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न्यूज़ चैनल के संपादक ने प्राइवेट कम्पनी के घाटे के लिए मोदी को ठहराया जिम्मेदार, लताड़े गए

पत्रकार विनोद कापड़ी ने एक प्राइवेट कम्पनी की कंगाली के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ ढूँढ लिया है। बता दें कि जेट एयरवेज घाटे में चल रही है और कम्पनी के पास फंड नहीं है। रुपयों की कमी से जूझती जेट एयरवेज को अब क़र्ज़दाताओं का इंतज़ार है कि वो इमरजेंसी फंड्स देकर इसे किसी तरह चालू रखें। इसी ख़बर पर TV9 भारतवर्ष के सम्पादक विनोद कापड़ी ने चुटकी लेते हुए मोदी सरकार पर निशाना साधा। कापड़ी को लताड़ते हुए अशोक पंडित ने उन्हें थोड़ी पढ़ाई-लिखाई करने की नसीहत दी और पूछा कि एक प्राइवेट एयरलाइन्स की समस्या में मोदी और विकास कहाँ से आ गया?

इसके बाद ट्विटर यूजर्स ने उन्हें अपनी प्रतिक्रियाओं में प्राइवेट और सरकारी कम्पनी का अंतर समझाया। एक यूजर ने कापड़ी और उनकी जमात के बारे में कहा कि ये ऐसे लोग हैं जो अपने बाथरूम में पानी न आने पर भी मोदी को ही कोसते हैं। उसने आगे कहा कि ऐसे लोगों को पेन गिफ्ट किया जाए तो ये इस बात के लिए नाराज़ हो जाएँगे कि रिफिल ख़त्म होने के बाद बदलनी पड़ेगी।

अगर सरकारी रुपयों से किसी प्राइवेट कम्पनी को बचाया जाए तो यही पत्रकार कहेंगे कि जनता के रुपयों का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है। कई लोगों ने पूछा कि क्या विजय माल्या की किंगफ़िशर एयरलाइन्स की कंगाली के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ज़िम्मेदार थे क्या? एक यूजर ने कापड़ी से पूछा कि अगर वो जेट एयरवेज की विफलता के लिए मोदी की ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं तो क्या TCS और HDFC की सफलता का श्रेय वो देंगे?

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कापड़ी के टीवी चैनल के कार्यक्रम में कहा था कि उन्होंने अपने संस्थान में केवल ऐसे लोग भर रखे हैं, जिनके ख़ून में ही मोदी के प्रति घृणा है। अमित शाह ने भी विनोद कापड़ी के एक सवाल पर उन्हें डाँटा था। दरअसल, कापड़ी ने अमित शाह से झूठा सवाल पूछा था कि उन्होंने चुनाव से पहले वाड्रा को जेल भेजने की बात कही थी।

‘महिलाओं को घर के अंदर ही नमाज पढ़नी चाहिए’: सुन्नी मौलाना

मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश को लेकर अभी कोर्ट में याचिका दर्ज हुए कुछ समय ही हुआ है कि मज़हब के ठेकेदारों ने इस पर आपत्ति जतानी भी शुरू कर दी है। केरल के सुन्नी मौलानाओं और इस्लामिक विद्वानों के संगठन समस्त केरला जमीयतुल उलेमा ने महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर अपनी कट्टर प्रतिक्रिया को दोहराया है।

संगठन की मानें तो मुस्लिम महिलाओं को अपने घर के अंदर ही नमाज़ पढ़नी चाहिए। उनका कहना है कि वह मज़हब से जुड़े मामलों में कोर्ट का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं कर सकते हैं।

संगठन के महासचिव अलीक्कूटी मुसलियर ने इस मामले पर कहा, “हम धार्मिक मामलों में कोर्ट के हस्‍तक्षेप को स्‍वीकार नहीं कर सकते हैं। हमें अपने धार्मिक नेताओं के निर्देशों को मानना चाहिए।”

