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मगध-मित्र: महामारी के बाद नव विकास की संभावनाओं के साथ लौटेगा बिहार का उत्कर्ष

प्रत्येक राज्य का एक चरित्र होता है। बिहार का भी है। मूर्धन्य व्यंग्यकार शरद जोशी एक लेख में लिखते हैं कि मैं यदि अकेला एक फोटो खिंचाने जाऊँ तो भी मैं उसमें अंतिम पँक्ति में खड़ा अंतिम व्यक्ति होऊँगा। यही बिहार का चरित्र है।

बिहार परछाइयों में रहा है। संभवतः शेरशाह के काल से जब संभवतः सम्राट अशोक के बाद राहुल सांस्कृत्यायन के शब्दों में दूसरी बार बिहार के शौर्य ने हुमायूं की पराजय के साथ दूसरी बार भारत के भविष्य में हस्तक्षेप किया। जहाँ दिल्ली ताल ठोक कर कहता है कि ‘जानता नहीं मेरा बाप कौन है’, बिहार ‘बाबूजी कौन हैं रे तोहार’ का प्रश्न सुनते ही ‘पणाम, चचा!’ कह कर सर झुका कर जलती हुई सिगरेट को मुट्ठी में भींच लेता है।

यह अन्तर्निहित संकोच है जो बिहार को संविधान समिति के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान निर्माता कहने से संकोचित रखता है। संभवतः 87 की क्रांति और फिर निलहों के संघर्ष के बाद की ब्रिटिश उपेक्षा ने बिहार को हाशिये पर धकेल दिया।

स्वतंत्रता के बाद जातिगत राजनीति ने कर्मशील मागधी के लिए कहीं स्थान नहीं छोड़ा और ऐसा पलायन हुआ कि बिहार के हाथ हर राज्य में जा कर राष्ट्र निर्माण में जुट गए। बिहार तो स्तरों पर राष्ट्रीय विकास की धुरी बना – एक, प्रशासनिक व्यवस्था की इस्पाती धुरी जो योजना बनाती थी, दूसरी योजना के ज़मीनी कार्यान्वयन की स्वेद-सरिता के रूप में।

I-CAN से अंत्योदय के नाम एक अलख: 2000 से ज्यादा वॉरियर्स, 25000+ जरूरतमंद लोगों की मदद

पलायन या षड्यंत्र? ये देश को तबाह करने की साजिश नहीं तो और क्या है? दो लाख लोग इकट्ठा कैसे हो गए?

नैसर्गिक संकोच से भरा बिहार प्रत्येक राज्य में सड़क, मेट्रो, पुल सर नीचे किए बनाता रहा, कई बार अपमान और विरोध भी झेल कर। बहुधा ‘ऐ बिहारी’ के अपमानजनक उद्बोधन के उत्तर बिहार ने कभी क्रोध या राजनैतिक मुखरता से नहीं वरन साहस, संयम और उद्यम से दिया। बिहार ने तो उस पूर्वोत्तर भारत में भी सम्मानपूर्वक भैया बन कर कार्य किया, जिसे अन्य प्रदेशों में उसी कठिनाई का सामना करना पड़ता था।

विपत्ति का बोझ सदा मूक मनुष्यता पर सबसे अधिक पड़ता है, उस भाग पर जो वराह-अवतार के विष्णु की भाँति समाज के अस्तित्व को पीठ पर ढोता है। कोरोना महामारी के उत्तर में जब कोई औषधि या उपाय नहीं था, केंद्र ने एक लॉकडाउन की घोषणा अंतिम उपाय के रूप में की।

आशय यह था की जो जहाँ है वहीं रहे, वैयक्तिक सीमाएँ एक दुसरे को न काटे। ऐसे में जब अचानक विश्व की सबसे पहली में से एक रेल व्यवस्था सहसा रुक गई, कारखाने बंद हो गए, सड़कों पर काम ठहर गया, सबसे नीचे का वह तबका, वह अदृश्य पहिया जिस पर इस महान राष्ट्र का महान रथ चलता है, पंगु हो गया, निरुद्देश्य हो गया।

दैनिक आय पर निर्भर रहने वाले लोग सहसा एक ऐसी अन्धेरी सुरंग के सामने खड़े थे जिसके दूसरे छोर का कोई भान न होता था। कुछ महानगरों में इसके साथ पलायन प्रारम्भ हुआ, और पैदल लोगों की पंक्तियाँ सहसा सड़कों पर उतर गईं। जब तक राज्य सरकारें संज्ञान ले कर उन्हें रोकें, कुछ लोग सड़कों पर थे, कुछ अपने घरों में बंद, बिना राशन, बिना भोजन।

ऐसे समय पर जब इस वैश्विक महामारी के समर में जब चीन के बाद अमेरिका, स्पेन और इटली में मृत्यु मंडरा रही है, लाखों की संख्या में लोग मर रहे हैं, संभवतः भारत के पास अपनी जनसँख्या को देखते हुए इसके सिवा कोई और चारा भी नहीं था। राज्य सरकारों ने संज्ञान लिया और मदद की व्यवस्था की जाने लगी परन्तु प्रशासन का चक्र चलने में समय लेता है।

ऐसे समय जब प्रार्थनाएँ, चिंताएँ और हाहाकार ही सोशल मीडिया पर था, धीरे-धीरे आम नागरिक सहायता के लिए सामने आए। यहाँ एक समस्या यह रही कि अधिकाँश श्रमिक बंधुओं की पहुँच उन राजनैतिक दलों के नेतृत्व तक सीमित थी, जिन्हें वे समय-समय पर समर्थन देते रहे थे। अब सहरसा के नेताजी का सोनीपत में कोई संपर्क नहीं था, न किऊल के नेताजी का कोलकाता में!

दुःख, सहायता की माँग सब अपने आप में एक सीमा तक बंधा हुआ था। दूध के लिए कलपते बच्चों का क्रंदन, भूखे परिवारों का विलाप, एक दीवार तक पहुँच कर लौट आ रहा था। इसी कठिनाई को देख कर ‘मगध-मित्र’ का सोशल मीडिया पर जन्म हुआ। इसका उद्देश्य राजनैतिक दलों की सीमाओं से उठ कर, जिस राज्य अथवा शहर में जिस किसी वालंटियर या स्वयंसेवक समूह का कार्यक्षेत्र हो उससे वहाँ फँसे श्रमिकों तक सहायता पहुँचाना था।

भिन्न-भिन्न दलों का शीर्ष नेतृत्व जिसके पास श्रमिक पहुँच रहे थे, अब इस नेटवर्क से जुड़ कर वापस उन तक पहुँच पा रहे थे, जहाँ स्वयं उनके राजनैतिक दल की पहुँच चाहे न हो। बिहार से राष्ट्रीय जनता दल का नेतृत्व दिल्ली में भारतीय जनता दल के नेतृत्व से मदद ले कर पहले ही कार्य कर रहा था। इसे ही विस्तार देते हुए मगध मित्र (ट्विटर हैंडल @BiharBandhu) ने इस पहुँच की समस्या का समाधान किया।

चेन्नई से मुंबई से दिल्ली से बेंगलुरु से मुंबई से कोलकाता से गुरुग्राम से सोनीपत तक मगध मित्र कार्याशील रहा। लगभग हजार से अधिक व्यक्तियों तक मदद की व्यवस्था की गई, सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ताओं को उनके शहरों में फँसे श्रमिकों से जोड़ कर। इस बीच मगध मित्र का प्रयास यह भी रहा कि शासकीय प्रयासों की सूचना भी यथोचित सब के पास पहुँचती रही।

