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वहाँ इमरान तबलीगियों को सरहद पार कराता है तो यहाँ BBC उन्हें क्लीन चिट देता है

तबलीगी जमात की मेहरबानी से देशवासी अब तीन मई तक अपने घरों में बंद रहने के लिए मजबूर हैं लेकिन औपनिवेशिक दासता का अवशिष्ट BBC और एक ‘स्रोत-विशेष’ यही मानकर चल रहे हैं कि वो कोरोना वायरस के प्रभाव से अक्षुण हैं और रहेंगे। शायद यही वजह है कि वास्तविकता से मुँह मोड़कर प्रोपेगैंडा वायरस और कोरोना वायरस के ये दोनों प्रमुख स्रोत तत्परता से अपने दैनिक क्रियाकलाप में लगे हुए हैं।

बीबीसी की एक रिपोर्ट का शीर्षक है- “मैं ब्राह्मण आदमी हूँ, मेरा तबलीगी जमात के लोगों से क्या लेना-देना?”

इस ‘लेख’ में बीबीसी ने यह साबित करने का कुटिल प्रयास किया है कि तबलीगी जमात ही कोरोना वायरस का स्रोत नहीं है और बेहद धूर्तता से एक लाइन को इस लेख के बीच में डालकर यह भी लिखा है कि “हालाँकि, वह (जिस ‘ब्राह्मण’ का हेडलाइन में जिक्र किया गया है) निजामुद्द्दीन रेलवे स्टेशन से जरूर गुजरा था।

ऐसे लेख लिखकर बीबीसी तबलीगी जमात को क्लीन चिट देने का एक निरर्थक प्रयास तो करता ही है, साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि वह ब्राह्मणवाद और हिन्दुफोबिया से सर से पैरों तक ग्रसित है। बीबीसी जैसे घातक मीडिया गिरोहों का मूल उद्देश्य पत्रकारिता करना या फिर सत्य को उजागर करना नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ उलजुलूल आँकड़ों की बात करते हुए पाठक को गुमराह करना होता है।

बीबीसी की इस रिपोर्ट की शुरुआत होती है अदालत के आदेश से जिसमें निज़ामुद्दीन के तबलीगी जमात मरकज़ से छत्तीसगढ़ लौटे 159 लोगों की सूची के आधार पर अदालत ने 52 लोगों का पता लगाने का आदेश जारी किया है। बीबीसी का कहना है कि उसने अपने ‘सूत्रों’ के माध्यम से पता किया है कि उसमें से 108 ग़ैर-मुस्लिम हैं। यहीं पर बीबीसी के लिए अपनी रिपोर्ट में ब्राह्मण के नाम पर खेलना प्राथमिकता हो गया था।

बीबीसी की इस रिपोर्ट के एक हिस्से में लिखा है-

“इस सूची में शामिल बिलासपुर के रहने वाले श्रीकुमार पांडे (बदला हुआ नाम) ने बीबीसी से कहा, ‘मैं ब्राह्रण आदमी हूँ। मेरा भला तबलीगी जमात के लोगों से क्या लेना-देना? मैं मार्च में दिल्ली ज़रुर गया था लेकिन तबलीगी जमात के मरकज़ में तो जाने का सवाल ही नहीं पैदा होगा। हाँ, मैंने बिलासपुर के लिये जो ट्रेन ली, वो ज़रुर निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन से पकड़ी थी। दिल्ली से लौटने के बाद से ही पुलिस और स्वास्थ्य विभाग वालों ने जाँच पड़ताल करने के बाद मुझे घर में ही रहने की हिदायत दी है।”

जरा सा ध्यान देने पर ही स्पष्ट हो जाता है कि इसी एक बयान में बीबीसी पहले स्वयं अपनी इस रिपोर्ट के शीर्षक के अनुसार चलते हुए देखा जाता है और बाद में स्वयं ही अपने शीर्षक के विरोध में खड़ा नजर आता है। क्या बीबीसी इतना मासूम है कि वह कोरोना वायरस के संक्रमण के माध्यम से अभी तक अनजान है? क्योंकि यदि ऐसा न होता तो बीबीसी की इस रिपोर्ट का औचित्य ही समाप्त हो जाता है।

यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि तबलीगी जमात भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी COVID-19 वायरस के कुल संक्रमण का कम से कम साठ प्रतिशत हिस्से में अकेले भागीदारी करते हुए सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा है।

यह बात अवश्य है कि यदि हम अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लें सिर्फ तभी हमें यह आँकड़े गलत नजर आ सकते हैं और बीबीसी की तरह अपने प्रोपेगैंडा पर अडिग रह सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन आँकड़ों को इस्लामोफोबिक बताने वाले बीबीसी जैसे प्रोपेगैंडा के स्रोत ने तबलीगी जमात की भरपाई करने के लिए किसी ‘ब्राह्मण’ का बयान शीर्षक बनाने का फैसल लिया है।

बीबीसी को वास्तविक निराशा उन लोगों से हाथ लग रही है, जिनके बचाव में वह दिन-रात जुटा हुआ है। हर दिन कम से कम पाँच ख़बरें ऐसी हैं, जिनमें तबलीगी जमात या फिर ‘विशेष-स्रोत’ के लोग इस संक्रमण को बढ़ाने के प्रयास से लेकर सामाजिक अस्थिरता में हिस्सा लेते हुए देखे गए हैं। कल उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में डॉक्टर की टीम पर हुआ हमला इसी का एक छोटा सा उदाहरण है।

मीडिया के गिरोह विशेष से लेकर समाज के समुदाय विशेष की एकजुटता देखिए कि इमाम को क्वारंटाइन करने गए दल पर सिर्फ मुस्लिम पुरुषों ने ही नहीं बल्कि महिलाओं ने भी अपनी तरफ से जमकर भागीदारी करते हुए छतों से पत्थर और ईंटें बरसाईं।

कहीं पर कॉन्स्टेबल इमरान और मोहम्मद पंकज खान पुलिस की गाड़ी से तबलीगी जमातियों को सरहद पार कराते हुए पकड़े जाते हैं तो यहाँ मीडिया में बीबीसी जैसी टुकड़ियाँ उन्हें क्लीन-चिट देते हुए नजर आते हैं।

दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज से निकले हुए तबलीगी जमात के लोगों ने देश-विदेश में अपनी ‘गहरी छाप’ छोड़ी है। मुस्लिम ही लोगों पर थूक रहे हैं, जाँच करने गए स्वास्थ्यकर्मियों पर पत्थर बरसा रहे हैं, ‘अल्लाह-हो-अकबर‘ कहकर पुलिस के सामने खड़े होकर उन्हें चुनौती देते नजर आ रहे हैं। ऐसे में बीबीसी अपनी एक ऐसी रिपोर्ट लेकर सामने आता है, जिसमें उनका कोई ‘गुप्त सूत्र’ कहता है कि वह तबलीगी जमात के मरकज से नहीं लौटा लेकिन फिर भी वह कोरोना वायरस से संक्रमित हुआ।

पहला सवाल बीबीसी को स्वयं से यह पूछना चाहिए कि इस मरकज से निकले हुए लोग आखिर किन-किन जगहों पर नहीं गए होंगे? वह हर रेलवे स्टेशन, मेट्रो, सब्जी-मंडी, बाजार गए होंगे जहाँ वह कितने ही ऐसे लोगों के संपर्क में जाने-अनजाने आए होंगे जिन्हें उन्होंने यह संक्रमण दिया होगा। ऐसे में यदि बीबीसी का कोई गुप्त सूत्र नाम न बताने की शर्त पर यह कहता भी है कि उसका तबलीगी जमात से क्या लेना-देना! तो फिर बीबीसी को किसी विधि से यह भी साबित करने में सक्षम होना चाहिए कि उस ‘गुप्त सूत्र’ को यह वायरस किसी मुस्लिम ने नहीं दिया होगा

और फिर इन्हें शंका की दृष्टि से क्यों न देखा जाए जब इनके मौलवी से लेकर टिकटोक पर हिन्दुओं के खिलाफ वीडियो बना रहे मुस्लिम युवा कोरना को अल्लाह का अजाब बताता है? बीबीसी इस तरह से 15-20 साल के उन टिकटोक जिहादियों से भिन्न नहीं है, जो समाज को यह संदेश देते नजर आए कि कोरोना वायरस नमाजियों को नहीं हो सकता या फिर यह काफिरों के लिए अल्लाह की NRC है।

ब्राह्मण और और हिन्दू धर्म के प्रति घृणा से सनी हुई बीबीसी की यह रिपोर्ट कहीं भी यह साबित करती है कि उसका पहला लक्ष्य कोरोना वायरस नहीं बल्कि हिन्दू धर्म हैं, क्योंकि अगर ऐसा नहीं है तो फिर हर ऐसे मौके पर, जब सारा देश एकजुट नजर आता है, बीबीसी उस समस्या को ‘ब्राह्मणवाद, जाति-धर्म’ के आधार पर वर्गीकृत करता हुआ ही नजर आता है और ऐसे में जब समस्या की यह गेंद उन्हीं की दुलारी कौम में गिरती नजर आने लगती है, तब औपनिवेशिक दासता की प्रतीक यह बीबीसी नामक विष्ठा एक बार फिर उसकी भरपाई के लिए मूल विषय त्यागकर ‘ब्राह्मण-हिन्दुओं’ को कोसने लगती है।

