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‘अच्छा वाला ओवैसी’ एक छलावा है, दोनों भाई ही एक ही विकृत मानसिकता के शिकार हैं

आज़म खान के बेहूदे बयानों को अगर कोई बेहतर शब्दों से टक्कर देता है तो वो हैं मजहब विशेष की नई आवाज़ असद-उद-दीन ओवैसी। ये ओवैसी अकबरुद्दीन के ब्रो हैं जिन्होंने ‘पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा देने पर’ ‘वो’ क्या-क्या कर सकते हैं उसकी एक झलक देने की कोशिश की थी। लेकिन लोगों ने कहा कि ये वाला ओवैसी लम्पट है, इसका ब्रो असद जो है, वो समझदार है।

लोकिन जब आपकी राजनीति मुस्लिम ध्रुवीकरण से चले, और उसमें भी मोदी विरोध का तड़का लगता रहे, तो फिर बयानबाजी में तर्क और मानवीय संवेदना की हदों को पार करना आम बात हो जाती है। असद ओवैसी का ताजा बयान यही दर्शाता है कि नेताओं में मज़े लेने की प्रवृत्ति इतनी प्रबल हो चुकी है कि वो अपनी संवेदना को कहीं परचून की दुकान पर छोड़ आते हैं।

हाल ही में ख़बर आई थी कि भारतीय वायुसेना का एक मालवाहक विमान AN 32 खराब मौसम के कारण रडार से गायब हो गया। उसके बाद कल उसके मलबे के मिलने की ख़बर आई। ऐसा बताया जा रहा है कि ख़राब मौसम में जहाज़ पहाड़ी से टकरा कर क्षतिग्रस्त हुआ। हमारे तेरह वायुसैनिक अभी तक लापता हैं। हृदय नहीं चाहता कि ऐसा मान लूँ लेकिन तर्क यही है कि हमारे वीर अफसर और जवान इस दुर्घटना में शायद बलिदान हो गए।

जब भी ऐसी कोई ख़बर आती है तो लगभग हर भारतीय, धर्म-जाति-क्लास स्टेटस से परे, प्रार्थना करता है कि वो कहीं सुरक्षित मिल जाएँ। अभी भी, जब तक हमारे पास उनके बलिदान हो जाने की पुष्टि नहीं हुई है, तो हम सोचते हैं कि शायद वो जंगलों में कहीं ज़िंदा होंगे और अपने साथियों के आने का इंतज़ार कर रहे होंगे। जिस इलाके में यह विमान क्षतिग्रस्त हुआ है वो दुर्गम है, खोजी दल भी वहाँ जाने में सक्षम नहीं है क्योंकि अभी भी मौसम सही नहीं हुआ है।

इन मौक़ों पर भी छप्पन इंच की बात करने वाले गिरोह के लोग आ जाते हैं कि कहाँ है मोदी, क्यों दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं जहाज़? ऐसे लोग यह बात भूल जाते हैं कि ऐसी दुर्घटनाएँ बस हो जाती हैं, उनसे आप बच नहीं सकते। वैश्विक लिहाज़ से भी देखें तो भारतीय वायु सेना के विमानों के क्षतिग्रस्त होने का प्रतिशत बहुत कम है। इसलिए, इसे एक प्रकृति का कोप कहा जा सकता है, सरकारी या सैन्य ग़लती नहीं।

ऐसे में ओवैसी का जो बयान आया है वो बेहद ख़राब है। जब एयर फ़ोर्स के हवाई खोज अभियान को मौसम के कारण सफलता नहीं मिल रही थी तो वायुसेना ने पाँच लाख रुपए के इनाम की घोषणा की ताकि कोई ग्रामीण व्यक्ति उसकी सूचना दे सके। ऐसा भी नहीं होता कि मौसम ख़राब है और एक लापता विमान की खोज में तीन और विमान वैसे ही मौसम में भेज दिए जाएँ, और वो भी क्षतिग्रस्त हो जाए। इसके लिए मौसम के बेहतर होने से लेकर उस इलाके के मिजाज़ तक को ध्यान में रख कर योजना बनाई जाती है। इसलिए, धैर्य और इंतज़ार ही हमारे वश में होते हैं।

ओवैसी ने वायु सेना के इस घोषणा पर कहा कि मोदी से पूछ लेते क्योंकि उनको तो रडार की बहुत जानकारी है, और वो तो दुश्मनों के इलाके तक में जहाज़ भेज कर एयर स्ट्राइक करते हैं। वायु सेना को तो मोदी को फोन कर लेना चाहिए था, उनके पाँच लाख बच जाते। इस बयान की क्या ज़रूरत थी, मुझे नहीं पता। अभी तो चुनाव भी नहीं हैं कि कहा जाए कि चुनावी जुमलेबाज़ी है।

शायद, मोदी के दोबारा जीतने पर ये कुंठा बाहर आ रही है। दूसरी बात यह है कि रडार के मामले में मोदी ने जो कहा वो तो वैज्ञानिक रूप से भी सही साबित हो चुका है। हालाँकि, इस मामले में ओवैसी का इस तरह से हमला बोलना यही दिखाता है कि उन्हें उन जवानों की कितनी फ़िक्र है या भारतीय सेना को लेकर उनमें कितनी संवेदना है।

अब, नेता हैं तो यह कह कर भी बच जाएँगे कि उनके बयान को संदर्भ से हटा कर बता दिया गया है लेकिन मुझे ऐसे बयानों में संदर्भ की ज़रूरत कहीं नहीं दिखती। ये बयान विशुद्ध रूप से पोलिटिकल प्वाइंट बनाने के लिए दिए जाते हैं ताकि उनके समर्थकों में ख़ुशी की लहर चल जाए कि उनके नेता ने तो मोदी की कह के ले ली!

