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Movie Review Azaad: घोड़े, इंसानी जज़्बात और 1920 के भारत की अनकही कहानी, ‘उई अम्मा’ नहीं बल्कि दमदार है ‘आजाद’

अमूमन हर शुक्रवार को बॉक्स ऑफिस पर फिल्में रिलीज होती हैं, कोई बड़ा त्यौहार या मौका न हो, तो शुक्रवार से ही टिकट खिड़की पर फिल्मों का इम्तिहान होता है। इसी कड़ी में शुक्रवार (17 जनवरी 2025) को ‘आजाद’ नाम की फिल्म भी रिलीज हुई है, जिसके चर्चे आगे सुनने को मिल सकते हैं। हाँ, तो हम बात कर रहे हैं ‘आजाद’ की। डायरेक्टर अभिषेक कपूर की फिल्म का मुख्य पात्र है महाराणा प्रताप के महापराक्रमी घोड़े ‘चेतक’ की तरह का शानदार घोड़ा ‘आजाद’।

अभिषेक कपूर ने ‘रॉक ऑन,’ ‘काई पो छे!’ और ‘केदारनाथ’ जैसी फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिलों में जगह बनाई है। अभिषेक इस बार एक ऐसा विषय लेकर आए हैं, जो भारतीय सिनेमा में कम ही देखा गया है। यह फिल्म एक घोड़े और एक लड़के के बीच की दोस्ती की कहानी है, लेकिन इसके साथ-साथ यह गुलामी और विदेशी हुकूमत के अत्याचारों को भी बखूबी उजागर करती है। अभिषेक कपूर ने दर्शकों को 1920 के उस दौर में ले जाने की पूरी कोशिश की है, जब भारतीय मजदूरों को जबरन गुलामी के लिए विदेशों में भेजा जाता था। यह तथ्य फिल्म में हल्के लेकिन प्रभावी ढंग से सामने आता है।

पुराने समय पर आधारित अनोखी कहानी

फिल्म की कहानी 1920 के भारत में सेट है, जब अंग्रेज भारत पर हुकूमत कर रहे थे। यह वह दौर था जब भारतीय मजदूरों को जबरन गुलाम बनाकर विदेशों में ले जाया जाता था। कहानी इस दर्दनाक सच्चाई को हल्के लेकिन प्रभावी ढंग से पेश करती है।

‘आजाद’ नाम का घोड़ा केवल एक जानवर नहीं है, वह आज़ादी, स्वामिभक्ति और साहस का प्रतीक है। यह फिल्म एक घोड़े और इंसान के रिश्ते की बारीकियों को खूबसूरती से दिखाती है। इसके अलावा, यह फिल्म उन अनकही कहानियों को भी उजागर करती है, जो आजादी की लड़ाई के दौरान भारतीयों के जीवन का हिस्सा थीं।

कहानी का नयापन इस बात में है कि यह केवल देशभक्ति पर आधारित नहीं है, बल्कि इंसानी भावनाओं और रिश्तों की गहराई को भी छूती है। यह फिल्म आमिर खान की ‘लगान’ की याद दिलाती है, लेकिन इसकी कहानी और उसे पर्दे पर पेश करने का तरीका, दोनों ही अलग है।

स्टीरियोटाइप मिटाने वाली एक्टिंग

खास बात ये है कि अजय देवगन को छोड़कर कोई भी एक्टर अपने पुराने स्टीरियोटाइप इमेज में नहीं दिखा है। अजय का वैसा दिखना कहानी की माँग थी, जिसमें वो जंचे भी हैं। बाकी कहानी के मुख्य बिंदुओं को संभालने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है और उन्होंने इसे पूरी शिद्दत से निभाया है। अजय का किरदार एक ऐसा व्यक्ति है, जो न केवल घोड़े ‘आजाद’ को समझता है, बल्कि उसके जरिए अपने जीवन के कई सवालों के जवाब भी ढूंढता है। अजय देवगन के किरदार में गंभीरता और गहराई है, जो हर सीन में नजर आती है।

फिल्म के मुख्य किरदारों में अजय देवगन के भतीजे अमन देवगन और रवीना टंडन की बेटी राशा थडानी हैं। दोनों ने अपने करियर की शुरुआत इस फिल्म से की है, और यह कहना गलत नहीं होगा कि दोनों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। अमन देवगन का किरदार एक स्थिर लड़के का है, जो घोड़ों के प्रति अपने लगाव और साहस से कहानी को आगे बढ़ाता है। उनकी मासूमियत और जुनून को बड़े पर्दे पर देखना बेहद सुखद अनुभव है।

राशा थडानी का किरदार एक जमींदार की बेटी का है, जो घोड़ों से बेइंतेहा लगाव रखती है। उनके अभिनय में एक नई ताजगी और आत्मविश्वास है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और डायलॉग डिलीवरी कमाल की है। यह फिल्म राशा के लिए उनके करियर की मजबूत शुरुआत साबित हो सकती है।

पीयूष मिश्रा ने राय बहादुर का किरदार निभाया है, जो अंग्रेजों का समर्थक जमींदार है। उनके किरदार की हर बारीकी को उन्होंने बखूबी निभाया है। वहीं, मोहित मलिक ने निर्दयी और क्रूर बेटे के रूप में दर्शकों को प्रभावित किया। उनकी पत्नी और अजय की प्रेमिका के किरदार में डायना पेंटी भी सीमित जगह होने के बावजूद छाप छोड़ती हैं।

गानों और डांस में दिखी ताजगी

फिल्म का संगीत अमित त्रिवेदी ने तैयार किया है, जो कहानी के मूड को पूरी तरह से बयाँ करता है। ‘उई अम्मा’ गाना आजकल खूब वायरल हो रहा है। इसे मधुबंती बागची ने गाया है, जो संगीत के आगरा घराने से जुड़ी हैं। उनकी आवाज में एक ताजगी और गहराई है, जो इस गाने को खास बनाती है।

फिल्म का एक गाना ‘बिरंगे’ होली पर आधारित है। इसका फिल्मांकन रंगीन और उत्साह से भरा हुआ है। इस गाने के बोल अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे हैं, जो अपनी शानदार लिरिक्स के लिए जाने जाते हैं। उनका काम इस फिल्म में भी कमाल का है। हितेश सोनिक का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को और अच्छा फील देता है, जिसके फिल्म का इमोशनल वैल्यू भी बढ़ता है।

