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फारुख अब्दुल्ला पर फूटा कश्मीरी पंडितों का गुस्सा, मंदिर में घुसने से रोका और भगाया

अनुच्छेद 370 हटने पर कश्मीर की ‘आज़ादी’ की धमकी देने वाले फारूख अब्दुल्ला जब कश्मीरी पंडितों के बीच पहुँचे तो अपने घरों से दरबदर कश्मीरी पंडितों का गुस्सा उनके खिलाफ फूट पड़ा। ज्येष्ठा देवी मंदिर में उन्हें घेर कर मोदी-समर्थक नारेबाज़ी की गई और “हर-हर महादेव” का भी घोष हुआ। अंत में उन्हें वहाँ से वापिस जाना पड़ा।

पंडित नाराज़, क्यों नहीं किया वापसी के लिए कुछ अगर चिंता थी

हर मौके पर अपना ‘सेक्युलरिज़्म’ दिखाने के लिए कश्मीरी पंडितों के सामूहिक हत्याकांड पर अफ़सोस जताने वाले और उन्हें वापिस लाने की बात करने वाले कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता फारूख अब्दुल्ला ज्येष्ठा देवी मंदिर पहुँचे हुए थे। वहाँ मौजूद पंडितों ने उन्हें घेर लिया और जम कर नारेबाजी होने लगी। वहाँ मौजूद कुछ पंडितों का मानना था कि उनकी कश्मीर और बाकी जगह बदहाली के लिए फारूख अब्दुल्ला सीधे-सीधे जिम्मेदार हैं। उनका कहना था कि अगर उन्हें कश्मीरी पंडितों की इतनी ही चिंता है तो अपने कार्यकाल में उन्होंने कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए महफूज़ माहौल तैयार करने हेतु कदम क्यों नहीं उठाए

उन्होंने लोगों को शांत करने की बहुत कोशिश की, लेकिन लोगों के आगे उनकी एक न चली। उन्होंने मंदिर के अंदर घुसने की भी कोशिश की लेकिन भीड़ ने रास्ता रोक लिया। यहाँ तक कि उनके सहायकों की एक बार उनकी (अब्दुल्ला की) बातें एक बार सुन-भर लेने की गुज़ारिश भी कश्मीरी पंडित सुनने को नहीं तैयार हुए। अंत में हारकर उन्हें वहाँ से हटना पड़ा।

MeToo: तनुश्री दत्ता को बड़ा झटका, मुंबई पुलिस को नहीं मिले सबूत, नाना को राहत

तनुश्री दत्ता द्वारा मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर पर लगाए गए छेड़छाड़ के आरोपों पर मुंबई पुलिस ने अपनी रिपोर्ट दाखिल कर दी है। बता दें कि 2018 में तनुश्री दत्ता ने ‘मी टू’ अभियान के आलोक में नाना पाटेकर पर दुर्व्यवहार के आरोप लगाए थे। अब मुंबई पुलिस ने नाना को क्लीन चिट देते हुए उनके ख़िलाफ़ फाइल बंद कर दी है। पुलिस का कहना है कि पाटेकर के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिले।

हिंदी व मराठी सिनेमा इंडस्ट्री के अनुभवी अभिनेताओं में से एक नाना पाटेकर के बारे में मुंबई पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उनके ख़िलाफ़ इस मामले में किसी भी प्रकार का सबूत न मिलने के कारण जाँच आगे नहीं बढ़ाई जा सकती और पुलिस इस केस को बंद किया जाता है।

ख़बरों के अनुसार, पुलिस उपायुक्त परमजीत सिंह दहिया ने पीटीआई-भाषा को बताया कि उपनगरीय ओशीवारा पुलिस ने बुधवार को अंधेरी में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष एक ‘बी समरी’ रिपोर्ट दाखिल की। बता दें कि यह रिपोर्ट उस वक्त दाखिल की जाती है जब पुलिस आरोपपत्र दाखिल करने के लिए और मुकदमा चलाने का अनुरोध करने के लिए आरोपी के खिलाफ कोई सबूत नहीं पाती है। तनुश्री दत्ता ने जिस घटना को ले कर आरोप लगाए थे, उनके अनुसार वह घटना 2008 में फ़िल्म ‘हॉर्न ओके प्लीज’ की शूटिंग के दौरान हुई थी।

इससे पहले अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने बयान दिया था कि नाना पाटेकर की टीम झूठी खबरें फैला रही है कि उन्हें क्लीन चिट मिल गई है या मिल जाएगीl अभिनेत्री का आरोप है कि नाना पाटेकर और उनके लोग गवाहों के बयान रिकॉर्ड करने से उन्हें रोक रहे हैं, धमका रहे हैं, जिसकी वजह से गवाह अपना बयान दर्ज नहीं करा पा रहे हैंl तनुश्री ने बयान दिया था कि नाना पाटेकर की टीम इस तरह की झूठी खबरें फैला रही हैl नाना पाटेकर और उनके लोग गवाहों के बयान रिकॉर्ड करने से उन्हें रोक रहे हैं, धमका रहे हैं, जिसकी वजह से गवाह अपना बयान दर्ज नहीं करा पा रहे हैंl

