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61000 किमी की यात्रा, वीरगति प्राप्त 40 जवानों के परिजनों का बाँटा दर्द, उनके घरों की मिट्टी ले पुलवामा पहुॅंचे जाधव

बीते साल 14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले में 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। हमले की पहली बरसी पर पूरा देश इन जवानों को नमन कर रहा है। पुलवामा में सीआरपीएफ के लेथपुरा कैंप में स्थित स्मारक पर श्रद्धांजलि दी गई। इस दौरान महाराष्ट्र के उमेश गोपीनाथ जाधव विशिष्ट अतिथि थे।

अरसे से बेंगलूरू में रह रहे गोपीनाथ ने इस हमले के बाद एक संकल्प लिया था। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने करीब 61 हजार किमी की यात्रा की। पुलवामा में वीरगति पाने वाले 40 जवानों के घर गए। उनके परिजनों के साथ दर्द बॉंटा। उनके घरों की मिट्टी कलश में इकट्ठा की। शुक्रवार को यह कलश उन्होंने सेना को सौंप दी।

गोपीनाथ ने अपनी यात्रा पिछले वर्ष 9 अप्रैल को बेंगलूरू से शुरू की थी। उनकी यात्रा को सीआरपीएफ के डीआइजी सनंद कमल ने हरी झंडी दिखाई थी। उमेश बताते हैं कि वह पुलवामा हमले वाले दिन वे अजमेर से अपने घर बेंगलूरू लौट रहे थे। जयपुर एयरपोर्ट पर लगी टीवी स्क्रीन पर उन्होंने सीआरपीएफ पर हमले की खबर देखी। इसके बाद ही उन्होंने जवानों के परिजनों के लिए कुछ करने का संकल्प लिया था।

अपनी इस यात्रा को ‘तीर्थ यात्रा’ मानने वाले जाधव ने बताया, “मुझे गर्व है कि मैंने पुलवामा में वीरगति प्राप्त करने वाले सभी जवानों के परिवार से मुलाकात की। उनका आशीर्वाद लिया। इस हमले में माता-पिता ने अपने बेटे को खो दिया, पत्नियों ने अपने पति को खो दिया, बच्चों ने अपने पिता को खो दिया, दोस्तों ने अपने दोस्तों को खो दिया। मैंने उनके घरों और उनके श्मशान घाटों से मिट्टी इकट्ठा की।” 

वीरगति प्राप्त करने वाले जवानों की याद में बनाए गए स्मारक का लेथपुरा कैंप में शुक्रवार को उद्घाटन किया गया। सीआरपीएफ के अतिरिक्त महानिदेशक जुल्फिकार हसन ने गुरुवार को स्मारक स्थल का दौरा करने के बाद कहा था, ‘यह उन बहादुर जवानों को श्रद्धांजलि देने का तरीका है जिन्होंने हमले में अपनी जान गॅंवाई।’ स्मारक में वीरगति प्राप्त करने वाले जवानों के नामों के साथ उनकी तस्वीरें भी हैं। साथ ही केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) का ध्येय वाक्य ‘सेवा और निष्ठा’ भी लिखा है। जाधव द्वारा एकत्र की गई मिट्टी को भी स्मारक पर रखा गया है।

सिखों का नरसंहार करने वालों ने पूछा- पुलवामा के आतंकी हमले से किसे हुआ फायदा?

पुलवामा हमले की पहली बरसी: वीरगति की 11 कहानियाँ, कोई जन्मदिन मनाकर लौटा था तो किसी की थी सालगिरह

सिखों का नरसंहार करने वालों ने पूछा- पुलवामा के आतंकी हमले से किसे हुआ फायदा?

पुलवामा आतंकी हमले की पहली बरसी पर आज जहाँ पूरा देश सीआरपीएफ के जवानों को याद कर रहा है और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहा है, वहीं कॉन्ग्रेस नेता ने अपनी छोटी सोच को एक बार फिर से उजागर किया है। पुलवामा हमले के बाद राहुल गाँधी हर जगह ये ज्ञान देते नजर आए थे कि पुलवामा हमले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन उन्होंने खुद ही मोदी विरोध के चक्कर में भारतीय सेना पर सवाल उठाए। अब इस हमले की पहली बरसी पर कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने एक ट्वीट कर साबित कर दिया है कि उनकी विकृत सोच साल भर बाद भी नहीं बदली है।

उन्होंने ट्वीट कर तीन सवाल पूछे हैं। पहले सवाल में उन्होंने पूछा है कि इस आतंकी हमले से सबसे ज्यादा फायदा किसे हुआ? इस सवाल का साफ मतलब है कि कॉन्ग्रेसियों को लगता है कि ये हमला भाजपा ने ही करवाया था क्योंकि उसको फायदा मिलता। उस समय भी कॉन्ग्रेस के कई नेताओं समेत तमाम विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग में शिकायत दी थी कि पीएम मोदी पुलवामा हमले और एयरस्‍ट्राइक का चुनावी फायदा लेने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गाँधी अपने पहले सवाल के माध्यम से यह कहना चाह रहे हैं कि चूँकि बीजेपी पुलवामा हमले को चुनाव में भुनाना चाहती थी, इसलिए उसने यह हमला करवाया था।

राहुल गाँधी आज पुलवामा हमले पर नफे-नुकसान की ओछी राजनीति कर रहे हैं। इस हिसाब से तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि महात्मा गाँधी की हत्या का फायदा किसे हुआ? लाल बहादुर शास्त्री जी की हत्या का लाभ किसे हुआ? इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों का नरसंहार कराने का लाभ किसे हुआ? राजीव गाँधी की हत्या के बाद सियासी फायदा किसने उठाया था? खैर, देश ने कॉन्ग्रेस की इस शर्मनाक हरकत का जवाब लोकसभा चुनाव 2019 में दे दिया है, लेकिन ये अभी भी सेना के शौर्य पर सवाल करके गंदी राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे।

कॉन्ग्रेस नेता ने अपने दूसरे सवाल में पूछा कि पुलवामा आतंकी हमले की हुई जाँच में क्या निकला? वहीं उनका तीसरा सवाल है कि बीजेपी सरकार में सुरक्षा में चूक के लिए किसकी जवाबदेही तय हुई? अंध-विरोध के चक्कर में ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर भी राहुल गाँधी ने बेतुके बयान देकर ओछी राजनीति का परिचय दिया है। राहुल गाँधी ने इस ट्वीट से अपनी संवेदनहीनता को प्रमाणित करने का काम किया है। एक सच्चे देशभक्त होने के नाते तो उन्हें तो सेना के वीरों पर गर्व होना चाहिए, जो जान को हथेली पर रखकर वर्दी धारण करते हैं और देश की रक्षा करते हैं। मगर वो तो इस पर आज भी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। उनके इस ट्वीट के बाद तो लोग यह भी सवाल कर रहे हैं कि कॉन्ग्रेस भारत की राजनैतिक पार्टी है या पाकिस्तान की, जो आज बलिदान दिवस पर भी ओछी राजनीति कर रही है।

वैसे कुछ सवाल तो लोगों के पास भी है, जिसका जवाब राहुल गाँधी को देना चाहिए। जब देश का बँटवारा हुआ तब सरकार किसकी थी? जब पाक अधिकृत कश्मीर बना तब सरकार किसकी थी? जब मुंबई पर हमला हुआ तब सरकार किसकी थी? जब चीन ने ज़मीन हड़पी थी, तब सरकार किसकी थी? जब वीर सैनिकों के सर काट के पाकिस्तानी ले गए थे तब किसकी सरकार थी? जब बोफोर्स का घोटाला हुआ तब सरकार किसकी थी?

