जहाँ एक तरफ़ पूरी दुनिया रोहिंग्याओं पर हो रहे कथित अत्याचार की बात करती है और भारत में कई आपराधिक वारदातों में उनकी संलिप्तता पर चुप्पी साध लेती है, वहीं दूसरी तरफ रोहिंग्या ईसाइयों की बदहाल स्थिति पर कोई भी संगठन कुछ नहीं कहता। रोहिंग्या ईसाइयों के हक़ के लिए कोई आवाज़ नहीं उठाता, क्योंकि उन पर रोहिंग्या मुस्लमान ही अत्याचार कर रहे हैं। रोहिंग्या क्रिश्चियन रिफ्यूजी कमिटी इस सम्बन्ध में समय-समय पर आवाज़ उठाता रहा है। अपने ताज़ा ट्वीट में भी संगठन ने पूछा है कि रोहिंग्या लगातार रोहिंग्या ईसाइयों के घरों व चर्चों को जला रहे हैं, फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुप क्यों है?
बांग्लादेश के कुटुपलोंग में रोहिंग्याओं ने न सिर्फ़ चर्च को लूटा बल्कि वहाँ रखी बाइबिल की पवित्र पुस्तकों को भी फाड़ कर बिखेड़ दिया। उन्होंने चर्च में रखे सारे सामान लूट लिए। ये घटना रविवार (जनवरी 26, 2020) की है, जिसे मीडिया द्वारा कवरेज नहीं दिया गया। ये घटना कुटुपलोंग के ब्लॉक 2 में स्थित चर्च में हुई। पिछले वर्ष मई में भी लगातार तीन दिन रोहिंग्या ईसाइयों को निशाना बनाया गया था।
Oh, human rights organizations, you who are working for Rohingya Muslims, see what they are doing to Rohingya Christians. Yesterday the R.M and ARSA destroyed Rohingya Christians’ houses and church. They lotted all of their goods and strewed Bibles and books in the church. pic.twitter.com/p6uu1pJhPw
— Rohingya Christian Refugee committee (@RohingyaCRC) January 27, 2020
नीचे आप एक अन्य चर्च की तस्वीर देख सकते हैं, जहाँ दिसंबर 2018 में धूमधाम से क्रिसमस का त्योहार मनाया गया था, लेकिन अब स्थिति इसके उलट है चर्च के नाम पर वहाँ एक तम्बू गड़ा हुआ है। चर्च को रोहिंग्याओं ने तोड़-फोड़ डाला। मार्च 27, 2019 को इस चर्च पर रोहिंग्याओं का कहर बरपा। इतना ही नहीं, वहाँ चर्च की जगह पर मस्जिद भी बना दिया गया।
This was their previous church and school, in it they celebrated Christmas in 2018. But the Rohingya Muslims demolished it on March 27, 2019 and built a mosque within one day. Here one picture is of church and another one is of the mosque. pic.twitter.com/CLrCGjYur8
— Rohingya Christian Refugee committee (@RohingyaCRC) January 28, 2020
रोहिंग्या मुस्लिम संगठन ARSA पर रोहिंग्या ईसाइयों को प्रताड़ित करने के आरोप लगे हैं। हाल ही में ARSA के हमले में 12 रोहिंग्या ईसाई गंभीर रूप से घायल हो गए, जिनका इलाज हो रहा है। इनमें से कुछ के शरीर पर एसिड फेंक कर हमला किया गया। कुछ की सर्जरी की नौबत आन पड़ी। एक व्यक्ति को उसकी आँखों से दिखाई नहीं दे रहा। 26 जनवरी की रात ARSA ने 25 रोहिंग्या ईसाई परिवारों पर हमले किए। यहाँ तक कि बांग्लादेश सरकार भी इस मामले में ईसाइयों का साथ नहीं दे रही है। पीड़ितों में महिलाएँ एवं बच्चे भी शामिल हैं।
इस मामले में अभी तक किसी को हमलावर को पकड़ा नहीं जा सका है। तीन रोहिंग्या ईसाइयों के परिवार अभी भी गायब हैं। दक्षिणी-पूर्वी बांग्लादेश के कुटुपलोंग में जहाँ ये हमला हुआ, वहाँ रोहिंग्या ईसाइयों के कई कैम्प हैं। पुलिस इसे हेट क्राइम न मान कर सामान्य आपराधिक वारदात बता रही है।
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की प्रतिनिधि यांगी ली ने पीड़ित रोहिंग्या ईसाइयों से मुलाक़ात की और उनके कैम्पों का दौरा किया। रोहिंग्या ईसाइयों के संगठन ने उम्मीद जताई है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएँ उनकी बातों को उठाएँगी।
उत्तर प्रदेश के उन्नाव से एसिड अटैक का मामला सामने आया है। यहाँ एक मुस्लिम युवती ने एकतरफा इश्क में हिंदू युवक पर तेजाब फेंक दिया। लड़की 5 महीने से लड़के का पीछा कर रही थी। जब लड़के ने इसकी शिकायत उसके पिता से करने को कही तो लड़की ने इस वारदात को अंजाम देने का मन बनाया। घटना की सूचना मिलने के बाद आरोपित युवती को हिरासत में ले लिया गया। उसके परिजनों से पूछताछ जारी है। जाँच के बाद सारी स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल युवक को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जहाँ उसका इलाज चालू है।
