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इकोनॉमी में कॉन्ग्रेस का 6.30 लाख का योगदान, जमानत बचाने वाले 3 नेताओं को शो कॉज नोटिस!

दिल्ली विधानसभा चुनाव आखिरकार संपन्न हो चुके हैं और अरविन्द केजरीवाल एक बार फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद ‘मुफ्त-मुफ्त’ की रेहड़ी की चर्चा में गोदी मीडिया इतनी मशगूल थी कि इस बीच एक बड़ी खबर बड़ी शालीनता से दबी रह गई। वो खबर थी, कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों द्वारा देश की अर्थव्यवस्था में किए गए योगदान की! हालाँकि, जो हालत कॉन्ग्रेस की दिल्ली चुनाव के दौरान रही, उससे यह योगदान कम और बलिदान ज्यादा नजर आ रहा है। लेकिन फिर भी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह एक बड़ी पहल थी।

अगर देश की जनता को मनोज तिवारी और केजरीवाल पर चुटुकले बनाने से पहली फुरसत मिल गई हो, तो बता दें कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के 66 उम्मीदवारों में से 63 की जमानत तक जब्त हो गई। इन सीटों पर कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों को कुल वोटों के पाँच प्रतिशत से भी कम वोट मिले। दिल्ली में कॉन्ग्रेस ने 70 में से मात्र 66 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे।

66 में से कॉन्ग्रेस के बस तीन ही ऐसे नेता हैं, जो चुनाव में अपनी जमानत जब्त ना करवा पाने में नाकामयाब रहे और इस कारण पार्टी ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी कर दिया है। इनमें गाँधी नगर से अरविंदर सिंह लवली, बादली से देवेंद्र यादव और कस्तूरबा नगर से अभिषेक दत्त अपनी जमानत जब्त ना करवाने में विफल रहे।

सॉल्ट न्यूज़ द्वारा सत्यापित एक गुप्त सूत्र ने ऑपइंडिया तीखी मिर्ची सेल को बताया है कि कॉन्ग्रेस ने चुनाव से पहले ही एक उच्चस्तरीय ख़ुफ़िया बैठक बुलाकर अपनी-अपनी जमानत जब्त करवाने के आदेश समस्त प्रत्याशियों को दे दिए थे। दरअसल, कॉन्ग्रेस ने यह ‘नेहरुवी फैसला’ देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान करने के लिए लिया था।

देश में चल रही राहुल गाँधी की लहर को देखते हुए कॉन्ग्रेस की राजमाता गाँधारी-द्वितीय ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह पहले ही भाँप लिया था कि दिल्ली में कॉन्ग्रेस की सरकार कम से कम इस बार तो नहीं बन सकती। इसलिए देशहित में यह निर्णय लिया गया कि जमानत जब्त करवाने से जो धन चुनाव आयोग के पास इकठ्ठा होगा, वह देश की अर्थव्यवस्स्था में योगदान देने के काम आएगा।

असल में चुनाव लड़ते वक्त उम्मीदवारों को 10 हजार रुपया डिपॉजिट करना पड़ता है। जो उम्मीदवार वैध मतों का छठवॉं हिस्सा नहीं ला पाते उनकी यह रकम जब्त कर ली जाती है। कॉन्ग्रेस के 63 उम्मीदवारों ने अपनी जमानत जब्त करवाई है। इस हिसाब से यह रकम छह लाख 30 हजार रुपए होती है।

हालाँकि, कुछ वामपंथी साथियों ने यह इच्छा भी प्रकट की थी कि उन्हें इस धन से बची सर्दियों का जुगाड़ कर चिलम-चखना खरीदना चाहिए। लेकिन आखिर में यही फैसला हुआ कि सस्ते नशे की कमी में किसी भी प्रकार की यदि कोई आपात स्थिति पैदा होती है, तो ऐसे में युवा एवं तेजस्वी नेता राहुल गाँधी का ही कोई भाषण कार्यकर्ताओं को सुना दिया जाएगा।

फिलहाल पार्टी के वो तीन नेता पार्टी में अपनी स्थिति को लेकर संशय में हैं, जो अपनी जमानत जब्त करवाने में नाकाम रहे। 14 फरवरी तक उन्हें पार्टी हाईकमान को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) का जवाब देना है। बताया जा रहा है कि अगर वो जवाब देने में विफल रहते हैं, तो उन्हें राहुल गाँधी की अगली चार जनसभाओं में उनके भाषण सुनने के लिए बिठाया जा सकता है।

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पटेल ही नहीं राजेंद्र प्रसाद, टंडन, करियप्पा, राम… किसी को नहीं चाहते थे नेहरू

