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सपा विधायक और UP सरकार में पूर्व मंत्री को गैंगरेप में हुई जेल

बिजनौर के नगीना से समाजवादी पार्टी के विधायक और पूर्व मंत्री मनोज पारस को गैंगरेप मामले में एमपी-एमएलए कोर्ट ने जेल भेज दिया है। 13 जून 2007 को दर्ज हुई रिपोर्ट के मुताबिक आरोपित विधायक ने पीड़ित महिला को राशन की दुकान दिलाने का भरोसा दिलाकर अपने घर बुलाया था। यहाँ उसने जयपाल, अस्सू और कुंवर सैनी के साथ मिलकर महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया था।

इस मामले में अन्य आरोपित जयपाल, अस्सू, कुंवर सैनी कोर्ट में सरेंडर करने के बाद से जेल में हैं, लेकिन विधायक न तो खुद कोर्ट में पेश हुए थे और न ही जमानत कराई थी। ऐसे में जब शनिवार को सपा विधायक एम-एमएलए कोर्ट में पेश हुए तो उन्हें न्यायिक हिरासत में लेकर जेल भेजने का आदेश दे दिया गया। उनकी ओर से दी गई जमानत अर्जी पर सुनवाई 4 जून को होनी है, तब तक मनोज पारस को जेल में ही रहना होगा।

बता दें अभी हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सपा विधायक द्वारा याचिका को खारिज किया था जिसमें मनोज पारस द्वारा मामले को बंद करने की गुहार लगाई गई थी। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के निर्देश पर मामला साल 2007 में आईपीसी के तहत नगीना थाने में दर्ज हुआ था। इस मामले में आरोपितों के खिलाफ गैर जमानती वारंट भी जारी किया गया था। हालाँकि बाद में आरोपितों की गिरफ्तारी पर उच्च न्यायालय रोक लगा दी थी।

इसके बाद एक जाँच अधिकारी ने आरोपित के ख़िलाफ़ 2011 में हलफनामा दर्ज करवाया था, लेकिन सही प्रक्रिया फॉलो न करने के कारण उसे प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया गया था। इसके बाद ये मामला उस समय सुर्खियों में आया जब दोबारा मनोज को 2012 में सपा से टिकट मिला और साथ ही उन्हें मंत्री भी बनाया गया।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक प्रवीण देशवाल का कहना है कि इस समय स्थानीय कोर्ट में पारस के ख़िलाफ़ कोई मामला पेंडिंग नहीं हैं क्योंकि 2017 में यूपी सरकार ने प्रावधान बनाया था कि एमपी और एमएलए से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई इलाहाबाद की स्पेशल कोर्ट करेगी, तब से ये मामला एमपी-एमएलए कोर्ट में पेंडिंग था।

साइबर ठगों ने देश के भूतपूर्व सबसे बड़े जज को लूटा, जानिए क्या है मामला

साइबर ठगों ने इस बार भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश को ही निशाना बनाया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आरएम लोढ़ा से एक लाख रुपए की ठगी का मामला सामने आया है। जालसाजों ने उनकी ईमेल आईडी हैक करने के बाद उनसे एक लाख रुपए ठग लिए। इस मामले में दिल्ली के मालवीय नगर थाना पुलिस ने शिकायत दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि मामले की शुरुआती जाँच के बाद आगे की कार्रवाई के लिए इसे साइबर सेल को सौंप दिया जाएगा। पूर्व सीजेआइ फिलहाल अपने परिवार के साथ एस-ब्लॉक, पंचशील पार्क में रहते हैं।

दरअसल, हुआ यूँ की रिटायर्ड जस्टिस लोढ़ा की आधिकारिक मेल आईडी पर 19 अप्रैल को दोपहर करीब 1:40 बजे सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त उनके एक परिचित जस्टिस बीपी सिंह की आधिकारिक मेल आईडी से एक ई-मेल आया। इस मेल में लिखा था कि रिटायर्ड जस्टिस सिंह के भतीजे को खून से सम्बंधित गंभीर बीमारी है और इलाज के लिए एक लाख रुपयों से अधिक की ज़रूरत है। राशि भेजने के लिए एक बैंक अकाउंट के विवरण भी भेजे गए, जिसे किसी सर्जन का बताया गया।

इसके बाद स्थिति को गंभीर समझते हुए रिटायर्ड सीजेआइ लोढ़ा ने एक लाख रुपए तुरंत उस बैंक खाते पर भेज दिए। इसके बाद 30 मई को जब जस्टिस बीपी सिंह से उनकी बात हुई तो पता चला कि उन्होंने ऐसा कोई मेल भेजा ही नहीं था। इसके बाद उन्हें एहसास हुआ कि उनके साथ ठगी हुई है। दरअसल, बदमाशों ने जस्टिस बीपी सिंह की आईडी हैक कर ली थी और उससे पूर्व सीजेआइ को मेल भेजा गया, जिसपर विश्वास करते हुए उन्होंने बताई गई राशि जमा करा दी। पुलिस के अनुसार, जिस व्यक्ति के खाते में रुपए ट्रान्सफर किए गए थे, उसका नाम दिनेश माली है।

बता दें कि लगातार डिजिटल हो रहे भारत में साइबर ठगी से निपटने के लिए पर्याप्त निगरानी व्यवस्था न होने के कारण बड़े से बड़े पदों पर बैठे लोगों से लेकर आम जनों तक, सभी इसके चपेट में आ जाया करते हैं। थानों में अक्सर शिकायतें आती हैं कि लोगों से इंटरनेट द्वारा रुपए ठग लिए गए और पुलिस के पास इससे निपटने के लिए संसाधन और स्किल नहीं होते। एक व्यापक व्यवस्था के रूप में स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक, सामान्य आपराधिक घटनाओं वाले हर थाने में साइबर पुलिस की मौजूदगी अब भारत की ज़रूरत बन गई है।

11 साल की शिवभक्त भारत में रहना चाहती है, कहती है- मोदी जी हमें आने दो

11 वर्षीय एलिजा वानात्को नामक पोलिश लड़की ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नए विदेश मंत्री एस जयशंकर को अपने हाथ से लिखा एक पत्र भेजा है, जिसमें एलिजा ने प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री से अपनी माँ के साथ भारत में रहने की इजाजत माँगी है। साथ ही इस पत्र में बच्ची ने भगवान शिव के प्रति अपने प्रेम, नंदा देवी की पहाड़ियों और गौ सेवा की खूबसूरत यादों के बारे में भी चर्चा की है।

बच्ची ने लिखा है कि वीजा की अवधि खत्म होने के बाद भी भारत में लंबे वक्त तक रहने के कारण उसे और उसकी माँ को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है। एलिजा ने पत्र में बताया है कि वो 6 साल की उम्र में भारत आई थी और तब से वह गोवा में ही रह रही थी। भारतीय न होने के बावजूद भी वो भारत को ही अपना घर मानती है। वो यहाँ वापस आना चाहती है। लेकिन, पिछले एक महीने से उनकी सुनवाई नहीं हो रही है।

पत्र में बच्ची ने लिखा है कि वो और उसकी माँ मार्था (जो एक फोटोग्रॉफर और कलाकर दोनों हैं) अपने वीजा को नवीनीकृत करवाने के लिए श्री लंका गए थे, लेकिन इसके बाद उन्हें भारत नहीं आने दिया गया। उनकी माँ
भारत में बी 2 बी वीजा पर लंबे समय से भारत में रह रहीं थी।

