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चुनाव आयोग का निर्देश- मतदान से 48 घंटे पहले नेता नहीं कर सकेंगे प्रेस कॉन्फ्रेंस

चुनाव का समय नज़दीक है। इस बीच चुनाव आयोग ने शनिवार (मार्च 30, 2019) को 41 राजनीतिक दलों को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि मतदान से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार का शोर थमने यानी कि ‘साइलेंस पीरियड’ के दौरान कोई भी नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर या फिर अखबार व टीवी के माध्यम से इंटरव्यू नहीं दे सकते।

लोकसभा के लिए सात चरणों में मतदान होगा। पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को होगा, जिसके 48 घंटे पहले यानी कि 9 अप्रैल को इस चरण के लिए चुनाव प्रचार थम जाएगा। मगर चुनाव आयोग ने ये निर्देश दिया है कि पहले चरण का चुनाव प्रचार थमने के बाद नेता दूसरे चरण में होने वाले मतदान क्षेत्रों में भी ऐसे भाषण नहीं दे सकते, जिससे पहले चरण के क्षेत्र के लिए वोट अपील करने का भाव उत्पन्न होता हो। आयोग ने यह निर्देश सभी प्रदेशों के मुख्य सचिवों तथा निर्वाचन अधिकारियों को भेज दिया है।

इसके साथ ही चुनाव आयोग ने सभी दलों से कहा है कि वे अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिदायत दें कि वे साइलेंस पीरियड का पूर्ण रूप से पालन करें। वे ऐसा कोई काम न करें, जो जनप्रतिनिधि कानून की धारा 126 की भावना के खिलाफ हो। चुनाव के 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार थमने के साथ ही ‘ड्राइ डे’ घोषित कर दिया जाएगा, और ये मतदान के समाप्त होने तक जारी रहेगा। यह आदेश विशेष प्रकार के लिकर लाइसेंस वाले संस्थानों पर भी लागू होगा।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने शनिवार (मार्च 16, 2019) को चुनाव आचार संहिता के नियमों में घोषणापत्र से संबंधित प्रावधानों को जोड़ते हुए कहा था कि मतदान से दो दिन पहले तक ही राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र जारी कर सकेंगे। प्रचार अभियान थमने के बाद यानी कि मतदान से 48 घंटे की अवधि में घोषणा पत्र जारी नहीं किया जा सकेगा। चुनाव आयोग के प्रमुख सचिव नरेन्द्र एन बुतोलिया ने सभी राजनीतिक दलों और राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को एक दिशा निर्देश जारी करते हुए कहा था कि यह समय सीमा एक या एक से अधिक चरण वाले चुनाव में समान रूप से लागू होगी।

सात तरीक़ों से देख लिया, ‘बाघ’ मोदी को ‘कुत्ता’ राहुल हरा नहीं सकता: बेजान दारूवाला

लोकसभा चुनाव सर पर हैं। ऐसे में भविष्यवाणी करने में एस्ट्रोलॉजर भी पीछे नहीं हैं। प्रसिद्ध भविष्यवक्ता बेजान दारूवाला के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत पक्की है। न्यूज़ एजेंसी ANI से बात करते हुए दारूवाला ने बताया कि मिथुन राषि के राहुल गाँधी चतुर तो हैं लेकिन वे कॉन्ग्रेस को लोकसभा चुनाव जितवा नहीं पाएँगे।

जब दारूवाला से पूछा गया कि इस साल होने वाले चुनाव में कौन जीतेगा तो उन्होंने कहा कि इस बार काँटे की टक्कर है। राहुल गाँधी अच्छे नेता तो हैं लेकिन नरेंद्र मोदी उनसे हमेशा एक कदम आगे रहते हैं। दारूवाला ने कहा कि चाइनीज़ तरीकों से भविष्यवाणी की जाए तो राहुल गाँधी ‘कुत्ता’ हैं और नरेंद्र मोदी ‘बाघ’ हैं। बेजान दारूवाला एक दो नहीं बल्कि सात तरीकों से विश्लेषण करने के बाद इस नतीजे पर पहुँचे कि राहुल चतुर तो हैं लेकिन जीतेगा ‘बाघ’ नरेंद्र मोदी ही।

हालाँकि दारूवाला ने बात को आगे बढ़ाते हुए यह भी कहा कि राहुल गाँधी मिथुन राषि के हैं और लोगों का भला सोचते हैं लेकिन कुत्ता कितना भी अच्छा हो बाघ से मुकाबला नहीं कर सकता। ध्यातव्य है कि भविष्य बताने की कला हजारों वर्षों से भारत सहित विश्व के अनेक देशों में विद्यमान है। कोई ज्योतिषीय गणनाओं से कुंडली देखकर ग्रहों की चाल बताता है तो कोई टैरो कार्ड देखकर आने वाले कल का हाल बताता है।

बेजान दारूवाला गणेश जी के भक्त हैं और भारत के एक प्रसिद्ध भविष्यवक्ता हैं। उनसे बॉलीवुड के तमाम सितारे भी सलाह लेते हैं। दारूवाला के अतिरिक्त नंदिता पांडेय ने भी NDA की विजय की भविष्यवाणी की है।

बारामूला में आतंकियों ने एक नागरिक को गोली मारी, CRPF चौकी पर किया हमला

जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी लगातार उपद्रव करने के प्रयास कर रहे हैं। शनिवार (मार्च 30, 2019) को आतंकियों ने तीन घटनाओं को अंजाम दिया। शाम 5 बजे लगभग आतंकियों ने बारामूला में एक नागरिक की गोली मारकर हत्या कर दी। आतंकियों ने बारामूला के मुख्य चौक पर इस वारदात को अंजाम दिया। मृतक नागरिक का नाम अर्जुमंद माजिद भट है। एक आम नागरिक की हत्या से हलचल मच गई है। आमतौर पर आतंकी स्थानीय नागरिकों एवं पर्यटकों को निशाना नहीं बनाते हैं। लेकिन, इस घटना ने आतंकियों के बेहद क्रूर चेहरे को उजागर किया है।

एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि आतंकियों की गोलियों से घायल भट को अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इससे पहले दहशतगर्दों ने पुलवामा में CRPF की एक पोस्ट पर हमला करने का प्रयास किया, जिसमें एक जवान जख्मी हो गया।

आतंकियों ने दोपहर 03.30 PM के आसपास पुलवामा में SBI शाखा के सामने बनी एक पोस्ट पर ग्रेनेड फेंका था। इस ब्लास्ट में एक CRPF जवान जख्मी हुआ, जिसके बाद तत्काल पुलवामा पुलिस और सेना को वारदात की जानकारी दी गई। इसके बाद मौके पर पहुँचे जवानों ने इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाकर आतंकियों की तलाश शुरू की।

इसके अलावा बनिहाल इलाके में एक कार में विस्फोट की खबर भी आई है। सुरक्षा बलों ने आशंका जताई कि यह विस्फोट नजदीक से गुजर रहे CRPF काफिले को निशाना बनाने के उद्देश्य से किया गया था।

कश्मीर में स्कूली नाबालिग बच्चों को बनाया जा रहा है स्लीपर सेल: जाँच एजेंसियों का खुलासा

पुलवामा आतंकी हमले के बाद सुरक्षाबलों ने कश्मीर में बड़ा सर्च ऑपरेशन शुरू किया था। चप्पे-चप्पे पर नजर रखी गई, उसके बाद भी आतंकी घटनाएँ होती रही। सुरक्षाबलों को यह समझ नहीं आ रहा था कि उनकी आवाजाही और सर्च ऑपरेशन की सूचनाएँ आतंकियों तक कैसे पहुँच रही हैं। इन सबके अलावा आतंकियों को हथियार-गोला बारुद और दूसरी मदद भी लगातार मिल रही हैं।

NIA ने पुलवामा हमले की जाँच के दौरान पता लगाया कि जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकियों के बड़े पैमाने पर स्लीपर सेल मौजूद हैं। हालाँकि, लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी, जैसे आतंकी संगठनों व उनके स्लीपर सेल का अंदेशा तो जाँच एजेंसियों को पहले भी था, लेकिन स्कूली बच्चों का इस्तेमाल, यह एक राज ही बना हुआ था। दो सप्ताह पहले जाँच एजेंसियों ने इस सम्बन्ध में गृह मंत्रालय को एक रिपोर्ट भी सौंपी है।

₹1,500 है नाबालिग बच्चों को स्लीपर सेल बनाने की कीमत

पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों ने जम्मू-कश्मीर में नाबालिग स्कूली बच्चों का सहारा लेना  दिया है। सुरक्षा एवं जाँच एजेंसियों ने इस मामले में एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश किया है। जम्मू-कश्मीर के 178 हायर सेकेंडरी स्कूल और 41 हाईस्कूल ऐसे मिले हैं, जहाँ आतंकी संगठन अपने स्लीपर सेल के जरिए बच्चों को गुमराह कर आतंक के रास्ते पर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। फोन टैपिंग के जरिए जो बातें सामने आई हैं, उसके मुताबिक इस नेक्सस में स्कूल के अध्यापक, चतुर्थ श्रेणी स्टाफ और 5 सरकारी विभाग, वन, लोक निर्माण, श्रम विभाग, मंडी और परिवहन शामिल हैं। आतंकी संगठनों ने सभी स्कूल में स्लीपर सेल के लिए अलग-अलग कोड जारी किए हैं। नाबालिगों को भारतीय सुरक्षाबलों के खिलाफ भड़का कर उन्हें पहली किश्त के तौर ₹1,500 भी देते हैं।

