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लैला: 2047 के काल्पनिक भारत के नाम पर डर, नफ़रत, अराजकता और हिंदुत्व विरोधी तानाबाना

‘लैला’ नेटफ्लिक्स पर 14 जून को रिलीज हुआ, हिन्दूफ़ोबिया जैसे नैरेटिव को और मजबूत करने एवं आगे बढ़ाने की एक और लीला ही है। ‘लैला’ प्रयाग अकबर की इसी नाम से लिखी एक नॉवेल से अडॉप्टेड है, जिसे किताब से हटकर ठीक-ठाक घालमेल करते हुए अलग आयाम तक ले गई हैं इस शो की निर्देशिका और क्रिएटिव डायरेक्टर दीपा मेहता। दीपा मेहता ‘वॉटर’ और ‘फायर’ जैसी फिल्मों के कारण पहले से ही अपनी हिन्दू संस्कृति विरोधी विवादस्पद पहचान बना चुकी हैं। इस सीरीज पर और इसमें इस्तेमाल हिन्दूफोबिक अजेंडे पर विस्तार से बात करने से पहले एक छोटी सी यात्रा पर आपको ले चलते हैं कि क्यों ऐसे टीवी शो या वेब सीरीज और फिल्मों की अचानक से बाढ़ आ गई है? कौन-कौन हैं इस पूरे नैरेटिव और सनातन या हिंदुत्व को बदनाम करने वाले महानुभाव? आखिर किसने इनकी दुखती रग पर हाथ नहीं बल्कि लात रख दिया है कि यह पूरा इकोसिस्टम अपनी पूरी ताकत के साथ जी-जान से जुट गया है इस देश, इसकी वास्तविक पहचान और इसकी सांस्कृतिक अस्मिता में पलीता लगाने के लिए…

लैला में शुद्धि कैंप में शालिनी पाठक

स्वर्णिम काल: वामी गिरोह के पतन की शुरुआत!

2013 से पहले का समय मानो इस देश का स्वर्णिम काल था! बेशक तब आए-दिन दंगे, मॉब लिंचिंग, भयंकर भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा से लेकर स्वच्छता-सफाई और विकास, चाहे वह इस देश के गरीब आम और खास तबके का हो या फिर नवीन इंफ्रास्ट्रक्चर का – यह सब मुद्दा था ही नहीं। तमाम वामी-कामी बुद्धिजीवी, लुटियंस पत्रकार, ‘निष्पक्ष’ पक्षकार, नेता और छद्म आंदोलनकारी सब की बढ़ियाँ छन रही थी। सब मलाई काट रहे थे। चारों-तरफ आनंद ही आनंद था। लेकिन तभी अचानक से नए-पुराने पाप प्रकट होने लगे, एक के बाद एक घोटाले सामने आने लगे, निर्भया के बलात्कार और निर्मम हत्या ने अचानक से उस बुलबुले को फोड़ दिया जो उस समय तक के मलाई काटने वालों ने बनाया था।

‘हिन्दू आतंकवाद’ से लेकर, राष्ट्रवाद और इस देश की तरक्की के बारे में वास्तविक धरातल पर कुछ सोचना; सबको या तो बेहद बदनाम कर दिया गया था या गाली बना दी गई थी। किसने किया यह सब, आप सबको पता है क्योंकि बाद में उस खेल के सभी किरदार खुल कर बाहर आ गए। जनता को उस माहौल में जो गड़बड़ी थी वो साफ़ नज़र आ गया था। निर्भया के बाद अन्ना आंदोलन ने बहुतों को मुखर कर दिया, देश उनके लिए सर्वोपरि होने लगा। राष्ट्र के प्रतीक विरोध का सिंबल बन गए। कॉन्ग्रेस के हाथ से सत्ता छिटकने की सुगबुगाहट हो चुकी थी। सच में उस समय देश भयंकर पीड़ा में कराह रहा था, ऐसे में दिल्ली में केजरीवाल उभरे (जिन्होंने अपनी बाद की हरकतों से आंदोलन और प्रतिरोध जैसे सशक्त हथियारों की धार को इतना कुंद कर दिया कि अब मात्र ‘आत्म मुग्ध बौना’ होना ही इनकी पहचान रह गई है) तो गुजरात से चले मोदी ने जब ‘कॉन्ग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया तो उसमें बहुतों को उम्मीद की किरण नज़र आई लेकिन पूरे कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम ने इसे अपने अस्तित्व पर खतरे के रूप में पहचान लिया और फिर शुरू हुआ ‘दक्षिणपंथी ताकतों’ के उभार के नाम पर ‘काल्पनिक डर’ फ़ैलाने और बेचने का कारोबार और इसमें वो सब लग गए जिनकी आने वाले समय में बैंड बजने वाली थी। चूँकि, वो ‘बुद्धिजीवी’ थे इसलिए वो भलीभाँति समझ गए कि अब उनके लिए ‘अच्छे दिन’ नहीं बल्कि मुश्किल भरे दिन आने वाले हैं।

2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सत्ता में आई और फिर खेल का दूसरा भाग शुरू हो गया, जहाँ यह पूरा इकोसिस्टम किसी एक व्यक्ति से विरोध और नफ़रत के नाम पर राष्ट्र और इसके सभी प्रतीकों के खिलाफ गाली बनाने में जुट गई, मोदी को हिंदुत्व का प्रतीक मान हिंदुत्व के नाम पर पूरी ‘सनातन संस्कृति’ को बदनाम करने में लग गई। तमाम तरह के गल्प और अपनी उर्वर काल्पनिकता को विभिन्न माध्यमों, चाहे वो किताब हो, टॉक शो, फिल्म या सीरियल के रूप में इस तरह परोसा कि जैसे उनका दिखाया हुआ ‘नकली डर’ वास्तविक हो और जो सामने विकास या तरक्की दिखनी शुरू हुई है वो सब ‘नकली’ है, मात्र एक छलावा। लेकिन पूरे इकोसिस्टम की पहले और बाद की दोनों भविष्यवाणियाँ, सर्वे, आँकड़ो के रूप में गणितीय लफ्फबाजी सब फेल होने लगे, पूरा इकोसिस्टम फेल होने लगा, इनका हर प्रोपेगेंडा फेल होने लगा और ये सिलसिला 2019 के चुनावों तक लगातार चलता रहा। इस बार भी आपने देखा-समझा-जाना कि कैसे इस पूरे नेक्सस ने जो सामने है, उसे नकारकर काल्पनिक डर दिखाकर, जाति-धर्म, विभेदीकरण में खुद लिप्त होकर, आरोप हिंदुत्व या दक्षिण पंथ पर लगाते रहे। लेकिन जनता ने सब कुछ ख़ारिज कर दिया।