बीबीसी पर नियमित रूप से छपने वाले शीर्षक और कार्टून्स निश्चित तौर पर हिंदुत्व-विरोधी या फिर केंद्र की दक्षिणपंथी सरकार-विरोधी होते हैं। यह बात अलग है कि वामपंथी मीडिया के कार्टून्स और शीर्षक वास्तविक तथ्यों के साथ अक्सर ही न्याय नहीं कर पाते हैं, यह उनकी प्राथमिकता में शायद ही होता है। पहला उद्देश्य होता है विरोध और आपत्ति दर्ज करना।

फिलहाल तो बीबीसी को यही करना चाहिए कि पहले जहाँ यह महज अपने आकाओं के खाने और सोने या विदेश प्रवास की खबर देकर ही अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखता था, उसे ऐसी ही किसी जानकारी में व्यस्त रहना चाहिए और अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर कम से कम भारत में होने वाले घटनाक्रमों पर ज्ञान बाँटना बंद कर देना चाहिए क्योंकि यदि बीबीसी भारत में अपनी गतिविधियों पर लगाम लगता है तो यह भी भारत देश की व्यवस्था में उनका एक योगदान ही माना जाएगा। दूसरी बात यह कि भारत को अपनी समस्या के समाधान या उनकी मान्यता के लिए बीबीसी जैसे विदेशी प्रपंची समूहों की भी आवश्यकता भी नहीं है।

यदि वह अपने गुप्त सूत्रों के हवाले से तैयार की गई ऐसी रिपोर्ट लोगों के सामने रखना बंद कर दे तो देशवासियों को शायद ही कोई फर्क पड़ेगा हालाँकि, बीबीसी के अपने राजस्व को लेकर जरुर अन्य आयाम तलाशने होंगे।

संविधान में राम-कृष्ण को उकेरने वाला वो नायक जिसकी धरोहर ‘सेकुलर’ जमात ने गुपचुप गायब कर दी

क्या आपने नंदलाल बोस का नाम सुना है? आज के दौर में एक तबका हिंदू देवी-देवताओं को खारिज करने के लिए संविधान का हवाला देता है। भगवान श्रीराम का नाम सुनते ही बहुसंख्यक आबादी पर कम्यूनल होने का इल्जाम लगाया जाता है। श्रीकृष्ण के उपदेशों को खारिज करने के लिए उनकी रासलीला पर सवाल खड़े किए जाते हैं। शैक्षणिक संस्थानों में गायत्री मंंत्र को प्रार्थना में शामिल करने का विरोध किया जाता है। पूछा जाता है कि इससे अन्य समुदाय के बच्चों पर क्या असर पड़ेगा?

अब सवाल है कि क्या वाकई हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख देश की बहुसंख्यक आबादी को साम्प्रदायिक करार देने की आजादी प्रदान करता है। या फिर ये भारतीय पृष्ठभूमि का एक ऐसा हिस्सा है जिसे इसके बिना जाना-समझा नहीं जा सकता। इसके बिना न केवल एक भारतीय अधूरा है, बल्कि सूचनाओं के स्तर पर शून्य भी है। जिस संविधान की दुहाई अक्सर दी जाती है, उसकी मूल प्रति में भारत की यात्रा को दर्शाने के लिए श्रीराम-सीता-लक्ष्मण सहित श्रीकृष्ण, नटराज, गंगा मैया का चित्रण मौजूद हैं।

कुछ लोगों को ये पढ़कर शायद हैरानी हो कि संविधान में हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर कैसे? अगर ये तस्वीर है भी तो उन्हें इसकी जानकारी क्यों नहीं? आज एक महान चित्रकार नंदलाल बोस की पुण्यतिथि पर हम आपको इन्हीं सवालों का जवाब देने जा रहे हैं। ये सभी बातें उस रचनाकार को याद किए बिना जानना मुश्किल है। उसने एक हस्तलिखित दस्तावेज को अपनी कला के माध्यम से न केवल सुसज्जित किया, बल्कि उसे नया जीवन भी प्रदान किया। नंदलाल बोस वही शख्स हैं जिन्होंने अपने शिष्यों के साथ मिलकर कागज़ पर लिखे संविधान की रिक्तता को पूर्ण करने के लिए सैकड़ों चित्र बनाए।

22 चित्रों को संविधान में जगह

हालाँकि बाद में इनमें से 22 चित्रों को भारतीय संविधान में जगह दी गई। समय के साथ-साथ राजनीति करने वालों ने इस किताब को भी अपने अधिकार क्षेत्र का हिस्सा समझ लिया और धीरे-धीरे इसमें से कुछ चित्रों को गायब करवा दिया। अब आजादी के बाद किसने सालों राज किया और किसने नए-नए संशोधन किए ये किसी से छिपी नहीं है। आने वाली प्रतियों से गायब होने वाले चित्र भगवान श्रीराम-सीता-लक्ष्मण के थे और ये चित्र अर्जुन को युद्धभूमि में उपदेश देते श्रीकृष्ण के थे। इन्हें भले गुपचुप नई प्रतियों से गायब कर दिया गया, लेकिन संविधान की मूल प्रति में ये आज भी उसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। कुछ समय पहले इसका जिक्र केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी किया था। उन्होंने इस बात पर ध्यान आकर्षित करवाया था कि नीति निर्देशकों तत्वों से जुड़े अध्याय के ऊपर नंदलाल बोस द्वार बनाए रेखाचित्र हैं और मौलिक अधिकारों वाले अध्याय में भगवान श्रीराम हैं।

कहा जाता है कि जब संविधान तैयार हुआ तो उसमें ऊपर नीचे बहुत जगह सफेद जगह छूटी थी। ऐसे में इसपर विचार हुआ कि आखिर किस तरह इस खाली जगह के जरिए भारत की 5000 साल पुरानी संस्कृति को प्रदर्शित किया जाए। तब खुद जवाहरलाल नेहरू ने ही इस काम के लिए नंदलाल बोस को सत्यनिकेतन जाकर आमंत्रित किया। इसके बाद सदी के महान चित्रकार ने अपने कुछ शिष्यों के साथ मिलकर एक हस्तलिखित पन्नों में प्राण भरने का काम किया और बाद में समिति से जुड़े सभी लोगों ने इन चित्रों को संविधान के रिक्त स्थान पर शामिल करने पर सहमति देते हुए उस पर हस्ताक्षर किए। संविधान की मूल कॉपी यदि देखें तो आज भी वहाँ श्री राम भगवान और श्रीकृष्ण की तस्वीर चित्रित है। आखिरी पृष्ठ पर समिति के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हैं।

जाहिर है कि उस समय इन चित्रों से किसी को आपत्ति नहीं थी। मगर सोचिए! क्या आज के समय नंदलाल बोस की इन कलाकृतियों को कोई ‘सेकुलर’ नेता संविधान का हिस्सा बनने देता? बिलकुल नहीं। ये लोग फौरन नंदलाल बोस को साम्प्रदायिक घोषित कर देते। साथ ही उनकी कला को दरकिनार कर सिर्फ़ इस बात पर ध्यान देते कि उन्होंने बहुसंख्यक आबादी को खुश करने के लिए ये काम किया है। क्योंकि इसमें श्रीराम हैं, श्रीकृष्ण हैं।

लेकिन, नंदलाल बोस की कलाकृतियों का इतिहास जानते-समझते हुए इस बात को जेहन में डालने की कोई कोशिश नहीं करता कि नंदलाल बोस और शांति निकेतन के उनके छात्रों ने धर्म विशेष नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की विकास यात्रा को दर्शाने वाले चित्र बनाए जो बिन इन देवनायकों के अधूरी है। ध्यान देने योग्य बात है कि उन्होंने इसके बाद जो भी चित्र बनाए वो भी इसी बिंदु को केंद्र में रखकर बनाए।

उन्होंने  संविधान के लिए भारत के राष्ट्रीय चिह्न अशोक स्तंभ की लाट का बनाया, हड़प्पा की खुदाई से मिले घोड़े, शेर, हाथी और सांड़ की चित्रों को लेकर सुनहरी किनारियों को सजाया। उन्होंने झाँसी की रानी को चित्रित किया तो मैसूर के सुल्तान टीपू को भी आकार में उकेरा। उन्होंने अपनी कला से संविधान को एक बोलती किताब बना दिया। जिसमें निहित अनुच्छेदों ने भारत के नागरिकों को लोकतांत्रिक बनाया। वहीं 5000 पहली की संस्कृति को भी जीवंत रखा।

बताया जाता है कि चूँकि उनपर टैगोर परिवार और अजंता के भित्ति  चित्रों का खासा प्रभाव था तो उनकी चित्रकारी में भी इसका असर दिखता था। वे महीन-महीन डिजाइनों को भी ऐसे गढ़ते थे जैसे समाज उनसे कोई संदेश ले रहा हो। उनका मानना था कि चित्रकार कभी किसी रंग को दूसरे रंग से बेहतर नहीं बताता, जो चित्रकार होता है, उसे सभी रंग पसंद होते हैं।

जो मिलता उसी के साथ रम जाते नंदलाल बोस

कला के प्रति उनके प्रेम का अंदाजा उनके बचपने के वाकयों से लगाया जा सकता है। कहते हैं बाल्यकाल से ही नंदलाल बोस को कलाकारी से इतना प्यार था कि घर से लेकर सड़क तक जो भी कोई कला सिखाने वाला मिलता, वे उसके साथ रम जाते थे। जब उनकी माँ क्षेत्रमणि देवी रंगोली या गुड़िया बनातीं, या कपड़ों पर कढ़ाई करतीं, तो वह उसे भी ध्यान से देखते थे। इसका परिणाम यह होता कि वे पढ़ाई से अधिक रुचि चित्रकला में लेते और जब कक्षा में अध्यापक पढ़ाते थे, तो वे कागजों पर चित्र ही बनाते रहते थे।

