लखनऊ में एक बार फिर से हिंदूवादी नेता को निशाना बनाया गया है। विश्व हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रंजीत बच्चन की बदमाशों ने गोली मार कर हत्या कर दी। बीते साल लखनऊ में ही हिंदूवादी नेता कमलेश तिवारी की हत्या कर दी गई थी। रंजीत बच्चन की हत्या तब की गई, जब वे हजरतगंज इलाक़े में सुबह की सैर के लिए निकले थे।
रंजीत बच्चन की हत्या रविवार (फरवरी 2, 2020) को तब हुई, जब वो मॉर्निंग वाक के लिए निकले थे। पुलिस ने डेड बॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है। बाइक पर सवार अपराधियों ने बच्चन के सिर में गोली मारी। घटनास्थल पर पहुँची पुलिस जाँच में लगी हुई है। मौके पर पुलिस कमिश्नर सहित कई कई बड़े अधिकारी मौजूद हैं। ये घटना सुबह साढ़े 6 बजे के क़रीब हुई। जब रंजीत बच्चन के सिर पर गोली मारी गई, तब वो ग्लोब पार्क से निकल रहे थे।
मूल रूप से गोरखपुर के रहने वाले रंजीत बच्चन हजरतगंज इलाके की ओसीआर बिल्डिंग के बी ब्लॉक में रहते थे। इस घटना में उनके भाई भी घायल हो गए हैं। उनके हाथ में गोली लगी है। उनका इलाज ट्रामा सेंटर में किया जा रहा है। जहाँ ये घटना हुई है वह यूपी की राजधानी के व्यस्ततम इलाक़ों में से एक है। ताबड़तोड़ गोलीबारी से शहर में दहशत का माहौल पैदा हो गया है। लोगों का ये भी कहना है कि हिंदूवादी नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है।
अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि रंजीत बच्चन के सिर में कितनी गोलियाँ लगी हैं। वो अपने संगठन के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम भी करते थे। अपराधी उन्हें मार कर मौके से फरार हो गए। बता दें कि पिछले साल हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या कर दी गई थी। उन पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किया गया था और गोली भी मारी गई थी।
अलीगढ़ के शाहजमाल में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध में कई दिनों से प्रदर्शन चल रहा है। दिल्ली के शाहीन बाग़ की तर्ज पर वहाँ भी महिलाओं को बिठा दिया गया है, ताकि मीडिया का अटेंशन पाया जा सके। ये विरोध-प्रदर्शन करीब पाँच दिनों से जारी है। शनिवार (फ़रवरी 1,2020) की शाम प्रदर्शनकारी महिलाएँ तिरंगे का टेंट बना कर उसके नीचे धरना देने को अड़ गईं। हालाँकि, पुलिस ने समय रहते उनकी इस चाल को नाकामयाब कर दिया, क्योंकि इससे शांति-व्यवस्था भंग होने की आशंका थी।
इस दौरान महिलाओं व पुलिस के बीच तीखी झड़प भी हुई। पुलिस ने टेंट को जब्त कर लिया और महिलाओं को शांति के साथ प्रदर्शन करने की सलाह दी। प्रदर्शनकारी महिलाओं ने पुलिस को घेरने की भी चेष्टा की। इससे पहले शुक्रवार को धरनास्थल पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) छात्र संघ के पूर्व उपाध्यक्ष सज्जाद सुभान पहुँच गया। इस दौरान सज्जाद ने बुर्का पहन कर महिलाओं के प्रदर्शन में शिरकत की। सज्जाद ने टेंट लगाने और माइक फिट करने में प्रदर्शनकारियों की मदद की।
इसके बाद सज्जाद ने वहाँ भाषण देना शुरू कर दिया। पुलिस ने जब सज्जाद को रोका तो वो महिलाओं के बीच पहुँच कर बुर्के में प्रदर्शन करने लगा। प्रदर्शन के दौरान ही सज्जाद अपनी फेसबुक पेज पर लाइव हो गया और उसने वहाँ उपस्थित प्रदर्शनकारी महिलाओं को उकसाना शुरू कर दिया। वो वहाँ उपस्थित लोगों को भड़का रहा था। स्थिति बिगड़ती देख जब पुलिस उसे गिरफ़्तार करने पहुँची तो वो साथियों सहित भाग खड़ा हुआ। पुलिस ने इस प्रदर्शन को लेकर 600 अज्ञात के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है।
बुर्का पहन महिलाओं को भड़का रहा था एएमयू का पूर्व छात्र नेता,
अलीगढ़ के शाहजमाल ईदगाह के बाहर नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में महिलाएं धरने पर बैठी हैं। जिसमें एएमयू के पूर्व छात्र संघ उपाध्यक्ष सज्जान सुभान बुर्का पहनकर महिलाओं को भड़काते नजर आ रहे हैं। pic.twitter.com/Tc8RlAUXOB
शुक्रवार की देर रात वहाँ छात्र नेता सलमान इम्तियाज भी आ धमका। बाद में वो भी पुलिस के डर से भाग खड़ा हुआ। जब बुरका वाले वीडियो को लेकर सज्जाद से सवाल किया गया तो उसने कहा कि ये वीडियो उसका नहीं है, किसी और का है। धरणास्थल पर महिलाएँ नमाज भी पढ़ रही हैं। आसपास उनके घर के पुरुष खड़े रहते हैं, जो उन्हें निर्देशित करते हैं।
