आज बात करेंगे ‘द टेलिग्राफ’ के हेडलाइन्स की और ऐसी कई हेडलाइन की जिन्हें अक्सर टेलिग्राफ के मुख्य पृष्ठ पर देखा तो जाता है, लेकिन पूरी खबर के अंदर उस शब्द का जिक्र तक नहीं मिलता, जिसका इस्तेमाल अक्सर हेडलाइन में नजर आता है। ‘द टेलिग्राफ’ नाम का अखबार एबीपी ग्रुप का ही एक अखबार है, जिसे एक पूरे परिवार द्वारा संचालित किया जाता है। खैर, 17 मार्च को अखबार ने अपने पहले पेज पर एक खबर लगाई, जो कि बीजेपी द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किए गए पूर्व चीफ जस्टिस रहे रंजन गोगोई को लेकर थी। अखबार ने हेडलाइन में लिखा ‘कोविंद, नोट कॉविड, डिड इट’ मतलब कि रंजन गोगोई कोरोना वायरस के कारण नहीं बल्कि रामनाथ कोविंद के कारण राज्यसभा पहुँचे हैं। इतना ही नहीं नीचे खबर में राफेल और अयोध्या मामले को टारगेट करके गोगोई की खबर को लिखा गया।
अब ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि एक देश के सम्मानित पद पर बैठे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का नाम को कोरोना वायरस से क्यों जोड़ा गया? दरअसल अखबार का यही अजेंडा है कि किसी भी तरह से अपने से अलग विचारधारा वाले लोगों, पार्टियों और विचारकों पर मुखर हो कर, नीचता से हमला करे। इसी कड़ी में राष्ट्रपति कोविंद भी आते हैं जो बीजेपी की ओर से राष्ट्रपति बने और आरएसएस की विचारधारा से हैं। इसीलिए उनको अखबार ने अपना निशाना बनाया और कोरोना वायरस से उनकी तुलना की। वैसे भी इन वामपंथी लम्पट गिरोह को हिन्दू धर्म से, भाजपा से, संघ से और हर गैर-वामपंथी विचारधारा से हमेशा घृणा रही है।
रामनाथ कोविंद के सामाजिक और राजनैतिक जीवन के बारे में तो अधिकांश लोगों को यही पता होता है कि वह राष्ट्रपति बनने से पहले बिहार के राज्यपाल भी थे, लेकिन बड़ी बात यह नहीं बल्कि यह है कि वह पहले बीजेपी द्वारा भेजे गए ऐसे राष्ट्रपति है, जो पिछड़ी जाति से आते हैं और आरएसएस से भी जुड़े रहे हैं। इनका जन्म एक मिट्टी के छोटे से घर में हुआ जो कि बाद में गिर गया था। इसके बाद, जब कोविंद पाँच वर्ष के थे तब उनकी माता जी का देहांत फूस की छत वाले घर में आग लगने के कारण हो गया। इसके बाद बड़े हुए तो हर रोज आठ किलोमीटर पैदर चलकर पढ़ाई करने के लिए जाते थे। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक छोटे से घर से निकले हुए व्यक्ति ने देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचने में कितनी मेहनत की होगी। जाहे फिर वह उनका राजनीतिक जीवन हो या फिर सामाजिक जीवन हो।
‘द टेलिग्राफ’ की हेडलाइन में शब्दों से खेलने की रही है फितरत
अब आप जरा ‘द टेलिग्राफ’ द्वारा हर रोज हेडिंग में एक प्रोपेगेंडा के तहत नए शब्दों को डालने की फितरत भी जान लीजिए। दरअसल इनका खबरों से अधिक हेडलाइन पर पूरा फोकस रहता है कि आखिर हेडलाइन में शब्दों के साथ कैसे खेला जाए और आश्चर्य की बात यह है कि पूरी खबर में उस हेडलाइन से जुड़ा कोई शब्द नहीं मिलेगा और न ही खबर में कोई रेफरेंस होगा। यहाँ तक कि ये लोग खुद पूरी खबर में भी बता नहीं पाते कि यह जो हेडलाइन बनाई गई है आखिर वह शब्द यहाँ क्यों लाए गए हैं।
आश्चर्य की बात यह कि ममता के बंगाल से छपने वाले इस अखबार में बंगाल के मजहबी दंगे दिखाई नहीं देते, बीजेपी और आरएसएस के कार्यकर्ताओं की आए दिन होती हत्याएँ नहीं दिखतीं, लेकिन दलितों को एक वायरस से तुलना करते हुए, राष्ट्रपति पर निशाना साधा जाता है, क्योंकि वो भाजपा-संघ से जुड़े हुए रहे हैं। यही अजेंडा इनकी घटिया जातिवादी सोच को और गाँधी परिवार की चापलूसी को दर्शाता है इस बात का अंदाजा आप खुद अखबार में छपी हेडिंग को पड़कर लगा सकते हैं।
नीचे के विडियो में मैंने इस प्रपंची अखबार के 15 मुखपृष्ठों की लीड पर बात की है:
चीन के वुहान से कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू हुआ था। दुनिया के करीब 150 देश इसकी चपेट में हैं। 5900 के करीब जानें जा चुकी हैं। इस वैश्विक महामारी से अब तक जिस तरीके से भारत निपटा है उसकी दुनिया भर में तारीफ हो रही है। लेकिन, एक वर्ग ऐसा भी है जो इस बात से निराश है कि कोरोना अब तक भारत में तबाही क्यों नहीं मचा पाया। इस वर्ग में न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे कुछेक मीडिया संस्थान भी हैं। मोदी घृणा से सने इस संस्थान को कोरोना का प्रसार रोकने के लिए भारत सरकार की ओर से उठाए गए कदमों में कुछ नहीं दिखता। उसे तो यह रहस्य लगता है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश में संक्रमण बेहद सीमित क्यों है।
न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख के अनुसार भारत कोरोना वायरस के ख़तरे से निपटने के लिए संघर्षशील है। अब तक उसके प्रयासों का परिणाम अच्छा रहा है। वो लिखता है कि अब तक भारत में कोरोना वायरस के महज सवा सौ केस ही आए हैं और ये एक रहस्य ही है कि 130 करोड़ की जनसंख्या वाला देश अब तक इस खतरे से अछूता ही रहा है। वो भी तब, जब इसके पूर्व और पश्चिम में हाहाकार मचा हुआ है। ऑस्ट्रेलिया और चीन इससे ज्यादा दूर नहीं हैं।
एनवाइटी के इस लेख की बात करने से पहले प्रमुख ऑस्ट्रेलियाई मीडिया संस्थान एबीसी के दक्षिण एशियाई कॉरस्पोंडेंट जेम्स ओटेन के कहे पर गौर करिए। उन्हीं की बातों में एनवाइटी के दर्द का कारण छिपा हुआ है। उन्होंने एबीसी के एक लेख के माध्यम से बताया है कि वो भारत में अपने देश ऑस्ट्रेलिया से ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। मार्च की शुरुआत में जब देश में कोरोना वायरस के मात्र 6 मामले आए थे, तभी भारत ने जापान, दक्षिण कोरिया, इटली और ईरान के लिए अपनी सीमाओं को बंद कर दिया था। 12 मार्च को जैसे ही मरीजों की संख्या 70 हुई, सभी देशों से आने वाले नागरिकों के वीजा को अस्थायी रूप से निष्प्रभावी कर दिया गया।
India has reported around 125 cases of the coronavirus, and it is a bit of a mystery how the world’s second-most-populous nation, with 1.3 billion people, has remained relatively unscathed while the number of cases explodes to its east and west https://t.co/6eCRkS3V2r
जेम्स लिखते हैं कि जब ऑस्ट्रेलिया ‘मास गैदरिंग’ के लिए निर्णय लेने में माथापच्ची कर रहा था, तभी भारत ने एक जगह पर भीड़ न जुटने को लेकर सलाह दी और आदेश जारी कर दिया। दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में स्कूल और सिनेमा हॉल्स में ताले जड़ दिए गए। हाँ, भारत को पता था कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है लेकिन लोगों की जान बचाने के लिए मोदी सरकार ने स्वास्थ्य को अर्थ से ऊपर रखा। जेम्स ने याद दिलाया है कि कैसे क्रिकेट के प्रति भारत में इतना पागलपन और लेकर जूनून होने के बावजूद लोकप्रिय टी-20 लीग की तारीख आगे बढ़ा दी गई।
जेम्स की बातों से पता चलता है कि NYT जैसे पश्चिमी मीडिया में इतनी जलन की भावना क्यों है। दरअसल, वे चाहते थे कि भारत में कोरोना वायरस तेज़ी से फैले, ताकि वो मोदी सरकार को कोस सकें। भारत का मजाक बना सकें। बता सकें कि यहाँ किस कदर अराजकता फैली हुई है और लोग जानवरों की भाँति मर रहे हैं। उन्हें ये मौका नहीं मिलने का अफ़सोस है।
इसी बहाने उन्हें होली को गालियाँ देने का मौका मिल जाता और वो एक हिन्दू त्यौहार के बहाने पूरे हिंदुत्व को मानवता के लिए ख़तरा बताने से बाज नहीं आते। हाँ, इस पर वो ज़रूर चुप हैं कि दक्षिण कोरिया में शिनचियोंजी चर्च के कारण जो कोरोना वायरस से पूरा देश तबाह हुआ है, उसकी जवाबदेही कौन लेगा? कई ऐसी मस्जिदें हैं, जिन्हें अभी भी बंद नहीं किया गया है। विदेशी प्रोपेगेंडा पोर्टलों को भारत सरकार और भारत को गाली देने का मौका नहीं मिल पाया। एबीसी ने अपने लेख में बताया है कि किस तरह लोगों ने सावधानी से होली खेली और वायरस भी नहीं फैला।
यहाँ कुछ सनकी लोगों द्वारा गोमूत्र की पार्टी की गई, जिनका जुड़ाव समाजवादी पार्टी जैसे दलों से रहा है। उन्हें पूरी भारत का चेहरा बता कर पेश किया जा रहा है। क्योंकि मीडिया के इस वर्ग के पास अब गाली देने के लिए कुछ बचा नहीं है। शाहीन बाग़ का महिमामंडन करते-करते अब वो थक चुके हैं। दंगों में निर्दोष हिन्दुओं के कत्लेआम की बात लोगों की जुबान पर हैं। इस असफलता से बौखलाए एनवाइटी जैसे संस्थानों को ये भी पता चल गया है कि कोरोना वायरस को लेकर विशेषज्ञों की सलाहों को सबसे ज्यादा यही प्रदर्शनकारी धता बता रहे हैं।
India knows prevention is better than a cure. It’s an approach that’s left me pretty calm (so far) during the coronavirus outbreak.
