Home Blog Page 5089

बंगाल: मदरसों पर ममता बनर्जी मेहरबान, मजहबी शिक्षा लेने को हिंदू बच्चे मजबूर

पश्चिम बंगाल में इस बार 70 हजार छात्र मदरसा बोर्ड की परीक्षा में बैठने वाले हैं। इसमें से करीब 18% छात्र हिंदू हैं। पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष अबू ताहेर कमरुद्दीन ने बताया कि 2019 में मदरसा बोर्ड की परीक्षा में 12.77% फीसदी हिंदू छात्र शामिल हुए थे। पिछले कुछ सालों से मदरसे में हिंदू छात्रों की संख्या में हर साल 2-3 फीसदी का इजाफा हो रहा है। राज्य के पुरुलिया, बीरभूम और बांकुड़ा में चार बड़े-बड़े मदरसे हैं और हैरत की बात है कि यहाँ तो गैर मुस्लिम छात्रों की संख्या मुस्लिमों से ज्यादा है।

जानकारी के मुताबिक राज्य में सरकारी सहायता प्राप्त 6,000 से ज्यादा मदरसे हैं। मदरसे मजहबी तालीम के केंद्र हैं। अमूमन इसमें मुस्लिम समुदाय के बच्चे ही पढ़ते हैं। लेकिन, बंगाल में हिंदू बच्चों की तादाद भी अच्छी-खासी है और वह साल दर साल आश्चर्यजनक तौर पर बढ़ रही है। अब सवाल उठता है कि आखिर इसके पीछे वजह क्या है?

राज्य में 600 मदरसे हैं, जिसे ममता बनर्जी सरकारी फंड देती हैं। वे किसी भी उद्योग से अधिक मदरसों पर खर्च करती हैं, जबकि स्कूलों के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। उनकी दोयम दर्जे की राजनीति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल उनकी सरकार ने मदरसों के विकास के लिए 4,000 करोड़ रुपए का आवंटन किया था, जबकि राज्य के पूरे उच्च शिक्षा सेट-अप के लिए 3,964 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। इतनी मेहरबानी मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ मजबूत करने के लिए की जा रही है। ऐसे में हिंदू छात्र मदरसा जाने के लिए मजबूर न हो तो और क्या करें? 

इसके अलावा कई इलाकों में स्कूल नहीं होने की वजह से भी हिंदू छात्र मदरसे को तरजीह देते हैं, या फिर यूँ कहें कि वो मदरसे में जाने के लिए मजबूर हैं। मदरसों के छात्रों को सरकार स्कॉलरशिप भी दे रही है। ऐसे में बीरभूम, बर्धवान और बांकुड़ा जिले में गैर-मुस्लिम छात्रों और अभिभावकों में इन मदरसों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है।

लेकिन, मुस्लिम वोट बैंक को पनाह देने की नीति से धीरे-धीरे पश्चिम बंगाल मिनी इस्लामिक राज्य बनाने की दिशा में अग्रसर है। मदरसे में भारी फंडिंग करके वहाँ के मुल्लाओं को खुश करने की कोशिश की जा रही है और इसकी वजह से वहाँ के हिंदू दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर रह गए हैं।

ममता के बंगाल में सरस्वती पूजा को लेकर हिन्दू छात्रों को पीटा गया, शिक्षक ने टॉयलेट में छिपकर बचाई जान

महिलाओं के ख़िलाफ़ SC गई थी UPA सरकार, मोदी पर ठीकरा फोड़ राहुल गाँधी ने कराई जगहँसाई

करीब एक दशक पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने सेना में पुरुषों की तरह महिला अधिकारियों के लिए भी स्थायी कमीशन के गठन को कहा था। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने कहा कि शरीर-क्रिया सम्बन्धी बाधाओं और सामाजिक पहलुओं के आधार पर महिलाओं को सेना में परमानेंट कमीशन न देना एक व्यथित करने वाला तर्क है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला अधिकारियों ने काफ़ी बहादुरी भरा प्रदर्शन किया है और विभिन्न सम्मान लेकर आई हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने सेना में महिलाओं को शामिल किए जाने को एक ‘विकासवादी प्रक्रिया’ करार दिया।

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी इस मसले पर भी केंद्र सरकार को घेरने से बाज नहीं आए। लेकिन, इस चक्कर में वे वैसी ही गलती कर बैठे जैसा उन्होंने उत्तराखंड में पदोन्नति के आरक्षण मामले में किया था। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार के समर्थन में फ़ैसला देते हुए पिछले दिनों कहा था कि प्रमोशन में रिजर्वेशन देने के लिए राज्य को मजबूर नहीं किया जा सकता। उत्तरखंड में भाजपा की सरकार है, इसीलिए राहुल ने मोदी-शाह और संघ को निशाने पर लिया। लेकिन वे भूल गए कि यह मामला 2012 का था, जब उत्तराखंड में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। अब उन्होंने फिर से अपनी बेइज्जती कराई है।

