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दीपावली पर भारत की नारी शक्ति और उनकी उपलब्धियों को सेलिब्रेट करें: PM मोदी

आज दीपावली के शुभ अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों से ‘मन की बात’ कर रहे हैं, यह ‘मन की बात’ कार्यक्रम का 58वाँ एपिसोड है। आज सुबह 11 बजे से इस कार्यक्रम का आकाशवाणी के माध्यम से प्रसारण हुआ। इस कार्यक्रम के ज़रिए पीएम मोदी ने एक बार फिर अपने विचारों को देश के लोगों के साथ साझा किया। बता दें कि पीएम मोदी द्वारा साल 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही ‘मन की बात’ कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के इस संस्करण में देशवासियों को दीप-पर्व की बधाई देते हुए कहा है कि आजकल दुनिया के अनेक देशों में दिवाली मनाई जाती है। इसमें सिर्फ़ भारतीय समुदाय शामिल होता है, ऐसा नहीं है बल्कि अब कई देशों की सरकारें, वहाँ के नागरिक दिवाली को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। एक प्रकार से वहाँ ‘भारत’ खड़ा कर देते हैं।

अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि पिछली मन की बात में हमने तय किया था कि इस दीपावली पर कुछ अलग करेंगे। मैंने कहा था आइए, हम सभी इस दीपावली पर भारत की नारी शक्ति और उनकी उपलब्धियों को सेलिब्रेट करें, यानी भारत की लक्ष्मी का सम्मान करें।

कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि दुनिया भर में फेस्टिवल टूरिज्म का अपना ही आकर्षण है। हमारा भारत जो त्योहारों का देश है, उसमें फेस्टिवल टूरिज्म की भी अपार संभावनाएँ हैं। हमारा प्रयास होना चाहिए कि होली हो, दिवाली हो, ओणम हो, पोंगल हो, बिहु हो इन जैसे त्योहारों का प्रसार करें और त्योहारों की खुशियों में अन्य राज्यों व देशों के लोगों को भी शामिल करें।

पीएम मोदी ने कहा कि गुरु नानक जी ने निस्वार्थ भाव से सेवा की। उनके इस सेवाभाव से कई सारे संत भी प्रभावित हुए। गुरुनानक देव जी ने अपना संदेश दुनिया में दूर-दूर तक पहुँचाया। वे अपने समय में सबसे अधिक यात्रा करने वालों में से थे। गुरुनानक देव जी छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई के ख़िलाफ़ मज़बूती के साथ खड़े रहे।

उन्होंने कहा कि अभी कुछ दिन पहले ही, करीब 85 देशों के राजदूत, दिल्ली से अमृतसर गए थे। वहाँ राजदूतों ने स्वर्ण मंदिर के दर्शन तो किए ही, उन्हें सिख परम्परा और संस्कृति के बारे में भी जानने का अवसर मिला। इसके बाद कई राजदूतों ने सोशल मीडिया पर वहाँ की तस्वीरें साझा की।

पीएम मोदी ने कहा कि हम सभी जानते हैं कि भारत के प्रथम गृह मंत्री के रूप में सरदार वल्लभभाई पटेल ने रियासतों को एक करने का एक बहुत बड़ा भगीरथ और ऐतिहासिक काम किया। सरदार वल्लभभाई पटेल की ये ही विशेषता थी जिनकी नज़र हर घटना पर टिकी थी। एक तरफ उनकी नजर हैदराबाद, जूनागढ़ और अन्य राज्यों पर केंद्रित थी, तो वहीं दूसरी तरफ उनका ध्यान सुदूर दक्षिण में लक्षद्वीप पर भी थी।

उन्होंने बताया कि 31 अक्टूबर को हर बार की तरह रन फॉर यूनिटी का आयोजन किया जा रहा है जिसमें समाज के हर वर्ग और हर तबके के लोग शामिल होंगे। ‘रन फॉर यूनिटी’ इस बात का प्रतीक है कि यह देश एक है। एक दिशा में चल रहा है और एक लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है। एक लक्ष्य- एक भारत श्रेष्ठ भारत। उन्होंने दिवाली के मौक़े पर देशवासियों से स्थानीय लोगों, बुनकरों और कारीगरों से सामान ख़रीदने का आग्रह किया।

अयोध्या दीपोत्सव: फिजी की मंत्री ने गाया- मंगल भवन अमंगल हारी, कहा- वहाँ के हर नागरिक का भारत आने का सपना

राम की नगरी अयोध्या में शनिवार (अक्टूबर 26, 2019) को उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से आयोजित दीपोत्सव में मुख्य अतिथि बनकर आई फिजी की मिनिस्टर वीणा कुमार भटनागर ने कार्यक्रम के संबोधन के दौरान रामचरित मानस की चौपाई ‘मंगल भवन अमंगल हारी’ गाया। वीणा ने जब सुरीली आवाज में चौपाई गायन शुरु किया तो उनके साथ कार्यक्रम में उपस्थिति भक्तजनों ने भी सुर में सुर मिलाते हुए चौपाई का गायन किया।

इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। बता दें कि अयोध्या में आयोजित हुए इस बार के दीपोत्सव को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज हो गया। दीपोत्सव में इस बार 5 लाख 51 हजार दीप जलाकर विश्व रिकार्ड बनाया गया। राम की पैड़ी के घाटों पर 4 लाख 10 हजार और अन्य 11 चुनिंदा स्थलों पर 1 लाख 51 हजार दीप जलाए गए।

