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चीन पर अल्लाह का अजाब है कोरोना, मस्जिदें बंद की इसलिए आया: मेरठ का काजी

दुनिया के करीब 150 देशों को चपेट में ले चुके कोरोना वायरस का संक्रमण चीन के वुहान से शुरू हुआ था। इस महामारी पर काबू पाने के लिए तरह-तरह के कदम उठाएँ जा रहे हैं। लेकिन, इसके साथ-साथ बेतुके बयानों का सिलसिला भी जारी है। इसी कड़ी में मेरठ के शहर काजी की तरफ से कहा गया है कि चीन ने मस्जिदों को बंद किया, जिसकी वजह से कोरोना वायरस आया।

मेरठ के नायब शहर काजी की मानें तो चीन में मस्जिद बंद करने से कोरोना वायरस आया है। काजी जैनुर राशिदीन ने कहा है कि कोरोना वायरस अल्लाह का अजाब है। चीन में मस्जिदों को बंद कर दिया गया था। इसलिए वहाँ अल्लाह का अजाब बीमारी की सूरत में आया और सरकार को दोबारा मस्जिदें खुलवानी पड़ीं। उन्होंने कहा कि इसका असर अब हिंदुस्तान में भी दिखाई दे रहा है। इस अजाब से बचने के लिए हमें अल्लाह की इबादत करनी चाहिए। पाँच वक्त की नमाज पढ़ें और जो डॉक्टर बता रहे हैं, उन पर अमल करें।

जमीयत उलेमा हिंद मेरठ शाखा के अध्यक्ष और नायब शहर काजी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा है कि लोग पाँचों वक्त नमाज और कुरान पढ़ें। नमाज में अल्लाह से रो-रोकर दुआएँ और अपने गुनाहों की माफी माँगें। गरीब और बेसहारा लोगों की मदद करें। बयान में उन्होंने आगे कहा, “जब-जब दुनिया में लोग अल्लाह की नाफरमानी करते हैं, अल्लाह के बताए रास्ते पर नहीं चलते, नमाज, रोजा, कुरान से दूर जाते हैं, जुल्म-ज्यादती ज्यादा होती है, लोगों को सताया जाता है, छोटे-बड़ों का आदर खत्म हो जाता है और बेशर्मी बढ़ जाती है तो अल्लाह अपना असर दिखाते हैं। जैसे सूरज ग्रहण, चाँद ग्रहण, आँधी-तूफान, जलजले (भूकंप) और ऐसी बीमारियाँ फैलाता है जो लाइलाज हों। कोरोना वायरस भी इसी तरह के अजाबों में से एक है।”

काजी ने इस वायरस से बचने के भी कई उपाय बताते हुए कहा कि अपने घरों में लोबान, गंधक और आजवायन आदि की धूनी देकर इस अजाब से बचा जा सकता है। साथ ही बाहर से आने पर साबुन से हाथ-मुँह धोएँ। घबराने की जरूरत नहीं है।

आपको बता दें कि इससे पहले एक इस्लामी धर्मगुरु इलियास शराफुद्दीन ने कहा था कि उइगरों से क्रूरता करने के कारण अल्लाह ने चीन पर इस वायरस का कहर भरपाया है और उन्हें दंडित किया है। एक वायरल ऑडियो में धर्मगुरु को कहते सुना गया था कि याद करो कैसे उन्होंने मुस्लिमों को धमकी दी थी और दो करोड़ मुस्लिमों की जिंदगी बर्बाद करने की कोशिश की। मुस्लिमों को शराब पीने के लिए मजबूर किया गया, उनकी मस्जिदों को तोड़ दिया गया और उनकी पवित्र पुस्तकों को जला दिया गया। उन्होंने कहा था कि चीन ने सोचा कि कोई भी उन्हें चुनौती नहीं दे सकता, लेकिन अल्लाह सबसे शक्तिशाली है, अल्लाह ने चीन को सजा दी।

इराक मूल के ईरान में रहने वाले इस्लामिक नेता अयातुल्ला सैयद हादी-अल-मुदारिसी ने भी 28 फरवरी को MEMRI-TV पर दिए एक वीडियो संदेश में चीन पर निशाना साधते हुए कहा था कि- नि:संदेह अल्लाह ने चीन को ये सज़ा दी है, चीन के उन कारनामों के लिए, जिसमें वो मुस्लिम औऱ इस्लाम के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि जाहिर सी बात है कि ये कोरोना वायरस चीन पर अल्लाह का अज़ाब है। बाद में मुदारिसी के भी इससे संक्रमित होने की खबरें सामने आई थी।

भूख हड़ताल, हिरासत के बाद दिग्विजय सिंह को डबल झटका: HC ने नहीं सुनी, बीजेपी EC पहुॅंची

मध्य प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में चल रही कॉन्ग्रेस सरकार भविष्य पर पैदा संकट की एक बड़ी वजह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बताए जाते हैं। कहा जा रहा है कि उनके ही इशारों पर कमलनाथ ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों की लगातार उपेक्षा कर रहे थे। इसके बाद राज्यसभा की उम्मीदवारी में दिग्विजय को तरजीह मिलता देख सिंधिया ने बीजेपी का दामन थाम लिया और उनके समर्थक विधायकों ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद से मध्य प्रदेश का सियासी ड्रामा थमने का नाम नहीं ले रहा। सुप्रीम कोर्ट तक यह मसला पहुॅंच चुका है।

गुरुवार को इस सियासी ड्रामे में सबसे पहले खबर आई कि दिग्विजय सिंह बागी विधायकों से मिलने की मॉंग को लेकर बेंगलुरु के एक होटल के बाहर भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। इस होटल में वे बागी विधायक ठहरे हुए हैं जिनका इस्तीफा मध्य प्रदेश विधानसभा के स्पीकर स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इन विधायकों के दावे के इतर कॉन्ग्रेस उन्हें बंधक बनाने का आरोप बीजेपी पर लगा रही है। दिग्विजय सिंह को धरने पर बैठने के बाद पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इसके बाद दिग्विजय ने कहा कि अब वे थाने में भूख हड़ताल करेंगे।

फिर उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपनी याचिका में उन्होंने बागी विधायकों से मिलने की अनुमति देने की अपील की थी। लेकिन, अदालत ने ऐसा कोई भी आदेश देने से इनकार करते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी। दूसरी ओर, उनके खिलाफ बीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा है। पत्र में कहा गया है कि दिग्विजय सिंह राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार हैं। बावजूद इसके अन्य नेताओं के साथ बेंगलुरु के एक होटल में जाकर उन्होंने उन्होंने 16 विधायकों पर अपने पक्ष में वोट डालने के लिए दबाव डालने की कोशिश की। यह चुनाव अचार संहिता का उल्लंघन है। पत्र में दिग्विजय सिंह के खिलाफ उचित कार्रवाई की मॉंग की गई है।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस के 22 विधायकों ने पिछले दिनों इस्तीफा दे दिया था। इनमें से 6 का इस्तीफा स्वीकार किया जा चुका है। अन्य के इस्तीफे स्पीकर ने अब तक स्वीकार नहीं किए हैं। राज्यपाल ने कमलनाथ सरकार को सोमवार को विधानसभा में बहुमत साबित करने को कहा था। लेकिन, स्पीकर ने कार्यवाही स्थगित कर दी थी। इसके खिलाफ बीजेपी के कई नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। बुधवार को सुनवाई में शीर्ष अदालत ने स्पीकर से पूछा कि वे विधायकों के इस्तीफे पर कब तक फैसला लेंगे। स्पीकर ने गुरुवार को इसका जवाब देने की बात कही है।