डांस की बात करें तो अजय देवगन ‘कितने बेहतरीन’ डांसर रहे हैं, वो आप भूल जाएँगे। अमन की मेहनत दिखती है, तो राशा खास तौर पर अगली ‘स्टार’ बनने की राह पर दिखती हैं।

अभिषेक कपूर ने दिखाई मास्टरी

अभिषेक कपूर ने इस फिल्म के जरिए यह साबित कर दिया है कि वे अलग-अलग शैलियों की कहानियों को प्रभावी ढंग से पेश करने में माहिर हैं। 1920 का भारत, अंग्रेजों का अत्याचार, और एक घोड़े की अनकही कहानी को एक साथ पेश करना एक बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने पूरी शिद्दत से निभाया है। फिल्म के विजुअल्स बेहद खूबसूरत हैं। 1920 के भारत को पर्दे पर उतारने में प्रोडक्शन डिजाइन टीम ने कोई कसर नहीं छोड़ी। हर सीन में उस दौर की झलक साफ नजर आती है। बाकी फिल्म के प्रोडक्शन, डिस्ट्रीब्यूशन जैसे कामों में उन्होंने ‘स्टार किड्स’ वाला जो फायदा उठाया है, वो सिनेमा को गंभीरता से देखने वाले लोग समझ ही जाएँगे।

ट्रेलर देखें:

क्यों देखें और क्यों न देखें यह फिल्म?

‘आजाद’ एक ऐसी फिल्म है, जो आपको भावनात्मक रूप से जोड़ती है। यह फिल्म केवल एक घोड़े की कहानी नहीं है, बल्कि इंसानी भावनाओं, रिश्तों और स्वतंत्रता के संघर्ष की भी कहानी है।

फिल्म के खूबसूरत विजुअल्स, शानदार अभिनय, और दिल छू लेने वाले संगीत इसे खास बनाते हैं। हाँ, एक्शन फिल्मों के शौकीनों को यह थोड़ा धीमा लग सकता है, लेकिन जो लोग संवेदनशील और कहानी प्रधान फिल्मों को पसंद करते हैं, उनके लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है।

स्टार रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (3.5/5)

कश्मीर से भाग कर बरेली आए हरबंस लाल, लेकिन यहाँ भी सगीर और इमरान ने पीट-पीट कर मार डाला: मांस पकाने को लेकर करते थे विवाद, हत्या का मामला दर्ज

उत्तर प्रदेश के बरेली में मुस्लिम परिवार ने अपने पड़ोसी हिन्दू बुजुर्ग की हत्या कर दी। मृतक का परिवार कश्मीर में हिन्दुओं के उत्पीड़न के बाद भाग कर बरेली आया था। बुजुर्ग को मांस की गंध नहीं पसंद थी, इसलिए वह अपने घर पर फाइबर की शीट लगवा रहे थे।

इसी को लेकर मुस्लिमों ने विवाद कर दिया और हिन्दू बुजुर्ग के साथ मारपीट की। उन्होंने बुजुर्ग को धक्का दिया, जिसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई और अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मामले में पुलिस ने हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया है। मुस्लिम परिवार अब फरार है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना बुधवार (15 जनवरी, 2025) को हुई। बरेली की नीलकंठ कॉलोनी में रहने वाले 79 वर्षीय हरबंस लाल शाम को अपने घर की दीवाल पर फाइबर शीट लगवा रहे थे। उनके बगल में ही सगीर अहमद का घर है। फाइबर शीट को लेकर सगीर अहमद बवाल करने लगा।

उसकी बीवी भी आकर हरबंस लाल से विवाद करने लगी। दोनों ने बुजुर्ग हरबंस लाल से मारपीट करना चालू कर दिया, उनको धक्का दिया। इसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई और अस्पताल में ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

हरबंस लाल के परिवार ने इसके बाद पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने इस मामले में पहले गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज किया। हालाँकि, यह मामला शांत नहीं हुआ। इस मामले की जानकारी हिन्दू संगठनों को दी गई। गुरुवार को हरबंस लाल के शव को रख कर हिन्दू संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया।

मृतक हरबंस के बेटे हेमंत लाल ने बताया कि उनका परिवार कश्मीरी विस्थापित है। वह कश्मीर में उत्पीड़न से बचने के लिए भागे थे। हेमंत लाल ने आरोप लगाया कि सगीर उनके परिवार को लगातार परेशान करता था।

हेमंत लाल ने आरोप लगाया कि सगीर के घर में रोज मांस पकता था, इससे उनके पिता को दिक्कत थी। हेमंत ने आरोप लगाया कि मना करने पर भी सगीर नहीं माना तो हेमंत के पिता ने फाइबर शीट लगवाने का फैसला किया लेकिन इस बात पर भी सगीर ने उनकी पीट-पीट कर हत्या कर दी।

उन्होंने बताया कि पूरी कॉलोनी में 32 घर हिन्दू जबकि केवल सगीर का घर मुस्लिम है। बाकी कोई परिवार विवाद नहीं करता, सगीर अहमद लगातार बवाल काटता रहता था। उसने बुधवार को आखिर में हत्या ही कर दी।

हरबंस लाल का पोस्टमार्टम करवा के रिपोर्ट मँगवा ली गई है। मामले में पुलिस ने गैर इरादतन हत्या की धाराएँ हटा कर हत्या की FIR दर्ज की है। मामले में सगीर और उसके बेटे इमरान को आरोपित बनाया गया है। पुलिस ने घटनास्थल की CCTV फुटेज भी कब्जे में ले ली है।

SSP बरेली मानुष पारीक ने कहा है कि CCTV की जाँच करके आगे कार्रवाई की जाएगी। वहीं सगीर ने मारपीट की बात से इनकार किया है। मामले में पुलिस के कार्रवाई चालू करने के बाद सगीर का पूरा परिवार घर बंद करके गायब हो गया है।

पंजाब में 2 साल में 3.5 लाख बने ईसाई, तरनतारन में 102% बढ़ गई क्रॉस वाली आबादी: जानिए कैसे ‘चमत्कार-प्रलोभन’ से पादरी कर रहे पगड़ी वालों का धर्मांतरण

