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पालघर में जूना अखाड़े के संतों की मॉब लिंचिंग, उद्धव की पुलिस मूकदर्शक: अखाड़ा परिषद की कठोर कार्रवाई की माँग

महाराष्ट्र के पालघर के दहानु तालुका के एक आदिवासी बहुल गडचिंचले गाँव में सैकड़ों लोगों की भीड़ द्वारा जूना अखाड़ें के दो संतों और उनके ड्राइवर की पुलिस के सामने ही बड़ी बेरहमी से पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। घटना गुरुवार (अप्रैल 16, 2020) के देर रात की है। घटना की जानकारी होते ही संत समाज में गहरा आक्रोश व्याप्त है कि कैसे महाराष्ट्र पुलिस के सामने दो महात्माओं और उनके ड्राइवर की इस तरह से हत्या कर दी जाती है और पुलिस मूक दर्शक बनी रहती है।

महाराष्ट्र के पालघर जिले के दहानु तालुका (Dahanu taluka) का गडचिनचिले गाँव (Gadchinchale Coordinates: 20.0843517°N 73.0611882°E)


क्या है पूरा मामला

जूना अखाड़ा के 2 महंत कल्पवृक्ष गिरी महाराज (70 वर्ष), महंत सुशील गिरी महाराज (35 वर्ष) अपने ड्राइवर निलेश तेलगडे (30 वर्ष) के साथ मुंबई से गुजरात अपने गुरु भाई को समाधि देने के लिए जा रहे थे। दरअसल, श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा 13 मढ़ी मिर्जापुर परिवार के एक महंत राम गिरी जी गुजरात के वेरावल सोमनाथ के पास ब्रह्मलीन हो गए थे। दोनों संत महाराष्ट्र के कांदिवली ईस्ट के रहने वाले थे और मुंबई से गुजरात अपने गुरु की अंत्‍येष्टि में शामिल होने जा रहे थे।

गुरु के देहावसान के बाद अचानक से मिर्जापुर परिवार के कुछ सन्तों को वहाँ बुलाया गया था ताकि महात्मा जी की समाधि लगाई जा सके। जिनमें से उसी परंपरा के दो संत महंत कल्पवृक्ष गिरी जी महाराज और दूसरे महंत सुशील गिरी जी महाराष्ट्र से गुजरात के वेरावल के लिए रवाना हुए रास्ते में उन्हें महाराष्ट के पालघर जिले में स्थित दहानु तहसील के गडचिंचले गाँव में पालघर थाने के पुलिसकर्मियों ने पुलिस चौकी के पास रोका।

ड्राइवर के साथ दोनों संतों को भी गाड़ी से बाहर निकलने के लिए कहा गया और उन लोगों को पुलिस वालों ने, सड़क के बीच में ही बैठा दिया, कहा जा रहा है वहाँ गाँव के करीब 200 के आस पास लोग अचानक ही इकट्ठे हो गए। यह गाँव और इलाका आदिवासी बहुल है और ग्रामीणों में ज़्यादातर ईसाई और कुछ के मुस्लिम समुदाय का होने का दावा भी संत समाज के कुछ लोगों द्वारा किया गया है।

यह भी कहा जा रहा है कि जूना अखाड़े के उन दोनों सन्तों और ड्राइवर को, पुलिस वालों ने डर के कारण एक तरह से उन आदिवासियों के हवाले कर दिया और इस भीड़ ने, पुलिस वालों के सामने ही डंडे और पत्थरों से मार-मार कर दोनों सन्तों और ड्राइवर की बेरहमी से हत्या कर दी। अभी तक जो वीडियो फुटेज उपलब्ध हैं उसमें आप पुलिस वालों की मौजूदगी देख सकते हैं। मॉब लिंचिंग होता देख पुलिस खुद ही चिहुँक रही है। ऐसे में महाराष्ट्र पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार

कुछ लोकल मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि संतों की इस यात्रा के दौरान आदिवासी बहुल इस गाँव में पुलिस ने गाड़ी को रोका और साधुओं को सड़क पर बैठा कर पूछताछ करने लगी और इसी दौरान गाँव में संदिग्ध हालत में यह अफवाह उड़ा दी गई कि ये सब बच्चा चोर हैं l बस इतनी सी बात थी कि गाँव वाले इन संतों पर लाठी डंडे, भाले, फरसे लेकर टूट पड़े।

जब ‘धर्म विशेष’ बहुल आदिवासियों ने इन साधुओं को मारना शुरू किया तो महाराष्ट्र पुलिस वहाँ से भाग खड़ी हुई और साधुओं को मरता हुआ छोड़ दिया। बाद में खाना पूर्ति के लिए इन मरणासन्न साधुओं को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्हें डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित कर दिया गया। ये भी कहा जा रहा है की इस घटना को लूटपाट के उद्देश्य से भी अंजाम दिया गया। एक वीडियो फुटेज में भी भीड़ संतों की गाड़ी में चढ़ी और कुछ तलाशती नजर आ रही है।

पुलिस और ग्रामीणों की भूमिका संदिग्ध

जैसा कि आप वीडियो में भी देख सकते हैं कि जब भीड़ द्वारा उन्हें बेरहमी से पीटा जा रहा है तो न सिर्फ पुलिस वहाँ मौजूद है बल्कि एक वीडियो में तो खुद ही पुलिस संत कल्पवृक्ष गिरी महराज को पुलिस चौकी से बाहर लाते और फिर भीड़ के सामने यूँ ही असहाय हालत में छोड़ती नजर आ रही है। भीड़ को पीटते देख भी पुलिस की कोई कार्रवाई नजर नहीं आ रही है। अलबत्ता पुलिस वाला खुद ही बचता नजर आ रहा है। नहीं तो पुलिस की मौजूदगी में कम से कम संतों की इस तरह से बर्बर हत्या नहीं हुई होती।

दूसरा बच्चा चोर का आरोप भी मीडिया के एक धड़े द्वारा फैलाया नजर आ रहा है। रात के अँधेरे में लॉकडाउन के समय वहाँ सड़क पर इतनी बड़ी भीड़ अचानक इकट्ठी नहीं हो सकती थी। अगर इकट्ठी हुई भी तो पुलिस ने जिन्हें पूछताछ के लिए रोका और वो बाकायदा अपना परिचय बता रहे हैं तो पुलिस ने भीड़ को न रोककर चौकी से निकालकर संत को भीड़ के बीच क्यों ले गई?

जनसत्ता सहित मीडिया के कुछ रिपोर्टों में सवाल ये भी उठाया गया है कि लॉकडाउन के बावजूद ये तीनों लोग मुंबई से लगभग 120 किमी तक जाने में कैसे कामयाब रहे? पालघर जिले से इस गडचिंचले गाँव की दूरी 110 किलोमीटर बताया जा रहा है। साथ ही बचाव में ये भी जोड़ दिया जा रहा है कि इस पूरे इलाके में कुछ दिनों से बच्‍चा चोर गिरोह की अफवाह फैली हुई थी। अगर ऐसी कोई अफवाह थी जो बिना वहाँ गए मीडिया गिरोह के लोगों को साफ-साफ पता है। और इसी अफवाह की आड़ लेकर इस बहसी भीड़ के कृत्य को हल्का करने कि कोशिश में कहा जा रहा है कि बस लोगों ने इन्‍हें इसी बच्चा चोर गिरोह से संबंधित समझ लिया और बिना सोचे-समझे हमला करना शुरु कर दिया। बाद में मौके पर पहुँची पुलिस की टीम ने इन्‍हें बचाया लेकिन अस्‍पताल में तीनों की मौत हो गई।

पालघर, महाराष्ट्र, मॉब लिंचिंग
महाराष्ट्र के पालघर जिले में हुई जूना अखाड़े के दो संतो और उनके ड्राइवर की मॉब लिंचिंग

यहाँ फिर ध्यान दीजिए कि यह नैरेटिव गढ़ी तो बड़ी चालाकी से गई है लेकिन लॉकडाउन क्या सिर्फ उन संतों के लिए था? खून की प्यासी इस आक्रामक और वहशी भीड़ के लिए नहीं। जिस सड़क के रास्ते जा रहे हैं ये लोग वहाँ पुलिस चौकी मौजूद है और महाराष्ट्र पुलिस के रोकने पर संत बाकायद अपनी पहचान और इस तरह जाने का कारण बताते हैं। पुलिस उन्हें सड़क के बीच पहले बैठाती है फिर वीडियो में दिख रहा है कि दोनों में से एक महंत चौकी से बाहर निकल रहे हैं और वहाँ भारी संख्या में लाठी-डंडों-हथियारों से लैश भीड़ पहले से मौजूद है। देर रात को इतनी भीड़ इस तरह आक्रामक होकर वहाँ कैसे इकठ्ठा हो गई और वो भी पुलिस चौकी होते हुए?

