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सरकार या संसद को नहीं है शरीयत में हस्तक्षेप का हक: मौलाना मदनी

महिलाओं की सामाजिक स्थिति मजबूत करने के लिए जहाँ सरकार तीन तलाक बिल पर गंभीर है और कानून बनाने के लिए संसद में लगातार कोशिश कर रही है, वहीं इस्लामिक संगठनों और कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से इसका विरोध जारी है।

तीन तलाक मुद्दे पर समुदाय के बड़े संग़ठन जमीयत उलेमा ए हिन्द ने कहा है कि भारत के संविधान में दिए गए अधिकारों के तहत मुस्लिमों के धार्मिक एवं परिवारिक मामलों में सरकार या संसद को दखल देने का अधिकार नही हैं। साथ ही यह भी कहा कि मुस्लिम ऐसे किसी कानून को नहीं स्वीकार करेगा, जो शरीयत के खिलाफ हो।

तीन तलाक मुद्दे पर जमीयत ने कहा कि भारत के संविधान में दिए गए अधिकारों के तहत मुस्लिमों के धार्मिक एवं परिवारिक मामलों में सरकार या संसद को दखल देने का अधिकार नही हैं, क्योंकि मजहबी आजादी उनका बुनियादी हक है और इसका जिक्र संविधान की धारा 25 से 28 में की गई है। इसलिए मुस्लिम ऐसा कोई भी कानून, जिससे शरीयत में हस्तक्षेप होता है स्वीकार नही करेगा। मौलाना मदनी ने कहा कि समुदाय के अलावा 68% तलाक गैर मुस्लिम में होता है और 32% तमाम समुदायों में लेकिन सरकार का ये दोहरा रवैया समझ से परे है।

देश के वर्तमान हालात पर चर्चा के लिए जमीयत उलेमा हिंद की वर्किंग कमेटी की अहम बैठक हुई। बैठक के अहम मुद्दों में बाबरी मस्जिद, असम नागरिकता और वर्तमान में आए दिन हो रही मॉब लिंचिंग रही। बैठक में मौलाना अरशद मदनी ने अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुस्लिम और दलित समुदाय पर हो रहे कथित हमलों पर कहा कि वर्तमान स्थिति विभाजन के समय से भी बद्तर और खतरनाक हो चुकी है और ये संविधान के वर्चस्व को चुनौती एवं न्याय व्यवस्था पर सवालिया निशान हैं।

मौलाना ने कश्मीर समस्या पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कश्मीर समस्या का एक मात्र हल आपसी बातचीत से सम्भव है। NRC के मुद्दे पर जमीयत ने सुप्रीम कोर्ट में रिट पटीशन दाखिल की है, जिसमें नागरिकता साबित करने का वक़्त 15 दिन से बढ़ाकर 30 दिन किया जाए। बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर जमीयत ने कहा कि कानून एवं प्रमाण के अनुसार सुप्रीम कोर्ट जो भी निर्णय देगी वो उसको मानेंगे और कोर्ट के निर्णय का सम्मान करेंगे।

इंजीनियर पर कीचड़ उड़ेलने वाला कॉन्ग्रेस MLA और पूर्व CM का बेटा गिरफ्तार

महाराष्ट्र में हाइवे का निरीक्षण कर रहे इंजीनियर पर कीचड़ फेंकने और उसे पुल की रेलिंग से बांधने की कोशिश करने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। विवाद बढ़ने पर कॉन्ग्रेस विधायक और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे के बेटे नीतेश राणे ने कंकावली थाने में सरेंडर कर दिया है। सिंधुदुर्ग के एसपी दीक्षित गेदम ने बताया कि नितेश राणे और उनके दो समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया गया है। अन्य आरोपियों की तलाश की जा रही है। आरोपियों को शुक्रवार को कोर्ट के सामने पेश किया जाएगा। राणे समेत उनके करीब 40-50 समर्थकों के खिलाफ आईपीसी की धारा 353, 342, 332, 324, 323, 120(A), 147, 143, 504, 506 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है।

एक वीडियो में नीतेश अपने समर्थकों के साथ इंजीनियर प्रकाश शेडकर के साथ बदसलूकी करते नजर आए थे। शेडकर मुंबई-गोवा हाइवे पर कनकावली के करीब बारिश के कारण बने गड्ढों का निरीक्षण कर रहे थे। इसी दौरान नीतेश अपने समर्थकों के साथ वहां पहुंचे। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे उनके समर्थक इंजीनियर पर बाल्टी भर कीचड़ उड़ेलते हैं। इसके बाद नीतेश और उनके समर्थको ने एक नदी पर बने पुल की रेलिंग से इंजीनियर को बांध दिया।

मामला सामने आने के बाद नारायण राणे ने अपने बेटे के इस व्यवहार पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, “हाइवे के लिए प्रदर्शन ठीक है, लेकिन हिंसा पूरी तरह गलत है।” उन्होंने कहा, “यदि एक पिता बगैर गलती के माफी मांग सकता है तो बेटे को माफी मांगनी पड़ेगी।”

हालॉंकि घटना का विडियो सामने आने के बाद नीतेश ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “अब से मैं हाथ में एक डंडा लेकर इस हाइवे की रिपेयरिंग के काम की पड़ताल करूंगा। हर रोज सुबह 7 बजे मैं यहां आऊंगा और देखता हूं कि सरकार हमसे कैसे जीतती है। मेरे पास ऐसे अहंकारी लोगों से निपटने की दवा मौजूद है।”

नीतेश महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र से विधायक हैं। उनके पिता ने बीते साल सितंबर में कांग्रेस छोड़ दी थी और फिलहाल भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के करीब बताए जा रहे हैं। हालाँकि औपचारिक तौर पर नारायण राणे अभी भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं।

