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नाम- आदिल, घर-J&K, पढ़ाई- ऑस्ट्रेलिया से MBA… लेकिन बना ISIS लड़ाका, बाप लगा रहे गुहार

कश्मीर के आदिल अहमद ने ऑस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैंड से एमबीए किया, और उसके बाद चला गया आइएस, ‘प्लेसमेंट’ में। 2013 में सीरिया जाकर आतंकी बनने वाले आदिल ने घर पर बताया था कि वह सीरिया एक एनजीओ के साथ काम करने जा रहा है। और अब जबकि आइएस को अमेरिकी-गठबंधन के देशों ने हरा दिया है, और आदिल उनकी जेल में है, तो उसके पिता उसे बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं। हाल ही में इसी सिलसिले में उनकी एक याचिका राज्य पुलिस ने केंद्र सरकार को अग्रेषित की है।

वालिद चलाते हैं डिपार्टमेंटल स्टोर, निकाह कर डच बेगम को भी बना दिया जिहादिन

आदिल के वालिद फ़याज़ अहमद डिपार्टमेंटल स्टोर चलाने के साथ-साथ कॉन्ट्रैक्टर का काम करते हैं घर चलाने के लिए। उनके अनुसार उनके लिए अभी भी यह यकीन करना मुश्किल है कि उनकी औलाद ऐसे खूँखार संगठन में जा सकती है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस से बात करते हुए वह बताते हैं कि उन्हें नई केंद्र सरकार से उम्मीद है कि उनके बेटे की घर-वापसी को गति मिलेगी।

पढ़ाई पूरी करने के पहले ही आतंकी समूहों के संपर्क में आने के बाद आदिल एमबीए खत्म कर जॉर्डन से होता हुआ 21 जून, 2013 को तुर्की जा पहुँचा। वहाँ एनजीओ में काम करने के बहाने पहुँचने के बाद उसने एक डच (हॉलैंड निवासी) महिला से निकाह भी कर लिया, और उसे भी जिहाद में शामिल कर लिया। 2014 में उसकी बेगम ने एक बेटे को उसी खूनी माहौल में जन्म दिया, जो ज्यादा दिन जिन्दा न रहा।

आदिल और उसके कुछ सौ साथियों ने जब आइएस छोड़ हथियार डाले तो उन्हें जेल भेज दिया गया। वहाँ से उसकी डच बेगम ने इंटरनेशनल रेड क्रॉस सोसाइटी की मदद से अपने ससुराल वालों से हिंदुस्तान में संपर्क किया, और मदद की गुहार की। आदिल कश्मीर से आइएस में जाने वाला पहला दहशतगर्द है। फ़याज़ अहमद बताते हैं कि जब उन्होंने अधिकारियों से मदद की गुहार की तो उन्हें पता चला कि नई केंद्र सरकार बनने के बाद ही मामले पर विचार होगा।

सुरक्षा एजेंसियों की दिलचस्पी

फाइनेंशियल एक्सप्रेस बताता है कि आदिल की वापसी में सुरक्षा एजेंसियाँ भी दिलचस्पी दिखा रही हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी के हवाले से अख़बार दावा करता है कि अगर आदिल को वापिस ले आया जाए तो आइएस के काम करने के तरीके, उनके भविष्य के इरादे सहित बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिल सकती हैं।

हिन्दी भाषा का बवाल और पत्रकारिता का वह दौर जब कुछ भी छप रहा है, कोई भी लिख रहा है

पत्रकारिता के बारे में बात करते हुए, अधिकांश पत्रकारों या लेखकों की तरह अपनी बात को वज़नी बनाने के लिए मैं पहले ही पैराग्राफ़ में यह बता सकता हूँ कि जर्नलिज़्म शब्द की उत्पत्ति क्या है, किस तरह की थ्योरी हैं, और चार विदेशी नाम गिना कर (जिनका अमूमन कोई औचित्य नहीं) पहले ही आप पर बोझ बना दूँगा कि ये तो जानकार आदमी है, विदेशी लोगों के नाम जानता है, थ्योरी की बात करता है। लेकिन उसकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि तर्क हों तो आप लेख की शुरुआत यूजेज एंड ग्रैटिफिकेशन थ्योरी से करें या फिर ‘लगा दिही न चोलिया के हूक राजा जी’ से, मुद्दे पर फ़र्क़ नहीं पड़ता।

पत्रकारिता के चार दौर मैं समझ सकता हूँ भारत में। स्वतंत्रता संग्राम के समय कहा जाता था कि हर क्रांतिकारी एक पत्रकार है, और हर पत्रकार क्रांतिकारी। उसके बाद आज़ाद भारत में अखबारों में एडिटर, यानी सम्पादक, हुआ करते थे जो कि मालिकाना हक़ न रखने के बावजूद पूरे अख़बार पर अपनी छाप छोड़ते थे। अक्सर साहित्य से जुड़े लोगों को, या अच्छे पत्रकार को यह ओहदा दिया जाता था। उसके बाद सीईओ वाला युग आया जिसमें अख़बार पर पहले विज्ञापन की जगह तय होती थी, फिर तथाकथित एडिटर को उसमें खबरें फ़िट करनी होती थी।