जाँच एजेंसियों के अधिकारियों का कहना है कि आतंकी संगठन स्कूली बच्चों को नाबालिग होने की वजह से अपना स्लीपर सेल बना रहे हैं। वे जानते हैं कि अगर 100 बच्चों में से 20 बच्चे भी लंबे समय तक आतंकी संगठन के साथ जुड़े रहे तो वे सुरक्षाबलों को भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं। स्कूली बच्चों पर किसी को शक नहीं होगा और ये पकड़े गए तो जुवेनाइल एक्ट में जल्द छूट जाएँगे, इन्हीं वजहों से इन बच्चों को आसान हथियार बनाया जा रहा है।

पाकिस्तान से कोड वर्ड्स में आता है बच्चों को जिहाद की शिक्षा देने का सन्देश

आतंकियों की ऐसी सोच है कि बच्चों को जो भी काम सौंपा जाएगा, वे उसे आसानी से पूरा कर देंगे। पिछले माह जम्मू में बस अड्डे पर जो ग्रेनेड फेंका गया था, उसमें ऐसे ही बच्चों का इस्तेमाल किया गया था। हालाँकि, पुलिस अभी उनके दस्तावेज जाँच रही है। जम्मू-कश्मीर में स्लीपर सेल को धन की मदद देने वाले कथित अलगाववादी एवं दूसरे असामाजिक तत्व बच्चों के आधार कार्ड की फोटो प्रति उनके बैग में डलवा देते हैं। जो कॉल इंटरसेप्ट की गई, उसमें पाकिस्तान से आतंकी संगठन का एक सदस्य कह रहा है कि बच्चों को जिहाद की जानकारी देनी शुरू करो। स्कूल के बाद उन्हें खेल के बहाने जंगल या दूसरी किसी सुनसान जगह पर बुलाओ। अगर पैसे कम पड़ रहे हों तो स्लीपर सेल कोड वर्ड (साहबजादा) को बोल देना। बच्चों को जेहाद के यंत्र (कोड वर्ड) यानी हथियारों की जानकारी भी दे दो।

अनंतनाग-25 स्कूल, बांदीपोरा-15 हाई और 8 हायर सेकेंडरी स्कूल, बारामुला में 34 हाई और 14 हायर सेकेंडरी स्कूल, बड़गांव में 18 हायर सेकेंडरी स्कूल, डोडा में 11, कठुआ में 5, किश्तवाड़ में 13, कुलगांव में 8, कुपवाड़ा में 17 हाई व 21 हायर सेकेंडरी, शोपियां में 21 और पुलवामा में 11 हायर सेकेंडरी स्कूल शामिल हैं। इसके अलावा कई हाईस्कूलों में भी स्लीपर सेल अपनी गतिविधियाँ संचालित कर रहे हैं।

जो स्टूडेंट हायर सेकेंडरी स्तर पर हैं, उन्हें हर माह एक तय राशि दी जाए। बच्चों को एक छोटी सी पुस्तिका भी दी जाती है, जिसमें आतंकी संगठन खुद के बारे में बताते हैं। वे खुद को कश्मीर के लोगों का साथ देने वाले बताते हैं। जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी का कहना है कि पाकिस्तान का इन बच्चों को आतंक की राह पर ले जाने का मकसद बड़ा साफ है। अगर कभी इन बच्चों ने किसी बड़ी वारदात को अंजाम दिया या आतंकियों की मदद की तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह कहा जा सकेगा कि इसमें पाकिस्तान का हाथ नहीं है, ये सब भारतीय बच्चे हैं।

स्कूल और स्टाफ है आसान निशाना

जाँच एजेंसियों के अनुसार, स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी स्टाफ को स्लीपर सेल के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। कई जगहों पर अध्यापक भी आतंकी संगठनों के संपर्क में हैं। इसके अलावा कुछ ड्राइवर-कंडक्टर स्लीपर सेल बने हैं। स्कूलों से बाहर, लोक निर्माण विभाग, वन विभाग, परिवहन, श्रम विभाग और मंडी जैसे विभागों में बड़े स्तर पर स्लीपर सेल बनाए जा रहे हैं। आतंकियों को सबसे बड़ी मदद परिवहन विभाग से मिल रही है।

अलगाववादी नेता इन विभागों और आतंकी संगठनों के बीच की कड़ी का काम करते हैं। NIA, जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना, अर्धसैनिक बल, आईबी, RAW, एनटीआरओ और ईडी जैसी एजेंसियों को संयुक्त तौर से इस ऑपरेशन में लगाया गया है। गौरतलब है कि ऐसी खबरें पिछले साल भी आई थीं।

कॉन्ग्रेसी राज के वो दिन, जब देश को मजबूत बनाने की सोचने वाले जिंदा नहीं बचते थे

मिशन शक्ति की कामयाबी के साथ भारत दुनिया के उन तीन शक्तिशाली देशों अमरीका, रुस और चीन के साथ उस क्लब में सम्मिलित हो गया, जिनके पास उपग्रह आधारित अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणाली है। भारत ने आज पूर्णत: स्वदेशी उपग्रह निरोधी मिसाइल (एंटी सैटेलाइट मिसाइल) ए-सैट का सफलतापूर्वक परीक्षण करते हुये उपग्रह मार गिराने के साथ ही स्पेसस्ट्राइक की क्षमता हासिल कर ली। यह देश का न केवल बड़ा गौरव है, बल्कि भारत के रक्षा के क्षेत्र में मील का पत्थर है। किंतु दुर्भाग्य जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की इस उपलब्धि की घोषणा की तो देश की जनता का माथा गर्व से उठ गया, लेकिन कॉन्ग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने भारतीय वैज्ञानिकों की इस असाधारण उपलब्धि पर भी सवाल उठाते हुए इसे प्रधानमंत्री मोदी के साथ ही देश को नीचा दिखाने का बहाना बना लिया।

वह भी दौर था, जब इस तरह की प्रणाली या देश की रक्षा से संबंधित किसी बड़ी परियोजना पर सोचने पर शीर्ष रक्षा वैज्ञानिकों की संदिग्ध मौत हो जाती थी। भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहाँगीर भाभा और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई की संदिग्ध मौत भला कैसे भूल जाएँ!

एक पत्रकार ग्रेगरी डगलस और अमरीका की खुफिया एजेंसी सीआईए के एक अफसर के बीच बातचीत (11 जुलाई, 2008) में यह खुलासा हुआ था कि भाभा की मौत में सीआईए की भूमिका थी। सीआईए की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ था। डॉ भाभा का एयर इंडिया बोइंग 707 विमान स्विस आल्प्स में उस समय क्रैश हो गया था जब वो एक बैठक में भाग लेने वियना जा रहे थे। अक्टूबर, 1965 में डॉ भाभा ने आकाशवाणी पर घोषणा की कि यदि उन्हें अनुमति मिली तो वे भारत को 18 माह के भीतर नाभिकीय बम बनाने की क्षमता वाला देश बना देंगे। इसके ठीक दो माह बाद 24 जनवरी, 1966 को विमान क्रैश होने पर उनकी संदिग्ध मृत्यु हो गयी।

इस तथ्य को जानने से पहले एक और रहस्यमयी बात जानना आवश्यक है। जिस समय डॉ भाभा ने यह घोषणा की थी, उस समय देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे। यह समझा जा सकता है कि भारत को परमाणु सम्पन्न बनाने को लेकर शास्त्री जी ने डॉ भाभा को हरी झंडी दे दी होगी, इसीलिए आकाशवाणी पर उन्होंने इसकी घोषणा की थी। इस घोषणा के दो माह बाद ही 11 जनवरी, 1966 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की तत्कालीन सोवियत रूस के ताशंकद में रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी।

स्वतंत्र प्रेक्षकों को संदेह है कि शास्त्री जी को विष देकर मारा गया था। अंतिम समय में शास्त्री जी के साथ रहे उनके व्यक्तिगत चिकित्सक डॉ आर.एन. चुग इसके गवाह थे। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद इस मामले की जाँच शुरू की गयी। डॉ चुग को संसद में उस दिन की पूरी घटना पर गवाही देनी थी और वे सड़क मार्ग से संसद सत्र में भाग लेने दिल्ली आ रहे थे कि एक ट्रक ने रहस्मयी ढंग से उनकी कार को टक्कर मार दी और वे व उनकी पत्नी की मौत मौके पर ही हो गयी।

यह और रहस्यमय बात है कि शास़्त्री जी की संदिग्ध मौत के बाद, 12 दिन बाद ही 24 जनवरी को कॉन्ग्रेस की इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं और उसी दिन डॉ. भाभा की संदिग्ध मृत्यु हो गयी। डॉ. भाभा की भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र बनाने की घोषणा और इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के दिन तक की घटनाओं के बीच संबंधों को लेकर अक्सर संदेह के बादल मँडराते हैं। क्या लाल बहादुर शास्त्री और डॉ भाभा दोनों की संदिग्ध मृत्यु का कारण इन दोनों विभूतियों द्वारा भारत को शक्तिसम्पन्न राष्ट्र बनाने का संयुक्त रूप से बीड़ा उठाना था?

