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क्या बदल गया है ‘हज़ार जख्म दे कर मारेंगे’ से कराची वालों के ‘अल्ला खैर करे’ तक? (भाग-2)


पाकिस्तान, कश्मीर और भारतीय मुसलमान

इमरान खान या पाकिस्तान को यह सोचना चाहिए कि जब वो ब्लैक लिस्ट हो जाएँगे, तो देश को चलाने के लिए भारत पर हमला करने के ख्वाब बेच कर पाकिस्तानियों का पेट नहीं भरा जा सकता। फरवरी में कराची की पाकिस्तानी जनता ‘अल्ला खैर करे’ और ‘रहम करना अल्ला’ करने लगी थी जब उसकी ही सेना के जेट उनके ऊपर उड़ान भर रहे थे। और वो बस इसलिए उड़ान भर रहे थे कि भारतीय नौसेना और उसके जेट मुंबई के तटों पर तैयारी में खड़े थे।

पहला भाग यहाँ पढें: जिसका भाग्य गधे के लिंग से लिखा गया हो… उसे कोई चीन या विदेशी मुसलमान काम नहीं आता (भाग-1)

पाकिस्तान की समस्या यह है कि उसका दम्भ भी भीख पर टिका हुआ है और अमेरिका समेत कई यूरोपीय देशों ने उसके कटोरे में सिक्के डालने से मना कर दिया है। अब पाकिस्तान उस कटोरे को बेच कर नान और टिमाटर का जुगाड़ कर सकता है, लेकिन भारत से युद्ध की सोचने पर भी, उसकी हालत यह होगी कि वहाँ की जनता भारत के बमों से नहीं, भूख से मर जाएगी।

ये बात सच है कि जिहादियों को या पाकिस्तानी आतंकियों को इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि एक बर्बाद देश की जनता भी उतनी ही निकम्मी है और वो हथियार नहीं तो पत्थर लेकर भी भारत से लड़ने निकल जाएँगे, लेकिन पिछले कुछ सालों में बहुत कुछ बदल चुका है। बदला यह है कि अब सेना के हाथ बँधे नहीं हैं। बदला यह है कि प्रधानमंत्री पाकिस्तान के ऊपर फाइटर भेजते वक्त यह नहीं सोचता कि दुनिया क्या सोचेगी, बल्कि यह सोचता है कि दुनिया को यह देखना चाहिए।

बदला यह है कि चंद वोटों के लिए, जिन भारतीय मुसलमानों को कॉन्ग्रेस, वाम दल और विरोधी पार्टियों के नेताओं ने पाकिस्तानियों से जोड़ रखा था, मोदी को उससे फर्क नहीं पड़ता। भारतीय मुसलमानों की छवि अगर किसी पार्टी ने बर्बाद की है तो वो है कॉन्ग्रेस और बाकी पार्टियाँ जो खुद को मुसलमानों का हिमायती बता कर उनके एकमुश्त वोट पाती रही हैं। किसी ने भी भारतीय मुसलमानों से यह नहीं पूछा कि उनका कश्मीर को लेकर क्या स्टैंड है, क्या वो चाहते हैं कि कश्मीर पाकिस्तान में चला जाए?

भारतीय मुसलमानों को इन पार्टियों ने ही पाकिस्तानी बना कर रख दिया है जहाँ कई बार सोशल मीडिया पर उनके देशप्रेम पर प्रश्नचिह्न उठाया जाता है। वो इसलिए कि इनके तथाकथित नेता कभी भी ऐसे मामलों पर मुखर हो कर नहीं बोलते कि वो कहाँ खड़े हैं। कश्मीर भारत का हिस्सा है और वो आज भी इतना पिछड़ा है, बावजूद इसके कि 2000-16 के सालों की बात करें तो जहाँ उत्तर प्रदेश के प्रत्येक नागरिक पर केन्द्र ने महज ₹4,300 खर्च किए, वहीं कश्मीरी लोगों पर ₹91,000 प्रति नागरिक का खर्च रहा।

फिर भी कश्मीरी नवयुवक पत्थर उठाता है, आतंकी बनता है और अंततः मारा जाता है। ऐसे में भारतीय मुसलमानों के नेता कश्मीर के मुसलमानों को भविष्य भी तो ठीक से नहीं देख पा रहे! क्या वो चाहते हैं कि कश्मीरी मुसलमान पत्थर फेंकता रहे? क्या इससे यह नहीं लगता कि इन तमाम पार्टियों के लिए कश्मीर या कश्मीरी मुसलमान, या मुसलमान कभी मुद्दा रहे ही नहीं। इनका मुद्दा तो एक पार्टी या विचारधारा को सत्ता में पहुँचने से रोकना रहा है, या अगर वो पहुँच भी गए तो पाकिस्तान तक जा कर मोदी को हटाने की भीख माँगना रहा है, या विदेशों में अपने ही देश के खिलाफ प्रपंच फैला कर उसकी छवि खराब करना रहा है।

जनसंख्या के आँकड़े उठा लीजिए और देखिए कि किस मजहब के लोगों का विकास रुका हुआ है; किस मजहब के लोगों की शिक्षा का स्तर सबसे नीचे है; किस मजहब की स्त्रियों में सबसे कम ग्रेजुएट हैं। इन नेताओं ने मुसलमानों को सिर्फ उल्लू बनाया है यह कह कर कि वो ही मुसलमानों के बारे में बेहतर सोच सकते हैं। उसी तरह, कश्मीरी मुसलमानों को वहाँ के नेताओं ने, आतंकी अलगाववादियों ने और चंद लालची नेताओं ने बर्बाद किया है। आप सोचिए कि इन नागरिकों के लिए जो 1.14 लाख करोड़ रुपए जो दिए गए, वो कहाँ गए?

