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मालेगाँव में MLA मौलाना मुफ़्ती इस्माइल और उसके गुंडों ने डॉक्टर को पीटा, हॉस्पिटल स्टाफ धरने पर

कोरोना महामारी से लड़ने के लिए लॉकडाउन किए जा चुके भारत में एक तरफ जहाँ सभी अपने-अपने स्तर पर इस घातक वायरस से होते संक्रमण को रोकने का प्रयास कर रहे हैं, देश का हर व्यक्ति कोरोना संक्रमित मेडिकल स्टॉफ के प्रति आभार जता रहा है, वहीं कुछ लोग इन्हीं डॉक्टर्स से बदसलूकी करने से बाज नहीं आ रहे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ओवैसी की एआईएमआईएम पार्टी से विधायक मौलाना मुफ़्ती इस्माइल ने अपने समर्थकों के साथ मालेगाँव अस्पताल पहुँचे और अस्पताल के स्टॉफ के साथ बदतमीजी और मारपीट करने लगे। रिपोर्ट्स के अनुसार यह सारा मामला तब शुरू हुआ जब डॉक्टर किशोर डांगे ने विधायक का फोन नहीं उठाया।

अपनी धौंस दिखाते हुए विधायक मुफ़्ती मोहम्मद इस्माइल अपने 20-25 कार्यकर्ताओं के साथ अस्पताल में घुस कर डॉक्टर किशोर डांगे से बहस और गाली-गलौज करने लगे, अस्पताल प्रशासन को धमकाने लगे। डॉक्टर को गालियाँ देता विधायक एएनआई के इस ट्वीट में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है।

गौरतलब है कि इस साल के शुरुआत में दो संदिग्धों ने एआईएमआईएम पार्टी लीडर रिजवान खान के मालेगाँव स्थित घर पर गोलीबारी की थी। उन्हीं में से एक उस गोलीबारी में घायल हो गया था, जिसका कोर्ट के आदेश पर कथित तौर पर अस्पताल में इलाज चल रहा था। एक टीवी न्यूज़ चैनल की रिपोर्ट के अनुसार एआईएमआईएम के विधायक मुफ़्ती इस बात से नाराज थे कि उपरोक्त संदिग्ध को बगैर किसी पर्याप्त कागज के अस्पताल में बनाए रखा गया है।

कोरोना वायरस से संक्रमण के इस दौर में विधायक डॉक्टरों और मेडिकल स्टॉफ को अपनी ड्यूटी सही ढंग से न निभाने और गैर जिम्मेदाराना बर्ताव का आरोप लगाकर गाली-गलौज करता हुआ साफ देखा जा सकता है। एआईएमआईएम का विधायक खुद ही कह रहा है कि उसका फोन क्यों नहीं उठाया गया। इस घटना के बाद वीडियो वायरल से विधायक और उसके बदमाशों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने की माँग को लेकर अस्पताल का समूचा स्टाफ अस्पताल के बाहर धरने पर बैठ गया है। हालाँकि, कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों और एमरजेंसी चिकित्सा सुविधाएँ चालू रखी गई हैं।

‘इनका कसूर सिर्फ इतना है कि ये सिख हैं, ये उस मजहब के नहीं जिससे आतंकी आते हैं’

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के एक गुरुद्वारे पर हुए आतंकी हमले में बुधवार (25 मार्च 2020) को 27 सिख मारे गए थे। हमले की खबर ने सबको झकझोर दिया। सामने आई तस्वीरें दर्दनाक हैं। लगभग 150 सिखों पर उस समय हमला हुआ जब वह दुनिया को कोरोना के प्रकोप से बचाने की अरदास लेकर गुरुद्वारे में इकट्ठा हुए थे। मगर, यहाँ अचानक पाकिस्तान पोषित आतंकियों ने उन पर हमला कर दिया।

सबसे पहले एक फिदायीन हमलावर ने खुद को उड़ा लिया। फिर उसके बंदूकधारी साथियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की। पुलिस के एक्शन लेने के बाद कई लोगों का रेस्क्यू हुआ, लेकिन कुछ को बचाया न जा सका। जो लोग मानवता को बचाते-बचाते खुद शहीद हो गए, उनमें से 25 को आज अंतिम विदाई दी गई। इसका एक विडियो बीबीसी के पत्रकार रविंद्र सिंह रॉबिन ने शेयर की है। विडियो में सभी सिखों के शव को अंतिम संस्कार के लिए एक साथ रखा देखा जा सकता है और साथ ही अपनों को खोने के गम में परिजनों के सिसकने की आवाज भी सुनी जा सकती है।