विदेश मंत्री एस जयशंकर का यह कहना कि नेहरू अपनी कैबिनेट में सरदार वल्लभभाई पटेल नहीं रखना चाहते थे, कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा से लेकर कॉन्ग्रेसियों तक को बेहद नागवार गुजरी है। जयशंकर ने इतिहासकार नारायणी बसु द्वारा स्वतंत्र भारत के पहले गृह सचिव वीपी मेनन की लिखी जीवनी का हवाला देते हुए यह बात कही। कॉन्ग्रेसी और वामपंथी भले इस पर छाती पीटे लेकिन कई तथ्य हैं जो बताते हैं कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपने समकालीनों के प्रति असुरक्षा की भावना से ग्रस्त थे। केवल पटेल ही नहीं राजेंद्र प्रसाद, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, जनरल केएम करियप्पा वगैरह को भी नेहरू उनकी जगह नहीं देखना चाहते थे। यहॉं तक कि उन्होंने आजाद भारत में अयोध्या की राम जन्मभूमि से रामलला को भी हटाने की कोशिश की थी।

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे और संविधान सभा के अध्यक्ष भी थे। लेकिन, नेहरू नहीं चाहते थे कि चे राष्ट्रपति बनें। हालॉंकि नेहरू के विरोध के बावजूद वो 1950, 1952 और 1957 में लगातार तीन बार देश के राष्ट्रपति चुने गए। राजेंद्र प्रसाद ने जब दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की, तब नेहरू ने आपत्ति जताई। नेहरू चाहते थे कि एक बार 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाला व्यक्ति दूसरी बार राष्ट्रपति न बने। ये अलग बात है कि खुद नेहरू ख़ुद 1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहे।

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को दूसरी बार राष्ट्रपति बनाने के लिए जब हस्ताक्षर अभियान चल रहा था, तब नेहरू उनसे मिलने पहुँचे। उन्होंने ‘एक पुराने दोस्त होने के नाते’ उनसे आग्रह किया कि वो दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव न लड़ें। हालाँकि, डॉक्टर प्रसाद ने उन्हें किसी प्रकार का भरोसा नहीं दिया। वो चुप रहे। कॉन्ग्रेस की संसदीय समिति की बैठक हुई। इस बैठक में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की उम्मीदवारी का सिर्फ़ एक व्यक्ति ने विरोध किया और वो थे जवाहरलाल नेहरू। पार्लियामेंट्री बोर्ड के 6 सदस्यों में से नेहरू अकेले व्यक्ति थे, जो राजेंद्र प्रसाद को फिर से राष्ट्रपति बनाए जाने के ख़िलाफ़ थे।

इसी तरह देश के प्रथम सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा जो बाद में देश के पहले 5 स्टार जनरल बने वो भी देश के पहले सेनाध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहली पसंद नहीं थे। दरअसल, नेहरू चाहते थे कि किसी अंग्रेज अधिकारी को सेनाध्यक्ष बनाया जाए। इस सम्बन्ध में नेहरू ने एक बैठक बुलाई थी जिसमें कई बड़े नेता व अधिकारी शामिल थे। बैठक को सम्बोधित करते हुए तत्कालीन पीएम ने कहा कि किसी भी भारतीय के पास सेना के नेतृत्व का अनुभव नहीं है, इसीलिए ये पद किसी अंग्रेज को ही देना चाहिए।

बैठक में सबने नेहरू की हाँ में हाँ मिलाई लेकिन लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौड़ ने नेहरू से अलग मत रखते हुए कहा कि अगर किसी भारतीय के पास अनुभव नहीं है तो इसका अर्थ ये नहीं है कि भारत को गुलाम रखने वाले अंग्रेजों में से ही किसी एक को सेनाध्यक्ष की पदवी दे दी जाए। तब नेहरू ने उनसे ही सवाल दाग दिया कि क्या वो इस जिम्मेदारी का निर्वाहन करने को तैयार हैं? लेकिन सेनाध्यक्ष के पद को ठुकराते हुए उन्होंने कहा– “मैं कुछ कहना चाहता हूँ” और नेहरू के विचारों से आपत्ति जताते हुए भारत के पहले सेनाध्यक्ष के लिए किसी अंग्रेज की जगह करियप्पा का नाम सुझाया।

इस सूची में एक नाम राजर्षि पुरषोत्तम दास टंडन का भी है। राजर्षि ने उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की जड़ें मजबूत करने में अपनी ज़िंदगी खपा दी। यूपी के गाँव-गाँव में घूम कर निःस्वार्थ भाव से जिस तरह उन्होंने पार्टी की सेवा की थी, उनका लोकतान्त्रिक तरीके से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनना शायद ही किसी को अखरता। लेकिन, कॉन्ग्रेस पार्टी का शायद यह दुर्भाग्य ही था कि राजर्षि का अध्यक्ष बनना ‘किसी’ को रास नहीं आया और उन ‘किसी’ का नाम था- जवाहरलाल नेहरू। भारतीय राजनीतिक इतिहास की यह घटना उस समय की है जब नेहरू कॉन्ग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता थे।

