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होटल के लिफ्ट में बलात्कार के आरोपित तरुण तेजपाल की मुश्किलें बढ़ीं, 7 अक्टूबर से सुनवाई

यौन शोषण के आरोपित पत्रकार तरुण तेजपाल मामले में कोर्ट ने सुनवाई के लिए तारीख दे दी है। ख़बर के अनुसार, 7 अक्टूबर से उनके ख़िलाफ़ ट्रायल शुरू किया जाएगा। तरुण तेजपाल पर उनकी ही एक सहयोगी ने यौन शोषण का आरोप दर्ज कराया था। तहलका के संस्थापक संपादक रहे तेजपाल फ़िलहाल जमानत पर बाहर रहे हैं। गोवा डिस्ट्रिक्ट एन्ड सेशन जज क्षमा जोशी ने सुनवाई के लिए अगली तारीख 7 अक्टूबर को मुक़र्रर की है। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट बेंच ने ट्रायल कोर्ट को 6 महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने को कहा था।

तरुण तेजपाल ने कोर्ट से दरख्वास्त करते हुए कहा कि अगली तारीख नवंबर में दी जाए, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। 2013 के इस मामले के आरोपित तरुण तेजपाल ने कहा है कि ‘सच्चाई बाहर आएगी।’ तेजपाल ने इस बात की पुष्टि की कि अगले 6 महीने में सुनवाई पूरी हो जाएगी। इसी वर्ष अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ लगे आरोपों को खारिज करने से इनकार कर दिया था। गोवा पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि उसे तरुण तेजपाल के कुछ व्हाट्सएप्प मैसेज और इमेल्स मिले हैं, जिसके आधार पर उन्हें इस मामले में ट्रायल का सामना करना पड़ेगा।

पुलिस ने तरुण तेजपाल की उस याचिका का विरोध किया था, जिसमें उन्होंने ख़ुद पर लगे आरोपों को ख़ारिज करने की माँग की थी। गोवा पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि तेजपाल के ख़िलाफ़ ट्रायल चलाने के लिए उसके पास पर्याप्त सबूत हैं। तरुण तेजपाल पर आरोप है कि उन्होंने लिफ्ट में अपनी सहयोगी का बलात्कार किया। उन पर बलात्कार, यौन शोषण और दुर्व्यवहार के मामले दर्ज किए गए थे। पीड़िता के मुताबिक़, तेजपाल ने ‘तहलका’ के वार्षिक कार्यक्रम ‘थिंक फेस्ट’ के दौरान उसका बलात्कार किया।

हालाँकि, तरुण तेजपाल के वकील विकास सिंह ने कहा है कि वरिष्ठ पत्रकार पर लगाए गए आरोप मनगढंत हैं और उनकी छवि को ख़राब करने के लिए लगाए गए हैं। तेजपाल की अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज होने के बाद उन्हें नवंबर 2013 में क्राइम ब्रांच ने गिरफ़्तार किया था। मई 2014 के बाद से वह जमानत पर बाहर हैं।

36 घंटे में केवल 1 ने बेचे ₹750 करोड़ के फोन: क्या जनता बिना कच्छों के मोबाइल चला रही?

भारत में अंडरवियर की गिरती बिक्री को लेकर मंदी की बात कही गई थी। रवीश कुमार सरीखे पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर लम्बे-चौड़े लेख लिख कर बताया था कि किस तरह कच्छों की बिक्री का गिरना भारत की गिरती अर्थव्यवस्था का राज़ खोलता है। खैर, स्थिति को ज्यादा से ज्यादा भयावह बताने के लिए तरह-तरह की बातें कही गईं। अमेरिकी फ़ेडरल रिजर्व बोर्ड के अध्यक्ष रहे एलन ग्रीनस्पैन ने यह थ्योरी दी थी कि किसी भी देश में अण्डरवियर्स की बिक्री में बढ़ोतरी या गिरावट से उस देश की अर्थव्यवस्था का पता चलता है। इसीलिए, ‘मेन्स अंडरवियर इंडेक्स’ जारी किया जाता है।

यह पाया गया कि भारत में जून क्वार्टर में चोटी पर मौजूद 4 अंडरवियर की कंपनियों की बिक्री में पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा गिरावट देखने को मिली। भारत का लगभग 28,000 करोड़ रुपए का इनरवियर बाजार कपड़ों का बाजार का कुल 10% हिस्सा है। ख़ैर, ये तो थी अंडरवियर की बिक्री की बात, जिसे लेकर बहुत ज्यादा डर का माहौल बनाने की कोशिश की गई। अब ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल्स अमेज़न और फ्लिपकार्ट के कुछ ताज़ा आँकड़ों पर नज़र डालते हैं। क्या सचमुच लोगों के पास रुपया नहीं है? या फिर वे रुपए होते हुए भी ख़र्च नहीं करना चाह रहे? या फिर वे कुछ ख़ास चीजों पर ही पैसे ख़र्च करना चाह रहे?