फिजी की मंत्री और डिप्टी स्पीकर वीणा भटनागर सभा को संबोधित करते हुए ने कहा कि उन्हें भगवान राम के शहर में आने का अवसर मिला। इसके लिए वह खुद को भाग्यशाली मानती हैं। उन्होंने कहा कि वो बचपन से अयोध्या के बारे में सुनती आ रही हैं आज वो अयोध्या में हैं। भटनागर ने कहा कि वो यहाँ आकर धन्य हो गई। भटनागर ने यह विश्वास भी दिलाया कि अयोध्या में एक दिन भगवान राम के शासन में प्रचलित शासन की पौराणिक अवधारणा रामराज्य स्थापित होगी।

वहीं अपने भारत कनेक्शन के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो भले ही फिजी में रह रही हैं, लेकिन वो यहाँ भी हैं। उन्होंने कहा कि उनके पूर्वज भारत से फिजी चले गए, लेकिन वहाँ भी उनलोगों ने भारतीय मूल्यों, परंपराओं और संस्कृति को सहेज कर रखा है। वहाँ भी वो लोग भारतीय संस्कृति के साथ ही रहते हैं। उन्होंने कहा, “फिजी एक छोटा सा द्वीप है, लेकिन हमने भारतीय संस्कृति और भाषा को संरक्षित रखा है। हम दिवाली, दशहरा और अन्य भारतीय त्योहार मनाते हैं।”

वीणा भटनागर ने 1879 में फिजी में भारतीय प्रवास को याद करते हुए कहा कि वे उन्हें बाहरी न समझें। उन्होंने कहा, “मैं आप में से एक हूँ। मेरे पूर्वज यहीं के यूपी और बिहार से थे। भारतीय संस्कृति इतनी समृद्ध है कि हमने इसे सहेज कर रखा है। फिजी का हर नागरिक मरने से पहले कम से कम एक बार भारत आने का सपना देखता है।”

ISIS आतंकी सरगना बगदादी की मौत की खबर पर: ट्रंप ने कहा- कुछ बड़ा हुआ है, इस्लामिक आतंकवाद पर बड़ा कदम

इस्लामिक आतंकी संगठनों के खिलाफ हमेशा मुखर होकर कार्रवाई करने के पक्ष में रहने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर इस्लामिक आतंकवाद को निशाना बनाया है। 27 अक्टूबर की सुबह इस ओर इशारा करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने ट्वीट किया। ट्रम्प के इस बयान के आने के बाद से ही अंतर्राष्ट्रीय जगत में खलबली मची हुई है। इस्लामिक चरमपंथ को बढ़ावा देने वाले देश भी इस कार्रवाई के बाद से हक्का-बक्का बैठे हैं।

बता दें कि आतंकवाद पर नकेल कसने के लिए अमेरिका लम्बे समय से प्रयास करता आ रहा है, पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के वक़्त भी इस्लामिक आतंकवाद को लेकर उठने वाली चिंताओं के चलते यूएस ने पाकिस्तान और खाड़ी देशों में पलने वाले इस्लामिक आतंक के नासूर से निपटने के लिए ड्रोन हमले का रास्ता अख्तियार किया।

ट्रम्प ने सुबह-सुबह ट्वीट किया “अभी कुछ बड़ी घटना हुई है”। उनके इस बयान के बाद पूरी दुनिया की निगाहें उनके ऊपर टिक गई हैं। हमेशा ही अपने बयानों और अप्रत्याशित फैसलो के लिए मशहूर ट्रम्प इस बार क्या करेंगे या उन्होंने इस बार उनकी कार्रवाई का क्या परिणाम होगा। एक न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक अमेरिका ने इस्लामिक आतंकवाद को पनाह देने वाले इस्लामिक स्टेट के सरगना अबू बक्र अल बगदादी को निशाना बनाने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया है। जिसमें बगदादी के मारे जाने की खबर है। इसकी सूचना खुद ट्रम्प ने ‘कुछ बड़ा हुआ है…’ लिखकर बताया।

बता दें कि यह जिहादी संगठन पूरी दुनिया में इस्लाम के प्रचार के बहाने आतंक और खून-खराबा फ़ैलाने के लिए कुख्यात है। इसी साल एक अप्रैल को जारी एक वीडियो में बगदादी को देखा गया था। यद्यपि यह स्पष्ट नहीं है कि यह वीडियो कब फिल्माया गया है मगर यह तय है कि पाँच साल में पहली बार बगदादी किसी वीडियो के ज़रिए नज़र आया है। अपने इस वीडियो में वह पूर्वी सीरिया के बगूज़ में चल रहे संघर्ष ख़त्म होने की बात कहता नज़र आ रहा है। साथ ही बता दें कि कुछ समय पहले श्रीलंका में हुए आतंकी हमले में भी इसी संगठन के संलिप्त होने की बात कही जा रही है। श्रीलंका में तीन अलग अलग शहरों में सीरियल बम धमाके हुए थे। इस दौरान करीब 500 से अधिक लोग घायल हो गए थे तो वहीं 300 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था।

उन्नाव रेप आरोपित कुलदीप सिंह सेंगर के भाई मनोज सेंगर की हार्ट अटैक से मौत: रेप, हत्या सहित कई थे आरोप

उन्नाव दुष्कर्म मामले के आरोपित और भाजपा से निष्कासित विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के भाई की मौत की ख़बर सामने आई है। पता चला है कि कुलदीप सेंगर के भाई और पूर्व ब्लॉक प्रमुख मनोज सेंगर को दिल्ली में हार्ट अटैक आया था, जिसकी वजह से देर रात उसकी अचानक मौत हो गई।

