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माँ की कसम खाकर बेगूसराय में कन्हैया कुमार के लिए वोट माँग रहे जिग्नेश मवाणी

सीपीआई के टिकट पर कन्हैया कुमार बेगूसराय से उम्मीदवार हैं। बेगूसराय सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला होने वाला है। एक तरफ आरजेडी बेगूसराय सीट से तनवीर हसन को मोर्चे पर उतार चुकी है तो वहीं दूसरी तरफ बीजेपी की तरफ से गिरिराज सिंह खड़े हैं। इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच में से बेगूसराय सीट निकाल पाना कन्हैया के लिए काफी मुश्किल है।

पर कन्हैया कुमार के तमाम दोस्त और भाजपा विरोधी नेता और पत्रकार उनके समर्थन में हवाई माहौल बनाने में जुट गए हैं। कोई स्टूडियों या डेस्क से ही उनके पक्ष में बने माहौल पर लेख लिख रहा है तो कोई सोशल मीडिया पर ही हवाई माहौल बनाने में जुटा है।

हक़ीक़त क्या है? ये तो चुनाव नज़दीक आते-आते और साफ हो जाएगा। अगर ऐसे ही सिर्फ हवा-हवाई माहौल बनाने की कोशिश की गई तो नंबर-1 का किला ढहकर अगर 3 पर जगह मिले तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

इस आशंका को और मजबूती इस बात से भी मिला कि अभी उनके खास दोस्त जिग्नेश मवाणी कन्हैया के लिए गाड़ी से ही बेगूसराय में “माँ की कसम अच्छा आदमी है” के नाम से वोट माँगते नज़र आए। मवाणी कन्हैया के पक्ष में माहौल बनाने बेगूसराय पहुँचे थे। शायद मवाणी को हवा-हवाई माहौल और वहाँ की हक़ीक़त समझ आ गई जो वो चलते-चलते उसी अंदाज़ में हवा में ही वोट की फरियाद कर बैठे।

हो सकता है बेगूसराय की जनता ऐसे ही हवा में वोट भी दे आए। क्या होगा ये तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा लेकिन जमीनी आसार कन्हैया से दूर जाते नज़र आ रहे हैं।

‘सौगंध मुझे इस मिट्टी की’ PM मोदी की इन पंक्तियों को सुरों से सजाया स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने

हाल ही में बालाकोट में IAF के हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण देते हुए एक कविता की पंक्ति ‘सौगंध मुझे इस मिट्टी की’ का इस्तेमाल किया था। जिसके ज़रिए उन्होंने देश के लोगों को आश्वासन दिया था कि उनके हाथ में देश सुरक्षित है। अब इन्हीं पंक्तियों को लयबद्ध करने का कार्य स्वयं लता मंगेशकर ने किया हैं।

जी हाँ। लता मंगेशकर ने सेना के जवानों को समर्पित करते हुए इन पंक्तियों को अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड किया है। जिसे बीजेपी अपनी चुनाव कैंपेन का गीत बनाएगी। लता मंगेश्कर ने अपना यह गाना ट्विटर पर शेयर किया हैं।

अपनी ऑडियो में इस गाने को गाने से पहले लता कहती हैं कि पिछले दिनों वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण सुन रही थी, जिसमें उन्होंने एक कविता की कुछ पंक्तियाँ कही थीं, जो उन्हें वास्तव में हर भारतीय की मन की बात लगी।

उन्होंने कहा कि वो पंक्तियाँ वाकई उनके मन को छू गई। उन्होंने उसे रिकॉर्ड किया है। साथ ही देश के वीर जवानों को और देश की जनता को समर्पित करते हुए उन्होंने गाने को शुरू किया।

सरस्वती का दूसरा रूप कही जाने वाली लता मंगेशकर की आवाज़ में यह कविता और उसकी पंक्तियाँ किसी भी व्यक्ति के भीतर राष्ट्र प्रेम जगाने के लिए काफ़ी है। याद दिला दें कि प्रधानमंत्री के जिस भाषण पर लता मंगेशकर ने यह गीत लयबद्ध किया है। उसमें पीएम ने कहा था, “2014 के मेरे उन शब्दों को माँ भारती के वीरों को नमन करते हुए आज मैं फिर से दोहरा रहा हूँ। सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूँगा, मैं देश नहीं रुकने दूँगा, मैं देश नहीं झुकने दूँगा। मेरा वचन है भारत माँ को। तेरा शीश झुकने नहीं दूँगा।”

मोदी के मुख से की इन पंक्तियों को सुनकर लोगों ने खूब तालियाँ बजाईं थी और काफ़ी समय मोदी की आवाज में इन पंक्तियों की गूँज न्यूज़ चैनल्स पर सुनाई पड़ती रहती थी।

4 बीघा में खड़ी फसल कटना जरुरी है, ताकि मायावती भर सके हेलीकॉप्टर से उतरकर हुँकार

आम चुनाव सर पर हैं, चारों दिशाओं में नेताओं की हुँकार भरने की खबर आ रही हैं। सबके जीतने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं क्योंकि जिस स्तर पर रैलियाँ और भीड़ जुटाने के प्रयास देखने को मिल रहे हैं उनको देखते हुए ‘हार’ शब्द को चुनावी डायरी से विलुप्त कर लिया जाना चाहिए।

कुछ ऐसी घटनाएँ भी हैं जो किसानों की तस्वीर खींचने वालों को कष्ट दे सकती हैं। 4 बीघा जमीन पर अधपकी फसल को मायावती की रैली के लिए समय से पहले काटा जा रहा है। रोजगार के गलत आँकड़े जुटाने में व्यस्त मीडिया प्रमुखों से मेरा व्यक्तिगत निवेदन है कि अपने मतलब के प्रोपेगैंडा बेचने से कुछ समय निकालकर किसानों की एड़ियों और बिवाइयों की तस्वीर बेचने के बाद बड़े मीडिया गिरोहों को इस खबर को भी प्रमुखता से छापना चाहिए।