लेखक, राजनैतिक चिंतक एवं सामाजिक कार्यकर्ता गुरुप्रकाश पटना से एक प्रकार से इसके संयोजक रहे, वहीं दिल्ली से अभिषेक रंजन इस में जुड़ कर वॉलंटियर्स और हताश नागरिकों के मध्य संपर्क की कड़ी बने रहे। अलग अलग क्षेत्र से राजनैतिक कार्यकर्ता भी जुड़ते रहे, भारतीय जनता पार्टी के रत्नेश कुशवाहा पटना से जुड़े रहे और गुरुप्रकाश के साथ सारे भारत में श्रमिक परिवारों को वहाँ के स्थानीय कार्यकर्ताओं तथा समाजसेवी संस्थाओं से जोड़ कर मदद सुनिश्चित करते रहे।

कहते हैं ‘लोग साथ आते गए, कारवाँ बनता गया’, दिल्ली से जहाँ भाजपा के मनीष सिंह जुड़े, विद्यार्थी परिषद् की वैशाली पोद्दार से ले कर उत्तराखंड से भाजपा की नेहा जोशी की मदद मिली, वहीं सर्वोच्च न्यायलय अधिवक्ता सविता सिंह दिल्ली में मदद को जुड़ी; चेन्नई में पहुँचना कठिन था, वहाँ सुदर्शन जी ने मदद की।

इस प्रयास में अनेको नाम हैं, जिन्हें चिन्हित करना भी संभव नहीं है, जिन्हें राष्ट्रीय सरोकार के प्रति जागरूकता के लिए साधुवाद ही भेजा जा सकता है। अलग-अलग नगरों में जिन संस्थाओं ने मगध मित्र का साथ दिया, जिन नागरिकों ने इस विपदा में हाथ बढ़ाया, उन सबके समर्पण ने ही इस प्रयास की सफलता में सहायता की।

प्रत्येक आपदा में नव-विकास की संभावनाएँ छिपी होती हैं। जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर इस संकट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत एक नई वैश्विक शक्ति के रूप में निश्चय ही उभरेगा, आशा है कि बिहार भी एक राज्य के रूप में दलगत एवं जातिगत राजनीति से इतर एक नए रूप में उदित होगा, मगध गौरव के साथ।

ऐसे प्रयास न सिर्फ संकट काल में लोगों को जोड़ते हैं, वरन उन्हें यह भी आभास दिलाते हैं कि विभाजनकारी राजनीति, विकास-विरोधी विचारधारा की अपनी सीमाएँ होती हैं और यदि आधारभूत विकास ठहर जाता है तो ‘सब सामान्य है’ का विचार एक क्षणभंगुर आश्वासन से अधिक कुछ नहीं रह जाता। इस संकट के मध्य बने जुड़ाव से शायद एक परिपक्व सोच निकले जो बिहार को बदल दे।

जैसे प्लेग ने सूरत को, भूकंप ने सौराष्ट्र को परिवर्तित किया, प्रत्येक आपदा हमें नए सिरे से सोचने का अवसर देती है। संघर्ष अभी आगे भी है। मगध-मित्र अपने आप में संस्था नहीं है, मगध-मित्र एक प्रयास है, एक पुल है, जिसके एक ओर वो भले लोग हैं, सामाजिक संस्थाएँ हैं, जो इस संकट की घडी में अपना नागरिक कर्त्तव्य और सामाजिक दायित्व निभाने को तत्पर हैं, दूसरी ओर हताश और निराश मित्र हैं जिन्हें अपने अगले भोजन के आने का विश्वास नहीं है, वो बच्चे हैं जिन्हें दूध की अगली घूँट का भरोसा नहीं है।

इसे आने वाले समय में और विस्तार की, और विश्वास की आवश्यकता है। अधिक लाभार्थियों को संस्थाओं से और सरकार से जोड़ने की आवश्यकता है, अधिक संस्थाओं से मगध मित्र को जुड़ने की आवश्यकता है, ताकि इसकी पहुँच व्यापक हो सके।

अभी संकट टला नहीं है, हमें मिल कर ही लड़ना है, अपने लिए और अपनों के लिए, और राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में – “समर शेष है पाप के भागी नहीं केवल व्याघ्र/ जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”

मास्टर अब्दुल रहमान… इसलिए जयपुर में कोरोना संक्रमण पर बेअसर है ‘भीलवाड़ा मॉडल’

कोरोना वायरस से मुकाबले के लिए इन दिनों देश में राजस्थान के ‘भीलवाड़ा मॉडल’ की चर्चा हो रही है। यह निश्चित रूप से भीलवाड़ा प्रशासन की बड़ी कामयाबी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी कोरोना वायरस पर लगाम लगाने के लिए प्रभावित जिलों में तत्काल प्रभाव से भीलवाड़ा मॉडल को लागू करने के लिए निर्देश दे रहे हैं। इसके बावजूद जयपुर कोरोना वायरस का हॉटस्पॉट बना हुआ है। तमाम प्रयासों के बावजूद संक्रमण की दर को रोकने में चिकित्सा विभाग और जिला प्रशासन विफल हो रहा है।

आखिर क्यों जयपुर में कोरोना वायरस का एपिसेंटर बने रामगंज में भीलवाड़ा मॉडल विफल हो रहा है? इसे समझने के लिए आपको एक घटना को बारीकी से देखना होगा। बाड़मेर के पहले कोरोना पॉजीटिव अब्दुल रहमान के मामले पर गौर करना होगा।

जयपुर के रामगंज का रहने वाले अब्दुल रहमान बाड़मेर जिले के धोरीमन्ना तहसील के भलीसर विद्यालय में बतौर प्रधानाचार्य तैनात है। लॉकडाउन के दौरान ही वह एक दिन अपने ‘प्रबंधन’ से निजी वाहन से जयपुर चला गया। उसकी कार्यशैली से वाकिफ कुछ ग्रामीणों ने प्रशासन को उसकी इस हरकत से अवगत करवाया। साथ ही उसके लौटने की संभावना भी जताई।

छह अप्रैल तक बाड़मेर राजस्थान के उन जिलों में शामिल था, जो कोरोना से पूरी तरह मुक्त था। लेकिन अब्दुल रहमान रामगंज के महाकर्फ्यू को तोड़ते हुए छह अप्रैल को बाड़मेर पहुॅंच गया। बड़ा सवाल यह है कि कैसे कर्फ्यूग्रस्त रामगंज से वह छह जिलों की सीमाओं को पार करता हुआ तीन अन्य लोगों के साथ अपने निजी वाहन से बाड़मेर लौट आया?

एक नर्सिंगकर्मी के संदेश के आधार पर उसकी जॉंच हुई और वह जिले का पहला कोरोना पॉजीटिव निकला। अभी और कितने निकलेंगे, कहा नहीं जा सकता। मगर सबकी सुरक्षा के लिए उसकी ट्रेवल हिस्ट्री जानना बहुत जरूरी हो गया है। फिलहाल उसके खिलाफ बाड़मेर जिला प्रशासन ने प्राथमिकी दर्ज कर ली है।

अब भीलवाड़ा मॉडल की चर्चा करते हैं। अठारह मार्च को शून्य कोरोना संक्रमण वाला भीलवाड़ा 30 मार्च तक कोरोना वायरस का एपिसेंटर बन गया था। एक चिकित्सक के जरिए लोगों में फैला कोरोना वायरस कई लोगों को संक्रमित कर चुका था। पूरे जिले में भय का माहौल बन गया। जिला प्रशासन ने तत्काल पूरे जिले की सीमाएँ सील कर दी। घर-घर स्क्रीनिंग करते हुए महाकर्फ्यू लगा दिया। लाखों लोगों की स्क्रीनिंग की गई। लोगों को पूरी तरह घरों में बंद कर दिया गया। सबसे अच्छी बात यह कि जिले के लोगों ने कोरोना वायरस के खतरे को पूरी तरह भॉंपते हुए प्रशासन का भरपूर सहयोग दिया। लोगों के सहयोग से कोरोना वायरस को फैलने से रोक लिया गया। चिकित्सकों की कुशलता से जिले में 27 कोरोना पॉजीटिव में आधे से ज्यादा ठीक होकर घर को लौट चुके हैं।