नेता पुत्रों की दबंगई का यह इकलौता उदाहरण नहीं है। सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने वाले नीतेश पहले विधायक भी नहीं हैं। हाल में मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक आकाश विजयवर्गीय और उनके समर्थकों का भी इसी तरह का वीडियो सामने आया था। इसमें आकाश इंदौर नगर निगम के अधिकारी को बल्ले से मारते दिखे थे। बाद में उनकी गिरफ्तारी भी हुई और फिलहाल वे जमानत पर बाहर हैं। आकाश मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं। आकाश की इस हरकत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी नाराजगी जता चुके हैं।

VIDEO: पहाड़ से गिरते पत्थरों से ढाल बनकर बचा रहे हैं अमरनाथ यात्रियों को ITBP के जवान

भारतीय सेना और सुरक्षा बल किस तरह से अपनी जान पर खेलकर आम लोगों की सुरक्षा के लिए हर वक़्त तैयार रहते हैं इसके उदाहरण हम अक्सर देखते रहते हैं। इसकी एक झलक सोशल मीडिया पर समाचार एजेंसी ANI द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में हम देख सकते हैं, जिसमें ITBP के जवान अमरनाथ यात्रियों को पहाड़ से गिरते पत्थरों से बचा रहे हैं।

अमरनाथ यात्रा 1 जुलाई से शुरू हो चुकी है। 45 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में श्रद्धालुओं की सुरक्षा में आईटीबीपी के जवान जी-जान से लगे हुए हैं। यात्रा के दौरान जब श्रद्धालु बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए आगे बढ़े तो उसी दौरान पहाड़ियों में भूस्खलन हो गया और पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े मार्ग की तरफ तेजी से आने लगे। इस पर ITBP के जवान पत्थर के भारी-भरकम टुकड़ों के सामने चट्टान की तरह खड़े हो गए और बिना अपनी जान की परवाह किए पत्थरों को यात्रियों तक पहुँचने से रोकते रहे। ANI ने इसका वीडियो जारी किया है।

वीडियो में हम देख सकते हैं कि भूस्खलन के बाद पत्थर का टुकड़ा तेजी से नीचे की तरफ गिरता है और यात्रा मार्ग की तरफ आने लगता है। जिस वक्त पत्थर का वो भारी भरकम टुकड़ा नीचे की तरफ लुढ़क रहा था उस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मार्ग से गुजर रहे थे। ITBP के जवानों ने यह देखकर तुरंत मार्ग से दूर मानव श्रृंखला बनाई और पत्थर के टुकड़े को मार्ग पर गिरने से रोक दिया।

अगर वह पत्थर का टुकड़ा नीचे की तरफ यात्रा मार्ग पर गिरता तो निश्चित तौर कुछ श्रद्धालुओं की जान चली जाती और कुछ लोग घायल हो जाते, लेकिन आईटीबीपी के जवानों की मुस्तैदी काम आई और श्रद्धालु बाल-बाल बच गए। इस पूरे वाकये के वीडियो को आईटीबीपी के ट्विटर हैंडल से शेयर किया गया है जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। लोग आईटीबीपी के जवानों की बहादुरी की तारीफ करते हुए उन्हें सलाम कर रहे हैं।

इसी तरह से भारतीय सैनिक और सुरक्षा बल, चाहे BSF हो या फिर ITBP के जवान हों, 2013 में केदारनाथ में आई आपदा के दौरान जगह-जगह फँसे हुए लोगों को सुरक्षित स्थान पहुँचाने में मदद करते हुए देखे गए थे।

हिन्दू करें कल्कि अवतार की प्रतीक्षा, क्योंकि जिनको चुना उनसे तो कुछ हो नहीं रहा

इसमें कोई दोराय नहीं है कि विरोधियों ने मोदी और भाजपा को आज तक ‘हिंदुत्व’ एजेंडा चलाने वाला कहा है, जिसमें फासीवाद से लेकर तमाम मवादों के नाम एक साथ ग्राइंडर में डाल कर भगवा शेक बनाने के बाद कहा जाता है कि पूरे भारत को मोदी शाकाहारी, विशुद्ध हिन्दू और मंगलवार को हनुमान की अराधना करने वाला बना देगा। वहीं, दूसरी तरफ जिन लोगों ने मोदी को, योगी को, भाजपा को वोट दिया है, वो भी उन्हें हिन्दू हृदय सम्राट से लेकर तमाम विशेषणों से नवाजते हैं।

वस्तुस्थिति चाहे इसके उलट रही हो, और सिर्फ जून के महीने में छः जगह (एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) मंदिरों और मूर्तियों को इस्लामी भीड़ ने तोड़ा हो, लेकिन बर्बर बहुसंख्यक का तमगा हिन्दुओं के सर पर ही चिपकाया जाता है। खबरें आती हैं जहाँ सामाजिक अपराध को मजहबी रंग देकर, हिन्दुओं को असहिष्णु बताया जाता है, स्थान विशेष से मोमबत्तियाँ निकल आती हैं, चौक-चौराहों पर हजारों की भीड़ जुटती है और बीबीसी लंदन से लेकर वाशिंगटन पोस्ट तक भारत को बताते हैं कि इस देश में अल्पसंख्यकों का जीना हिन्दुओं ने मुहाल कर रखा है।