लॉकडाउन में संतों को क्यों जाना पड़ा

नागा सम्प्रदाय में जब कोई कोई संत-महात्मा का देहावसान होता है तो उनको समाधि सिर्फ उनके परम शिष्य देते आए हैं। नागा समाज में गुरु शिष्य सम्बन्ध बहुत करुणामय और प्रगाढ़ होता है। ये सब आपस में ममता के बंधन से जुड़े होते हैं। किसी का अहित नहीं सोचने वाले ये साधू जीवन भर साधना के साथ गरीब, दलित और पिछड़े लोगों की सेवा में रत रहते हैं। ये संन्यासी अपना सर्वस्व त्याग कर जाति और वर्ण के बंधनों से मुक्त होकर निराकार की आराधना करते हैं। इसलिए ये निर्लिप्त, अघोर, निरपेक्ष होते हैं और अपने इसी परंपरा का निर्वाह करने के लिए अपने पूजनीय गुरू के देहावसान की खबर सुनकर ये साधू अपने गुरु को समाधि देने किसी तरह गुजरात जा रहे थे। इस दौरान गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा पर पालघर जिले के गडचिंचले गाँव से गुजरते हुए देर रात ये घटना घटी।

संत समाज के इन महात्माओं की गलती बस इतनी थी कि इन्होनें सोचा लॉकडाउन है तो जाना मुश्किल होगा और क्या पता पुलिस हमें जाने दे या न जाने दे हमारे गुरु की समाधि लगाने के लिए इसलिए भावनाओं और कर्तव्य पालन के वशीभूत हो बॉर्डर वाले गाँव के अंदर से जो रास्ता था, उसी रास्ते से जाने की सलाह बनाई गई मालूम पड़ती है लेकिन उनको क्या पता कि अंदर क्या होने वाला है और ये बड़ी और वीभत्स घटना सामने आई।

नागा साधु, इनका इतिहास और फेक मीडिया नैरेटिव

आज जिस जूना अखाड़े के संतों की हत्या पर मीडिया गिरोह लीपापोती पर उतारू है और उसे बच्चा चोरी जैसे नैरेटिव की आड़ में मॉबलिंचिंग को एक सामान्य घटना बनाकर पेश करते हुए उन हत्यारों का बचाव कर रही है और कइयों को अभी तक ये पता भी नहीं चला है कि किन तीन लोगों की हत्या हुई? वे कौन थे? बल्कि उसे और हलका करने के लिए यह लिखा जा रहा है कि आक्रोशित भीड़ ने बच्चा चोर समझ कर तीन लोगों को पीट दिया जिससे बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इस नैरेटिव की आड़ में आज घटना घटे दो दिन होने के बाद भी हर छोटी बात पर बवाल काटने वाली वामपंथी लिबरल गैंग मौन है।

अपने गुरु भाई की समाधि के लिए भावुक होकर निकले जूना अखाड़ा के इन संतो ने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा होगा कि कुम्भ के महीने में जब ये करोड़ों लोगों को बिना किसी भेदभाव के एक ही संगत में बैठा कर भोजन कराते हैं। उन साधुओं की हत्या उस इलाके में कर दी जाएगी जिस नासिक महाराष्ट्र के क्षेत्र में नागा साधुओं की संख्या बहुत ज़्यादा है और लोग उनसे परिचित भी हैं। इन नागा साधुओं ने अंग्रेजों और मुगलों के खिलाफ भी बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी है। दशकों तक चलने वाले संन्यासी विद्रोह का भी इन्हीं नागा संन्यासियों ने नेतृत्व किया था। यहाँ तक कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की रूप रेखा भी इन्हीं नागा साधुओं के अखाड़े में बनी थी।

आज अचानक देश का यह हिस्सा जहाँ बहुतायत में नागा संन्यासी हैं। इन साधुओं के प्रति इतना असंवेदनशील हो गया हैl कि भेषभूसा, बातचीत, पूछताछ के बाद भी कोई उनके बारें में अफवाह फैला रहा है तो महाराष्ट्र पुलिस सच जानने के बाद भी उन्हें भीड़ के हवाले कर दे रही है और भीड़ 70 वर्षीय वृद्ध और संत के रूप में देखकर भी जूना अखाड़े के कल्पवृक्ष गिरी, उनके गुरु भाई और ड्राइवर को पीटकर मार डालती है। और फेक नैरेटिव गढ़ने वाले लोग हत्यारों और सरकार का बचाव करने लगते हैं क्योंकि वहाँ शासन में कॉन्ग्रेस हिस्सेदार है और शिवसेना अपने लिबरल भूमिका में है।

जानकारी के लिए बता दूँ कि मीडिया की गढ़ी थ्योरी और पुलिस की भूमिका दोनों इसलिए संदिग्ध मानी जा रही है क्योंकि ठीक इसी तरह 2008 में कंधमाल में माओवादियों ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती सहित तीन और साधुओं की हत्या गोली मार कर दी थी। लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या इसलिए हुई थी क्योंकि स्वामी जी कंधमाल में निर्दोष आदिवासियों के धर्म परिवर्तन का विरोध कर रहे थेl आज यह हत्या उसी घटना की याद दिलाती है। और कहीं न कहीं इसकी आड़ में भी किसी साजिश या हत्यारों को बचाने की बू आ रही है।

संतों द्वारा अभी के हत्या के तरीकों और उस क्षेत्र में मुस्लिम और नक्सल गतिविधियों को देखते हुए सिर्फ चोरी की अफवाह को कारण मानने को तैयार नहीं है। कहा यह भी जा रहा है कि पिछले दिनों में गुजरात महाराष्ट्र के सीमा पर स्थित इन जिलों में माओवादी गतिविधि में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। और माओवादी नक्सली भी लूटपाट के इरादे से गलती से उधर आई किसी गाड़ी को रोककर, हत्या की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। इस घटना के ठीक तीन दिन पहले भी उस इलाके में ऐसी ही एक घटना की खबर है। लेकिन लॉकडाउन की वजहों से या हमलावरों को बचाने के उद्देश्य से वह भी मीडिया में रिपोर्ट नहीं हुई। उस घटना का जिक्र हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में बहुत ही संक्षेप में है।

इसके अलावा दो-तीन दिन पहले कई दूसरे जगहों से भी ये रिपोर्ट आई थी कि लॉकडाउन के कारण भोजन आदि जुटाने के लिए नक्सली ग्रामीणों को के साथ इक्का-दुक्का राहगीरों को परेशान और लूटपाट कर रहे हैं।

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ने की निंदा और उठाई कठोर कार्रवाई की माँग

ऑपइंडिया ने सभी 13 अखाड़ों के परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी से बात की तो उन्होंने साफ़ शब्दों में इसका घटना में शामिल संभावितों की तरफ इशारा किया और कहा, “महाराष्ट्र में कोरोना के नाम पर धर्म विशेष के लोगों द्वारा जूना अखाड़े के दो संतों की हत्या किए जाने की अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद कड़े शब्दों में निंदा करता है।”

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से दोनों संतों की हत्या की जाँ और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। साथ ही माहौल को देखते हुए महंत नरेंद्र गिरी ने संत समाज के संन्यासियों से अपील भी की कि लॉकडाउन चल रहा है ऐसे में अगर कोई संत महात्मा ब्रह्मलीन होते हैं तो उस इलाके के ग्रामीण और आसपास के साधु संत ही उनकी समाधि में शामिल हों। उन्होंने कहा है कि बाहरी जिले से साधु-संतों को समाधि में जाने की फिलहाल लॉकडाउन तक कोई आवश्यकता नहीं है।

