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सोशल मीडिया पर चुनाव आयोग सख़्त, नेताओं के अकाउंट्स पर रहेगी नज़र – दिशा-निर्देश जारी

चुनाव आयोग ने आगामी लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान सोशल मीडिया के प्रयोग को लेकर भी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इस दौरान चुनाव आयोग फेसबुक, ट्विटर सहित तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पैनी नज़र रखेगा। राजनीतिक पार्टियों व उम्मीदवारों द्वारा सोशल मीडिया पर किए जा रहे विज्ञापन भी अब उनके चुनावी ख़र्च में शामिल होंगे। नेता व राजनीतिक दलों को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर विज्ञापन जारी करने से पहले चुनाव आयोग से उसका सत्यापन कराना होगा। अर्थात, अब सोशल मीडिया पर असत्यापित विज्ञापन पोस्ट करने पर आयोग कार्रवाई करेगा। इसके अलावा चुनाव प्रचार के लिए सेना के जवानों के फोटोज भी इस्तेमाल नहीं किए जा सकेंगे। इतना ही नहीं, फेक न्यूज़ पर भी चुनाव आयोग की कड़ी नज़र रहेगी।

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने इस बाबत अधिक जानकारी देते हुए कहा:

“ज़िला और राज्य स्तर पर MCMC (मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमिटी) सक्रिय हैं। प्रत्येक स्तर पर एक सोशल मीडिया एक्सपर्ट भी इस कमिटी का हिस्सा होगा। राजनीतिक विज्ञापनों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से पहले MCMC से प्रमाणित करवाना होगा।”

नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, नामांकन के वक़्त ही उम्मीदवारों को अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स का पूरा विवरण पेश करना पड़ेगा। चुनाव आयोग उम्मीदवारों व राजनीतिक पार्टियों के फेसबुक, ट्विटर, गूगल व व्हाट्सऐप एकाउंट्स पर निगरानी रखेगा। आदर्श आचार संहिता के प्रावधान अब सोशल मीडिया पर भी लागू होंगे। राजनीतिक दलों व नेताओं को सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करते समय आचार संहिता के दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखना पड़ेगा। चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त एक्सपर्ट्स फेक न्यूज़ की पहचान करेंगे, जिसके बाद चुनाव आयोग उचित निर्णय लेगा। इसके अलावा राजनीतिक दल व नेतागण अपने सोशल मीडिया अकाउंट से ऐसे पोस्ट नहीं डाल सकेंगे, जिससे चुनावी प्रक्रिया में बाधा पहुँचे।

वे ऐसा कोई पोस्ट नहीं डाल सकते, जिस से सामाजिक या धार्मिक सद्भावना बिगड़ने की नौबत आए या सार्वजनिक व्यवस्था पर कोई बुरा असर पड़े। बता दें कि रानजीतिक दलों व उम्मीदवारों को चुनाव आयोग के समक्ष प्रचार-प्रसार के दौरान हुए व्यय का ब्यौरा प्रस्तुत करना होता है। अब सोशल मीडिया पर किया गया प्रचार-प्रसार और विज्ञापन का ख़र्च भी इसी विवरण में शामिल होगा। इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर को दिए गए रुपए से लेकर वेबसाइट्स पर दिए गए विज्ञापन तक के ख़र्च इसमें शामिल होंगे। इसके अलावा पार्टी के लिए विज्ञापन कंटेंट बनाने वाली टीम की सैलरी भी इसी ख़र्च में जुड़ेगी।

केंद्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी से इस सम्बन्ध में बात करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर ‘पॉलिटिकल एडवर्टाइजमेंट’ को रेगुलेट करने के लिए चुनाव आयोग ने जो दिशा-निर्देश और आचार संहिता लागू की है, उसको हम भी मानेंगे और सभी को मानना चाहिए। लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया का एंटी-सोशल इस्तेमाल न हो, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। कॉन्ग्रेस ने कहा कि आयोग को ये दिशा-निर्देश बहुत पहले ही जारी करने चाहिए थे। उम्मीदवारों के अलावा ऐसे अन्य लोगों को पर भी कार्रवाई की जाएगी, जो गलत तरीके से फोटोज से साथ छेड़छाड़ करते हैं या फिर आपत्तिजनक पोस्ट्स पर कमेंट करते हैं। देश में आम चुनाव 11 अप्रैल से शुरू होंगे। यूपी, बिहार व बंगाल में सभी 7 चरणों में चुनाव होंगे।