बेबश शालिनी पाठक

उसी समय मई में ही इस शो ‘लैला‘ का ट्रेलर रिलीज हुआ था जिसका ट्विटर से लेकर सोशल मीडिया पर भयंकर विरोध हुआ, शो शायद चुनाव से पहले ही रिलीज होता लेकिन उस समय चुनाव आयोग जिस तरह से बाकी वेब सीरीज पर प्रतिबन्ध लगा रहा था, शायद इसे भी रोक देता। तब इसका रिलीज डेट 14 जून तय किया गया था। विरोध स्वरूप नेटफ्लिक्स के इस शो के ट्रेलर को सबसे ज़्यादा लोगों ने डिसलाइक किया था। ऐसा करके भी लोगों ने इसे चर्चा में ला दिया।

चुनाव परिणाम के बाद: लुटे-पिटे वामी-कामी काम पर लग गए

चुनाव परिणाम में संयोग से इस पूरे नेक्सस के मन का कुछ भी नहीं हुआ अब शायद यह पूरा इकोसिस्टम और आक्रामक होकर हमला करे और ‘लैला’ तो बस एक शुरुआत भर हो। क्योंकि आज भी तमाम संस्थानों और शक्तिशाली जगहों पर इस गिरोह का ही कब्ज़ा है और अब डर बेचकर अपनी दुकान चलाना इनका मुख्य व्यवसाय। आज ‘लैला’ कुछ और नहीं बल्कि उसी काल्पनिक डर का विस्तार है। जो आपको एक बार फिर से क्रिएटिव लिबर्टी और कलात्मकता के नाम पर एक डिस्टोपियन इंडिया ‘आर्यावर्त’ (एक ऐसा काल्पनिक समाज जो बेहद अमानवीय और अराजक है) की रूप रेखा पेश कर डराने और अपनी गौरवशाली सनातन परम्परा और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ तमाम तरह की नकारात्मकता और नफ़रत को शामिल कर एक ऐसी खिचड़ी परोसने की कोशिश है। जिसे आप खाएँगे तो अच्छे स्वास्थ्य या मनोरंजन के नाम पर लेकिन यह धीमी ज़हर के रूप में, आपकी सेहत ख़राब करने वाली है।

आपका दिमाग उन काल्पनिक समस्याओं में उलझ जाने वाला है जिसकी आने वाले समय में संभावना न के बराबर है। क्योंकि यह पूरा गिरोह एक ऐसे समाज और संस्कृति को लगातार बर्बर, अराजक, आक्रामक और अत्याचारी के रूप में परोसने में लगा है, जिसका कभी ऐसा कोई इतिहास ही नहीं रहा, इसलिए बड़ी चालाकी से ऐसे भविष्य की कल्पना कर लगातार डराने की कोशिश की जा रही है। ऐसा करने का एक और खास मकसद जो है वह आतंक, नक्सलवाद या दूसरे समुदाय विशेष या ऐसे कौम की उन वास्तविक समस्याओं से मुँह मोड़ लेना है, जो समस्याएँ वास्तव में न सिर्फ हैं, बल्कि वर्षों से पूरी तीव्रता से समाज का हिस्सा बने हैं, इसे खोखला कर रहे हैं। लेकिन यह इकोसिस्टम अपने फायदे के लिए हमेशा से उसे नकारता रहा या उस पर बात करने से कतराता रहा। क्या इस पर आगे बात होगी? पता नहीं, फ़िलहाल, डिस्टोपिआ क्या है उसकी एक झलक देखें…

अब सीधे-सीधे बात कर लेते हैं नेटफ्लिक्स इंडिया के 14 जून से प्रसारित इस वेब सीरीज ‘लीला’ की। कहने को यह शो प्रयाग अकबर के 2017 में प्रकाशित नॉवेल ‘लैला’ पर आधारित है, जिसमें कथ्य के लिए तथ्य कम लेकिन ‘डर का माहौल है’ वाली नैरेटिव के माध्यम से जो कहने की कोशिश नेटफ्लिक्स, निर्देशक दीपा मेहता, शंकर रमन (गुरगाँव फेम) और पवन कुमार के साथ ही स्क्रीन प्ले राइटर उर्मि जुवेकर ने किया है। इसके मुख्य किरदारों के रूप में हैं हुमा कुरैशी (जो कठुआ काण्ड में पूरे हिन्दू धर्म को दोषी मानते हुए सोनम, स्वरा के साथ प्लाकार्ड गैंग की हिस्सा थीं), सिद्धार्थ (कुछ दिन पहले ही मोदी के प्रति नफ़रत के कारण ट्विटर में छाए हुए थे), राहुल खन्ना, संजय सूरी और आरिफ ज़कारिया। इन किरदारों के माध्यम से पूरे ‘हिन्दू विरोधी नैरेटिव’ को परोसा गया है। इकोसिस्टम द्वारा पहले से ही चली आ रही हिंदुत्व, इसके प्रतीकों और अपने गौरवशाली परम्परा के प्रति नफ़रत और हीनताबोध से भर जाने या भर देने का एक और प्रयास है ‘लैला’।

कहानी आपको ‘2047’ (हाल ही में बीजेपी के 2047 तक सत्ता की बात चर्चा में थी) के डिस्टोपियन भारत “आर्यावर्त” में ले जाती है। सीरीज चूँकि, दिल्ली में शूट हुई है तो आप इसे बड़ी आसानी से पहचान सकते हैं कि इस सीरीज का मकसद किस भारत और किस सत्ता के प्रति डर बैठाना है।