और हिन्दू क्या करते हैं? या, हिन्दुओं के चुने हुए तथाकथित हिन्दुवादी नेता क्या करते हैं? वो तमाम पावर में बैठे लोग क्या करते हैं, जिनकी रगों के खून को भगवा बताया जाता है? वो कुछ नहीं करते। कुछ नहीं करना भी बड़ा कठिन कार्य है, क्योंकि आपको पता ही नहीं चलता कि आपने वो काम कब खत्म कर दिया। इनकी आस लगाए फेसबुक पर जनता कोसती है एक-दूसरे को कि ‘जिसको चुना वो निष्क्रिय है’, ‘हिन्दुओं इकट्ठा हो जाओ’, ‘आत्मरक्षा के लिए तैयार रहो’, ‘तैयारी करो…’ आदि। लेकिन ये सब तो समाधान नहीं है। हिंसा से किसी भी समस्या का समाधान नहीं मिल सकता।

इसी पर बात करते हुए एक सोशल मीडिया यूजर ने जो लिखा है वो हिन्दुओं के बारे में पूरी तरह से सही है कि धर्म हिन्दुओं को लिए कभी भी प्राथमिकता नहीं रहा। इसलिए फेसबुक पर लिख कर, चार सवाल फेंक कर अपनी जिम्मेदारी निभा लेने के मुग़ालते में रहने वाले लोग बहुत हैं। जबकि समुदाय विशेष आपसी दुश्मनी में भले ही अलग दिखे, लेकिन बाकी हर काम, जहाँ मजहब है, चाहे वो नमाज हो या सामूहिक हिंसा, वो एकजुट और तैयार दिखता है।

दक्षिणपंथी सरकार और दक्षिणपंथी लोग कभी भी एक साथ होना ही नहीं चाहते। यहाँ हमेशा यह देखा गया है कि सबको बॉण्ड बनना है, और जरूरत पड़े तो एक दूसरे की पतलून उतार लेनी है। जबकि ऐसे मौकों पर, जब आपका धर्म, आपकी धार्मिक जगहें, आपकी जीवनशैली और अंततः आपका अस्तित्व ही संकट में हो, आपको तय तरीके से, कश्मीर से कैराना और वहाँ से मेरठ के प्रह्लादपुर से दिल्ली के कुछ इलाकों तक से मकानों पर ‘ये मकान बिकाऊ है’ लिखना पड़ रहा हो, तो संगठित होने के अलावा कोई चारा नहीं है।

संगठन आत्मरक्षा के लिए, धर्मरक्षा के लिए और संस्कृति की रक्षा के लिए ज़रूरी है। वरना दिल्ली के हौज़ काज़ी में दुर्गा मंदिर के सामने इस्लामी भीड़ आएगी, ‘अल्लाहु अकबर’ चिल्लाएगी, पत्थर फेंकेगी, भीतर जाकर मूर्तियों को तोड़ेगी और आप मीडिया को बाइट देंगे कि ‘उन्होंने हमारी मूर्ति पर पेशाब भी किया’।

आप इतने मजबूर कैसे हैं? हमला बोलने की परंपरा हमारी रही नहीं, लेकिन अपने आप को बचाने के लिए पहला कदम तो उठाइए! सत्ता का सिर्फ एक ही ध्येय होता है ‘सत्ता में बने रहना’। सरकारों को न तो दंगों में किसी एक समुदाय की मदद करनी चाहिए, न ही ऐसा आगे होने वाला है। याद कीजिए कि चर्च का शीशा टूटता है और यही पुलिस उपद्रवियों को कैसे पकड़ लेती है। याद कीजिए कि जयपुर में मजहबी भीड़ पुलिस स्टेशन को घेर लेती है, आग लगाती है, दंगा करती है, और वहाँ के भाजपा मंत्री को देर रात को ‘नेगोशिएशन’ करने जाना पड़ता है, और केस वापस लेने की बात माननी पड़ती है।

एक खबर पर दिल्ली में लाख लोग जुट जाते हैं और उसे मजहबी रंग देकर सबको सुना देते हैं कि जुनैद की हत्या गोमांस के कारण हुई, और तबरेज की हत्या उसके मजहब के कारण हुई, सच भले यह हो कि एक सीट के विवाद में मारा गया और दूसरा चोर था और उसकी जान भीड़ ने ले ली। आखिर तुम्हारी एक लाख लोगों की भीड़ मंगरू की हत्या पर, अंकित सक्सेना की हत्या पर, प्रशांत पुजारी की हत्या पर, ईरिक्शा चालक रवीन्द्र की हत्या पर, डॉ. नारंग की हत्या पर, ध्रुव त्यागी की हत्या पर… क्यों नजर नहीं आती? और कितने नाम लूँ?

आपका और हमारा सत्य यही है कि हम फेसबुक पर ही लाइकों की भीड़ जुटा लेते हैं और पेरिस हमलों के बाद डीपी में फ्रान्स के झंडे का फिल्टर लगा कर संवेदनशील हो जाते हैं, जबकि रामपुर में समुदाय विशेष के दस लड़के किसी हिन्दू लड़की को खींच लेते हैं, छेड़ते हैं, हाथ लगाते हैं और वो किसी लोकल न्यूजपेपर के भीतरी पन्नों की खबर बन कर गायब हो जाती है। पचास घटनाएँ तो हाल ही में हमने गिनाईं जहाँ 2016 के बाद से समुदाय विशेष के द्वारा किए गए हेट क्राइम्स की पूरी सूची है। दर्जन भर और ऐसी घटनाएँ जहाँ हिन्दू को बुरा दिखाने के लिए हेट क्राइम बताया गया, लेकिन वो निकले कुछ और। लेकिन हमने किया क्या उसके बाद?