इसलिए, पाकिस्तान का स्टैंड तो समझ में आता है क्योंकि उसके लिए कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाना ही एकमात्र उपाय है सत्ता में बने रहने के लिए, चाहे पार्टी कोई भी हो, लेकिन भारतीय पार्टियों, नेताओं और मजहब देख कर विचार रखने वाले लोगों का स्टैंड समझ में नहीं आता। यहाँ रह कर आप कश्मीरियों के लिए अगर वाकई चिंतित हैं तो, सत्तर साल तक चले एक्सपेरिमेंट का परिणाम आपने एक आंतकी रक्तपात से सने कश्मीर के रूप में देखने के बाद, आप उसकी जगह कुछ और समाधान को क्यों नहीं देखना चाहते? क्या इसलिए कि ये भाजपा सरकार ने किया है? क्या आपको दिखता नहीं कि कॉन्ग्रेस, या बाकी की पार्टियाँ सिर्फ अपना पेट भर रही है, कश्मीरियों को सड़क पर मरने के लिए छोड़ रखा है?

अगर आप एक मुसलमान के तौर पर भी कश्मीरी मुसलमानों का समर्थन करना चाहते हैं तो बेहतर तर्क ले कर आइए कि आखिर ये निर्णय उनका जीवन बेहतर होने से कैसे रोक रहा है? इस बात पर कोई बात नहीं करना चाहता कि सत्तर सालों से एक बंद राज्य बना कर, कश्मीरी नेताओं को लिए, अलगाववादियों के लिए इस देश के नागरिकों के टैक्स का पैसा उनकी जेब में पहुँचाने के अलावा हुआ क्या है वहाँ पर?

क्या कश्मीर के मुसलमान दुनिया में, या भारत में ही, सबसे ज्यादा शिक्षित हैं? क्या उनकी आमदनी अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे अच्छी है? क्या वहाँ अलग स्टेटस होने के बावजूद वो परिणाम हासिल हुए जिसकी आशा थी? या, इसकी आड़ में हिन्दुओं को बेघर किया गया, दलितों को न तो शिक्षा का अधिकार मिल पाया, न ही नागरिकता! क्या पूरे भारत में ‘हमें तो दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है’ कहने वाले मुसलमान नेता कश्मीरी समाज के बारे में भी बोलेंगे कि अगर उनकी बात एक प्रतिशत सत्य भी है, तो कश्मीर में तो एक समाज के लोगों को नागरिकता ही नहीं है।

फिर ये कैसे कहते हैं कि ये गरीबों की बात करते हैं? बाकी भारत में ये भीम-मीम, अदरक-लहसुन करते नजर आते हैं, लेकिन कश्मीर के दलितों की बात आते ही वो नैरेटिव गायब हो जाता है! मतलब तो यही हुआ कि इन्हें प्रोपेगेंडा फेंक कर बस नेता बने रहना है, और नागरिकों को मुद्दों से, उनके पिछड़ेपन से, उनके मुसलमान होने से, दलित होने से, इनको घंटा फर्क नहीं पड़ता।

इसलिए, भले ही आप कश्मीर पूरे जीवन में न जाएँ, लेकिन राष्ट्र की अवधारणा में आपका विश्वास होना चाहिए। आप कश्मीर क्या हिमाचल भी न जाएँ, लेकिन आपको यह याद रखना चाहिए कि पूरे भारत में जितने आतंकी हमले हुए हैं, उसका रास्ता इन्हीं नेताओं ने 370 की आड़ में तैयार किया था। भले ही आपको वहाँ के नेताओं से कोई वास्ता न हो, लेकिन यह याद रखिए ‘ब्लीडिंग बाय अ थाउजेंड कट्स’ में एक-दो जख्म आपके भी शरीर पर आएँगे।

जिसका भाग्य गधे के लिंग से लिखा गया हो… उसे कोई चीन या विदेशी मुस्लिम काम नहीं आता (भाग-1)

पाकिस्तान की बात करें तो बहुत सारी चीजें याद आती हैं, उनमें से बहुत कम चीजें अच्छी हैं। ‘ब्लीडिंग इंडिया बाय थाउज़ेंड कट्स’ की नीति लेकर चलने वाले पाकिस्तान के बारे में एक बात तो तय रूप से कही जा सकती है कि ये ऐसी कौम है जो बहुत ही निःस्वार्थ भाव से काम करती है। पाकिस्तान के बारे में आप ये तो मान ही सकते हैं कि उन्होंने कभी अपना ख्याल किया ही नहीं, हमेशा यह देखा है कि घर में खाने को न हो, पूरे देश में बर्बादी फैली हो, वज़ीर कभी चीन को गधे बेच रहा हो, तो कभी अपने घर की भैंसों को, लेकिन इन सब में अपना स्वार्थ बिलकुल भी नहीं। जो भी किया भारत के लिए किया।

जिन्ना ने जब पाकिस्तान की बात उठाई थी, तभी पाकिस्तान का भविष्य भी तय हो गया था। मजहब के आधार पर देश को बाँटना ही उसका लक्ष्य था ताकि वो सत्ता पा सके। उस देश के बनने के बाद से उनका लक्ष्य कभी भी अपनी बेहतरी रहा ही नहीं, बल्कि उनका पूरा कुनबा इसी फिराक में रहा कि कैसे भारत को नुकसान पहुँचाया जाए। इन्होंने अपनी चिंता की ही नहीं, बल्कि अपना पैसा, अपने नागरिक, अपनी सेना, हर संसाधन को इस बात पर खर्च किया कि वो लोगों को यह ख्वाब बेच सकें कि कश्मीर उनका हो जाएगा।