6 अप्रैल को रुड़की में प्रस्तावित BSP प्रमुख मायावती की जनसभा के लिए 4 बीघा में खड़ी गेहूँ की फ़सल काटी जा रही है। फसल को इसलिए कटवाया जा रहा है ताकि मायावती का विमान आसमान से वहाँ पर उतरे और उनका चुनावी भाषण जोर-शोर से वोटर्स को सुनाया जा सके। चिंता की बात यह भी है कि अभी फ़सल पकने का समय नहीं है, ऐसे में यह फ़सल मवेशियों के चारे के अलावा किसी काम में नहीं आ सकेगा। किसानों का कर्ज माफ़ करने के लिए महागठबंधन की सरकार लेकर जो लोग सत्ता में आने का स्वप्न देख रहे हैं, वो जब चुनावी रैलियों के लिए किसानों और उनकी फसलों की बलि देते हुए नजर आते हैं तो लोकतंत्र बहुत पीछे छूट जाता है।

उत्तर प्रदेश के महागठबंधन की तर्ज पर उत्तराखंड में BSP और SP ने चुनाव लड़ने के लिए समझौता किया है। उत्तराखंड राज्य की 5 सीटों में से 4 BSP के खाते में गई हैं और 1 सीट (पौड़ी) SP के खाते में गई है। हालाँकि, मजेदार बात ये है कि पौड़ी से समाजवादी पार्टी प्रत्याशी ने नामांकन ही नहीं किया है। हरिद्वार सीट से BSP के अंतरिक्ष सैनी मैदान में हैं। उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में 1994 के मुजफ्फरनगर में हुए वीभत्स कांड के लिए जिम्मेदार समाजवादी पार्टी का इस राज्य में वोट ढूँढना सत्ता में आने की लालसा की पराकाष्ठा ही मानी जा सकती है।

हरिद्वार, ख़ासकर रुड़की के इलाके में BSP का अच्छा-खासा वोट बैंक है और वहाँ से पार्टी के विधायक भी रहे हैं। BSP प्रत्याशी के समर्थन में मायावती की 6 अप्रैल को रुड़की में जनसभा है। रुड़की क्षेत्र में किसी बड़ी रैली के लिए मैदान उपलब्ध नहीं है, इसलिए BSP रैली के लिए जगह तैयार कर रही है। रुड़की में 4 बीघा में खड़ी गेहूँ की फ़सल को काटकर रैली के लिए मैदान बनाया जा रहा है। मैदान में एक हेलीपैड भी बनाया जाएगा, जिसमें मायावती का हेलिकॉप्टर उतरेगा।

स्थानीय लोग बता रहे हैं कि अभी फ़सल पकी नहीं है, लेकिन इसे काटने के अलावा उन्हें कोई दूसरा उपाय नजर नहीं आ रहा है, इसलिए अब यह सिर्फ़ पशुओं के चारे के काम आ सकती है। आस-पास के लोग यह कटा हुआ गेहूँ अपने मवेशियों के लिए ले जा रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों के बारे में झूठ और फर्जी खबरों का कारोबार खूब बढ़ा है। आम चुनाव से पहले हालत ये हो चुके हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जोर से साँस भी खींच लें, तो विपक्ष और तमाम मीडिया गिरोह इसे मोदी द्वारा चुनाव जीतने की रणनीति ठहराया जाने लगा है। हैरान करने वाली बात ये है कि चुनाव के लिए पार्टी प्रमुख से लेकर तमाम नेताओं के साथ खुदको निष्पक्ष कहने वाले मीडिया गिरोहों ने भी कमर कस डाली है। चुनाव जीतने और जितवाने के लिए नेताओं से ज्यादा होशियारी उनके मीडिया गिरोह दिखाते नजर आ रहे हैं। होशियारी दिखाते हुए मीडिया तंत्र वोटर्स के सामने ऐसी काल्पनिक घटनाएँ तोड़-मरोड़कर ले आते हैं, जो एक खुली ‘व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी’ रोल निभा सकती है।

मीडिया गिरोह फ़ौरन अपनी पोज़िशन लेकर कुछ मनगढ़ंत स्वप्न जनता के बीच लाकर रखता है, जो बिना सोचे-समझे आगे संचार माध्यमों को सौंप दी जाती हैं। इसी तरह से प्रोपेगैंडा और अफवाहों के बीच मीडिया गिरोहों द्वारा नरेंद्र मोदी की रैलियों के लिए पेड़ कटवाए जाने की ख़बरें पढ़ने को मिली थी, जिन्हें OpIndia द्वारा फैक्ट चेक किए जाने पर पता चला था कि वो ख़बरें मात्र अफवाहें थी। इनमें झूठी अफवाह फैलाई जा रही थी कि नरेंद्र मोदी की रैली के लिए हैलीपैड बनवाया जाना था और इसके लिए बड़े स्तर पर पेड़ कटवाए गए।

लेकिन पर्यावरणविद पत्रकारों और किसानों के प्रति चिंतित रहने वाले लोगों को जानना आवश्यक है कि BSP प्रमुख मायावती की चुनावी तैयारियाँ गेहूँ की फ़सल पर भारी पड़ रही हैं। महागठबंधन फिलहाल और किसी पर नहीं लेकिन किसान और फसलों पर खूब भारी पड़ रहा है। अपने फेसबुक पोस्ट्स के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करते हुए किसानों की इस चिंता पर ध्यान दे पाना संभव नहीं होता होगा। ना ही TV पर रोज TV ना देखने की अपील करने वालों के लिए किसानों पर अभी प्राइम टाइम करने से TRP को कोई विशेष लाभ होगा, इसलिए मवेशियों को अध-पकी फसल खिलाने के महत्त्व को लेकर तो कम से कम कुछ प्राइम टाइम जरूर करवाए जाने चाहिए। बाकी जो है सो तो….

