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पुलवामा आतंकी था धोनी का फैन, बेचारे के शरीर का एक टुकड़ा भी नहीं मिला: HT ने लगभग दी श्रद्धांजलि!

भारतीय मीडिया और आतंकवादियों से उनकी संवेदना कोई नई बात नहीं है। अक्सर हम देखते हैं कि मीडिया में बैठे हुए कुछ बुद्धिजीवी आतंकवादियों की प्रोफाइलिंग करते हुए उन्हें इस तरह से पेश करते हैं, ताकि उनके कारनामों पर मानवता की एक परत चढ़ जाए। इससे पहले प्रोपेगेंडा पत्रकार बरखा दत्त को आतंकी बुरहान वाणी की प्रोफाइलिंग करते हुए देखा गया था।

बरखा दत्त की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए हिन्दुस्तान टाइम्स की पत्रकार हरिंदर बावेजा ने पुलवामा आतंकी हमले के ठीक एक साल पूरे होने पर इस हमले के मुख्य अभियुक्त आदिल अहमद डार के कारनामे पर पर्दा डालने का ‘बौद्धिक’ प्रयास किया है।

हरिंदर बावेजा द्वारा लिखे गए इस लेख का शीर्षक है- “Apathy forced him to opt for violence, says Pulwama bomber’s family” जिसका आशय यह है कि उपेक्षा ने पुलवामा के आतंकी हमलावर को यह कदम उठाने पर मजबूर किया।

शीर्षक से ही स्पष्ट होता है कि इस लेख में पुलवामा आतंकी को क्लीन चिट देने की पूरी कोशिश की गई होगी। लेकिन फिर भी, बिना किसी पूर्वग्रह के इस लेख को पढ़ने से पता चलता है कि यह पूरा लेख और कुछ नहीं बल्कि एक और आतंकवादी को अगला युगपुरुष साबित करने का प्रयास है।

इस लेख में हरिंदर बावेजा ने बताया है कि अहमद डार की माँ से बातचीत में उसे पता चला कि उसे क्रिकेट बहुत पसंद था और वह भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का प्रसंशक था। यह भी बताया गया है कि अहमद डार कभी भी गाड़ी ज्यादा दूर तक नहीं ले जाता था क्योंकि उसके पास लाइसेंस नहीं था।

हैरानी की बात यह है कि इस कॉलम की लेखिका हरिंदर बावेजा के अनुसार फिदायीन आतंकी अहमद डार अगर नियम-कानून का इतना रखवाला था तो फिर वो एक दिन अचानक से विस्फोटकों से भरी हुई गाड़ी लेकर सीआरपीएफ के 40 जवानों से भरी गाड़ी से कैसे टकरा जाता है?

लेख में बताया गया है कि अहमद डार के पिता ने कहा कि वो भारतीय क्रिकेट टीम की जीत पर हमेशा जश्न मनाता था, भले ही हर कोई यही मानता है कि कश्मीरी पाकिस्तान की जीत से खुश होते हैं।

लेकिन अगर यह आतंकी अहमद डार भारतीय क्रिकेट और एमएस धोनी का इतना ही बड़ा समर्थक था, तो उसने उस भारतीय सुरक्षा बलों पर हमला करने का फैसला आखिर कैसे कर लिया, जिसके साथ डार के प्रिय क्रिकेटर धोनी अपना समय बिताते हैं। एमएस धोनी को 2011 में लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद रैंक मिली थी। लेकिन धोनी के चरित्र और सेना के प्रति उनके प्रेम को फिदायीन आतंकी क्यों नहीं अपना पाया, यह प्रश्न करना शायद हिन्दुस्तान टाइम्स की स्तम्भकार भूल गई।

लेखिका का कहना है कि अहमद डार के पिता ने बताया कि 22 साल का अहमद डार फिर कभी क्रिकेट प्रेमी नहीं रह पाया और उसने गत 14 फरवरी को भारतीय सुरक्षा बलों पर हमला कर दिया, इस हमले में जितने सैनिक मारे गए, इतने घाटी के इतिहास में पहले कभी एक ही हमले में नहीं मारे गए थे। लेख में बड़े ही पीड़ादायक शब्दों में बताया गया है कि 40 जवानों को मारने के बाद अहमद डार के शरीर का कुछ भी हिस्सा उसके घर वालों को नहीं मिल पाया।

अहमद डार के पिता के शब्दों को अगर स्तम्भकार हरिंदर बावेजा ने शब्दशः वास्तव में लिखा है तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि ये एक दुखी या मायूस नहीं बल्कि एक जिहादी के गौरवान्वित पिता के शब्द थे। क्योंकि लेखिका का कहना है कि अहमद डार के इस विस्फोट से पहले मार्च 2018 में जैश-ए-मोहम्मद में शामिल होने के बारे में उसके घर वालों को मालूम था।

इस लेख में आगे बताया गया है कि कैसे बेहद नाटकीय ढंग से सेना द्वारा कश्मीरी पत्थरबाजों को सजा देने और आतंकी बुरहान वाणी की मौत जैसी घटनाओं ने आदिल डार को धीरे-धीरे बदल दिया था।

इस पूरे लेख में आदिल अहमद डार की भाभी का बयान सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है। हिन्दुस्तान टाइम के इस लेख में बताया गया है कि फिदायीन आतंकी आदिल डार के ही परिवार से तीन लोग आतंकी समूहों से जुड़ चुके हैं। जिनमें से एक उसके चाचा का लड़का था, जिसने कि 2016 में ही घर छोड़कर लश्कर-ए-तैयबा ज्वाइन किया था और मारा गया था। दूसरा आदिल का भाई था, जो कि जेल में था और आदिल की मौत के बाद ही बाहर आया था और तीसरा खुद पुलवामा हमले का आतंकी आदिल अहमद डार था।