जूना अखाड़ा द्वारा जारी किया गया पत्र

उनके इस अपील में भी इस बात पर जोर है कि महाराष्ट्र के पालघर जिले के दहानु तहसील में जूना अखाड़े के दो संत महात्माओं की पुलिस की मौजूदगी में लाठी डंडों से पीट-पीटकर धर्म विशेष के लोगों ने हत्या कर दी। इस घटना के बाद से साधु संतों में काफी नाराजगी है। साधु संतों की सर्वोच्च संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने दोषियों के खिलाफ जाँच के बाद सख्त कार्रवाई की माँग की है। महंत नरेंद्र गिरी ने आरोप लगाया है कि कोरोना के बहाने धर्म विशेष के लोग साधु-संतों से बदला ले रहे हैं।

लॉकडाउन के खत्म होने के बाद बड़ी संख्या में संत महात्मा महाराष्ट्र सरकार का घेराव करेंगे और इस मामले में कार्रवाई के लिए दबाव भी बनाएँगे। महंत नरेंद्र गिरी ने महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे से दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई की माँग की है। जो वहाँ मौजूद थे लेकिन संतों को बचाने का उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया।

संत समुदाय ने की कार्रवाई की माँग

हालाँकि जिस तरह से भीड़ द्वारा हत्या की गई इसे लेकर संत समाज आक्रोशित है। ऑपइंडिया ने अखाड़ों के कई संतो से बात की तो उन्होंने अंदेशा जताया कि यह कृत्य सामान्य ग्रामीणों का नहीं है बल्कि इसमें नक्सल और मुस्लिम पक्ष की मौजूदगी का दावा किया जा रहा है। गंगा सेना के संत श्री आनंद गिरी ने तो साफ कहा कि संत समाज के दो संतों को बेरहमी से मारकर कहीं न कहीं तबलीगी जमात का बदला लिया गया है। उनका दावा है कि उन इलाकों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की भी उपस्थिति है।

अतः इस आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता और हम महाराष्ट्र सरकार से इसकी सघन जाँच और दोषियों पर कार्रवाई की माँग करते हैं नहीं तो हम संत समाज के लोग लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद सड़कों पर आएँगे ताकि प्रशासन इस तरह की हत्याओं को खुली छूट देने से रोक लगाए। उनका का भी आक्रोश वहाँ पुलिस के मौजूद होने और कुछ न करने को लेकर था। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि जो शिवसेना हिन्दुओं की हिमायती बनती रही वही आज कॉन्ग्रेस के साथ मिलकर संतों की भीड़ द्वारा हत्या को खुली छूट दे रही है।

वहीं स्वामी अविनाश जंगम (प्रयागराज) ने कहा, “जूना अखाड़े के जिन निर्दोष साधुओं की हत्या हुई है। वो गुजरात-महारष्ट्र सीमा पर आदिवासी बहुल इलाके में हुई है। इन लोगों ने अक्षम्य अपराध किया है। ऐसा लगता है कि ग्रामीणों ने किसी बहकावे में आकर हत्या कर दी है। मेरा सरकार से अनुरोध है कि इन अपराधियों को आजीवन कारावास हो और सरकार को बिना देर किए न्याय करना चाहिए। आज सम्पूर्ण देश का संत समाज इस घटना से हतप्रभ है औऱ लॉकडाउन के बाद इसपर कोई निर्णायक कदम उठाया जाएगा।”

प्रशासन का बयान

संत समाज के आक्रोश को देखते हुए वहीं महाराष्ट्र प्रशासन की तरफ से जारी बयान में डीएम कैलास शिंदे कहते हैं कि पुलिस को जैसे ही घटना की जानकारी मिली पुलिस वहाँ पहुँची लेकिन हमलावर ग्रामीणों की संख्‍या इतनी अधिक थी कि हम पीड़ितों को बचा नहीं सके। पुलिस अधिकारियों का दावा है कि हमलावरों ने पुलिस वाहनों को भी नुकसान पहुँचाया और पुलिस मौके पर पहुँचकर उन्हें अस्पताल ले गई थी लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। लगभग 110 ग्रामीणों को पूछताछ के लिए पुलिस थानों में लाया गया है। और आगे की जाँच चल रही है। 

सोशल मीडिया पर आक्रोश

संतों की हत्या हुए आज तीसरा दिन है और जिस तरह से मीडिया गिरोह इसकी लीपापोती में लगा है। बल्कि इस पूरे घटना को ही हवा में उड़ा देने के लिए या तो पूरी तरह मौन है या फेक नैरेटिव की आड़ में दोषियों और महाराष्ट्र सरकार पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है। आपको याद होगा जब तबरेज़ अंसारी की चोरी करने के कारण मॉब लिंचिंग हुई थी तब मीडिया ने ना सिर्फ तबरेज को निर्दोष साबित किया बल्कि इस हत्या के सारे आरोप हिंदुओं पर मढ़ दिए।

साथ वामपंथी-लिबरल गिरोह पूरी दुनियाँ मे हिंदुओं और देश का नाम खराब करने में पूरी तरह सक्रिय हो गई थी तुरंत ही बिना ये जाने कि मामला क्या है? क्योंकि वहाँ जिसे पीटा गया था वह एक मुस्लिम था। यही इस गिरोह के नैरेटिव के लिए पर्याप्त है वह क्या कर रहा था, चोर था आदि, इसे मीडिया ने ख़ारिज कर दिया था लेकिन अब जब दो निर्दोष साधुओं की हत्या हुई जिसमें कहा जा रहा है कि लूट-पाट का विरोध करना भी एक कारण है तो उल्टा खबरों में यह चलाया गया कि चोरी की शक में हत्या हुई है। और ना जाने क्या क्या आरोप लगाए जा रहे हैं ताकि लोगों को न सिर्फ सच से दूर रखा जाए बल्कि आरोपितों को बचाने में सक्रीय है यहाँ यह गिरोह।

सोशल मीडिया पर संतों के शवों को बेकदरी से डम्पर में डालकर ले जाने पर भी आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर जारी तस्वीरों में देखा जा सकता है कि किस तरह से बिना कफ़न या किसी कपड़े के लावरिशों की तरह यूँ ही उनका शरीर लोड कर पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाया गया।

केजरीवाल पर हमलावर हुए कट्टरपंथी, दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलों के लिए ठहराया था तबलीगी जमात को जिम्मेदार

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को रविवार (अप्रैल 19, 2020) को मीडिया को संबोधित करते हुए यह कहना भारी पड़ गया कि निजामुद्दीन मरकज में तबलीगी जमात के मजहबी आयोजन की वजह से, खासकर उनमें शामिल विदेशी नागरिकों के कारण आज दिल्ली इन विकट परिस्थितियों से जूझ रहा है। उनके इस बयान के बाद से वे कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए।

उनके बयान के तुरंत बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने ट्विटर पर उन पर हमला बोल दिया, क्योंकि वो निजामुद्दीन में तबलीगी जमातियों के गैर जिम्मेदाराना रवैया के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने से खुश नहीं थे।

सिर्फ सच्चाई को बताने के लिए उनके ऊपर इस्लामोफ़ोबिया तक का भी आरोप लगाया गया।

दिल्ली सीएम को गाली देने में कॉन्ग्रेस समर्थकों ने भी अपना योगदान दिया।

दिल्ली में निजामुद्दीन के तबलीगी जमात से जुड़े कोरोना के मामले

17 अप्रैल 2020 तक, दिल्ली में कुल 1707 कोरोना पॉजिटिव मामलों में से 1080 मामले ‘स्पेशल ऑपरेशन्स’ से जुड़े हुए थे। बता दें कि दिल्ली सरकार ने तबलीगी जमात घटना से जुड़े मामलों को ‘स्पेशल ऑपरेशन्स’ नाम दिया है।

इसका मतलब है कि दिल्ली में कुल कोरोना वायरस पॉजिटिव मामलों में से 63.27% तबलीगी जमात से जुड़े हुए हैं। इन आँकड़ों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली ने निजामुद्दीन मरकज में आयोजित मजहबी सभा के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है।