ख़बर के अनुसार, रविवार सुबह 3 बजे मनोज की तबीयत ख़राब हो गई थी। इसके बाद उन्हें हॉस्पिटल लेकर जाया गया। उसके बाद उनकी मौत हो गई। मनोज दिल्ली रहकर बड़े भाई कुलदीप सिंह सेंगर के मुक़दमों की पैरवी कर रहे थे। इसके अलावा, मृतक मनोज सेंगर के ख़िलाफ़ पीड़िता के सड़क हादसे की घटना में सीबीआई में मुक़दमा दर्ज है। जबकि उन्नाव दुष्कर्म कांड के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर इस समय जेल में बंद है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामले की सुनवाई अब दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में हो रही है।

जुलाई महीने जब दुष्कर्म पीड़िता रायबरेली में अपने चाचा से मिलकर वापस उन्नाव जा रही थी, तभी उसकी कार को एक ट्रक ने टक्कर मारी थी। जिसमें उसकी मौसी और चाची की मौत हो गई थी, जबकि पीड़िता और उसके वकील गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

इस हादसे को लेकर कुलदीप सेंगर, उनके भाई मनोज सेंगर और आठ अन्य के ख़िलाफ़ सड़क दुर्घटना के एक मामले में पुलिस ने एक FIR दर्ज की थी। इन सभी के ख़िलाफ़ आईपीसी की कई धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई थी, जिनमें हत्या, हत्या का प्रयास, आपराधिक धमकी और आपराधिक साज़िश शामिल हैं। रायबरेली में कार से टकराया यह ट्रक फतेहपुर के एक सपा नेता का था।

बता दें कि ‘सेंगर बंधुओं’ के हाथों हुए जघन्य अपराधों की फेहरिश्त उन्नाव दुष्कर्म मामले पर आकर नहीं ख़त्म होती। अपने लिए न्याय की गुहार लगा रहे डीआईजी रैंक के उत्तर प्रदेश कैडर के एक आईपीएस अधिकारी राम लाल वर्मा पर ‘सेंगर बंधुओं’ ने चार गोलियाँ दागी थी, जो उनके सीने और पेट में लगी थीं। उत्तर प्रदेश में ख़ासा रसूख रखने वाले सेंगर बंधुओं ने आईपीएस अफसर वर्मा पर जानलेवा हमले के अहम दस्तावेज़ न सिर्फ़ ग़ायब करवाए थे, बल्कि मामले की सुनवाई भी वर्षों तक टलवा दी थी।

इस महीने की शुरुआत में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने गैंगरेप के एक दूसरे मामले में एक और चार्जशीट दाखिल की थी। इस चार्जशीट में कुलदीप सिंह सेंगर की क़रीबी शशि सिंह के बेटे शुभम सिंह का भी नाम शामिल थे। चार्जशीट के मुताबिक़, तीनों आरोपितों ने 4 जून की घटना के एक सप्ताह बाद कथित रूप से पीड़िता का अपहरण और सामूहिक बलात्कार किया था।

ग़ौरतलब है कि 4 जून 2017 को आरोपित कुलदीप सिंह सेंगर पर एक नाबालिग ने रेप का आरोप लगाया था और 11 जून को पीड़िता अचानक गायब हो गई। पुलिस ने नाबालिग को 20 जून को ओरैया से बरामद किया और अगले दिन उसे उन्नाव लाया गया। इस मामले की पूरी A से Z तक की कहानी जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

900 बच्चों के टेस्ट HIV पॉजिटिव: शहर में दहशत, आरोपित डॉ. मुजफ़्फर घनघोरो गिरफ़्तार

पाकिस्तान के छोटे शहर राटोडेरो में लगभग 900 बच्चे इस साल की शुरुआत में तेज़ बुखार से पीड़ित थे और उन्होंने इसके इलाज भी किया। लेकिन, बच्चों की बीमार दशा से माता-पिता काफ़ी चिंतित थे।

दरअसल, अप्रैल में, तेज़ बुखार का उपचार बेहद विनाशकारी साबित हुआ था। पूरा शहर HIV की चपेट में आ गया था और इससे सबसे ज्यादा बच्चे प्रभावित थे। शुरूआत जाँच में, स्वास्थ्य अधिकारियों ने एक बाल रोग विशेषज्ञ को इस समस्या का दोषी ठहराया, क्योंकि उसने बच्चों को इंजेक्शन लगाने के दौरान एक ही सीरिंज का उपयोग बार-बार किया था।

उसके बाद लगभग 1,100 नागरिकों का टेस्ट किया गया जो HIV पॉजिटिव पाए गए। इसका मतलब यह हुआ कि प्रत्येक 200 निवासियों में से एक HIV से ग्रसित था। स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना ​​है कि पीड़ितों की संख्या इससे अधिक हो सकती है क्योंकि फ़िलहाल जिन लोगों का टेस्ट किया गया है वो कुल आबादी का एक छोटा सा हिस्सा हैं। 

अप्रैल में, एक स्थानीय पत्रकार गुलबहार शेख ने शहर में फैले इस प्रकोप की ख़बर ब्रेक की थी, उन्होंने देखा कि उनके पड़ोसी और रिश्तेदार इस वायरस के टेस्ट के लिए क्लीनिक के चक्कर लगा रहे हैं।

ख़बर के अनुसार, इस मामले की जाँच के लिए जब अधिकारियों ने राटोडेरो शहर का दौरा किया तो उन्होंने पाया कि अधिकतर संक्रमित बच्चे एक ही बाल रोग विशेषज्ञ मुजफ़्फर घनघोरो के पास गए थे, जो शहर के सबसे ग़रीब परिवारों की सेवा करते थे।