पंजाब में सिखों का ईसाई धर्मांतरण बहुत समय से बड़ी चिंता का विषय रहा है। पिछले कुछ समय से ऐसी कई खबरें सामने आईं जिससे पता चला कि राज्य में ईसाई मिशनरियों की शक्तियाँ बढ़ रही हैं। कई बार इसे लेकर कई सिख संगठनों ने चिंता भी जाहिर की, लेकिन फिर भी न कॉन्ग्रेस सरकार ने, न AAP सरकार ने इस मुद्दे पर गौर किया। अब ताजा खबर इस मामले पर दैनिक जागरण ने प्रकाशित की है।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। ये बताती है कि पंजाब में केवल 2 वर्षों में ही 3 लाख 50 हजार अधिक लोग अपना धर्म बदलकर ईसाई बन चुके हैं। खबर के अनुसार, पंजाब में केवल साल 2023-24 में ही 1.5 लाख लोग धर्मांतरित हुए जबकि साल के 2024-25 के अंत तक दो लाख लोगों ने अपना धर्म बदल लिया।

हैरानी और भी ज्यादा तब बढ़ती है जब धर्मांतरित लोगों की बढ़ती संख्या राज्यों के हिसाब से देखा जाए। जैसा तरनतारन को लेकर रिपोर्ट बताती है कि पिछले 10 सालों में यहाँ में ईसाई समुदाय की जनसंख्या 6,137 से बढ़कर 12,436 हो गई यानी दस वर्षों में 102 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसी तरह गुरदासपुर जिले की बात करें तो पिछले 5 वर्षों में इस समुदाय की जनसंख्या में 4 लाख से अधिक की वृद्धि हुई है।

पंजाब में ईसाई पादरी कैसे बनाते हैं सिखों को निशाना

वैसे तो ईसाई मिशनरियाँ देश भर के सुदूर इलाकों में पहुँचकर गरीब और लाचार लोगों को अपने निशाने पर ले रही हैं लेकिन पंजाब और भी चिंता का कारण इसलिए है क्योंकि यहाँ उनके द्वारा धर्मांतरण का खेल खुलेआम चल रहा है। यहाँ खुलेआम चंगाई सभा होती हैं। ऐसे-ऐसे पादरियों के कार्यक्रम कराए जाते हैं जो फूँक मारकर मृत व्यक्ति में जान डालने का दावा करते हैं। इसके बाद भ्रम पैदा करके सिखों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए कहा जाता है।

एक पुरानी रिपोर्ट बताती है कि इन मिशनरियों का प्रभाव पटियाला से लेकर पठानकोट तक फैला है। ईसाईी मिशनरियों ने राज्य के 23 जिलों को अपने जाल में जकड़ा है और अपने सम्राज्य को लगातार फैलाते जा रहे हैं। सिखों के बीच पैठ बनाने के लिए उन सभाओं में पगड़ी पहने लोग दिखते हैं जिससे आम सिखों को लगे कि वो सभा कराने वाले कोई अलग नहीं हैं।

ये सभी ईसाई पादरी गैर-ईसाई जनता को धर्मांतरण के जाल में फँसाने के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित करते हैं। प्रशासन बकायदा इन्हें इसके लिए अनमुति देता है। इन्हें सुरक्षा मिलती है। बैनर, पम्पलेट, सोशल मीडिया कैंपेन के जरिए इनका प्रचार होता है और आखिर में कार्यक्रम वाली जगह पर हजारों की भीड़ जुटती है। इस भीड़ को रिझाने के लिए कार्यक्रम में बैंड वाले होते हैं जो पादरी की हर बात के बाद उसे प्रभावी दिखाने के लिए बैंड बजाते हैं। लय में ऐसे गाने गाए जाते हैं कि भीड़ ईसाई धर्म के गीतों पर नाचने लग जाए।

इसी तरह के सारे खेल के बाद भीड़ से किसी को निकालकर दावा किया जाता है कि वो पादरी न केवल बड़ी से बड़ी बीमारी ठीक कर सकता है बल्कि भूतों को भगा सकता है। पादरियों के इन्हीं लुभावने वादों के कारण कुछ लोग कार्यक्रम में तो कुछ कार्यक्रम के बाद ईसाई धर्म में परिवर्तित हो जाते हैं।

जानकारी अचंभा होगा कि पंजाब में धर्मांतरण के व्यापार में शामिल ईसाई पादरियों में अधिकांश धर्मांतरण के बाद ईसाई बने पादरी हैं। हालाँकि, न तो इन लोगों ने नाम बदला है और न पहचान। सिख पादरी आज भी पगड़ी लगाते हैं और हाथ में बाइबल का संदेश देते घूमते हैं। उनकी ऐसी हरकतों का नतीजा ये होता है कि आम सिख भी उनकी सभा में उन्हें अपना समझकर पहुँचता है।

SGPC का अभियान

4 साल पहले शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए चिंता दिखाई थी और सिखों को धर्मांतरण से बचाने के लिए ‘घर-घर अंदर धर्मसाल’ अभियान आरंभ किया था। इनका उद्देश्य था कि ईसाई प्रचारक जिस प्रक्रिया द्वारा सिखों को बरगला रहे हैं, अब उसी का इस्तेमाल सिख धर्म को बचाने के लिए किया जाएगा। SGPC का मानना था कि कुछ पादरी जानबूझकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं और उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की कोशिश कर रहे हैं।

पंजाब में धर्मांतरण के लिए विदेशी फंडिंग

ये बात मालूम रहे कि पंजाब में चल रहे इतनी बड़ी साजिश के खिलाफ अक्सर विदेशी फंडिंग की बातें सामने आती रही हैं। इस बार भी दैनिक जागरण की रिपोर्ट में सिख स्कॉलर डॉ रणबीर सिंह के हवाले से बताया गया पंजाब में चल रहे धर्मांतरण के खेल के लिए अमेरिका, पाकिस्तान व अन्य मुल्कों से फंडिंग हो रही है।

पंजाब में ईसाई पादरियों का प्रभाव

आज पंजाब में सबसे अधिक चर्चित पादरी बजिंदर सिंह प्रोफेट बजिंदर सिंह है, जो खुद को ईसा मसीह का प्रोफेट बताता है। इसके यूट्यूब पर 30 लाख से अधिक फॉलोवर्स हैं और वीडियो पर लाखों में व्यूज भी आते हैं। हाल में इसी पादरी के आगे गिरते हुए बॉलीवुड अभिनेता राजपाल सिंह को देखा गया था।