तबलीगी जमात

तब्लीगी जमात का आयोजन मार्च के दूसरे सप्ताह में हुआ था, जिसमें भारत और देश के अन्य हिस्सों के साथ ही विदेशों से आए लोग शामिल हुए थे। यह भारत में कोरोना वायरस का मेगा-स्प्रेडर बन गया है, क्योंकि भारत में एक-तिहाई से अधिक मामले अब उस घटना से जुड़े हैं। जो लोग इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे, वो और उनके परिवार के सदस्य एवं उनके संपर्क में आए लोगोंं का परीक्षण किया जा रहा है। इसमें से अधिकतर लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए। इस कारण देश में कोरोना वायरस के मामलों में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई है।

लॉकडाउन में बेच रहा था गाँजा, विरोध करने पर नुरुल हक़ ने साथियों के साथ किया हमला

जमशेदपुर में गाँजा बेचने से मना करने पर एक व्यक्ति ने अपने साथियों के साथ उसके घर जाकर हमला कर दिया। यह घटना आजादनगर ओल्ड पुरुलिया रोड नम्बर एक की है, जहाँ तनवीर रहमत को गाँजा बेचने का विरोध करना महँगा पड़ गया।

गाँजा बेचने का विरोध करने पर नुरुल हक़ ने अपने कुछ साथियों के साथ तनवीर रहमत के घर जाकर उस पर हमला किया। वो अपने पाँच-सात साथियों के साथ जब तनवीर के घर पहुँचा तो शोर करने पर वह भाग खड़े हुए।

इस हमले में घायल तनवीर का इलाज एमजीएम अस्पताल में चल रहा है। उन्होंने बताया कि इस हमले के बाद वहाँ पुलिस भी पहुँची। हमलावरों में से एक को पुलिस पकड़कर भी ले गई हालाँकि, बाद में उसे छोड़ दिया गया।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट

तनवीर के अनुसार, देशव्यापी बन्द के बावजूद भी नुरूल हक़ अपनी दुकान से गाँजा बेच रहा है। उन्होंने इस बारे में विरोध के बाद नजदीकी थाने में शिकायत भी की थी। इसके बाद शनिवार (अप्रैल 09, 2020) रात 9 बजे तनवीर जब अपने घर से निकले, नुरुल हक़ ने अपने साथियों के साथ लाठी-डंडों से उन पर हमला कर दिया।

लॉकडाउन के बाद भी झारखंड में गाँजे का व्यापार पुलिस के लिए सरदर्द बना हुआ है। गत माह ही बहरागोड़ा थाना क्षेत्र के कालियाडिंगा चौक पर एनएच-18 पर पुलिस ने करीब पाँच लाख रुपए का 81 किलोग्राम गाँजा बरामद किया था।

पुलिस ने बताया कि वाहन चेंकिंग के दौरान एक स्कॉर्पियो को रोका गया, जिसमें से 62 पैकेट में कुल 81 किलो गाँजा बरामद किया गया। इस दौरान स्कॉर्पियो सवार तीन तस्करों को भी गिरफ्तार किया गया है।

पकड़े गए तीनों तस्कर अंतरराज्यीय गाँजा तस्कर गिरोह के सदस्य थे, जो बिहार के पटना जिला अंतर्गत फतूहा के रहने वाले हैं।

इ-कॉमर्स वेबसाइटों को लेकर भ्रम फैला रही कॉन्ग्रेस: अपनी ही सरकारों का रुख पार्टी से अलग

कॉन्ग्रेस पार्टी विरोधाभासों की जननी है। पार्टी जहाँ एक तरफ केंद्र सरकार से कुछ और माँग करती है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में उसकी सरकारें अपनी ही पार्टी की माँगों के विपरीत काम करती है। कोरोना वायरस के बीच भी पार्टी राजनीति करने से बाज नहीं आ रही है। अब इ-कॉमर्स कंपनियों द्वारा सामानों की डिलीवरी को लेकर पार्टी ने राजनीति की है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन ने कहा था कि केंद्र सरकार को इ-कॉमर्स वेबसाइटों को केवल ज़रूरी सामग्रियों के वितरण की ही अनुमति देनी चाहिए। शनिवार (अप्रैल 18, 2020) को अजय माकन ने ये कहा था।

माकन ने गृह मंत्रालय से ये स्पष्ट करने को कहा था कि क्या 20 अप्रैल के बाद से लॉकडाउन में ढील के दौरान इ-कॉमर्स वेबसाइट सिर्फ़ ज़रूरी सामग्रियों का वितरण करेंगे, या फिर अन्य चीजें भी डिलीवर हो सकेंगी। उन्होंने रिटेल ट्रेडरों का दुःख सरकार के समक्ष रखने का दावा किया था। उन्होंने दावा किया था कि छोटे व्यापारियों के लिए मोदी सरकार के दिशा-निर्देशों ने चिंता खड़ी कर दी है। उन्होंने कहा कि दुकानदारों को सिर्फ़ ज़रूरी सामग्रियाँ बेचने की इजाजत दी गई है तो फिर ऑनलाइन ट्रेडर्स अन्य आइटम्स कैसे बेच सकते हैं?

अब आते हैं केंद्र सरकार के ऑर्डर पर, जिसके बाद हम बात करेंगे कि ऑफलाइन ट्रेडर्स मोदी सरकार के बारे में क्या सोचते हैं। केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि ऑनलाइन ट्रेडर्स केवल ज़रूरी वस्तुओं की डिलीवरी ही कर सकते हैं। दुकानदारों और इ-कॉमर्स कंपनियों, दोनों के लिए यही नियम हैं। यानी, जो वस्तुएँ ज़रूरी सामग्रियों के अंतर्गत नहीं आती, वो न तो बेची जा सकेगी और न ही उसकी ऑनलाइन डिलीवरी हो सकेगी। ऐसे में छोटे व खुदरा व्यापारियों के साथ अन्याय होने का सवाल ही नहीं है।

इसलिए, ऑनलाइन ट्रेडर्स एसोसिएशन ने मोदी सरकार के निर्णय के लिए उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। एसोसिएशन ने 7 करोड़ व्यापारियों की ओर से मोदी सरकार को धन्यवाद दिया है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी लिखा है कि मंत्रालय ने छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा करने का काम किया है, जिसके लिए वो उनके आभारी हैं। एसोसिएशन ने कहा कि भारत सरकार का ये निर्णय दिखाता है कि किसी भी मल्टीनेशनल कम्पनी के आगे सरकार छोटे व्यापारियों के हितों को ज्यादा प्राथमिकता देती है। उनका ठेकेदार बन कर घूम रहे अजय माकन को इससे ज़रूर निराशा होगी।

अब आते हैं कॉन्ग्रेस शासित राज्यों पर। राजस्थान सरकार के आदेश में साफ़ लिखा है कि इ-कॉमर्स कंपनियाँ सभी वस्तुओं की डिलीवरी कर सकती है। इसमें ज़रूरी या अन्य चीजों का कोई जिक्र नहीं है। सीधा स्पष्ट लिखा है कि सभी सामग्रियों की होम डिलीवरी की अनुमति रहेगी। ऐसी कंपनियों को उनकी सेवाएँ देने की स्वतंत्रता रहेगी और उन्हें प्रोत्साहन देने की बात भी कही गई है। राजस्थान में कॉन्ग्रेस छोटे व्यापरियों की अनदेखी क्यों कर रही है?

राजस्थान सरकार और कॉन्ग्रेस पार्टी में विरोधाभास

महाराष्ट्र सरकार ने तो स्पष्ट कर दिया कि इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल वस्तुओं की डिलीवरी भी ऑनलाइन कंपनियों द्वारा की जा सकेगी। महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व वाली अपनी गठबंधन सरकार के ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस क्यों नहीं आवाज़ उठा रही है? वहाँ छोटे व्यापारी नहीं हैं क्या? मोदी सरकार ने उनके हितों की रक्षा की तो कॉन्ग्रेस ने तरह-तरह के आरोप लगाए। अपने शासन वाले राज्यों में जब छोटे व्यापारियों के हितों की अनदेखी हो रही तो पार्टी चुप क्यों है?

