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18000 से 50000+ की छलाँग दे सकता है 8वाँ वेतन आयोग, जानिए कैसे तय होती है सैलरी-पेंशन में बढ़ोतरी: फिटमेंट फैक्टर है सबसे अहम, सब कुछ इसी से होगा तय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय कैबिनेट ने गुरुवार (16 जनवरी, 2025) को 8वें वेतन आयोग को मंजूरी दे दी। इस आयोग का गठन केन्द्रीय कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन तय करने के लिए किया गया है। 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर ही 2026 से सैलरी और पेंशन का निर्धारण होगा।

इस आयोग का गठन सातवें वेतन आयोग की अवधि पूरे होने से लगभग एक वर्ष पूर्व किया गया है। 7वां वेतन आयोग 31 दिसम्बर, 2025 को समाप्त हो जाएगा। वेतन आयोग को मोटे तौर लोग सैलरी-पेंशन बढ़ने से ही जोड़ते हैं। नए वेतन आयोग के ऐलान के साथ ही कयास लगने लगे हैं कि 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद सैलरी-पेंशन कितने बढ़ेंगे।

यह भी चर्चा चल रही है कि कब से यह बढ़ी हुई पेंशन मिलेगी। इस बीच पाँचवे, छठे और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद सैलरी और पेंशन कितनी बढ़ी थी। इसके अलावा इस नए वेतन आयोग पर काम कितनी जल्दी चालू होगा, इसको लेकर भी चर्चाएँ चल रही है।

8वें वेतन आयोग में कितनी बढ़ेगी सैलरी-पेंशन?

8वें वेतन आयोग के लिए कुछ दिनों के भीतर चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति सरकार कर देगी। इसके बाद यह आयोग उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (IW) समेत बाकी तमाम तथ्यों को ध्यान में रख कर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा। इस रिपोर्ट में यह बताया जाएगा कि कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन कितनी बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।

आयोग सैलरी और पेंशन बढ़ाने के लिए ‘फिटमेंट फैक्टर’ का इस्तेमाल करता है। फिटमेंट फैक्टर वह संख्या होती है, जिससे पिछले आयोग में तय की गई बेसिक सैलरी और पेंशन को गुणा करके नई बेसिक सैलरी और पेंशन तय की जाती है। इसको उदाहरण से समझा जाना चाहिए।

यदि आज किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी ₹20 हजार है और इस पर 2 का फिटमेंट फैक्टर लगाया जाता है तो यह बढ़ कर ₹40 हजार हो जाएगी। यदि किसी की बेसिक सैलरी ₹1 लाख है तो यह बढ़ कर ₹2 लाख हो जाएगी। आयोग इसके अलावा कर्मचारियों को मिलने वाले बाकी भत्ते और भुगतान तय करेगी।

8वें वेतन आयोग की सिफारिशों में बेसिक सैलरी पर 2.86 का फिटमेंट फैक्टर लगाए जाने की चर्चा चल रही है। कहीं-कहीं यह फिटमेंट फैक्टर 2.28 लगाए जाने की चर्चा भी चल रही है। ऐसे में अभी के सभी ग्रेड के बेसिक सैलरी इसी से तय होंगे। वर्तमान में सबसे निचले स्तर के कर्मचारी को ₹18000 की बेसिक सैलरी मिलती है।

यदि इस पर 2.28 का फिटमेंट फैक्टर लगा तो यह बढ़ कर ₹41 हजार से ज्यादा हो जाएगा। यदि 2.86 का फिटमेंट फैक्टर लगा तो यह बढ़ कर ₹51 हजार से अधिक हो जाएगी। जो भी जिस कर्मचारी का पे बैंड और ग्रेड होगा, उसी हिसाब से उसका वेतन तय किया जाएगा। इस ग्राफ से आप यह समझ सकते हैं।

वेतन आयोग

पिछले वेतन आयोगों में कितना बढ़ा?

2016 में लागू किए गए 7वें वेतन आयोग में 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लगाया गया था। यानि तब बेसिक सैलरी में 257% की बढ़ोतरी हुई थी। इसके अलावा इस दौरान पेंशन को भी 2.57 के फिटमेंट फैक्टर से बढ़ाया गया था। तब बेसिक पेंशन भी ₹3500 से बढ़ कर ₹9 हजार हो गई थी।

इसी तरह 2006 में केन्द्र सरकार द्वारा लाए गए 6ठे वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 1.86 का था। तब बेसिक सैलरी ₹3700 से बढ़ कर ₹7000 हुई थी। इस वेतन आयोग के चलते देश में बड़े बदलाव देखने को मिले थे।

इसके अलावा 5वें वेतन आयोग में 40% की बढ़त बेसिक सैलरी पर दी गई थी। यानी इसमें 1.4 का फिटमेंट फैक्टर लगाया गया था। यही फिटमेंट फैक्टर पेंशन पर भी लागू किया गया था।