आदिल की भाभी का कहना है कि उसका पति भी आतंकी संगठन से जुड़ने की बात करता है लेकिन वह यह कहकर उसे मना कर देती है कि उनका बेटा ऐसा करेगा क्योंकि वो आजादी के लिए लड़ रहे हैं और उन्हें यह काम करना ही होगा।

अहमद डार की भाभी का बेटा ‘मंजूर’, अभी मात्र तीन साल का है। इस तरह की आजादी और लड़ने की बातें हाल ही में हम शाहीन बाग़ में चल रहे प्रदर्शन में भी देख चुके हैं। शाहीन बाग़ में एक नवजात बच्चे की मौत पर उसकी माँ का भी कुछ ऐसा ही कहना था। उसकी माँ ने कहा था कि उसका बेटा अल्लाह के लिए मर गया, अल्लाह ने ही उसे भेजा और उसने बुला भी लिया।

इस तरह की ‘आजादी’ के जज्बे का एक ही आशय होता है और वह है जिहाद! इस धार्मिक युद्ध की प्रेरणा के लिए कश्मीर में मौजूद कुछ लोग आज भी कितनी तत्परता से कूदने के लिए तैयार हैं, अहमद डार के परिवार के बयानों से इस बात का जायजा लगाया जा सकता है।

ऐसे में, बरखा दत्त और हिन्दुस्तान टाइम के स्तम्भकाओं द्वारा फिदायीन आतंकियों की जिंदगी को बेहद नाटकीय ढंग से प्रस्तुत कर के सिर्फ जिहाद और धर्म युद्ध जैसे विषयों का महिमामंडन किया जा रहा होता है। मीडिया के कुछ चुनिंदा लोगों की संवेदना आतंकवादियों से निरंतर बनी रहती है।

इसी तरह से लेफ्टिस्ट इकोसिस्टम की ही एक टुकड़ी और प्रोपेगेंडा वेबसाइट दी क्विंट को कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन के लिए आँसू बहाते हुए भी देखा गया था।

सवाल यह उठता है कि यही मीडिया गिरोह उन सुरक्षा बलों के परिवार के साथ इतनी प्रतिबद्धता से क्यों नहीं खड़ी नजर आती है, जिन्हें एक फिदायीन हमले हिन्दू विरोधी धार्मिक नारों को दोहराकर मार दिया गया। यही मीडिया आज तक यह नहीं कह पाई है कि पूरा भारत देश आज भी गजवा-ए-हिन्द का सपना देख रहे धार्मिक जिहादियों और इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर है।

ऐसे में आतंकवादियों की हरकतों को कोसना तो दूर, यह मीडिया के लोग आतंकवादियों के एक ‘आम आदमी’ से आतंकवादी बनने की घटना का बेहद फ़िल्मी तरीके से महिमामंडन करते नजर आते हैं। आतंकवादियों से अलग यह अपना एक अलग किस्म का बौद्धिक जिहाद चला रहे होते हैं, जिनका पहला संघर्ष सामान्य विवेक और तर्क क्षमता से नजर आता है।

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गार्गी कॉलेज मामला: CCTV में नहीं दिखा कोई भगवा झंडा, जय श्रीराम का प्रपंच हुआ फुस्स

दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में पिछले दिनों छात्राओं से हुई छेड़छाड़ के मामले में दिल्ली पुलिस ने एक अहम बयान जारी किया है। दिल्ली पुलिस ने मामले में जानकारी देते हुए बताया है कि घटना के बाद से लगातार मीडिया हाउसों और सोशल मीडिया के माध्यम से दावा किया जा रहा था कि गार्गी कॉलेज की छात्राओं के साथ छेड़छाड़ करने वाले लोग भाजपा के गुंडे थे, जोकि हाथों में भगवा झंडे लिए हुए थे, लेकिन अभी तक सामने आई सीसीटीवी फुटेज में इस तरह की कोई तस्वीर सामने नहीं आई है।

इस बात की पुष्टि करते हुए डीसीपी दक्षिण दिल्ली अतुल ठाकुर ने बताया कि अब तक सीसीटीवी फुटेज में भगवा झंडे, या किसी भी तरह के झंडे पकड़े हुए लोग कहीं भी दिखाई नहीं दिए हैं। वहीं अतुल ठाकुर ने आगे कहा कि अभी तक की जाँच से यह पता नहीं चल सका है कि आरोपी किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं या नहीं, लेकिन सभी आरोपित या तो कॉलेज के छात्र हैं या फिर उनके दोस्त हैं।

मीडिया में इस मामले से संबंधित जितनी भी रिपोर्ट्स दिखाई गई, वह सभी एक इंस्टाग्राम हैंडल iawaken.in द्वारा अपलोड किए गए पोस्ट के आधार पर थीं। इसमें कहा गया था, “बीजेपी के गुंडे कैंपस के अंदर भगवा झंडे के साथ जय श्री राम का नारा लगा रहे थे।” इंस्टाग्राम हैंडल से ली गई इस पोस्ट में यह भी कहा गया था कि उन्होंने कॉलेज की लड़कियों के सुरक्षित स्थान को नष्ट कर दिया है, क्योंकि गार्गी कॉलेज एक महिला कॉलेज है, इसलिए यहाँ उनका दबदबा रहा है, लेकिन अब वो छीन लिया गया। वहीं इस पोस्ट का श्रेय @fuckbjp नाम के एक ट्विटर हैंडल को दिया गया था।