दंगों में मारे गए हिन्दुओं के परिवारों की मदद करना भी पाप है क्या? कपिल मिश्रा से बौखलाया गुप्ता जी का ‘द प्रिंट’

कपिल मिश्रा निशाना हैं। कपिल मिश्रा तब से निशाना हैं, जब से उन्होंने दिल्ली में माहौल खराब करने वाले उपद्रवियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। शाहीन बाग़ में प्रदर्शन पर बैठे उपद्रवियों के कारण कई बड़ी सड़कों पर महीनों जाम का माहौल रहा, बच्चों और ऑफिस जाने-आने वालों को प्रतिदिन परेशानी हुई और स्थानीय लोगों का जीना मुश्किल हो गया। शाहीन बाग़ की तर्ज पर पूरी दिल्ली को बंधक बनाने की योजना थी लेकिन कपिल मिश्रा ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस तरह से लोगों को बंधक नहीं बनाया जा सकता और सड़कें खाली कराई जाएँ, वरना वो इसके विरोध में सड़क पर उतरेंगे।

सम्पूर्ण दिल्ली की मनोदशा बयाँ करने की सज़ा उन्हें बदनाम करने की कोशिशों के रूप में मिली। हालाँकि, दिल्ली में दंगे भड़कने उनके बयान से पहले ही शुरू हो गए थे लेकिन उन्हें जबरदस्ती ‘बलि का बकरा’ बनाने का प्रयास किया गया। ऑपइंडिया ने भी एक वीडियो के जरिए इसका पर्दाफाश किया कि किस तरह उनके बयान से पहले ही मजहबी दंगाई भीड़ द्वारा पत्थरबाजी और राह चलते लोगों की पिटाई शुरू कर दी गई थी। लेकिन, वामपंथी गैंग ने एक सुर में दंगों के लिए कपिल मिश्रा को बदनाम करना शुरू कर दिया।

भारत के टुकड़े करने की बात की शरजील इमाम ने। हिन्दुओं को धमकाया वारिस पठान ने। शाहीन बाग़ के हिन्दुत्वविरोधी प्रदर्शनों में भाषण दिया अमानतुल्लाह खान ने। दंगों में हिन्दुओं का कत्लेआम किया ताहिर हुसैन ने। लेकिन, दोषी कौन? कपिल मिश्रा। दंगाई भीड़ द्वारा मार डाले गए हिन्दुओं को छोड़ दिया गया। न तो कोई मीडिया वाला उनकी खोज-ख़बर लेने गया और न ही किसी ने ये चिंता जताई कि आखिर मृत हिन्दुओं के परिवारों का भरण-पोषण कैसे होगा? ऐसे समय में कपिल मिश्रा आगे आए और उन्होंने क्राउडफंडिंग की पहल कर के सभी पीड़ित परिवारों से मिलना-जुलना शुरू किया और उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया।

कपिल मिश्रा भले ही हालिया दिल्ली विधानसभा चुनावों में हार गए हों लेकिन दंगों के बाद जनता की मदद करने के लिए जब दिल्ली सरकार का कोई मंत्री-विधायक नहीं पहुँचा तो कपिल मिश्रा ने ये बीड़ा उठाया। कुल 1 करोड़ रुपए जमा करने का लक्ष्य रखा गया था, जो पूरा हो चुका है। अब वो और डोनेशन नहीं लेंगे। इन रुपयों में से कई लोगों की मदद की गई है, औरों की की जा रही है। मिश्रा सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार अपडेट कर रहे हैं कि इन रुपयों में से किसे कितना दिया जा रहा है। जनता के धन में से एक-एक पैसे का हिसाब उन्हें दिया जा रहा है।

कपिल मिश्रा के इस प्रयास से ‘द प्रिंट’ खफा हो गया है। शेखर गुप्ता के प्रोपेगंडा पोर्टल को इस बात से भी दिक्कत है कि एक-एक रुपया देने वाले लोगों के ट्वीट्स को भी कपिल मिश्रा रीट्वीट क्यों कर रहे हैं। उसने लिखा है कि ‘दंगे भड़काने के आरोपित’ कपिल मिश्रा क्राउडफंडिंग कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो ताहिर हुसैन पुलिस कस्टडी में किस बात के लिए है? समाजसेवा के लिए? अंकित शर्मा की हत्या करने वाले कौन लोग थे? कॉन्सटेबल रतन लाल की हत्या किसने की? और हाँ, दिल्ली दंगा शुरू होने के समय हाथ में पिस्तौल लहराते हुए पुलिस पर गोलीबारी कर रहा शाहरुख़ कौन था? क्या इन सबको बचाने के लिए कपिल मिश्रा का नाम बार-बार दोहराया जा रहा है?

यहाँ सवाल ये है कि जब पूरा मीडिया हिन्दुओं के दुःख-दर्द को छिपाने में लगा हुआ है और दंगाइयों के कुकृत्यों को ढकने में प्रयासरत है, कोई एक व्यक्ति यदि पीड़ितों के हित के लिए उठ खड़ा हुआ है तो इन प्रोपेगंडा पोर्टलों को पच क्यों नहीं रहा? किसी कथित अल्पसंख्यक को एक झापड़ लगने वाले आरोप को किसी हिन्दू को सैकड़ों बार चाकू गोद कर मार डालने से तुलना करने वाले इन पोर्टलों की ये पुरानी आदत है। ‘द प्रिंट’ इस बात के लिए भी खफा है कि कपिल मिश्रा ने उसके पत्रकारों से बात क्यों नहीं की। मिश्रा ने उन्हें पहले ही लताड़ लगाते हुए बता दिया था कि वो फेक न्यूज़ और प्रोपेगंडा फैलाने वालों से बात नहीं करेंगे। उन्होंने कहा था:

तुम्हारा न्यूज़ पोर्टल ‘द प्रिंट’ एक पक्षपाती फेक न्यूज़ फैक्ट्री है। बावजूद इसके कि तुमलोग मेरे ख़िलाफ़ लगातार एक घृणास्पद अभियान चला रहे हो, मुझे चारों ओर से भारी समर्थन मिल रहा है। ज़मीन पर तुम जहाँ भी लोगों से बात करोगे वहाँ से मेरे लिए समर्थन आएगा लेकिन ‘द प्रिंट’ जैसी फेक न्यूज़ फैक्ट्री को ये पसंद नहीं। मुझे ज़रूरत ही नहीं है कि अपना समर्थन साबित करने के लिए तुम्हारे पोर्टल में लेख प्रकाशित करवाऊँ। दिल्ली की जनता ने तुम्हारे प्रोपेगेंडा को नकार दिया है। तुम जाकर इस पर लेख लिखो कि मोहम्मद शाहरुख़ बचपन में कितना क्यूट था। तुम लिखो कि कैसे ‘बुरे हिन्दुओं’ ने ताहिर हुसैन को एक आतंकवादी बनने के लिए मजबूर कर दिया।”

ये पूरा गिरोह बार-बार हिन्दुओं को पीड़ित मानने की जगह ‘दोनों ही तरफ के लोग मरते हैं’ वाला राग अलाप रहा है। जबकि सत्य यह है कि मजहबी भीड़ ने दंगों की अच्छी-खासी तैयारी की थी। अगर कोई अपने समुदाय को ले कर कुछ करना चाहता है तो समस्या क्या है? क्या फंड जुटाना गुनाह है? क्योंकि पहले तो दंगे का पीड़ित ही इन्हें नहीं मान रहे थे, अब लाशें सामने हैं तो नए गीत रचे जा रहे हैं। पीड़ितों के लिए पैसा इकट्ठा करना अमानवीय और विभाजनकारी कैसे है? चूँकि चार चम्पुओं से बयान ले लिए गए कि ये अनैतिक है, मानवीय मूल्यों के खिलाफ है, भेदभाव करता है, उससे ये साबित नहीं हो जाता कि मरने वाले हिन्दू परिवारों को लोगों की हत्या नहीं हुई है। जिनके बच्चे मरे, जिनकी बेटियों को नग्न करके दुराचार किया गया, जिनकी शादी में सिलिंडरों को उड़ाने की योजना थी, जिनके बच्चों को छः कट्टरपंथियों ने दो-दो घंटे चाकू मारे… उन्हें अब आर्थिक मदद से भी महरूम किया जाएगा?