अब जब उन्हें ब्लैकलिस्ट होने के कारण भारत आने की अनुमति नहीं है तो ऐसे में मार्था को एलिजा के साथ थायलैंड में रहकर इंतजार करना पड़ रहा है। एलिजा और उनकी माँ इस समय कंबोडिया में हैं। उन्हें उम्मीद है कि उन्हें भारत आने की इजाजत जरूर दी जाएगी। एलिजा का कहना है कि वो अब हिंदू धर्म और उसकी मान्यताओं से पूरी तरह जुड़ चुकी है। इसलिए उसे इन सब चीज़ों की बहुत याद आती है।

अपने पत्र में बच्ची ने इस बात का जिक्र भी किया है कि वो भले ही अभी अपनी माँ के साथ है लेकिन फिर भी वो अपने पसंदीदा देश में बिताई अपनी पुरानी जिंदगी को बहुत याद करती है। वो कहती है कि वो जिन पशुओं की सेवा करती थी, वो उनके बगैर बहुत परेशान होंगे और वो खुद भी उनके बिना हर रात गुस्से और निराशा के साथ गुजार रही है।

एलिजा को भारत न आ पाने के कारण लगता है कि सब कुछ बर्बाद हो चुका है। वो रोज़ भगवान शिव और नंदा देवी से मदद के लिए प्रार्थना करती है। वो लिखती है कि उसने नरेंद्र मोदी और जयशंकर को पत्र इसलिए लिखा है क्योंकि ये लोग भारत के सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक हैं, जो उसकी और उसकी माँ की मदद कर सकते हैं। बच्ची विनती करती है कि उसे भारत में आने की अनुमति दी जाए और साथ ही उन्हें ब्लैकलिस्ट की सूची से हटाया जाए।

इसके अलावा बता दें ट्विटर के जरिए मार्था भी लगातार नरेंद्र मोदी और एस जयशंकर से मदद की गुहार लगा रही हैं। उन्होंने अप्रैल महीने में इसी तरह सुषमा स्वराज से भारत लौटने के लिए निवेदन किया था। इस दौरान उन्होंने दावा किया था कि ‘गलतफहमी के कारण’ उनके साथ ऐसा हो रहा है।

‘MP में बहुत अन्धकार है क्या, पता करो वहाँ कॉन्ग्रेस की सरकार है क्या’

मध्य प्रदेश में बिजली जाना आम हो गया है। इससे पहले ख़बर आई थी कि लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री कमलनाथ जब मतदान करने पहुँचे, तब अचानक से बिजली गुल हो गई। इसके बाद उन्हें वहाँ मौजूद मीडियाकर्मियों के कैमरे के प्रकाश में मतदान करना पड़ा था। नाराज़ मुख्यमंत्री ने इस मामले की जाँच तक बिठाने की बात कर दी। फ़्लैशलाइट में मतदान करने को मजबूर कमलनाथ के मतदान केंद्र पर पहुँचते ही लगभग आधे घंटे के लिए बिजली चली गई थी। अब मशहूर शायर राहत इन्दौरी ने भी राज्य में बिजली की समस्या से परेशान होकर अपना दर्द बयाँ किया है। राहत इन्दौरी ने ट्विटर के माध्यम से सीधा मुख्यमंत्री को टैग कर अपनी समस्या से अवगत कराया।

राहत इन्दौरी ने ट्विटर पर मुख्यमंत्री कमलनाथ, बिजली विभाग व विधायक प्रियव्रत सिंह को टैग करते हुए लिखा, “आजकल बिजली जाना आम हो गया है। आज भी पिछले 3 घंटों से बिजली नहीं है। गर्मी है, रमजान भी है‘मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत् वितरण कम्पनी लिमिटेड’ के इंदौर दफ्तर में कोई फोन नहीं उठा रहा है। कुछ मदद करें।” लोकप्रिय शायर की इस ट्वीट के बाद लोगों ने ख़ूब मज़े लिए। कई दिनों से वैसे भी सोशल मीडिया पर ये बात ख़ूब फ़ैल रही है कि कमलनाथ सरकार के सत्ता संभालने के बाद से मध्य प्रदेश में अचानक से इन्वर्टर की बिक्री बढ़ गई है।

अधिकतर यूजरों ने रहत इंदौरी के लोकप्रिय शेर “सरहदों पर बहुत तनाव है क्या, कुछ पता तो करो चुनाव है क्या” को लेकर उनपर निशाना साधा। बता दें कि रहत इंदौर अपने कार्यक्रमों में अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा को आड़े हाथों लेते रहे हैं। हाल ही में एक शेर उन्होंने पढ़ा था:

ज़मीर बोलता है ऐतबार बोलता है 
मेरी ज़ुबान से परवरदिगार बोलता है
मैं मन की बात बहुत मन लगा के सुनता हूँ 
ये तू नही है तेरा इश्तेहार बोलता है
कुछ और काम उसे याद ही नही शायद 
मगर वो झूठ बहुत शानदार बोलता है
तेरी ज़ुबान कतरना बहुत ज़रूरी है 
तुझे ये मर्ज़ है तू बार बार बोलता है

राहत इंदौरी ने यह शायरी अप्रत्यक्ष रूप से पीएम मोदी के लिए कही थी। कॉन्ग्रेस राज में बिजली की समस्या को लेकर लोगों ने रहत इंदौरी को शिवराज सरकार के ‘अच्छे दिन’ याद दिलाए।

‘यो यो फनी सिंह’ नाम के एक यूजर ने लिखा “प्रदेश में बहुत अंधकार है क्या, कुछ पता तो करो, वहाँ कॉन्ग्रेस की सरकार है क्या ..!!” इसके बाद एक अन्य यूजर ने राहत इंदौरी का नामकरण ‘आहत इंदौरी’ करते हुए लिखा, “भीषण गर्मी में पॉवर कट से अंधकार है क्या पता करो ताऊ, सूबे में कॉन्ग्रेस की सरकार है क्या“। एक अन्य यूजर ने सलाह दी कि अगर सेक्युलर सरकार बनाना है तो 3-4 घंटे बिजली की क़ुर्बानी देनी पड़ेगी।

प्रिय होम मिनिस्टर, आतंकियों की लाशें परिवार को सौंप कर उन्हें हीरो बनाना कब बंद होगा?

एक तरफ मजहबी उन्माद है जो मानता है कि एक पीढ़ी खप जाए, दो पीढ़ी खप जाए, तीन खपे, चार हो जाए, दो सौ साल लगें लेकिन हम अपना झंडा गाड़ेंगे। और दूसरी तरफ आपकी लड़ाई है कि कभी आप उन्हें बच्चा समझ कर छोड़ देते हैं, कभी रमज़ान में सीजफायर करके उन्हें फिर से संगठित होने का मौका देते हैं, कभी उनके आतंकी बच्चों की लाशों को सौंपते हैं परिवारों को ताकि आतंकियों को समर्थन देने वाला पूरा समुदाय 20-30 हज़ार की भीड़ बन कर आपको यह संदेश देता रहे कि एक पीढ़ी खप जाए, दो पीढ़ी खप जाए, तीन खपे, चार हो जाए, दो सौ साल लगें लेकिन हम अपना झंडा गाड़ेंगे।

अगर भारतीय सुरक्षा नीति इस हिसाब से चलती रही तो इसी तरह की खबरें हम पढ़ते रहेंगे कि इस साल 101 आतंकी मारे जा चुके हैं लेकिन नई भर्तियों से सुरक्षा बल चिंतित है। ये सुरक्षा नीति नहीं, ये तो प्रोटेक्शन देना है एक क़ातिल, आतंकी विचारधारा को जिसे आप मानवतावाद का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, और वहीं, उसी के मज़हब के तमाम नेता उसे ‘साहब’ कह कर बुलाने से लेकर ‘माटी के सपूत’ और पता नहीं क्या-क्या कहते फिरते हैं।