उसके बाद का जो युग है, वो आज कल का युग है जहाँ पत्रकारिता प्रतिक्रियावादी होने से लेकर निजी घृणा के रूप में अख़बारों और चैनलों के माध्यम से सोशल मीडिया और जनसामान्य तक पहुँच रही है। इस दौर में एक व्यक्ति का निजी अनुभव इस तरह से रखा जाता है मानो वो पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व करता हो। इस दौर में ऐसे क्रांतिकारी लेख लिखे जाते हैं जिनका आधार इंटरनेट पर चल रहे किसी चैटरूम का वो कमेंट होता है जिसको लिखने वाली कोई एंजेल प्रिया हो सकती है या फिर इंग्लैंड में बैठा डिक जो खुद को तमिल ब्राह्मण बताते हुए कहता है कि वो यह मानता है कि उसकी तीक्ष्ण बुद्धि का कारण उसका तमिल ब्राह्मण होना है।

ये वही दौर है जहाँ बीबीसी जैसी रेसिस्ट और कोलोनियल विचारों वाली संस्था किसी टुटपुँजिए से लेख को होमपेज पर लीड में चलाती है जिसका मानक बस यही है कि वो किसी खास समुदाय के प्रतीक चिह्नों पर हमला बोले। ये वो दौर भी है जब एक ईको सिस्टम फर्जी खबरें न सिर्फ बनाता है बल्कि मृणाल पांडे जैसे लोगों से शेयर करवाते हुए उसे चर्चा में लाता भी है। ये वो दौर है जब ‘द हिन्दू’ जैसी संस्थाओं में उस फ़ाउंडेशन पर, कुल चार बच्चों के बयान के आधार पर, हिट जॉब किया जाता है जो हर दिन 17 लाख से ज्यादा बच्चों को भोजन देती है। और हाँ, ये वही दौर है जब तथाकथित दलितों को सड़कों पर उतार कर आगजनी और हिंसा कराई जाती है जिसकी जड़ में एक अफ़वाह होता है कि सरकार आरक्षण हटा रही है।

हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान का पुराना राग जो अब दूसरा पक्ष गा रहा है

आज कल पत्रकारिता में एक और विचित्र रोग पाया जाने लगा है। जब भाजपा अपनी रैलियों में राम मंदिर की बात नहीं करती दिखती तो वो पत्रकार ही इस पर सवाल उठाते हैं जो राम मंदिर को ध्रुवीकरण का मुद्दा बताते थे। यानी, उन्हें भी यह समझ में आता है कि जब भाजपा विकास के मुद्दे पर लड़ रही है तो उसके मुद्दों को पटरी से उतारने के लिए साम्प्रदायिक टोन के साथ राम मंदिर आदि की बात को लाना कितना आवश्यक है।

कुछ ऐसा ही फिर से हो रहा है। पाँच साल की घटिया, नकारात्मक और कुत्सित कैम्पेनिंग के बाद भी मोदी और भाजपा की देशव्यापी स्वीकृति जब दिख रही है तो आग को भड़काना ज़रूरी हो गया है। दो दिन पहले भारत की, हास्यास्पद रूप से सिर्फ तीसरी, नई शिक्षा नीति का ड्राफ़्ट नए शिक्षा मंत्री के टेबल पर पहुँचा और अगली सुबह तमिलनाडु में आंदोलन का माहौल बना दिया गया कि हिन्दी को थोपने की बात की जा रही है।

484 पन्ने का ड्राफ़्ट डॉक्यूमेंट है, जिसे शायद ही किसी ने पढ़ने की कोशिश की। इसकी जड़ में एक पुराना ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ वाली फर्जी बात है जो अपनी मौत मर चुकी है। लेकिन कुछ लोग उसे माउथ-टू-माउथ दे कर वापस ज़िंदा कर रहे हैं। इसका किसी भी दक्षिणपंथ से कोई वास्ता नहीं, बल्कि मुद्दों के गौण होने पर नई अस्थिरता लाने की यह एक कोशिश है। ये कोशिश भारत की विविधता और एकता दोनों के ही दुश्मनों की साज़िश भर है।

ख़बर का तुरंत ही खंडन हो गया कि ऐसी कोई बात नहीं है कि हिन्दी को थोपा जाएगा। लेकिन पत्रकारिता का गैंग सक्रिय हो चुका है। नए दौर में पत्रकार या सम्पादक गैंग का हिस्सा होते हैं। उनका अजेंडा होता है। वो सरकारों के मंत्री तय किया करते थे, दंगे करवाया करते थे, लोगों की छवि बर्बाद करने के लिए सत्रह सालों तक लेख लिखा करते थे। ये लोग इतनी जल्दी अपनी हरकतों से बाज कैसे आएँगे!