अब रामगंज पर लौटते हैं। जयपुर में प्रदेश का पहला कोरोना मरीज दो मार्च को सामने आया था। वह विदेशी पर्यटक था और स्थानीय लोग उससे संक्रमित नहीं हुए थे। लेकिन रामगंज इलाके की रहमानिया मस्जिद के पास ओमान से आए एक व्यक्ति को जब 26 मार्च को कोरोना पॉजिटिव पाया गया तो हालात बिगड़ने लगे। हालात बिगड़ने के पीछे की बात की पड़ताल जरूरी है।

ओमान से आए उस व्यक्ति की स्वास्थ्य विभाग ने जॉंच की। लक्षण नहीं पाए जाने पर उसे क्वारंटाइन में रहने को कहा। वह नहीं माना। बाहर निकलता रहा। सामूहिक नमाज में जाता रहा। रिश्तेदारों से मिलता रहा।

फिर आए तब्लीगी जमातियों ने सरकार के तमाम प्रयासों पर पानी फेर दिया। उन्होंने अनेक लोगों को संक्रमित किया। फिर इस इलाके के लोगों की सामूहिक मानसिकता ने इसे और भी बढ़ा दिया। इस सामूहिक मानसिकता को समझना बहुत मुश्किल है। जब इन इलाकों में लॉकडाउन बेअसर हो गया तो प्रशासन को जबरन यहा पहले कर्फ्यू और फिर महाकर्फ्यू लगाना पड़ा। हालात इतने मुश्किल हो गए कि 27 मार्च को परकोटे के सात थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया गया। परकोटे में किसी भी तरह की एंट्री बंद कर दी गई।

इस इलाके में ढाई लाख से ज्यादा लोग रहते हैं। इनमें नब्बे फीसदी से ज्यादा मुस्लिम समुदाय के हैं। दस अप्रैल सुबह नौ बजे जयपुर में कोरोना पॉजीटिव के कुल 168 मरीज सामने आए थे। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इनमें नब्बे फीसदी मरीज रामगंज और आसपास के इलाकों के हैं। हर दिन रामगंज से फैलता हुआ यह वायरस आसपास के कई इलाकों को अपनी चपेट में ले रहा है।

फिर से पहले सवाल की ओर आते हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद रामगंज और परकोटे में भीलवाड़ा मॉडल काम क्यों नहीं कर पा रहा है? इसका जबाव थोड़ा कड़वा है। लोग उसमें सांप्रदायिकता भी ढूँढ सकते हैं। मगर कोरोना जैसे खतरनाक वायरस से मुकाबले के लिए किसी को भी अंधेरे में नहीं रहना चाहिए। भीलवाड़ा जिले में लोगों ने (जिले में बहुसंख्यक हिंदू समुदाय, लगभग 93%) ने स्वतः स्फूर्त कोरोना से लड़ने के लिए मुश्किलों के बावजूद प्रशासन का सहयोग किया। नियम-कायदों का पालन किया। नतीजतन, यह जिला देश भर में एक मॉडल के तौर पर उभरा।

इधर रामगंज में लोग प्रशासन की सख्ती से पहले तक घर में रहने और नमाज नहीं पढ़ने के संबंध में निर्देशों के लिए शायद फतवे का इंतजार करते रहे। प्रशासन के निर्देशों को हवा-हवाई समझते रहे और आपस में मिलते-जुलते रहे। संक्रमण फैलाते रहे।

कोरोना के मामलों की रिपोर्ट में से तबलीगी जमात का कॉलम हटा लेने से सच नहीं छिप सकता। इतनी कड़ाई के बावजूद कोरोना वायरस का वाहक बनकर अब्दुल रहमान बाड़मेर तक पहुॅंच जाता है। सोचने की बात है कि यहाँ भीलवाड़ा मॉडल कैसे लागू किया जा सकता है?

निश्चित रूप से भीलवाड़ा मॉडल कोरोना संक्रमण पर काबू पाने का एक बेहतरीन मॉडल साबित हो सकता है। लेकिन इसके लिए उसी तरह की सख्ती, नागरिकों में कानूनों का पालन करने की प्रवृति और प्रशासन में कानून का पालन करवाने की इच्छा शक्ति की जरूरत होती है। अब उम्मीद करनी चाहिए कि जयपुर प्रशासन द्वारा इच्छा शक्ति दिखाते हुए भीलवाड़ा मॉडल की तर्ज पर जल्द ही जयपुर में भी कोरोना को काबू कर लिया जाएगा।

जैन समुदाय खिला रहा था खाना: ‘ऑल्टन्यूज़’ वालों ने बताया धार्मिक कार्यक्रम, लॉकडाउन का उल्लंघन

जहाँ एक तरफ़ कुछ लोग अपनी जान पर खेल कर कोरोना आपदा के बीच राहत-कार्य और जनसेवा में लगे हैं, कुछ प्रोपेगंडा पोर्टल ने अब उन्हीं लोगों को बदनाम करने की ठानी है, जो ज़मीन पर समाज सेवा में जुटे हैं। अबकी ‘ऑल्टन्यूज़’ वालों ने जैन मुनियों को बदनाम करने का प्रयास किया। मोहम्मद जुबैर ने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें दो जैन मुनि बैठे दिख रहे हैं और कुछ लोग हाथ जोड़ कर खड़े हैं। बस, फिर क्या था! इसी तस्वीर के सहारे उसने दावा कर दिया कि ये लॉकडाउन का उल्लंघन हो रहा है।

ज़ुबैर ने दावा किया कि गुजरात स्थित सूरत के मेयर नीरव शाह ने एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वो जैन मुनियों की अध्यक्षता वाले एक धार्मिक कार्यक्रम में शिरकत कर के ‘उदाहरण पेश कर रहे हैं’। जबकि सच्चाई कुछ और थी। ज़ुबैर ने यहाँ तक कि उन जैन मुनियों के पीछे लगे बैनर को भी पढ़ने की जहमत नहीं उठाई। अब आप समझ जाइए कि जब ‘ऑल्टन्यूज़’ के कर्ताधर्ता ऐसे काम करते हैं तो उनका प्रोपेगेंडा पोर्टल कैसे चलाया जाता होगा। बैनर पर आमजनों और पशु-पक्षियों को खाना खिलाने की बात स्पष्ट लिखी हुई है। इस पर लिखा है- “कोरोना जैसी महामारी मे पशु-पक्षियों को भोजन… पूरे सूरत शहर के पशु-पक्षियों को भोजन कराएँ और मानवता दिखाएँ।

इसके अलावा उस फंक्शन की एक और तस्वीर है, जिसे ज़ुबैर ने छिपा लिया। उस तस्वीर में भोजन सामग्रियों के पैकेट्स और फल-फूल रखे हुए हैं, जिनका वितरण किया जा रहा है। इसमें बहुतायत में तरबूजे दिख रहे हैं। ये एक राहत-कार्य था, जिसे ज़ुबैर ने धार्मिक पूजापाठ का कार्यक्रम करार देकर लोगों को बेवकूफ बनाया। यहाँ तक कि ‘गल्फ न्यूज़’ ने भी दुनिया भर में चल रहे कम्युनिटी किचन्स की जो प्रोफाइल बनाई है, उसमें जैन साधुओं द्वारा चलाए जा रहे राहत-कार्य का जिक्र किया है