इस बयान से ओवैसी या उनके तरह के लोगों ने यह भी जताया है कि अनभिज्ञता और अज्ञान तब हावी हो जाते हैं जब आपके मन में घृणा का स्तर बहुत ज़्यादा हो। मोदी को उन मुद्दों पर घेरिए जहाँ उसकी ग़लती हो। मोदी सरकार की नीतियों पर बयानबाज़ी कीजिए। मोदी सरकार के बजट पर घेरिए। सही आँकड़े और तर्क लाकर घेरिए। लेकिन यूनिट के वो वायुसैनिक जो अपने साथियों के लौटने के इंतज़ार में हैं, उस सेना को अपनी घृणा की राह में मत लाइए।

ऐसा करने से सेना या मोदी को नुक़सान नहीं होगा। मोदी ने तो दिखा दिया कि राष्ट्रवाद भी चुनाव का मुद्दा हो सकता है और सेना पर सवाल करने वाले नेताओं को जनता जवाब दे चुकी है। इसलिए नुक़सान घूम-फिर कर आपका ही होगा क्योंकि आपकी वैचारिक नग्नता सबके सामने खुले में आ जाएगी।

ओवैसी जैसे लोगों का भारतीय राजनीति में होना ज़रूरी है। इसके दो कारण हैं। पहला तो यह है कि ऐसे लोग जब भी बोलते हैं तो समझदार लोग जान जाते हैं कि कैसे नेता या कैसी पार्टी से दूरी बना कर रखनी है। दूसरी यह कि जब तक ऐसे लोग बयान देते रहेंगे, इस विचारधारा को व्यापक कवरेज मिलेगी और लोग बेहतर नेताओं को सत्ता में रखेंगे।

इसलिए, चाहे जितना अजीब लगे सुनने में, आज़म खान और ओवैसी जैसे नेताओं की बयानबाज़ी भारतीय राजनीति की ज़रूरत है। ये लोग जितना ज़हर उगलेंगे, राजनीति में लोगों की भागीदारी उतनी ही बढ़ेगी और लोगों के पास एक ख़ास विचारधारा को नकारने के लिए कई विकल्प उपलब्ध होंगे।

गैंग रेप आरोपित सपा मंत्री के घर समेत दिल्ली से यूपी तक 22 ठिकानों पर CBI ने की छापेमारी

अवैध खनन मामले में समाजवादी पार्टी में मंत्री पद पर रहे गायत्री प्रजापति के निवास स्थान समेत लगभग 22 ठिकानों पर CBI ने छापेमारी की। इस दौरान उनके अमेठी स्थित घर में CBI के क़रीब आधे दर्जन अधिकारी मौजूद थे। बता दें कि गायत्री प्रजापति का निवास स्थान अमेठी के आवास विकास कॉलोनी में है।

ख़बर के अनुसार, CBI इस मामले में प्रजापति के भतीजे से भी पूछताछ कर रही है। इसके अलावा सिंचाई विभाग में घोटाले को लेकर कई स्थानों पर CBI ने छापे मारे हैं। दरअसल, खनन घोटाले में लगभग 22 जगहों पर छापेमारी की गई है, जिसके तहत गायत्री प्रजापति के तीन ठिकानों पर भी छापे मारे गए हैं। गायत्री प्रसाद सपा सरकार में खनन मंत्री रह चुके हैं। उन पर अवैध खनन के भी आरोप हैं। साथ ही वो महिला के साथ गैंग रेप मामले में भी आरोपित हैं और फ़िलहाल जेल में बंद हैं। अगले महीने की 8 तारीख को उनकी जमानत पर सुनवाई होनी है।

एक अन्य ख़बर के अनुसार, CBI द्वारा अवैध खनन के मामले में 11 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया जा चुका है। सीबीआई ने हमीरपुर जिले की पूर्व कलेक्टर और आईएएस अधिकारी बी. चंद्रकला, खनिक आदिल खान, भूवैज्ञानिक/खनन अधिकारी मोइनुद्दीन, समाजवादी पार्टी के नेता रमेश कुमार मिश्रा, उनके भाई दिनेश कुमार मिश्रा, राम आश्रय प्रजापति, हमीरपुर के खनन विभाग के पूर्व क्लर्क संजय दीक्षित, उनके पिता सत्यदेव दीक्षित और रामअवतार सिंह के नाम प्राथमिकी में शामिल हैं।

BJP कार्यकर्ताओं पर ममता की पुलिस ने बरसाई ताबड़तोड़ लाठी, वॉटर कैनन, आँसू गैस…

पश्चिम बंगाल में बुधवार (जून 12, 2019) को एक और भाजपा कार्यकर्ता का शव मिलने के कारण प्रदेश में तनाव काफ़ी बढ़ गया है। भाजपा कार्यकर्ता ममता सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरकर पुलिस मुख्यालय की ओर आगे बढ़ रहे थे। इन कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए पुलिस ने बिपिन बिहारी गांगुली स्ट्रीट पर लाठीचार्ज किया और आँसू गैस के गोले फेंके। साथ ही कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए वॉटर कैनन का इस्तेमाल भी किया गया।