आर्यावर्त के सत्ता प्रमुख जोशी जी

देश या राज्य की बात करें तो वह है ‘आर्यावर्त’, राज्य का नारा है ‘जय आर्यावर्त’ जो हिटलर के नारे से मैच करता है ‘Hail Hitler’ अर्थात जय हिटलर। और मुखिया हैं जोशी जी, जो ‘शुद्धतावादी’ समाज के पक्षधर हैं। जो राज्य में पूजनीय हैं और जनता उनकी भक्त। कहानी आपको एक ऐसे भारत में ले जाती है जहाँ लोगों को जाति-धर्म-संप्रदाय के नाम पर अलग-अलग सेक्टरों में रखा जाता है, भाषा जहाँ संस्कृतनिष्ठ है, प्रदूषण अपने चरम पर है। पीने के पानी के लिए चारों तरफ हाहाकार मचा है। पानी खरीदना, बेचना या बाँटना अपराध है, राज्य की तरफ से कभी-कभी पानी मिलता है। नॉनवेज बैन है। हर तरफ अराजकता का माहौल है, कानून व्यवस्था के नाम कुछ भी नहीं बचा है राज्य में, पत्रकारों को लेबर कैंप में रखा जा रहा है या जान से मार दिया जा रहा है। बुद्धिजीवी-प्रोफेसरों की मॉब लिंचिंग हो रही है। ‘दूश’ अर्थात अछूतों से कोई भी सम्बन्ध रखना मना है। महिलाओं पर अमानवीय अत्याचार हो रहे हैं। चाइल्ड लेबर खूब हो रहा है, मिक्स्ड बच्चों को पिजरों में कैद कर रखा जा रहा है। शिक्षा के नाम पर भक्त बनाकर राज्य उनका ब्रेन वाश कर रहा है। एक तरफ घेटोज और स्लम्स की भरमार है अर्थात गरीबी बहुत ज़्यादा है तो दूसरी तरह अमीर वर्ग बेहद सुविधा संपन्न है जो आर्यावर्त का हिस्सा है।

ऐसे में एक हिन्दू लड़की शालिनी पाठक (हुमा कुरैशी) मुस्लिम लड़का रिजवान (राहुल खन्ना) से निकाह कर लेती हैं। चूँकि, दोनों में प्यार है और उनका परिवार उस अराजक और अत्यधिक प्रदूषित माहौल में भी आलीशान और बेहद ऐसो-आराम की ज़िन्दगी जी रहा है। जहाँ एक तरफ पीने का पानी नहीं है वहीं यह परिवार चोरी से टैंकर माफियाओं से राज्य का पानी खरीद कर स्वीमिंग पूल जैसी लग्जरी अफोर्ड कर पा रहा है। बेटी ‘लैला’ अपने पापा रिजवान के साथ स्वीमिंग पूल में नहा रही है तभी आर्यावर्त राज्य का एक सिपाही डॉ राकेश (जिसका काम मिक्स बच्चों को मार देना या उन्हें बेच देना है, वह जोशी का एक सिपाही है) वहाँ आता है और सब कुछ तहस-नहस हो जाता है। बेटी ‘अशुद्ध’ क्योंकि हिन्दू-मुस्लिम के मिक्स्ड ब्लड की है, होने के कारण गायब कर दी जाती है, रिजवान को हिंदूवादी ताकतें भीड़ की शक्ल में जान से मार देती है और शालिनी को शुद्धिकरण कैंप ‘श्रम केंद्र’ भेज दिया जाता है। जहाँ की सुरक्षा और व्यवस्था की कमान ‘हिजड़ों’ के हाथ में है।

यहाँ उसे बेहद नारकीय जीवन से गुजरना पड़ता है। न जाने कितनी माँओं से उनकी अशुद्ध बच्चों को अलग कर दिया गया है। शालिनी इसी कैंप में रहते हुए अपनी बेटी की तलाश में निकलती है, उसकी पूरी कोशिश अपनी बेटी ‘लैला’ तक पहुँचने की जद्दोजहद है और इसी के इर्द-गिर्द बुनी गई है डिस्टोपियन इंडिया ‘आर्यावर्त’ की कहानी। इस कैंप में दिन-रात एक धुन बजती है…

मेरा जन्म ही मेरा कर्म है…
मेरा सौभाग्य है कि मैंने इस धरती पर जन्म लिया।
आर्यावर्त के लिए जान देना और जान लेना मेरा कर्तव्य है।
भले ही वो जान मेरे बच्चे की क्यों न हो!

इसके माध्यम से यह दिखाने का प्रयास है कि यदि हिंदुत्ववादी ताकतें सत्ता पर इसी तरह हावीं रहीं तो यह देश खासतौर से मुस्लिमों और अन्य समुदायों के लिए रहने लायक नहीं होगा, अछूत पर होगा भयंकर अत्याचार, जिसे इस सीरीज में ‘दूश’ के रूप में दिखाया गया है। कहने का मतलब, सब कुछ निकट भविष्य में बेहद ख़राब होने जा रहा है। पूरा ताना बाना इस तरह बुना गया है जिससे आप पिछले कुछ सालों में हुई छिटपुट घटनाक्रमों के माध्यम से खुद को कोरिलेट करते हुए उस डर की दुनिया से खुद को इस तरह से जोड़ लें जिस तरह से इकोसिस्टम आपको दिखाना और डराना चाहता है। बड़ी चालाकी से इसमें उम्मीद की किरण भी है और वो हैं ‘विद्रोही’ (एक तरह से आतंकी या वामपंथी नक्सली कह लें) जो जोशी जी को मारने के लिए नरसंहार के लिए भी तैयार हैं। एक और ट्वीस्ट है इसमें, आर्यावर्त में भी ‘संघ’ की तर्ज पर एक और सत्ता का केंद्र दिखाया गया है और इनके बीच थोड़ा सा मनमुटाव भी, जिसके मुखिया हैं मोहन राव।


