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अकबरुद्दीन ओवैसी, दर्द उठा है तो अलीगढ़ के हकीम के पास जाओ, ये 2019 है

पुरानी फिल्म में एक संवाद है कि ‘भैंस पूँछ उठाएगी तो गाना नहीं गाएगी, गोबर ही करेगी’। ओवैसी नाम के दो लोग हैं, जो राष्ट्रीय परिदृश्य में काफी चर्चित रहते हैं। ये दोनों आपस में गुड ओवैसी-बैड ओवैसी करते रहते हैं। एक भाई मुँह से विष्ठा करता है, दूसरा अपनी छवि समझदारों वाली बनाए घूमता है। लेकिन ऐसा है नहीं, दोनों ही ज़हरीले हैं।

अकबरुद्दीन और असदुद्दीन नाम हैं इनके। पूरी पहचान मजहब विशेष के तथाकथित हक की राजनीति को लेकर है जिसमें इन्हें लगता है कि इनके मजहब वाले इस देश के नागरिक मात्र नहीं हैं, बल्कि कुछ और ही हैं और उन्हें उनका हक नहीं दिया जा रहा। और वो हक क्या है? ‘पंद्रह मिनट के लिए पुलिस को हटा दो’ फिर हम अदरक कर देंगे, लहसुन कर देंगे।

आज फिर एक विडियो घूम रहा है जिसमें अकबरुद्दीन बता रहा है कि उसके 15 मिनट वाले बयान को लेकर लोग अभी तक दहशत में हैं। इसीलिए मॉब लिंचिंग करने वाले और आरएसएस वाले उससे डरते हैं। उसने कहा कि मजहब वालों को शेर बनना होगा, ताकि कोई ‘चायवाला’ उनके सामने खड़ा न हो सके। छुटभैये ओवैसी ने इस्लामी भीड़ से कहा कि उन्हें डरने वाला नहीं, डराने वाला बनना चाहिए।

जाहिर है कि ऐसे मौकों पर भारत के लिबरपंथी और स्वयं को लेनिन-माओ की क्रॉसब्रीड बताने को लालायित कामभक्त वामपंथी अभी या तो गालिब की शायरी करने में मशगूल हैं या मोदी को चिट्ठियाँ लिख कर बता रहे हैं कि ‘जय श्री राम’ तो युद्धघोष बन चुका है। अब इनको ये कौन बताए कि ये तो युद्धघोष हनुमान के समय से है जब वो लंका पर कूद गए थे। साथ ही, संदर्भ सही हो तो ये अभिवादन भी है। वर्साटाइल नारा है। एक नारा और भी बहुत वर्साटाइल है लेकिन वो युद्धघोष नहीं, कामांध आतंकियों के लिए किसी आकाशी वेश्यालय तक पहुँचने का पासवर्ड है। लेकिन उस पर किसी ने चिट्ठी नहीं लिखी।

खैर, रिंकलफ्री शेरवानी पहन कर, भीड़ को उन्मादी और दंगाई बनाने को आतुर ओवैसी यह भूल गया है कि ये 2012 नहीं है, न ही ‘इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का होना चाहिए’ कहने वाली सरकार है। शायद कॉन्ग्रेसियों के इसी बयान को ओवैसी जैसे चिरकुट ने ये सोचा कि पुलिस भी तो संसाधन ही है, और उस पर पहला हक समुदाय विशेष का है तो उसे हटा दिया जाए।

डरा हुआ शांतिप्रिय बनाम डराने वाला शांतिप्रिय

अब बात यह है कि ओवैसी पहले तो यह डिसाइड कर ले कि देश का ‘शांतिप्रिय’ डरा हुआ है या वो पंद्रह मिनट में हिन्दुओं को खत्म करने के लिए तैयार है। क्योंकि उसके भाई समेत कई ‘शांतिप्रिय’ नेता आज कल डरा हुआ ‘शांतिप्रिय’ वाला ही कोरस गा रहे हैं। ये बात और है कि जिस हिसाब से उनके द्वारा किए गए बलात्कारों, मंदिरों को तोड़ने, झूठ बोल कर ‘जय श्री राम’ का एंगल डालने, तलाक देकर भाई/बाप/मामा/जीजा आदि के साथ सो कर हलाला करवाने आदि की खबरें आ रही हैं, उससे ये डरे तो बिलकुल नहीं लग रहे। मजहब विशेष के तीन लोग किसी के घर के आगे गाँजा पीता है, मना करने पर उसको चाकुओं से गोद देते हैं। डरे हुए तो नहीं लगते। काँवड़ियों का अपने इलाके से गुजरने का इंतजार करते हैं और रात के एक बजे उन पर पत्थर फेंकते हैं। ये डरे हुए तो नहीं लगते।

