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खबरदार दक्षिणपंथियों! तुम HAHA का रिएक्शन मत देना, यह काम वामपंथियों पर छोड़ दो

भारत देश अभी आतंकवाद की घटना से उबरा नहीं था कि न्यूजीलैंड में भी एक वीभत्स नरसंहार की घटना सामने आई है, जिसमें एक बन्दूकधारी ने लगभग 50 लोगों को मार दिया। न्यूजीलैंड के शहर क्राइस्टचर्च की मस्जिद में किए गए हमले में इस 28 वर्षीय आरोपित का नाम है, ब्रेनटेन टैरेंट! लेकिन अचानक से यह हास्य की घटना में क्यों तब्दील हो गई?

यह घटना तब तक एक सामान्य घटना थी, जब तक भारत में बैठे मीडिया गिरोह के गिद्धों को ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमन्त्री ने उनके मतलब की ‘जानकारी’ नहीं उपलब्ध करवाई थी। यह ‘जानकारी’ थी इस घटना के बाद ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन द्वारा की गई कड़ी निंदा! उन्होंने ब्रेनटेन टैरेंट नाम के उस आरोपित को ‘दक्षिणपंथी आतंकवादी’ बताकर तुरंत हमारे मीडिया गिरोह में बैठे भेड़ियों के लिए काम आसान कर दिया।

पेशे से पत्रकार किन्तु दिमाग से ‘न्यूट्रल’ सागरिका घोष और बरखा दत्त ने फ़ौरन इस लाइन को बेचकर सस्ती लोकप्रियता जुटाना शुरू कर दिया। लेकिन ‘येन केन प्रकारेण’ लोकप्रियता जुटाने की इस कला में वो अक्सर भूल जाती हैं कि वो वास्तविक मुद्दे और समस्या से एक बार फिर लोगों का ध्यान भटका चुके हैं।

जो पत्रकार पुलवामा आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार जिहाद की मानसिकता को कभी जिहाद नहीं बोल पाए हैं, वो अगर इस प्रकार की घटना को तुरंत किसी ‘पंथ’ से जोड़ दें और इसे आतंकवाद घोषित करने के लिए क्रान्ति छेड़ देते हैं, तो समझ आता है कि यह सिर्फ और सिर्फ किसी विचारधारा के प्रति कुंठा के कारण ही ऐसा करते हैं। लेकिन फिर सवाल यह भी है कि अगर किसी विचारधारा के प्रति कुंठा आपको ऐसा करने पर मजबूर करती है, तो इस तरह से 49 मुस्लिमों को मारकर वीडियो बनाने वाले व्यक्ति को आप किस प्रकार से दोषी ठहरा पाएँगे?

इस घटना को दक्षिणपंथी आतंकवाद ठहराने पर प्रतिक्रिया होना भी स्वाभाविक है और वो लोग जिनके खिलाफ ऐसे मीडिया गिरोह के गिद्ध जहर भरकर बैठे हुए हैं, उन्होंने भी अपनी राय रखनी शुरू कर दी है।

दक्षिणपंथी विचारधारा को आतंकवाद से जोड़ने की हड़बड़ी कुछ लोगों में इतनी रहती है कि वो भूल जाते हैं कि ये उनकी हरकतों का ही नतीजा ही है कि लोग न्यूजीलैंड की इस घटना पर लिखना शुरू करते हैं – ‘Just for a change, it was not a Muslim person this time।’ यानि, यह चौंकाने वाली बात है कि आतंकवाद शब्द चर्चा में है और इसमें मजहब विशेष का योगदान नहीं है।

इतना ही नहीं, भारतीय मीडिया के समुदाय विशेष की इस नीच हरकत के जवाब में कुछ लोगों ने लिखा है, “न्यूज़ीलैंड में अभी एक मस्ज़िद पर हमला हुआ। फ़ॉर आ रिफ्रेशिंग चेंज, हमलावर शांतिदूत नहीं था। हमलावर न्यूज़ीलैंड का एक आम क्रिस्चियन नागरिक था। जिसे सजा देकर उसका भविष्य खराब नहीं किया जाना चाहिए, हो सकता है वो किसी हेडमास्टर का बेटा हो।” कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने एक कदम आगे जा कर इन्हीं पत्रकारिता के कलंकों पर कटाक्ष करते हुए लिखा है, “Just wondering, no one from our neutral Media Giroh has tweeted yet – “सरहदों पर बहुत तनाव है क्या, कुछ पता तो करो चुनाव है क्या।” ऐसा प्रश्न शायद इसलिए किया गया है क्योंकि पत्रकारिता से जुड़े कुछ लोगों ने पुलवामा आतंकी हमले को कॉन्सपिरेसी थ्योरी की सारी हदें पार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव जीतने की साजिश बताया था।

दक्षिणपंथी अगर चाहें तो तख्तियाँ पकड़कर यूट्यूब पर उसे वायरल कर ब्रेनटेन टैरेंट को भटका हुआ नौजवान साबित करने का अभियान चला सकते हैं। या उसे निर्दोष साबित करने और क्षमायाचना के लिए इंटरनेट पर ऑनलाइन पिटीशन भी साइन करवा सकते हैं। लेकिन उन्हें आतंकवाद को आतंकवाद कहना आता है, ना कि गोदी मीडिया की तरह आतंकवादियों को विक्टिम कार्ड जैसे खिलौने देकर उन्हें समर्पण के बजाए गौरवान्वित महसूस करवाते हैं।