पहले पाँच साल समझ सकता हूँ कि प्राथमिकताएँ अलग थीं क्योंकि फर्जी मानवाधिकारों की लॉबी को भी देखना था, उनके नैरेटिव को भी काटना था, आतंकियों को रोकना भी था और उन लोगों को मौका भी नहीं देना था जो एक सामाजिक अपराध को राजनीति का रंग देकर वैश्विक मंच पर राष्ट्र की छवि बर्बाद करते हैं। यहाँ तक तो समझा जा सकता है, और उन पाँच सालों तक लोगों ने इंतजार किया, और आपको फिर से वोट देकर सत्ता दी कि कुछ घावों को कैंसर बनने से पहले ही सही दवाई दे दी जाए।

आतंकियों को लगातार मारते रहना, घर में घुस कर ब्लैकमेल करे तो घर को ही आग लगा देना, पैलेट गन से पत्थरबाज़ों को तितर-बितर करना, आफ्स्पा में ढिलाई न बरतना आदि वो नीतियाँ थीं जो पहले पाँच सालों में दिखीं, और काफी हद तक आतंकी गतिविधियों में कमी आई जिसके कारण कई बार बम विस्फोट से लेकर कई आतंकी घटनाएँ आम हुआ करती थीं। इसका भी क्रेडिट इसी सरकार को जाता है।

लेकिन, इस दूसरे कार्यकाल में इन आतंकियों को हीरो बनाने से रोकना एक प्राथमिकता होनी चाहिए। जिसने निर्दोषों को क़त्ल के लिए बंदूक उठा ली, वो मानव नहीं है। जो मानव नहीं है, उसके न तो अधिकार हैं, न परिवार। ऐसे दरिंदों को न सिर्फ बहुत क्रूर सजा मिलनी चाहिए, बल्कि अगर वो मुठभेड़ में मारा जाए तो उसकी लाशों को परिवार को सौंपने की जगह अनाम जगहों पर फेंक दिया जाना चाहिए। हाँ, यह भी ध्यान रहे कि उस आतंकी की लाश का एक टुकड़ा भी किसी जीव के मुँह में न जाए, क्योंकि वो उस जीव के अधिकारों का हनन होगा। उस लाश को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। पूरी तरह से जला देना भी एक उचित तरीके हो सकता है।

मेरे इन विचारों से कुछ लोग असहमत हो जाएँगे कि मैं लाशों को जलाने कह रहा हूँ। मुझे इसमें कोई समस्या नहीं दिखती क्योंकि आतंकियों का कोई मज़हब नहीं होता, तो उनकी लाशों को नष्ट करने के लिए जलाना, पानी में डुबाना या किसी निर्जन जगह पर फेंक देना भी एक बेहतर विकल्प है।

प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा करना ज़रूरी क्यों है? ज़रूरी इसलिए है कि ये आतंकी रक्तबीज साबित हो रहे हैं। बुरहान वनी को मारोगे तो ज़ाकिर मूसा आ जाएगा, मूसा को मारोगे तो कोई बिल्ला आ जाएगा, बिल्ला को मारोगे तो कोई टाइगर आ जाएगा। ये अनवरत चलता रहेगा। ये अनवरत इसलिए चलता रहेगा क्योंकि इनकी लाशों को, इनकी क़ब्रों को हमारी मानवीय नीतियों ने पर्यटन स्थल और हीरो का दर्जा दे दिया है।

जब एक राष्ट्र के तौर पर हमारी नीति साफ है कि कश्मीर जो हो रहा है वो आतंकी गतिविधि है, हमारे देश की अखंडता पर प्रहार की कोशिश है, तो फिर उसी नीति का हिस्सा नए आतंकियों को पैदा करने में मदद कैसे कर रहा है? आखिर हम इस बात को कैसे नकार रहे हैं कि इनकी लड़ाई कश्मीर या कश्मीरियत की नहीं, बल्कि इस्लामी ख़िलाफ़त की है? क्या इनकी लाशों के साथ चलने वाली भीड़ में आईसिस का काला झंडा नहीं दिखता?

पिछले पाँच सालों में जबसे सेना और सशस्त्र बलों ने, जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ, ऑपरेशन किए हैं, और लगातार आतंकियों को ढेर किया है, तब से इन आतंकियों की योजना बदल गई है। पहले ये कश्मीरी लोगों को नहीं मारते थे। लेकिन, जब इनके पास कुछ और करने को नहीं बचा तो इन्होंने न सिर्फ कश्मीरी सैनिकों को मारा, बल्कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के अफ़सरों को भी मारने लगे।

ज़ाहिर है कि ये लड़ाई कश्मीर के नाम तो नहीं ही लड़ी जा रही। ये लड़ाई तो सांकेतिक जीत के लिए है कि भारत के एक हिस्से पर इस्लाम का ‘अल्लाहु अकबर’ लिखा काला झंडा लहराया जा सकता है, बाकी भारत भी तैयार रहे। कश्मीर के आतंकी तो इसलिए लगातार अपनी जान दे रहे हैं ताकि इनके तथाकथित आंदोलन को बाकी लोग, जो दिल में भारत को इस्लामी ख़िलाफ़त के अंदर होते देखना चाहते हैं, एक उदाहरण के तौर पर देखें।

आप कश्मीरी हिन्दुओं को तो कश्मीर दे नहीं सके, कश्मीर को उसके अपने संविधान और दंड विधान से बाहर लाकर भारतीय संविधान और इंडियन पीनल कोड के नीचे तो ला नहीं सके, लेकिन हर वो काम किया है जिससे भारत-विरोधी भावना भड़कती रहे। जब हमारी नीति स्पष्ट है कि कश्मीर में जो हथियार के साथ आंदोलन कर रहे हैं, वो आतंकी हैं, तो फिर उनकी लाशों को परिवारों को किस हिसाब से दिया जाता है?

अब भारत की जनता ने दोबारा बहुमत देकर मोदी सरकार को कुछ वैसे वायदे पूरे करने की उम्मीद जताई है जो किन्हीं कारणों से पिछले पाँच सालों में पूरी नहीं हो सकी। 370 एक बेकार और मरी हुई चर्चा है, उसे ख़त्म करना आवश्यक है। 35A कई मायनों में राष्ट्रीयता और ‘एक भारत’ के विचार से बुनियादी तौर पर ही उल्टा है। इन्हें ख़त्म करके कश्मीरियों को मुख्यधारा में लाया जाए। अगर ऐसे कानून वहाँ रहेंगे तो आप खूब आईआईटी और आईआईएम खोल दीजिए, सेंट्रल यूनिवर्सिटी बना दीजिए, वहाँ जाएगा कौन?