दूसरी बात यह भी है कि ओवैसी को बैठ कर यह सोचना चाहिए कि 2012 से 2019 में ऐसा क्या बदल गया कि पंद्रह मिनट में हिन्दुओं का सफाया करने वाला ओवैसी इस्लामी भीड़ को कह रहा है कि उनमें शहादत का जज्बा होना चाहिए। आखिर इशारा कहाँ है? क्या ओवैसी चाहता है कि उसके सामने बैठे ‘शांतिप्रिय’, और उसको सुन कर स्खलित होने वाले ‘शांतिप्रिय’, भारतीय सेनाओं में जाएँ और राष्ट्र के लिए शहादत दें? क्या ओवैसी जब इस्लामी भीड़ से कहता है कि वो डराने वाले बनें तो उसका मतलब इससे है कि सुनने वाले मजहबी लोग पाकिस्तानियों को, या देश-समाज के दुश्मनों को डराने वाले बनें?

शहादत का जज्बा यानी मर मिटने की चाहत रखना। ऐसा जज्बा इस्लामी आतंकियों में खूब देखा गया है। वो बस इसलिए देह पर बम बाँध कर अपनी बम-बिरयानी बनवा लेते हैं क्योंकि किसी ने कहा है कि ऊपर बहत्तर हूरें बुर्का पहने इंतज़ार कर रही होंगी। यही तो वो जज्बा है कि अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए मर मिटना है। आखिर ओवैसी इन लोगों को शहादत के लिए क्यों तैयार कर रहे हैं? वो भी तब जब भारत के प्रधानमंत्री, जो ओवैसी के समर्थकों के भी प्रधानमंत्री हैं, ‘सबका विश्वास’ जीतने में जी-जान से लगे हैं।

आरएसएस का हौव्वा

चूँकि ओवैसी जैसे दंगाई प्रवृत्ति के लोग बार-बार यह नहीं कह सकते कि हिन्दू तुम्हारा दुश्मन है, इसलिए उन्हें एक विकल्प चाहिए। विकल्प है संघ, जिसके नाम एक भी अपराध नहीं, जिसने कभी भी किसी भी संप्रदाय के खिलाफ कुछ गलत नहीं किया, न कहीं हम फोड़ा, न किसी मार्केट में जा कर ‘जय श्री राम’ कहते हुए फट गया, फिर भी कट्टरपंथियों के लिए एक कॉमन दुश्मन के तौर पर इसे सारे नालायक पेश करते रहे हैं।

चूँकि, इन्होंने एकजुट हो कर, नरेन्द्र मोदी को इस चुनाव में हराने के लिए एड़ी-चोटी का परिश्रम किया लेकिन हुआ कुछ भी नहीं, तो इन्हें चुनने वाले इनकी क्षमता पर सवाल कर रहे हैं कि तुमने तो कहा था कि ये उखाड़ लोगे, और वहाँ से मोदी को भगा दोगे। न्यूज वाले भी इनको भाव नहीं दे रहे, तो इनके नुमाइंदे टिकटॉक से लेकर गलियों के जलसों में पागल कुत्तों की तरह भौंक रहे हैं।

लेकिन भौंकने के लिए एक भागती हुई कार तो चाहिए। आरएसएस वही भागती हुई, चमचमाती कार है जिसे देख कर ये भौंकते हैं क्योंकि इनका एक भी संगठन इस तरह का नहीं बन पाया जो कि अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा को सत्ता तक पहुँचा दे। इनके संगठन बड़ी पार्टियों द्वारा फेंकी गई हड्डियाँ चूसते रहे और अपने समर्थकों को ठगते रहे कि तुम्हारे लिए शहद की नदियाँ बहाने के लिए फंड इकट्ठा हो रहा है। परिणामतः मजहबी नेता रिंकलफ्री शेरवानी पहन कर घूम रहे हैं, और उनके समर्थक ‘नारा ए तदबीर अल्लाहु अकबर’ चिल्ला कर खुश हैं कि उनका मसीहा अब पर्वत को जला कर राख कर देगा। जबकि वो वास्तव में है चिरकुट।