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास वो क्षमता है, जिससे वो किसी साधारण से कार्य को भी जनांदोलन में परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं। जब उन्होंने झाड़ू पकड़ी तो स्वच्छता अभियान घर-घर में आंदोलन की तरह बन गया। इसी तरह जब उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स के जरिए जागरूकता फैलानी शुरू की तो लोगो ने बचाव व सावधानी के लिए बताए गए उन उपायों पर अमल किया। विदेश में फँसे भारतीय नागरिकों को वापस वतन लाने में विदेश मंत्रालय ने तो तत्परता दिखाई, उससे भी विदेशी मीडिया का ये वर्ग ख़ासा नाराज़ है।
‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ दबे जबान से मानता है कि जल्दी से प्रभावी कार्रवाई करने के कारण भारत में कोरोना वायरस के कम मामले हो सकते हैं, लेकिन साथ ही कथित विशेषज्ञों के हवाले से ये भी दावा करना नहीं भूलता कि इतनी कम संख्या तो डिटेक्ट हुए मामलों की है। कई मामले ऐसे होंगे जो टेस्टिंग सेंटर तक पहुँचे ही नहीं। लेकिन, ऐसे केस तो सभी देशों में हो सकते हैं? जब बात तुलनात्मक रूप से की जा रही है फिर पक्षपात क्यों? यूरोप के कई देशों के अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ रहे हैं और कई लोगों को लौटा दिया गया, जबकि वहाँ हेल्थकेयर सिस्टम सबसे अच्छा माना जाता रहा है।
दिक्कत ये है कि भारत सरकार के प्रयासों ने इन प्रोपेगेंडा संस्थानों को चित कर दिया है। अब तक सब सही है और आगे भी आशा है कि सब ठीक ही रहेगा। इसके बाद तमाम भौगोलिक और वैज्ञानिक कारण के नाम पर बकैती की जाएगी कि भारत में कोरोना क्यों नहीं फैला? देश की तैयारियों को कमतर करने के लिए अलग-अलग तकनीकी टर्म्स गढ़े जाएँगे। ये निराश मीडिया संस्थान चुप नहीं बैठेंगे, तैयार रहिए।
भारतीय प्रेस परिषद ने बंगाल से छपने वाले वामी अखबार ‘द टेलीग्राफ’ को कारण बताओ नोटिस जारी किया। द टेलीग्राफ को ये नोटिस राष्ट्रपति के नाम की तुलना कोरोना वायरस के साथ करने के कारण दिया गया। मंगलवार (मार्च 17, 2020) को जारी प्रेस रिलीज के अनुसार परिषद ने 17 मार्च 2020 को अखबार में प्रकाशित हुई एक हेडलाइन पर संज्ञान लेते हुए ये एक्शन लिया।
इस हेडलाइन में वामी समाचार पत्र ने ‘व्यंग्यात्मक’ शैली का इस्तेमाल करते हुए नियमों का उल्लंघन किया था। जिसके बाद पत्रकारिता नियमों के उल्लंघन के आरोप में ये नोटिस जारी किया गया।
प्रेस रिलीज
जानकारी के अनुसार, प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस चंद्रमौली कुमार प्रसाद ने इस मुद्दे पर संज्ञान लिया था और पत्रकारिता आचरण के मानदंडों का उल्लंघन करने के लिए द टेलीग्राफ के संपादक को नोटिस भेजा।
प्रेस काउंसिल ने लिखा कि देश के प्रथम नागरिक (राष्ट्रपति कोविंद) पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ, उपहास और उन्हें नीचा दिखाने की बात गैरजरूरी होने के साथ-साथ पत्रकारिता के उचित प्रतिमानों के विपरीत जाती हैं।
गौरतलब है राष्ट्रपति कोविंद ने सोमवार को पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया था। जिसके बाद वामपंथियों में हलचल मच गई और वे पूर्व सीजेआई के फैसलों को इससे जोड़कर देखने लगे। इस बीच कल मंगलवार को नफरत की हर सीमा पार करते हुए द टेलीग्राफ ने पत्रकारिता की गरिमा को ताक पर रख दिया और प्रथम नागरिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को ही वायरस कह दिया।
हालाँकि, इस हेडलाइन को देखने के बाद कई सोशल मीडिया यूजर्स भड़क गए। उन्होंने इसे दलित समुदाय का अपमान बताया और राष्ट्रपति कोविंद को अपना दलित नेता। लोगों ने लिखा लिबरलों को दलित से इतनी घृणा है कि राष्ट्रपति की तुलना वायरस से कर सकते हैं तो फिर दलितों के लिए इनकी सोच क्या होगी। एक ने लिखा कि सिर्फ लिबरल ही राष्ट्रपति की तुलना घातक वायरस से कर सकते हैं।
इसके बाद इस मामले ने कल बहुत तूल पकड़े रखा और अंत में प्रेस परिषद के संज्ञान में ये मामला आया। प्रेस परिषद ने इस प्रयोग के लिए द टेलीग्राफ को फटकार लगाई और उससे ऐसी हरकत करने के पीछे की वजह को पूछा।
बीजेपी नेता डॉ. बीएस तोमर की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गाजियाबाद पुलिस ने सपा के एक नेता को गिरफ्तार किया है। उसका नाम मेहताब कुरैशी है। उसे पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के पास से पुलिस ने दबोचा। तोमर की बीते साल उनके क्लीनिक के पास ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शुरुआत में इस मामले को एक किशोरी से जोड़कर देखा गया था। लेकिन डासना चेयरमैन के पति की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक रंजिश की बात सामने आई। इस मामले में कुरैशी का नाम करीब आठ महीने पहले सामने आया था। एआईएमआईएम के पश्चिमी यूपी के प्रभारी आरिफ की गिरफ्तारी के बाद उसकी भूमिका उजागर हुई। लेकिन, वह फरार हो गया।
#Ghaziabad – सपा नेता मेहताब कुरैशी गिरफ्तार, भाजपा नेता की हत्या में कुरैशी गिरफ्तार, बीएस तोमर की हत्या की साजिश का आरोप, लंबे समय से फरार चल रहा था मेहताब कुरैशी, जुलाई 2019 में हुई थी भाजपा नेता की हत्या, मसूरी पुलिस ने मेहताब कुरैशी को किया अरेस्ट।
इस मामले में पुलिस अब तक 11 आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है। थाना प्रभारी उमेश पवांर ने बताया कि मेहताब कुरैशी की एक समय डासना क्षेत्र में अच्छी पैठ थी। इस बीच बीजेपी नेता बीएस तोमर का भी प्रभाव बढ़ने के चलते उनका भी क्षेत्र के अधिकांश मुद्दों में दखल बढ़ने लगा था। इतना ही नहीं तोमर की पकड़ समाज में कुछ इस तरह से बन गई थी कि लोग अपनी समस्याओं को लेकर उनके पास ही जाते थे। इससे मेहताब का क्षेत्र में लगातार वर्चस्व कम होता जा रहा था। इससे वह काफी परेशान रहने लगा था। इसी को लेकर उसने आरिफ के साथ मिलकर बीएस तोमर की हत्या की प्लानिंग की और किशोरी के परिवार को इसके लिए तैयार किया।
गौरतलब है कि मसूरी के दूधिया पीपल में पिछले वर्ष 20 जुलाई की रात नौ बजे तोमर क्लीनिक बंद कर निकले ही थे कि हमलावरों ने उन्हें गोलियों से भून दिया था। उनके सिर व पीठ में दो और पसलियों में एक गोली लगी थी। उनको 5 गोली मारी गई थी। जिस जगह उन्हें गोली मारी गई थी वहॉं से पुलिस चौकी महज 50 मीटर की दूरी पर है। हमलावर जिस स्कूटी से आए थे उसे मौके पर ही छोड़ फरार हो गए थे। जाँच से पता चला कि स्कूटी डासना निवासी शाहरुख की थी। बता दें कि बीएस तोमर के पास बीजेपी मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी थी।
अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि ‘हमारी सोच और हमारे सिद्धांत ये हैं कि गरीब और अशिक्षित लोग हमारे ईश्वर हैं, यही हमारा सामाजिक और मानवीय धर्म है।’ इसी विचार को आत्मसात कर लोक कल्याण के लिए कार्य कर रही उत्तर प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने तीन वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। मुझे यह कहते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि हमारी सरकार के ये तीन वर्ष अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति के उदय के थे।
चुनौतियाँ