खुद को अन्य लोगों से ज्यादा सभ्य और पढ़ा-लिखा बताने वाला यह मीडिया गिरोह जब आतकंवाद को दक्षिणपंथ से जोड़ने का प्रपंच रचता है तो प्रतिक्रिया में लोग उन्हीं की भाषा में जवाब देकर अपना विरोध जताते हैं। इसके बाद यदि यही लोग न्यूजीलैंड में हुई 49 लोगों की मौत की खबर पर सोशल मीडिया पर जाकर ‘HAHA’ और ‘दिल’ बनाकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, तो ये सब मात्र आपके द्वारा उन्हें लगातार लज्जित किए जाने के प्रयासों पर प्रतिक्रिया मात्र है और आपने इस पर शिकायत करने का अधिकार खो दिया है।

आतंकवादी बुरहान वानी के प्रति उसके नाम की वजह से सहानुभूति रखकर उसे एक हेडमास्टर का बेटा बताने वाली बरखा दत्त कल से एक क्रांतिकारी अभियान पर हैं। बरखा दत्त किसी भी शर्त पर चाहती हैं कि आरोपित ब्रेनटेन टैरेंट को आतंकवादी घोषित किया जाए। यह दोहरा नजरिया ही इन लोगों को पत्रकार नहीं बल्कि सामाजिक ट्रॉल की उपाधि देता है और दक्षिणपंथी इन्हें पत्रकारिता का आतंकवाद कहने से नहीं हिचकिचाते हैं।

49 लोगों की हत्या पर HAHA करने वालों को एक बार सोचना चाहिए कि उनकी प्रतिक्रिया करने का तरीका तार्किक नहीं है। सवाल कीजिए तो जवाब मिलता है कि पुलवामा में जिहाद के नाम पर घटी आतंकवादी घटना पर भारतीय बलिदानी सैनिकों की मृत्यु की खबर पर ऐसे लोगों ने इसी प्रकार की अतार्किक प्रतिक्रिया दी थी, जिनके नाम में उनका मजहब नहीं ढूँढा जाना चाहिए। उनका मानना है कि यदि वो इस मीडिया गिरोह के लाडले हैं तो फिर ये लाडले बनने का अधिकार दक्षिणपंथियों को भी अवश्य मिलना चाहिए।

वास्तव में, यदि देखा जाए तो पुलवामा आतंकवादी घटना के बाद पाकिस्तान जैसे देश भी भारत को शान्ति और मानवता का पाठ पढ़ाते नजर आ रहे थे। इसमें इसी पत्रकारिता के समुदाय विशेष ने काफी चरमसुख की प्राप्ति की थी। लेकिन नरेंद्र मोदी और भारतीय सेना को  पाकिस्तान को सबक सिखाने का दृढ़ निश्चय लेता देख इमरान खान की हाँ में हाँ मिलाने और उसकी तारीफ करने वाला यह पत्रकारिता का धूर्त गिरोह यह भूल जाना चाहता है कि यही वो शांतिदूतों का देश पाकिस्तान है, जो लगातार हमारे देश में आतंकवाद को प्रोत्साहन देता रहा है। ये वही शांतिदूत हैं जो पिछले कई दशकों से भारत देश को लगातार खून और आतंकवाद का तोहफा देते आए हैं।

क्या है आतंकवाद की जड़

अब यदि भारत देश की सहिष्णुता की तुलना करें तो हम देखेंगे कि कल न्यूजीलैंड में हुई इस घटना के आरोपित ब्रेनटेन टैरेंट ने एक मेनिफेस्टो (घोषणापत्र) जारी कर लिखा था, “न्यूज़ीलैंड की डेमोग्राफी तेज़ी से बदल रही है, बाहर से इस्लामिक लोग तेज़ी से अंदर आ रहे हैं और अपने आप को मल्टीप्लाई कर रहे हैं, उसे रोको।”

अगर देखा जाए तो ब्रेनटेन टैरेंट का मुद्दा बहुत सरल था, सारी उथल-पुथल के बीच उसे भी सुना जाना चाहिए। वो एक हिंसक मानसिकता के द्वारा पीड़ित व्यक्ति था, जिसका मकसद समाज और अपनी सरकार को एक सन्देश देना था। बेशक ब्रेनटेन मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति था, लेकिन उसके अंदर ये घृणा मात्र एक दिन में नहीं उपजी थी। यह निरंतर हुई कुछ घटनाओं का ही परिणाम था, जिसने उसे इतना बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर किया।

आरोपित ब्रेनटेन ने 49 लोगों को मार गिराने के पीछे कारण देते हुए इबा (Ebba) का जिक्र किया और कहा कि ऐसा कर के उसने Ebba का बदला लिया है। Ebba गूँगी-बहरी बच्ची थी, जो स्कूल से लौटते समय एक चोर की गाड़ी का शिकार हुई थी। यह हादसा 7 अप्रैल 2017 के दिन स्टॉकहॉम में हुई थी। Ebba स्कूल से आ रही थी और एक वैन ने Ebba को कुचल दिया। वैन चलाने वाला एक मुस्लिम शरणार्थी था। उस समय कल की घटना का आरोपित ब्रेनटेन यूरोप भ्रमण पर था और इस घटना ने उसके मन मष्तिष्क पर गहरा आघात पहुँचाया था। ब्रेनटेन ने अपने घोषणापत्र में लिखा है कि इस्लाम को अन्य धर्म पसन्द नहीं हैं और इस्लाम को जो शरण देता है, इस्लाम उसे भी अपना शिकार बनाने से नहीं चुकता है। इस प्रकार यह क्रिया पर प्रतिक्रिया का उदाहरण है। लेकिन मानवता को ताक पर इस तरह के घृणित कदम सिर्फ कोई पीड़ित मानसिकता का ही व्यक्ति कर सकता है और इस मानसिकता का कोई धर्म नहीं होता है।