गौरतलब है बुधवार को बंगाल में तनाव और भाजपा कार्यकर्ताओं में आक्रोश उस समय बढ़ गया जब मालदा में 2 लापता भाजपा कार्यकर्ताओं के शव मिले। कार्यकर्ताओं की लगातार होती हत्या से भाजपा कार्यकर्ताओं में गुस्सा और भड़क गया। लोग ममता सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरकर नारेबाजी करने लगे। लालबाजार में बीजेपी ने मार्च निकाला। साथ ही पुलिस मुख्यालय का घेराव भी किया।

इस दौरान पुलिस और नाराज़ कार्यकर्ताओं के बीच जमकर ईंट-पत्थर भी चले। बढ़ते तनाव को देखकर पूरे शहर में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। भाजपा कार्यकर्ता प्रदर्शन के दौरान जय श्री राम के नारे भी लगा रहे हैं।

कमलनाथ की सरकार गिराने के लिए दिग्विजय और सिंधिया ने किया संपर्क: कैलाश विजयवर्गीय

मध्य प्रदेश में किसान आक्रोश रैली को संबोधित करते हुए भाजपा के मुख्य सचिव कैलाश विजयवर्गीय ने एक बड़ा खुलासा किया। विजयवर्गीय ने रैली के दौरान बताया कि कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुरेश पचौरी ने उन्हें मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार गिराने के लिए संपर्क किया था।

रैली के दौरान कैलाश विजयवर्गीय ने कहा, “दिग्विजय सिंह और उनके दो विधायकों ने मुझे संपर्क किया और कहा कैलाश जी, अगर आप चाहें तो सरकार गिराई जा सकती है। इस पर मैंने जवाब दिया कि मैं सरकार गिराना नहीं चाहता। इसके बाद सिंधिया जी के लोगों ने मुझसे संपर्क किया कि वो प्रदेश में जालसाज़ कमलनाथ की सरकार गिराना चाहते हैं। उन लोगों ने कहा कि हम आपके साथ हैं। फिर, सुरेश पचौरी के लोगों ने मुझसे संपर्क किया कि वो सरकार को गिराना चाहते हैं।”

विजयवर्गीय ने रैली संबोधन के दौरान कहा कि मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपनों के साथ ही जालसाजी की, इसलिए पार्टी के कई दिग्गज़ नेता उनके ख़िलाफ़ हैं। उन्होंने बताया कि कमलनाथ के सभी ओएसडी (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) के पास पैसा गिनने की मशीन है। भाजपा मुख्य सचिव ने इस दौरान कहा कि बीते दिनों जितने तबादले मध्य प्रदेश में हुए, उतने देश में कहीं भी नहीं हुए। विजयवर्गीय ने दावा किया कि मध्य प्रदेश में पद बेचे जाते हैं। उन्होंने इस दौरान एक पुलिस अधिकारी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें बताया था कि तबादले के लिए उससे 25 लाख की घूस ले ली गई और उसका तबादला भी नहीं किया गया।

गौरतलब है कमलनाथ के मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने के बाद से चीजें कॉन्ग्रेस के पक्ष में होती नहीं दिखीं। गत वर्ष कमलनाथ की जीत के बाद मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को जन आक्रोश का सामना करना पड़ा। प्रदेश में कॉन्ग्रेस किसानों का लोन ही माफ़ नहीं कर पाई, जिसका वादा करके उन्होंने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी । इसके अतिरिक्त अप्रैल महीने में कमलनाथ के सहयोगियों के आवास पर हुई रेड में भारी मात्रा में कैश बरामद हुआ था।

सबरीमाला के पास की 5 एकड़ जमीन चर्च के कब्जे में, हिंदुओं की आस्था पर केरल सरकार की चोट

केरल की कम्युनिस्ट सरकार की कथित मदद से ईसाई चर्च पर अब सबरीमाला मंदिर से जुड़े ‘पवित्र वनों’ का अतिक्रमण करने का आरोप लगा है। न्यूज़ पोर्टल ऑर्गनाइज़र के अनुसार, केरल में इस स्थान को ‘पूनकवनम’ कहा जाता है।

ऑर्गनाइज़र के अनुसार, मलयालम अख़बार जन्मभूमि की एक ख़बर बताती है कि इडुक्की ज़िले के सबरीमाला जंगलों के एक हिस्से पांचालिमेडु के पास वनभूमि का बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत इस पूरे क्षेत्र को ऐसा माना गया था जिसे पारिस्थितिक रूप से संरक्षण की आवश्यकता है।

पांचालिमेडु (Panchalimedu), स्थानीय हिंदुओं के लिए एक पवित्र स्थान है, जिसका नाम पांचाली/ द्रौपदी के नाम पर रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि 12 साल के वनवास के दौरान वो पांडवों का निवास स्थान था। त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड के तहत एक प्राचीन भुवनेश्वरी मंदिर भी अतिक्रमित भूमि के पास स्थित है। ऐसा माना जाता है कि चर्च कथित तौर पर राज्य के समर्थन से कब्ज़ा करके सरकार और वनभूमि को ज़ब्त करने की अपनी सामान्य रणनीति को दोहरा रहा है।