‘गल्फ न्यूज़’ ने बताया है कि किस तरह सूरत में जैन समुदाय के लोग ज़रूरतमंदों को भोजन सामग्रियाँ वितरित कर रहे हैं। सिर्फ़ सूरत ही नहीं बल्कि अहमदाबाद में चल रहे हैं और राहत-कार्य जारी है। हाल ही में उन्होंने राजकोट में 30,000 रोटियाँ पका कर ज़रूरतमंदों में वितरित किया। बेंगलुरु में भी जैन समुदाय ने ग़रीबों को भोजन कराया और ये काम आज भी जारी है। हाल ही में ‘महावीर जयंती’ के अवसर पर जैन समुदाय ने राहत-कार्य में और ताज़ी लाई।

UP में कॉन्ग्रेस प्रदेश सचिव सचिन चौधरी गिरफ्तार, PM मोदी और CM योगी पर की थी विवादित टिप्पणी

अमरोहा से कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके और उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के सचिव सचिन चौधरी को गिरफ्तार कर लिया गया है। सचिन चौधरी को यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विवादित टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। थाना अमरोहा देहात पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया है। 

इसके अलावा सचिन चौधरी के खिलाफ आईपीसी की धारा 188 के तहत भी केस दर्ज किया गया है। यह केस लॉकडाउन के दौरान प्रेस कॉन्फ्रेंस करने को लेकर किया गया है। बता दें कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ही उन्होंने मीडिया से रूबरू होते हुए पीएम मोदी और सीएम योगी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्हें कल रात ही गिरफ्तार कर लिया गया।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता सचिन चौधरी व दो अन्य को धारा 144 के उल्लंघन करने के मामले में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। जानकारी के मुताबिक पुलिस ने 28 मार्च की देर रात हाइवे पर जीरो प्वाइंट के पास भारी भीड़ जमा देखी। भीड़ देख पुलिस वहाँ पर पहुँची। भीड़ हटाने की कोशिश की तो वहाँ पर कॉन्ग्रेस नेता और उनके दोस्तों ने हंगामा शुरू कर दिया। साथ ही पुलिस के साथ अभद्रता भी की।

इसके बाद पुलिस ने उन पर सरकारी कार्य में बाधा डालने और लॉकडाउन का उल्लंघन करने का मामला दर्ज किया। बाद में उन्हें थाने से जमानत पर रिहा कर दिया गया।

कॉन्ग्रेस नेता ने पूरे मामले पर सफाई देते हुए कहा था कि उन्हें मुरादाबाद में सड़क पर लोगों की मदद करते हुए SSP अमित पाठक ने गिरफ्तार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि SSP का कहना किसी की मदद मत करो सरकार का आदेश है, जो मर रहा है मरने दो। आगे उन्होंने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा सड़कों पर लोगों को मारना चाहती है। क्या किसी की मदद करना भी अपराध है? हालाँकि उनकी इस सफाई पर लोगों ने उन्हें जमकर आड़े हाथों लिया था।

इस मर्ज की दवा कब तक: Covid-19 के संक्रमण पर काबू पाने के लिए क्या कर रही है दुनिया

वायरस या विषाणु अतिसूक्ष्म जीव हैं। ये बैक्टीरिया से भी छोटे होते हैं। ये सिर्फ किसी जीवंत कोशिका के अंदर ही वंश वृद्धि कर सकते हैं। ये सालों साल सुसुस्प्ता अवस्था में रह सकते हैं और किसी सजीव के संपर्क में आते ही फिर से संक्रमण कर सकते हैं। वायरस मुख्यत: प्रोटीन और RNA या DNA से बना होता है।

वायरस सजीव कोशिका पर आक्रमण करने के बाद होस्ट कोशिका के कोसकिए (cellular) मशीनरी को हाइजैक करता है। उससे अपना प्रोटीन और न्यूक्लिक एसिड (DNA/RNA) बनवाने लगता है। रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम कर देता है। Covid-19 भी एक वायरस जनित बीमारी है। यह कोरोना वायरस या SARS-CoV-2 से होता है। कॉरोनाविरीदी वायरस की एक फैमिली है। इसमें SARS-CoV-2 के अलावा SARS और MERS जैसे रोग जनित वायरस भी हैं।

2018 में माय सेक्रेट तेर्रिउस (My secret terrius) नाम की एक फिल्म आई थी। आजकल इसका एक दृश्य वायरल हो रहा। इसमें इस फैमिली के वायरसों की बात हो रही है न कि SARS-CoV-2 की। कहा जा सकता है कि अतीत में कोरोना से संबंधित जो बातें हुई हैं, असल में वे कोरोना फैमिली की बात थी।

इस बीमारी का सबसे पहले पता 2019 में चीन के वुहान प्रांत के सी-फ़ूड मार्केट में काम करने वाले 41 वर्षीय एक व्यक्ति में चला था। इसके बाद इस वायरस के सोर्स को लेकर बहुत सारे कयास लगाए गए। कुछ का मानना था कि यह अधपके चमगादड़ के मांस खाने से मनुष्य में फैला। कुछ का कहना था कि यह चीन के बॉयो-वेपन्स लैबोरेट्रीज से लीक हुआ है।

SARS-CoV-2 एक जूनोटिक (zoonotic) रोग है। इसका मतलब है कि यह रोग जानवर से मनुष्य में फैलता है। प्रारंभ में ऐसा कहा गया कि Covid-19 के रोगी वुहान के समुद्री जिओ के बाज़ार गए थे। लेकिन बाद के मरीजों से पता लगा चला कि उनमें कुछेक बाज़ार नहीं गए थे। फिर इसके मनुष्य से मनुष्य में भी फैलने की पुष्टि हुई। अभी तक यह 205 देशों में फ़ैल चुका है और करीब 15 लाख लोगों को संक्रमित कर चुका है।

प्रसिद्ध मेडिसिन जर्नल नेचर के 17 मार्च 2020 के अंक में ‘द प्रोक्सिमल ओरिजिन ऑफ़ SARS-CoV-2’ नाम से एक रिपोर्ट छपी है। इसके अनुसार SARS-CoV-2 ना तो प्रयोगशाला में तैयार किया गया है और ना ही इसे किसी फ़ायदे के लिए प्रयोगशाला में उदेश्यपूर्ण तरीके से बदला गया है। जंतुओं से आदमी में इसके प्रवेश की सटीक पहचान के लिए जरूरी है कि Covid-19 के शुरुआती मरीजों के वायरस की नुक्लेइक एसिड सिक्वेंसिंग (Nucleic acid sequencing) स्टडीज़ की जाए। यह रिसर्च स्क्रिप्प्स रिसर्च संस्थान, ला-जोला, कैलिफ़ोर्निया, USA द्वारा क्रिस्टियन जी एंडरसन के नेतृत्व किया गया था।

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एलर्जी एंड इन्फेक्शस डिजीज (अमेरिका) के प्रांगण में रॉकी माउंटेन लैबोरेट्रीज के वैज्ञानिको ने इसी साल फरवरी में SARS-CoV 19 वायरस को मरीजों से निकाल कर इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी के द्वारा इसकी तस्वीर ली। यह देखने में Halo या प्रभामंडल के आकार (Halo आकार को लैटिन भाषा में करोना कहा जाता है) की तरह दिखता है। इसके मरीजों को बुखार, सूखी खाँसी और कभी-कभी साँस लेने मे कठिनाई जैसे लक्षण दिखते हैं।

यह रोग मुख्यत: एक रोगी से स्वस्थ मनुष्य में खाँसने या छींकने के दौरान बने रेस्पिरेटरी ड्रॉप्लेट्स (respirtory droplets) के कारण फैलता है। इस रोग के लक्षण परिलक्षित होने मे सामान्यत: 2 से 14 दिन लगते हैं। डॉक्टर रोगियों के प्रारंभिक लक्षणों के द्वारा इसकी पहचान करते हैं। लेकिन ये पूरी तरह सटीक नहीं है, क्योंकि ये सारे लक्षण दूसरे वायरस जनित रोग में भी एकसमान होते हैं। जैसे, 2002 मे फैला SARS-CoV के भी यही लक्षण थे।