साधन की पवित्रता

महात्मा गाँधी हमेशा साधन की पवित्रता पर बल देते थे। हिंसा और आतंकवाद किसी भी तरह से साधन और समाधान नहीं माने जा सकते हैं। इसी तरह से अपनी मानसिकता को ऊँचा साबित करने के लिए अन्य किसी मानसिकता को नीचा बताने का निरंतर प्रयास भी एक पवित्र साधन नहीं हो सकता है। अब आतंकवादियों के आतंकवाद की तुलना भारतीय मीडिया गिरोह के पत्रकारों से कर के देखिए। ये भी सिर्फ दूसरी मानसिकता और विचारधारा से ही संघर्षरत नजर आते हैं, जिस कारण इसे ‘पत्रकारिता का आतंकवाद’ कहा जाना चाहिए। इसी संघर्ष में हमारे देश का यह मीडिया गिरोह हर मुद्दे की प्रासंगिकता को नष्ट कर देता है, उसकी गंभीरता को हास्य का विषय बना देता है।

हमें अपनी वर्तमान स्थिति से बहुत ऊपर उठने की जरूरत है। आतंकवाद को समाधान समझना सिर्फ पीड़ित मानसिकता का स्वर है। इसे ‘पंथ’ और ‘वाद’ में बाँटकर हम इससे ‘इम्यून’ नहीं हो सकते। इस तरह की घटनाओं का शिकार कोई भी व्यक्ति हो सकता है, इसलिए मृतकों के शवों पर अपनी घृणित विचारधारा की दुकान चलाना और दूसरे को नीचा दिखाना ना ही सागरिका घोष को शोभा देता है और ना ही सोशल मीडिया यूज़र्स को! यह समझना जरुरी है कि आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष सामूहिक संघर्ष होना चाहिए। हम सबका प्रयास आतंकवाद का धर्म और पंथ तलाशना नहीं बल्कि ‘लेफ्ट-राइट-मुस्लिम-ईसाई’ छोड़कर आतंकवाद को जड़ से मिटाना होना चाहिए।

मुद्दों से भटकी कॉन्ग्रेस ने पकड़ी Meme की राह, पप्पू वाले वीडियो से लोगों ने जमकर लगाई लताड़

हालिया समय में चुनावी दंगल के माहौल में राजनीति इतनी गरमा गई है कि कॉन्ग्रेस के पास कुतर्क करने के अलावा और कोई मुद्दा ही नहीं बचा है। अब तो लगता है कि शायद कॉन्ग्रेस को अपनी जग-हँसाई का भी कोई मलाल नहीं है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि बदहवासी की पराकाष्ठा पर पहुँची कॉन्ग्रेस इस समय अपने सबसे दु:खद दौर से गुजर रही है। इस बात को प्रमाणित करने के लिए सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से साझा की गई एक तस्वीर पर नज़र डालनी होगी। बता दें कि इस पुरानी तस्वीर को शेयर करना ख़ुद कॉन्ग्रेस के लिए ही भारी पड़ गया जब लोगों ने इस पर जमकर तंज कसे।

जैसा कि आप देख सकते हैं कि ट्रक के पीछे लिखा है, ‘कृपया हॉर्न न बजाए, मोदी सरकार सो रही है।’ सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस के इस मज़ाक की लोग कड़ी आलोचना कर रहे हैं और प्रतिक्रियात्मक रूप से आपत्ति भी दर्ज कर रहे हैं। एक यूजर ने इसी तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए लिखा, ‘चाइनीज़ गाँधी ने फोटोशॉप एक्सपर्टस भी चीन से हॉयर किए हैं’। वहीं एक अन्य यूज़र ने कॉन्ग्रेस की चुटकी लेते हुए लिखा कि क्या कॉन्ग्रेस World PhotoShop Day मना रही है?

कॉन्ग्रेस के इस मज़ाक का जवाब बीजेपी ने भी अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से दिया। इसमें एक वीडियो शेयर किया। इस वीडियो क्लिप ‘शेरों के तेवर नहीं बदलते’ में जनवरी 1992 से 2019 के पीएम मोदी के स्वरूप को दिखाया गया।

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एक यू़जर ने चुटकी लेते हुए लिखा कि इस तरह का एक ट्रक उन्होंने मध्य प्रदेश जाने के दौरान देखा, जिस पर लिखा था, ‘चलती है गाड़ी उड़ती है धूल, पप्पू है गाँधी परिवार की सबसे बड़ी भूल’। वहीं एक अन्य यूज़र ने कॉन्ग्रेस के चुनाव चिन्ह पर माला चढ़ाकर उस तस्वीर को शेयर किया। इसमें लिखा था, ‘अबकी बार अंतिम संस्कार’।

राहुल गाँधी द्वारा आतंकवादी मसूद अज़हर को ‘जी’ कहकर संबोधित करने वाली बात को एक यूज़र ने ट्विटर पर साझा करते हुए लिखा, ‘कृपया हॉर्न न बजाए, आतंकवादी ‘जी’ वैसे भी सो नहीं पा रहे’।

वैसे तो सोशल मीडिया पर फ़ज़ीहत होने से कॉन्ग्रेस पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता और इसीलिए वो बार-बार ऐसी बेहुदी हरक़तों को दोहराती रहती है, लेकिन लोग भी कुछ कम नहीं हैं वो भी कॉन्ग्रेस को बार-बार आईना दिखाने से नहीं चूकते। ऐसा ही जवाब अपने ट्विटर हैंडल से एक अन्य यूज़र ने दिया, जिसमें उन्होंने ऐसी तस्वीर साझा की जिसमें संसद की कार्यवाही के दौरान राहुल गाँधी सच में सो रहे थे।

एक यूज़र ने ट्विटर हैंडल से एक अनोखा जवाब दिया। इसमें ट्रक वाली तस्वीर का ही इस्तेमाल किया गया लेकिन कुछ लिखने की बजाए राहुल गाँधी द्वारा ख़ुद को ‘पप्पू’ स्वीकारने वाला वीडियो उस जगह लगाया।

सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस के इस भद्दे मज़ाक का लगभग हर कोई अपने-अपने अंदाज़ में जवाब दे रहा है। ऐसे ही एक यूज़र हैं, जिन्होंने एक तस्वीर शेयर की, जिसमें एक ऑटोचालक ने अपने ऑटो को मोदी एक्सप्रेस का नाम दिया और उस पर गाँधी परिवार के नाम संदेश लिखा।

कॉन्ग्रेस की मानसिकता का स्तर लगातार गिरता जा रहा है जो उसकी दिमागी रूप से विक्षिप्त होने की दशा को भी उजागर करता है। सच पूछो तो मोदी को घेरना कॉन्ग्रेस की एक आदत बन चुकी है, जिसे वो छोड़ ही नहीं पा रही है फिर भले ही उसका अंजाम जग-हँसाई ही क्यों न हो।

#ऐसी दीवानगी देखी नहीं कहीं: 36 मिनट में राहुल ने 27 बार नरेंद्र मोदी को किया याद

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आज जनसभा को संबोधित करने पहुँचे जहाँ वह प्रधानमंत्री पर लगातार निशाना साधते रहे। वहाँ राहुल गाँधी ने पीएम मोदी पर जीएसटी से लेकर राफेल डील और किसान सम्मान निधि योजना तक पर सीधा वार किया। पीएम के कार्यों पर सवाल उठाते हुए राहुल इस बीच यही भूल गए कि हर बात के बाद केवल मोदी का ही नाम दोहरा रहे हैं। उन्होंने 36 मिनट के भाषण में 27 बार प्रधानमंत्री मोदी का नाम लिया।

जी हाँ, चुनाव के नज़दीक आते ही पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से मतदाताओं को रिझाने का काम कर रही हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी भी देहरादून में रैली करने पहुँचे जहाँ पीएम पर निशाना साधते हुए राहुल को यह भी याद न रहा कि वो अपने भाषण में बार-बार सिर्फ़ मोदी का ही नाम ले रहे हैं। इस दौरान कॉन्ग्रेस अध्यक्ष प्रधानमंत्री मोदी को चौकीदार कहते हुए जनता को संबोधित करते रहे।

दून के परेड मैदान में रैली करते हुए मोदी का नाम लेने के अलावा राहुल ने वहाँ की जनता के सामने दावा किया कि इस बार कॉन्ग्रेस की सरकार बनने वाली है। उन्होंने बताया कि उनकी सरकार ऐतिहासिक कदम उठाएगी। अपनी न्यूनतम आय की गारंटी वाला वादा भी राहुल इस रैली दोहराते हुए दिखे।

भाषण में राहुल गाँधी ने सीधे-सीधे प्रधानमंत्री का नाम 27 बार लिया और साथ ही पुलवामा हमले के बाद सरकार के साथ खड़े रहने की बात कहने वाले राहुल ने मौक़ा देखते हुए भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा। साथ ही चौकीदार चोर है के नारे भी लगाए।

शोपियाँ में महिला SPO खुशबू जान को आतंकियों ने मारी गोली, मौत

एक तरफ जहाँ जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों ने आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। वहीं छटपटाहट में आतंकी पिछले कई दिनों से आम आदमियों और पुलिस बलों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। एक बार फिर आतंकियों जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ में एक महिला विशेष पुलिस अधिकारी (SPO) खुशबू जान को आतंकियों ने गोली मार दी। हालाँकि, आनन-फानन में खुशबू को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।

वहीं, पुलिस के साथ सुरक्षा बलों ने इलाके की घेराबंदी कर आतंकियों के खिलाफ सर्च ऑपरेशन तेज कर दिया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शोपियाँ के वेहिल इलाके में महिला पुलिस अधिकारी को आतंकियों ने उनके घर पर ही गोली मारी है।

बता दें कि इससे पहले बीते गुरुवार को पुलवामा में आतंकियों ने 40 वर्षीय एक व्यक्ति को जबरन उसके घर से निकालकर गोली मार दी थी। वहीं, बुधवार को पुलवामा में ही आतंकियों ने सेना के एक पूर्व जवान की भी गोली मारकर हत्या कर दी थी।

तेजस्वी ने कॉन्ग्रेस को कहा घमंडी, बिहार में गठबंधन गड्ढे में!

चुनाव की तारीख़ों की घोषणा होते ही सियासी हलचल काफी तेज हो गई है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से चुनाव जीतने की कोशिशें करती हुई नज़र आ रही है। इसी बीच खबर आ रही है कि बिहार में आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच हुए महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। साफ तौर पर तो नहीं, मगर अप्रत्यक्ष रूप से इनके बीच की खटपट सामने आने लगी है।

बता दें कि महागठबंधन के बीच का ये मनमुटाव सीट के बँटवारे को लेकर है। इस मसले पर आरजेडी के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने ट्विटर पर बिना किसी का नाम लिए कॉन्ग्रेस पर तंज कसते हुए उसे अहंकारी पार्टी बताया।

तेजस्वी ने अपने ट्वीट में कहा, ”संविधान और देश पर अभूतपूर्व संकट है। अगर अबकी बार विपक्ष से कोई रणनीतिक चूक हुई तो फिर देश में आम चुनाव होंगे या नहीं, कोई नहीं जानता? अगर अपनी चंद सीटें बढ़ाने और सहयोगियों की घटाने के लिए अहंकार नहीं छोड़ा तो संविधान में आस्था रखने वाले न्यायप्रिय देशवासी माफ़ नहीं करेंगे।”

तेजस्वी यादव के इस ट्वीट को कॉन्ग्रेस से इसलिए जोड़ा जा रहा है, क्योंकि इन्होंने ऐसे समय में ये बयान दिया है, जब आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच सीटों के बँटवारे का मामला अटका हुआ है। इस मामले पर बिहार चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष और राज्य सभा सांसद अखिलेश सिंह ने कहा कि उनकी पार्टी बिहार में 11 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हालाँकि, उम्मीदवारों के नाम की घोषणा होना अभी बाकी है।