इस बात से पत्रकार शेख घबरा गए क्योंकि डॉ मुजफ़्फर घनघोरो उनके बच्चों के भी बाल रोग विशेषज्ञ थे। उन्होंने तुरंत अपने परिवार का भी टेस्ट करवाया और तब उन्हें पता चला कि उनकी 2 वर्षीय बेटी भी इस HIV वायरस से ग्रसित थी।

44 वर्षीय टीवी पत्रकार शेख का कहना है कि इस शहर की कुल आबादी 200,000 है। यहाँ के लोग पाकिस्तान के सबसे ग़रीब लोग हैं, साथ ही शिक्षा का स्तर भी बहुत गिरा हुआ है। ऐसे हालत में यहाँ के लोगों पास केवल डॉ मुजफ़्फर घनघोरो ही एकमात्र विकल्प हैं। उनके इलाज की फीस 20 सेंट थी यानि महीने भर में वो 60 डॉलर से कम कमाते थे।

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ मुजफ़्फर घनघोरो ने इम्तियाज जलबानी के सभी छ: बच्चों का इलाज किया, जिनमें से चार HIV से ग्रसित थे और उनके दो सबसे छोटे बच्चे, जिनमें 14 महीने की रिदा और 3 साल की समीना की मौत हो गई।

मजदूर जलबनी के अनुसार, जब वो अपने 6 वर्षीय बेटे का इलाज कराने डॉ मुजफ़्फर घनघोरो के पास पहुँचा तो उसने देखा कि उन्होंने एक अन्य बीमार व्यक्ति अली के इंजेक्शन लगाने के लिए कचरे में से सिरिंज निकाली। यह देखकर वो सहम गया और उसने डॉ घनघोरो से इसका विरोध किया। इस विरोध पर डॉ मुजफ़्फर घनघोरो ने भड़कते हुए कहा वो एक पुरानी सिरिंज का उपयोग कर रहा है क्योंकि वो नई सिरिंज ख़रीदने में सक्षम नहीं है।

इसके आगे उन्होंने कहा, “अगर आप मुझसे इलाज नहीं कराना चाहते, तो किसी अन्य डॉक्टर के पास जाएँ।” इस पर जलबानी ने कहा, “मुझे और मेरी पत्नी को दवा की फीस देने के लिए भूखा रहना पड़ा है।”

डॉ मुजफ़्फर घनघोरो को पुलिस ने लापरवाही, हत्या और ग़ैर-क़ानूनी तरीके से नुकसान पहुँचाने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया है। लेकिन उन्हें अभी तक दोषी नहीं ठहराया गया है। द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए साक्षात्कार में, उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा वो निर्दोष हैं और उन्होंने कभी भी सीरिंज का दोबारा इस्तेमाल नहीं किया।

वकील मुकेश शर्मा की हत्या का मास्टरमाइंड नासिर गिरफ्तार, ससुर जुबैर के साथ वारदात को दिया अंजाम

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मेरठ में ब्राह्मण महासभा से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता मुकेश शर्मा की हत्या के मुख्य आरोपित नासिर को दिल्ली से गिरफ्तार किया है। उस पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने 10 हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया था। नासिर खान ने अपने ससुर जुबैर के साथ मिलकर 18 अक्टूबर को अधिवक्ता के घर के पास गोली मारकर उसकी हत्या कर दी थी।

घटना शुक्रवार (18 अक्टूबर) रात 9:30 बजे की है। मुकेश शर्मा खाना खाकर बाहर टहलने निकले थे। इसी दौरान घात लगाए हमलावरों ने उनके घर से क़रीब 400 मीटर की दूरी पर प्राइमरी स्कूल के पास घेरकर उनके सिर में गोली मार दी। इसके बाद हमलावर वहाँ से फ़रार हो गए। गंभीर अवस्था में परिजन उन्हें अस्पताल ले गए, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। 

डीसीपी डॉ जी राम गोपाल नाइक ने बताया कि वांछित बदमाशों की धरपकड़ के लिए एसीपी श्वेता सिंह चौहान के निर्देशन में इंस्पेक्टर कुलदीप सिंह के नेतृत्व में टीम का गठन किया था। बदमाशों के बारे में जानकारी जुटाए जाने के दौरान सूचना मिली कि हत्या के एक मामले में वांछित बदमाश ओखला मंडी के पास अपने दोस्त से मिलने के लिए आने वाला है। जिसके बाद पुलिस ने नासिर को ओखला मंडी से गिरफ्तार किया

पूछताछ में नासिर ने बताया कि उसने और उसके ससुर जुबैर ने 700 गज जमीन वकील मुकेश के भतीजे अभिषेक से खरीदी थी। मृतक की फैमिली का आपस में जमीन के बँटवारे को लेकर विवाद चल रहा था। मुकेश 37 लाख रुपए लौटा भी नहीं रहा था और जमीन की रजिस्ट्री भी नहीं करवा रहा था। इसलिए मुकेश के भतीजे अभिषेक, नासिर, जुबैर और उनके परिजनों ने उनकी हत्या कर दी।

इस मामले में पाँच आरोपितों को यूपी पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। जिसमें ओमकार, योगेश, चेतन, नौशाद और ज़ुबैर का नाम शामिल है। गौरतलब है कि मृतक मुकेश शर्मा मेरठ बार एसोसिएशन के सदस्य और ब्राह्मण सभा के भी पदाधिकारी थे। हत्या की इस घटना के बाद गुस्साए ग्रामीणों ने अस्पताल में पुलिस अधिकारियों का घेराव किया था और कई घंटों तक शव का पंचनामा नहीं भरने दिया था। वहीं घटना की जानकारी मिलते ही भारी संख्या में अधिवक्ता भी अस्पताल पहुँचे थे।