चिंताजनक मुद्दा यह है कि चर्च ने पहले से ही एक बोर्ड स्थापित कर रखा है और वन क्षेत्र में एक आर्कियन भी है जो यह दावा करता है कि यह स्थान ईसाई तीर्थस्थल है। रिपोर्टों से पता चलता है कि इसका केंद्र बिंदु सबरीमाला मंदिर है, जो पिछले सात वर्षों से धर्मांतरण लॉबी के रडार पर है।

चार दशक पहले, ईसाई संगठनों ने नीलक्कल में सबरीमाला भूमि को हड़पने का प्रयास किया था, जिसमें दावा किया गया था कि उन्होंने 57 A.D में यीशु के प्रचारक संत थॉमस द्वारा स्थापित एक पत्थर का पता लगाया था। पुजारी (ईसाई) ने साइट पर एक ईसाई चर्च बनाने का प्रस्ताव पेश करते हुए अपने दावे पर ज़ोर दिया। इस पर हिंदुओं के कड़े विरोध के बावजूद, सरकार ने कैथोलिक चर्च को लगभग 5 एकड़ जमीन मुफ़्त में सौंप दी।

केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने इस मुद्दे पर अनिश्चित रूप से अब तक चुप्पी साधे रखी है, जबकि सबरीमाला के विरोध के दौरान यह बात स्पष्ट हो गई थी कि यह मुद्दा हिंदुओं से जुड़ा हुआ है। कथित तौर पर, मुन्नार में Pappathichola से इसी तरह के अतिक्रमण की सूचना मिली है, लेकिन राजस्व अधिकारियों ने इसे हटा दिया। इतना होने के बावजूद, राज्य सरकार ने एक बार फिर से अपने क़दम आगे बढ़ाए और मुख्यमंत्री विजयन व अन्य सीपीएम नेताओं के हस्तक्षेप के बाद वहाँ क्रॉस को फिर से स्थापित कर दिया गया।

जेल में बंद नक्सलियों को निर्दोष बताने वाले फादर स्टेन स्वामी के घर छापेमारी

भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में पुलिस ने नई कार्रवाई की है। झारखण्ड की राजधानी राँची स्थित नामकुम बगीचा में कथित सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी के ठिकाने पर छापेमारी की। यह कार्रवाई महाराष्ट्र पुलिस और एटीएस ने की। छापेमारी टीम ने फादर के ठिकाने से कंप्यूटर हार्ड डिस्क सहित कई अन्य कागजात भी ज़ब्त किए। इस मामले में उनके यहाँ दूसरी बार छापा पड़ा है। उससे पूछताछ भी की गई है। इससे पहले 28 अगस्त, 2018 को भी फादर स्टेन स्वामी के घर में छापेमारी हुई थी। ताज़ा कार्रवाई के लिए मंगलवार (जून 11, 2019) की शाम ही महाराष्ट्र पुलिस की टीम राँची पहुँच गई थी। बुधवार के दिन सुबह होते ही छापेमारी शुरू कर दी गई।

छापेमारी के दौरान स्थानीय पुलिस भी मौके पर मौजूद थी। मीडिया को फादर के घर के बाहर ही रोक दिया गया था। इससे पहले पिछले वर्ष जब फादर के यहाँ छापेमारी की गई थी, तब उसके घर से एक लैपटॉप, दो टैब और कुछ सीडीज बरामद की गई थीं। इन सबके अलावा कुछ अहम दस्तावेज भी पुलिस के हाथ लगे थे। फादर ने छापेमारी टीम के सामने काफ़ी नखरे दिखाए थे। जब पुलिस ने उन्हें सर्च वारंट थमाया था, तब उन्होंने उस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। फादर का कहना था कि यह सर्च वारंट मराठी में है और उसे मराठी नहीं आती। इसके बाद पुलिस को सर्च वारंट का अनुवाद करना पड़ा था, तब उसने हस्ताक्षर किए थे।

फादर स्टेन स्वामी ख़ुद को एक सामाजिक कार्यकर्ता बताता है और आदिवासी क्षेत्रों में वह अक्सर सक्रिय रहता है। पिछले कई दशकों से वह आदिवासियों के बीच सक्रिय रहा है। वह मानवाधिकार की बातें भी करता है और इसे लेकर सरकारों को घेरता रहा है। वह नक्सलियों का प्रखर समर्थक है। वह ख़ुद दावा करता रहा है कि लगभग 3000 निर्दोष लोगों को जेल में नक्सली बता कर बंद रखा गया है और उसके लिए उसनें अदालत में पीआईएल दाखिल कर रखी है। भीमा कोरेगाँव मामले में पुलिस ने कई नक्सलियों व उनके समर्थकों को गिरफ़्तार किया था। इनमें कई ऐसे थे, जो ख़ुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं।

बताते चलें कि वर्ष 2018 में पेशवा बनाम अंग्रेज युद्ध के 200वें साल का जश्न मनाने के लिए भारी संख्या में दलित समुदाय के लोग जमा हुए थे। जश्न के दौरान दलित और मराठा समुदाय के बीच हिंसक झड़प हो गयी थी, जिसके बाद हिंसा भड़क गई थी। स्टेन स्वामी व अन्य कथित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उस दौरान भड़काऊ भाषण दिया था, इसी मामले में फादर स्टेन के खिलाफ देशद्रोह का मामला भी दर्ज किया गया था। स्टेन स्वामी पर महाराष्ट्र के नक्सली संगठन अलगार परिषद को समर्थन देने के भी आरोप लगे हैं।