किस्सा 1950 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का चुनाव से जुड़ा हुआ है जब जवाहरलाल नेहरू के समर्थन में जेपी कृपलानी मैदान में उतरे। जेपी कृपलानी आज़ादी के समय भी कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे और नेहरू ने इस चुनाव को अपने स्वाभिमान पर ले लिया। कारण- जिस व्यक्ति को देश का सबसे ‘लोकप्रिय’ नेता कहा जाता था, उसके उम्मीदवार की पार्टी में ही हार होने से तरह-तरह की चर्चाओं को बल मिल सकता था। लेकिन उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल के समर्थन और गाँव-गाँव में अपनी मजबूत छवि के कारण टंडन इस चुनाव को जीतने में कामयाब रहे। बेदाग़ चरित्र और विवादों से दूर रहने वाले टंडन हिंदुत्व की तरफ़ झुकाव वाले नेता थे। इस चुनाव परिणाम को नेहरू ने अपने स्वाभिमान पर धक्का के रूप में लिया। यहाँ तक कि नेहरू ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने की भी धमकी दे डाली। अंततः देश और पार्टी के हित में टंडन ने कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

नेहरू को समस्या केवल समकालीनों से ही नहीं थी। हिंदुओं की बात करने वाले, तुष्टिकरण का विरोध करने वालों को वे देखना नहीं चाहते थे। उन्होंने तो बकायदा अयोध्या से राम की मूर्ति हटाने की भी कोशिश की थी। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में ​विस्तार से उन घटनाओं का ब्यौरा दिया है, जब गर्भगृह से राम की मूर्ति हटाने पर नेहरू अमादा थे। लेकिन, केरल के रहने वाले आईसीएस अधिकारी केकेके नायर, जो उस समय फैजाबाद के जिलाधिकारी थे ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

हेमंत शर्मा लिखते हैं, “उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम नेताओं और देवबंद के उलेमाओं ने नेहरू को तार भेजकर उनका ध्यान अयोध्या की ओर दिलाया। नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत और राज्य के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को तत्काल मस्जिद से मूर्तियों को हटाने के निर्देश दिए। लगातर केंद्र से संदेश लखनऊ आते और वैसे ही तार लखनऊ से फैजाबाद भेजे जाते कि मूर्तियॉं तुरंत हटाई जाएँ।” शर्मा ने ​अपनी किताब में जिन घटनाओं और चिट्ठियों का जिक्र किया है, उनसे जाहिर होता है कि नेहरू मूर्तियॉं हटाकर धर्मनिरपेक्ष दिखना चाहते थे। लेकिन, नायर के अड़ने और पंत तथा पटेल के नरम रुख अपनाने के कारण वे अपने इस मंसूबे में यहाँ भी कामयाब नहीं हो पाए।

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अब सुषमा स्वराज के नाम से जाना जाएगा प्रवासी भारतीय केंद्र: जयंती से पहले मोदी सरकार की घोषणा

भारत सरकार ने प्रवासी भारतीय केंद्र और विदेशी सेवा संस्थान का नाम बदलकर दिवंगत सुषमा स्वराज के नाम पर रखने की घोषणा की है। 14 फरवरी को उनकी जयंती से ठीक पहले यह घोषणा की गई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आज घोषणा करते हुए कहा कि, सरकार ने प्रवासी भारतीय केंद्र का नाम सुषमा स्वराज भवन और विदेशी सेवा संस्थान का नाम सुषमा स्वराज इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन सर्विस रखने का फैसला किया है। एक महान शख्सियत को दी गई श्रद्धांजलि हमें हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

जयशंकर ने कहा, “हम सब सुषमा स्वराज को याद करते हैं, जो कल (14 फरवरी) 68 वर्ष की हो जाएँगी। विदेश मंत्रालय परिवार उन्हें विशेष रूप से याद करता है।” इस फैसले का स्वागत करते हुए केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने कहा कि मैं इस फैसले के लिए आपकी आभारी हूँ। वास्तव में यह सरकार द्वारा एक महिला को दी गई सच्ची श्रद्धांजलि है, उनको नेता के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा।

गौरतलब है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में ही सुषमा को विदेश मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद दिया था। इस पद पर रहते हुए सुषमा ने विदेश में रह रहे भारतीयों की मदद की दिशा में सराहनीय कार्य किए थे। वह लोगों से ट्विटर के जरिए जरिये कनेक्ट रहती थीं और उनकी समस्या का समाधान करती थीं। 6 अगस्त 2019 को उनका निधन हो गया था। स्वराज को गणतंत्र दिवस के मौके पर पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा गया था। पिछले महीने हरियाणा सरकार ने अंबाला के बस अड्डे का नाम सुषमा स्वराज के नाम पर रखने की घोषणा की थी। परिवहन मंत्री मूलचंद शर्मा ने बताया था कि 14 फरवरी को बस अड्डे का नया नामकरण किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि सुषमा स्वराज ने जीवन के शुरुआती साल अंबाला में बिताए थे।