आशा है कि नई सरकार, अपने इरादे स्पष्ट करते हुए, आतंकी को आतंकी कहे और उनके साथ वही व्यवहार करे जिससे वो जनमानस में कुछ भी बन जाएँ, हीरो तो न बनें। आज विरोध में खड़ी मीडिया पर से लोगों का विश्वास उठ चुका है और उनके नैरेटिव को अब कोई सीरियसली लेता नहीं। उन्हें पढ़ने और देखने वालों में से भी एक बड़ा हिस्सा उन्हें या तो बरनॉल देने जाता है, या फिर वहाँ दिल खोल कर उन्हें लताड़ता है।

इस लिहाज से भी यह मौका उचित है कि इस तरह की मीडिया की पूर्ण उपेक्षा करते हुए, मजबूत क़दम उठाए जाएँ ताकि लोकतांत्रिक भारत का लोकतंत्र सही मायनों में हर जगह स्थापित हो सके और इसकी अखंडता सुनिश्चित रहे। इसके लिए आतंकियों को आयकॉनिफाय करने की जगह, उन्हें लगातार गायब किया जाए। बस एक संख्या बता दी जाए कि इतने लोग आज मारे गए। वो लोग कौन थे, यह बात कम से कम तीन दशक तक क्लासिफाइड सूचना बन कर रहे। उनकी लाश कहाँ है, उसके साथ क्या किया जाए, ये सारी सूचना सार्वजनिक न की जाए।

इससे ‘गजवा-ए-हिंद’ का नारा लगाती, आतंकियों के जनाजों के चारों तरफ सफ़ेद टोपियों की मातमी भीड़ चिल्लाते हुए भारत-विरोधी नारे लगाने की बजाए सफ़ेद तख़्तियों पर गायब आतंकियों की फोटो के साथ किसी चौक पर कभी-कभार इकट्ठे दिखेंगे। वो दृश्य उन परिवारों का, उन समुदायों का, उन गाँवों का मनोबल तोड़ेगा जिसके लोग यह सोचते हैं कि एके सैंतालीस उठा कर किसी की हत्या कर देना नेक काम है। ये उनका मनोबल नीचे करेगा जो सोचते हैं कि आतंकियों के मानवाधिकार होते हैं, जो कॉलम लिखते हैं, जो इनके हिमायती बन कर कोरस में विलाप करते हैं।

अगर इन आतंकियों को सिर्फ एक संख्या के रूप में, साल के अंत में जारी किया जाएगा, और इनकी लाशों को ऊपर बताए तरीक़ों से निपटा जाएगा, तो रक्तबीज का रक्त ज़मीन पर नहीं गिरेगा। वो सेना के खप्पर में ही रहेगा, जिसे सेना जैसे चाहे निपट लेगी। हमारी सेना दुश्मनों की भी लाशों का सम्मान करती है, कश्मीरी तो फिर भी अपने हैं। उनके परिवारों को बता देगी आपका लड़का आतंकी था, वो अपनी तय जगह पहुँचा दिया गया है, आप अपने आप को संभालिए।

बारिश हेतु यज्ञ करने से नहीं रोक सकते, लोगों की आस्थाओं को तोड़ना हमारा काम नहीं: हाईकोर्ट

अदालत ने कहा है कि वह किसी की आशाओं और आस्थाओं को नहीं तोड़ सकती क्योंकि वे सफल हों या नहीं, उनसे जनता की भावनाएँ जुड़ी होती हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने बारिश के लिए किए जाने वाले यज्ञ के ख़िलाफ़ दायर याचिका को रद्द करते हुए ये निर्णय दिया। तमिलनाडु में HR विभाग के कमिश्नर ने एक सर्कुलर जारी करते हुए अच्छी बारिश के लिए यज्ञ करने को कहा था। ‘मक्कल सेती मैय्यम’ के संपादक और एक सामाजिक कार्यकर्ता ने इस बारे में अदालत में याचिका दाखिल की थी। अपनी याचिका में इन्होंने इस सर्कुलर को संविधान के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ बताया था। याचिका में कहा गया था कि यह हमारे देश द्वारा अनुसरण किए जाने वाली धर्मनिरपेक्षता या सेकुलरिज्म के ख़िलाफ़ है।

इस याचिका में दलील दी गई थी कि ये सर्कुलर Tamil Nadu Hindu Religious and Charitable Endowments Act, 1959 का उल्लंघन करता है। इस दौरान जस्टिस सीवी कार्तिकेयन और जस्टिस सीवी रामासामी की पीठ ने सबरीमाला मामले में जस्टिस इंदु मल्होत्रा द्वारा दिए गए जजमेंट का जिक्र किया। जस्टिस दीपक मिश्रा के उस निर्णय का भी जिक्र किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि धार्मिक क्रियाकलापों का अनुसरण करने पर कोई पाबन्दी नहीं है। अदालत ने कहा कि यह पूछना अप्रासंगिक है कि क्या अभ्यास तर्कसंगत या तार्किक है? साथ ही मद्रास हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि न्यायालयों द्वारा धर्म के मामलों में तर्कसंगतता की धारणा को लागू नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि यह याचिका धार्मिक आस्थाओं में विश्वास को तोड़ने के लिए दाखिल की गई है, शांति और सद्भाव बिगाड़ने का प्रयास है। अदालत ने कहा कि इसमें हस्तक्षेप करना उनका काम नहीं है, चाहे बारिश लाने के लिए वैज्ञानिक तरीका अपनाया जा रहा हो या फिर धार्मिक तरीका। पूजा या यज्ञ कर के बारिश लाना एक सफल तरीका है या यह असफल है, इस बात की जाँच करना अदालत का काम नहीं है। अदालत ने कहा कि वह हजारों-लाखों लोगों की आस्था तोड़ने का काम नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि सामान्यतः उसने ख़ुद को धार्मिक क्रियाकलापों और आस्थाओं में हस्तक्षेप करने से दूर ही रखा है।

अदालत ने याचिका को रद्द करते हुए आगे कहा:

“कृषि भूमि के एक छोटे से टुकड़े के साथ एक किसान, बारिश की कमी के कारण किसी भी फसल को उगाने में सक्षम नहीं होगा। वह आशा और विश्वास करेगा कि इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से उसे बचाने के लिए किसी दिन बारिश आएगी, जिस स्थिति से वह और उसका परिवार मजबूरीवश गुजर रहा है। इसके लिए वह भगवान से प्रार्थना करेगा। वह अगर ख़ुद पूजा करेगा तो हो सकता है उसके पास धन की कमी हो जाए। इसीलिए वह आसपास की मंदिरों में हो रही ऐसी पूजाओं में ख़ुद को सम्मिलित करेगा। अब अदालत ऐसे किसानों की आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती।”

अदालत ने कहा कि वह इस बारे में कोई राय नहीं दे सकती कि बारिश के लिए यज्ञ करना वैज्ञानिक है या फिर पूरी तरह से धार्मिक है।

इमरान खान, हिन्दुओं के धर्म-ग्रंथ लिट्टे बनाने का हुक्म नहीं देते, जबरदस्ती हमें अपने स्तर पर मत घसीटो

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने हिन्दुओं और हिंदुत्व (हिन्दू धर्म, न कि राजनीतिक विचारधारा) को इस्लाम से जोड़ते हुए बड़ा ही अजीब बयान दिया है। मक्का में आर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कंट्रीज़ (OIC) की बैठक में इमरान कहते हैं, “किसी ने हिन्दू धर्म को तो तमिल टाइगरों के बम धमाकों के लिए दोषी नहीं ठहराया, जापानी धर्म (शिंटो) को जापानियों के अमेरिकी जहाजों पर खुद को उड़ा लेने का दोषी नहीं ठहराया। तो इस्लाम पर यह ठप्पा क्यों?” साथ में यह भी जोड़ा, “मुस्लिम समाज दुनिया को सशक्त तरीके से इस बात का आश्वासन नहीं दे पाया है कि इस्लाम का दहशतगर्दी से कोई लेना-देना नहीं है?”