रविंद्र सिंह रॉबिन वाहे गुरु से मदद माँगते हुए लिखते हैं, “काबुल में अभी 26 में से 25 निर्दोष सिखों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। कल ये सभी जब कोरोना वायरस के बीच दुनिया भर के अच्छे स्वास्थ्य की अरदास करने पहुँचे तब पाक समर्थित आतंकियों ने इन्हें निर्ममता से गोली मार दी। आखिर इनका क्या अपराध था?” पत्रकार रविंद्र सिंह के इस सवाल पर गुरप्रताप सिंह ने लिखा, इनका कसूर सिर्फ ये है कि ये सिख धर्म के अनुयायी हैं। ये उस मजहब से नहीं जिससे आतंकी आते हैं। उनके लिए सिख काफिर हैं और वे इन्हें मारना उचित समझते हैं। सिखों ने शाहीन बाग में लंगर तक बाँटा। लेकिन उनमें से कितनों ने इस हमले की निंदा की? शून्य।

वहीं, एसएस सिंह नाम के यूजर ने लिखा, “ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे भाइयों ने उस देश में अपनी किस्मत को लेकर जाकर छोड़ा, जहाँ उनके जीवन का मूल्य नहीं…। भारत में कुछ लोग इनके प्रवेश का विरोध करते हैं, इन्हें नागरिकता देने की बात पर राजनीति साधते हैं। क्योंकि वे चाहते हैं कि आतंकियों को भी नागरिकता दी जाए ताकि वे यहाँ उनका पालन कर सकें और हत्याएँ को जारी रख सकें।”

गौरतलब है कि कल यानी 25 मार्च को जब ये हमला हुआ उस वक़्त अरदास के लिए गुरुद्वारे में कई छोटे-छोटे बच्चे भी मौजूद थे। हमले के बाद हर तरफ चीख-पुकार मची हुई थी। सुरक्षाकर्मियों ने जब उन्हें बाहर निकाला, तब उनके चेहरे पर खौफ साफ दिखाई दे रहा था।

लॉकडाउन के बाद भी देहरादून की मस्जिद में जमा हुए नमाजी, पुलिस को देखते ही हुए फरार

एक तरफ पूरा देश कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहा है, तो दूसरी ओर लॉकडाउन घोषित होने के बाद भी मुस्लिम कट्टरपंथी मस्जिद जाने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ अब पुलिस ने सख्त कार्रवाई का मन बना लिया है। एक ऐसी ही खबर उत्तराखंड से सामने आई है, जहाँ लॉकडाउन के बाद भी एक मस्जिद में सैकड़ों की नमाज अदा करने के लिए लोग इकट्ठा हो गए। इसकी सूचना जब पुलिस को मिली तो वह मौके पर पहुँच गई। इसके बाद मस्जिद से सभी नमाजी फरार हो गए। पुलिस ने मस्जिद के मौलवी सहित 20-25 नमाजियों के खिलाफ में मुकदमा दर्ज किया है।

दरअसल, पूरे देश में लॉकडाउन घोषित होने के बाद भी बुधवार शाम को उत्तराखंड के सत्तो वाली घाटी में मौजूद मस्जिद में बड़ी संख्या में मु्स्लिम समाज के लोग नमाज के लिए इकट्ठे हो गए। जानकारी मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुँची। पुलिस को मस्जिद की तरफ आते देख नमाज अदा कर रहे लोग अलग- अलग गलियों में घुस गए।

इसके बाद पुलिस को मौके पर कोई नहीं मिला। पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए कोरोना वायरस को लेकर लागू धारा 144 उल्लंघन करने के आरोप में मस्जिद के मौलवी अब्दुल मद सहित 20- 25 अज्ञात नमाजियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया।

वहीं कोरोना के लगातार बढ़ते प्रकोप के बीच उत्तराखंड पुलिस ने बुधवार को शहर की सभी मस्जिदों में नमाजियों के आने पर रोक लगा दी। पुलिस ने घर पर ही नमाज अदा करने की अपील की है। इतना ही नहीं पुलिस ने इस संबंध में बुधवार को ही मस्जिदों से ऐलान करा दिया। उत्तराखंड पुलिस ने यह भी साफ किया है कि मस्जिदों में केवल इमाम और मुअज्जिन ही नमाज अदा करेंगे। इस दौरान दोनों को मस्जिद के अंदर ही रहना होगा। वहीं पुलिस की सख्ती के बाद अब मौलवी खुद मस्जिदों से ऐलान कर रहे हैं कि लोग घरों से बाहर न निकलें और ऐसे हालात में अपन-अपने घरों में नमाज अदा करें, क्योंकि पुलिस ने सभी मस्जिदों में नमाजियों के आने पर पाबंदी लगा दी है।