धीरे-धीरे समय बीता और 15 वर्ष की अवस्था में वे कोलकाता पढ़ने आ गए लेकिन यहाँ भी उनका कला से मोहभंग नहीं हुआ। नतीजन वह अपने पढ़ाई के पैसे भी चित्रों को खरीदने में लगा देते, जिसके कारण उन्हें कई बार अनुतीर्ण होना पड़ा। बाद में आगे चलकर उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई को अवीन्द्रनाथ टैगोर को अपना गुरु बनाया और धीरे-धीरे भारतीय कला की तरफ आगे बढ़े।

एक वाकया उन्हें लेकर मशहूर है कि वो एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने एक बार एक पागल से भी कला सीखी, ताकि उसका प्रयोग आने वाले जीवन में कर सकें। जी हाँ। एक राह चलते पागल से, जिसे देखकर आम आदमी कई फीट की दूरी बना लेता है। वैसे ही एक पागल को एक बार उन्होंने उस समय तीन पैसे दिए, जिसने केवल कोयले और पानी से सड़क पर उनका चित्र बना दिया। हालाँकि इसे देखकर वह भी हैरान हुए होंगे। लेकिन उन्होंने इस पर अचंभा जताने से ज्यादा उस पागल से उस कला को सीखा। बाद में इसका प्रयोग उन्होंने शांति निकेतन में किया। 1922 में उन्हें शांतिनिकेतन का प्रमुख बनाया गया। 

भले नंदलाल बोस को गुजरे दशकों बीत गए हैं, लेकिन उनके द्वारा बनाए गए स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित चित्र भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। इनमें गाँधी जी की दांडी यात्रा को सबसे ज्यादा प्रसिद्ध बताया जाता है। इसके अलावा उनके द्वारा भारतीय देवी-देवताओं तथा प्राचीन ऐतिहासित घटनाओं के चित्रों का आज भी कोई मुकाबला नहीं है। मौजूद जानकारी के अनुसार उन्होंने न केवल संविधान को सजाया बल्कि स्वतंत्रता के बाद जब नागरिकों को सम्मानित करने के लिए पद्म अलंकरण प्रारम्भ हुए, तो इनके प्रतीक चिन्ह भी नंदलाल जी ने ही बनाए। अपने अमूल्य काम के लिए उन्हें 1954 में पद्मविभूषण भी मिला।

खबर तबलीगी जमातियों की और फोटो हिंदू पति-पत्नी की: इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता को पड़ रही गाली

दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ से होकर वापस लौटे तबलीगी जमातियों के कारण कम से कम 40 बच्चों पर कोरोना की गाज गिरी है। मात्र 3-17 साल के ये बच्चे आँध्र प्रदेश में कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, ये सभी बच्चे अपने परिजनों के कारण संक्रमित हुए, जो जमात के कार्यक्रम में शामिल होकर घर वापस लौटे थे।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक वहाँ के स्वास्थ्य विभाग ने इस संबंध में कहा कि सभी बच्चे दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात की बैठक में भाग लेने वाले परिजनों से वायरस के संपर्क में आए। रिपोर्ट की मानें तो जमात में शामिल होकर वापस लौटने वालों को ये नहीं मालूम था कि वे संक्रमित हैं और अंजाने में उन्होंने ये संक्रमण अपने परिवार के सदस्यों को दे दिया। हालाँकि, प्रशासन का कहना है कि संक्रमित हुए बच्चों में से किसी की हालत अभी गंभीर नहीं है। इसलिए हो सकता है ये जल्दी ठीक हो जाएँ।

अब बता दें कि 15 अप्रैल तक आँध्र प्रदेश में कोरोना के 475 मामले सामने आए थे। इन 475 में 124 महिलाएँ थीं। अधिकारियों ने कहा कि कुछ मामलों में परिवार के एक संक्रमित सदस्य, जो निजामुद्दीन मरकज से होकर लौटा था, उसने परिवार में सभी महिलाओं, माताओं, बहनों, पत्नियों, बेटियों और दादी को संक्रमण दे दिया। एक जानकारी के अनुसार, जहाँ ये कहा जा रहा है कि ये वायरस बुजुर्गों के लिए सबसे खतरनाक है, वहाँ आँध्र प्रदेश में 36 ऐसे केस हैं, जिनकी उम्र 60 पार कर चुकी है।

आँध्र प्रदेश में कोरोना फैलने के पीछे तबलीगियों की भूमिका

ज्ञात हो कि अभी हाल ही में आँध्र प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ने कोरोना फैलाने के लिए जमातियों को जिम्मेदार ठहराया था।। हालाँकि बाद में उन्होंने लोगों की प्रतिक्रिया देखकर इसे वापस लेने की बात की थी। वहीं तेलंगाना के स्वास्थ्य मंत्री एटेला राजेंदर ने भी माना था कि जमाती अगर नहीं होते तो राज्य कोरोना वायरस से मुक्त हो जाता। एक खबर के अनुसार आँध्र प्रदेश व तेलंगाना दोनों जगहों के 250 हॉट्सपॉट ऐसे हैं, जिनका संबंध सीधा तबलीगी जमात से है।

एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक बुधवार को राज्य में 19 नए मामले सामने आए। मगर, 16 अप्रैल को सुबह 8 बजे तक ये संख्या 22 नए मामले के साथ बढ़ गई और राज्य में कोरोना पॉजिटिवों की संख्या 525 पहुँच गई। संक्रमितों में से 20 मरीज रिकवर कर चुके हैं। जबकि राज्य में 14 लोगों की मौत हो गई है। कुरनूल जिले में सबसे अधिक 75 मामले हैं, इसके बाद गुंटूर और नेल्लोर जिले में क्रमशः 51 और 48 मामले हैं।

आलोचनाओं से घिरा इंडियन एक्सप्रेस

इंडियन एक्सप्रेस को कोरोना पर अपनी रिपोर्टिंग के लिए पिछले 2 दिनों से सोशल मीडिया पर घेरा जा रहा है। इससे पहले उन्होंने अपनी एक रिपोर्ट में अहमदाबाद के अस्पताल को लेकर झूठे दावे किए थे और अब इस रिपोर्ट को भी सोशल मीडिया पर जमकर दुत्कारा जा रहा है। इस आलोचना के पीछे वजह इंडियन एक्प्रेस की वो हरकतें हैं, जो हर बार किसी भी एक खबर को धार्मिक रंग देने में प्रयासरत रहती है ।

इसी रिपोर्ट को देखिए। जिसमें भीतर में साफ लिखा है कि बच्चों को कोरोना उनके उन परिजनों के कारण हुआ, जो जमाती थे। मगर संस्थान ने इस खबर में एक ऐसी फीचर इमेज का इस्तेमाल किया, जिसमें एक हिंदू कपल की स्क्रीनिंग होते दिखाई गई। इसका क्या मतलब है? क्या जमातियों की या मरकज की तस्वीरें मौजूद नहीं हैं? या फिर अपने पाठकों को बरगलाना है?

बता दें कि संस्थान की इस हरकत के लिए न केवल सोशल मीडिया यूजर्स उनकी मंशा पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। बल्कि लेखिका शेफाली वैद्य ने भी इस पर प्रश्न उठाया है और साथ ही भ्रामक तस्वीर के लिए मीडिया संस्थान को लताड़ा है। उन्होंने पूछा है कि क्या खबर के अनुरूप तस्वीर इस्तेमाल करना ईशनिंदा होती?

सिर्फ सेहत के सहारे जिन्दगी कटती नहीं, क्योंकि बिरियानी में बोटियाँ तलाशते रहते हैं टुकड़ाखोर

कहा गया है कि जिन्दगी के लिए एक रोग पाल लो, क्योंकि सिर्फ सेहत से जिन्दगी नहीं कटती। इस शेर में वैसे तो इशारा इश्क की तरफ था, लेकिन पॉलिटिकल करेक्टनेस भी वैसी ही एक बीमारी है। इस बीमारी के मरीज़– नफरती चिंटू, दूसरों के लिए तरह–तरह के नाम गढ़ते हैं। जी हाँ, ये “नफरती चिंटू” भी उनका खुद का गढ़ा हुआ एक नाम है। अब शायद आप कहेंगे कि नाम में क्या रखा है? साहित्य (शेक्सपियर) पढ़ा है आपने। तो जनाब नाम की बड़ी महिमा है।

कई दशक पहले एक मजदूरों के नाम पर बनी समाजवादी पार्टी के आतंक से दुनिया दहल उठी थी। उसे आज भी “नाज़ी” के नाम से लोग याद करते हैं। इस पार्टी के प्रचार तंत्र का मुखिया था पॉल जोसफ गोएबल्स। उसने प्रचार तंत्र के जरिए लड़ाई के कई ऐसे नुस्खे निकाले थे, जिसका इस्तेमाल उसकी नाजायज औलादें आज भी करती हैं। विश्वयुद्ध के बीतने के इतने साल बाद भी संचार और सूचना तंत्र के बारे में पढ़ने वालों ने उसके कम से कम दस नुस्खे आज भी पढ़े होते हैं।