एक तरफ जहाँ पूरा देश जाबांजों की शहादत पर गम में डूबा है, वहीं दूसरी तरफ राहुल गाँधी ने दिखा दिया कि उनके लिए देशभक्ति से ऊपर राजनीति है। तभी तो इस मौके पर भी वो राजनीति करने से बाज नहीं आए। उन्होंने साबित कर दिया कि उन्हें तो बस अपनी राजनीति चमकाने से मतलब है। वैसे ये पहली बार नहीं है, जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने इनकी शहादत पर सवाल उठाए हों या फिर इनका मजाक उड़ाया हो। उनके ट्वीट से उनकी मानसिकता साफ झलकती है, लेकिन हैरत की बात तो यह भी है कि कॉन्ग्रेस के किसी नेता की इतनी हिम्मत नहीं होती कि उनके इस तरह की बयान की निंदा कर सके। वैसे करेंगे भी कैसे, पूरी पार्टी को ही वीरों और भारतीय सेना के अपमान करने पर शर्म नहीं आती है।

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह से लेकर, सलमान खुर्शीद, नवजोत सिंह सिद्धू और कमलनाथ तक सब ने लगातार इस पर सवाल उठाए। ये तो इनके सीनियर नेताओं के कुकर्म हैं, छोटे नेताओं को तो गिना भी नहीं जा रहा। कॉन्ग्रेस से राज्यसभा संसद बीके हरिप्रसाद ने इस हमले में मोदी और इमरान खान की मिलीभगत बताते हुए कहा था, “पुलवामा अटैक के बाद के घटनाक्रम पर यदि आप नजर डालेंगे तो पता चलता है कि यह पीएम नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के बीच मैच फिक्सिंग थी।”

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह जैसे कई नेता भारतीय सेना और IAF का मजाक बनाते दिखे थे। दिग्विजय सिंह ने पुलवामा हमले को ‘दुर्घटना’ बताया तो वहीं नवजोत सिंह सिद्धू जैसे कुछ नेता तो एयर स्ट्राइक पर ही यह कहकर सवाल उठाया था कि आतंकी मारने गए थे या पेड़ गिराने? गाँधी परिवार के बेहद क़रीबी और इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने अपना पाकिस्तान प्रेम दिखाते हुए कहा था कि पुलवामा हमले के लिए पूरे पाकिस्तान को दोषी ठहराना गलत है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मुंबई हमले के लिए भी पूरे पाकिस्तान पर आरोप लगाना सही नहीं है।

राहुल गाँधी की राजनीति से इतर पुलवामा हमले के एक साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वीरों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि भारत हमेशा हमारे बहादुरों और उनके परिवारों का आभारी रहेगा जिन्होंने हमारी मातृभूमि की संप्रभुता और अखंडता के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। देश उनकी शहादत को नहीं भूलेगा। वहीं सीआरपीएफ ने पुलवामा के वीरों को शत्-शत् नमन करते हुए लिखा, “तुम्हारे शौर्य के गीत, कर्कश शोर में खोए नहीं। गर्व इतना था कि हम देर तक रोए नहीं।”

पुलवामा हमले की पहली बरसी: वीरगति की 11 कहानियाँ, कोई जन्मदिन मनाकर लौटा था तो किसी की थी सालगिरह

पीएम मोदी के खिलाफ की अपमानजनक टिप्पणी, राज्यसभा के सुरक्षा अधिकारी का ओहदा घटा

राज्यसभा के उप निदेशक सुरक्षा (सुरक्षा) उरजुल हसन को डिमोट यानी ओहदा कम कर दिया गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कुछ केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के खिलाफ सोशल मीडिया में अपमानजनक पोस्ट किए थे। हसन के खिलाफ राज्यसभा सेवा नियम 1957 और केंद्रीय लोक सेवा (आचरण) नियमों के तहत कार्रवाई की गई है। यह नियम कर्मचारियों को वैसी गतिविधियों में शामिल होने से रोकता जिनसे उनकी राजनीतिक तटस्थता प्रभावित होती है।

12 फरवरी को जारी नोटिफिकेशन में कहा गया है, “उरजुल हसन पर प्रधानमंत्री और कई अन्य केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ अपमानजनक और आपत्तिजनक पोस्ट करने का आरोप है। उन्होंने सक्रिय राजनीति से जुड़े पोस्ट को सोशल मीडिया पर शेयर भी किया था। राजनैतिक तटस्थता बनाए रखने में नाकाम रहने पर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है।” हसन को इस मामले में शुरुआती जॉंच के बाद निलंबित कर दिया गया था। उन्हें जून 2018 में निलंबित किया गया था। ताजा आदेश के बाद उन्हें डिप्टी डायरेक्टर सिक्योरिटी से अगले 5 वर्षों के लिए सिक्योरिटी अफसर की पोस्ट पर डिमोट किया गया है। इस दौरान उन्हें वेतन में वृद्धि का लाभ नहीं मिलेगा। मामले की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी ने बताया कि इस अधिकारी को असल में वरिष्ठता क्रम में कुल 15 वर्षों की हानि उठानी होगी।

हसन का निलंबन 10 फरवरी को समाप्त कर दिया गया था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार डिमोशन की प्रक्रिया 10 फरवरी से लागू हो गई है। सूत्रों के अनुसार, राज्यसभा सचिवालय पिछले 9 से 10 महीने से हसन की गतिविधियों पर नजर रख रहा था। राज्यसभा के सभापति एम.वेंकैया नायडु ने अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश दिए हैं। आदेश में ये भी कहा गया था कि दोषी अधिकारी फिर से अपने वरिष्ठ पद तक नहीं पहुॅंच सकेंगे।

‘तुम्हारा चेहरा बिगाड़ दूँ, तो तुम क्या कर लोगे’: महाराष्ट्र में मेडिकल सर्वे टीम पर एसिड अटैक

महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगणघाट में प्राध्यापिका को पेट्रोल छिड़ककर जलाने की घटना के बाद अब राज्य के सावनेर में महिला डॉक्टर पर एसिड हमले की घटना सामने आई है। गुरुवार (फरवरी 13, 2020) की दोपहर हुए इस हमले में महिला डॉक्टर के साथ दो अन्य भी झुलस गए। इनमें एक 14 साल की नाबालिग है।

जानकारी के मुताबिक कि हमलावर नीलेश कान्हेरे ने “तुम्हारा ऐसा चेहरा बिगाड़ दूँ, तो तुम क्या कर लोगे?” कहते हुए महिला डॉक्टर और लेक्चरर के चेहरे की तरफ एसिड फेंका। हालाँकि महिला ने उससे बचने की कोशिश की और काफी हद तक वो इसमें कामयाब भी हुई। उसने अपने चेहरे को तो एसिड अटैक से तो बचा लिया, लेकिन एसिड के कुछ छींटे उसके दाहिने हाथ पर जा गिरे।

दरअसल आरोपित नीलेश ने महिला डॉक्टर के करीब जाकर आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिसके बाद वो वहाँ से जाने लगी तो आरोपित ने उसका पीछा करते हुए इस वारदात को अंजाम दिया। पुलिस का कहना है कि आरोपित के पास बाथरूम साफ करने वाली एसिड थी। तीनों घायलों को नागपुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

उनका कहना है कि तीनों के चेहरे और शरीर के अन्य हिस्से मामूली रूप से झुलस गए हैं। इस हमले में महिला डॉक्टर के साथ साथ एक मरीज भी घायल हो गया। यह हादसा उस समय हुआ जब वो गुरुवार को नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (NACO) के प्रोजेक्ट के तहत टीम सर्वे करने नागपुर से सटे सावनेर गई थी। GMCH के डॉक्टरों की पाँच सदस्यीय टीम यौन-संक्रमित संक्रमण (STI) और प्रजनन पथ संक्रमण (RTI) पर एक सर्वेक्षण और स्क्रीनिंग परियोजना का काम कर रही थी।

घटना के बाद कलेक्टर रवींद्र ठाकरे ने कहा कि वह एसिड और पेट्रोल की उपलब्धता और ट्रांसपोर्टेशन के खिलाफ सख्त नियम लाने वाले हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि वो इस तरह के हमलों के खिलाफ जागरूकता अभियान भी चलाएँगे। बताया जा रहा है कि घटना के बाद स्थानीय लोगों ने आरोपित को पकड़ कर बुरी तरह से पिटाई कर दी और फिर पुलिस के हवाले किया। 

घटना के बाद सावनेर थाने के सामने भारी भीड़ इकट्ठा हो गई। नागरिक आरोपित के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने की माँग पर अड़ गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस मुख्यालय को सूचना दी गई। एडिशनल एसपी मोनिका राऊत सावनेर पहुँची। उन्होंने घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि जाँच की जा रही है। जानकारी के मुताबिक घटना के समय आरोपित नशे की हालत में था। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि उसका कोई क्रिमिनल बैकग्राउंड तो नहीं है।

बता दें कि नीलेश बूचड़खाने पर काम करना सीख रहा था, लेकिन कुछ समय पहले ही उसे निकाल दिया गया था। उसने अपने दोस्तों के साथ सिनेमाहॉल में टॉयलेट साफ करना का काम करता था। इसके लिए वो एसिड का इस्तेमाल करता था और बताया जा रहा है कि इसमें कुछ एसिड उसने बचा लिए थे। इससे वो उस आदमी के टू व्हीलर के ऊपर अटैक करना चाहता थाा, जिसके अंदर उसने काम किया था, लेकिन उसने डॉक्टरों को देखा और उन पर हमला कर दिया।

एडिशनल एसपी मोनिका राउत ने कहा कि आरोपित से पूछताछ की जा रही है, लेकिन वो लगातार अपने बयान बदल रहा है, जिससे काफी परेशानी हो रही है। उन्होंने कहा, “हम यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि उसके हमले का कारण क्या है और उसे ये एसिड कहाँ से मिला। पूछताछ में उसने कई एसिड स्पालयर्स के नाम बताए, लेकिन सभी फर्जी निकले।”  

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सुपर मॉम जिसने कहा था- आप मंगल ग्रह पर फँस गए तो भी भारतीय दूतावास आपकी मदद करेगा

अपने बच्चों के लिए तो मॉं सुपर मॉम होती हैं। लेकिन, ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि कोई महिला देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करते-करते सुपर मॉम का दर्जा हासिल कर ले। लेकिन, वह अलग ही मिट्टी की बनी थी। विदेश मंत्री बनीं तो कहा कि अग़र आप मंगल ग्रह पर भी फँस गए तो भी भारतीय दूतावास आपकी मदद करेगा। हाल में कोरोना वायरस से घिरे चीनी शहर वुहान से भारतीय छात्रों को निकालना इसी रीति-नीति का हिस्सा था।

हम बात कर रहे है देश की विदेश मंत्री रहीं दिवंगत सुषमा स्वराज का, जिनका आज जन्मदिन है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में विदेश मंत्री रहीं सुषमा ने दूर-दराज देशों में फँसे अपने लोगों को भारत वापसी करवाने में अहम भूमिका निभाई थी। चाहे वह पाकिस्तान से गीता की वापसी हो ​या फिर युद्धग्रस्त यमन से भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए भी वे लोगों की मदद के लिए तत्पर रहती थीं। इसी सक्रियता के कारण ही वॉशिंगटन पोस्ट ने उन्हें ‘सुपर मॉम’ के नाम से नवाजा था।

एक प्रखर वक्ता से कुशल राजनेत्री का सफर तय करने वाली पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 25 साल की उम्र में ही विधायक बन गईं थीं। जब 1977 में जॉर्ज फर्नां​डीस ने जेल से लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन भरा तो सुषमा ही दिल्ली से मुजफ्फरपुर पहुॅंचीं और हथकड़ियों में जकड़ी जॉर्ज की तस्वीर दिखा प्रचार किया। उन दिनों ‘जेल का फाटक टूटेगा, जॉर्ज हमारा छूटेगा’ का उनका दिया नारा सबकी ज़ुबान पर था। हालांकि वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके दिखाए मार्गों पर आज भी देश उसी संकल्प के साथ चल रहा है, जो सुषमा ने अपने जीते जी लिए थे।