पाकिस्तान को तगड़ा झटका, ICC ने कहा ‘हमने दी थी भारतीय टीम को आर्मी कैप पहनने की अनुमति’

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चल रहे सीरीज के दौरान राँची वनडे मैच में भारतीय क्रिकेट टीम ने भारतीय जवानों के सम्मान में आर्मी कैप पहन कर मैच में हिस्सा लिया। कप्तान विराट कोहली और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी सहित सभी भारतीय क्रिकेटरों ने आर्मी कैप पहन रखा था। शुक्रवार (मार्च 8, 2019) को खेले गए इस मैच में पुलवामा आतंकी हमले के विरोधस्वरूप टीम इंडिया ने ऐसा किया। खिलाड़ियों ने वीरगति को प्राप्त जवानों को आर्थिक मदद देने का भी सन्देश दिया। भारतीय टीम का यह सराहनीय पहल पाकिस्तान को काफ़ी नागवार गुजरा। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने विश्व में क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था आईसीसी (International Cricket Council) को इस सम्बन्ध में कार्रवाई करने का अनुरोध किया था। तिलमिलाए पाकिस्तान ने कहा था कि वह इसका बदला लेगा।

राँची में आर्मी कैप पहने भारतीय क्रिकेटर्स

वहीं अब आईसीसी ने पाकिस्तान के जले पर नमक छिड़कते हुए कहा है कि भारतीय टीम को ऐसा करने की अनुमति उसने ही दी थी। पाकिस्तान ने कोहली ब्रिगेड पर खेल का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया था, जिसे आईसीसी ने नकार दिया। बहरहाल, बीसीसीआई ने योजना बनाई है कि भारत हर साल एक बार अपने सैनिकों के सम्मान में आर्मी कैप पहनकर मुक़ाबला खेलेगा। पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद चौधरी तो इतने ख़फ़ा हो गए कि उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि अगर भारतीय टीम पर कार्रवाई नहीं की गई तो पाकिस्तानी टीम भी विश्व कप में काली पट्टी बाँध कर खेलेगी।

ऑस्ट्रेलिया के ‘पिंक टेस्ट’ और दक्षिण अफ्रीका के ‘पिंक वनडे’ की तर्ज पर अब भारत भी साल में एक मैच सेना को डेडिकेट करेगा। शुक्रवार को ये टोपियाँ स्वयं पूर्व कप्तान धोनी ने खिलाड़ियों को सौंपी थी। कप्तान विराट कोहली ने बताया था कि टीम इस मैच की फीस नैशनल डिफेंस फंड में जमा करेगी जिससे शहीदों के परिवार की मदद की जा सके। उन्होंने लोगों से भी शहीदों के परिवार की मदद करने की अपील की। धोनी और कोहली स्वयं ब्रांड नाइकी के साथ मिलकर इस पर पिछले 6 महीने से काम कर रहे थे।

आईसीसी के महाप्रबंधक (रणनीतिक संचार) क्लेरी फुर्लोग ने पाकिस्तान की शिकायत को दरकिनार करते हुए बयान में कहा:

“बीसीसीआई ने धन जुटाने और वीरगति को प्राप्त सैनिकों की याद में टोपी पहनने की अनुमति माँगी थी और उसे इसकी अनुमति दे दी गई थी। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने आईसीसी को इस संबंध में कड़ा पत्र भेजा था और इस तरह की टोपी पहनने के लिये भारत के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की थी।”

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख एहसान मानी ने कहा कि भारतीय टीम ने किसी और उद्देश्य से ऐसा करने की अनुमति ली थी लेकिन इसका गलत इस्तेमाल किया गया। अब आईसीसी से झटका खाने के बाद पाकिस्तानी टीम इस बारे में कुछ नहीं कर सकती। बीसीसीआई ने पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों के वीरगति को प्राप्त होने के बाद आईसीसी से उन देशों के साथ संबंध तोड़ने के लिए कहा था जो आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं।