अब मुंबई पुलिस द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के बाद तनुश्री ने पुलिस को ही अपने निशाने पर ले लिया। तनुश्री ने कहा कि मुंबई पुलिस और न्यायिक व्यवस्था भ्रष्ट है। अभिनेत्री ने आगे कहा कि नाना पाटेकर उससे भी ज्यादा भ्रष्ट हैं।

ईद पर नग्न डांस को मजबूर लड़कियाँ लेकिन तस्वीर बिहु की! INDIA TODAY की नई पत्रकारिता

बीते दिनों असम से एक शर्मसार करने वाली घटना सामने आई थी। यह घटना थी – ईद के जश्न में नृत्य करने को बुलाई गई लड़कियों को 800 लोगों की भीड़ ने जबरन नग्न अवस्था में नृत्य करने को मजबूर किया। किसी तरह जान बचाकर उस समय लड़कियाँ वहाँ से भाग निकलीं और पुलिस में इस घटना की एफआईआर दर्ज करवाई। मामले में आरोपितों की गिरफ्तारी हुई। इस खबर को लगभग हर मीडिया संस्थान ने कवर किया – कुछ ने सच्चाई को जैसे का तैसा रख कर रिपोर्ट किया, कुछ ने खबर को छिपाते हुए। इंडिया टुडे ने न सिर्फ खबर का एंगल बदला बल्कि फोटो भी ऐसी लगाई, जिससे असम की संस्कृति को चोट पहुँची है।

आमतौर पर मीडिया जगत में खबर से जुड़ी ‘तस्वीर’ को पूरी खबर का ‘संक्षिप्त सार’ कहा जाता है, जो उस घटना की गंभीरता के स्तर को बयान करती है और पाठक को अपनी ओर आकर्षित करती है। ऐसे में अगर घटना से संबंधित कोई तस्वीर खबर लिखने वाले के पास नहीं होती है तो वह ‘प्रतीकात्मक तस्वीर’ का इस्तेमाल करता है। प्रतीकात्मक तस्वीर का चलन डिजीटल मीडिया में सबसे ज्यादा है, क्योंकि कंप्यूटर के पास बैठे पत्रकार के लिए घटनास्थल से तुरंत तस्वीर ला पाना संभव नहीं होता, लेकिन खबर पोर्टल पर तुरंत अपडेट करने का दबाव भी होता है। ऐसी हड़बड़ी में खबर से मिलती-जुलती तस्वीर यानी प्रतीकात्मक तस्वीर लगाकर यह बताने की कोशिश की जाती है कि आखिर मामला क्या है, उसकी गंभीरता क्या है?

इस ट्रेंड को लगभग हर मीडिया संंस्थान फॉलो करता है, ताकि तस्वीर न होने के कारण खबर न छूट जाए। हमारी अंग्रेजी साइट ने भी एक तस्वीर लगाई लेकिन वो तस्वीर उसी डांस ग्रुप की है जिसकी बात हो रही है। इंडिया टुडे भी इससे अछूता नहीं है, और इसमें कोई बुरी बात भी नहीं है। लेकिन खबर की गंभीरता को मारना और सांस्कृतिक तत्वों से छेड़छाड़ करना बुरा भी है और शर्मसार करने वाला भी। असम में घटी इस घटना की कवरेज पर इंडिया टुडे ने ‘प्रतीकात्मक तस्वीर’ में ‘बिहु’ करते कलाकारों की तस्वीर लगाई। ‘बिहु’, जो असम की संस्कृति का एक मुख्य अंग है, जिसके कारण असम की संस्कृति को पूरे देश भर में पहचान मिली हुई है, उस ‘बिहु’ की तस्वीर का प्रयोग इस खबर को दर्शाने के लिए किया गया। इसके पीछे इंडिया टुडे की संपादकीय मानसिकता क्या थी, पता नहीं। लेकिन, यह स्पष्ट है कि ‘सबसे तेज’ की दौड़ में इंडिया टुडे ने पत्रकारिता के उन मानदंडो को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया, जिसमें तस्वीर की महता को उतना ही प्रमुख बताया जाता है, जितना खबर की प्रमाणिकता को।