इस दौरान हमारी सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मसलन सपा-बसपा के कार्यकाल में प्रदेश की जर्जर हो चुकी स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना, नकल माफियाओं पर अंकुश लगाकर गुणवत्तापरक शिक्षा की बहाली और सबसे अहम कार्य प्रदेश की चौपट हो चुकी कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाना था। जिसमें हम सफल भी रहे।
आज विकास, विश्वास और सुशासन के साथ देश के समक्ष नया उत्तर प्रदेश खड़ा है। निरोगी प्रदेश के संकल्प को मूर्त रूप प्रदान करने के लिए “कु-व्यवस्था” के वायरस से संक्रमित आईसीयू में पड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुशासन की “प्राण वायु” प्रदान करना आवश्यक था।
यहाँ यह जानना दिलचस्प है कि प्रदेश में देश के स्वतन्त्र होने के 76 साल तक केवल 12 मेडिकल कॉलेज अस्तित्व में थे। अतएव हमने सहज, सुव्यवस्थित और साधन सम्पन्न चिकित्सकीय सुविधाओं हेतु मात्र 03 वर्षों में ही 07 नए मेडिकल कॉलेज स्थापित कर उनमें एमबीबीएस की कक्षाएँ प्रारम्भ करा दीं। इसके साथ ही 13 नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की स्वीकृति भी केंद्र सरकार से प्राप्त की। इस प्रकार कुल 28 मेडिकल कॉलेजों की सेवाएँ उत्तर प्रदेश को प्राप्त होंगी। यही नहीं गोरखपुर और रायबरेली में एम्स अपना प्रस्तावित आकार प्राप्त कर रहा है।
स्वास्थ्य सेवाएँ
यह स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी एवं स्वच्छ भारत अभियान की सक्रियता का परिणाम है कि पूर्वी यूपी में 4 दशकों से बच्चों में महामारी के रूप में जानी जाने वाली इंसेफ्लाइटस रोगियों की संख्या में 56 प्रतिशत की कमी हुई है तथा 90 प्रतिशत मृत्यु में कमी आई है। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में आम जन की आस्था सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर बढ़ी है। सरकारी अस्पतालों में फिर भीड़ दिखाई पड़ने लगी है। हमने प्रदेश को निरोगी बनाने के संकल्प में एक और रचनात्मक प्रयोग करते हुए संवेदित, सक्रिय और संवर्धित चिकित्सकीय सेवाओं के लिए प्रत्येक रविवार को प्रत्येक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर “मुख्यमंत्री आरोग्य मेला” का आयोजन प्रारम्भ किया है।
साभार :ट्विटर
2 फरवरी से प्रारम्भ हुई इस योजना में लाखों की संख्या में आमजन निःशुल्क सुविधाएँ प्राप्त कर रहे हैं। आज प्रदेश में कोरोना वायरस संक्रमण जैसी किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए हमारा स्वास्थ्य विभाग पूर्णतः तैयार है। जन जागरण के बिगुल से लेकर आइसोलेशन वार्ड तक, सरहदी क्षेत्रों की नाकेबंदी से लेकर थर्मल एनालाइजर तक की स्थापना तक, कोई भी प्रयास हमारे सामर्थ्य से बाहर नहीं है। शिक्षा के आलोक में ही कोई भी समाज उन्नति-पथ पर गति कर सकता है। तो सबसे पहले हमने नकल माफियों के चंगुल से शिक्षा को मुक्त कराया।
कृषि
उत्तरप्रदेश में भाजपा सरकार के समक्ष सबसे चुनौतिपूर्ण कार्य किसानों के चेहरे पर खुशी वापस लाना था। गन्ने की खेती करने वाले किसान लंबे समय से इंतजार कर रहे थे कि कोई उनकी परेशानी को समझे। भाजपा के आते ही उनकी परेशानियों का समाधान हुआ और आज उत्तर प्रदेश देश में गन्ना और चीनी उत्पादन में लगातार दूसरी बार प्रथम स्थान पर है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत 12 हजार करोड़ रुपए सीधे किसानों के खातों में भेजे गए। साथ ही किसानों का 36 हजार करोड़ रुपए का ऋण माफ किया और ऐसे करके हमने किसानों से किए अपने वादों को पूरा किया है।
शिक्षा
“ऑपरेशन कायाकल्प” के माध्यम से 92 हजार से अधिक प्राइमरी पाठशालाओं को आधारभूत सुविधाएँ जैसे बाउंड्रीवाल, शौचालय, पेयजल, विद्युतीकरण आदि से संपन्न किया है। इन विद्यालयों में 45,383 शिक्षकों की भर्ती की गई है तथा 69,000 शिक्षकों की भर्ती अंतिम चरण में है। इसी प्रकार माध्यमिक शिक्षा में भी 55 नए सरकारी इंटर कॉलेज की स्वीकृति दी गई है। यही नहीं वंचना के दंश से पीड़ित श्रमिकों के बच्चों एवं अनाथ बच्चों के जीवन में ज्ञान के आलोक को विस्तारित करने हेतु प्रत्येक मण्डल मुख्यालय में अटल आवासीय विद्यालयों की स्थापना की कार्रवाई को आगे बढ़ाया है।
सदियों से हाशिए पर पड़े वनटांगिया, कोल, मुसहर एवं थारू जनजातियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के संकल्प के क्रम में उनके सभी ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित कर सरकार द्वारा संचालित समस्त जन कल्याणकारी योजनाओं से आच्छादित किया। उन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त कराया।
नारी सशक्तिकरण
महिला सशक्तिकरण के लिए भी हमारी सरकार ने बेहतर कार्य किया है। ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ के तहत 01 लाख से अधिक गरीब कन्याओं को 51 हजार रुपए प्रति लाभार्थी देते हुए योजना से लाभान्वित किया गया। ‘ऐंटी रोमियो स्क्वाड’ की स्थापना कर पुलिस के द्वारा मनचलों के विरूद्ध प्रभावी कार्यवाही की गई। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत प्रदेश में अच्छा कार्य हुआ है। ‘मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना’ लागू की गई। स्वास्थ्य विभाग और महिला कल्याण विभाग के कार्यक्रमों को प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वित किए जाने का परिणाम यह है कि प्रदेश के जनपदों में लिंगानुपात में काफी सुधार हुआ है। निराश्रित महिला पेंशन योजना में लाभार्थियों की संख्या मे काफी वृद्धि हुई है। लखनऊ, बदायूँ व गोरखपुर में महिला पीएसी बटालियन की स्थापना की जा रही है। ‘पिंक बस सेवा’ की शुरुआत की गई है। इन बसों में महिला कंडक्टर के साथ सुरक्षाकर्मी की तैनाती की जा रही है तथा इन बसों में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जा रहे है।
कानून-व्यवस्था
कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर हमें विरासत में अपराधियों के सम्मुख बेबस पुलिस मिली थी। जो “सेफ जोन” होना चाहिए था वो स्थान अपराधियों के “सफारी जोन” थे। फिर हमारी सरकार ने कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कठोरतम प्रयास किए। परिणामतः आज अपराधी प्रदेश छोड़ कर भाग रहे हैं या जेलों में कैद हैं। बेहतर पुलिसिंग के लिए प्रदेश में 41 नए थाने, 13 नई चौकियाँ स्थापित की गई। 1.7 लाख पुलिसकर्मियों की भर्ती की गई। लखनऊ तथा गौतमबुद्ध नगर में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली को लागू किया गया।
अपराध के प्रति जीरो टालरेंस की नीति अपनाते हुए पुलिस-व्यवस्था में व्यापक सुधार हुआ। अपराध के आँकड़ों में बहुत गिरावट आई। डकैती के मामलों में वर्ष 2016 की तुलना में वर्ष 2019 में 59.70 प्रतिशत सुधार हुआ, तो वहीं इसी अवधि में हत्या के मामलों में 47.09 प्रतिशत की कमी आई। कश्मीर में धारा 370 के निर्मूलन के आदेश के समय, अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि विवाद मामले में निर्णय के समय प्रशासन और पुलिस के प्रभावी नियन्त्रण का ही परिणाम था, कि पूरे प्रदेश में एक भी हिंसात्मक घटना नहीं हुई।