आपको बता दें कि देश में कोरोना वायरस से अब तक 15 मौतें हो चुकी हैं, साथ ही इससे संक्रमित लोगों की संख्या 600 के करीब हो गई है। यही कारण है कि तेजी से बढ़ते कोरोना के प्रकोप की रोकथाम के लिए मोदी सरकार ने भारत में 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से घरों में ही रहने की अपील की है। लॉकडाउन 14 अप्रैल तक लागू रहेगा।

The Hindu के ‘इस्लामोफोबिक’ कार्टून में लोगों ने पहचाना कोरोना वायरस का लिबास और मजहब

देश की मुख्यधारा की मीडिया और समाचार पत्रों पर अक्सर पूर्वग्रहों को लेकर कई तरह के आरोप लगाए जाते रहे हैं। कई बार देखा जाता है कि अभिव्यक्ति की आजादी का सहारा लेकर हिन्दू मान्यताओं और प्रतीकों को किसी भी शक्ल और नैरेटिव में पिरोकर जनता के सामने रखा जाता है और ख़ास विरोध भी इस बारे में बमुश्किल देखा जाता है। लेकिन कारोना वायरस की महामारी के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता ने पाला बदलने का प्रयास किया और यह खतरा मोल लिया है।

मशहूर समाचार पत्र द हिन्दू (The Hindu) ने 26 मार्च के अपने कार्टून में कोरोना के खिलाफ सन्देश दिखाने की कोशिश की, जिस कारण यह अखबार एक बड़े वर्ग के निशाने पर आ गया है।

26 मार्च को द हिन्दू ने एक कार्टून चित्र पब्लिश किया, जिसमें कोरोना वायरस (Covid-19) को हाथों में बन्दूक थामे हुए पृथ्वी ग्रह को डराते हुए बताया गया है कि इसने पूरी पृथ्वी को आतंकित किया है। लेकिन कुछ लोगों ने इस कार्टून में भी कोरोना वायरस के ‘लिबास’ पहचान लिए और फिर इसे इस्लामोफ़ोबिक कार्टून घोषित कर दिया।

The Hindu में प्रकाशित 26 मार्च का कार्टून –

लेकिन, इस कार्टून पर कुछ इस्लामिक विचारधारा का अनुसरण करने वाले लोगों ने आपत्ति दर्ज की है। राना सफवी, जिनके ट्विटर अकाउंट में उपलब्ध जानकारी से पता चलता है कि वो स्तंभकार, लेखक होने के साथ-साथ गंगा-जमुनी तहजीब में भी यकीन करती हैं, ने द हिन्दू का यह कार्टून ट्वीट करते हुए लिखा है- “द हिन्दू की दैनिक पाठक और साथ ही साथ कंट्रीब्युटर होने के नाते, मैं इस इस्लामोफोबिक कार्टून से बेहद दुखी हूँ।” उन्होंने द हिन्दू समूह के चेयरमैन एन राम को टैग करते हुए निवेदन किया है कि कृपया इसे हटा दीजिए। इसके आगे राना सफवी ने लिखा है – “हम आपसे ‘उन्हें उनके कपड़ों से पहचानिए’ वाली कट्टरता की उम्म्मीद नहीं करते हैं।

@grumpeoldman ने भी द हिन्दू के इस कार्टून को ट्वीट करते हुए लिखा है- “द हिन्दू! यह बेहद कड़वा है। ‘उन्हें उनके कपड़ों से पहचानो’ का अनुसरण करने के कारण तुम्हें लोगों से माफ़ी माँगनी चाहिए।”

इस कार्टून में कोरोना वायरस का लिबास पहचानकर इससे आहत होने वाले लोगों की लिस्ट बहुत लम्बी है। @EqualityLabs नाम के एक अकाउंट ने भी द हिन्दू को टैग करते हुए लिखा है कि द हिन्दू को यह इस्लामोफोबिक कार्टून हटाना चाहिए क्योंकि यह चित्र मुस्लिम विरोधी भावनाओं के समान ही है और यह स्वीकार नहीं है।

@SharjeelUsmani ने लिखा है, “@the_hindu में आज छपे एक कार्टून में कुर्ता पाजामा पहने तीन लोग जिनके चेहरे की जगह कोरोना वाइरस बना है, हाथ मे राइफल लिए पृथ्वी पर निशाना साधे हैं। भारत के तथाकथित ‘अच्छे’ अखबार के अंदर का इस्लामोफोबिया.. बोल रहा है कोरोना मुस्लिमों जितना बुरा है या मुस्लिम कोरोना जितने बुरे हैं?”