जब इस ट्विटर हैंडल की जाँच की गई तो @Fuckbjp नाम का अकाउंट बंद पाया गया। वहीं उक्त इंस्टाग्राम हैंडल से भी इस पोस्ट को हटा दिया गया है। वहीं इस मामले को NDTV के रवीश कुमार जैसे लोग अपना वामपंथी रंग देने में लगे हुए हैं। यह खुद गार्गी कॉलेज की छात्राओं ने स्वीकार किया है कि छात्राओं के साथ उत्पीड़न और बदसलूकी जरूर की गई लेकिन यह कहना एकदम बकवास है कि ऐसा करने से पहले धार्मिक नारे लगाए गए थे।

घटना के विरोध में गार्गी कॉलेज में छात्राओं का धरना प्रदर्शन अभी जारी है। इससे पहले दिल्ली पुलिस 10 आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है। साथ ही मामले का खुलासा करने के लिए दिल्ली पुलिस की 11 टीमें दिन-रात जाँच में लगी हुई हैं।

आपको बता दें कि गार्गी कॉलेज में आयोजित तीन दिवसीय वार्षिक फेस्ट का छह फरवरी को अंतिम दिन था। कुछ छात्राओं ने कॉलेज प्रशासन से छेड़छाड़ की शिकायत दी थी। उन्होंने बताया था कि कॉलेज परिसर में दोपहर को जबरन घुसे बाहरी लोगों ने छात्राओं के सामने अश्लील हरकत कर छेड़छाड़ की। इस घटना पर गुस्सा जाहिर करते हुए उन्होंने इसे सुरक्षा में भारी चूक करार दिया था। वहीं इसके बाद घटना को लेकर कॉलेज प्रशासन हरकत में आया और मामले में पुलिस से शिकायत की गई।

गार्गी कॉलेज यौन उत्पीड़न केस: पुलिस ने 10 छात्रों को किया गिरफ्तार, जाँच के लिए बनाई 11 टीमें

गार्गी कॉलेज में छेड़-छाड़ जरूर हुई, लेकिन धार्मिक नारों की बात सिर्फ वामपंथी मीडिया की करामात है

चिदंबरम टोटल कनफ्यूज! सीनियर कॉन्ग्रेसी नेता ने की टिप्पणी, NPR को लेकर पार्टी में घमासान शुरू

गुरुवार (फरवरी 13, 2020) को जेएनयू के साबरमती हॉस्टल के बाहर NSUI की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में पूर्व वित्त मंत्री और कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता पी चिदंबरम के NPR पर दिए गए बयान के बाद पार्टी के बीच बहसबाजी का दौर शुरू हो गया है। चिदंबरम के बयान पर कॉन्ग्रेस नेता संजय निरुपम ने उन्हें टोटल कन्फ्यूज बताया।

दरअसल चिदंबरम ने कहा था कि अगर सभी राज्य के लोग NPR के खिलाफ लामबंद हो जाएँ और राज्य सरकारें फैसला कर लें कि इसको लागू नहीं किया जाएगा, तो यह विफल हो जाएगा। राज्यों के सहयोग के बिना NPR को लागू नहीं किया जा सकता है।

इस पर संजय निरुपम ने चिदंबरम को आड़े हाथों लेते हुए ट्वीट किया, “टोटल कन्फ्यूजन! पी चिदंबरम चाहते हैं कि NPR का विरोध हो। इसके लिए उन्होंने जेएनयू के छात्रों को कुछ टिप्स दिए हैं। वहीं, महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने एक मई से 15 जून के बीच NPR कराने का ऐलान किया है। महाराष्ट्र की सत्ता में कॉन्ग्रेस पार्टी शिवसेना की साझेदार है। क्या दिल्ली में कॉन्ग्रेस नेतृत्व को इसकी जानकारी है?”

चिदंबरम ने जेएनयू के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा था कि NPR, NRC और CAA तीनों अलग हैं लेकिन तीनो इंटरकनेक्टेड है, संविधान में नागरिकता का प्रावधान है और पूरे विश्व में हर जगह देश के अंदर रहने वाले नागरिकों को नागरिकता का प्रावधान होता है। अगर किसी के पिता, ग्रैंड पेरेंट्स इंडिया में रह चुके हैं तो उनके बच्चे यहीं के नागरिक होते हैं।

इसके साथ ही चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री पर तंज कसते हुए कहा था कि कुछ दिनों में जेएनयू का नाम मोदी यूनिवर्सिटी या फिर अमित शाह यूनिवर्सिटी हो सकता है। उन्होंने कहा कि सिटिजनशिप को टेरिटरी बेस की जगह रिलीजियस बेस पर दिया जा रहा है और कई देशों में धर्म के आधार पर नागरिकता दी जाती है। लेकिन भारत इस आधार पर नहीं बना था।

उन्होंने सवाल किया था कि अगर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान हमारे पड़ोसी हैं, तो क्या भूटान, म्यांमार, चीन, श्रीलंका और नेपाल हमारे पड़ोसी नहीं हैं? अगर अल्पसंख्यकों के रिलिजियस परसिक्यूशन पर ही नागरिकता दे रहे हैं, तो फिर पाकिस्तान के अहमदिया, म्यांमार के रोहिंग्या, तमिल हिंदू-तमिल मुस्लिमों के लोगों के बारे में क्यों नहीं सोच रहे?