ये बात कोई नहीं जानता कि कश्मीर लेकर पाकिस्तान क्या करेगा? वहाँ के लोग बस इसलिए खुश हैं कि ‘आपने देखा है कि वहाँ के लड़ाके जब मरते हैं तो उन्हें पाकिस्तानी झंडे में लपेटते हैं’। पाकिस्तानी बुद्धिजीवी इसी से खुश है कि कोई आतंकी पाकिस्तान के झंडे में लपेटा जाता है, जबकि अगर वो सही मायने में बुद्धिजीवी होता तो यह भी सोचता की उसकी भवों के बीच गोली डालने वाली सेना कहाँ की है जो साल में दो सौ आतंकियों को निपटा रही है।

इनकी मूर्खता आप देखिए कि खुद खाने के लाले पड़े हैं और चाहते हैं कि कश्मीर ले कर उन्हें भी अपने जैसा बना देंगे। यही तो खिलाफत है कि खलीफा के शासन में समुदाय के सारे लोग सिर्फ इसलिए खुश रहें कि अब तो हम इस्लामी खिलाफत में हैं और शरिया कानून है यहाँ। वो रुक कर ये तक नहीं सोचते कि ऐसे शासन में उनका जीवन स्तर क्या होगा? उनका जीवन स्तर क्या होगा, उसका नमूना आईसिस ने सीरिया में दिखा दिया है। जिसको वो जीवन सही लगता है, वो बेशक जिहाद की राह पर निकल जाए।

ठेठी में एक कहावत है कि ‘खाय क खर्ची नै, डेहरी पर नाच’। इसका अर्थ यह होता है कि खाने के पैसे नहीं हो और चाहते हैं कि घर के आगे नाच का प्रोग्राम रखा जाए। पाकिस्तान के साथ यही समस्या है। पाकिस्तान के साथ-साथ काफी हद तक समुदाय विशेष के दुनिया के लोगों की भी यही समस्या है। भारत से बाहर के देशों को देखिए कि वहाँ के ‘शांतिप्रिय मजहबी’ कश्मीर पर क्या रिएक्शन दे रहे हैं। एक संस्था है ‘ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कन्ट्रीज़’। कश्मीर का मसला भारत का है, कुछ हद तक पाकिस्तान का क्योंकि हमारे देश के बाप-दादाओं ने कुछ मूर्खताएँ की थीं, हम भोग रहे हैं।

अब आप यह सोचिए कि इन देशों को कश्मीर को लेकर कष्ट क्यों हो रहा है? आखिर जब यूएन सिक्योरिटी काउंसिल की अध्यक्षा ने इस पर कमेंट करने से मना कर दिया तो फिर मजहबी देशों के समूह के स्थान विशेष में दर्द क्यों उठ रहा है? वेल… क्योंकि वो समूह मजहबी देशों का है। मसले से जगह, यानी कश्मीर, गायब हो चुका है, ये मसला मजहब विशेष का हो गया है। उन्हीं लोगों का जो लहसुन-ए-हिन्द और नारा-ए-बुलशिट चिल्लाते हुए आईसिस और तमाम आतंकी संगठन बना कर पूरी दुनिया को इस्लामी शासन के भीतर लाने का ख्वाब देखते हैं।

और जब ये खिलाफत स्थापित भी हो जाएगी तो क्या होगा? वही होगा जो यजीदी महिलाओं के साथ हुआ। आईसिस के आतंकी, जो रात में बलात्कार करते हैं, और दिन में उन महिलाओं को कहते हैं कि वो बुर्के में रहें क्योंकि बाहर के दूसरे मर्द देख लेंगे! ये शासन कैसा होगा? ये शासन वैसा ही होगा जहाँ पाकिस्तान जैसे मुल्कों में नेशनल टीवी पर, अपने होशो-हवास में पैनलिस्ट कहते हैं कि पाकिस्तान को लाखों मुजाहिद्दीन, मिलिटेंट भारत की धरती पर भेजना चाहिए, और एंकर कहता है कि क्या इतना ह्यूमन रिसोर्स है पाकिस्तान के पास? मतलब, आतंकियों को भेजने की बात वहाँ की मीडिया से लेकर बुद्धिजीवी तक इतनी आसानी से कहते हैं जैसे ये एक सामान्य सी बात हो।

जब देश का पीएम ही घोड़े की लीद चिलम में भर कर पीता है, क्योंकि आप मानें या न मानें, इमरान खान और उसके देश की हालत लीद सुखा कर पीने लायक ही बची है, तो फिर टीवी पर डिबेट में खुल्लमखुल्ला आतंकियों को तैयार कर भारत में भेजने की बातें क्यों नहीं होंगी? ये है पाकिस्तान जिसका मसला पाकिस्तान कभी रहा ही नहीं, वरना कश्मीर के लोगों की छोड़ कर अपने देश के लोगों की हालत में सुधार ले आता।

पाकिस्तान का पीएम, जिसे कि दुनिया उधार न दे तो शायद इमरान खान अपनी चौथी बीवी के लिए ढंग का बुर्का न सिलवा पाए, वो संसद में पूछता है कि क्या भारत पर हमला बोल दिया जाए? इसी पर मुझे राजकुमार की फिल्म से एक डायलॉग याद आता है कि ‘छिपकली अगर तैरना सीख जाए तो वो मगरमच्छ नहीं बन जाता’। पाकिस्तान वो बंदर है जिसके हाथ में उस्तरा है और इसकी प्रबल संभावना है कि वो अपना ही अंग विशेष एक दिन उसी उस्तरे से काट लेगा।