पैस्टर बजिंदर सिंह के अलावा पंजाब में जो पादरी सक्रिय होकर धर्मांतरण को बढ़ावा दे रहे हैं उनमें अमृत संधू, कंचन मित्तल, रमन हंस, गुरनाम सिंह खेड़ा, हरजीत सिंह, सुखपाल राणा, फारिस मसीह कुछ बड़े नाम हैं। ये लोग जनता के बीच अपनी पैठ सोशल मीडिया के जरिए बनाते हैं। इनके अनुयायियों में हर वर्ग के लोग हैं। सवाल उठने पर ये दावा करते हैं कि ये लोग सिर्फ प्रार्थना कराते हैं, लेकिन सवाल फिर वही है कि अगर चंगाई सभाओं और मिशनरी के अन्य कार्यक्रमों में सिर्फ प्रार्थना होती है तो लोग धर्मांतरित कैसे होते हैं।

विवादित ढाँचों को बचाने सुप्रीम कोर्ट पहुँची कॉन्ग्रेस, वर्शिप एक्ट का किया समर्थन: 1991 में बनाया था कानून ताकि हिन्दू वापस न ले सके अपने देवस्थल

मुग़ल और इस्लामी शासन के दौरान कब्जाए गए मंदिरों को वापस लेने से रोकने वाले कानून प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट (POWA) के बचाव में कॉन्ग्रेस पार्टी उतर आई है। उसने सुप्रीम कोर्ट में इस कानून के समर्थन में एक याचिका दायर की है। कॉन्ग्रेस सुप्रीम कोर्ट में इस कानून की वैधता पर चल रही सुनवाई में पक्ष बनने के लिए पहुँची है। कॉन्ग्रेस ने कहा है कि यह कानून देश में सेक्युलरिज्म बचाने के लिए जरूरी है। उसने कहा है कि यदि कानून में कोई बदलाव हुआ तो इससे देश का सेक्युलरिज्म खतरे में आ जाएगा।

कॉन्ग्रेस ने क्या कहा?

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में कॉन्ग्रेस ने अपने वकीलों के माध्यम से दायर की है। याचिका में कॉन्ग्रेस ने कहा, “आवेदक प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट के संवैधानिक और सामाजिक महत्व पर जोर देने के लिए इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहती है क्योंकि उसे आशंका है कि इसमें कोई भी बदलाव भारत के मजहबी एकता और सेक्युलरिज्म को खतरे में डाल सकता है और इससे राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता को खतरा हो सकता है।”

कॉन्ग्रेस ने आगे कहा कि वह सेक्युलरिज्म को बचाए रखना चाहती है और जब कानून बना था तो लोकसभा में जनता पार्टी के साथ वह बहुमत में थी। कॉन्ग्रेस ने कहा क्योंकि कानून बनाने के लिए वह अपने सांसदों के माध्यम से जिम्मेदार थी, ऐसे में उसे सुप्रीम कोर्ट के भीतर इसका बचाव करने के लिए मौक़ा दिया जाए। कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि इस कानून के विरोध में डाली गई याचिकाओं में गलत दावे किए गए हैं। कॉन्ग्रेस ने यह भी दावा किया कि इससे हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों के साथ कोई भेदभाव नहीं होता।

कॉन्ग्रेस ने याचिका में कहा, “याचिका में यह भी गलत कहा गया है कि प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप पक्षपाती है क्योंकि यह केवल हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध समुदायों के सदस्यों के लिए लागू है। प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट को देखने से ही पता लगता है कि यह सभी धर्मों के बीच समानता को बढ़ावा देता है और याचिका में बताए गए धर्म के लोगों से अलग व्यवहार नहीं करती है। यह सभी धर्मों के पूजा स्थलों के लिए समान रूप से लागू है और 15 अगस्त, 1947 के अनुसार उनकी स्थिति का पता लगाता है और उसे स्थापित करता है।”

सुप्रीम कोर्ट में क्या लड़ाई चल रही?

इस कानून को हिन्दुओं की तरफ से सुब्रमण्यम स्वामी, अश्विनी उपाध्याय और बाकी संगठनों ने चुनौती दी है। वहीं मुस्लिमों की तरफ से आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत ने याचिका दायर की है। इस मामले में नई याचिका ज्ञानवापी मस्जिद कमिटी ने दायर की है। उसका कहना है कि वह भी प्रभावित है।

मुस्लिम चाहते हैं कि इस कानून के खिलाफ दायर की गई याचिकाएँ खारिज कर दी जाएँ और कानून को पूरी तरह से लागू किया जाए। उनका कहना है कि कानून के तहत अब किसी भी मुस्लिम मजहबी स्थल पर दावा नहीं किया जाना चाहिए।

वहीं हिन्दू पक्ष ने कहा है कि इस कानून के जरिए उन सभी धार्मिक स्थलों को कानूनी मान्यता दे दी गई जिनका स्वरुप 1947 से पहले बदल दिया गया था। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि इस कानून की धारा 2,3 और 4 को रद्द कर दिया जाए। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि कानून के चलते उन धार्मिक स्थलों को भी वह वापस नहीं ले सकते, जिनको आक्रांताओं ने तोड़ा था।

हिन्दू पक्ष ने इस कानून को संसद में पास किए जाने का भी विरोध किया है। हिन्दू पक्ष का कहना है कि यह ऐसा कानून है जो लोगों को न्यायालय के दरवाजे खटखटाने से रोकता है ऐसे में यह असंवैधानिक है। हिन्दू पक्ष ने इसके अलावा कानून की संवैधानिकता पर भी प्रश्न उठाए हैं।

इस मामले में को लेकर 12 दिसम्बर, 2024 को सुनवाई की थी। इसकी सुनवाई CJI संजीव खन्ना की बेंच ने की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में आदेश दिया था कि अब देश की अदालतों में कोई भी ऐसी याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी, जिसमें किसी मजहबी स्थल की स्थिति को लेकर चुनौती दी गई हो। सुप्रीम कोर्ट ने प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट मामले में केंद्र सरकार से एक हलफनामा दायर करने को कहा था।

क्या है 1991 का प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट?