राहुल गाँधी ने कहा कि केंद्र सरकार महिलाओं को सेना में ‘स्थायी सेवा’ या फिर ‘कमांड पोस्ट’ नहीं देना चाहती थी, इसीलिए उसने सभी महिलाओं का अपमान किया है। उनका निशाना मोदी सरकार पर था। उन्होंने बड़ी बेशर्मी से दावा कर दिया कि एक-एक महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर मोदी सरकार को, भाजपा की सरकार को ग़लत साबित कर दिया। हालाँकि, इस दौरान वो ये भूल गए कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार नहीं, मनमोहन सरकार लेकर गई थी। 2010 में जब हाई कोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था, तभी कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में चल रही यूपीए-2 की सरकार इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।

यानी राहुल गाँधी अपनी पार्टी के सरकार की करनी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। अब सवाल उठता है कि मोदी सरकार इस बारे में क्या सोचती है? पीएम मोदी ने अगस्त 15, 2018 को ही अपने सम्बोधन के दौरान इस बारे में घोषणा कर दी थी कि पुरुष अधिकारियों की तरह अब महिला अधिकारियों को भी सेना में ‘परमानेंट कमीशन’ की सुविधा दी जाएगी। 72वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से उन्होंने ऐलान किया था कि पारदर्शी प्रक्रिया के तहत ये सुनिश्चित किया जाएगा कि सेना में महिला अधिकारियों को पुरुष साथियों की तरह सुविधाएँ व अधिकार मिलें।

जहाँ तक महिलाओं के अधिकार की बात है, पहली मोदी कैबिनेट में जितनी महिलाओं की संख्या थी, उतनी आजादी के बाद से किसी भी सरकार में नहीं रही। उस दौरान पीएम ने इस बात की भी चर्चा की थी कि सुप्रीम कोर्ट में भी 3 महिला जज हैं, जो आजादी के बाद से अब तक सर्वाधिक है।

राहुल गाँधी के ‘तमगे’: सुप्रीम कोर्ट की फटकार, नेशनल हेराल्ड घोटाला और झूठा प्रलाप

‘NYAY योजना’ पर राहुल गाँधी ने देश से बोला था झूठ, नोबेल विजेता अभिनीत बनर्जी ने किया खुलासा

मी लॉर्ड ने बख्श दिया पर राहुल गाँधी को मन से माफ नहीं कर पाएँगे कॉन्ग्रेसी

मैग्सेसे विजेता को जीप में डाल कर ले गई यूपी पुलिस, भड़काऊ पोस्टर बाँट कर लोगों को उकसा रहा था

उत्तर प्रदेश में सीएए के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन के नाम पर हिंसा की गई, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया और पुल्सकर्मियों के साथ झड़प की गई। योगी सरकार ने फ़ैसला किया कि सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई उपद्रवियों से ही की जाएगी। अब जब प्रदर्शन को कवरेज नहीं मिल रहा है, बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग फिर से जनता को भड़काने में जुट गया है। मीडिया का एक वर्ग तो पहले से ही उलटा-पुल्टा झूठ फैला कर मोदी सरकार को बदनाम करने में लगा है। हालाँकि, योगी आदित्यनाथ की सख्ती के कारण उपद्रवियों के मंसूबे धरे के धरे रह जा रहे हैं।

ताज़ा सूचना के अनुसार, मैग्सेसे विजेता संदीप पांडेय को पुलिस उठा कर ले गई है। पांडेय भड़काऊ पोस्टर बाँट कर लोगों को उकसाने का काम कर रहे थे। वो सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ भड़काऊ बातें लिख कर लोगों में भ्रम फैला रहे थे। बता दें कि पूरे देश में एनआरसी लागू करने के संबंध में अभी कोई फ़ैसला नहीं हुआ है, लेकिन कथित बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इसके विरोध में लगा हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन पर सीआरपीसी की धारा-151 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

बता दें कि धारा-151 के तहत पुलिस किसी अपराध को रोकने के लिए किसी व्यक्ति को हिरासत में ले सकती है और इसके लिए मजिस्ट्रेट के ऑर्डर की ज़रूरत नहीं पड़ती। अभी तक आधिकारिक रूप से पांडेय की गिरफ़्तारी बारे में कुछ नहीं कहा गया है। उनकी पत्नी ने अरुंधति धुरु ने बताया कि लखनऊ स्थित ठाकुरगंज थाने की पुलिस उन्हें उठा कर ले गई है। अरुंधति ख़ुद भी एक्टिविस्ट होने का दावा करती हैं। पांडेय के दोस्तों ने दावा किया है कि पुलिस उन्हें जीप में डाल कर ले गई है।