आखिरकार ‘चंदू चैंपियन’ को मिला ‘अर्जुन अवॉर्ड’, जिसके लिए थाने पहुँचा था दिग्गज तैराक: मुरलीकांत पेटकर ने राष्ट्रपति के हाथों लिया सम्मान, मोदी सरकार ने 2018 में दिया था पद्मश्री

राष्ट्रपति भवन में आयोजित भव्य समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 4 खिलाड़ियों को खेल रत्न, 32 खिलाड़ियों को अर्जुन अवॉर्ड के साथ ही 2 खिलाड़ियों को लाइफटाइम अर्जुन अवॉर्ड भी दिया, इसमें पैरा-स्विमर मुरलीकांत पेटकर और एथलेटिस्ट में सुचा सिंह का नाम रहा।

मुरलीकांत पेटकर को मिला अर्जुन अवॉर्ड

मुरलीकांत पेटकर वही हैं, जिन्होंने खुद पुलिस स्टेशन जाकर अर्जुन अवॉर्ड न देने के लिए सरकार की शिकायत की थी। हालाँकि मोदी सरकार ने उनका सम्मान किया है और अर्जुन अवॉर्ड (लाइफटाइम) देकर सम्मानित किया है। मुरलीकांत पेटकर को सम्मानित करने के समय एक्टर कार्तिक आर्यन भी मौजूद थे, जिन्होंने उनकी जिंदगी पर बनी फिल्म ‘चंदू चैंपियन’ में उनका किरदार निभाया था। ‘चंदू चैंपियन’ फिल्म के डायरेक्टर कबीर खान भी मौके पर मौजूद रहे।

बता दें कि मुरलीकांत पेटकर को मोदी सरकार मार्च 2018 में पद्मश्री से भी सम्मानित कर चुकी है। वो जिस अर्जुन अवॉर्ड के लिए थाने तक पहुँचे थे, मोदी सरकार ने उन्हें वो सम्मान राष्ट्रपति के हाथों दिलाया। मुरलीकांत पेटकर अब 80 वर्ष के हो चुके हैं। इसके बावजूद अर्जुन अवॉर्ड लेने के लिए खुद वो पहुँचे थे।

कौन हैं मुरलीकांत पेटकर?

मुरलीकांत पेटकर का जन्म 1944 में महाराष्ट्र के सांगली में हुआ। वो पहलवानी करना चाहते थे, जिसके लिए वो घर से भी भाग गए। बाद में वो सेना में भर्ती हो गए और बॉक्सिंग शुरू की। सेना में रहते हुए उन्होंने कई मेडल जीते और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कैडेट्स के गेम में हिस्सा लिया। साल 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में उन्होंने हिस्सा लिया, जहाँ 9 गोलियाँ लगने के बावजूद वो बच गए। 8 गोलियाँ तो शरीर से निकाल दी गई, लेकिन एक गोली उनकी रीढ़ की हड्डी में फंसी रह गई, जिसकी वजह से काफी समय तक वो लकवा के शिकार रहे। इस दौरान धीरे-धीरे वो ठीक होने के क्रम में ही स्विमिंग करने लगे और फिर अन्य खेलों में हिस्सा लेने लगे।

मुरलीकांत पेटकर ने साल 1968 के पैरालंपिक्स में टेबल टेनिस और फिर 1972 के हैडलवर्ग पैरालंपिक्स में स्विमिंग में हिस्सा लिया और मेडल जीते। हालाँकि उस समय और बाद की सरकारों ने उन्हें अनदेखा किया और कभी उनका सम्मान नहीं किया गया, जिसके बाद अपने गाँव की बदहाली की वजह से वो खुद पुलिस थाने पहुँचे थे और फिर मोदी सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। उनकी ये कहानी ‘चंदू चैंपियन’ फिल्म में भी दिखाई गई है।

राष्ट्रीय खेल पुरस्कार समारोह के मौके पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मनु भाकर, डी. गुकेश, हरमनप्रीत सिंह और प्रवीन कुमार को खेल रत्न सम्मान से नवाजा। इस दौरान 18 वर्षीय शतरंज विश्व चैंपियन डी. गुकेश और डबल ओलंपिक पदक विजेता निशानेबाज मनु भाकर ने सभी का ध्यान खींचा, जबकि पैरा-एथलीट प्रवीन कुमार को सबसे ज्यादा तालियाँ मिलीं। प्रवीन ने पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया है। वहीं, भारतीय हॉकी टीम के कप्तान हरमनप्रीत सिंह को भी देश के सर्वोच्च खेल सम्मान से सम्मानित किया गया। इस दौरान 5 कोचों को द्रोणाचार्य पुरस्कार, फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया को राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार से नवाजा गया।

‘कठमुल्ला’ पर जस्टिस शेखर यादव ने नहीं माँगी माफी, कहा- संविधान के अनुरूप था बयान: VHP के कार्यक्रम में जाने पर पीछे पड़ गए थे लिबरल-वामपंथी

विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रम में दिए गए अपने संबोधन को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर यादव ने माफी नहीं माँगी है। उन्होंने इस संबोधन के ऊपर उठे विवाद को लेकर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिख कर अपना जवाब दिया है। जस्टिस यादव ने अपने संबोधन को नियमों के अनुसार बताया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जस्टिस शेखर यादव ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली को पत्र भेज कर जवाब दिया है। जस्टिस यादव ने कहा है कि उनके संबोधन को तोड़मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। जस्टिस शेखर यादव ने माँग की है कि न्यायपालिका को उनका संरक्षण करना चाहिए क्योंकि उनके जैसे लोग अपना बचाव नहीं कर सकते।

जस्टिस शेखर यादव ने अपने पत्र में लिखा है कि उनका संबोधन संविधान में निहित मूल्यों के अनुरूप था। उन्होंने कहा है कि यह उनकी सामाजिक मुद्दों पर विचारों की अभिव्यक्ति थी, न कि किसी समुदाय के प्रति घृणा पैदा करने वाली बात। उन्होंने कहा है कि यह संबोधन किसी भी तरह से न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता।

जस्टिस यादव ने यह जवाब 17 दिसम्बर, 2024 को उनकी सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम की बैठक के बाद दिया है। इस कोलेजियम की अध्यक्ष CJI संजीव खन्ना कर रहे थे। इसके बाद जनवरी, 2025 में CJI खन्ना ने जस्टिस भंसाली से इस मामले पर रिपोर्ट माँगी थी। इसी के बाद जस्टिस शेखर ने यह जवाब भेजा।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया गया है कि जस्टिस शेखर यादव से यह जवाब एक वकालत के छात्र और एक सेवानिवृत्त IPS अधिकारी की शिकायत के बाद माँगा गया था। यह सभी शिकायतें 8 दिसम्बर, 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में UCC पर आयोजित किए गए एक कार्यक्रम में जस्टिस शेखर यादव के संबोधन के बाद की गई हैं।

यह कार्यक्रम विश्व हिन्दू परिषद (VHP) के लीगल सेल ने करवाया था। इस कार्यक्रम में जस्टिस यादव ने मुस्लिमों में कट्टरपंथ और रूढ़िवादिता को लेकर कुछ बातें कही थीं। उन्होंने ‘कठमुल्लों’ को देश के लिए घातक बताया था। उन्होंने UCC जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखे थे। इसके बाद उनके पीछे पूरा लिबरल और वामपंथी गैंग पड़ गया था।

जस्टिस शेखर यादव ने यहाँ कहा था, “मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह हिंदुस्तान है, यह देश हिंदुस्तान में रहने वाले बहुसंख्यकों के अनुसार चलेगा। यही कानून है। आप यह नहीं कह सकते कि मैं हाईकोर्ट के जज होने के नाते ऐसा कह रहा हूँ। दरअसल, कानून ही बहुमत के हिसाब से काम करता है।”

जस्टिस शेखर यादव ने मुस्लिमों में फैली रूढ़िवादिता और दकियानूसी को लेकर प्रश्न खड़े किए थे। उन्होंने कहा, “हमारे हिंदू धर्म में बाल विवाह, सती प्रथा और बालिकाओं की हत्या जैसी कई सामाजिक कुरीतियाँ थीं, राम मोहन राय जैसे सुधारकों ने इन कुरीतियों को खत्म करने के लिए संघर्ष किया। लेकिन जब मुस्लिम समुदाय में हलाला, तीन तलाक और गोद लेने से जुड़े मुद्दों जैसी सामाजिक कुरीतियों की बात आती है, तब उनके पास इनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं थी।”

दिल्ली में अभी लागू नहीं होगी ‘आयुष्मान भारत योजना’ : हाई कोर्ट के आदेश पर SC ने लगाई रोक, केंद्र सरकार से जवाब माँगा

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में आयुष्मान भारत योजना लागू करने के हाईकोर्ट के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। यह फैसला दिल्ली सरकार की याचिका पर आया, जिसमें वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि हाईकोर्ट किसी राज्य सरकार को किसी योजना के एमओयू पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। दिल्ली सरकार ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना में 60% फंड केंद्र और 40% राज्य सरकार को देना है, लेकिन केंद्र आगे के खर्च के लिए बजट नहीं देगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने दिल्ली सरकार की याचिका पर सुनवाई के बाद केंद्र, एम्स और दिल्ली नगर निगम को भी नोटिस जारी किया। बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बाद दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें उसने बताया था कि आयुष्मान भारत योजना को लागू करना पहले से प्रभावी दिल्ली आरोग्य कोष (DAK) योजना को कमजोर करने जैसा होगा।

दिल्ली सरकार ने तर्क दिया था कि उसकी योजना अधिक व्यापक और प्रभावशाली है। आयुष्मान भारत योजना केवल दिल्ली की सीमित आबादी को लाभ पहुँचाएगी, जबकि DAK योजना हर नागरिक को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराती है।

बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट ने पिछले महीने दिल्ली सरकार और केंद्र को निर्देश दिया था कि वे 5 जनवरी तक आयुष्मान भारत योजना को लागू करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करें। कोर्ट ने कहा था कि जब 33 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश इस योजना को लागू कर चुके हैं, तो दिल्ली में इसे न लागू करना उचित नहीं है।

इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने 24 दिसंबर को दिल्ली सरकार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर करने का आदेश दिया था। हालाँकि, दिल्ली सरकार ने इसे लागू नहीं किया है और अपनी दिल्ली आरोग्य कोष योजना को इससे बेहतर बताते हुए इसे प्राथमिकता दी है।

‘चाहे तो नजरबंद कर लो, लेकिन बेल दे दो’… कोर्ट में गिड़गिड़ाया आतंकी अबूबकर, PFI का था सरगना: सुप्रीम कोर्ट ने भगाया, कहा – निचली अदालत जाओ

भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ का सरगना अबू बकर सुप्रीम कोर्ट के पास मेडिकल ग्राउंड पर बेल लेने गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी इस याचिका को खारिज कर दिया और उसे निचली कोर्ट के पास जाने को कहा। इसके पहले हाई कोर्ट भी उसकी याचिकाओं को खारिज कर चुका है।

गौरतलब है कि अबू बकर को साल 2022 में NIA ने प्रतिबंधित संगठन के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई के दौरान अरेस्ट किया था। उसके बाद से वो जेल में बंद है और बेल पर बाहर आने की कोशिश करता है। उसपर आईपीसी की धारा 120बी और 153ए के अलावा यूएपीए की धारा 17, 18, 18बी, 29, 22बी, 38 और 39 के तहत कार्रवाई हुई है।

पिछले साल भी बेल माँगे जाने पर 12 नवंबर को न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को एक मेडिकल टीम गठित करने का निर्देश दिया था, ताकि अबूबकर की गहन जाँच हो और पता लग सके कि अबूबबकर को मेडिकल ग्राउंड पर बेल मिलनी चाहिए या नहीं।

इसी रिपोर्ट के आधार पर अबूबकर के वकील ने फिर जमानत माँगी लेकिन अतिरिक्त सॉलिस्टर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि अबूबकर की सभी समस्याएँ इलाज से ठीक हो गई हैं इसलिए उसे बेल नहीं मिलनी चाहिए। इसके बाद जस्टिस सुंदरेश और राजेश बिंदल की पीठ ने कहा कि वे इस समय चिकित्सा आधार पर जमानत देने के लिए इच्छुक नहीं हैं और याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी।

वहीं अबूबकर के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने फिर कहा कि याचिकाकर्ता को घर में नजरबंद रख लिया जाए लेकिन बेल दे दें। इसका भी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विरोध किया और सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

रेस्टोरेंट मालिक अब्दुल हकीम ने किया तुलसी माता का अपमान, वीडियो-फोटो शेयर करने पर धमका रही केरल पुलिस: तर्क दिया – ‘तनाव मत बढ़ाओ… मानसिक विक्षिप्त है’

केरल के गुरुवयूर में नेशनल पैराडाइज़ रेस्टोरेंट के मालिक अब्दुल हकीम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। इसमें वह तुलसी पौधे के साथ अभद्र हरकत करते हुए नजर आ रहे हैं। वीडियो में आरोपित अपने शरीर के निजी हिस्से से बाल निकालकर तुलसी पौधे पर डालते हुए दिखाई देता है, जो हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है।

नेशनल पैराडाइज़ रेस्टोरेंट के मालिक अब्दुल हकीम की इस हरकत पर लोगों में काफी गुस्सा है। केरल में विश्व हिंदू परिषद के सदस्य मौके पर पहुँचे और तुलसी पूजन कर विरोध प्रदर्शन किया। वहीं, जब लोगों ने सोशल मीडिया पर अब्दुल हकीम को लेकर पोस्ट करना शुरू किया, तो केरल पुलिस धमकाने पर उतर आई।

त्रिशूर पुलिस ने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर पोस्ट डाल कर लोगों को धमकाने वाले अंदाज में खबरदार किया है। त्रिशूर सिटी पुलिस ने लिखा है कि हकीम पिछले 25 सालों से मानसिक बीमारी से ग्रस्त है और उसका इलाज चल रहा है। उन्होंने वीडियो को साझा करने वालों को सख्त कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। पुलिस ने लिखा, “गुरुवायूर के एक युवक का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है। जाँच में पता चला है कि वह युवक 25 साल से मानसिक बीमारी से पीड़ित है। ऐसे वीडियो साझा करने और सामाजिक वैमनस्य बढ़ाने वाले पोस्ट्स पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