पूजास्थल अधिनियम, 1991 या फिर प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट, 1991 पीवी नरसिम्हा राव की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकार 1991 में लेकर आई थी। इस कानून के जरिए किसी भी धार्मिक स्थल की प्रकृति यानी वह मस्जिद है मंदिर या फिर चर्च-गुरुद्वारा, यह निर्धारित करने को लेकर नियम बनाए गए हैं।

इस कानून के अनुसार, देश के आजाद होने के दिन यानी 15 अगस्त, 1947 को जिस धार्मिक स्थल की स्थिति जैसी थी, वैसी ही रहेगी। यानि इस दिन यदि कोई स्थान मस्जिद था तो वह मस्जिद रहेगा। कानून में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल का स्वरुप बदलने की कोशिश करेगा तो उसकी 3 वर्ष तक का कारावास हो सकता है।

इसी कानून में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति यदि किसी धार्मिक स्थल के स्वरुप के बदलने को लेकर याचिका कोर्ट में लगाएगा तो वह भी नहीं मानी जाएगी। यानि कोई भी व्यक्ति किसी मस्जिद के मंदिर होने का दावा नहीं कर सकता या फिर किसी मंदिर के मस्जिद होने का दावा नहीं किया जा सकता।

कानून में यह भी स्पष्ट तौर पर कहा है कि यदि यह स्पष्ट तौर पर साबित हो जाए कि इतिहास में किसी धार्मिक स्थल की प्रकृति में बदलाव किए गए थे तो भी उसका स्वरुप नहीं बदला जाएगा। यानी यह सिद्ध भी हो जाए कि किसी मंदिर को इतिहास में तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी तो भी उसे अब दोबारा मंदिर में नहीं बदला जा सकता।

कुल मिलाकर यह कानून कहता है कि 1947 के पहले जिस भी धार्मिक स्थल में जो कुछ बदलाव हो गए या फिर उस दिन जैसे थे, वह वैसे ही रहेंगे। उनके ऊपर अब कोई दावा नहीं किया जा सकेगा। इसी कानून में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को छूट दी गई थी।

इस कानून में कई छूट भी दी गई हैं। यह कानून कहता है कि यदि किसी धार्मिक स्थल में बदलाव 15 अगस्त, 1947 के बाद हुए हैं तो ऐसे में कानूनी लड़ाई हो सकती है। इसके अलावा ASI द्वारा संरक्षित स्मारकों को लेकर भी इसमें छूट दी गई है।

गाँव में कई लोगों को हुआ बुखार, कहा जादू-टोना किया है… 3 लोगों को पीट-पीटकर मार डाला: ओडिशा हाई कोर्ट ने 9 दोषियों की मौत की सजा उम्रकैद में बदली

ओडिशा हाई कोर्ट ने 9 लोगों को दी गई फाँसी की सजा खत्म कर दी है। यह सजा उन्हें एक परिवार के तीन लोगों की हत्या करने के चलते निचली अदालत ने दी थी। हाई कोर्ट ने कहा कि मौत की सजा देना ठीक नहीं होगा और दूसरी सजाओं से भी इन दोषियों का पुनर्वास हो सकता है।

ओडिशा हाई कोर्ट ने यह फैसला बुधवार (15 जनवरी, 2025) को दिया है। हाई कोर्ट ने कहा, “हमारा विचार है, यह नहीं कहा जा सकता कि कम सजा के विकल्प को बंद करने और मौत की सजा को अनिवार्य करने के अलावा अपीलकर्ताओं के सुधार और पुनर्वास की कोई संभावना नहीं है। या दूसरे शब्दों में कहना ठीक नहीं है कि आजीवन कारावास से न्याय नहीं मिल पाएगा।”

हाई कोर्ट ने कहा कि फांसी की सजा अनुचित होगी और आजीवन कारावास ज्यादा सही रहेगी। हाई कोर्ट ने इसी के साथ इन सभी 9 दोषियों को मौत की सजा खत्म करके उसे आजीवन कारावास में बदल दिया। हालाँकि, आगे वह माफी पाने के अधिकारी रहेंगे।

हाई कोर्ट ने यह फैसला 2016 के एक मामले में सुनाया है। यह घटना सितम्बर, 2016 में ओडिशा के रायगडा में हुई थी। यहाँ एक महिला मेलिता साबर ने आरोप लगाया था कि उसी के गाँव के रहने वाले उसी के समाज के 9 लोगों ने उसके माता-पिता और बहन को एक गौशाला में बाँध दिया।

इन लोगों ने तीनों पर आरोप लगाया कि वह जादू टोना कर रहे हैं जिसके चलते गाँव में दो लोगों की मौत हो गई जबकि कई लोग बुखार से पीड़ित हैं। इन तीनों को इसके बाद बेरहमी से पीटा गया। इनसे जादू टोने की बात स्वीकारने को कहा गया। इसके बाद इन्हें बेरहमी से पीटा गया और इन्हें दूसरी जगह मरणासन्न अवस्था में ले जाया गया।

इसके बाद इन तीनों की हत्या कर दी गई और शव दफना दिया गया। पीड़िता को भी धमकाया गया। इसके कुछ दिनों के बाद तीनों मृतकों को जला भी दिया गया। निचली अदालत ने इस मामले में यह आरोप सही पाए और सभी को मौत की सजा सुनाई और इसे हाई कोर्ट के पास भेजा। इस फैसले के खिलाफ दोषी हाई कोर्ट पहुँचे।

हाई कोर्ट ने इसके बाद सुनवाई करते हुए पाया कि निचली अदालत ने दोषियों को पर्याप्त समय नहीं दिया और फांसी की सजा इस मामले में उपयुक्त नहीं है।

मेरा नाम अजीत झा है, शहजाद पूनावाला ने मुझे नहीं कहा ‘Jha2’; आपको कहा तो AAP के ऋतुराज का पकड़िए गला

दिल्ली में सड़कों की हालत खस्ता है। पीने का पानी लोगों को नहीं मिल रहा है। बिजली का संकट अलग है। कुल मिलाकर दिल्ली विधानसभा का चुनाव BSP (बिजली+सड़क+पानी) के मुद्दे पर भी लड़ा जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य से यह आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित है। अब लड़ाई मैथिल ब्राह्मणों को ‘झा2’ कहने पर सीमित हो गई है। ऐसा करने का आरोप बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला पर है।

पूरा विवाद ‘रिपब्लिक भारत’ नाम के टीवी चैनल पर हुई एक चर्चा के बाद खड़ा हुआ है। इस चर्चा में पूनावाला के अलावा किराड़ी से आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक ऋतुराज भी शामिल थे। ऋतुराज को पार्टी ने इस बार टिकट नहीं दिया है। उनकी जगह चुनाव से ठीक पहले बीजेपी से आए अनिल झा को उम्मीदवार बनाया गया है।

इस चर्चा के दौरान ऋतुराज ने पहले पूनावाला के सरनेम को बिगाड़ते हुए उन्हें ‘चूनावाला’ कहा। जवाब में शहजाद ने कहा कि ऐसी बातें मैं भी कर सकता हूँ। मैं भी कह सकता हूँ कि संजय झा ‘Jha1’ और ऋतुराज झा ‘Jha2’। मैं भी बोल सकता हूँ कि Jha2 हो आप। पर मैं ऐसी बातें नहीं करता।