महाराष्ट्र में ऑनलाइन सामानों की डिलीवरी की अनुमति दी गई

सार ये कि कॉन्ग्रेस पार्टी का मानना है कि इ-कॉमर्स वेबसाइटों को केवल ज़रूरी सामग्रियों की ऑनलाइन डिलीवरी की अनुमति देनी चाहिए, बाकी वस्तुओं की नहीं। केंद्र सरकार ने भी यही किया।लेकिन, कॉन्ग्रेस का निशाना फिर भी मोदी सरकार ही है। राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार और महाराष्ट्र की शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस सरकार ने ऐसा नहीं किया, लेकिन फिर भी पार्टी उनके ख़िलाफ़ नहीं बोल रही तभी तो, कॉन्ग्रेस विरोधाभासों की जननी है।

बिस्किट लाने गए रिजवान को UP पुलिस ने मारा, हुई मौत: वामपंथी मीडिया ने फैलाई खबर, डॉक्टर ने बताई सच्चाई

अम्बेडकरनगर में बिस्किट लेने दुकान पर गए रिजवान (Rizwan) की पुलिस की पिटाई से मौत की खबर का अम्बेडकरनगर पुलिस ने खंडन किया है। पुलिस ने रिजवान का इलाज करने वाले डॉक्टर का वीडियो जारी किया है। इसमें डॉक्टर ने स्पष्ट किया है कि रिजवान की मौत पुलिस के मारने से नहीं बल्कि मोटरसाइकल से गिरने से हुई थी।

दावा: बिस्कुट लेने गए थे रिजवान जब पुलिस की पिटाई से हुई मौत

हाल ही में कुछ प्रमुख मीडिया संस्थानों ने एक खबर प्रकाशित की, जिसमें बताया गया था कि उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जिले में 19 साल के रिजवान नाम के एक युवक की मौत हुई। उनके परिवार के लोगों का आरोप था कि रिजवान अपने घर से जरूरी सामान लेने के लिए निकले थे, जिसके बाद पुलिस ने उनकी पिटाई की थी।

यहाँ तक कि रिजवान की मौत के मामले में मृतक के पिता इसराइल (Israil) ने टांडा कोतवाली में अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ तहरीर देकर कार्रवाई तक की माँग की थी।

मृतक रिजवान के पिता ने कहा कि अम्बेडकरनगर के छज्जापुर इलाके का निवासी रिजवान वहाँ के ताज टॉकीज के पास बिस्किट लेने गए था। इसी दौरान वहाँ पुलिसकर्मियों ने उनकी पिटाई कर दी, जिसके कारण उन्हें गंभीर चोट आई। उनके पिता का कहना था कि घायल अवस्था में ही युवक को हालत बिगड़ने पर तत्काल जिला अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया था। जहाँ इलाज के दौरान ही शुक्रवार रात रिजवान की मौत हो गई।

क्या है सच्चाई

अम्बेडकरनगर पुलिस रिजवान के साथ ही उनके पिता इसराइल द्वारा पुलिस पर लगाए गए आरोपों की सच्चाई उनके परिवार के डॉक्टर के माध्यम से सामने लेकर आई है। अम्बेडकरनगर पुलिस ने ट्विटर पर एक वीडियो को तीन भागों में ट्वीट किया है, जिसमें रिजवान के घर के डॉक्टर ने खुद बताया है कि रिजवान चरस-भाँग का नशा करता था और उनकी मौत पुलिस की पिटाई से नहीं हुई।

अब्दुल हक़ीम ने बताया कि उनकी क्लीनिक छज्जापुर में है। रिजवान की फूफी उनके पास गई थीं, जिसने बताया कि रिजवान की मोटर साइकल से गिरने के बाद चोट आई है। जब डॉक्टर अगली सुबह रिजवान के घर उसे देखने गए तो उनके दाहिने पैर में जाँघ के हिस्से में चोट लगी थी, जबकि बाएँ पैर में सूजन थी।

डॉक्टर ने कहा कि उन्होंने चोट की गंभीरता को देखते हुए रिजवान और उनके परिवार को एक्स-रे लेने और पूरा इलाज कराने के लिए अस्पताल जाने की सलाह दी। लेकिन पुलिस के मारने की बात उन्होंने नहीं की। डॉक्टर ने कहा:

मैंने उनसे जब पूछा कि मोटरसाइकिल पर ऐसे क्यों बैठते हो कि ऐसी चोट लगी तो घर पर किसी ने भी पुलिस के मारने की बात नहीं कही, ना ही पुलिस के मारने जैसी बात के बारे में बाहर मोहल्ले में किसी को पता है। घर पर भी बस मोटरसाइकल से गिरने की ही बात थी।

इसके आगे इस वीडियो को बना रहे व्यक्ति ने डॉक्टर से मृतक रिजवान के आचरण के बारे में पुछा तो उन्होंने कहा- “लड़के को उसके बाप ने घर से निकाला हुआ था। वो ठेला चलाता था और मोहल्ले में रहता था, घर नहीं जाता था। उसके बारे में ये खबरें भी हैं कि चरस वगैरह भी पीता है, या जो इंजेक्शन होते हैं नशे के उन्हें भी लेता है। बहुत दुबला-पतला था। एक झापड़ मारो तो मर जाएगा।”

‘रिजवान को मोटरसाइकल से गिरने से जो चोट लगी थी, उससे वो मर सकता था’

पुलिस ने बाईट देते हुए कहा है- “स्थानीय डॉक्टर का बयान लिया गया है, CCTV भी जाँच की गई, लेकिन पुलिस द्वारा पिटाई की बात कहीं भी सामने नहीं आई है। मृतक की पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट भी आ चुकी है, जिसमें उनके शरीर पर कहीं भी चोट या लाठी का निशान नहीं था। उनके फेफड़े और दिल में इन्फेक्शन था और जो मोटरसाइकल से गिरने की बात आई थी, वह एकदम सही थी।”

The Hindu, The Telegraph और कश्मीर वाला ने लगाए पुलिस पर आरोप

रिजवान नाम के इस युवक की बात पर तत्परता से ‘संज्ञान’ लेने वाले द टेलीग्राफ और द हिन्दू ने इस खबर में पुलिस पर आरोप लगाए थे। उल्लेखनीय है कि ये वही टेलीग्राफ है, जिसे कल ही एक ऐसी खबर में आरएसएस को बदनाम करने की साजिश करते हुए देखा गया, जिसमें आरोपित एक मुस्लिम युवक था।

अक्सर देखा जाता है कि इस प्रकार की घटनाओं में महज मुस्लिम समुदाय का जिक्र होने के कारण टेलीग्राफ जैसे वामपंथी समाचार पत्र पुलिस से लेकर समाज के एक वर्ग को भी कटघरे में खड़े कर देते हैं। हालाँकि, हर बार इसी तरह से और इतनी जल्दी सच्चाई सामने नहीं आ पाती है।

रिजवान के पिता इजराइल ने पुलिस पर आरोप लगाते हुए विक्टिम कार्ड खेलने की कोशिश की, जिसमें उनका साथ देने के लिए वामपंथी मीडिया हमेशा तैयार बैठा रहता है। खासतौर पर देशव्यापी बंद के दौरान मीडिया ने पुलिस के आचरण को गलत साबित करने के अथक प्रयास किए हैं।

क्लीनचिट के बावजूद कमिश्नर और MS ने सरेआम बताया चोर: हिन्दूराव हॉस्पिटल के डॉ. पीयूष की प्रताड़ना क्यों?