संदीप पांडेय जिन भड़काऊ पोस्टरों के जरिए लोगों को उकसा रहे थे, उन पर कई अन्य तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं के हस्ताक्षर थे। उन पोस्टर्स में लिखा था- “देश को लूटने की, बाँटने की और बेचने की राजनीति नहीं चलेगी।” पोस्टर में कई आपत्तिजनक बातें लिखी होने की बात भी पता चली है। मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता संदीप पांडेय लोगों से अपील कर रहे थे कि वो देश के संविधान की प्रस्तावना को ‘वास्तविकता में बदलने के लिए’ एकजुट हों।

संदीप पांडेय के साथ-साथ उनके 9 अन्य साथियों को भी पुलिस ले गई है, जो क्षेत्र में शांति भंग करने का प्रयास कर रहे थे। पांडेय बिना अनुमति लखनऊ घंटाघर से लेकर गोमती नगर तक मार्च भी निकालने वाले थे। घंटाघर को यूपी का शाहीन बाग़ बनाने के लिए वहाँ कई मुस्लिम महिलाओं को धरने पर बिठा दिया गया है।

15 मौतें, 705 गिरफ्तारियाँ, 57 पुलिसकर्मियों को लगी गोली: यूपी में CAA पर हिंसा का हर डिटेल

वीडियो: CAA विरोध के नाम पर उत्पात मचाने निकली थी दंगाई भीड़, यूपी पुलिस ने खदेड़-खदेड़ कर पीटा

निर्भया गैंगरेप: 27 दिन में तीसरी बार डेथ वारंट, 3 मार्च की सुबह 6 बजे लटकाए जाएँगे 4 दरिंदे

निर्भया गैंगरेप और हत्या मामले में दोषियों के खिलाफ कोर्ट ने आज तीसरी बार डेथ वारंट जारी किया। पटियाला हाउस कोर्ट ने इस दौरान दोषियों को फाँसी दिए जाने का दिन और समय मुकर्रर करते हुए अपना फैसला सुनाया। एडिशनल सेशन जज ने 3 मार्च को सुबह 6 बजे फाँसी देने का आदेश दिया। इसे सुनने के बाद निर्भया की माँ ने कहा कि न्याय में देर होता है, अंधेर नही।

निर्भया की माँ ने कहा, “मैं ज्यादा खुश नहीं हूँ, क्योंकि यह तीसरी बार है जब डेथ वारंट जारी हुआ है। हमने काफी संघर्ष किया है इसलिए इस बात से संतुष्ट हूँ कि आखिरकार डेथ वारंट जारी किया गया। मुझे उम्मीद है कि 3 मार्च को फाँसी हो जाएगी।”

उन्होंने सुनवाई के दौरान अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “मामले को 7 साल हो चुके हैं। मैं भी इंसान हूँ, मेरे अधिकारों का क्या होगा? मैं आपके सामने हाथ जोड़ती हूँ, कृपया डेथ वारंट जारी कर दीजिए।”

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने तिहाड़ जेल अधीक्षक और निर्भया के माता-पिता की याचिका पर करीब एक घंटे तक चली सुनवाई के बाद नया डेथ वारंट जारी किया। यह तीसरा डेथ वारंट है। इससे पहले 22 जनवरी को और फिर एक फरवरी को फॉंसी के लिए डेथ वारंट जारी हो चुके हैं।

इससे पहले दोषियों के वकील एपी सिंह ने कहा कि अभी कानूनी विकल्प बाकी हैं और इनका इस्तेमाल न किए जाने को इंसाफ देने में नाकामी कहा जाएगा। उन्होंने बताया कि दोषी पवन क्यूरेटिव पिटीशन और मर्सी पिटीशन लगाना चाहता है और दुष्कर्मी अक्षय भी गुनाह के वक्त अपने नाबालिग होने को लेकर नई याचिका दाखिल करना चाहता है। दोषियों के वकील के मुताबिक वह अक्षय के लिए नई दया याचिका लगाएँगें। पवन के पास भी क्यूरेटिव पिटिशन और राष्ट्रपति के पास दया याचिका का विकल्प बचा हुआ है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट कर दिया था कि निर्भया सामूहिक बलात्कार एवं हत्या मामले में चार दोषियों को अलग-अलग फाँसी दिए जाने की माँग करने वाली केंद्र की याचिका का लंबित रहना दोषियों को फाँसी के लिए निचली अदालत द्वारा नई तारीख जारी करने की राह में आड़े नहीं आएगा।

आज यानी सोमवार को इस सुनवाई के दौरान कोर्ट में ये भी जानकारी दी गई कि गुनहगार विनय शर्मा तिहाड़ में भूख हड़ताल कर रहा है। जबकि दोषी मुकेश सिंह ने कोर्ट से कहा कि वह नहीं चाहता कि वृंदा ग्रोवर उसकी तरफ से पैरवी करें। इसके बाद कोर्ट ने उसके लिए वकील रवि काजी को नियुक्त किया। विनय के वकील ने कोर्ट से कहा कि मेरा मुवक्किल मानसिक रूप से काफी बीमार है, लिहाजा उसे इस वक्त फाँसी नहीं दी जा सकती।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले 14 फरवरी को दोषी पवन ने अदालत से कहा था कि उसने अपने पुराने वकील को हटा दिया है और नए वकील के लिए उसे वक्त की जरूरत है। इसके बाद अदालत ने उसके अधिकारों की बात कहते हुए नया वकील नियुक्त किया था।