बता दें कि इसके बाद भारत परमाणु सम्पन्न राष्ट्र तब बना जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की अटल बिहारी बाजपेयी सरकार बनीं। 11-13 मई, 1998 को अटल जी ने पोखरण परमाणु परीक्षण किया, जिसके बाद विश्व ने भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र के रूप में मान्यता दी। हालाँकि, इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में भी 18 मई, 1974 को भी पोखरण में परमाणु परीक्षण करने का दावा किया गया था, लेकिन विश्व ने भारत के इस दावे को खारिज कर दिया था।

भारत में अमरीका के राजदूत व सांसद रहे डेनियल पैट्रिक मॉयनिहन ने अपनी पुस्तक में खुलासा किया था कि सीआईए कॉन्ग्रेस को फंडिंग करती थी। यह भी आरोप लगे हैं कि इंदिरा गाँधी रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी से भी धन लेती थीं। 1967 के चुनाव में इंदिरा गाँधी की कॉन्ग्रेस ने केजीबी से धन लिया था। केजीबी के वगीकृत (गोपनीय) दस्तावेज लीक हुए तो यह खुलासा हुआ था। सीआईए की रिपोर्ट में भी यह दावा किया गया था। केजीबी पेपर्स के हवाले से द टेलीग्राफ अखबार की 25 अक्टूबर, 2005 की एक रिपोर्ट के मुताबिक जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में ही केजीबी संवेदनशील प्रतिष्ठानों में घुसपैठ कर चुकी थी।

2005 में ही केजीबी के पूर्व जासूस वसीलाई मित्रोखिन ने अपनी पुस्तक में खुलासा किया था कि केजीबी ने कॉन्ग्रेस पार्टी के चुनाव प्रचार के लिये इंदिरा गाँधी को सूटकेसों में भरकर रुपए भेजे थे। इसके अतिरिक्त नेहरू के चहेते और उनकी कैबिनेट में रक्षा मंत्री वीके कृष्णमेनन के चुनाव के लिये केजीबी ने पैसा दिया था और 1970 में चार अन्य केंद्रीय मंत्रियों को अलग से धन मुहैया कराया था। सीआईए की एक रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि राजीव गाँधी के मंत्रिमंडल में केजीबी के लोग थे।

यहाँ ये तथ्य उजागर करने का कारण यह है कि आज जब कॉन्ग्रेस भारत को अंतरिक्ष महाशक्ति बनाने की भारतीय वैज्ञानिकों और वर्तमान नेतृत्व की उपलब्धि को झुठलाने के लिए मिशन शक्ति का श्रेय भी जबरन इंदिरा गाँधी को दे रही है तो देश को इस सवाल का जवाब भी ढूँढना चाहिए कि इंदिरा का शास्त्री जी, डॉ भाभा और विक्रम साराभाई की संदिग्ध मृत्यु और इससे भारत के परमाणु कार्यक्रम ठप पड़ने का क्या संबंध है?

डॉ भाभा की तरह ही विक्रम साराभाई भी देश को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में आगे ले जाना चाहते थे और उनके प्रयासों से ही 1962 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान राष्ट्रीय समिति (आईएनसीओएसपीएआर) गठित हुयी थी, जिसे 1969 में भंग कर दिया गया और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना की गयी। जो प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतरिक्ष विभाग के अधीन कार्य करती है। विक्रम साराभाई देश को अंतरिक्ष शक्ति बनाने के काम में लग गए और उनकी अगुवाई में देश का पहला उपग्रह आर्यभट्ट तैयार होने लगा। किंतु, 30 दिसम्बर 1971 को उनकी भी तिरुअनंतपुरम में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी। उनका पोस्टमार्टम तक नहीं कराया गया। साराभाई की बेटी मल्लिका साराभाई ने अपने पिता की मौत में साजिश का संदेह जताते हुए सरकार द्वारा पोस्टमार्टम न कराए जाने के निर्णय पर सवाल उठाया था।

“विक्रम साराभाई ए लाइफ” पुस्तक में अमृता शाह ने साराभाई की निकट सहयोगी कमला चौधरी के हवाले से लिखा है कि साराभाई ने उनसे अपने जीवन पर खतरे की बात बताई थी। इसी तरह स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन विकसित कर देश को उपग्रह प्रक्षेपण क्षेत्र में शक्तिशाली बनाने की परियोजना का हिस्सा रहे डॉ नम्बी नारायणन का किस्सा भी जगजाहिर है। जनवरी 1991 में तत्कालीन सरकार ने रूस के साथ तकनीक हस्तांतरण के साथ 7 क्रायोजनिक राकेट इंजन क्रय करने का 235 करोड़ रुपए का समझौता हुआ था। इसके बाद डा. नारायणन उन तीन वैज्ञानिकों में शामिल थे, जिन्होंने समझौते के तहत रूस जाकर इस पर काम किया था। अमरीका के दबाव में जब रूस ने 1993 में भारत को क्रायोजनिक इंजन की तकनीक देने से इनकार कर दिया तो इसरो वैज्ञानिकों ने इसे खुद बनाने की ठान ली।

नारायण स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन के प्रोजेक्ट को लीड कर रहे थे। लेकिन तत्कालीन कॉन्ग्रेस शासन में दिसम्बर 1994 में डॉ नारायणन को जासूस होने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया। जाँच में उनके ऊपर लगे आरोप झूठे पाये गए और बरी किए गए। इस बीच अटल जी की सरकार बनने के बाद इस प्रोजेक्ट पर काम तेज कर दिया गया और इसरो स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन विकसित करने की ओर सफलतापूर्वक बढ़ने लगा। 2004 में अटल जी की सरकार चली गयी और कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सत्ता में आई तथा दस साल बाद 5 जनवरी 2014 को स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।

जिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में भारत को अंतरिक्ष की महाशक्ति बनने की इतनी बड़ी उपलब्धि मिली है, उन पर व्यंग्य मारने वाले कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से यह पूछा जाना चाहिए कि उनकी माँ और तत्कालीन कॉन्ग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गाँधी के इशारे पर चलने वाली मनमोहन सरकार द्वारा देश की सेना को आधुनिक हथियारों, लड़ाकू विमानों व साजोसामान से वंचित कर देश की सुरक्षा को खतरनाक स्थिति में लाने का षडयंत्र क्यों हुआ? मिशन शक्ति की उपलब्धि पर प्रश्न उठाने वाले कॉन्ग्रेस से यह भी पूछा जाना चाहिए कि इंदिरा के समय से लेकर सोनिया व राहुल तक चाहे देश के शीर्ष रक्षा वैज्ञानिकों की रहस्यमयी व अचानक मृत्यु की घटनाएँ हों अथवा कॉन्ग्रेस की अगुवाई में विपक्षी दलों द्वारा राफेल सौदे, सर्जिकल स्ट्राइक व एयरस्ट्राइक पर चीन और पाकिस्तान की मदद कर देश की सुरक्षा खतरे में डालने वाली षडयंत्रकारी बयानबाजी हो अथवा 2007 और 2012 में इसरो द्वारा ए-सैट मिसाइल कार्यक्रम के प्रस्ताव की अनुमति न देने के पीछे उनकी सरकार और पार्टी की मंशा क्या थी?

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने साफ कहा कि भारत के पास एक दशक से पहले भी ऐंटी सैटलाइट मिसाइल क्षमता थी, लेकिन उस समय राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण इसे सफलतापूर्वक अंजाम नहीं दिया जा सका। जिस समय चीन ने 2007 में यह परीक्षण किया और अपने मौसम उपग्रह को मार गिराया, उस समय भी भारत के पास ऐसा ही मिशन पूरा करने की तकनीक थी। नायर ने कहा, “अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी पहल की है। उनके पास राजनीतिक इच्छा शक्ति है और साहस है, यह कहने का कि हम इसे करेंगे। इसका प्रदर्शन अब हमने पूरी दुनिया को कर दिया है।”

रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (डीआरडीओ) इसरो के पूर्व अध्यक्ष वीके सारस्वत ने भी कहा कि उन्होंने 2012 में कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सरकार को इसके परीक्षण का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन तब उन्होंने इसकी अनुमति देने के बजाय इस पर रोक लगा दी। इस सफलता का श्रेय मोदी सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति व साहस को ही जाता है। मोदी सरकार के कार्यकाल में जब ए-सैट मिसाइल पर काम शुरू हुआ तो डीआडीओ के मुखिया सारस्वत थे।

मोदी विरोध के लिए देश की उपलब्धियों को झुठलाने वाली कॉन्ग्रेस व विपक्षी दल फिर कटघरे में हैं। आज नहीं कल, लोग उनसे हिसाब माँगेंगे और पूछेंगे कि देश को मजबूत बनाने वालों की संदिग्ध मौत और भारत को असुरक्षित बनाने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी के इतिहास में इतने ब्लैक होल क्यों हैं?