डॉक्टर पीयूष पुष्कर दिल्ली के हिन्दू राव हॉस्पिटल में रेजिडेंट डॉक्टर हैं। वे लगातार प्रताड़ना के शिकार हैं। उन्हें प्रताड़ित कोई और नहीं बल्कि उनका ही कॉलेज और नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन कर रहा है। सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर उनके ख़िलाफ हॉस्पिटल में साजिश रची जाती है। हालॉंकि सरकार के ख़िलाफ़ उन्होंने कुछ नहीं लिखा है।

डॉ. पीयूष पुष्कर का कहना है कि वे सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। कोरोना से निपटने में सरकार की मदद करना चाहते हैं। तमाम संघर्ष करते हुए उन्होंने पीपीई किट के लिए सीधा मैन्युफैक्चरर से संपर्क किया और अपने स्तर से जितना हो सकते ख़रीद कर डॉक्टरों की मदद की।

कथित तौर पर नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की कमिश्नर वर्षा जोशी उन्हें सार्वजानिक तौर पर ‘चोर’ और ‘धोखेबाज’ कह कर संबोधित करती हैं। एनबीई (नेशनल बोर्ड ऑफ एक्सामिनेशन्स) से क्लीनचिट मिलने के बावजूद उनके साथ ऐसा हो रहा। इसकी वजह से डॉ. पीयूष डिप्रेशन के शिकार रहे हैं। वे कई रातों से सोए तक नहीं हैं।

इस संबंध में बात करते हुए डॉ. पीयूष पुष्कर भावुक हो जाते हैं और रो पड़ते हैं। वे कोरोना से निपटने में सरकार की मदद कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन उन्हें ही दुष्प्रचार करने वाला बताता है। उन्हें बार-बार अपमानित किया जाता है। क्लीनचिट मिलने के बाद वर्षा जोशी ने फिर से उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया। हॉस्पिटल की एमएस (मेडिकल सुपरिटेंडेंट) उन्हें ‘गेट लॉस्ट’ कह कर बिना कुछ कहे-सुने भगा देती हैं।

डॉक्टर पीयूष पुष्कर हिन्दू राव हॉस्पिटल में डीएनबी ऑर्थोपेडिक सर्जरी रेजिडेंट हैं। वे ‘रेजिडेंट डॉक्टर्स ऑफ हिन्दू राव’ के अध्यक्ष भी हैं। कुछ दिनों पहले की बात है, जब एक एनजीओ ने हॉस्पिटल को कुछ पीपीई किट डोनेट किया। उन्होंने इसे रिसीव किया और डॉक्टरों के बीच वितरित किया।

लेकिन, वर्षा जोशी को यह पसंद नहीं आया। उन्होंने इसे अपने इगो का मामला बना लिया और हाथ धो के डॉक्टर पुष्कर के पीछे पड़ गईं। उन्हें सोशल मीडिया पर चोर तक कहकर सम्बोधित किया गया और हॉस्पिटल की गरिमा पहुँचाने का आरोप लगाया गया।

इसके बाद डॉक्टर पीयूष पुष्कर के टर्मिनेशन का ऑर्डर जारी कर दिया गया। लेकिन, वर्षा जोशी ने जैसा सोचा था, एकदम से वैसा नहीं हुआ। ‘दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन’ सहित देश के कई अन्य हिस्सों में डॉक्टरों ने उनके इस क़दम का विरोध किया। इस मामले को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन के समक्ष भी उठाया गया।

‘नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस’ ने उनके टर्मिनेशन ऑर्डर को रद्द कर दिया। लेकिन, ऊपर से आदेश आने के बावजूद हॉस्पिटल उन्हें ड्यूटी ज्वाइन नहीं करने दे रहा है। नीचे आप ‘डॉक्टर मोनिका फाउंडेशन’ द्वारा डोनेट किए गए पीपीई किट से संबंधित कागज़ देख सकते हैं:

डोनेशन पूरे पारदर्शी तरीके से किया गया

डॉ. पीयूष पुष्कर के टर्मिनेशन का आदेश नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की तरफ से आया। इसमें लिखा है कि ऑर्थोपेडिक डिपार्टमेंट के डीएनबी छात्र डॉक्टर पीयूष पुष्कर को हॉस्पिटल की गरिमा को ठेस पहुँचाने के आरोप में उनकी सेवा से टर्मिनेट किया जाता है। आदेश के साथ ही उनके त्वरित टर्मिनेशन की बात लिखी हुई है। नीचे आप डीएमसी द्वारा जारी किए गए टर्मिनेशन ऑर्डर को देख सकते हैं, जिस पर हिन्दू राव हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट का हस्ताक्षर हैं:

डीएमसी द्वारा जारी किया गया टर्मिनेशन का आदेश

इस आदेश को रिसीव करने वालों में डॉक्टर पीयूष का नाम इसीलिए है, क्योंकि वो DRA के अध्यक्ष भी हैं। इस पर अप्रैल 15, 2020 की तारीख अंकित है। डोनेशन वाले दस्तावेज पर भी डॉक्टर पुष्कर का नाम है। वो प्रक्रिया पूरे वैध तरीके से हुई थी।

हालाँकि, इसके बाद NBE ने इस टर्मिनेशन ऑर्डर को रद्द कर दिया। एनबीई ने लिखा कि डॉक्टर पुष्कर हिन्दू राव हॉस्पिटल में ‘स्पेशलिटी ऑफ ऑर्थोपेडिक सर्जरी’ में पोस्ट एमबीबीएस डीएनबी सीट मिली है। दिसंबर 2019 में उन्होंने फाइनल थ्योरी एग्जाम दी थी।

एनबीई ने हॉस्पिटल द्वारा दिए गए सारे दस्तावेजों की जाँच के बाद पाया कि इस मामले को टर्मिनेशन से पहले ‘ग्रीवांस रेड्रेसल कमिटी’ के पास नहीं ले जाया गया, जो कि इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी खामी की ओर इशारा करता है। यानी, ‘प्रिंसिपल नेचर ऑफ़ जस्टिस’ को नज़रंदाज़ किया गया। इसी आधार पर उनका टर्मिनेशन ग़लत पाया गया और उन्हें फिर से बहाल कर दिया गया।

उन्हें 20 अप्रैल से फिर से अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने को कहा गया। लेकिन, हॉस्पिटल ने अड़ंगा लगाना शुरू कर दिया और उन्हें ज्वाइन करने नहीं दिया जा रहा है।

यह भी कहा जा रहा है कि बिना जाँच के सीधा टर्मिनेट कर देना एक बहुत ही क्रूर निर्णय था। उन्हें रिजाइन करने को भी कहा जा सकता था। एनबीई के आदेश के बावजूद हॉस्पिटल उन्हें वापस नहीं ले रहा है, जो फिर से नियमों का उल्लंघन है। टर्मिनेट करने से पहले उनसे कोई स्पष्टीकरण भी नहीं माँगा गया था। न तो उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया गया और न ही उचित जाँच की गई।

वहीं वर्षा जोशी का आरोप है कि डॉ. पीयूष पुष्कर ने एनजीओ से हॉस्पिटल अथॉरिटी बनकर कांटेक्ट किया, जबकि मेडिकल सुपरिटेंडेंट पहले से ही संपर्क में थीं। उनके आरोप हैं कि पीपीई के स्टॉक का वितरण करना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है।

एनबीई ने बीएमसी के आदेश पर लगाईं रोक, फिर से बहाल किया

एक वकील ने इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोबडे को भी पत्र लिखा। उन्होंने सीजेआई से इस मामले में हस्तक्षेप की माँग की थी। इधर डॉक्टर पीयूष पुष्कर ने आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि उस एनजीओ ने ही उनसे संपर्क किया था। उन्होंने इस सम्बन्ध में हॉस्पिटल के पदाधिकारियों को सूचित कर दिया था।

उन्होंने कहा कि अगर कोई एनजीओ उनके नाम पर कुछ डोनेट करता है तो क्या उन्हें उसके वितरण का अधिकार नहीं है? वर्षा जोशी का कहना है कि पहले पीपीई किट हॉस्पिटल स्टोर में जाना चाहिए था। वहीं डॉक्टर पुष्कर का कहना है कि रेजिडेंट डॉक्टरों ने ऐसा करने से मना किया था, क्योंकि स्टोर में जाने के बाद उसका ठीक से वितरण हो ही नहीं पाता है।

यहाँ बात ये है कि जब रेजिडेंट डॉक्टरों की यही राय थी, एनजीओ ने पीपीई किट डोनेट किया और वितरण के समय वहाँ मौजूद था, तो फिर कमिश्नर वर्षा जोशी को क्या दिक्कत आ गई? एक डॉक्टर के करियर के साथ क्यों खेला जा रहा है?