अलग-अलग रोड़े जोड़ के कुनबा मत बनाइए, इमरान ‘भानुमति’ खान

इमरान खान जिन तीन उदाहरणों को लेते हैं, पहली बात तो वह आपस में तुलना करने लायक ही नहीं हैं- लिट्टे ने जो कुछ किया, वह जातीय संघर्ष में किया (उसका कोई न बचाव कर रहा है, न ही किसी और को वैसा बनने की सलाह दे रहा है, लेकिन सत्य सत्य होता है), जापान के सैनिकों ने एक अंतरराष्ट्रीय युद्ध में अपने देश के लिए प्राणोत्सर्ग किया, और जिहादी जो करते हैं वह है लोगों की आँखों में धूल झोंक कर, उनके बीच पैठ बनाकर, घुल-मिलकर मज़हब के नाम पर, आस्था के नाम पर, जन्नत की उम्मीद में बेगुनाहों की जान ले लेना।

अगर लिट्टे की बात करें तो पहली बात तो लिट्टे-बनाम-सिंहली संघर्ष मज़हबी नहीं है, भाषाई/जातिगत है। लिट्टे वालों का पंथ तो हिन्दू धर्म का शैव पंथ है ही, श्री लंका के बौद्धों द्वारा माना जाने वाला और पालन किया जाने वाला बौद्ध धर्म भी हिन्दू आस्था के कई पुट लिए हुए है। दूसरी बात यह कि न ही हिन्दुओं द्वारा बौद्धों को, न ही बौद्धों द्वारा हिन्दुओं को आस्था के आधार पर मारा जा रहा था- सिंहली-बनाम-तमिल भाषाई मसला था। तीसरी बात, तमिल आतंकी खुद को शिव भक्त कहते भले हों, लेकिन न ही वे शिव महापुराण, शिव संहिता या और कोई ग्रंथ उठाकर बताते थे कि भगवान शिव ने उन्हें या उनके किसी नेता को गैर-शैवों (या सिंहली बौद्धों) की हत्या का आदेश दिया है, न ही जब वे खुद को बम से उड़ाते थे तो उनकी कल्पना में यह ख्वाब होता था कि महादेव उन्हें शिव लोक की 72 अप्सराएँ देंगे। और-तो-और, उनका लक्ष्य भी दुनिया भर को शैव बना देना, दुनिया से गैर-शैवों को मिटा देना, या अपने राज में गैर-शैवों के धर्म का प्रचार-प्रसार न होने देना नहीं था।

इसके उलट हर आतंकी मरते समय “अल्लाहू-अकबर” कहता है, उसका ब्रेन-वॉश मुल्ले-मौलवी ‘कुरान’ और ‘हदीस’ में लिखी बातों को सुनकर ही करते हैं, और आइएस के चंगुल से मुक्त हुई लड़कियाँ भी बतातीं हैं कि उनका बलात्कार और उनसे सेक्स-गुलामी भी इस्लाम के ग्रंथों का हवाला देकर ही कराई जाती थी। पुलवामा के दहशतगर्द का बाप उसे इस्लाम की राह पर शहीद मान फ़ख़्र करता है, सैयद अली शाह गीलानी साफ-साफ कहता है कि कश्मीर में दहशतगर्दी राजनीतिक नहीं, मजहबी संघर्ष के लिए है, इस्लाम का वर्चस्व स्थापित करने के लिए है। कश्मीर का आदिल अहमद एमबीए करने के बाद सीरिया क्यों चला जाता है? इस्लाम का जिहाद लड़ने

अब रही जापान की बात तो, इमरान जी, यह जान लीजिए कि…

तीसरा उदाहरण जो इमरान खान जापानियों का देते हैं, तो या तो वह खुद इतिहास में अनपढ़ हैं, या तो वह यह सोचकर वहाँ बोल रहे थे कि जाहिलों की जमात है, कुछ भी पढ़ा दो! जापानियों ने आत्मघाती हमले अमेरिकी जहाजों पर किए जरूर, पर वह जंगी जहाज थे, और समय खुले युद्ध का था- द्वितीय विश्व-युद्ध का। न ही जापानियों ने अमेरिका में ट्विन टावर उड़ाए, न ही पुलवामा की तरह छिप कर तब सैनिकों पर हमला किया जब कोई जंग नहीं चल रही थी। इसलिए इमरान खान के लिए बेहतर होगा कि वो दुनिया को उल्लू बनाना छोड़ें, मानें कि इस्लाम और दहशतगर्दी में सीधा संबंध है, बजाय दुनिया को अपने जैसा ही दिखाने की व्यर्थ कवायद के, और उसका क्या करना है, इस पर मनन-चिंतन करें।

चीन में रोज़ा के दौरान उइगरों को जबरन खिलाया जा रहा खाना, 30 लाख अभी भी नज़रबंद

चीन में उइगर मुस्लिम समुदा पर अत्याचार रमजान के दौरान भी थम नहीं रहा है। चीन की मस्जिदों में सिक्यूरिटी कैमरे लगाए गए हैं, नमाज़ पढ़ने आने-जाने वालों पर नज़र रखी जा रही है, मेटल डिटेक्टर्स से उनकी आने और जाने के समय जाँच की जा रही है और पुलिस लगातार लाठियाँ व हथियार लेकर गश्त लगा रही है। मुस्लिम इलाकों में होटलों को खुला रखने को कहा गया है और मुस्लिम डर के मारे ‘अस्सलाम वालेकुम’ बोलकर एक-दूसरे से सार्वजनिक रूप से बातचीत तक भी नहीं कर पा रहे हैं। ‘वर्ल्ड उइगर कॉन्ग्रेस’ के अध्यक्ष का कहना है कि स्कूलों से लेकर कार्यालयों तक खाने-पीने की वस्तुएँ जबरन दी जा रही है और मुस्लिम रोज़ा न रख पाएँ, इसको सुनिश्चित किया जा रहा है।

यहाँ तक कि मुस्लिमों के घरों में जाकर भी देखा जा रहा है कि कहीं वे नमाज़ वगैरह तो नहीं पढ़ रहे या अपने मज़हब की चीजों को तो नहीं प्रैक्टिस कर रहे। कैम्पों में 30 लाख के लगभग उइगरों को नज़रबंद रखा गया है। ‘द टेलीग्राफ’ के पत्रकार जब इन कैम्पों की सच्चाई जानने निकले तो उन्हें 2 बार अपहृत किया गया। उन्होंने जो फोटो क्लिक किए, उन्हें डिलीट करवा दिया गया। हाइवे चेकपॉइंट्स पर उइगर मुस्लिमों की डिजिटल तलाशी ली जा रही है और उनके सारे व्यक्तिगत डिटेल्स खंगालने के बाद ही उन्हें आगे बढ़ने दिया जाता है। मस्जिदों के ऊपर कम्युनिस्ट पार्टी के बैनर लगा दिए गए हैं।

एक उइगर मुस्लिम की पत्नी को ही कैम्प में डाल दिया गया और उसके दोनों बच्चों का पालन-पोषण करने वाले पिता ने कहा कि वो कब तक आजाद होगी, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इससे पहले भी ख़बर आई थी कि चीन में मुस्लिमों का चीनीकरण किया जा रहा है, जिसके तहत उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों का अनुसरण करने की अनुमति नहीं दी जाती। उन्हें जिन कैम्पों में रखा जाता है, चीनी सरकार उन्हें ‘स्किल ट्रेनिंग’ कैम्प बताती है। इन कैम्पों में रह रहे लोगों को जबरन इस्लामी रीति-रिवाजों से इतर चीनी और कम्युनिस्ट पार्टी की चीजें सिखाई जाती हैं।

इससे पहले हमनें बताया था कि चीन में उइगरों पर की जा रही कार्रवाई रमजान महीने में थमने का नाम नहीं ले रही है। इस्लाम के इस पवित्र महीने में चीन स्थित टकलामकान रेगिस्तान में हज़ारों की संख्या में मुस्लिम आया करते थे। यहाँ कुछ ऐसी मस्जिदें स्थित थीं, जहाँ 8 वीं शताब्दी के एक इस्लामिक योद्धा की याद में लोग नमाज़ पढ़ते थे। लेकिन, इस साल यह स्थल खाली पड़ा हुआ है।