इस घटना को लेकर हिंदू ऐक्य वेदी ने शिकायत दर्ज कराई है, जिसके बाद हकीम को कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार गिरफ्तार कर लिया गया है। हालाँकि ये वही केरल पुलिस है, जो रिपोर्टिंग पर पत्रकारों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट में मुकदमे भी दर्ज कर रही है।

हकीम पहले भी कई विवादों में घिर चुका है। 12 जनवरी 2017 को उसके रेस्टोरेंट से स्वास्थ्य निरीक्षकों ने खराब और बासी खाना जब्त किया था। यह तीसरी बार था जब उसके होटल पर छापा पड़ा। पहले की घटनाओं को कथित राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते दबा दिया गया था। हिंदू सेवा केंद्रम नाम के एक्स हैंडल ने अब्दुल हकीम के पुराने पापों के बारे में बताया है।

हकीम पर अयप्पा भक्तों को ले जा रही बसों पर पत्थर फेंकने और रेस्टोरेंट के बाथरूम में हिडेन कैमरे लगाने जैसे गंभीर आरोप भी लग चुके हैं। इन मामलों को लेकर गुरुवायूर थाने में शिकायतें दर्ज हैं।

मैसुरु में मंदिर के बैल की पूँछ काटी, धारदार हथियारों से किया घायल: भाजपा के पूर्व MP ने किया प्रदर्शन, इससे पहले बेंगलुरु में सैयद नसरू ने गायों के थन काटे थे

कर्नाटक में गोवंश पर लगातार हमले हो रहे हैं। बेंगलुरु में गायों के थन काटे जाने के बाद अब मैसुरु में एक बैल पर धारदार हथियारों से कई हमले किए गए और उसकी पूँछ काट दी गई। यह बैल यहीं के प्रसिद्ध श्रीकंटेश्वरा मंदिर का था।

हमलावरों की पहचान ना होने के चलते स्थानीय हिन्दुओं में गुस्सा है। उन्होंने कॉन्ग्रेस सरकार पर यहाँ के मंदिर में गोशाला ना बनाने का आरोप लगाया है, जिसके चलते गाय और बैल आवारा घूमते हैं और हमलों या फिर तस्करी का शिकार बनते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मैसुरु के नंजानगुड़ में स्थित श्रीकंटेश्वरा मंदिर के बैल पर यह हमला गुरुवार (16 जनवरी, 2025) को हुआ। हमलावरों ने बैल की पूछ काट दी, उसके पैर धारदार हथियारों से घायल कर दिए। उसके शरीर पर और जगह चोटें भी आईं।

कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि हमलवारों ने बैल को उठा ले जाने का प्रयास भी किया। हमले के बाद बैल के इलाज के पशुओं के डॉक्टर को बुलाया गया। मामले में पुलिस को भी सूचना दी गई। जिले के एसपी ने घटनास्थल का दौरा किया और इस मामले में FIR दर्ज करने का आदेश दिया।

पुलिस ने अभी अज्ञात आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। हालाँकि, हमलावर पकड़े नहीं जा सके हैं। मामले से भाजपा के पूर्व सांसद प्रताप सिम्हा समेत क्रोधित स्थानीय युवाओं ने प्रदर्शन किया और जल्द कार्रवाई की माँग की। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि मंदिर में बड़ी संख्या में गाय और बैल हैं लेकिन उनके लिए सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किए हैं।

यह सभी गोवंश इस कंटेश्वरा मंदिर को ही दान किए जाते हैं, जो कि एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है और शिव को समर्पित है। स्थानीयों ने आरोप लगाया कि मंदिर में गोशाला बनाए जाने के लिए 2 एकड़ जमीन की पहचान की थी और गोशाला बनाने के लिए फंड भी दे दिया था।

कॉन्ग्रेस सरकार में इस पर कोई काम नहीं हुआ और पशु अब छुट्टा घूमने को मजबूर हैं। बैल पर हुए हमले के बाद मंदिर प्रशासन और बाकी लोगों के बीच बातचीत हुई है। मंदिर प्रशासन ने कहा है कि वह हाथियों के लिए बनाए गए आश्रय स्थल को गोशाला में तब्दील करेगा।

कर्नाटक में गोवंश पर यह कोई पहला हमला नहीं है। हाल ही में बेंगलुरु में एक गोपालक की गायों पर सैयद नसरू नाम के एक व्यक्ति ने हमला कर दिया था। उसने तीन गायों पर धारदार हथियार चलाया था और उनके थन काट दिए थे। भाजपा ने इस मामले में विरोध प्रदर्शन किया था।

‘8 साल का तैमूर घायल सैफ को लेकर गया अस्पताल’ : टाइम्स ऑफ इंडिया ने छापी हवा-हवाई खबर, नेटीजन्स ने लताड़ा तो चुपके से बदली हेडलाइन