दीक्षित स्काईडोम प्रोजेक्ट का इंजीनियर , जो विद्रोहियों से मिल गया है

खैर, इस तरह की हरकतें न वामपंथियों के लिए नई हैं और न भारत विरोधी पूंजीवादी ताकतों के लिए, जिनके बीच बाहर भले खटपट दिखे लेकिन अंदर साँठ-गाँठ तगड़ी होती है। और इसी गठजोड़ का नतीजा है, पिछले काफी समय से ऐसे कई सीरीज का नेटफ्लिक्स पर रिलीज होना। नेटफ्लिक्स ने कई बार हिन्दू भावनाओं से खिलवाड़ किया है। हिन्दुओं की छवि और उनके प्रतीकों को नकारात्मक तरीके से पेश किया गया है। नेटफ्लिक्स और पूरे इकोसिस्टम की लगातार प्रवृत्ति रही है – एंटी हिन्दू नैरेटिव को स्थापित करने की। ‘Ghoul’ और  ‘Sacred Games’ के बाद ‘लैला’ के संयुक्त रूप में यह उनका तीसरा प्रयास है। कहने को ‘लैला’ भविष्य की काल्पनिक कहानी है पर इस सीरीज में इस्तेमाल हुए प्रतीकों, विज़ुअल्स, शब्दावली आदि से इस गिरोह की मानसिकता साफ पता चलती है और रही सही कसर गिरोह के तमाम फिल्म समीक्षकों ने पूरी कर दी। रिव्यु में बिलकुल साफ़ कर दिया गया है कि जो इस दौर में चल रहा है, इसका भविष्य यही है।

अब आते हैं असली मुद्दे पर, यह सब जो भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और क्रिएटिव लिबर्टी के नाम पर हो रहा है, उस पर। जिस तरह से हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है, उसकी वजह क्या है? जिस तरह से काल्पनिक डर का माहौल और ‘डरे हुए मुस्लिम’ की छवि को बार-बार परोसा जा रहा है – बात इस पर करते हैं। इसके पीछे के एजेंडा को समझना इतना मुश्किल नहीं है। बाजार बेशक एक ताकत के रूप में यहाँ मौजूद है लेकिन इस बाजार के ग्राहक कौन हैं? किसके दम पर नेटफ्लिक्स जैसी ताकतें भारत या आने वाले भारत की ऐसी नकारात्मक छवि को इस तरह से पेश कर पा रही हैं?

क्या इसकी सबसे बड़ी वजह हमारी सहिष्णुता नहीं है। हम सब-कुछ देख सुन कर भी मौन रहते हैं। कभी उतनी सशक्तता से एकजुट हो अपना विरोध भी नहीं जता पाते कि नेटफ्लिक्स और इनके पीछे छिपी राष्ट्र विरोधी ताकतों का हौसला पस्त हो। इसी नेटफ्लिक्स को सऊदी अरब सहित कई देशों से वहाँ के विरोध में बनाए गए कई शो को वेबसाइट से हटाना पड़ा। वहाँ की सरकारों ने सीधे इसे बैन कर दिया लेकिन अगर यहाँ की सरकार ऐसा कोई कदम उठाए तो यह पूरा कॉन्ग्रेसी, वामपंथी, अर्बन नक्सल गिरोह एक्शन में आ जाएगा। इनके गिरोह का ही कोई सुप्रीम कोर्ट जाएगा और अभिव्यक्ति के नाम पर अपने पक्ष में फैसला ले आएगा।

तो, इस तरह के प्रोपेगेंडा को काटने का या इनको ऐसा करने से रोकने का कारगर उपाय क्या हो सकता है? सबसे आसान उपाय है दर्शक जिन्हें राष्ट्र और वहाँ के लोगों की उन्नति प्यारी हो वो अपने स्तर पर ऐसे शो का पूरी तरह बहिष्कार करें। दो-चार बार भी ऐसा हो गया तो कितना भी बड़ा पूँजीपति हो ऐसे गिरोहों और ऐसे हिदुत्व विरोधी कंटेंट में पैसा लगाने से कतराएगा। याद रखिए, यह बड़ी लड़ाई का हिस्सा है, देश के टुकड़े करने का इनका सपना मरा नहीं है। बस कहीं दुबका पड़ा है। ये हर माध्यम से देश के बच्चों और युवाओं में काल्पनिक डर, दहशत और झूठ का ज़हर बो रहे हैं ताकि एक दिन ये इस देश की चिता पर जश्न मना सकें, अट्टहास कर सकें।

प्रतिरोध का प्रतीक

इनके हर झूठ को बेनकाब कीजिए, इन्हें पढ़िए, तर्कों से घेरिए, इनसे सवाल पर सवाल कीजिए, इनके हर नैरेटिव की लंका लगा दीजिए। इनसे पूछिए कि क्यों ऐसे स्टोरी-टेलर और पूँजीपति हलाला, तलाक या आतंकवाद या समुदाय विशेष पर खुलकर कुछ नहीं कह पा रहे, कुछ बना नहीं पा रहे? यहाँ तो काल्पनिक डर का माहौल दिखा रहे हैं वहाँ तो सब कुछ सामने है। है हिम्मत, नक्सल आतंकवाद, अलगाववाद पर कुछ बोलने, लिखने या दिखाने की। यह दुबक के पतली गली से निकल लेंगे या आपको भक्त, वॉर मोंगर, गंगा-यमुनी तहज़ीब के खिलाफ अनेक विशेषणों से नामाजेंगे तब समझ जाइएगा, तीर निशाने पर लगी है। कभी अगर ऐसे विषयों पर फ़िल्में बनती भी है तो ज़रा ध्यान से देखिए कैसे बड़ी चालाकी से उसमें भी वो अपना नैरेटिव सेट कर जाते हैं और आपको पता भी नहीं चलता।

चलते-चलते ‘लैला’ में बड़ी आसानी से क्रिएटिव लिबर्टी लेते हुए पूरे कथानक को ऐसे प्रदर्शित किया गया है जिससे ज़्यादा से ज़्यादा ख़राब तरीके से हिंदुत्व की छवि को बिगाड़ा जा सके। ‘आर्यावर्त’ से मुस्लिम समुदाय का लगभग सफाया हो चुका है। जो बचे हैं उन्हें स्काईडोम अर्थात गगनचुम्बी तकनीकी दीवारें बनाकर बिलकुल अलग-थलग कर दिया है। नृत्य, गीत, संगीत, पोएट्री, पेंटिंग सब पर बैन लग चुका है आर्यावर्त में, बस 2047 में भी ज़िंदा हैं तो फैज अहमद फैज़ और उनकी सत्ता विरोधी पोएट्री। ऐसा दिखाकर बड़ी आसानी से वो सब परोस दिया गया जिसका डर ये पिछले पाँच साल से दिखाते आ रहे हैं।