उनके लिए संकल्प का असर पिछले दिनों बखूबी देखने को मिला कि जब वुहान में फँसे भारतीय छात्रों को सुरक्षित निकाला गया। वहीं पाकिस्तान ने अपने छात्रों को उनके हाल पर छोड़ दिया। हाल ही में इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इसमें एक पाकिस्तानी छात्र कहता सुनाई पड़ रहा था, “ये भारतीय छात्र हैं और ये बस इन्हें लेने आई है, जो इनके दूतावास ने भेजी है। वुहान की यूनिवर्सिटी से इस बस से इन छात्रों को एयरपोर्ट ले जाया जाएगा और वहाँ से फिर इन्हें इनके घर पहुँचाया जाएगा। बांग्लादेश वाले भी आज रात यहाँ से ले जाए जाएँगे। एक हम पाकिस्तानी हैं, जो यहाँ पर फँसे हैं। जिनकी सरकार कहती है कि आप मरो या जियो, हम आपको नहीं निकालेंगे। शेम ऑन यू पाकिस्तान, सीखो भारत से कुछ सीखो।”

सुषमा के जन्मदिवस से एक दिन पूर्व यानी 13 फरवरी को भारत सरकार ने प्रवासी भारतीय केंद्र और विदेशी सेवा संस्थान का नाम बदलकर दिवंगत सुषमा स्वराज के नाम पर रखने की घोषणा की थी। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि, सरकार ने प्रवासी भारतीय केंद्र का नाम सुषमा स्वराज भवन और विदेशी सेवा संस्थान का नाम सुषमा स्वराज इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन सर्विस रखने का फैसला किया है। एक महान शख्सियत को दी गई श्रद्धांजलि हमें हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

बीते साल अनंत ​यात्रा पर निकलने से महज तीन घंटे पहले उनके द्वारा अनुच्छेद 370 हटाने पर किया गया आखिरी ट्वीट यह दर्शाता है कि, अपने विचारों के प्रति सुषमा स्वराज कितनी प्रतिबद्ध थीं। खराब स्वास्थ्य के कारण वो भले कुछ दिनों से सक्रिय राजनीति से दूर थीं, लेकिन वह अपने विचारों को लेकर अंतिम क्षण तक सक्रिय बनी रहीं थीं। उन्होंने अपने आखिरी ट्वीट में कहा था, “प्रधानमंत्री जी-आपका हार्दिक अभिनंदन। मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।”

इस ट्वीट के करीब तीन घंटे बाद ही 6 अगस्त 2019 को भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का 67 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनके द्वारा किए गए कार्यों को देश हमेशा याद रखेगा। इस साल गणतंत्र दिवस पर सुषमा स्वराज को मरणोपरांत पद्म विभूषण से नवाजा गया। उनके साथ यह सम्मान जॉर्ज फर्नांडीस को भी मिला, जिनकी हथकड़ी लगी तस्वीरें लेकर कभी वे मुजफ्फरपुर गई थीं।

सुषमा स्वराज की आखिरी इच्छा पूरी, बेटी बाँसुरी ने हरीश साल्वे को दिया फीस का ‘एक रुपया’

सुषमा की मृत्यु के बाद अब खुला यह राज: उन्होंने कहा था- उनकी किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी अगर विदेश में हुई तो…

सुषमा स्वराज: बेल्लारी की नायिका, जिसने कहा था-हॉं, हम साम्प्रदायिक हैं, क्योंकि धारा 370 हटाने की बात करते हैं

पुलवामा हमले की पहली बरसी: वीरगति की 11 कहानियाँ, कोई जन्मदिन मनाकर लौटा था तो किसी की थी सालगिरह

14 फरवरी 2019। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सीआरपीएफ का काफिला सामान्य दिनों की तरह ही गुजर रहा था। अचानक एक कार ने सड़क की दूसरी तरफ से आकर काफिले के साथ चल रहे वाहन में टक्‍कर मार दी। इसके साथ ही एक जबरदस्‍त धमाका हुआ। मौके पर ही सीआरपीएफ के करीब 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए। हमले की पहली बरसी पर पूरा देश उन वीर जवानों को याद कर रहा है। हम आपके लिए लेकर आए हैं हमले में वीरगति को प्राप्त करने वाले जवानों की कुछ चुनिंदा कहानियॉं,

जन्मदिन मनाकर लौटे ही थे नसीर अहमद

पुलवामा में बलिदान हुए नसीर अहमद फिदायीन हमले से एक दिन पहले ही अपना 46 वाँ जन्मदिन मनाकर ड्यूटी पर वापस लौटे थे। 22 साल सेना को दे चुके नसीर उस बस के कमांडर थे, जिसे आत्मघाती हमले में निशाना बनाया गया। नसीर का पार्थिव शरीर जब उनके गाँव पहुँचा तो दोदासन देशभक्ति के नारों से गूँज उठा था। वहाँ मौजूद हर शख्स के चेहरे पर आतंकियों को लेकर गुस्सा था। नसीर का बेटा बार-बार बस यही दोहरा रहा था कि पहले वो पापा की मौत का बदला लेगा फिर अपना जन्मदिन मनाएगा।

संजय ने खुद बढ़वाई थी नौकरी के 5 साल

पुलवामा में वीरगति को प्राप्त हुए संजय राजपूत 20 साल की सेवा पूरी करने के बाद भी देश के लिए अपनी सेवा को पाँच वर्ष के लिए आगे बढ़वाया था। मगर उन्हें क्या मालूम था उनका यह फ़ैसला उन्हें हमेशा के लिए परिवार से दूर कर देगा। संजय के दो बच्चे हैं, जिनकी उम्र 13 और 10 साल है। उनके परिवार में चार भाई और एक बहन हैं। एक भाई को पहले ही परिवार एक्सिडेंट में खो चुका है।

‘बेटे को करूँगी सेना को समर्पित’

अपने घर के इकलौते कमाने वाले नितिन राठौर 14 फरवरी को हुए आत्मघाती हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए। महज 23 की उम्र में साल 2006 में सीआरपीएफ में शामिल होने वाले नितिन के घर में उनकी पत्नी वंदना, बेटा जीवन, बेटी जीविका माँ सावित्री बाई, पिता शिवाजी, भाई प्रवीण समेत दो बहनें हैं। नितिन के वीरगति के प्राप्त होने की ख़बर सुनने के बाद गाँव के लोगों ने अपने घरों में खाना नहीं बनाया। वहीं वीर की पत्नी ने हिम्मत दिखाते हुए कहा था कि वो अपने बेटे को भी सेना को समर्पित करेंगी क्योंकि यह उनके पति (नितिन) का सपना था।