हिंदुस्तान के उन्नाव संस्करण में प्रकाशित संबंधित खबर
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने इस मामले में बताया कि यह घटना मौरावां गाँव के नजदीक की है। जहाँ 25 वर्षीय रोहित यादव दूध डेयरी चलाता है। सोमवार देर रात करीब 2 बजे वह टैंकर में दूध डलवाने के बाद डेयरी में सफाई कर रहा था, तभी डेयरी के सामने रहने वाली 20 वर्षीय मुनीर वहाँ पहुँची और उसने उससे बल्ब बुझाने को कहा। पहले तो लड़के ने उसे घर जाने को कहा, लेकिन जब लड़की नहीं मानी तो उसने बल्ब बुझा दिया।
अंधेरा होते ही युवती ने युवक पर तेजाब फेंक दिया। जिससे उसका गला, कान, गर्दन व पीठ गंभीर रूप से झुलस गए। घटना को अंजाम देने के बाद मुनीर वहाँ से भाग निकली। मगर लड़का वहीं चिल्लाता रहा। गंभीर रूप से घायल रोहित को पहले पड़ोसियों ने मदद की और फिर उसने स्वजनों को पूरी घटना बताई। घरवालों ने यूपी-112 पर सूचना देने के बाद रोहित को लेकर लखनऊ ले गए। सूचना के बाद सीओ एमपी शर्मा के साथ पुलिस की टीम ने पड़ताल की।
दैनिक जागरण के उन्नाव संस्करण में प्रकाशित संबंधित खबर
जानकारी के अनुसार युवक का कुसूर सिर्फ इतना था कि उसने युवती के प्रेम प्रस्ताव से इनकार कर घर वालों से शिकायत करने की बात की थी। जो मुनीर को रास नहीं आई। दैनिक जागरण के अनुसार, अब तक की पूछताछ में युवती ने बताया कि 5 माह से वह युवक से प्रेम का इजहार कर रही थी। घर से निकलने और डेयरी तक उसका पीछा करती रहती थी। कई बार डेयरी पर जाकर उससे प्रेम का इजहार भी किया लेकिन उसने हर बार मना करते हुए भाग जाने को कहा। इससे गुस्से में आकर उसने युवक पर तेजाब फेंकने का मन बना लिया था।
सीओ पुरवा एमपी शर्मा ने बताया कि एसिड अटैक करने वाली युवती ने पूछताछ में बताया कि है कि उसके प्यार के इजहार को युवक मानने को तैयार नहीं था। बर्तन साफ करने के बहाने पड़ोस में रहने वाली लड़की से एसिड भी लड़के के घर से मँगवाया था। पीड़ित युवक के पिता की तहरीर पर आरोपित युवती के खिलाफ एसिड अटैक की धारा में रिपोर्ट दर्ज की गई है।
अमिताव घोष ने लिखा है- कोई नहीं जानता, कोई जान भी नहीं सकता, अपनी स्मृतियों में भी नहीं, क्योंकि काल के गर्भ में कुछ ऐसे क्षण होते हैं जो जाने भी नहीं जा सकते।
मारीचझापी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बकौल दलित लेखक मनोरंजन व्यापारी यह एक ऐसा नरसंहार है, जिसने सुंदरबन के बाघों को आदमखोर बना दिया। आजाद भारत का सबसे भीषण नरसंहार जिसमें मार डाले गए हिंदू शरणार्थियों की संख्या को लेकर यकीनी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। सरकारी फाइलों में 10 मौतें जो अलग-अलग आकलनों में 10 हजार तक पहुॅंचती है। जो मारे गए उनमें ज्यादातर दलित (नामशूद्र) थे। जिनकी शह पर नरसंहार हुआ, वह दलितों के वोट से बंगाल में दशकों तक राज करने वाले वामपंथी थे। नरसंहार और उसे इतिहास के पन्नों से मिटा देने की साजिश को जिसकी मौन सहमति हासिल थी, वह कॉन्ग्रेस थी। वही, कॉन्ग्रेस जिसने मंगलदोई में समुदाय विशेष की घुसपैठ इस तेजी से करवाई कि जनसंख्या वृद्धि के सभी सिद्धांत धाराशायी हो गए और जिसके विरोध में असम आंदोलन की लौ फूटी।
1979 के इस नरसंहार के पन्नों को खोलने से पहले जरा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर हो रही हिंसा के किरदारों पर गौर करें। मजहबी उन्मादी भीड़, उसके बीच खड़ा दलितों का मसीहा बनने को आतुर भीम आर्मी का चीफ चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ रावण, पर्दे के पीछे से साजिश रचते कॉन्ग्रेसी और वामपंथी। हिंदुत्व की कब्र खुदने के नारों के बीच ‘जय भीम-जय मीम’ की वही फुसफुसाहट, जिसने जोगेंद्रनाथ मंडल को 72 साल पहले धोखा, विश्वासघात और पश्चाताप के सिवा कुछ भी नहीं दिया था।
सो, हैरत नहीं कि खुशी सिंह ट्विटर पर लिखती हैं, “मैं दलित हूॅं। ज्यादातर बांग्लादेशी और पाकिस्तानी हिंदू दलित हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश के दलित शरणार्थियों को नागरिकता देने के विरोध में जामा मस्जिद पर हो रहे प्रदर्शन में चंद्रशेखर आजाद क्या कर रहा है? कौन इसे दलित नेता कहता है?”