SARS-CoV और SARS-CoV2 (Covid19) मे अनुवांशिक जानकारी सिंगल स्ट्रैंडडेड (single stranded) RNA मे होता है। वैसे तो इन दो वायरस के RNA में समानता होती है। लेकिन कुछ हिस्सा ऐसा है जो SARS-CoV2 में अनोखा या अलग होता है और टेस्ट के द्वारा इस अनोखे हिस्से को पहचान कर संक्रमण सुनिश्चित किया जाता है।

टेस्ट के लिए डॉक्टर रोगी के नाक या गला के swab सैंपल को इकट्ठा कर लैब में भेज देता है। लेकिन जब मनुष्य में इस वायरस का शुरुआती इन्फेक्शन होता है तब RNA की मात्रा इतनी कम होती है कि उसका लैब में पता कर पाना मुश्किल होता है। इससे निपटने के लिए लैब में SARS-CoV2 specific प्राइमर्स के द्वारा RT-PCR की जाती है। इसके बाद कन्फर्म रूप से कहा जा सकता है कि फलॉं संक्रमित है या नहीं।

RNA बहुत स्थायी नहीं होते हैं। उनका हैंडलिंग भी बहुत संवेदनशील होता है। विकासशील देशों में सभी हॉस्पिटल में RT-PCR की सुविधा उपलब्ध नहीं होती। इन वजहों से यह टेस्ट आसान नहीं है। साथ ही यह टेस्ट बेहद सेंसिटिव भी होता है। सैंपल में जरा सा भी सनदोशन या कंटैमिनेशन होने से गड़बड़ी की आशंका बढ़ जाती है। इस कारण से ही इस टेस्ट को तीन से पाँच बार भी करने की जरूरत पड़ जाती है। CDC टेस्ट सबसे प्रचलित है। सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल (अटलांटा) ने इसे ड़ेवलप किया है। लेकिन बहुत सारे टेस्ट के नतीजे नहीं निकलने के बाद इसके टेस्ट-किट के केमिकल्स में बदलाव करना पड़ा।

इस टेस्ट को लैब के बाहर करना मुश्किल है। इस कठिनाई को दूर किया अमेरिका की अबोट (Abbott) कंपनी की किट ID NOW ने। यह आइसोथर्मल एम्प्लिफीकेसन तकनीक इस्तेमाल करता है। रिजल्ट 10 से 15 मिनट में देता है। भारत ने भी इस किट का ऑर्डर दिया है और अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक डिलिवरी की उम्मीद है। इस किट की कीमत 500-1000 रुपए होती है।

पुणे की कंपनी मायलैब डिस्कवरी सॉल्यूशन द्वारा विकसित किट पैथोडिटेक्ट covid-19, भारत की पहली Covid 19 डिटेक्शन किट है। भोपाल की कंपनी किल्पेस्ट इंडिया की TRUPCR, इसी तकनीक पर आधारित है।

जब हमारे शरीर में वायरस का प्रवेश होता है तो हमारा शरीर उस वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज बनाता है।एक दूसरे प्रकार का टेस्ट जो एलिसा (ELISA) तकनीक इस्तेमाल करती है, हमारे ब्लड से इस वायरस की उपस्थति के कारण बने एंटीबॉडी की पहचान कर संक्रमण बताता है। यह टेस्ट फ़ास्ट होता है। इससे उन रोगियों की भी पहचान की जा सकती है जो पहले संक्रमित थे लेकिन बाद में ठीक हो गए। उनकी भी पहचान की जा सकती है जिनमें मजबूत रोग निरोधक क्षमता के कारण संक्रमित होने के बाद भी उसके लक्षण परलक्षित नहीं हुए। बेंगलुरु की Bione कंपनी की तैयार किट एंटीबॉडी को डिटेक्ट कर Covid19 की पहचान करती है और पूरी प्रक्रिया सिर्फ 5-10 मिनट में हो जाती है।

अभी तक Covid19 के लिए कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। इस कारण से इसके रोकथाम में कुछ विशेष प्रगति नहीं हो पाई है। तीन सप्ताह पहले ही USA की Moderna कंपनी ने NIAID, USA के साथ मिल कर mRNA-1273 का पहला क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया है। वैक्सीन देने के लिए 45 स्वस्थ वालंटियर्स चुने गए हैं। इन्हें एक्चुअल वायरस नहीं दिया जा रहा है, इसलिए जान का कोई खतरा नहीं है। वैक्सीन डेवलपमेंट की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए ही पहले चरण में लैब में जंतुओं पर टेस्ट की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है।

कुछ दूसरी कंपनियॉं जैसे, अमेरिका की ही इनोवियो फर्मास्यूटिकल अपना ट्रायल अगले महीने यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेनसिल्वेनिया में शुरू करने जा रही है। जॉनसन एंड जॉनसन ने 1 अप्रैल को प्रेस ब्रीफिंग कर बताया कि Covid-19 वैक्सीन के फेज 1 का पहला क्लीनिकल ट्रायल इस साल सितंबर में शुरू करेगी। सब कुछ सही रहा तो 2021 के जनवरी में वैक्सीन लॉन्च हो सकता है।

होथ थेराप्यूटिक्स (Hoth Therapeutics) के साथ मिलकर हेलोवाक्स (HaloVax) Covid-19 के लिए वाक्ससेलेरात (VaxCelerate) नामक सेल्फ असेंबली वैक्सीन शुरू करने जा रही है। यह वायरस में हो रहे जेनेटिक ड्रिफ्ट को तीव्र गति से अनुकूलित भी करता है। mRNA संबंधित मेडिसिन्स बनाने वाली अमेरिकी कंपनी अर्क्टुरुस (Arcturus) भी लूनर लिपिड मिडीएतेद के सहयोग से Covid-19 वैक्सीन पर काम करने जा रही है। GSK (GlaxoSmithKline) भी Xiamen Innovax के साथ मिलकर Covid-19 के लिए recombinant प्रोटीन आधारित वैक्सीन पर काम कर रही है।

Vaccitech और CanSinoBio के वैक्सीनस स्टेज 2 ट्रायल पे हैं। हालॉंकि थोड़ी आशा की किरण egeneron pharma और सनोफ़ी के द्वारा किया जा रहा दवा केव्जारा (Kevzara) (sarilumab) और Gilead साइंसेज कि remdesvir से भी देखने को मिल सकता है। FDA, USA द्वारा एप्रूव्ड एंटी वायरल ड्रग लोपिनाविर और रितोनाविर दोनों ड्रग ट्रायल में फेल हो गए है। लेकिन क्लीनिकल ट्रायल्स में ऐसा पाया गया कि रेम्देस्वीर कोरोना वायरस के रेप्लिकेसन को रोकता है और कंपनी तीसरे चरण का ट्रायल कर रही है। ये उन ट्रायल्स के अलावा है जो चाइना-जापान फ्रेंडशिप हॉस्पिटल के द्वारा चीन के हुबेई प्रांत में चलाया जा रहा है।

सनोफ़ी की Plaquenil जो कि मलेरिया के उपचार की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोकुइन (hydroxychloroquine) है, की भी तीसरे चरण की क्लीनिकल ट्रायल शंघाई पब्लिक हेल्थ क्लीनिक सेंटर में जारी है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी इरविंग मेडिकल सेंटर में भी इसकी ट्रायल अगले वर्ष तक कर लेने की उम्मीद है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एंटीमाइक्रोबियल एजेंट्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक azitromycine (एक एंटीबायोटिक) हाइड्रोक्सीक्लोरोकुइन के साथ मिलकर वायरस का सफाया करने में ज्यादा कारगर है। हालॉंकि बहुत विश्वसनीय प्रमाण के अभाव और मरीजों की सुरक्षा को देखते हुए इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दिया जा रहा है।