ट्विटर पर इस खबर की मुख्य तस्वीर को लेकर कुछ यूजर्स ने सवाल खड़े किए, जिसमें उन्होंने पूछा कि ईद के जश्न पर लड़कियों के साथ हुई इस बदसलूकी को सांस्कृतिक समारोह की तरह क्यों पेश किया जा रहा है? यूजर्स ने इस खबर से बिहु के दौरान सांस्कृतिक-सामूहिक डांस करते कलाकारों की तस्वीर को हटाने की बात कही। कुछ ने पीटीआई एजेंसी, गृह मंत्री, प्रधानमंत्री को टैग करके इंडिया टुडे की इस हरकत पर एक्शन लेने की माँग की, तो किसी ने इसे पत्रकारिता का पतन बताया।

अब ऐसे में हो सकता है कि इस घटना के लिए कोई ‘जल्दबाजी’ और ‘गलती’ जैसे शब्द कहकर उलाहना देने लगें, लेकिन यदि गौर किया जाए तो इस घटना के चर्चा में आने के बाद ऑपइंडिया ने इस खबर को 9 जून को ही कवर कर लिया था। उसके बाद जब इस खबर की आड़ में प्रोपेगेंडा फैलाया गया तब भी हमने उस पर लेख लिखे। जबकि इंडिया टुडे के वेब पोर्टल ने इस खबर को 10 जून की रात 9 बजे के करीब अपडेट किया। नॉर्थ ईस्ट से आई इस खबर को प्राथमिकता देना तो छोड़ ही दें, खबर की गंभीरता को भी इंडिया टुडे के डेस्क पर बैठे किसी पत्रकार ने इतनी बुरी तरह मारा कि ट्विटर पर आम जनता को इसके लिए आवाज़ उठानी पड़ गई।

इस खबर को इंडिया टुडे की वेबसाइट पर अपडेट हुए 2 दिन हो चुके हैं। अभी तक इसकी फीचर इमेज वही है, जिसमें बिहु नृत्य का प्रदर्शन कर रहे कलाकार हैं। संपादकीय टीम ने तस्वीर के नीचे कैप्शन के साथ लिखा – प्रतीकात्मक तस्वीर। और यह मान लिया कि उनका काम हो गया। लेकिन नहीं। प्रतीकात्मक तस्वीर लिख देने से भर से संवेदनशील खबरों के साथ आपके संपादकीय दायित्व खत्म नहीं होते। बल्कि ऐसी खबरों में, जहाँ मानवीय या सांस्कृतिक मूल्यों पर चोट की गुंजाइश हो, वहाँ आपका दायित्व हर एक शब्द से जुड़ा होता है। इस खबर में एक पूरे राज्य की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया गया है – वो भी पत्रकारिता के नाम पर! शर्मनाक है यह।

करोड़ों की धोखाधड़ी कर थाईलैंड भाग रहा था मशहूर शराब कारोबारी, चौकन्नी EOW ने किया गिरफ़्तार

विदेश भागने की तैयारी कर रहे बड़े शराब कारोबारी मोंटी चड्ढा को दिल्ली पुलिस इकोनॉमिक ऑफेंसिव विंग (Economic Offences Wing of Delhi Police) ने इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एअरपोर्ट से धर दबोचा है। मोंटी चड्ढा का पूरा नाम मनप्रीत सिंह चड्ढा है और उसके पिता पोंटी चड्ढा भी बड़े शराब कारोबारी रहे हैं। पोंटी चड्डा की मृत्यु हो चुकी है। एजेंसी ने मोंटी चड्डा को ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर गिरफ़्तार किया। एजेंसी को सूचना मिली थी कि वह थाईलैंड स्थित फुकेट भागने वाला है, इसीलिए वह पहले से ही सतर्क थी।

मोंटी चड्ढा पर आरोप है कि उसकी कंस्ट्रक्शन कम्पनियों ने लोगों को फ्लैट देने का वादा कर रुपए ऐंठ लिए लेकिन कई साल बीतने के बाद भी फ्लैट नहीं दिया। अव्वल तो यह कि चड्ढा की कम्पनियों ने ग्राहकों से लिया गया रुपया भी उन्हें लौटाने से इनकार कर दिया। उसने नोएडा, गाज़ियाबाद के इलाक़े में लोगों से रुपए ठगे थे। बड़ी संख्या में निवेशकों ने चड्ढा के ख़िलाफ़ केस दर्ज कराए थे। कुल मिलाकर उसने 100 करोड़ रुपयों से भी अधिक की धोखाधड़ी की है।

मोंटी चड्ढा की कम्पनी ने एक दशक से भी अधिक समय से निवेशकों के रुपए लटका कर रखे हैं और वह इतने ही समय से धोखाधड़ी करता आ रहा है। 2012 में उसके पिता पोंटी चड्ढा और चाचा हरदीप की आपसी गोलीबारी में मौत हो गई थी, जिसके बाद कारोबार की ज़िम्मेदारी पोंटी चड्डा ने संभाली। वह घटना दक्षिणी दिल्ली के छतरपुर स्थित एक फ़ार्म हाउस में हुई थी। संपत्ति के स्वामित्व को लेकर दोनों भाइयों के बीच लम्बे समय से विवाद चला आ रहा था।