डॉक्टर पीयूष कहते हैं कि वो हॉस्पिटल के भले की सोच रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो वो अपने रुपयों से पीपीई किट नहीं ख़रीदते। उन्होंने इतना कुछ होने के बावजूद सार्वजनिक तौर पर कभी हॉस्पिटल के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा, फिर उन्हें बदनाम क्यों किया जा रहा है?

उन्होंने पीपीई के बारे में पूरा अध्ययन किया। ‘कोरोना टास्क फोर्स’ में उन्होंने अपनी टीम के साथ ड्यूटी के इतर समय और संसाधन देकर जनसेवा की और सरकार की मदद करने का प्रयास किया।

डॉक्टर पीयूष ने बताया कि उन्हें 5 महीने से कोई सैलरी नहीं मिली है। वो घर से रुपए माँग कर काम कर रहे हैं। उनके घर पर उनकी माँ काफी परेशान है। बावजूद इसके लगातार उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि वो भले ही वापस ज्वाइन कर लें, लेकिन उन्हें फिर से प्रताड़ित किया जाएगा। उनके ख़िलाफ़ कुछ और मुद्दे खोज कर निकाले जाएँगे, ताकि उन्हें फिर से किसी बहाने बाहर निकाला जा सके। ‘ग्रिवांस एड्रेसल सेल’ में भी कमिश्नर, एमएस और उनके लोग ही बैठे हुए हैं। ऐसे में वहाँ से न्याय की उम्मीद ही नहीं है।

रमजान (24 मई) तक लॉकडाउन बढ़ाएँ, वरना बेकाबू मुस्लिम भीड़ लगाएँगे: मौलाना आजाद के पौत्र ने PM मोदी को लिखा पत्र

पूर्व कॉन्ग्रेस नेता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के पोते और मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) के कुलपति फिरोज बख्त अहमद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है। इसमें पूरे रमज़ान महीने के लिए 24 मई तक लॉकडाउन का विस्तार करने का आग्रह किया है। फिरोज बख्त अहमद ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर 3 मई को लॉकडाउन नहीं हटाने का अनुरोध किया है, क्योंकि उन्हें डर है कि रमजान महीने के दौरान कोरोना वायरस तेजी से फैल सकता है।

उन्होंने पीएम को लिखे गए अपने पत्र में लिखा, “24 मई, 2020 तक पूरे रमजान महीने के लिए लॉकडाउन का विस्तार करने के लिए सरकार को यह एक सुझाव है। आपसे अनुरोध है कि सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रमजान माह समाप्त होने के दिन यानी 24 मई तक लॉकडाउन को नहीं हटाना चाहिए। अगर इसे 3 मई को हटाया जाता है, तो ऐसे समय में कोरोना भारत में अपने चरम पर पहुँच जाएगा। बेकाबू मुस्लिम (जैसा कि तबलीगी जमात के अनुयायियों के मामले में देखा गया है) बाजारों में भीड़ लगाना शुरू कर देंगे और प्रधानमंत्री के निर्देशों की अवहेलना करते हुए इफ्तार पार्टियों और नमाज सभाओं को आयोजित करके कोरोना को फैलाएँगे।”

फिरोज बख्त अहमद द्वारा लिखा गया पत्र

उन्होंने अपने पत्र में आगे लिखा, “यह मेरा आपसे बहुत विनम्र निवेदन है। कानून-पालन करने वाले भारतीय मुस्लिम के रूप में, मैं भारत में क्वारंटाइन में रखे गए अपने समुदाय से संबंधित उन सभी लोगों की ओर से माफी माँगता हूँ, जो डॉक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिस, सफाई कर्मचारियों आदि पर हिंसा करते हुए नजर आ रहे हैं। जब भी मैं थूकने जैसी अत्यधिक निंदनीय घटना, अस्पताल के कर्मचारियों (खासकर नर्सों) के साथ अभद्र व्यवहार, टॉयलेट की बोतलों को फेंकना और कोरोना वायरस के उपचार के लिए सहयोग ना देने जैसी बातों को देखता हूँ तो मेरा सिर शर्म से झुक जाता है।

इन दिनों तबलीगी जमात के कई शर्मनाक कृत्य सामने आ रहे हैं, मगर इसके बावजूद कुछ मीडिया गिरोह इनके बचाव के लिए खड़ी है और कहती है कि इसे हिन्दू-मुस्लिम से जोड़कर न देखा जाए। मगर हाल ही में भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम आजाद के पोते ने कहा कि उन्हें उनकी गतिविधियों के कारण मुस्लिम होने पर शर्म महसूस होती है।

उन्होंने यह भी कहा कि ये जमाती और कई और कई अन्य लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए गोल्डेन मंत्र-“जनता कर्फ्यू”, “लक्ष्मण रेखा” और “जान है तो जहान है” का उल्लंघन कर रहे हैं।उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि एक सच्चे “तबलीग” को इन तीनों निर्देशों को मस्जिदों से दिन में पाँच बार अनाउंस करना चाहिए था। इससे पहले, उन्होंने मुस्लिमों से अपील की थी कि वे उन राजनेताओं के बहकावे में न आएँ, जो सीएए विरोधी प्रोपेगेंडा के नाम पर भारत को तोड़ना चाहते थे।

मोदी-शाह की हत्या और ब्राह्मणों को खत्म करना चाहता है AAP का स्वघोषित रणनीतिकार व ध्रुव राठी का ‘ग्रुप एडमिन’

आदिल अमान (Aadil Aman) नाम के स्वघोषित आम आदमी पार्टी (AAP) रणनीतिज्ञ को सोशल मीडिया पर पीएम नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की हत्या के साथ ब्राह्मणों को खत्म करने की बातें कहते हुए देखा गया है। ख़ास बात यह है कि यही आदिल अमान AAP के समर्थक ध्रुव राठी (Dhruv Rathe) के फेसबुक ग्रुप का भी एडमिन है। मोदी-शाह की हत्या की कामना करने वाला आदिल रामायण धारावाहिक की तुलना पोर्न फिल्मों से करते हुए भी देखा गया है।

ट्विटर पर आदिल अमान के ऐसे स्क्रीनशॉट शेयर किए गए हैं, जिसमें उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की हत्या की साजिश करते हुए देखा जा सकता है। आदिल अमान का कहना है कि या तो इनकी हत्या का प्रयास ही नहीं किया जाना चाहिए और यदि किया जाए तो यह हर हाल में सफल होना चाहिए।

मोदी-शाह की हत्या की कामना आदिल अमान ने कैसे की है, जरा इस कमेंट में देखें – “हत्या की सिर्फ कोशिश नहीं की जानी चाहिए। या तो पूरी तरह से मार दिया जाना चाहिए या फिर प्रयास ही नहीं किया जाना चाहिए। इसके बाद आरएसएस चड्डी वापस उसी गटर में छुप जाएँगे, जहाँ से वो आते हैं।”

एक दूसरे स्क्रीनशॉट में देखा जा सकता है कि यही आदिल अमान सोशल मीडिया पर AAP समर्थक प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात ध्रुव राठी के फेसबुक समूह का भी एडमिन है।

आदिल अमान का स्क्रीनशॉट

रामायण धारावाहिक की तुलना पोर्न फिल्म से

आदिल अमान की फेसबुक गतिविधियों से पता चलता है कि वह हिंदुत्व और हिन्दुओं से भी उतनी ही नफरत करता है, जितनी की केंद्र की दक्षिणपंथी सरकार से। आदिल अमान ने एक ऐसे ट्वीट को शेयर किया है, जिसमें केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को टीवी पर रामायण की जगह पोर्न फिल्म देखते हुए दिखाया गया है।

दरअसल, प्रकाश जावड़ेकर ने अपनी एक तस्वीर ट्वीट की थी, जिसमें वो देशव्यापी बंद के दौरान घर में बैठकर टीवी पर रामायण धारावाहिक देख रहे थे। आदिल अमान ने ऐसी फोटोशॉप की हुई तस्वीर को शेयर किया, जिसमें रामायण की जगह फोटोशॉप के द्वारा पोर्न फिल्म दिख रही है।

“ब्राह्मणों को खत्म कर दिया जाना चाहिए”