ऐसी तरीकों में से एक था “नेमकाल्लिंग”। यानी अपने विरोधियों का एक ऐसा नाम रख दो जिससे उनको पहचानकर उनकी बेइज्जती की जा सके। उदाहरण के तौर पर “भक्त” शब्द का गोएबल्स पुत्रों द्वारा इस्तेमाल किया जाना देखिए। ये टुकड़ाखोर, चार-छः फेंकी हुई बोटियों के लालच में कैसे एक सम्मानसूचक शब्द को गाली की तरह फेंककर मारते हैं? बिरियानी में पड़े मांस के टुकड़े ढूँढते ये नीच कितना नीचे तक जा सकते हैं, इसका ये केवल एक उदाहरण है। ऐसे अनगिनत नमूने आपको एक शब्द में ही याद आ गए होंगे।

सन 1930 के दौर में जब पोलैंड पर हमले के वक़्त, स्टालिन खुद हिटलर के टैंकों में तेल भरवा रहा था, उसी दौर में आयातित विचारधारा के इन पैरोकारों ने गोएबल्स के सारे नुस्खे सीख लिए थे। समय के साथ-साथ उनका इस्तेमाल करने में भी ये सिद्धहस्त होते गए। संकट के समय में इन भितरघातियों की कुचेष्टाएँ वैसे ही बढ़ती हैं, जैसे रात्रि के आते ही निशाचरों की शक्ति। अलग-अलग जगहों पर भेष बदल कर छुपे ये हमलावर संकट काल में ऐसे किस्म के हमले शुरू करते हैं। इसकी एक बानगी एक “फोबिक” शब्द में भी दिखती है।

थोड़ा ही पीछे चलें तो भारत की पोलियो से जंग बड़ी आसानी से याद आ जाती है। कई विख्यात अभिनेता “दो बूँदें जिन्दगी की” का प्रचार करते दिखते थे। घर-घर जाकर कई स्वास्थ्यकर्मियों ने हर छोटे बच्चे को पोलियो ड्रॉप पिलाने का काम किया था। ये काम उतना आसान नहीं था जितनी आसानी से ये जंग जीत लेने के बाद हम कह सकते हैं। शुरुआती दौर में इसमें कई समस्याएँ आई थीं। ऐसा नहीं था कि इसमें कोई सूई दी जाती थी और बच्चे को बुखार हो जाने जैसी कोई समस्या होती हो।

इसके पीछे “एकमात्र स्रोत” (सिंगल सोर्स) का दुराग्रह था। इन जंतुओं का ख़याल था कि इस दवाई से मर्दाना ताकत पर उल्टा सा असर हो जाता है। इससे वो ज्यादा बच्चे पैदा करने में असमर्थ हो जाएँगे। इस किस्म की अफवाहों की वजह से सिंगल सोर्स की आबादी वाले इलाकों में पोलियो ड्रॉप पिलाना करीब-करीब नामुमकिन हो गया। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने उनके मजहबी रहनुमाओं से चिट्ठियाँ लिखवाई। उसके बाद कहीं जाकर दवाएँ पिलाना मुमकिन हो पाया।

आज भी ऑपरेशन इन्द्रधनुष जैसे कार्यक्रम जो टीकाकरण के लिए चलते हैं, उसमें ऐसी चिट्ठियों का इस्तेमाल आम है। मजहबी नेताओं को इकट्ठा करके उनसे टीकाकरण के लिए आह्वान करवाना बिलकुल आम बात है। इसके वाबजूद बिरियानी में बोटियाँ तलाशते टुकड़ाखोर किसी “फोबिया” शब्द को बिलकुल वैसे ही पत्थरों की तरह चलाते हैं, जैसे अभी-अभी यूपी के किसी जिले में स्वास्थ्यकर्मियों पर चलाए गए। गोएबल्स की ये औलादें गाँधीवादी नहीं हैं। आपको ये भी पता है कि नाज़ियों से किसी गाँधीवादी तरीके से निपटा नहीं गया था।

बाकी इन वेटिकन फण्ड पर पल रहे टुकड़ाखोरों का खात्मा कैसे जल्दी से जल्दी किया जा सके, इस बारे में सोचना भी जरूरी है। सोचिएगा जरूर, क्योंकि सोचने पर फ़िलहाल जीएसटी नहीं लगता!

पिज्जा के साथ कोरोना की भी होम डिलीवरी! दिल्ली में 72 घरों के लोग क्वारंटाइन, मालवीय नगर के कुछ इलाके सील

दिल्ली में एक पिज्जा डिलीवरी करने वाले लड़के की लापरवाही के कारण 72 घरों को क्वारंटाइन करना पड़ा है। मामला साउथ दिल्ली के मालवीय नगर का है। एक पिज्जा डिलीवरी करने वाले लड़के के कोरोना पॉजिटिव निकलने से हड़कंप मच गया। डिलीवरी ब्वॉय से पूछताछ करके उसकी ऑर्डर्स डिटेल्‍स निकलवाई गई और 72 घरों में रहने वाले लोगों को लोगों को क्वारंटाइन किया गया है। साथ ही मालवीय नगर के कुछ इलाकों को भी सील कर दिया गया। उसके साथ काम करने वाले 17 लोगों को भी छतरपुर के क्वारंटाइन सेंटर में भेजा गया है।

साउथ दिल्‍ली के जिलाधिकारी बीएम मिश्रा ने समाचार एजेंसी ANI से कहा कि प्रशासन ने उन 72 घरों में रहने वाले लोगों को क्‍वारंटाइन में रहने को कहा है। हालाँकि अभी तक इनमें से किसी का टेस्‍ट नहीं किया गया है। अगर किसी में लक्षण डेवलप होते हैं तो उसका टेस्‍ट कराया जाएगा। यह भी पता करने की कोशिश हो रही है कि इन 72 घरों के अलावा भी व‍ह डिलीवरी ब्वॉय किसी और के संपर्क में आया था या नहीं।

जिलाधिकारी के अनुसार,”डिलीवरी ब्वॉय को पहले सिर्फ़ खाँसी थी, जिसके कारण उसे सामान्य फ्लू होने का संदेह था। मगर जब वो काफी टाइम ठीक होता नहीं दिखा, तो उसे आरएमएल अस्पताल में भेजा गया …जहाँ जाँच में वो कोरोना पॉजिटिव निकला। जानकारी के मुताबिक पिछले 15 दिनों में, उसने 72 स्थानों पर पिज्जा डिलीवर किया। हमने सभी लोगों को होम क्वारंटाइन में रखा है। 17 लोग ऐसे हैं जो उसके साथ काम करते थे, उन सभी छतरपुर में क्वारंटाइन सेंटर भेजा गया है।”

बताया जा रहा है कि यह डिलिवरी ब्वॉय मार्च के अंतिम सप्ताह तक ड्यूटी पर था और पिछले सप्ताह ही इसका कोरोना टेस्ट रिजल्ट पॉजिटिव आया है। अधिकारियों का कहना है कि वह कुछ टाइम पहले डायलिसिस के लिए एक अस्पताल में गया था और हो सकता है कि इसी दौरान वह संक्रमित हुआ हो।

गौरतलब है कि कोरोना के खतरे को देखते हुए ही भारत सरकार ने लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ाया दिया है। इस बीच, खाने और सब्जी आदि की होम डिलीवरी पर छूट दी गई है। हालाँकि कन्‍टेनमेंट जोन में किसी को आने-जाने की इजाजत नहीं है। लेकिन वहाँ जरूरी चीजें घर तक डिलीवर कराई जा रही हैं। इसी के मद्देनजर साउथ जोन के जिलाधिकारी ने सभी डिलीवरी करने वाले लड़कों को मास्क आदि लगाकर एहतियात बरतने की सलाह दी है।

ज्ञात हो कि दिल्ली में तबलीगी जमात का भंडाफोड़ होने के बाद कोरोना का ग्राफ बहुत तेजी से बढ़ा था। मगर बुधवार को यहाँ थोड़ा ब्रेक लगा और केवल 17 नए मामले आए। हालाँकि एक भी कोरोना मामले का होना खतरे की घंटी है। लेकिन इसे राहत के तौर पर इसलिए देखा जा रहा है कि पूरे अप्रैल में ये सबसे कम आँकड़ा है।

400 जिलों में कोरोना की नो एंट्री, इस राज्य में अब केवल 1 संक्रमित, 3 अप्रैल से कोई नया केस भी नहीं

कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में भारत सरकार द्वारा लॉकडाउन के दूसरे चरण को 3 मई तक बढ़ाए जाने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का बयान आया है। मंत्रालय ने अपने बयान में अगले 2-3 हफ्तों को कोरोना से छिड़ी जंग के लिए बेहद महत्तवपूर्ण बताया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने भी मीडिया से बात करते हुए एक संतोषजनक जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि भारत में अब भी ऐसे करीब 400 जिले हैं, जहाँ पर कोरोना संक्रमण का एक भी केस नहीं आया।

स्वास्थ्य मंत्री ने पत्रकारों से बातचीत में महाराष्ट्र और कर्नाटक के बिगड़ते हालातों पर भी चिंता व्यक्त की है। वहीं केरल और गोवा से अच्छी खबरें भी आई है। केरल के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा पेश किए गए आँकड़ों के मुताबिक पिछले 24 घंटे में कोरोना वायरस संक्रमण का मात्र 1 नया मामला सामने आया है। गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत ने खुद ट्वीट कर बताया है की राज्य में अब सिर्फ़ संक्रमण का एक रोगी बचा है।