कट्टरपंथियों का आइटम गर्ल है ओवैसी

जैसे फिल्मों में आइटम सॉन्ग हुआ करते थे और उनके आधार पर उनकी मार्केटिंग हुआ करती थी, और अब उन आइटम सॉन्ग्स में भी रीमिक्स का ही सहारा लिया जा रहा है तो ओवैसी का भी कुछ ऐसा ही है। नया है नहीं कुछ कहने को। घर की औरतें भी बुर्का पहन कर मोदी को वोट दे आती हैं, तो बेचारा भीतर से दुखी है।

ऐसे दुखी आदमी की भी जलसों में बुकिंग हो रखी होती है तो निजी दर्द को दरकिनार करते हुए माइक पर बोलना पड़ता है। ओवैसी का हाल उस बच्चे की तरह है जिसे उसका बाप मेहमानों के सामने सीधा ला कर खड़ा देता है और कहता है कि ‘अंकल को वो वाला पोएम सुना दो’। बच्चे को भी रटा हुआ रहता है, उसको पता है कि पिछले बार जो अंकल और आंटी आए थे किस लाइन पर ‘अरे वाह बेटा’ बोले थे, तो वो उस लाइन पर ज़ोर देता है।

ओवैसी को भीतर से पता है कि वो एक टुच्चा आदमी है जिसके विचार टुटपुँजिया हैं लेकिन इस देश में ऐसे लोगों के सामने भी, पंजो पर नितम्ब टिकाए लोग घुटनों पर हाथ रख कर ताली पीटने को बेकरार रहते हैं। उसे याद है कि ‘पंद्रह मिनट’ बोल कर वो अपने जेहनी बवासीर के दर्द से बिना चीर-फाड़ कराए, या अलीगढ़ के लाल कुआँ वाले हकीम के पास बिना जाए ही निजात पा सकता है। इसलिए वो बोलता है और उसके समर्थकों का भी दर्द थोड़ी देर के लिए शांत हो जाता है जो मई की 23 तारीख की सुबह से दोबारा शुरु हुआ है।

इसलिए, मेरी सलाह तो यही रहेगी कि भीड़ के सामने से हिन्दुओं के सफाए की धमकी देने वाले ओवैसी को अपनी स्पीच का प्रिंटआउट निकाल कर ठीक से पढ़ना चाहिए, फिर उसे सिलिंड्रिकल शेप में मोड़ कर स्थान विशेष में छुपा कर रख लेना चाहिए क्योंकि ये 2019 है।

अजब-गजब: केरल में कुतिया को ‘अवैध’ संबंध के लिए घर से निकाला

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में एक कुतिया को मालिक ने पड़ोसी के कुत्ते के साथ ‘अवैध संबंध’ के लिए घर से निकाल दिया। लगभग तीन साल की सफ़ेद कुतिया पॉमेरेनियन नस्ल की है और शहर के चकई स्थित वर्ल्ड मार्केट में घूमती मिली। उसका मालिक कौन है यह पता नहीं चल पाया है।

चिट्ठी से हुआ खुलासा

कुतिया की कॉलर में लटकी चिट्ठी से पूरे मामले का खुलासा हुआ है। उसे छोड़ने वाले मालिक ने चिट्ठी में बताया है, “वह बहुत अच्छी है, केवल भौंकती है, तीन साल में किसी को कभी काटा नहीं, ज़्यादा खाना नहीं खिलाना पड़ता- आम तौर पर दूध, बिस्कुट और अण्डों से काम चल जाता है। अब हमने इसे निकाल दिया है, क्योंकि इसके पड़ोस के कुत्ते से अवैध संबंध थे।”

जानवरों के लिए काम करने वाले NGO पीपल फॉर एनिमल्स की शमीन फारूखी ने मीडिया को बताया कि फ़िलहाल कुतिया को उन्होंने अपने घर में रख लिया है। उन्हें उम्मीद है कि उसे गोद लेने वाला कोई मिल जाएगा। हालाँकि कुतिया के चेहरे पर उम्मीद के भाव ऐसे हैं जैसे मालिक उसे लेने आता ही होगा।

‘कुत्ते ऐसा ही करते हैं’