क्या हमारा इकोसिस्टम ऐसा है कि हम किसी आतंकी के लिए इकट्ठे हो जाएँ? क्या हमारे तथाकथित चिंतित हिन्दू मित्रों ने लाख तो छोड़िए, सौ की भीड़ इकट्ठा कर के पूछा कि दिल्ली का दुर्गा मंदिर कैसे टूट जाता है? क्या कभी ऐसा हुआ है कि आपने गलत आदमी को तो छोड़िए, सही आदमी को भी छुड़ाने का कोई प्रयास किया? क्या आपने वामपंथियों की तरह, इस समुदाय विशेष की भीड़ की तरह कासगंज के चंदन को गोली मारने की घटना पर कभी कैंडल मार्च भी किया?

नहीं किया, क्योंकि जब तक अपने घर का कोई नहीं मर जाता, आप में वो संवेदना नहीं जगती कि आप इकट्ठे हो सकें। एक तरफ आतंकियों की सजा पर या तो विरोध प्रदर्शन होता है, या फिर हर ऐसी घटना पर ये समुदाय चुप्पी साध लेता है, और दूसरी तरफ आप हैं जो यह कह कर डिफेंड करने लगते हैं कि हिन्दू टेरर नहीं होता, उस पर तो इल्जाम लगा है, साबित कुछ नहीं हुआ है। आपको हमेशा कोर्ट के आदेश का इंतजार होता है, आप वोट की शक्ति के बल पर चलते हैं, आपको तंत्र पर विश्वास है।

जबकि उधर तंत्र को भीड़ के सामने झुकना पड़ता है। हर बार तंत्र झुकता है। पत्थरबाजों के केस वापस लिए जाते हैं। उनकी सरकारी नौकरी के लिए आपकी चुनी हुई सरकार इंतजाम में लग जाती है। उन्हें मजहब के आधार पर छात्रवृत्ति दी जाती है। उन्हें विश्वास दिलाया जाता है कि उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी। उनके मस्जिद की दीवार पर कीचड़ भी पड़ता है तो वो उस इलाके के पुलिस की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाती है।

आखिर आपको ये सुविधा क्यों नहीं मिलती? क्या आपने कभी तंत्र को झुकाने का तो छोड़िए, अपनी शक्ति दिखाने भर का भी प्रयत्न किया है? आपकी हालत यह है कि आपका बेटा इस्लामी भीड़ द्वारा अगवा कर लिया जाता है, गायब रहता है और पुलिस आपको चुप रहने को कहती है। आपकी हालत यह है कि आपके मंदिर तोड़े जाते हैं, आपकी मूर्तियाँ तोड़ी जाती हैं और आपके हिन्दू हृदय सम्राट की पुलिस इस फिराक में रहती है कि नई मूर्ति लगा दी जाए और ‘इलाके की स्थिति को नियंत्रण’ में लाया जा सके। आखिर पीड़ित के साथ ही नाइंसाफी कर के आप स्थिति को नियंत्रण में कैसे ले आते हैं? ये स्थिति ऐसे ही नियंत्रित क्यों होती है? नियंत्रित तो तब होगी जब उस भीड़ में शामिल हर व्यक्ति को जेल में डाला जाए, न कि किसी तीन को पकड़ कर दिखाने के लिए कहा जाए कि हिन्दू घरों के साथ न्याय हो गया!

ये प्रतीक हैं, ये लगातार चलती रही बेकार-सी परंपरा का घिसा-पिटा रूप है, जब हमला करने वाली भीड़, जानबूझकर उपद्रव करती है, और अपने शक्ति प्रदर्शन के बाद आपको चिढ़ाती हुई ऑफर करती है कि ‘हम लोग मिल-जुल कर मंदिर को दोबारा बना देंगे’। ये शांति की पेशकश नहीं है, ये हिन्दुओं की भीरुता पर तमाचा है, लेकिन नींद में सोया हिन्दू इन थप्पड़ों के बाद भी जगता नहीं, खुश हो जाता हो कि देखो हमारे मजहबी भाई कितने शांतिप्रिय हैं।

मजहबी भाई बेशक शांतिप्रिय होंगे, लेकिन बारह घंटे पहले मंदिर तोड़ने वाली भीड़ को शांतिप्रिय कैसे कहा जा सकता है? इतने ही शांतिप्रिय थे तो पत्थर उठा कर मंदिर पर हमला कैसे बोला? खबर तो यह भी थी कि मंदिर तोड़ने के बाद यही शांतिप्रिय भीड़ छतों से हिन्दुओं पर पत्थर फेंक रही थी और तलवार लिए ‘शांतिप्रिय’ इलाके में घूम रहे थे।

हिन्दुओं को एक बात गाँठ बाँध कर रख लेनी चाहिए कि जब तुम्हारे 59 कारसेवकों को साबरमती एक्सप्रेस की बॉगी में जला दिया जाए, तो तुम्हें उसके बाद होने वाली प्रतिक्रिया को सत्रह साल बाद भी अपनी गलती मान कर डिफेंड नहीं करना चाहिए, बल्कि यह याद करना चाहिए कि गुजरात में उस आगजनी के बाद आज तक कोई दंगा नहीं हुआ।

‘शठे शाठ्यम समाचरेत्’ कहा जाता है। यानी, दुष्ट के साथ दुष्टता का ही आचरण करना चाहिए। आज तक हिन्दुओं ने न तो जलमार्ग ढूँढ कर दूसरे देशों के साथ व्यापार करने की कोशिश की, न ही उन्होंने उपनिवेश बनाए, न ही दूसरे देशों में घुस कर मस्जिदों को तोड़ा, न ही गाँवों में आग लगा कर लूट-पाट और बलात्कार किए, न ही किसी को तलवार की नोंक पर हिन्दू बनाया, तो आज के समय में वैसी अपेक्षा करना मूर्खता होगी।