ईओडब्ल्यू के एसीपी सुवाशीष चौधरी ने बताया कि मोंटी उप्पल-चड्ढा हाईटेक डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड का डायरेक्टर है। यह कंपनी उत्तर भारत के कई शहरों में फ्लैट बनाकर बेचती है। धोखाधड़ी के मामले में मोंटी के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया था। चड्ढा परिवार ने गाज़ियाबाद में एक ‘वेव सिटी’ प्रोग्राम बनाया था, जिसके तहत इन लोगों ने कुछ ही महीनों में सारी सुविधाओं से युक्त फ्लैट मुहैया कराने का वादा किया था। जहाँ पर वेवसिटी बननी थी, आज वहाँ पशु चरते हैं और किसान खेती करते हैं, ऐसा शिकायतकर्ताओं का मानना है।

‘मुस्लिम लड़कियों को मिलेगी UPSC समेत विभिन्न परीक्षाओं की फ्री कोचिंग, इसी साल से मिलेगी यह सुविधा’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंत्र है- ‘सबका साथ-सबका विकास’। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार इस मूल मंत्र को साकार करने में लगी है। हाल ही में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नक़वी ने कहा था कि अगले पाँच वर्षों में पाँच करोड़ छात्रों को आर्थिक सहायता (प्रधानमंत्री छात्रवृति) प्रदान की जाएगी। इसमें अहम बात यह थी कि आर्थिक सहायता पाने वालों में 50 फ़ीसदी बालिकाएँ होंगी।

बुधवार (12 जून) को वक़्फ़ परिषद की बैठक में मुस्लिम लड़कियों की बेहतरी के लिए केंद्रीय मंत्री नक़वी ने कई महत्वपूर्ण ऐलान किए। इन्हीं ऐलानों में से एक ऐलान मुस्लिम लड़कियों को लेकर किया गया था। ANI के हवाले से मिली सूचना के मुताबिक नक़वी ने कहा, “मुस्लिम लड़कियों को UPSC, राज्य सेवाओं और बैंकिंग सेवाओं के लिए मुफ़्त कोचिंग दी जाएगी। हमने कई संस्थानों से बात की है। पूरा खाका तैयार होने के बाद इस योजना को इसी वर्ष लागू कर दिया जाएगा।”

केंद्रीय मंत्री ने देश भर में मौजूद वक़्फ़ सम्पतियाँ मुस्लिम समाज की बेहतरी के काम आ सकें इसके लिए 100 फ़ीसदी जियो टैगिंग और डिजिटलाइजेशन की बात भी की। वक़्फ़ परिषद की इस बैठक में केंद्रीय मंत्री नक़वी ने इस बात का भी ज़िक्र किया कि प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम के तहत वक़्फ़ की प्रॉपर्टी पर कॉलेज, अस्पताल आदि बनवाने के लिए 100 फ़ीसदी फंडिंग की जाएगी। ख़बर के अनुसार, देश में क़रीब 5.77 लाख वक़्फ़ सम्पत्तियाँ रजिस्टर्ड हैं। इन्हें डिजिटल किया जा रहा है ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

हाल ही में, मुख्तार अब्बास नक़वी ने एक और बड़ा ऐलान किया था कि देश भर के मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए मदरसा शिक्षकों को विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से प्रशिक्षण दिलाया जाएगा ताकि वे मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा- हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, कंप्यूटर आदि- दे सकें. यह काम अगले महीने से शुरू कर दिया जाएगा।


दलित रेपिस्ट के कारण पीड़‍िता हुई अशुद्ध, शुद्धिकरण के लिए पंचायत का तुगलकी फरमान – भंडारा कराओ

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे राजगढ़ जिले में एक बेहद ही असंवेदनशील मामला सामने आया है। यहाँ पर एक रेप पीड़िता के परिवार को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया है। दरअसल, जिले के नरसिंहगढ़ ब्लॉक के डूंगरपुरा गाँव में कुछ महीने पहले एक किशोरी के साथ रेप हुआ था। इस किशोरी के साथ दलित जाति के युवक ने रेप किया था। अब इस मामले पर गाँव के सामाजिक पंचायत ने एक अजीबोगरीब फैसला सुनाया है। पंचों ने पीड़िता के शुद्धिकरण के लिए उसके परिवार को भंडारा कराने का आदेश दिया है। पंचायत का कहना है कि रेप करने वाला आरोपी दलित जाति का था, इसलिए पीड़िता का परिवार अछूत हो गया है।