दिलबर नेगी का हाथ-पाँव काट कर उसी दुकान में लगाई आग में जिन्दा झोंक दिया गया, जिसमें वो काम करते थे। विवेक अपनी दुकान में बैठे थे, तभी वहाँ दंगाई भीड़ ने हमला किया और उनके सिर में ड्रिल कर डाला। दिनेश खटीक अपने बच्चों के लिए दूध लेने निकले थे, उन्हें गोली मार दी गई सिर में। इसी तरह आलोक तिवारी भोजन खा कर टहलने निकले, उन्हें मार डाला गया। उनके अंतिम संस्कार के लिए भी परिवार के पास रुपए नहीं थे। ताहिर हुसैन की ईमारत में जमा सैकड़ों गुंडों ने कई हिन्दुओं को मार डाला और कइयों के घरों को तबाह कर दिया। मंदिरों तक को नहीं बख्शा गया। क्या इन सबको मदद नहीं दी जानी चाहिए?

दिक्कत ये है कि पीड़ितों की मदद ‘द प्रिंट’ से इसीलिए देखी नहीं जा रही है क्योंकि इससे लोगों को पता चल रहा है कि कहाँ किस हिन्दू को किस तरह से दंगाई भीड़ ने मारा। इससे उस गुट के सभी मीडिया संस्थानों की पोल खुल रही है, जिन्होंने हिन्दुओं की मौतों को छिपाया क्योंकि इसके बाद उन्हें बताना पड़ता कि किसकी मौत कैसे हुई। फिर दंगाइयों की पहचान बतानी पड़ती, जो उनके प्रोपेगंडा में फिट नहीं बैठता। इसीलिए, आज कोई व्यक्ति पीड़ितों, मार डाले गए हिन्दुओं के परिवारों और बच्चों के लिए खड़ा हुआ है तो उनसे देखा नहीं जा रहा। कपिल मिश्रा भी इन पोर्टलों को भाव नहीं दे रहे। उनका कहना है- “ये जितनी गाली दे रहे हैं, उससे जनता उतनी ज्यादा जागरूक होकर डोनेट कर रही है।

विधायकों के इस्तीफे पर फैसला कब? SC में गुरुवार को बताएँगे स्पीकर: कमलनाथ को फिर मोहलत

फ्लोर टेस्ट से बच रही मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार को एक और दिन की मोहलत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को इस संबंध में सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत ने पूछा कि विधायकों के इस्तीफे पर स्पीकर कब तक फैसला लेंगे। स्पीकर के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इसका जवाब देने के लिए गुरुवार तक का वक्त मॉंगा। सुप्रीम कोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और 9 भाजपा विधायकों ने याचिका दायर कर रखी है। सोमवार को बिना फ्लोर टेस्ट कराए विधानसभा की कार्यवाही स्थगित किए जाने के बाद याचिका दायर की गई थी।

सुनवाई के दौरान कॉन्ग्रेस, भाजपा और राज्यपाल की ओर से कोर्ट में दलीलें पेश की गईं। कॉन्ग्रेस ने कहा कि बागी विधायकों का इस्तीफा भाजपा की साजिश है। इसकी जाँच होनी चाहिए। साथ ही कॉन्ग्रेस ने प्रदेश में सियासी संकट पैदा होने के पीछे भी भाजपा को जिम्मेदार बताया। कॉन्ग्रेस ने कहा कि बहुमत परीक्षण के लिए रातोंरात मुख्यमंत्री और स्पीकर को आदेश देना राज्यपाल का काम नहीं है। स्पीकर इस मामले में सबसे ऊपर हैं, राज्यपाल उन पर हावी हो रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने विधायकों के इस्तीफे से खाली हुई सीटों पर उपचुनाव होने तक फ्लोर टेस्ट नहीं कराने की माँग की और कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो आसमान नहीं फटेगा। वहीं भाजपा ने इसका विरोध किया।

सुनवाई के दौरान कॉन्ग्रेस के वकील की ओर से दलील दी गई है कि अभी दुनिया मानवता के सबसे बड़े संकट कोरोना से जूझ रही है, ऐसे में क्या इस वक्त बहुमत परीक्षण कराना जरूरी है? कॉन्ग्रेस की ओर से अदालत में बताया गया कि राज्यपाल सिर्फ मीडिया रिपोर्ट्स पर भरोसा कर रहे हैं और मान कर बैठे हैं कि कमलनाथ सरकार के पास बहुमत नहीं है। कॉन्ग्रेस के वकील ने अदालत से मामले की सुनवाई टालने के अपील करते हुए कहा कि ऐसा हुआ तो आसमान नहीं फट जाएगा। हमारी राज्य सरकार के पास बहुमत था, लेकिन विधायकों को किडनैप किया गया।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में फ्लोर टेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज फैसला आने के आसार थे। मगर, कोर्ट ने विधानसभा स्पीकर से सवाल किया कि आखिर आपने विधायकों के इस्तीफे पर अभी तक फैसला क्यों नहीं लिया? क्या ये विधायक अपने आप अयोग्य नहीं हो जाएँगे? अगर आप संतुष्ट नहीं हैं, तो आप विधायकों के इस्तीफे को अस्वीकार कर सकते हैं। आपने 16 मार्च को बजट सत्र को टाल दिया? अगर आप बजट को पास नहीं करेंगे, तो राज्य सरकार का कामकाज कैसे चलेगा?

पीठ ने क्या कहा?

पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा- हम कैसे तय करें कि विधायकों के हलफनामे मर्जी से दिए गए या नहीं? यह संवैधानिक कोर्ट है। हम संविधान के दायरे में कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे। टीवी पर कुछ देखकर तय नहीं कर सकते। 16 बागी विधायक फ्लोर टेस्ट में शामिल हों या नहीं, लेकिन उन्हें बंधक नहीं रखा जा सकता। अब साफ हो चुका है कि वे कोई एक रास्ता चुनेंगे। उन्होंने जो किया उसके लिए स्वतंत्र प्रक्रिया होनी चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने वकीलों से सलाह माँगी कि कैसे विधानसभा में बेरोकटोक आने-जाने और किसी एक का चयन सुनिश्चित हो।