गोवा सीएम ने अपने ट्वीट में लिखा है, “मुझे आपको यह बताते हुए खुशी हो रही है कि गोवा में कोविड-19 का 6ठा रोगी स्वस्थ हो चुका है। अब गोवा में कोरोना वायरस संक्रमण का सिर्फ 1 रोगी रह गया है और 3 अप्रैल, 2020 से राज्य में अब तक एक भी नया मामला नहीं आया है।”

गौरतलब है कि भारत में कोरोना संक्रमितों का आँकड़ा 12 हजार पार होने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना रोकने के लिए नई रणनीति बनाई है। अपनी नई रणनीति के तहत उन्होंने देश भर के सभी जिलों को 3 जोन में बाँटा है। पहला- हॉटस्पॉट, दूसरा- नॉन हॉटस्पॉट और तीसरा ग्रीन जोन- यानी वह जिले जहाँ अब तक कोई केस नहीं आए हैं।

साभार: इकोनॉमिक टाइम्स

मौजूदा जानकारी के अनुसार, देश में अभी 170 हॉटस्पॉट जिले हैं। इनमें 123 ऐसे हैं जहाँ महामारी तेजी से फैली। 47 ऐसे हैं जिन्हें क्लस्टर की सूची में रखा गया है। इसके अलावा 207 जिलों को ऑरेंज यानी नॉन हॉटस्पॉट जोन चिह्नित किया गया है।

नई रणनीति के मुताबिक रेड जोन में अब डोर टू डोर सर्वे किया जाएगा। इन जिलों में जो भी लोग किसी भी फ्लू या खाँसी-सर्दी से पीड़ित मिलेंगे, उनका कोरोना टेस्ट किया जाएगा। इधर, हॉटस्पॉट एरिया में लोगों की पहचान के लिए हर हफ्ते अभियान चलाया जाएगा। यह अभियान हर सोमवार को चलेगा। हॉटस्पॉट से सटे एरिया को बफर जोन घोषित किया गया है। जहाँ स्पेशल टीम की मदद से एक्टिव केसों की तलाश की जाएगी। लोगों का सैंपल लिया जाएगा। उनका टेस्ट किया जाएग। साथ ही यहाँ आवश्यक सेवाओं को जारी रखा जाएगा।

इसी प्रकार नॉनस्पॉट इलाकों में बुखार, सर्दी-खाँसी से पीड़ित लोगों का टेस्ट किए जाएगा। इन जिलों को कोविड-19 के लिए एक अलग से अस्पताल बनाने का निर्देश जारी किया गया है। साथ ही कोरोना से निपटने के लिए सभी जरूरी उपाय करने का भी निर्देश दिया गया है।

आखिर में ग्रीन जोन यानी जहाँ कोई केस नहीं है। वहाँ प्रशासन की ओर से नजर रखी जाएगी और ध्यान दिया जाएगा कि ये इलाके ग्रीन जोन की सूची में बने रहें। बता दें स्वास्थ्य विभाग ने राज्य सरकारों से कहा कि जिस भी इलाके में 28 दिनों से कोई केस नहीं आया है, उन इलाकों के हॉस्पॉट को ग्रीन और ऑरेंज जोन में तब्दील किया जाए।

इंटरनेट से भी फास्ट आरोग्य सेतु: जहाँ पहुँचने में टेलीफोन को 75 साल लगे, वहॉं 13 दिन में पहुँचा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस आरोग्य सेतु ऐप को डाउनलोड करने की सलाह दी थी, उसे मात्र 13 दिन में 50 मिलियन लोगों ने डॉउनलोड कर एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। कुछ तकनीक से निर्मित चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें समाज के हर तबके के बीच पहुँचने में लंबा समय लग जाता है। कई बार लोग उन चीजों का उपयोग करते भी हैं और कई बार नहीं भी। लेकिन आज जब दुनिया विकल्पों के बीच घिरी हुई है, उस समय किसी एक चीज को समाज द्वारा इतने तेजी से स्वीकारना उसकी उपयोगिता का बखान स्वंय करता है। कोरोना के मद्देनजर कुछ ऐसा ही कमाल आरोग्य सेतु ऐप ने कर दिखाया है।

नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने इस संबंध में जानकारी दी है। उन्होंने कोरोना से लड़ने के लिए तैयार की गई इस ऐप की सफलता को बताते हुए लिखा, “टेलीफोन को 75 साल लगे 50 मिलियन यूजर्स तक पहुँचने में। रेडियो को 38 साल, टेलीविजन को 13 साल , इंटरनेट को 4 साल , फेसबुक को 19 महीने, पॉकेमॉन गो को 19 दिन लगे। लेकिन कोरोना से लड़ने के लिए तैयार की गई ऐप को सिर्फ़ 13 दिनों में 50 मिलियन यूजर मिल गए हैं। यह वैश्विक स्तर पर किसी ऐप के लिए सबसे तेज है। भारत की प्रतिबद्धता को सलाम! “

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार द्वारा लॉंच किए गए इस ऐप को डाउनलोड करने की सलाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संबोधन में दी थी। यह ऐप न केवल आपको कोरोना के बारे में सभी जानकारी उपलब्ध कराता है, बल्कि कोरोना वायरस संक्रमण के खतरे और जोखिम का आकलन करने में भी मदद करता है। इसका इस्तेमाल एंड्रॉयड और आईफोन दोनों तरह के स्‍मार्टफोन में किया जा सकता है। इस ऐप के जरिए आसपास मौजूद कोरोना पॉजिटिव लोगों के बारे में पता लगाने में मदद मिलती है।।

बता दें, इस ऐप की खासियत है कि इसे 11 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया गया है। यानी देशव्यापी समस्या से लड़ने के लिए सरकार ने इस ऐप से भाषा की समस्या को दूर कर दिया है। इस ऐप के लिए ब्लूटूथ और जीपीएस डेटा की जरूरत पड़ती है। बिना नंबर रजिस्टर किए ये काम नहीं करता। इसके अलावा ये आपको स्वयंसेवक  बनने का मौका देता है। यदि आप इस महामारी में वॉलिंटियर की तरह काम करने की इच्छा रखते हैं तो आपके पास खुद को इसमें नामांकित करने का विकल्प है। इस ऐप में रंगों के माध्यम से आपको सुझाव दिया जाता है और बताया जाता है कि आप सुरक्षित या नहीं। इसमें सेल्फ असेसमेंट टेस्ट होता है। साथ ही चैट विंडो के जरिए सेहत और लक्षण से जुड़े सवालों से उन्हें आँका जाता है।

बंगाल: 20 दिनों से नहीं मिल रहा खाना, 400 से ज्यादा परिवारों ने किया हाइवे ब्लॉक

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 3 मई तक बढ़ाए गए लॉकडाउन के कारण सबसे ज्यादा परेशानी देश के गरीब वर्ग को झेलनी पड़ रही हैं। ऐसे में राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वो अपने राज्य में इस तबके का विशेष ख्याल रखें। ज्यादातर राज्य ऐसा कर भी रहे हैं। मगर, ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल से खबर है कि वहाँ मुर्शिदाबाद के डोमकल इलाके में सैकड़ों लोगों को पिछले 20 दिन से खाना नहीं मिला है। मजबूरन बुधवार (अप्रैल 15, 2020) को करीब 3 घंटे के लिए उन्होंने राज्य का हाइवे जाम किए रखा। इस दौरान इस प्रोटेस्ट में 400 से ज्यादा परिवारों ने भाग लिया। बाद में जब स्थानीय प्रशासन ने हस्तक्षेप किया, तब जाकर यह मामला शांत हुआ।

जानकारी के मुताबिक स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप करने पर पदर्शन खत्म किया। डोमकल नगर पालिका के अध्यक्ष ने मौके पर पहुँचकर इस बात को स्वीकार किया कि राशन डीलरों ने गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) खंड में खाद्य आपूर्ति का कोटा नहीं बढ़ाया था। प्रत्येक राशन कार्ड धारक को एक महीने में 5 किलो चावल और 5 किलो आटा मिलना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले मीडिया से बात करते हुए राज्य के खाद्य और आपूर्ति मंत्री ज्योतिप्रियो मलिक ने भी जनता को आश्वस्त किया था कि बंगाल में चावल की कोई कमी नहीं है। उन्होंने कहा था,”हमारे पास स्टॉक में 9.45 लाख मीट्रिक टन और अन्य 4 लाख मीट्रिक टन चावल मिलों में स्टोर हैं। हमारे पास अगस्त महीने तक लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त चावल है। हमारी सरकार भारतीय खाद्य निगम से चावल नहीं खरीदती है। हम सीधे किसानों से खरीदते हैं।” मंत्री ने ये भी कहा था कि प्रशासन ने कुछ राशन डीलरों पर दुकानें नहीं खोलने या लोगों को पूरा कोटा नहीं देने के कारण कार्रवाई भी की है। 

बता दें, बावजूद इसके डोमकल नगर पालिका के वार्ड नंबर 10 के निवासी महादेव दास ने शिकायत की। उन्होंने, “हमारे क्षेत्र के राशन डीलर दुलाल साहा ने पिछले दो सप्ताह में मुट्ठी भर परिवारों को एक किलो चावल दिया। यह 4-5 सदस्यों के परिवार को खिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।” उन्होंने कहा कि क्षेत्र के अधिकांश लोग पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं। लॉकडाउन के कारण हमारी आजीविका छीन ली गई है। हमें बताया गया था कि केंद्र और राज्य सरकारें गरीबों को मुफ्त भोजन दे रही हैं। 