यहाँ मुसलियर ने सबरीमला मामले का हवाला देते हुए कहा कि उनके संघठन ने उस समय भी महिलाओं के प्रवेश पर इसी तरह का रुख अपनाया था। मुसलियर का कहना है कि मस्जिद में केवल पुरूषों को ही नमाज़ पढ़नी चाहिए। मस्जिद में महिला प्रवेश पर दायर याचिका पर मुसलियर ने कहा है कि यह नियम नया नहीं हैं, पिछले से 1400 साल से यह अस्तित्व में है।

याद दिला दें कि 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर निष्पक्षता के साथ क्या फैसला सुनाती हैं।

सबरीमला विवाद के बाद धर्म की आड़ में महिलाओं के मौलिक अधिकारों पर उठा, यह दूसरा मामला है। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि पाक कुरान में भी मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश का कभी विरोध नहीं किया गया है। साथ ही बताया गया है कि इस्लाम के सबसे पाक स्थल मक्का समेत कई देशों में महिलाओं को मस्जिद में जाने की इजाजत है।

बता दें कि याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश की गई दलीलों पर उच्चतम न्यायालय वकील के जवाबों से असंतुष्ट दिखाई दिया और स्पष्ट स्वीकारा कि इस मामले को सुनने का एकमात्र कारण, केरल के सबरीमला मंदिर पर उनका फैसला है।

पार्टी के व्यवहार से दुखी प्रियंका चतुर्वेदी ने कॉन्ग्रेस को गुंडों का साथ देने वाला बताया

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव आगे बढ़ रहे हैं, कॉन्ग्रेस पार्टी में अंतर्विरोध और असंतोष की खाई गहराती जा रही है। कद्दावर नेता शकील अहमद की बगावत, फायरब्रांड मोदी-विरोधी अल्पेश ठाकोर के इस्तीफ़े और सहयोगी मुख्यमंत्री कुमारास्वामी के बेटे की उम्मीदवारी के खिलाफ होने पर 7 नेताओं के निष्कासन जैसे मामलों से पार्टी पहले से ही जूझ रही थी। अब पार्टी के सबसे चर्चित मीडिया चेहरों में से एक प्रियंका चतुर्वेदी ने पार्टी के खिलाफ एक और मोर्चा खोल दिया है।

चतुर्वेदी से दुर्व्यवहार पर बच निकले पार्टी सदस्य, सिंधिया की सिफारिश  

राजनीति कवर करने वालीं पत्रकार विजय लक्ष्मी शर्मा ने कल रात कॉन्ग्रेस के आन्तरिक संवाद के एक पत्र को ट्वीट किया। उस पत्र में उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के सदस्य श्री फजले मसूद पार्टी के कुछ सदस्यों को यह सूचित करते हैं कि श्रीमती चतुर्वेदी से दुर्व्यवहार समेत अनुशासन के उल्लंघन के मामले में उनपर की गई कार्रवाई को निरस्त किया जा रहा है।

मामला राफेल विवाद को लेकर मथुरा में कॉन्ग्रेस की पत्रकार वार्ता के दौरान का है।

कार्रवाई की संस्तुति और मामले की शिकायत प्रियंका चतुर्वदी ने की थी, और कार्रवाई निरस्त कॉन्ग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश के पार्टी प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया की सिफारिश पर की गई थी। आरोपियों में अधिकतर मथुरा के स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता थे, पर दो बड़े नाम प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के सदस्य श्री अब्दुल जब्बार और महासचिव श्री उमेश पंडित के थे।

पत्र के ‘प्रतिलिपि’ खण्ड में देखा जा सकता है कि उक्त पत्र को कॉन्ग्रेस के उच्च स्तरीय सदस्यों ज्योतिरादित्य सिंधिया और एके एंटनी (कॉन्ग्रेस की अनुशासन समिति के अध्यक्ष) को भी प्रेषित किया गया था- यानि माफ़ी के इस निर्णय में केवल सिंधिया ही नहीं, कॉन्ग्रेस के पूरे ढाँचे की सहमति मानी जा सकती है।

चतुर्वेदी का क्षोभ

विजय लक्ष्मी शर्मा के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए प्रियंका चतुर्वेदी ने लिखा कि उनकी पार्टी मेहनती कार्यकर्ताओं की बजाय गुंडों को तरजीह दिए जाने से वह दुखी हैं। उन्होंने पार्टी के लिए हर तरफ से गालियाँ झेलीं पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पार्टी के भीतर ही उन्हें धमकाने वाले मामूली कार्रवाई के भी बिना बच निकलते हैं।