अमीद, यूसुफ और इकबाल ने हज के नाम पर 50 लोगों को लगाया चूना, 1.1 करोड़ रुपए ठगे

मुंबई के तीन ट्रेवल एजेंटों के खिलाफ हज के नाम पर 1.1 करोड़ की ठगी का मामला सामने आया है। जानकारी के मुताबिक इन तीनों ने पिछले साल 50 लोगों को हज पर भेजने के नाम पर 1.1 करोड़ रुपए हड़प लिए। इसका खुलासा तब हुआ, जब 7 फरवरी 2020 को बेंगलुरू के आरटी नगर निवासी कारोबारी नूरुल्ला रहीम ने पुलिस से शिकायत की। उन्होंने मुंबई में आसरा एंटरप्राइजेज चलाने वाले अमीद हसन और यूसुफ हसन के साथ ही उसके एक स्टाफ इकबाल के खिलाफ मामला दर्ज कराया है।

शिकायत में नूरुल्ला ने कहा कि उसने और उसके रिश्तेदारों ने हज पर जाने की योजना बनाई थी। इसके लिए जनवरी 2019 में उन्होंने आरोपितों से संपर्क किया था। नूरुल्ला ने बताया कि आरोपित का नंबर उसे ऑनलाइन मिला था।

एक पुलिस अधिकारी ने बताया, “नूरुल्ला को आरोपितों ने कहा कि वे उसे और उसके 49 रिश्तेदारों को हज पर भेज सकते हैं। इसके लिए उन्होंने प्रति व्यक्ति 3.2 लाख रुपए का खर्च बताया। नूरुल्ला ट्रैवल एजेंट की बातों से सहमत हो गया और उसने मुंबई के आसरा एंटरप्राइजेज ऑफिस में कूरियर के माध्यम से 50 पासपोर्ट भेजे। इसके साथ ही उसने फरवरी 2019 में एडवांस के तौर पर उसके बैंक अकाउंट में 6 हजार रुपए भी जमा कराए।”

पुलिस ने आगे बताया कि नूरुल्ला ने दावा किया है कि उसने और उसके रिश्तेदारों ने जनवरी से अगस्त 2019 के बीच कई किश्तों में कुल 1.1 करोड़ रुपए आरोपित के खाते में जमा कराए। नूरुल्ला ने अपनी शिकायत में कहा, “हाल ही में मैंने आरोपित से वीजा और एयर टिकट भेजने के लिए कहा। इस पर अमीद ने कहा कि वीजा और एयर टिकट जल्द ही हमारे पास पहुँच जाएँगे, लेकिन उन्होंने कूरियर के जरिए हमारा पासपोर्ट वापस कर दिया। इसके बाद जब हमने उनसे संपर्क करने की कोशिश की तो हमने पाया कि उनके फोन स्विच ऑफ थे।”

आरटी नगर पुलिस ने तीनों के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने 6 लाख रुपए का भुगतान बैंक ट्रांजेक्शन के माध्यम से किया था, जबकि बाकी की राशि नकद में दिए थे। पुलिस ने शिकायतकर्ता को मामले से संबंधित और भी डॉक्यूमेंट्स उपलब्ध कराने के लिए कहा है। एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “हम संदिग्धों को पूछताछ के लिए बुलाएँगे और उनके खिलाफ सबूतों के आधार पर कार्रवाई करेंगे। जाँच जारी है।”

दलितों ने नहीं अपनाया इस्लाम: ‘सूत्रों’ के हवाले से फर्जी खबर छाप कर टाइम्स ऑफ इंडिया फैला रहा प्रोपेगेंडा

स्वयं को निष्पक्ष और क्रांतिकारी पत्रकारिता कहकर खुद ही अपनी पीठ थपथपाने वाले मुख्यधारा की मीडिया का खोखलापन अक्सर सामने आता रहता है। इस बार मीडिया में यह कारस्तानी कोई और नहीं बल्कि देश के कुछ प्रमुख समाचार चैनल्स कर रहे हैं।

सनसनी के उद्देश्य से किसी भी काल्पनिक घटना को हवा देना कोई लिबरल और कथित निष्पक्ष मीडिया गिरोह से सीख सकता है। ‘प्रोपेगैंडा परमो धर्मः’ को अगर कोई चरितार्थ करता है तो वह हमारे देश की मुख्यधारा की मीडिया ही है।

दरअसल, हाल ही में इंडिया टुडे ने धर्मांतरण से जुड़ी हुई एक ऐसी घटना को प्रकाशित किया था, जिसका ऑपइंडिया दिसंबर में ही फैक्ट चेक कर उसे फर्जी ख़बर साबित कर चुका था। लेकिन भारतीय मीडिया और उसका अतिरेक के प्रति लगाव कोई नई बात नहीं है, खासतौर पर तब, जब यह हिन्दू धर्म के लोगों में जातिगत भेदभाव बढ़ाकर उनमें दरार डालने के उद्देश्य से प्रसारित की जा रही हो।

‘इंडिया टुडे’ के बाद इस फर्जी खबर को अब ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ द्वारा अपने समाचार पत्र में छापा गया है। ख़ास बात यह है कि इस खबर को सिर्फ छाप देने के उद्देश्य से ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ ने बेहद सावधानी से लेकिन मूर्खतापूर्ण तरीके से पेश किया है।

कुछ दिन पहले ही ‘द हिन्दू’ और ‘इंडिया टुडे’ जैसे नामी मीडिया संस्थानों ने कुछ महीने पुरानी फर्जी ख़बर दोबारा प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया है कि तमिलनाडु के कोयम्बटूर में दीवार गिरने से 17 दलितों की मौत के बाद 430 दलितों ने इस्लाम अपना लिया है। दिसंबर में धर्मान्तरण की यह फेक ख़बर ख़ूब शेयर हुई थी। उस समय इन समाचार पत्रों द्वारा 3,000 लोगों के मजहबी धर्मान्तरण के आँकड़े दिए जा रहे थे।