ममता-राज में TMC की हिंसक सच्चाई इंटरनेट पर ‘आमार भॉय लागे’ के नाम से आई सामने

बंगाल में तृणमूल के काडर ने किस तरह की दहशत हवा में घोल रखी है, इसे आपके फोन पर, आपकी आँखों के आगे नंगा सच दिखाती, एक वेब-सीरीज़ बांग्लभाषी नेट सर्कलों में और सोशल मीडिया पर शेयर हो रही है। 5 से 7 मिनट प्रति एपिसोड की यह साक्षात्कार सीरीज़ राज्य के विभिन्न हिस्सों में लोगों में गहरे पैठ चुके तृणमूल आतंक को बयाँ करती है।

तेजाब, शराब: सबमें डूबी है तृणमूल

स्वराज्य पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक ‘आमार भॉय लागे’ (मुझे डर लगता है) नाम की इस वेब-सीरीज़ के एपिसोड यूट्यूब पर अपलोड होने के साथ तेज़ी से शेयर हो रहे हैं और भारी संख्या में देखे जा रहे हैं। पहला एपिसोड मोनिशा पईलान नामक युवती पर है, जो कि एसिड-अटैक-सर्वाइवर (चेहरे पर तेज़ाब फेंके जाने से उबर रही) है। हमले का आरोपी सलीम हलदर नामक तृणमूल कार्यकर्ता है। दक्षिण 24-परगना के हसनपुर में मोनिशा पर हमला रात के दस बजे हुआ, जब वह एक कंप्यूटर-सेंटर से लौट रहीं थीं। जैसे ही वह हसनपुरा पहुँचीं, किसी ने उनका नाम पुकारा और जैसे ही मोनिशा ने मुड़ कर देखा, हमलावरों ने चेहरे पर तेजाब फेंक दिया।

चेहरा बुरी तरह जल जाने के अलावा मोनिशा ने एक आँख की पूरी रोशनी भी खो दी। 23-वर्षीया मोनिशा सलीम की पूर्व-पत्नी है और दोनों का तलाक हमले के पहले ही हो चुका था। वीडियो का description यह भी कहता है कि यह शादी मोनिशा के 18 साल के होने पर जोर-जबर्दस्ती से हुई थी, पर पति-पत्नी की नहीं बनी और जल्दी ही तलाक हो गया।

पर सलीम ने मोनिशा को अपना माल-असबाब समझना नहीं छोड़ा। उन्हें पुरुषों से बात करते देख कर उसे ईर्ष्या होने लगी और उसने मोनिशा को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। दो बार पिस्तौल तान कर भी धमकी दी। रिपोर्ट के अनुसार उसे इस गुनाह के दो साल बाद गिरफ्तार किया गया और वह एक महीने में ही जेल से छूट भी गया।

दूसरा एपिसोड तापोश मंडल नामक एक भाजपा कार्यकर्ता पर है जिस पर तृणमूल कार्यकर्ताओं ने हमला किया था। तापोश 2016 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा का प्रचार कर रहे थे।

तीसरे एपिसोड में एक युवक की कहानी है जिसपर अवैध शराब का व्यापार कर रहे गुंडों ने हमला कर उसके साथ निर्मम मारपीट की। आरोप है कि वह गुंडे स्थानीय तृणमूल नेताओं के पाले हुए थे।

सभी एपिसोड ऐसी ही दहशत की घुटन से लबालब हैं। सभी तृणमूल कॉन्ग्रेस के काडर के सताए हैं, और हर एक केस में न्याय मिलना शेष है। सभी पीड़ितों ने पुलिस के असहयोग की भी बात की, और कुछ ने तो यह भी कहा है कि पुलिस ने उल्टा उन्हें ही और भी प्रताड़ित किया, जबकि आरोपितों को खुला छोड़ दिया।

दीदी की समुदाय विशेष में भी केवल वोट देने वालों के प्रति है ममता

अमित हसन नामक युवक की कहानी का विशेष ज़िक्र जरूरी है। सातवें एपिसोड में उन्हीं की कहानी है और दिखाती है कि कैसे ‘दीदी’ के लिए दूसरे समुदाय वालों में भी केवल खुद को वोट देने वाले हिन्दुतानी जिहादी-कठमुल्ले और बांग्लादेशी-रोहिंग्या घुसपैठिए ही जरूरी हैं। अमित भाजपा की छात्र इकाई ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) के सदस्य हैं और 2013 से ही तृणमूल के निशाने पर हैं।

2016 में उनके साथ भी तापोश की ही तरह बेरहमी से मारपीट हुई। इसके अलावा उन्हें जबरन जहरीली शराब भी पिलाई गई। उनकी जान किसी तरह बच पाई लेकिन पुलिस ने उनका केस दर्ज करने से साफ इंकार कर दिया। इसके बावजूद वह आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा के प्रचार के लिए मैदान में हैं। उनके अनुसार यदि सभी लोग डरे रहेंगे तो तृणमूल वालों की हिम्मत बढ़ती जाएगी और यह आतंक का राज कभी खत्म नहीं होगा। इसलिए उन्हें तृणमूल के आतंक का सामना करने का खतरा उठाना ही पड़ेगा।

मैं विदेश में भारतीयों के हितों की चौकीदारी कर रही हूंँ, इसलिए चौकीदार हूँ: सुषमा स्वराज

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने शनिवार (मार्च 30, 2019) को बताया कि जर्मनी में म्यूनिख के निकट एक अप्रवासी ने भारतीय दंपति पर चाकू से हमला किया। इस घटना में  पुरुष की मौत हो गई, जबकि उनकी पत्नी घायल हैं। सुषमा स्वराज ने ट्वीट करके कहा, “भारतीय दंपति प्रशांत और स्मिता बसारूर पर म्यूनिख के निकट एक अप्रवासी व्यक्ति ने चाकू से हमला किया। दुर्भाग्यवश प्रशांत की मौत हो गई। स्मिता की हालत स्थिर है। हम प्रशांत के भाई की जर्मनी यात्रा का प्रबंध कर रहे हैं। शोक संतप्त परिवार के प्रति मेरी संवादनाएँ।”

जर्मनी के म्यूनिख में शुक्रवार (मार्च 29, 2019) सुबह करीब 7 बजे भारतीय दंपति के साथ उनके ही अपार्टमेंट पर रहने वाले एक व्यक्ति से बहस हुई। बहस इतनी बढ़ गई कि व्यक्ति ने दंपति पर चाकुओं से हमला कर दिया। हमले के दौरान प्रशांत के सिर पर चाकुओं से कई वार किए गए। दंपति की चीख-पुकार सुनकर उसी परिसर में रहने वाले पड़ोसियों ने पुलिस को बुलाया। पुलिस ने आरोपित व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया है। इस दंपति को पिछले साल ही जर्मनी की नागरिकता मिली थी।

सुषमा स्वराज द्वारा मामले को MEA के अंतर्गत सम्भाले जाने की सूचना ट्विटर पर देने के दौरान सुषमा स्वराज से एक ट्विटर यूजर ने पूछा कि भाजपा की ‘सबसे संवेदनशील नेता’ ने अपने नाम के आगे ‘चौकीदार’ क्यों जोड़ा है? इस पर सुषमा स्वराज ने जवाब देते हुए कहा, “क्योंकि मैं विदेश में भारत और भारतीय नागरिकों के हितों की चौकीदारी कर रही हूंँ।”

क्यों दफ़्न किए गए दस्तावेज़? क्या सोनिया गाँधी का इतालवी परिवार बोफोर्स घोटाले में शामिल था?

बोफोर्स घोटाला एक ऐसा मामला है जिसने लगभग 3 दशकों तक देश को उलझाए रखा। कई लीक हुई ख़बरों से इस बात का ख़ुलासा हुआ था कि यह शायद पहला अंतर-महाद्वीप रक्षा घोटाला था जो स्वतंत्र भारत में सामने आया था और राजीव गाँधी इसके बीच की सबसे अहम कड़ी थे। यह पहला घोटाला था, जिसने गाँधी-नेहरू राजवंशों को आम जनता की नज़रों से गिरा दिया था। आज के समय में उनके अन्य घोटाले जैसे नेशनल हेराल्ड, जिसमें सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी कथित रूप से शामिल हैं, रॉबर्ट वाड्रा के भूमि घोटाले या राहुल और प्रियंका गाँधी के स्वयं के संदिग्ध भूमि सौदे जिनके बारे में सच्चाई उजागर हो चुकी है।

जब 1980 के दशक में पहली बार यह घोटाला प्रकाशित हुआ था, तब कॉन्ग्रेस पार्टी ने बोफोर्स घोटाले को कोई मुद्दा ही नहीं माना था। हालाँकि, इस घोटाले पर से परदा उठता रहा और दस्तावेज़ो के ज़रिए सच्चाई सामने आती रही। अब तक, केवल राजीव गाँधी का ही नाम बोफोर्स घोटाले में लिया जाता था और सोनिया गाँधी का संबंध क्वात्रोची से था, जिसने इस घोटाले में बिचौलिए की भूमिका निभाई थी। बता दें कि क्वात्रोची, सोनिया गाँधी के क़रीबी दोस्त थे। इस सच को जानने के बाद सोनिया गाँधी और बोफोर्स घोटाले के बीच कनेक्शन होने का शक़ गहराता जा रहा है।