भारत के लिए घृणा फैला कर ही पाकिस्तान में सत्ता पाई जाती है। अगर वहाँ के नागरिकों को भारत का डर न दिखाया जाए तो सेना और आईएसआई की मनमानी चल नहीं पाएगी। भारत को गाली देना पाकिस्तान की मजबूरी है क्योंकि वहाँ की जनता को इसी से मतलब है पाकिस्तान ने एटम बम सजाने के लिए नहीं रखे हैं। लेकिन जनता ये नहीं जानती कि उसके पीएम को अगर रोटी, नान और टिमाटर का दाम तय करने के लिए आला अधिकारियों की मीटिंग बुलानी पड़ती है, तो उस मुल्क के साथ बहुत बड़ी दिक्कत है।

जनता ये नहीं जानती कि अगर वो टेरर फायनेंसिंग के मामले में अगर ब्लैक लिस्ट हो जाएँगे तो कैबिनेट की मीटिंग इस बात के लिए भी बुलानी पड़ सकती है कि चीन वालों को पाकिस्तानी सेना के जवानों के शरीर का कौन सा हिस्सा बेचना सही रहेगा। आप सब जानते हैं कि पाकिस्तान कौन सा अंग ऑफर करेगा, और यह भी कि चीनियों को शायद उसमें कोई रुचि नहीं होगी।

हमारी प्यारी कॉन्ग्रेस

वहाँ की मीडिया में एक और गजब की बात देखने को मिलती है। वहाँ की चर्चाओं में पैनलिस्ट और एंकर दोनों ही इस बात से खुश होते रहते हैं कि भारत की पार्टियाँ, मीडिया का एक हिस्सा और बुद्धिजीवी मोदी के साथ नहीं हैं। यूट्यूब पर जाइए और सर्च कर लीजिए, वहाँ आपको ऐसे वीडियो मिल जाएँगे जहाँ वो ये कहते मिल जाएँगे कि पूरा भारत इस मुद्दे पर साथ नहीं है और पाकिस्तान को इससे फायदा हो सकता है। वो नाम लेकर कहते हैं कि कॉन्ग्रेस पार्टी, राहुल गाँधी समेत भारत की मीडिया, कम्यूनिस्ट पार्टियाँ मोदी के इस फैसले के साथ नहीं है।

लेकिन ऐसा सोचने में पाकिस्तानियों की कोई गलती नहीं है क्योंकि यहाँ एनडीटीवी जैसे समूह हैं जो कश्मीर को ‘इंडिया अकुपाइड कश्मीर’ लिखने से नहीं हिचकिचाते। यहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी है जिसके परनाना ने कहा था कि 370 का मसला अस्थाई है और ये घिसते-घिसते घिस जाएगा लेकिन पाँच दशक के शासन के बावजूद कॉन्ग्रेसियों के हलक से थूक सूख गया लेकिन वो 370 को घिस नहीं सके। एक पार्टी जो लगातार चुनाव हार रही है, आंतरिक कलह से जूझ रही है, जहाँ नेतृत्व का संकट है, उसे इस क्षण में भी यह नहीं दिख रहा है कि भारत की जनता क्या चाहती है।

मुट्ठी भर वोट के लिए कॉन्ग्रेस को देश का मूड नहीं दिख रहा कि लोग क्या चाहते हैं। इस कारण ये लोग अपनी ही पार्टी में इस मुद्दे पर बिखरे हुए दिख रहे हैं। इसका स्वतः लाभ तो भाजपा को मिलेगा ही, लेकिन कॉन्ग्रेस यह नहीं देख पा रही कि पाकिस्तान के चैनलों, ट्विटर हैंडलों आदि पर उसका नाम लगातार लिए जाने को भारत की आम जनता कैसे देखती है। उसकी एक नकारात्मक छवि बनती जा रही है कि ये लोग न सिर्फ देश को बर्बाद करने वाले हैं, बल्कि ये तो पाकिस्तान जो चाहता है, उसी की बात, उसी की भाषा में भारत में बैठ कर कर रहे हैं।

कश्मीर को लेकर मीडिया में प्रोपेगेंडा और ‘पाक अकुपाइड पत्रकार’

कश्मीर में पाकिस्तान समेत भारतीय नक्सली और आतंकियों के हिमायतियों, देशविरोधी शक्तियों ने मानवाधिकारों के हनन से लेकर तमाम तरह की खबरें फैलाने की कोशिश की, लेकिन दूसरे धड़े के सजग रहने के कारण, वो प्रोपेगेंडा काफी हद तक चल नहीं पाया। आप सोचिए कि पाकिस्तान को बहुत कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं है, यहाँ उसके लिए, भारत की ही खाने वाले, लगातार उसका काम कर रहे हैं।

यहाँ के पार्टियों और बुद्धिजीवियों को अब भारत की ही जनता गंभीरता से नहीं लेती। चाहे वो पाकिस्तान के इशारे पर लिख रहे हों या खुद ही अंतरात्मा बेच कर ‘राष्ट्र’ की अवधारणा से ऊपर दुश्मन राष्ट्र के संघर्ष को मजबूती प्रदान कर रहे हों, उनका मुकाबला नरेन्द्र मोदी से है जिसने अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत का कद ऐसा कर दिया है कि उसकी सहमति के बगैर बोलने पर ट्रम्प तक को अपनी बात वापस लेनी पड़ती है। इसलिए दो-चार डॉलर लेकर विदेशी अखबारों में लेख लिखने वाले पत्रकारों को, टीवी पर मुस्कुराते हुए वाहियात बातें करने वाले एंकरों को देखते बहुत हैं, लेकिन अधिकतर बस ये देखते हैं कि उनकी जमीन भारत में है, या वो मानसिक तौर पर ‘पाक अकुपाइड पत्रकार’ बन चुके हैं।