स्पष्ट है कि शहजाद पूनावाला ने मैथिल ब्राह्मणों या झा सरनेम वाले समाज को लक्षित कर कोई टिप्पणी नहीं की। उन्होंने ऋतुराज के ‘चूनावाला’ का प्रत्युत्तर ‘Jha2’ से दिया। ऐसा भी नहीं है कि ‘Jha2’ शब्द पहली बार सुनने को मिला है। यदि आप सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, आपका सरनेम ‘झा’ है तो आए दिन आपको कोई न कोई ‘Jha2’ कह कर चला जाता है। मैं खुद इसका पीड़ित हूँ। ऐसी टिप्पणी करने वाला व्यक्ति या तो आपसे घृणा कर रहा होता है या फिर उसे सार्वजनिक मंचों पर किसी विचार से असहमत होने पर खीझ मिटाने के लिए शब्द नहीं मिल रहे होते। पीड़ित होते हुए भी मुझे नहीं लगता है कि इस तरह की टिप्पणी करने वाले व्यक्ति की घृणा उस पूरे समाज के प्रति होती है जिससे मैं आता हूँ।

यदि इस टिप्पणी को उस व्यक्ति की एक पूरे समाज से घृणा मान ली जाए तो फिर AAP के ऋतुराज पहले दलित मुस्लिमों से घृणा के अपराधी हैं। बावजूद आम आदमी पार्टी ने ‘Jha2’ शब्द को चुनावी मुद्दा बनाया। सोशल मीडिया में कुछ सेकेंड के ऐसे क्लिप सर्कुलेट करवाए जिसमें शहजाद पूनावाला का ‘Jha2’ तो सुनाई पड़ता है, लेकिन उससे पहले क्या हुआ इसका पता नहीं चलता। जाहिर है कि AAP चाहती थी कि ऐसा नैरेटिव बने जिससे मैथिल ब्राह्मणों को लगे कि बीजेपी का नेता उन्हें गाली दे रहा है।

इस नैरेटिव को AAP समर्थकों के अलावा उन लोगों ने भी आगे बढ़ाया जो दिल्ली विधानसभा चुनाव में मैथिल ब्राह्मणों की कथित उपेक्षा करने से बीजेपी से नाराज हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जो बीजेपी समर्थक रहे हैं। लेकिन इस उपेक्षा का जवाब एक फर्जी नैरेटिव का शिकार बनकर उसे आगे बढ़ाना नहीं है।

यह बात सही है कि बीजेपी जैसी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता को किसी भी स्थिति में ऐसे शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए था। लेकिन जब राजनीति में संयम, मर्यादा और नैतिकता गौण हो चुका है, अरविंद केजरीवाल जैसे धूर्त की पार्टी का नुमाइंदा आपके सरनेम का मजाक बनाता है, तो संयम, नैतिकता और मर्यादा का बोझ केवल बीजेपी पर ही नहीं डाला जा सकता है।

इन सबके बावजूद झा उपनाम धारी मैथिल होने के कारण आपको लगता है कि गाली दी गई है तो कायदे से आपको ऋतुराज का गला पकड़ना चाहिए जिसने ऐसी स्थिति पैदा की। यदि ऐसा किए बिना हम केवल शहजाद पूनावाला का ही गला पकड़ते हैं तो यह वैसा ही टिपिकल मैथिल स्टाइल है जिसमें हम अपने बाल-बच्चों के अपराध/बदतमीजी पर तो पर्दा डालते हैं, लेकिन दियाद के बाल-बच्चों की सामान्य सी भी भूल को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं और निंदा रस से आह्लादित होते हैं।

वैसे भी ऋतुराज या AAP मिथिला/मैथिल/मैथिल ब्राह्मण का प्रतिनिधि नहीं हो सकती। इसका प्रतिनिधित्व वह बीजेपी ही कर सकती है जिसने संविधान की अष्टम अनुसूची में मैथिली को जगह दी है। जिसके शासनकाल में संविधान मैथिली में जारी हुई है। जिस पार्टी के शासनकाल में दो भागों में विभक्त मिथिला को जोड़ने वाला पुल शुरू हुआ। मैथिल समाज और बीजेपी के बीच के इस पुल को तोड़कर AAP आपको और बदहाली में धकेलना चाहती है।

छात्रा पढ़ने जाती थी सेंट जेवियर्स स्कूल, वाइस प्रिंसिपल फादर कमलेश करता था रेप: यौन शोषण के लिए देता था स्कूल से निकालने की धमकी, हुआ गिरफ्तार

गुजरात के भरूच स्थित सेंट जेवियर्स स्कूल के उप-प्राचार्य पादरी कमलेश रावल को एक नाबालिग छात्रा के यौन शोषण के मामले में गिरफ्तार किया है। छात्रा फिलहाल 12वीं पास करके कॉलेज में पढ़ती है। जिस समय घटना हुई थी, उस समय वह इस स्कूल में पढ़ती थी। स्कूल छोड़ने के बाद पीड़िता के परिजनों ने थाने में जाकर शिकायत दी। इसके बाद POCSO सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज हुआ है।

लड़की के माता-पिता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में यौन शोषण की अलग-अलग घटनाओं का जिक्र किया गया है। शिकायत में कहा गया है कि साल 2022 और साल 2024 के बीच दो अलग-अलग मौकों पर उनकी बेटी का शोषण हुआ। शिकायत के अनुसार, पादरी कमलेश ने दोनों मौकों पर तब 10वीं कक्षा की छात्रा रही पीड़िता को अपने कार्यालय में बुलाकर उसका यौन शोषण किया था।

नाबालिग छात्रा का आरोप है कि आरोपित ने उसे अपने कक्ष में बुलाया और उसके साथ छेड़छाड़ की। उसने यह भी धमकी दी कि यह बात अगर किसी तो बताई वह छात्रा को स्कूल से निकाल देगा। इससे पीड़िता को स्कूल से निकाले जाने और बदनामी का भी डर सताने लगा। इस कारण वह चुप रही थी। पीड़िता के साथ दूसरी घटना दिसंबर 2024 में हुई।