I am a Dalit (Chamar), Most of the Bangladesh and Pakistani hindus are DALITS
What the fuck that PIG Chandrasekhar Azad doing in Jama Masjid and protesting against citizenship to DALITS of Pak and Bangladesh
Who call that pig a DALIT LEADER ? That pig is not my leader.
खुशी जैसों की बात में दम है, क्योंकि पाकिस्तान के ज्यादातर हिंदू शरणार्थी मेघवाल, भील, कोली, बलाई जैसी जातियों से हैं। बांग्लादेशी नामशूद्र हैं। ऐसे में वह कानून जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता देने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, कैसे दलित विरोधी हो सकता है? इस सवाल का जवाब आप जब तलाशते हैं तो जड़ें मरीचझापी के नरसंहार में मिलती हैं।
हालॉंकि बंगाल में अपने तीन दशक के शासनकाल में वामपंथियों ने जो खूनी खौफ कायम किया उसका ही असर है कि बमुश्किल चार दशक पुरानी इस घटना का ज्यादा ब्यौरा नहीं मिलता। अमिताव घोष की किताब ‘द हंग्री टाइड्स’ की पृष्ठभूमि यही नरसंहार है। इसके अलावा आनंद बाजार पत्रिका और स्टेट्समैन जैसे उस समय के अखबारों में इस घटना का एकाध विवरण मिलता है। लेकिन, इसका सबसे खौफनाक और प्रमाणिक विवरण पत्रकार दीप हालदार की किताब ‘द ब्लड आइलैंड’ में है, जो इसी साल प्रकाशित हुई है। दीप ने इस नरसंहार में जीवित बच गए लोगों और इससे जुड़े अन्य किरदारों के मार्फत उस खौफनाक घटना का विवरण पेश किया है।
किताब में एक प्रत्यक्षदर्शी के हवाले से कहा गया है, “14-16 मई के बीच आजाद भारत में मानवाधिकारों का का सबसे खौफनाक उल्लंघन किया गया। पश्चिम बंगाल की सरकार ने जबरन 10 हजार से ज्यादा लोगों को द्वीप से खदेड़ दिया। बलात्कार, हत्याएँ और यहॉं तक की जहर देकर लोगों को मारा गया। समंदर में लाशें दफन कर दी गईं। कम से कम 7000 हजार मर्द, महिलाएँ और बच्चे मारे गए।”
साभार: दीप हालदार की किताब ‘द ब्लड आइलैंड’
आप जानकर हैरत में रह जाएँगे कि वाम मोर्चे की सरकार ने जिनलोगों की हत्याएँ कि उन्हें यहॉं बसने के लिए भी उसने ही प्रोत्साहित किया था। यह तब की बात है जब वामपंथी सत्ता में नहीं आए थे और हिंदू नामशूद्र शरणार्थी उन्हें अपना शुभेच्छु मानते थे। वामदलों की शह पर खासकर, राम चटर्जी जैसे नेताओं के कहने पर ये नामशूद्र शरणार्थी दंडकारण्य से आकर दलदली सुंदरबन डेल्टा के मरीचझापी द्वीप पर बसे। अपने पुरुषार्थ के बल पर बिना किसी सरकारी मदद के इस निर्जन द्वीप को उन्होंने रहने लायक बनाया। खेती शुरू की। मछली पकड़ने लगे। स्कूल, क्लीनिक तक खोल लिए।
नामशूद्र दलित हिंदुओं का यह समूह उस पलायन का एक छोटा सा हिस्सा था, जो बांग्लादेश में प्रताड़ित होने के बाद भारत के अलग-अलग हिस्सों में बसे। लेकिन, सत्ता में लौटने के बाद वामपंथियों को ये बोझ लगने लगे। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 1979 में मरीचझापी द्वीप पर बांग्लादेश से आए करीब 40,000 शरणार्थी थे। वन्य कानूनों का हवाला दे वामपंथी सरकार ने उन्हें यहॉं से खदेड़ने का कुचक्र रचा। 26 जनवरी को मरीचझापी में धारा 144 लागू कर दी गई। टापू को 100 मोटर बोटों ने घेर लिया। दवाई, खाद्यान्न सहित सभी वस्तुओं की आपूर्ति रोक दी गई। पीने के पानी के एकमात्र स्रोत में जहर मिला दिया गया। पाँच दिन बाद 31 जनवरी 1979 को पुलिस फायरिंग में शरणार्थियों का बेरहमी से नरसंहार हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि इस दौरान 1000 से ज्यादा लोग मारे गए। लेकिन, सरकारी फाइल में केवल दो मौत दर्ज की गई।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उच्च न्यायालय के आदेश पर 15 दिन बाद रसद आपूर्ति की अनुमति लेकर एक टीम यहाँ गई थी। इसमें जाने-माने कवि ज्योतिर्मय दत्त भी थे। दत्त के अनुसार उन्होंने भूख से मरे 17 व्यक्तियों की लाशें देखीं।
बावजूद इसके करीब 30,000 शरणार्थी मरीचझापी में अभी भी थे। मई 1979 में इन्हें खदेड़ने पुलिस के साथ वामपंथी कैडर भी पहुॅंचे। 14-16 मई के बीच जनवरी से भी भीषण कत्लेआम का दौर चला। ‘ब्लड आइलैंड’ में इस घटना का बेहद दर्दनाक विवरण दिया गया है। मकान और दुकानें जलाई गईं, महिलाओं के बलात्कार हुए, सैंकड़ों हत्याएँ कर लाशों को पानी में फेंक दिया गया। जो बच गए उन्हें ट्रकों में जबरन भर दुधकुंडी कैम्प में भेज दिया गया। इस किताब में मनोरंजन व्यापारी के हवाले से बताया गया है कि लाशें जंगल के भीतरी इलाकों में भी फेंके गए और सुंदरबन के बाघों को इंसानी गोश्त की लत गई।