‘देशद्रोही मुर्दाबाद’ से बेगूसराय के लोगों ने कन्हैया का किया स्वागत, पूछा कौन-सी ‘आज़ादी’ चाहिए

JNU के खलिहर प्रदर्शनकारी से नेता बने कन्हैया कुमार की परेशानियाँ बेगूसराय में कम नहीं हो रहीं हैं। पहले महागठबंधन ने कन्हैया से विभिन्न मंचों पर ता-ता-थैया कराने के बाद टिकट के नाम पर उन्हें गोली दे दी। उनकी डूबती राजनीतिक नैया को सहारा दिया CPI ने। फिलहाल, बिहार के बेगूसराय से सीपीआई (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) के टिकट पर 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ रहे कन्हैया को चुनाव अभियान के दौरान लगातार विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ताज़ा मामला यह है कि एक रोड-शो दौरान कन्हैया कुमार का बेगूसराय के स्थानीय लोगों द्वारा घेराव किया गया और समाज के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के विरोध में, उनके द्वारा उठाए गए कदम और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ नारे के बारे में सवाल किया गया।

विभिन्न मौके-बेमौके दिए गए कन्हैया कुमार के नारों और बयानों से नाराज बेगूसराय के स्थानीय लोगों ने उनका काफिला रोक कर, उनसे पूछा कि वह किस तरह की आज़ादी चाहते हैं, जिसका जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘हम छीन के लेंगे आज़ादी’, और उनकी उपस्थिति में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाल्लाह-इंशाल्लाह’ के नारे लगे थे। बता दें कि 2016 में कन्हैया कुमार, उमर खालिद और उनके कई अन्य साथियों ने JNU में यह कारनामा किया था।

कन्हैया का घेराव करने वाले स्थानीय लोगों ने कहा कि ‘इस देश के गरीब लोग तुम्हारे टाइप की ‘अज़ादी’ नहीं चाहते हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘यह अच्छा है कि तुम एक राजनेता बनना चाहते हो, लेकिन तुम्हें इस देश के लोगों के सवालों का जवाब देना चाहिए।’

बेगूसराय के लोगों ने कन्हैया से आगे पूछा कि ‘तुमने देश के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण का विरोध क्यों किया।’ बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में भारत के गरीब लोगों के लिए 10% आरक्षण की घोषणा की थी, जिसका कन्हैया कुमार ही नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस ने भी विरोध किया था। भौंचक्के कन्हैया के पास बेगूसराय के लोगों के सवालों का कोई जवाब नहीं था।

कुछ नहीं सूझा तो….

कन्हैया की स्थानीय लोगों के सवालों पर एक ही प्रतिक्रिया थी कि क्या वे भाजपा समर्थक हैं। इसके जवाब में, स्थानीय लोगों ने कहा कि वे वास्तव में NOTA (उपरोक्त में से कोई नहीं) के लिए वोट करने जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कन्हैया कुमार को सवालों का जवाब देना चाहिए और जो कोई भी सवाल पूछता है, वह भाजपा समर्थक नहीं होता है। लोगों ने कन्हैया से यह भी कहा कि वह वोट माँगने के लिए इतना बेचैन न हों, सबसे पहले लोगों का दिल जीतें और “भारत तेरे लिए इंशाल्लाह इंशाल्लाह” का नारा उनकी कोई मदद नहीं करेगा।

इस गहमा-गहमी के बाद स्थानीय लोगों ने ‘देशद्रोही मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। चुनाव नज़दीक है और माहौल गरम अब देखना यह है कि कन्हैया की दाल बेगूसराय में गलती कि नहीं या उन्हें आए-दिन अपने पिछले कर्मों के वजह से यूँ ही ज़लील होना पड़ेगा।