न्यायपालिका में भी है भ्रष्टाचार, ‘एंटी-नेशनल’ घोषित होने चाहिए भ्रष्ट: मद्रास हाईकोर्ट जज

जो बात अवमानना कानून के भय से देश के उग्रतम पत्रकार और भ्रष्टाचार से लड़ रहे कार्यकर्ता बोलने से कतरा जाएँ, मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम ने दो-टूक कह दी।

भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित एक लोकसेवक की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम ने कहा कि भ्रष्ट न्यायपालिका से बड़ा संविधान का कोई शत्रु हो नहीं सकता। उन्होंने यह भी जोड़ा कि न्यायपालिका को अपने अन्दर फैले भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कठोरतम कदम उठाने चाहिए और भ्रष्ट बाबुओं व न्यायिक अधिकारियों को ‘एंटी-नेशनल’ (देशविरोधी) घोषित किया जाना चाहिए।

‘माँ के पेट से सीखने लगता है घूस’

गुरुवार को ग्रामीण प्रशासनिक अधिकारी पी सरवनन की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सुब्रमण्यम ने कहा कि लोकसेवकों को घूस देना व्यक्ति माँ के पेट से ही शुरू कर देता है, और यह शोचनीय है कि जनसामान्य को लोककल्याण की सुविधाओं के लिए भी भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है। सरवनन चाहते थे कि अदालत उनका निलंबन रद्द कर उनकी बहाली का आदेश जरी करे, पर अदालत ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया।

“यह ‘एंटी-नेशनल’ हैं क्योंकि ये इस महान राष्ट्र के विकास में रुकावट पैदा करते हैं। आतंकवादियों को हम समाज-विरोधी घोषित कर देते हैं। अतः भ्रष्ट और देश के विकास की गतिविधियों में बाधा उत्पन्न कर रहे लोगों को भी राष्ट्र-विरोधी घोषित कर देना चाहिए। इन राष्ट्र-विरोधियों को देश के विकास से कोई मतलब नहीं है; केवल अपना विकास (स्वार्थ) चाहिए इन्हें,” जस्टिस सुब्रमण्यम ने आगे जोड़ा।

जस्टिस सुब्रमण्यम ने यह भी कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और पीड़ादायक है कि शैक्षणिक संस्थानों में रिश्वत की जगह कामुक अनुग्रहों (sexual favors) का आदान-प्रदान होता है और लोक प्रशासन में इससे बुरी बात क्या हो सकती है। उन्होंने इस पर भी क्षोभ जताया कि लोगों को दफनाए जाने तक में भी भ्रष्टाचार होता है और लोग उसे सहन करते रहते हैं। जब तक कि लोकसेवकों को घूस न दी जाए, लाशें दफनाए जाने के इंतजार में पड़ी रहतीं हैं; लोगों को सम्मानजनक अंतिम क्रिया के हक से भी वंचित कर दिया जाता है।

चुनावी भ्रष्टाचार पर बहुत सख्त  

चुनावी भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार करते हुए न्यायमूर्ति ने कहा कि यदि वे ही मतदाताओं को घुस देने जैसे भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाएंगे तो लोकतांत्रिक सिद्धांतों की जड़ें हिल जाएँगी, “यह लोक-प्रतिनिधि केवल कानून बनाने ही नहीं, बल्कि उसका अनुपालन कराने के भी उत्तरदायी होते हैं।”

‘न्याय योजना’ उजाले में वोट खरीदने की कॉन्ग्रेस की विलक्षण नीति का नाम है

लोकसभा चुनाव का समय नज़दीक है। सभी राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव जीतने की कोशिश में जुटी है। इस दौरान राजनीतिक दल जनता के सामने लोकलुभावन वादे कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक पार्टियों द्वारा वोट खरीदने की कोशिश की जाती है और इसे ‘न्याय’ का नाम दे दिया जाता है।

दरअसल हम बात कर रहे हैं कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की, जिन्होंने लोकसभा चुनाव के मुख्य चुनावी वादे के रूप में न्यूनतम आय गारंटी योजना की घोषणा की है। इस योजना के अनुसार, 5 करोड़ परिवारों के देश में सबसे गरीब 20% लोगों को प्रति वर्ष 72,000 रुपये का भुगतान किया जाएगा। लेकिन पार्टी इस बात का ब्यौरा नहीं दे रही है कि इस भारी भरकम योजना को लागू कैसे किया जाएगा? इसके लिए फंड कहाँ से आएँगे। जीडीपी और राजकोषीय घाटे पर इसका क्या असर होगा? अगर यह योजना लागू होती है, तो 2019-20 में करीब ₹3,60,000 करोड़ की जरूरत होगी। वो पैसे कहाँ से आएँगे?