आज़म चड्डी खान की ज़रूरत है इस देश को, ऐसे लोगों को ज़िंदा रखा जाना चाहिए

आज़म खान और असदुद्दीन ओवैसी, दोनों ही, कथित तौर पर पढ़े लिखे लोग माने जाते हैं। माने ही जाते हैं, क्योंकि इनके बयानों से लगता तो नहीं कि वास्तव में पढ़े-लिखे हैं। एक विरोधी नेत्री के अंडरवेयर का रंग बताने से लेकर ग़ैरक़ानूनी उर्दू गेट को ढाहने पर मजहब को बीच में ले आता है, दूसरे की तो पूरी राजनीति ही यह झूठ बताने में जाती है कि सरकारी नीतियों का लाभ ख़ास समुदाय को नहीं मिल रहा है।

हाल ही में दोनों ने बड़े अजीब बयान दिए हैं। पहले आज़म खान की बात करते हैं जिनका दिमाग ज़्यादा ढीला मालूम पड़ता है। अपनी और अपने पार्टी के अस्तित्व को बचाने के लिए, मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति का वर्षों से सहारा लेकर बचने वाले आज़म खान, जो हर इस्लामी आतंकी द्वारा किए गए हमले पर चुप रहते हैं, आज मदरसों के उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा का उदाहरण देते हुए कहा है कि मदरसों से गोडसे और प्रज्ञा जैसे लोग नहीं निकलते।

ये बिलकुल सही बात है क्योंकि मदरसों में अमूमन हिन्दू धर्म को मानने वाले नहीं जाते, तो वहाँ से गोडसे या प्रज्ञा जैसे प्रकृति तो छोड़िए, नाम वाले भी निकल आएँ तो आश्चर्य की ही बात होगी। फिर मदरसों में जाते कौन हैं? क्या मदरसों में ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा बुलंद करते हुए बाज़ारों में फटने वाले लोग जाते हैं? क्या मदरसों में सड़कों पर 500 रुपए के लिए शुक्रवार की नमाज़ के बाद पत्थरबाज़ी करने वाले सात-आठ साल के बच्चे जाते हैं? क्या सेना की गाड़ियों पर पत्थर, डंडे, रॉड से लेकर बम और रॉकेट लॉन्चर से हमला करने वाले मदरसों में जाते हैं?

मैं बता नहीं रहा, मैं पूछ रहा हूँ कि आज़म खान जैसे नेता जब पूरे इतिहास से दो नाम निकाल पाते हैं, और उन्हें किसी मजहबी स्कूली व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश करते हैं, तो आप ऐसे चुटकुलों पर हँस भी नहीं सकते क्योंकि ये चुटकुला कोई कुणाल कामरा टाइप का सस्ता कॉमेडियन नहीं मार रहा, ये चुटकुला एक क़द्दावर नेता मार रहा है जो 30 साल से ज़्यादा समय उत्तर प्रदेश की विधायिका का सदस्य या कैबिनेट मंत्री बन कर गुज़ार चुका है।

अगर आज़म खान की बात करें और मदरसों को ले आएँ तो आज़म खान पहले यही बता दें कि ऐसी कौन सी शिक्षा मदरसों में दी जाती है, या नहीं दी जाती है कि ख़ास समुदाय की मात्र एक प्रतिशत लड़कियाँ बारहवीं के बाद ग्रेजुएशन कर पाती हैं? क्या इसे ख़ास समुदाय पर फेंका जाए या फिर मदरसों को तंत्र पर जहाँ के बाद आज के दौर में भी लड़कियों को ग्रेजुएशन तक नहीं करने दिया जाता?

ये सारे आतंकी क्या आरएसएस के स्कूलों में पढ़ते थे जिनके गुनाह साबित हो गए और जिन्हें फाँसी मिल गई? ये मजहबी उन्माद क्या हार्वर्ड में पढ़ाया जाता है कि काले झंडे पर इस्लाम का नाम लिखने वाले लोग भारत की गलियों में उगते और डूबते रहते हैं? ये मजहबी शिक्षा क्या रामकृष्ण मिशन या सरस्वती शिशु मंदिर में मिलती है जहाँ एक समुदाय के अल्लाह और पैग़म्बर के नाम पर बेगुनाहों की जान लेने में आतंकी हिचकिचाते नहीं?

फिर गोडसे का नाम क्यों? गोडसे ने जो किया, उसे उसकी सजा मिली। साध्वी प्रज्ञा पर केस चल रहा है, और अगर वो गुनहगार है तो उसे इसी देश की कोर्ट सजा देगी जिसने सुबह के चार बजे तक अपने दरवाज़े आतंकी की फाँसी रोकने के लिए खोले हैं। और कोई नाम है तो आज़म खान ले आएँ, उसका भी समुचित जवाब दिया जाएगा।

लेकिन आज़म खान अपनी भी घटिया शिक्षा का उद्गम स्थल बता देते ताकि हमें पता तो चलता कि कारगिल को फ़तह करने वाले सैनिकों में मजहब लाने के पीछे की पढ़ाई किस जगह पर होती है। वो बता देते कि किस मदरसे में उन्होंने ऐसी बेहतरीन शिक्षा पाई जहाँ बच्चों की आँखें और विचार इतने बौने हो जाते हैं कि वो स्त्रियों के अंडरवेयर का कलर तक मालूम कर लेते हैं। वो बता देते कि किस मजहबी शिक्षा की जड़ें इतनी खोखली हैं जो मजहबी बयानबाजी में इतना आगे निकल जाता है कि संभल की रैली में समुदाय विशेष को मुज़फ़्फ़रनगर दंगों का बदला लेने को उकसाता है?