इस अजीबोगरीब फैसले से पीड़िता का परिवार परेशान है। परिवार को न तो सामाजिक कार्यक्रमों में बुलाया जा रहा है और न ही कोई उनके घर में किसी कार्यक्रम में शामिल हो रहा है। ऐसे में पीड़िता के माता-पिता ने राजगढ़ पहुँचकर अधिकारियों से इंसाफ की गुहार लगाई। गाँव वालों के इस अजीब फैसले की शिकायत मानवाधिकार आयोग में भी की गई है।

पंचायत द्वारा जारी किए गए फरमान में कहा गया है कि इस भंडारे में गाँव के ही नहीं, बल्कि आस-पास के ग्रामीण भी शामिल हों। इसके लिए लिखित में पंचनामा तैयार किया गया। जिस पर पंचों के साथ-साथ पीड़िता के माता-पिता से भी हस्ताक्षर करवाए गए। हालाँकि, पीड़िता के पिता ने भंडारा करवाने की कोशिश की, मगर गरीबी के कारण वे भंडारा नहीं करा पाए। जिसके बाद गाँव के साथ ही आस-पास के लोगों ने भी उनका बहिष्कार कर दिया है। हाल ही में पीड़ित परिवार के घर एक आयोजन हुआ था, जिसका कार्ड गाँव के किसी भी व्यक्ति ने स्वीकार नहीं किया।

वहीं इस बारे में जिले की पुलिस का कहना है कि ये मामला उनके संज्ञान में आया है, लेकिन पीड़ित परिवार की तरफ से अभी तक कोई लिखित शिकायत नहीं आई है। शिकायत आने के बाद कार्रवाई की जाएगी। जानकारी के मुताबिक, इसी साल मार्च में 17 साल की नाबालिग के साथ गाँव के ही दलित युवक सियाराम ने रेप किया था। जिसकी रिपोर्ट पीड़ित परिवार ने पुलिस में की। एफआईआर के लगभग आठ दिन बाद आरोपित को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया।

डॉक्टरों ने एक साथ दिया इस्तीफा, ममता बनर्जी की ‘4 घंटे में काम पर लौटो’ धमकी को दिखाया ठेंगा

पश्चिम बंगाल में अपने डॉक्टर साथी परिबाह मुखोपाध्याय पर किए गए घातक हमले को लेकर न्याय की उम्मीद पाले डॉक्टरों ने हड़ताल की। दो दिन की हड़ताल के बाद न्याय तो दूर, बदले में उन्हें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिली धमकी – 4 घंटे में काम पर लौटो। ऐसे में 7 डॉक्टरों ने एक साथ इस्तीफा दे कर राज्य सरकार को यह संदेश दे दिया है कि उन्हें हल्के में ना लिया जाए। जाहिर सी बात है, वो न्याय की बात कर रहे हैं, जो कि उनका या किसी का भी लोकतांत्रिक हक है। लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने इनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है।

इससे पहले पश्चिम बंगाल में अपने सहयोगी डॉक्टर पर हमला होने के विरोध में डॉक्टर्स की चल रही हड़ताल पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने डॉक्टरों को चार घंटे का अल्टीमेटम जारी किया था। मुख्यमंत्री ने कोलकाता के राजकीय SSKM अस्पताल का दौरा करने के बाद आंदोलनरत जूनियर डॉक्टरों को 4 घंटे के भीतर काम पर लौटने के लिए कहा था। लेकिन, डॉक्टरों ने उनके समक्ष ही ‘हम न्याय चाहते हैं’ के नारे लगा दिए थे।

कोलकाता के नील रतन सरकार (NRS) मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में जूनियर डॉक्टर्स की हड़ताल की वजह से मरीज़ों को दूसरे दिन (बुधवार, जून 12, 2019) भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इससे लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए काफ़ी परेशानियाँ आ रही हैं।

इस समस्या के निदान के लिए कॉन्ग्रेस के सांसद अधीर रंजन चौधरी ने इस संबंध में पीएम मोदी को पत्र लिखा है। अपने पत्र के माध्यम से उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को कोलकाता में मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों के डॉक्टर्स की हड़ताल मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है।

आपको बता दें कि कोलकाता स्थित नील रतन सरकार मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में सोमवार (10 जून) को एक बुजुर्ग मरीज मोहम्मद शाहिद की मौत के बाद उसके परिजनों ने डॉक्टर परिबाह मुखोपाध्याय पर घातक हमला किया। डॉक्टरों की मानें तो करीब 200 की भीड़ ने मोहम्मद शाहिद की मौत के बाद अस्पताल में जमकर उत्पात मचाया। इस घटना के बाद राज्य के विभिन्न अस्पतालों के डॉक्टर न्याय की माँग करते हुए हड़ताल पर चले गए।

सईद की मौत पर 200 दंगाईयों को बुलाकर डॉक्टरों पर हमला करने वालों को ममता क्यों बचा रही है?