शमीम ने कहा कि कुत्ते अपने प्रजनन काल में यौन संबंध बनाते ही हैं- यही उनकी प्रकृति है। अगर मालिक को उसके बच्चे/पिल्ले नहीं चाहिए थे तो वह कुतिया की नसबंदी करा सकता था। यदि उसे अपनी कुतिया को ‘कुँवारी’ ही रखना था तो उसे घर में बंद रखने के सिवाय और कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। शमीम के अनुसार उन्होंने घायल, बीमार वगैरह कुत्तों को छोड़े जाते तो देखा है, लेकिन ‘अवैध संबंध’ के कारण छोड़े गए कुत्ते का यह पहला मामला है।

शहरी नक्सलियों से जीरो सहानुभूति, कॉन्ग्रेस ने कानून लाकर अच्छा काम किया: अमित शाह

गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में साफ़ किया है उनकी सरकार शहरी नक्सलियों और माओवादियों के प्रति किसी भी मुरौव्वत के मूड में नहीं है। उन्होंने सदन में यह भी बयान दिया कि सच में सामाजिक कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं को पकड़ने में पुलिस की कोई रुचि नहीं है।

‘अर्बन नक्सलियों’ पर बहस का हिस्सा

‘अर्बन नक्सली’ या अर्बन माओवादी’ का अर्थ वह शहरी नागरिक हैं, जो शहरी मध्य-वर्ग/उच्च-मध्यम वर्ग (मार्क्सवादी भाषा में ‘बुर्जुआ’, burgeoise) का हिस्सा होते हुए भी वैचारिक, नैतिक-राजनीतिक, और कई बार आर्थिक, समर्थन भारत-विरोधी वाम-चरमपंथी गुटों जैसे नक्सलियों और माओवादियों की ग्रामीण इलाकों में हिंसक गतिविधियों का समर्थन करते हैं। माना जाता है कि यह शब्द फ़िल्मकार विवेक अग्निहोत्री द्वारा प्रचलित किया गया था। शहरी वाम-चरमपंथियों, और आदिवासी इलाकों में उनके हाथों जनजातियों के उत्पीड़न, को चित्रित करने वाली अग्निहोत्री की फिल्म ‘बुद्धा (बुद्ध) इन अ ट्रैफिक जाम’ की एक ओर वामपंथी धड़े में जहाँ आलोचना होती है, वहीं दूसरी ओर देश के ‘राइट विंग’ में फिल्म को ‘कल्ट स्टेटस’ मिला हुआ है। इस विषय पर जेएनयू में लगाए गए कुख्यात भारत-विरोधी नारों के बाद से कई बार राजनीतिक और सामाजिक बहस हो चुकी है।

‘व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने वाले प्रावधान की ज़रूरत’

गृह मंत्री अमित शाह ने गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) संशोधन अधिनियम (UAPA) पर बहस करते हुए कहा कि देश में एक व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने के प्रावधान की सख्त ज़रूरत है। उन्होंने अपने तर्क के समर्थन में अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र से लेकर पाकिस्तान तक के उदाहरण गिनाते हुए बताया कि हर बड़े देश के पास यह कानूनी हथियार है। यह प्रावधान इस्लामिक स्टेट (आईएस) के इराक-सीरिया स्थित केंद्रीयकृत संगठन के उखड़ जाने के बाद उसके आतंकियों के स्वतंत्र टुकड़ों (‘लोन वुल्फ टेररिस्ट’, अकेला जिहादी) के रूप में बिखर जाने की खबरों के प्रकाश में सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम है।

‘आपने सही किया था, हम भी सही कर रहे हैं’

UAPA पर कॉन्ग्रेस के सवाल उठाने को आड़े हाथों लेते हुए शाह ने कहा कि जब कॉन्ग्रेस राजग पर सवाल उठाती है तो भूल जाती है कि यह कानून लाया कौन (कॉन्ग्रेस) था और किसने उसे कड़ा बनाया। उन्होंने कहा कि कानून आप (कॉन्ग्रेस) लाए थे, आपने भी सही काम किया और अब हम भी (इसमें संशोधन करके) सही ही कर रहे हैं।

‘जो ना बोले जय श्री राम, भेज दो उसको कब्रिस्तान’, Viral हुए इस नए गाने पर बढ़ा विवाद