लेकिन यह आशा तो की जा सकती है कि आस्था को निजी के साथ-साथ सामूहिक मान कर, दिल्ली में मंदिर तोड़े जाने पर चेन्नई में कैंडल मार्च हो। यह आशा तो की जा सकती है कि किसी मंगरू को अगर मजहब विशेष के तीन ‘शांतिप्रिय’ चाकुओं से इसलिए गोद दें कि उसने अपने घर के सामने उन्हें गाँजा पीने से मना किया था, तो उस मंगरू की लिंचिंग पर एक लाख लोग इंडिया गेट पर इंसाफ माँगने पहुँच जाएँ। यह आशा तो की जा सकती है कि तुम उस पुलिस स्टेशन को तब तक घेरे रखो जब तक सीसीटीवी में दिखने वाला हर अपराधी पुलिस पकड़ न ले।

लेकिन वो हमसे नहीं हो पाएगा, हम दलित-सवर्ण में, डोम-चमार में, इस ब्राह्मण और उस ब्राह्मण में, तीन गाँठ और दो गाँठ के जनेऊ में, उत्तर और दक्षिण में, हिन्दी और तमिल में, नौकरी और आस्था में तोल-मोल करते रहेंगे। हम निजी नफा-नुकसान तब तक देखते रहेंगे जब तक कि हमारे घर के भीतर के मंदिर में कोई आकर पेशाब न कर दे, जब तक हमारे घर की किसी लड़की को कोई खींच न ले जाए, जब तक हमारा भाई तीन दिनों के लिए किसी मजहबी भीड़ द्वारा गायब न कर दिया जाए।

इसलिए, इंतजार करो कल्कि अवतार का जो कि कलियुग में होना लिखा है। इसका इंतजार इसलिए करो क्योंकि तुम्हारे विरोध में बैठे लोगों का तंत्र, सत्ता से बाहर होते हुए भी इतना प्रबल है कि चोर की भीड़ हत्या पर प्रधानमंत्री को बोलने पर मजबूर कर देता है, लेकिन मंगरू जैसे दसियों हिन्दुओं की कट्टरपंथियों द्वारा की गई हत्या पर उससे कोई सवाल ही नहीं करता।

हमारी लड़ाई उस इकोसिस्टम से है जो हमें यह बताता है कि भले ही इस्लामी आक्रांताओं ने हिन्दुओं के मंदिर तोड़े, गाँवों को आग लगाया, जगहों की पहचान मिटाने के लिए नाम बदले, बलात्कार और लूट-पाट की, लेकिन देखो उन्होंने तो मुगलई व्यंजनों की रेसिपी भी तो बताई! ये इकोसिस्टम बार-बार बताता है कि ठीक है, उन्होंने लाखों हत्याएँ कि लेकिन वो दिल के बड़े अच्छे थे।

उनके नाम का सत्संग तुम्हें इतिहास में पढ़ाया जाता रहेगा। तुम्हारे नायकों को एक वाक्य में डिसमिस किया जाएगा लेकिन मुगल सल्तनत में किसके बाप ने किस-किस की बेटियों से शादी करके, कितने बच्चे पैदा किए और उसने फिर किस तरीके से कितने साल भारत पर राज किया, ये सब विस्तार से पढ़ाया जाएगा। और तुम्हारी तथाकथित हिन्दूवादी सरकार, जो कि भारतीय संस्कृति और इतिहास को संरक्षित करने का दावा किया करते थकती नहीं, एक शिक्षा नीति तक अपने पहले कार्यकाल में नहीं ला पाई। सरकारों से उम्मीद रखोगे तो ऐसे ठगे जाओगे कि शिकायत करने के लिए कोई मिलेगा नहीं।

इसलिए हे हिन्दुओ! तुम गाय के झुंड के सामने हाथ जोड़ कर ऐसे ही बैठे रहो कि भगवान शंकर का घर है, वो रक्षा करेंगे जबकि एक उन्मादी भीड़ आएगी और उसी शिवलिंग को लूट कर चली जाएगी जिससे तुम किसी प्रकाशपुंज के निकलने की प्रतीक्षा में हो कि त्रिशूल चमकेगा और दुश्मनों का नाश हो जाएगा। शंकर ऐसे कायरों पर अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं करते। शंकर की ऊर्जा का पात्र बनने के लिए स्वयं का स्तर बढ़ाओ।

तुम्हें लगता है कि नोबेल पीस प्राइज की राह तकता सत्ताधीश तुम्हारे पक्ष में बयान देकर अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि बर्बाद करेगा कि उससे वैश्विक पटलों पर यह पूछ दिया जाए कि आपने तो बहुसंख्यकों के पक्ष में बयान दिया था। जब तक सामूहिक प्रतिकार करना नहीं सीखोगे, हमारे जैसे लोग इन खबरों को गिनते रहेंगे जहाँ फलाँ साल कितने मंदिर गिरे, कितनी जगहों पर मजहबी भीड़ ने किसी की हत्या कर दी, किसने लस्सी विक्रेता से हुई बाता-बाती पर मजहबी भीड़ बुला कर हिन्दू व्यक्ति की जान ले ली।

रीढ़हीन व्यक्ति के लिए तो मेडिकल साइंस ने सपोर्ट की व्यवस्था की है, लेकिन रीढ़हीन व्यक्तित्व के लिए किसी भी तरह का सपोर्ट बाजार में उपलब्ध नहीं है। अंग्रेजी में एक कहावत है कि भगवान उसी की मदद करता है जो स्वयं अपनी मदद करने को तैयार हों। यहाँ वैसी स्थिति नहीं है। रोने-गाने वालों की एक आभासी भीड़ का खून तीन सेंकेंड के लिए ऐसे ही उबल कर नीचे चला जाता है जैसे इंडक्शन चूल्हे पर स्टील के बर्तन में रखा दूध।

कल्कि आएँगे, सफेद घोड़े पर आएँगे और उसे मजहबी भीड़ घोड़ा समेत काट कर फेंक देगी और हम फेसबुक पर अपडेट करके उस समय की सरकार से पूछेंगे कि क्या तुम्हें इसी समय के लिए चुना था!