वीर कुलविंदर की अंतिम यात्रा में पहुँचीं थी मंगेतर

कुलविंदर सिंह 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में आतंकियों के कायरतापूर्ण हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए। कुलविंदर अपने माता-पिता के इकलौती संतान थे। कुलदीप की आठ नवंबर को शादी होनी तय थी। इस खबर को सुनकर उनकी मँगेतर अमनदीर कौर ससुराल आई और भारत माता के वीर सपूत की अंतिम यात्रा में शामिल हुई। उन्होंने वीरगति को प्राप्त अपने मंगेतर के पार्थिव शरीर को सैल्यूट ठोक शत्-शत् नमन किया। कुलविंदर सिंह के पिता दर्शन सिंह यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि उन्होंने अपने जवान बेटे को सदा के लिए खो दिया है। उन्होंने हमले वाले दिन से ही अपने बेटे की वर्दी पहन रखी थी। उनके इस जोश को देख कर अन्य लोग भी अभिभूत थे।

छिन गया सबसे छोटा बेटा

अश्वनी कुमार काछी भी पुलवामा में हुए हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए। अश्वनी कुमार काछी परिवार के सबसे छोटे बेटे थे। चार भाइयों में सबसे छोटे अश्वनी की पहली पोस्टिंग साल 2017 में श्रीनगर में हुई थी। उनके बुज़ुर्ग पिता ने कहा कि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु पर गर्व है, लेकिन यक़ीन नहीं होता कि वो अब इस दुनिया में नहीं है। अश्वनी कुमार घर के एकमात्र कमाऊ पूत थे। अश्वनी की माँ अपने पाँचों बच्चों के भरण-पोषण के लिए बीड़ी बनाने का कार्य किया करती थी। जब अश्विनी की नौकरी लगी, तब उन्होंने अपनी माँ से बीड़ी बनाने वाला कार्य छुड़वा दिया था।

बेटी की शादी के लिए लड़का देखने जाने वाले थे संजय

पुलवामा आतंकी हमले में वीरगति को प्राप्त बिहार के संजय कुमार सिन्हा को अपनी बड़ी बेटी रूबी की शादी की फ़िक्र सता रही थी। वापस ड्यूटी पर जाते वक़्त उन्होंने घरवालों से दोबारा आने का वादा किया था। संजय ने कहा था कि वह घर लौटते ही बेटी के लिए लड़का देखने जाएँगे। घरवाले भी उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन जब उनके वीरगति को प्राप्त होने की सूचना मिली, पूरा परिवार ही स्तब्ध रह गया और गाँव में मातम पसर गया। जब उनकी मृत्यु का समाचार आया, तब उनकी पत्नी बबीता भोजन कर रही थी। यह दुःखद सूचना मिलते ही थाली उनके हाथों से गिर पड़ी और वह दहाड़ मार कर रोने लगी।

सालगिरह के दिन वीरगति को प्राप्त हुए थे तिलक राज

हिमाचल प्रदेश स्थित कांगड़ा के सीआरपीएफ जवान तिलक राज 14 फ़रवरी को पुलवामा हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए। जिस दिन उन्होंने मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर किए, उसी दिन उनकी चौथी मैरिज एनिवर्सरी भी थी। जब तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा तिलक के परिजनों से मिलने पहुँचे, तब सावित्री ने उनसे कहा- ‘साहब, मुझे भी सीआरपीएफ की नौकरी दे दो।‘ एक माह से भी कम उम्र के बच्चे को अपनी गोद में लेकर बैठी सावित्री की आवाज़ में गज़ब की दृढ़ता थी।

सबको सिसकियाँ भरने के लिए छोड़ गए विजय

पुलवामा आतंकी हमले में जान गँवा बैठे जवानों में एक नाम देवरिया के सीआरपीएफ जवान विजय कुमार मौर्य का भी है। विजय के इस हमले में शिकार होने के बाद उनके कई रिश्ते ताउम्र सिसकियाँ भरने के लिए पीछे छूट गए। इस हमले में सिर्फ़ देश की सेना का एक जवान ही नहीं बलिदान हुआ बल्कि बुजुर्ग पिता ने विजय के रूप में अपने घर के सबसे होनहार बेटे को गवाँ दिया। उस पत्नी का सुहाग भी उजड़ गया जिसके पास विजय की तीन साल की मासूम बच्ची है, जो अभी अपने पिता को ढंग से जान भी नहीं पाई थी। इसके अलावा दो भतीजियों की आस भी टूट गई, जिनकी जिम्मेदारी उनके पिता की मौत के बाद विजय ने ही उठाई हुई थी।

गर्भवती पत्नी को अकेला छोड़ गए वीर रतन ठाकुर

14 फरवरी को पुलवामा आतंकी हमले में वीरगति को प्राप्त हुए रतन ठाकुर अपनी गर्भवती पत्नी को अकेला छोड़कर चले गए थे। रतन के पिता निरंजन ने बताया कि दोपहर डेढ़ बजे रतन ने पत्नी राजनंदनी को फोन करके यह बताया था कि वो श्रीनगर जा रहे हैं और शाम तक वहाँ पहुँच जाएँगे। रतन ठाकुर ने अपनी पत्नी से होली पर आने का वादा किया था और इसी इंतज़ार में उनकी पत्नी के दिन कट रहे थे। बता दें कि रतन सिंह का चार साल का बेटा भी है जो कहता है कि उसके पिता ड्यूटी पर हैं। चार साल के इस बच्चे को हर पल अपने पिता का इंतज़ार रहता है।

4 दिन पहले ही ड्यूटी पर लौटे थे वीर अजीत कुमार

14 फरवरी को हुए आतंकी हमले में अजीत कुमार को उनके घरवालों ने हमेशा के लिए खो दिया। अजीत की उम्र मात्र 38 साल थी। चार दिन पहले ही अजीत अपनी छुट्टियाँ बिताकर ड्यूटी पर वापस लौटे थे। अजीत कुमार सीआरपीएफ की 115वीं बटालियन में तैनात थे। अजीत के वीरगति के प्राप्त होने की सुनने के बाद घर में कोहराम मच गया। अजीत के भाई रंजीत ने बताया कि एक महीने पहले ही उनके बड़े भाई अजीत छुट्टियों में घर आए थे, लेकिन 10 फरवरी को छुट्टी समाप्त होने पर वो जम्मू वापस लौट गए थे। किसे मालूम था कि अजीत के घरवालों की मुलाकात उनसे आखिरी है, इसके बाद वो तिरंगे में लिपट कर ही वापस आएँगे।

वीरगति को प्राप्त हुआ बनारस का लाल, माँ को है कैंसर

इस आतंकी हमले में अवधेश यादव भी वीरगति को प्राप्त हो गए थे। अवधेश यादव की माँ को कैंसर है। उनके बलिदान की सूचना पाकर तो जैसे परिजनों पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। अवधेश साल 2006 में सीआरपीएफ की 145वीं बटालियन में शामिल हुए थे। उनकी शादी तीन साल पहले ही हुई थी। उनकी पत्नी शिल्पी यादव ने बताया कि अवधेश तीन दिन पहले ही जल्दी लौटने का वादा कर ड्यूटी के लिए रवाना हुए थे। शिल्पी अपने तीन वर्ष के बेटे निखिल को कलेजे से लगा कर रो रही थी। रोती बिलखती शिल्पी यादव का रोते-रोते इतना बुरा हाल था कि वो बार-बार बेहोश हो रही थी। उनका बार-बार यही कहना था कि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा कि उनके पति अब इस दुनिया में नहीं रहे।