अगर दिल्ली सुरक्षित नहीं है, तो इसके लिए सिर्फ और सिर्फ केजरीवाल ही जिम्मेदार हैं: निर्भया के पिता

दरिंदों को बचाने के लिए पगलाया NewsLaundry, कंगना और निर्भया की माँ को कहा भला-बुरा

निर्भया की माँ ने केजरीवाल को लताड़ा: कहा- जो काम दिल्ली सरकार को करना था, वो हमने किया

8 साल की बच्ची ने तोड़ा दम: रिश्तेदार समेत 16 लोगों ने 4 साल तक किया था रेप

तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में इंसानियत को शर्मसार और रिश्तों को तार-तार करने वाला एक मामला उजागर हुआ है। जानकारी के अनुसार, यहाँ पूरे चार साल तक एक 8 साल की बच्ची का उसके रिश्तेदारों समेत 16 दरिंदो ने रेप किया। हालत बिगड़ने पर उसे चेन्नई के अस्पताल में भर्ती कराया। जहाँ गुरुवार को उसकी मौत हो गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रही हैं ताकि बच्ची की मौत के असल कारणों का पता चल सके। फिलहाल सीआरपीसी की धारा 174 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है। साथ ही आरोपितों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। सभी आरोपितों की उम्र 23 से 55 के बीच की है। पता चला है कि आरोपितों में लड़की के अंकल के लड़के भी थे।

बताया जा रहा है बच्ची के साथ रेप की सनसनीखेज घटना 2019 में उजागर हुई थी। बच्ची की माँ ने पुलिस में अपने रिश्तेदारों के खिलाफ बयान दिया था और अपने ही कई रिश्तेदारों समेत 16 लोगों पर अपनी दो बच्चियों के साथ रेप करने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि उसके रिश्तेदार उनकी दोनों बेटियों से 2017 से ही रेप कर रहे थे।

उनके मुताबिक गुरुवार को उनकी छोटी बेटी पेट में दर्द के चलते काफी देर तक बाथरूम में रही। जब उन्होंने आवाज दी तो कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। तब उन्होंने दरवाजा तोड़कर अंदर देखा जहाँ बच्ची को जमीन पर बेहोश पाया। उसे अचेत अवस्था में देखकर उन्होंने उसे तुरंत निजी अस्पताल में भर्ती करवाया। जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

यहाँ बता दें कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में लड़की की मौत के पीछे फ़ूड प्वॉइजनिंग को भी वजह बताया जा रहा है। लेकिन लड़की के साथ हुई हैवानियत को देखते हुए बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट कुछ नहीं कहा जा सकता।

खबर के अनुसार कुछ साल पहले बच्ची की माँ ने पति को छोड़कर अपने सहकर्मी से शादी कर ली थी। इसके बाद वो चेन्नई में रहने लगी और बच्ची अपनी नानी के घर। लेकिन, साल 2018 में बच्चियों की शिकायत सुनने के बाद वह दोनों बेटियों को अपने पास चेन्नई ले आई। मगर, यहाँ आकर बच्ची की माँ ने इस बारे में पुलिस में शिकायत नहीं की। आरोप है कि जब दोनों लड़कियों ने इस मामले पर बात शुरू की तो उन्हें उनकी माँ ने मारा।

एक खबर के मुताबिक, लड़की के साथ हैवानियत का खुलासा तब हुआ जब लड़की के जख्म स्कूल की टीचर ने देखे। टीचर ने ही बच्ची से उसके जख्मों के बारे में सवाल किया और सारी बात जानने के बाद चाइल्डलाइन को सूचित किया। इसके बाद ही पुलिस इस मामले पर अलर्ट हुई। बता दें, जिस समय लड़की की मौत हुई वो अपनी माँ और सौतेले पिता के साथ ही थी। मृतक बच्ची के सौतेले पिता का कहना है बच्ची बड़ी होकर पुलिस अधिकारी बनना चाहती थी।

15 साल की लड़की को वेश्यावृति में धकेला, 5 ने किया गैंगरेप: सबीना, मुबीना और निशा गिरफ्तार

48 वर्षीय बाप ने अपनी ही 12 साल की बेटी का किया रेप, छत्तीसगढ़ फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने दी दोहरी उम्रकैद की सजा

इस्लामी आतंकियों ने चर्च में अँधाधुँध बरसाई गोलियाँ: पादरी समेत 24 की मौत, कई अगवा