हालाँकि जाने-माने अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी का कहना है कि उन्होंने कॉन्ग्रेस को सलाह दी थी कि न्‍याय स्‍कीम के तहत ₹2,500 से ₹3,000 तक देना राजकोषीय अनुशासन के दायरे में होगा। ‘टाइम्स नाउ’ को दिए इंटरव्‍यू में अभिजीत बनर्जी ने बताया कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने ‘न्याय स्कीम’ को लेकर उनसे सलाह ली थी और उन्होंने पार्टी को बताया था कि न्यूनतम आय के तहत प्रति माह ₹2,500 देना सही रहेगा। यह राजकोषीय अनुशासन के दायरे में होगा।

इस पर सालाना ₹1.50 लाख करोड़ खर्च का अनुमान लगाया था। मगर लोकसभा चुनाव की वजह से कॉन्ग्रेस की ओर से इसे सीधा दोगुना कर दिया गया। बनर्जी का मानना है कि इस योजना के लागू होने के बाद राजकोषीय असमानता आने की आशंका है। ऐसे में इनकम टैक्‍स, जीएसटी की दरों में बढ़ोतरी हो सकती है। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो राजकोषीय असमानता आ सकता है। इसके साथ ही बनर्जी ने कहा कि इस स्‍कीम के लागू होने पर अगला कदम वाटर, इलेक्‍ट्र‍ीसिटी और फर्टिलाइजर सब्‍सिडी को हटाने का होगा। इसके बाद ही न्‍याय स्‍कीम को प्रभावी ढंग से इस्‍तेमाल किया जा सकेगा।

वहीं वित्त मंत्री अरुण जेटली का भी इस बारे में कहना है कि अगर न्यूनतम आय योजना को लागू किया गया तो देश में पहले से चल रहा राजकोषीय घाटा और अधिक बढ़ जाएगा। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष तथाकथित अर्थशास्त्रियों का हवाला देकर जो गरीबी हटाने का फॉर्मूला दे रहे हैं, वो चुनावी धोखा है। इसके साथ ही अरुण जेटली ने कहा कि इस योजना की घोषणा से ये बात साबित हो जाती है कि न तो इंदिरा गाँधी, ना उनके बेटे और ना ही उनके उत्तराधिकारियों द्वारा चलाई जा रही सरकार गरीबी हटाने में सफल हो पाई है। उन्होंने कहा कि ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देने के बाद कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार ने दो तिहाई समय तक शासन किया। जब कॉन्ग्रेस पार्टी इतने बड़े कालखंड में गरीबी को हटाने में असफल रही तो अब देश उन पर क्यों विश्वास करेगा?

वैसे राहुल गाँधी की न्याय योजना को लेकर यह बात समझ में आ रही है कि चुपचाप रात के अंधेरे में शराब और पैसा बाँटकर चुनाव जीतने की कोशिश अब दिन के उजाले में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर वोटर के अकाउंट में पैसे डालने पर पहुँच गई है। इसके साथ ही ये भी स्पष्ट हो गया है कि कॉन्ग्रेस के पास गरीबी हटाने का विजन नहीं है। राहुल गाँधी ने मुफ्त का पैसा बाँटने की योजना लाकर यह साबित कर दिया है कि उनके पास नौकरियाँ देने की ठोस नीति नहीं हैं। यानी कॉन्ग्रेस के पास ऐसी कोई योजना नहीं है कि लोग परिश्रम से पैसा कमाकर गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर निकलें। लेकिन वो शायद ये भूल गए कि मुफ्तखोरी के पैसों से गरीबी नहीं मिटाई जा सकती।

अब यहाँ पर सवाल यह भी उठता है कि यदि राहुल को गरीबों और किसानों की इतनी ही चिंता है तो वो कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में किसान सम्मान निधि योजना लागू क्यों नहीं कर रही है? क्यों वो आयुष्मान योजना के लाभ से गरीबों को वंचित रख रही है। वैसे देखा जाए तो कॉन्ग्रेस का इतिहास गरीबी और गरीबी हटाने के नाम पर राजनीतिक व्यवसाय का रहा है। मगर उनका असली मकसद गरीबी हटाने का नहीं, बल्कि गरीबी हटाने का सपना दिखाकर अपने योजनाओं के माध्यम से छल कपट करके सत्ता हासिल करने का है।

ऐसा प्राय: देखा गया है कि नेता लोग सोचते हैं कि किसानों का कर्ज माफ कर, या लोगों के बैंक अकाउंट में पैसा ट्रांसफर कर वोटों को खरीदा जा सकता है, गरीबी दूर किया जा सकता है। लेकिन सही मायने में राष्ट्र निर्माण तभी होगा जब वह किसानों और गरीबों को इतना सक्षम बना दें, कि उन्हें कर्ज माफी की जरूरत ही ना पड़े। वह खुद अपना कर्ज चुकाने में सक्षम हों।

मगर असलियत तो यह भी है ना कि इनको जनता की भलाई से कोई मतलब ही नहीं होता है। इन्हें तो बस वोट बैंक बढ़ाकर चुनाव जीतना होता है। इसके पीछे एक और कारण ये भी हो सकता है कि इन्हें डर होता है कि अगर ये वोटर सक्षम हो गए तो फिर इनसे बड़े और वाजिब मुद्दे पर सवाल करने लगेंगे और फिर तब ये कर्ज माफी और न्याय योजना का लॉलीपॉप देकर वोट नहीं खरीद पाएँगे।

इसलिए राजनीतिक दलों को यही तरीका आसान लगता है कि सामाजिक न्याय के नाम पर पैसा फेंककर लोगों का वोट ख़रीद लिया जाए। बहरहाल, ये स्कीम नेताओं के सत्ता सुख के लिए तो अच्छी है, लेकिन यह देश के लिए मुफ्तखोरी के नशे की तरह है, जो लोकतंत्र को अंदर ही अंदर खोखला कर देगा।

कोका-कोला ने ठोंकी ताल, ‘राष्ट्रवादी कोल्ड-ड्रिंक्स’ का बाजार गर्म

अब तक कार्बनेटेड सॉफ्ट-ड्रिंक्स के बाजार में रहा कोका-कोला अब लस्सी, लीची के रस, आम पना जैसे देसी पेयों के बाजार में भी खम ठोंकने के लिए कमर कस चुका है। हाल ही में जलजीरा फ्लेवर की कोल्ड ड्रिंक उतार कर और गर्मियों में आम पना उतारने की घोषणा कर कम्पनी ने इस बाजार में पैठ बनाने की कोशिश शुरू कर दी है।