मृणाल पांडे एक लेखिका भी हैं, और पत्रकारिता में एक जाना-माना नाम भी। आज उन्होंने दो कांड किए। खलिहर लोग ट्विटर पर कांड करते हैं, मृणाल पांडे ने भी वही किया। पहले तो एक पुराना आर्टिकल शेयर किया जो ‘मिंट’ अख़बार में किसी रौशन किशोर ने लिखा था कि कैसे हिन्दी की सांस्कृतिक हिंसा ने बिहार की भाषाओं को लील लिया, और दूसरी बार उन्होंने अपने आप को हिन्दी पत्रकार कहते हुए तमिलनाडु के किसी व्यक्ति का ‘स्टॉप हिन्दी इम्पोजिशन’ वाला ट्वीट शेयर किया। दोनों का लेना-देना हिन्दी से ही है।

रौशन किशोर का लेख पूरी तरह से बकवास है क्योंकि बिहार की मूल भाषाओं- भोजपुरी, मैथिली, मगही (और उनकी कई बोलियों)- के बोलने वालों की कमी का जो दोष पत्रकार ने हिन्दी पर डाला है, वो दोष मूलतः अंग्रेज़ी और घर में अपनी ही मातृभाषा में बात करने वाले बच्चों को हेय दृष्टि से देखने वाले परिवारों का है। ये लेख इतना वाहियात है कि अपने पूर्वग्रहों या अजेंडा को थोपने के लिए लेखक ने नाहक ही हिन्दी को बिहारी भाषाओं की हत्यारिन बता दिया है।

रौशन किशोर का लेख सिर्फ काल्पनिकता पर आधारित है जहाँ हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात से लेकर अगली पीढ़ी द्वारा छठ के गीतों के समझ में न आने का दोष हिन्दी पर डाला गया है। न तो राष्ट्रभाषा का कोई डिबेट हालिया दिनों में कहीं दिखा, न ही गाँव छोड़ कर शहरों में पलायन करते बिहारी लोग अपने बच्चों को अंग्रेज़ी के अलावा किसी और भाषा में बोलते देखना पसंद करते हैं। हिन्दी स्वयं ही आठवीं तक पढ़ाई जाने लगी है और उत्तर भारत के जिस हिस्से में हिन्दी को बड़ी मछली जैसा बताया जा रहा है, वहीं के बच्चे अंग्रेज़ी माध्यम में पूरी शिक्षा पाते हैं।

पलायन कर बाहर गए लोगों के बच्चों को घर के बाहर अपनी मातृभाषा बोलने का न तो अवसर मिलता है, न ही हम बिहारियों में घुसी हीन भावना उसे अपने राज्य, अपनी बोली को स्वीकारने में सहजता दे पाती है। इस कारण, अगर बिहारी भाषाएँ गायब हो रही हैं तो उसका कारण अंग्रेज़ी है, हिन्दी नहीं। अपने एडिटर द्वारा ‘यार हिन्दी पर कुछ तड़कता-भड़कता लिख दे कि मजा आ जाए’ कहने पर ‘जी सर’ कहते हुए, ऐसे वाहियात लेख लिखता हुआ बिहारी यह भूल जाता है कि बिहार के हर जिले में पिछले तीस सालों में ‘इंग्लिश मीडियम’ वाले स्कूलों की संख्या दिल्ली की गलियों में मिलने वाले मोमोज़ के दुकानों से ज़्यादा होगी।

वो यह भूल जाता है कि जिन बिहारी भाषाओं की वह बात कर रहा है, उसकी व्यवस्थित शिक्षा कभी अपनी लिपि में स्कूलों में आई ही नहीं। वो यह भूल जाता है कि पहले मायग्रेशन इतना था ही नहीं कि लोग राज्य छोड़कर दिल्ली में ही बसने लगे हों। इसलिए, अपने जिले से निकल कर ज्यादा से ज्यादा पटना पहुँचने वाला बच्चा लगातार अपनी बोली या भाषा से जुड़ा रहता था। हिन्दी का प्रयोग वो तब करता था जब उसके सामने कोई ऐसा व्यक्ति आता हो जो उसकी भाषा न समझता हो। जब आप अपने एरिया से ही बाहर चले गए, जहाँ मुहल्ले में कोई आपकी बोली बोलता नहीं, आपकी भाषा से आपको पहचान कर लालू के कारण अलग-थलग किया जाता हो, तो आप स्वयं ही अपनी पहचान छुपाने लगते हैं।

खैर, मृणाल पांडे का दूसरा ट्वीट भी उतना ही अनावश्यक और फर्जी था, जितना पहला। ये उसी मशीनरी का हिस्सा है जो मोदी की जीत को पचाने में अक्षम है। यही कारण है कि तमिलनाडु का व्यक्ति अंग्रेज़ी में लिख कर बता रहा है कि उसे हिन्दी नहीं चाहिए, और अपने आप को हिन्दी पत्रकार कहने वाली मृणाल पांडे, बिना नई शिक्षा नीति के ड्राफ़्ट को पढ़े इस फर्जीवाड़े को प्रमोट करते हुए हीरोइन बनना चाह रही हैं क्योंकि भाजपा या मोदी के खिलाफ मुद्दे मैनुफ़ैक्चर करने के बाद, उस पर ज्ञान की बातें कहना ही तो पत्रकारिता के समुदाय विशेष में आपको लेजिटिमेसी दिलवाता है!

इसमें लिखा गया है कि प्रिय ‘हिन्दीभाषियो, तमिलनाडु में गोलगप्पे बेचने के लिए तमिल सीखो’। इस ट्वीट में हिन्दीभाषियों को नीचा दिखाया गया है कि उनका काम गोलगप्पे बेचना ही है। इस घृणा भरे ट्वीट को मृणाल पांडे जैसी लेखिका और पत्रकार सिर्फ इसलिए ट्वीट करती है क्योंकि उसने जिस व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ जी-तोड़ कैम्पेनिंग की थी वो जीत गया!