ऑपइंडिया ने इस तरफ अपना ध्यान केंद्रित किया और सबूतों को प्राप्त करने की दिशा में क़दम आगे बढ़ाए जिससे यह पता चल सके कि कहीं सोनिया गाँधी और उनका इटैलियन परिवार बोफोर्स घोटाले में शामिल तो नहीं था और फिर उनके नाम सार्वजनिक रूप से छिपा दिए गए हों। दस्तावेज़ रूपी साक्ष्य इस तथ्य की ओर भी इशारा करते हैं कि शायद, राजीव गाँधी और राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली भारत सरकार (GOI) को ख़ुद कथित तौर पर इस भागीदारी की जानकारी पहले से ही थी और सक्रिय रूप से इसे कवर (छिपाने) करने की कोशिश की गई।

दस्तावेज़ में सोनिया गाँधी के बहनोई के नाम का उल्लेख है

सितंबर 1987 में, भारत सरकार और बोफोर्स के कार्यकर्त्ता एक चर्चा के लिए मिले थे। अप्रैल 1987 में स्वीडिश रेडियो द्वारा यह आरोप लगाने के कुछ महीने बाद ही आरोप लगाया गया था कि कॉन्ग्रेसियों, भारत सरकार और स्वीडन को बड़े पैमाने पर रिश्वत अदा की गई थी। भारत सरकार और बोफोर्स प्रतिनिधियों के बीच हुई इस गुप्त बैठक का सारांश रिकॉर्ड ऑपइंडिया द्वारा एक्सेस किया गया है।

यह बैठक रक्षा मंत्रालय में 15, 16 और 18 सितंबर 1987 को हुई थी। GOI टीम में, तत्कालीन रक्षा सचिव एसके भटनागर, तत्कालीन कानून सचिव पीके करथा, प्रधानमंत्री के विशेष सचिव जीके अरोड़ा और रक्षा मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव एनएन वोहरा शामिल थे। GOI टीम को रक्षा मंत्रालय के ज्वॉइन सेक्रेटरी (ऑर्डनेंस) टीके बनर्जी ने सहायता प्रदान की। बोफोर्स प्रतिनिधिमंडल में Per Ove Morberg (बोफोर्स के अध्यक्ष) और Lars Gothlin (वरिष्ठ उपाध्यक्ष और मुख्य न्यायविद, नोबेल इंडस्ट्रीज) शामिल थे।

चर्चा स्वयं में आपसी छल, संभवतः ब्लैकमेलिंग और राज़ छिपाने की गाथा थी। दिलचस्प है, झूठ बोलने और यह सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में कि कोई रिश्वत नहीं दी गई थी, बोफोर्स ने दो दिलचस्प नामों वाल्टर विंची और वैल डे मोरो का उल्लेख किया है।


इस बैठक के दौरान, बोफोर्स प्रतिनिधियों ने AE सर्विसेज सहित कई फर्मों को भुगतान करने से इनकार कर दिया, जिसमें क्वात्रोची जुड़ा हुआ था। यह बाद में यह दस्तावेज़ सीधे क्वात्रोची के पास गए। वे कई अन्य फर्मों को भुगतान करने से भी मना किया गया, जिन्हें बाद के चरण में पूरा करने का दावा किया गया। ये दावे भी झूठे साबित हुए और दस्तावेज़ो से पता चलता है कि भारत सरकार जानती थी कि झूठ को खत्म किया जा रहा है।

दस्तावेज़ में वाल्टर विंची और वैल डे मोरो के नामों के साइड में “a relation of PM” का उल्लेख है। जाहिर है, अगर विंची और मोरो को ‘पीएम का संबंधी’ कहा जा रहा है, तो इसका मतलब होगा कि वे सोनिया गाँधी से संबंधित थे।

कम से कम यह कहना तो बनता है कि सोनिया गाँधी का परिवार जो इटली से रहता है, वो किसी मायावी परिवार से कम नहीं है। सोनिया गाँधी के पिता और उनकी माँ के अलावा ऐसा कुछ भी उपलब्ध नहीं है जिससे उनके परिवार के इतिहास का पता लग सके। सोनिया मैनो का जन्म 9 दिसंबर 1946 को इटली के वेनेटो में विसेंज़ा से लगभग 35 किलोमीटर दूर सिम्ब्रियन-भाषी गाँव लुसियाना में हुआ था। उनके पिता स्टेफानो कथित तौर पर बेनिटो मुसोलिनी और फासीवादी पार्टी के एक वफ़ादार समर्थक थे। सोनिया मेनो गाँधी की कथित तौर पर दो बहनें हैं जो अभी भी अपनी माँ के साथ ओरबासानो में रहती हैं।

सोनिया गाँधी को दो नामों के साथ जोड़ने में हमें एक लंबा समय लगा, भले ही यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि वाल्टर विंची और वाल डे मोरो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी, सोनिया गाँधी के पति के रिश्तेदार थे।

हमें 2004 के टाइम्स ऑफ़ इंडिया पर प्रकाशित एक लेख मिला जिसमें सोनिया गाँधी की भतीजी का नाम अरुणा विंची और उसकी बहन अलेसांद्रा के रूप में उल्लेखित है। यह लेख टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इतालवी पत्रकार एस्टेले एरियल के साथ बातचीत पर आधारित था।

‘The Red Sari’ पुस्तक में सोनिया की बहनों के रूप में अनुष्का (यह बताया गया है कि उनका उपनाम अल्लसांद्रा था) और नादिया का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकलता है कि वाल्टर विंची अनुष्का के पति थे।

पुस्तक में, दूसरे नाम के लिए वैल डे मोरो का सच सामने आता है। रशीद किदवई, जो गाँधी के एक वफ़ादार पत्रकार हैं, ने ‘सोनिया’ नाम से सोनिया गाँधी की जीवनी लिखी है।

रशीद किदवई ने अपनी पुस्तक में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि 1984 और 1989 के बीच, सोनिया गाँधी (राजीव गाँधी की पत्नी), क्वात्रोची (बोफोर्स घोटाले में मुख्य बिचौलिया) और जेव वल्देमोरो अच्छे दोस्त थे। उन्होंने कहा कि सोनिया गाँधी के लिए सप्ताह का सबसे अच्छा दिन रविवार का दिन होता था, उस दिन “ये दोस्त” एक साथ मिलते थे। पुस्तक में इस बात का भी उल्लेख है कि वल्देमोरो की शादी सोनिया गाँधी की बहन नादिया से हुई थी और वह उस समय दिल्ली में कार्यरत थीं।


इस प्रकार यह स्थापित होता है कि बैठक के सारांश में जिन दो नामों का उल्लेख किया गया है, वाल्टर विंची और वैल डी मोरो सोनिया गाँधी के बहनोई थे।

GOI और बोफोर्स के बीच बैठक में इन नामों का उल्लेख क्यों किया गया?

सितंबर 1987 में हुई एक बैठक को लेकर वाल्टर विंची और वैल डी मोरो के नामों पर कई सवाल उठ खड़े होते हैं। बैठक के सारांश में मूल रूप से कहा गया है कि बोफोर्स ने दावा किया है कि बोफोर्स सौदे में रिश्वत के रूप में इन दोनों व्यक्तियों को कोई भुगतान नहीं किया गया था। ये दो नाम कई अन्य नामों में से एक हैं।

पूरे सारांश में बोफोर्स घोटाले को देखने के लिए गठित जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) को प्रासंगिक जानकारी नहीं देने के लिए भारत सरकार को घुमा-घुमाकर पेश किया गया। दूसरी तरफ, ऐसा लगता है कि भारत सरकार ने जेपीसी में आने वाली सूचनाओं को हटाकर अपने स्वयं के ट्रैक को कवर किया है।

दिलचस्प बात यह है कि इस बैठक के आयोजित होने से पहले, वाल्टर विंची और वैल डे मोरो का नाम बोफोर्स संदर्भ में कभी नहीं आया था। अभी तक, लीक किए गए दस्तावेज़ो के आधार पर पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यन द्वारा जाँच और रिपोर्ट पहले से ही प्रकाशित की जा रही थी। हालाँकि उनके पास वे सभी (350+) दस्तावेज़ नहीं थे, जिन्हें वह अंततः हासिल कर लेंगी। चित्रा के साथ मेरी बातचीत में, वह इस बात की पुष्टि करती हैं कि उन्होंने अब तक, किसी दस्तावेज़, रिपोर्ट या जानकारी में वाल्टर विंची और वैल डे मोरो का उल्लेख नहीं किया था। बाद में 1989-1990 तक सोनिया गाँधी के परिवार को सौदे से लाभ होने की अफ़वाहें सामने आईं और तब भी दस्तावेज़ी सबूत नहीं थे। चित्रा का कहना है कि अफवाहें शुरू होने के बाद उन्होंने एक बार अपने स्रोत, स्टेन लिंडस्ट्रॉम से इस बात की पुष्टि की जो स्वीडन में बोफोर्स मामले की जाँच कर रहा था, उससे पूछा कि क्या उसने इन दो नामों के बारे में सुना है। चित्रा के अनुसार, स्टेन लिंडस्ट्रॉम को भी इन दो नामोंं के बारे में कई जानकारी नहीं थी।

स्टेन लिंडस्ट्रॉम का कथन यह सिद्ध करता है कि गॉसिप के अलावा जो बहुत बाद में सामने आए उसमें सोनिया गाँधी के बहनोई के ख़िलाफ़ कोई आरोप नहीं थे।

ऐसा कहा जाता है कि इस संबंध में पूछे जाने वाले प्रश्न हमेशा ही संदेहास्पद रहते हैं। इस बैठक में, वाल्टर विंची और वैल डे मोरो के नाम बिना किसी सवाल के पूछे गए थे। जबकि सोनिया गाँधी के बहनोई का उल्लेख किया गया था जबकि क्वात्रोची का उल्लेख नहीं किया गया था।

यह एक आसान सवाल है: वाल्टर विंची और वाल डे मोरो के नामों का उल्लेख क्यों किया गया?