जापान की ताकेदा फार्मास्यूटिकल ने 4 अप्रैल को US कॉन्ग्रेस के मेंबर्स को अपने एंटीबाडी बेस्ड (Polyclonal hyperimmune globulin H-IG) ट्रीटमेंट प्लान से अवगत कराया। कैनेडियन कंपनी भी Lilly के साथ मिलकर, USA के पहले Covid-19 पेशेंट के एंटीबाडी पर काम की शुरुआत की है, जो कोरोना वायरस के संक्रमण से ठीक हुआ था। ऐसे बहुत सारे वैक्सीन और ट्रीटमेंट पर काम जारी हैं।

मगर इस मर्ज की दवा बनाने में सबसे बड़ी बाधा है समय। किसी भी दवा या वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल्स जो जंतुओं में टेस्टिंग के उपरांत, मानव में परीक्षण के सामान्तया तीन स्टेज से होकर गुजरता है। पहले स्टेज में कुछ दर्जन स्वस्थ वालंटियर्स के ऊपर अजमा कर देखा जाता है कि ये उपयोग के लिए सुरक्षित है या नहीं। यह करीब तीन महीने ले लेता है। दूसरे स्टेज के ट्रायल्स में करीब 6-8 महीने लगते हैं। इसमें कुछ सौ लोग उस एरिया/क्षेत्र से प्रतिभागी बनते हैं, जहाँ उस रोग का आउटब्रेक हुआ है। तीसरे स्टेज में ये पक्रिया कुछ हज़ार लोगों पर दुहराई जाती है। इस पक्रिया के पूरे होने में भी 6-8 महीने का समय लग जाता है। इसके बाद USA में फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन सारे ट्रायल से संबंधित डाटा के पुनरीक्षण के बाद वैक्सीन या दवा के उपयोग के लिए अपनी सहमति देता है। भारत में यह काम सेंट्रल ड्रग्स स्टैण्डर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन, नई दिल्ली करती है। यह पक्रिया पूरी होने में 1 महीने से 1 साल लगता है। अगर सारे प्रक्रिया को जोड़ा जाए तो Covid-19 के जो ड्रग्स क्लीनिकल ट्रायल्स स्टेज 3 में भी हैं उनके भी मरीजों तक पहुॅंचने में अभी 6 महीने और लग जाएँगे।

वैक्सीन के विकास में अमूमन एक से डेढ़ साल लगते हैं। इस समय Covid-19 पर काबू पाने के लिए युद्धस्तर पर काम चल रहा है। यह वैश्विक स्तर पर मानव जीवन के इतिहास की सबसे प्रेरणादायक कहानी साबित होगी। Covid-19 की उत्पति और विस्तार से संबंधित साइंटिफिक रिपोर्ट्स ना केवल इसके रहस्य से पर्दा उठाएँगे, बल्कि नई ग्लोबल महामारी की चुनौतियों से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कैसे निबटा जाए, इससे संबंधित पॉलिसी बनाने में भी मदद मिलेगी।

(लेखक डॉ. राजीव रमण जर्मनी के मैडेनबर्ग स्थित leibniz institute for neurobiology में वैज्ञानिक हैं)

30 अप्रैल तक लॉकडाउन बढ़ाने की बात: विपक्षी मुख्यमंत्रियों ने PM से की सिफारिश, राष्ट्रीय स्तर पर फैसले का सुझाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लॉकडाउन बढ़ाने या खत्म करने पर सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बात कर रहे हैं। लॉकडाउन बढ़ेगा या नहीं, इसको लेकर मंथन जारी है। इस दौरान कई राज्य के मुख्यमंत्रियों के साथ ही खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मास्क पहनकर लोगों को कोरोना से बचाव का संदेश दिया। अभी तक पाँच राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपनी बात रखी। जिनमें से तीन ने लॉकडाउन 30 अप्रैल तक बढ़ाने को कहा। तीनों विपक्ष के शासन वाले राज्य हैं: महाराष्ट्र, पंजाब और दिल्ली।

दिल्ली, पंजाब और महराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों ने पीएम मोदी को सुझाव दिया है कि देश में लॉकडाउन को 30 अप्रैल तक बढ़ा देना चाहिए।

इस बैठक में पीएम मोदी ने कोरोना वायरस के मौजूदा हालात को लेकर चर्चा की। साथ ही कोरोना वायरस से निपटने के लिए राज्यों से सुझाव भी माँगे। पीएम मोदी ने मुख्यमंत्रियों से कहा कि वो आप सभी के लिए 24*7 उपलब्ध है। पीएम मोदी ने इस दौरान कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगी और निश्चित रणनीति के तहत चलेंगी, तब हम देश और देशवासियों को कोरोना संक्रमण से होने वाले नुकसान से बचा सकेंगे। इस बैठक में स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना वायरस को लेकर प्रेजेंटेशन भी दी।

78% देशवासी लॉकडाउन बढ़ाने के पक्ष में, इसे लागू कराने में नाकाम (38%) रही पश्चिम बंगाल सरकार: सर्वे

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने इस बैठक में 30 अप्रैल तक लॉकडाउन को बढ़ाए जाने की माँग की है। सीएम केजरीवाल ने कहा कि लॉकडाउन बढ़ाए जाने का फैसला राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए। राज्य अपने स्तर पर फैसला करेंगे तो उतना असर नहीं होगा। वहीं किसी तरह की ढील दी जाए तो किसी भी सूरत में ट्रांसपोर्ट नहीं खुलना चाहिए। न रेल, न सड़क और न एयर ट्रांसपोर्ट।

इस बैठक में पंजाब और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों ने भी देश में लॉकडाउन को बढ़ाए जाने की माँग की। हालाँकि, इस बैठक से पहले ही ओडिशा में 30 अप्रैल और पंजाब में एक मई तक लॉकडाउन बढ़ाए जाने का फैसला लिया जा चुका है।

गौरतलब है कि इससे पहले तेलंगाना, यूपी, मध्यप्रदेश सहित कुछ अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने पत्र लिख कर पीएम को लॉकडाउन की अवधि बढ़ाने की अपील की थी। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों के साथ पहले भी मीटिंग कर चुके हैं। बुधवार (अप्रैल 8, 2020) को सभी दलों के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग में पीएम ने कहा था कि वह देश भर में लागू लॉकडाउन की समय सीमा में परिवर्तन पर फैसला लेने से पहले सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से एक बार और बात करेंगे।

इस मीटिंग में पीएम ने तकरीबन स्पष्ट कर दिया था कि आने वाली 14 अप्रैल को लॉकडाउन नहीं हटाया जाएगा। मीटिंग में मोदी ने कहा था कि केंद्र सरकार की प्राथमिकता प्रत्येक जीवन की सुरक्षा है। लॉकडाउन के विस्तार के मुद्दे पर उन्होंने कई जिलों के जिलाधिकारियों से बात की है और सभी ने एकमत होकर लॉकडाउन की समय सीमा को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है। उन्होंने यह भी कहा था कि पूरे देश में एक साथ लॉकडाउन हटाना संभव नहीं है। कई राज्य इसे बढ़ाने पर सहमति भी जता चुके हैं।

लॉकडाउन के बीच मस्जिद में जुटे नमाजियों का पुलिस टीम पर हमला, लियाकताबाद में महिला SHO घायल

पूरा विश्व लगातार फैलती कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए तरह-तरह के इंतजाम कर रहा है, लेकिन कुछ लोगों के कारण पुलिस-प्रशासन इस संकट के बीच अलग ही तरह की परेशानी से जूझ रही है। भारत में लगातार आ रही जमातियों से जुड़ी खबर के बाद कुछ इसी तरह की खबर अब पाकिस्तान से भी आई है। वहाँ लॉकडाउन के बीच पढ़ी जा रही नमाज को रोकने के लिए पहुँची पुलिस टीम पर लोगों ने हमला कर दिया।