INX मीडिया केस में इंद्राणी मुखर्जी को सरकारी गवाह बनने की मिली मंज़ूरी

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) की एक अदालत ने गुरुवार (4 जुलाई) को पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम से संबंधित INX मीडिया मामले में इंद्राणी मुखर्जी को गवाह बनने की अनुमति दे दी है। इस मामले की अगली सुनवाई 11 जुलाई को होगी।

अदालत ने इंद्राणी के लिए एक प्रोडक्शन वारंट जारी किया है। फ़िलहाल, इंद्राणी मुखर्जी मुंबई की भायखला जेल में अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या मामले में बंद हैं। गवाह बनने की इंद्राणी की अर्जी का समर्थन करते हुए केंद्रीय जांँच ब्यूरो (सीबीआई) ने दलील दी थी कि इससे मामले में सबूतों को मजबूती मिलेगी। इसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने इंद्राणी मुखर्जी से पूछा था कि क्या उन पर कोई दबाव है, जिससे उन्होंने इनकार किया था। उन्होंने अदालत को बताया था, “मैं स्वेच्छा से वादा माफ गवाह बनना चाहती हूँ।”

पिछले साल, इंद्राणी मुखर्जी ने एक सनसनीखेज खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि वे चिदंबरम से उनके नॉर्थ ब्लॉक कार्यालय में मिली थीं और उनसे उनकी मीडिया कंपनी में विदेश निवेश के लिए क्लीयरेंस की माँग की थी। इंद्राणी का दवा है कि पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम ने उनसे अपने बेटे कार्ति के व्यवसाय में मदद करने को कहा था।

इसके बाद इंद्राणी अपने पति पीटर के साथ दिल्ली के एक पाँच सितारा होटल में कार्ति से मिलीं, जहाँ उन्होंने कथित रूप से 10 लाख अमेरिकी डॉलर की माँग की थी। इंद्राणी ने मजिस्ट्रेट के सामने भी अपना यही बयान दोहराया था।

INX मीडिया मामले में CBI ने 15 मई, 2017 को FIR दर्ज की थी। इसमें आरोप लगाया गया है कि चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान 2007 में 305 करोड़ रुपए की विदेशी धनराशि प्राप्त करने के लिए मीडिया ग्रुप को फॉरन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड (FIPB) की मंज़ूरी देने में अनियमितताएंँ बरती गईं। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पिछले साल इस संबंध में मनी लाँड्रिंग का मामला भी दर्ज किया था।

खिंसियानी महुआ मीडिया को धमकाए: भाषण में ‘चोरी’ पकड़े जाने पर दिखाई विशेषाधिकार की धौंस

पश्चिम बंगाल की कृष्णानगर सीट से चुनकर लोकसभा पहुॅंचीं तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा अब अपने विशेषाधिकारों की आड़ में पत्रकारों को धमकाने पर उतर आईं हैं। लोकसभा में अपने पहले संबोधन से चर्चा में आई ‘उदारवाद की नई नायिका’ ने गुरुवार को सदन में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव रखा। अपने पहले संबो​धन में ‘साहित्यिक चोरी’ को लेकर महुआ विवादों में हैं। इस चोरी को उजागर करने वाले पत्रकार को डराने के लिए उन्होंने विशेषाधिकार की धौंस दिखाने की कोशिश की।

असल में महुआ ने बीते दिनों नरेंद्र मोदी की सरकार पर निशाना साधते हुए लोकसभा में बेहद तीखा भाषण दिया था। लेकिन, 3 जुलाई को सुधीर चौधरी ने जी न्यूज के अपने शो ‘डीएनए’ में बताया कि महुआ का भाषण मौलिक नहीं था। उन्होंने दस्तावेज साझा करते हुए बताया कि मोइत्रा ने किस तरह एक अमेरिकी वेबसाइट से भाषण चोरी कर लोकसभा में दिए। चौधरी ने इसको लेकर ट्वीट भी किए थे।

इससे महुआ की काफी किरकिरी हुई। इसी से खार खाई तृणमूल सांसद गुरुवार को लोकसभा में विशेषाधिकार हनन का नोटिस लेकर आईं ताकि पत्रकार और मीडिया संस्थान निर्भीक होकर तथ्य सामने नहीं रख सके। वो तो भला हो, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का कि उन्होंने इस नोटिस को खारिज कर दिया।

अपने भाषण पर विवाद के बाद महुआ ने सफाई देते हुए कहा था कि उनके शब्द चोरी के नहीं थे। उन्होंने जो कुछ कहा दिल से कहा। उन्होंने मीडिया पर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया था। मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को धमकाया भी था। इस दौरान मीडिया को ‘बिकाऊ’ बताने से भी वे नहीं चूकीं।

महुआ ने अपने इस अंदाज़ से बता दिया है कि वे अपनी नेता ममता बनर्जी के नक्शेकदम पर चलने को तैयार हैं। असल, में मीडिया जब भी ममता बनर्जी की सरकार की आलोचना करता है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री मीडिया को धमकाने से बाज नहीं आतीं।

उल्लेखनीय है कि महुआ पर अमेरिकी वेबसाइट के 2017 के जिस आलेख से शब्द चुराने के आरोप हैं उसे भी चौधरी ने ट्वीट किया था।

‘खुद को सबसे बड़ा ईमानदार बताने वाला निकला सबसे बड़ा लुटेरा’

दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सभी राजनैतिक पार्टियाँ अपनी-अपनी तरह से तैयारियों में जुटी हुई हैं। इसी दिशा में भाजपा ने जनता के सामने केजरीवाल सरकार के कार्यकाल में हुए घोटालों का पर्दाफ़ाश करने का मोर्चा खोला है। जिसमें दिल्ली भाजपा दस्तावेज और आरटीआई के जरिए पाँच सालों में हुए घोटालों का खुलासा कर रही है।

अब इसी मौक़े का फायदा उठाते हुए रजौरी गार्डन से विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने केजरीवाल पर तंज कसते हुए कई जगह पोस्टर लगाए हैं, जिसमें केजरीवाल का कार्टून बना हुआ है और साथ में लिखा हैं, “खुद को सबसे बड़ा ईमानदार बताने वाला निकला सबसे बड़ा लुटेरा, स्कूलों में जो कमरा 5 लाख (रुपए) में बनता है वो बनाया 25 लाख में।” पोस्टर के नीचे मनजिंदर सिंह सिरसा ने अपना नाम और शिरोमणि अकाली दल का नाम भी लिखवाया है।

हालाँकि, ऐसा पहली बार नहीं है कि मनजिंदर सिंह सिरसा ने केजरीवाल के पोस्टर सड़कों पर लगवाएँ हों, इससे पहले भी वे 2018 में अरविंद केजरीवाल के लिए, “मैं एक झूठा मुख्यमंत्री हूँ” के पोस्टर लगवा चुके हैं। लेकिन इस बार उनका केजरीवाल पर यह तंज शिक्षा विभाग में हुए करोड़ों के घोटालों पर है। जिसका खुलासा दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कुछ दिनों पहले एक आरटीआई का हवाला देकर किया था।

दरअसल, मनोज तिवारी ने अपने बयान में कहा था कि केजरीवाल और मनीष सिसोदिया का गठजोड़ शिक्षा के नाम पर 2000 करोड़ रुपए का भ्रष्टाचार कर रहा है। उन्होंने बताया था कि दिल्ली सरकार ने स्कूलों में नर्सरी कक्षा के 366 कमरों का निर्माण करवाया है, जिसमें एक कमरे की लागत 28 लाख 70 हजार रुपए आई हैं।

जिस पर शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी, सांसद प्रवेश वर्मा और विधायक विजेंद्र गुप्ता को कानूनी नोटिस जारी भी किया और कहा कि ये उनकी सोची-समझी साजिश है, ये तीनों नेता अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा की उल्लंघन कर रहे हैं। अगर इन लोगों ने 48 घंटों में माफी नहीं माँगी तो इनके ख़िलाफ़ आपराधिक मुकदमा भी दायर हो सकता है।

श्रद्धालुओं से गाली-गलौज, हनुमान जी की प्रतिमा तोड़ने की कोशिश: मंदिर में घुस कर मूसा ने पार की हदें

जनपद मुज़फ्फरनगर में गुरुवार को दिन निकलते ही उस समय हंगामा मच गया जब एक शरारती युवक ने एक मंदिर में घुस कर वहाँ पूजा कर रहे एक श्रद्धालु को गाली-गलौज करते हुए मंदिर में रखी हनुमान की मूर्ति को तोड़ने का प्रयास किया। इसी बीच वहाँ मौजूद लोगों ने आरोपित युवक को दबोच लिया मगर तब तक आरोपित मंदिर का शीशा तोड़ चुका था। देखते ही देखते मौके पर भीड़ इकट्ठा हो गई और भीड़ ने आरोपित युवक को पुलिस को सौंप दिया।

आरोपित के ‘दूसरे समुदाय’ के होने की वजह से इलाक़े में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जिसके बाद हिंदू संगठन के लोगों ने थाना खतौली में जमकर हंगामा किया। बताया जा रहा है कि आरोपित युवक का नाम मूसा है। जोगी जनपद बुलंदशहर के खुर्जा का रहने वाला है और मुजफ्फरनगर के खतौली में एक जमात में आया हुआ था। घटना की जानकारी मिलते ही हिंदू संगठन के लोगों में रोष व्याप्त हो गया और मौके पर भारी भीड़ इकट्ठा हो गई। बताया जा रहा है कि आरोपित युवक का नाम मूसा है, जो कि जनपद बुलंदशहर के खुर्जा का रहने वाला है।

खतौली में एक जमात में आया हुआ था। पुलिस ने पूरे मामले की छानबीन शुरू कर दी है। पुलिस उपाधीक्षक आशीष प्रताप सिंह का कहना है सुबह के समय एक युवक हनुमान मंदिर में घुसा और वहाँ पूजा कर रहे मंदिर के पुजारी व एक अन्य व्यक्ति के सामने तरह-तरह की धार्मिक भावनाओं को भड़काने जैसी बातें करने लगा। और मंदिर की मूर्ति को खंडित करने का प्रयास किया जिसके खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। आरोपित को जेल भेजा जा रहा है। मामले की छानबीन की जा रही है। इस बात का पता लगाया जा रहा है कि आरोपित युवक बुलंदशहर के खुर्जा से यहाँ किसलिए आया।

बांग्लादेश टीम पर बिजली गिर जाए तो Pak वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में: पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद युसूफ़

ICC वर्ल्ड कप 2019 में पाकिस्तान का खेल ख़त्म हो गया है। सेमीफाइनल में पहुँचने की अब उसकी सभी उम्मीदों पर पानी फिर चुका है। यूँ तो आगामी शुक्रवार (5 जुलाई) को पाकिस्तान की टीम बांग्लादेश के ख़िलाफ़ मैदान में उतरेगी, लेकिन उसका कोई फ़ायदा पाकिस्तान की टीम को नहीं मिलने वाला, क्योंकि इसका नतीजा सेमीफाइनल तक उसे नहीं पहुँचा पाएगा।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पाकिस्तान के सेमीफाइनल में जगह न बना पाने से वहाँ की जनता उनसे काफ़ी नाराज़ है। इस बीच पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद युसूफ़ ने एक शर्मनाक बयान दिया है। युसूफ़ ने यह बयान पाकिस्तानी चैनल जियो न्यूज़ को दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि बांग्लादेश की टीम पर बिजली गिर जाए।