‘गदहे हैं ये लोग’: शिकारा से कश्मीरी पंडितों के जख्म पर नमक रगड़ने वाला चोपड़ा बौखलाया

बतौर निर्देशक अपनी लगातार तीन फ़िल्में फ्लॉप होने के बाद विधु विनोद चोपड़ा बौखला गए हैं। झूठे आँकड़ों के जरिए आलोचकों को चुप कराने में जुट गए हैं। उन्होंने अपनी फ़िल्में ‘3 इडियट्स’ और ‘शिकारा’ को लेकर झूठ बोला है। बता दें कि वो ‘3 इडियट्स’ से बतौर निर्माता जुड़े हुए थे। यहाँ सवाल उठता है कि आलोचकों पर निशाना साधने के लिए उन्होंने ख़ुद की निर्देशित की हुई फ़िल्मों का आँकड़ा क्यों नहीं दिया? क्या इसीलिए, क्योंकि इससे उनकी और भी बेइज्जती हो जाती? उनके आँकड़ों की सच्चाई जानेंगे लेकिन पहले पढ़िए कि उन्होंने आख़िर कहा क्या?

कश्मीरी पंडितों का दर्द दिखाने के नाम पर उन्होंने ‘शिकारा’ बनाई। लेकिन, फिल्म में कट्टरपंथियों के अत्याचार को छिपा लिया गया और प्रेम-कहानी पर जोर दिया गया। चोपड़ा ने कहा कि कश्मीरी पंडित और कट्टरपंथी एक-दूसरे से सॉरी कहें और आगे बढ़ें। अत्याचार कश्मीरी हिन्दुओं पर हुआ तो वो मुस्लिमों से सॉरी क्यों बोलें, इस सवाल पर चोपड़ा भड़क जाते हैं। तभी कश्मीरी पंडित व पत्रकार दिव्या राजदान ने ‘शिकारा’ के स्क्रीनिंग के दौरान विधु विनोद चोपड़ा को जोर से डाँटा। राजदान ने पूछा कि उन्होंने फिल्म में कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार को छिपाया क्यों?

अब निर्देशक-निर्माता विधु विनोद चोपड़ा में अपने आलोचकों को गदहा कहा है। उन्होंने कहा कि उनकी फ़िल्म ‘3 इडियट्स’ ने पहले ही दिन 33 करोड़ रुपए की कमाई की थी। उन्होंने दावा किया कि उन्हें पता था कि शिकारा का पहले दिन का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 30 लाख रुपया ही होगा। साथ ही उन्होंने ये भी दावा किया कि उन्होंने ये फ़िल्म अपनी माँ की याद में बनाई है। बकौल चोपड़ा, कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने कश्मीरी पंडितों का दर्द बेच कर रुपए कमाने के लिए ”शिकारा’ बनाई, वो सभी गदहे हैं। वैसे चोपड़ा अपने आलोचकों को गदहा तभी कह रहे हैं, जब उनके पास सवालों के कोई जवाब नहीं हैं।

अब आते हैं ‘3 इडियट्स’ के पहले दिन के कलेक्शन पर। फ़िल्म समीक्षक और बॉक्स ऑफिस विशेषज्ञ सुमित कादेल ने विधु विनोद चोपड़ा की पोल खोलते हुए बताया कि क्रिसमस 2009 के मौके पर रिलीज हुई अमित ख़ान अभिनीत फिल्म की पहले दिन की कमाई 12.78 करोड़ रुपए थी। हालाँकि, इसके बाद आई सलमान ख़ान की ‘दबंग’ ने 3 इडियट्स के ओपनिंग रिकॉर्ड तोड़ डाले थे। ‘3 इडियट्स’ के लगभग 1 साल बाद आई सुपरस्टार रजनीकांत की तमिल मूवी ‘एंथिरन (रोबोट)’ ने दोनों ही फ़िल्मों के सारे रिकार्ड्स को तोड़ डाला था। ऐसे में, चोपड़ा ने झूठ बोला कि उनकी फ़िल्म ने उस वक्त 33 करोड़ रुपए कमाए थे।

वहीं ‘शिकारा’ के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को लेकर भी विधु विनोद चोपड़ा सही नहीं बोल पाए। वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक व बॉक्स ऑफिस ट्रैकर तरन आदर्श के इस ट्वीट को देखिए, जिसमें उन्होंने रिलीज के एक दिन बाद ही बताया था कि ‘शिकारा’ ने पूरे भारत में 1.2 करोड़ रुपए की नेट कमाई की है:

इससे पता चलता है कि जहाँ अपने पुराने फ़िल्म की कमाई को ढाई गुना ज्यादा बता कर चोपड़ा अपने ताज़ा फिल्म की कमाई कम बता कर शेखी बघारने के साथ-साथ ही सहानुभूति भी बटोरना चाहते हैं। दरअसल, उन्होंने अपने द्वारा निर्देशित की गई फ़िल्मों का नाम इसीलिए नहीं लिया, क्योंकि उनकी पिछली तीनों फ़िल्में फ्लॉप रही हैं। अप्रैल 2015 में ‘Broken Horses’ के जरिए वो हॉलीवुड में पाँव पसारने चले थे लेकिन फ़िल्म 25 लाख रुपए के लिए भी तरस गई। इसे इतिहास की सबसे बड़ी फ्लॉप फ़िल्मों में रखा जाता है। चोपड़ा की बौखलाहट का कारण लगातार तीसरी फ़िल्म का फ्लॉप होना तो नहीं?