लस्सी-छाछ अगले वर्ष

भारत और दक्षिणपश्चिम एशिया में कोका-कोला के मुख्य कार्यकारी टी कृष्णकुमार ने ब्लूमबर्ग से बात करते हुए कहा कि कोका-कोला की रणनीति में भारत के 29 राज्य अलग-अलग देशों की तरह हैं। इसके पीछे है हर राज्य के खान-पान, स्वाद की अपनी एक विशिष्टता होना। “यहाँ तक कि कई बार तो दो प्रदेशों के लोगों के जलपान करने के कारण भी अलग-अलग हो सकते हैं।”

दिल्ली स्थित Technopak Advisors नामक कंसल्टिंग एजेंसी के मुताबिक भारत में पैकेटबंद देसी पेय पदार्थों का बाजार लगभग 32% की दर से बढ़ रहा है, जो कि हालिया समय में कोका कोला की माँग में बढ़त का तीन गुना है।

भारत के देसी पेयों के बाजार के बारे में बात करते हुए कृष्णकुमार ने यह भी जोड़ा कि अकेले जूस का बाजार $3.6 अरब (करीब ₹250 अरब) का है। इसका 72% हिस्सा रेहड़ी, छोटी दुकानों और ठेले वालों को जाता है।

इस बाजार में पैर जमाने के लिए कोका कोला भारी-भरकम निवेश भी करेगी। आम और लीची जैसे फलों को उगाने में ही कम्पनी का निवेश $1.7 अरब (₹118 अरब) के करीब होगा। इस साल फलों के रस से शुरुआत कर कम्पनी की योजना अगले साल तक दुग्ध-आधारित पेय पदार्थों जैसे छाछ, लस्सी आदि भी लाने की है। इसके अलावा कम्पनी की रणनीति में इन सभी पेय पदार्थों की कीमत कम-से-कम रख अधिक-से-अधिक ग्राहकों तक पहुँचना भी शामिल है।

बाजार के पुराने खिलाड़ियों से कड़ी टक्कर के आसार

इस बाजार में कोका कोला जहाँ नई होगी, वहीं कई भारतीय कम्पनियों ने इस मार्केट में अच्छी-खासी जड़ें जमा लीं हैं। सबसे पहला नाम योगगुरु बाबा रामदेव की पतंजलि का तो है ही, जो तेजी से भारत की अग्रणी एफएमसीजी कम्पनी बनने के साथ ही भारत के बाहर दूसरे बाजारों में भी पैर पसार रही है। पतंजलि ने आम के रस, आँवले के रस से लेकर करेले पर आधारित पेय पदार्थ तक उतारे हुए हैं और सभी की बिक्री तेज़ी से होती है।

इसके अतिरिक्त बंगलूरु स्थित हेक्टर बेवरेजेज़ के पेपर बोट, Xotik Frujus (मुंबई) के जीरू जैसे अन्य ब्रांड भी हैं जिनसे कोका कोला को कठिन चुनौती मिलने के आसार हैं। यह सभी कम्पनियाँ एक हद तक राष्ट्रवादी भावनाओं पर भी दाँव लगाती हैं और ‘Be Indian, Buy Indian’ का नारा इनकी मार्केटिंग पिच में शामिल है।

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका के एटलांटा राज्य स्थित कोका कोला, जिसके पास अगर 100 साल से भी पुराना ब्रांड होने का दमखम है, ‘राष्ट्रवादी मार्केटिंग’ की क्या काट निकालती है।

मगर वो 40 लोग CRPF के शहीद हो गए… उसपर भी मुझे शक है – फारूक अब्दुल्ला का शर्मनाक बयान

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला समय-समय पर बयानों के जरिए अपना असली चेहरा दिखाते रहे हैं। कभी सीजफायर के उल्लंघन पर भारत को बराबर का दोषी बताकर तो कभी पाकिस्तान के जवानों के प्रति सहानुभूति दिखाकर। इतना ही नहीं फारूक ने नई पीढ़ी के आतंकियों को आजादी के लिए लड़ाई लड़ने वाला तक भी बताया हुआ है। लेकिन इस बार उन्होंने हद कर दी है।

एएनआई द्वारा जारी वीडियों में फारूक अब्दुल्ला ने आज मीडिया से बात करते हुए उन 40 जवानों की वीरगति पर संदेह जताया जो पुलवामा हमले का शिकार हुए है। ज़रा सोचिए! जिन फारूक अब्दुल्ला की जान की सुरक्षा में भारत सरकार ने हमेशा सुरक्षाबलों को तैनात रखा। आज उनके ऐसे सुर वो भी पुलवामा के उन जवानों के लिए जो भयावह हमले का शिकार हुए कितने शर्मसार करने वाले हैं।

फारूक के ज़हन से ये बात उस समय निकली जब वह प्रधानमंत्री क ख़िलाफ़ बयान दे रहे थे। इस बयान में उन्होंने कहा,  “कितने सिपाही हिंदुस्तान के छत्तीसगढ़ में शहीद हुए, क्या कभी मोदी जी वहाँ गए, उनपर फूल चढ़ाने के लिए , या उनके खानदान वालों से हमदर्दी की? या जितने जवान यहाँ मरे उसपर कुछ कहा… मगर वो 40 लोग सीआरपीएफ के शहीद हो गए… उसपर भी मुझे शक है।”