वहीं सुबोध दास कहते हैं, “सरकार हमें काम करने की अनुमति नहीं दे रही है। क्या अब हम भूख से मरने वाले हैं? हम जानते हैं कि हमने आंदोलन के लिए इतने सारे लोगों को इकट्ठा करके अपने जीवन को जोखिम में डाला, लेकिन कोई विकल्प नहीं था।”

खबरों के अनुसार, प्रदर्शनस्थल पर टीएमसी नेता जफिकुल इस्लाम के पहुँचने के बाद रास्ता खाली हुआ। मीडिया से बात करते हुए इस्लाम ने बताया कि डोमकल में 1.57 लाख से अधिक लोग रहते हैं और उनमें से 69 प्रतिशत लोग बीपीएल श्रेणी के हैं। हमें गरीब लोगों में वितरण के लिए सरकार से केवल 42 क्विंटल चावल प्राप्त हुआ। इस्लाम ने भी कहा कि उन्हें मालूम पड़ा है कि स्थानीय राशन डीलर लोगों को उनके कोटे का चावल नहीं दे रहे। इसलिए इनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होगी।

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संतोषजनक जवाब न मिलने पर डॉक्टरों ने एक बार फिर से पीपीई किट के लिए दबाव डाला। इसके जवाब में उन्होंने डॉक्टरों को ड्यूटी पर आने के लिए मना कर दिया।

गुजरात में हिंदू और मुस्लिमों के अलग-अलग कोरोना वार्ड: इंडियन एक्सप्रेस का झूठ बेनकाब

कोरोना वायरस संक्रमण के बीच मीडिया गिरोह आधी-अधूरी जानकारी पर अफवाहें फैलाने का काम कर रहा है। पिछले दिनों इस संबंध में ‘द वायर’ के एजेंडे की पोल खुली थी और अब बारी इंडियन एक्सप्रेस की है। दरअसल, बुधवार (अप्रैल 15, 2020) को इंडियन एक्प्रेस में एक खबर प्रकाशित हुई जिसमें दावा किया गया कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल में धर्म व मजहब को देखते हुए मरीजों के लिए अलग-अलग वार्ड बनाए गए हैं। रिपोर्ट में वजन डालने के लिए ये भी कहा गया कि अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट गुणवंत एच राठौड़ ने खुद दावा किया है कि सरकार के फैसले के अनुसार हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग वार्ड तैयार किए गए हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक डॉक्टर राठौड़ ने कहा, “आमतौर पर महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग वार्ड होते हैं। लेकिन यहाँ हमने हिंदू और मुस्लिम मरीजों के लिए अलग-अलग वार्ड बनवाए हैं।” इतना ही नहीं रिपोर्ट ये भी कहती है कि जब डॉक्टर से इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये सरकार का निर्णय है। आप उनसे पूछ सकते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की ये रिपोर्ट वाकई चौंकाने वाली है कि धर्मनिरपेक्ष देश में ऐसा भेदभाव क्यों? अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग USCIRF ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी तरह का दावा किया। लेकिन इन सभी रिपोर्टों पर उस समय सवालिया निशान लग गया, जब गुजरात सरकार ने ऐसे किसी भी वर्गीकरण को ख़ारिज कर दिया। गुजरात के स्वास्थ्य विभाग ने भी इस बिंदु को पूरी तरह से खारिज करते हुए अपनी ओर से बयान जारी किया।

स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल में किसी भी मरीज के लिए धार्मिक आधार पर विभाजन नहीं किया गया है। कोरोना मरीजों को उनके लक्षण, उनकी गंभीरता के आधार पर और डॉक्टरों की सिफारिशों आदि पर इलाज किया जा रहा है।

इसके बाद, डॉक्टर राठौर का खुद भी इस संबंध में बयान आया। उन्होंने कहा ”मेरा बयान कुछ खबरों में गलत तरीके से पेश किया जा रहा है कि हमने हिंदू और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग वार्ड बनवाएँ। मेरे नाम पर गढ़ी गई ये रिपोर्ट झूठी और निराधार है। मैं इसकी निंदा करता हूँ।” उन्होंने ये भी बताया कि वार्डों को महिला-पुरुष और बच्चों के लिए अलग-अलग किया गया है, वो भी उनकी मेडिकल स्थिति देखकर न कि धार्मिक आधार पर।

वहीं विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में अमेरिकी आयोग के दावे को ख़ारिज किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी अमेरिकी आयोग भारत में कोविड-19 से निपटने के लिए पालन किए जाने वाले पेशेवर मेडिकल प्रोटोकॉल पर गुमराह करने वाली रिपोर्ट फैला रहा है।

विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी आयोग की टिप्पणी पर कहा, “अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में धार्मिक आधार पर कोविड-19 के मरीजों को अलग-अलग नहीं किया गया। इसलिए, यूएससीआईआरएफ को कोरोना वायरस महामारी से निपटने के भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य को धार्मिक रंग देना बंद करना चाहिए।

गौरतलब है कि ये पहला मौक़ा नहीं है जब इंडियन एक्सप्रेस ने किसी खबर को धार्मिक रंग देने का प्रयास किया हो। 2019 में भी ऐसा मामला आया था। उस समय इंडियन एक्प्रेस में एक घटना को साम्प्रदायिक रूप देकर तूल दिया था और रिपोर्ट की थी कि 5 लोगों ने धर्म जानने के लिए 1 मुस्लिम को बुरी तरह मारा। जबकि पीड़ित ने खुद इस तरह का कोई बयान नहीं दिया था। मगर, इंडियन एक्प्रेस ने इस घटना को बिना आधार मजहबी रंग दिया। 

इसी प्रकार साल 2015 में इंडियन एक्प्रेस ने दावा किया अहमदाबाद में नगर निगम द्वारा संचालित जो स्कूल मुस्लिम बहुल इलाके में हैं उनकी यूनिफॉर्म हरे रंग की है। वहीं हिंदू बहुल इलाके में केसरिया। बाद में पता चला कि यह मीडिया संस्थान की कल्पना से इतर कुछ नहीं था। असल में यूनिफॉर्म के कलर को लेकर फैसला स्कूल की प्रबंधन समिति ने अपनी पसंद के हिसाब से किया था।  

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मैग्जीन ने दावा किया था कि ICMR टास्क फोर्स को मोदी सरकार ने किनारे कर दिया है। टास्क फोर्स के अध्यक्ष विनोद पॉल ने ऑपइंडिया को बताया कि मीडिया की ऐसी हरकतों से, महामारी के इस दौर में, एक राष्ट्रीय स्तर की लड़ाई में हानि ही होती है।

‘गायों का चरवाहा’ बना बम क्रांति का जनक, जिसके धमाकों से हिल गए थे अंग्रेज

अप्रैल का महीना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ख़ासा महत्व रखता है। इस महीने के अंत में (30 अप्रैल को) मुजफ्फरपुर के किंग्सफोर्ड बम कांड को अंजाम दिया गया था। इसके चलते भारत की ब्रिटिश गुलामी के इतिहास का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुकदमा अलीपुर बम केस हुआ और बंगाल के क्रांतिकारियों की निर्भीक आत्मोत्सर्ग की क्रांतिकारी विचारधारा पूरे देश में आग की तरह फ़ैल गई। अंग्रेजों ने इसके जवाब में जो दमनचक्र चलाया, उससे देश में अंग्रेजी राज का चेहरा अधिकाधिक लोगों की नजरों में बेनकाब होने लगा।

यही महीना भारत के महानतम क्रांतिकारी नेता ऑरोबिंदो घोष (महर्षि अरबिंदो) के अनुज बारीन्द्र ‘बारिन’ घोष की पुण्यतिथि (18 अप्रैल) का भी है। भारतीय क्रांतिकारियों में ‘बम क्रांति के जनक’ कहे जाने वाले उनके साथी उल्लासकार दत्ता के जन्मदिन का भी महीना यही है।

दुर्भाग्यपूर्वक हम महर्षि अरबिंदो का नाम अपने स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में महज़ एक पंक्ति में पढ़ते हैं। बारिन घोष, उल्लासकार दत्ता, इंदुभूषण रॉय, हेमेन्द्र घोष, बाघा जतीन आदि के बारे में हमारी जानकारी निल-बटा-सन्नाटा ही होती है।

फाइन आर्ट्स से बम की केमिस्ट्री

इतिहास के धूल-भरे पन्नों को खॅंगालने की अगर हम ज़हमत उठाएँ, तो हम पाएँगे कि भारतीय सशस्त्र क्रांतिकारी आन्दोलन में उल्लासकार दत्ता की भूमिका की तुलना भारतीय पौराणिक देवता विश्वकर्मा से की जा सकती है। जैसे, भगवान विश्वकर्मा देवताओं के अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण करने वाले माने जाते हैं, वैसे ही उल्लासकार दत्ता क्रांतिकारियों के बम विशेषज्ञ थे। मुजफ्फरपुर में मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड के काफिले पर हमले में जिस बम का इस्तेमाल खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किया था, उसे बनाने वाले उल्लासकार दत्ता ही थे।