भाजपा का पक्ष

इसके बाद मुकुल रोहतगी की ओर से अदालत में कहा गया कि अगर अदालत चाहे तो वह 16 बागी विधायकों को जज के चैंबर में या रजिस्ट्रार के सामने पेश कर सकते हैं। हालाँकि, जज ने इसके लिए मना किया और कहा कि वो ऐसा आदेश जारी नहीं कर सकते। वहीं रोहतगी ने कहा आप विकल्प के तौर पर कर्नाटक हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को गुरुवार को विधायकों के पास भेजकर वीडियो रिकॉर्डिंग करा सकते हैं। कॉन्ग्रेस चाहती है कि विधायक भोपाल आएँ ताकि उन्हें प्रभावित कर खरीद-फरोख्त की जा सके। विधायक उनसे मिलना ही नहीं चाहते तो कॉन्ग्रेस क्यों इस पर जोर दे रही है।

इस मामले में शिवराज सिंह ने भी कहा कि विधायकों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बता दिया है कि वह अपनी इच्छा से बेंगलुरु में हैं और वे सबूत के तौर पर कोर्ट में सीडी पेश करने के लिए तैयार हैं। इस्तीफा देना उनका संवैधानिक अधिकार है, उन्होंने वैचारिक मतभेद के चलते इस्तीफे दिए। इन्हें मंजूर करना स्पीकर का कर्तव्य है। वह फैसले को लंबे वक्त तक लटका नहीं सकते हैं। क्या स्पीकर इसे लेकर सेलेक्टिव हो सकते हैं, कि कुछ पर फैसला लेंगे, कुछ इस्तीफे पर नहीं। जब विधायक भोपाल आकर कॉन्ग्रेस से मिलना ही नहीं चाहते तो हमे इसके लिए कैसे मज़बूर किया जा सकता है। कोर्ट स्पीकर को इस्तीफे स्वीकार करने के लिए निर्देश दे। हमारा भी मानना है कि सरकार बहुमत खो चुकी है। इसलिए तुरंत फ्लोर टेस्ट होना चाहिए।

सियायी हालात

बता दें मध्यप्रदेश में इस समय कमलनाथ सरकार के गिरने का संकट मंडरा रहा है। स्पीकर द्वारा 22 कॉन्ग्रेस विधायकों में से 6 विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने के बाद पार्टी के विधायकों की संख्या कम होकर 108 हो गई है। अभी 16 बाकी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार होने बाकी है। यदि उनके इस्तीफे स्वीकार कर लिए जाते हैं तो पार्टी के विधायकों की संख्या 92 हो जाएगी। सदन में बीजेपी के विधायकों की संख्या 107 है।

रंजन गोगोई तो बहाना है, राम मंदिर निशाना है: पूर्व CJI को राज्यसभा भेजे जाने से खफा BBC ने रोया ‘सिद्धांतों’ का रोना

बीबीसी या उसे ‘बिग बीसी’ कह लीजिए। इस ब्रिटिश प्रोपेगंडा मीडिया संस्थान को आज भी लगता है कि भारत उसके आकाओं का गुलाम है। वो आज भी 1947 से पहले के ज़माने में जी रहा है, जब उसके ही देश के तथाकथित जज सफ़ेद बालों वाली विग लगा कर कोर्ट में बैठते थे कठघड़े में खड़े किसी निर्दोष और मासूम भारतीय की ओर इशारा कर के कहते थे- ‘हैंग हिम’। बीबीसी आज भी उसी मुद्रा में है और वो चाहता है कि भारत की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका ठीक उसी तरह काम करे, जैसा वो चाहता है। उसका ताज़ा निशाना पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई हैं।

पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्यसभा सांसद के रूप में मनोनीत किया है। नियमानुसार राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नॉमिनेट किए जाते हैं और रंजन गोगोई को भी किया गया। कहानी शुरू होती है जनवरी 2018 से जब रंजन गोगोई सहित तब सुप्रीम कोर्ट के 4 सबसे वरिष्ठ जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मोदी सरकार पर गम्भीर आरोप लगाए थे। शेखर कपूर सरीखे पत्रकार उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बढ़-चढ़ कर मौजूद रहे थे। उस घटना के बाद से गोगोई मीडिया के वर्ग विशेष के प्यारे बन गए थे। बीबीसी जैसे संस्थानों ने इसे बढ़-चढ़ कर चलाया था।

तो फिर रंजन गोगोई अचानक से गिरोह विशेष के दुश्मन कैसे बन गए? 2019 के चुनाव में राफेल मुद्दा हावी था और अपनी हर रैली में राहुल गाँधी आँकड़े बदल-बदल कर बताते थे कि घोटाला हुआ है। ‘द हिन्दू’ के नेतृत्व में बीबीसी जैसे संस्थानों ने प्रोपेगंडा पोर्टल्स के साथ मिल कर राफेल मामले में एक से बढ़ कर एक फिक्शन गढ़े। मुद्दा फ्लॉप हो गया और चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद इस पर बातें होनी भी बंद हो गईं। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार को क्लीन चिट दी।

इसके बाद आया राम मंदिर मामला। दशकों से अटके इस मामले में तत्कालीन सीजेआई गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने फ़ास्ट-ट्रैक सुनवाई कर के निपटाया। बस, यही वो मौका था जब वो मीडिया के सबसे बड़े दुश्मन बन गए क्योंकि उन्होंने राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया। यहाँ सवाल उठता है कि अगर बीबीसी को दोष ही देना है तो सिर्फ़ रंजन गोगोई को ही क्यों? राफेल मामले में तो उनके साथ जस्टिस एसके कॉल और जस्टिस केएम जोसफ भी थे। केएम जोसफ भी उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल थे, जिसमें मोदी सरकार पर निशाना साधा गया था। फिर बीबीसी केवल गोगोई को ही क्यों निशाना बना रहा है?

राम मंदिर फैसले में भी जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अब्दुल नज़ीर शामिल थे। जस्टिस बोबडे फ़िलहाल देश के सीजेआई हैं। तो फिर रंजन गोगोई पर ही निशाना क्यों? क्या पहले किसी जज ने रिटायरमेंट के बाद कोई पद स्वीकारा ही नहीं है या फिर सब कुछ एकदम नया हो रहा है? या मोदी सरकार ने जस्टिस गोगोई को राज्यसभा भेज कर क़ानून और नियमों की अवहेलना की है। इन सभी चीजों की पड़ताल हम करेंगे लेकिन सबसे पहले जानते हैं कि आखिर बीबीसी ने लिखा क्या है?

‘बिग बीसी’ की खुन्नस: रंजन गोगोई पर साधा निशाना

बीबीसी लिखता है कि जजों से उम्मीद की जाती है कि वो कुछ ‘अलिखित सिद्धांतों’ का पालन करें। हालाँकि, अलिखित कहने से स्पष्ट है कि इसका कहीं कोई जिक्र संविधान में नहीं है लेकिन बीबीसी ने अपने हिसाब से जो भी सही मान लिया, वही सिद्धांत सब पर लागू होना चाहिए। बीबीसी यह याद कराना नहीं भूलता कि जिस ज़मीन पर पहले ‘बाबरी मस्जिद हुआ करती थी’, वहाँ राम मंदिर के निर्माण का फ़ैसला सुनाया गया। अगर वहाँ पहले बाबरी मस्जिद हुआ करती थी तो फिर उस बाबरी मस्जिद का निर्माण कब और कैसे हुआ था और उससे पहले वहाँ क्या हुआ करता था, इस पर बीबीसी ने चुप्पी साध रखी है। ये बताने से प्रोपेगंडा ध्वस्त हो जाएगा।

साथ ही बीबीसी लिखता है कि राफेल मामले में कोर्ट के निर्णय के बाद कई ‘ज़रूरी सवाल’ के जवाब नहीं मिले। किसने तय किया कि कौन सा सवाल ज़रूरी है? उन्हीं राहुल गाँधी ने, जिनके आँकड़े हर बार बदल जाते थे? सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट लम्बा-चौड़ा था और उसे बिना पढ़े अगर बीबीसी ऐसे दावे कर रहा तो उसका कुछ नहीं किया जा सकता। चीजें ‘मीडिया ट्रायल’ से नहीं चलती। जनता ने चुनावों में राफेल मुद्दे को नकार दिया, सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष को झटका दिया सो अलग। क्या अब बीबीसी जनता और न्यायपालिका से ऊपर जाकर ये तय करेगा कि कौन से सवाल ज़रूरी हैं और कौन से नहीं?