सैफ अली खान पर हुए हमले को लेकर मीडिया में लगातार खबरें आ रही हैं । इसी कड़ी में अंग्रेजी समाचार वेबसाइट टाइम्स ऑफ़ इंडिया (TOI) ने एक हवा-हवाई दावा करते हुए खबर प्रकाशित कर दी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने सैफ अली खान और उनके बेटे तैमूर को लेकर यह खबर छापी। जब इसको लेकर उसे सोशल मीडिया पर लताड़ पड़ी तो उसने हेडलाइन बदल दी।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया (TOI) ने गुरुवार (16 जनवरी, 2024) को खबर छापी कि सैफ अली खान को उनके 8 साल के बेटे तैमूर हमले के बाद अस्पताल लेकर पहुँचे थे। बात टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपनी खबर की हेडलाइन में तक लिखी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने यह खबर लीलावती अस्पताल के एक डॉक्टर के हवाले से लिखी है।

रात 11:35 पर प्रकाशित की गई टाइम्स ऑफ़ इंडिया की यह खबर तुरंत सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इस खबर के स्क्रीनशॉट लेकर तुंरत नेटीजन्स सोशल मीडिया पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया को लताड़ लगाई। सोशल मीडिया पर लोगों ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया का फर्जी एक्सक्लूसिव खबर पर मजाक भी उड़ाया।

नेटीजन्स से लताड़ लगने के बाद टाइम्स ऑफ़ इंडिया की घटिया ने इस खबर की हेडलाइन बदल दी। हेडलाइन बदलकर “सैफ़ अली खान को तैमूर के साथ ले जाया गया लीलावती अस्पताल, डॉक्टर ने किया खुलासा” लिखा। हालाँकि टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपनी गलती के लिए कोई माफ़ी नहीं माँगी और यहाँ तक कोई अपडेट तक नहीं लिखा।

चाकू घोंपने के बाद सैफ अली खान के साथ अस्पताल कौन गया था, इस बारे में कई अटकलें लगाई जा रही थीं। कई रिपोर्टों में दावा किया गया था कि यह तैमूर के साथ एक केयरटेकर था, अन्य ने दावा किया कि यह खान का बड़ा बेटा इब्राहिम था, जो उनके साथ अस्पताल गया था।

कई रिपोर्ट्स में बताया गया था कि सैफ को उनके बेटे तैमूर अस्पताल लेकर एक ऑटो में गए थे। हालाँकि, मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट में बाद में दावा किया कि न तो इब्राहिम और न ही तैमूर सैफ के साथ अस्पताल गए थे।

मनीकंट्रोल ने अपनी खबर में बताया था कि सैफ को अस्पताल ले जाने वाला व्यक्ति एक केयरटेकर था और दोनों बेटों में से कोई भी उस समय घटनास्थल पर नहीं दिखे थे। अभी सैफ अली पर हमले की गुत्थी सुलझ नहीं पाई है। पुलिस को CCTV फुटेज मिला है, जिसके आधार पर जाँच जारी है।

‘वेश्या का बेटा’ कहना जातिगत गाली नहीं: केरल हाई कोर्ट ने SC-ST केस से आरोपित को दी बेल, कहा- ये कहना अपमानजनक था, लेकिन अपराध नहीं

केरल हाई कोर्ट ने मलयालम भाषा में दी गई गाली- ‘पुलायडी मोने’ जिसका अर्थ हिंदी में ‘वेश्या का बेटा’ होता है- उसे SC/ST एक्ट के तहत जातिवादी गाली मानने से इनकार कर दिया। जस्टिस सी एस सुधा की सिंगल बेंच ने इस गाली को देने वाले आरोपित को गिरफ्तारी से पहले जमानत देते हुए कहा कि यह शब्द निस्संदेह अपमानजनक था, लेकिन ये ऐसा शब्द नहीं था जिसकी वजह से आरोपित पर एससी-एसटी एक्ट की धारा 3 (1) के तहत अपराध सिद्ध हो।

जस्टिस सी एस सुधा ने कहा कि यदि डिक्शनरी में लिखे मतलब पर जाएँ तो इसका अर्थ हुआ- वेश्या का बेटा। ये तो कोई जातिवादी गाली नहीं है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, पूरा मामला 12 नवंबर 2024 को पेरुंबवूर का है। यहाँ पुलाया समुदाय के एक व्यक्ति और उसके साले अबीराज के साथ कथित तौर पर तीन लोगों ने गाली-गलौज और मारपीट की थी। इसके बाद उन लोगों ने मामले में एफआईआर कराई जिसमें कहा गया कि उनके खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल हुआ है।

एफआईआर में अतिक्रमण, स्वेच्छा से चोट पहुँचाने और गंभीर चोट पहुँचाने के आरोपों के साथ-साथ एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(आर) और (एस) के तहत मामला दर्ज किया गया था। जब आरोपित बेल लेने ट्रायल कोर्ट गए तो वहाँ अदालत ने एससी/एसटी अधिनियम की धारा 18 और 18ए के तहत वैधानिक प्रतिबंध का हवाला देते हुए गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से इनकार कर दिया।