गहलोत ने राष्ट्रपति की जाति पर की टिप्पणी, घटिया राजनीति करने में और नीचे गिरी कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस पार्टी ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति चुने जाने के पीछे की वजह उनकी जाति बताया है। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे श्री रामनाथ कोविंद पर टिप्पणी से आहत भाजपा ने चुनाव आयोग से शिकायत की है। दरअसल, राजस्थान के मुख्यमंत्री व वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता अशोक गहलोत ने कहा कि रामनाथ कोविंद इसीलिए राष्ट्रपति बने क्योंकि वो दलित हैं। गहलोत ने कहा:

“क्योंकि गुजरात के चुनाव आ रहे थे, वो इस बात से घबरा चुके थे कि उनकी सरकार गुजरात में नहीं बनने जा रही है। मेरा ऐसा मानना है कि रामनाथ कोविंद जी को जातीय समीकरण बैठाने और कोली समुदाय को लुभाने के लिए राष्ट्रपति बनाया गया और आडवाणी साहब छूट गए।”

अशोक गहलोत के इस बयान पर पलटवार करते हुए भाजपा ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने राष्ट्रपति का अपमान किया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव ने कहा:

“आज हम बहुत दुःख के साथ ये बात पूरे देश के सामने रखना चाहते हैं कि आज कॉन्ग्रेस पार्टी ने बहुत ही निचले स्तर पर जाकर चुनावी मर्यादा का उल्लंघन किया है। भारत के राष्ट्रपति, जो देश में सर्वोच्च पद पर है, उन पर भी कॉन्ग्रेस ने राजनीति करने की कोशिश की है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत देश के राष्ट्रपति जी को लेकर गलत बयानबाजी कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस क्या ग़रीब तबके, दलित समाज से आने वाले राष्ट्रपति जी के ख़िलाफ़ है। एक काबिल व्यक्ति और ज्ञानी व्यक्ति होने के बावजूद केवल समाज का नाम लेकर कॉन्ग्रेस राष्ट्रपति जी के साथ पूरे समाज और देश को बदनाम कर कर रही है।”

भाजपा ने चुनाव आयोग से अपील करते हुए कहा कि देश के राष्ट्रपति पर इस तरह का बयान देने के मामले पर वह संज्ञान ले और अशोक गहलोत को नोटिस देकर उन्हें माफ़ी माँगने के लिए कहा जाए। पार्टी ने पूछा कि क्या कॉन्ग्रेस सभी दलित, पिछड़े और ग़रीब राजनेताओं को जलील करके केवल एक परिवार को ही राज करने लायक समझती है?

इससे पहले 2017 में जब रामनाथ कोविंद की राष्ट्रपति उम्मीदवारी की घोषणा की गई थी, तब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि भाजपा के दलित मोर्चा का अध्यक्ष होने के कारण उन्हें राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया है। कोविंद इससे पहले बिहार के राज्यपाल भी रह चुके हैं।

आजम खान को ‘मोगेंबो’ बोलना नकवी को पड़ा भारी, हुआ केस दर्ज

सोमवार(अप्रैल 15, 2019) को शाहबाद में भाजपा उम्मीदवार जया प्रदा के समर्थन में आयोजित जनसभा को संबोधित करने के दौरान केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने सपा नेता आजम खान पर जमकर निशाना साधा।

नकवी ने अपने भाषण में आजम खान को मोगेंबो कहा। जिसके बाद नकवी के इन शब्दों को प्रशासन ने बेहद गंभीरता से लिया और नकवी पर आचार संहिता उल्लंघन के आरोप में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।

जनसभा में मौजूद रहे मजिस्ट्रेट महेश चंद्र गुप्ता की ओर से नकवी के ख़िलाफ़ केस दर्ज कराया गया है। गौरतलब है कि नकवी ने आजम खान के लिए मोगैम्बो शब्द का प्रयोग उनके अंडरवियर वाले बयान के मद्देनजर दिया था।

इसके अलावा बता दें कि जया प्रदा पर आजम खान द्वारा आपत्तिजनक टिप्पणी का संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग ने सपा नेता के चुनाव प्रचार पर 72 घंटे का बैन लगा दिया है।

इसके पहले, नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ भी आचार संहिता के उल्लंघन पर केस दर्ज किया गया है। सिद्धू पर आरोप है कि उन्होंने बिहार में एक रैली के दौरान धर्म के आधार पर वोट माँगा था। मायावती और योगी आदित्यनाथ के चुनाव प्रचार पर भी बैन लगाया जा चुका है।

रिटायर्ड कर्नल की कविता से चुराया कॉन्ग्रेस ने अपना थीम सॉन्ग, क्या ‘अब होगा न्याय’?