फारूक की इस वीडियो में प्रधानमंत्री मोदी पर लगाए इल्जामों पर शायद कोई इतना गौर न भी करता, क्योंकि अलूल-जलूल बातें करने की उनकी आदत रही है। लेकिन जो उन्होंने पुलवामा में जवानों की मौत पर सवाल खड़ा किया, वो न केवल निंदनीय है बल्कि फारूक की हक़ीकत और नीयत को बयान करने के लिए भी काफ़ी है।

यह पहला मौका नहीं हैं कि उनकी बातों में द्वेष भावना दिखी हो। समय-समय पर फारूक जनता को भड़काने का काम अच्छे से करते रहे हैं। फारुक ही वह शख्स है जिन्होंने केंद्र सरकार को खुलेआम चुनौती दी थी कि ‘सरकार pok पर तो भूल जाएं, पहले श्रीनगर में ही तिरंगा को फहराकर दिखाएँ।’

हैरानी होती है, जब लोग ऐसे भड़काऊ लोगों को समर्थन देने में अपना वक्त और ताकत जाया करते हैं, जिनके खुद के अस्तित्व का कोई औचित्य न रह गया हो।

देश के जवानों की मौत और प्रधानमंत्री के कार्यों पर सवाल उठाने वाले फारूक का नाम उन नेताओं की सूची में रह चुका हैं जिन्हें जान का खतरा होने पर सरकार द्वारा जेड प्लस सिक्योरिटी तक मुहैया कराई गई। आज वही फारूक और उनके बयान देश के लिए नासूर बनते जा रहे हैं। जो समय-समय पर देश की उदारता को उसकी कमजोरी समझ लेते हैं और खुलेआम देश विरोधी बयानबाजी करते हैं।

अगर सीमा पार से आत्मघाती हमले का इरादा लेकर आए आतंकी आतंकवाद का प्रत्यक्ष चेहरा हैं। तो फारुख जैसे नेता भी अघोषित रूप से उन्हीं उनका ही रूप हैं। फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि उन लोगों के इरादे भयंकर विस्फोट में दिख जाते हैं और इनके हमले अभिव्यक्ति की आजादी और अधिकारों की आड़ में छिप जाते हैं।

प्रियंका गाँधी वाड्रा, जो लगभग भगवान हैं…

“मैं चुनाव नहीं लडूँगी।”
“पार्टी जहाँ से कहेगी, वहाँ से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हूँ।”
“तो मैं बनारस चुनाव लड़ जाऊँ?”
– मिसेज वाड्रा

आपने बड़े घरों के बच्चे देखे हैं, असल जिन्दगी में या फिल्मों में भी? जो बहुत सारे नौकर-चाकर और सुख सुविधाओं के बीच पलते हैं, जिनसे उम्र में कई गुना बड़े रामू काका सरीखे बुजुर्गवार दीदी, भैया, बाबा, छोटे साहब, छोटी मालकिन जैसे संबोधन का प्रयोग करते हैं?

जिनकी दुनिया अपने बंगलों, फ़ार्म हाउस, एसी कारों और हवाई जहाजों के बीच ही होती है, जो चीजों को जरूरत के लिए नहीं बल्कि पैसा खर्चने और बोरियत मिटाने के लिए खरीदते हैं, जो सिक्यूरिटी रीजन्स की वजह से घर के बाहर खेलने नहीं जाते, जो घर में ही अपने नौकरों के बच्चों के साथ खेलते हैं तो कभी आउट नहीं होते।

इनके स्कूल के दोस्त यार भी इनके घर ही आ जाते हैं, जो इनके ठाठ और रसूख की तारीफों के पुल बाँधते हैं। और ऐसे माहौल में इन बच्चों को यह आदत हो जाती है कि सारी दुनिया इन्हें पैम्पर करे। यह जो कहें वही सही हो, जो माँगें वही मिल जाए।

गाँव, गरीब, खेत, किसान, मजदूर जैसी चीजें या तो फिल्मों में देखते हैं या फिर कभी पिकनिक मनाने जाएँ तब! कुल मिलाकर कह लीजिये कि यह लोग इस दुनिया में रहकर भी किसी दूसरे ही दुनिया के प्राणी हो जाते हैं।

और ऐसी ही दूसरी दुनिया के प्राणी हैं- राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा गाँधी। राहुल, चूँकि चर्चाओं से परे हो चुके हैं, जिन राक्षसों पर कायम चूर्ण का असर हो जाता था, राहुल गाँधी पर ऐसे कई क्विंटल कायम चूर्ण बेअसर है। इसलिए उन चर्चा का खर्चा उचित नहीं हैं।

इसलिए थोड़ी चर्चा मिसेज वाड्रा की कर लेते हैं। उनके ऊपर के बयानों को देखिये और जब उन्होंने यह बयान दिए, उनके तब के चेहरे को भी देखिये। वे हँस देती हैं, मुस्कुरा जाती हैं, शरमा जाती हैं। उनको लगता ही नहीं है कि वे भारत की सबसे पुरानी पार्टी की वारिस हैं, उनके घर में तीन-तीन पीएम रहे हैं, उनके खानदान ने देश पर सत्तर साल राज किया है, उनको लगता ही नहीं है कि वे राजनीति जैसे एक गंभीर कार्यक्षेत्र में हैं… क्योंकि उनको लगता है कि उनके आस-पास सब नौकर-चाकर जैसे ही लोग खड़े हुए हैं, वे सब उनकी रियाया है। जो उनको पैम्पर करेगी, उनकी बातों से खुश होगी।

उन्हें क्या मतलब है कि उनकी बातों में क्या कटेंट है। उनको तो यह पता है और यही बताया गया है कि आप का बस भौतिक रूप में मौजूद होना ही काफी है। उनको बताया गया है कि आप इंसान नहीं बल्कि लगभग अवतार हैं कि लोग आपको सुनने नहीं बल्कि आपको देखने आते हैं, वे आपके कपड़े देखने आते हैं, वे आपके आँख, नाक, और कान देखने आते हैं, वे यह भी देखने आते हैं कि भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में आपकी त्वचा में प्रचूर मॉइस्चराइजेशन आखिर कैसे बना रहता है।