बाद में आरोपित इस मामले में बेल की अपील लेकर हाईकोर्ट गए। यहाँ पूरे केस की जाँच करने के बाद कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जातिगत गाली नहीं दी गई है। पूरे मामले में न्यायालय ने पाया की अधिनियम की धारा 3(1) एस या आर के तहत प्रथम दृष्ट्या में कोई अपराध नहीं है।

न्यायालय ने पाया कि आरोपित और शिकायतकर्ताओं के बीच झगड़ा वाहन विवाद के कारण हुआ था न कि जातिगत गाली देने से। न्यायालय ने कहा, “किसी व्यक्ति का अपमान या धमकी देना अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जाएगा, जब तक कि ऐसा अपमान या धमकी पीड़ित के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने के कारण न हो।”

कोर्ट ने फैसला देते हुए ये भी कहा अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार करना है, क्योंकि उन्हें कई नागरिक अधिकारों से वंचित किया जाता है। इस प्रकार, अधिनियम के तहत अपराध तब माना जाएगा जब समाज के कमजोर वर्ग के सदस्य को अपमान, अपमान और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

Movie Review Azaad: घोड़े, इंसानी जज़्बात और 1920 के भारत की अनकही कहानी, ‘उई अम्मा’ नहीं बल्कि दमदार है ‘आजाद’

अमूमन हर शुक्रवार को बॉक्स ऑफिस पर फिल्में रिलीज होती हैं, कोई बड़ा त्यौहार या मौका न हो, तो शुक्रवार से ही टिकट खिड़की पर फिल्मों का इम्तिहान होता है। इसी कड़ी में शुक्रवार (17 जनवरी 2025) को ‘आजाद’ नाम की फिल्म भी रिलीज हुई है, जिसके चर्चे आगे सुनने को मिल सकते हैं। हाँ, तो हम बात कर रहे हैं ‘आजाद’ की। डायरेक्टर अभिषेक कपूर की फिल्म का मुख्य पात्र है महाराणा प्रताप के महापराक्रमी घोड़े ‘चेतक’ की तरह का शानदार घोड़ा ‘आजाद’।

अभिषेक कपूर ने ‘रॉक ऑन,’ ‘काई पो छे!’ और ‘केदारनाथ’ जैसी फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिलों में जगह बनाई है। अभिषेक इस बार एक ऐसा विषय लेकर आए हैं, जो भारतीय सिनेमा में कम ही देखा गया है। यह फिल्म एक घोड़े और एक लड़के के बीच की दोस्ती की कहानी है, लेकिन इसके साथ-साथ यह गुलामी और विदेशी हुकूमत के अत्याचारों को भी बखूबी उजागर करती है। अभिषेक कपूर ने दर्शकों को 1920 के उस दौर में ले जाने की पूरी कोशिश की है, जब भारतीय मजदूरों को जबरन गुलामी के लिए विदेशों में भेजा जाता था। यह तथ्य फिल्म में हल्के लेकिन प्रभावी ढंग से सामने आता है।

पुराने समय पर आधारित अनोखी कहानी

फिल्म की कहानी 1920 के भारत में सेट है, जब अंग्रेज भारत पर हुकूमत कर रहे थे। यह वह दौर था जब भारतीय मजदूरों को जबरन गुलाम बनाकर विदेशों में ले जाया जाता था। कहानी इस दर्दनाक सच्चाई को हल्के लेकिन प्रभावी ढंग से पेश करती है।

‘आजाद’ नाम का घोड़ा केवल एक जानवर नहीं है, वह आज़ादी, स्वामिभक्ति और साहस का प्रतीक है। यह फिल्म एक घोड़े और इंसान के रिश्ते की बारीकियों को खूबसूरती से दिखाती है। इसके अलावा, यह फिल्म उन अनकही कहानियों को भी उजागर करती है, जो आजादी की लड़ाई के दौरान भारतीयों के जीवन का हिस्सा थीं।

कहानी का नयापन इस बात में है कि यह केवल देशभक्ति पर आधारित नहीं है, बल्कि इंसानी भावनाओं और रिश्तों की गहराई को भी छूती है। यह फिल्म आमिर खान की ‘लगान’ की याद दिलाती है, लेकिन इसकी कहानी और उसे पर्दे पर पेश करने का तरीका, दोनों ही अलग है।

स्टीरियोटाइप मिटाने वाली एक्टिंग

खास बात ये है कि अजय देवगन को छोड़कर कोई भी एक्टर अपने पुराने स्टीरियोटाइप इमेज में नहीं दिखा है। अजय का वैसा दिखना कहानी की माँग थी, जिसमें वो जंचे भी हैं। बाकी कहानी के मुख्य बिंदुओं को संभालने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है और उन्होंने इसे पूरी शिद्दत से निभाया है। अजय का किरदार एक ऐसा व्यक्ति है, जो न केवल घोड़े ‘आजाद’ को समझता है, बल्कि उसके जरिए अपने जीवन के कई सवालों के जवाब भी ढूंढता है। अजय देवगन के किरदार में गंभीरता और गहराई है, जो हर सीन में नजर आती है।