डॉक्टरों के आगे झुकीं ममता: कैमरे के सामने मानी हर माँग, हर अस्पताल में पुलिस की होगी तैनात

पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों द्वारा 10 जून से जारी हड़ताल के अब खत्म होने के आसार दिख रहे हैं। जूनियर डॉक्टरों पर किए गए हमले के बाद लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन के बाद आज सीएम ममता बनर्जी और डॉक्टरों के बीच बैठक चली। सचिवालय में हुई बैठक में डॉक्टरों की बात ममता तक पहुँचाने के लिए डॉक्टरों के प्रतिनिधिमंडल पहुँचे। बंगाल में 14 मेडिकल कॉलेज हैं और ममता बनर्जी प्रत्येक मेडिकल कॉलेज के दो-दो प्रतिनिधियों से मिलीं।

इस दौरान डॉक्टरों ने मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में उन्हें हो रही दिक्कतों से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अवगत कराया। जानकारी के मुताबिक, ममता बनर्जी ने सरकारी अस्पतालों में शिकायत निवारण सेल का निर्माण करने के डॉक्टरों के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। ममता ने पश्चिम बंगाल के हर अस्पताल में नोडल पुलिस ऑफिसर तैनात करने का निर्देश दिया है।

ममता ने आंदोलनरत जूनियर डॉक्टरों के साथ बैठक में कहा कि राज्य सरकार ने किसी भी डॉक्टर के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं। एनआरएस अस्पताल में हुई घटना में कथित तौर पर लिप्त 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हालाँकि, पहले ममता कैमरे के सामने लाइव बैठक करने के लिए मना कर रही थीं, लेकिन फिर मान गईं। केवल दो क्षेत्रीय न्यूज चैनलों को राज्य सचिवालय में बनर्जी और जूनियर डॉक्टरों के बीच हुई बैठक को कवर करने की अनुमति दी गई।


बिहार में भीषण गर्मी के कारण 200 मौतें, धारा 144 लागू, अस्पतालों में मचा कोहराम

बिहार में गर्मी का प्रकोप ऐसा है कि अब इसके कारण प्रशासन ने धारा 144 लागू कर दी है। आपदा प्रबंधन विभाग ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि अब तक भीषण गर्मी व लू के कारण 184 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह आँकड़ा अब 200 के पार हो चुका है। हालत यह है कि सिर्फ़ पिछले 2 दिनों में 113 लोग काल के ग्रास बन गए हैं। स्थिति को और बदतर होने से बचाने के लिए गया में धारा 144 लागू कर दी गई है। डीएम अभिषेक सिंह ने नया निर्देश जारी करते हुए सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक लोगों को घर में ही रहने को कहा है।

इसके अलावा 11 बजे से 4 बजे तक दिन में सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई है। जब तक मौसम सामान्य नहीं हो जाता, धारा 144 लागू रहेगी। यहाँ तक कि सरकारी मनरेगा योजनाएँ व उनके तहत होने वाले कामकाज भी सुबह 10.30 के बाद ठप्प रहेंगे। खुले स्थानों पर किसी भी प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करने पर भी प्रशासन ने निषेध लगा दिया है। यह सब इसीलिए किया गया है क्योंकि ज़िले के अस्पतालों में कोहराम मचा हुआ है और गर्मी से पीड़ित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

बताया जा रहा है कि लू लगने से सबसे ज्यादा मौतें औरंगाबाद जिले में हुई हैं। धारा 144 लागू करने का एक कारण यह भी है कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने के कारण लोग आक्रोशित हो सकते हैं और असामाजिक तत्व इसका फ़ायदा उठा कर अस्पतालों में तोड़फोड़ कर सकते हैं, जिससे पहले से ही बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर और बुरा असर पड़ेगा। क़ानून व्यवस्था को देखते हुए डीएम ने समूचे जिले के लिए यह निर्देश जारी किया है।

गया जिलाधिकारी ने दिया धारा 144 लगाने का आदेश

जिलाधिकारी ने एहतियातन चैंबर ऑफ कॉमर्स, गया से भी निवेदन किया है कि गया शहरी क्षेत्र की दुकानों को दिन में सिर्फ 11:00 बजे तक खोला जाए एवं अपराह्न में 4:00 बजे के बाद खोला जाए। जिलाधिकारी ने आगे कहा कि दिन में 11:00 बजे से 4:00 बजे के बीच दुकानों को बंद रखा जाए और ग्राहकों को भी इसकी सूचना दी जाए, ताकि ग्राहक भीषण गर्मी एवं लू का शिकार न हो सकें।

कस्टमर के साथ सेक्स से इनकार करने पर सईद समेत 4 साथी डांसरों ने बेरहमी से पीटा

हैदारबाद के बेगमपेट इलाके में रविवार (जून 16, 2019) को एक बार में डांसर को कस्टमर के साथ सेक्स न करने पर कपड़े उतारकर पीटा गया। महिला ने अपनी 4 साथी महिला डांसर और एक सईद नाम के कस्टमर पर
मारपीट का आरोप लगाया है। पुलिस ने चारों महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया जबकि सईद अभी फरार है।

मीडिया खबरों के मुताबिक पुलिस अभी फरार सईद को ढूँढ रही है। पंजागुट्टा पुलिस ने बताया है कि महिला ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि उसने जब से बार ज्वाइन किया था तब से उसपर कस्टमर्स के साथ सेक्स करने के लिए दबाव बनाया जाता था। रविवार को जब उसने सेक्स करने से इंकार किया तो चार महिला डांसर और कस्टमर ने उसके कपड़े उतार दिए और सड़क पर पीटा।