देश भर में हो रही मॉब लिंचिंग की घटनाओं के बीच एक गाना रिलीज हुआ है। रिलीज होने के साथ ही ये गाना विवादों में घिर गया है। इस गाने के बोल हैं- ‘जो ना बोले जय श्री राम, भेज दो उसको कब्रिस्तान।’ इस गाने को लेकर सोशल मीडिया में काफी चर्चा हो रही है। जानकारी के मुताबिक, इस गाने को वरुण बहार ने गाया है। 

इस गाने को लेकर लोग सोशल मीडया पर अपनी-अपनी अलग प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं। कुछ लोग इसे आपत्तिजनक बता रहे हैं, तो कुछ लोगों को इस गाने में कुछ भी गलत नहीं लग रहा है। ट्विटर यूजर प्रशांत कनौजिया ने इस वीडियो को ट्वीट करते हुए सिंगर को डिजिटल टेररिस्ट बताया है। बता दें कि प्रशांत कनौजिया वही पत्रकार है, जिसे सीएम योगी आदित्यनाथ पर आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट करने के आरोप में यूपी पुलिस ने हाल ही में गिरफ्तार किया था।

प्रशांत ने ट्वीट में लिखा है, “भारत एकमात्र देश है जहाँ आतंकवादी अपना म्यूजिक वीडियो बनाते हैं और यूट्यूब पर चलाते हैं। इस मामले में तालिबान और आईएसआईएस भी इस तकनीक तक नहीं पहुँच पाए हैं। डिजिटल इंडिया के साथ डिजिटल आतंकवाद…” इसके साथ ही कनौजिया ने हैशटैग में डिजिटल टेरेरिस्ट भी लिखा है।

प्रशांत कनौजिया के ट्वीट पर बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो गृह मंत्रालय से लेकर यूपी पुलिस तक से वीडियो बनाने वाले शख्स के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। वहीं कुछ यूजर्स ऐसे भी हैं जो ये कह रहे हैं कि इस तरह के वीडियो मार्केट में आने से मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएँ बढ़ सकती हैं।

वहीं, कुछ यूजर्स ऐसे भी हैं जिन्हें इस तरह के गाने में कोई बुराई नहीं दिख रही है। ऐसे लोग वीडियो ट्वीट करने वाले प्रशांत कनौजिया को ही एंटी हिंदू और एंटी नेशनलिस्ट बता रहे हैं। एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा है, “सबसे बड़े आतंकी तो तुम हो। रहते हिंदुस्तान में, खाते हिंदुस्तान की लेकिन हिंदुओं को आतंकवादी बोलते हो। शांतिदूत जब खुलेआम खून खराब करते हैं, तब कहाँ मर जाते हो।”

संपादकीय नोट: ऑपइंडिया इस तरह के किसी गाने की निंदा करता है (फिर चाहे वो किसी भी धर्म विशेष को लेकर ही क्यों न हो)। इससे माहौल बिगड़ सकता है, साम्प्रदायिक तनाव बढ़ सकता है।

मोदी राज में कम हुआ साम्प्रदायिक तनाव, आईबी के आँकड़े दे रहे गवाही

‘लिबरल गैंग’ और विपक्ष के तमाम दावों के बीच आँकड़ें बताते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश में साम्प्रदायिक तनाव कम हुआ है। केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बुधवार को राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान एक सवाल के जवाब में खुफिया ब्यूरो (आईबी) के आँकड़ों के हवाले से यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 2013 में साम्प्रदायिक घटनाओं के 823 मामले दर्ज किए गए थे। 2018 में इनकी संख्या घटकर 708 रह गई।

रेड्डी ने कहा, “वास्तविकता यह है कि देश में साम्प्रदायिक घटनाओं में कमी आई है। साम्प्रदायिक या किसी अन्य प्रकार की हिंसा के प्रति हमारी सरकार का इरादा ‘जीरो टॉलरेंस (कतई बर्दाश्त नहीं करने)’ की नीति का पालन करने का है।”

साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों का रिकॉर्ड दर्ज करने और इन आंकड़ों के स्रोत से जुड़े पूरक प्रश्न के जवाब में रेड्डी ने बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2014 से देश में साम्प्रदायिक घटनाओं का रिकॉर्ड दर्ज करना शुरू किया। लेकिन राज्य सरकारों द्वारा रिकॉर्ड में भिन्नता पर आपत्ति दर्ज कराने के कारण एनसीआरबी ने 2017 में इसका रिकॉर्ड दर्ज करना बंद कर दिया।

साम्प्रदायिक हिंसा रोकने के लिए अलग से कानून बनाने के सवाल पर उन्होंने मौजूदा कानून को पर्याप्त बताते हुए कहा कि साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा से निपटने के लिए नया कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं है। केन्द्र सरकार समय-समय पर राज्य सरकारों को इस बारे में खुफिया जानकारियाँ साझा करने के साथ-साथ परामर्श भी जारी करती रहती है।

‘शेर’ एजाज खान आया जेल से लँगड़ाते हुए बाहर, लोगों ने पूछा- सब ठीक तो है?