लेकिन, मरीचझापी को न तो वामदलों ने मुद्दा बनने दिया और न कॉन्ग्रेस ने इन दलितों की फिक्र की। वह तो इसी वक्त मुस्लिम घुसपैठियों को मंगलदोई में बसाने में जुटी थी। अपनी किताब ‘द लास्ट बैटल आफ सरायघाट’ में रजत सेठी और शुभ्राष्ठा ने लिखा है कि इमरजेंसी के बाद हुए 1977 के चुनावों में असम में कॉन्ग्रेस को 14 में से 10 सीटें मिली। तीन सीटें जनता पार्टी को मिली थीं। इनमें एक सीट मंगलदोई की थी। इस सीट पर जनता पार्टी के हीरा लाल पटवारी (तिवारी) चुनाव जीते थे। मंगलदोई लोकसभा क्षेत्र में 5,60, 297 मतदाता थे। एक साल बाद हीरा लाल की मौत हो गई तो उपचुनाव कराया गया। महज़ एक साल से थोड़े से अधिक समय में जब मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) अपडेट की गई तो मतदाताओं की यह संख्या 80,000 बढ़ गई! यानी रातों-रात 15% की एकाएक वृद्धि! इनमें से लगभग 70,000 मतदाताओं का मजहब इस्लाम था। तमाम नागरिक समूहों ने इसके विरुद्ध शिकायतें दर्ज कराईं। ऐसे मामलों की संख्या भी लगभग 70 हज़ार थी, इनमें से 26 हज़ार ही टिक पाए। यहीं से भारतीय राजनीति में ‘अवैध बांग्लादेशी’ शब्द आता है, जिसका बड़ा हिस्सा बांग्लादेशी मुस्लिमों का है। इनके लिए ही आज ममता बनर्जी जैसी नेता राजनीतिक स्वार्थों की वजह से ढाल बनकर खड़ी नजर आ रहीं हैं।
साभार: द लास्ट बैटल आफ सरायघाट
वैसे, ‘जय भीम-जय मीम’ के नाम पर दलित हिंदुओं को छलने का सिलसिला गुलाम भारत से ही शुरू हो जाता है। जोगेंद्रनाथ मंडल भी इसी छलावे के शिकार हुए थे। यह मंडल ही थे जिनके कारण बांग्लादेश का सयलहेट पाकिस्तान में चला गया था। 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट जिले को मतदान से ये तय करना था कि वो पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का। उस इलाके में हिन्दुओं और मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग बराबर थी। चुनाव में नतीजे बराबरी के आने की संभावना थी। जिन्ना ने मंडल को वहाँ भेजा। दलितों का मत, मंडल ने पाकिस्तान के समर्थन में झुका दिया।
देश के विभाजन के बाद फौरी तौर पर मंडल को इसका इनाम भी मिला। वे पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री और श्रम मंत्री थे। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। लेकिन जब पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार शुरू हुए तो मंडल बेबस हो गए। बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार-बार इन पर कार्रवाई के लिए चिट्ठियाँ लिखते रहे। इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी। हिन्दुओं की हत्याएँ होती रहीं। जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रहीं। कुछ समय तो मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है। जिन्ना की मौत होते ही 1950 में वे भारत लौट आए और 5 अक्टूबर 1968 को गुमनामी की मौत मर गए।
मंडल से लेकर आज तक का इतिहास गवाह है कि ‘जय भीम-जय मीम’ की ओट में दलित हमेशा छले ही जाते रहे हैं। भले रावण जैसा कोई फौरी तौर पर अपना कद ऊँचा कर ले, लेकिन भीड़ दलितों के नाम पर अपने मजहबी उन्माद को छिपा लेती है। दलितों के सहारे सत्ता में आ कॉन्ग्रेसी और वामपंथी हर बार उनकी ही लाशों पर चढ़ ‘मीम’ का तुष्टिकरण करते हैं। आज CAA विरोध के नाम पर जो कुछ दिख रहा है वह भी इससे अलग नहीं है। आखिर, आंबेडकर ने यूॅं ही नहीं कहा था, “वतन के बदले क़ुरान के प्रति वफादार हैं मुस्लिम। वो कभी हिन्दुओं को स्वजन नहीं मानेंगे।”
झारखंड के लोहरदगा में सीएए के समर्थन में हुई रैली पर मुस्लिमों ने हमला किया। इस दौरान घायल हुए नीरज राम प्रजापति की 5 दिनों तक ज़िंदगी और मौत से जूझने के बाद मौत हो गई। उनकी पत्नी दिव्या कुमारी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिख कर अपने पति की मौत में न्याय करने और परिवार के भरण-पोषण में मुआवजा देने की माँग की लेकिन मंगलवार को सीएम दिन भर मंत्रिमंडल विस्तार में व्यस्त रहे। उलटा पुलिस प्रशासन परिजनों पर दबाव बनाता रहा कि वो नीरज के बाथरूम में गिर कर घायल होने की बात कहें और इसे ही मृत्यु का कारण बताएँ। स्थानीय हिंदूवादी नेताओं ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के इशारे पर मामले में लीपापोती की जा रही है।