कॉन्ग्रेस पार्टी के नए चुनावी गीत ‘मैं ही तो हिंदुस्तान हूँ’ का पार्टी नेताओं द्वारा ज़ोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है। अब ये गीत रिलीज होते ही विवादों में घिर गया है। धनबाद निवासी रिटायर्ड कर्नल जे के सिंह की पत्नी ने पार्टी पर अपने पति द्वारा लिखित कविता को चोरी करने का आरोप लगाया है। रिटायर्ड कर्नल जे के सिंह की पत्नी नितिका ने कहा कि कॉन्ग्रेस के चुनावी गाने के बोल उनके पति द्वारा रचित कविता पर आधारित हैं। इस बाबत आपत्ति जताते हुए नितिका सिंह ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को खुला पत्र लिखा है।

बता दें कि अभियान का थीम सॉन्‍ग ‘मैं ही तो हिन्दुस्तान हूँ’ के बारे में दावा किया जा रहा है कि इसके वास्तविक रचयिता जावेद अख्तर हैं और संगीत अर्जुना हरजाई ने दिया है। कॉन्ग्रेस की प्रचार क्लिप का निर्देशन निखिल आडवाणी ने किया है और इसके छायाकार तुषार कांति राय हैं और पटकथा अनुजा चौहान ने लिखी है। इसके लॉन्च होने से पहले चुनाव आयोग की आपत्ति के कारण इसकी कुछ पंक्तियाँ हटानी पड़ी थी। इसे ‘अब होगा न्याय’ टाइटल के अंतर्गत रिलीज किया गया है।

कॉन्ग्रेस का चुनावी थीम सॉन्ग

सेवानिवृत्त कर्नल सिंह की पत्नी ने राहुल गाँधी को भेजे गए खुले पत्र में लिखा है कि उनके पति कर्नल जे के सिंह ने ‘मैं सारा हिंदुस्तान हूँ’ कविता संग्रह लिखा था। कुछ ही दिनों पहले 25 फरवरी को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के उद्घाटन के दौरान उन्होंने नेशनल स्टेडियम दिल्ली में क़रीब 20 हज़ार पूर्व सैनिकों के समक्ष इस कविता का पाठ भी किया था। कर्नल जे के सिंह सेना के कार्यक्रमों के जाने-माने संचालक हैं और अब तक कई बड़े कार्यक्रमों का संचालन कर चुके हैं। इस कार्यक्रम का लाइव प्रसारण कई टीवी चैनलों पर भी हुआ था।

कर्नल जे के सिंह ने अपने काव्य संग्रह ‘मैं सारा हिंदुस्तान हूं’ का विमोचन 13 अप्रैल 2012 को जालियाँवाला बाग़ में किया था। उन्होंने कॉन्ग्रेस द्वारा इसे कॉपी किए जाने को ‘इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स’ का उल्लंघन बताया है। उन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष से कहा कि अगर उनकी पार्टी इस गीत का उपयोग करना ही चाहती है तो पहले उनसे सहमति पत्र लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि वो सहमति पत्र देने के बदले कोई राशि भी नहीं लेंगे। उन्होंने कहा कि सहमति पत्र के बदले राहुल गाँधी वीरगति को प्राप्त झारखण्ड के किसी सैनिक या पुलिसकर्मी के परिवार को आर्थिक सहायता दें।


₹300 करोड़ तक के हथियार खरीदने के लिए सशस्त्र सेनाओं को अनुमति नहीं लेनी होगी: रक्षा मंत्रालय

पुलवामा हमले से सबक लेते हुए केंद्र सरकार ने पाकिस्तान से लगी सीमा की सुरक्षा हेतु सेना को आवश्यक हथियार व रक्षा उपकरण खरीदने के लिए आपातकालीन अधिकार दिए हैं। इसके तहत सशस्त्र सेनाओं के तीनों अंग (आर्मी, नेवी एयर फ़ोर्स) अपनी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ₹300 करोड़ प्रति आवश्यकता की दर से रक्षा उपकरण खरीद सकते हैं। सेनाओं को हथियार खरीदने की प्रक्रिया 3 महीने में पूरी करने की छूट दी गई है।