इन सब पर बात करने से पहले जरा आँकड़े देख लेते हैं। ऑनलाइन फेस्टिव सीजन शुरू हो चुका है। त्योहारों की शुरुआत के साथ ही भारत के दोनों टॉप ऑनलाइन रिटेलर्स आपस में एक ‘युद्ध’ करते हैं, जिसमें आँकड़ों की लड़ाई होती है। शनिवार (सितम्बर 28, 2019) को शाम 8 बजे फ्लिपकार्ट का ‘बिग बिलियन डे’ शुरू हो गया। अमेज़न का ‘ग्रेट इंडियन फेस्टिवल सेल’ भी उसी दिन दोपहर को शुरू हुआ। हालाँकि, पहले 12 घंटों के लिए यह सिर्फ़ प्राइम उपभोक्ताओं के लिए था। इसके बाद इसे अन्य यूजर्स के लिए भी खोल दिया गया। अब जरा सबसे पहले फ्लिपकार्ट के आँकड़े देखिए।

फ्लिपकार्ट प्रत्येक वर्ष फेस्टिवल सेल आयोजित करता है। त्योहारों के मौके पर आयोजित किए जाने वाले ‘बिग बिलियन डे’ पिछले वर्ष 2018 में भी मनाया गया था। पिछले वर्ष तो मंदी की बातें नहीं चल रही थीं। कच्छों की बिक्री भी सही थी। फिर भी, अगर पहली दिन की बिक्री की बात करें तो फ्लिपकार्ट ने 2018 के आँकड़े को इस वर्ष 2019 में पीछे छोड़ दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि कम्पनी ने बिक्री में पिछले वर्ष के मुक़ाबले 10% या 25% बढ़ोतरी नहीं दर्ज की है, बल्कि सीधे दोगुना ज्यादा व्यापार किया है। जी हाँ, दोगुना। अपने ‘ट्रेवल’ केटेगरी में तो कम्पनी ने पिछले साल के मुक़ाबले कमाई में 12 गुना ज्यादा वृद्धि दर्ज की।

हाँ, इसे लेकर भी भ्रम फैलाया जा सकता है कि ये तो महानगरों के लोग शॉपिंग कर रहे होंगे। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बंगलौर जैसे शहरों में ज्यादा ख़रीददारी हो रही होगी। लोग ये कह कर भी भ्रम फैला सकते हैं कि ये आँकड़े छोटे शहरों के नहीं हैं, बल्कि बड़े महानगरों के हैं। लेकिन फ्लिपकार्ट के अनुसार, टायर-1 सिटीज नहीं बल्कि टायर-2, 3 और 4 के शहरों में ग्राहकों की संख्या 2018 के मुक़ाबले दोगुनी हो गई है। क्या कच्छों को लेकर मंदी की बात करने वाले अब मानेंगे कि जनता रुपए ख़र्च कर रही है और उनकी वित्तीय हालत उतनी भी पस्त नहीं है, जितना दावा किया जा रहा था।

फ्लिपकार्ट के चीफ एग्जीक्यूटिव कल्याण कृष्णमूर्ति कहते हैं कि यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा फेस्टिवल सेल होने जा रहा है। कम्पनी के ‘ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू (GMV)’ भी इस वित्तीय वर्ष 1 ट्रिलियन डॉलर होने जा रहा है। यानी पिछले वित्तीय वर्ष के मुक़ाबले 45% की वृद्धि। क्या यह सब जनता ने बिना रुपए ख़र्च किए ही संभव बना दिया? फ्लिपकार्ट पर मिलने वाले सामानों की बिक्री तभी बढ़ी होगी जब पब्लिक ने उन चीजों को ख़रीदा होगा। जनता ने उन चीजों को तभी ख़रीदा होगा, जब उसके पास पैसे होंगे। सीधा मतलब यह है कि पब्लिक ने पिछले साल के मुक़ाबले दोगुना ज्यादा रुपए ख़र्च किए।

अब बात जरा अमेज़न की कर लेते हैं। अमेज़न इंडिया के प्रमुख अमित अग्रवाल ने बताया कि इस फेस्टिव सीजन कम्पनी के ‘प्राइम साइन-अप’ के लिए सबसे अच्छा दिन देखा। अर्थात, कम्पनी के इतिहास में आज तक के इतिहास में एक दिन में सबसे ज्यादा ग्राहकों ने ‘प्राइम सदस्य’ के लिए रजिस्टर किया। अग्रवाल कहते हैं कि अमेज़न इंडिया ने उपभोक्ताओं और विक्रेताओं की भागीदारी में रिकॉर्ड बना लिया है। सबसे बड़ी बात कि यहाँ भी 91% ग्राहक टायर-2 और 3 शहरों के ही हैं। सोचिए, कुल उपभोक्ताओं में से मात्र 9% ही बाकी शहरों से हैं। कम्पनी ने अपना हिंदी इंटरफ़ेस लॉन्च किया है, इससे उसे काफ़ी फ़ायदा मिल रहा है।

अब जरा अमेज़न की भी बिक्री की बात कर लेते हैं। अगर पहले 36 घंटों की बात करें तो कम्पनी ने एप्पल, सैमसंग और वनप्लस कम्पनी के कई फोन बेचे। पहले 36 घंटों में अमेज़न इंडिया ने 750 करोड़ रुपयों का फोन बेचा है। टीवी सहित अन्य बड़े उपकरणों की बिक्री में सामान्य दिनों के मुक़ाबले 10 गुना ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई। सामान्य दिनों के मुक़ाबले बिक्री की बात करें तो फैशन की चीजों में 5 गुना, ब्यूटी प्रोडक्ट्स के मामले में 7 गुना और ग्रोसरीज में साढ़े 3 गुना ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई। हालाँकि, कुल बिक्री के मामले में दोनों कंपनियों ने चुप्पी साध रखी है।

फिर भी, रिपोर्ट्स कहते हैं कि ऑनलाइन रिटेलिंग पोर्टल्स इन फेस्टिव सीजन में कुल 5 बिलियन डॉलर का कारोबार कर सकते हैं या फिर इससे ज्यादा भी। जाहिर है सवाल तो उठेंगे ही। अंडरवियर ख़रीदने से हिचक रही जनता आखिर मोबाइल फोन पर क्यों टूट रही है?