ब्लैकमेल किया गया

जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) के सामने बोफोर्स के प्रतिनिधि भारत में थे। जेपीसी सुनवाई से ठीक पहले बैठक के सारांश में, यह स्पष्ट था कि बोफोर्स जेपीसी से जानकारी गुप्त रखने के लिए बोफोर्स प्रतिनिधि भारत सरकार को घुमा रहे थे। बैठक के दौरान कई बार, गोपनीयता के खंड को दोहराया गया और बोफोर्स के प्रतिनिधि इस बात पर ज़ोर देते रहे कि वे जेपीसी के समक्ष नहीं रखना चाहेंगे क्योंकि फिर जानकारी गुप्त नहीं रह पाएगी। वरिष्ठ बोफोर्स प्रतिनिधिमंडल मूल रूप से, जेपीसी के समक्ष प्रदान की जाने वाली जानकारी के बारे में एक रास्ता खोजने के लिए बैठक कर रहा था। दस्तावेज़ों में बोफोर्स ने सीधे तौर पर राजीव गाँधी सरकार को “गुप्त” जानकारी रखने की धमकी दी थी।

बोफोर्स द्वारा अपनाई गई धमकी भरे लहज़े का सीधा परिणाम यह था कि भारत सरकार ने माना था कि कुछ जानकारी को ‘गुप्त’ रखने के लिए उन्हें वर्गीकृत किया जाएगा।


राजीव सरकार ने इस तरह बोफोर्स प्रतिनिधियों को मनाया कि कुछ सूचनाएँ जनता से गुप्त रखी जाएँगी, और अगर ज़रूरत पड़ी तो जेपीसी से भी उन सूचनाओं को गुप्त रखा जाएगा।

बोफोर्स प्रतिनिधि भी यह जानने का इच्छुक था कि जानकारियों को कैसे गुप्त रखा जाएगा।

इस बैठक में विश्वास का एक विशाल उल्लंघन भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया गया। राजीव गाँधी सरकार इंगित करती है कि जेपीसी के “संदर्भ की शर्तें” बोफोर्स प्रतिनिधियों को उपलब्ध कराई गई थीं।

अंशों और सामान्य रूप से बैठक के सारांश से यह स्पष्ट है कि बोफोर्स प्रतिनिधियों ने राजीव गाँधी के नेतृत्व में भारत सरकार को ब्लैकमेल करने के लिए हर चाल संभल कर चली। यह ब्लैकमेलिंग एक ऐसे पड़ाव तक जा पहुँची, जहाँ भारत सरकार ने जनता से जानकारियों को गुप्त रखने की बात भी स्वीकार ली।

किसी भी ब्लैकमेल का आधार यह है कि ब्लैकमेलर के पास मोलभाव करने वाली चिप होनी चाहिए। जानकारी का एक टुकड़ा इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि व्यक्ति या संस्थान को ब्लैकमेलर की इच्छाओं के अनुरूप बड़ी सरलता से बाँधा-घुमाया और ब्लैकमेल किया जा सकता है।

राजीव गाँधी की भूमिका और अन्य सरकारी अधिकारियों की भूमिका लंबे समय से स्थापित है। आश्चर्य इस बात पर होता है कि इस साज़िश के सौदे में सिर्फ़ राजीव गाँधी की व्यक्तिगत भागीदारी ही नहीं बल्कि सोनिया गाँधी के इतालवी परिवार की भी भागीदारी थी, जो अब तक आँखों से दूर थी।

क्या राजीव गाँधी को पता था?

सितंबर 1989 की एक कवर स्टोरी में, इंडिया टुडे ने एक चौंकाने वाला ख़ुलासा किया। इस कहानी में उल्लेख किया गया था कि सेना पूरी तरह से बोफोर्स सौदे को रद्द करने के पक्ष में थी। सेना का विचार था कि बोफोर्स को असली दोषियों के नाम और सौदे में रिश्वत प्राप्त करने वालों के नामों का खुलासा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। जनरल सुंदरजी ने इंडिया टुडे को बताया था कि रक्षा मंत्रालय ने उनसे इस सौदे को रद्द करने में शामिल जोखिमों के बारे में पूछा था, जिसके बारे में जनरल सुंदरजी ने कहा था कि जोखिम सेना को स्वीकार्य थे। वास्तव में, उन्होंने यह भी सिफ़ारिश की थी कि सौदा रद्द कर दिया गया है, इसलिए नहीं कि उन्होंने होवित्जर की गुणवत्ता पर संदेह किया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने यह भी माना कि वित्तीय दबाव बोफोर्स को असली दोषियों को प्रकट करने के लिए मजबूर करेगा। अरुण सिंह भी इस योजना के पक्ष में थे।

हालाँकि, राजीव गाँधी ने कथित तौर पर 4 जुलाई 1987 को एक बैठक बुलाई और रक्षा मंत्रालय को सूचित किया कि कड़े रुख वाली रणनीति को लागू करें क्योंकि वे अपनी हदों को पार कर रहे थे। इसके तुरंत बाद, अरुण सिंह ने इस्तीफ़ा दे दिया। इंडिया टुडे ने उस समय के राजीव गाँधी का वर्णन “विक्षिप्त व्यक्ति” के रूप में किया था। कथित तौर पर, राजीव गाँधी ने अपनी सरकार को बोफोर्स के लिए मजबूर करने से रोकने के लिए रिश्वत के असली दोषियों के नाम का खुलासा किया था। उन्होंने पहले ही (11 जून को) एक जेपीसी के गठन की अनुमति दी थी, और अब यह जेपीसी का काम है कि वो किस निष्कर्ष के साथ सामने आती है।

किसी के भी मन में यह सवाल उठ सकता है कि राजीव गाँधी यह सुनिश्चित करने के लिए क्यों उत्सुक थे कि बोफोर्स असली नाम उजागर नहीं करेगा। यदि सौदा रद्द कर दिया गया था और वित्तीय दबाव तब बोफोर्स द्वारा महसूस किया गया था, जैसा कि जनरल सुंदरजी द्वारा सुझाया गया था, असली दोषियों के नाम सामने आ सकते हैं। सितंबर 1987 में आयोजित बैठक में वाल्टर विंची और वैल डी मोरो के नामों को आधिकारिक तौर पर लिया गया था, राजीव गाँधी ने यह सुनिश्चित किया कि बोफोर्स के ख़िलाफ़ कोई “हार्ड लाइन” नहीं ली गई। निश्चित रूप से, वैध रूप से पूछ सकते हैं कि राजीव गाँधी किसकी रक्षा करना चाह रहे थे। क्या राजीव गाँधी को पहले से ही सोनिया गाँधी की भागीदारी का पता था? और उसके और वो उनके इतालवी परिवार की रक्षा करने की कोशिश कर रहे थे।

जैसा कि पहले बताया गया था, GOI अधिकारियों और बोफोर्स के प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई बैठक न तो यह सुनिश्चित करने के लिए आपसी हाथ-जोड़-तोड़ की रणनीति थी कि न तो GOI और न ही बोफोर्स के अधिकारियों ने रिश्वत के संदर्भ में जेपीसी के आगे अपना मुँह खोला और न ही कोई विवरण प्रकट किया। सरकार द्वारा या बोफोर्स द्वारा जेपीसी के लिए कोई वास्तविक जानकारी सामने नहीं आई। सच तो यह है कि मिली-भगत रूप से जानकारियों को छिपाने की कोशिश की जा रही थी।

उदाहरण के लिए, बोफोर्स प्रतिनिधियों के जेपीसी से मिलने से ठीक पहले हुई बैठक में वाल्टर विंची और वैल डे मोरो के नाम लिए गए थे। जेपीसी में ही, जब दोनों प्रतिनिधियों से पूछताछ की जा रही थी, तो वे नाम एक बार भी सामने नहीं आए। जेपीसी ने कभी भी बोफोर्स के प्रतिनिधियों या रक्षा सचिव से नहीं पूछा कि सरकार का प्रतिनिधित्व क्यों करते हैं, ये दोनों नाम बैठक के दौरान क्यों सामने आए थे।