इसके अलावा रंजन गोगोई पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने सीजेआई रहते भाजपा के घोषणापत्र के आधार पर काम किया। असम में एनआरसी लागू किए जाने को इसके अगले उदाहरण के रूप में दिखाया गया है। एनआरसी वाला निर्णय जिस बेंच ने सुनाया, उसमें जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन भी शामिल थे। लेकिन, बीबीसी का निशाना सिर्फ़ रंजन गोगोई ही हैं। जस्टिस नरीमन 2011 में भारत के सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किए गए थे। तब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 की सरकार चल रही थी, जिसे रिमोट कंट्रोल से सोनिया गाँधी चला रही थी।

इसके बाद बीबीसी के लेख में जस्टिस (रंजन गोगोई) पर सीजेआई रहते लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की बात की गई है। बता दें कि वर्तमान सीजेआई जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता में एक सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक समिति ने इस मामले की जाँच की थी और रंजन गोगोई को क्लीन-चिट दिया था। बीबीसी को इस जाँच पर भी भरोसा नहीं। यानी, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले और जाँच पर कोई भरोसा नहीं और मोदी सरकार तो ग़लत है ही, ऐसा इनका सोचना है।

क्या पहले ऐसा नहीं हुआ? सब कुछ नया है?

ज्यादा पहले न जाएँ तो 1998 में जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को कॉन्ग्रेस सरकार ने रिटायरमेंट के बाद ओडिशा से राज्यसभा भेजा था। वो 2004 तक राज्यसभा सांसद रहे थे और अपना कार्यकाल पूरा किया था। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा के बारे में तो यहाँ तक कहा जाता रहा है कि उन्होंने 1984 सिख दंगा मामले में कॉन्ग्रेस को एक तरह से क्लीन-चिट दे दी थी। ऐसा इन दंगों पर पुस्तक लिखने वाले मिट्टा का ही मानना है। आज उस दंगे के कई आरोपित जेल में हैं, जिनका कॉन्ग्रेस से लंबा जुड़ाव रहा है।

इसी तरह बहरुल इस्लाम भी सुप्रीम कोर्ट के जज थे, जिन्होंने राज्यसभा की शोभा बढ़ाई थी। वे जब सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते थे, तब उन्हें 1962 में पहली बार असम से कॉन्ग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेजा। उसके बाद दूसरी बार 1968 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया लेकिन इसके पहले कि वो 6 साल का अपना कार्यकाल पूरा कर पाते, उन्हें तब के असम और नागालैंड हाईकोर्ट (आज के गुवाहाटी हाईकोर्ट) का जज बनाया गया। जब वो रिटायर हुए, उसके बाद फिर से कॉन्ग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा। तो फिर अब रंजन गोगोई पर हंगामा क्यों?

वकीलों और जजों को रिटायरमेंट के बाद विभिन्न जाँच समितियों का अध्यक्ष बनाना, किसी आयोग वगैरह के अध्यक्ष का पद देना या सदस्य के रूप में शामिल करना या फिर किसी संवैधानिक संस्था में कोई पद देना- कोई आज की रीत नहीं है। मुद्दा ये है कि रंजन गोगोई पर सवाल उठाने वालों के पास कोई तर्क ही नहीं है, जिससे वो उनके मनोनयन को ग़लत ठहरा सकें। इसीलिए बीबीसी ‘अलिखित सिद्धांतों’ और दुनिया-जहाँ का रोना रो रहा है। गोगोई तो मनोनीत किए गए हैं, बहरुल इस्लाम और रंगनाथ मिश्रा तो कॉन्ग्रेस से राज्यसभा गए थे।

क्या गोगोई को मनोनीत करना संविधान की अवहेलना है?

संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्यसभा का गठन 250 सदस्यों द्वारा होता है और इनमें से 12 सदस्यों के नाम राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित किए जाते हैं। फ़िलहाल, राज्यसभा में 245 सदस्य हैं। ये 12 लोग कौन हो सकते हैं। साहित्य, विज्ञान, कला तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव के आधार पर इन्हें मनोनीत किया जा सकता है। अब कोई मुर्ख ही होगा जो कहेगा कि रंजन गोगोई के पास कोई अनुभव नहीं है। उन्होंने ख़ुद कहा है कि वो राज्यसभा सांसद का पद इसीलिए स्वीकार कर रहे हैं क्योंकि वो संसद में जुडिशरी की आवाज़ बनना चाहते हैं, न्यापालिका की बातों को वहाँ उठाना चाहते हैं।

तो फिर हंगामा क्यों? दरअसल, हंगामे का कारण है राफेल के मुद्दे पर मोदी सरकार को न घेर पाना और राम मंदिर मामले का निपटारा एकदम शांति से हो जाना। हमेशा ख़ून-खराबे की उम्मीद लेकर बैठे ये मीडिया संस्थान इसीलिए भी नाराज़ हैं क्योंकि तीन तलाक़ और अनुच्छेद 370 जैसे निर्णय शांतिपूर्वक सम्पन्न हुए और उन पर अमल भी हुआ। सीएए के बहाने खड़े हुए आंदोलन ने हिन्दू-विरोधी दंगों का रूप लिया और ये फिर से ये बेनकाब हुए। कोरोना वायरस पर सरकार की तैयारियों से ये पहले ही हैरान हैं। ऐसे में मुद्दों के अभाव से जूझ रहे ये मीडिया संस्थान अभी और कितना गिरते हैं, ये देखने वाली बात होगी।

भीम-मीम का नया शिगूफा: जो विशेष मजहब खुद को हिंदुस्तानी नहीं मानते वे आंबेडकरवादी क्या बनेंगे

देश में सीएए लागू हुआ ही था कि देश के अलग-अलग हिस्सों से इसके विरोध के नाम की खबरें आने लगीं। कहीं विरोध को शांति पूर्वक रखा गया तो कहीं इसे हिंसा का रूप दे दिया गया, तो कहीं सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया, तो कहीं इसी विरोध के नाम पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया। जैसे कि, दिल्ली में सीएए विरोध के नाम पर हुई हिंदू विरोधी हिंसा।

इसे लेकर केंद्रीय मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री और खुद गृहमंत्री अमित शाह ने अपना बयान दिया और कहा कि सीएए देश के किसी भी व्यक्ति की नागरिकता लेता नहीं बल्कि यह नागरिकता देने वाला कानून है। इसके बाद भी आज तक कोई भी प्रदर्शनकारी यह नहीं बता सका कि हम इसका विरोध क्यों कर रहे हैं। अगर आप भी जानना चाहते हैं कि ये लोग विरोध क्यों कर रहे हैं तो आज आप भी जान लीजिए।