एक अन्य पोस्ट में यही आदिल अमान लिखता है- “हाँ मैं कनवर्टेड हूँ, लेकिन ब्राह्मणों ने क्या किया? उन्होंने मुगलों के पास अपनी महिलाओं को *** के लिए भेजा। वो हम नीची जाति वालों की सुरक्षा नहीं कर पाए, इसलिए हमें धर्मान्तरण करना पड़ा। लेकिन कम से कम हम इसी जमीन के हैं। ब्राहमण क्या हैं? विदेशी आक्रान्ता कीड़े, जिनका नाश कर दिया जाना चाहिए।”

आदिल अमान के फेसबुक प्रोफाइल से पता चलता है कि वह आम आदमी पार्टी (AAP) का रणनीतिकार (स्वघोषित) है, जो कि वर्तमान में भुवनेश्वर में अध्ययन कर रहा है। उसने लिखा है कि वह पेरियार, नेहरु, अम्बेडकर, लेनिन, भगत सिंह और फेमिनिज्म विचारधारा का समर्थक है।

सोशल मीडिया पर आदिल अमान को लेकर चर्चा जोरों पर है। इसके पीछे सबसे प्रमुख कारण यह है कि देश की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी (AAP) का सलाहकार और रणनीतिकार (स्वघोषित) आखिर इतनी घृणा से भरा हुआ है, तो फिर उस दल की विचारधारा समाज के लिए कितनी घातक हो सकती है। हालाँकि, अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का अभी तक भी इस पर कोई बयान नहीं आया है।

आदिल अमान का फेसबुक प्रोफाइल

60 साल के बुजुर्ग ने बैरियर हटाने का विरोध किया, सत्तार और उसके परिजनों ने पीट-पीटकर मार डाला

झारखंड में लॉकडाउन के दौरान बैरियर हटाने का विरोध करना एक बुजुर्ग के लिए जानलेवा साबित हुआ। 60 साल के अलीमुद्दीन अंसारी की उनके ही गॉंव के मोहम्मद सत्तार और उसके परिजनों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। घटना बोकारो जिले के बेरमो इलाके की है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस घटना में अंसारी के चार अन्य परिजन जख्मी भी हुए हैं। आरोपित फरार हैं। सूचना मिलने पर पुलिस गॉंव पहुॅंची। शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

मिली जानकारी के मुताबिक शनिवार दोपहर करीब 12 बजे सत्तार घर बनवाने के लिए ईंट मॅंगवा रहा था। ईंट लेकर ट्रैक्टर जब पहुॅंचा तो उसने गॉंव के प्रवेश द्वार पर लगे बॉंस के बैरियर को हटा दिया। कोरोना संक्रमण को देखते हुए बाहरी लोगों की आवाजाही रोकने के लिए यह बैरियर लगाया गया था।

अंसारी और उनके परिवार के लोगों ने बैरियर हटाने का विरोध किया। इसके बाद सत्तार का पूरा परिवार मौके पर इकट्ठा हो गया। उनलोगों ने लाठी, डंडे और रॉड से अंसारी पर हमला कर दिया। बीच-बचाव में आए उनके बेटों की भी पिटाई की।

पिटाई के दौरान अंसारी कुएँ में गिर गए और उनकी मौत हो गई। यह भी कहा जा रहा है कि आरोपितों ने ही धक्का देकर उन्हें कुएँ में गिरा दिया। घटना में उनके चार बेटों को भी गंभीर चोटें आई।

घटना की जानकारी मिलने पर जरीडीह सर्किल इंस्पेक्टर रूस्तम अंसारी व पेटरवार थाना प्रभारी विपिन कुमार जवानों संग मौके पर पहुँचे। मृतक अंसारी के पुत्र इम्तियाज से घटना की जानकारी ली। इम्तियाज ने बताया कि गॉंव के ही मोहम्मद सत्तार ट्रैक्टर से ईंट लाने के लिए जबरन बैरियर हटवा रहा था।

इम्तियाज ने बताया कि विरोध करने पर सत्तार, उसके बेटे इरफान, आमिर, हुसैन साई अन्य ने मिलकर लाठी, डंडे और रॉड से हमला कर दिया। घटना के बाद सत्तार के परिवार के लोग फरार हो गए।

मोदी अच्छा या गहलोत? बुजुर्ग महिला ने कहा – PM मोदी: कॉन्ग्रेस विधायक राजेन्द्र बिधूड़ी ने राशन देने से किया इनकार

राजस्थान में कोरोना से जंग के बीच सूबे की गहलोत सरकार एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इसकी वजह बन रहा है कॉन्ग्रेस विधायक राजेन्द्र बिधूड़ी का एक ताजा वीडियो, जो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।

बेगूं से कॉन्ग्रेस विधायक राजेन्द्र बिदुड़ी इस वीडियो में ज़रूरतमंदों के बीच राशन वितरित करते दिखाई दे रहे हैं। इस दौरान बिधूड़ी जनता से ये सवाल पूछते दिख रहे हैं कि बताइए पीएम मोदी अच्छे हैं, या राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत।

सवाल के जवाब में बुजुर्ग महिला की ओर से पीएम मोदी को अच्छा बताने के बाद विधायक बिधूड़ी ने महिला को राशन वापस रख देने की बात कह दी। वीडियो में कॉन्ग्रेस विधायक बोलते हुए दिखाई दिए, “मोदी अच्छा है तो दिए जलाओ और राशन छोड़ जाओ।”

इस वीडियो आने के फौरन बाद ही भाजपा नेताओं ने उन्हें और गहलोत सरकार की राशन वितरण कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। राजस्थान के भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया ने रिपब्लिक टीवी से बात करते हुए कॉन्ग्रेस पार्टी पर राशन वितरण करते समय भेदभाव और राजनीतिकरण में लिप्त होने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा, “इससे कॉन्ग्रेस पार्टी की मंशा को पूरा तरह से समझा जा सकता है। अगर वे इस तरह से बात करेंगे तो लोगों के अंदर विश्वास खत्म हो जाएगा और कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ लड़ाई भी कमजोर हो जाएगी।”

वहीं केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस वीडियो ट्वीट करते हुए कहा, “बेगूं विधानसभा से कॉन्ग्रेस विधायक राजेंद्र बिधूड़ी की प्रधानमंत्री जी के प्रति ईर्ष्या भाव के कारण गरीबों को मिलने वाले भोजन पर अभद्र टिप्पणी दुर्भाग्यपूर्ण है।” इसके साथ ही उन्होंने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “इस संवेदनशील समय में जब समाज की हर एक इकाई एक दूसरे की सहायता हेतु आगे आ रही है। ऐसे में कॉन्ग्रेस के नेतागण अपने राजनीतिक स्वार्थ को आगे रख, गरीबों को भोजन तक देने में भेदभाव कर रहें है। बेहद शर्मनाक।” भाजपा नेता अमित मालवीय ने भी इस वीडियो को ट्वीट किया है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों से गहलोत सरकार पर राशन वितरण में भेदभाव के आरोप लगते रहे हैं। हालाँकि कॉन्ग्रेस के नेता इन तमाम आरोपों को नकारते भी रहे हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस MLA राजेन्द्र बिधूड़ी के इस ताजा वीडियो ने कॉन्ग्रेस खेमे को बैकफुट पर लाकर जरूर खड़ा कर दिया है।

बता दें कि कुछ दिनों पहले राजस्थान की महिला सरपंच किस्मत गुर्जर ने ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा था कि जब उन्हें जानकारी मिली कि भीलवाड़ा मॉडल का श्रेय सोनिया गाँधी द्वारा राहुल गाँधी और राज्य की सरकार को दिया जा रहा है तो बेहद दुःख हुआ। बल्कि हकीकत यह है कि जिसे भीलवाड़ा मॉडल कहा जा रहा है उसके पीछे भीलवाड़ा की जनता यानी किसान, नौजवान, महिला और स्वयंसेवी संस्थाओं की कड़ी मेहनत है।

उन्होंने कहा था कि भीलवाड़ा की जनता ने इसे एक मॉडल के रूप में स्थापित करने और कोरोना से लड़ने के लिए छोटी-छोटी बातों का कड़ाई से पालन किया और आत्मसंयम का परिचय दिया। हम लोग प्राधनमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा की गई अपील से बहुत प्रभावित हैं।