजबान के घर उसकी खूब खातिरदारी की गई। जब उसने भारत का स्वादिष्ट भोजन निपटा लिया, उसके बाद अंत में उसे आम परोसे गए। आम का स्वाद इतना जबरदस्त था कि शेख ने मन बना लिया कि वह इन आमों को अपने कबायली साथियों को वापस लौट कर जरूर खिलाएगा।

इसी उम्मीद में उसने अपने साथ लाए सभी ऊँट और घोड़ों में जितना संभव हो सका उतने आम लाद लिए। फिर शेख ने अपने मेजबान से विदा माँगी और वापस अपने रेतीले देश निकल पड़ा।

लेकिन वापस लौटते वक्त वह कई दुर्गम रास्तों से गुजरा। रास्ता बहुत लंबा था और धूप तेज थी। जिस कारण उसके साथी थकने लगे और उसके ऊँट और घोड़े बदहाल होते गए। उसके साथियों ने शेख को सलाह दी कि उसे अगर अपने ऊँट और घोड़े सही सलामत चाहिए तो उसे आमों के बोझ को कम करना ही होगा।

यह बात शेख को पसंद तो नहीं आई। लेकिन मजबूरी में उसने फैसला किया कि कुछ ऊँटों से आम का बोझ कम किया जा सकता है। ऐसा करते-करते उसके कई ऊँट रास्ते में मर भी गए। अब उसके साथ उसके कुछ साथी ही बच गए थे। बाकी बचे कुछ ऊँट और घोड़े लगभग सब थक चुके थे और एक कदम आगे चलने में भी असमर्थ थे।

शेख के लिए अभी भी मुद्दा उसके रसीले आम थे। आखिर उसने फैसला किया अगर उसे अपने साथियों को आम का स्वाद बताना है तो उसे कम से कम एक आम तो अपने साथ रखना होगा। लेकिन कई दिनों के इस लम्बे सफर में अब आम भी बहुत ज्यादा चलने वाला नहीं था।

शेख के एक साथी ने उसे एक नेक सलाह दी कि वह उस आम को निचोड़ कर उसमें अब अपनी दाढ़ी भिगो ले। शेख ने ऐसा ही किया। आम के रस से उसकी दाढ़ी में भी नई जान आ गई और इतिहासकारों को भी मुगलों की दाढ़ी से उनकी पहचान करने में आसानी हुई। कुछ महीनों के सफर के बाद आखिर वह अपने घर पहुँचा।

उसने बिना साँस लिए फौरन अपने सभी साथियों को इकट्ठा किया। उसने सबको उस रसीले आम के स्वाद की महिमा के बारे में बताया और कहा कि अब वह सब एक-एक करके उस आम का स्वाद लेने के लिए उसकी दाढ़ी को चूसेंगे।

उसके सभी कबायली साथियों ने यही किया। आखिरकार शेख खुश था कि उसने अपने साथियों को अपने दोस्त के घर पर खाए हुए रसीले आमों का स्वाद बता पाया।

असली रहस्य यहाँ से शुरू होता है। दरअसल, शेख की दाढ़ी से आम का स्वाद लेने वालों में भारत के कुछ बुद्धिजीवी और वाम उदारवादी लोग भी शामिल थे। बल्कि व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर प्रकाशित एक लेख में बताया गया है कि ये जमात शेख की दाढ़ी से आम का स्वाद चूसने के बाद ही वाम-उदारवादी बने थे।

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में ये किस्सा उसी अध्याय के साथ दिया गया है, जिसमें बसों को ऑटो-रिक्शा और स्कूटर में तब्दील करने की कला के बारे में बताया गया है।

शेख की दाढ़ी चूसने के बाद नव-उदारवादियों ने फौरन वहाँ से लौटकर भारत का इतिहास लिखा और उसमें बताया कि भारत के आम स्वादिष्ट तो थे, लेकिन शेख की दाढ़ी से टपकने वाले रस की बात ही कुछ और थी।

भारत के वामपंथी उदारवादियों का मुगल-प्रेम इस कहानी के प्रत्येक पात्र घटना से संयोग ही नहीं रखता, बल्कि ऐसा लगता है मानो वो इसका ही हिस्सा रहे थे।