‘इंडिया टुडे’ ने संगठन ‘तमिल पुलिगल कच्ची’ के हवाले से लिखा कि 430 दलितों ने इस्लाम अपना लिया है और कई अन्य इसी राह पर हैं। साथ ही ये भी लिखा गया कि क्षेत्र के दलितों ने भेदभाव की बात कही है। कुछ दलितों के बयान भी प्रकाशित किए गए हैं।

आज के टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस फर्जी खबर को एक बार फिर से प्रकाशित किया है। TOI ने हेडलाइन में लिखा है- “Outfit claims several Dalits converted to islam” जिसका अर्थ है- “सूत्रों के अनुसार कुछ दलितों ने इस्लाम में धर्मांतरण किया।”

इस हेडलाइन के साथ ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने ‘सूत्रों का दावा’ जैसे अस्वीकरण को जोड़कर पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वो सिर्फ हवा में निशाना लगाने का प्रयास कर रहे हैं। मीडिया अक्सर इस तरह की कारस्तानी सस्ती चर्चा, बहस और लोकप्रियता कमाने के उद्देश्य से किया करती है। इनमें किसी भी चर्चा को हवा देकर प्रासंगिक बने रहने का सबसे आसान तरीका होता है कि खबर के साथ ‘सूत्र’ ‘मीडिया’ ‘रिपोर्ट्स’ जोड़ दिया जाए।

TOI की इस खबर को पूरा पढ़ने पर आप देखते हैं कि ‘हालाँकि, TOI इस दावे की पुष्टि नहीं कर पाया।’ आजकल यह ‘हालाँकि’ ही मुख्यधारा की निष्पक्षता का सबसे बड़ा हथियार बना हुआ है। इसी रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है कि तमिलनाडू के नाडूर गाँव में, जहाँ कि दीवारी ढह गई थी, किसी ने भी धर्मान्तरण नहीं किया है।

इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि नाडूर के ही लोगों ने कहा है- “हम भगवान पेरुमल में कट्टरता से विश्वास करते हैं और हिंदू धर्म नहीं छोड़ेंगे।”

इस फर्जी और मनगढ़ंत खबर में यह साबित करने की कोशिश की गई थी कि सवर्णों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद ही इन दलितों ने इस्लाम अपनाने और धर्मांतरण का फैसला लिया था। फर्जी रिपोर्ट्स में कहा गया कि तमिलनाडू के नाडूर गाँव के शिवसुब्रमन्यम ने अपने पड़ोस में दलितों का घर न हो, इसलिए बीचों-बीच एक दीवार खड़ी कर दी थी। लेकिन दिसंबर 02, 2019 को बीच की दीवार गिरने की वजह से 17 दलितों की जान चली गई थी।

रिपोर्ट्स इस तरह के दावे भी करती नजर आती है कि धर्मांतरण कर चुके लोग डर के कारण यह बात स्वीकार नहीं करते हैं, इसलिए धर्मान्तरण के दावे वाहियात बताए जा रहे हैं।

रिपोर्टिंग के इस पूरे हास्यास्पद प्रकरण से गुजरने के बाद एक बार सोचिए कि ‘द हिन्दू’ से लेकर ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ जैसे संस्थानों द्वारा इस प्रकार की एकदम मनगढ़ंत खबरों को सनसनी बना देने से पहले इस खबर की एक बार पुष्टि कर पाना कितना मुश्किल था?

जब ऑपइंडिया जैसा एक छोटा सा मीडिया संस्थान इस प्रकरण की तह तक जाकर इसकी वास्तविकता पता कर सकता था, तो फिर बड़े और ‘निष्पक्ष मीडिया’ संस्थानों के विश्वसनीय रिपोर्टर्स ने आखिर इस घटना की प्रमाणिकता सिद्ध करने के बजाए सब कुछ ‘सूत्रों के’ सिर क्यों आरोपित करना ही बेहतर समझा?

दिसंबर में फेक न्यूज साबित हुई खबर को इंडिया टुडे ने वापस चलाया: दलितों ने नहीं अपनाया इस्लाम

3000 दलित नहीं अपनाएँगे इस्लाम, सब भगवान राम के भक्त: गाँव वालों ने खोली फर्जी संगठन की पोल, करेंगे FIR

कॉन्ग्रेस पर ₹100 करोड़ की मानहानि का केस करेंगे सावरकर के पोते, उद्धव ठाकरे से भी कार्रवाई को कहा

वीर सावरकर के पोते रंजीत सावरकर ने महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के खिलाफ 100 करोड़ रुपए का मानहानि का केस दायर करने की बात कही है। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से भी कॉन्ग्रेस के खिलाफ कार्रवाई की अपील की है। रंजीत सावरकर बीते साल के आखिर में कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी की सार्वजनिक रूप से पिटाई करने की मॉंग भी उद्धव से की थी।

ताजा मामला महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस की मराठी भाषा की मासिक पत्रिका शिदोरी में छपे दो लेख से जुड़ा है। ​पत्रिका के फरवरी अंक में सावरकर पर दो लेख हैं। इनमें से एक लेख का शीर्षक ‘स्वातंत्र्यवीर नव्हे, माफीवीर’ (स्वातंत्र्यवीर नहीं, माफीवीर) और दूसरे का शीर्षक ‘अंधारातील सावकर’ (सावरकर के अनजाने पहलू) है। रंजीत सावरकर ने कहा है, “महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस ने सावरकर के चरित्र को धूमिल करने के लिए उनके खिलाफ आर्टिकल छापे। मैं सीएम से एक्शन लेने की अपील करता हूॅं। हमने कॉन्ग्रेस के खिलाफ दो केस दर्ज किए हैं और अब बॉम्बे हाई कोर्ट में कॉन्ग्रेस के खिलाफ 100 करोड़ रुपए की मानहानि का मुकदमा दर्ज करेंगे।”