‘द गार्डियन’ के एक ख़ुलासे के अनुसार, चीनी मुसलामानों के लिए हज की तरह महत्व रखने वाला ये स्थल आज खाली इसीलिए पड़ा हुआ है क्योंकि इसे ढहा दिया गया है। चीन ने इमाम आसीन दरगाह के गुम्बद को छोड़ कर इसके बाकी हिस्से को मिट्टी में मिला दिया है। यहाँ लगे झंडे और चढ़ावे गायब हो गए हैं। चीन में 36 मस्जिदें ढहा दी गई हैं।

‘जय श्रीराम’ के नारे से तिलमिलाई ममता, ख़ुफ़िया एजेंसियों को सौंपा यह नया काम

पश्चिम बंगाल में सूबे की सरकार ने ख़ुफ़िया एजेंसियों को एक नया कार्यभार सौंपा है, जो अटपटा होने के साथ-साथ थोड़ा हास्यास्पद भी है। पिछले काफ़ी समय से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ‘जय श्रीराम’ के नारे से काफ़ी आहत हैं। हद तो अब यह हो गई है कि ममता सरकार ने ख़ुफ़िया एजेंसियों को उन स्थानों का पता लगाने को कहा है जहाँ उन्हें देखकर ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए जाते हैं। अपने इस चिड़चिड़ेपन के इलाज के लिए ममता दीदी ने ख़ुफ़िया एजेंसियों का दरवाज़ा खटखटाया है।

टेलीग्राफ़ की ख़बर के अनुसार, ममता बनर्जी ऐसा मानती हैं कि उन्हें देखकर जो लोग ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाते हैं वो उन्हें उकसाने के लिए लगाते हैं। हालाँकि, अभी यह बात साफ़ नहीं हो सकी है कि ख़ुफ़िया एजेंसियों को सौंपा गया यह काम ज़मीनी तौर पर कैसे क्रियान्वित किया जाएगा। ख़बर के अनुसार, ममता बनर्जी अब जहाँ से भी गुज़रेंगी हो सकता है कि उस स्थान को अब पूरी तरह से खाली करा लिया जाए। आमतौर पर उस स्थान को पहले से ही खाली करा लिया जाता है जहाँ नेताओं के विरोध में नारेबाज़ी होने की गुंजाइश हो या फिर उन्हें काले झंडे दिखाए जाने की संभावना हो।

वहीं, दूसरी तरफ़ भाजपा ने ममता सरकार द्वारा ख़ुफ़िया एजेंसियों को सौंपे गए इस काम का कड़ा विरोध किया है। भाजपा, पश्चिम बंगाल सरकार के इस रवैये को दमनकारी नीतियों से प्रेरित मान रही है। शनिवार (1 जून) को भाजपा के सांसद अर्जुन सिंह ने तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर 10 लाख ‘जय श्रीराम’ लिखे कॉर्ड भेजने की बात कही थी।

वैसे तो ‘जय श्रीराम’ बोलना कोई अपराध नहीं है और इसलिए यह ग़ैर-क़ानूनी भी नहीं है। लेकिन, ममता बनर्जी इस नारे से वो इस क़दर आहत हैं कि ‘जय श्रीराम’ बोलने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने से भी नहीं चूकतीं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से फोन पर ‘हैलो’ बोलने की बजाए ‘जय बांग्ला’ और ‘जय हिंद’ बोलने का फ़रमान भी जारी किया था। ममता बनर्जी को ‘जय श्रीराम’ का नारा इतना नागवार लगता है कि वो तुरंत अपनी गाड़ी से उतरती हैं और नारा लगाने वालों को ख़ूब डाँटती-फटकारती हैं। कहने को तो ममता ने यह बात स्वीकारी थी कि वो बंगाली और बिहारी में कोई भेदभाव नहीं करतीं, लेकिन असलियत इससे परे है।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या की ख़बर लगातार सामने आती रहती हैं। 30 मई को 52 वर्षीय बीजेपी कार्यकर्ता सुशील मंडल की हत्या सिर्फ़ इसलिए कर दी गई थी क्योंकि वो प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण के एक दिन पहले पार्टी के झंडे सजा रहे थे और ‘जय श्रीराम’ का नारा लगा रहे थे।

रोज़ 17 लाख बच्चों का पेट भरने वाली संस्था को बदनाम करने के लिए ‘The Hindu’ का ज़हरीला प्रोपेगेंडा

अगर कोई अच्छा कार्य कर रहा है तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। कुछ लोगों को जलन होती है और वे किसी को लगातार अच्छा करता देखते हुए भी उसकी प्रशंसा नहीं करते। इनसे भी ऊपर वाले लेवल में वो लोग आते हैं जो अच्छे कार्यों में भी बुराइयाँ निकाल लेते हैं। देश की मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसी सिद्धांत पर काम कर रहा है, और ‘द हिन्दू’ ने अपनी मैगज़ीन में एक ऐसे प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाया है, जो हिटजॉब की सारी विशेषताएँ रखता है। दो-चार बच्चों से कुछ बातें की गईं और इसे साढ़े 4 लाख बच्चों की आम राय बना कर पेश कर दिया। जहाँ पूरे कर्नाटक की क़रीब 2814 स्कूलों और 4.43 लाख छात्रों की बात हो, वहाँ बमुश्किल 4 बच्चों व इक्के-दुक्के स्कूलों की स्थिति देख कर आम राय कैसे बनाई जा सकती है?

इसका तरीका ‘द हिन्दू’ से समझिए। जब पूरी दुनिया बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को खाना खिलाने के लिए इस्कॉन द्वारा संचालित ‘अक्षय पात्र फाउंडेशन’ (AFP) की तारीफ़ करती है, ‘द हिन्दू’ ने एक लम्बे-चौड़े लेख के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश की है कि संस्था अपने ‘हिन्दू विधि-विधान’ को बच्चों पर थोप रही है। यहाँ हम परत दर परत आगे बढ़ते हुए इस लेख की पोल खोलेंगे और देखेंगे कि कैसे एक संस्था को सिर्फ़ इसीलिए बदनाम करने की कोशिश की जा रही है क्योंकि उसे एक हिन्दू संस्था द्वारा चलाया जाता है। आपको बता दें कि ‘अक्षय पात्र फाउंडेशन’ को ‘हरे कृष्णा मूवमेंट’ वाली संस्था इस्कॉन चलाती है।

इस लेख की शुरुआत होती है एक बच्चे के व्यक्तिगत अनुभव से। बेंगलुरु सेंट्रल के एक स्कूल का बच्चा मिड डे मील की जगह घर जाकर दोपहर का खाना खाता है क्योंकि उसे स्कूल में दिया जाने वाला खाना ‘नीरस’ लगता है। एक अन्य छात्रा बताती है कि उसे घर का खाना ज्यादा अच्छा लगता है, इसीलिए वह घर पर ही खाती है। एक अन्य स्कूल की छात्रा घर से टिफिन ले कर आती है, वह भी स्कूल में नहीं खाती। कुछ बच्चों द्वारा ऐसा करने के पीछे इस लेख में यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि वे खाने में प्याज-लहसुन न दिए जाने के कारण ऐसा कर रहे हैं। आश्चर्य की बात यह कि इस निष्कर्ष को यूँ ही निकला गया है, न कोई आँकड़ा, न कोई रिसर्च, न कोई सर्वे।