इससे पहले सज्जाद ने शरजील इमाम का भी बचाव किया था। राजद्रोह के आरोपित शरजील को सज्जाद ने राष्ट्रवादी बताया था। कश्मीरी छात्र नेता सज्जाद ने पुलवामा आतंकी हमले के समय पूछा था कि कहीं इसके पीछे अपनी ही एजेंसियों का तो हाथ नहीं? उसने आतंकियों के समर्थन में ट्वीट करने वाले छात्र वसीम बिलाल का भी बचाव किया था।
आईआईटी बॉम्बे में इन दिनों एक खेल चल रहा है। एक ऐसा खेल, जिसके तहत उन छात्रों का ब्रेनवाश किया जा रहा है, जो राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते। राजनीति से दूर रहने वाले प्रोफेसरों को बरगला कर उनका हस्ताक्षर ले लिया जा रहा है और उसे आईआईटी बॉम्बे का विचार बना कर पेश किया जा रहा है। मीडिया भी इसे हाथोंहाथ ले रही है। प्रोफेसरों और छात्रों का एक गुट लगातार संस्थान की छवि बदनाम करने में लगा हुआ है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि वहाँ के कुछ छात्रों से ही बातचीत के दौरान ऑपइंडिया को ये बातें पता चली हैं।
ऑपइंडिया ने आईआईटी बॉम्बे के एक छात्र से बातचीत की, जिसने नाम न सार्वजनिक करने की शर्त पर सीएए और एनआरसी विरोध के नाम पर मुट्ठी भर प्रोफेसरों के प्रपंच को जाहिर किया। छात्र ने बताया कि चंद प्रोफेसरों ने ऐसे कई प्रोफेसरों को चुना, जिन्हें राजनीति से ख़ास मतलब नहीं। उन्हें बरगला कर वामपंथी प्रोफेसरों ने उनका हस्ताक्षर ले लिया। प्रोफेसरों से कहा गया कि वो हिंसा के विरोध में हस्ताक्षर करा रहे हैं। बाद में इसे सीएए और एनआरसी विरोधी बता कर पेश कर दिया गया।
उक्त छात्र ने बताया कि शाहीन बाग़ में शुरू हुए प्रदर्शन के बाद आईआईटी बॉम्बे के सोशियोलॉजी विभाग के छात्र केंद्र सरकार के विरोध में ज्यादा सक्रिय रहे। चूँकि इस विभाग में छात्रों के एडमिशन को लेकर प्रोफेसर ही इंटरव्यू लेते हैं, वामपंथी प्रोफेसरों की दया से यहाँ जेएनयू के छात्रों का एडमिशन हुआ है। ऑपइंडिया से बात करते हुए छात्र ने आरोप लगाया कि वामपंथी विचारधारा वाले छात्रों को उक्त विभाग में भरा जा रहा है। एमफिल और पीएचडी वालो कोर्स के लिए ऐसा किया जा रहा है। इन कोर्सेज के लिए अंतिम निर्णय प्रोफेसरों को ही लेना होता है।
‘आंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्कल’: इस फेसबुक पेज का नाम बदल कर ‘आईआईटी बॉम्बे फॉर जस्टिस’ कर दिया गया
सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ ‘सोम बिल्डिंग (स्कूल ऑफ मैनेजमेंट)’ में 25 जनवरी को विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया गया। वहाँ विरोध प्रदर्शन के लिए ‘डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर (DSW)’ से अनुमति लेनी होती है। यहाँ छात्रों और प्रोफेसरों ने मिल कर एक ‘आंबेडकर-फुले-पेरियार स्टडी सर्कल’ समूह बनाया और इसके बैनर तले विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। डीन से अनुमति न मिलने के बावजूद अनाधिकारिक रूप से विरोध-प्रदर्शन किया गया। इससे आईआईटी के अन्य छात्रों को काफ़ी परेशानी होने लगी। मुश्किल से 40-50 छात्र और 10-12 प्रोफेसरों ने आए दिन कैम्पस में उपद्रव शुरू कर दिया और अन्य छात्रों को दिक्कतें होने लगी।
इसके बाद छात्रों ने उपद्रवी छात्रों व प्रोफेसरों के ख़िलाफ़ संस्थान के प्रशासन से शिकायत की। एक और गौर करने वाली बात ये है कि यही मुट्ठी भर प्रोफेसर और छात्र ख़ुद को आईआईटी बॉम्बे का प्रतिनिधि बताते हैं। वामपंथी प्रोफेसर और छात्रों ने ‘हमें चाहिए आज़ादी’ के नारे लगाए। शिकायत के बाद डायरेक्टर ने प्रोफेसरों और छात्रों से बातचीत कर उन्हें समझाया। डायरेक्टर ने सलाह दी कि आईआईटी बॉम्बे तकनीकी क्षेत्र में देश का नंबर 1 संस्थान है, इसीलिए इसे राजनीति से दूर रखा जाए। साथ ही उपद्रवी छात्रों व प्रोफेसरों को उन छात्रों को परेशान न करने को कहा, जो इन सबसे कोई मतलब नहीं रखते।
वामपंथी प्रोफेसर और छात्र डायरेक्टर की इस सलाह के बाद भड़क गए। वो पूछने लगे कि अगर राजनीतिक वाद-विवाद नहीं होगा तो फिर यहाँ पॉलिसी डिपार्टमेंट होने का औचित्य क्या है? वामपंथियों से तंग आकर कुछ अन्य प्रोफेसरों व छात्रों ने 25 जनवरी को डीन से अनुमति लेकर सीएए के समर्थन में रैली निकाली। इसके बाद वामपंथी गुट ने एक लम्बे तिरंगे झंडे के साथ रैली की। मामला गणतंत्र दिवस के दिन बिगड़ गया। हॉस्टल 12, 13 व 14 जनवरी को वामपंथियों के गुट ने ‘कागज़ नहीं दिखाएँगे’ वाले वरुण ग्रोवर को चीफ गेस्ट बना कर इन्वाइट किया। साथ ही एक विरोध-प्रदर्शन रैली निकालने की योजना बनाई।