सोशल मीडिया के कथित लिबरल आर्थिक विशेषज्ञों तो बता रहे थे जनता एक-एक रुपए हिसाब से ख़र्च करना चाह रही है। उन्होंने कहा था कि अगर जनता के पास रुपए हैं भी तो वह बचा कर रख रही है। उन्होंने कहा था कि जनता कच्छे नहीं ख़रीद रही, यह बताता है कि वह ज़रूरी चीजों को ख़रीदने में भी हिचक रही है। अब मोबाइल फोन्स के साथ-साथ ब्यूटी व फैशन प्रोडक्ट्स की बिक्री में इतना बड़ा उछाल देखने के बाद तो यही पूछा जा सकता है कि क्या ये सब भी जीवन जीने के लिए एकदम परम अनिवार्य वस्तुएँ हैं?

ताकि, सनद रहे! बिहारियों की जान बहुत सस्ती है…

मैं बहुत देर से और काफी डरते-डरते यह पोस्ट लिख रहा हूँ, क्योंकि काफी लोगों की भावना आपा के आहत होने का डर है। फिर भी, पटना की डूब के बारे में दो-तीन बातें लिखनी जरूरी हैं…

1.) मैं मिथिलांचल का हूँ। अभिशप्त, बाढ़ का मारा। हमारे लिए बाढ़ के साथ जीना कोई नई बात नहीं है, जीवन जीने का ढर्रा है। 1986-87 की भीषण बाढ़ के समय मैं बालक ही था, तब से अब तक करीब चार-पांच प्रलयंकारी बाढ़ मिथिलांचल में आई है, पर…और यह बहुत बड़ा पर है कि वह बाढ़ थी, पटना का डूबना बाढ़ नहीं है, यह मनुष्य-निर्मित तबाही और बर्बादी है।

मिथिलांचल में केवल दरभंगा में सैकड़ों तालाब थे। उनमें से 300 को हमलोग लील गए। यहाँ तक कि राज-दरभंगा के किले को नहीं छोड़ा। झील जैसे बड़े तालाबों को लील गए या अतिक्रमित करते चले गए। इस होड़ में नेता, व्यापारी, प्रोफेसर, दुकानदार, मध्यवर्गीय परचून वाला आदि-इत्यादि सभी शामिल हैं। अब आपने पानी सोखने का रास्ता तो बंद किया ही, साथ ही ले आए- पॉलीथीन। इससे आपने रहे-सहे जल निकालने के रास्ते भी बंद कर दिए। नतीज़ा तो यही होना था।

2.) मुझे याद है, मैट्रिक में मुझे पहला फुलपैंट नसीब हुआ था। उसके पहले हमलोग हाफ पैंट पहनते थे और वो भी उन मामाओं का फुलपैंट कटवाकर जो हमारे साथ रहते थे। जब हमारे हाफपैंट भी घिस जाते थे, तो उसका थैला बनता था और वही थैला लेकर हमलोग बाजार जाते थे, चाहे सब्जी लानी हो, या गेहूँ पिसवाने चक्की पर जाना हो। अब सबकुछ रेडीमेड है, लेकिन यह भी जान लीजिए कि आशीर्वाद आटे में भी कुछ मिलावट की ख़बरें आई हैं।

मैं व्यक्तिगत तौर पर दावा नहीं करता कि मैं बिल्कुल प्राकृतिक जीवन जी रहा हूँ, पर हाँ, बाज़ारवाद के चपेट में अब तक नहीं आया हूँ। सरकारें तो अजीब होती ही हैं, पहले समस्या (पॉलीथीन या दारू) निर्मित करो और फिर उनके समाधान खोजो।

3.) तीसरी और अंतिम समस्या है नीचे के पोस्ट की तस्वीरें। आज कमोबेश पंद्रह वर्षों से जदयू-भाजपा युति की सरकार है। अभी चंद महीनों पहले डिप्टी सीएम अपने घर के बाहर थोड़े दिन की बारिश के बाद पायजामा उतारे नज़र आए थे (उस बार नालंदा मेडिकल कॉलेज और पीएमसीएच में मछलियां तैर रही थीं)….इस बार तो एनडीआरएफ को उन्हें बचाना पड़ा। पाजामा भी घर पर ही छूट गया। सुशासन बाबू तो अटरिया पर लोटन कबूतर बने ही हैं।

यह भी चंद दिनों का ख़ब्त है। अभी आप पूरे देश के बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं को केरल और चेन्नै के बहाने गाली दे रहे हैं, लेकिन यह भूल जा रहे हैं कि आज के युग में आर्थिक बल ही सब कुछ है। बिहार यहाँ नीचे से पहले पायदान पर है। आईएएस-आईपीएस के बाद अब आपका नया खटराग केबीसी के विजेताओं का है, पर उद्योग-धंधे, खेती, सेवाएँ वगैरह कहाँ हैं…क्या आप सुशासन कुमार से लेकर डिप्टी सीएम का कॉलर थामेंगे अगली बार…या जयकारा ही लगाएँगे…