गौरतलब है कि पैगंबर मोहम्मद के कार्टून छापने से नाराजगी के कारण जनवरी 07, 2015 को फ्रांस की प्रसिद्ध व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ पर आतंकवादी हमला हुआ था, जिसमें दो हमलावरों ने हमला कर 12 लोगों को जान से मार दिया। उनका कहना था कि पैगम्बर का कार्टून छापना इस्लाम के खिलाफ है।

शार्ली एब्डो के दफ्तर में हमलावर एक स्वचालित रायफल कालशनिकोव और रॉकेट लॉंचर से लैस होकर घुसे थे और जोर-जोर से कह रहे थे, “हमने पैगंबर का बदला लिया है” और साथ ही ‘अल्लाहु अकबर’ के मज़हबी नारे भी लगाए। इसके बाद पत्रिका के शीर्ष संपादक लॉरेन सूरिसो ने घोषणा की थी कि अब उनकी पत्रिका में कभी भी पैगंबर के कार्टून नहीं छापेंगे।

मक्का से लौटे 37 लोगों ने मुंबई एयरपोर्ट पर लगा क्वारेंटाइन स्टांप मिटाया: मॉं-बेटे के संक्रमित होने के बाद खुलासा

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मॉं-बेटे के कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। बेटे को मॉं से ही संक्रमण हुआ है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक युवक की मॉं सहित 37 लोग मक्का से उमरा कर लौटे थे। मुंबई एयरपोर्ट पर जॉंच के बाद इनके हाथ पर क्वारेंटाइन का स्टांप लगाया गया। लेकिन, एक खास परफ्यूम से स्टांप मिटा ये लोग अपने घर पहुॅंच गए। इनकी इस कारगुजारी से न इनके जीवन पर संकट पैदा हो गया बल्कि इन्होंने सैकड़ों और के जीवन को संकट में डाल दिया है।

पूरा मामला एक महिला की तबीयत बिगड़ने के बाद सामने आई। इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने सभी मक्का से लौटे सभी 37 लोगों को क्वारेंटाइन सेंटर भेज दिया है। इस 45 वर्षीय महिला को तबीयत बिगड़ने पर जिला अस्पताल ले जाया गया गया। जहाँ उसकी ट्रैवल हिस्ट्री और लक्षण देख सैम्पल्स किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज लखनऊ भेजे गए थे। इस महिला के कोरोना पॉजिटिव निकलने के बाद, उसके साथ उमरा कर के आए अन्य लोगों और उसके बेटे का भी टेस्ट करवाया गया। वह भी कोरोना संक्रमित पाया गया।

जिले के पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि पूछताछ करने पर पता चला कि विदेश से लौट कर आने के कारण मुंबई एयरपोर्ट पर इन सभी को क्वारेंटाइन की मुहर लगाई गई थी। इसे इन सभी ने मिटा दिया। जाँच-पड़ताल के चक्कर से बचने के लिए मुंबई से ट्रेन के जरिए लखनऊ ट्रेन पहुँचे। वहॉं से बस से पीलीभीत आए। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये सभी पीलीभीत के उमरिया तहसील स्थित गाँवों के रहने वाले हैं, जिनमें से लगभग 25 एक ही गाँव के हैं।

जिले के प्रशासनिक और स्वास्थ्य विभाग के लोगों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि उमरा से लौटे इस ग्रुप के सभी 37 सदस्यों को पीलीभीत के क्वारेंटाइन सेंटर पहुँचा दिया गया है। गौरतलब है कि कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए सरकार कई तरह के कदम उठा रही है। देश में 21 दिनों का लॉकडाउन है। लेकिन, लोगों की लापरवाही भारी पड़ रही है। पीलीभीत की तरह ही कश्मीर में भी प्रशासन को करीब 400 शिकायतें ट्रैवल हिस्ट्री छिपाने की मिली है।

जामिया का प्रोफेसर सस्पेंड, मजहब विशेष वाले ऑपइंडिया को बना रहे निशाना

जामिया मिल्लिया इस्लामिया का असिस्टेंट प्रोफेसर अबरार अहमद ट्वीट करता है कि उसने सीएए का समर्थन करने वाले अपने 15 गैर मुस्लिम छात्रों को फेल कर दिया है। ऑपइंडिया इस पर रिपोर्ट करता है। मामला तूल पकड़ता है। फिर अबरार सफाई देते हुए कहता है कि वह मजाक कर रहा था। यूनिवर्सिटी प्रशासन उसकी करतूत को गंंभीर मानता है। उसे जाँच पूरी होने तक सस्पेंड कर देता है। सब कुछ एक प्रक्रिया की तरह होता है। लेकिन इसी दौरान कुछ मुसंघी अबरार के निलंबन की खबर पढ़कर चिढ़ जाते हैं और ऑपइंडिया को गैर प्रमाणिक बताकर उसे टारगेट करने लगते हैं।

अब पढ़िए कि प्रशासन के एक्शन पर कैसे ये लोग ऑपइंडिया पर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं।