चंद छात्रों व प्रोफेसरों ने मीडिया के सामने ख़ुद को घोषित किया आईआईटी बॉम्बे का प्रतिनिधि
एक साज़िश के तहत ‘आंबेडकर-फूले-पेरियार स्टडी सर्कल’ के फेसबुक पेज का नाम बदल कर ‘जस्टिस फॉर आईआईटी बॉम्बे’ कर दिया गया। गणतंत्र दिवस के दिन संस्थान ने बाहरी व्यक्ति के कैम्पस में प्रवेश पर बैन लगा दिया। आशंका थी कि बाहरी लोग माहौल खराब कर सकते हैं। वरुण ग्रोवर की भी एंट्री रोक दी है। इसके बाद वामपंथी प्रोफेसरों की बीवियों व महिला वामपंथी प्रोफेसरों ने वरुण ग्रोवर को अपना गेस्ट बना कर अंदर एंट्री करा दी। इसके बाद कई वामपंथी छात्र पोस्टर-बैनर और डफली लेकर विरोध-प्रदर्शन करने लगे। इन छात्रों ने ‘लड़ कर लेंगे आज़ादी’ जैसे नारे भी लगाए।
अन्य छात्रों को फिर से परेशानी हुई। परेशान छात्र नारेबाजी व उपद्रव के कारण न तो पढ़ाई कर पा रहे थे और न ही ठीक से मेस में बैठ कर खाना खा पा रहे थे। उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड्स से इसकी शिकायत की लेकिन रसूखदार वामपंथी प्रोफेसरों के आगे गार्ड्स की एक न चली। अंत में हार कर छात्रों ने इसकी शिकायत पुलिस से की। पुलिस ने आकर वरुण ग्रोवर को कैम्पस से बाहर निकाला और हिरासत में भी लिया। तब जाकर उस दिन मामला शांत हुआ। वामपंथी छात्र घूम-घूम कर नुक्कड़ नाटक भी कर रहे थे और अपने ही संस्थान पर निशाना साध रहे थे।
इसके बाद आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने एक नोटिस जारी कर किसी भी प्रकार की असामाजिक व देशद्रोही गतिविधि में शामिल न होने को कहा। बावजूद इसके शरजील इमाम के समर्थन में नारे लगाए गए। शरजील इमाम ने असम को भारत से अलग-थलग कर के टुकड़े करने की धमकी दी थी और लोगों को भड़काया था। डीएसडब्ल्यू ने छात्रों को स्पष्ट कर दिया कि शरजील इमाम का मामला देशद्रोह से जुड़ा है, इसीलिए इस मामले में उसका समर्थन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद रवीश कुमार व वामपंथी मीडिया ने डीएसडब्ल्यू को ‘तानाशाह’ करार दिया।
आईआईटी बॉम्बे ने छात्रों को दी शांति रखने की सलाह तो भड़की वामपंथी मीडिया
शरजील इमाम व उसके समर्थकों को बचाने के लिए रवीश कुमार ने भी अपने ‘प्राइम टाइम’ में कई फ़र्ज़ी दलीलें दी। आईआईटी बॉम्बे के छात्र ने ऑपइंडिया को बताया कि कैम्पस में हॉस्टल जनरल सेक्रेटरी का चुनाव होना है, जहाँ वामपंथियों को बिठाने का प्रयास किया जा रहा है। राजनीतिक रुझान न रखने वाले छात्रों को बरगलाया जा रहा है और उनका ब्रेनवाश किया जा रहा है। यहाँ इस सवाल का कोई तुक नहीं बनता कि आईआईटी में पढ़ने व पढ़ाने वाले को बरगलाया नहीं जा सकता, क्योंकि उनका ब्रेनवाश करने वाले भी से हैं और सारे दाँव-पेंच आजमा रहे हैं।
बिजनेस समिट में अनुराग कश्यप स्पीकर के तौर पर भाग लेंगे: एजेंडा साफ़ है
आईआईटी बॉम्बे के ई-सेल ने कॉलेज बिजनेस फेस्ट में अनुराग कश्यप जैसे गालीबाज को बुलावा भेजा है, जो हर बात में पीएम मोदी व गृह मंत्री अमित शाह को गालियाँ बकते हैं। हालाँकि, एंटरप्रेन्योरशिप समिट के नाम पर उन्हें क्यों बुलाया जा रहा है, ये वामपंथियों का एजेंडा स्पष्ट दिखता है।
बजट आ चुका है और स्टूडियो में चर्चा हो रही है। रात में प्राइम टाइम भी होगा जब बजट पर विश्लेषण होगा। हमारे पास रवीश कुमार के बजट की लीक हुई स्क्रिप्ट आ गई है जिसे हमने इस बार न्यूज़लौंडी के झबरा कुत्ते से सुँघवा कर सत्यापित किया है।
बजट आ चुका है और स्टूडियो में चर्चा हो रही है। रात में प्राइम टाइम भी होगा जब बजट पर विश्लेषण होगा। हमारे पास रवीश कुमार के बजट की लीक हुई स्क्रिप्ट आ गई है जिसे हमने इस बार न्यूज़लौंडी के झबरा कुत्ते से सुँघवा कर सत्यापित किया है। पेश है स्क्रिप्ट के मूल अंश:
देखिए, बजट किस दिन आया है, दिन है शनिवार, जो कि एक छुट्टी का दिन माना जाता है। बात यह नहीं कि ये छुट्टी का दिन है, गौर करने वाली बात यह है कि यह दिन हनुमान जी का है, इसीलिए उनको और उनके भक्तों को खुश करने के लिए बजट को लाल रंग के थैले में पेश किया जाता है। लाल रंग से याद आया…
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
अब आपने विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को बजट पेश करने के दौरान देखा होगा, जोकि आज पीली साड़ी में थीं। अब इस साड़ी का रंग पीला ही क्यों था? यह कोई सामान्य बात नहीं इसके पीछे भी भक्तों को खुश करने की मंशा नज़र आती है, क्योंकि पीला रंग विष्णु भगवान का प्रतीक है। असल में बात यह कि देश में सांप्रदायिकता का ज़हर घोलने की कोशिश की जा रही है।