लंदन यूनिवर्सिटी से कृषि विशेषज्ञता हासिल करने वाले ब्रह्मसमाजी पिता द्विजदास दत्ता की सन्तान उल्लासकार का जन्म 16 अप्रैल, 1885 को वर्तमान बांग्लादेश के ब्राह्मणबरिया जिले में एक वैद्य परिवार में हुआ था। उनका परिवार वहाँ कालिकच्चा नामक स्थान से आकर बसा था।

उल्लासकार का पहला रुझान क्रांति या बम बनाने के विज्ञान और तकनीक की ओर नहीं था, बल्कि उन्होंने कलकत्ता के प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कॉलेज में फाइन आर्ट्स में दाखिला लिया था। लेकिन जैसा कि इतिहास में होता आया है कि दुराचारी शासक का अत्याचार ही उसके दुश्मन खड़े करता है, कलाकार उल्लासकार को बम विशेषज्ञ अंग्रेजी राज की क्रूरता और नस्लभेद ने ही बनाया।

उनके क्रांतिकारी साथी हेमंत सरकार ने अपनी किताब Revolutionaries of Bengal में उल्लासकार के हवाले से लिखा है कि अंग्रेजी शासन के अत्याचार से उनका पहला सामना तब हुआ जब राष्ट्रवादी नेता बिपिन चन्द्र पाल का भाषण सुनने जाने के ‘गुनाह’ के लिए पुलिस के सिपाहियों ने उनके साथ मारपीट और बदसलूकी की। उसके बाद जब सिपाहियों ने उन्हें इंस्पेक्टर के सामने पेश किया तो उलटे तोहमत लाद दी कि उल्लासकार ने उनके साथ हाथापाई की। बकौल उल्लासकार दत्ता, “इस घटना के बाद से पुलिस और उसके पीछे खड़ी सरकार के तौर-तरीकों को लेकर मेरे मन में स्पष्ट छवि और विचार उभरने लगे।” इस घटना के कुछ ही समय बाद प्रेसिडेंसी कॉलेज के ही एक अंग्रेज शिक्षक प्रोफ़ेसर रसेल ने जब कलकत्ता के बंगाली छात्र वर्ग पर नस्ली और अपमानजनक टिप्पणी की तो उल्लासकार ने मिस्टर रसेल को तमाचा जड़ दिया। इसके बाद उन्हें कॉलेज से निलंबित कर दिया गया।

उन दिनों स्वदेशी आंदोलन अपने चरम पर था, इसलिए उल्लासकार ने बम्बई के एक टेक्सटाइल संस्थान में प्रवेश ले लिया, ताकि वे स्वदेशी कपड़ा बनाने की तकनीक सीख सकें और देश को गुलाम बनाने वाले विदेशी शासकों की जेबें भरने से रोकने में योगदान कर सकें। यहीं उन्होंने रसायन-विज्ञान (केमिस्ट्री) के वह मूलभूत पाठ पढ़े, जो आगे जाकर उन्हें खुद से बम की केमिस्ट्री समझने में सहायक साबित हुए। यह ध्यान देने वाली बात है कि यह कालखण्ड मोहनदास ‘महात्मा’ गाँधी के भारत-आगमन से भी पहले का है, जबकि इतिहासकार और मीडिया गिरोह स्वदेशी आंदोलन का श्रेय प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से गाँधी को देते हैं।

उन्हीं दिनों विदेश से आईसीएस अधिकारी बनने के मौके को लात मारकर देश लौटे ऑरोबिंदो घोष बंगाल में अनुशीलन समिति नामक एक संगठन चला रहे थे। समिति एक ओर जाहिरी तौर पर नवयुवकों में हिन्दू धर्म, गीता, चरित्र-निर्माण, स्वामी विवेकानंद और श्री रामकृष्ण परमहंस के विचारों का प्रचार-प्रसार आदि कर रही थी। लोगों को देशप्रेम, पहलवानी, आत्मरक्षा आदि सिखा रही थी। वहीं जुगांतर नामक एक पत्रिका का प्रकाशन कर इशारों-इशारों में सशस्त्र क्रांति की वैचारिक जमीन भी तैयार कर रही थी। महर्षि अरबिंदो द्वारा पत्रिका में लिखे ऐसे ही एक सम्पादकीय लेख से प्रभावित दत्ता ने उनसे सम्पर्क किया। महर्षि अरबिंदो के जीवन और उनके सहयोगियों पर शोध करने वालों का दावा है कि अक्टूबर 1907 आते-आते दत्ता एक समूची ट्रेन को जला देने लायक बम बनाना सीख चुके थे।

बाल-बाल बचा फ्रेज़र

यह समय बंग-भंग के ठीक बाद का है, जब साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल का विभाजन कर एक अलग मुस्लिम-बहुल प्रांत बनाने की अंग्रेजी नीति के विरोध में बंगाल धधक रहा था। जनता के विरोध को दबाने के लिए बंगाल के गवर्नर लॉर्ड कर्जन ने मानों पूरे बंगाल की आबादी को ही अंग्रेजी बूट के नीचे कुचल कर मार डालने की नीति अपना रखी थी। अपने आपको ‘जेंटिलमैन’ कहने वाले ब्रिटिश शासन की नृशंसता क्रूरतम मुगल जनरल को मात देती थी।

अनुशीलन समिति के क्रांतिकारी इस दमन-चक्र की कीमत अंग्रेजी शासन से वसूलने को अडिग थे। इसके लिए उन्होंने पहला निशाना चुना प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एंड्रू फ्रेज़र को, जो लॉर्ड कर्ज़न का दाहिना हाथ माना जाता था और उसके गुनाहों में उतना ही सहभागी था (आगे जाकर उसके कुकर्मों के ही इनाम के रूप में अंग्रेजी शासन ने उसे पश्चिमी बंगाल प्रांत का गवर्नर बना दिया था)। उल्लासकार दत्ता को उसकी ट्रेन उड़ाने का जिम्मा सौंपा गया। यह उनके क्रांतिकारी जीवन का सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी बम होना था।

उल्लासकार को बम बनाना था। उसे पहुँचाने का जिम्मा खुद बारिन घोष का था। पटरी के नीचे सही जगह गड्ढा खोद कर उसे लगाने का जिम्मा प्रफुल्ल चाकी (जिन्होंने आगे जाकर किंग्सफोर्ड धमाके में भी हिस्सा लिया) और बिभूतिभूषण सरकार का था। कई-एक बार ऐसा हुआ कि क्रांतिकारी बम लगा आए, लेकिन जिस ट्रेन से फ्रेज़र के आने की सूचना थी, वह आई ही नहीं, और प्लान असफ़ल हो गया।

अंत में किसी तरह सही ट्रैक पर बम लगाया गया, उसमें विस्फ़ोट हुआ, ट्रेन का इंजन हवा में उड़ गया लेकिन ट्रेन बेपटरी होने से बच गई। फ्रेज़र जिंदा बच गया। उसने तुरंत ही घटना की जाँच के आदेश दे दिए। इसके बाद क्रांतिकारी समझ गए कि फ्रेज़र को मारना तो अब असम्भव हो चुका है, अतः उन्होंने अगला निशाना चुना- मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड।

अनुशीलन समिति से विशेष ‘सौहार्द्र’

अलीपुर के प्रेसिडेंसी कोर्ट का चीफ़ मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड आम बंगालियों के प्रति अपने अंग्रेज माई-बाप की भॉंति क्रूर और दमनकारी तो था ही, अनुशीलन समिति और जुगांतर पत्रिका से उसे कुछ विशेष ही ‘लगाव’ था। उसने जुगांतर के लगभग पूरे सम्पादक मंडल, जिसमें स्वामी विवेकानंद के भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त भी शामिल थे, को कठोर कारावास की सज़ा देकर जेल भेज दिया था। यही नहीं, जब इसके विरोध में जुगांतर में लेख प्रकाशित हुए ​तो उसने पत्रिका पर 5 और मुकदमे लाद दिए। इन सभी मुकदमों के आर्थिक बोझ और सम्पादकीय व बौद्धिक नेतृत्व के एक बड़े हिस्से के जेल चले जाने से 1908 आते-आते जुगांतर एक तरह से निष्प्राण हो गया था। बावजूद इसके उसकी विचारधारा इन मुकदमों के साथ और प्रख्यात हो रही थी। अधिक-से-अधिक लोग राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़ कर अंग्रेजों को विदेशी आक्रांता के रूप में देख रहे थे। पुलिस की परवाह किए बिना जुगांतर के मामले में सुनवाई के दौरान विरोध-प्रदर्शन किसी के थामे नहीं थमता था।

इन्हीं विरोध-प्रदर्शनों के दौरान एक किशोर सुशील सेन को मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड ने सरेआम कोड़े मरवाए थे, ताकि बंगालियों में डर बैठाया जा सके। लेकिन क्रांतिकारियों की योजना पर उस समय पानी फिरता सा लगा जब सूचना मिली कि किंग्सफोर्ड की सुरक्षा को लेकर चिंतित सरकार ने उसे जिला जज के रूप में पदोन्नत कर वर्तमान उत्तरी बिहार के मुजफ्फरपुर में भेज दिया है। अंततः निर्णय हुआ कि किंग्सफोर्ड की मौत बन क्रांतिकारी ही उस तक मुजफ्फरपुर पहुँचेंगे। इस दुस्साहसिक कृत्य के लिए 19 वर्षीय लेकिन अनुभवी प्रफुल्ल चाकी के साथ युवा खुदीराम बोस को चुना गया।