अजित डोभाल के कश्मीर में होने, और एक भी बड़ी हिंसक घटना के न होने पर यह माना जा सकता है कि वहाँ स्थिति नियंत्रण में है, और सरकार कश्मीरियों का विश्वास जीतने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। मीडिया और सोशल मीडिया पर झूठी खबरें फैलाई गईं, जो कि भारत के लिए थी भी नहीं। उन लोगों ने सीधे यूएन ह्यूमन राइट्स कमीशन को टैग करके प्रपंच फैलाया कि कश्मीरियों को सताया जा रहा है, सेना गोलियाँ चला रही हैं।

इन बातों को लेजिटिमेसी किसने दी? शाह फैजल जैसे लम्पटों ने, जिसका राजनैतिक करियर शुरु होने से पहले ही शीघ्रपतन का शिकार हो गया। दुर्भाग्य यह है कि वो इलाज कराने अलीगढ़ के हाशमी दवाखाने तक भी नहीं आ सकता। फैजल जैसे लोगों ने लिखा कि कश्मीरियों की जमीन छीन ली गई है! जबकि वो अच्छे से जानता है कि जमीन अगर किसी ने छीनी भी है तो वो पाकिस्तान के कब्जे में है। दूसरी बात, जो आईएएस रह चुके फैजल को पता नहीं होगी, वो यह है कि जो जिसका है ही, उसे वो छीन नहीं सकता। कश्मीर हमारा है, और उसके चाहने से वो पाकिस्तान के साथ नहीं दिया जा सकता क्योंकि उसे यह लगता है कि उसके कुछ बाप-चाचा सीमा के उस पार हैं।

इन्हें लगा था कि पत्थरबाजी करवा कर, मीडिया में बयानबाजी करते हुए ये भारत की छवि बर्बाद करने की कोशिश करेंगे और फिर किसी तरह मोदी-शाह को झुकना पड़ेगा। लेकिन इनका दुर्भाग्य यह है कि अलगाववादियों के पास अब पाकिस्तानी रुपए नहीं हैं। पत्थरबाज मूर्ख जरूर होते हैं, लेकिन फ्री में वो पत्थर नहीं फेंकने वाले क्योंकि इस बार गृह मंत्री अमित शाह हैं, और सेना ने कश्मीरी माँ-बापों को बता दिया है कि आतंकियों में 83% वैसे लोग होते हैं जिनका पत्थरबाजी की इतिहास रहा है, और उनमें से दो तिहाई साल भर के भीतर कुत्ते की मौत मारे जाते हैं। तो, हर बार की तरह सेना इन पत्थरबाजों को छोड़ ही देगी, ऐसा नहीं लगता।

दूसरा और अंतिम भाग यहाँ पढ़ें: क्या बदल गया है ‘हज़ार जख्म दे कर मारेंगे’ से कराची वालों के ‘अल्ला खैर करे’ तक? (भाग-2)

रघुवर दास की कोशिशों से बकरीद पर घर लौटा मोहम्मद मुफीज, 3 महीने से सऊदी में था बंधक

3 महीने से सऊदी अरब के रियाद में बंधक बना मोहम्मद मुफीज सोमवार (अगस्त 12, 2019) को अपने घर लौट आया। मुफीज के राँची एयरपोर्ट पहुँचते ही परिवारवालों का खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उनके लिए बकरीद की खुशियाँ दोगुनी हो गई। मुफीज ने अपनी वापसी के लिए सीएम रघुवर दास का आभार जताया और कहा कि उसकी घर वापसी में सरकार ने काफी मदद की। उसने बताया कि मुख्यमंत्री की वजह से ही उसे इमरजेंसी पासपोर्ट उपलब्ध कराया गया और बकरीद पर वो अपने घर आ पाया।

मुफीज के भाई खुर्शीद ने बताया कि उसका (मुफीज) एक दोस्त काम दिलाने का वादा करके फर्जी पासपोर्ट पर सऊदी ले गया था। उसने मुफीज से महीने के 50,000 रुपए देने की बात कही, मगर जब वो वहाँ गया, तो कंपनी ने उसे 15,000 रुपए दिए और फिर कुछ महीने बाद वो भी देना बंद कर दिया। इसके बाद कंपनी ने झूठा केस बनाकर उसे बंधक बना लिया।

मुफीज के परिवार ने इसकी जानकारी सीएम रघुवर दास को दी। मुफीज की बहन इशरत परवीन ने अपने भाई की रिहाई के लिए सीएम रघुबर दास से गुहार लगाई थी। इशरत ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा था कि उनके भाई को तीन महीने से अधिक समय से बंधक बनाकर कंपनी में रखा गया है और झूठा केस दर्ज किया गया है।

इसके बाद सीएम ने मामले का संज्ञान लिया और रियाद स्थित भारतीय दूतावास के संपर्क में रहे। उन्होंने पूरे मामले से दूतावास को अवगत कराया। आखिरकार इनकी कोशिश रंग लाई और सऊदी अरब सरकार ने मुफीज को रिहा करने का फैसला किया और मुफीज बकरीद के मौके पर अपने वतन लौट आए।

सीएम ने खुद ट्वीट करते हुए इसकी जानकारी दी। उन्होंने इसके लिए रियाद स्थित भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को धन्यवाद दिया और साथ ही कहा कि एक बहन के लिए इससे बड़ा तोहफा नहीं हो सकता।

एक भी हिन्दू कश्मीर में बसता है तो उसे 1 मिनट भी ज़िंदा रहने का अधिकार नहीं: पाक ‘विश्लेषक’ पीरजादा

पाकिस्तान के एक ‘बुद्धिजीवी’ ने जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के अहम प्रावधानों को ख़त्म किए जाने पर हिन्दुओं के नरसंहार की वकालत की है। पाकिस्तान के स्वघोषित बुद्धिजीवी तारिक पीरजादा ने कश्मीरियों को उकसाते हुए कहा है कि अगर एक भी हिन्दू उनके राज्य में बसता है तो उसे मार डालना चाहिए। तारिक पीरजादा न सिर्फ़ पाकिस्तान बल्कि भारत के मीडिया चैनलों पर भी चर्चाओं में हिस्सा लेता रहा है। अतिरिक्त रुपए कमाने के लिए भारतीय टीवी चैनलों पर आकर बेइज्जत होना उसका पुराना पेशा रहा है।