सोशल मीडिया पर भड़काऊ और विवादस्पद सांप्रदायिक वीडियो बनाने के मामले में मुंबई पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए गालीबाज अभिनेता एजाज खान को गिरफ्तार कर लिया था। अभिनेता एजाज ख़ान ने टिक-टॉक ऐप पर भड़काऊ वीडियो बना कर पोस्ट किया था। लेकिन अब वो जेल से रिहा हो चुके हैं। इसकी जानकारी एजाज खान ने अपने ट्विटर अकाउंट से दी। साथ में अपनी एक दमदार तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है- “A lion doesn’t concern himself with the opinions of a sheep”

गालीबाज एजाज खान की दमदार वापसी

एजाज खान एक लाख रुपए की जमानत पर रिहा किए गए हैं। मुंबई पुलिस द्वारा उन पर IPC की धारा 153-A, धारा 34 और धारा 67 के तहत केस दर्ज किया गया था।

‘लँगड़ाकर क्यों चल रहे हो?

एजाज खान के ट्वीट पर ट्विटर यूज़र्स ने जवाब देते हुए उनका एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वो लड़खड़ाते हुए चल रहे हैं। इस पर ट्विटर यूज़र्स उनसे अपने अंदाज में सवाल करते देखे जा रहे हैं।

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कुछ दिन पहले ही एजाज ख़ान ने हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा की बात की थी और सोशल मीडिया पर वह भड़काऊ और विवादास्पत पोस्ट्स के लिए कुख्यात हैं। मुंबई पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की थी। एजाज ख़ान ने उसी TikTok ‘सेलिब्रिटी’ के साथ यह विवादस्पद वीडियो बनाया था जिसके खिलाफ तबरेज़ अंसारी की मौत के बदले में हिंसा भड़काने के आह्वान को लेकर FIR दर्ज की गई थी।

एजाज़ खान की TikTok प्रोफाइल पर शेयर किए गए इस वीडियो में वह मुंबई पुलिस का मज़ाक उड़ाते नज़र आए थे। इसमें उनके साथ Team07 का एक सदस्य भी नज़र आया था। डायलॉग में जब पुलिस अफसर का किरदार कुछ अपराधियों को पुलिस की गाड़ी में बैठने को कहता है तो अपराधियों में से एक पुलिस वाले पर धौंस जमाता है। यह पहली बार नहीं है जब एजाज खान जेल गए हों, वो पहले भी कई बार ड्रग्स रखने और एक्ट्रेस के साथ बदसलूकी के लिए जेल की हवा खा चुके हैं।

‘मैंने BJP का झंडा लगाया, कॉन्ग्रेस के राजाराम ने मुझे और मेरी पत्नी को दिन-दहाड़े पीटा’ – देखें Video

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ के लिधौरा थाना क्षेत्र के खरो गाँव में कॉन्ग्रेस समर्थकों द्वारा पिटाई की खबर सामने आई है। यहाँ के एक दंपती को उन लोगों ने इसलिए पीट दिया, क्योंकि उसने अपनी गाड़ी पर बीजेपी का झंडा लगाया था। पीड़ित राकेश ने बताया कि वो भाजपा समर्थक है और उसने अपनी गाड़ी के ऊपर बीजेपी का झंडा लगाया था। इस पर उसके पड़ोसी राजाराम, जो कि कॉन्ग्रेस का आदमी है, ने उससे झंडा हटाने के लिए कहा। मगर राकेश ने मना कर दिया।

जब राकेश ने झंडा उतारने से मना किया तो राजाराम ने उसके साथ बदतमीजी की। फिर उसकी और उसकी पत्नी की पिटाई कर दी। साथ ही राकेश ने बताया कि उसके पड़ोसी ने अपने विकलांग बेटे को दारू पिलाकर उसके दरवाजे पर बैठा दिया है और वो गाली-गलौज कर रहा है।