जब कंधार-कंधार रटने वालों ने 25 खूंखार आतंकियों को रिहा कर दिया था.. जानिए क्या हुए उसके दुष्परिणाम

कॉन्ग्रेस पार्टी विरोधाभासों का प्रतीक है, विडंबनाओं की प्रतिमूर्ति है और धीरे-धीरे झूठ की भी अचल प्रतिमा बनती जा रही है। पार्टी के अध्यक्ष का तो कहना ही क्या। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों से उन्होंने ऐसा खेल खेला है कि मीडिया से लेकर राजनीतिक दल, सब अपनी गोटियाँ वहीं फिट कर रहे हैं। अब राहुल गाँधी एक फोटो को लेकर भाजपा पर हमला बोल रहे हैं। इस फोटो में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कंधार विमान हाईजैक के दौरान तीन आतंकियों को छोड़ने जा रहे हैं, जिसमें मसूद अज़हर भी शामिल है। वही मसूद अज़हर, जिसने भारत में पठानकोट और पुलवामा सहित कई आतंकी घटनाओं को अंजाम देकर हमारे जवानों का रक्त बहाया। उस समय क्या परिस्थितियाँ थीं और किन कारणों से ऐसा करना पड़ा उसकी हम संक्षेप में चर्चा करेंगे लेकिन, यहाँ हम आपको एक ऐसी बात बताएँगे, जिसे जानकार आप चौंक जाएँगे।

दरअसल, जो कॉन्ग्रेस आज भाजपा पर आतंकियों को रिहा करने का आरोप मढ़ रही है, उसी पार्टी की सरकार ने 2010 में एक, दो, तीन नहीं बल्कि 25 पाकिस्तानी आतंकियों को जेल से रिहा कर दिया था। उन्होंने इसे ‘Goodwill Gesture’ नाम दिया था। 24 दिसंबर 1999 को काठमांडू और नयी दिल्ली को जोड़ने वाले इंडियन एयरलाइन्स के विमान IC814 को हाईजैक कर लिया गया था। इस प्लेन को अफ़ग़ानिस्तान ले जाया गया, जहाँ उस समय तालिबान का राज था। आईएसआई और हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के इस संयुक्त आतंकी अभियान के बारे में अजीत डोभाल ने कहा था कि अगर उस समय आतंकियों को आईएसआई का समर्थन नहीं रहता तो परिस्थितियाँ कुछ अलग हो सकती थीं। डोभाल उस टीम का हिस्सा थे जो आतंकियों के साथ नेगोशिएशन कर रही थी।

कॉन्ग्रेस का ये कृत्य अख़बारों की सुर्खियाँ बना था

इस घटना के एक दशक पहले कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुक़ अब्दुल्ला की बेटी रुबैया सईद का आतंकियों ने अपहरण कर लिया था, जिसे छुड़ाने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने पाँच आतंकियों को रिहा किया था। लोगों के मन में वो यादें ताज़ा थी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर देश भर में दबाव था और चर्चा चल रही थी कि अगर एक बड़े नेता की बेटी को छुड़ाने के लिए आतंकियों को रिहा किया जा सकता है तो 150 के क़रीब आम लोगों को छुड़ाने के लिए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? सर्वदलीय बैठक में सभी पार्टियों की सहमति से निर्णय लिया गया कि तीनों आतंकियों को छोड़ा जाएगा। उस बैठक में सोनिया गाँधी ने भी हिस्सा लिया था। इतना ही नहीं, डॉक्टर मनमोहन सिंह भी उस बैठक में शामिल थे।

आज कंधार-कंधार की रट लगाने वालों को अपनी पार्टी के दोनों सुप्रीम नेताओं- सोनिया गाँधी और डॉक्टर मनमोहन सिंह से पूछना चाहिए कि क्या उस बैठक में उन्होंने आतंकियों को रिहा करने और फँसे नागरिकों को छुड़ाने का विरोध किया था? अगर नहीं, तो राहुल गाँधी सहित आज के नेताओं को अपने सीनियर्स से कोचिंग लेकर उस समय की परिस्थितियों से अवगत होना चाहिए। रुबैया के अपहरण के बाद 5 आतंकी छोड़े गए थे। इसके एक दशक बाद 150 के लगभग यात्रियों की सकुशल वापसी के लिए 3 आतंकी छोड़े गए। अब एक दशक और आगे बढ़ते हैं। 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने 25 आतंकियों को यूँ ही रिहा कर दिया। ये उनके लिए ‘सद्भावना का संकेत’ था। आतंकियों से सद्भावना जताने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी क्या आज उन 25 आतंकियों को रिहा करने के बाद हुए दुष्परिणामों को लेकर कुछ कहेगी?