हिन्दी को थोपना संभव नहीं है। न ही ऐसा होना चाहिए। भारत की ख़ूबसूरती इसकी विविधता है। इस विविधता को सकारात्मक रूप से एक्सप्लॉइट करने की आवश्यकता है। क्या यह अच्छा नहीं होगा कि हर राज्य में प्राइमरी से लेकर दसवीं तक दो बाहरी राज्यों की भाषाएँ पढ़ाई जाएँ? इस बात को स्वीकारने में क्या समस्या है कि तमिलनाडु के बच्चे गुजराती और पंजाबी पढ़ें, बिहार के बच्चे तेलुगु और कन्नड़ पढ़ें, उत्तर प्रदेश के बच्चे तमिल और मणिपुरी पढ़ें, असम के बच्चे मलयालम और कश्मीरी पढ़ें, पंजाब के बच्चे अरुणाचली और मैथिली पढ़ें, केरल के बच्चे बंगाली और हिन्दी पढ़ें?

लेकिन नहीं, अंग्रेज़ी पढ़ लेंगे जो ग़ुलामी की याद दिलाता रहता है, परंतु अपने ही देश की किसी भाषा को पढ़ने में साउथ और नॉर्थ का झगड़ा आ जाएगा। वही अंग्रेज़ी जो मात्र दस प्रतिशत लोगों को समझ में आती है। वही अंग्रेज़ी जो उत्तर प्रदेश से निकला टूरिस्ट केरल के बोर्ड पर देख कर समझ नहीं पाता। वही अंग्रेज़ी जो गुजरात का व्यक्ति कर्नाटक घूमते हुए इस्तेमाल नहीं कर पाता।

ये झगड़ा फर्जी है और इसे फिर से हवा देने में मृणाल पांडे जैसे पत्रकार जी-जान से माइकल बनने के लिए जुटे हुए हैं। हालात यह हैं कि अब इन लोगों को सिवाय गालियों के कुछ मिलता नहीं। ये दुःखद स्थिति है, लेकिन सत्य है। आप इस गिरोह के सदस्यों के सोशल मीडिया फ़ीड पर जाएँ तो पता चलेगा कि जो इन्हें पढ़ते हैं, उनमें से अधिकतर इन्हें लताड़ने के लिए ही आते हैं।

ये अपनी प्रासंगिकता तलाश रहे हैं। ये अपनी वास्तविकता से लड़ रहे हैं। इनकी बातों को सुनने वाला कोई नहीं है तो अब ये आग लगाना चाहते हैं। ये खुद को पत्रकार कहते हैं और पत्रकारिता के किसी भी नियम को, उसकी नैतिकता को मानने से दूर भागते हैं। क्या हिन्दी वाली बात के सत्य को जानने को लिए ड्राफ़्ट पॉलिसी को पढ़ना जरूरी नहीं था पांडे जी के लिए? शायद नहीं, क्योंकि अवॉर्ड वापसी के हुआँ-हुआँ वाले दौर में बेकार की बातों को भारत की एकता और विविधता पर पेट्रोल छींटने का काम इन पत्रकारों को लिए सहज है। वो यही कर रहे हैं, वो यही करते रहेंगे।

शहनाज Weds गौरव: धर्म की ‘आड़’ में जब अब्बू-अम्मी ने नहीं दिया साथ, शेल्टर होम से की ज़िंदगी की शुरुआत

किसी भी लड़की के लिए शेल्टर होम में रहना आसान नहीं होता है। मगर फिर भी सहारनपुर की शहनाज ने अपनी मर्जी से घर छोड़कर शेल्टर होम का आसरा लिया और 27 मई को अपने पसंद के लड़के गौरव से शादी कर अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत की। शादी से सिर्फ चार दिन पहले घर छोड़कर अंजान शहर दिल्ली आना, जहाँ उनका कोई जानने वाला न हो, शेल्टर होम में रहना बिल्कुल आसान नहीं रहा होगा। बावजूद इसके उन्होंने यह कड़ा कदम उठाया और उनकी इस हिम्मत की वजह से ही उनकी शादी वहाँ हुई, जहाँ वो करना चाहती थी।

दरअसल, शहनाज के परिवार वाले दूसरे धर्म के लड़के गौरव से शादी करवाने के लिए तैयार नहीं थे और शहनाज की मर्जी के बगैर 10 फरवरी को उनकी शादी कहीं और करवा रहे थे। इसलिए उन्होंने 6 फरवरी को घर छोड़ दिया और दिल्ली के जंगपुरा के शेल्टर हेम में शरण लिया। शहनाज ये कदम उठाकर न केवल रुढ़िवादी परिवार के फैसले के खिलाफ खड़ी हुई, बल्कि गौरव को भी इस बात के लिए मनाया कि शादी धार्मिक रीति-रिवाज की जगह कोर्ट में रजिस्टर करवाया जाए। अब शहनाज ने गौरव से शादी करने के बाद 29 मई को शेल्टर होम भी छोड़ दिया और अपने पति के साथ नई ज़िंदगी की शुरुआत करने के लिए निकल पड़ी है।