क्वात्रोची और सोनिया गाँधी घनिष्ठ मित्र थे, ऐसे में यह कल्पना करना वास्तव में बहुत कठिन है कि राजीव गाँधी ख़ुद अपनी पत्नी की भागीदारी के बारे में नहीं जानते थे। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और बोफोर्स के प्रतिनिधियों के बीच हुई इस बैठक से बहुत पहले पूर्व राष्ट्रपति अर्दो की डायरी में कहा गया था कि इस सौदे में क्वात्रोची की अहम भूमिका थी।

भारत सरकार ने क्वात्रोची के ख़िलाफ़ शुरुआत से ही जाँच को नाकाम कर दिया था। 1999 में, केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने चार्जशीट में बोफोर्स घूस के लिए एक आरोप-पत्र नामित किया। उसके ख़िलाफ़ मामला जून 2003 में मज़बूत हुआ था जब इंटरपोल ने क्वात्रोची और उसकी पत्नी मारिया द्वारा बीएसआई एजी बैंक, लंदन के साथ दो बैंक खातों का खुलासा किया, जिसमें यूरो 3 मिलियन और $ 1 मिलियन थे। जनवरी 2006 में, इन फ्रीज़ हुए बैंक खातों को अप्रत्याशित रूप से भारत के क़ानून मंत्रालय द्वारा जारी किया गया था, जाहिर तौर पर सीबीआई की सहमति के बिना जिन्होंने उन्हें फ्रीज करने के लिए कहा था।

6 फरवरी 2007 को इंटरपोल के वारंट के आधार पर क्वात्रोची को अर्जेंटीना में हिरासत में लिया गया था। भारतीय जाँच एजेंसी CBI ने अपने प्रत्यर्पण के लिए आधा-अधूरा प्रयास करने के लिए हमला किया और भारत जून 2007 में अपने प्रत्यर्पण के लिए मुकदमा हार गया। इस मामले में न्यायाधीश ने टिप्पणी की थी कि “भारत ने उचित क़ानूनी दस्तावेज़ भी पेश नहीं किए”। नतीजतन, भारत को क्वात्रोची के क़ानूनी खर्चों का भुगतान करने के लिए कहा गया। 2009 में, इंटरपोल ने कॉन्ग्रेस सरकार के तहत CBI के इशारे पर क्वात्रोची के ख़िलाफ़ रेड कॉर्नर नोटिस भी हटा दिया गया।

वास्तव में, मनमोहन सिंह द्वारा क्वात्रोची के ख़िलाफ़ जाँच छोड़ने का कारण यह था कि ‘किसी व्यक्ति को परेशान करना अच्छा नहीं जब दुनिया को लगता हो कि हमारे पास उसके ख़िलाफ़ कोई ठोस दस्तावेज़ नहीं हैं’। 13 अगस्त, 1999 को, सोनिया गाँधी ने भी अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्वात्रोची के लिए बात की और कहा, “सीबीआई ने मुझे संदिग्ध पाया है। लेकिन हमने आज तक नहीं देखा कि उसने कुछ किया है।”

यहाँ उल्लेख किया जाना चाहिए कि 2005 में, एक आयकर न्यायाधिकरण पीठ ने फैसला सुनाया कि भारत में बोफोर्स एजेंट क्वात्रोची और विन चड्ढा को रिश्वत में 410 मिलियन रुपए का भुगतान किया गया था।

पूरे कॉन्ग्रेसी तंत्र ने लंबे समय से बोफोर्स घोटाले में किसी भी तरह के दोष के लिए सिर्फ़ राजीव गाँधी को ढाल बनाने की कोशिश की है। राजीव गाँधी ने बोफोर्स को स्पष्ट रूप से कहा था कि किसी भी बिचौलिए को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा। यह ठीक उसी तर्क की पंक्ति है जो जेपीसी रिपोर्ट में भी की गई थी। रक्षा सचिव एसके भटनागर ने कहा था कि राजीव गाँधी ने बोफोर्स और स्वीडिश प्रधानमंत्री ओलाफ पाल्मे को भी बताया था कि किसी भी बिचौलिए को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा।

घटनाओं का यह पूरा क्रम एक महत्वपूर्ण प्रश्न को जन्म देता है: इस घोटाले में क्वात्रोची एक अहम भूमिका में था और यह भी साबित हो गया कि उसे बड़े पैमाने पर रिश्वत का भुगतान किया गया था। जबकि घटनाओं के इस पूरे क्रम में, अफ़वाहें 1990 के दशक में बहुत बाद में सामने आईं थीं कि वाल्टर विंची और वैल डी मोरो बोफोर्स घोटाले के बाद बड़े पैमाने पर अमीर हो गए थे, दोनों के तार सीधे तौर पर घोटाले से जुड़े थे। वास्तव में, जैसा कि समझाया गया है, GOI और बोफोर्स प्रतिनिधियों के बीच बैठक में नामों को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई। राजीव गाँधी के साथ-साथ सोनिया गाँधी को भी जाँच से बचाने की कोशिश की गई। राजीव गाँधी को विवरण रखने के लिए बोफोर्स द्वारा ब्लैकमेल किया जा रहा था। इस पर भी सवाल उठता है कि क्या क्वात्रोची, वाल्टर विंची और वैल डे मोरो को पैसा दिलवाने का एक ज़रिया था और बोफोर्स घोटाले में सोनिया गाँधी के शामिल होने की असली सीमा क्या है?

‘रिंगबर्ग बहुत सारे सवाल पूछ रहा है’

स्टॉकहोम के मुख्य ज़िला अभियोजक लार्स रिंगबर्ग ने अगस्त 1987 में बोफोर्स घोटाले की एक स्वतंत्र जाँच शुरू की। बाद में, उन्होंने जाँच को छोड़ दिया क्योंकि न तो भारत सरकार और न ही स्वीडिश सरकार सहयोग कर रही थी। ऑपइंडिया ने बोफोर्स चीफ़ मार्टिन आर्डबो द्वारा एक हस्तलिखित नोट एक्सेस किया जिसमें कहा गया था कि “रिंगबर्ग बहुत सारे सवाल पूछ रहा है” और “अगर पुलिस को पता चल जाए तो क्या करना है”।

यह स्पष्ट है कि आर्डबो पुलिस को “कुछ पता लगने” से चिंतित था और उसी डायरी प्रविष्टि में, उसने यह भी कहा है कि “रिंगबर्ग बहुत सारे सवाल पूछ रहा है”। यह, निश्चित रूप से, इस सवाल का जवाब देता है कि अर्डबो रिंगबर्ग से सवाल पूछे जाने से क्यों इतना डरता था। जबकि रिंगबर्ग को भारत और स्वीडन के सहयोग की कमी और स्वीडिश पीएम ओलोफ पाल्मे और राजीव गाँधी के आपसी संबंध के कारण अपनी स्वतंत्र जाँच छोड़नी पड़ी, तब सोचने वाली बात यह है कि क्या जाँचकर्ता विपरीत परिस्थितियों में काम कर रहे थे जबकि दोनों सरकारों ने न केवल पैसा कमाया, बल्कि भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की पत्नी का परिवार भी इसमें शामिल था।

स्टीन लिंडस्ट्रॉम के साथ रिपब्लिक टीवी के विशेष साक्षात्कार में, उन्होंने ख़ुलासा किया था कि 1986 की शुरुआत में, राजीव गाँधी ने स्वीडिश प्रधानमंत्री ओलाफ पाल्मे के साथ उड़ान भरी थी जहाँ उन्होंने विशेष रूप से रिश्वत के बारे में बात की थी। लिंडस्ट्रॉम ने कहा कि आर्डबो ने अपने अंतिम दिनों में लिंडस्ट्रॉम को बताया था कि वह उस बातचीत में शामिल थे और राजीव ने विशेष रूप से पाल्मे को एक ट्रस्ट को पैसे हस्तांतरित करने के लिए कहा था जो विशेष रूप से इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाया गया था। इस प्रकार, उन्होंने ख़ुलासा किया था कि रिश्वत को लेकर शीर्ष स्तर पर चर्चा की गई थी।

यह तथ्य कि राजीव गाँधी सीधे तौर पर रिश्वत की बातचीत में शामिल थे, वहीं ऑपइंडिया के नए ख़ुलासे के साथ, ऐसा लगता है कि सोनिया गाँधी का इटैलियन परिवार भी इसमें शामिल था। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि रिंगबर्ग द्वारा गवाही देने पर भी यह मामला आगे नहीं बढ़ सका।

लिंडस्ट्रॉम ने 1998 में आउटलुक को दिए एक साक्षात्कार में उल्लेख किया था कि सोनिया गाँधी घोटाले की अनदेखी नहीं कर सकती हैं।

गाँधी परिवार की भागीदारी के बारे में एक सवाल के लिए, उन्होंने कहा था:

अधिक विवरण उपलब्ध होने तक, यह कहना मुश्किल है। लेकिन गाँधी परिवार, विशेष रूप से अब सोनिया को यह बताना चाहिए कि क्वात्रोची के स्वामित्व वाली कंपनियों को बोफोर्स सौदे से भुगतान के रूप में इतनी मोटी रकम कैसे मिली। आखिर क्वात्रोची से सोनिया और गाँधी परिवार का क्या संबंध है? किसने क्वात्रोची और उनके AE सर्विसेज को बोफोर्स में पेश किया? कम से कम एक बात निश्चित रूप से अब ज्ञात है कि अदायगी का एक हिस्सा निश्चित रूप से क्वात्रोची के पास भी गया था। अब यह क़ानूनी स्थिति है और क्या सरकारों को दिलचस्पी दिखानी चाहिए, अब एक औपचारिक मामला तो दर्ज किया ही जा सकता है।

एक और सवाल जो पूछा गया था, “आपके पास किस तरह के दस्तावेज़ हैं? और क्या वे अदायगी करने वालों पर कोई प्रकाश डालते हैं? ”

उन्होंने कहा था:

कुछ परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं। यह एक लंबी कहानी है। मैं इसे जल्दबाज़ी में नहीं समझा सकता। मैं सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि सभी दस्तावेज़ गाँधी परिवार की ओर इशारा करते हैं। सच्चाई से रूबरू होने का एक अच्छा तरीका यह है कि सोनिया अपने पत्ते टेबल पर रख दें। मगर वो ऐसा करें ये मुश्किल बात लगती है।

जब ऑपइंडिया टीम बोफोर्स इंडिया सौदे की प्रमुख जाँचकर्ता चित्रा सुब्रमण्यम के पास पहुँची, और उनसे पूछा कि जाँच कभी भी अपने तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सकती है और भारत और स्वीडन के बीच संयुक्त जाँच क्यों नहीं हुई, इस पर उन्होंने कहा:

अंतर्राष्ट्रीय जाँच के मामलों में दस्तावेज़ों का आदान-प्रदान करने वाले देशों के लिए, सवाल पूछने वाले देश (इस मामले में भारत) के पास देश की अदालत में केस दर्ज होना चाहिए जिसके आधार पर जानकारी प्रदान करने वाला देश (इस मामले में स्वीडन) सहायता कर सकता है। यह कहना भारत के लिए निराशाजनक है कि स्वीडन ने सहयोग नहीं किया और उनके साथ दस्तावेज़ो को भी साझा नहीं किया, जिसमें SNAB रिपोर्ट भी शामिल थी। वह कौन-सा आधार था जिसके तहत उस समय इस तरह की सूचनाओं का आदान-प्रदान होना चाहिए था, भारत में ऐसा कोई मामला नहीं था।

यह घोटाला भारत की सरकार के साथ 410 क्षेत्र हॉवित्जर तोपों की बिक्री के लिए स्वीडिश हथियार निर्माता बोफोर्स के बीच 1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सौदे में अदा की गई अवैध रिश्वत से संबंधित है जोकि कॉन्ट्रेक्ट की राशि का लगभग दोगुना थी। यह स्वीडन में अब तक का सबसे बड़ा हथियार सौदा था, और विकास परियोजनाओं के लिए चिह्नित धन को किसी भी क़ीमत पर इस अनुबंध को सुरक्षित करने के लिए मोड़ दिया गया था। जाँच में नियमों के उल्लंघन और संस्थानों को दरकिनार करने की बात सामने आई। 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और बोफोर्स के बीच इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। 16 अप्रैल 1987 को स्वीडिश रेडियो ने ख़ुलासा किया कि इस सौदे के लिए भारत सरकार और स्वीडन के पदाधिकारियों को बड़े पैमाने पर रिश्वत का भुगतान किया गया था। और इस प्रकार, स्वीडिश पुलिस अधिकारी और बोफोर्स सौदे के मुख्य अन्वेषक स्टेन लिंडस्ट्रॉम के ज़रिए इस घोटाले की परतें खुलती चली गई। स्टेन लिंडस्ट्रॉम ने सुब्रमण्यम को स्वीडन, स्विट्जरलैंड और भारत में रिश्वत और इस घोटाले को कवर-अप करने से संबंधित 350 दस्तावेज़ सौंपे।

चित्रा ने कहा:

अब तक, कोई भी भारतीय जाँच एजेंसी आधिकारिक तौर पर स्टेन लिंडस्ट्रॉम के संपर्क में नहीं है।

बहु-आयामी बोफोर्स घोटाला 3 दशक पुराना है और अब लगता है कि अपनी अंतिम यात्रा पर है। लेकिन तीन दशकों के बाद भी, नई जानकारी अब सामने आती रहती है और फिर हमें उस व्यापक विश्वासघात की एक झलक देखने को मिलती है। यह केवल वित्तीय रूप से अक्षमता से ही संबंधित नहीं था बल्कि इसमें दो राष्ट्रों और कई स्वतंत्र जाँचकर्ताओं और पत्रकारों को दोषी ठहराया गया था। अब इस सबूत के साथ कि सोनिया गाँधी का इतालवी परिवार घोटाले में भूमिका निभा सकता था, इस नए सवाल ने अतीत के सवालों को पीछे छोड़ दिया है। यह एक ऐसा घोटाला है जो कई सवालों के साथ जनता के समक्ष है लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि इसका परिणाम आज भी मानों कहीं दफ़न हो। उम्मीद है कि अगर इस मामले की निष्पक्ष जाँच हो तभी शायद देश की जनता सच जान सकेगी।

यह मूल खबर OpIndia English की एडिटर नुपुर जे शर्मा की है, जिसका अनुवाद प्रीति कमल ने किया है।

आजादी के बाद पहली बार ‘सरकारी MEME’, PIB क्यों उतर आई MEME की दुनिया में?

संसाधनों और तकनीक का इस्तेमाल यदि सही कार्य और दिशा में किया जाए तो सृजन अवश्य होता है। विगत कुछ समय में सरकारी संस्थाओं को अक्सर समाज के लिए सन्देश देने के लिए रचनात्मकता का प्रयोग करते हुए देखा गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आजकल सोशल मीडिया पर बॉलीवुड और खेल जगत से लेकर अन्य नामी हस्तियों से समाज में मतदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सहयोग करने की अपील करते हुए देखा गया है। इसी तरह की एक नई पहल PIB (Press Information Bureau) ने मतदाताओं से वोट डालने के लिए शुरू की है।

PIB सोशल मीडिया के माध्यम से MEME बनाकर जनता से मतदान करने का सन्देश दे रहा है। एक MEME में PIB युवाओं से मतदान के दिन मोबाइल पर PUBG खेलने की जगह मतदान करने का निर्देश दे रहा है।

वहीं दूसरे MEME में ऋतिक रोशन की फिल्म कृष के सीन के द्वारा कहा गया है कि वोटिंग करना वोटर की शक्ति है और उसे इसका सही इस्तेमाल मतदान कर के करना चाहिए।

सोशल मीडिया के ट्रेंड्स रोचक और लुभावने होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इनके प्रति खूब जागरूक रहते हैं। कुछ दिन पहले ही मसखरे अंदाज में स्कूल के बच्चों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि बच्चे PUBG खेलते हैं, इसलिए उनका ध्यान पढ़ाई में कम लगता है।

वहीं कुछ मीडिया गिरोह ऐसे भी हैं जो रचनात्मकता का प्रयोग सृजन की जगह भी नकारात्मकता को बढ़ावा देने के लिए करते हैं। TOI ने सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प ग्रुप्स से MEME उठाकर उन पर फैक्ट चेक करते हुए कहा था कि क्रिस गेल ने कृष्ण गोयल बनकर भाजपा जॉइन नहीं की है।

पुलवामा में CRPF के बंकर पर आतंकियों ने फेंका ग्रेनेड, 1 जवान घायल

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों द्वारा सुरक्षा बलों के एक बंकर पर ग्रेनेड फेंक कर निशाना बनाया गया। इस हमले में एक जवान के घायल होने की खबर है। यह हमला पुलवामा में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शाखा के बाहर सुरक्षाबलों के बने बंकर पर हुआ।

मीडिया खबरों के अनुसार इस हमले घायल हुए सीआरपीएफ जवान को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है। जवान का नाम सूरजचंद है। वह 182 बटालियन में तैनात थे। इस घटना की जानकारी होते ही सुरक्षाबलों ने उस क्षेत्र की छानबीन करनी शुरू कर दी हैं। आतंकियों के मौक़े से फरार होने पर सुरक्षाबलों द्वारा तलाशी अभियान भी शुरु किया जा चुका है।

पुलवामा के एसएसपी चंदन कोहली ने बताया है कि इस हमले में एक जवान घायल हुआ है। इलाज के लिए उसे अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया है।

बता दें कि जम्मू-कश्मीर में बनिहाल से आज (मार्च 30, 2019) को एक कार ब्लास्ट की खबर आई थी। वो भी वहाँ जहाँ से सुरक्षाबलों का काफिला गुज़र रहा था। बहुत से मीडिया खबरों ने इसे सिलिंडर फटने के कारण हुई दुर्घटना करार दिया।

लेकिन कार के ड्राइवर के फरार होने के कारण इस मामले पर भी संदेह बराबर बना हुआ। बाद में पता चला कि कार में गैस सिलिंडर होने की पुष्टि नहीं हुई है। जिसके कारण इसे भी आतंकियों की ही एक चाल कहा जा सकता है।