मीडिया खबरों के मुताबिक इस संबंध में तीनों सेनाएँ कई प्रस्तावों को लेकर आगे बढ़ रही हैं। गौरतलब है कि अपनी आपातकालीन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सेना ने इस्राएल से 250 स्पाईक मिसाईल खरीदने का प्रस्ताव भी रखा है जिनका प्रयोग दुश्मन के टैंक के ख़िलाफ़ किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर वायुसेना ने अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कुछ मिसाइल खरीदने में भी दिलचस्पी दिखाई थी, जिनसे सीमा पर भारत विरोधी गतिविधि रोकने में सहायता मिलेगी।

बता दें कि सेना को मिले इन आपातकालीन अधिकारों के तहत हथियार और उपकरणों की खरीद के लिए सेनाओं को रक्षा वित्त विभाग के इंटीग्रेटेड फाइनेंस एडवाइजर की सहमति लेने की भी जरूरत नहीं होगी। प्राप्त अधिकार में सेना एक विक्रेता से उपकरण खरीदने का विकल्प भी चुन सकती है। ANI की रिपोर्ट के अनुसार रक्षा मंत्रालय ने कहा कि सीमा पर सुरक्षाबलों को युद्ध लड़ना है, इसलिए उन्हें निर्णय लेना होगा कि उन्हें किस हथियार या उपकरण की आवश्यकता है।

Bar Council के नियमों का उल्लंघन करते पकड़े गए प्रशांत भूषण, NGOs से दिया इस्तीफा

सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण एक बार फिर विवादों की वजह से चर्चा में हैं। उन्होंने तीन ग़ैर सरकारी संगठनों (NGOs) से इस्तीफा दे दिया है। भूषण ने सेंटर फॉर पीआईएल (CPIL), कॉमन कॉज और स्वराज अभियान नामक संगठनों से इस्तीफा दे दिया। प्रशांत भूषण ने ये क़दम तब उठाया है जब वो बार कॉउन्सिल के नियमों को ताक पर रखते हुए पकड़े गए हैं। बता दें कि प्रोफेशनल स्टैंडर्ड्स को परिभाषित करते हुए बार कॉउन्सिल के कुछ नियम हैं, जिनका सभी सदस्य वकीलों को पालन करना पड़ता है। इसके क्लॉज 9 में लिखा है कि वकील अदालत में ऐसे किसी भी प्रतिष्ठान का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते, जिसमें उन्होंने कोई पद ग्रहण कर रखा है।

प्रशांत भूषण कई बार इन संगठनों के लिए अदालत में जिरह कर चुके हैं, जिनके गवर्निंग बॉडी में वो शामिल हैं। मेजर सुरेंद्र पुनिया (रिटायर्ड) ने भूषण के ख़िलाफ़ शिकायत दायर की थी जिसके बाद उन्होंने ये क़दम उठाया। प्रशांत भूषण ने ट्वीट कर कहा कि भले ही उन्होंने इन संगठनों की गवर्निंग बॉडी से इस्तीफा दे दिया है, लेकिन वो इसके लिए लड़ना जारी रखेंगे।

प्रशांत भूषण ने कहा कि बार कॉउन्सिल ऑफ दिल्ली उनके पीछे पड़ा हुआ था क्योंकि वो इन संगठनों के लिए अदालत में केस लड़ रहे थे। बार कॉउन्सिल ने नोटिस देकर भूषण से जवाब माँगा था जिसके बाद उन्होंने इस संगठनों के लिए केस लड़ने की बात स्वीकार की थी। अब उन्होंने बार कॉउन्सिल को अपने इस्तीफे से अवगत करा दिया है।