बीते दिन क्विटं हिंदी ने अपने पोर्टल पर एक खबर अपलोड की, जिसमें सीएए विरोध करने के चौंका देने वाले सभी कारण आपको मिल जाएँगे और देश को तोड़ने वाली योजनाओं के बारे में भी आपको जानकारी हो जाएगी। लेख में लेखने शाहीन बाग से अपना विचार देने की शुरूआत करते हैं और कहते हैं कि सीएए के खिलाफ शाहीन बाग में जारी धरना लोगों के लिए एक मिशाल बन गया है, जिसमें मुस्लिमों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

आगे लेखक ने लिखा, “तीन तलाक और राम मंदिर के मुद्दे से मुस्लिम समाज बेहद आहत था, लेकिन उसने प्रतिरोध नहीं किया और फिर उन्हें (मुस्लिमों को) CAA-NRC के मुद्दे पर लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया कि वह अपने अस्तित्व की लडाई लड़ें।” अब आपको जानकार हैरानी होगी कि यह लेखक कोई मुस्लिम नहीं बल्कि डॉ उदित राज, पूर्व लोकसभा सांसद और कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैंस जिन्होंने अपने लेख में हिंदुओं और हिदुत्व के खिलाफ जमकर जहर उगला और इसे हवा दी उस पोर्टल क्विंट हिंदी ने जो एक प्रोपेगेंडा के तहत खबरें चलाता है।

सवाल खड़ा होता है जो कानून संसद से पास होकर देश में लागू हुआ हो उसी कानून के खिलाफ वह पूर्व सांसद लोगों को भड़काने में लगे हुए हैं, जिसे जानकारी है कि यह कानून भी संदिवधान के तहत संसद से पास हुआ, लेकिन उनके इस लेख ने उनके चेहरे से नकाब हटा दिया और पूरे लेख में जय भीम जय मीम का राग अलापते रहे। लेखक ने आगे लिखा कि पहली बार ऐसा हुआ कि सीएए विरोध के दौरान अल्पसंख्यक और बुद्धिजीवी समाज में डॉ अम्बेडकर को अपनाया गया। दोनों की दोस्ती जमीन पर पैदा हुई और इसके बड़े राजनैतिक और सामाजिक परिणाम अवश्य होने वाले हैं। लेखक यहीं नहीं रुके और गँभीर परिणाम की ओर इशारा करते हुए लिखा, “CAA-NRC के विध्वंसक परिणाम तो होंगे ही, लेकिन इस सबसे बीच एक अच्छी बात यह हुई है कि मुस्लिम समाज पहली बार अपने लिए इतने दमखम से मैदान में उतरा है। अब जब वह मैदान में उतरा है, तभी तो अपने सही दोस्त और दुश्मन कि पहचान कर पायेगा।”

लेखक उदित राज का आगे दुख भी झलका और लिखा, “दलित-मुस्लिम एकता का प्रयास तो कई बार हुआ लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी। एकजुटता की पहल अक्सर दलितों की तरफ से होती रही है। मुस्लिम समाज को सब्र से काम लेना होगा क्योंकि वो कभी दलित उत्पीड़न या उसकी लड़ाई में साथ नहीं आए।” वहीं लेख यह लिखना भूल गए कि जो मुस्लिम कभी अपने को भारतीय तक नहीं मानता तो आखिर वही मुस्लिम दलितों के साथ या आंबेडकरवादी कैसे हो सकता है।

खैर, आगे उदित ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि मुस्लिमों के बाद अगर CAA-NRC के खिलाफ आन्दोलन में कोई समाज सबसे बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी कर रहा है तो वो दलित समाज ही है। उसका कारण भी है, क्योंकि दलित समाज का मानना है कि बीजेपी-संघ मिलकर देश के संविधान को नष्ट करना चाहते हैं। इसके बाद उदित ने खुद को मुस्लिम हितैशी साबित करते हुए कुछ आँसू अपनी हथेली पर गिराए और लिखा, “बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से प्रताड़ित मुस्लिम भारत में नागरिकता नहीं ले सकते। बाकी शेष अन्य धर्म के लोगों के लिए भारतीय नागरिकता का दरवाजा खुला है। इससे दलित समाज भावुक रूप से आहत हुआ।”

आगे राज ने अपने लेख में यह तो बता दिया कि बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को लाखों लोगों के साथ हिन्दू धर्म छोड़कर के बौध धर्म अपनाया था, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि उन्होंने(बाबा साहब ने) इस्लाम को क्यों स्वीकार नहीं किया। जिसे आज आप जबरन अपने गले लगाना चाहते हैं। इतना ही नहीं बाबा साहब ने यूँ ही नहीं लिखा था मुस्लिमों के लिए, “वतन के बदले क़ुरान के प्रति वफादार हैं मुस्लिम। वो कभी हिन्दुओं को स्वजन नहीं मानेंगे।” वहीं उदित राज ने लेख के अंत में यहाँ तक लिख दिया कि मुस्लिमों के साथ दलितों की भी लड़ाई हिंदुत्व के खिलाफ है

शरद पवार की मुसीबत बढ़ी: 4 अप्रैल को पेश होने का आदेश, उद्धव पहले ही ठुकरा चुके हैं माँग

एनसीपी अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार से भीमा-कोरेगाँव हिंसा मामले में पूछताछ होगी। हिंसा की जाँच कर रहे कमीशन ने उन्हें इस संबंध में नोटिस भेजा है। कमीशन की ओर से भेजे गए नोटिस में पवार को 4 अप्रैल को पेश होने के लिए कहा गया है। पैनल के वकील आशीष सातपुते ने बुधवार को इसकी जानकारी दी।

सातपुते ने बताया कि आयोग ने तत्कालीन एसपी (पुणे ग्रामीण) सुवेज हक, तत्कालीन अतिरिक्त एसपी संदीप पाखले, तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त, पुणे रवींद्र सेंगांवकर और तत्कालीन जिलाधीश सौरभ राव को भी सम्मन किया है।

इससे पूर्व महाराष्ट्र के एक सामाजिक संगठन ने जाँच आयोग के सदस्यों से शरद पवार से पूछताछ करने की माँग की थी। समूह विवेक विचार मंच के सदस्य सागर शिंदे ने आयोग के समक्ष अर्जी दायर कर 2018 की हिंसा के बारे में मीडिया में पवार द्वारा दिए गए कुछ बयानों को लेकर उन्हें सम्मन भेजे जाने का अनुरोध किया था।

सामाजिक समूह विवेक विचार मंच के सदस्यों ने जाँच आयोग को ये अनुरोध पत्र देते हुए कहा था कि 18 फरवरी को अपनी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शरद पवार ने भीमा-कोरेगाँव की हिंसा को लेकर तमाम बातें कही थीं। इस दौरान उन्होंने पुणे के पुलिस कमिश्नर की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाया था। ऐसे में इन तमाम विषयों पर पवार से पूछताछ की आवश्यकता है।

याचिकाकर्ता संगठन ने यह भी कहा था कि भीमा-कोरेगाँव के केस में पवार से व्यक्तिगत रूप में गवाही देने और उनके पास मौजूद जानकारियों को उपलब्ध कराने के लिए निजी रूप से पूछताछ की जानी चाहिए। इस याचिका के कुछ वक्त बाद ही अब जाँच आयोग ने पवार को नोटिस जारी किया है।