अब ताज़ा सूचना आई है कि नीरज राम प्रजापति की अंतिम यात्रा में शामिल लोगों की संख्या प्रशासन ने डिसाइड की है। इसमें 35 से ज्यादा लोगों को शामिल नहीं होने दिया गया। राँची से लेकर लोहरदगा तक कई लोग अंतिम यात्रा में शामिल होना चाहते थे लेकिन उन्हें ‘माहौल बिगड़ने की आशंका’ के कारण रोक दिया गया। ‘हिन्दू जागरण मंच’ ने भी प्रशासन के इस व्यवहार को लेकर आक्रोश जताया। गुरुवार (जनवरी 28, 2020) की देर शाम नीरज के पार्थिव शरीर को लोहरदगा लाया गया।
क्षेत्र के पारंपरिक श्मशान में नीरज प्रजापति का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया क्योंकि रास्ते में मस्जिद पड़ती है। क़रीब पौने 8 बजे बॉडी घर पहुँची और सवा 8 में अंतिम संस्कार के लिए रवाना कर दी गई। परिजनों ने ऑपइंडिया से बात करते हुए आरोप लगाया कि पुलिस व प्रशासन ने जल्दी-जल्दी अंतिम संस्कार कराने के चक्कर में धार्मिक रीति-रिवाज भी पूरा नहीं करने दिया। जबरदस्ती रात में ही दाह संस्कार करने का दबाव बनाया गया। मृतक के एक पड़ोसी ने पुलिस के इस रवैए को लेकर आक्रोश जताया।
झारखंड सरकार पर इस मामले में तानाशाही रवैया अपनाने के आरोप लग रहे हैं। किसी भी पत्रकार को अंतिम संस्कार या अंतिम यात्रा के दौरान फोटो लेने की अनुमति नहीं दी गई। एक स्थानीय पत्रकार ने ऑपइंडिया से कहा कि पुलिस ने उनका कैमरा तोड़ डालने की धमकी दी। अंतिम यात्रा के दौरान लोगों को छत से देखने की इजाजत भी नहीं दी गई। फिर भी कई लोगों ने खिड़कियाँ खोल कर नीरज प्रजापति के पार्थिव शरीर का अंतिम दर्शन किया।
Raghu – BJP leader in Trichy was hacked to death
Neeraj Ram Prajapati, died during deadly Islamist attack @ Lohardaga
Ved (doctor) was removed from his job in Kerala
All for taking a Pro-CAA Stance.
But, democracy is not in Danger until a Jeehadi is booked for burning Bus.
पुलिसिया हूटर की आवाज़ में अंतिम यात्रा निकाली गई। क़रीब 2 बस और 8 छोटे वाहनों में मुस्तैद पुलिस अंतिम यात्रा के दौरान माइक से लगातार अनाउंसमेंट कर रही थी। मृतक नीरज के पड़ोसियों ने बताया कि इस दौरान क्षेत्र में काफ़ी भय का माहौल रहा।
वहीं लोहरदगा के सांसद सुदर्शन भगत ने ऑपइंडिया से बातचीत के दौरान बताया कि वो इस मामले को संसद में उठाएँगे। पत्थरबाजी और हिंसा करने वाले लोगों की पहचान के बारे में बोलते हुए भागत ने कहा कि पूरे देश में कौन ऐसा करते हैं, ये सभी को पता है। सुदर्शन भगत ने कहा कि जब से हेमंत सरकार सत्ता में आई है, पूरे झारखंड में कत्लेआम व अपराध आम बात हो गई है।
इंडिगो एयरलाइन्स ने उपद्रवी यात्री कुणाल कामरा को 6 महीने के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। बता दें कि 6E 5317 फ्लाइट में कुणाल कामरा ने रिपब्लिक न्यूज़ के संस्थापक अर्नब गोस्वामी के साथ बदसलूकी की थी। इंडिगो ने कहा कि कुणाल कामरा का ये व्यवहार अस्वीकार्य है और उन्हें फ्लाइट में उड़ान भरने के लिए 6 महीनों के लिए प्रतिबंधित किया जाता है।
Hereby, we wish to advise our passengers to refrain from indulging in personal slander whilst onboard, as this can potentially compromise the safety of fellow passengers. 2/2@MoCA_GoI@HardeepSPuri
साथ ही इंडिगो ने अपने यात्रियों को सलाह दी है कि दूसरे यात्रियों पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने वाली किसी भी गतिविधि में संलिप्त न हों। इंडिगो ने यात्रियों को अपने सहयात्रियों से भी दुर्व्यवहार करने से मना किया है, जिससे उनकी सुरक्षा को खतरा पहुँचे।
वीडियो में कुणाल कामरा कहता दिख रहा था कि जब उसने ‘डरपोक’ अर्नब गोस्वामी से उनकी पत्रकारिता को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने कामरा को ‘मानसिक रूप से विक्षिप्त’ बताया और बाद में कहा कि वो अपने लैपटॉप पर कुछ देखने में व्यस्त हैं। वीडियो में कथित कॉमेडियन कुणाल कामरा ये कहते दिख रहा था कि अर्नब उसके सवालों का जवाब नहीं दे रहे हैं। इस दौरान कामरा ख़ुद को ‘टुकड़े-टुकड़े’ नैरेटिव का अंग बताता है और कहता है कि अर्नब से दर्शक जानना चाहते हैं कि वो ‘राष्ट्रवादी’ हैं, या फिर ‘डरपोक’?