बंगाल में हड़ताल पर बैठे जूनियर डॉक्टरों की दो सीधी-सी माँगें हैं- उन्हें सुरक्षा दी जाए, और उनके साथी को मौत के मुहाने तक पहुँचा देने वालों को जेल भेजा जाए। किसी भी सामान्य नागरिक का किसी भी सभ्य देश और समाज में यह अधिकार होता है कि वह अपने पेशे का बिना किसी भय या प्रताड़ना के अभ्यास कर सके। डॉ. परिबोहो मुखोपाध्याय को भी यह अधिकार था- जिसका उल्लंघन उनका सर फोड़ कर किया गया। यही हक़ डॉ. यश तेकवानी का भी था, जो उनकी रीढ़ में गंभीर चोट पहुँचाकर छीन लिया गया। ममता बनर्जी जिन डॉक्टरों को भाजपा की साजिश का हिस्सा बता रहीं हैं, वह केवल सुरक्षा और न्याय माँग रहे हैं।

हर मरीज की मौत के लिए क्या बलि चढ़ेगा एक डॉक्टर?

मोहम्मद सईद की मौत यकीनन उनके परिवार वालों के लिए दुःखद रही होगी- रिश्तों की पहचान में से एक होता है किसी की मौत पर दुःख होना। लेकिन अपने घर पर किसी के मर जाने के बदले क्या किसी की भी बलि ले लोगे? कोई डॉक्टर किसी मरीज को जान-बूझकर मरने नहीं देता है- उसी का ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ ख़राब हो जाता है कि फलाना डॉक्टर नहीं यमदूत है; उसके पास मत जाना। और इस मामले में तो मरीज को तीमारदारों के सामने ही (टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार) दिल का दौरा पड़ा, सामने ही डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, और सामने ही सामने वह कोशिश असफल रही, और शाहिद चल बसे।

अपने प्रियजन को अपनी आँखों के सामने दम तोड़ते देखना किसी के भी लिए तकलीफ़देह होगा, लेकिन दो ट्रक भरकर, 200 लोगों को लाकर 20 डॉक्टरों को पीटने का क्या मतलब था? क्या गलती थी परिबोहो मुखोपाध्याय और यश तेकवानी की जिसके लिए उनपर ईंटों से हमला किया गया? क्या उनकी जान सस्ती थी?

ममता बनर्जी, अल्पसंख्यकों के वोट के लिए आप किस हद तक गिरेंगी?

सारे तीमारदारों का मानसिक संतुलन, अगर मान भी लिया जाए, एक साथ बिगड़ गया, वे शरीफ शहरी से खून के प्यासे पागल बन गए, तो आखिर पुलिस क्या कर रही थी? पथराव शुरू हुआ, डॉक्टरों पर जानलेवा हमले हुए तो पुलिस ने क्यों नहीं रोका? क्यों डॉक्टरों की जान बचाने के लिए दंगाईयों पर नियंत्रण के लिए कड़ी कार्रवाई नहीं की गई? जवाब हम सब को पता है।

क्योंकि हमलावर मजहब विशेष से थे- अगर उन्हें कुछ हो जाता तो ममता के वोट बैंक को खतरा था। और सीएम के वोट बैंक को खतरा मतलब गोली चलाने वाले, दंगाईयों का हाथ पकड़ने वाले का कैरियर खत्म। ममता बनर्जी अल्पसंख्यकों को वोटों के लालच में लुभाने के लिए कुछ भी करने की कमर कस चुकीं हैं- रोहिंग्याओं को हिंदुस्तानी बनाया जा रहा है ताकि उनके वोट से ममता बनर्जी को बहुमत मिलता रहे, ‘जय श्री राम’ को ‘बाहरी नारा’ बताया गया और ‘रामधोनु’ को ‘रॉन्गधोनु’ इसीलिए किया गया, और इसीलिए ममता बनर्जी आरोपियों पर कार्रवाई करने में हिचकिचा रहीं हैं।

देश की बिगड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था में कोढ़ में खाज होगी डॉक्टरों की नाराजगी

डॉक्टरों की कमी से वैसे ही देश जूझ रहा है। सरकार कोई भी हो, यह समझ नहीं पा रही कि शिक्षा की गुणवत्ता घटाए बिना डॉक्टर कैसे बढ़ाए जाएँ। अस्पतालों के ओपीडी के बाहर लाइन में खड़े-खड़े लोग मर जाते हैं, क्योंकि अस्पतालों में न तो मरीजों के लिए बिस्तर होते हैं न डबल शिफ्ट कर-कर के थके हुए डॉक्टरों में इलाज करने की ताकत। 2017 की डेंगू महामारी की तरह जब अचानक से कोई बीमारी फैलने लगती है तो मुसीबत और बढ़ जाती है। ऐसे में डॉक्टरों को नाराज करना किस दृष्टिकोण से समझदारी है?