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में कुछ अराजक तत्वों ने सुनियोजित तरीके से कानून-व्यवस्था को खराब करने का असफल प्रयास किया, किन्तु बाद में इसे भी प्रभावी और परिणामदायक ढंग से नियंत्रित कर लिया गया। उपद्रवियों को चिह्नित कर उनके द्वारा नष्ट की गई सम्पत्तियों की क्षतिपूर्ति उपद्रवियों से ही की गई, तो उप्र शासन के इस प्रयास को पूरे देश में व्यापक समर्थन भी मिला। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने प्रदेश की बेहतर कानून-व्यवस्था को सराहा और कहा कि उप्र की तर्ज पर अपराधियों के खिलाफ कड़ा कानून लागू किया जाए। यह उपद्रवियों व उनके रहनुमाओं पर बड़ी चोट थी।
यह कुशल नियोजन व अनुशासित व्यवस्था का ही सुफल है कि प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय की दर में अनवरत वृद्धि हो रही है। आँकड़ों में कहें तो 2014-15 में प्रति व्यक्ति आय 42,267 रुपए थी जो वर्तमान में बढ़कर 70,419 रुपए हो गई है। यह हमारी पारदर्शी व्यवस्था की उपलब्धि ही कही जाएगी कि विगत तीन वर्षों में प्रदेश सरकार द्वारा 03 लाख लोगों को प्रदान की गईं सरकारी नौकरियाँ, विवाद मुक्त हैं। मेरे लिए यह निजी संतुष्टि का विषय है कि इन तीन वर्षों में प्रदेश कई क्षेत्रों में देश में शीर्ष पर पहुँचा है। कौशल विकास नीति, राज्य स्वास्थ्य नीति लागू कर एवं मानव-वन्य जीव संघर्ष को आपदा घोषित करने में उत्तर प्रदेश, देश का पहला राज्य बना। ई-मार्केट (जेम) के अंतर्गत सर्वाधिक खरीददारी करने में भी टॉप वायर पुरस्कार हासिल कर देश में पहला स्थान प्राप्त किया।
प्रधानमंत्री आवास योजना में 09, मनरेगा में 07, रूर्बन मिशन में 02, आजीविका मिशन में 01, ग्राम स्वराज अभियान में 01 और एनआईआरडीपी में 01 पुरस्कार प्राप्त हुए। तीन वर्ष में ही मातृ मृत्यु दर में सबसे अधिक 30 प्रतिशत गिरावट आई। पोषण माह के लिए सर्वोच्च पुरस्कार मिला। स्वच्छता सर्वेक्षण में प्रदेश के 14 निकाय सम्मानित हुए एवं सर्वाधिक तिलहन उत्पादन के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार मिला। द मिलियन फार्मर्स स्कूल (किसान पाठशाला) योजना जैसे अभिनव प्रयोग को देश-विदेश में लागू करने की अनुशंसा की गई तो ‘एक जनपद-एक उत्पाद योजना’ को भारत सरकार ने देश के हर जनपद में लागू करने योग्य योजना कहा।
अन्य उपलब्धियाँ
महिला सशक्तिकरण के तहत वन स्टॉप सेंटर स्थापित करने के लिए नारी शक्ति पुरस्कार, डिजिटल भूमि प्रणाली के लिए राष्ट्रीय ई-गवर्नेस पुरस्कार, अधिक विद्युत संयोजन के लिए सौभाग्य योजना पुरस्कार, दिव्यांगजन सशक्तिकरण के लिए तीन राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले।
दुग्ध, चीनी, गन्ना, खाद्य उत्पादन में भी प्रदेश प्रथम स्थान पर है। देश में सबसे ज्यादा चिकित्सा संस्थानों की स्थापना एवं संचालन में भी प्रदेश अग्रणी है। यह पुरस्कार हमें नित नया अभिनव करने को प्रोत्साहित करते हैं। इन सबसे प्रदेश की पहचान विकसित प्रदेश के रूप में हो रही है। गाँव, गरीब, किसान, महिला, मजदूर, नौजवान सहित सभी के हित-कल्याण के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। 23 करोड़ लोगों की विशाल आबादी वाला उत्तर प्रदेश सकारात्मक उत्पादक परिवर्तन लाते हुए माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की भावनानुरूप वन ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी बनने की ओर अग्रसर है।
निवेश एवं आधारिक संरचना
अंत्योदय से राष्ट्रोदय की संकल्पना को मूर्तरूप प्रदान करती हमारी वैचारिक दृष्टि अवध के मन, पूर्वांचल की आशा, बुंदेलखण्ड की अपेक्षा और पश्चिमांचल की अभिलाषा को संतुष्ट करने के क्रम में अनवरत प्रयत्नशील है। भ्रष्टाचार और कदाचार में लिप्त प्रत्येक व्यक्ति पर हमारी व्यवस्था द्वारा जीरो टालरेंस के तहत की जा रही कार्यवाहियाँ, प्रदेश में “बदली हुई व्यवस्था” का संदेश देने में सफल हुई हैं। और यही संदेश हमारी पूँजी है। बजट, योजनाओं का वित्तीय ढाँचा होता है। देश के सबसे बड़े प्रदेश उप्र के समावेशी विकास के लिये हमने इस वर्ष 05 लाख 12 हजार 860 करोड़ 72 लाख रुपए का बजट प्रस्तुत किया, जो प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा बजट है।
युवाओं को समर्पित इस ऐतिहासिक बजट में मुख्यमंत्री शिक्षुता प्रोत्साहन योजना (APPRENTICESHIP) तथा युवा उद्यमिता विकास अभियान (YUVA) जैसी योजनाएँ स्वरोजगार और स्वावलंबन के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होंगी। जाति, मत और मजहब से ऊपर उठकर सभी वर्गों का ख्याल रखते हुए हमारी सरकार ने प्रदेश में सुशासन का राज स्थापित किया है। अपराधमुक्त, भयमुक्त और अन्यायमुक्त वातावरण से प्रदेश का चतुर्दिक विकास हो रहा है। प्रदेश की जनता का सरकार पर भरोसा लौटा है। उत्तर प्रदेश को पुराना गौरव वापस दिलाने के लिए हमारी सरकार कृति संकल्पित है। आदरणीय प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से शेष दो वर्ष में उत्तर प्रदेश प्रगति नए आयाम लिखेगा।
दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत की साझी ऐतिहासिक विरासत, भौगोलिक निकटता और हाल के वर्षों में क्रमशः बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र को इस साझेदारी की अनिवार्य धुरी बनाते हैं। भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र 5,300 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा हुआ है तथा एक संकरे गलियारे (चिकेन नेक/सिलीगुड़ी कॉरिडोर) से शेष भारत से जुड़ता है। यह क्षेत्र पिछले काफी समय से उपेक्षा का शिकार रहा है, जिसके कारण यहाँ अलागाववाद भी क्रमशः बढ़ता गया है। जल, जमीन, वनस्पति, जैव विविधता और हाइड्रोकार्बन जैसे प्राकृतिक और अन्यान्य खनिज संसाधनों का असीम भण्डार होने के बावजूद यह क्षेत्र अविकसित रहा है। अतः बुनियादी ढॉंचे की स्थापना के साथ इस उपेक्षित क्षेत्र में विकास की महती आवश्यकता रही है, जिसके लिए बड़ा निवेश भी अपेक्षित था।
मई 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर भारत की 35 से अधिक यात्राएँ की हैं। पूर्वोत्तर की ओर दिए गए उनके व्यक्तिगत ध्यान ने विकास की सभी गतिविधियों को तेजी प्रदान की है। उनकी प्राथमिकता न केवल पूर्वोत्तर को शेष भारत के करीब लाने की है, बल्कि शेष भारत को भी पूर्वोत्तर के निकट ले जाने की है। फलस्वरूप, सरकार द्वारा ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ से कई कदम आगे बढ़कर ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के माध्यम से पूर्वोत्तर में समग्र और समावेशी विकास की अनेक परियोजनाएँ प्रारंभ की गईं हैं।
दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लिए भारत के इस ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ बहुपक्षीय जुड़ाव के माध्यम से आर्थिक सहयोग एवं सांस्कृतिक संबंधों को निरंतर बढ़ावा देना और वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की प्रभावी भूमिका को सुनिश्चित करना है। ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र को पूर्वी देशों के “प्रवेश द्वार” के रूप में महत्व देती है। यह क्षेत्र सम्पूर्ण भारत की प्रगति और समृद्धि के लिए एक विस्तारित गलियारा है। इसलिए इस नीति में उत्तर-पूर्व क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता दी गई है।