क्या राजकुमार हिरानी के निर्देशन के बिना विधु विनोद चोपड़ा की इतनी भी हैसियत नहीं कि वो एक फ़िल्म भी हिट करा सकें? ‘3 इडियट्स’, ‘मुन्नाभाई’ सीरीज, ‘पीके’ और ‘संजू’- इन सभी फ़िल्मों के निर्देशक हिरानी ही थे। विधु विनोद चोपड़ा ने ‘एकलव्य’ के लिए 2007 में निर्देशक की टोपी पहनी थी, जो बुरी तरह फ्लॉप रही। अमिताभ बच्चन, सैफ अली खान, संजय दत्त और जिमी शेरगिल जैसे सितारों के रहते भी उनकी फ़िल्म नहीं बच पाई और अब शिकारा के साथ फ्लॉप फिल्मों की उन्होंने हैट्रिक पूरी कर ली है।

‘कश्मीरी हिन्दुओं पर थूकने का काम करती है शिकारा फिल्म, उल्टे हिन्दुओं को ही कम्युनल कहती है’

कट्टरपथियों से किस बात की माफ़ी माँगें कश्मीरी हिन्दू? कि उनकी लड़कियों का गैंगरेप हुआ, निर्मम हत्या की गई?

सरला का गैंगरेप और शरीर को 3 हिस्सों में चीर सरे बाजार घुमाना… शिकारा के ‘शातिरों’ ने सब कुछ छुपाया

केंद्र शासित J&K में पहली बार चुनावों का ऐलान, 8 चरणों में होंगे पंचायती चुनाव

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद पहली बार चुनाव आयोग ने राज्य में पंचायती चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया है। घोषणा के मुताबिक राज्य में कुल आठ चरणों में चुनाव कराए जाएँगे। पहला चरण 5 मार्च, जबकि आखिरी चरण 20 मार्च को होगा।

जम्मू-कश्मीर के चुनाव आयुक्त शैलेंद्र कुमार ने घोषणा करते हुए बताया कि पंचायती चुनाव का पहला चरण 5 मार्च, दूसरा 7 मार्च, तीसरा 9 मार्च, चौथा 12 मार्च, 5वॉं 14 मार्च, छठा 16 मार्च, 7वाँ 18 मार्च और 20 मार्च को चुनाव का आखिरी चरण होगा। यह चुनाव प्रदेश की एक हजार से अधिक खाली पड़ी सरपंचों की सीटों के लिए होंगे। साथ ही चुनाव आयोग ने साफ किया है कि चुनाव बैलेट पेपर से ही कराए जाएँगे।

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चुनाव आयोग ने बताया कि प्रदेश में सरपंच की 1011 सीटें खाली हैं। इन पदों को भरने के लिए लंबे समय से चुनाव कराने की अटकलें लगाई जा रही थीं। आपको जानकर हैरानी होगी कि जम्मू-कश्मीर में जिन सीटों पर चुनाव होना है। यह वही सीटें है, जहां से आतंकवाद के डर से कोई उम्मीदवार ही खड़ा नहीं हुआ था और तभी से इन गॉंवों का विकास पूरी तरह से अफसरों के हाथों में है।  

एक रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू-कश्मीर-लद्दाख के 22 जिलों की आबादी करीब 1 करोड़ 40 लाख लोगों की है, जिसमें से करीब 80 लाख लोग 6,900 गॉंवों में रहते हैं। अगर पंचायतों की बात करें तो जम्मू-कश्मीर प्रदेश में 4,483 पंचायत हैं, जिनमें 3500 पंच और 4500 सरपंच हैं।

गौरतलब है कि बीते साल केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बॉंट दिया था। जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा है जबकि लद्दाख बगैर विधानसभा के केंद्र शासित प्रदेश है।

खेलो इंडिया: बारी-बारी से शीतकालीन खेलों की मेजबानी करेंगे लद्दाख और J&K, रिजिजू ने किया ऐलान

J&K में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम बनाएगा श्री वेंकटेश मंदिर, प्रशासन ने की 100 एकड़ भूमि आवंटित

21348 अवैध घुसपैठिए किए गए प्रत्यर्पित, 9205 को किया गया गिरफ़्तार: गृह मंत्रालय ने जारी किए आँकड़े