पाकिस्तान के सिंध में लगी पाबंदी के बाद भी कराची शहर के लियाकताबाद इलाके में मौजूद एक मस्जिद में बड़ी संख्या में नमाजी एकत्र हो गए। इसकी सूचना जब क्षेत्रीय पुलिस को हुई तो तत्काल पुलिस मौके पर पहुँच गई। मस्जिद में हो रही नमाज को लेकर जब पुलिस ने विरोध किया तो लोगों ने अचानक से पुलिस टीम पर ईंट-पत्थरों से हमला कर दिया। इस दौरान पुलिस को घरों में घुसकर अपनी जान बचानी पड़ी।

नमाजियों द्वारा पुलिस टीम पर किए हमले में पीराबाद थाने की एक महिला एसएचओ घायल हो गई, जिस पर आला अधिकारियों को सूचना दी गई। इसके बाद बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स मौके पर पहुँची। वहीं मामले में कार्रवाई करते हुए कराची पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया है। इस मामले का एक वीडियो पाकिस्तान के पत्रकार रविन्द्र सिंह रॉबिन ने अपने ट्विटर पर शेयर किया है।

खबर के मुताबिक पाकिस्तान में लगातार बढ़ती कोरोना के मरीजों की संख्या के बीच सिंध राज्य की सरकार ने शुक्रवार (10 अप्रैल 2020) को बीते सप्ताह की तरह ही जुमे की नमाज को ध्यान में रख लोगों को एकत्र होने से रोकने के लिए दोपहर बारह बजे से तीन बजे तक कर्फ्यू जैसे लॉकडाउन की घोषणा की थी। इस दौरान तीन घंटे तक घरों से निकलने पर पूरी तरह से पाबंदी थी।

इससे पहले पाकिस्तान उलेमा काउंसिल ने लोगों से महामारी के फैलाव को रोकने के लिए सरकार के आदेशों का पालन करने और घरों में ही नमाज पढ़ने की अपील की थी। इसके बाद भी कराची के औरंगी टाउन की एक मस्जिद में बड़ी संख्या में लोग लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करते हुए जुमे की नमाज अदा करने के लिए पहुँच गए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में अब तक कोरोना से 102,734 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि इससे संक्रमित लोगों की संख्या 1,699,632 के पर पहुँच गई है, राहत की बात यह कि 376,330 लोग अस्पतालों से ठीक होकर अपने घरों को लौट चुके हैं। वहीं बात करें पाकिस्तान की, तो यहाँ मरने वालों की संख्या 66, जबकि इससे संक्रिमत लोगों की संख्या बढ़कर 4696 हो गई है।

78% देशवासी लॉकडाउन बढ़ाने के पक्ष में, इसे लागू कराने में नाकाम (38%) रही पश्चिम बंगाल सरकार: सर्वे

कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए लागू देशव्यापी लॉकडाउन की अवधि को बढ़ाने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (मार्च 11, 2020) को फैसला ले सकते हैं। वह इस मुद्दे पर सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बात करेंगे। बताया जा रहा है कि कोरोना के बढ़ते हुए संक्रमण को देखते हुए देश में 14 अप्रैल को खत्म हो रहे लॉकडाउन को बढ़ाया जा सकता है। कई राज्यों ने इस पर सहमति भी जताई थी। इस मीटिंग से पहले लॉकडाउन बढ़ना चाहिए या नहीं, इसको लेकर एक सर्वे सामने आई है। यह सर्वे जन की बात के फाउंडर, सीईओ और एडिटर एंड चीफ प्रदीप भंडारी द्वारा किया गया है। 

इस सर्वे के अनुसार देश के 78 फीसदी लोगों ने लॉकडाउन को आगे बढ़ाने का समर्थन किया है। शहरी क्षेत्रों में 82 फीसदी लोगों ने इसका समर्थन किया जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 74 फीसदी लोगों ने इसके पक्ष में अपना मत दिया।

पूरे देश में 78 फीसदी लोग लॉकडाउन के समर्थन में
शहरी क्षेत्रों में 82 फीसदी लोग लॉकडाउन के समर्थन में
ग्रामीण क्षेत्रों में 74 फीसदी लोग लॉकडाउन के समर्थन में

बता दें कि यह सर्वे 16 राज्यों में किया गया। ये राज्य हैं- मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल, गुजरात, पंजाब, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, गोवा और झारखंड। सर्वे के दौरान इन राज्यों में लोगों से पूछा गया कि क्या वो लॉकडाउन को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं? और इसके साथ ही उनसे यह भी पूछा गया कि जिस तरह से उनके राज्य में लॉकडाउन को लागू किया गया, क्या वो उससे संतुष्ट हैं? 

सर्वे के मुताबिक इन 16 राज्यों में कितने फीसदी लोग लॉकडाउन के समर्थन में हैं, इसका विवरण हम नीचे दे रहे हैं:-

मध्य प्रदेश     72%

राजस्थान       84%

छत्तीसगढ़      79%

कर्नाटक        83%

उत्तर प्रदेश    84%

बिहार           86%

केरल           70%

गुजरात         80%

पंजाब           74%

उड़ीसा         90%

बंगाल           74%

महाराष्ट्र        86%

दिल्ली          71%

हरियाणा       60%

गोवा            86%

झारखंड       88%

इसके अलावा इस सर्वे से जो दूसरी बात निकल कर सामने आई, वो ये कि अभी जो 21 दिन का लॉकडाउन जारी है, उसमें सबसे ज्यादा संतुष्ट उड़ीसा के लोग हैं, जबकि सबसे कम संतुष्ट लोग पश्चिम बंगाल के हैं। बता दें कि उड़ीसा में जिस तरह से लॉकडाउन का पालन किया गया और करवाया गया, उससे 85 फीसदी लोग संतुष्ट हैं, जबकि पश्चिम बंगाल सरकार इसका पालन करवाने में काफी पिछड़ गई है। यही वजह है कि वहाँ के मात्र 38 फीसदी लोग ही राज्य में इससे संतुष्ट नजर आए। हालाँकि यहाँ के भी 74 फीसदी लोग लॉकडाउन को बढ़ाने के पक्ष में हैं।

उड़ीसा के लोग सबसे अधिक संतुष्ट
पश्चिम बंगाल के लोग सबसे कम संतुष्ट

अब हम आपको बताते हैं कि कौन सा राज्य लॉकडाउन को अच्छी तरह से लागू करवाने में कामयाब रही और कहाँ की जनता इससे कितना संतुष्ट है:-  

मध्य प्रदेश     63%

राजस्थान       64%

छत्तीसगढ़      75%

कर्नाटक        56%

उत्तर प्रदेश    66%

बिहार           50%

केरल           70%

गुजरात         51%

पंजाब           66%

उड़ीसा         85%

बंगाल           38%

महाराष्ट्र        62%

दिल्ली          68%

हरियाणा       64%

गोवा            52%

झारखंड       42%

UP में 200 जमाती अचानक गायब, 500+ लोगों के मोबाइल ऑफ: पता बताने पर 5000 रुपए का इनाम

देश में लगातार बढ़ते कोरोना मरीजों की संख्या के बीच दिल्ली मरकज से निकल कर हर जगह फैले जमाती सभी राज्य सरकारों के लिए मुसीबत बने हुए हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में लगातार पुलिस ने जमातियों को खोजने के लिए सर्च अभियान चलाया हुआ है। इस दौरान यूपी के लखनऊ से अचानक ग़ायब हुए 200 जमातियों ने यूपी सरकार को नई टेंशन दे दी है, साथ ही प्रदेश की जनता को संकट में डाल दिया है।