पूर्वोत्तर में भौतिक ढॉंचे (सड़क, हवाई अड्डे, दूरसंचार, विमानपत्तन, जल/बिजली संयंत्र आदि) को विकसित करते हुए आसियान क्षेत्र के साथ उसके संबधों और संपर्क को सुदृढ़ करने के लिए निरंतर प्रयास किया जा रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर व्यापारिक-सांस्कृतिक संबंध और संपर्क को बढ़ाया जा रहा है। ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ की तीन प्रमुख विशेषताएँ- संपर्क, संस्कृति और वाणिज्य ही हैं। इसके माध्यम से लोगों की क्षमताओं और कौशल का विकास करते हुए प्रगति और समृद्धि में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। पूर्वोत्तर में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित विकास को बढ़ावा दिया गया है। यह क्षेत्र पहाड़, जंगल और नदियों वाला है। इसलिए जलविद्युत की उत्पादकता को बढ़ाने के अतिरिक्त पर्यटन, कृषि से सम्बद्ध उद्योग, देशज कौशल-शिक्षा, कीटपालन तथा नैसर्गिक संसाधनों पर आधारित अवसंरचना में भारी निवेश किया जा रहा है।
पूर्वोत्तर के लिए अपर्याप्त परिवहन सुविधा एक ऐसी गम्भीर समस्या रही है, जिसने लम्बे समय तक इस क्षेत्र के विकास को बाधित किया है। किसी भी क्षेत्र के सम्पूर्ण विकास के लिए आधारभूत ढाँचे का सुदृढ़ होना बहुत आवश्यक है। इससे नागरिकों को मूलभूत सुविधाएँ तथा कच्चे माल और उत्पादों की आवाजाही सुनिश्चित होती है। परिवहन-व्यवस्था बुनियादी भौतिक ढाँचे की मेरुदंड होती है। केंद्र सरकार द्वारा आधारभूत सुविधाओं के साथ-साथ परिवहन के सभी साधनों (रेल, सड़क, उड्डयन, जलपत्तन आदि) में भारी निवेश कर कनेक्टिविटी की कमी को मिटाते हुए पूर्वोत्तर के विकास की मुख्य बाधा को समाप्त किया जा रहा है।
केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर में 900 किलोमीटर रेल पटरियों को ब्रॉड गेज में परिवर्तित कर दिया है और इस क्षेत्र के सभी आठ राज्यों की राजधानी को रेल संपर्क प्रदान करने के प्रयास चल रहे हैं। इसके लिए लगभग 50,000 करोड़ रुपए की लागत से 15 नई रेल लाइनों पर काम शुरू हुआ है। पूर्वोत्तर के दूर-दराज क्षेत्रों का हवाई संपर्क होने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और निवेश को भी गति मिलेगी। अत: केंद्र सरकार की ‘उड़ान योजना’ के तहत, पूर्वोत्तर में 5 नए हवाई अड्डों का निर्माण किया गया है। इस योजना में एक विमानन जनशक्ति प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना, रूपसी हवाई अड्डे का विकास, दीमापुर में हवाई सुविधा का विस्तार आदि भी शामिल हैं। सिक्किम में पाक्योंग हवाई अड्डे का निर्माण पूरा हो गया है। अरुणाचल में ज़ीरो, पासीघाट, विजय नगर, मेचुका, टीट्यूटिंग और तेजू में छह हवाई पट्टियों का नवनिर्माण किया गया है। गुवाहाटी को ड्रुक एयर फ़्लाइट (भूटान – गुवाहाटी – सिंगापुर फ़्लाइट) के माध्यम से भूटान और सिंगापुर से सीधे जोड़ा गया है। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा उड्डयन क्षेत्र में कुछ ऐसी समावेशी परियोजनाओं का क्रियान्वयन किया गया है जिनसे पूर्वोत्तर को शेष भारत के साथ पर्याप्त प्रवेश द्वार मिल सकें।
मोदी सरकार द्वारा 32,000 करोड़ रुपए के निवेश के साथ 4,000 किलोमीटर से अधिक राष्ट्रीय राजमार्गों को मॅंजूरी दी गई है, और क्षेत्र में लगभग 1,200 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया है। अरुणाचल में होलोंगी- ईटानगर 4 लेन राष्ट्रीय राजमार्ग तथा मेघालय में शिलांग-तुरा (271 किलोमीटर) राजमार्ग का निर्माण किया गया है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड (1,360 किलोमीटर लंबे) त्रिपक्षीय राजमार्ग का निर्माण किया जा रहा है, जो पूर्वोत्तर भारत को आसियान देशों के साथ जोड़ देगा। इससे बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
इसके अतिरिक्त, वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढॉंचे के विकास पर जोर दिया जा रहा है। असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच संपर्क बढ़ाने और सीमा पर सेना की आवाजाही को आसान बनाने के लिए दो बड़े पुलों का भी उद्घाटन किया गया है। असम और अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने वाले ये दो पुल- लोहित का ढोला सदिया पुल (जो भारत का सबसे लंबा पुल है) और ब्रह्मपुत्र का रेलपुल- बोगीबील पुल (जो भारत का सबसे लंबा रेल-सह-सड़क पुल है और असम में डिब्रूगढ़ और धेमाजी को जोड़ता है) हैं। ये बेहद सामरिक और सैन्य महत्व के पुल हैं। इनसे सशस्त्र बलों और युद्ध उपकरणों की त्वरित आवाजाही हो सकेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा-व्यवस्था सुदृढ़ होगी।
मिजोरम में 1302 करोड़ रुपए की लागत की 60 मेगावॉट की ट्युरिअल जलविद्युत परियोजना को पूरा किया जा चुका है। यह परियोजना मिजोरम में स्थापित सबसे बड़ी परियोजना है। इससे उत्पादित बिजली राज्य को ही दी जाएगी। इससे राज्य में सबको सातों दिन चौबीसों घंटे किफायती और प्रदूषणमुक्त ऊर्जा देकर राज्य का चहुँमुखी विकास किया जा सकेगा। परियोजना से अतिरिक्त 60 मेगावाट बिजली प्राप्त होने के साथ ही मिजोरम अब सिक्किम और त्रिपुरा के बाद पूर्वोत्तर भारत का तीसरा सरप्लस बिजली वाला राज्य बन जाएगा।
शिक्षा, सूचना-प्रौद्योगिकी, कला-कौशल,शिल्प, खेल, पर्यटन तथा स्वास्थ्य जैसी सामाजिक बुनियादी संरचना एवं सुविधाएँ उस क्षेत्र के मानव विकास और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अतः खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए केंद्र सरकार ने मणिपुर में प्रथम राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी है तथा भारत की बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक मैरीकॉम को राज्यसभा का नामित सदस्य बनाया है। पूर्वोत्तर भारत गिरते स्वास्थ-स्तर और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण हमेशा खबरों में रहा है। आयुष्मान भारत ने इस परिदृश्य को बदलने में मदद की है। जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुँचाने के लिए असम के चांगसारी में AIIMS तथा लखीमपुर, डुबरी, दीफू, नौगॉंव में 4 नए मेडिकल कॉलेज और तिनसुकिया, कोकराझार, करीमगंज और नलबाड़ी में भी 4 मेडिकल कॉलेज खोलने का काम शुरू हुआ है।
उत्तर-पूर्व की अर्थव्यवस्था के लिए बाँस महत्वपूर्ण है। वहाँ की अर्थव्यवस्था में इसके अत्यधिक महत्व के कारण ही इसे “हरा सोना” कहा जाता है। सरकार ने बाँस को पेड़ों की सूची से हटा कर उसे काटने, लाने-ले जाने और इसके उपयोग सम्बन्धी नियमों से 90 वर्ष पुरानी पाबंदियों को हटा दिया है। 50 करोड़ रुपए की लागत से 75 हेक्टेयर क्षेत्र में असम के दीमा हसाओ जिले के मंडेरदिसा में एक बाँस औद्योगिक पार्क की भी स्थापना की जा रही है। यह कदम बाँस आधारित हस्तकला को बढ़ावा देते हुए असंख्य स्थानीय लोगों को रोजगार देगा। इसके अतिरिक्त अरुणाचल प्रदेश में नॉर्थ ईस्ट रीजन टेक्सटाइल प्रमोशन स्कीम (एनईआरटीपीएस) के तहत बड़े पैमाने पर ईरी फार्मिंग शुरू की गई है। इसके अंतर्गत 4000 लाभार्थियों को वित्तीय सहायता की घोषणा तथा एरी रेशम किसानों और बुनकरों के कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई है।