खेलो इंडिया: बारी-बारी से शीतकालीन खेलों की मेजबानी करेंगे लद्दाख और J&K, रिजिजू ने किया ऐलान

केंद्रीय खेल मंत्री किरेन रिजिजू ने बृहस्पतिवार (फरवरी 13, 2020) को घोषणा करते हुए बताया कि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख इस महीने पहले ‘खेलो इंडिया’ (Khelo India) शीतकालीन खेलों की मेजबानी करेगा, जबकि मार्च में इस तरह की प्रतियोगिता जम्मू-कश्मीर में आयोजित की जाएगी।

इस महीने लद्दाख और मार्च में जम्मू कश्मीर अपने पहले ‘खेलो इंडिया’ शीतकालीन खेलों की मेजबानी करेगा। खेलो इंडिया शीतकालीन खेलों की दोनों प्रतियोगिताओं का खर्चा खेल मंत्रालय उठाएगा। पहली प्रतियोगिता लद्दाख में फरवरी के तीसरे हफ्ते, जबकि दूसरी प्रतियोगिता जम्मू-कश्मीर में मार्च के पहले हफ्ते में होगी।

1,700 खिलाड़ी लेंगे हिस्सा

खेलो इंडिया लद्दाख शीतकालीन खेलों में आईस हॉकी चैंपियनशिप, फिगर स्केटिंग और स्पीड स्केटिंग स्पर्धाएँ होंगी और इस प्रतियोगिता का आयोजन ब्लॉक, जिला और केंद्र शासित स्तर पर किया जाएगा। इन खेलों में लगभग 1,700 खिलाड़ियों के हिस्सा लेने की उम्मीद है।

खेलो इंडिया जम्मू-कश्मीर शीतकालीन खेल गुलमर्ग के कोंगडोरी में लड़के और लड़कियों के लिए चार आयु वर्ग में होंगे। इन खेलों में 19 से 21, 17 से 18, 15 से 16 और 13 से 14 साल के आयु वर्ग के खिलाड़ी अल्पाइन स्कीइंग, क्रास कंट्री स्कीइंग, स्नो बोर्डिंग और स्नोशूइंग स्पर्धाओं में हिस्सा लेंगे।

केंद्रीय खेल मंत्री रिजिजू ने कहा कि युवाओं की ऊर्जा को सही स्थान पर लगाने के लिए खेलों से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि यह एक साल में तीसरे खेलो इंडिया खेल होंगे और सरकार ने स्वदेशी खेलों के लिए भी एक प्रतियोगिता के आयोजन की योजना बनाई है।

गौरतलब है कि भारत सरकार ने बीते साल 5 अगस्त को आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्क्रिय कर दिया था। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया था। 31 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर विधानसभा के साथ और लद्दाख बगैर विधानसभा के केंद्र शासित प्रदेश बना।

20 साल बाद भारत लाया गया अजहर का नाम लेने वाला संजीव चावला, अगला नंबर विजय माल्या का!

क्रिकेट जगत को हिलाकर रख देने वाले साल 2000 के चर्चित मैच फिक्सिंग मामले के प्रमुख आरोपी संजीव चावला गुरुवार को भारत लाया गया। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम उसे लंदन से लेकर आई है। 50 वर्षीय चावला को ब्रिटेन से प्रत्यर्पित कर लाया गया है।

ब्रिटेन की एक अदालत ने पिछले महीने चावला की याचिका को खारिज करते हुए उसके प्रत्यपर्ण का आदेश दिया था। मैच फिक्सिंग के इस मामले में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान हैंसी क्रोनिए का नाम भी सामने आया था। उनकी बाद में एक विमान हादसे में मौत हो गई थी। चावला और क्रोनिए के बीच बातचीत को इंटरसेप्ट करने के बाद दिल्ली पुलिस ने मार्च 2000 में प्राथमिकी दर्ज की थी। बातचीत के दौरान चावला ने भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान और कॉन्ग्रेस के सांसद रहे मोहम्मद अजहरुद्दीन का नाम भी लिया था।

चावला 1996 में बिजनेस वीजा पर ब्रिटेन चला गया था। 2000 में उसका भारतीय पासपोर्ट रद्द कर दिया गया।2005 में उसे ब्रिटेन की नागरिकता मिल गई। पिछले साल मार्च में ब्रिटेन के गृह मंत्री ने उसके प्रत्यर्पण का आदेश दिया था। इसके खिलाफ वह कोर्ट चला गया था। लेकिन 16 जनवरी को लंदन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने उसके प्रत्यर्पण को मंजूरी दे दी।