महागठबंधन में राजद और कॉन्ग्रेस के बीच बढ़ती तल्खी को देखते हुए राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने खुद इस बारे में फैसला लेने का विचार किया है। आरजेडी प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने बताया कि चुनाव से जुड़े सारे फैसले लालू प्रसाद यादव ही लेंगे। यानी कि महागठबंधन में सीटों के बँटवारे से लेकर आरजेडी के उम्मीदवारों के चयन में अंतिम मुहर लालू प्रसाद यादव की ही लगेगी।

प्लेन से ‘विदेश’ जाना था, लेकिन जाना पड़ा पैदल: आर्मी स्पेशल फ़ोर्स ने म्यांमार में ऐसे की थी सर्जिकल स्ट्राइक

भारत ने म्यांमार में अब तक दो सर्जिकल स्ट्राइक की हैं। एक जून 2015 में की गई थी और दूसरी हाल ही में फरवरी-मार्च (2019) के बीच चले ऑपरेशन में की गई जिसकी जानकारी कुछ दिन पहले ही मीडिया में आई। इस लेख में इन दोनों ऑपरेशन का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है।

मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार फरवरी 17 से मार्च 2, 2019 के बीच भारतीय सेना की स्पेशल फ़ोर्स के जवानों ने म्यांमार में फिर से आतंकी ठिकानों पर हमला कर उन्हें ध्वस्त कर दिया। इस बार अराकान आर्मी को निशाना बनाया गया जो भारत के सहयोग से म्यांमार में निर्मित सित्वे पोर्ट के लिए खतरा बन चुके थे। ईरान में चाबहार के बाद अब म्यांमार में भी भारत के सहयोग से निर्मित सित्वे पोर्ट चालू हो चुका है जिसके बाद दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक एवं व्यापारिक साख़ मज़बूत होनी निश्चित है। इसे चीन के बेल्ट एन्ड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जवाब के रूप में देखा जा रहा है।

सित्वे पोर्ट का निर्माण कालादान मल्टी मोडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के अंतर्गत हुआ है जिसके बहुआयामी उद्देश्य हैं। कालादान प्रोजेक्ट भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और कलकत्ता को म्यांमार के रखाइन और चिन राज्यों से जल तथा भूमि मार्ग से जोड़ने के लिए 2008 में प्रारंभ किया गया था। भारत ने इस पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग ₹3170 करोड़ का निवेश किया है जिसमें से सित्वे पोर्ट और पालेत्वा में अंतर्देशीय जलमार्ग पर लगभग ₹517 करोड़ व्यय हुए हैं।

चीन ने कालादान परियोजना को बाधित करने के भरसक प्रयास किए थे। यदि चीन म्यांमार स्थित सित्वे पोर्ट पर अपना अधिकार स्थापित कर लेता तो बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना को अपनी प्रभावी क्षमता पुनः प्राप्त करना अत्यंत कठिन होता। चीन ने म्यांमार के आतंकी गुटों से भी सम्पर्क स्थापित किए थे ताकि उन्हें बांग्लादेश और म्यांमार के मार्ग से भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में घुसपैठ कराई जा सके।

अराकान आर्मी म्यांमार सरकार द्वारा घोषित आतंकवादी संगठन है जो लगातार म्यांमार की सेना ‘तत्मादॉ’ से लड़ता रहता है। दिसंबर 2015 में इस संगठन ने रखाइन प्रान्त में सित्वे के पास कई दिनों तक हिंसक संघर्ष किया था। उसके बाद भी म्यांमार की सेना के विरुद्ध कई बार लड़ाई हुई। सित्वे को सुरक्षित रखना भारत के हित में जरूरी था इसलिए भारतीय सेना ने म्यांमार सेना के साथ मिलकर अराकान आर्मी को सबक सिखाया।

इस ऑपरेशन में करीब एक दर्जन आतंकी कैम्पों को ध्वस्त कर दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया में रजत पंडित की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पहले से ही म्यांमार की 1600 किमी लंबी सीमा पर ऑपरेशन सनराईज़ के अंतर्गत इन्फैंट्री, असम राइफल्स, स्पेशल फ़ोर्स और ड्रोन के अतिरिक्त बल तैनात किए हैं। म्यांमार और भारतीय सेना ने चिन स्टेट और साउथ मिज़ोरम स्थित बॉर्डर पिलर 1-9 पर मिलिट्री ऑपरेशन कर अराकान आर्मी के 10-12 कैंप तबाह कर दिए जो कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी के साथ मिलकर काम कर रहे थे। कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी चीन के प्रभाव में काम करने वाला संगठन है। पूरे ऑपरेशन में NSCN (K), NDFB (S), ULFA (I) के उग्रवादियों को भी मार गिराया गया।

इससे पहले 2015 में की गई सर्जिकल स्ट्राइक में डोगरा रेजिमेंट के 18 सैनिकों की हत्या का बदला लिया गया था। 4 जून 2015 को NSCN के आतंकवादियों ने मणिपुर के चंदेल ज़िले में भारतीय सेना के 18 जवानों की हत्या कर दी थी। इसका प्रतिशोध लेने के लिए भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा के 10 किमी भीतर तक स्पेशल फ़ोर्स भेजी थी। उस समय तत्कालीन COAS जनरल दलबीर सिंह को ब्रिटिश आर्मी की गोरखा रेजिमेंट की 200वीं वर्षगाँठ पर ब्रिटेन जाने का न्योता मिला था जो उन्होंने स्थगित कर दिया था।