गौरतलब है कि भीमा-कोरेगाँव युद्ध की 200वीं वर्षगाँठ के मौके पर 1 जनवरी 2018 को हिंसा भड़क उठी थी। पुणे पुलिस ने आरोप लगाया कि 31 दिसंबर 2017 को ‘एल्गार परिषद सम्मेलन’ में दिए ‘‘उकसावे” वाले भाषणों से हिंसा भड़की। पुलिस के अनुसार, एल्गार परिषद सम्मेलन के आयोजकों के माओवादियों से संपर्क थे।

उद्धव ठाकरे ने बीते दिनों एल्गार परिषद की जाँच NIA को सौंपने को मँजूरी दी थी। इसका विरोध उनकी सरकार में शामिल एनसीपी ने किया था। खुद पवार ने उद्धव के फैसले की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने एनआईए एक्ट की धारा 10 का हवाला देते हुए यह माँग की थी कि एनआईए जाँच के अलावा राज्य सरकार एल्गार परिषद केस की समानांतर जाँच कराए। ऐसे में पवार को समन से फिर से महाविकास अघाड़ी सरकार के बीच मतभेद गहराने के आसार दिख रहे हैं। गौरतलब है कि शिवसेना ने बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाई थी। सरकार गठन के बाद से ही साझेदार दलों के मतभेद हर मसले पर सामने आते रहते हैं।

अयोध्या फैसले के खिलाफ मार्च करने वाले इस्लामी संगठन ने नहीं माना HC का आदेश, कोरोना के खतरे के बीच प्रदर्शन

तमिलनाडु में कोरोना को लेकर हाइकोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ इस्लामिक संगठन तौहिद जमात ने सीएए-एनआरसी-एनपीआर के ख़िलाफ़ अपना प्रदर्शन जारी रखा। ये प्रदर्शन चेन्नई में मद्रास हाइकोर्ट के पास हुआ।

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि एक ओर जहाँ कोरोना वायरस के चलते देशभर में ज्यादा संख्या में लोगों के एक साथ इकट्ठा होने पर रोक लगाई जा रही है। प्रशासन इसे लेकर निर्देश लागू कर रहे हैं। बावजूद चेन्नई में सीएए प्रदर्शन में भारी संख्या में लोग पहुँचे। 

गौरतलब है कि इससे पहले तमिलनाडु के तौहीद जमात ग्रुप ने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी विरोध किया था और मार्च निकाला था। इस दौरान करीब 2000 से ज्यादा लोग चेन्नई की सड़कों पर बैनर लेकर उतरे थे और उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के ख़िलाफ़ नारे लगाए थे।

इस बार भी इस संगठन की मनमानी देखकर लग रहा है कि जनस्वास्थ्य सुरक्षा से उसके कोई वास्ता नहीं है। अभी कल शाहीन बाग में महिला प्रदर्शनकारियों ने अपना धरना खत्म करने से मना कर दिया था। हालाँकि अगले दिन से प्रदर्शनस्थल खाली दिखने लगा। मगर, जानकारी के मुताबिक वहाँ बैठी महिलाओं ने इसे न गंभीरता से लिया था और न ही इस पर कोई जवाब देना उचित समझा था।

बता दें, भारतीय प्रशासन एक ओर जहाँ इस घातक वायरस को फैलने से रोकने के लिए सार्वजनिक स्थलों पर लोगों को जाने से रोक रही है। वहीं शाहीन बाग जैसे प्रदर्शनस्थल और तौहीद जमात जैसे इस्लामिक संगठन इसे बढ़ावा देने के लिए निर्देशों की गैरफरमानी करते देखे जा रहे हैं और ऐसी बेफिक्री का क्या नतीजा होता है, हम इटली और स्पेन में देख सकते हैं। जहाँ कोरोना के कारण हजारों लोग संक्रमित हो चुके हैं।

बंगाल: कोरोना भगाने के नाम पर 500 रुपए लीटर गोमूत्र बेच रहा था माबुद अली, गिरफ्तार

एक ओर जहाँ भारतीय मीडिया और तथाकथित लिबरल वर्ग गाय और गोमूत्र पर चुटकुले बनाते हुए देखा जाता है, वहीं कोरोना के इलाज के लिए माबुद अली नाम का एक मुस्लिम युवक चुपचाप देश के एक कोने में गोमूत्र बेचकर अपनी आजीविका चलाने का काम कर रहा है। हालाँकि ‘बिजनेस इनसाइडर’ की एक रिपोर्ट के अनुसार बताया जा रहा है कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।

माबुद अली नाम का यह व्यक्ति दिल्ली और कोलकाता को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 19 पर टेबल पर गोबर के पैकेट और जार में गौमूत्र रखकर बेच रहा था। हालाँकि, अगर दी क्विंट जैसे हिन्दुफोबिया से ग्रसित प्रोपेगेंडा वेबसाइट की मानें तो माबुद अली का कहना है कि उसे यह विचार दिल्ली में हिन्दू महासभा द्वारा आयोजित गौमूत्र पार्टी से मिला है।

ऐसे समय में यह देखना जरूरी है कि जब कोरोना वायरस कि महामारी से लोग अपनी जान गँवा रहे हैं, दी क्विंट जैसे संस्थान हिन्दुओं के उपहास के अपने एजेंडा के साथ कोई समझौता नहीं कर रहे हैं। माबुद अली महामारी के दौरान अफवाह और गलत जानकारी शेयर कर जिस अपराध को कर रहा है, क्विंट उसका श्रेय हिन्दुओं को देने का प्रयास कर रहा है।

दरअसल, हाल ही में चक्रपाणि महाराज नाम के एक व्यक्ति ने खुद को हिन्दू महासभा का अध्यक्ष बताते हुए कोरोना से निपटने के लिए गोमूत्र पार्टी का आयोजन करवाया था। सोशल मीडिया पर चक्रपाणि महाराज पर यह भी आरोप लगाए गए कि उसे किसी हिन्दू विरोधी दल द्वारा ऐसा करने के लिए उकसाया जा रहा है और उसकी मदद कि जा रही है और उसका हिन्दू महासभा से कोई लेना-देना नहीं है। काशी विद्वत परिषद ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में चक्रपाणि महाराज नाम के इस व्यक्ति के हिन्दू विरोधी राजनीति का मोहरा होने की बात स्वीकारी है।

माबुद अली ने अपनी टेबल पर एक पोस्टर चिपकाया है, जिस पर लिखा है, “गौमूत्र पिएँ और कोरोना वायरस से बचें।” मीडिया के अनुसार, अली ने कहा, “मेरे पास दो गायें हैं, एक भारतीय और दूसरी जर्सी। मैं अपना जीवन-यापन दूध बेचकर करता हूँ। जब मैंने टीवी पर गौमूत्र पार्टी देखी तो मुझे लगा कि मैं भी गौमूत्र और गोबर बेचकर पैसे कमा सकता हूँ। अब मैं गाय के हर हिस्से का उपयोग अपने बिजनेस में कर सकता हूँ।” मीडिया कि मानें तो माबुद अली ने यह भी कहा कि जर्सी गाय भारतीय गाय की तरह शुद्ध नस्ल नहीं है, इसलिए उसके मूत्र का ज्यादा डिमांड नहीं है।

Covid-19: मोदी की स्वास्थ्य नीति पर सवाल उठाने वाले लिबरल गिरोह की आँखें खोलने के लिए यह महामारी काफी है