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार पहले लेख में कहा गया है कि सावरकर से जुड़े जो तमाम दस्तावेज सामने आते हैं, उन्हें देखने के बाद वह स्वातंत्र्यवीर नहीं, बल्कि माफीवीर के रूप में सामने आते हैं। यह लेख मराठी की मासिक पत्रिका ‘साम्य योग साधना’ से लिया गया है। दूसरे लेख में सावरकर के जीवन से जुड़े कुछ बेहद निजी पहलुओं को रखा गया है।

इस साल की शुरुआत में मध्य प्रदेश के भोपाल में अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस सेवा दल के प्रशिक्षण शिविर में ‘वीर सावरकर’ नाम की पुस्तिका का वितरण करने का मामला सामने आया था। इस पुस्तिका में बीजेपी पर निशाना साधने के लिए सावरकर को टारगेट करते हुए उनके आसपास की कई घटनाओं, सवालों और विवादों का जिक्र है। विनायक दामोदर सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर कॉन्ग्रेस द्वारा जारी की गई विवादित पुस्तिका में दावा किया गया था, “महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के साथ हिंदू महासभा के सह-संस्थापक का शारीरिक संबंध थे।”

गौरतलब है कि दिसंबर में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली में राहुल गॉंधी ने ‘रेप इन इंडिया’ वाली टिप्पणी के लिए भाजपा की माफी की मॉंग पर पलटवार करते हुए कहा था, ‘‘संसद में भाजपा के लोगों ने कहा कि मैं अपने भाषण के लिए माफी मॉंगूॅं। मुझे कहते हैं कि सही बात बोलने के लिए माफी मॉंगो। मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं है, मेरा नाम राहुल गॉंधी है। मैं सच्चाई के लिए कभी माफी नहीं मॉंगूॅंगा। मर जाऊँगा मगर माफी नहीं मॉंगूॅंगा और न कोई कॉन्ग्रेस वाला माफी मॉंगेगा।’’ इसके जवाब में राहुल सावरकर ने कहा था, “यह अच्छा है कि राहुल गॉंधी, राहुल सावरकर नहीं हैं। ऐसा होता हम सबको अपना मुॅंह छिपाना पड़ता। अब हम उम्मीद करते हैं कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपना वादा निभाएँगे। वे कई बार कह चुके हैं कि यदि किसी ने सावरकर का अपमान किया तो वे उसे सार्वजनिक रूप से पीटेंगे। मैं उम्मीद करता हूॅं कि शिवसेना ने सावरकर पर अपना स्टैंड नहीं बदला होगा।”

कॉन्ग्रेस से गठबंधन के चलते CM उद्धव के पास वीर सावरकर के लिए समय नहीं, रंजीत सावरकर लौटे खाली हाथ

8 दिन के लिए जेल भेजी गई पायल रोहतगी, लोगों ने पूछा- सावरकर के अपमान पर राहुल गाँधी की गिरफ्तारी कब

MP में वीर सावरकर की फ़ोटो वाली कॉपियाँ बच्चों को बाँटने पर प्रधानाचार्य निलंबित, BJP ने कॉन्ग्रेस को घेरा

NDTV का प्रोपेगेंडा: बीजेपी को दागदार बताने के लिए ग्राफ में 39% को 81% से बड़ा दिखाया

यह जगजाहिर है कि ख़बरों के नाम पर धुर वामपंथी चैनल NDTV दर्शकों के सामने प्रोपेगेंडा पेश करता है। आए दिन खुद की झूठी खबरों के पकड़े जाने के बावजूद वह इस कारस्तानी से बाज नहीं आ रहा है। गुरुवार को एक कार्यक्रम के दौरान उसने आँकड़ों का ग्राफ गलत तरीके से पेश किया ताकि यह भ्रम पैदा हो कि सबसे ज्यादा दागी सांसद बीजेपी के हैं।

यह कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश पर था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि सभी राजनीतिक दलों को अब अपनी साइट और सोशल मीडिया एकाउंट पर आपराधिक नेताओं की प्रोफाइल अपडेट करनी होगी। इसे लेकर NDTV ने कुछ गेस्टों के साथ चर्चा की। कार्यक्रम के एंकर विष्णु सोम हैं। चर्चा में ADR इंडिया के संस्थापक प्रोफेसर जगदीप छोकर, पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, पूर्व सांसद कलिकेश नारायण सिंह देव और बीजेपी के विवेक रेड्डी शामिल थे। इसी दौरान एक ऐसा ग्राफिक दिखाया गया जिससे प्रतीत होता है कि अन्य दलों की तुलना में आपराधिक आरोपों वाले सबसे ज्यादा सांसद बीजेपी के हैं।

एडीआर के आँकड़ों के आधार पर जो ग्राफिक एनडीटीवी ने दिखाया उसमें पॉंच पार्टियों की तुलना की गई थी। इसमें बीजेपी, कॉन्ग्रेस, जदयू, डीएमके और तृणमूल कॉन्ग्रेस शामिल हैं। इन दलों में सबसे कम आपराधिक आरोपों वाले सासंद करीब 39 फीसदी बीजेपी के हैं, जबकि सबसे ज्यादा क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले सांसद 81 फीसदी जदयू के हैं। कॉन्ग्रेस के सांसदों दागदार सांसदों का प्रतिशत 57 और DMK तथा टीएमसी का क्रमश: 43 एवं 41 फीसदी है। इन आँकड़ों के आधार पर तैयार ग्राफ में बीजेपी का हिस्सा सबसे छोटा और जदयू का सबसे बड़ा होना चाहिए। लेकिन, सबसे बड़ा ग्राफ बीजेपी का दिखाया गया।