बता दें कि नासिर और उसके साथियों जुबैर, नौशाद आरिफ और शमशेर ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी और जून 2018 में सदर तहसील के सामने मुकेश शर्मा पर नासिर, ज़ुबैर और जियाउल हक़ ने जानलेवा हमला भी किया था। जिसका मुक़दमा सदर बाजार थाने में दर्ज है। हालाँकि, इस मामले में पुलिस ने गिरफ़्तारी नहीं हुई थी। आरोपित कोर्ट से स्टे ले आए थे, मगर इस मुक़दमे में चार्जशीट दाखिल है।

बग्वाल: जहाँ बिना आतिशबाजी और पटाखों के मनाया जाता है प्रकाशपर्व दीपावली

त्योहार और उत्सव का मौसम हो और इसमें उत्तराखंड का ज़िक्र न आए यह संभव ही नहीं है। दीपावली के त्यौहार को लेकर देशभर में तैयारियाँ जोरों पर हैं। लेकिन उत्तराखंड में यह प्रकाशपर्व यानी दीपावली बिना पटाखे, आतिशबाजियों और वैचारिक प्रदूषण के ही ख़ास तरीके से मनाया जाता है। देवभूमि कहे जाने वाले इस राज्य में दीपावली को इगास और बग्वाल कहा जाता है। यह बग्वाल राज्य के अलग-अलग स्थानों में दिवाली से 11 दिन बाद और ठीक एक महीने बाद मनाई जाती है। इसके पीछे कारण उत्तराखंड का इतिहास और जनजातीय परम्पराएँ हैं।

दरअसल, उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में दीवाली मनाने के तौर-तरीके देश के अन्य इलाकों से काफी अलग हैं। गढ़वाल में एक नहीं बल्कि चार-चार दीपावली मनाने की परम्परा है। स्थानीय भाषा में इन्हें अलग-अलग नाम दिया गया है। गढ़वाल में कार्तिक दीपावली के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में इगास, राज और मार्गशीर्ष दीपावली भी धूमधाम से मनाई जाती हैं। इन्हें भी लोग कार्तिक दीपावली की तरह मनाते हैं।

राज दिवाली

टिहरी जनपद में इस दीपावली से एक दिन पूर्व ‘राज’ दीपावली को मनाने की अनोखी परम्परा है। इस दीपावली को सिर्फ एक ख़ास जाति के लोग, यानी केवल डोभाल जाति के लोग मनाते हैं। इन्हें इस दीपावली को मनाने का अधिकार रियासत के समय से मिला था, इसलिए यह प्रथा डोभाल जाति में आज भी प्रचलित है।

इगास

इसी तरह से कार्तिक दीपावली के ठीक ग्यारह दिन बाद आकाश दीवाली मनाई जाती है जिसे स्थानीय भाषा में ‘इगास’ कहते हैं। इसे मनाने के पीछे यह मान्यता है कि वनवास के बाद पांडवों में से चार भाई घर वापस लौट गए, लेकिन भीम कहीं युद्ध में फँस गए थे। माना जाता है कि ग्यारह दिन बाद ही भीम घर लौटे और इस तरह तब से आज तक यह आकाश दीपावली या इगास दिवाली मनाई जाती है।

यह भी पढ़ें: बेटे की बलि देने वाले अकेले नहीं थे हज़रत इब्राहीम; जानिए वीर माधो सिंह की अमर गाथा

दूसरी मान्यता उत्तराखंड के इतिहास से जुड़ी है। महाराजा के सेनापति माधो सिंह भंडारी एक बार तिब्बत के युद्ध में तिब्बतियों को खदेड़ते हुए दूर निकल गए। वह दीपावली के समय अपने घर नहीं लौट पाए थे। उस वक्त अनहोनी की आशंका के कारण पूरी रियासत में दीपावली नहीं मनाई गई थी। बाद में रियासत का यह सेनापति युद्ध में विजयी बनकर लौटा। यह खबर रियासत में दीपावली के ग्यारह दिन बाद पहुँच पाई थी। जिसके पश्चात् टिहरी के समीपवर्ती इलाकों में इगास का त्योहार मनाया जाता है।

बग्वाल: मार्गशीर्ष दीपावली

उत्तराखंड में कार्तिक दीपावली के ठीक एक माह पश्चात् मार्गशीर्ष की दीपावली मनाई जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘रिख बग्वाल’ कहते हैं। इस दिन उत्तराखंड के जनजातीय इलाकों जैसे- रवांई जौनपुर, जौनसार व बावर क्षेत्र में सीड़े, अरसे, पूरी-पकोड़े आदि पकवानों सहित चूड़ा कूटने की भी परम्परा है। ग्रामीण रात भर तांदी, गीत, राधे व पांडव नृत्य करते हुए उत्सव मनाते हैं। मार्गशीर्ष की इस दीपावली या बग्वाल पर आतिशबाजी का शोर नहीं होता और ना ही बारूद के प्रदूषण का खतरा।

इसे मनाने के लिए देवदार के पुराने पेड़ों की लकड़ियाँ और छाल इस्तेमाल किए जाते हैं। जिन्हें जलाकर पारंपरिक उत्सव मनाए जाते हैं।

उत्तराखंड में दीपावली के 11 दिन या एक माह बाद माने जाने के पीछे एक और मान्यता बताई जाती है। कहा जाता है कि गढ़वाल क्षेत्र में भगवान राम के अयोध्या पहुँचने की खबर दीपावली के ग्यारह और कुछ स्थानों में एक माह बाद मिली और इसीलिए ग्रामीणों ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए बाद दीपावली का त्योहार मनाया था और इसी परंपरा को निभाते गए।