अब बात करें बजट की तो करोड़ों रुपए का बजट पेश कर यह दिखाने की कोशिश की गई कि इस बजट के बाद देश की जनता एकदम से अमीर हो जाएगी, लेकिन हकीक़त यह है कि जितना फायदा और सपने बजट के पेश करने के दौरान दिखाए जाते हैं, उतना कुछ है नहीं, क्योंकि अगर हम कैलकुलेटर से नापें तो पता चलता है कि 78000 रुपए सालाना बचत, 216 रुपए प्रतिदिन, 9 रुपए प्रति घंटे और 15 पैसे प्रति मिनट का फायदा हो रहा है। ये बहुत कम है।
पूरा विश्लेषण यहाँ देखें
जहाँ सामान्य तौर पर बजट के दौरान सेंसेक्स ऊपर जाता है, इससे वैसे आम जनता का ज्यादा कोई मतलब नहीं, लेकिन अग़र सेंसेक्स 1 अंक भी नीचे जाता है तो आप समझिए कि ये ग़रीब की थाली से रोटी छीन रहा है। हालाँकि मुझे ये बजट ज्यादा समझ नहीं आता, लेकिन एक बात साफ़ है कि इस बजट से सीधे तौर पर अंबानी और अडानी बंधुओं को फायदा पहुँचाया गया है।
वहीं इस बजट में आने वाले वेलेंटाइन-डे को लेकर कुछ नहीं बोला गया, जिससे साफ है कि युवाओं की अनदेखी की गई है। वह भी ऐसे समय में कि जब देश का बेरोजगार युवा प्रेम जाल में फँसकर भटक रहा है या फ़िर बंदूक उठा रहा है। अब आप देखिए कि ये बजट ऐसे माहौल में लाया गया, जब पूरे देश में, और खास तौर पर शाहीन बाग में, सीएए और एनआरसी के खिलाफ जमकर विरोध हो रहा है, तो क्यों न मान लिया जाए कि ये कहीं न कहीं शाहीन बाग से मीडिया का ध्यान भटकाने के लिए लाया गया है? क्योंकि आज पूरे दिन मीडिया शाहीन बाग की कवरेज और जनता के जरूरी मुद्दों को छोड़कर सिर्फ बजट पर ही चर्चा करती रही और एक दिन में ही वह रामभक्त अचानक से गायब हो जाता है, जिसने देश में आतंक फैलाने की कोशिश की हो।
कहने के लिए बजट में 85,000 करोड़ एससी/एसटी, ओबीसी के लिए दिया जाता है, लेकिन क्या इससे ग़रीब की भूख मिट पाएगी? क्या हम गरीब को अमीर बना पाएँगे? शिक्षा के लिए एक लाख करोड़ दिए जाने की घोषणा की जाती है। 94 (हज़ार करोड़) से 99 (हज़ार करोड़) हो गए, लेकिन अभी तक 2020 तक नहीं पहुँच पाए। हर साल युवाओं को उच्च शिक्षा का झुनझुना दे दिया जाता है। बच्चे IIT के विरोध में हैं, यूनिवर्सिटी सीएए के विरोध-प्रदर्शनों में जल रहे हैं। ऐसे समय में उच्च शिक्षा के लिए लाखों-करोड़ों रुपए के बजट पास करने का कोई मतलब नहीं हैं, क्या फायदा ऐसे पैसे का। भले ही वित्तमंत्री के रूप में आप सफल हो सकते हैं, लेकिन सभ्य समाज के रूप में हम हार गए हैं।
अगर बात करें डिफेंस की तो हम करोड़ों-अरबों रुपए देश की जनता का खर्च कर राफेल ले रहे हैं। जब लड़ाई किसी से होती नहीं, तो देश में इतने मँहगे जहाजों और हथियारों के लाने का क्या फायदा? इससे अच्छा है कि कागज के जहाज ही बनाकर उसे सजा के रख दिया जाए। अब पीछे की ओर देखिए, पिछले सालों में कितने युद्ध हुए। कोई हुआ है तो ज़रा एक भी वाीडियो दिखाइए।
अब बात करते हैं बजट से जुड़े लोकप्रिय मुद्दों पर जिन पर चर्चा हुई ही नहीं! लोगों के बीच के मुद्दों से ध्यान हटाया गया, जबरदस्ती के टैक्स और पैसे की बातें हुईं। पहला मुद्दा जो ध्यान में आता है कि उच्च क्वालिटी वीड आदि पदार्थों के लिए बजट में कोई राहत नहीं दी गई है, जिसका सेवन वामपंथी युवाओं के साथ-साथ फ़िल्म स्टार भी करते हैं। इससे साफ़ है कि बजट में वामपंथी युवाओं की अनदेखी की गई है। वहीं दूसरी तरफ, घोड़े की सूखी लीद, जिसका सेवन अनुराग करते हैं, कुणाल करते हैं, यहाँ तक कि स्वयं मैं भी करता हूँ, उस पर बढ़े हुए आयात शुल्क पर कोई चर्चा नहीं हुई। दरअसल ये आम लीद नहीं, ये मंगोलियाई घोड़े की नस्ल है, जिसके पूर्वजों का मिलन चंगेज खान के घोड़े से हुआ करता था। इसलिए ये लीद उच्च गुणवत्ता वाली मानी जाती है।
इस बजट में वामपंथी ट्रोलों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया गया है। ये इतनी चिंता का विषय है कि कोई भी आज कल आकर पेल देता है। यहाँ तक कि मेरे सोशल मीडिया हैंडल पर कोई कुछ भी कहकर चला जाता है। खैर, इस बजट में व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी (वामपंथी कैंपस, लिबरलगंज) के लिए लगातार छठे साल भी फंड में कमी की गई है। जबकि दक्षिणपंथी कैंपस को लगातार बजट में पैसा दिया जा रहा है। वो अब राष्ट्रीय मीम योजना के तहत लाभ ले रहे हैं। वो भी कागज दिखाकर!