NDTV के बीजेपी के कम प्रतिशत को ग्राफ में सबसे ज्यादा दिखाया है

यह बताता है कि बीजेपी को लेकर एनडीटीवी किस कदर पूर्वाग्रह से ग्रसित है और कॉन्ग्रेस को पाक-साफ दिखाने के लिए वह कैसे चीजों को गलत तरीके से पेश करता है। गौरतलब है कि गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक पार्टियों को दिशा-निर्देश जारी करते हुए उनसे उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों की जानकारी अपनी वेबसाइट पर अपलोड करने को कहा था। कहा था कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को टिकट देने का कारण भी बताएँ। साथ ही कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक पार्टियों को उम्मीदवार के आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में तमाम जानकारी अपने आधिकारिक फेसबुक और ट्विटर हैंडल पर भी देनी होगी।

एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि अलग तरह की राजनीति का दावा कर अस्तित्व में आई आप ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में जिन लोगों को उतारा था उनमें से 60 फीसदी दागी हैं। 51 फीसदी पर तो गंभीर आपराधिक आरोप हैं। रिपोर्ट के अनुसार आप के 70 उम्मीदवारों में से 42 के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। 36 आप उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

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राहुल, सोनिया, प्रियंका अब लाइन में खड़े होंगे एयरपोर्ट पर! गृह मंत्रालय को नागरिक उड्डयन ने भेजा प्रस्ताव

कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी को भी अब विमान से यात्रा करने के लिए आम हवाई यात्री की तरह एयरपोर्ट की सुरक्षा प्रक्रिया से गुजरना होगा। अब उन्हें भी कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करना होगा। इससे पहले, इन तीनों को सुरक्षा जाँच को दरकिनार करते हुए एयरक्राफ्ट के बोर्डिंग तक कार से जाने की अनुमति प्राप्त थी।

बता दें कि नवंबर में ही मोदी सरकार ने सोनिया गाँधी, उनके बेटे, वायनाड सांसद और कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी व प्रियंका गाँधी को मिला हुआ एसपीजी सुरक्षा कवच हटाने का निर्णय लिया था। अब उनकी सुरक्षा का स्तर घटा कर ज़ेड प्लस कर दिया गया है। यानी इनकी सुरक्षा अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ (सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स) की ज़िम्मेदारी है। सोमवार (11 नवंबर, 2019 को) को सीआरपीएफ़ ने एसपीजी जवानों से तीनों की सुरक्षा के संबंध में जानकारी ली थी। फिलहाल एसपीजी सीआरपीएफ़ के सहायक की भूमिका में है।

जानकारी के मुताबिक एसपीजी कवर वापस लेते ही विशेषाधिकारों को समाप्त हो जाना चाहिए था। हालाँकि एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ इंडिया और ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सेक्योरिटी ने अनौपचारिक रूप से गाँधी परिवार को ये सुविधा इस्तेमाल करने दिया था। लेकिन हाल ही में उनकी कार एयरपोर्ट के एक अन्य कार से टकरा गई। जिसके बाद एयरपोर्ट के सुरक्षा अधिकारियों ने FIR दर्ज करने की धमकी दी है।

इस हाई प्रोफाइल मामले को CRPF की मदद से सँभाल लिया गया। लेकिन नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो की तरफ से कहा गया कि आगे से इस तरह की घटनाएँ न हों और वो अपनी विशेष सुरक्षा के दायरे में रहें। अब अगर गृह मंत्रालय नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो के प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो गाँधी को हवाई अड्डे की सुरक्षा से गुजरना होगा और घरेलू या अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में सवार होने के लिए अन्य यात्रियों के साथ कतार में खड़ा होना होगा।

उल्लेखनीय है कि एसपीजी सुरक्षा व्यवस्था वापस लिए जाने के विरोध में कॉन्ग्रेस सदस्यों ने लोकसभा में जमकर हंगामा किया था। लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा था, “सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी सुरक्षा पाने वाले मामूली लोग नहीं हैं। वाजपेयी जी ने गाँधी परिवार को एसपीजी सुरक्षा दी थी। 1991 से अब तक एनडीए दो बार सत्ता में आई, लेकिन उनकी एसपीजी सुरक्षा कभी नहीं हटाई गई।”

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भीमा कोरेगाँव मामला: अर्बन नक्सलियों को नहीं मिली राहत, बॉम्बे HC ने अग्रिम जमानत देने से किया इनकार

बॉम्बे उच्च न्यायलय ने भीमा कोरेगाँव हिंसा से जुड़े एल्गार परिषद केस में शुक्रवार को कथित नागरिक अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे पर माओवादियों से सम्पर्क रखने के आरोप हैं।

हालाँकि न्यायमूर्ति पीडी नाइक ने उनकी अग्रिम जमानत याचिकाओं को अस्वीकार कर दिया है तथापि आरोपियों को चार हफ्ते की मोहलत जरूर दी है, जिससे वे सुप्रीम कोर्ट से राहत पाने के लिए अपील कर सकें।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक जनवरी 2018 को पुणे जिले के भीमा कोरेगाँव में हिंसा होने के बाद माओवादी संपर्कों तथा कई अन्य आरोपों में नवलखा, तेलतुंबडे और कई अन्य कार्यकर्ताओं पर पुणे पुलिस ने मामला दर्ज किया था। पुणे पुलिस ने अपने आरोपों में कहा है कि 31 दिसंबर 2017 को पुणे में हुए एल्गार परिषद सम्मेलन में आरोपितों गौतम नवलखा आदि ने उत्तेजक भाषण और भड़काऊ बयान दिए, जिससे कारण अगले दिन कोरेगांव भीमा में जातीय हिंसा भड़की।