सुशासन कुमार ने तो प्रकृति पर लांछन लगाकर अपना कर्तव्य पूरा किया। हालाँकि कोशी हादसे के 700 करोड़ या पटना में स्मार्ट सिटी के नाम पर अरबों के ड्रेनेज प्रोजेक्ट और मेट्रो को कहाँ घुसा दिया, यह बताते नहीं हैं।

खैर, तीन-चार दिनों की बात है। वैसे भी इस देश में इंसानों की और खासकर बिहारियों की जान बहुत सस्ती है।

-व्यालोक पाठक

बिहार में बाढ़: न पहली, न आखिरी बार… आखिर क्यों डूबते हैं शहर?

मेरे गोपालगंज का उदाहरण देख लीजिए। मुझे लगता है कि आज से 30 साल पहले तक गोपालगंज शहर के लिए “बाढ़ का कहर” एक काल्पनिक बात रही होगी। 30 साल पहले तक गोपालगंज शहर के बीच से हो कर कुल 6 बरसाती नदियाँ-नाले निकलते थे। इनमें जो सबसे पतला नाला था उसकी चौड़ाई भी 30-40 फीट से कम नहीं होगी। यह गोपालगंज का प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम था जो बरसात के जल को घण्टे भर में शहर के बाहर खेतों, चँवर आदि में छोड़ आता था। ऐसा जबरदस्त सिस्टम कि एक बार पूरी गंडक नदी ही घूम जाए गोपालगंज की ओर तब भी शहर नहीं डूबता।

आज 30 साल से कम आयु के लोगों में किसी ने उन 6 में से 4 नदियों का नाम तक नहीं सुना। आज उनका कोई चिह्न तक नहीं। शेष दो नदियाँ आज तीन-तीन फीट चौड़ाई वाले नालों में बदल गई हैं। आज मात्र चार दिनों की बरसात में मेरा शहर डूब गया है।

जानते हैं नदियाँ कहाँ गईं? उसे शहर का मध्यम वर्ग खा गया, गरीब खा गए। सच कह रहा हूँ, नदियों की जमीन पर न किसी बड़े बिल्डर का घर बना है न किसी नेता-अफसर का। सब आम लोग छेक के घर बनवाए हैं। ये वही आम लोग हैं जो आज बाढ़ के लिए कभी सरकार को तो कभी भगवान को दोषी ठहरा रहे हैं।

आपको आश्चर्य होगा, सरकारी भू-मापन के नक्शे में सारे नदी-नाले जीवित हैं। इस लेख को लिखने के पहले मैंने शहर के सबसे सीनियर अमीन दिनेश्वर मिश्र जी से बात की थी। उन्होंने बताया कि नक्शे में सारी जमीन दर्ज है, जमीन पर सब गायब हो गया है।

हुजूर! यही हैं हम। यही है हमारा देश… आज केवल मेरा शहर नहीं डूबा, मेरा पूरा राज्य डूब गया है। छपरा, सिवान, पटना सब डूबे हुए हैं। शहर यदि नदियों के बाढ़ से डूब जाएँ तो बात समझ में आती है, पर बरसात से डूबें तो बात समझ में नहीं आती। सबके डूबने के पीछे यही एकमात्र कारण है।

क्या लगता है, पटना छपरा में इस तरह के नाले नहीं होंगे? बरसाती नदियाँ नहीं होंगी? एक-दो नहीं पचासों होंगी। सब को लूट लिया गया। कुछ को बड़े लोगों ने लूटा, कुछ को छोटे लोगों ने… जिसको जितना मौका मिला, उसने उतना लूटा।

कौन है दोषी? क्या केवल प्रशासन? क्या केवल सरकार? प्रशासन का दोष इतना है कि जब हम आत्महत्या कर रहे थे तो उसने हाथ नहीं रोका, लेकिन अपने पेट में छुरा हर बार हमने स्वयं मारा है। नदियों-नालों को न नीतीश ने बन्द किया है, न लालू ने। नदियों को हमने बन्द किया है।

शहरों को डूबाने के लिए हम भले प्रकृति को दोष दें, पर शहर प्रकृति के कारण नहीं वहाँ के लोगों के कुकर्मों के कारण डूबते हैं। पहले हम डूबे हैं, उसके बाद शहर डूबा है। मेरा राज्य हर वर्ष डूबेगा। न नीतीश रोक पाएंगे, न लालू… हाँ, कोई ऐसा पागल आए जो जबरदस्ती इन चोरों से अपनी सरकारी जमीन छीने, तो शायद स्थितियाँ कुछ सुधरे। यह देश अब अच्छे लोगों से नहीं, हिटलरों से सुधरेगा।

कहीं पढ़ा था, हमारे देश में अधिक से अधिक 50 करोड़ लोगों के जीने लायक संसाधन है। अभी हम लगभग 150 करोड़ हैं, अर्थात क्षमता से तीन गुने… हम यदि अब भी नहीं रुके तो डूबना तय ही है। कोई नहीं बचा सकता…