भारत सरकार की प्रतिबद्धता को देखते जापान ने भी पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में कुछ वर्तमान और कुछ नई परियोजनाओं में 205.784 अरब येन (13,000 करोड़ रुपए) की धनराशि निवेश करने का फैसला किया है। इससे असम में गुवाहाटी जलापूर्ति परियोजना और गुवाहाटी सीवेज़ परियोजना, असम और मेघालय की पूर्वोत्तर सड़क संजाल संपर्क सुधार परियोजना, सिक्किम में जैव-विविधता संरक्षण और वन-प्रबंधन परियोजना, त्रिपुरा में सतत वन प्रबंधन परियोजना, मिजोरम में निरंतर कृषि और सिंचाई के लिए तकनीकी सहयोग परियोजना, नगालैंड में वन प्रबंधन परियोजना आदि को पूरा किया जा सकेगा।
इन नवीन विकास योजनाओं के माध्यम से पूर्वोत्तर में समावेशी संवृद्धि और समृद्धि लाने और मूलभूत सेवाओं के क्रियान्वयन के लिए स्थानीय समुदाय के समर्थन और सहयोग को सुनिश्चित करना भी परम आवश्यक है। अतः सरकार ने समग्र विकास के लिए त्रिपुरा में वर्षों से चल रहे अलगाववाद तथा उग्रता का अपनी समावेशी नीतियों से शमन किया है। पूर्वोत्तर के समग्र विकास के लिए विभिन्न विद्रोही/उग्रवादी समूहों के साथ संकल्प और संवेदनशीलता के साथ संवाद करते हुए वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान करते हेतु ब्रू समझौता, बोडो समझौता तथा नागा समझौतों के माध्यम से शांति और विकास की आधारभूमि निर्मित की है।
वास्तव में, उत्तर-पूर्व के रहवासियों की समृद्धि भारत के विकास की धुरी है। यह भारत की एकता, अखण्डता, शांति और सुरक्षा की आधारशिला है। विगत कुछ वर्षों से पूर्वोत्तर में बुनियादी अवसंरचना, समावेशी विकास और शान्ति-वार्ता के स्तर पर तीव्र परिवर्तन दिखाई दे रहा है। यहाँ की भौगोलिक दुर्गमताओं और कठिनतम जीवन-स्थितियों को प्राकृतिक संसाधनों और जनांकीय-क्षमताओं की पहचान तथा दूरगामी एवं समावेशी विकास योजनाओं द्वारा सरल किया जा रहा है। वस्तुतः ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ भारत की विश्वशक्ति बनने की महत्वाकांक्षी परियोजना की सकर्मक आयोजना है जो निश्चय ही फलीभूत भी होगी।
देश में बढ़ते कोरोना के प्रभाव से कई लोगों के काम ठप्प हैं। इस श्रेणी में एक वर्ग मजदूरों का भी है जिनका ख्याल रखते हुए यूपी की योगी सरकार ने बड़ा फैसला किया है। इस फैसले के तहत कोरोना के कारण मजदूरों को हुए नुकसान की भरपाई सरकार करेगी और उनकी आर्थिक मदद करते हुए कुछ पैसे सीधे उनके खाते में भेजेगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में मंगलवार को कैबिनेट की बैठक के बाद दिहाड़ी मजदूरों के लिए ये बड़ा ऐलान किया गया। इसमें बताया गया कि मजदूरों के भरण-पोषण के लिए निश्चित धनराशि मुहैया करवाई जाएगी। इसके लिए वित्त मंत्री, कृषि मंत्री और श्रम मंत्री की कमेटी बनाई गई है।
ये कमेटी रोज कमाने खाने वाले लोगों पर तीन दिन के अंदर रिपोर्ट देगी। इसके बाद उनको अलग से आरटीजीएस के द्वारा पैसे दिए जाएँगे। इसके साथ सरकारी कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा दी गई। इसके लिए चीफ सेकेट्री की अध्यक्षता में कमेटी बनेगी।
कोरोना वायरस के दुष्प्रभाव के चलते दिहाड़ी मजदूर भाई-बहनों को परिवार के भरण-पोषण में समस्या न हो, इस हेतु प्रदेश सरकार ने एक तय धनराशि मजदूर भाई-बहनों के बैंक खाते में प्रदान करने का निर्णय लिया है। इस संबंध में वित्तमंत्री की अध्यक्षता में गठित समिति 3 दिन में रिपोर्ट सौंपेगी।
योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर कहा है,“कोरोना वायरस के दुष्प्रभाव के चलते दिहाड़ी मजदूर भाई-बहनों को परिवार के भरण-पोषण में समस्या न हो, इस हेतु प्रदेश सरकार ने एक तय धनराशि मजदूर भाई-बहनों के बैंक खाते में प्रदान करने का निर्णय लिया है। इस संबंध में वित्तमंत्री की अध्यक्षता में गठित समिति 3 दिन में रिपोर्ट सौंपेगी।”
इसके अलावा योगी सरकार ने प्रदेश में कोरोना वायरस से संक्रमित होने वालों की जाँच और इलाज मुफ्त में करने का ऐलान किया है। साथ ही यह भी तय किया गया है कि इलाज हेतु लिए गए अवकाश के दौरान उनके वेतन में कोई कटौती नहीं की जाएगी।
किसी कारणवश यदि हमारा कोई साथी कोरोना वायरस से संक्रमित हो जाता है तो आपकी सरकार उनकी मुफ्त जांच और इलाज कराएगी।
इसके साथ ही यह भी तय किया गया है कि इलाज हेतु लिए गए अवकाश के दौरान उनके वेतन में कोई कटौती नहीं की जाएगी।
गौरतलब है कि मंगलवार को हुई इस बैठक में यूपी के सभी पर्यटक स्थल 31 मार्च तक बंद करने का आदेश दिया गया है। इस दौरान कहा गया कि पर्यटक स्थल सिर्फ साफ-सफाई के लिए खुलेंगे। तहसील दिवस व जनता दर्शन भी 2 अप्रैल तक नहीं होंगे। सभी स्कूल-कॉलेजों और मल्टीप्लेक्स 2 अप्रैल तक बंद कर दिए गए हैं। इसके अलावा सभी स्कूल-कॉलेजों में चल रही परीक्षाओं को स्थगित करने का आदेश जारी हुआ है। बता दें, इस समय उत्तर प्रदेश में कोरोना के पीड़ित मरीजों की संख्या 13 है जिसमें से 12 भारतीय और 1 विदेशी नागरिक हैं। हालाँकि इसमें से चार लोग कोरोना से पूरी तरह ठीक हो चुके हैं।
कॉन्ग्रेस के बाद पश्चिम बंगाल ने वाम मोर्चे का लंबा राज देखा। करीब 9 साल से राज्य में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है। लेकिन, बंगाल में जो नहीं बदला वह है सरकार के कामकाज का तरीका। विकास कार्यों के प्रति उदासीन रुख। राजनीतिक हिंसा।
राजनीतिक हिंसा के लिए तो बंगाल कुख्यात रहा है। बीजेपी समर्थकों को निशाना बनाने की घटनाएँ आए दिन सामने रहती है। अब राज्यसभा में रेल मंत्री पीयूष गोयल की ओर से रखे एक तथ्य से यह बात भी सामने आई है कि राज्य सरकार विकास परियोजनाओं को पूरा करने को लेकर भी उत्साहित नहीं है। राज्य में 1974 में 110 किमी लंबी एक रेल परियोजना शुरू हुई। आप जानकर हैरत में रह जाएँगे कि 46 साल में यह परियोजना महज 42 किमी ही पूरी हो पाई है।
इसके लटके होने का कारण है जमीन अधिग्रहण। इन 46 साल के दौरान राज्य में कॉन्ग्रेस, लेफ्ट फ्रंट और टीएमसी तीनों दलों की सरकारें रहीं, पर किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। मुख्यमंत्री बनने से पहले दो साल तक ममता बनर्जी केंद्र सरकार में रेल मंत्री भी रहीं थी। लेकिन, इस परियोजना का हाल देखकर लगता है कि सीएम बनते ही उन्होंने रेलवे की योजनाओं को अपने राज्य में भी बिसरा दिया।
अब सुनिए पीयूष गोयल ने संसद के उच्च सदन में क्या कहा। इसका विडियो उन्होंने खुद ट्वीट किया है।
पं.बंगाल में रेलवे का एक प्रोजेक्ट 1974 में शुरु हुआ, मैं तब 10 वर्ष की आयु का था।
मेरी दिली इच्छा है कि राज्य सरकार जमीन अधिग्रहण में सहयोग करे और मेरे जीते जी यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाये। pic.twitter.com/KsjCBsfF2H
विडियो में पीयूष गोयल को इस प्रोजेक्ट का जिक्र करते सुना जा सकता है। वे कहते हैं कि जिस समय 1974 में इस परियोजना का कार्य शुरू हुआ उस समय वह 10 साल के थे। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मेरी दिली इच्छी है कि राज्य सरकार जमीन अधिग्रहण में सहयोग करें और मेरे जीते जी यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाए।