स्वघोषित न्यूज़ विश्लेषक ने दावा किया कि भारतियों ने जम्मू कश्मीर पर उसी तरह अवैध कब्ज़ा कर रखा है, जिस तरह से यहूदियों ने फिलिस्तीन को अपने कब्जे में ले लिया। तारिक पीरजादा ने कहा कि अगर एक भी हिन्दू कश्मीर में आकर बसता है तो उसे एक मिनट भी ज़िंदा रहने का अधिकार नहीं है। कश्मीरी जनता को भड़काने के उद्देश्य से उसने कहा कि वहाँ हालात फिलिस्तीन से भी बदतर हैं।

पीरजादा ने पाकिस्तान सरकार से अपील करते हुए कहा कि उसे अब जम्मू कश्मीर को भारत से पूर्णरूपेण अलग करने को खुला समर्थन देना चाहिए। पीरजादा ने कहा, “मुझे आशा है कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने के बाद कश्मीरी जनता अगर भारतीय सत्ता के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरती है तो पाकिस्तानी फौज जमीन पर जाकर उनकी मदद करेगी।” पीरजादा के इस बेतुके, भड़काऊ और अजीबोगरीब बयान का कारण उसकी बौखलाहट और तिलमिलाहट है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर कहीं से भी समर्थन न मिलने के कारण पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। तालिबान से डाँट सुनने के बाद उसे चीन से भी अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। यूएई और मालदीव जैसे मुस्लिम देशों ने भी जम्मू कश्मीर को भारत का आंतरिक मुद्दा बताया। रूस ने अनुच्छेद 370 के अहम प्रावधानों को ख़त्म कर जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन किए जाने को भारतीय संविधान के दायरे में रह कर लिया हुआ निर्णय करार दिया। संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान की अपील पर कोई ध्यान नहीं दिया।

इससे पाकिस्तान के पत्रकारों व नेताओं में बौखलाहट का माहौल है। पाकिस्तान के एक सांसद ने भरी संसद में अपने ही मंत्री फवाद चौधरी को दब्बू, बेशर्म और कुत्ता जैसे अपमानजनक शब्दों से नवाज दिया। हाल ही में पाकिस्तान के रेल मंत्री रशीद खान ने कहा कि अगर युद्ध हुआ तो वह ख़ुद सीमा पर लड़ने जाएँगे। रशीद ख़ान ने ख़ुद को भारतीय मुसलमानों की आवाज बताया। बता दें कि यही रशीद ख़ान 1998 में पाकिस्तान के परमाणु परीक्षण के समय डर के मारे देश से बाहर भाग खड़े हुए थे।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई ने एनडीटीवी की एक ख़बर का वीडियो ट्वीट कर यह दिखाने की कोशिश की कि जम्मू कश्मीर के लोग भारत सरकार के निर्णय से नाखुश हैं। कई पाकिस्तानी चैनलों ने भारतीय नेताओं, ख़ासकर कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं के बयान को प्रसारित किया। इन बयानों में कॉन्ग्रेस नेताओं ने जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को ख़त्म किए जाने का विरोध किया था।

भारत-बांग्लादेश सीमा पर BSF सख्ती से पशु तस्करी में 96% की कमी

पशु तस्करी भारत-बांग्लादेश सीमा के बीच अवैध व्यापार का ज़रिया रहा है और ईद का त्योहार नज़दीक आते ही लोग काफ़ी प्रफुल्लित हो जाते हैं। फ़िलहाल, भारत से बांग्लादेश में अवैध रूप से तस्करी किए गए मवेशियों की संख्या में भारी गिरावट आई है।

पिछले महीने बांग्लादेश में एक अंतर-मंत्रिस्तरीय बैठक में मंत्री अशरफ़ अली ख़ान की अध्यक्षता में आँकड़ों का ज़िक्र करते हुए बताया गया कि 4096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा पर पशु तस्करी में 96 प्रतिशत की कमी आई है।

बांग्लादेश के अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की कि सीमा पर तैनात बीएसएफ की कोशिशों और बांग्लादेश द्वारा प्राप्त मांस उत्पादन में आत्मनिर्भरता के कारण पशु आयात में कमी आई है। 

2016 के बाद से पशु तस्करी लगभग आधे से कम हो गई है। विस्तृत आँकड़े बताते हैं कि 2016 में लगभग 1,28,440 पशुओं के सिर ज़ब्त किए गए थे, जबकि 2017 में यह आँकड़ा घटकर 83,378 और 2018 में 51,592 पशु हो गए।

इसके अलावा, पहले, भारतीय गायों के अवैध प्रवेश की संख्या 2.4 से 2.5 मिलियन सालाना थी। कथित तौर पर, 2018 में केवल 92,000 गायों ने बांग्लादेश में प्रवेश किया।

माना जाता है कि देश में मवेशियों के व्यापार पर प्रभावी रोक ने इस अवैध व्यापार को प्रभावित किया है। फिर भी, भारत-बांग्लादेश सीमा पर पशु तस्करी का यह दुष्चक्र बीएसएफ के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसका कोई अंत नहीं है।