(लेखक सर्वेश तिवारी श्रीमुख बिहार के गोपालगंज के रहने वाले हैं )

सुप्रीम कोर्ट में फिर खड़े हुए रामलला के 92 वर्षीय वकील, दलीलों से मुस्लिम पक्षकार पस्त

राम मंदिर मामले में सोमवार (सितम्बर 30, 2019) को 34वें दिन की सुनवाई हुई। इस दौरान के. पराशरण ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें रखीं। पराशरण ने उपनिषदों और महाभारत का हवाला देकर अपने तर्कों को रखा। रामलला विराजमान के 92 वर्षीय वकील ने मुस्लिम पक्षकारों द्वारा पिछले कुछ दिनों में कही गई बातों का एक-एक कर जवाब दिया। पराशरण ने इस मामले में न्यायिक व्यक्ति को हिन्दू क़ानून के अनुसार देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि हिन्दू देवता को रोमन और अंग्रेजी क़ानूनों के अनुसार नहीं देखा जा सकता।

पराशरण ने अपनी इस दलील को दोहराया कि जन्मस्थान एक न्यायिक व्यक्ति है। इसे साबित करने के लिए उन्होंने कोर्ट के ही कुछ अन्य फ़ैसलों का जिक्र किया। समझाया कि हिन्दू धर्म में एक ही ईश्वर है, जो परम आत्मा है। उन्होंने आगे कहा कि इसी ईश्वर की विभिन्न मंदिरों में और विभिन्न स्वरूपों में पूजा की जाती रही है। पराशरण के दावों से बौखला कर सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि इन बातों का इस केस से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने उदाहरण दिया था, तब उन्हें कोर्ट ने टोका था। धवन ने कोर्ट को निष्पक्ष रहने की सलाह दी।

पराशरण ने धवन की दलीलों को काटते हुए कहा कि विवादित स्थल पर मूर्ति होने या न होने से इस मामले पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। उन्होंने समझाया कि पूजा-स्थल का मुख्य उद्देश्य ईश्वर की पूजा है और वहाँ मूर्ति हो भी सकती है और नहीं भी। पराशरण ने मुस्लिम पक्ष से कहा कि मूर्ति न होने की बात कह कर जन्मस्थान पर सवाल उठाना एक ग़लत तर्क है। धवन की आपत्ति पर पराशरण ने कहा कि उन्होंने ख़ुद हिन्दू पक्ष की दलीलों पर 4 दिन जवाब दिया लेकिन अब सवाल खड़े कर रहे हैं। पराशरण ने कहा कि वो अदालत में जो भी कह रहे हैं, उसका कुछ न कुछ मतलब है।

इससे पहले मुस्लिम पक्षकार निज़ाम पाशा ने कहा कि मस्जिद में स्तम्भ न होने की बात कहना सरासर ग़लत है क्योंकि हदीस में इसका जिक्र है कि नमाज 2 खम्भों पर बनी दीवार पर पढ़ा जाता है। उन्होंने कहा कि बहस धार्मिक पहलुओं पर नहीं बल्कि क़ानूनी पहलुओं पर होनी चाहिए। वहीं मुस्लिम पक्ष की दलीलों का जवाब देते हुए भारतीय न्यायिक व्यवस्था के भीष्म पितामह कहे जाने वाले पराशरण ने कहा:

“स्वयंभू दो प्रकार के होते हैं। एक वह जो ख़ुद प्रकट होते हैं और एक वो जिनकी स्थापना मूर्ति में की जाती है। हमारे यहाँ भूमि भी स्वयंभू ही होती है। यह ज़रूरी नहीं है कि भगवान का कोई निश्चित रूप हो लेकिन सामान्य लोगों को पूजा करने के लिए किसी आकार या आकृति की आवश्यकता पड़ती है। आकृति के होने से उस पर लोगों का ध्यान केंद्रित होता है। दूसरी तरफ जो लोग अध्यात्म में काफ़ी ऊपर उठ चुके होते हैं, उन्हें पूजा वगैरह के लिए किसी आकृति या स्वरूप की ज़रूरत नहीं पड़ती।”

जस्टिस बोबडे ने पराशरण से पूछा था कि उन्हें इस भूमि को एक न्यायिक व्यक्ति या ज्यूरिस्टिक पर्सन साबित करने के लिए इसे ‘दिव्य’ या ‘ईश्वरीय’ साबित करने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? पराशरण ने बताया कि मूर्ति अपने-आप में भगवान नहीं है, लेकिन स्थापना के बाद उसमें दिव्यता आ जाती है। उन्होंने बताया कि ऐसी मूर्ति में स्थापित ईश्वर लोगों की भावनाओं और आस्थाओं का प्रतीक होते हैं। उन्हें समर्पित की गई चल व अचल संपत्ति के भी वह स्वामी होते हैं।

पराशरण ने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि विपत्ति के समय भगवान प्रकट होकर भक्तों की रक्षा करते हैं। उन्होंने जस्टिस बोबडे के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि महाभारत के युद्ध के दौरान भी भगवान श्रीकृष्ण के शास्त्र उठाए बिना पांडवों को जीत मिल गई थी। इस उदाहरण के पीछे का आधार समझाते हुए पराशरण ने कहा कि भक्तों की आस्था ही इतनी मजबूत होती है कि उसके लिए भगवान को आना पड़ता है।