टीवी-अखबार हर जगह कोरोना देखने और सुनने के बाद कल ही गाँव से एक बुजुर्ग ने हाल-चाल पूछने के लिए फोन पर बातचीत करते हुए मुझसे ‘सेनिटाइजर्स’, हर बार हाथ धुलने और मास्क पहनने जैसी सलाहें दी। उस समय यह सिर्फ मजाक लगा लेकिन कुछ देर बाद मैंने महसूस किया कि सफाई जैसी बेहद मामूली और बुनियादी आवश्यकताओं के प्रति जागरूकता के लिए कोरोना जैसी भयावह महामारी का उदय हुआ। एक ऐसे बुजुर्ग जिन्होंने कभी खाना खाने से पहले हाथ नहीं धुले, वो महानगर में रह रहे नौजवान को सफाई का महत्व समझाते नजर आए।

चीन से शुरू हुआ कोरोना वायरस देखते ही देखते पूरे विश्व के लिए सदी कि सबसे बड़ी आपदा बनने जा रहा है। कोरोना वायरस के संक्रमण से निपटने के लिए अन्य देशों द्वारा की गई तैयारियों के मुकाबले भारत की तैयारियों की खासा वाह-वाही देखी जा सकती है। खासकर पीएम मोदी द्वारा बिना देर किए तुरंत सार्क देशों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और COVID- डिप्लोमेसी के अंतर्गत दस मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता ने तो सरकार के कोरोना से लड़ने के उनके इरादे स्पष्ट कर दिए।

सोशल मीडिया पर भी कोरोना वायरस के संक्रमण से पीड़ित कुछ लोगों ने बताया है कि भारत सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय किस तत्परता से उनकी देखभाल में लगे हुए हैं। पहली बार हमारे देश में ‘हाइजिन’ और साफ़-सफाई के प्रति लोगों को जागरूकता से बात करते हुए देखा जा रहा है। यह आश्चर्यजनक इसलिए भी था क्योंकि भारत जैसे देश में हाइजिन को ‘विशेषाधिकार’ के रूप में देखा जाता रहा है। हमारे दिमाग के किसी कोने में यह बात जरुर है कि साफ़-सफाई और निजी स्वच्छता आम आदमी का नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ सभ्रांत वर्ग का अधिकार है।

सबसे बड़ा सवाल यही सबके मन में उठ रहा है कि भारत की तैयारियाँ कोरोना जैसी किसी आपदा से निपटने के लिए क्या थीं? या भविष्य में क्या हो सकती हैं? लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी माँग की कि उन्हें सेनीटाइज़र्स से लेकर मास्क तक सरकार द्वारा उपलब्ध करवाए जाने चाहिए। आपदा के वक्त इस प्रकार की माँग जायज भी मानी जा सकती हैं। क्योंकि इंसान का स्वास्थ्य उसका मौलिक अधिकार होना ही चाहिए।

यूरोप महाद्वीप के कई देशों में स्वास्थ्य मौलिक अधिकार है और हर छह माह में सरकार द्वारा आम आदमी के स्वास्थ्य परिक्षण का आयोजन करवाया जाता है। भारत के ग्रामीण वर्ग में अब जाकर सरकारी अस्पताल स्वास्थ्य शिविर आयोजित करवाते देखे जाते हैं। हमने अपने सामने वह बदलाव देखा है, जिसके लिए अलग उत्तराखंड राज्य की स्थापना आवश्यक थी। वरना स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के चलते होने वाली भयानक मौतें बचपन के कुछ बुरे स्वप्नों में से एक हैं।

लेकिन स्वास्थ्य और बेहतर जीवन के मौलिक अधिकार की जरूरत दिल्ली जैसे राज्यों में, जहाँ लगभग हर समय एक आम आदमी को शुद्ध हवा के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले मास्क की आवश्यकता होने लगी है, नितांत आवश्यक है। दिल्ली जैसे महानगरों में, जो हर समय कोरोना जैसे ही अन्य संक्रमण के साए से घिरे होते हैं, में कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए अब यह बुनियादी जरूरत बन चुका है। हालाँकि, अरविन्द केजरीवाल जैसे नेताओं के पास तब भी इसकी जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर थोपकर इससे बच निकलने का रास्ता खुला रहता है।

इस बीच जिस एक चीज ने सबका ध्यान आखिरकार अपनी ओर आकर्षित किया है, वह है 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी योजनाएँ! आपको याद होगा कि पहली बार किसी सरकार ने गरीब लोगों के लिए एक के बाद एक हेल्थ इंश्योरेंस यानी, स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाएँ लेकर आई थी। इसके बाद देश का आदर्श लिबरल गैंग, जिसमें कि लिबरल मीडिया का भी एक बड़ा वर्ग शामिल था, सरकार से यह सवाल करते हुए देखा जा रहा था कि सरकार आखिर स्वास्थ्य बीमा की ओर इतनी ऊर्जा किसलिए लगा रही है।

मीडिया के इस वर्ग में सबसे ज्यादा वो लोग थे जो आलिशान बंगलों के मालिक हैं और ऑफिस में उनके शानदार स्टूडियो हैं, इस कारण गरीब जनता की जरूरतों से शायद ही किसी तरह से वाकिफ हों। एक इंटरव्यू के दौरान तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जवाब में कहा था कि क्या मीडिया स्वास्थ्य बीमा और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी अन्य स्कीम्स के खिलाफ हैं? इसके जवाब में पत्रकार महोदय ने कोई जवाब भी नहीं दिया था।

एक सच्चाई यह भी है और यह दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि भारत जैसे विकासशील देशों में आज भी किसी बड़े पुनर्जागरण के लिए कई जिंदगियाँ दाँव पर लगानी होती हैं। स्वच्छता और बेहतर हाइजिन जैसे मुद्दों को हर गली-गाँव और अखबारों की हेडलाइन बनने तक चाइनीज वायरस कोरोना एक बड़े वर्ग को प्रभावित कर चुका था। लेकिन देर से ही सही, लोग इस ओर जागरूक हुए और शायद इसके बाद इन सब बातों का महत्व समझना शुरू कर देंगे।

कोरोना के कहर ने लोगों की आँखें सिर्फ स्वास्थ्य जैसी चीजों पर ही नहीं बल्कि भारत सरकार के काम करने के तरीकों और उस पर अनावश्यक रूप से बनाए गए दबाव का भी खुलासा कर दिया है। इसमें मीडिया के आदर्श लिबरल वर्ग ने केंद्र की दक्षिणपंथी भाजपा सरकार पर अक्सर मीडिया को मौन करने का भी आरोप लगाया है।

तानाशाही के आधार पर चल रहे चीन ने यूँ तो अपने देश को स्वतंत्र मीडिया कभी उपलब्ध ही नहीं करवाया। लेकिन, कोरोना के लिए जिम्मेदार इस देश ने सोशल मीडिया से लेकर बाहरी देशों की मीडिया पर जिस सख्ती से अंकुश लगाया है, उसे भारतीय मीडिया के लिबरल वर्ग को जरूर देखना चाहिए। चीन ने वुहान में हुई मौतों को छुपाने के साथ ही अब चीन के विदेश मंत्रालय ने न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट और वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकारों को 10 दिनों के अंदर अपने मीडिया पास वापस करने के आदेश दिए हैं।

यह एक बड़ा संदेश है। जो पत्रकार भारत सरकार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर इसकी कल्याणकारी योजनाओं में कांस्पीरेसी थ्योरी गढ़ने के प्रयास करते आए हैं, यह कोरोना का संक्रमण उनकी आँखें खोलने के लिए काफी है। फिर भी, अपनी व्यक्तिगत विचारधारा के पोषण के लिए वो सत्य का कौन सा हिस्सा चुनते हैं, यह तब भी उन्हीं पर निर्भर करेगा।