पिछले महीने, गाय की तस्करी के एक क्रूरतम तरीके में गाय के गले में IED (कामचलाऊ विस्फोटक उपकरण) बम बाँधा गया था। कथित रूप से IED बम बीएसएफ के उन सैनिकों को मारने के लिए था जो गाय तस्करी को रोकने और तस्करों को पकड़ने की कोशिश में होंगे। इससे पहले, एक घटना सामने आई थी जिसमें बांग्लादेश के पशु तस्करों द्वारा बम फेंके जाने से एक बीएसएफ जवान को अपना हाथ तक गँवाना पड़ा था।

श्रीनगर में डोवाल: पूरे शहर का लिया जायज़ा, देखे बकरीद के इंतज़ाम

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोवाल ने बकरीद के मौके पर जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में डेरा डाल रखा है। NSA ने शहर के सभी महत्वपूर्ण इलाकों के अलावा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण जिलों पांपोर, बड़गाम, और दक्षिण कश्मीर के पुलवामा और अवंतीपोरा का भी दौरा किया।

अजीत डोवाल पिछले कुछ दिनों से जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील हिस्से का एक-एक कर दौरा कर रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने शोपियाँ और अंनतनाग का दौरा किया था। इसी शृंखला में वह फ़िलहाल श्रीनगर में हैं। वहाँ उन्होंने मुख्य कमर्शियल/बाज़ार इलाके के अलावा सौरा, लाल चौक, हज़रतबल आदि महत्वपूर्ण इलाकों में रेकी की।

इसके पहले डोवाल घाटी में जिहाद के गढ़ माने जाने वाले अनंतनाग पहुँचे थे और सुरक्षा व्यवस्था का जायज़ा लेने के साथ-साथ स्थानीय लोगों से बातचीत की थी। राज्यसभा से जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल पास होने के अगले ही दिन यानी 6 अगस्त को जम्मू-कश्मीर पहुँचे डोवाल इसके बाद से ही राज्य में डेरा डालकर सुरक्षा प्रबंधों पर निगाह रखे हुए हैं।

ओए दो टके के, तू मुझे मारेगा: पाकिस्तानी संसद में बदजुबानी

पाकिस्तानी संसद का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। इस वीडियो में सांसद एक दूसरे के साथ बदजुबानी करते नजर आ रहे हैं। बताया जाता है कि यह घटना पाकिस्तानी संसद में जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने पर हुई चर्चा के दौरान हुई।

वीडियो में देखा जा सकता है कि सांसद मुशाहिद उल्ला खान और फवाद चौधरी एक-दूसरे को धमकी दे रहे हैं। मुशाहिद उल्लाह खान अप्रत्यक्ष रूप से फवाद की तुलना ‘कुत्ते’ से करते दिख रहे हैं।

वह वीडियो में फवाद चौधरी के बीच में बोलने पर कहते हैं, “ये डब्बू साहब बोले जा रहे हैं। इन्हें मैं घर छोड़कर आया था फिर यहाँ आ गए।”

इसके बाद फवाद चौधरी कहते हैं, “तुम मुझे मारोगे? आओ बताता हूँ।’ ओए दो टके के शटअप।”

वीडियो में हम देख सकते हैं कि स्पीकर सांसदों के बीच हुई बदजुबानी को कार्यवाही से हटाने के लिए कह रहे हैं। साथ ही वह दोनों से शांत होने की भी दरख्वास्त कर रहे हैं, लेकिन दोनों नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।

भाई से निकाह करा 17 साल की नायला खान को परिवार ने दी ‘पापों’ की सजा

तीस साल की नायला खान को 17 साल की उम्र में स्कॉटलैंड से परिजन पाकिस्तान ले गए। जहॉं उसका निकाह कजन से जबरन कराया गया। इससे आहत नायला एक दिन सारे नाते-रिश्तों को तोड़ कर भाग खड़ी हुईं। अब अपने साथ हुई ज्यादतियों पर वह एक किताब लिख रही हैं।

नायला के अनुसार, यह रिश्ता नैतिक रूप से ग़लत था। उन्होंने बताया कि उनके परिजनों ने काफी काम उम्र में ही उनका रिश्ता कजन से तय कर दिया था। परिवार की कट्टर इस्लामिक सोच के कारण बचपन से ही उन्हें काफ़ी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। अम्मी-अब्बू इस बात को लेकर चिंतित रहते थे कि वह ‘पश्चिमी सभ्यता के अनुसार ढलती जा रही है।’ नायला के परिवार को लगता था कि वह ‘कंट्रोल से बाहर’ हो गई है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि नायला कपड़े पहनने, बातें करने और ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाने में यकीन रखती थीं।

नायला के परिवार वाले अक्सर उसे ताना देते थे कि वह कुछ ज्यादा ही वेस्टर्न होती जा रही हैं। उन्हें 17 वर्ष की उम्र में ही पाकिस्तान ले जाया गया और उसके कजन के साथ जबरन शादी करा दी गई। नायला के परिवार वालों को लगता था कि वह बहुत ‘पापी’ हो गई है और उनका मानना था कि नायला ने परिवार की बदनामी कराई है। नायला के परिवार वालों ने निर्णय लिया कि इन सब चीजों को सही करने का एक ही तरीका है और वह है निकाह।

नायला ने अपने परिवार से बहुत मिन्नतें कीं लेकिन परिवार वालों ने उसकी एक न सुनी। पाकिस्तान में 5 हफ्ते बिताने के बाद नायला और उसका परिवार वापस स्कॉटलैंड आ गया। उसका पति बाद में आने वाला था। 2 महीनों बाद परिवार की ज्यादतियों से परेशान होकर नायला ने घर छोड़ने का फैसला किया। नायला अपने एक दोस्त के साथ घर से भाग खड़ी हुईं। इसके बाद उसके ही परिवार के लोगों ने नायला के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया।