स्टिंग केस में हरीश रावत पर कसा शिकंजा: CBI को FIR दर्ज करने की इजाजत मिली

नैनीताल हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत पर साल 2016 के स्टिंग मामले में CBI को FIR दर्ज करने की अनुमति दे दी है। मामला विधायकों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा है। मामले में अगली सुनवाई नवंबर में होगी। कोर्ट ने कहा है कि CBI इस मामले के संबंध में जाँच शुरू कर सकती है, लेकिन फैसला आने तक रावत को गिरफ्तार नहीं कर सकती।

जस्टिस सुंधाशु धूलिया की बेंच ने सोमवार (सितंबर 30, 2019) को मामले की सुनवाई की। रावत की ओर से पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने पैरवी की। सीबीआई की ओर से दलीलें असिस्टेंट सॉलिस्टर जनरल राकेश थपलियाल ने रखी। कोर्ट के सामने सीबीआई की प्रारंभिक जाँच की सीलबंद रिपोर्ट भी पेश की गई।

सिब्बल ने एसआर मुम्बई केस का हवाला देते हुए अदालत से कहा कि राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल द्वारा लिए गए निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय असंवैधानिक बता चुका है। न्यायालय के आदेश पर बहाल हुई रावत सरकार के कैबिनेट ने स्टिंग मामले की जाँच एसआईटी से कराने का निर्णय लिया था। सीबीआई के वकील थपलियाल ने इसका विरोध करते हुए कहा गया कि जिस व्यक्ति पर आरोप हों, उसे यह तय करने का अधिकार नहीं हो सकता कि जाँच कौन सी एजेंसी करेगी।

गौरतलब है कि पिछली सुनवाई में सीबीआई ने कोर्ट से इस मामले में प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट पेश करने और रावत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की इजाजत माँगी थी।

रावत ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि सीबीआई को इस मामले की जॉंच का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने राष्ट्रपति शासन के दौरान जारी सीबीआई जाँच की नोटिफिकेशन वापस ले ली थी। पूरे मामले की जाँच SIT से कराने का निर्णय लिया था। ऐसे में इस मामले में जाँच का अधिकार सीबीआई का नहीं है। रावत के अधिवक्ता ने CBI की प्रारंभिक रिपोर्ट को भी अवैध बताया था।

दरअसल, मार्च 2016 में विधानसभा में वित्त विधेयक पर वोटिंग के बाद 9 कॉन्ग्रेस विधायकों ने बगावत कर दी थी। जिसके बाद एक निजी चैनल ने हरीश रावत का एक स्टिंग जारी किया था। जिसमें रावत सरकार बचाने के लिए कथित तौर पर विधायकों से सौदेबाजी करते दिखे थे। इसके बाद उनकी सरकार बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।

बाद में अदालत के आदेश से रावत सरकार फिर बहाल हो गई। सत्ता में लौटते ही इस मामले की जॉंच सीबीआई से हटाकर एसआईटी से कराने का निर्णय किया गया। लेकिन केंद्र सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया।

हरियाणा में BJP ने घोषित किए 78 उम्मीदवार: योगेश्वर दत्त, बबीता फोगाट, संदीप सिंह को टिकट

हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है। पहली सूची में 78 उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं। इनमें पहलवान योगेश्वर दत्त, बबीता फोगाट और भारतीय हॉकी टीम के कप्तान रहे संदीप सिंह के नाम भी शामिल हैं। तीनों हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं।

योगेश्वर दत्त को बरौदा, संदीप सिंह को पिहुआ और बबीता फोगाट को दादरी से टिकट मिला है। मुख्यमंत्री मनोह​र लाल खट्टर करनाल से चुनाव लड़ेंगे। सोमवार को जिन नामों का ऐलान किया गया उनमें 38 मौजूदा विधायक हैं। 7 मौजूदा विधायकों का नाम सूची में नहीं है।

हरियाणा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 26 सितंबर को ओलंपिक खेलों में देश का नाम रोशन करने वाले पहलवान योगेश्वर दत्त भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे। उनके साथ संदीप सिंह ने भी पार्टी की सदस्यता ली थी।

BJP ने जारी की उम्मीदवारों की पहली लिस्ट

BJP ने जारी की उम्मीदवारों की पहली लिस्ट

BJP ने जारी की उम्मीदवारों की पहली लिस्ट

महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव 21 अक्टूबर को होंगे, जबकि मतों की गणना 24 अक्टूबर को होगी। हरियाणा की 90 सदस्यों वाली विधानसभा का कार्यकाल दो नवंबर को समाप्त हो रहा है। पिछले चुनाव में बीजेपी ने बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। इस बार भी भाजपा की स्थिति मजबूत बताई जा रही है। कॉन्ग्रेस, इनेलो, जेजेपी, बसपा जैसे दल भी चुनावी मैदान में हैं।

भाजपा में शामिल होंगे TMC विधायक सब्यसाची दत्ता, अमित शाह रहेंगे मौजूद

पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) के एक और विधायक भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं। बिधाननगर के मेयर रह चुके विधायक सब्यसाची दत्ता मंगलवार (अक्टूबर 1, 2019) को भाजपा की सदस्यता लेंगे। इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी मौजूद रहेंगे।