देवदार की लकड़ियों से बने ‘भैलू” से बग्वाल मनाते हुए ग्रामीण

लेकिन इन सबसे अलग इन त्योहारों को मनाने का तर्क यह माना जाता है कि जनजातीय इलाकों में लोग अपनी खेती में इस समय इतने व्यस्त होते हैं कि वो किसी त्यौहार की तैयारियाँ कार्तिक माह में नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से मार्गशीर्स के माह अपने समस्त कार्यों को निपटाने के बाद ही ग्रामीण लोग इस दीपावली को मनाते आए हैं।

उत्तराखंड भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का एक अनोखा संगम है और अब इन्ही परम्पराओं को सुरक्षित रखना भी यहाँ के स्थानीय लोगों के लिए एक गंभीर विषय बनता जा रहा है। अक्सर सरकार द्वारा भी इन परम्पराओं को बचाए रखने के लिए प्रयास किए जाते हैं। हालाँकि, पलायन जैसे संक्रामक रोग का असर फिर भी पूरे उत्तराखंड को लील रहा है और गाँव खाली होते जा रहे हैं। सवाल अब भी यही है कि जब गाँव में लोग ही नहीं रहेंगे तो फिर संस्कृति को सुरक्षित किसके लिए और आखिर कैसे रखा जा सकेगा?

किसी की नहीं सुनेंगे, बच्चा पैदा करने के लिए जो भी करना होगा, करेंगे मुस्लिम: बदरुद्दीन अजमल

असम सरकार की दो बच्चों की नीति पर ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के प्रमुख और सांसद बदरुद्दीन अजमल ने करारा हमला बोला है। अजमल का कहना है कि मुस्लिम बच्चे पैदा करते रहेंगे और वे किसी की नहीं सुनेंगे। बता दें कि असम भाजपा सरकार ने उन लोगों को सरकारी नौकरी नहीं देने का फैसला किया है, जिनके दो से अधिक बच्चे हैं। 

बदरुद्दीन अजमल ने शनिवार (अक्टूबर 26, 2019) को गुवाहाटी में कहा, “मैं निजी तौर पर मानता हूँ और हमारा धर्म भी मानता है कि जो लोग दुनिया में आना चाहते हैं, उन्हें आना चाहिए और उन्हें कोई रोक नहीं सकता है।”

असम में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार को निशाने पर लेते हुए बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि असम सरकार चाहे जो भी कानून बना लें, लेकिन मुस्लिमों पर उसका कोई असर नहीं पड़ने वाला है। उनका कहना है कि प्रकृति को छूने की कोशिश करना ठीक बात नहीं है। उन्होंने कहा कि बच्चा पैदा करने के लिए जो भी करना होगा, मुस्लिम करेंगे। बाद में यह मत कहना कि हमारे बच्चे अधिक हैं। साथ ही उन्होंने प्रकृति के साथ खिलवाड़ न करने की भी हिदायत दी।

बदरुद्दीन का कहना है कि असम सरकार मुस्लिमों को सरकारी नौकरी देने से रोकने के लिए यह कानून लाई है। उन्होंने कहा कि सचर समिति के अनुसार अभी 2 फीसदी से भी कम मुस्लिमों को सरकारी नौकरी मिलती है। अब मुस्लिम समुदाय के बीच भी साक्षरता बढ़ रही है और वो दुनिया भर में काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि एक तरफ RSS और मोहन भागवत कहते हैं कि 10-10 बच्चे पैदा करो और दूसरी तरफ सरकार कहती है कि जिनके दो से ज्यादा बच्चे होंगे उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। पहले यह तय कर लें कि वे क्या चाहते हैं। आरएसएस जो कहता है वे (बीजेपी सरकार) उसे मानते नहीं हैं।

उल्लेखनीय है कि असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल की कैबिनेट ने 22 अक्टूबर को यह फैसला लिया कि जिनके दो से ज्यादा बच्चे होंगे उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। कैबिनेट फैसले के मुताबिक 1 जनवरी, 2021 के बाद से दो से अधिक बच्चे वाले लोगों को कोई सरकारी नौकरी नहीं दी जाएगी।

4.5 साल में 2 सीएम देने वाली शिव सेना माँग रही 2.5 साल, उसकी गलती से ही भाजपा ने भोगा 15 साल का वनवास

शिव सेना की घुड़की भाजपा के लिए नई नहीं है। 2014 में भी जब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे तो बहुमत से दूर भाजपा के साथ आने में शिव सेना शुरू में तीन तेरह ही कर रही थी। भाजपा ने अल्पमत की सरकार बनाई और बाद में थक-हार शिव सेना भी सरकार में शामिल हो गई। हालॉंकि उस चुनाव में दोनों दल अलग-अलग लड़े थे। इसलिए, इस बार जब दोनों दल साथ-साथ विधानसभा चुनाव लड़ने मैदान में उतरे तो लगा कि शायद शिवसेना का खटराग न सुनाई पड़े।

लेकिन, 2014 के मुकाबले भाजपा की कुछ सीटें क्या गिरी शिव सेना को पुराने ढर्रे पर लौटने में वक्त नहीं लगा। सो, वह कथित ‘50:50 (सत्ता में समान हिस्सेदारी) फॉर्मूले’ की बात करने लगी। अब वह चाहती है कि बीजेपी उसे इस संबंध में लिखित आश्वासन दे। शिव सेना की इच्छा है कि बिल्ली के भाग्य से छींका छूटे और उसे 2.5 साल के लिए सीएम का पद मिल जाए। हालॉंकि उसकी यह इच्छा पूरी होती नहीं दिख रही।