स्पेशल फ़ोर्स की जिस यूनिट (21 PARA SF) को म्यांमार भेजा गया था उसे ‘वाघनख’ नाम दिया गया था। यह नाम छत्रपति शिवाजी के उस वाघनख पर रखा गया था जिससे उन्होंने अफजल खान का वध किया था। स्पेशल फ़ोर्स की 21 PARA यूनिट पहले 21 मराठा लाइट इन्फैंट्री बटालियन थी। बाद में उसे स्पेशल फ़ोर्स यूनिट बनाया गया था। म्यांमार जाने से पहले स्पेशल फ़ोर्स की यूनिट संयुक्त राष्ट्र के मिशन पर साउथ सूडान जाने वाली थी। तभी उन्हें दिल्ली से नॉर्थ ईस्ट आने के आदेश मिले। इस पर एक जवान ने मजाक में कहा, “कहाँ तो हम प्लेन से विदेश जाने वाले थे लेकिन अब पैदल जाना पड़ेगा।”

स्पेशल फ़ोर्स को दो ठिकानों पर हमले करने थे- एक जिसमें करीब 150-200 आतंकी थे और दूसरा छोटा था जिसमें 50-60 आतंकी थे। हमले की पूरी प्लानिंग 57 डिविज़नल हेडक्वार्टर इंफाल में बनाई गई। निर्धारित रणनीति के तहत तत्कालीन कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत ने पूरी गोपनीयता के साथ स्पेशल फ़ोर्स की टुकड़ी को ऑपरेशन को अंजाम देने के आदेश दिए। 9 जून को 50 सैनिकों की टुकड़ी म्यांमार के घने जंगलों में घुसी जहाँ बड़े कैंप पर अचानक हमला किया गया। उस कैंप में लगभग 150 आतंकी थे। स्पेशल फ़ोर्स को स्पष्ट निर्देश थे कि मारे गए आतंकियों की लाशें गिनने या फोटो लेने के लिए रुकना नहीं है। उन्हें काम खत्म कर लौटने का आदेश था।

स्पेशल फ़ोर्स के सर्जिकल स्ट्राइक कर लौटने के बाद अजित डोभाल और विदेश सचिव जयशंकर ने म्यांमार जाकर राजनयिक संबंध मजबूत किए जिसके कारण हमें म्यांमार से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवादी और आतंकी संगठनों को समाप्त करने में म्यांमार आर्मी की सहायता मिली।  

भारत के लिए सित्वे पोर्ट के महत्व को जानने के लिए यहाँ पढ़ें

स्मार्ट पोल्स लॉन्च करने को तैयार BSNL-नोकिया: 5G इंटरनेट के साथ वायु प्रदूषण पर भी रखेगा नज़र

नोकिया-बीएसएनएल के सहयोग से बना पहला स्मार्ट पोल बीएसएनएल के परिसर में संचालन प्रारंभ करने के लिए तैयार है। इकोनोमिक टाइम्स में छपी खबर के अनुसार 21 मार्च (गुरुवार) को इस स्मार्ट पोल का परिचालन प्रारंभ हो सकता है।

यह पोल नोकिया के इंटेलिजेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम का अंग है।

वायु प्रदूषण रोकने में सहायक

इंडिया मोबाइल कॉन्ग्रेस के दौरान प्रेस से बात करते हुए बीएसएनएल के चेयरमैन व मैनेजिंग डाइरेक्टर अनुपम श्रीवास्तव ने कहा था कि इन पोल्स का विपणन और प्रसार (marketing and deployment) नोकिया और बीएसएनएल संयुक्त तौर पर करेंगे। “यह स्मार्ट पोल्स वायु प्रदूषण के स्तर को समय रहते भाँप कर सम्बंधित विभाग को सूचित कर देंगे। यह परली जलाने पर वायु प्रदूषण के स्तर में तेज़ बढ़ोतरी को भी समय रहते दर्ज कर लेगा (ताकि उसकी रोकथाम हो सके)।

गौरतलब है कि भारत के लिए वायु प्रदूषण एक अति-गंभीर और उतना ही विवादस्पद विषय के साथ-साथ चुनौती भी है। पिछले दो वर्षों से सुप्रीम कोर्ट दिवाली पर पटाखे चलाने पर किसी-न-किसी प्रकार रोक लगाने, या कम-से-कम कमी लाने, के लिए प्रयासरत है।

(यह बात अलग है कि खुद पटाखे बेचने वालों को अवमानना की चेतावनी देने के बाद हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अचानक ही यह सवाल कर डाला कि प्रदूषण के और बड़े-बड़े कारकों, जैसे वाहनों आदि के बदस्तूर जारी रहते हुए आखिर लोग पटाखों से ही क्यों नाराज़ हैं?)

दिल्ली के मुख्मंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी दिल्ली में वाहनों से वायु प्रदूषण रोकने के लिए ऑड-ईवेन फार्मूला लागू करने का प्रयास किया था।

और भी हैं प्रयोग

गत अक्टूबर में बीएसएनएल ने ₹46 लाख प्रति पोल की दर से नोकिया को 50 पोल की आपूर्ति के लिए अनुबंधित किया था।

इन स्मार्ट पोल्स का प्रयोग शहरों में वाई-फाई सुविधा प्रदान करने के लिए (केजरीवाल जी ध्यान दें), मोबाइल टॉवर, स्ट्रीट लाइटिंग और यहाँ तक कि सुरक्षा हेतु सर्विलांस के लिए भी हो सकता है।

5G की दौड़ में भी सहायक

4G की दौड़ में भले ही बीएसएनएल पिछड़ गया हो (बीएसएनएल के 4G प्लान को दूरसंचार विभाग ने हाल ही में मंजूरी दी है जबकि अधिकांश निजी सेवा-प्रदाताओं ने 2016 के अंत से लेकर 2017 की शुरुआत के बीच अपने 4G परिचालन प्रारंभ कर दिए थे), पर इस स्मार्ट पोल उपक्रम के ज़रिए वह 5G की दौड़ में शायद सबसे आगे निकल गया है। तकनीकी पोर्टल TechHerald के अनुसार यह पोल्स बीएसएनएल के आधारभूत ढाँचे को महत्वपूर्ण तकनीकों जैसे 5G व इन्टरनेट-ऑफ़-थिंग्स (IoT) के लिए तैयार करेंगे।