अब बात करते हैं कागज की, तो ध्यान देने वाली बात यह कि पूरे साल सरकार और मीडिया ने कागज दिखाने पर चर्चा की, लेकिन सरकार ने कागज पर टैक्स कम नहीं किया। कागज को लेकर सरकार गंभीर होती तो जरूर इस पर टैक्स कम करती, लेकिन ऐसा लगता है कि ‘कागज नहीं दिखाएँगे’ वालों से अब सरकार डर गई है।
वहीं दूसरी तरफ, ‘दो रुपया दे दो ना कामरेड, बीयर पीना है’ (तगड़ी तलब याचनामिश्रित स्वर में पैसा माँगते हुए) इस योजना पर टैक्स छूट नहीं की गई है। इससे पता चलता है कि जेएनयू को नजरअंदाज किया गया है, जहाँ एक नहीं बल्कि सैकड़ों छात्र-छात्राएँ इस योजना का लाभ उठा रहे हैं।
गमछों पर लगातार बढ़ते दामों और तेज़ी से बढ़ता सड़क निर्माण, तो कहीं रेल मार्ग बनाने की घोषणा की जा रही है। मतलब साफ है कि पत्थर कहीं भी देखने को नहीं मिलना चाहिए। इन घोषणाओं के बाद सवाल यह खड़ा होता है कि जब आते-जाते रास्तों में पत्थर ही नहीं होगा, तो एक ‘मास्क मैन’ अपने गुस्से का इजहार कैसे कर पाएगा। यह अभिव्यक्ति की आज़ादी को छीनने जैसा है।
दो फिल्मों से गंजेपन की समस्या पर ध्यानाकर्षण के बावजूद, इस बजट में बालों पर सरकार ने कुछ नहीं बोला है। ट्रांसप्लांट पर वित्तमंत्री ने चुप्पी साधी है। वह भी ऐसे समय में कि अब एक आदमी झबरा है तो दूसरा टकला। वहीं पंचर के पुराने ट्यूब पर भी कोई राहत नहीं दी गई है, जिसके पैसों से सॉल्ट न्यूज़ चुटकुलों की फैक्टचेकिंग करता है।
बजट पर हमने आम लोगों की भी राय ली। हमने फरजील इमाम से बजट पर बात करने की कोशिश की, उन्होंने बताया, “हमें क्या, हमारा तो PFI से फण्ड आता है।” हमने एकतरफा से भी बात की, उन्होंने कहा, “फोटोशॉप पर बजट में चर्चा के अभाव से वो दुखी हैं।” फिर हमने कुछ मीडिया वालों से भी बात की, जिसमें द स्क्विंट, द लायर, सॉल्ट न्यूज़, न्यूज़लौंडी प्रमुख रूप से शामिल हैं। अब इन्होंने एक लाइन में ऐसी बात कही, “हमें क्या साहब हमें तो वेटिकन से फंड मिल ही रहा है।”
फिर हमने जन्नत में पहुँचे आतंकियों से बात करने की कोशिश की, जिसमें जाकिर मूसा, बुरहान बानी आदि नाम शामिल थे, जिन्होंने कहा, “हमें क्या, हम तो आतंकवादी हैं। हम तो 72 हूरों के साथ जन्नत की सैर कर रहे हैं।” भले ही उन्होंने अपने आप को आतंकवादी कहा, लेकिन आज भी कई चैनल उनको आतंकवादी नहीं मानते।
इस मुद्दे पर अनंत सिह से हमारे रिपोर्टर क्रोधित मिश्रा ने बात की और उनके मुँह में माइक डालकर जवाब लेने की कोशिश की, जिससे आजिज आकर अनंत सिंह ने कहा, “&*^% का बजट है!”
अंत में बात यही कि मैं इस बजट को सांप्रदायिक मानता हूँ। यकीन मानिए आज इस बजट के दौरान गाँधी जी होते तो इसे पास नहीं होने देते। अब क्या बजट तो हर साल आता है-जाता है, लेकिन देश में अल्पसंख्यक के मुद्दे पर सभी चुप्पी साध लेते हैं। अंत में सवाल यही कि क्या इस बजट के पैसे से गरीब का पेट भर जाता है? कोई जवाब है… नहीं। हें.हें.हें…नमस्कार!
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा में मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा बजट पेश कर चुकी हैं। सुनने में आ रहा है कि निर्मला सीतारमण जी ने इस बार के बजट में आज तक की सबसे लंबी स्पीच दे डाली। इसमें हैरान होने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि –
‘वो स्त्री है, वो कुछ भी कर सकती है’
माफ़ करना मैं जरा इधर-उधर हो जाता हूँ। तो हम बात कर रहे थे बजट की, जिसे पढ़ते-पढ़ते वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी की तबीयत ख़राब हो गई और बजट भाषण को रोकना पड़ा। लेकिन इस बीच दुनियादारी से एकदम हटकर कुछ लोग अपनी ही दुनिया में मस्त थे। जहाँ कुछ लोग इनकम टैक्स स्लैब में राहत मिलने की बात सुनकर खुश हुए, वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसे अभी उस इनकम टैक्स स्लैब तक पहुँचना बाकी है। खैर, उनकी समस्या भी अपनी जगह पर वाजिब है।
लेकिन आम दुनिया से अलग एक मेन्टोस दुनिया भी है, जिसे कहते हैं दी लल्लनटॉप! वही दी लल्लनटॉप जो आखिरी बार जर्मनी में नाज़ी सेनानायक और फासिस्ट बादशाह हिटलर के पीछे इंच-टेप और फीता लेकर घूमते देखे गए थे। दी लल्लनटॉप की चिन्ताएँ एकदम लल्लनटॉप हुआ करती हैं। महिलाओं के विषयों पर अन्य से अधिक चिंतित दी लल्लनटॉप जहाँ होली पर इस वजह से चिंतित होता है कि कहीं यह वीर्य का त्योहार तो नहीं, वही दी लल्लनटॉप बजट के दौरान इस बात को लेकर परेशान था कि आखिर प्रियंका चोपड़ा की ड्रेस खिसकती क्यों नहीं?