कानून व्यवस्था बनाए रखना ज़िम्मेदारी है

ममता बनर्जी इमोशनल ब्लैकमेलिंग और धमकी का डबल डोज़ इस्तेमाल कर रहीं हैं- एक तरफ डॉक्टरों को बीमार मरीजों की जान का हवाला दे रहीं हैं, और दूसरी ओर धमकी कि जो काम पर नहीं लौटा उसकी (जान-माल की?) जिम्मेदारी सरकार की नहीं है, और हॉस्टल भी खाली करा लिए जाएँगे। इस नरम-गरम नौटंकी से अच्छा 20 डॉक्टरों को पीटने 2 ट्रक भरकर आए लोगों को पकड़कर जेल में क्यों नहीं डाल देतीं? 53 डॉक्टरों ने संयुक्त इस्तीफ़ा मुँह पर मार दिया तो अपना-सा मुँह लेकर लौटा दिया। कुल मिलाकर विशुद्ध अव्यवस्था का माहौल है- क्लासिकल एनार्की, जो हर कम्युनिस्ट के दिल का ख्वाब होती है। (विडंबना यह है कि ‘दीदी’ इन्हीं कम्युनिस्टों से लड़कर सत्ता में आईं थीं)

हर राज्य में हर हाथापाई को मॉब-लिंचिंग बता कर मोदी के इस्तीफे की माँग करने वालीं ममता बनर्जी अगर कानून व्यवस्था नहीं संभाल सकतीं तो इस्तीफा दे देना चाहिए।

शायद अब समय आसन्न है कि गृह मंत्रालय राजधर्म का पालन करे, और ममता बनर्जी को चेतावनी दे कि इतने घंटों में उन गुंडों को जेल में बंद कर दिया जाए वरना उसकी सरकार बर्खास्त कर दी जाएगी। अगर भाजपा राजनीतिक नफे-नुकसान, ‘संघीय ढाँचे’ या ममता बनर्जी को विक्टिम कार्ड न खेलने देने के चक्कर में बेगुनाहों के उत्पीड़न की मूकदर्शक बनी रहेगी तो वह भी इस राजनीतिक पाप की दोषी होगी।

MF हुसैन को अवॉर्ड देने वाली CPM सरकार करेगी बिशप मुलक्कल के कार्टून की समीक्षा, चर्च का दबाव

केरल की सीपीएम सरकार ने कार्टूनिस्ट सुभाष केके द्वारा बनाए गए उस कार्टून की फिर से समीक्षा करने का निर्णय लिया है, जिसे सरकार ने हाल ही में ‘केरल ललितकला अकादमी अवॉर्ड’ से नवाजा है। कारण है- चर्चों द्वारा किया गया विरोध। केरल सरकार चर्चों व पादरियों द्वारा किए जा रहे विरोध के सामने झुकती हुई नज़र आ रही है। यह कार्टून यौन शोषण के आरोपित पादरी फ्रैंको मुलक्कल का है। केरल चर्च बिशप काउंसिल (KCBC) ने कहा है कि इस कार्टून में बिशप मुलक्कल को बुरे तरीके से दिखाया गया है और इसीलिए यह धार्मिक संवेदनाओं को चोट पहुँचाने वाला है।

दरअसल, इस कार्टून में बिशप फ्रैंको को एक मुर्गे के रूप में चित्रित किया गया है, जिसे विधायक पीसी जॉर्ज का सहारा मिल रहा है। इस कार्टून में पीड़ित ननों को भी दिखाया गया है, वह डर कर कहीं भाग रही हैं और व्यथित हैं। इस कार्टून में पुलिस की टोपी को दिखाया गया है, जिस पर बिशप मुलक्कल मुर्गे के रूप मे खड़ा है। इसमें यह दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह कुछ राजनेताओं व पुलिस अधिकारियों की मदद से पीड़ित ननों को न्याय नहीं मिल पा रहा है और मुलक्कल कानून की गिरफ़्त में नहीं आ रहा है। अभी हाल ही में केरल सरकार ने मुलक्कल के ख़िलाफ़ बलात्कार की जाँच कर रहे दो अधिकारियों का ट्रान्सफर कर दिया था।

इन सबके अलावा उक्त कार्टून में बिशप मुलक्कल की लाठी के ऊपर महिलाओं के अंगवस्त्र टंगे हुए हैं और उसके ऊपर लिखा है- “विश्वासम रक्षतिः (आपका विश्वास ही आपको बचाएगा)”। इसके अलावा उस कार्टून में सीपीएम नेता पाइक शाही का भी चित्र है, जिन पर यौन शोषण के आरोप लगे हुए हैं। बिशप मुलक्कल और पीके शाही अपने सिरों पर एक ही प्रकार की टोपी पहने हुए हैं, जिसका अर्थ यह हुआ कि दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं, भले ही दोनों अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हों।