जेएनयू छात्र संगठन ने शरजील इमाम की गिरफ़्तारी की निंदा की है। जेएनयू छात्र संगठन ने ‘इस्लामोफ़ोबिक’ मोदी सरकार पर मुस्लिमों को निशाना बनाने और विरोधी आवाज़ों को दबाने का आरोप लगाया। जेएनयू छात्र संगठन ने कहा कि वो शरजील इमाम के साथ मजबूती से खड़ा है। बता दें कि महात्मा गाँधी को सबसे बड़ा फासिस्ट नेता बताने वाले शरजील इमाम ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकेन्स नेक) को ठप्प कर के पूरे उत्तर-पूर्वी भारत को शेष भारत से काट देने की बात की थी। उसे जहानाबाद की एक मस्जिद से गिरफ़्तार किया गया। उसके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुक़दमा चलाया जाएगा।
जेएनयू छात्र संगठन ने कहा कि सीएए, एनआरसी और एनपीआर के ख़िलाफ़ बयान देने के लिए शरजील पर यूएपीए के तहत कार्रवाई की जा रही है। संगठन ने आरोप लगाया कि शरजील पर ‘अँग्रेजों के ज़माने के निष्ठुर क़ानून’ के तहत सज़ा दी जा रही है। संगठन ने आरोप लगाया कि सीएए और एनआरसी के कारण लाखों लोग बेदखल हो जाएँगे और उनके अधिकार छीन लिए जाएँगे। जेएनयू छात्र संगठन ने आरोप लगाया कि मुस्लिमों को सरकार बेशर्मी से निशाना बना रही है।
जेएनयू छात्र संगठन ने लिखा, “शरजील उस अल्पसंख्यक मुस्लिम पहचान का नेतृत्व करते हैं, उसे तो निशाना बनाया ही जा रहा है और इसके लिए विरोधी और दबे हुए तबके की आवाज़ को कुचलने वाले क़ानून का इस्तेमाल किया जा रहा है।” छात्र संगठन ने आरोप लगाया कि सरकार अपनी मशीनरी का इस्तेमाल कर के उन मुस्लिमों को बदनाम कर रही है, जो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं। जेएनयूएसयू ने मीडिया के प्रति भी गुस्से का इजहार किया और आरोप लगाया कि मीडिया अलग ट्रायल कर के सरकार का साथ दे रही है।
जेएनयू छात्र संगठन का बयान, शरजील इमाम के समर्थन में
जेएनयू छात्र संगठन शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों की छवि को लेकर भी चिंतित है। उसने अपने बयान में आरोप लगाया कि संबित पात्रा व भाजपा से जुड़े अन्य लोगों ने शरजील इमाम की वीडियो की एडिट की हुई क्लिप्स को ग़लत सन्दर्भ में पेश किया और उसे बदनाम किया।
शरजील इमाम के साथ मजबूती से खड़ा है जेएनयू छात्र संगठन
संगठन ने दावा किया कि कई मीडिया नेटवर्क्स को भी शरजील को बदनाम करने के काम में लगाया गया है। इस बयान पर जेएनयू छात्र संगठन के 145 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। बता दें कि जेएनयू छात्र संगठन के अधिकतर महत्वपूर्ण पदों पर वामपंथियों का कब्जा है।
साउथ दिल्ली के सांसद रमेश विधूड़ी ने अरविन्द केजरीवाल को उनके वादों की याद दिला कर दिल्ली सरकार की धज्जियाँ उड़ा दी। उन्होंने पूछा कि 15 लाख सीसीटीवी कैमरे, 20 स्कूल, 500 कॉलेज, 5000 बसें और कॉलनियों को नियमित करने का वादा- ये सब फेल क्यों हो गया? उन्होंने पूछा कि झुग्गी में रहने वालों को पक्का घर देने के वादे का क्या हुआ? उन्होंने इस दौरान सीएए को लेकर भी बात की और कहा कि इससे किसी की नागरिकता ली नहीं जा रही है, दी जा रही है, फिर भी इस पर हंगामा हो रहा है।
शाहीन बाग़ में हो रहे उपद्रव पर बोलते हुए भाजपा सांसद ने कहा कि सोते हुए लोगों को तो जगाया जा सकता लेकिन इन्हें कोई नहीं जगा सकता। उन्होंने कहा कि शाहीन बाग़ में बैठे लोगों की पीड़ा सीएए नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 370 है, तीन तलाक़ है और राम मंदिर है। विधूड़ी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने सीएए को लेकर कई बार लोगों को समझाया। उन्होंने पूछा कि पुलिस जामिया में घुस कर दंगाइयों को पकड़ती है तो भी पुलिस की आलोचना होती है और जेएनयू में हिंसा होती है तो भी पुलिस से ही पूछा जाता है कि वो जेएनयू में क्यों नहीं गई?