25 वर्षीय महिला लोकल फिल्म इंडस्ट्री में बतौर जूनियर कलाकार काम किया करती थी लेकिन जनवरी में आर्थिक संकट के कारण उसने बार ज्वाइन किया था। न्यूज 18 में प्रकाशित खबर के मुताबिक शहर के जाने-माने लिस्बन रेस्ट्रोबार में महिला को अवैध रूप से काम पर रखा गया था। पीड़िता ने आरोप लगाया है कि जब उसने मदद के लिए पुलिस से गुहार लगाई तो पुलिस ने भी उसे बचाने में आनाकानी की।

हालाँकि, एएनआई की खबर के अनुसार इस मामले में पुलिस ने आरोपितों पर आईपीसी धारा 354, 509, 506, 323, 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया है, और उनके खिलाफ जाँच भी शुरू हो गई है। इसके अलावा चार महिला आरोपितों को गिरफ्तार करके न्‍यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। जबकि एक की तलाश जारी है। इस मामले में तेलंगाना के डीजीपी महेंद्र रेड्डी ने विस्‍तृत रिपोर्ट माँगी है।

Video वायरल: मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस के नेता ने प्रेस कॉन्फ्रेस से पहले की पुलिस के साथ हाथापाई

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार को 6 महीने पूरे हो गए हैं। राज्य सरकार के मंत्री इन दिनों अपने-अपने क्षेत्रों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने में व्यस्त हैं। इसी बीच इंदौर से एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में बवाल होने की ख़बर सामने आई है। दरअसल, वहाँ राज्य सरकार में मंत्री सज्जन सिंह वर्मा एक प्रेस कॉन्फ्रेस में मीडिया को संबोधित करने वाले थे। इस मौक़े पर कई अन्य कॉन्ग्रेसी नेता भी शामिल होने आए थे। इन्हीं में एक नाम स्थानीय कॉन्ग्रेसी नेता सनी राजपाल का भी था। वहाँ पहुँचकर कॉन्ग्रेस के इस दबंग नेता ने न सिर्फ़ पुलिस वालों के साथ बदसलूकी की बल्कि अपनी पावर का भी इस्तेमाल किया।

न्यूज़ एजेंसी ANI द्वारा शेयर किए इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि जब पुलिस अधिकारी ने नेता साहब को रोक कर कुछ पूछना चाहा तो उन्होंने भड़कते हुए कहा कि वो पार्टी के स्पोक पर्सन (प्रवक्ता) हैं। इतना कहते-कहते वो पुलिस से हाथापाई करने लगे और ज़बरदस्ती अंदर चले गए। हल्ला-गुल्ला होता देख वहाँ मौजूद अन्य नेताओं ने मामले को शांत कराया।

सोशल मीडिया पर अब यह वीडियो वायरल हो चुका है। बता दें कि सज्जन सिंह वर्मा राज्य सरकार में PWD मंत्री हैं, जिनके पास राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की ज़िम्मेदारी है।

कमलनाथ सरकार सत्ता पर आसीन होते ही आए दिन चर्चा का विषय बनी हुई है। कभी किसानों की क़र्ज़माफ़ी, कभी आयकर विभाग की छापेमारी। ख़बर तो यह भी है कि CBI की रडार पर कमलनाथ के क़रीबी भी हैं। हद तो तब पार हो जाती जब कमलनाथ यह तक बोलने से नहीं चूकते कि लोकसभा चुनाव 2019 का ख़र्च उठाने के लिए बीजेपी नेताओं की पत्नियाँ गहने बेच रही हैं।

अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को रेलवे का बड़ा तोहफ़ा, सुरक्षा के भी कड़े इंतज़ाम

अमरनाथ धाम की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए भारतीय रेलवे नया तोहफ़ा लेकर आया है। भारत सरकार जहाँ इस यात्रा को सफलतापूर्वक सुगमता से संचालित करने की पूरी कोशिश में लगी है, रेलवे ने इसके लिए स्पेशल ट्रेन चलाने की घोषणा की है। यह ट्रेन दिल्ली से लेकर जम्मू-कश्मीर तक चलेगी और बीच में 11 स्टेशनों पर रुकेगी। यात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए रेलवे ने उनकी सुविधा के लिए यह ऐलान किया है। यह ट्रेन दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल से हर सप्ताल 2 बार चलेगी। इसे 1 जुलाई से लेकर 15 अगस्त तक चलाया जाएगा।

रेल मंत्री पीयूष गोयल ने स्पेशल ट्रेन को लेकर दी जानकारी

केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी देते हुए बताया, “अमरनाथ यात्रियों को रेलवे का तोहफ़ा: विश्व प्रसिद्ध तीर्थ बाबा अमरनाथ के दर्शन हेतु जाने वाले श्रद्धालुओं के लिये रेलवे विशेष ट्रेन चलाने जा रहा है। यह ट्रेन 1 जुलाई से शुरु होगी तथा सप्ताह में दो बार आनंद विहार, दिल्ली से उधमपुर तक चलेगी।” इसके अलावा वापसी के लिए भी स्पेशल ट्रेन की घोषणा की गई है, जो उधमपुर से आनंद विहार तक चलेगी। ये ट्रेनें गाजियाबाद, मेरठ सिटी जंक्शन, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, यमुनानगर जगाधरी, अंबाला कैंट जंक्शन, लुधियाना जंक्शन, जालंधर कैंट, पठानकोट कैंट और जम्मू तवी स्टेशन पर रुकेगी।

भारतीय रेल द्वारा जारी किया गया विज्ञापन

इन ट्रेनों में जनरल व स्लीपिंग वर्ग की सुविधा उपलब्ध होगी। इस बार अमरनाथ यात्रा पर इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकियों द्वारा हमले के मँडराते ख़तरे को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा की व्यवस्था की गई है। पुलवामा और अनंतनाग में हाल के दिनों में बड़े हमले हो चुके हैं। ये अमरनाथ यात्रा की रास्ते में ही आते हैं। ऐसे में, सुरक्षा को लेकर पहले से सतर्कता बरती जा रही है। इस बार की अमरनाथ यात्रा में 350 से भी अधिक अर्धसैनिक बलों की कम्पनियाँ तैनात किए जाने की तैयारी है।