आरोप है कि इस क्रिश्चियन स्कूल में पुराने विद्यार्थियों को स्कूल के एक कार्यक्रम में बुलाया गया था। कार्यक्रम के बाद उसके साथ दोबारा बलात्कार किया गया और किसी को नहीं बताने की धमकी भी दी गई थी। पीड़िता का यह भी आरोप है कि पादरी कमलेश ने उसे बार-बार ह्वाट्सऐप मैसेज करके उससे फिर से शारीरिक संबंध बनाने की माँग की। इससे पीड़िता तंग आ गई।

आखिरकार पीड़िता ने इस बारे में अपने परिजनों को पूरी बता बता दी। परिजनों ने इसकी शिकायत पुलिस थाने में की। शिकायत के आधार पर भरूच बी डिवीजन पुलिस ने आरोपित पादरी के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) की धारा 6, 10 और 12 के साथ-साथ IPC की धारा 376, 376(2)(एन) और 376(3) के तहत मामला दर्ज कर लिया।

मामला सामने आने के बाद स्कूल ने आरोपित का तबादला दूसरे स्कूल में कर दिया। वहाँ से उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस आरोपित के फोन की भी जाँच कर रही है कि कहीं किसी और छात्रा के साथ ऐसी घटना तो नहीं हुई। आरोपित को 15 जनवरी किया गया है। इस मामले में चार दिन पहले शिकायत दर्ज कराई गई थी।

जिन्होंने महाकुंभ को बताया ‘अंधविश्वास’, उन पर फूटा नागा साधुओं का गुस्सा: तोड़-फोड़ की वीडियो सामने आई, लोग कह रहे – और कूटो

प्रयागराज में पहुँचकर महाकुंभ को अंधविश्वास बताने वाले लोगों पर नागा बाबाओं का जबरदस्त गुस्सा फूटा। सामने आई वीडियो में देख सकते हैं कि महाकुंभ में कैसे कुछ लोग हाथ में पोस्टर लेकर महाकुंभ को बदनाम करने की कोशिश कर रहे थे।

पोस्टर का स्क्रीनशॉट

पोस्टर में देख सकते हैं लिखा था- “अंधविश्वास का मेला है कुंभ एक बहाना। मुक्ति चाहिए तो समझ को जगाना।”

ये लोग माइक से भी ऐसी ही बातें अनाउंस कर रहे थे जिसकी आवाज नागा बाबाओं के कान में पड़ी। ये सुनने के बाद नागा बाबा वहाँ इकट्ठा हो गए और पोस्टर पर लिखी बातें देखकर सब भड़क गए। इसके बाद वहाँ पूरे सेट-अप को तोड़-फोड़ डाला गया।

कुछ लोगों ने इसी बीच प्रोपगेंडा फैलाने वालों का सारे सामान को इकट्ठा किया और आग लगाने को कहने लगे। मगर, नागा बाबाओं ने उस पोस्टर को संभाले रखा जिसमें महाकुंभ को ‘अंधविश्वास’ कहा जा रहा था। वीडियो बनाने वालों में से कोई बोला कि इस पोस्टर को ‘योगी बाबा’ को दिखाएँगे

अब लोग इसी वीडियो को शेयर करते हुए सवाल उठा रहे हैं कि ये महाकुंभ में घुसे लोग कौन सी मानसिकता के हैं जिन्हें हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए और प्रोपगेंडा फैलाने के लिए महाकुंभ में ही आने की जरूरत पड़ रही है। वहीं सोशल मीडिया पर नागा बाबाओं की तारीफ हो रही है। कहा जा रहा है कि किसी को अधिकार नहीं कि वो हिंदुओं की आस्था के केंद्र महाकुंभ पहुँचकर इस तरह की बात करें। लोगों का कहना है कि साधुओं ने ऐसे लोगों की धुनाई करके सही किया।

सैफ अली खान की घायल नौकरानी, 3 कर्मचारी और हमलावर की पहचान: सर्जरी के बाद अभिनेता के शरीर से निकाला गया 3 इंच लंबा ऑब्जेक्ट

बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान को बुधवार-गुरुवार (15-16 जनवरी 2025) की रात एक अज्ञात शख्स ने मुंबई के बांद्रा स्थित उनके घर में घुसकर चाकू मार दिया। उन्हें 6 घाव लगे हैं, जिनमें से दो गहरे जख्म हैं। उनकी रीढ़ की हड्डी के पास से लगभग 3 इंच का एक ऑब्जेक्ट निकाला गया है। बताया जा रहा है कि यह ऑब्जेक्ट चाकू का टुकड़ा है। उनकी हालत खतरे से बाहर है।

लीलावती अस्पताल के सीओओ डॉक्टर नीरज उत्तमानी ने बताया कि सैफ अली खान को बांद्रा स्थित उनके घर से सुबह 3:30 बजे अस्पताल लाया गया। डॉक्टर उत्तमानी ने बताया कि न्यूरोसर्जन डॉक्टर नितिन डांगे, कॉस्मेटिक सर्जन डॉक्टर लीना जैन और एनेस्थिसियोलॉजिस्ट डॉक्टर निशा गाँधी के नेतृत्व में डॉक्टरों की एक टीम उनका ऑपरेशन किया। उनकी न्यूरो सर्जरी सफल रही है।

पुलिस उपायुक्त दीक्षित गेदम के अनुसार, “अभिनेता और घुसपैठिए के बीच हाथापाई हुई थी, जिसमें अभिनेता घायल हो गए। घटना की सूचना मिलते ही मुंबई पुलिस फोरेंसिक टीम के साथ मौके पर पहुँची और सबूत इकट्ठा किए। मुंबई पुलिस के अनुसार, हमलावर चोरी की नीयत से अग्नि से बचने वाली सीढ़ियों के जरिए अभिनेता के घर में घुसा और हमले के बाद भाग गया।

पुलिस उपायुक्त दीक्षित गेदम का कहना है कि आरोपित की पहचान कर ली गई है और उसे गिरफ्तार करने के लिए दस टीमें गठित की गई हैं। सूत्रों ने बताया कि मुंबई पुलिस सैफ अली खान के स्टाफ के पाँच सदस्यों से पूछताछ कर रही है। सैफ जिस हाउसिंग सोसाइटी में रहते हैं, उसकी मरम्मत का काम चल रहा था। इसमें काम करने वाले मजदूरों से भी मुंबई पूछताछ की जा रही है।

मुंबई पुलिस ने सैफ के घर के तीन कर्मचारियों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। वहीं, घुसपैठिए के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। हमले में सैफ अली खान के साथ उनकी नौकरानी अरियामा फिलिप्स उर्फ लीमा भी घायल हो गई है। पुलिस उनसे भी पुलिस स्टेशन लेकर पूछताछ कर रही है। हमलावर सैफ के घर में घुसने के बाद वहाँ मौजूद नौकरानी लीमा से बहस कर रहा था।