1992 की भारत-ब्रिटेन के बीच हुई प्रत्यर्पण संधि के तहत चावला का प्रत्यर्पण हुआ है। यह इस संधि के तहत पहला हाई प्रोफाइल प्रत्यर्पण है। वर्ष 2000 में 16 फरवरी और 20 मार्च को खेले गए भारत-दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट मैच फिक्स करने के लिए दिल्ली पुलिस ने साउथ अफ्रीका टीम के कैप्टन रह चुके दिवंगत हैंसी क्रोनिए और पांच अन्य के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी। साउथ अफ्रीका के हर्शल गिब्स और निकी बोए के खिलाफ फिक्सिंग से जुड़े होने के पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर उनका नाम चार्जशीट से हटा दिया गया था। इस संबंध में पुलिस ने 2013 में चार्जशीट दाखिल की थी।

20 साल बाद संजीव चावला के प्रत्यर्पण से अन्य वांछितों को भारत लाने की उम्मीदें बढ़ी है। खासकर, भगोड़े विजय माल्या को देश लाने के मामले में कामयाबी की उम्मीद जताई जा रही है। उसके मामले में फिलहाल लंदन के कोर्ट में सुनवाई जारी है।

मदर टेरेसा की मिशनरी में लाई गई 450 गर्भवती औरतें, 280 के बच्चों का पता नहीं: बाल आयोग पहुँचा SC

मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘मिशनरी ऑफ चैरिटी’ कथित तौर पर बच्चों के ख़रीद-फरोख्त में लगी हुई है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया है कि ईसाई मिशनरी संस्थाओं द्वारा बच्चों को बेचे जाने की जाँच हेतु एक एसआईटी का गठन किया जाए। आयोग की माँग है कि ये एसआईटी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जाँच करे। साथ ही झारखंड में बच्चों के हितों की रक्षा के लिए जाँच हेतु एक समयावधि भी तय करने की भी माँग की गई है। ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर सजग एनसीपीसीआर पहले बार सुप्रीम कोर्ट पहुँचा है।

सीजेआई एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले में झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, केरल और महारष्ट्र की सरकारों को नोटिस जारी किया है। आरोप है कि झारखंड में मिशनरियों द्वारा बच्चों को बेचे जाने के सम्बन्ध में सरकारी अधिकारियों ने काफ़ी ढुलमुल रवैया अपनाया है। मदर टेरेसा का संगठन कई ‘चिल्ड्रेन होम’ चलता है, जहाँ से इन बच्चों को कथित तौर पर बेचा जा रहा है। इस मामले में झारखंड सरकार को आगाह किया गया था लेकिन जाँच को रोकने के प्रयास होते रहे।

आयोग ने झारखंड के मुख्य सचिव को पत्र लिख कर इन चिल्ड्रेन होम्स में रह रहे सभी बच्चों की जानकारी और अन्य विवरण माँगे थे। साथ ही ऐसे सभी शेल्टर होम्स की भी जानकारी माँगी गई थी। आयोग ये देखना चाहता था कि इनमें से कितने रजिस्टर्ड हैं। शेल्टर होम्स में रह रहे बच्चों की एक ‘वैधानिक स्थिति’ होती है, जिसके अनुसार पता चलता है कि वो अनाथ हैं, छोड़ दिए गए हैं या फिर आत्मसमर्पण करने वाले हैं। जुलाई 2018 में आयोग ने राँची स्थित एक ऐसे ही शेल्टर होम का दौरा किया था, जहाँ बड़ी गड़बड़ियाँ पाई गई थीं। इस बारे में झारखंड के पुलिस व प्रशासन को सारी जानकारी दे दी गई थी।

ज्ञात हो कि 2018 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की 2 सिस्टर्स बच्चों को बेचने के मामले में गिरफ्तार की गई थीं। 2015 से 2018 के बीच 450 गर्भवती महिलाएँ यहाँ भर्ती की गई थी। किया गया था। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इनमें से सिर्फ़ 170 बच्चों का ही रिकॉर्ड दर्ज है। बाकी 280 शिशुओं के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। उनका क्या हुआ? बच्चों को बेचे जाने की पुष्टि हुई थी। वरिष्ठ अधिकारीगण इस बात की तस्दीक में जुटे हैं कि इसके तार कहाँ-कहाँ तक जुड़े हैं।

इस संबंध में एनसीपीसीआर ने कई पीड़ितों से बातचीत भी की है, जिन्होंने कई बड़े खुलासे किए हैं। इसी से मदर टेरेसा की मिशनरी द्वारा की गई गड़बड़ियों के बारे में पता चला था। लेकिन, राज्य सरकारों की नज़रअंदाज़ी के चलते कुछ कार्रवाई नहीं हुई।

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‘किसी ने यह नहीं पूछा कि देश की इकोनॉमी को 3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने में 70 साल क्यों लगे’

बुधवार (फरवरी 12, 2020) को टाइम्स नाउ समिट 2020 के पहले दिन अलग-अलग वक्ताओं ने सरकार की खूबियों और खामियों को देश की जनता के सामने पेश किया। किसी को देश तरक्की के रास्ते पर नजर आया तो किसी को लगा कि यह सरकार विभाजनकारी एजेंडे पर काम कर रही है।