फिल्म के मुख्य किरदारों में अजय देवगन के भतीजे अमन देवगन और रवीना टंडन की बेटी राशा थडानी हैं। दोनों ने अपने करियर की शुरुआत इस फिल्म से की है, और यह कहना गलत नहीं होगा कि दोनों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। अमन देवगन का किरदार एक स्थिर लड़के का है, जो घोड़ों के प्रति अपने लगाव और साहस से कहानी को आगे बढ़ाता है। उनकी मासूमियत और जुनून को बड़े पर्दे पर देखना बेहद सुखद अनुभव है।

राशा थडानी का किरदार एक जमींदार की बेटी का है, जो घोड़ों से बेइंतेहा लगाव रखती है। उनके अभिनय में एक नई ताजगी और आत्मविश्वास है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और डायलॉग डिलीवरी कमाल की है। यह फिल्म राशा के लिए उनके करियर की मजबूत शुरुआत साबित हो सकती है।

पीयूष मिश्रा ने राय बहादुर का किरदार निभाया है, जो अंग्रेजों का समर्थक जमींदार है। उनके किरदार की हर बारीकी को उन्होंने बखूबी निभाया है। वहीं, मोहित मलिक ने निर्दयी और क्रूर बेटे के रूप में दर्शकों को प्रभावित किया। उनकी पत्नी और अजय की प्रेमिका के किरदार में डायना पेंटी भी सीमित जगह होने के बावजूद छाप छोड़ती हैं।

गानों और डांस में दिखी ताजगी

फिल्म का संगीत अमित त्रिवेदी ने तैयार किया है, जो कहानी के मूड को पूरी तरह से बयाँ करता है। ‘उई अम्मा’ गाना आजकल खूब वायरल हो रहा है। इसे मधुबंती बागची ने गाया है, जो संगीत के आगरा घराने से जुड़ी हैं। उनकी आवाज में एक ताजगी और गहराई है, जो इस गाने को खास बनाती है।

फिल्म का एक गाना ‘बिरंगे’ होली पर आधारित है। इसका फिल्मांकन रंगीन और उत्साह से भरा हुआ है। इस गाने के बोल अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे हैं, जो अपनी शानदार लिरिक्स के लिए जाने जाते हैं। उनका काम इस फिल्म में भी कमाल का है। हितेश सोनिक का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को और अच्छा फील देता है, जिसके फिल्म का इमोशनल वैल्यू भी बढ़ता है।

डांस की बात करें तो अजय देवगन ‘कितने बेहतरीन’ डांसर रहे हैं, वो आप भूल जाएँगे। अमन की मेहनत दिखती है, तो राशा खास तौर पर अगली ‘स्टार’ बनने की राह पर दिखती हैं।

अभिषेक कपूर ने दिखाई मास्टरी

अभिषेक कपूर ने इस फिल्म के जरिए यह साबित कर दिया है कि वे अलग-अलग शैलियों की कहानियों को प्रभावी ढंग से पेश करने में माहिर हैं। 1920 का भारत, अंग्रेजों का अत्याचार, और एक घोड़े की अनकही कहानी को एक साथ पेश करना एक बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने पूरी शिद्दत से निभाया है। फिल्म के विजुअल्स बेहद खूबसूरत हैं। 1920 के भारत को पर्दे पर उतारने में प्रोडक्शन डिजाइन टीम ने कोई कसर नहीं छोड़ी। हर सीन में उस दौर की झलक साफ नजर आती है। बाकी फिल्म के प्रोडक्शन, डिस्ट्रीब्यूशन जैसे कामों में उन्होंने ‘स्टार किड्स’ वाला जो फायदा उठाया है, वो सिनेमा को गंभीरता से देखने वाले लोग समझ ही जाएँगे।

ट्रेलर देखें:

क्यों देखें और क्यों न देखें यह फिल्म?

‘आजाद’ एक ऐसी फिल्म है, जो आपको भावनात्मक रूप से जोड़ती है। यह फिल्म केवल एक घोड़े की कहानी नहीं है, बल्कि इंसानी भावनाओं, रिश्तों और स्वतंत्रता के संघर्ष की भी कहानी है।

फिल्म के खूबसूरत विजुअल्स, शानदार अभिनय, और दिल छू लेने वाले संगीत इसे खास बनाते हैं। हाँ, एक्शन फिल्मों के शौकीनों को यह थोड़ा धीमा लग सकता है, लेकिन जो लोग संवेदनशील और कहानी प्रधान फिल्मों को पसंद करते हैं, उनके लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है।

स्टार रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (3.5/5)