नायला ने जानकारी दी कि वह अपने साथ हुए अत्याचार पर एक पुस्तक लिख रही हैं

नायला ने फेसबुक पर पोस्ट लिख कर अपना दर्द जाहिर किया। वह महिलाओं की स्वच्छंदता और स्वतंत्रता की लगातार पैरवी कर रही हैं। उन्होंने एक पुस्तक लिखने का फैसला लिया है, जिसमें परिवार की प्रताड़ना से वह कैसे उबरीं, इसका विस्तृत विवरण होगा। इस किताब में एक चैप्टर इस बात पर जोर देगा कि प्यार को मजहब से भी ऊपर रखा जाना चाहिए। बीबीसी के अनुसार, ब्रिटेन में जबरन शादी की घटनाओं में काफ़ी बढ़ोतरी देखी गई है।

जम्मू-कश्मीर में मनाई जा रही है शांतिपूर्ण तरीके से ईद

जम्मू-कश्मीर में नकारात्मक प्रचारों के बावजूद ईद का त्योहार बड़ी धूमधाम और शांतिपूर्ण तरीके से मनाया जा रहा है। इस बात की पुष्टि सोशल मीडिया की तस्वीरों से हो रही है। 

जम्मू और कश्मीर पुलिस के डीजीपी दिलबाग सिंह ने मीडिया को बताया कि ईद का त्योहार शांतिपूर्ण और पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। उन्होंने कहा है कि कश्मीर घाटी के सभी क्षेत्रों में, लोग अपनी स्थानीय मस्जिदों में आते-जाते रहें इसके लिए सुरक्षा मानदंडों में ढील दी गई है। साथ ही मस्जिदों में लोगों के इकट्ठा होने पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है।

दिलबाग सिंह ने यह भी कहा कि घाटी में हिंसा या पथराव की कोई घटना नहीं हुई है। ख़बरों के अनुसार, अकेले बारामूला में 10,000 से अधिक लोगों ने शांति से ईद की नमाज अता की।

राजौरी क्षेत्र में, मस्जिदों में ईद की नमाज़ अता की गई जहाँ समुदाय विशेष के लोग बड़ी संख्या में इकट्ठे हुए। पुलिस ने कहा है कि दो दिन पहले प्रतिबंधों में ढील दी गई थी ताकि लोग ईद मनाने के लिए ख़रीदारी कर सकें और आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था कर सकें।

मीडिया में छाई ख़बरों में कश्मीर की मस्जिदों के दृश्य भी दिखाए जहाँ ईद की नमाज़ और समुदाय विशेष का जमावड़ा बिना किसी हिंसक घटनाओं के सुचारू रूप से चलता दिखा।

श्रीनगर में, लोग बड़ी संख्या में मस्जिदों में जमा हुए हैं और ईद की नमाज़ शांतिपूर्ण तरीके से अता की गई।

पत्रकार आदित्य कौल ने एक वीडियो पोस्ट किया। इस वीडियो में यह स्पष्ट दिख रहा है कि शहर में अब तक कोई हिंसा या कोई अप्रिय घटना नहीं घटित हुई है और ईद की नमाज़ शांतिपूर्ण ढंग से अता की गई।

हालाँकि, इन खबरों के बीच ऐसे कई नेता, मीडिया पोर्टल और निहित स्वार्थ वाले व्यक्ति भी शामिल हैं, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर ग़लत सूचना दी। EX-IAS अधिकारी से राजनेता बने शाह फ़ैसल ने अनुच्छेद-370 हटाने के लिए भारत में हिंसा और बदला लेने की धमकी दी। उन्होंने ट्वीट किया था कि अपमान का बदला लेने तक कोई ईद नहीं मनाई जाएगी।

बौखलाए Pak का ईद की मिठाई लेने से इनकार, लद्दाख सीमा पर तैनात किए जेट

आज देश भर में ईद का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने ईद-उल-अजहा के मौके पर मस्जिदों में नमाज पढ़ी और एक दूसरे को मुबारकबाद देकर खुशी का इजहार किया। जम्मू कश्मीर में भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शांतिपूर्ण तरीके से ईद का त्योहार मनाया जा रहा है। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्वीट कर लोगों को शुभकामनाएँ दी है।

वहीं, ईद-उल-अजहा के मौके पर पाकिस्तान ने बीएसएफ से ईद की मिठाई लेने से इनकार कर दिया है। भारतीय जवानों ने बाघा-अटारी बॉर्डर पर पाकिस्तानी रेंजर्स को ईद की मिठाई दी लेकिन उन्होंने मना कर दिया। दरअसल, जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 निष्क्रिय होने से पाक बौखलाया हुआ है। बीएसएफ के एक अधिकारी ने बताया कि पाकिस्तान की तरफ से बकरीद पर अटारी-वाघा बॉर्डर पर और हुसैनीवाला बॉर्डर पर मिठाई देने और लेने के लिए कोई संदेश नहीं आया। पहले ऐसे त्योहारों पर संदेश पाक की तरफ से दिन में ही मिल जाता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। 

इधर, पाकिस्तानी वायुसेना लद्दाख सीमा के पास अपने लड़ाकू विमान तैनात कर रही है। यह पाकिस्तानी लड़ाकू विमान भारत के केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख की सीमा के पास पाकिस्तानी स्कार्दू हवाई अड्डे पर तैनात किए जा रहे हैं। इस पर भारत की लगातार नजर बनी हुई है। जानकारी के मुताबिक, शनिवार (अगस्त 10, 2019) को पाकिस्तानी वायुसेना के तीन सी-130 हरक्यूलस परिवहन विमानों को केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख सीमा के पास तैनात किए गए हैं। इस ख़बर के सामने आने के बाद संबंधित भारतीय एजेंसियाँ ​​सीमावर्ती क्षेत्रों में पाकिस्तानियों की आवाजाही पर कड़ी नजर रख रही हैं।