वहीं एसपी अनुराग सुजानिया का कहना है कि जब इनके विवाद का मामला दर्ज हुआ था, तो इसके पीछे का कारण अवैध शराब बेचना था। उन्होंने कहा कि अभी तक राजनीतिक झंडा उतारने को लेकर कोई सबूत सामने नहीं आया है। उन्होंने कहा कि एफआईआर दर्ज कर ली गई है इस तथ्य को लेकर भी जाँच की जा रही है।

एसपी का कहना है कि पहले भी इनके बीच विवाद के मामले सामने आ चुके हैं। राकेश ने कहा कि पहले वो अवैध शराब बेचता था, लेकिन अब नहीं बेचता है। फिर भी ये लोग उसे परेशान करते हैं, उसके साथ मारपीट करते हैं। इनके साथ हुई मारपीट का वीडियो भी सामने आया है।

गुलशनजहाँ को दूधमुँही बच्ची के साथ घर से निकाला, तीसरी बेटी पैदा होने पर शौहर ने दिया तीन तलाक

कहते हैं कि समाज बदल रहा है और अब लोगों की सोच भी बदल रही है, मगर शायद ऐसा नहीं है। इसका उदाहरण समाज में आए दिन देखने को मिलता है। ताजा मामला उत्तराखण्ड के लक्सर का है। यहाँ तीसरी बेटी पैदा होने पर शौहर द्वारा तीन तलाक देकर बीबी को छोड़ने का मामला सामने आया है।

गुलशनजहाँ को तीसरी बेटी होने पर शौहर ने तीन तलाक देकर दूधमुँही बच्ची के साथ घर से निकाल दिया। महिला ने इसकी शिकायत थाने में की, मगर पुलिस ने घटनास्थल देहरादून का बताकर उसे वापस लौटा दिया। पुलिस ने कहा कि घटना देहरादून का है, तो मामला भी वहीं दर्ज होगा। गुलशनजहाँ का निकाह तकरीबन 6 साल पहले देहरादून के पटेल नगर थाना क्षेत्र के मोहल्ला मेहूँवाला के युवक के साथ हुआ था।

निकाह के बाद गुलशनहाँ को एक के बाद एक दो बेटियाँ हुईं, जिसके बाद घर वालों उसके साथ बुरा बर्ताव करने लगे, उसे प्रताड़ित करने लगे। बात-बात पर उसे परेशान किया करते थे और जब घर वालों को उसके तीसरी बार गर्भवती होने की बात पता चली तो उन लोगों ने लिंग परीक्षण करवाने की कोशिश की, मगर डॉक्टर ने इसके लिए मना कर दिया। इसके बाद उन लोगों ने महिला को और भी ज्यादा प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

इसी बीच गुलशनजहाँ को तीसरी बेटी पैदा हुई। तीसरी बार भी बेटी पैदा होने से बौखलाए ससुराल वालों ने उसके साथ मारपीट करनी शुरू कर दी। कई बार उसे गर्म प्रेस (इस्त्री) से भी जलाया गया और फिर 20 जुलाई को उसके शौहर ने तीन तलाक देकर उससे सारे संबंध खत्म करते हुए दूधमुँही बच्ची के साथ घर से निकाल दिया।

हनुमान भक्त शाहीन परवेज: घर में विराजे हैं बजरंग बली, रोज करती हैं पाठ और आरती

हनुमान चालीसा भले पश्चिम बंगाल की पुलिस को न सुहाता हो, भले इसके कारण बंगाल की भाजपा कार्यकर्ता इशरत जहॉं कट्टरपंथियों के निशाने पर हों, लेकिन मेरठ की 42 साल की शाहीन परवेज को इससे फर्क नहीं पड़ता। शाहीन के घर में तुलसी की माला पहने बजरंग बली विराजे हुए हैं और नियमित रूप से वह हनुमान चालीसा का पाठ तथा आरती करती हैं।

बकौल शाहीन, इससे वह अच्छा महसूस करती हैं। इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म मानने वाली शाहीन ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया, “मैं कॉलेज के दिनों से ही हनुमान चालीसा का पाठ करती हूॅं। मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी, वहॉं सभी धर्मों की शिक्षा दी जाती थी।”