एक ओर यह दोनों वहाँ पहुँचे। वहीं कहीं से कलकत्ता पुलिस को भी इस योजना की भनक लग गई। कलकत्ता के कमिश्नर हैलिडे ने मुजफ्फरपुर पुलिस के ज़रिए किंग्सफोर्ड को आगाह कर दिया। लेकिन अति-आत्मविश्वास में किंग्सफोर्ड ने बहुत ज़्यादा एहतियात नहीं बरती। हालाँकि उसके घर के बाहर पुलिस ने 4 सिपाही तैनात ज़रूर कर दिए, लेकिन उसने ब्रिज खेलने जाना जारी रखा।

इसी का फायदा उठाकर स्कूल छात्रों के वेश में घूम रहे क्रांतिकारियों ने 29 अप्रैल 1908 की शाम को उसकी बग्घी में उल्लासकार दत्ता का बनाया हुआ बम फेंक दिया। दुर्भाग्यवश वह बग्घी किंग्सफोर्ड की न होकर बिहार के अंग्रेज वकील प्रिंगल केनेडी की निकली, जिसकी बेटी और पत्नी ने बम-धमाके से दम तोड़ दिया। किंग्सफोर्ड हूबहू वैसी ही बग्घी में पीछे से आ रहा था और वह बच निकला।

क्रांतिकारियों की इस भयानक चूक का फायदा उठाकर अंग्रेज पुलिस ने भारतीयों पर अत्याचार का नया सिलसिला शुरू कर दिया। हालाँकि प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस से मुठभेड़ में पकड़े जाने की बजाय खुद को गोली मार ली, लेकिन खुदीराम बोस पुलिस के हाथ लग गए। पुलिस ने मुकदमे के एक संक्षिप्त प्रहसन के बाद उन्हें फॉंसी पर चढ़ा दिया। लेकिन यह पुलिसिया अत्याचारों का अंत नहीं, महज़ शुरूआत थी। असली ‘बड़ी मछली’ थे “अंग्रेज़ी शासन के लिए सबसे खतरनाक व्यक्ति” घोषित हो चुके, अनुशीलन समिति व जुगांतर पत्रिका के संचालक ऑरोबिंदो घोष। (सन्दर्भ: Peter Heehs की किताब The Lives of Sri Aurobindo)

नेता के लिए कुर्बानी

2 मई, 1908 को पुलिस ने क्रांतिकारियों के विभिन्न ठिकानों पर एक साथ छापेमारी कर कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें उल्लासकार दत्ता के अतिरिक्त बारिन घोष, इंदु भूषण रॉय, उपेन्द्रनाथ बनर्जी आदि समिति के लगभग सभी चोटी के नेता थे। इन सभी पर इंग्लैण्ड के राजा के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने का आरोप लगाकर अदालत में मामला शुरू हुआ, जिसे आधिकारिक तौर पर ‘Emperor vs Aurobindo Ghosh and others’ और जनसामान्य के बीच अलीपुर बम केस, माणिकपुर षड्यंत्र या माणिकटोला बम षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है। कुल 49 जनप्रिय नेताओं को आम चोर-लुटेरों और हत्यारों-बलात्कारियों की तरह हाथ में हथकड़ियाँ और कमर में रस्सी बाँधकर कठघरे में खड़ा कर दिया गया।

जब मुकदमा चलना शुरू हुआ तो यह साफ़ था कि बारिन घोष समेत बाकी लोग तो सरकार के लिए ‘बोनस’ थे। असली नज़र तो थी ऑरोबिंदो घोष को दोषी करार देकर (और हो सके तो फाँसी पर चढ़ाकर) अंग्रेजी राज की राह के इकलौते सबसे बड़े काँटे को मिटाना। इसके लिए एक आरोपित नरेन्द्रनाथ गोस्वामी को पुलिस ने तोड़ भी लिया था कि यदि वह अदालत में गवाही दे दे कि मुजफ्फरपुर हत्याकाण्ड के आदेश सीधे महर्षि अरबिंदो ने दिए थे, उसके सामने, तो उसे माफ़ कर दिया जाएगा। यही नहीं, बचाव पक्ष के वकीलों को गोस्वामी से जिरह का मौका भी जज ने नहीं दिया।

लेकिन क्रांतिकारी भी ऑरोबिंदो पर आँच न आने देने के लिए कृतसंकल्प थे। एक ओर दो क्रांतिकारियों कनैलाल दत्त और सत्येन बोस ने जेल में ही नरेन गोस्वामी को मौत के घाट उतार दिया (जिसके लिए दोनों को आनन-फानन में फाँसी भी दे दी गई) और दूसरी ओर बारिन घोष ने पूरे मुजफ्फरपुर हत्याकाण्ड का जिम्मा अपने सिर ले लिया।

चूँकि उल्लासकार दत्ता, इंदुभूषण रॉय और बिभूतिभूषण सरकार को भी मुकदमे में फॉंसी ही होनी थी, अतः उन्होंने भी बाकी साथियों को मौत के मुँह से बचाने के लिए जिम्मेदारी बाँट ली। अंत में 6 मई, 1909 को जब मुकदमे का नतीजा आया तो उल्लासकार दत्ता और बारिन घोष को मुख्य षड्यंत्रकारी मानते हुए मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई। इंदुभूषण रॉय और बिभूतिभूषण सरकार सहित 13 अन्य को कालापानी में उम्र कैद और सम्पत्ति की कुर्की, और कइयों को अन्य अवधि के कारावास सज़ा सुनाई गई।

लेकिन अंग्रेज सरकार लाख चाहकर भी महर्षि अरबिंदो को हाथ तक नहीं लगा पाई। सबूतों के अभाव में अरबिंदो समेत 17 आरोपितों को बरी करना पड़ा। बाद में उल्लासकार दत्ता और बारिन घोष के मृत्युदण्ड को सरकार ने कालापानी के उम्रकैद में तब्दील कर दिया। वहाँ वे 1920 में सरकार द्वारा सभी क्रांतिकारियों को आम माफ़ी दिए जाने तक रहे।

जेल की यातनाएँ, मानसिक रोगी हो जाना

अलीपुर मुकदमे में अपना पेशा ‘गायों का चरवाहा’ बताने वाले उल्लासकार दत्ता कालापानी जाने के पहले तक काफ़ी विनोदप्रिय माने जाते थे। उन्हें दूसरों की मिमिक्री करने और वेंट्रीलोक्विज़म (कठपुतली का करतब) में भी महारत हासिल थी। जेल में भी कुछ समय तक वह चुटकुले आदि से अपने साथियों का मनोरंजन करते रहे थे। लेकिन अरबिंदो के हाथ से निकल जाने से खिसियाई अंग्रेज सरकार ने अपना गुस्सा कैद क्रांतिकारियों पर बहुत बर्बरतापूर्वक निकाला और उन्हें रूह कॅंपा देने वाली यातनाएँ दीं। कैदी वहाँ की गर्म जलवायु में मलेरिया और हैजा आदि से ग्रस्त हो पड़े रहते थे और सुनने वाला कोई नहीं था। राजनीतिक कैदियों के हिस्से का राशन जेल कर्मचारी चुरा लेते थे। दस सालों के अंतराल में तिल-तिल कर इतना शोषण किया गया कि उल्लासकार दत्ता का मानसिक संतुलन ही जाता रहा। वे अकेले नहीं थे- कुछ ही समय पहले देश के लिए मौत को गले लगाने को उद्यत खड़े इंदुभूषण रॉय की आत्मा और शरीर को अंग्रेजी दमन के कोल्हू ने इतना बुरी तरह पीस दिया कि उस क्रांतिकारी ने एक फ़टी कमीज से खुद को फॉंसी लगा ली

1920 में जेल से निकल कर उल्लासकार कलकत्ता चले गए, जहाँ 1931 में उन्हें दोबारा हिरासत में लेकर 18 महीने के लिए जेल भेज दिया गया। वहाँ से निकलने के बाद के उनके जीवन के बारे में वृत्तान्त कम ही मिलते हैं। उनके जीवन के विषय में जानकारी का मुख्य स्रोत उनके लिखे हुए दो जेल वृत्तान्तों आमार काराजीबन (कारागार में मेरा जीवन, अंग्रेजी में Twelve years in prison life शीर्षक से अनुवादित) और द्वीपांतरेर कथा (अंग्रेजी में The Tale of Deportation शीर्षक से अनुवादित) के अलावा महर्षि अरबिंदो के जीवन पर शोध-साहित्य और क्रांतिकारी हेमंत सरकार की किताब Revolutionaries of Bengal प्रमुख हैं।

1947 में आजादी हासिल होने के बाद उल्लासकार अपने पैतृक स्थान कालिकच्चा चले गए। बाघबाड़ी हाउस नामक अपने घर में उन्होंने प्रवेश अंग्रेजी राज के अंतिम दिन 14 अगस्त, 1947 को किया। बाद में 1957 में उन्होंने विवाह कर लिया और वर्तमान असम के सिलचर चले गए, जहाँ 17 मई 1965 को उन्होंने अंतिम साँस ली।

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सारी सभा में हलचल मच गई। रौद्र रूप धरे गुरु गोविन्द सिंह की इस माँग के बाद जो लोग आए, उन्होंने न सिर्फ़ अपनी बहादुरी से देश को गौरवान्वित किया बल्कि जाति-पाती के बंधनों को तोड़ने में भी अहम भूमिका निभाई। एक व्यक्ति आगे आया। गुरु गोविन्द सिंह उसे तम्बू में ले गए और खचाक…!