हमले के बरसी पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “मैं पुलवामा हमले के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। भारत हमेशा हमारे बहादुरों और उनके परिवारों का आभारी रहेगा जिन्होंने हमारी मातृभूमि की संप्रभुता और अखंडता के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।”

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ये लोग किस बात पर विरोध कर रहे हैं मुझे किसी ने बताया ही नहीं: अमित शाह

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत और भाजपा को मिली हार के बाद अमित शाह ने कहा कि उनका आकलन इस बार गलत हो गया। ‘टाइम्स नाउ समिट’ कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि हम चुनाव सिर्फ जीत या हार के लिए नहीं लड़ते हैं। भाजपा एक ऐसी पार्टी है जो अपनी विचारधारा का विस्तार करने में विश्वास करती है। साथ ही शाह ने कहा कि दिल्ली चुनाव परिणाम CAA और NRC का जनादेश नहीं है।

दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा नेताओं के गोली मारो और भारत-पाकिस्तान मैच जैसे बयानों पर अमित शाह ने कहा, ऐसी बातें नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि पार्टी ने ऐसे बयानों की हमेशा निंदा की है, इस बार भी इन बयानों से दूरी बना ली थी। अमित शाह ने आरोप लगाया कि देश को हिंदू-मुस्लिम में बाँटने का कम हमेशा से कॉन्ग्रेस ने ही किया है।

दरअसल, दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने ‘गोली मारो’ वाला बयान दिया था। वहीं, ‘भारत-पाकिस्तान मैच’ वाला बयान आम आदमी पार्टी से बीजेपी में शामिल हुए कपिल मिश्रा का था। कपिल मिश्रा मॉडल टाउन से उम्मीदवार थे।

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि मुद्दा आज भी यह है कि विरोध किस प्रकार से और किस चीज के लिए होना चाहिए। जिस प्रकार से शाहीन बाग का समर्थन करने वालों को अपने विचार रखने का अधिकार है, उसी प्रकार हमें भी हमारे विचार व्यक्त करने का अधिकार है और हमने वो किया।

शाह ने कहा कि पत्रकारों को विरोध-प्रदर्शन का कारण भी देखना चाहिए। शाहीन बाग़ में चल रहे विरोध-प्रदर्शन पर अमित शाह ने कहा उन्हें किसी के द्वारा इसका कारण नहीं बताया गया है? उन्होंने पूछा कि यह अधिनियम मुस्लिम विरोधी या अल्पसंख्यक विरोधी कैसे है?

अन्य राज्यों के चुनाव परिणामों पर शाह ने कहा कि मोदी जी अभी कुछ ही समय पहले सबसे बड़े बहुमत के साथ विजयी रहे। अब सही बात है कि कुछ राज्यों में सफलता नहीं मिली लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भाजपा से लोगों का विश्वास उठा है। महाराष्ट्र में हम चुनाव जीते हैं। हरियाणा में केवल 6 सीटें कम हुईं हैं। झारखंड में हम चुनाव हारे और दिल्ली में पहले से हारे हुए थे बावजूद इसके सीट और वोट पर्सेंट बढ़ा है। 

अमित शाह ने कहा, “मैं 13 साल की आयु से राजनीति में हूँ, मेरा व्यक्तिगत कुछ नहीं है, जो देश के लिए अच्छा है, वही मेरा है। 1980-81 में जब मैंने भाजपा ज्वाइन की थी उस वक्त हमारी मात्र दो सीटें थी। आज एक लंबा सफर तय करके हम यहाँ पहुँचे हैं। किसी ने आज तक मुझे ऐसा प्रावधान नहीं बताया कि सीएए के किस प्रावधान के तहत वो ये मानते हैं कि ये एंटी-मुस्लिम है। अगर भाजपा का विरोध ही करना है तो फिर कुछ भी हो सकता है।”

शाह ने आगे कहा कि 30 मार्च 1964 को, गृह मंत्रालय ने भारत में हिंदुओं और सिखों को दीर्घकालिक वीजा पर रहने की अनुमति दी थी। अतीत में कई मौकों पर कॉन्ग्रेस सरकार ने कहा है कि हिंदुओं और सिखों को भारत में रहने में मदद करने के लिए दीर्घकालिक वीजा दिया जाना चाहिए।

जगमगाती दिल्ली: फ्री पॉलिटिक्स के लिए टिहरी जैसी सभ्यताओं का डूबना जरूरी क्यों?

दिल्ली के विधानसभा चुनाव आखिरकार निपट ही गए। इसके नतीजे जो भी रहे हों, लेकिन राजनीतिक दलों के चुनावी मैनिफेस्टो और वायदों ने फ्री वाली लुभावनी स्कीम पर सोचने को एक बार फिर मजबूर कर दिया है। यह अच्छी बात है। जनता को अगर फ्री का मिल रहा है तो आखिर किसे समस्या हो सकती है?

जब सभी कुछ मुफ्त मिल रहा है तो बिजली भी फ्री मिलनी चाहिए। यह आज के आम आदमी की सबसे बड़ी जरूरतों में से है। लेकिन मुफ्त की रेहड़ी लगाने वाले राजनीतिक दलों को यह भी साफ करना चाहिए कि उनकी इस फ्री पॉलिटिक्स का भुगतान दूसरे राज्य की जनता क्यों करें।

कुछ वर्षों से देश की राजधानी दिल्ली में मुफ्त में बाँटी जा रही बिजली की भारी कीमत उत्तराखंड वर्षों से अदा कर रहा है। दुख की बात यह है कि खुद उत्तराखंड इस बात से बेखबर, मस्ती में सोया हुआ नजर आता है।

उत्तराखंड में कुछ कहावतें काफी लोकप्रिय हैं। जैसे- पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी, कभी पहाड़ के काम नहीं आती। यह विशेषतः पहाड़ों से होते आ रहे पलायन के सम्बन्ध में है। स्थानीय गढ़वाली बोली में एक और कहावत है- ‘उत्तराखंड यूँ डामुन डाम्याली।’ इसका मतलब है कि उत्तराखंड को इन बाँधों ने दाग दिया है।

हर दूसरे दिन स्वीकृत होने वाली छोटी-बड़ी नदी घाटी परियोजनाएँ उत्तराखंड की एक कड़वी दास्तान बनते जा रहे हैं। इनके लिए टिहरी जैसी प्राचीन और ऐतिहासिक सभ्यता को डूबना पड़ता है, ताकि दिल्ली को मुफ्त की बिजली मुहैया कराई जा सके।