एक अन्य निष्कर्ष यह भी निकाला गया है कि अक्षय पात्र फाउंडेशन ‘कथित तौर पर’ ऐसा मानता है कि प्याज-लहसुन तामसिक भोजन है और इसे साबित करने के लिए एक वॉलंटियर की दलील को पेश किया गया है। लेख में कथित एक्टिविस्ट्स को ख़ास जगह दी गई है, जो यह मानते हैं कि सरकार को एएफपी से करार ख़त्म कर किसी और को यह ज़िम्मेदारी दे देनी चाहिए। लेकिन, कोई विकल्प नहीं सुझाए गए हैं। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि शायद इतने वृहद् स्तर पर और संसाधनों से संपन्न होने के साथ शायद ही कोई और एनजीओ ऐसी सेवा दे पाए। इसी लेख में एक अन्य जगह पर जब यह सवाल कर्नाटक के मुख्य शिक्षा सचिव से किया जाता है, तो उनका जवाब गौर करने लायक है। उन्होंने कहा:

“अगर हम करार ख़त्म कर दें तो इतने सारे बच्चों को खाना कौन खिलाएगा? इसमें ढाँचागत समस्याएँ हैं। एक रात में हम इतने सारे किचन का निर्माण नहीं कर सकते और इतनी बड़ी संख्या में खाना बनाने वालों की व्यवस्था भी नहीं कर सकते। प्रशासन दार्शनिक दलीलों पर कार्य नहीं करता। मैंने उन एक्टिविस्ट्स को सीधा-सीधा बोल दिया है- उनके सर बादलों में घुसे हुए हैं, मैं ज़मीन पर रहता हूँ।”

अगर इस लेख में कर्नाटक के मुख्य शिक्षा सचिव उमाशंकर के इस बयान को पहले या दूसरे पैराग्राफ में जगह दे दी होती तो शायद इस लेख का कोई औचित्य ही नहीं बनता। लेकिन, बड़ी चालाकी से उनके इस बयान को भीतर रखा गया है। अगर कोई संस्था इतने वृहद् स्तर पर कार्य कर रही है और उसके ख़िलाफ़ आज तक कोई बड़ी शिकायत नहीं आई है, तो उसे अचानक से प्याज-लहसुन के बहाने निकाल बाहर किया जाए, इसमें नुकसान किसका है? देश भर के 15,000 से भी अधिक स्कूलों और 17 लाख से भी अधिक बच्चों को अपनी सेवा देने वाली संस्था के ख़िलाफ़ प्याज-लहसुन का विवाद खड़ा करना कहाँ तक जायज है?

पहली बात, सरकार का लक्ष्य स्कूलों में बच्चों को स्वादिष्ट खाना खिलाने का नहीं बल्कि उन्हें उचित न्यूट्रीशन और उचित कैलोरी वाला भोजन देने का है। इसी लेख में बताया गया है कि एपीएफ की भोजन मेनू को National Institute of Nutrition (NIN) और The Central Food Technological Research Institute (CFTRI) के पास जाँच के लिए भेजा गया। एनआइएन ने एपीएफ की मेनू से सहमति जताई और इसमें उन्हें कोई दिक्कत नहीं दिखीं। एनआईएन ने साफ़-साफ़ कहा कि जितनी मात्रा में न्यूट्रीशन सरकार द्वारा निश्चित की गई है, बच्चों को उतना ही दिया जा रहा है।

इसके अलावा जो बेसिक सामग्री सरकार द्वारा निश्चित की गई हैं, वो भी एपीएफ की मेनू में पूरी तरह मौजूद है। इतना ही नहीं, एनआईएन ने यह भी पाया है कि जितनी किलो कैलोरी और प्रोटीन की मात्रा निर्धारित की गई है, एपीएफ के खाने में उतने ही होते हैं और कभी-कभी तो उससे थोड़े-बहुत ज्यादा भी पाए गए लेकिन कम नहीं। ये सभी चीजें केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा निर्धारित की गई हैं और अक्षय पात्र फाउंडेशन इन सभी मानकों पर खरी उतरती है। अब इन कथित एक्टिविस्ट्स का क्या होना चाहिए? इसके बावजूद 10 संस्थाओं व 94 कथित विशेषज्ञों द्वारा कुप्रचार चलाया गया और एनआईएन पर ही आरोप मढ़ दिए गए। जैसा कि इस तरह के कथित विशेषज्ञों की आदत रही है, ये अंत में संस्थाओं को ही निशाना बनाना शुरू कर देते हैं।

एपीएफ बच्चों को सही मात्रा में न्यूट्रीशन और कैलोरी युक्त भोजन उपलब्ध करा रही है, सरकार द्वारा निर्धारित सामग्री प्रयोग में ला रही है, तो दिक्कत क्या है? क्या अब यह एक्टिविस्ट्स निर्धारित करेंगे कि बच्चों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं? इसी लेख में एक जगह एक बच्चा बताता है कि उसे अंडे पसंद हैं और लेखक सवाल खड़ा करता है कि बच्चों को अंडे क्यों नहीं दिए जा रहे। इसके अलावा चिकेन की भी चर्चा की गई है। क्या यह सब इसीलिए किया जा रहा है क्योंकि इसे एक वैष्णव संस्था द्वारा संचालित किया जा रहा है, जिसके कई मंदिर हैं और जो शाकाहार को प्राथमिकता देता है। क्या किसी संगठन के कर्ताधर्ता के वैष्णव संत होने के कारण उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता?

हो सकता है कि कुछ दिनों बाद सूअर के मांस में न्यूट्रीशन गिनाते हुए पूछा जाए कि बच्चों को रेड मीट क्यों नहीं दी जा रही है? अगर इसके लिए विरोध करना है तो निःस्वार्थ भाव से काम कर रही संस्था को नहीं बल्कि सरकारों को निशाना बनाइए। सरकार को कहा जाए कि वो बच्चों को प्याज-लहसुन में तल कर मांस-मछली और अंडे वाली मेनू क्यों नहीं दे रही, बच्चों को दूध, साम्भर और खिचड़ी क्यों दी जा रही है? किसी बीमारी के समय बच्चों को वो दवाएँ नहीं दी जातीं जो स्वादिष्ट हों, बल्कि वो दवाएँ दी जाती हैं जो उस बीमारी को ठीक करे। ठीक इसी तरह बच्चों के लिए मेनू उनके शरीर की स्वास्थ्य ज़रूरतों को ध्यान में रख कर बनाया जाता है, केवल स्वाद को लेकर नहीं।

कर्नाटक के मुख्य शिक्षा सचिव भी बताते हैं कि सरकार यह निर्धारित नहीं करती कि बच्चों को कौन सा भोजन देना है, सरकार यह निर्धारित करती है कि दिए जाने वाले भोजन में प्रोटीन, कार्ब्स इत्यादि की मात्रा कितनी होनी चाहिए, और एपीएफ इन सभी मानकों पर कार्य करते हुए बच्चों को पूर्ण हाइजेनिक भोजन उपलब्ध कराती है। मुख्य सचिव ने बताया कि भोजन में उचित व निर्धारित मात्रा में मौसमी सब्जियाँ, ताज़ी सब्जियाँ, हरे पत्तों वाली सब्जियाँ, करी पत्ता, जीरा इत्यादि इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जिसके कारण प्याज-लहसुन की ज़रूरत ही नहीं पड़ रही और ये सामग्रियाँ प्याज-लहसुन की कमी को अच्छी तरह पूरा करती हैं। लेकिन, एक प्रोपेगेंडाबाज़ एक्टिविस्ट का कुछ और ही कहना है।