लेकिन जो लोग ऐसे माहौल में नहीं पले होते हैं, जिन्होंने धूल-धक्के खाए होते हैं, जो संघर्ष, मुसीबतों, यश-अपयश को झेलकर आगे बढ़े होते हैं, जिन्होंने जिम्मेदारियों को निभाया होता है, जिन्होंने विपरीत परिस्तिथियों में परिणाम दिया होता है, जिन्होंने अपने विरोधियों के हाथों जेल और तड़ीपार तक झेला होता है, वे लोग किसी को पैम्पर नहीं करते, वे लोग असमान स्थितियों में भी समान होते हैं, वे लोग निर्मम लग सकते हैं, पर वे लोग बुरे नहीं होते।

और ऐसा ही एक शख्स, जो आज गांधीनगर से अपना चुनावी परचा दाखिल करने के लिए 42 डिग्री के टेम्प्रेचर में रोड शो कर रहा था, जब उससे प्रियंका वाड्रा के बयान – ‘क्या बनारस से चुनाव लड़ जाऊँ’ – पर प्रतिक्रिया पूछी गई तो उसका जवाब था, “अगर-मगर से राजनीति नहीं चलती है, जब लड़ेगी तब देखेंगे।”

बैट से हिन्दू बच्चे की हत्या कर, स्कूल में दफ़नाने वाले मिशनरी स्कूल पर CBI जाँच

कुछ दिन पहले देहरादून (रानीपोखरी, ऋषिकेश) के चिल्ड्रेन होम मिशनरी स्कूल भोगपुर के छात्र वासु की जान सिर्फ़ एक बिस्किट के पैकेट के कारण चली गई। जिसमें बच्चे ने स्कूल के बाहर दुकान से बिस्किट का पैकेट चुराया और दुकानदार की शिकायत पर मिशनरी स्कूल के सीनियर छात्रों ने बच्चे (वासु) की निर्मम तरीके से पिटाई की। समय पर इलाज न मिलने से बच्चे की मौत हो गई। लेकिन, इस मामले ने छात्रों की मानसिकता, स्कूल प्रबंधन के रवैये और शिक्षा विभाग की कार्यशैली सब पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

12वीं कक्षा में पढ़ने वाले सीनियर्स ने वासु को बिस्किट का पैकेट चोरी करने का दोषी ठहराया और फिर बल्ले व स्टंप्स से पीट-पीट कर उसकी जान ले ली। सीनियर्स ने बच्चे को पहले तो ख़ूब पीटा और फिर उसे वहीं क्लास रूम में ही छोड़कर निकल गए। घायल छात्र को आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई।

चिल्ड्रेन होम एकेडमी स्कूल मामले में एक नया और बड़ा मोड़ आया है। उत्तराखंड बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इस मामले की सीबीआई जाँच की माँग की है। आयोग की अध्यक्ष ऊषा नेगी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को पत्र लिखकर सीबीआई जाँच की माँग की है। ऊषा नेगी ने बच्चे की मेडिकल रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए हैं। स्कूल संचालक स्टीफ़न सरकार की भूमिका को आयोग ने संदिग्ध माना है। इस पूरे प्रकरण में स्कूल प्रबंधन पर कई तरह के आरोप लगे हैं।

चिल्ड्रन्स होम एकेडमी स्कूल के छात्र वासु यादव की मौत के मामले में दो छात्रों और तीन स्कूल कर्मचारियों की गिरफ़्तारी के बाद से इस मामले में दबाव बढ़ता जा रहा है। बाल आयोग अध्यक्ष ऊषा नेगी ने भी स्कूल का दौरा किया था। इस दौरान उन्हें बच्चे स्कूल में काम करते मिले थे। जबकि प्रबंधन के सभी लोग नदारद थे। इसके बाद ऊषा नेगी ने पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

चिल्ड्रेन एकेडमी मिशनरी स्कूल में छात्र वासु की हत्या के बाद बाल संरक्षण आयोग इस संस्था पर नजर बनाए हुए है। उत्तराखंड बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष उषा नेगी ने स्कूल पहुँचकर औचक निरीक्षण किया। जिससे बच्चों से खाना बनवाने समेत उन्हें पीने के लिए गंदा पानी दिए जाने की बात सामने आई है। इसे देखकर आयोग की अध्यक्ष भड़क गई। करीब 2 घंटे तक आयोग की अध्यक्ष हॉस्टल में मौजूद रहीं, इस दौरान स्कूल प्रबंधन समिति मौके से नदारद रही। ऊषा नेगी ने बताया कि प्रबंधक स्टीफ़न सरकार का बेटा, जो उसी स्कूल में टीचर है, ने भी एक बार पहले वासु यादव की बुरी तरह पिटाई की थी। स्कूल में CCTV कैमरे नहीं थे, जिससे यह आशंका भी बनती है कि वहाँ जो हो रहा था उसे छुपाने की कोशिश की जा रही थी।

नेशनल एसोसिएशन फॉर पेरेन्ट्स एंड स्टूडेन्ट्स राइट्स (NAPSR) के सदस्यों ने देहरादून के जिलाधिकारी से मुलाकात कर के इस स्कूल की मान्यता रद्द करने की माँग रखी है। NAPSR ने माँग की गई है कि स्कूल की जाँच कर वैधानिक तरीके से कार्रवाई की जाए। पुलिस ने भी दो साल पहले इस स्कूल से एक छात्र के गायब होने के मामले में भी स्कूल प्रबंधन की भूमिका की जाँच करने की बात कही है।