रमेश विधूड़ी ने आरोप लगाया कि शाहीन बाग़ में धरने पर बैठे लोगों को अरविन्द केजरीवाल ने बैठाया है। उन्होंने कहा कि जो बसें जला रहे हैं, वो दंगाई हैं। निर्दोष बच्चों से पीएम मोदी की हत्या करने की बात कहवाने वाले दंगाई हैं। जो भी उपद्रव कर रहे हैं, वो दंगाई हैं।
#ABPShikharSammelan2020 | शिखर सम्मेलन में बीजेपी नेता रमेश विधूड़ी ने शाहीन बाग में प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों को दंगाई कहा.
रमेश विधूड़ी ने एबीपी न्यूज़ के ‘शिखर सम्मलेन’ में ये बातें कहीं। इस दौरान वहाँ आम आदमी पार्टी के नेता गोपाल राय भी उपस्थित थे। विधूड़ी ने दिल्ली के बदहाल स्कूलों की तस्वीर दिखाते हुए आप सरकार पर निशाना साधा।
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें बुर्कानशीं महिलाएँ हिन्दुओं के ख़िलाफ़ घृणा फैलाते हुए नज़र आ रही हैं। इस वीडियो में महिलाएँ सीएए को लेकर धरना पर बैठी दिख रही हैं और विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। बता दें कि शाहीन बाग़ की तर्ज पर कई इलाक़ों में मुस्लिम महिलाओं को विरोध प्रदर्शनों में आगे कर के सुर्खियाँ बटोरने और अराजकता फ़ैलाने का काम किया जा रहा है। सीएम योगी ने भी कहा था कि कुछ पुरुष ख़ुद रजाई में सो रहे हैं और अपने घर की महिलाओं और बच्चों को सड़क पर बिठा दे रहे हैं।
वायरल वीडियो में महिलाओं की भाषा पर गौर कीजिए। हिजाब और बुर्का पहनी महिला इस वीडियो में कहती है कि आजकल आ रहा हर क़ानून मोदी का है, ऐसा कौन सा क़ानून है जो दूसरे का है? जब बुर्कानशीं युवती को याद दिलाया जाता है कि इस मामले में अभी कोर्ट ने कोई फ़ैसला नहीं दिया है तो वो कहती है कि कोर्ट भी तो ‘उन्हीं’ का है।
महिला आगे कहती है कि वो मर भी जाएँ लेकिन वहाँ से हटेंगी नहीं। वीडियो में वो कहती दिखती है कि चाहे कुछ भी हो जाए, वो विरोध प्रदर्शन स्थल से पीछे नहीं हटेंगी। वो मुस्लिमों की जनसंख्या की बात करते हुए कहती है कि हिन्दू इतनी ज्यादा संख्या में मुस्लिमों को मारेंगे तो मुस्लिम भी हिन्दुओं को मारेंगे। बुर्कानशीं महिला आगे कहती है कि जिस दिन मुस्लिम जनसंख्या में हिन्दुओं से ज्यादा हो गए, उस दिन हिन्दुओं को पटक-पटक कर मारेंगे।
“Jis din hum Hinduo se zyada ho gaye naah us din hinduo ko raaste me patak patak ke maarenge”. Ganga-Jamuni tehzeeb ? pic.twitter.com/a5LoHBUMhB
हालाँकि, ये वीडियो कहाँ का है और किस डेट का है, इसके बारे में ऑपइंडिया कुछ पुष्टि नहीं कर सकता। लेकिन, जिस तरह से सीएए और एनआरसी को लेकर इस वीडियो में महिलाएँ मोदी सरकार को आड़े हाथों ले रही हैं और हिन्दुओं के प्रति घृणा का प्रदर्शन कर ही हैं, उससे लगता है कि ये शाहीन बाग़ के बाद शुरू हुए ताज़ा ट्रेंड का ही एक हिस्सा है।
झारखण्ड के लोहरदगा में गुरुवार (जनवरी 23, 2020) को नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में आयोजित रैली पर मुस्लिमों ने हमला कर दिया। इस हमले में नीरज प्रजापति नामक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उनके माता-पिता बीमार हैं और दो छोटे-छोटे बच्चे भी हैं। झारखण्ड सरकार किसी भी प्रकार की सहायता देने में आनाकानी कर रही है और प्रशासन दबाव बना रहा है कि पीड़ित परिजन मीडिया के सामने ऐसा बोलें कि नीरज की मौत बाथरूम में गिरने से हुई, सीएए समर्थकों के ख़िलाफ़ हुई हिंसा में नहीं। ऐसे में शोक-संतप्त परिजनों की दयनीय स्थिति हो गई है।
ऑपइंडिया ने उस पत्र को एक्सेस किया, जो मृतक नीरज राम प्रजापति ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भेजा है। हम चाहते हैं कि आप भी इस पत्र को पढ़ें और परिवार की दुःखद स्थिति को समझें। पूरी घटना को समझने के लिए मृतक की पत्नी का ये पत्र पढ़ना इसीलिए भी आवश्यक है, ताकि सरकार की नाकामी और अमला टोली के मजहबियों की करतूत को आप भी जानें और समझें। हम आपके लिए पूरा पत्र हूबहू पेश कर रहे हैं। एक-एक शब्द को ध्यान से पढ़ें:
सेवा में, मुख्यमंत्री, झारखण्ड प्रतिलिपि: उपयुक्त, लोहरदगा एवं एसपी, लोहरदगा दिनांक: जनवरी 28, 2020 (मंगलवार)
विषय: नीरज राम प्रजापति की हत्या के मुआवजे के सम्बन्ध में