TMC विधायक सुनील सिंह समेत 12 पार्षद होंगे BJP में शामिल, दिल्ली के लिए हुए रवाना

पश्चिम बंगाल में एक तरफ जहाँ डॉक्टरों के हड़ताल का मामला तूल पकड़ता जा रहा है, वहीं एक और बड़ी खबर आ रही है। दरअसल, लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) के नेताओं का भाजपा में शामिल होना लगातार जारी है। इसी कड़ी में अब बंगाल के नौपारा के टीएमसी विधायक सुनील सिंह ने ऐलान किया है कि वह 12 पार्षदों के साथ सोमवार (जून 17, 2019) को दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय में पार्टी में शामिल होंगे।

दिल्ली के लिए रवाना होने से पहले सुनील सिंह ने कहा, “पश्चिम बंगाल की जनता सबका साथ-सबका विकास चाहती है। दिल्ली में मोदी जी की सरकार है और हम चाहते हैं कि यही सरकार प्रदेश में भी बने। ताकि हम पश्चिम बंगाल का विकास कर सकें।”

इस बार के लोकसभा चुनाव में बंगाल में बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की है। 2014 में मात्र 2 सीटों पर सिमटी बीजेपी इस बार 18 सीटें जीत कर आई है। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद टीएमसी के 3 विधायक और 50 से अधिक पार्षद टीएमसी का साथ छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने बंगाल में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि चुनाव के नतीजों के बाद 40 विधायक भाजपा में शामिल होंगे। पीएम मोदी ने कहा था कि ये विधायक लगातार उनके संपर्क में हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के अलावा भाजपा के बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने भी कहा था कि टीएमसी विधायक किश्तों में भाजपा ज्वाइन करेंगे। उन्होंने कहा था, “जैसे सात चरणों में लोकसभा का निर्वाचन हुआ, वैसे ही (दूसरी पार्टियों के नेताओं का) भाजपा में शामिल होना भी सात चरणों में होगा। आज तो केवल पहला चरण था।” नेताओं के पलायन के साथ ही पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हत्याओं का दौर भी जारी है। टीएमसी के कार्यकर्ताओं द्वारा बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्याओं के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।

योगी से सीख सकते हैं नीतीश कुमार: गोरखपुर में AES से हुई मौतों को इस तरह किया नियंत्रित

बिहार के मुजफ्फरपुर में 100 से भी अधिक बच्चे ASE (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) के कारण जान गँवा चुके हैं और नीतीश सरकार व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इस त्रासदी को रोकने में नाकाम साबित हुए हैं। स्थानीय जनता के अनुसार, मरने वाले मासूमों की संख्या सरकारी आँकड़ों से कहीं ज्यादा है। पूरे उत्तर बिहार में फ़ैल चुके इस जापानी बुखार को लेकर प्रशासन अभी भी सुस्त बना हुआ है। आज से 2 वर्ष पहले तक योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक व धार्मिक कर्मभूमि रहा गोरखपुर भी जापानी इंसेफेलाइटिस की चपेट में था।

2017 से पहले उत्तर प्रदेश (खासकर गोरखपुर में) में प्रति वर्ष हज़ारों बच्चों की मौतें होती थीं। 2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री के रूप में उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाली, तब उनके सामने इससे निपटने की सबसे बड़ी चुनौती थी, जो पिछली सरकारों की निष्क्रियता के कारण उन्हें विरासत में मिली थी। अकेले उसी वर्ष 500 से अधिक बच्चे अपनी जान गँवा चुके थे। गोरखपुर व आसपास के 14 जिले इस बीमारी की चपेट में थे। 2017 में गोरखपुर के अस्पताल में कई बच्चों की मौत के बाद यह एक बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन गया था।

योगी आदित्यनाथ ने इस बीमारी से निपटने के लिए बड़े स्तर पर योजनाएँ तैयार कीं। इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन (WHO) और UNICEF जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ साझेदारी की और उनके साथ मिल कर एक एक्शन प्लान पर काम शुरू किया। एक बड़ा और व्यापक टीकाकरण अभियान शुरू किया गया। स्वास्थ्य व सफाई को लेकर जागरूकता फैलाने के तहत एक बड़ा अभियान चलाया गया। प्रभावित क्षेत्रों से सूअरों को अलग किया गया। फॉगिंग के लिए त्वरित प्रतिक्रया टीम को लगाया गया।

बच्चों के माता-पिता को घर-घर जाकर यह समझाया गया कि वे अपने बच्चों को मिट्टी की पुताई वाली जमीन पर न सोने दें। पीने का पानी के लिए इंडिया मार्क-2 वाटर पाइप का और हैंड पंप का प्रयोग करने की सलाह दी गई। इस बीमारी से जुड़े लक्षणों के बारे में हर परिवार को बताया गया और किसी भी आपात स्थिति में 108 एम्बुलेंस नंबर पर कॉल करने को कहा गया। इन सभी कार्यों के परिणाम भी अच्छे मिले। जापानी इंसेफेलाइटिस के कारण हुई मौतों में एक वर्ष के भीतर दो तिहाई की कमी आई। जहाँ 2017 में इस बीमारी से 557 जानें गई थीं, 2018 में यह आँकड़ा 187 रहा।

अगर 14 जिलों के आँकड़ों की बात करें तो 2017 में इस बीमारी को लेकर कुल 3817 मामले आए थे, 2018 में इसकी संख्या आधे से भी कम होकर 2043 पर पहुँच गई। जब इस बीमारी से पीड़ित होने वाले बच्चों की संख्या में कमी आई तो इसका अर्थ यह हुआ कि अस्पताल में भी कम बच्चे भर्ती होंगे। इससे डॉक्टरों को मृत्यु दर रोकने में मदद मिली। जहाँ 2017 में प्रत्येक 7 मरीज में से 1 की मृत्यु हो जाती थी, 2018 में हर 11 में से 1 बीमार की मृत्यु हुई। इस वर्ष फ़रवरी में जापानी इंसेफेलाइटिस की वजह से 1 भी बच्चे की जान जाने की बात सामने नहीं आई है।