आज़म खान की पहचान ही इस बात से है कि वो निहायत ही घटिया बातें बोलते हैं। वो अगर बेहूदगी न करें तो देश को पता भी न चले कि खुद को समुदाय विशेष का ज़हीन नेता मानने वाला, और प्रोजेक्ट करने वाला, ये आदमी किस दर्जे का धूर्त है। ये वही आदमी है जो प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पत्नी के अलग-अलग रहने को लेकर घृणित बयान देता है कि जो अपनी पत्नी के साथ न रह सका वो देश के साथ कैसे रहेगा।

अब ये तो पता चले कि ये मदरसा छाप हैं या फिर संघ के विद्यालयों में इनकी ऐसी घटिया सोच विकसित हुई है। आज़म खान जैसे नेता ही मजहब विशेष के प्रति फैली दुर्भावना के लिए ज़िम्मेदार हैं। ये व्यक्ति पेरिस में हुई इस्लामी आतंकी घटना को ज़ायज ठहराता है क्योंकि कहीं और किसी दूसरे देश ने पहले समुदाय विशेष को ऐसा करने को उकसाया।

ऐसे आदमी सिर्फ इसलिए खुले में घूम रहे हैं क्योंकि ये नेता हैं और हमारी सरकारी व्यवस्था में ऐसे लोग इस तरह से बोल सकते हैं। ये वैचारिक दंगाई है जो मज़हब के नाम पर लोगों को उकसाता है, और चाहता है कि दंगे हों ताकि इनकी दुकानें चलें। अगर ऐसा नहीं है तो सरकार द्वारा मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने को लिए बनाई जा रही नीति का स्वागत करने की जगह ये महामूर्ख इसमें गोडसे और प्रज्ञा कहाँ से ले आता है?

आज़म खान जैसे लोग कभी नहीं चाहते कि उनका समुदाय बेहतर शिक्षा पाए क्योंकि मदरसों में अगर दुनिया के समानांतर शिक्षा मिलने लगेंगी तो कोई क्यों पत्थर लेकर सड़क पर खड़ा हो जाएगा? कोई शरीर में बम बाँध कर मज़हब के नाम पर खुद को क्यों उड़ा देगा? शिक्षा बेहतर सोच विकसित करती है। शिक्षा का उद्देश्य मानवता की भलाई होता है, लेकिन उसी शिक्षा के नाम पर अगर मजहबी उन्माद की धीमा ज़हर छोटे बच्चों में डाला जाए तो वो कट्टरपंथी बनेगा और उसे एक मशीन की तरह, अपने कुत्सित विचारों को अमल में लाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

अगर ऐसा नहीं होता तो पत्थरबाज़ी का कलंक किसी एक मज़हब के लोगों के सर पर नहीं होता। अगर ऐसी शिक्षा नहीं दी जाती तो सात साल के बच्चों के चेहरे पैलट गन के छर्रों से नहीं बंधे होते। अगर मजहबी उन्माद न बोया जा रहा होता तो आरडीएक्स से भरी गाड़ी सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले से अब्दुल अहमद डार नहीं मिलता। अगर इस्लाम की हुकूमत लाने की पढ़ाई इन मदरसों में नहीं दी जा रही होती तो हर साल लगभग दो सौ की दर से ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे और ख़िलाफ़त की राह में इस्लामी आतंकी नहीं मर रहे होते।

गोडसे और प्रज्ञा तो दो नाम हैं। मेरे पास तो इसी शिक्षा पद्धति से जुड़े लोगों के इतने नाम हैं कि उन्हें व्यक्तिवाचक संज्ञा की जगह जातिवाचक रूप में बताना पड़ रहा है। लेकिन आज़म खान जैसों का रहना बहुत ज़रूरी है इस देश में। ये लोग अगर नहीं रहेंगे तो समाज के वो नकारात्मक आदर्श गायब हो जाएँगे जिन्हें देख कर माँ-बाप अपने बच्चों को कह सकेंगे कि देखो बच्चे, ऐसा इन्सान मत बनना।

ओवैसी की बेहूदगी पर चर्चा दूसरे आर्टिकल में होगी।

बूढ़े माँ-बाप के लिए नीतीश सरकार द्वारा कोई नया क़ानून नहीं, 2007 के अधिनियम में किया सिर्फ संशोधन

मीडिया में यह चलाया जा रहा है कि बिहार सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों को लेकर नया कानून बनाया है, जिसमें पुत्र-पुत्री द्वारा उनका भरण-पोषण या देखरेख ठीक से न करने की स्थिति में उन पर कार्रवाई की जा सकेगी। आपको बता दें कि तकनीकी रूप से यह कोई नया कानून नहीं है। केंद्र सरकार द्वारा 2007 में लागू किए गए अधिनियम को ही नीतीश सरकार ने कुछ बदलावों के साथ लागू किया है। जैसे, पूर्व में बेटे या बेटियों द्वारा प्रताड़ित किए जाने वाले माता-पिता को न्याय के लिए जिलों के परिवार न्यायालय में अपील करने जाना होता था। वहाँ पर सुनवाई प्रधान न्यायाधीश के स्तर पर होती थी। नए नियमों के मुताबिक, अब माता-पिता जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित अपील अधिकरण में अपील करेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि अब से डीएम ही मामले की सुनवाई करेंगे।