टिहरी बाँध जैसे अनेकों छोटे-बड़े हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट; जैसे कि आसन बैराज, मनेरी, कोटेश्वर, किशाऊ, रामगंगा, विष्णुगाड, लोहारीनाग, धौलीगंगा परियोजना, भीमगोड़ा, पशुलोक और डाकपत्थर बैराज के लिए उत्तराखंड के लोगों ने न जाने कितनी कुर्बानियाँ दी हैं। लेकिन बदले में उत्तराखंड को क्या मिलता है? ले-देकर टूरिज्म के नाम का झुनझुना।

उदाहरण के लिए सबसे बड़ी परियोजना ‘टिहरी बाँध’ की बात करते हैं। इसी टिहरी बाँध को श्रीदेव सुमन सागर नाम से भी जाना जाता है। गौरतलब है कि भागीरथी नदी पर 260.5 मीटर की ऊँचाई पर बना यह टिहरी बाँध भारत का सबसे ऊँचा और विशालकाय और दुनिया का आठवाँ सबसे बड़ा बाँध है।

THDC की वेबसाइट ही बताती है कि टिहरी बाँध से उत्पादित होने वाली बिजली से आठ अन्य राज्यों- उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल, दिल्ली, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, चंडीगढ़ और राजस्थान को फायदा मिलता है। इस बाँध से पड़ोसी उत्तर प्रदेश राज्य में सिंचाई और यूपी-दिल्ली में पीने के पानी की सप्लाई की जाती है।

अब बात करते हैं कि इस टिहरी बाँध से उत्तराखंड को क्या मिलता है। THDC की वेबसाइट के अनुसार, इस बाँध से कुल बिजली उत्पादन का 12% ही उत्तराखंड को फ्री मिलता है। हो सकता है कि सरकार को मिलता हो, लेकिन टिहरी या उत्तराखंड की जनता को इसमें से कितनी बिजली फ्री या सस्ती मिलती है, इस बात का कोई साक्ष्य अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। हाँ, उत्तराखंड से दिल्ली को मिलने वाली फ्री बिजली अब जरूर इस प्रश्न पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर करती है।

कारण? क्या आप जानते हैं कि पुराने टिहरी शहर के डूबने से टिहरी और उत्तराखंड की जनता ने एक विरासत, एक सभ्यता को खो दिया? क्या दिल्ली में मुफ्त की बिजली पाने वाले उस दर्द को महसूस कर सकते हैं, जो अपने खेत-खलिहान को आँखों के सामने डूबते देखने में होता है? वह दर्द जो अपने बाप-दादाओं के पुश्तैनी घर और अपने आम के बगीचों को डूबते देखने में होता है? ये वह दर्द है जो पुरखों की विरासत और आँगन में गाई जाने वाली माँगलों (मंगल गीत) के खो जाने के एहसास से ही चुभने लगता है। दर्द जो टिहरी की नथ और सिंगोरी की मिठास के खो जाने से होता है। आँसू जो बहते हैं, दूर किसी पहाड़ से आप जब अपने घर और खेतों को तबाह होते देखते हैं। डूबे हुए शहर में अंदाजा लगाते हैं कि ‘शायद यहीं कहीं आपका घर रहा होगा।

अगर किसी भी तरह से आप टिहरी से विस्थापित लोगों का दर्द समझ पाने में सक्षम नहीं हैं तो कश्मीर घाटी से आज से तीस साल पहले नरसंहार के बाद अपने ही घरों को छोड़कर जाने को मजबूर कश्मीरी पंडितों के दर्द को महसूस कीजिए। अंतर बस इतना ही है कि कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार करने वाले इस्लामिक बर्बर कट्टरपंथी थे और टिहरी के लोगों को खुद उनकी सरकार ने अपने घर खाली कर शहरों को चले जाने की राय दी।

पुराना टिहरी शहर तीन नदियों- भागीरथी, भिलंगना और घृत गंगा, जो विलुप्त हो गई थी से घिरा हुआ था, इसलिए इसको त्रिहरी नाम से जाना जाता था। बाद में इस शहर का नाम टिहरी रख दिया गया। इस शहर को राजा सुर्दशन शाह ने दिसम्बर, 1815 में बसाया था।

टिहरी बाँध तो सिर्फ उदाहरण है, क्योंकि मेरा बचपन इस शहर की गलियों में बीता था और इस शहर को मैं जानता था। ऐसे न जाने कितने गाँव और कस्बे हैं उत्तराखंड में, जो जनमानस की तरक्की के लिए चुपचाप जल समाधि ले चुके हैं। इतने वर्ष बीत गए, सवाल वहीं का वहीं है- इतनी कुर्बानियों के बाद उत्तराखंड को क्या मिला?

उत्तराखंड को मिला विकास के नाम पर सिर्फ टूरिज्म का झुनझुना, खाली होते गाँव, पलायन की मार, कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटते सरकारी नौकरियों के नोटिस, सरकारी दफ्तर के बाबुओं की दादागिरी, कुशासन की मार, छुटभैये ठेकेदारों की बड़े नेताओं में तब्दीली, कच्ची दारू की जगह ब्रैंडेड बोतल, वीकेंड पर शहरों से आकर पहाड़ों में कचरा करने और टूटी बोतलें फेंक जाने वाले सीजनल सैलानी… बस यही!

दिल्ली की फ्री (सस्ती नहीं) बिजली ने कई सवाल खड़े किए हैं। इसके लिए मैं दिल्ली की जनता को दोष नहीं दूँगा क्योंकि सभी राजनीतिक दलों ने फ्री की ऐसी कई योजनाओं का लालच दिया था। लेकिन सवाल यह है कि दूसरों की जरूरतों को पूरा करने वाला उत्तराखंड खुद के अधिकारों के लिए कब सचेत होगा?

जो राज्य उत्पादन करके दूसरों को फ्री बिजली दे सकता है, क्या उसके स्थानीय निवासियों को इतना भी अधिकार नहीं कि वे भी फ्री नहीं तो सस्ती बिजली के लिए ही अपनी आवाज बुलंद कर सकें? या उत्तराखंड इसी में खुश है कि सैलानी आएँगे तो कुछ सीजनल आमदनी का जुगाड़ हो ही जाएगा? खैर, बिजली आपकी, मुफ्तखोरी दिल्ली की। उत्तराखंड बस देना जानता है; जिन पहाड़ों से माँ गंगा पूरे देश का पेट सींचती है, वही गंगा राजनीतिक फायदे के लिए दिल्ली के साथ-साथ खुद को मुफ्त बिजली नहीं दे सकती?