हिंदुस्तान में प्रकाशित खबर के मुताबिक अब तक लखनऊ शहर में रह रहे 200 से अधिक जमाती पिछले 1-2 दिनों के अंदर अचानक से गायब हो गए हैं। इस बात का खुलासा तब हुआ, जब उत्तर प्रदेश में यूपी पुलिस की क्राइम ब्रांच कोरोना के संकट से उभरने के लिए प्रदेश में जमातियों की तलाश में सर्च अभियान चलाए हुए है। क्राइम ब्रांच ने लखनऊ में रहने वाले जमातियों का पता लगाने के लिए 700 से अधिक मोबाईल नंबरों को सर्विलांस पर लगा रखा था।

झारखंड के जो आदिवासी कभी दिल्ली नहीं गए उनके नाम पर जमातियों ने ले लिए सिम

1 लाख से ज्यादा हिंदुस्तानियों को मारना चाहते थे तबलीगी जमाती, जाकिर नाइक की B टीम की तरह कर रहे काम: वसीम रिजवी

अब इनमें से 200 से अधिक जमातियों के नंबर अचानक से बंद जा रहे हैं। इतना ही नहीं, इन जमातियों के सम्पर्क में रहे करीब 300 लोगों ने भी अपने मोबाइल बंद कर लिए हैं। वहीं पुलिस को आशंका है कि इन जमातियों ने शायद नए नंबर लेकर उनका इस्तेमाल शुरू कर दिया है। यह भी सामने आ रहा है कि कुछ लोगों ने पुराने लखनऊ में परिचितों की दुकान से नए मोबाइल ले लिए हैं। पुलिस इसकी भी पड़ताल कर रही है।

हिन्दुस्तान अखबार के लखनऊ संस्करण में प्रकाशित खबर की कटिंग

वहीं क्राइम ब्रांच की टीम ने खुलासा किया कि जब कॉल डिटेल के आधार पर पुलिस ने जमाती और उनके परिवारजनों से पूछताछ शुरू की तो कई जमातियों ने लोकेशन को लेकर झूठ भी बोला था। इतना ही नहीं, कई जमातियों ने तो पुलिस के सवालों के सही जवाब भी नहीं दिए। इसके बाद पुलिस ने जब पूछताछ बढ़ा दी तो क्वारंटीन किए जाने के डर से ये लोग अपने नंबरों को बंद करने लगे।

लखनऊ के कैसरबाग, सदर, वजीरगंज, मड़ियांव, सआदतगंज, गोमती नगर समेत कई इलाकों में रहने वाले जमातियों में से अधिकांश ने दिल्ली की जमात में हिस्सा लिया था। अब क्राइम ब्रांच के साथ एसटीएफ की टीम कुछ नए नम्बरों को सर्विलांस पर लेकर गायब हुए जमातियों के बारे में पता लगाने में जुटी हुई है।

पुलिस कमिश्नर सुजीत पाण्डेय ने बताया कि जमातियों का पूरा ब्योरा आ गया है। कुछ ब्योरा और मिलना बाकी है। दिल्ली में हुई जमात में शामिल होने गए लखनऊ के 18 लोग अभी वहीं क्वारंटीन है। पुलिस टीम परिवारजनों के सम्पर्क में है। यह मॉनिटरिंग लगातार हो रही है कि दिल्ली से कोई जमाती यहाँ आ तो नहीं गया है।

दरअसल दिल्ली मरकज में बड़ी संख्या में पाए गए जमातियों के बाद उत्तर प्रदेश में की गई छापेमारी के दौरान लखनऊ के काकोरी, गोमतीनगर और कैसरबाग स्थित मस्जिदों से 24 विदेशी नागरिकों को निकाला गया था। ये सभी विदेशी जमाती तभी दिल्ली की जमात में शामिल होकर लखनऊ वापस लौटे थे। इसके बाद लगातार की गई छापेमारी में पाए गए सभी जमातियों को पुलिस ने क्वारंटाइन कराया था, जिनमें से कई जमाती कोरोना पॉजीटिव भी मिले थे।

हकीकत तो यह है कि किसी भी हाल में प्रदेश सरकार जमातियों को खोजकर कोरोना से निपटने के लिए इन्हें क्वारंटाइन कर देना चाहती है। यही कारण है कि आजमगढ़ की पुलिस ने जमातियों का पता बताने पर 5000 रुपए का इनाम घोषित कर दिया है। आपको बता दें कि गुरुवार को यूपी पुलिस ने प्रदेश के विभिन्न जिलों से 48 जमातियों को घरों से खोज निकाला था।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में अब तक कोरोना से 4 लोगों की मौत और इससे संक्रमित लोगों की संख्या 431 हो गई है। वहीं इनमें से 246 तबलीगी जमात से जुड़े हुए जमाती हैं।

चाँद मोहम्मद ने भूख से मरने का नाटक कर मँगवाया खाना, घर में था खूब राशन, फ्रिज में चिकन: होगी कार्रवाई

किचन में महीने भर का राशन, फ्रिज में चिकन। घर में मोटरसाइकल, गैस कनेक्शन, फ्रिज, कूलर सभी चीजें उपलब्ध, फिर भी भूख से मरने का नाटक कर सरकारी कर्मचारियों से खाना मँगवाया। ये मामला है राजस्थान के खानपुरा क्षेत्र का। यहाँ के चाँद मोहम्मद नाम के शख्स ने प्रशासन से फोन करके भूख से मरने की बात कही। फिर उसने दोबारा फोन करके कहा कि वो भूख से मर रहा है। प्रशासन खाना लेकर उसके मरने के बाद पहुँचेगी क्या?

अतिरिक्त जिला कलक्टर हीरालाल मीणा ने बताया कि प्रशासन ने उसकी बातों को गंभीरता से लिया और आनन-फानन में अधिकारी सूखी राशन सामग्री एवं तैयार भोजन के पैकेट लेकर गए। मगर वहाँ का नजारा देखकर अधिकारी सन्न रह गए। चाँद मोहम्मद के घर में ना सिर्फ पर्याप्त मात्रा में आटा-चावल और अन्य सामग्रियाँ भरी हुई थी, बल्कि उसका फ्रिज भी चिकन से भरा हुआ था। इसके बावजूद उसने भूख से मरने का झूठ बोला। इसके बाद जिला प्रशासन ने चाँद के खिलाफ कानूनी कर्रवाई की बात करते हुए उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है।

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उल्लेखनीय है कि पूरा देश इस वक्त कोरोना संकट से जूझ रहा है। दिन प्रतिदिन इसके मामले बढ़ते जा रहे हैं। सरकार और प्रशासन इसको लेकर काफी मुस्तैदी से काम कर रही है। पूरे देश में लॉकडाउन जारी है, मगर किसी को भी कोई परेशानी न हो, कोई भी भूख से न मरे इसका भी पूरा ख्याल रखा जा रहा है। पुलिस और सरकारी कर्मचारी इस बात को लेकर काफी सक्रिय हैं कि कोई भी शख्स खाने के लिए न तरसे। इसलिए इस तरह की किसी भी सूचना के मिलने पर वह तैयार खाना और राशन लेकर उनके पास दौड़कर पहुँचते हैं।

मगर चाँद मोहम्मद जैसे कुछ लोग मौके की नजाकत को बिल्कुल ही नहीं समझते हैं और इसका गलत फायदा उठाते हैं। इनकी वजह से जरुरतमंद लोग खाने से महरुम रह जाते हैं और 24 घंटे काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों को भी काफी परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं। इनके जैसे लोगों की वजह से उन जरुरतमंदों तक राहत सामग्री नहीं पहुँच पाती है, जिन्हें वाकई में इनकी जरुरत है। इन जैसे लोगों को शर्म आनी चाहिए, जो गरीबों से मुँह से निवाला छीनने का काम करते हैं। ये समय एक-दूसरे की मदद करने का है, परेशान करने का या फिर किसी का हक छीनने का नहीं।