दिल्ली के जंगपुरा में स्वैच्छिक संगठन शक्ति शालिनी द्वारा चलाए जा रहे शेल्टर होम में रहने के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने शहनाज को सुरक्षा प्रदान की थी। जानकारी के मुताबिक, दिल्ली में शादी रजिस्टर करवाने के लिए यहाँ कम से कम एक महीने रुकना पड़ता है। इस दौरान शेल्टर होम ने शहनाज का काफी साथ दिया। इसके साथ ही शादी के समय दंपत्ति के साथ एक और दिक्कत थी कि उनके पास दिल्ली का स्थाई पता नहीं था। ऐसे में उच्च न्यायालय के निर्देश पर एसडीएम-प्रभारी ने जरूरी वेरिफिकेशन के बाद शेल्टर होम को ही स्थाई पता मानते हुए शहनाज का घर मान लिया।

पुलिस और अदालत के सामने आत्मविश्वास और बेबाकी से अपनी बात रखने के बाद शहनाज ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए बताया कि उन्होंने और उनके पति ने एक-दूसरे के धर्म को सम्मान के साथ स्वीकार करने का फैसला किया था। शहनाज बताती है कि उन्होंने बारहवीं तक की पढ़ाई की है। वो आगे ग्रेजुएशन की पढ़ाई करके नौकरी करना चाहती है। शहनाज के पति गौरव एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करते हैं। शक्ति शालिनी की सेक्रेट्री भारती शर्मा ने इस मामले में शामिल चुनौतियों और संवेदनाओं को देखते हुए इसे बड़ी सफलता बताया है। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि शक्ति शालिनी काउंसलर शहनाज के साथ नियमित संपर्क में रहेंगी। शहनाज-गौरव के किस्से ने काफी लोगों को आशा की नई राह दिखाई है।

मामूली विवाद में सेना के जवानों को दबंगों ने पीटकर किया लहूलुहान, देखें वीडियो

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में सेना के जवानों से होटल के मालिक और कर्मचारियों ने मारपीट का एक वीडियो सामने आया है। मारपीट में सेना के जवानों को लहूलुहान कर दिया गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में आधा दर्जन से अधिक लोग सेना के दोनों जवानों को लाठी डंडों से पीटते नजर आ रहे हैं। पुलिस के अनुसार मामले को लेकर अब तक सात लोगों को अरेस्ट किया गया है। इनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

बताया जा रहा है कि खाने के बिल को लेकर सेना के जवानों से होटल मालिक और उनके साथ काम करने वाले भिड़ गए। मामला इतना बढ़ गया कि वह सड़क तक पहुँच गया। होटल मालिक की तरफ से करीब सात लोगों ने सेना के जवानों पर हमला किया और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। इस बीच लोग सड़क पर खड़े होकर वीडियो बनाते रहे। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने कार्रवाई की और बड़ौत कोतवाली पुलिस ने मामला दर्ज कर के सात लोगों को इस मामले में गिरफ्तार किया है।

यौन शोषण मामले में मौलाना गिरफ़्तार, 25 साल से बच्चे-बच्चियों को बना रहा था हवस का शिकार

केरल के कोट्टायम ज़िले में पुलिस ने एक मदरसा टीचर को बच्चों के साथ दुष्कर्म के आरोप में गिरफ़्तार किया है। 63 साल के आरोपी युसूफ़ को मदरसा चलाने वाली मस्जिद कमिटी की शिक़ायत के बाद शनिवार (1 जून) को गिरफ़्तार किया गया। पुलिस के अनुसार, यूसुफ़ एक अपराधी था और उसने एक दर्जन से अधिक बच्चों का यौन शोषण किया। पुलिस ने कहा कि माता-पिता की शिक़ायत दर्ज कराने में विफल रहने की वजह से यूसुफ को पहले गिरफ़्तार नहीं किया गया था।

ख़बर के अनुसार, गिरफ़्तार होने के बाद युसुफ़ ने 25 साल की उम्र से बच्चों के साथ बलात्कार करने की बात क़बूल कर ली और यह भी बताया कि जब वो बच्चा था तब वो ख़ुद भी यौन शोषण का शिकार हुआ था। मौलाना ने कहा कि उसने एक व्यक्ति से बदला लेने के लिए उसकी बेटी का बलात्कार किया क्योंकि कभी उसने भी उसका (यूसुफ़) यौन उत्पीड़न किया था। यूसुफ़ को यह विश्वास था कि वो कभी पकड़ा नहीं जाएगा क्योंकि बच्चों को शायद ही यौन शोषण और क़ानूनी कार्रवाइयों का कोई ज्ञान हो। महाल्लु समिति के लोग भी शुरू में शिक़ायत दर्ज कराने में हिचकिचाते थे, लेकिन उन्होंने अंततः यूसुफ़ के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का फ़ैसला किया।

दरअसल, पिछले हफ़्ते थालायोलापारांबू मदरसे में युसूफ़ ने एक बच्चे को कुरान पढ़ाने के बहाने बुलाया। जिसके बाद बच्चा जब घर गया तो ख़ौफ़ में डूबे बच्चे ने दुष्कर्म की पूरी कहानी अपने माता-पिता को बता डाली। जिसके बाद माता-पिता ने इसकी शिक़ायत मदरसा चलाने वाली मस्जिद कमिटी को की। बाद में पता चला कि 2 साल पहले भी इस मदरसे को ज्वाइन करने वाले युसूफ़ पर कई बच्चों ने एतराज़ जताया था। लेकिन तब मदरसे ने बच्चों की शिक़ायत पर कोई कार्रवाई नहीं की थी।