कल सुबह भारत का प्रोग्रेसिव विचारक वर्ग अगर यह कहता है कि अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि के निर्माण स्थल को अगर थोड़ा सा और खोदा जाए तो वहाँ से बाबर के बिरयानी के पतीले भी निकल सकते हैं। अगर लिखने वाले नेहरूवादी नमक में डूबे पत्रकार हों, तो यह दावा भी कर सकते हैं कि जिस चूल्हे में बाबर बिरयानी पका रहा था, उसमें अभी भी आग बाकी है।

वामपंथी रिपोर्टर्स कल सुबह उठकर अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर उस निर्माण स्थल को पाताल लोक तक खोदने का भी प्रयास कर सकते हैं और इस पूरे घटनाक्रम का उद्देश्य सिर्फ यही साबित करना होगा कि शेख की दाढ़ी के निकले आम का रस आज भी वामपंथी इतिहासकारों, साहित्यकारों और पत्रकारों की रगों में दौड़ रहा है।

बंगाल: ‘अम्फान’ ने ली 72 की जान, ममता बनर्जी के साथ प्रभावित इलाकों का जायजा लेंगे PM मोदी

190 किलोमीटर की रफ्तार से आए चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ ने पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक तबाही मचाई है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘अम्फान’ की चपेट में आने से 72 लोगों की मौत होने की बात कही है। ममता बनर्जी की अपील के बाद शुक्रवार (22 मई, 2020) को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनके साथ प्रभावित इलाकों में हवाई सर्वेक्षण करेंगे।

पश्चिम बंगाल के दीघा और बांग्लादेश के हटिया द्वीप के बीच जमीन से टकराए चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ ने सबसे अधिक पश्चिम बंगाल के कोलकाता को अपनी जद में लिया है। इस तूफान ने हजारों लोगों घरों से बेघर और सैकड़ों इमारतों को पूरी तरह से तबाह कर दिया है। कोलकाता और राज्य के कई अन्य हिस्सों में पुल नष्ट हो गए हैं और निचले हिस्से में बाढ़ जैसे हालात बन गए।

इसे लेकर अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, ‘अब तक हमें मिली खबरों के अनुसार, चक्रवात ‘अम्फान’ के चलते 72 लोगों की मौत हुई है। इससे दो जिले, उत्तर और दक्षिण 24 परगना पूरी तरह तबाह हो गए हैं। हमें उन जिलों का पुनर्निर्माण करना होगा। मैं केंद्र सरकार से आग्रह करूँगी कि वह राज्य को सभी सहायता उपलब्ध कराए।”

ममता बनर्जी ने कहा कि मैंने अपने जीवन में इससे भीषण चक्रवात और नुकसान कभी नहीं देखा। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चक्रवात ‘अम्फान’ प्रभावित इलाकों का निरीक्षण करने के लिए आने की अपील करती हूँ। मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को दो से ढाई-ढाई लाख रुपए मुआवजा देने की भी घोषणा की है।

वहीं ममता बनर्जी की अपील के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने तूफान प्रभावित इलाकों का दौरा करने का फैसला किया है। जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल के हालात का जायजा लेने के लिए शुक्रवार (22 मई, 2020) को वह ममता बनर्जी के साथ हवाई सर्वेक्षण करेंगे।

‘अम्फान’ ने ओडिशा में भी भारी तबाही मचाई है। वहाँ तटीय जिलों में विद्युत और दूरसंचार से जुड़ा आधारभूत ढाँचा नष्ट हो गया है। ओडिशा के अधिकारियों के आकलन के मुताबिक चक्रवात से लगभग 44.8 लाख लोग प्रभावित हुए हैं।

इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात की और उन्हें स्थिति से निपटने के लिए केंद्र की ओर से हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया।

उत्तर प्रदेश: योगी सरकार के हाथ में अब शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड की कमान

उत्तर प्रदेश में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड का 5 वर्षीय कार्यकाल पूरा होने के बाद अब दोनों समितियों की कमान योगी सरकार ने अपने हाथों में ले ली है। जानकारी के मुताबिक, सुन्नी वक्फ बोर्ड का कार्यकाल 31 मार्च और शिया वक्फ बोर्ड का कार्यकाल 18 मई को पूरा हो गया है। कोरोना के कारण चुनाव टलने से दोनों वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश की सरकार के अधीन ही रहेंगे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मोहसिन रजा ने कहा कि दोनों बोर्ड के काम को देखने के लिए इस दौरान सरकार द्वारा सीईओ नियुक्त किए जाएँगे।