इस्लामिक आतंकवाद से पीड़ित अफ्रीकी देश बुर्किना फासो में हमले में 24 लोगों की मौत हो गई। आतंकियों ने एक चर्च में अंधाधुंध गोलियॉं बरसा इस घटना को अंजाम दिया। मृतकों में पादरी भी है। हमले में 18 अन्य जख्मी हो गए। हमला बुर्किना फासो के उत्तरी इलाके के एक गाँव के प्रोटेस्टेंट चर्च पर किया गया। क्षेत्रीय गवर्नर ने मीडिया से बातचीत में सोमवार यह जानकारी दी। सुरक्षा कर्मियों ने बताया कि हमला रविवार को एक साप्‍ताहिक सेवा समारोह के दौरान हुआ।

कर्नल सल्फो कबोरे के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि हमले में पादरी समेत 24 लोगों के मरने और 18 लोगों के घायल होने की खबर है। कर्नल ने बताया, “हथियारबंद आतंकी याघा प्रोविंस के पांसी नामक गाँव में घुसे और शांतपूर्ण लोगों पर हमला कर दिया।”

दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक बुर्किना फासो जिहादी आतंक से बुरी तरह प्रभावित है। यहाँ 2015 से अब तक 750 लोग मारे जा चुके हैं। करीब 600,000 लोगों को मजबूरन घर छोड़ भाग जाना पड़ा। बुर्किना फासो के उत्तरी इलाके में लगातार ईसाई आबादी और चर्चों को जिहादी आतंकी निशाना बनाते रहते हैं। चर्चों और उनके घरों को आग के हवाले कर देते हैं। यूएन के अनुसार जिहादी आतंकी हमलों में पिछले वर्ष बुर्किना फासो और पड़ोस के नाइजर, माली में 4,000 लोगों की मौत हुई थी।

उत्तरी बुर्किना फासो के लाम्दामोल गाँव में 02 फरवरी को आतंकियों ने घंटों कहर बरपाया था। मोटरसाइकिलों पर आए सशस्त्र आतंकियों ने गाँव में घुसते ही लोगों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाते हुए निकल गए। इस हमले में 20 लोगों की मौत हो गई थी। एक अधिकारी ने बताया था कि आतंकियों ने स्थानीय लोगों से कुछ दिन पहले इलाका खाली करने को कहा था। इसके बाद हमलावरों ने घटना को अंजाम दिया। उससे पहले सोम प्रांत में 25 जनवरी को हुए हमले में 39 लोग मारे गए थे।

सैन्य शिविर पर हमले में 25 लोगों की मौत, 63 आतंकवादी भी मार गिराए गए: रक्षा मंत्रालय

5 साल का सबसे बड़ा हमला: अरबिंदा में 35 की मौत, जवानों ने 80 आतंकी भी मार गिराए

ट्रेन की एक सीट पर हिंदू देवी-देवता को जगह देना एहसान नहीं… यह होना चाहिए, यही वक्त की माँग है

काशी महाकाल एक्सप्रेस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हरी झंडी दिखाई जाने के बाद कई तथाकथित सेकुलरों में कुलबुलाहट है। ओवैसी जैसे कट्टरपंथी नेता इस ट्रेन की एक सीट पर शिव भगवान का मंदिर स्थापित किए जाने को लेकर नाराज हैं। साथ ही संविधान की प्रस्तावना ट्वीट करके पीएम मोदी का ध्यान इस बात पर केंद्रित करवा रहे हैं कि जब संविधान में सभी धर्मों को बराबर रूप से समानता है तो फिर ट्रेन में भगवान के लिए अलग से जगह क्यों? हालाँकि IRCTC ने स्पष्ट कर दिया है कि भगवान शिव के लिए कोई भी सीट रिजर्व नहीं है। फिर भी अब ओवैसी की तरह सोशल मीडिया पर भी कई यूजर इस मामले पर सवाल उठा रहे हैं और इस फैसले को मोदी सरकार द्वारा भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने की ओर एक कदम कह रहे हैं।

अब प्रश्न है कि क्या वाकई तीर्थ स्थानों को एक दूसरे से जोड़ने वाली एक्सप्रेस ट्रेन में हिंदू देवी-देवताओं को एक सीट पर स्थान देने से किसी अन्य धर्म को ठेस पहुँच रही है या फिर क्या सच में इस एक कदम से किसी समुदाय को नीचा दर्शाने का प्रयास हो रहा है?

तो, जरा इन बिंदुओं पर गौर डालिए और समझिए कि ट्रेन में देवी-देवताओं के लिए मंदिर की स्थापना का ये पहला वाकया है। जिसको देखकर ये तथाकथित सेकुलर लोग आहत हो गए हैं। लेकिन यहाँ बता दें शिव भगवान की प्रतिमा की स्थापना एक ऐसे ट्रेन में की गई है, जो हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों को एक साथ जोड़ रही है न कि किसी सामान्य ट्रेन में।

मगर, संविधान की उलाहना देने वालों के लिए इस बिंदु का कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे लोग तब कभी सवाल करते नहीं देखे जाते कि आखिर क्यों धार्मिक भावना को ठेस न पहुँचाए जाने के नाम पर पटरियों पर नमाज पढ़ने वालों को बर्दाशत किया जाता है। क्यों राज्य सरकारें एक धर्म विशेष को अल्पसंख्यक श्रेणी में रखकर बढ़ावा देती है? क्यों कभी इनके ख़िलाफ़ एक्शन नहीं लिया जाता और लिया जाता भी है तो उसके राजनीतिक पहलूओं को ध्यान में रखा जाता है?