मोहम्मद अरशद खान प्रशासन के फैसले को पढ़कर हैरानी जताता है और कहता है, “क्या सच में? प्रशासन ने पक्षपाती दक्षिणपंथी संघी समाचार पोर्टल की रिपोर्ट पर संज्ञान लिया और अति सम्मानित संकाय फैकल्टी को कुछ ही घंटों में निलंबित कर दिया। मगर इतने समय से पुलिस के ख़िलाफ़ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की। जिन्होंने परिसर में घुसकर बर्बरता की।”

मोहम्मद सरफराज नाम का यूजर लिखता है, “मैं जामिया मिलिया इस्लामिया का छात्र हूँ। प्रोफेसर अबरार मेरे क्लास टीचर थे। मुझे अच्छी तरह से पता है कि वे कितना प्यारे प्रोफेसर हैं और यहाँ तक ​​गैर मुस्लिम छात्र भी मेरी कक्षा में उनके साथ बहुत खुश थे। अपनी सीमा में रहो।”

मिर्ज़ा बिला बेग ऑपइंडिया की खबर को फेक न्यूज बताता है और कहता है, “एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर अबरार अहमद को ऑपइंडिया द्वारा लगाए झूठे आरोपों के आधार पर निलंबित कर दिया गया।”

मोहम्मद अरशद वारसी ने जामिया प्रशासन को पागल बताते हुए लिखा, “क्या…जामिया मिल्लिया इस्लामिया प्रशासन तुम पागल हो गए हो। ऑपइंडिया के फेक ट्वीट पर एक आदर्श टीचर के ख़िलाफ़ एक्शन ले लिया। क्या तुम बहरे और अंधे हो। तुम्हें दिखता नहीं कि अबरार अहमद ने एक व्यंग्य लिखा था।”

जिक्र नायक नामक यूजर लिखता है कि आखिर जामिया प्रशासन क्या कर रहा है? पहले अबरार सर को उनका मत रखने का मौका दो, फिर एक्शन लो। ये सब बिलकुल एकतरफा है। तुम्हें सारे चार्ज वापस लेने चाहिए।

अबु बकर, अबरार के ट्वीट का मतलब समझाने की कोशिश करता है और कहता है कि प्रोफेसर अबरार ने वैसा बिलकुल नहीं कहा, जैसा ऑपइंडिया द्वारा फैलाया जा रहा है। प्रोफेसर अबरार ने कभी भी बच्चों के साथ जाति-पाति पर भेदभाव नहीं किया। मैं सलाह देता हूँ कि अगर आपको सबूत चाहिए तो कॉलेज के नॉन मुस्लिम छात्रों से बात करें। किसी को अंधा होकर फ़ॉलो न करें।

इसके अलावा भड़काऊ बयानों के कारण फॉलोवर इकट्ठा करने वाला पत्रकार अली सोहराब भी इस मामले में ऑपइंडिया को आरएसएस का मुखपत्र कहने से नहीं चुकता। काकावाणी नाम के अकाउंट से सोहराब अपने फॉलोवर्स को भड़काते हुए लिखता है कि ऑपइंडिया इस्लाम को गाली देने वालों को प्रमोट करता है और आतंकी संगठन आरएसएस का मुखपत्र हैं। ये हर रोज मुस्लिमों को टारगेट करता है। अभी हाल फिलहाल में शरजील इमाम और खुद मुझे टारगेट कर चुका है। आज अबरार को टारगेट किया है। कल आप का नंबर हो सकता है।

अब जिस बात को लेकर अबरार के समर्थक इतना जहर उगल रहे हैं वह खुद उसने ट्वीट कर कबूला था। सीएए समर्थक छात्रों को फेल करने की बात करना, उन्हें धमकी देना किस तरह का व्यंग्य है यह समझ से परे है। ऑपइंडिया ने अपने तरफ से कोई झूठ दावे नहीं किए। जैसा अबरार ने सोशल मीडिया में कहा है वही सब पाठकों को बताया है। अबरार के इसी कबूलनामे पर यूनिवर्सिटी प्रशासन भी एक्शन लिया है।

कोरोना चैलेंज के नाम पर एक और टिकटॉक यूजर ने चाटी टॉयलेट सीट, हुआ संक्रमण

कोरोना वायरस को एक मजाक समझकर उसे हल्के में लेने वाले और उस पर उल-जुलूल बयान जारी करने वाले धीरे-धीरे इसकी गंभीरता से वाकिफ हो रहे हैं। मगर, अभी भी कुछ सनकी लोग ऐसे हैं जो सब कुछ जानते समझते हुए इसे सिर्फ़ एक ट्रेंड मान रहे हैं और चैलेंज की तरह ले रहे हैं। नतीजतन वे खुद अपनी गलतियों के कारण इसका शिकार हो रहे हैं।