2.5 साल के सीएम कुर्सी के लिए भाजपा के दर पर चिरौरी कर रही शिव सेना को राज्य में पहले एक बार सरकार चलाने का मौका मिल चुका है। उस सरकार में भाजपा भी साझेदार थी। तब शिव सेना की कमान उद्धव ठाकरे के पिता बाला साहेब के हाथों में थी। उस समय सरकार चलाने में शिव सेना की ओर से जो-जो नायाब प्रयोग किए गए थे, उसकी कीमत साझेदार होने के नाते भाजपा को भी चुकानी पड़ी थी। महाराष्ट्र की सत्ता में वापसी करने में फिर भाजपा को 15 साल लग गए, जबकि उस सरकार में भाजपा के कोटे से शामिल नितिन गडकरी जैसे मंत्रियों ने इतना शानदार काम किया था कि आज भी उसकी मिसाल दी जाती है।

1995 में बनी उस सरकार को बाल ठाकरे ने रिमोट कण्ट्रोल से चलाते थे। बाल ठाकरे को जब लगा कि मुख्यमंत्री मनोहर जोशी उनके हिसाब से नहीं चल रहे हैं, तो उन्होंने मुख्यमंत्री बदलने में देर नहीं लगाई। उसके बाद नारायण राणे को जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद 1999 में समय से पहले ही लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया।

इसके लिए उस समय की स्थिति को समझते हैं। शरद पवार को कॉन्ग्रेस ने निकाल बाहर किया था। उन्होंने एनसीपी की स्थापना की। तो इस हिसाब से इस चुनाव में एक नई पार्टी हिस्सा ले रही थी। उधर, दिल्ली में भी राजनीतिक उथल-पुथल चल रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मात्र 1 वोट से गिर गई थी और संसद में दिया गया उनका ओजस्वी भाषण घर-घर तक पहुँचा था। बावजूद इन चीजों के शिव सेना और भाजपा ने 6 महीने पहले ही विधानसभा भंग कर चुनाव कराने का फ़ैसला किया। आख़िर साढ़े 4 साल सरकार चलाने के बावजूद समय-पूर्व चुनाव की नौबत ही क्यों आई?

दरअसल, शिवसेना जिस स्टाइल से सरकार चला रही थी वह लोगों को रास नहीं आ रहा था। बाल ठाकरे को इसका ख़ूब भान था। इसलिए, लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव कराने का फ़ैसला लिया गया। इस उम्मीद में कि वाजपेयी नैया पार लगा देंगे।

यह भी देखिए कि आज जो पवार सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाले गठबंधन का हिस्सा हैं, कभी गाँधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठा कॉन्ग्रेस से बाहर निकले थे। पवार ने इसे भुनाया। उन्होंने जनता को यह बताने का प्रयास किया कि एक मराठा क्षत्रप के उभरने से कॉन्ग्रेस आलाकमान को दिक्कत है। अगर ध्यान से देखें तो शिव सेना, कॉन्ग्रेस और राजद जैसी वंशवादी पार्टियों से अलग नहीं है। बाल ठाकरे शायद अपनी राजनीतिक विरासत किसी और के हाथ जाने को लेकर कुछ ज्यादा ही आशंकित थे। अगर ऐसा न होते तो 2004 महाराष्ट्र चुनाव से ऐन पहले उन्होंने पार्टी में कार्यकारी अध्यक्ष का नया पद गठित कर इस पर अपने बेटे उद्धव को नहीं बैठाया होता।

यही कारण है कि चुनाव दर चुनाव जो शिव सेना महाराष्ट्र में राजग गठबंधन की मुख्य पार्टी होती थी, वह छोटा भाई बन कर रह गई। यह पार्टी की मज़बूरी ही थी कि उसे ऐसा करना पड़ा। भाजपा के विरोध के शिव सेना ने हिंदुत्व-विरोधी तरीके भी अपनाए, जिससे पार्टी की हिंदुत्ववादी छवि अवश्य ही कमज़ोर हुई और भाजपा बड़े भाई के रूप में उभरी। एक उदाहरण देखिए। जब 2015 में जब जैन त्योहार के दौरान सरकार ने एक दिन के लिए मीट प्रतिबंधित किया, तब शिव सेना ने उसका कड़ा विरोध किया। कई शिव सेना और मनसे समर्थक जैन मंदिरों से लेकर जैन सोसाइटियों के बाहर माँस का स्टॉल लगाने और चिकेन बनाते देखे गए। सामना में जैन समुदाय के ख़िलाफ़ ज़हर उगला गया। बाद में आदित्य ठाकरे को स्पष्टीकरण देना पड़ा। जैन साधुओं को मातोश्री जाकर उद्धव से मुलाक़ात करनी पड़ी।

उपर्युक्त कारणों जैसे कई अन्य कारणों से भी हिंदुत्व क्षेत्र में शिव सेना की साख पहले जैसी नहीं रही। जब उद्धव मुख्यमंत्री के साथ मंच साझा करना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझने लगे थे, तब देवेंद्र फडणवीस ने बाल ठाकरे की प्रतिमा स्थापित करने का ऐसा दाँव खेला कि उन्हें एक मंच पर आना ही पड़ा। कुल मिला कर देखें तो शिव सेना वो बादल है, जो गरजती ज्यादा है लेकिन बरसने के नाम पर एकाध बूँद भी आफत हो जाए। 1999 चुनाव में भी यही हुआ। लोकसभा चुनाव में वाजपेयी के नाम पर महाराष्ट्र की जनता ने भाजपा शिवसेना गठबंधन को 28 सीटें दी। उसी जनता ने गठबंधन को विधानसभा चुनाव में सत्ता से बेदखल कर दिया। एक साथ हुए चुनाव में दो विरोधाभासी परिणाम। जाहिर है सरकार चलाने की शिव सेना की शैली से लोग खुश नहीं थे।