एएनआई ने सब्यसाची के हवाले से यह जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि सदस्यता ग्रहण समारोह नेताजी इंडोर स्टेडियम में होगा। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य मुकुल रॉय समेत कई शीर्ष नेता मौजूद रहेंगे।

बताया जा रहा है कि सब्यसाची के साथ ही उनके हजारों समर्थक भी भाजपा में शामिल होंगे। फरवरी में सब्यसाची दत्ता के घर मुकुल रॉय के जाने के बाद से ही उनके बीजेपी में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही थी। अब टीएमसी नेता ने खुद इस बात की पुष्टि कर दी है।

सब्यसाची का काफी समय से पार्टी नेताओं से मतभेद भी चल रहा था। उन्होंने भी पार्टी के शीर्ष नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। उन्हें मेयर के पद से हटाने के लिए टीएमसी के सदस्य ही अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे।

प्रदेश भाजपा के महासचिव संजय सिंह ने बताया कि अमित शाह 1 अक्टूबर को दोपहर कोलकाता पहुँचेंगे। वे नेताजी इंडोर स्टेडियम में सभा को संबोधित करेंगे।

रोहिंग्या प्रेमी केजरीवाल को यूपी-बिहार के लोगों से नफरत क्यों: BJP नेता कपिल मिश्रा का लेख

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के मन में बसी पूर्वांचलियों से नफरत के पीछे असली कारण क्या है? असली कारण हैं बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों से मोहब्बत। NRC की जो तलवार घुसपैठियों पर लटक रही हैं, उससे डर कर केजरीवाल रोज पूर्वांचल के लोगों के बारे में अनाप-शनाप बयान दे रहे हैं। अगर ध्यान से देखा जाए तो जिस दिन से NRC पर चर्चा शुरू हुई, उसी दिन से केजरीवाल ने यूपी-बिहार के लोगों के बारे में बदतमीजी भरे बयान देने शुरू कर दिए।

भारत की राजधानी अपने आप में मिनी इंडिया है। यहाँ की कला, संस्कृति, पहचान, त्यौहार- सब जैसे पूरे देश की एक छोटी सी झलक हैं। यूपी, बिहार, पंजाब, राजस्थान, उड़ीसा, बंगाल, तमिलनाडु, केरल, आंध्र, कर्नाटक, हिमाचल, हरियाणा, असम, मिज़ोरम, सिक्किम, उत्तरांचल- भारत का ऐसा कोई कोना नहीं जहाँ के लोग दिल्ली में ना रहते हों। दिल्ली में रहने वाले लोग पढ़ाई के लिए, बीमारियों के ईलाज के लिए, छुट्टियों के लिए, अपने नाते-रिश्तेदारों को दिल्ली बुलाएँगे, ये स्वाभाविक हैं। राजधानी होने के नाते दिल्ली में स्वभावतः हमेशा से बाकी देश से बेहतर सुविधाएँ रही हैं।

ख़ुद हरियाणा में जन्में और फिर यूपी के ग़ाज़ियाबाद में रहे केजरीवाल के मन में यूपी-बिहार के लिए जो नफरत पैदा हुई है, उसके अन्य अन्य कारण भी हैं। पहले पंजाब में हार, फिर दिल्ली नगर निगम में हुई भयानक हार, उसके बाद यूपी में प्रचंड बहुमत से भाजपा की जीत, फिर एक-एक कर के हर राज्य में जमानत जब्त होना और फिर आखिर में जिस हरियाणा में केजरीवाल ने व्यक्तिगत प्रचार किया और जहाँ के चुनाव के नाम पर राज्यसभा के सीटों तक का सौदा किया गया, वहाँ उनके उम्मीदवारों की न केवल जमानत जब्त हुई बल्कि नोटा से भी हार कर शर्मिंदा होना पड़ा।

इन सब हारों को केजरीवाल ने व्यक्तिगत अपमान के तौर पर लिया। केजरीवाल और उनके आसपास के लोग जनता को ही जिम्मेदार बताने लगे। कभी ईवीएम को गाली और कभी जनता को ही ग़लत ठहराना, केजरीवाल गैंग को ऐसे बयान देने की जैसे आदत बन गयी। इसी नफरत के कारण पहले दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों में बिना दिल्ली के वोटर कार्ड और आधार के मुफ्त ईलाज पर बैन लगाया गया। केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना को भी दिल्ली में लागू होने से रोक दिया गया।

हजारों लोग अपने माता-पिता तक को दिल्ली में लाकर ईलाज करवाने में तरस गए। केंद्र सरकार की आयुष्मान योजना दिल्ली में बने केंद्र सरकार के अस्पतालों में लागू थी और एम्स, राम मनोहर लोहिया जैसे अस्पतालों में मुफ्त ईलाज जारी रहा। आयुष्मान योजना की सफलता और दिल्ली सरकार की स्वास्थ्य सुविधाओं का ठप्प होना भी एक कारण रहा कि केजरीवाल नफरत से भरते चले गए।

एक छोटा सा उदाहरण देखिए। रेबीज का इंजेक्शन पूरी दिल्ली में केवल केंद्र सरकार के अस्पतालों में ही उपलब्ध है। दिल्ली सरकार के अस्पतालों में रोजाना लगभग 15,000 केस आते हैं, जो बिना दवाई के सीधा केंद्र सरकार कब अस्पतालों में भेजे जाते हैं। नफरत और हार से बौखलाए केजरीवाल ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जिस प्रकार का शारीरिक हमला अमानुतुल्ला खान द्वारा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी जी पर करवाया, वो पूरे देश ने देखा।