ताजा उदहारण देखिए। शुक्रवार को एक टिकटॉक यूजर ने अपनी एक विडियो डाली। विडियो में वो टॉयलेट सीट को चाटते नजर आया। इस दौरान लोगों ने उसकी बहुत आलोचना की। मगर उस पर कोई फर्क़ नहीं पड़ा। उसने इस विडियो को कोरोना वायरस चैलेंज बताया। लेकिन, इस हरकत के कुछ दिन बाद में मालूम पड़ा कि वो खुद कोरोना से संक्रमित हो गया है और इसकी जानकारी भी उसने विडियो डालकर सबको दी है।

अब हालाँकि, लार्ज नाम का ये 21 वर्षीय लड़का वाकई अपनी इसी हरकत के कारण वायरस से संक्रमित हुआ है या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। लेकिन लोग इस समय सोशल मीडिया पर उसका विडियो शेयर कर खूब आलोचना कर रहे हैं। उसे गैर जिम्मेदार बता रहे हैं। कुछ लोग तो ये सब देखकर उसका मजाक भी उड़ा रहे हैं। ट्विटर ने तो इसका अकाउंट भी सस्पेंड कर दिया है।

गौरतलब है कि कोरोना चैलेंज का नाम पर लापरवाही और बेहूदगी दिखाने वाले शख्स से पहले एवा नाम की टिकटॉक यूजर भी ऐसी हरकत करने के लिए खबरों में आई थीं। एवा ने 15 मार्च को विडियो बनाकर टिकटॉक पर अपलोड की थी और कैप्शन में लिखा था, प्लीज इसे रीट्विट करें, ताकि लोग जान सकें कि विमान में सफाई कैसे की जा सकती है। यहाँ हालाँकि कैप्शन में ऐसा कुछ नहीं था, लेकिन विडियो यदि देखें तो एवा इसमें कोरोना वायरस के नाम पर टॉयलेट की सीट को जीभ से चाटते देखी जा सकती हैं और ऐसी घटिया हरकत करने के बाद वो अपने हाथ से विक्टरी का साइन भी बनाती दिखती हैं।

इस विडियो को भी कुछ समय पहले खूब शेयर किया गया था और एवा की विडियो को देखने के बाद अधिकांश लोगों ने उस पर पॉजिटिव रिएक्ट नहीं किया है, जो कि एक संतोषजनक बात थी। लेकिन उस समय ये सवाल जरूर उठा था कि जरूरी नहीं प्रतिक्रिया देने वाला हर व्यक्ति समझदार ही हो, क्योंकि उन लोगों का क्या भरोसा जो हर डिजिटल चुनौती को पूरा करने के लिए आमादा हो जाते हैं और इसी जुगत में लग जाते हैं कि किसी तरह वह भी ऐसे स्टंट करके टिकटॉक स्टॉर बनें और उनकी विडियो भी वायरल हो जाए।

लॉकडाउन के बाद भी मैनपुरी की मस्जिद में जुटे नमाजी, मौके पर पहुँची पुलिस से भिड़े

कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा किस तेजी से बढ़ रहा यह छिपा नहीं है। इसका प्रसार रोकने के लिए 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से घर से बाहर नहीं निकलने की अपील की है। बावजूद इसके समुदाय विशेष के कुछ लोग चेत नहीं रहे। लॉकडाउन को नजरअंदाज कर मस्जिदों में नमाज के लिए एकत्र हो रहे हैं। ऐसा ही मामला सामने आया है उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिला से। यहाँ की एक मस्जिद में लॉकडाउन के बाद भी भीड़ नमाज के लिए जुट गई। इतना ही नहीं सूचना पर पहुँची पुलिस से भी नमाजी भिड़ गए। हालाँकि बाद में पुलिस ने समझाकर लोगों को शांत कर दिया।

दरअसल पूरे देश में 21 दिनों के लिए घोषित लॉकडाउन के बाद भी बुधवार को मैनपुरी के भोगांव कस्बे के मोहल्ला मोहम्मद सईद स्थित मस्जिद में नमाज अदा करने के लिए नमाजियों की भीड़ इकट्ठा हो गई। इसकी जानकारी जब इलाका पुलिस को हुई तो तत्काल प्रभारी निरीक्षक पोहप सिंह, हल्का इंचार्ज भीपेन्द्र सिंह सिरोही और कुछ पुलिसकर्मियों के साथ मौके पर पहुँच गए, जहाँ पुलिस ने लोगों से मस्जिद का दरवाजा खोलने के लिए कहा। इसी बात पर मुस्लिम समाज के लोग आक्रोशित हो गए और फिर पुलिस और मुस्लिम समुदाय के लोगों के बीच गहमागहमी शुरू हो गई। माहौल बिगड़ता देख कंट्रोल रूम को सूचना दी गई, जिसके बाद मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस पहुँच गई।