महाशय, सविनय निवेदन है कि मैं दिव्या कुमारी स्वर्गीय नीरज राम प्रजापति की पत्नी हूँ। 23 जनवरी को सीएए के समर्थन में लोहरदगा में जो शोभा यात्रा निकाली गई, उसमें मेरे पति भी सम्मिलित हुए थे। शोभा यात्रा शांति से आगे बढ़ रही थी लेकिन बीच में शरारती तत्वों ने पेट्रोल बम और पत्थरों से हमला कर दिया। लोगों में भगदड़ मच गई और मेरे पति भी जान बचा कर किसी तरह वहाँ से भागे।
दंगाइयों ने मेरे पति को दौड़ा कर उनके सिर पर रॉड से वार किया। इसके बाद वो किसी तरह भागते हुए घर पहुँचे। वहाँ पहुँच कर उन्होंने मुझे सारी बातें बताईं। इसके बाद वो अचानक से बेहोश हो गए। मैं उन्हें लेकर आनन-फानन में लोहरदगा सदर अस्पताल पहुँची , जहाँ से उन्हें राँची रेफर कर दिया गया। तत्पश्चात मैंने इन्हें राँची स्थित ऑर्किड अस्पताल में भर्ती कराया। रुपए के अभाव के कारण मैं उन्हें फिर राँची स्थित रिम्स में लेकर आई।
मैं अपने घर में अकेली हूँ और मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे (एक बेटी और एक बेटा) हैं। अब मेरे घर में हमारा देख-रेख करने की स्थिति में कोई भी नहीं है। अतः, मेरा आपसे निवेदन है कि मुआवजे के रूप में 50लाख रुपए और परिवार के भरण-पोषण के लिए किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए। कृपया मेरी माँगों पर ध्यान देने की कृपा करें।
आपकी विश्वासी दिव्या कुमारी
मृतक नीरज की पत्नी दिव्या ने पत्र लिख कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से लगाई गुहार
यहाँ सवाल ये है कि आज दिन भर मंत्रिमंडल विस्तार की प्रकिया में व्यस्त रहने वाले क्या दिवंगत नीरज राम प्रजापति की पत्नी दिव्या कुमारी की इस गुहार पर ध्यान देंगे? सीएम सोरेन को समझना चाहिए कि परिजन राँची के रिम्स में अभी भी इस उम्मीद में बैठे हैं कि सरकार की तरफ से कोई नुमाइंदा उनका दुःख बाँटने के लिए वहाँ आएगा और मुआवजे का आश्वासन देगा। चुनाव जीतने के बाद लालू यादव का आशीर्वाद लेने के लिए रिम्स जाने वाले हेमंत सोरेन के पास इतना भी समय नहीं कि दिवंगत नीरज की पीड़ित पत्नी से एक बार मुलाक़ात तक कर सकें?
पाकिस्तान के सिंध प्रांत के छाचरो इलाके में हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ करने के मामले में पुलिस ने 4 नाबालिग लड़कों को गिरफ्तार किया है। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने पुलिस अधिकारियों के हवाले से बताया कि 15, 13, 13 और 12 साल की उम्र के चारों लड़कों ने अपना अपराध कबूल कर लिया है। उन्होंने मंदिर से पैसे चुराने के लिए वारदात को अंजाम दिया था।
गौरतलब है कि कल सिंध प्रांत के छाचरो शहर स्थित माता देवल भिटानी मंदिर में देर रात हमला बोला गया था। यहाँ मंदिर को नुकसान पहुँचाने के साथ आरोपितों ने मूर्तियों को क्षतिग्रस्त कर दिया था। माता की मूर्ति पर काली स्याही पोत दी गई थी। मामला तूल पकड़ने के बाद थार के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अब्दुल्ला अहमद के निर्देश पर संदिग्धों के खिलाफ सोमवार को एफआईआर दर्ज की गई थी। लेकिन, सिंध के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री हरि राम किशोरी लाल ने पुलिस से आरोपितों के ख़िलाफ़ ईश निंदा का मामला दर्ज करने को कहा था। साथ ही इनकी गिरफ्तारी की माँग की थी।
बता दें पाकिस्तान कें सिंध प्रांत में हुए हमले की तस्वीरे खुद वहाँ की नामी पत्रकार नायला इनायत ने अपने ट्विटर पर शेयर की थी। उन्होंने तस्वीरों को शेयर करते हुए लिखा था, “सिंध में अब एक और हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की गई। थारपरकर के छाचरो में भीड़ ने माता रानी भातियानी मंदिर में पवित्र मूर्ति और ग्रंथों को नुकसान पहुँचाया।”
Yet another Hindu temple vandalised in Sindh. The statue and holy scriptures desecrated as a mob attacked the temple of Mata Rani Bhatiyani in Chachro, Tharparkar. pic.twitter.com/VrKXpi8btd
नायला ने अपने ट्विटर हैंडल पर घटनास्थल की चार तस्वीरें भी शेयर की हैं। इसमें देखा जा सकता है कि उपद्रवियों ने मातारानी की मूर्ति पर काला रंग पोत दिया है और इसके अलावा तोड़फोड़ भी की गई है। साथ ही मंदिर को भी तोड़ने की कोशिश की गई है।