आज तक देश के तथाकथित सेकुलरिज्म को संरक्षित करने के लिए कई राज्यों में ईसाई धर्म और इस्लाम मजहब को बढ़ावा दिया जाता रहा है। लेकिन कभी किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाए। मगर एक हिंदू देवता को ट्रेन की एक सीट पर जगह क्या दी गई, सबने संविधान की तस्वीरें अपलोड करनी शुरू कर दीं। मेरे विचार से तीर्थ संबंधी इस ट्रेन के लिए IRCTC को निश्चित तौर पर एक सीट भगवान शिव के लिए रिजर्व रखनी चाहिए। और क्यों नहीं? क्योंकि इसी देश की पिछले साल की कुछ खबरों पर नजर डालिए और अनुमान लगाइए क्या इन सबके बीच कभी हिंदुओं के लिए कुछ हुआ?

  • तेलंगाना सरकार ने पिछले साल केवल क्रिसमस मनाने के लिए 200 चर्चों को एक-एक लाख रुपए दिए। वहीं कर्नाटक सरकार भी समय समय पर चर्च पर करोड़ों खर्च करती रही।
  • जगन मोहन रेड्डी ने पिछले साल ही अपने राज्य में पादरियों को हर महीने 5000 रुपए देने की घोषणा की। हालाँकि भाजपा ने इसे हिंदुओं के ख़िलाफ भी बताया। लेकिन जगन मोहन रेड्डी इस पर कायम रहे।
  • इसके अलावा देश की राजधानी में खुलेआम एक विशेष मजहब को ध्यान में रखते हुए मौलवियों की पगार निर्धारित हुई। लेकिन हिंदू मंदिर के पंडितों पर हमेशा निशाना साधा जाता रहा।

इसके अलावा कई ऐसी खबरें आई। लेकिन कभी इन पर किसी ने प्रश्नचिह्न नहीं लगाया। बहुसंख्यक कह-कहकर हिंदुओं को, उनकी प्रथाओं को, उनसे जुड़ी सभ्यताओं को दबा डालने का जैसे एक दौर चल पड़ा है। जिसमें उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष होने का सीधा पर्याय केवल हिंदू विरोधी होना परिभाषित कर दिया गया है।

विचार करिए, आज देशभर के बड़े हिंदू मंदिरों में चढ़ावे का करोड़ों रुपया रोज़ सरकारी ख़ज़ाने में जाता है। इसका बड़ा हिस्सा मस्जिदों और चर्च को दिया जाता है। राज्यों के धर्मार्थ विभाग कमाते तो मंदिरों से हैं, लेकिन उससे हज हाउस बनवाते हैं। ये वही पैसा है, जिससे मस्जिदों के इमामों को सैलरी दी जाती है। अगर उस करोड़ों की कमाई के बदले में सरकार किसी हिंदू देवी-देवता को ट्रेन में एक सीट दे रही है तो एहसान नहीं कर रही।

IRCTC ने कहा- महाकाल एक्सप्रेस में भगवान शिव के लिए सीट रिजर्व नहीं: ओवैसी ने उठाए थे सवाल

महाकाल एक्सप्रेस में महादेव को देख ओवैसी की सुलगी, लोगों ने कहा- एकतरफा सेकुलरिज्म नहीं चलेगा

घुसपैठियों के समर्थन में आए ‘विभिन्न पदार्थों का सेवन करने वाले’ नसीर, शिक्षा बजट पर बोला झूठ

फ़िल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह चर्चा में बने रहे के लिए अक्सर उलूलजुलूल बातें करते रहते हैं। जब सीएए और एनआरसी के विरोध की हवा में दीया मिर्ज़ा और सुशांत सिंह सरीखे बेरोजगार अभिनेता-अभिनेत्रियों को भी मीडिया से कवरेज मिलने लगी, तब बेचैन नसीरुद्दीन शाह ने अपनी ही इंडस्ट्री के साथी अनुपम खेर को जोकर बता दिया। वजह, खेर ने सीएए का समर्थन किया था। हालाँकि, अनुपम खेर ने नसीरुद्दीन के बारे में बड़ा खुलासा कर दिया कि वो वर्षों से ‘विभिन्न पदार्थों का सेवन’ करते रहे हैं।

ऐसे ही नसीरुद्दीन शाह ने प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ को दिए इंटरव्यू में आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने शिक्षा बजट में 30,000 करोड़ रुपए की कटौती की है। हालाँकि, ये झूठ है क्योंकि 2018-19 में शिक्षा बजट के हिस्से 85,010 करोड़ रुपए आए थे, जो अगले वर्ष बढ़ कर 94,000 करोड़ रुपए हो गया। अबकी 2020-21 वार्षिक बजट में ये आँकड़ा बढ़ कर 99,300 करोड़ रुपए हो गया है। फिर मोदी सरकार ने शिक्षा बजट में कब कटौती की, ये नसीरुद्दीन शाह ही बता सकते हैं।