शोर सुनकर सैफ वहाँ आ गए। उन्होंने हमलावर को शांत कराने की कोशिश की तो वह भड़क गया और हाथापाई करते हुए सैफ पर चाकू से कई वार कर दिए। मुंबई पुलिस का कहना है कि रिहायशी सोसाइटी के सुरक्षा गार्ड ने किसी को भी सोसाइटी में घुसते नहीं देखा। जबरन घुसने के भी अभी तक सबूत नहीं मिले हैं। कहा जाता रहा है कि हमलावर सोसाइटी में पहले से ही मौजूद था।

सोसायटी में सैफ का अपार्टमेंट 7वें फ्लोर पर है। घटना में किसी अंदरूनी व्यक्ति के शामिल होने का संदेह जताया जा रहा है। हालाँकि, घर में एक Duct है, जो सैफ अली खान के बेडरूम में खुलती है। आशंका है कि इसी Duct से हमलावर घर में घुसा था। यह हमला सैफ अली खान के बेटे जेह उर्फ जहाँगीर के कमरे में हुआ है। घटना के समय घर में करीना कपूर अपने दोनों बेटों के साथ मौजूद थीं।

13 साल की थी जब बचपन के दोस्त ने किया रेप, फिर ड्राइवर-मछुआरे-मजदूर सबसे करवाया रेप: तस्वीर-वीडियो से केरल की दलित एथलीट को करते थे ब्लैकमेल

केरल के पथानमथिट्टा जिले में दलित एथलीट के 5 साल तक लगातार रेप-गैंगरेप के मामले में चौंकाने वाले खुलासे होते जा रहे हैं। अब सामने आया है कि 13 साल की आयु से निशाना बनाई गई पीड़िता के यौन शोषण की शुरुआत उसके पड़ोसी और बचपन के दोस्त ने ही की थी। इसके बाद उसने और लोगों को भी इसमें शामिल किया और बलात्कारियों की संख्या बढ़ती चली गई। बच्ची का रेप करने वालों में ड्राइवर, मजदूर, मछुआरे और उसके कई पड़ोसी तक शामिल थे।

बचपन के दोस्त ने ही चालू किया यौन शोषण

द न्यूज मिनट की एक रिपोर्ट के अनुसार, दलित बच्ची का 13 वर्ष की उम्र में यौन शोषण उसके पड़ोस में रहने वाले सुबिन ने चालू किया। सुबिन पीड़िता से 6-7 वर्ष बड़ा है और दोनों के घर आसपास ही हैं। उसने यौन शोषण के बाद पीड़िता के फोटो और वीडियो भी ले लिए। इसके बाद उसने इन फोटो और वीडियो का इस्तेमाल अपने करके अपने दोस्त से भी पीड़िता का रेप करवाया। इसके बाद उसके शोषण चालू हो गया। सुबिन के इस दोस्त ने 2 और दोस्तों से पीड़िता का रेप करवाया।

उसके फोटो और वीडियो इसके बाद अलग-अलग लोगों को दिए जाते रहे। उसका यौन शोषण करने वालों की संख्या बढ़ती रही। उसका रेप करने वालों में ड्राइवर, मछुआरे और मजदूर तक रहे। उसका रेप करने वालों में उसके कॉलेज और स्कूल के पाँच छात्र भी थे। इस मामले में जिन लोगों को आरोपित बनाया गया है, उनमें 4 नाबालिग हैं। इसके अलावा उसका रेप करने वाले 2 और लोग घटना के समय नाबालिग थे। 1 आरोपित तिरुवनंतपुरम का है, जो कि 100 किलोमीटर दूर का रहने वाला है।

इसके अलावा 2 आरोपित देश से बाहर हैं। अधिकांश आरोपित उसकी ही बस्ती के रहने वाले हैं। इस बस्ती में अधिकांश घर दलितों के हैं। यहाँ से शादीशुदा लोग भी उठाए गए हैं। बस्ती के लोग पीड़िता और आरोपितों, दोनों को जानते हैं। कई आरोपित उससे 10 साल से ज्यादा बड़े हैं। दो मौकों पर उसका गैंगरेप भी हुआ, जिसमें कई लोग जुड़े हुए थे। आरोपितों ने बस और अस्पताल समेत अलग-अलग जगह पर उसे बुलाया और यौन शोषण किया।

पिता के फोन पर मैसेज करता था सुबिन

आरोपित पीड़िता के पिता के स्मार्टफोन पर मैसेज करता था। इसी में वह बताता था कि रेप करने वालों से कहाँ मिलना है। वह पीड़िता की फोटो भी माँगा करता था। पीड़िता के पिता को फोन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। ऐसे में उन्हें लगता था कि किसी और काम के लिए बेटी फोन का इस्तेमाल करती है। वह शराब के नशे में भी रहते थे।

रिपोर्ट में यह बताया गया है कि पीड़िता के माता-पिता दोनों ही मजदूर हैं। जब पीड़िता कई दिनों के लिए घर से बाहर होती थी तो उसके परिजन सोचते थे कि वह खेल के सिलसिले में गई है। पीड़िता के एथलीट है और लगातार कई सालों से इस सक्रिय है।

29 FIR हो चुकीं, 44 हुए गिरफ्तार

इस मामले में पुलिस ने 29 FIR दर्ज की हैं। इनमें रेप और गैंगरेप की FIR हैं। पुलिस अब तक 44 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी हैं। पुलिस को उसने कुछ समय लेकर इन 58 आरोपितों के नाम, आयु और उन्होंने कैसे उसका रेप कहाँ किया बताया है। पुलिस ने 40 लोगों का नम्बर पीड़िता के पिता के फोन से ही निकाल लिया था। बाकी गिरफ्तारी के लिए अभी प्रयास चल रहा है। तब तक पीड़िता को एक संरक्षण गृह में रखा गया है। यहाँ उसकी पढ़ाई के लिए इंतजाम किया गया है।

इस मामले की जाँच के लिए एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया गया है। इस टीम का नेतृत्व डिप्टी एसपी पी एस नंदकुमार कर रहे हैं, जबकि जाँच की निगरानी खुद डीआईजी एस अजीता बेगम कर रही हैं। डीआईजी अजीता बेगम ने कहा, “सबरीमला यात्रा खत्म होने के बाद इस टीम में और अधिक अधिकारियों को शामिल किया जाएगा।”