पीसी चाको, कॉन्ग्रेस की चाटो! लटक कर झूलना ही बचा है अब राहुल गाँधी में

ऐसा नहीं है कि ये लोग मूर्ख हैं जो कॉन्ग्रेस को भारत का माय-बाप बताते रहते हैं। मतलब, प्रियंका गाँधी को छोड़ दिया जाए, जिन्होंने हाल ही में हमें बताया था कि माचिस से मिसाइल तक सब उनके परनाना की और कॉन्ग्रेस की देन है, तो बाकी लोग, ऑन पेपर, ठीक ही लगते हैं। 

पीसी चाको कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता हैं, और उन्हें लगता है कि कॉन्ग्रेस ने भारत को जन्म दिया है, इसलिए भारत को ‘ऑब्लाइज्ड’ होना चाहिए पार्टी के लिए। हिन्दी में वो यह कहना चाह रहे हैं कि भारत देश की जनता कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार के टुकड़ों पर पलती है। लगातार तीन बार, एक ही वाक्य में चाको ने बताया कि गाँधी परिवार ही भारत की ‘फ़र्स्ट फ़ैमिली है’। आप उनका ट्वीट पढ़ लीजिए तो पता चल जाएगा कि ढलती उम्र और सत्ता से दूरी इन्सान को किस स्तर तक गिरा सकती है। 

चाको और चाको टाइप्स लोग, चाटुकारिता और परिवार के गुणगान से ही नजर में बने रहना चाहते हैं। वो भूल चुके हैं कि समय बदल गया है और गाँधी चालीसा का पाठ उन्हें सोनिया और राहुल की नज़र में तो ‘अले मेला बच्चा’ तक तो पहुँचा देगा लेकिन भारत की जनता से नहीं बचाएगा जिसने नेहरू और नकली गाँधियों के कुकर्मों को लगातार झेला है। 

पीसी चाको ने जो कहा है उसे पढ़ कर घिन आती है। एक सांसद राजनीति को किसी परिवार की बपौती बताता है, और देश के तमाम संस्थानों को धता बताकर एक परिवार की बात ऐसे करता है मानो नेहरू ने कुदाल चलाया था, फिर सोना निकला और फिर उन्होंने सड़कें बनवा दीं। चाको जैसे चिरकुट नेता यह भूल जाते हैं नेहरू ने बिना कुदाल चलाए ही सोना निकाला, और उसे अपने परिवार को पालने में लगा दिया।

ये पैसा देश का था, नेहरू को लोगों ने प्रतिनिधि बनाया था, राजा नहीं। कॉन्ग्रेस के इन चंपक नेताओं को लगता है कि नेहरू ने अपने बाप की संपत्ति से देश का कल्याण किया है जबकि बात इसके उलट है कि नेहरू, उनकी बेटी, उनके बेटे, उनकी पत्नी और उनके बेटे ने लगातार इस देश को लूटा है, नोंचा है, घसीटा है और उसकी स्थिति ऐसी कर दी कि वो वृहद् समाज में सहजता से खड़ा भी न हो सके।

एक तरफ मोदी है जो खुद को नौकर कहता फिरता है, दूसरी तरफ ये चमन नेता हैं जिनके लिए संविधान, चुनाव और लोकतंत्र की जगह फ़र्स्ट फ़ैमिली का क्यूटाचार है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि ये लोग मुँह खोलते ही क्यों हैं? आखिर ऐसी क्या ज़रूरत है मुँह से विष्ठा करने की?

चाको जैसे कलाकार कॉन्ग्रेस को भारत का सबकुछ बताने पर ही नहीं रुकते, वो बताते हैं कि राहुल गाँधी का पूरा परिवार प्रधानमंत्री रहा है, या वैसे काम करता रहा है, तो देश चलाने का हुनर उसमें पैदाइशी है। इस बात पर कई कॉन्ग्रेसी चाटुकार पागल हो रहे होंगे कि आखिर ये बेहतरीन लाइन उनके मुँह से क्यों नहीं निकली! 

आप ज़रा सोचिए कि ये मानसिकता कहाँ से आती है? आप गौर कीजिए कि ये आदमी कॉन्ग्रेस का प्रवक्ता है, सांसद रह चुका है, मंत्री रह चुका है। ये आदमी इस तरह की बेहूदी बातें कैसे कर सकता है! फिर याद आता है कि कॉन्ग्रेस का ही तो है, राहुल गाँधी में ये नहीं झूलेगा तो क्या भाजपा समर्थक झूलेंगे? लोकसभा से तो रास्ता सँकड़ा हो ही चुका है कॉन्ग्रेसियों का, अब राज्यसभा का सहारा है कहीं-कहीं से। 

ऐसे में इस स्तर से भी ऊँचे स्तर की बात तो यही बची है कि कॉन्ग्रेस के नेहरू जी की ही देखरेख में चाको साहब पैदा हुए थे। चिरकुट चाको जैसे नेता ही कॉन्ग्रेस की विरासत हैं इस देश के लिए। ऐसे नेताओं का होना बहुत जरूरी है क्योंकि पता चलता रहता है कि जब मोदी कहता है कि कॉन्ग्रेस को भी कॉन्ग्रेस की मानसिकता से मुक्त होना चाहिए, तो उसका अर्थ यही होता है। 

चाको जी, चाटिए… जीभ पर सरेस काग़ज़ यानी सैंड पेपर रख कर चाटिए, इतना चाटिए कि लाल करके ख़ून निकाल दीजिए अपने नेताओं का, लेकिन देश को बख़्श दीजिए। देश कॉन्ग्रेस के बाप की जागीर नहीं है, देश ने कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियाँ पैदा की हैं, तोड़ी हैं, और गायब की हैं।