साथ ही नसीरुद्दीन शाह ने ने दावा किया कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार सिर्फ़ इस्लामिक मुल्कों में ही नहीं होता, बल्कि श्रीलंका और म्यांमार जैसे देशों में भी होता है। इस सम्बन्ध में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले ही बता चुके हैं कि भारत में रह रहे तमिल शरणार्थियों की रक्षा के लिए पूरी व्यवस्था की जा रही है और किसी को भी बाहर नहीं निकाला गया है। विभिन्न कैम्पों में रह रहे 65,000 तमिल शरणार्थियों के लिए सरकार सही समय पर घोषणा करेगी, इसका आश्वासन भी दिया जा चुका है। फिर नसीरुद्दीन शाह किसके लिए चिंतित हैं?

साथ ही नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि उनके पास पासपोर्ट, वोटर आईडी और आधार कार्ड जैसे जो कागज़ात हैं, वो उनकी नागरिकता साबित करने के लिए काफ़ी नहीं होंगे। यहाँ सवाल ये उठता है कि नसीरुद्दीन से नागरिकता साबित करने को कहा किसने है? न तो वो असम के हैं और न ही पूरे देश में एनआरसी आई है। असम में भी 14 डॉक्यूमेंट्स की सूची में से कोई एक डॉक्यूमेंट और फिर दूसरी सूची के अन्य डॉक्यूमेंट्स की सूची में से कोई एक, यानि सिर्फ़ 2 कागज़ ही दिखाने हैं। लेकिन, नसीर तो असम के हैं ही नहीं। फिर वो यहाँ 70 साल गुजारने और पर्यावरण व समाज की सेवा करने की बातें कर के क्या जताना चाहते हैं?

नसीरुद्दीन ने आरोप लगाया कि अमित शाह कीड़े और दीमकों को एक-एक कर देश से बाहर निकालने की बातें करते हैं। गृहमंत्री घुसपैठियों को निकाल बाहर करने की बात करते हैं, तो इससे नसीरुद्दीन को क्या दिक्कत है? वो तो घुसपैठिए नहीं हैं। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि पीएम मोदी कभी विद्यार्थी नहीं रहे हैं, इसीलिए उन्हें छात्रों की संवेदना का पता नहीं। पहली बात, पीएम ने ऐसा कभी नहीं कहा है कि वो विद्यार्थी नहीं रहे हैं, इसलिए ये बात ही झूठ है। दूसरी बात, अगर इसी लॉजिक के हिसाब से देखें तो नसीरुद्दीन शाह तो कभी कोई वकील, जज या क़ानूनविद रहे ही नहीं हैं, फिर उन्हें कैसे पता कि सीएए ग़लत है?

‘द वायर’ में नसीरुद्दीन शाह का इंटरव्यू: झूठ और प्रपंच का पुलिंदा

उन्होंने दावा किया कि सीएए विरोधी आंदोलन का कोई नेता नहीं है। अगर ऐसा है तो फिर देश के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने के लिए समुदाय विशेष को भड़काने वाला शरजील इमाम कौन था, जिसके गिरफ़्तार होते ही शाहीन बाग़ के उपद्रवियों का जोश जाता रहा? नसीरुद्दीन ने फ़िल्म इंडस्ट्री पर सत्ताधारी दलों का साथ देने का आरोप लगाया। लेकिन, महाराष्ट्र में तो शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस की सरकार है और ये तीनों दल भाजपा के विरोधी हैं। तो क्या मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री को कॉन्ग्रेस का गुलाम माना जाए?

नसीरुद्दीन ने इस इंटरव्यू और और भी कई फालतू बातें की। मसलन उन्होंने आरोप लगाया कि युवाओं को विरोध करने की सज़ा गोली मार कर दी जाती है। जबकि सच्चाई ये है कि 55 पुलिसकर्मी पूरे यूपी में सिर्फ़ सीएए विरोधियों की हिंसा के कारण घायल हुए। वो गोलियाँ किन लोगों ने चलाई थी?