इससे पहले भी प्रशांत भूषण ऐसी हरकतें कर चुके हैं। अदालत के फैसले को लेकर ट्विटर पर टिप्पणी करने के कारण उनसे जवाब माँगा गया था। उनके ख़िलाफ़ 87 वर्षीय अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल राव ने अवमानना केस भी किया था। 16 जनवरी को लोकपाल मामले में बहस के दौरान भारत के प्रधान न्यायाधीश ने प्रशांत भूषण को जमकर फटकार लगाई थी। प्रधान न्यायाधीश ने प्रशांत भूषण नसीहत देते हुए चीजों को सकारात्मक तरीके से देखने की बात कही थी। लोकपाल मामले पर बहस के दौरान कोर्ट में जब प्रशांत भूषण ने सर्च कमिटी के उपर सवाल खड़ा किया तो चीफ़ जस्टिस ने तल्ख अंदाज में प्रशांत भूषण को ये जवाब दिया था- “ऐसा लगता है आप जजों से भी ज्यादा जानते हैं।”

‘सबरीमला पर निर्णय के कारण ही मामले को सुन रहे हैं’: SC ने मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर कहा

कल (अप्रैल 16, 2019) सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश संबंधी एक याचिका को स्वीकार किया। इसके बाद इस मामले पर जस्टिस एस ए बोबडे और एस अब्दुल नजीर की पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है।

पुणे के एक मुस्लिम दंपति ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दायर करते हुए न्याय व्यवस्था से गुहार लगाई है कि भारत की मस्जिदों में औरतों के प्रवेश पर रोक को अवैध और असंवैधानिक घोषित किया जाए। याचिका में यासमीन जुबेर अहमद पीरजादे और जुबेर अहमद पीरजादे ने दलील दी है कि कुरान और हदीस में ऐसी किसी बात का उल्लेख नहीं है जो मस्जिद में प्रवेश के लिए लिंगभेद को जरूरी बताए। इसके अलावा संविधान में प्राप्त अधिकारों की बात रखते हुए दंपति ने अपनी याचिका में अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का हवाला दिया और मस्जिद में महिलाओं को प्रवेश न देने को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।

मस्जिद में महिलाएँ Vs मर्द: एक साथ खड़े होने का समय अब नहीं तो कब?

दंपति ने याचिका में इस बात का भी जिक्र किया है कि देश में बहुत सी औरतें इस भेदभाव से पीड़ित हैं लेकिन वो कोर्ट तक अपनी आवाज़ पहुँचाने की हालत में नहीं हैं। ध्यान रहे कि सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर की मस्जिदों में महिलाओं को जाने की अनुमति है। याचिका में सबरीमला विवाद का भी हवाला दिया गया है, जिसके मद्देनजर शीर्ष अदालत ने महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा था कि किसी भी धार्मिक स्थल में महिलाओं को पूजा-अर्चना के अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता।

दंपति की याचिका में कहा गया है कि जमात-ए-इस्लामी और मुजाहिद वर्ग के लोग महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने की अनुमति देते हैं जबकि सुन्नी समुदाय में महिलाओं के मस्जिद में जाने पर प्रतिबंध है। हालाँकि जिन मस्जिदों में महिलाओं को जाने दिया जाता है वहाँ पर उनके प्रवेश द्वार से लेकर उनके नमाज पढ़ने वाले स्थान को अलग रखा जाता है। जबकि मजहब वालों के सबसे पाक स्थल मक्का में इस तरह का भेदभाव नहीं किया जाता है। काबा में महिलाएँ और पुरूष दोनों एक साथ बैठकर नमाज़ अदा करते हैं।

इसके बावजूद याचिकाकर्ताओं के वकील के जवाबों से उच्चतम न्यायालय असंतुष्ट दिखाई दिया। पीठ कहा कि सर्वोच्च न्यायालय केरल के सबरीमला मंदिर पर अपने फैसले के कारण मामले की सुनवाई के लिए तैयार है। पीठ का कहना है कि इस मामले को सुनने का एकमात्र कारण, केरल के सबरीमाला मंदिर पर उनका फैसला है।

गौरतलब है कि पुणे के मुस्लिम दंपत्ति ने याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि विधानमंडल आम महिलाओं/मुस्लिम महिलाओं की गरिमा और उनके समानता के अधिकार सुनिश्चित करने में विफल रहा है, विशेष रूप से तब जब बात महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश को लेकर हो या फिर उनके बुर्के पहनने को लेकर हो।