1995 में जीत के बाद बाल ठाकरे, आडवाणी और मनोहर जोशी

शिव सेना की सरकार के दौरान मुख्यमंत्री तक पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे। मनोहर जोशी ने एक प्रमुख सरकारी ज़मीन को अपने दामाद को दे दिया, ताकि हाउसिंग कॉम्प्लेक्स बनाया जा सके। इस मामले में 2011 में टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री जोशी, जो ख़ुद को एक शिक्षाविद भी बताते हैं, उन्होंने अपने दामाद के व्यक्तिगत फायदे के लिए उक्त ज़मीन पर स्कूल बनवाया। कोर्ट ने कहा था कि अगर उनके दामाद गिरीश व्यास ने उस 15 मंजिला इमारत से अपना मालिकाना हक़ नहीं छोड़ा तो उसे गिरा दिया जाएगा। साथ ही जोशी पर 15,000 रुपए का जुर्माना लगाया। जोशी ने ख़ुद इस डील को मुख्यमंत्री रहते स्वीकृति दी थी और उस समय इसे लेकर काफ़ी विवाद हुआ था। तो ऐसे चली थी शिव सेना की सरकार।

जब बाल ठाकरे के रहते शिव सेना न तो सरकार ठीक से चला पाई और न ही वाजपेयी के जादू से भी अपनी नाकामी को छिपा पाई, वह उद्ध्व के नेतृत्व में कोई कमाल कर दिखाएगी ऐसी उम्मीद तो शिव सैनिकों को भी न होगी। इतना ही नहीं बीएमसी का शिव सेना किस तरीके से नेतृत्व करती है इसका नमूना हर साल बारिश में मुंबई सहित देश भर के लोग देखते हैं।

उद्धव के नेतृत्व में सिकुड़ती शिव सेना जानती है कि आज भाजपा और मोदी के बिना उसके सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो सकता है। कुछ क्षेत्र विशेष तक सीमित शिव सेना को हालिया वर्षों में जो राजनीतिक उभार मिला है उसके पीछे मोदी की ही लोकप्रियता है। वरना भाजपा से अलग होकर वह 2014 के विधानसभा और 2017 के बीएमसी चुनाव में नतीजे भुगत चुकी है। इसलिए देर सबेर शिव सेना का फिर उसी रास्ते पर लौटना तय है। तब तक उसके राजनीतिक फुफकार के मजे लीजिए!

हमने कांडा से किया किनारा, कॉन्ग्रेस थरूर को निकाल कर दिखाए: सुब्रह्मण्यम स्वामी

गोपाल कांडा पर भाजपा को घेरने की कोशिश करने वालों को पार्टी सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा है कि भाजपा ने तो कांडा से किनारा कर लिया। लेकिन, क्या उसी तरह के आरोप में फॅंसे अपने सांसद शशि थरूर के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत कॉन्ग्रेस में है।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “अब जबकि भाजपा ने पब्लिक ओपिनियन के आगे सर झुकाते हुए गोपाल कांडा को नकार दिया है। क्या कॉन्गी (कॉन्ग्रेसी) भी पब्लिक ओपिनियन के आगे सर झुकाते हुए मिस्टर शशि थरूर को पार्टी से बाहर करेंगे? उन पर अपनी पत्नी को अप्राकृतिक मौत के लिए उकसाने का अधिक गंभीर आरोप है।”

गौरतलब है कि 17 जनवरी 2014 को दिल्ली के होटल लीला में थरूर की पत्नी 51 वर्षीय सुनंदा पुष्कर मृत मिली थीं। उनकी मौत के बाद से पुलिस ने थरूर के खिलाफ़ आईपीसी की धारा 498-A और धारा -306 के तहत मामला दर्ज किया। फिलहाल वह जमानत पर हैं। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में अदालत से कॉन्ग्रेस सांसद के खिलाफ हत्या का मामला चलाने की इजाजत मॉंगी है।

सुस्वामी का यह बयान कॉन्ग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के भाजपा पर हमले के जवाब में आया है। तिवारी ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा था कि भगवा पार्टी राज्य में सरकार बनाने के लिए किसी का भी समर्थन ले लेगी, वह भी तब जब जनादेश ही उसके खिलाफ है। बकौल तिवारी, “कांदा, बटाटा, बैंगन, आलू सब चलेगा बीजेपी को। साम दाम दंड भेद- सरकार बनानी है बीजेपी को। हर गलत तरीके से, जबकि जनादेश भी उनके खिलाफ है। हुँह, पार्टी विथ अ डिफ़रेंस!”

हरियाणा विधानसभा चुनाव का परिणाम सामने आने के बाद हरियाणा लोकहित पार्टी के प्रमुख गोपाल कांडा ने भाजपा को समर्थन देने का ऐलान किया था, जिसको लेकर विपक्षी दलों ने काफी बवाल काटा। हालाँकि, भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि उसने न तो कांडा से समर्थन मॉंगा था और न ही वे उसकी सरकार में होंगे। कांडा के ख़िलाफ़ एक एयर होस्टेस की आत्महत्या से जुड़ा मामला चल रहा है।