‘आओ मिलकर हम बढ़ें, अधिकार अपने छीन लें’ – नसीरुद्दीन शाह ने CAA विरोधी प्रदर्शन की आग को दी हवा

नसीरुद्दीन शाह की बेटी बिल्लियों की नसबंदी कराने गईं, लेकिन अस्पताल में करने लगीं मारपीट, FIR दर्ज

अनुपम खेर जोकर है, मनोरोगी है, मुझे मुस्लिम होने का अहसास कराया जा रहा: नसीरुद्दीन शाह

14 साल बाद BJP में लौटे बाबूलाल मरांडी: झारखंड के पहले सीएम ने 2006 में बना ली थी अपनी पार्टी

झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और एक समय में प्रदेश की राजनीति का कद्दावर चेहरा रहे बाबूलाल मरांडी की सोमवार (फरवरी 17, 2020) को ‘घर वापसी’ हो गई। मरांडी ने अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (JVM) का भारतीय जनता पार्टी में विलय कर दिया। मरांडी ने यह फैसला इसी महीने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात के बाद लिया था। सोमवार को राँची में एक कार्यक्रम के दौरान मरांडी ने विलय की औपचारिक घोषणा की। इस अवसर पर गृहमंत्री अमित शाह भी मौजूद थे। उन्होंने मरांडी का पार्टी में स्वागत किया।

शाह ने कहा, “मुझे खुशी है कि बाबूलाल मरांडी बीजेपी में लौट आए हैं, मैं 2014 से उनकी वापसी के लिए काम कर रहा था।” उनकी घर वापसी को लेकर झारखंड की राजधानी राँची में विशाल कार्यक्रम आयोजित किया गया। बीजेपी ने इसे मिलन समारोह का नाम दिया। मरांडी ने बीजेपी में शामिल होने के बाद कहा कि उन्हें पद की लालसा नहीं है और वे पार्टी के लिए झाड़ू लगाने को भी तैयार हैं।

बाबूलाल मरांडी ने अमित शाह को धन्यवाद दिया और उपस्थित सभी लोगों का आभार जताते हुए कहा, “आज पार्टी में मेरा जिस तरह से बाँहें फैला कर स्वागत किया गया, उसके लिए मैं सबका आभार प्रकट करता हूँ। मैं आज पार्टी में आया हूँ तो किसी पद के मोह में नहीं आया हूँ। मुझे पार्टी जो भी जिम्मेदारी देगी मैं उसे स्वीकार करूँगा। मैं एक आम कार्यकर्ता की तरह काम करूँगा। पार्टी अगर मुझे झाड़ू लगाने का काम भी मुझे देगी तो मैं उसे करूँगा।”

इस दौरान शाह ने कहा कि लोग चर्चा करते हैं कि बीजेपी झारखंड में चुनाव हार गई। लेकिन बीजेपी का लक्ष्य सरकार बनाना नहीं है, बल्कि राष्ट्र और समाज का निर्माण करना होता है। इस लक्ष्य के लिए हमलोग सालों विपक्ष में रहे हैं। वहीं मरांडी ने अपने संबोधन में हेमंत सरकार पर जमकर हमला बोला और कहा कि प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब है, लोगों की हत्याएँ हो रही है, लेकिन सरकार बेखबर है।

बता दें कि बाबूलाल मरांडी ने 2006 में बीजेपी से अलग होकर झारखंड विकास मोर्चा के नाम से नई पार्टी का गठन किया था। हालाँकि उनकी पार्टी का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा। 2009, 2014 और 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में पार्टी को क्रमशः 11, 8 और 3 सीटों पर जीत मिली।

मोबाइल चोरी पर हल्ला मचाया, लूटेरे इब्राहिम शेख ने चलती ट्रेन से बाहर खींच लिया, अस्पताल में…

बीते शुक्रवार को नानावती अस्पताल में काम करने वाले 32 वर्षीय संतोष कुमार मौर्य को काम पर जाते वक्त अँधेरी स्टेशन पर चलती हुई लोकल ट्रेन से, एक लुटेरे ने मोबाइल लूटने की कोशिश में प्लेटफॉर्म पर खींच लिया। चेहरे के बल गिरे संतोष को इस हादसे में कई चोटें आईं हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार प्लेटफॉर्म पर मौजूद पब्लिक ने लुटेरों में से एक 26 वर्षीय मो. इब्राहिम शेख को मौके से धर दबोचा, जिसे बाद में पुलिस के हवाले कर दिया गया। जबकि उसका साथी मौके से भागने में कामयाब हो गया। इब्राहिम शेख मुंबई के नालसोपाड़ा का रहने वाला है।

नालसोपाड़ा के ही रहने वाले मौर्या जो विलेपार्ले के नानावती अस्पताल में भर्ती हैं, घटना को याद करते हुए कहते हैं, “मैं लगभग 10 बजे अँधेरी स्टेशन पर फ़ास्ट लोकल से उतर विले पार्ले के लिए स्लो लोकल में बैठा ही था कि किसी ने चोर-चोर का हल्ला किया, यह सुनते ही मैंने अपना फोन तलाशा, जो गायब था… मैंने देखा कि उसने मेरा फोन लिया हुआ था, मैंने उसे कॉलर से पकड़ लिया, इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, वह ट्रेन से कूद गया और साथ में मुझे खींच ले गया।”

बाद में मीडिया को पुलिस ने बताया कि इब्राहिम शेख नामक यह शख्श आदतन अपराधी है, तथा इसका साथी 48 साल का मो.अयूब शेख अभी फरार है।