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से जुड़ीं शाहीन को कट्टरपंथियों का डर नहीं। वे कहती हैं, “हम ऐसे देश में रहते हैं जहां सभी को एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करना चाहिए। यदि मैं दूसरे धर्म के बारे में भी सीखती हूॅं तो इसमें क्या गलत है। हर धर्म प्यार करना सिखाता है।”

‘पुण्य करने वालों को मिलता है ब्राह्मण कुल में जन्म, जातिगत आरक्षण के खिलाफ करना चाहिए आंदोलन’

केरल उच्च न्यायलय के न्यायाधीश वी चिताम्बरेश की ब्राह्मण समुदाय को लेकर विवादित टिप्पणी प्रकाश में आई है। उनके अनुसार ब्राह्मणों को जातिगत आरक्षण के खिलाफ आंदोलन करना चाहिए। हालाँकि उन्होंने साथ में साफ कर दिया कि संवैधानिक पद पर आसीन होने के चलते वह राय नहीं दे रहे, खाली श्रोताओं की रुचि जागृत कर रहे हैं। उन्होंने ब्राह्मणों को सलाह दी कि केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करें, जाति या आस्था के आधार पर नहीं। वह तमिल ब्राह्मणों के एक समूह को 19 जुलाई को सम्बोधित कर रहे थे।

‘पूर्व जन्म के कर्मों से बनता है ब्राह्मण’

वी चिताम्बरेश के अनुसार ब्राह्मण द्विज यानी ‘दो बार जन्म लेने वाले’ (उपनयन संस्कार को ‘दूसरा जन्म’ कहा जाता है) होते हैं, दूसरी बार जन्म लेने का मौका पूर्व जन्म के पुण्यों से मिलता है। उन्होंने ब्राह्मण की विशेषताएँ ‘स्वच्छ आदतें, उत्कृष्ट सोच, शानदार चरित्र, अधिकांशतः शाकाहारी होना, शास्त्रीय संगीत का पुजारी’ होना बताया। उनके मुताबिक जब किसी व्यक्ति में यह गुण आ जाते हैं, तो वह ब्राह्मण हो जाता है।

पद से हटाने की माँग

दिसम्बर 2012 में ही पूर्णकालिक जज बने वी चिताम्बरेश को हटाने के लिए सोशल मीडिया पर आवाज़ें आना शुरू हो गईं हैं। एक व्यक्ति ने उन्हें मूर्ख कहा, तो एक ने नफरती (‘bigot’)। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि ऐसे विचार रखने वाला व्यक्ति भला दलितों या अल्पसंख्यकों के मामले में न्याय कैसे करेगा।

मंदिर के पटाखों पर प्रतिबंध के लिए दे चुके हैं याचिका

जस्टिस चिताम्बरेश के करियर का इतिहास कई पक्षों वाला है। एक चर्च के स्वामित्व के मामले में उन्हें सुनवाई से हटना पड़ा था क्योंकि वकील रहते वह विवादित गुटों में से एक के पक्ष में मुकदमा लड़ चुके हैं। इसके अलावा 2016 में उन्होंने केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को खुद जज रहते एक चिट्ठी लिखी थी, जिसमें त्रिसूर पूरम उत्सव में ज्यादा शोर करने वाले पटाखों पर प्रतिबंध की पैरवी की थी। बाद में उनके पत्र को जनहित याचिका बनाकर हाई कोर्ट ने शाम से सुबह तक ऐसे पटाखों को प्रतिबंधित कर दिया, जिससे भड़क कर उत्सव में भाग लेने जा रहे आठ अन्य मंदिरों ने तिरुवम्बादी और परमेक्कावु मंदिरों के देवास्वोम बोर्डों की अगुआई में पूरे उत्सव को ही रद्द कर केवल जरूरी पूजापाठ करने की चेतावनी दी थी। यहाँ तक कि त्रिसूर के आर्कबिशप को भी मंदिरों और उत्सव के पक्ष में आना पड़ा था।

अंततः अदालत के आदेश के बाद भी प्रदेश के नेताओं ने उत्सव में किसी भी प्रकार की कमी करने से मना कर दिया था। माना जाता है कि इसका कारण रातों-रात 1300 साल पुराने वडक्कुनाथन मंदिर क्षेत्र, जिसे केरल की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है, में तख्तियाँ टंग गई थीं, जिन पर नेताओं को चेतावनी थी कि अगर आप पूरम का आयोजन नहीं कर सकते, तो वोट माँगने मत आना।