उन्होंने राज्यसभा में बोलते हुए कहा कि आगामी वर्षो में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि के जरिए लगभग 20,000 मेगावाट बिजली उत्पादन कर भारतीय रेलवे का 100 फीसदी विद्युतीकरण किया जाएगा। इससे कार्बन उत्सर्जन की मात्रा शून्य होगी और भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत होगी जिसे अभी कच्चे तेलों के आयात पर खर्च किया जाता है। इसके साथ ही रुपया मजबूत होगा और महँगाई घटेगी। इससे देश को 13 से 16 हजार करोड़ रुपए की सालाना बचत होगी।
हमारे रेल के कर्मचारियों में जो प्रतिबद्धता और काम के प्रति जुनून है, उस पर मुझे पूरा विश्वास है कि वह 2024 तक रेलवे को शत प्रतिशत विद्युतीकृत करके दिखायेंगे। pic.twitter.com/QoYIRh4NjV
रेल मंत्री पीयूष गोयल ने इस दौरान राज्यसभा में ये भी साफ कर दिया कि भारतीय रेलवे देश की जनता की है और सरकार के पास इसके निजीकरण की कोई योजना नहीं है। दरअसल, कई विपक्षी सदस्यों की ओर से इस पर संदेह जताए जाने के बाद रेल मंत्री की ओर से ये यह बात कही गई।
रेल मंत्री ने सदस्यों का संदेह दूर करते हुए दो टूक कहा है कि, “मैं यह पूरी तरह से साफ कर देना चाहता हूँ कि भारतीय रेलवे के निजीकरण का कोई प्रस्ताव या योजना नहीं है, ऐसा नहीं होगा। भारतीय रेलवे इस देश के लोगों की है और यह उसी के पास रहेगी।” हालाँकि यहाँ पर उन्होंने ये बात भी बताई कि रेलवे के विकास के लिए सरकार कुछ सेवाएँ निजी क्षेत्रों को दे सकती है, जिससे कि यात्रियों को बेहतर से बेहतर सुविधाएँ मुहैया कराई जा सके।
इस दौरान उन्होंने कहा कि अगले 12 वर्षो में रेल की विभिन्न परियोजनाओं को पूरा करने के लिए लगभग 50 लाख करोड़ रुपए के निवेश की आवश्यकता होगी जिसमें सभी अंशधारकों से मदद मिलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि हम इस देश की जनता को भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनने का मौक़ा देंगे।
रेलवे के लंबित परियोजनाओं के मुद्दे पर भाजपा की ओर से सांसद रूपा गाँगुली ने भी अपने क्षेत्र की माँग रखी। रूपा गांगुली ने रेलवे की डिमांड ग्रांट का जिक्र करते हुए कहा कि संघीय व्यवस्था के सम्मान की कमी की बात कही। उन्होंने अपने क्षेत्र के कसाई हाल्ट के मुद्दे को रखा।
2014 से पहले साधारणतया नई लाइनों, रॉलिंग स्टॉक, लोकोमोटिव, सिग्नलिंग आदि में जो निवेश होता था वह लगभग ₹40-50 हजार करोड़ रहता था। इस वर्ष के बजट में ₹1.61 लाख करोड़ का निवेश कैपेक्स में होने जा रहा है। pic.twitter.com/eIidmRPsHZ
इस दौरान बता दें, गोयल ने विपक्षी सदस्यों की ओर से रेलवे में कार्य की धीमी प्रगति पर पूछे गए वालों का भी जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि 2014-15 में कैपिटल एक्सपेंडिचर 58,000 करोड़ रुपए था, जो कि इस साल 1.61 लाख करोड़ रुपए रहने वाला है। उन्होंने दावा किया कि इतनी बड़ी मात्रा में निवेश से कार्यों में बड़ी प्रगति देखने को मिलेगी। रेलवे में काम को तेजी से पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों से जमीन दिलाने में सहयोग की भी अपील की है। उन्होंने रेलवे की उपलब्धि बताते हुए कहा है कि रायबरेली रेल कोच फैक्ट्री से इस साल 2,000 कोच बनकर निकलेंगे।
इस चर्चा में जब रेल राज्यमंत्री सुरेश अंगाडी ने रेलवे जमीन के अतिक्रमण का मामला उठाया, तो पीयूष गोयल ने इसका भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के हाल के दौरे में उन्होंने पाया कि रेलवे की जमीन के अतिक्रमण का ज्यादातर मामला पश्चिम बंगाल में (ही) है। राज्य सरकार की ओर से इसे खाली कराने की दिशा में कोई सक्रिय पहल नहीं दिखी। उन्होंने कहा कि संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध प्रदर्शन के दौरान ज्यादातर ऐसी जगहों पर संपत्ति को नुकसान पहुँचा।
कोरोना वायरस का प्रसार रोकने के लिए भारत की तैयारियों और प्रभावित देशों से अपने नागरिकों को लाने की केंद्र सरकार की कोशिशों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हो रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भले इस वैश्विक महामारी को मोदी सरकार पर हमले के मौके की तरह तलाश कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार की तारीफ करते हुए कुछ लोगों ने जो आपबीती शेयर की है वह बेहद मार्मिक है। इटली से लाई गई एक युवती के पिता ने अपनी भावना साझा करते हुए कहा है कि वो सालों से सरकार की आलोचना कर रहे थे। लेकिन, अब उन्हें एहसास हो रहा है कि मोदी सरकार पिता के साए (fatherly figure) जैसी है। विदेश से लाए गए एक युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय मुल्कों में भी नहीं देखी है।
A father whose daughter managed to board Mar 13 flight from Coronavirus-ravaged Italy shares an emotional post on how @IndiainItaly helped evacuate his 20 yr old kid
“My daughter was studying graphic designing course at Naba in Milan.I am proud of Indian govt/embassy officials” pic.twitter.com/mOSB7zETzD
टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने इटली से लौटी युवती के पिता का पत्र शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने इंडियन एंबेसी, भारत सरकार और विशेषत: नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। पिता के मुताबिक उनकी बेटी मास्टर की पढ़ाई करने इटली के मिलान गई थी। वहॉं हालात बिगड़ने पर उसे वापस लौटने को कहा। जब वह लौटने लगी तो उससे भारत वापस जाने का सर्टिफिकेट माँगा गया। न्होंने खुद इंडियन एंबेसी को संपर्क करने की कोशिश की। मगर मिलान में एंबेसी का कार्यालय बंद होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने इंडियन एंबेसी के अन्य लोगों को मेल के जरिए संपर्क किया और रात के 10:30 बजे उनकी बेटी ने फोन पर बताया कि उसकी बात दूतावास में हो गई है और वह अगली फ्लाइट से भारत लौट रही है।
पिता के मुताबिक, वे सालों से भारतीय सरकार को कोस रहे थे। लेकिन मोदी सरकार में पिता का चेहरा है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 15 मार्च को भारत आई और आईटीबीपी अस्पताल में उसकी स्वास्थ्य संबंधी, खान-पान संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। गौरतलब है कि इटली उन देशों में शामिल है जो कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित हैं।
Watch this experience from a Coronavirus quarantine to understand the massive planned action to prevent the spread of Coronavirus. Let us all work together to fight this pandemic. pic.twitter.com/VuMh0v1gOk