पुणे पुलिस ने इन पर आरोप लगाया था कि एलगार परिषद को माओवादियों का समर्थन मिला हुआ था। तेलतुंबडे और नवलखा ने पुणे की एक सत्र अदालत द्वारा उनकी याचिकाओं को खारिज किए जाने के बाद पिछले साल नवंबर में अग्रिम जमानत के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था।

पिछले दिसंबर में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें अग्रिम जमानत याचिकाओं के निस्तारण की सुनवाई लंबित रहने के कारण गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी थी।

ध्यातव्य है कि पुणे पुलिस इस मामले की जाँच कर रही थी लेकिन केंद्र सरकार ने पिछले महीने इसकी जाँच पुणे पुलिस से लेकर राष्ट्रीय जाँच एजेंसी को सौंप दी।

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किडनैपिंग और वीडियो कॉल से देह व्यापार के धंधे का खुलासा, मेघा बनी बांग्लादेशी बेगम खातून थी मास्टरमाइंड

इंदौर में फर्जी पासपोर्ट बनवाकर रहने वाले तीन बांग्‍लादेशी गिरफ्तार हुए हैं। आरोपित पहचान बदलकर ना सिर्फ इंदौर में रह रहे थे बल्कि देह व्यापार और नकली नोट का धंधा भी चला रहे थे। इस गिरोह की सरगना बांग्लादेशी महिला है। इसका असली नाम बेगम खातून है। काम की तलाश में मुंबई पहुँची बेगम खातून ने नाम बदलकर मेघा रख लिया और यहाँ देह व्यापार में लिप्त हो गई। वह 10 साल पहले यहाँ आई थी। वो बिना पासपोर्ट के ही देश में घुसी थी।

यहाँ आकर उसने एक ड्राइवर से प्रेम विवाह कर लिया और जाली नोट भी छापने लगी। इसके बाद उसने बांग्लादेश और भारत में अलग-अलग पासपोर्ट बनवा लिए थे। इसने बांग्लादेश के अलावा फर्जी दस्तावेजों के जरिए भोपाल से मेघा नाम से एक पासपोर्ट भी बनवा लिया था। इन दस्तावेजों को प्राप्त करने के लिए बेगम खातून ने फर्जी मार्कशीट भी बनवाई। आरोपितों के पास से नकली सील, मार्कशीट, जाली नोट, प्रिंटर, फोटो कॉपी मशीन समेत कई अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स बरामद हुई हैं। 

बेगम खातून की तीन साल पहले शिर्डी में किशोर से मुलाकात हुई थी। उसने पहले किशोर को अपना नाम मेघा ही बताया लेकिन बाद में उसे पता चला गया कि वह बांग्लादेश से है। दोनों ने शादी कर ली। इसके बाद ये दोनों अहमदाबाद, मुंबई, शिर्डी, नासिक, बेंगलुरु, पीथमपुर में घूमते रहे। एएसपी डॉ प्रशांत चौबे ने बताया कि वीजा की अवधि खत्म हुई तो खातून ने आठवीं की फर्जी मार्कशीट बनवाई। इस आधार पर पासपोर्ट तैयार कर मेघा के नाम से रहने लगी। रेंट एग्रीमेंट के जरिए उसने आधार कार्ड व अन्य दस्तावेज में इंदौर का पता अपडेट करवा लिया।

इसके अलावा लीमा व रोनी को भी गिरफ्तार किया गया है। वो दोनों भी बांग्लादेशी नागरिक हैं और बिना पासपोर्ट अवैध रूप से भारत में आए थे। खातून की मुलाकात इसी साल जनवरी में रोनी शेख व लीमा से हुई थी, जिसके बाद उसने इन दोनों को भी देह व्यापार से जोड़ लिया। आरोपित किशोर व मेघा ने बताया कि वर्ष 2018 में विश्वास नगर में रहते थे। इस दौरान दोनों कलर प्रिंटर और फोटो कॉपी मशीन के माध्यम से 100, 200, 500 के जाली नोट छाप चुके हैं।

एसएसपी रुचिवर्धन मिश्र ने बताया कि हीरा नगर इलाके में स्कूल कर्मचारी अनिल पाल का अपहरण हो गया था। मामले में पुलिस ने किशोर खंडारे निवासी वाशिम महाराष्ट्र, मेघा खंडारे निवासी दत्त नगर, रोनी शेख, लीमा हलधर को गिरफ्तार किया है। आरोपितों ने अनिल पाल को बंधक बनाकर पीटा और उसकी पत्नी को कॉल कर दो लाख रुपए की फिरौती माँगी। उन्होंने कनपटी पर पिस्टल रख वीडियो कॉल कर पत्नी को डराया भी था। जिसके बाद पत्नी ने वीडियो का स्क्रीन शॉट लेकर पुलिस को सौंप दिया था। पुलिस इस पर कार्रवाई करते हुए मोबाइल लोकेशन के आधार पर आरोपितों को गिरफ्तार किया।

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फर्जी आधार कार्ड और वोटर आईडी के साथ बांग्लादेशी मोहम्मद बिलाल धनबाद से गिरफ्तार

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