केरल बिशप काउंसिल ने कहा है कि सीपीएम को ऐसा लगता है कि ईसाईयों ने हालिया लोकसभा चुनाव में उसे वोट नहीं दिया, इसीलिए शायद केरल सरकार ने इस कार्टून को अवॉर्ड देने का निर्णय लिया। काउंसिल का कहना है कि ईसाईयों के पवित्र प्रतीक के ऊपर महिला के अंगवस्त्र को दिखाना ग़लत है। काउंसिल ने कहा कि ऐसे कार्टून को सरकार द्वारा पुरस्कृत करना अजीब विषय है। अब चर्चों के विरोध के बाद केरल सरकार ने इस अवॉर्ड की समीक्षा करने का निर्णय लिया है। केरल के संस्कृति मंत्री एके बालन ने कहा, “हालाँकि, सरकार इस कार्टून की थीम की प्रशंसा करती है लेकिन हम धार्मिक प्रतीक के अपमान को गंभीरतापूर्वक ले रहे हैं। इसीलिए हमने ललित कला आकादमी को इस वर्ष दिए गए अवार्डों की समीक्षा करने को कहा है।

बता दें कि केरल में तब सीपीएम की ही सरकार थी, जब हिन्दू देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाने वाले चित्रकार एमएफ हुसैन को ‘राजा रवि वर्मा अवॉर्ड’ देने का निर्णय लिया गया था। इसे लेकर केरल की वामपंथी सरकार की काफ़ी आलोचना भी की गई थी। सोशल मीडिया पर लोगों ने भी पूछा कि एमएफ हुसैन को अवॉर्ड देने वाली सरकार चर्चों के विरोध के सामने क्यों झुक गई?

मुस्लिम महिला को CM योगी ने दिलाया न्याय, 3 तलाक देने वाला मदरसा का डायरेक्टर अरेस्ट

तीन तलाक मामले में यूपी पुलिस ने जीकरू रहमान को गिरफ्तार किया। ये गिरफ्तारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर हुई। आरोपित मालपुरा इलाके का रहने वाला है। जानकारी के अनुसार जीकरू (Zikru Rehman) की पत्नी तरन्नूम बेगम ने मुख्यमंत्री से इस मामले पर शिकायत की थी कि उसके पति ने उसे तीन तलाक दे दिया है।

शिकायत के मुताबिक, तरन्नुम ने बताया था कि उनका निकाह जीकरू से 5 साल पहले हुआ था। उसके तीन बच्चे हैं। शादी के बाद से ही रहमान उनके साथ बदसलूकी करता था। पिछले हफ्ते मदरसे में पढ़ने वाले एक लड़की से निकाह करने के बाद जीकरू ने तरन्नूम को तलाक दे दिया था। ये लड़की उसी मदरसे में पढ़ती थी, जिसमें जीकरू न सिर्फ पढ़ाता था बल्कि वहाँ का डायरेक्टर भी वही था।

तरन्नूम का आरोप है कि तलाक देने के बाद उसे घर से बाहर निकाल दिया गया। जिसके बाद उसने मदद के लिए योगी आदित्यनाथ का दरवाजा खटखटाया। शिकायत लेकर वह योगी आदित्यनाथ से मिली। तथ्यों की जाँच के बाद स्थानीय पुलिस को मामले पर तुरंत एक्शन लेने की बात कही गई। मुस्लिम मैरिज प्रोटेक्शन एक्ट के अंतर्गत जीकरू को तुरंत गिरफ्तार किया गया। बता दें कि कानून के प्रभाव में आने के बाद ये पहला मामला है जिसमें गिरफ्तारी हुई है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दिलाए इंसाफ़ को लेकर तरन्नूम बहुत खुश है। तरन्नुम ने इंडिया टुडे से हुई बातचीत में अपनी खुशी जाहिर की। महिला ने कहा कि उसे हमेशा से योगी आदित्यनाथ पर भरोसा था कि वो इस मामले में जरूर कार्रवाई करेंगे। महिला ने बताया कि इस तुरंत कार्रवाई के लिए वो हमेशा योगी आदित्यनाथ की आभारी रहेंगी।

तीन तलाक मामले में पुलिस की इस कार्रवाई पर सोशल एक्टिविस्ट आमिर कुरैशी ने कहा कि यह देखना बेहद खुश करने वाला है कि अब आखिरकार सरकार देश में रह रही करोड़ों मुस्लिम महिलाओं का भरोसा जीतने के लिए उचित कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि ये नया कानून मुस्लिम पुरूषों को सबक सिखाएगा कि महिलाएँ उनकी संपत्ति नहीं हैं। उन्हें भी इज्जत और सम्मान से रहने का अधिकार है।