इस समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत को तीन ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने में 70 साल लग गए और आश्चर्य है कि किसी ने भी यह सवाल नहीं पूछा कि इसमें इतना लंबा वक्त क्यों लग गया? प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले 70 सालों में देश की सुस्त आर्थिक रफ्तार पर चुप्पी को लेकर भी सवाल उठाए।

‘जो लक्ष्य तय करते हैं, उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है’

कार्यक्रम के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों को बताते हुए कहा कि जो लक्ष्य तय करते हैं, आलोचनाओं का सामना भी उन्हें ही करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि वो अपने कर्तव्य को समझने के साथ-साथ उन लोगों से भी अपेक्षा करते हैं, जो सिर्फ अधिकारों की बात करते हैं।

पीएम ने कहा कि उन्होंने अब एक लक्ष्य तय किया है, तो उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं। पीएम ने कहा कि उनकी सरकार इस लक्ष्य को पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। पीएम ने कहा कि एक कठिन लक्ष्य चुनना और उस पर काम करना बेहतर होता है।

पीएम नरेंद्र मोदी कहा कि दुनिया का सबसे युवा देश अब खेलने के लिए तैयार है और सरकार ने इस देश के आम लोगों की आवाज को सुना है। इसके साथ ही उन्होंने अपनी सरकार के उन महत्वपूर्ण फैसलों का जिक्र किया जो पूरे किए जा चुके हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि सरकार ने तीन तलाक, अनुच्छेद 370, सीएए जैसे विषयों पर मसलों पर फैसले किए हैं। पीएम मोदी ने कहा कि देश के सामने चुनौतियाँ हैं, लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि पाँच ट्रिलियन के अर्थव्यस्था को जरूर हासिल करेंगे।

दिल्ली में बीजेपी की हार के पीछे छिपी है एक जीत, 63 सीटों पर बढ़ा पार्टी का वोट प्रतिशत

भले ही दिल्ली विधानसभा चुनावों में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन पार्टी के खाते में वोट प्रतिशत बढ़ा है। इतना ही नहीं पिछले दिल्ली में चली केजरीवाल की आँधी और पिछले चुनावों में 3 सीटें पाने वाली बीजेपी को इस बार 8 सीटों पर जीत मिली है।

दिल्ली चुनाव परिणामों का शोर थम सा गया है सभी पार्टियाँ अपनी जीत और हार का विश्लेषण करने में लगी हुई हैं। तो वहीं अरविंद केजरीवाल फिर से मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह के कार्यक्रम की तैयारी में जुट गए हैं। दूसरी ओर बीजेपी अपनी हार पर गहन मंथन में जुटी हुई है, तो कॉन्ग्रेस पार्टी में आरोप-प्रत्यारोप के साथ छिड़े घमासान के बीच पार्टी पदाधिकारियों द्वारा इस्तीफा दिए जाने का सिलसिला जारी है।

दिल्ली चुनाव परिणामोंं में सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बीजेपी की करारी हार में भी उसकी एक बड़ी जीत छिपी हुई है। ऐसा इसलिए कि इस 70 विधानसभा सीटों में से 8 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की है, जोकि पिछले चुनावों में यह आँकड़ा 3 सीटों पर सिमटा हुआ था। वहीं इसमें गौर करने वाली बात यह कि बीजेपी का इस बार करीब 63 सीटों पर वोट शेयर बढ़ा है। कुल मिलाकर दिल्ली में 38.51% के साथ पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा है। इतना ही नहीं 20 सीटों पर बीजेपी ने 2015 चुनाव की तुलना में 10 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर बढ़ाया है। बीजेपी ने सबसे ज्यादा वोट शेयर नजफगढ़ सीट पर बढ़ाया है। यहाँ पिछली चुनाव की तुलना में उसका वोट शेयर 21.5 फीसदी बढ़ा है। इन्हीं आँकड़ों के साथ बीजेपी की हार के पीछे पीर्टी की एक जीत भी देखी जा रही है।

चुनाव परिणामों के बाद आए आँकड़ों के मुताबिक चुनाव में 53.57% के साथ आम आदमी पार्टी का वोट शेयर घटा है, वहीं 4.26% के साथ कॉन्ग्रेस का भी वोट प्रतिशत भी घटा है। तो वहीं करावल नगर सीट पर आप का सबसे अधिक वोट शेयर घटा है। अग़र बात करें अन्य राजनीतिक दलों की तो, COI, COIM और NCP को चुनावों में नोटा से भी कम (0.46%) वोट प्रतिशत मिला है।

दिल्ली के लोगों ने आप को जमकर समर्थन दिया है। उसे कुल पड़े मत में 49,74,522 लोगों का समर्थन मिला है। बीजेपी को 35,75,430 एवं कॉन्ग्रेस को 3,95,924 लोगों का समर्थन मिला है। गौरतलब है कि 16 फरवरी को अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में पूरी कैबिनेट के साथ एक बार फिर से दिल्ली मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।