मोहसिन रजा का कहना है कि सुन्नी और शिया वक्फ बोर्ड सपा की सरकार के दौरान बने थे। दोनों के कार्यकाल के दौरान कई खामियाँ नजर आई हैं। इसकी जाँच अब योगी सरकार करवा सकती है। वहीं माना जा रहा है कि अगर जाँच होती है तो कई मजहबी नेताओं का नाम भी सामने आ सकता है।

बता दें, राज्य मुख्यालय प्रदेश सरकार ने एक आदेश जारी कर यूपी के शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी व बोर्ड के अन्य सदस्यों से बोर्ड के कामकाज से जुड़ी सभी फाइलें और दस्तावेज तलब किए हैं। वहीं, उपसचिव रवि शंकर मिश्रा की ओर से एक आदेश जारी किया गया है, जिसमें बोर्ड के पूर्व चेयरमैन व सदस्यों से सभी दस्तावेज, फाइलें आदि तत्काल शासन को सौंपने की बात कही गई है।

इसके अलावा ये भी पता चला है कि यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन जुफर फारूकी से बोर्ड के कामकाज से संबंधित सभी फाइलें व दस्तावेज वापस लिए जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। बताया जा रहा है कि उन्हीं के पास अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जुड़े सभी कागजात हैं। उन्होंने कहा है कि वे संबंधित फाइलों को सरकार के नामित प्राधिकारी को सौंपने के लिए तैयार हैं।

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में वक्फ समितियों का प्रशासन और पर्यवेक्षण मुस्लिम वक्फ अधिनियम, 1960 के प्रावधानों के तहत किया जाता है। शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड दोनों ही उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित कानून के तहत सांविधिक निकाय हैं।

स्थिति को देखते हुए इससे पहले शिया बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने यूपी सरकार को उनका कार्यकाल बढ़ने के लिए पत्र लिखा था। मगर, सुन्नी बोर्ड के चेयरमैन जुफर फारूकी ने किसी प्रकार से कार्यकाल बढ़़ाने की बात नहीं की थी।

यहाँ बता दें, मौजूदा जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश राज्य में लगभग 3 लाख सुन्नी वक्फ संपत्ति और 7,225 शिया वक्फ संपत्तियाँ हैं। इन संपत्तियों को इन संबंधित वक्फ बोर्डों द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

राम से शिवसेना की ‘सोशल डिस्टेसिंग’: खुदाई में अवशेष मिले तो कहा- मंदिर का निर्माण रोक देना चाहिए

महाराष्ट्र में सत्ता मिलते ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर शिवसेना के सुर बदल गए हैं। रामजन्मभूमि स्थल पर खुदाई में अवशेष मिलने पर प्रतिक्रिया देते हुए पार्टी सांसद संजय राउत ने कहा है कि फिलहाल मंदिर का निर्माण रोक देना चाहिए।

राउत ने कोरोना वायरस का हवाला देते हुए कहा कि यह राम मंदिर निर्माण और भारत-पाकिस्तान करने का नहीं है। यह वही शिवसेना है जो कभी राम मंदिर का श्रेय लेने का कोई मौका जाया नहीं करती थी। लेकिन, जब से उसने महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई है उसके स्टैंड में बदलाव दिख रहा है।

टाइम्स नाउ की खबर के मुताबिक शिवसेना सांसद संजय राउत ने गुरुवार (21 मई 2020) को कहा, “हमारा पूरा ध्यान कोरोना से जंग पर है। खुदाई के दौरान जो अवशेष मिलेंगे उन्हें देखने वाले और लोग हैं। अभी राम मंदिर, भारत-पाकिस्तान जैसे मुद्दों को अलग रख दिया जाना चाहिए। अभी देश के सामने सबसे बड़ा संकट कोरोना वायरस है और उस पर फोकस करना चाहिए।”

संजय राउत के इस बयान को लेकर बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने शिवसेना पर निशाना साधते हुए ट्वीट किया है, “देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान…”

गौरतलब है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर खुदाई चल रही है। खुदाई में प्राचीन अवशेष मिल रहे हैं। कई पुरातात्विक मूर्तियाँ, खंभे और शिवलिंग मिले हैं, जो इस स्थान पर पहले एक मंदिर होने की तरफ इशारा करते हैं। श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री चम्पत राय ने कहा कि मलबा हटाने के दौरान कई मूर्तियाँ और एक बड़ा शिवलिंग भी मिला है।