मोहम्मद युसूफ़ ने कहा, “पाकिस्तानी टीम वर्ल्ड कप से बाहर हो चुकी है। 316 रनों से जीत हासिल करना एक असंभव काम है, अगर पाकिस्तानी टीम किसी नकली टीम से भी मैच खेलेगी तो भी इतनी बड़ी जीत हासिल नहीं कर पाएगी।”

इसके आगे यूसूफ़ ने कहा, “इसमें कोई शक़ नहीं है कि पाकिस्तान वर्ल्ड कप से बाहर हो चुका है, हाँ अगर बांग्लादेश पर बिजली गिर जाए और वो 10 रन पर ऑल आउट हो जाए तो ही पाकिस्तानी टीम सेमीफाइनल में पहुँच पाएगी।”

ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान का बांग्लादेश से मुक़ाबला शुक्रवार को लॉर्डस में होना है, जहाँ उसका वर्ल्ड कप से बाहर होना तय है। पाकिस्तान का सेमीफाइनल में पहुँचने का एक और रास्ता है, जो लगभग असंभव है। वो यह कि अगर पाकिस्तान की पहले बल्लेबाज़ी आती है और वो 350 रन बनाती है तो उसे बांग्लादेश को 38 रनों पर ऑल आउट करना होगा। वहीं, दूसरी तरफ़ अगर पाकिस्तान टीम 400 रन बनाती है तो उसे बांग्लादेश को 84 रन पर ऑल आउट करना होगा, जो कि नामुमकिन सा है।

आपको बता दें कि मोहम्मद युसूफ़ 2005 में इस्लाम अपनाने से पहले युसूफ़ योहाना (ईसाई) थे। एक कैलेंडर इयर में टेस्ट में सबसे ज्यादा रन (किसी भी देश के किसी भी बल्लेबाज द्वारा) बनाने का रिकॉर्ड युसूफ़ के पास ही है। 2006 में उन्होंने 1788 रन (टेस्ट मैचों में) बनाए थे।

RaGa के इस्तीफे से आहत हसीब अहमद ने माँगी इच्छा मृत्यु, लोगों ने कहा पहली फुरसत में निकल

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गाँधी के इस्तीफे के बाद पार्टी में शुरू हुआ नाटक हर रोज नई शक्ल अख्तियार करता जा रहा है। कोई फाँसी लगाने को तैयार है, तो कोई उन्हें इस्तीफा वापस लेने के लिए खून से पत्र लिख रहा है। वहीं, कुछ लोग आत्मदाह की भी धमकी दे चुके हैं। लेकिन इस बार राहुल गाँधी को अपनी भक्ति साबित करने के लिए सबसे ज्यादा क्रिएटिव तरीका लेकर आए हैं प्रयागराज कॉन्ग्रेस कमेटी के महासचिव हसीब अहमद।

नया नाटक प्रयागराज में सामने आया है। वहाँ कॉन्ग्रेस कमेटी के महासचिव हसीब अहमद ने राहुल गाँधी के इस्तीफे से आहात होकर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिकर इच्छा मृत्यु की अनुमति माँगी है। इस पत्र के सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ सी आ गई है।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को लिखे पत्र में हसीब अहमद लिखते हैं, “कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गाँधी के इस्तीफे से करोड़ों कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता आहत हैं।” उन्होंने आगे लिखा है कि जिस देश में गाँधी विचारधारा का नेतृत्व करने वाले नेता को लोग अनसुना एवं अनदेखा कर दें, उस देश में जीने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। इसके साथ ही उन्होंने देश की न्याय प्रणाली पर विश्वास रखते हुए इच्छा मृत्यु की अनुमति देने की माँग की है।

सोशल मीडिया पर आ रही हैं प्रतिक्रियाएँ

कॉन्ग्रेस नेता के इस पत्र के सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ सी आ गई है। हसीम अहमद के फेसबुक अकाउंट पर भी लोग इस संवेदनशील मुद्दे का मजाक बना रहे हैं। नदीम नाम के एक शख्स ने लिखा- “राष्ट्रपति महोदय…कभी-कभी इतिहास भी रच देना चाहिए” एक अन्य शख्स ने लिखा- “लोकतंत्र है, जिसमें सभी की राय का सम्मान होना ही चाहिए। अतः राष्ट्रपति महोदय बगैर देर किए उनकी इच्छा मृत्यु की माँग मान लें।”

हसीब अहमद अपनी फेसबुक वॉल पर बहुत दिन से राहुल गाँधी से इस्तीफ़ा वापस लेने की अपील कर रहे हैं। उनके पोस्ट पढ़कर भी यही महसूस हो रहा है कि वो वास्तव में राहुल गाँधी के इस्तीफे को दिल पर ले चुके हैं और अब किसी गहरे सदमे में हैं, शायद इसी वजह से उन्होंने इच्छा मृत्यु की भी माँग की है। कुछ लोगों ने हसीब अहमद को यह भी नसीहत दी है कि इस्लाम में मौत माँगना गुनाह है।

जिस तरह से हर दिन इस्तीफे के बाद राहुल गाँधी के समर्थकों की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं, उन्हें इस बारे में फिर से विचार करना चाहिए। वरना समर्थकों में दंगों सी स्थिति फैल सकती है।