वही प्रियंका चोपड़ा जिन्हें दिवाली पर अस्थमा होता है, और क्रिसमस के समय जिनके पटाखे पर्यावरण में ऑक्सीजन छोड़ते हैं। प्रियंका चोपड़ा अपने पति निक जोनास के साथ 62वें ग्रैमी अवार्ड्स में एक ऐसी ड्रेस पहनकर गईं, जिसने दी लल्लनटॉप को परेशान कर दिया।
स्वयं विचार करें –
खैर, वो लल्लनटॉप है, वो कुछ भी कर सकता है। लेकिन ऊपरवाले को इस ज्ञानवर्धक वेबसाइट क्वोरा को हिंदी में उतारने की क्या सूझी थी? मेरा सवाल एकदम जायज है। Quora का वर्चस्व एक समय ऐसा हुआ करता था कि हर दूसरा व्यक्ति अमुक सूत्रों की पुष्टि के लिए विकिपीडिया छोड़कर Quora का रिफ्रेंस देता था और भोकाल काटता था। लेकिन ग्रहों की दशा पलटी और Quora ने अपना हिंदी वर्जन जारी कर दिया। Quora के इस हिंदी वर्जन में जो कुछ आता है उसे अपनी आँखों से देख सकते हैं तो जरूर देखिए। इसे देखकर आपको यह तय कर पाना मुश्किल हो जाएगा कि आप Quora पढ़ रहे हैं या ‘दी लल्लनटॉप’ पढ़ रहे हैं।
खुद देखिए मारक मजा-
एक और शख्सियत है जिसे बजट-वजट से कोई लेना-देना नहीं था। वो है सेक्रेड गेम्स जैसी ‘गोची’ बनाने वाले अनुराग कश्यप। अनुराग कश्यप आजकल CAA-विरोध और रोजगार की कमी के चलते एकदम ‘इधर-उधर’ नजर आ रहे हैं। अनुराग कश्यप का कहना है कि वो सामान्य ज्ञान के लिए ‘दी स्क्विंट‘ पढ़ते हैं। माफ़ कीजिए, ऐसा उन्होंने नहीं कहा लेकिन ट्विटर पर उनकी हरकतें कम से कम यही बताती हैं।
NDTV पर या तो सत्यान्वेषी पत्रकार चलते हैं या फिर सपना चौधरी। बजट-वजट बाद में देखा जाएगा, पहले NDTV चाहता है कि आप सपना चौधरी का डांस देखें।
लिबरल मीडिया का प्यार तैमूर के डायपर से, अनुराग कश्यप का गोची से और ‘दी लल्लनटॉप’ का हिटलर से कोई छुपी हुई बात नहीं है। लेकिन देश का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिसकी हरकतें भी एकदम लल्लनटॉप हैं। उन पर भी बात कर लेनी चाहिए, क्योंकि गोदी मीडिया हमेशा उन्हें किनारे ही करता आया है। वह वर्ग है टिकटॉक बनाने वाले युवाओं का।
बजट में टिकटॉक वीडियो बनाने वालों पर कोई कर ना लगाने से टिकटॉक समाज में एक बार फिर ख़ुशी की लहर देखी गई है। फेसबुक पर ‘वर्क्स एट स्टूडेंट ऑफ़ दी ईयर’ वाले लोग अभी भी टैक्स के दायरे से बाहर रखे गए हैं। बजट भाषण के दौरान ‘हंस मत पगली प्यार हो जाएगा’ जैसी कविता करने वालों को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से वंचित रखे जाने के प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।
अभी युवाओं का एक ऐसा भी वर्ग है जिसे कम से कम कल सुबह तक भी इस बजट से कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि उसे जब तक न्यूज़ पेपर दो कॉलम बनाकर नहीं समझा देता कि कौन सी चीज महँगी हुई है और कौन सी सस्ती, तब तक वह इस बजट पर वह किसी भी प्रतिक्रिया देने से बचते हुए बस यही कह रहा है कि –
भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने झारखंड सरकार पर गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने राज्य सरकार पर सीएए समर्थन रैली पर मुस्लिमों के हमले में मारे गए नीरज प्रजापति के परिजनों को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। ऑपइंडिया ने अपनी ख़बर में बताया था कि नीरज प्रजापति लोहरदगा में 23 जनवरी को सीएए समर्थन रैली पर मस्जिद व कॉन्ग्रेस दफ्तर से हुई पत्थरबाजी में घायल हो गए थे। इसके बाद उनका इलाज लोहरदगा सदर अस्पताल, राँची स्थित ऑर्किड हॉस्पिटल और रिम्स के ट्रामा सेंटर में चला। 5 दिनों तक ज़िंदगी और मौत से जूझने के बाद 28 जनवरी को उनकी मौत हो गई थी।
ऑपइंडिया ने अपनी ख़बर में दिवंगत नीरज के परिजनों के हवाले से बताया था कि झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार पीड़ित परिवार पर लगातार दबाव बना रही है कि वो मीडिया व पुलिस में कहें कि नीरज प्रजापति की मौत बाथरूम में फिसलने के कारण हुई। पुलिस व प्रशासन के दबाव के बावजूद परिजनों ने हार नहीं मानी और पीड़ित की पत्नी दिव्या कुमारी ने एक पत्र लिख कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुआवजे की गुहार लगाई। हालाँकि, उन्हें मुआवजा तो नहीं मिला लेकिन जल्दी-जल्दी में प्रशासन ने टॉर्च की रौशनी में रात के समय नीरज का अंतिम संस्कार करा दिया।
अमित मालवीय ने परिजनों के इसी आरोप को आधार बनाते हुए हेमंत सोरेन सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने पूछा कि क्या सिर्फ़ हिन्दू होने की वजह से नीरज प्रजापति के परिजनों के साथ ऐसा सलूक किया जा रहा है? उन्होंने पूछा कि अभी तक मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अब तक इस वारदात पर एक शब्द भी क्यों नहीं कहा है? भाजपा आईटी सेल प्रमुख के इस बयान के साथ ही नीरज प्रजापति की मौत का मामला दिल्ली पहुँच गया है। सांसद सुदर्शन भगत ने भी ऑपइंडिया से बात करते हुए दावा किया था कि वो इस मुद्दे को संसद में उठाएँगे।
Family of Neeraj Parajapti, who died in Congress ruled Jharkhand, after being hit on head for attending a pro CAA rally tells the media that they are being pressurised to say that he died after slipping in the bathroom… They ask if it is because he is a Hindu? No word from CM..