दरअसल, अयोध्या रामजन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद से ही राम मंदिर निर्माण की दिशा में पहल शुरू हो गई थी। लेकिन कोरोना वायरस के कारण जारी लॉकडाउन के चलते कुछ समय के लिए इसमें रुकावट आ गई थी।

संजय राउत के ताज़ा बयान के पीछे उस संकट को भी समझा जा सकता है, जिससे इन दिनों महाराष्ट्र बुरी तरह से जूझ रहा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में अब तक कोरोना से मरने वालों की संख्या 1390, जबकि इससे संक्रमित मरीजों की संख्या 39297 हो गई है।

आपकों बता दें कि महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों के बाद सीएम पद को लेकर शिवसेना ने लंबे समय से सहयोगी रही बीजेपी का साथ छोड़ दिया था और धुर विरोधी कॉन्ग्रेस और एनसीपी का दामन थाम पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने सीएम पद की शपथ ली थी। इसके बाद से ही शिवसेना के सुर हिंदुत्व को लेकर बदले-बदले दिखाई देते हैं।

अमेरिका ने आतंकी इब्राहिम जुबेर को भेजा भारत, NDTV के हिसाब से वो था ‘इंडियन इंजीनियर’

अमेरिका ने अल-कायदा आतंकवादी मोहम्मद इब्राहिम जुबेर को भारत को सौंप दिया है।सौंपें जाने के बाद उसे 19 मई को विशेष विमान से भारत लाया गया। इस बात की जानकारी आज (मई 21, 2020) मीडिया में आई।

फिलहाल, इब्राहिम जुबेर को पंजाब के अमृतसर स्थित एक क्वारंटाइन सेंटर में रखा गया है। वहाँ भारतीय सुरक्षा अधिकारी उससे लगातार पूछताछ कर रहे हैं।

40 वर्षीय हैदराबाद निवासी जुबेर पर अल-कायदा की फाइनेंसिंग का काम देखने का आरोप है। उसे अमेरिकी अदालत में आतंकवादी घटनाओं में दोषी पाया गया था। इसके बाद अमेरिका में उसे सजा दी गई। सजा पूरी होने के बाद अमेरिका ने उसे भारत को सौंप दिया।

जानकारी के मुताबिक जुबेर ने हैदराबाद से ही पढ़ाई की। बाद में वह साल 2001 से 2005 तक इलिनॉयस अर्बन-शैंपेन (Illinois Urbana-Champaign) में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद वह ओहायो चला गया। साल 2006 में उसने एक अमेरिकी लड़की से शादी कर वहाँ की नागरिकता भी हासिल कर ली।

बाद में वह आतंकी संगठन अल-कायदा में शामिल हुआ और संगठन के खूंखार आतंकवादी अल अवलाकी का सहायक बन गया। अवलाकी के बारे में मौजूद जानकारी के अनुसार उसका पूरा नाम अनवर नसीर अल अवलाकी था, जो यमन मूल का अमेरिकी नागरिक था।

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक अवलाकी अल-कायदा में आतंकवादियों की भर्ती की जिम्मेदारी सँभालता था। वह आतंकवादी हमलों की योजना बनाने में माहिर था। इसके कारण साल 2011 में यूएस ड्रोन से उसे मार गिराया गया था।

NDTV के हिसाब से जुबेर था Indian Engineer

मोहम्मद इब्राहिम जुबेर को साल 2018 में अमेरिका के ओहायो राज्य में अलकायदा के शीर्ष आतंकी को धन मुहैया कराने का दोषी पाया गया था। इसके बाद भारत में सेकुलर मीडिया के जाने-माने नाम एनडीटीवी समेत कई वामपंथी मीडिया पोर्टलों ने मोहम्मद जुबेर के नाम पर भारत को बदनाम करने की कोशिश की थी।

NDTV समेत कई मीडिया पोर्टल्स ने इस खबर को कवर करते हुए जुबेर की पहचान एक भारतीय इंजीनियर के रूप में बताई थी और हेडलाइन में भी उसके आतंकी होने के बावजूद Indian Engineer शब्द का प्रयोग किया था।