गौरतलब है कि भारत सरकार इन दिनों लगातार विदेशों से लौटने वाले अपने नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करवाने में प्रयासरत है। सोशल मीडिया में वायरल हुए एक विडियो में विदेश से लौटा शख्स मिली सुविधाओं के बारे में बता रहा है। इस विडियो को रेल मंत्री पीयूष गोयल ने भी शेयर किया था। इसमें व्यक्ति बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है। बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है। बड़े-बड़े अधिकारी मौक़े पर तैनात हैं। उन्हें 24 घंटे की देखरेख में रखा है। साथ ही जहाँ उन्हें रखा गया है वहाँ सरकार ने बहुत अच्छी व्यवस्था की है। सबको अलग से रूम मिले हैं। इसमें उन्हें पानी, चप्पल, बेड, खाना, नई तौलिया सब मुहैया कराया जा रहा है। इसलिए वे नरेंद्र मोदी, स्वास्थ्य मंत्री समेत पुलिस प्रशासन और डॉक्टरों का धन्यवाद करते हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण से निबटने के लिए सरकार ने 400 बेड का कोरोन्टाइन वार्ड तैयार करवाया है। यहाँ विदेश से लौटने वालों को सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर जाया जाएगा। यहाँ इन सभी लोगों की 14 तक की निगरानी होगी और अगर इनमें कोरोना के लक्षण मिलते हैं तो इन्हें आइसोलेट कर छोड़ा जाएगा। ये कोरोन्टाइन वार्ड नोयडा के सेक्टर 39 में स्थित जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग में बना है। यहाँ पर्याप्त संख्या में पैरामेडिकल स्टॉफ तैनात हैं।
दिल्ली दंगों के बाद से लेफ्टिस्ट मीडिया बौखलाया हुआ है क्योंकि आज तक वह ये साबित नहीं कर पाया कि दिल्ली दंगों में हिंदुओं का हाथ है, क्योंकि आप से निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन की छत से हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिमों द्वारा महीनों से की जा रही तैयारी दुनियाँ के सामने आ गई। इसके बाद जिस खबर को ऑपइंडिया ने ग्राउंड जीरो से एक्सक्लूसिव दिया था उसी खबर को ‘द वायर’ ने अपने प्रोपेगेंडा के तहत उल्टा चला दिया।
प्रोपगेंडा फैलाने में कुख्यात पोर्टल ने अपनी रिपोर्ट में खुद को भी पाक साफ रखते हुए बड़ी ही आसानी से अंत की एक लाइन में बता दिया कि सभी पीड़ितों के नाम काल्पनिक हैं और किसी का भी बयान ऑडियो या वीडियो में रिकॉर्ड नहीं किया गया है।
चौंकाने वाली बात यह कि ‘द वायर’ की टीम पूरी खबर को लिखते हुए चाँदबाग से लेकर शिव विहार तक पहुँच गई, लेकिन उसे कोई भी दंगों का असली पीड़ित नहीं मिला, जो भी मिला वह दंगाइयों के घर से था, जिनमें से किसी का नाम आफरीन था, किसी का रेशमा, किसी का तरन्नुम तो किसी का शबाना था।
हमने दंगाइयों के घर से इसलिए कहा कि दिल्ली दंगों में न सिर्फ मुस्लिम युवक शामिल थे बल्कि, उसमें जवान से लेकर बूढ़े और महिलाओं से लेकर बच्चों तक समुदाय के सभी लोग शामिल थे। इतना ही नहीं घर के मुखिया अपनी बहन-बेटियों और अपनी बीबियों को हाथों में ईंट-पत्थर और लाठी-डंडे देकर कह रहे थे कि चलो सभी घरों से बाहर निकलो।
दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की आग
आगे ‘द वायर’ की रिपोर्ट में गौर करने वाली बात यह है कि खबर में हर एक तथाकथित दंगा पीड़िता की आपबीती में इस तरह की भूमिका बना दी गई कि उन्होंने (तथाकथित दंगा पीड़ित ने) हमें पहले ही मना कर दिया या फिर इस शर्त पर ही बयान दिया कि वह इसे न तो ऑडियो और न ही वीडियो के रूप में रिकार्ड करेंगे और इसी के साथ अपना एजेंडा भी चला दिया और कोई सबूत भी नहीं।
इसके उलट ऑपइंडिया ने न सिर्फ सबसे पहले दंगाइयों की करतूतों को लोगों के सामने रखा बल्कि पीड़ित महिलाओं के दुख-दर्द भरे बयानों को सबूत के तौर पर अपने पास रिकार्ड भी किया, लेकिन जब दंगाइयों की पोल खुली तो द वायर जैसे पोर्टल दंगाइयों के हितैशी बनकर सामने आए और उनको (दंगाइयों को) पीड़ित बताने में भी कोई देरी नहीं की।
‘द वायर’ ने आगे अपनी रिपोर्ट में काल्पनिक नाम के तौर पर रेशमा नाम का प्रयोग किया और उसके हवाले से लिखा सुबह से ही खबरें मिल रहीं थीं। गौर करने वाली बात यह कि उसने यह नहीं बताया कि खबरें कहाँ और किस रूप में मिल रहीं थीं। इस बात का खुलासा पहले ही ऑपइंडिया ने अपनी खबरों में किया था कि दंगाई महीनों से हिंदुओं पर हमले की योजना बना रहे थे।
इसके लिए दंगाइयों ने न सिर्फ ईंट-पत्थरों, पेट्रोल बम को छतों पर पहुँचाया बल्कि मस्जिद से ऐलान भी कर दिया गया था। वहीं खबर में आगे लिखा है कि घर में पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे, लेकिन खबर में यह नहीं बताया गया कि पेट्रोल बम कहाँ पाए गए और कहाँ से फेंके जा रहे थे, क्योंकि दिल्ली पुलिस को अभी तक किसी भी हिंदू के घर में पेट्रोल बम नहीं मिले।
‘द वायर’ के प्रोपेगेंडा वाली खबर की कटिंग
‘द वायर’ की खबर में तथाकथित पीड़ित मुस्लिम महिला ने ये तो बता दिया कि उसको पहले से कुछ पता था कि इलाके में कुछ होने वाला है, लेकिन द वायर ने ये नहीं पूछा कि ऐसा क्या देखा कि हिंदू उन पर हमला करने वाले हैं। आश्चर्य की बात यह कि इस आशंका के चलते मुस्लिम महिला ने अपनी बेटियों को कुछ उसी तरह से अपने रिश्तेदारों के यहाँ सुरक्षित भेज दिया, जैसे कि मुस्लिमों ने दंगों से पहले अपने कीमती सामनों को बाहर निकाल लिया था। बृजपुरी में मुस्लिम ने अपने शोरूम से बाइकों को पहले ही निकाल लिया था और फिर खुद ही तोड़-फोड़ कर उसमें आग लगा दी, जिससे कि केजरीवाल से मुआवजे और कंपनी से बीमा मिल सके।
खबर के अंत में लिखे गए एक पेराग्राफ को पढ़कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह से ‘जय श्री राम’ के प्रयोग से हिंदुओं को न सिर्फ दंगाई बताया गया बल्कि सारी हदों को पार कर खबर में अश्लीलता भी परोसी गई कि हिंदुओं ने ही मुस्लिम महिलाओं के सामने अपने पैंट उतारे और उनको अपना लिंग दिखाया।
‘द वायर’ द्वारा हिंदुओं को दंगे का आरोपित साबित करने के लिए ‘जय श्री राम’ का किया गया प्रयोग
खुद के झूठी रिपोर्ट की वजह से फँसने के डर से वायर ने खबर के अंत में एक लाइन में लिख दिया कि सभी नाम काल्पनिक हैं। अब हम ये भी नहीं कह सकते कि ऐसा नहीं हुआ होगा, लेकिन द वायर के साथ-साथ ऐसे लोगों की आपबीती अपने आप में संदेह पैदा करती है, जिनकी घर की छतों पर पत्थर जमा हो और पूरा समुदाय आगजनी, पेट्रोल बम और तेजाब की बोलतें फेंककर हिंदुओं पर हमला कर रहा हो।
द वायर की खबर का क्रॉस चेक करने के बाद कुछ तो आप को साफ हो ही गया होगा, लेकिन इसके बाद भी सैकड़ों सवाल खड़े होते हैं कि द वायर को कोई भी हिंदू दंगा पीड़ित क्यों नहीं मिला, क्या द वायर को ताहिर हुसैन और राजधानी स्कूल नहीं मिला, जिसे दंगाइयों ने हिदुओं को आसानी से निशाना बनाने के लिए अपना केन्द्र बनाया। या वायर को मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर हमले की महीनों से की जा रही तैयारी नहीं दिखी।
क्या उसे मुस्लिमों की छतों पर लगी गुलेल दिखाई नहीं दी, क्या उसे ताहिर की छत पर रखे पेट्रोल बम और वहाँ से फेंके गए ईंट-पत्थर दिखाई नहीं दिए। ये सभी वो सवाल हैं जो दंगाइयों पर नहीं बल्कि दंगाइयों को अपना अनुसांगिक संगठन के सदस्य के रूप में मानने वाले मीडिया गिरोह पर खड़े होते हैं। अब आपको यह भी बता दें कि द वायर वालों का ट्रैक रिकॉर्ड प्रोपगेंडा फैलाने में बहुत ही खराब रहा है। खासतौर पर दिल्ली दंगों की रिपोर्ट को लेकर, क्योंकि ये लोग अभी तक ताहिर या फैसल की प्रॉपर्टी को लेकर कोई लेख लिखना तो दूर ये तक नहीं बता पाए हैं कि ताहिर हुसैन की छत और मकान से क्या-क्या मिला था और हाँ दिल्ली हिंसा पर जो भी लिखा है, वहाँ उनके पक्ष में जरूर खड़े ही दिखाई दिए हैं। खैर, अब आप खुद ही तय करें कि ये हिंदू विरोधी साजिश की कड़ी कहाँ से- कहाँ तक जाती है।