बता दें कि तबरेज की मौत को बड़ा मुद्दा बना कर देश भर में ‘मॉब लिंचिंग’ का माहौल चलाने वाले मीडिया ने नीरज प्रजापति की मौत की ख़बर को दबा दिया। अमित मालवीय के बयान के बाद लोगों ने आशा जताई है कि भाजपा इस मुद्दे पर झामुमो व कॉन्ग्रेस की सरकार को घेरेगी। ऑपइंडिया ने दिवंगत नीरज की पत्नी दिव्या कुमारी की मदद के लिए क्राउडसोर्सिंग का सहारा लिया, जिसमें अब तक लोगों ने लगभग 25 लाख रुपए का सहयोग दिया है।
उत्तर प्रदेश मजफ्फरनगर की एक अदालत ने 2009 में एक स्थानीय क्रिकेट मैच के दौरान विवाद के बाद एक युवक की गोली मारकर हत्या करने के मामले में तीन लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश वीरनायक सिंह ने शुक्रवार (जनवरी 31, 2020) को दोषियों सलीम, अजहरुद्दीन और सरवर को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराया और उन पर पचास-पचास हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया।
सरकारी अभियोजक जितेंद्र त्यागी ने बताया कि पाँच सितंबर 2009 को शामली जिले के गंगेरु गाँव में एक क्रिकेट मैच के दौरान शमशाद से तीनों की लड़ाई हो गई थी। इसके बाद शमशाद की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
जितेंद्र कुमार त्यागी ने कहा कि 5 सिंतबर 2009 को गंगेरू के रहने वाले बुंदा ने रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसके भतीजे शमशाद और सलीम के बीच क्रिकेट मौच के दौरान कहासुनी हो गई। इसके बाद सलीम, सरवर एवं अजहरुद्दीन ने मिलकर शमशाद को घेर लिया। फिर अजहरुद्दीन और सरवर ने शमशाद को पकड़ा और सलीम ने तमंचे से गोली मार कर हत्या कर दी। सलीम इस घटना के बाद से ही जेल में बंद है। सरवर और अजहरुद्दीन जमानत पर बाहर थे। सजा सुनाए जाने के बाद इन दोनों को भी जेल भेज दिया गया।
वहीं एक अन्य घटना में शुक्रवार (जनवरी 31, 2020) को ही मुजफ्फरनगर जनपद में एक किशोर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मृतक का शव शुक्रवार सुबह जंगल में पड़ा मिला। हत्या का कारण संपत्ति विवाद बताया गया है। सीओ ने बताया कि शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया है। सीओ ने कहा कि मुकदमा दर्ज किया जा रहा है और हत्यारोपी की तलाश में पुलिस लगी है।
मध्य प्रदेश की सियासी हलके में तब बड़ी हलचल देखने को मिली, जब कॉन्ग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के दो बड़े दिग्गजों से मिले। सिंधिया ने मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती से मुलाक़ात की। इस दौरान वहाँ भाजपा महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय भी मौजूद थे। उनसे भी सिंधिया पूरे गर्मजोशी से मिले। कुछ दिनों पहले सिंधिया की कॉन्ग्रेस आलाकमान से नाराजगी की ख़बरें उड़ी थीं, जिन्हें बाद में नकार दिया गया था। सिंधिया ने अपने ट्विटर बायो से कॉन्ग्रेस का नाम हटा दिया था, जिसके बाद मीडिया में तरह-तरह की बातें चल निकली थीं।
अब सिंधिया की विजयवर्गीय व उमा भारती के साथ मुलाक़ात से कॉन्ग्रेस आलाकमान के कान फिर से खड़े हो गए हैं। दरअसल, ये मुलाक़ात ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर हुई। यहाँ तीनों नेताओं के समर्थकों की फ़ौज जुटी हुई थी। इस दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जब उमा भारती को देखा तो उन्होंने झुक कर नमन किया। सिंधिया ने पूर्व मुख्यमंत्री से आशीर्वाद लिया। उमा भारती ने भी सिंधिया के सिर पर हाथ फेर कर आशीर्वाद दिया। दोनों में कुछ देर तक बातचीत भी हुई।
जब ये मुलाक़ात चल रही थी, तभी दिग्गज भाजपा नेता व मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री रहे कैलाश विजयवर्गीय वहाँ पर आ पहुँचे। विजयवर्गीय को देख कर सिंधिया मुस्कुराए, जिसके बाद दोनों एक-दूसरे के साथ गले मिले। विजयवर्गीय और सिंधिया बातें कर रहे थे, तभी उमा भारती के पाँवों में कुछ तकलीफ हो गई। उनके लिए व्हीलचेयर मँगाया गया। उमा भारती को व्हीलचेयर पर बिठा कर सिंधिया ने उनसे विदा लिया। तीनों नेताओं की गर्मजोशी से हुई मुलाक़ात भोपाल के गलियारों में चर्चा बटोर रही है।
दरअसल, ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर से दिल्ली रवाना हो रहे थे, जबकि उमा भारती और कैलाश विजयवर्गीय एक शादी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए वहाँ पहुँचे थे। मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस पिछले 1 साल से भी अधिक समय से सत्ता में है और कमलनाथ ने सरकार और संगठन, दोनों के ही मुखिया का पद सँभाला हुआ है। ऐसे में, सिंधिया गुट के नेता लगातार नाराज़ बताए जाते हैं और उनमें से कुछ गाहे-बगाहे कॉन्ग्रेस आलाकमान को असहज करने वाला बयान भी देते रहते हैं।