बहरहाल, ताज़ा मामला सामने आने के बाद मस्जिद कमिटी ने युसूफ़ को पहले मदरसे से बर्ख़ास्त कर दिया है। गिरफ़्तारी के बाद आरोपी युसूफ़ के ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त सज़ा दिलाने के लिए आवाज़ उठ रही है।

पुलिस प्रमुख का राष्ट्रपति पर आरोप, बंद करवाई थी इस्लामिक आतंकियों की जाँच: श्री लंका धमाके में खुलासा

पिछले महीने श्री लंका में हुए आतंकी हमलों के मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है। सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही बरतने और भारत से मिली गुप्त जानकारी को हल्के में लेने के आरोप में निलंबित चल रहे पुलिस इंस्पेक्टर-जनरल पूजित जयासुंदरा ने देश के सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना पर आरोप लगाया कि हमले के पहले पुलिस द्वारा की जा रही इस्लामी कटटरपंथियों की जाँच सिरिसेना ने रुकवा दी थी। जयासुंदरा के मुताबिक इसके लिए सिरिसेना ने खुद को डायरेक्ट रिपोर्ट करने वाली स्टेट इंटेलिजेंस सर्विस (एसआईएस) का इस्तेमाल किया था।

गुप्तचर व सुरक्षा विभागों में संवाद की कमी

अपनी 20 पन्नों की शिकायत में जयासुंदरा राष्ट्रपति सिरिसेना के अंतर्गत आने वाले और सीधे उन्हें रिपोर्ट करने वाले सुरक्षा विभाग और गुप्तचर एजेंसियों के बीच गंभीर रूप से संवाद की कमी को रेखांकित किया है। उन्होंने यह कहा कि देश की चोटी की गुप्तचर एजेंसी एसआईएस ने पुलिस को आदेश दिया था कि इस्लामिक उग्रवादियों के खिलाफ पुलिस की चल रही जाँच चलने दी जाए। यह जाँच पुलिस का टेररिस्ट इंवेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (आतंकी जाँच विभाग) कर रहा था, और इसमें शामिल संस्थाओं में से एक नेशनल तौहीद जमात भी थी, जिस पर इस समय धमाकों का शक है।

जयासुंदरा के आरोप ऐसे समय आए हैं जब राष्ट्रपति सिरिसेना पहले ही राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीरता से न लेने के आरोपों से दो-चार हैं। एक दूसरे गुप्तचर अधिकारी सिसिरा मेंडिस ने संसदीय पैनल को बताया कि इन धमाकों को रोका जा सकता था। मेंडिस के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठकें नियमित अंतराल पर नहीं होतीं थीं जिससे ऐसे हमलों की धमकी जैसे खतरों की समीक्षा नहीं हो पाई।

जयासुंदरा ने एसआईएस पर पुलिस को भारत से मिली श्री लंका में (तब) संभावित इस्लामी आतंकी हमले की ‘टिप’ साझा नहीं साझा करने का भी आरोप लगाया है। इससे पहले इकोनॉमिक टाइम्स में पद से हटाए गए श्री लंका पुलिस के प्रमुख (यानी जयासुंदरा) के ही हवाले से दावा किया गया था कि उन्हें मिली टिप पर भारत-पाकिस्तान के तल्ख रिश्तों को देखते हुए भरोसा नहीं हुआ था

जिम्मेदारी न लेने के कारण हटाए गए थे जयासुंदरा

सिरिसेना ने ईस्टर धमाकों के बाद जयासुंदरा को इसलिए निलंबित कर दिया था क्योंकि जयासुंदरा ने हमले के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराए जाने देने से मना कर दिया था। उनके मुताबिक उन्हें यह भी पेशकश मिली थी कि यदि वे जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दें तो उन्हें कोई कूटनीतिक पद दे दिया जाएगा। उनका यह भी कहना है कि पिछले वर्ष अक्टूबर में प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे और राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना के बीच मतभेद बढ़ने के बाद से ही उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया था

गाँधी की प्रतिमाएँ तोड़ो, नोटों से उनकी फोटो हटाओ: IAS अधिकारी ने गोडसे को कहा ‘Thank You’

महाराष्ट्र की एक महिला आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) अधिकारी निधि चौधरी ने महात्मा गाँधी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया है। उन्होंने गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को धन्यवाद भी कहा। बृहन्मुम्बई महानगरपालिका में डिप्टी म्युनिसिपल कमिश्नर (स्पेशल) के पद पर तैनात निधि चौधरी ने एक ट्वीट के माध्यम से गाँधी के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग किया। महिला आइएएस अधिकारी ने विवाद के बाद अपनी ट्वीट को डिलीट कर दिया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा था:

“150वीं जयंती की कितनी असाधारण तैयारियाँ चल रही हैं। यह सही समय है जब हम भारतीय रुपये व नोटों पर से उनके चेहरे को हटा दें, दुनिया भर में उनकी प्रतिमाओं को हटा दिया जाए और उनके नाम पर स्थापित संस्थानों व सड़कों का नया नामकरण किया जाए। 30 जनवरी 1948 के लिए धन्यवाद गोडसे।”

ये ट्वीट 17 मई को किया गया था। इस ट्वीट के बाद एनसीपी व कॉन्ग्रेस ने उक्त महिला आइएएस अधिकारी पर कार्रवाई करने की माँग की है। इन दलों ने महात्मा गाँधी के लिए निधि द्वारा प्रयोग किए गए शब्दों को अपमानजनक और शॉकिंग बताते हुए तत्काल निलंबन की माँग की। विवाद के बाद निधि ने कहा कि जो उनकी टाइमलाइन को 2011 से फॉलो कर रहे हैं, उन्हें पता है कि वो गाँधीजी की कितनी इज्ज़त करती हैं और उनके लिए कभी अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकतीं। निधि ने कहा कि उन्होंने यह ट्वीट इसीलिए डिलीट की क्योंकि कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा।

IAS अधिकारी निधि चौधरी का गाँधी को लेकर की गई वह ट्वीट, जो उन्होंने डिलीट कर दी

बता दें कि 30 जनवरी 1948 ही वह तारीख है, जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या की थी। इससे पहले भोपाल की भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा ने भी चुनाव के दौरान नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया था। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे नाराज़गी जताते हुए कहा था कि बापू के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करने वाले को वह दिल से कभी भी माफ़ नहीं कर सकते। वहीं चौधरी ने सफाई में कहा कि महात्मा गाँधी की आत्मकथा उनकी सबसे पसंददीदा पुस्तक है। निधि ने कहा कि उनका वो ट्वीट Sarcasm था और कुछ लोगों को इसे समझने में दिक्कत हुई।

कॉलेज का प्राचार्य होकर माँ सरस्वती पर बनाया आपत्तिजनक वीडियो, गिरफ्तार

माँ सरस्वती पर आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में पिछले पाँच दिन से फरार चल रहा मध्य प्रदेश के दतिया में सेंवढ़ा कॉलेज का प्राचार्य डाॅ एसएस गौतम बृहस्पतिवार (मई 30, 2019) की रात पुलिस के हत्थे चढ़ गया। पुलिस ने प्राचार्य को पकड़ने के लिए कई जगह दबिश दी, लेकिन जब कहीं पता नहीं चला तो पुलिस ने आरोपित की नरसिंहपुर में पदस्थ डिप्टी कलेक्टर बेटी और नायब तहसीलदार बेटे के घर तलाशी की, इसके बाद आरोपित पर दबाव पड़ा।

देवी सरस्वती पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर के वीडियो किया था वायरल

हाल ही में सेंवढ़ा कॉलेज के प्राचार्य का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें प्राचार्य एसएस गौतम हिन्दू देवी सरस्वती के बारे में अत्यंत आपत्तिजनक और अभद्र बातें कह रहा है। 26 मई को वीडियो वायरल होने के बाद लोगों का गुस्सा फूटा और प्राचार्य एसएस गौतम के खिलाफ नारेबाजी की। दतिया में ब्राह्मण समाज के अलावा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और एनएसयूआई ने एसपी को ज्ञापन सौंपकर मामला दर्ज करने और प्राचार्य को गिरफ्तार करने की माँग की।

विभिन्न दलों के छात्र नेताओं ने कहा कि अगर प्राचार्य के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन करेंगे। प्राचार्य के खिलाफ लोगों का आक्रोश देखते हुए पुलिस हरकत में आई और पुलिस ने प्राचार्य गौतम को शुक्रवार देर रात गिरफ्तार कर लिया गया।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरोपित प्राचार्य बृहस्पतिवार की रात खुद ही सरेंडर करने भगुआपुरा थाने पहुँच गया था। जबकि, पुलिस का दावा है कि उसे रात को थाने के पास से गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने शुक्रवार को सुबह पहले कोर्ट परिसर को छावनी में तब्दील किया। इसके बाद एडीजे लवकेश सिंह ने कोर्ट में प्राचार्य को पेश किया। आरोपित ने जमानत अर्जी दी लेकिन न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए आरोपित प्राचार्य को 14 जून तक की न्यायिक हिरासत में ग्वालियर जेल भेज दिया। वहीं, आपत्तिजनक वीडियो बनाकर वायरल करने वाले इसी काॅलेज के प्रोफेसर मनोज व्यास के खिलाफ भी मामला दर्ज हो गया है।

सेंवढ़ा थाना प्रभारी शैलेंद्र सिंह के अनुसार प्रिंसिपल गौतम पर 153-ए और 295-ए के तहत मामला दर्ज किया गया है और कॉलेज के प्रोफेसर मनोज को भी इन्हीं धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया है।