इस सबके बाद जब NRC की चर्चा शुरू हुई तो केजरीवाल जैसे बौखला ही गए। उन्हें अपने बचे-खुचे वोट बैंक को खोने का डर हैं। बांग्लादेशी और रोहिंग्या न सिर्फ दिल्ली के स्लम में राशनकार्ड और आधार बना कर केजरीवाल के वोटबैंक बन रहे हैं, बल्कि कई बार वो अपराधों में संलिप्त पाए गए हैं। चैन खींचने से लेकर, चोरी, लूट, हत्या और ड्रग माफिया का पूरा धंधा बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा चलाया जा रहा है। यही केजरीवाल का वोट बैंक है और फंडिंग का सोर्स भी।

केजरीवाल कुछ भी करके इन घुसपैठियों को बचाना चाहते हैं। आज केजरीवाल को यूपी-बिहार, बंगाल और राजस्थान से आए लोगो से नफरत है। इसके उलट उन्हें बांग्लादेश और म्यांमार से आए घुसपैठियों से मोहब्बत है। देशद्रोही, नक्सली और टुकड़े-टुकड़े गैंग की राजनीति करने वाले केजरीवाल अपने वोट बैंक को एक साफ सन्देश दे रहे हैं- “दिल्ली में NRC लागू नहीं होने दूँगा और टुकड़े-टुकड़े गैंग को बचाऊँगा।

वो आदमी जो खुद जेब मे 500 रुपए लेकर दिल्ली आया और दिल्ली का मुख्यमंत्री बन गया, उसे आज यूपी-बिहार के उन लोगों से घृणा हो रही है, जो 500 रुपए का किराया लगाकर आयुष्मान योजना से दिल्ली में ईलाज करवाते हैं। वो आदमी जो चंदा लेने और कार्यकर्ता ढूँढने के लिए पूरे देश से अपील करता है, वो दिल्ली में उनके आने पर बैन लगाना चाहता है।

भाजपा अध्यक्ष का पूर्वांचली होना भी केजरीवाल की नफरत का एक बड़ा कारण है। दिल्ली में निगम और लोकसभा चुनावों में मनोज तिवारी की अध्यक्षता में भाजपा के हाथों केजरीवाल की बड़ी हार अब व्यक्तिगत दुश्मनी से हटकर पूरे समाज से नफरत में बदल चुकी है। केजरीवाल का अहंकार अब बदतमीजी में बदल चुका है। जिस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल वो यूपी-बिहार के लोगों के खिलाफ कर रहे हैं, वो समाज मे एक बड़े गुस्से को जन्म दे रही है।

यूपी बिहार के स्वाभिमानी समाज में, खासतौर पर युवाओं में भयानक गुस्सा पनप रहा है और इस अपमान की बहुत भारी कीमत केजरीवाल को चुकानी पड़ेगी।

चुनाव लड़ने से पहले आजम खान की बीवी ने भरा हर्जाना, बिजली चोरी के दिए ₹29.77 लाख

उत्तर प्रदेश की रामपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए नामांकन करने से पहले सपा सांसद आजम खान की पत्नी तंजीन फातिमा ने बिजली विभाग का जुर्माना भर दिया है।

जानकारी के अनुसार बिजली विभाग ने बिजली चोरी के आरोप में तंजीन फातिमा ₹29.77 लाख जुर्माना लगाया था। जुर्माने में समन शुक्ल ₹3,40,000 और राजस्व निर्धारण ₹26,37,269 था। ये चोरी हमसफर रिजॉर्ट में पकड़ी गई थी, जिसे आजम खान का परिवार संचालित करता है।

बिजली विभाग के अधिकारी संजय गर्ग ने बताया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद हमसफर रिजॉर्ट में लगभग 34 किलो वाट बिजली चोरी के लिए समन भेजा गया था, जिसकी मूल्यांकन राशि 29.77 लाख रुपए थी। इसका भुगतान कर दिया गया है।

अधिकारी के मुताबिक हमसफर रिजॉर्ट में बिजली कनेक्शन समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान की पत्नी तंजीम फातिमा के नाम पर है।

यहाँ बता दें कि हमसफर रिजॉर्ट में 5 किलोवाट के कनेक्शन के अतिरिक्त 33, 870 वाट बिजली का उपयोग मिला था। यहाँ 5 विंडो एसी, 10 पंखे, 9 स्प्लिट एसी सहित कनेक्शन से ज्यादा लोड की चोरी पाई गई थी। प्रशासन की छापेमारी के बाद पूरा मामला प्रकाश में आया था और विद्युत अधिनियम (2003) की धारा 135 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया था।

गौरतलब है कि रविवार (सितंबर 29, 2019) को सपा ने विधानसभा उपचुनाव के लिए तंजीन फातिमा को उम्मीदवार घोषित किया था। आजम खान के लोकसभा के लिए चुने जाने के कारण यहॉं उपचुनाव हो रहा है। उपचुनाव के लिए 21 अक्टूबर को वोट डाले जाएँगे और मतगणना 24 अक्टूबर को होगी।