ओवैसी ने इकबाल के लिए माँगी थी सुषमा स्वराज से मदद, अब कह रहे हैं धन्यवाद

हमेशा से BJP की आलोचना करने के लिए पहचाने जाने वाले असदुद्दीन ओवैसी ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को धन्यवाद दिया है। ओवैसी द्वारा विदेश मंत्री को यह धन्यवाद कल न्यूजीलैंड में हमले का शिकार हुए लोगों के परिवार वालों को शीघ्र से शीघ्र वहाँ भेजने के लिए किए जाने वाले प्रयासों पर दिया गया।

दरअसल, कल (मार्च 16, 2019) न्यूज़ीलैंड में हुए हमले में जो लोग घायल हुए, उसमें हैदराबाद निवासी इक़बाल जहाँगीर के भाई अहमद जहाँगीर भी शामिल हैं। हमले की खबर सुनने के बाद इकबाल अपने भाई के परिवार को सहारा देने के लिए न्यूज़ीलैंड जाना चाहते थे। इसके लिए ओवैसी ने ट्वीटर के ज़रिए सुषमा स्वराज से माँग की थी कि इकबाल के न्यूजीलैंड जाने के लिए जरूरी प्रबंधन करा दें।

इस ट्वीट के कुछ देर बाद ही, इस मामले का अपडेट देने के लिए ओवैसी ने एक और ट्वीट किया। इसमें उन्होंने कहा कि वो सुषमा स्वराज का धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने खुद उन्हें अहमद के परिवार वालों को समय से न्यूज़ीलैंड पहुँचाने संबंधी प्रयासों से अवगत कराया।

ओवैसी ने लिखा कि वो भारत के विदेश मंत्रालय से संपर्क में हैं और उन्होंने आश्वासन दिया है कि वे वीजा प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए सभी प्रयास कर रहे हैं।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक अहमद जहाँगीर न्यूऑर्क में पिछले 15 सालों से हैदराबादी रेस्टरां चला रहे थे। शुक्रवार को अल-नूर मस्जिद में हुए हादसे के बाद वह गंभीर रूप से घायल हुए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके अलावा इस हमले में उन 9 भारतीय लोगों की सूची में एक नाम फरहाज अहसान का भी है, जो उस दिन मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आए थे और तब से गायब हैं।

‘राम जन्मभूमि’ 29 मार्च को होगी रिलीज़, अब्दुल मेमन की धमकी के बावजूद सेंसर बोर्ड ने दी मंज़ूरी

शिया वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष वसीम रिज़वी की फ़िल्म ‘राम जन्मभूमि’ को सेंसर बोर्ड की मंज़ूरी मिल गई है और 29 मार्च को रिलीज़ होने वाली है। रिज़वी द्वारा लिखित और निर्मित इस फ़िल्म में 1990 में राम मंदिर आंदोलन के बाद हुई घटनाओं को दर्शाया गया है। निक़ाह-हलाला जैसी सामाजिक बुराई को उजागर करने के लिए फ़िल्म में ख़ुद रिज़वी ने काम किया है।

रिज़वी ने बताया कि इस फ़िल्म की रिलीज़िंग से पहले ही उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें टाइगर मेमन के भाई अब्दुल मेमन द्वारा धमकी दी गई थी, जो 1993 के मुंबई बम विस्फोट मामले में एक प्रमुख संदिग्ध था। फ़िल्म को कई धार्मिक समूहों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ रहा है, जिससे इसके प्रदर्शन पर जमकर विरोध हो रहा है। इसके अलावा रिज़वी को राजकुमार याकूब हबीउद्दीन तुसी ने एक क़ानूनी नोटिस भेजा, जो ख़ुद को अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर की छठी पीढ़ी के वंशज होने का दावा करता है, ने रिज़वी को फ़िल्म रिलीज़ न करने की चेतावनी दी, क्योंकि उसे लगता है कि यह फिल्म मुगल सम्राट बाबर का तिरस्कार करती है।

बाबरी मस्जिद को ‘देश का कलंक’ कहने के बाद रिज़वी को इस्लामी मौलवियों के कोप का सामना भी करना पड़ा। पिछले साल अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के तीन संदिग्ध सहयोगियों को दिल्ली पुलिस के विशेष दल ने गिरफ़्तार किया था क्योंकि वे रिज़वी को मारने की योजना बना रहे थे। पुलिस ने तीनों संदिग्धों के पास से हथियार भी बरामद किए थे।

बता दें कि शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर सभी मदरसों को बंद करने अपील की थी। इस पत्र में उन्होंने लिखा था कि मदरसों की शिक्षा छात्रों को आतंकवादी बनने के लिए प्रोत्साहित करती है। ऑल इंडिया फैज़ान-ए-मदीना काउंसिल (AIFMC) नामक एक मुस्लिम संगठन ने मदरसों पर अपनी टिप्पणी के बाद रिज़वी के सिर पर ₹10 लाख के इनाम की घोषणा कर दी थी।

सागरिका जी! आपके ‘लिबरल’ होने का मलतब ‘दक्षिणपंथियों’ का आतंकवादी होना नहीं है… समझिए वरना देर हो जाएगी!