घटना के विरोध में जगह-जगह जलाए गए पुतले

पुलिस ने फरियादी कुलदीप यादव की रिपोर्ट पर प्राचार्य गौतम के खिलाफ मामला दर्ज तो कर लिया था, लेकिन लोगों की माँग के अनुसार 295-ए नहीं लगाई थी। जिसके चलते सुबह भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष विक्रम सिंह बुंदेला के नेतृत्व में तमाम कार्यकर्ता एसपी डी.कल्याण चक्रवर्ती से मिले। शाम को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने राजगढ़ चौराहे पर प्राचार्य गौतम का पुतला जलाकर चप्पलों से पीटा फिर पुलिस प्रशासन से प्राचार्य की गिरफ्तारी की माँग की। करीब आधा घंटे तक चौराहे पर प्रदर्शन हुआ। इस दौरान भाजपा नेता डॉ. राजू त्यागी, अतुल भूरे चौधरी, बल्लन गुप्ता, आकाश भार्गव सहित तमाम कार्यकर्ता मौजूद रहे। वहीं थरेट में बस स्टैंड पर ग्रामीणों ने प्राचार्य के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए पुतला बनाकर जूतों की माला पहनाई, फिर पुतला जलाया।

थरेट में आक्रोशित युवा पुतला दहन की तैयारी करते हुए

बुरहान वानी ‘साहब’… आतंकी को सम्मान देने के लिए J&K के पूर्व CM उमर अब्दुल्ला को पड़ रही लताड़

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मारे गए आतंकी बुरहान वानी को ‘साहब’ कह कर संबोधित किया है। आतंकी को इज्ज़त देने के लिए उमर अब्दुल्ला की ख़ासी आलोचना हो रही है। अब्दुल्ला ने एक ब्रिटिश मीडिया एजेंसी से बात करते हुए इस शब्द का इस्तेमाल किया। दरअसल, उनसे सवाल पूछा गया था कि हाल ही में आतंकी जाकिर मूसा को मारे जाने पर वो क्या कहना चाहेंगे, इसके बाद अब्दुल्ला ने याद दिलाया कि बुरहान वानी ‘साहब’ के मारे जाने के बाद कश्मीर में हालात बदतर हो गए थे।

इससे पहले उमर अब्दुल्ला ने बुरहान वानी को कश्मीर के असंतुष्ट तबके का मसीहा बताया था। उन्होंने कहा था कि वानी इस समूह का आइकॉन बन चुका है। अब उन्होंने विदेशी मीडिया से बात करते हुए एक आतंकी का नाम सम्मान से लिया है। बता दें कि बुरहान की मौत के बाद जाकिर मूसा उसके आतंकी संगठन का प्रमुख सरगना बना था, भारतीय सेना ने उसे भी मार गिराया। मूसा ने कश्मीर में अल-कायदा से जुड़ा संगठन अंसार गजवत-उल-हिंद शुरू किया था।

सेना ने अब बुरहान वानी के आतंकी संगठन का पूरी तरह सफाया कर दिया है। उसका आखिरी सदस्य भी मारा गया है। 2017 में हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहानी वानी की साथी आतंकियों के साथ एक फोटो वायरल हुई थी, जिसके बाद सेना ने एक-एक कर सबको निपटा दिया है।

’10 लोगों को गिरफ्तार किया था, अब क्या 10 लाख को गिरफ्तार करेंगी ममता’

पश्चिम बंगाल में ‘जय श्री राम’ कहने को लेकर पर भाजपा और तृणमूल कॉन्ग्रेस की रार बढ़ती ही जा रही है। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जय श्री राम बोलने पर आपत्ति जता चुकी हैं, लाठीचार्ज करवा चुकी हैं और साथ ही 10 लोगों को गिरफ्तार भी करवा चुकी हैं। अब लोकसभा चुनाव में भाजपा, ममता बनर्जी को ‘जय श्री राम’ लिखे हुए दस लाख पोस्टकार्ड भेज कर उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम करने वाली है।

पश्चिम बंगाल से बीजेपी के नवनिर्वाचित सांसद अर्जुन सिंह ने कहा है कि जय श्री राम लिखकर सभी पोस्टकार्ड मुख्यमंत्री निवास पर भेजे जाएँगे। तृणमूल कॉन्ग्रेस में विधायक रहे और आम चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए अर्जुन सिंह ने टीएमसी नेताओं के बैठक स्थल के बाहर कथित रूप से जय श्रीराम के नारे लगाते बीजेपी कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज की निंदा करते हुए ये बात कही। बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह ने कहा कि टीएमसी के नेता व्यर्थ की बातें कर रहे हैं। लोगों ने तृणमूल कॉन्ग्रेस को खारिज किया है और यह उनकी प्रतिक्रिया है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने जय श्री राम बोलने के लिए 10 लोगों को गिरफ्तार किया है और अब 10 लाख लोगों को गिरफ्तार करेगी। ऐसा लगता है कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।

जानकारी के मुताबिक, तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कचरापाड़ा में उन कार्यालयों को फिर से वापस लेने की रणनीति बनाने के लिए बैठक कर रहे थे, जिन पर कथित रूप से भाजपा कार्यकर्ताओं ने कब्जा कर रखा है। गौरतलब है कि, हाल ही में सम्पन्न हुए चुनाव में भाजपा कुल 42 सीटों में से 18 सीटें जीतकर बंगाल में एक राजनीतिक ताकत के तौर पर उभरी है। इस जीत के बाद तृणमूल कॉन्ग्रेस के काफी नेता और पार्षद भाजपा में शामिल हुए हैं।