पुलिस के अधिकारियों ने लोगों को समझा बुझाकर मामला शांत किया। साथ ही प्रभारी निरीक्षक ने लोगों से अपील की कि वह लॉकडाउन जारी रहने तक अपने घरों में ही नमाज अदा करें। साथ ही चेतावनी दी कि किसी भी कीमत पर लॉकडाउन रहने तक मस्जिदों में न जुटें। अन्यथा उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कनूनी कार्रवाई की जाएगी।

आपको बता दें कि इससे पहले मेरठ में भी मुस्लिम समुदाय के लोगों ने बीते रविवार को जनता कर्फ्यू के दौरान पुलिस द्वारा मस्जिदों में इकट्ठे न होने की अपील का विरोध किया था, जिसके बाद पहले तो पुलिस ने लोगों को काफी समझाया था, लेकिन इसके बाद भी न मानने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी। तब जाकर मुस्लिम समाज के लोग अपने घरों को लौटे। आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 38 हो गई है।

अगले 3 महीने तक प्रति व्यक्ति 10 किलो चावल/गेहूँ के साथ 1 किलो फ्री दाल: 1.70 लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान, 80 करोड़ गरीबों को मिलेगा लाभ

कोरोना वायरस संकट से निपटने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बृहस्पतिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की। केंद्र की सरकार ने गरीबों के लिए 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपए के राहत पैकेज का ऐलान किया है। वित्‍त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस राहत पैकेज की घोषणा की है।

आर्थिक पैकेज की राशि का इस्तेमाल 10 करोड़ गरीबों के खाते में सीधे रकम ट्रांसफर करने और उद्योगों को राहत देने के लिए किया जाएगा। कोरोना वायरस संक्रमण फैलने से रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को देशभर में 21 दिन का लॉकडाउन घोषित किया था। इससे जनजीवन और आर्थिक गतिविधियां ठहर गई हैं।

गरीब वरिष्‍ठ नागरिकों, विधावाएं और दिव्‍यांगों को तीन महीने तक एक्‍स्‍ट्रा 1,000 रुपए डायरेक्‍ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए दिया जाएगा। महिला जन-धन खाताधारकों को 500 रुपए राशि उनके खाते में भेजी जाएगी। इससे 20 करोड़ महिलाओं को लाभ होगा। उज्‍ज्‍वला स्‍कीम के तहत 8 करोड़ से ज्‍यादा बीपीएल महिलाओं को इस कठिन समय में तीन महीने तक एलपीजी सिलेंडर मुफ्त में दिया जाएगा।

वित्त मंत्री ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि हम किसी को भूखा और रुपयों के बिना नहीं रहने देंगे। उन्होंने कहा कि 24-25 की रात को लॉकडाउन शुरू किया गया है। सरकार प्रभावितों और गरीबों की मदद के लिए काम कर रही है। हमें उन तक पहुँचना है। केवल 36 घंटे हुए हैं। हम पैकेज लेकर आए हैं, जो गरीबों का ध्यान रखेगा, जिन्हें तुरंत मदद की जरूरत है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत किसी गरीब को भूखा नहीं रहने दिया जाएगा।

अभी गरीबों को 5 किलो गेहूँ या चावल हर महीने प्रति व्यक्ति मिलता है इसके अतिरिक्त अगले तीन महीने तक 5 किलो प्रति व्यक्ति मुफ्त गेहूँ या चावल दिया जाएगा। एक किलो प्रति परिवार दाल भी दिया जाएगा। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण धन योजना के तहत किसानों, मनरेगा, गरीब विधवा, गरीब पेंशनधारी और दिव्यांगों, और जन-धन अकाउंट धारी महिलाओं, उज्ज्वला योजना की लाभार्थी महिलाएं, स्वंय सेवा समूहों की महिलाओं और संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों, कंस्ट्रक्शन से जुड़े मजदूरों को मदद दी जाएगी।

इसके अलावा कंस्‍ट्रक्‍शन से जुड़े 3.5 करोड़ मजदूरों के लिए 31,000 हजार रुपए के फंड का सदुपयोग किया जाए। इसके लिए राज्‍य सरकारों से कहा जाएगा। कोरोना वायरस से जंग के लिए मेडिकल टेस्‍ट, स्‍क्रीनिंग और अन्‍य जरूरतों के लिए डिस्ट्रिक्‍ट मिनेरल फंड का उपयोग करने की आजादी राज्‍य सरकारों को दी जाएगी। कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए भी इस फंड का उपयोग किया जाएगा।

100 से कम कर्मचारी वाली कंपनी जिसमें 90 फीसद कर्मचारियों का वेतन 15,000 रुपए से कम है, उसके कर्मचारियों के ईपीएफओ खाते में सरकार अगले तीन महीने तक कर्मचारी और कंपनी की तरफ से पैसे डालेगी। सरकार दोनों की तरफ से 12-12 फीसद का योगदान करेगी। इससे 80 लाख से ज्‍यादा मजदूरों को लाभ लेगा।

संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए ईपीएफओ के रेगुलेशन में बदलाव किया जाएगा। अब कर्मचारी अपने प्रोविडेंट फंड खाते से 75 फीसद राशि या तीन महीने की सैलरी, जो भी राशि कम हो, की निकासी कर सकते हैं। ये पैसे उन्‍हें वापस नहीं करने होंगे।

50 लाख का बीमा कवर उन लोगों को मिलेगा जो कोरोना वायरस के इलाज में प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इनमें डॉक्‍टर, पैरामेडिकल स्‍टाफ, सफाई कर्मचारी आदि शामिल हैं।

लॉकडाउन से प्रभावित गरीबों की मदद की जाएगी। जिन लोगों को तुरंत मदद की जरूरत है, उन्हें राहत दी जाएगी। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना लाई जाएगी। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 80 करोड़ गरीब लोगों को 3 महीने तक राशन के अलावा 5 किलो गेहूँ या 5 किलो चावल अतिरिक्त दिया जाएगा। इसके अलावा एक किलो दाल भी दी जाएगी।यह खाद्य सामग्री राशन के अलावा होगी, यह फ्री दी जाएगी। 

किसानों के खाते में 2000 रुपए की किश्त अप्रैल के पहले हफ्ते में डाल दी जाएगी, इससे 8.69 करोड़ किसानों को फायदा मिलेगा। मनरेगा के तहत मजदूरी 182 से बढ़ाकर 202 रुपए की गई। 3 करोड़ सीनियर सिटीजंस, विधवाओं, दिव्यांगों को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर डीबीटी का फायदा मिलेगा।

वित्त मंत्री कोरोना से लड़ने के लिए सभी तरह के राहत पैकेज की घोषणा करते हुए

‘जामिया में जिहादियों और नक्सलियों की साँठगॉंठ, हिजाब वाली डायरेक्टर हमेशा नीचा दिखाती थी’

नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन करने के कारण गैर मुस्लिम छात्रों को फेल करने का मामला जामिया मिलिया इस्लामिया से आया है। अबरार अहमद नाम के असिस्टेंट प्रोफेसर ने ट्वीट कर ऐसे 15 गैर मुस्लिम छात्रों को फेल करने का दावा किया था। मामले के तूल पकड़ने के बाद सफाई देते हुए उसने इसे मजाक बताया था। हालॉंकि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने जॉंच पूरी होने तक उसे सस्पेंड कर दिया है।

जाकिर नायक के फैन अबरार के कट्टरपंथी विचारों और कारनामों को लेकर ऑपइंडिया ने विस्तार से रिपोर्ट की थी। इसके बाद सोशल मीडिया में कई लोग जामिया की अपनी आपबीती लेकर सामने आ रहे हैं। आधिकारिक तौर पर इनकी ऑपइंडिया पुष्टि नहीं करता। लेकिन, इससे संकेत मिलता है कि जामिया में गैर मुस्लिम छात्रों के साथ भेदभाव का सिलसिला पुराना है।

खुद को जामिया का पूर्व छात्रा बताने वाली शिवांगिनी पाठक ने बताया है उन्हें उनके नाम के कारण कभी पसंद नहीं किया गया। हमेशा उन प्रोफेसर्स ने उन्हें कम नंबर दिए जिनका झुकाव नक्सलियों की ओर था।

दरअसल, संजय दीक्षित ने इस मामले पर ऑपइंडिया की खबर को शेयर करते हुए लिखा कि गैर मुस्लिमों की मुस्लिम बहुल आबादी में ये किस्मत होती है। शिवांगिनी ने इस पर रिप्लाई करते हुए आपबीती बताई है। उन्होंने लिखा, “मैंने जामिया से MA किया है। प्रथम वर्ष में 67% अंकों के साथ टॉप भी किया था। लेकिन हिजाब वाली एक डायरेक्टर मुझे हमेशा नीचा दिखाती थी, क्योंकि उन्हें मेरा नाम नहीं पसंद था। नक्सलियों के प्रति झुकाव रखने वाले एक अन्य प्रोफेसर ने मुझे हमेशा कम नंबर दिए। जिहादी नक्सलियों की सॉंठगॉंठ काफी मजबूत है।”

शिवांगिनी के इस अनुभव को कई लोगों ने रीट्वीट करते हुए कहा है कि अगर शिवांगी द्वारा कही गई आधी बातें भी सच हैं, तो ये एक गंभीर विषय है। हमें इस नफरत भरे रवैए पर चिंता करनी चाहिए। क्या ऐसे प्रोफेसर यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लायक हैं?