70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा के लिए आठ फरवरी को वोट डाले जाएँगे। नतीजे 11 फरवरी को आएँगे। राजनीतिक दल जोर-शोर से प्रचार में जुटे हैं। मुस्लिम मतदाताओं का मूड भॉंपने की कोशिश करते हुए दैनिक भास्कर ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसके जरिए दिल्ली के मुस्लिम मतदाताओं की नब्ज टटोलने की कोशिश की गई है। इस रिपोर्ट से अंदाजा लगाया जा सकता है क्यों शाहीन बाग आम आदमी पार्टी (आप) के लिए न उगला जा रहा और न निगला।
यह रिपोर्ट दिल्ली के नौ मस्जिदों के इमाम से बातचीत पर आधारित है। सभी से 4 मसलों पर सवाल सवाल किए गए। ये हैं,
दिल्ली की केजरीवाल सरकार का काम
भाजपा को वोट देंगे या नहीं
मुस्लिम वोटर किधर जाएंगे
शाहीन बाग प्रदर्शन
जिन इमामों से बात की गई वे हैं,
दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस की मस्जिद के हबीबुर रहमान। यह मस्जिद तिमारपुर विधानसभा क्षेत्र में आता है।
एक मीनार मस्जिद के मुफ्ती अब्दुल वाहिद। यह लक्ष्मी नगर विधानसभा क्षेत्र में आता है।
चाँदनी चौक विधानसभा क्षेत्र के मस्जिद तकिया मंडल शाह के मोहम्मद तैयब कासमी।
ओखला विधानसभा के हजरत अबु मस्जिद के नजीर अहमद।
जैतपुर पार्ट-2 स्थित जामा मस्जिद के जुबैर अहमद। यह बदरपुर विधानसभा में आता है।
त्रिलोकपुरी विधानसभा के मदीना मस्जिद के हाजी रियासत अली
मटियामहल विधानसभा के मस्जिद मुबारक बेगम के मोहम्मद अजमल कासमी।
बल्लीमारान विधानसभा के अनारवाली मस्जिद के जुबैर अहमद
कैलाशनगर के मस्जिद-मदरसा अंजुमन इस्लामिया के अताउल रहमान कासमी। यह गॉंधी नगर विधानसभा में पड़ता है।
इस रिपोर्ट से जो बात उभरकर आती है वह यह है कि दिल्ली के इमाम नहीं चाहते कि भाजपा सत्ता में आए। ज्यादातर इमाम का झुकाव आप की ओर है। कुछ की नजरें कॉन्ग्रेस पर भी टिकी है। लेकिन, उनकी असल चिंता यह है कि वोटों का बॅंटवारा न हो पाए। दिल्ली में 12 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। कई सीटों पर उनका प्रभाव है।
जब आप इन इमामों के जवाब पर गौर करेंगे तो आप के लिए उनकी बेचैनी समझ आ जाएगी। साथ ही यह भी साफ हो जाएगा कि शाहीन बाग के कारण आम लोगों को होने वाली परेशानी अब कैसे उनकी पंसदीदा पार्टी के लिए समस्या खड़ी कर रही है। दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस की मस्जिद के इमाम हबीबुर रहमान के अनुसार केजरीवाल ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। वे भाजपा पर बार-बार कौम का मसला उठाने का आरोप भी लगते हैं। उन्होंने कहा कि वोटों का बँटवारा रोकने की कोशिश जारी है।
केजरीवाल सरकार के काम से एक मीनार मस्जिद के इमाम मुफ्ती अब्दुल वाहिद भी खुश हैं। उन्होंने बताया कि इस चुनाव में AAP और अगले लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को वोट दिए जाने की बात चल रही है। चाँदनी चौक विधानसभा के मस्जिद तकिया मंडल शाह के इमाम मोहम्मद तैयब कासमी के अनुसार उनका फोकस भाजपा को हराने पर है। हजरत अबु मस्जिद के इमाम नजीर अहमद ने शाहीन बाग का दोष भी बीजेपी के मत्थे मढ़ने की कोशिश की।
हालाँकि जैतपुर पार्ट-2 स्तिथ जामा मस्जिद के इमाम जुबैर अहमद केजरीवाल के काम से खुश नहीं हैं। फिर भी वे चाहते हैं कि मुस्लिम भाजपा को वोट नहीं दें। मदीना मस्जिद के इमाम हाजी रियासत अली ने बताया कि पहले भले 10-20 फीसदी मुस्लिम भाजपा को वोट दे देते थे। अब कोई मुस्लिम उन्हें वोट नहीं देगा। वैसे, मस्जिद मुबारक बेगम के इमाम मोहम्मद अजमल कासमी का मानना है कि वोटों का बँटवारा शायद ही रोकने में कामयाबी मिल पाए। अनारवाली मस्जिद के इमाम जुबैर अहमद ने शाहीन बाग के प्रदर्शन को गलत तरीके से पेश करने का आरोप भाजपा पर लगाया। मस्जिद-मदरसा अंजुमन इस्लामिया का कहना कि भाजपा के खिलाफ जो मजबूत उम्मीदवार हो मुस्लिमों को उसे वोट देना चाहिए।
अब सवाल उठता है कि ये इमाम क्यों नहीं चाहते कि मुस्लिम अपनी पसंद के हिसाब से वोट करें? वे वोटों के बॅंटवारे को लेकर क्यों चिंतित हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है उनकी सैलरी जो केजरीवाल सरकार ने बढ़ा दी थी। मस्जिद के इमामों की सैलरी 10,000 से बढ़ाकर 18,000 और मुअज्जिन की सैलरी 9,000 से बढ़ाकर 16 हजार कर दी गई थी। इसके अलावा दिल्ली में करीब 1500 मस्जिदें ऐसी हैं, जहाँ पर वक्फ बोर्ड का डायरेक्ट कंट्रोल नहीं है और इन मस्जिदों में वक्फ बोर्ड की कमिटी नहीं है। वक्फ बोर्ड ने यह भी फैसला लिया था कि इन 1500 मस्जिदों के इमामों को सैलरी के तौर पर 14,000 रुपए दिए जाएँगे, जबकि मोअज्जिन को 12,000 रुपए मिलेंगे।