बस रिर्टन्स: यूपी के CM योगी पर सियासत का तोहमत लगा प्रियंका गाँधी ने बुलवाई बसें

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने बुधवार (20 मई, 2020) को वे ‘बसें’ वापस बुलवा ली जो उत्तरप्रदेश के प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक भेजने के लिए इंतजाम करने का दावा किया था। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर राजनीति करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने यह फैसला किया। वहीं, उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने कहा कि खराब बसों में प्रवासियों को भेजकर सरकार उनकी जिंदगी से ख़िलवाड़ नहीं कर सकती।

कॉन्ग्रेस ने दावा किया था कि प्रवासी मजदूरों को घर ले जाने के लिए उसकी करीब 900 बसें यूपी-राजस्थान बॉर्डर पर खड़ी हैं। हालॉंकि बसों की जो सूची यूपी सरकार को मुहैया कराई गई थी उसमें एंबुलेंस, निजी वाहन के साथ-साथ ऑटो रिक्शा भी शामिल थे।

बाद में यह भी खबर आई कि राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार के विरोध में बस ड्राइवरों ने नारे लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें खाना नहीं मिल रहा है और जो मिल रहा है वो सड़ा हुआ मिल रहा है। इस मामले को लेकर यूपी सरकार और कॉन्ग्रेस के बीच एफआईआर की जंग भी देखने को मिली।

यूपी पुलिस ने प्रियंका गाँधी के सचिव संदीप सिंह और कॉन्ग्रेस के यूपी अध्यक्ष अजय लल्लू के ख़िलाफ़ जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप में केस दर्ज किया। फिर राजस्थान पुलिस ने यूपी के ए़डिशनल चीफ (गृह) के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर दी। मंगलवार को लल्लू को आगरा पुलिस ने कोरोना के बीच में धरना देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

गौरतलब है कि इसी बीच यूपी सरकार की नीतियों की तारीफ करने के कारण विधायक अदिति सिंह पर भी गाज गिरी और कॉन्ग्रेस ने उन्हें पार्टी की महिला विंग की महासचिव पद से हटा दिया। बता दें, बीते साल पार्टी के मना करने के बावजूद जब अदिति सिंह ने विधानसभा के विशेष सत्र में भाग लिया था, तब भी कॉन्ग्रेस ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया था। उस वक्त भी रायबरेली की विधायक ने इस नोटिस का ठेंगा दिखा दिया था।

J&K: पुलवामा में पुलिस और सीआरपीएफ की टीम पर आतंकी हमला, पुलिसकर्मी वीरगति को प्राप्त

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकियों ने पुलिस और सीआरपीआफ की पेट्रोल पार्टी पर हमला किया। हमले में एक पुलिसकर्मी वीरगति को प्राप्त हो गए। एक अन्य जवान जख्मी है। आतंकियों की तलाश में सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर रखी है।

जानकारी के मुताबिक पुलवामा के प्रिचू में गुरुवार (21 मई 2020) दोपहर को पुलिस और सीआरपीएफ की संयुक्त पेट्रोल पार्टी पर आतंकियों ने अचानक से फायरिंग शुरू कर दी। पुलिसकर्मी अनुज सिंह और मोहम्मद इब्राहिम को गोली लग गई। दोनों घायल पुलिसकर्मियों को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ अनुज सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए। आतंकी हमले की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में जवान मौके पर पहुँच गए और इलाके की घेराबंदी करके सर्च अभियान चलाया गया।

आपकों बता दें कि पिछले दो दिनों में सुरक्षाबलों पर यह दूसरा आतंकी हमला है। बुधवार (20 मई, 2020) को श्रीनगर शहर के बाहरी इलाके में इसी तरह के हमले में बीएसएफ के दो जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। हमलावरों ने जवानों से हथियार भी छीन लिए थे। जम्मू-कश्मीर पुलिस के मुताबिक, ड्यूटी पर तैनात दोनों जवान दुकान पर सामान लेने गए थे, तभी उन पर हमला किया गया।

इससे पहले 4 मई 2020 को जम्मू-कश्मीर के हंदवाड़ा के काजीबाद इलाके के पास सीआरपीएफ (CRPF) के गश्ती दल पर आतंकियों ने हमला कर दिया था। सुरक्षाबलों ने हमले का जवाब देते हुए एक आतंकी को ढेर कर दिया था। इसी हमले में तीन CRPF जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।