अब चूँकि पूर्वी यूपी और उत्तरी बिहार के भौगोलिक हालात मिलते-जुलते हैं, बिहार सरकार को योगी प्रशासन से यह सीखना चाहिए कि उन्होंने कैसे इस बीमारी पर काबू पाने में सफलता हासिल की। हालाँकि, बिहार सरकार ने भी 2016 एवं 2017 में इस बीमारी से हुई मौतों में कमी लाने के प्रयास में सफलता पाई थी, लेकिन इस वर्ष हुई इतनी संख्या में मौतें सरकार की सुस्ती का परिणाम हैं।

BJP सांसद को नहीं मिली भोजपुरी में शपथ लेने की अनुमति, पूर्व केंद्रीय मंत्री ने जताई आपत्ति

आज सोमवार (जून 17, 2019) को संसद का नया सत्र शुरू हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित अन्य नव-निर्वाचित सांसदों को प्रोटेम स्पीकर वीरेंदर कुमार ने शपथ दिलाई। वहीं बिहार स्थित महराजगंज के सांसद जर्नादन सिंह सिग्रीवाल ने जब भोपजपुरी में शपथ ग्रहण करने की इच्छा जताई, तब उन्हें रोक दिया गया। लोकसभा महासचिव ने कहा कि नियमानुसार यह संभव नहीं है क्योंकि भोजपुरी भाषा संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल नहीं है और जो भाषाएँ इस अनुसूची में शामिल नहीं होती हैं, उसमें शपथ लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने इस नियम पर आपत्ति जताई।

सारण से सांसद चुने गए रूडी इस बात से नाराज़ थे कि भोजपुरी में शपथ लेने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसके बाद दोनों ही सांसदों ने हिंदी में शपथ ली। उधर दूसरी तरफ छिंदवाड़ा से कॉन्ग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए नकुल नाथ को पहली संसद तक छोड़ने के लिए ख़ुद उनके पिता व मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी साथ में पहुँचे। इन सभी सांसदों को कार्यवाहक अध्यक्ष वीरेंदर कुमार ने शपथ दिलाई। इस दौरान संसद पहुँचे प्रधानमंत्री मोदी ने एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विपक्ष को अपने संख्याबल को लेकर चिंता करने की ज़रुरत नहीं है, उनकी हर बात सरकार के लिए मूल्यवान है। उन्होंने कहा कि सभी पक्ष और विपक्ष को छोड़ निष्पक्ष होकर कार्य करें।

प्रधानमंत्री ने आशा जताई कि विपक्ष के नेतागण लोकसभा की बहसों में सक्रियता से भाग लेंगे और खुले मन से अपनी बात रखेंगे। पश्चिम बंगाल से जीत कर आए भाजपा सांसदों बाबुल सुप्रियो और देवाश्री चौधरी ने भी शपथ ली। इन दोनों के शपथ लेने के दौरान पूरे सदन में ‘जय श्री राम’ के नारे गूँजते रहे। सत्र शुरू होने के तुरंत बाद राष्ट्रगान हुआ और उसके बाद 2 मिनट का मौन रखा गया। सबसे पहले पीएम मोदी ने शपथ ली। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कार्यवाहक अध्यक्ष को शपथ दिलाई।

दो दिनों के अंदर सभी 542 सांसदों को शपथ दिलाई जाएगी। बता दें कि टीकमगढ़ से सांसद चुने गए वीरेंद्र कुमार का लोकसभा में लम्बा अनुभव है और 1996 से लेकर अब तक वे 7 बार सांसद चुने जा चुके हैं। सत्र शुरू होने से पहले हुई सर्वदलीय बैठक में सरकार ने विपक्ष से मत्वपूर्ण बिलों को पारित कराने के लिए सहयोग माँगा। सभी सांसदों के शपथग्रहण के बाद लोकसभा में स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का भी चुनाव होगा।

जिनके परदादा ने रखी थी UCO बैंक की नींव, आज वही घोषित हुए विलफुल डिफॉल्टर

बिड़ला सूर्या लिमिटेड के निदेशक यशोवर्धन बिड़ला को यूको बैंक ने रविवार (जून 17, 2019) को विलफुल डिफॉल्टर घोषित कर दिया। बिड़ला सूर्या लिमिटेड पर बैंक का 67.55 करोड़ रुपया बकाया है। यूको बैंक द्वारा दी गई सार्वजनिक सूचना में यशोवर्धन बिड़ला की तस्वीर भी प्रकाशित की गई।

नोटिस में बैंक ने बताया कि बिड़ला सूर्या लिमिटेड को मुंबई के नरीमन प्वाइंट कॉरपोरेट ब्रांच से 100 करोड़ रुपए की क्रेडिट लिमिट दी गई थी। इसमें 67.55 करोड़ का ब्याज न चुका पाने के कारण कंपनी को 3 जून को एनपीए घोषित कर दिया था। लेकिन नोटिस मिलने के बाद भी जब कंपनी ने कर्ज नहीं चुकाया तो बैंक ने निदेशक, प्रमोटर और गारंटर को विलफुल डिफॉल्टर घोषित कर दिया।

बता दें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के निर्देशों के अनुसार विलफुल डिफॉल्टर को बैंकों या वित्तीय संस्थानों की ओर से किसी प्रकार का कोई कर्ज नहीं दिया जाता। इसके अलावा कंपनी पर पाँच साल तक नए उद्यम लाने पर रोक लग जाती है। कर्जदाता कंपनी या फिर डायरेक्टर्स के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई भी शुरू कर सकते हैं।

जानने वाली बात ये है कि यूको बैंक की स्थापना यशोवर्धन के परदादा घनश्याम दास बिड़ला ने की थी। घनश्याम दास बिड़ला महात्मा गाँधी के भी करीब थे। उनका परिवार देश के प्रमुख औद्योगिक परिवारों में गिना जाता है जिन्होंने देश की आजादी के लिए गांधीजी के आह्वान के बाद आर्थिक मदद भी दी थी।