वर्ष 2007 में “माता–पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007” को संसद में पारित किया गया था और उसी वर्ष दिसम्बर में राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बाद इसे “भारत का राजपत्र (गैजेट ऑफ इंडिया)” में शामिल किया गया था। बिहार सरकार के अंतर्गत आने वाले राज्य समाज कल्याण विभाग ने इसमें कुछ संशोधन सुझाए थे, जिस पर अमल करने के बाद नीतीश कुमार ने इसे लागू करने की घोषणा की है। इससे पहले सितम्बर 2012 में बिहार सरकार ने अधिसूचना जारी करते हुए इस अधिनियम को लेकर बनाई गई नियमावली को राज्यपाल की मंज़ूरी के बाद लागू किया था।

इस अधिनियम के अंतर्गत अगर पुत्र या पुत्री अपने माता-पिता की देखरेख नहीं करते हैं तो शिकायत के बाद उन पर कार्रवाई की जा सकती है। अगर वो अपना पक्ष रखने के लिए उपस्थित नहीं होते हैं तो सम्बंधित अधिकारी एकपक्षीय कार्रवाई के लिए स्वतंत्र होंगे। इस अवसर पर नीतीश कुमार ने कहा, “आज के बदले सामाजिक परिवेश में अपने बच्चों को परवरिश देने वाले माता-पिता को सामाजिक के साथ-साथ क़ानूनी संरक्षण देना सरकार का भी कर्तव्य है। पूरे देश में बिहार संभवत: ऐसा पहला राज्य होगा जहाँ यह क़ानून लागू किया जा रहा है।“

इसीलिए, जैसा कि मीडिया द्वारा कहा जा रहा है कि सज़ा का प्रावधान नया क़ानून बना कर किया गया है, ऐसा कुछ भी नहीं है। इस अधिनियम में कार्रवाई का प्रावधान पहले से ही था और यह अधिनियम 2007 से ही मौजूद है। नीतीश सरकार ने बस इसमें संशोधन किया है, जो समाज कल्याण विभाग द्वारा सुझाया गया था। अतः, इस अधिनियम की नियमावली में बिहार सरकार की तरफ़ से बदलाव किया गया है, इसे बिहार सरकार द्वारा नए सिरे से नहीं तैयार किया गया है। सामाजिक सुधार की दिशा में कार्य कर रहे नीतीश कुमार के लिए शराबबंदी, बाल विवाह रोकथाम, दहेज़ प्रथा पर प्रहार के बाद यह अगला क़दम है।

‘मदरसों में गोडसे और प्रज्ञा ठाकुर जैसी शख्सियत नहीं पैदा होती’

समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने मंगलवार (जून 11, 2019) को मदरसों की शिक्षा प्रणाली में कंप्यूटर और गणित को शामिल करके उसे मुख्यधारा में लाने के फैसले पर विवादस्पद बयान दिया।

आजम खान ने महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे और भाजपा की नवनिर्वाचित सांसद प्रज्ञा सिंह का जिक्र करते हुए कहा, “मदरसों की प्रकृति गोडसे या प्रज्ञा सिंह ठाकुर जैसी शख्सियतें पैदा करने वाली नहीं हैं, अगर सरकार मदरसों की मदद करना चाहती है तो उनके लिए बिल्डिंग बनवाए और सुविधाएँ बढ़ाई जाएँ।”

गौरतलब है कि आजम खान का ये बयान सरकार के उस फैसले के बाद आया है जिसमें सरकार ने तय किया है कि देश भर के मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए मदरसों के शिक्षकों को विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से प्रशिक्षण दिलवाया जाएगा, ताकि वे मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, कंप्यूटर आदि दे सकें।

मीडिया में आईं खबरों के मुताबिक आजम खान ने इस फैसले पर केंद्र को निशाने बनाते हुए कहा, “मदरसों में धार्मिक शिक्षा दी जाती है… साथ ही वहाँ अंग्रेज़ी, हिन्दी तथा गणित भी पढ़ाया जाता है। यह हमेशा से होता रहा है, अगर आप मदद करना चाहते हैं, उनका स्तर सुधारिए। मदरसों के लिए इमारतें बनवाइए, उन्हें फर्नीचर और मिड-डे मील उपलब्ध करवाइए।”

आजम खान के मुताबिक मदरसों को हमेशा मिड-डे मील से महरूम रखा गया है। उनका कहना है कि सरकार आधुनिक मदरसे की बात करती है। वजीफा देने की बात तो करती है, लेकिन साथ ही सरकार इंस्टीट्यूशन को खत्म कर रही है। अपनी बातचीत में उन्होंने जौहर यूनिवर्सिटी का जिक्र किया, उन्होंने कहा कि ले-देकर एक अल्पसंख्यक संस्थान बचा है और बीजेपी सरकार उसके पीछे पड़ी हुई है कि किस तरह उसे बर्बाद किया जाए।

आजम खान का कहना है कि मदरसों में गोडसे और प्रज्ञा ठाकुर जैसी शख्सियत पैदा नहीं की जाती। पहले सरकार को इन्हें रोकना चाहिए। सरकार को इस बात का ऐलान करना चाहिए कि गोडसे की विचारों को आगे बढ़ाने वाला लोकतंत्र का दुश्मन माना जाएगा।

‘मैं टूट गया हूँ’: अहमद और खान के परिवार को ₹1-1 करोड़, अंकित के पिता को दिया वादा तोड़ा केजरीवाल ने!