वो पूछता है कि सरकार ने एनआईएन से यह क्यों कहा कि वह एपीएफ के खाने की जाँच कर यह बताए कि इसमें सरकार द्वारा निर्धारित नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं, सरकार को सीधा पूछना चाहिए, “तुम बच्चों को प्याज-लहसुन क्यों नहीं दे रहे हो?” इन्हीं एक्टिविस्ट्स के तथ्यों को साबित करने के लिए 4 बच्चों से बात कर इसे 4.5 लाख बच्चों की राय के रूप में पेश किया गया है। सबसे ज्यादा बड़ी बात तो यह कि बच्चों को दी जाने वाली मिड डे मील में हर एक समस्या के लिए इस लेख के लेखक व एक्टिविस्ट्स द्वारा प्याज-लहसुन न दिए जाने को ही ज़िम्मेदार बताया गया है। अगर बच्चे खाना फेंक देते हैं, तो प्याज लहसुन नहीं दिया जा रहा है, इसीलिए वो फेंक देते हैं। एक बच्चा खाना खाने घर जा रहा है, क्योंकि खाने में प्याज-लहसुन नहीं दिया गया, इसीलिए। कोई बच्चा खाना अधूरा छोड़ देता है, मतलब प्याज-लहसुन वाला टेस्ट नहीं है, इसीलिए।

पूरे लेख में एक भी बच्चे ने कहीं भी प्याज-लहसुन का नाम तक नहीं लिया है लेकिन एक्टिविस्ट्स के हवाले से ऐसा दावा किया गया है कि एपीएफ बच्चों पर ‘हिन्दू विचार’ थोप रही है। ऐसा कैसे हो सकता है? एएफपी का करार सरकार से हुआ है, राज्य सरकार के शीर्ष अधिकारी कह रहे हैं कि नियमों का उल्लंघन नहीं किया, तो दिक्कत क्या है? कल को 2-4 एक्टिविस्ट्स आकर यह कह दें कि बच्चों को शिमला मिर्च क्यों नहीं दिया जा रहा है, तो क्या इस पर भी बवाल होगा? सबसे अजीब बात यह है कि शाकाहार को इस लेख में बिना तथ्यों के कथित उच्च जाति से जोड़ा गया है। क्या कहीं ऐसा कोई सर्वे ‘द हिन्दू’ ने किया है, जहाँ ऐसा पता चला हो कि कथित उच्च जाति के लोग शाकाहारी होते हैं और अन्य शाकाहार पसंद नहीं करते?

बात सपाट है, बच्चों को पौष्टिक, हाइजेनिक और सरकार द्वारा निर्धारित भोजन दिया जा रहा है, वो भी एक संस्था द्वारा यह कार्य वृहद् और व्यापक स्तर पर किया जा रहा है। ये बातें किसी को भी चुभनी नहीं चाहिए। अगर एनजीओ के पीछे एक वैष्णव संस्था है, तो उसकी तारीफ़ होनी चाहिए क्योंकि वो सरकार का काम हल्का कर रहे हैं, उन्हें अंडे, मांस, प्याज-लहसुन वगैरह-वगैरह न देने के लिए उनकी आलोचना नहीं होनी चाहिए। एपीएफ और सरकार का करार आज का नहीं, कई वर्षों पहले का है। यह संस्था किसी भी आपदा और विपत्ति के समय क्षेत्र में पहुँच कर लोगों की सेवा करती है, मुट्ठी भर कथित एक्टिविस्ट्स की तरह गले में प्लाकार्ड लगा कर घूमना आसान है, जनता के बीच जाकर उनकी सेवा करना मुश्किल।

इस लेख में दावा किया गया है कि इस्कॉन ने इन बातों के जवाब में एक लम्बा मेल भेजा, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया और जवाब को दो पंक्तियों में समेट दिया गया है। क्या ‘द हिन्दू’ को इस बात का डर था कि इस्कॉन का पक्ष दिखाने से उनके प्रोपेगेंडा की पोल खुल जाएगी? मुट्ठी भर कथित एक्टिविस्ट्स की राय और 2-4 बच्चों से बात कर एक व्यापक स्थिति का आकलन नहीं किया जाता, इसके लिए बाकायदा रिसर्च और अध्ययन की ज़रूरत होती है। अगर आपको मैगज़ीन में जगह ही कवर करनी है तो सभी 4 लाख बच्चों से पूछें कि क्या उन्हें प्याज-लहसुन न दिए जाने से कोई दिक्कत है?

सारे मंदिर अपना धन फलाँ चीज में ख़र्च कर दें, लाखों-करोड़ों का पेट भरने वाली एक सफल वैष्णव संस्था प्याज-लहसुन खिलाने लगे और दलित कुक ही खाना बनाएँ, ये बातें आती कहाँ से है? लेख में एक्टिविस्ट्स के हवाले से कहा गया है कि दलित कुक को प्राथमिकता दी जाए, इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। क्या अब बच्चों को खाना खिलाने में भी जाति घुसाई जाएगी? खाना बनाने वाले को इसीलिए हायर किया जाएगा क्योंकि वो अच्छा खाना बनाते हैं या सिर्फ़ इसीलिए क्योंकि वह दलित हैं? कर्नाटक में 20% के करीब दलित हैं और इस लेख में कहा गया है कि राज्य में 15% लोग शाकाहारी हैं और इनमें से अधिकतर कथित उच्च जाति के हैं। ओबीसी और वोक्कालिंगा को मिला कर कुल आबादी का 27% के करीब होता है

फिर ‘द हिन्दू’ किस आधार पर यह लिख सकता है कि कथित उच्च जाति के लोग ही शाकाहारी होते हैं? क्या यह मान लिया जाए कि सामान्य वर्ग में आने वाले वोक्कालिंगा और ओबीसी को मिला दिया जाए तो इनमें 55% से अधिक लोग शाकाहारी हैं? अगर ऐसा नहीं है तो दलितों व अनुसूचित जातियों के लोग भी शाकाहारी हैं। फिर किस आधार पर यह कहा गया कि दलित शाकाहारी नहीं होते? यह तो चॉइस का मामला है। दलित परिवार हो या सामान्य वर्ग का, हो सकता है कि परिवार में कोई शाकाहारी हो और कोई नहीं हो। इसे जाति के नाम पर स्टीरियोटाइप कर देना अनुचित है, ख़ासकर बिना सबूत के।

यह एक प्रोपेगेंडापरस्त लेख है। इसमें दलितों व सामान्य वर्ग के बीच खाई पैदा करने की कोशिश की गई है। इसमें एक सफल संस्था को बिना सबूत इसीलिए बदनाम करने का प्रयास किया गया है, क्योंकि उसके पीछे एक हिन्दू संगठन है। हिन्दुओं में विभाजन पैदा करने के लिए दलित कुक की बात की गई है। यह लेख नहीं है, जहर है। ऐसा जहर, जिसमें बच्चों को घसीटा जा रहा है, उनके भोजन को लेकर अपना कुटिल हित साधा जा रहा है। ज़हर फैलाने का आसान उपाय है कि आप किसी भी ABC में जाति घुसेड़ दीजिए और दलितों के साथ अन्याय होने की बात कह दीजिए। जैसे, इंडियन क्रिकेट टीम में दलित खिलाड़ी क्यों नहीं हैं? इसी तरह इस लेख में भी तथ्य नहीं हैं, आँकड़े नहीं हैं, इस्कॉन की लम्बी प्रतिक्रिया को दो पंक्तियों में समेट दिया गया है। ऐसे ज़हरीले लेख से सावधान।