कट्टरपंथियों ने हिंदू महिलाओं को माफी माँगने पर किया मजबूर, टिकटॉक वीडियो में डांस करती आईं थी नजर

बॉलीवुड के हिट नंबर ‘चोली के पीछे क्या है’ पर डांस करती दो महिलाओं का टिकटॉक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ। इसके बाद समुदाय विशेष के कट्टरपंथियों ने इन महिलाओं को बुर्का पहन डांस करने के लिए माफी मॉंगने को मजबूर कर दिया। ट्विटर यूजर शाहनवाज अंसारी टिकटॉक वीडियो पोस्ट किया जिसमें दो महिलाएँ बुर्के में डांस करती दिख रही थीं।

शाहनवाज जिसका ट्विटर हैंडल ‘shanu_sab’ ने दावा किया कि इनमें से एक महिला कंचन यादव है। उसका कहना था कि ये औरतें बुर्का पहनकर अक्सर डांस करती रहती हैं। जिस टिकटॉक अकाउंट से इन महिलाओं का वीडियो शेयर किया गया था वह है ‘sanulala087796046’ जो अब शायद डिलीट किया जा चुका है।

‘shanu_sab’ ने जो दूसरा ​ट्वीट शेयर किया है उसमें डांस करने वाली महिलाओं में से एक बुर्का पहन कर डांस करने के लिए माफी मॉंग रही है।

वीडियो में एक महिला मुस्लिमों से बुर्का पहनने के लिए माफी माँग रही है। वह कह रही है कि वह किसी मजहब या किसी व्यक्ति का मजाक उड़ाना कभी नहीं चाहती थी। ‘कंचन यादव’ का यह वीडियो ‘sanulala1234’ अकाउंट से पोस्ट किया गया है। इस यूजर ने टिकाटॉक पर कई वीडियो पोस्ट किए हैं जिसमें बुर्का का ‘अपमान’ करने वाले वीडियो डिलीट करने की धमकी दी गई है। वह कहता है कि महिलाएं हिंदू है और बुर्का पहन कर उनका डांस करना बुर्का का ‘अपमान’ है। एक अन्य टिकटॉक वीडियो में वह अन्य लोगों को भी बुर्का में डांस कर रही महिलाओं का वीडियो डिलीट करने को कह रहा है।


कोरोना वायरस से अब तक 1360 मौतें, 20 लाख उइगर मुस्लिमों पर सफाए का खतरा

चीन में नए साल की छुट्टियाँ ख़त्म हो गई हैं। लोग काम के लिए दफ्तरों में जुट रहे हैं। ऐसे में कोरोना वायरस को लेकर भयावह आँकड़े आ रहे हैं। अब तक 1360 लोगों के मौत की ख़बर है। पूरी दुनिया में कोरोना वायरस के कुल 60,000 मामले आ चुके हैं। इनमें से 48,000 मरीज चीन के हुबेई में ही हैं। सबसे भयावह बात ये है कि अब तक इसका इलाज मार्केट में नहीं आया है। हालाँकि, डब्ल्यूएचओ मानता है कि वायरस का ऐसा व्यवहार नहीं दिख रहा कि वो आक्रामक होकर सेंट्रल चीन के हुबेई से निकल कर दूर-दूर तक फैले, जो कि एक राहत देने वाली बात है। हुबेई में एक ही दिन में 242 मौतें हुईं है।

कोरोना वायरस से चीन के शिनजियांग प्रान्त में डर का माहौल है। ये वही क्षेत्र है, जहाँ क़रीब 20 लाख उइगर मुस्लिमों को विभिन्न प्रताड़ना कैम्पों में बंद कर के रखा गया है। भले ही कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित इलाक़े वहाँ से दूर हों, लेकिन चीन के इस उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में भी अब तक 55 मामले सामने आ चुके हैं। उइगर कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर एक बार किसी कैम्प में कोरोना वायरस फ़ैल गया तो फिर इसका रुकना असंभव है। कई एनजीओ और विशेषज्ञ पता लगाने में जुटे हैं कि इन कैम्पों के भीतर कोरोना वायरस को रोकने के लिए क्या व्यवस्थाएँ हैं लेकिन किसी को भी कोई पुष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही।

चीन कहता है कि ये कैम्प ‘वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर’ हैं, जो आतंकवाद और आतंकी व जिहादी विचारधारा को रोकने के लिए बनाए गए हैं। एक उइगर मानवाधिकार कार्यकर्ता ने बताया कि कैम्पों के भीतर खाने के लिए अच्छा भोजन मिलना ही दूर की बात है, तो इसकी उम्मीद ही नहीं है कि नज़रबंद लोगों को मास्क दिए गए होंगे। चेंज डॉट कॉम पर हज़ारों लोगों ने एक माँग पत्र पर हस्ताक्षर किया है, जिसमें कोरोना के कारण इन कैम्पों को तुरंत बंद किए जाने की बात कही गई है। ‘वायरस थ्रेट इन द कैम्पस’ नामक सोशल मीडिया ट्रेंड चला कर WHO से माँग की है कि वो एक प्रतिनिधिमंडल वहाँ भेजे।

इस याचिका में पूछा गया है कि क्या हम उस वक्त का इंतजार कर रहे हैं, जब इन कैम्पों में कोरोना वायरस फैलेगा और कुछ ही पलों में हज़ारों मुस्लिम काल के गाल में समा जाएँगे? आशंका जताई गई है कि अगर एक बार वुहान क्षेत्र से निकल कर वायरस का प्रभाव वहाँ तक पहुँचा तो फिर तबाही आ सकती है। ‘वर्ल्ड उइगर कॉन्ग्रेस’ का भी कहना है कि अगर समय पर एक्शन नहीं लिया गया तो हज़ारों मुस्लिम इसके शिकार बन जाएँगे। उनका कहना है कि चीनी अधिकारियों के ढुलमुल रवैये और नज़रअंदाज़ी के कारण ये लोग कोरोना से प्रभावित होने की आशंका से घिरे हैं।

उइगर कैम्पों में कुपोषण जोरों पर है। यहाँ मुस्लिमें के शरीर के अंग निकाल के बेच डाले जाते हैं। यौन शोषण के कई मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में लोगों के वायरस से प्रभावित होने की ज्यादा सम्भावना रहती है। अब देखना ये है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की चिंता का चीन कोई हल निकालता है या नहीं।

चीनियों ने पहले उइगर महिलाओं संग बिस्तर बाँटा, अब मुस्लिमों के घर ही बदल डाले

चीन में लिखा जाएगा फिर से बाइबल और क़ुरान! उइगर मुस्लिमों के शोषण के बाद नया फरमान

रेप, गर्भपात, गुप्तांगों में मिर्ची का पेस्ट: चीन में उइगर मुस्लिमों की स्थिति, सामने आया Video, पढ़ें आपबीती