दिल्ली के एक फ़ोटोग्राफर थे – अंकित सक्सेना। पिछले साल फरवरी में उनकी मुस्लिम गर्लफ्रेंड के परिवार द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई थी। दरअसल, अंकित जिस लड़की से विवाह करना चाहते थे वो मुस्लिम सम्प्रदाय से थीं और उनकी प्रेमिका के घरवाले इस विवाह के ख़िलाफ़ थे। इसके चलते अंकित की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। तब यह मामला बहुत जोर-शोर से उछला था, राजनीतिक रोटियाँ भी सेंकी गई थी। इस मामले में ताज़ा समाचार यह है कि अंकित के पिता यशपाल सक्सेना ने दिल्ली सरकार के ख़िलाफ़ अपनी निराशा व्यक्त की है, क्योंकि वो अपने वादे पर खरी नहीं उतरी।

समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुए, अंकित के पिता ने कहा कि उन्हें दिल्ली सरकार से कोई भी मुआवज़ा नहीं मिला। अंकित की हत्या हो जाने के बाद उन्हें बताया गया था कि उन्हें क़ानूनी और वित्तीय सहायता मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सबसे पहले दिल्ली सरकार द्वारा उन्हें 5 लाख रुपए मुआवज़ा देने का वादा किया गया था। बाद में, दिल्ली के सीएम ने मुआवज़ा बढ़ाने का वादा किया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं। इस पर अंकित के पिता ने कहा, “मैं टूट गया हूँ।”

यशपाल सक्सेना ने कहा कि दिल्ली सरकार को कई रिमाइंडर भेजने के बावजूद केजरीवाल सरकार ने अब तक अपना वादा पूरा नहीं किया। उन्होंने सवालिया होते हुए पूछा, “मुझे मुआवज़ा नहीं दिया जा रहा है, क्योंकि मैंने घटना को सांप्रदायिक नहीं होने दिया? मैं दो समुदायों के बीच प्रेम और सद्भाव क़ायम करना चाहता था। क्या मुझे इसके लिए दंडित किया जा रहा है?”

दिल्ली के एक फ़ोटोग्राफर अंकित सक्सेना की उनकी मुस्लिम प्रेमिका के परिवार द्वारा बेरहमी से हत्या कर दी गई थी क्योंकि मुस्लिम परिवार ने उनके अंतर-धार्मिक प्रेम संबंध को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद, लड़की की माँ, मामा और नाबालिग भाई को इस क्रूर अपराध के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया था।

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में दायर चार्जशीट में यह स्पष्ट किया कि हत्या पूर्व नियोजित थी। इस बात का भी पता चला कि लड़की का परिवार हिंदू लड़के से प्रेम करने के कारण उसके साथ सख़्ती से पेश आ रहा था। ग्राउंड रिपोर्ट में भी लड़की के परिवार की धार्मिक कट्टरता को उजागर किया गया है, जिसमें लड़की की माँ एक कट्टर मुस्लिम महिला है, जो अंतर-धार्मिक संबंध के ख़िलाफ़ थी।

यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 303 (हत्या), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाने) और 34 (आम इरादे) के तहत अंकित की प्रेमिका के पिता अकबर अली, छोटे भाई, मामा मोहम्मद सलीम और अकबर अली की पत्नी शहनाज़ के ख़िलाफ़ यह मामला दर्ज किया गया था।

इस घटना ने देश को झकझोर दिया था। अंकित और उसके परिवार के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से संवेदनाएँ भेजी गई थीं। दिल्ली में एक शोक समारोह आयोजित की गई थी, जिसमें एक प्रार्थना सभा भी शामिल थी। इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भाग लिया था। हालाँकि, जब परिवार ने अपने घर के एकमात्र कमाऊ इंसान को खो देने की भरपाई करने के लिए उनसे मुआवज़े की माँग की, तो केजरीवाल प्रार्थना सभा को बीच में ही छोड़ कर चल दिए थे।

ऊपर कपिल मिश्रा के वीडियो में आप देख सकते हैं कि केजरीवाल ने पूर्व में मृत एनआईए अधिकारी तंजील अहमद और एनडीएमसी के कानूनी सलाहकार एमएम खान के परिवार के सदस्यों को 1 करोड़ रुपए का मुआवज़ा देने की घोषणा की थी। ऐसे में उनके लिए अंकित के परिवार को मुआवजा देना कोई नई बात नहीं होती। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इससे यह सवाल उठता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अंकित सक्सेना के परिवार से अपना वादा निभाने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं?

अंकित की मुस्लिम प्रेमिका के परिवार वालों को इन दोंनों के अंतर-धार्मिक संबंध स्वीकार नहीं था। लेकिन अंकित सक्सेना के पिता, यशपाल सक्सेना तब सांप्रदायिक सौहार्द्र का चेहरा बन गए थे, जब उन्होंने सभी से अपील की थी कि उनके बेटे की मुस्लिम प्रेमिका के परिवार द्वारा हत्या को सांप्रदायिक रंग न दिया जाए। इतना ही नहीं, उन्होंने पिछले साल रमजान के दौरान एक अंतर-धार्मिक इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था, जिसमें कई सारे ‘सामाजिक कार्यकर्ताओं’ ने भाग लिया था। हालाँकि, इतना सब कुछ सहने के डेढ़ साल बाद, वह अभी भी न्याय का इंतजार कर रहे हैं।