कल न्यूजीलैंड में जो हमला हुआ वह किसी को भी भीतर तक झकझोर देने वाला है। काले कपड़े में मस्जिद में घुसा एक अनजान आदमी करीब 50 लोगों को मौत के घाट उतार कर चला गया। विश्व के कोने-कोने में इस कृत्य की निंदा हुई। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने जहाँ मरे हुए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए राष्ट्रीय झंडा तक झुकवा दिया, वहीं पाकिस्तान तक के प्रधानमंत्री इमरान खान भी अपने बयान पर अटल रहे कि ‘आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता’। लेकिन ऐसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर भी भारत के कुछ तथाकथित लिबरलों से चुप्पी नहीं साधी गई।

हर मुद्दे में अपनी विचारधारा के मुताबिक एंगल ढूँढ लेने वाला यह लिबरल गिरोह एक तरफ़ जहाँ पुलवामा/उरी जैसे हमले पर सरकार से जवाब माँगता है और IAF के हमले पर सवाल उठाता है। वहीं न्यूज़ीलैड की घटना पर एकदम से निर्णायक बनकर उभरा। कल इस हमले के बाद रात में करीब साढ़े आठ बजे न्यूज़ जगत की महान हस्तियों में से एक सागरिका घोष का ट्विटर पर एक ट्वीट आया। जिसकी उम्मीद शायद लोगों को पहले से ही थी। उन्होंने अपने इस ट्वीट में हमले का कारण न केवल दक्षिणपंथियों को बताया बल्कि उन्होंने दक्षिण पंथियों को आतंकवादी ही घोषित कर दिया।

‘WHY I AM A LIBERAL’ की लेखिका और भारतीय समाचार जगत के सबसे ऊँचे नामों में से एक सागरिका का यह ट्वीट निसंदेह ही हास्यास्पद है, लेकिन इस पर गंभीर विचार करने की भी बहुत आवश्यकता है। लिबरलों का वह गिरोह जो भारत में एक आतंकी की मौत पर शोक मनाने की सलाह और संवेदनाओं पर लंबा-चौड़ा लेख लिख देता है। उसी गिरोह के लोग न्यूज़ीलैंड जैसे मौक़ों पर एकतरफा निर्णय देने से नहीं चूकते। चूँकि, कल न्यूज़ीलैंड के किसी मस्जिद में यह हमला हुआ और हमलावार के निशाने पर इस्लाम को मानने वाले लोग थे। तो सागरिका ने सीधा इसके तार ‘दक्षिणपंथी’ आतंक से जोड़ दिए। जबकि हमलावार ने खुद फेसबुक के जरिए बताया था कि इस हमला को किन कारणों से प्लान किया गया था।

आतंकवाद को मजहब से न जोड़ने की सलाह देने वाली विचारधारा के लोग सीधे दक्षिणपंथियों को आतंकवादी घोषित कर गए। बिना यह जानें कि जिस ब्रेंटन टैरंट का नाम इस हमले में आ रहा है वह खुद को स्कॉटिश, इंग्लिश और आयरिश पेरेंट्स की संतान बताता है। 2017 में एक आतंकी हमले का शिकार हुई एब्बा नाम की लड़की की मौत से आहत व्यक्ति ने अपने भीतर बदले की आग को अगर आतंकवादी हमले का रूप दे दिया तो इसमें दक्षिणपंथियों की भूमिका कैसे आ गई?

ट्विटर पर 280 शब्दों की शब्द सीमा इतनी भी कम नहीं है सागरिका जी कि आप यह न समझा पाएँ कि आपने दक्षिणपंथियों को आतंकवाद का रूप क्यों बताया? आपके लिबरल हो जाने से हर दूसरी विचारधारा आतंकी नहीं हो जाती। इस हमले पर कल से हर कोई शोक मना रहा है जो दर्शाता है कि मानवता अब भी लोगों में बरकरार है। लेकिन शायद तथाकथित लिबरलों को इससे कोई लेना-देना नहीं हैं। तभी उन्होंने इस ऐसे मामले पर भी अपना एंगल मेंटेन कर लिया।

सागरिका जैसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बात करने वाले लोग जब भूल जाते हैं कि उनके लिखे एक-एक शब्द का असर उनके पाठकों पर क्या पड़ रहा है तो उसे अतिवाद ही मान लेना चाहिए। क्योंकि ‘ऐसे’ समय में वो उस जनमत का निर्माण कर रहे होते हैं जो कि आने वाले समय में दो विचारधाराओं के बीच दंगे-फसाद का कारण बन सकता है। राजनैतिक और सामाजिक दृष्टि से किसी की भी हर मुद्दे पर दो राय हो सकती है लेकिन मानवता के लिहाज़ से कभी दो नज़रिए नहीं होते हैं। क्योंकि, उस लक्ष्य में भावनाओं को संरक्षित किया जाता है। इसको समझिए! परिस्थितियाँ चाहे कुछ भी हों, लेकिन आतंकवादी हमला करने वाले आतंकवादी ही कहलाते हैं। जो आप आज समाज को दे रहे हैं कल को समाज आपको वही लौटाएगा, और यह बात हर संदर्भ में प्रासांगिक है।

सोशल मीडिया पर पहले ही दो विचारधारा के लोगों को IT सेल की कार्यशैलियों द्वारा वॉर रूम के डिबेटर्स में तब्दील किया जा चुका है। अब व्यक्ति के भीतर तक ऐसे भावनाओं को मत उपजाएँ कि जाति-पाति से परेशान लोग सेकुलकर देश में एक दूसरे की धर्म और विचारों से तंग आकर खतरनाक रूप ले लें। सागरिका के ट्विटर से ही मालूम पड़ा कि उन्हें ऑक्सफॉर्ड यूनियन में वक्ता के रूप में बुलाया गया है। उम्मीद है कि वह वहाँ जाकर अपने ट्वीट की तरह लोगों को बाँटने का प्रयास नहीं करेंगी। और याद रखेंगी कि आपके लिबरल होने का मतलब दक्षिणपंथियों का या उनकी विचारधारा का आतंकी होना नहीं है।