जिस आतंकी को रिहा किया, उसने पठानकोट में ख़ून बहाया

जिन 25 आतंकियों को डॉक्टर सिंह (अप्रत्यक्ष रूप से सोनिया गाँधी) के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने रिहा किया था, उसमे एक नाम शाहिद लतीफ़ का भी था। लतीफ़ पठानकोट हमले को अंजाम देने वाले फिदायीन गुट का प्रमुख हैंडलर था। पाकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने के लिए जिसे यूपीए सरकार ने रिहा किया, उसने एक झटके में हमारे सुरक्षा बल के 7 जवान और 1 नागरिक को मौत के घात उतार दिया था। 28 मई 2010 को पाकिस्तान को ख़ुश करने के लिए लतीफ़ सहित 25 आतंकियों को सीमा से वापस भेज दिया गया। न कोई मज़बूरी थी और न कोई दबाव। मुंबई हमले को अभी डेढ़ वर्ष ही हुए थे और 150 से भी अधिक लोगों के ख़ून को भारत सरकार इतनी जल्दी भूल गई। जब आतंकियों का सफाया होना चाहिए था, तब उन्हें छोड़ दिया गया। इसी लतीफ़ को कंधार काण्ड के दौरान वाजपेयी सरकार ने रिहा करने से मना कर दिया था। इतना ही नहीं, अटल सरकार ने लतीफ़ सहित 31 आतंकियों को रिहा करने से साफ़ इनकार कर दिया था।

आपको यह जान कर हैरानी होगी कि लतीफ़ को रिहा करने की माँग वही आतंकी कर रहे थे, जिन्होंने 1999 में भारतीय विमान को हाईजैक किया था। इतने खूंखार आतंकी को यूं छोड़ दिया गया जैसे कि वह कोई चोरी-चकारी का मुजरिम हो। कंधार काण्ड के बाद तो राजग सरकार और सतर्क हो गई थी। उसने लतीफ़ को कश्मीर से निकाल कर वाराणसी के जेल में स्थानांतरित कर दिया ताकि उसे छुड़ाने के लिए आतंकी फिर से कोई ऐसी-वैसी हरकत न करें। अव्वल तो यह कि बदले में पाकिस्तान ने किसी एक भी भारतीय क़ैदी को रिहा नहीं किया। यह कैसा सद्भावना सन्देश या Goodwill Gesture था जहाँ भारत ने उन्हीं आतंकियों को रिहा किया जिन्होंने बदले में हमारे जवानों व नागरिकों को मारा। पाकिस्तान ने भारत की बेइज्जती करते हुए इस सद्भावना का कोई पॉजिटिव प्रत्युत्तर नहीं दिया।

डोवाल के इसी चित्र को आधार बना कर राहुल गाँधी भाजपा पर हमले कर रहे हैं

ऐसा नहीं था कि कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के इस कथित सद्भावना वाले कार्य के बाद आतंकी हमले होने बंद हो गए। इसके बाद मुंबई, बनारस, पुणे, दिल्ली, पटना, गया, बंगलुरु और हैदराबाद सहित तमाम धमाके हुए और केंद्र सरकार हाथ मलती रही। बता दें कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश के प्रमुख शहरों में इस तरह के आतंकी धमाके नहीं हुए। कंधार-कंधार का रट लगाने वाली कॉन्ग्रेस को याद करना चाहिए की वो आतंकी तो देश से बाहर अपने सुरक्षित ठिकाने पर जा चुके थे लेकिन मुंबई हमलों के दौरान तो आपकी आर्थिक राजधानी में घुसकर 10 आतंकियों ने 3 दिन तक पूरे देश को एक तरह से बंधक बनाए रखा। अगर ख़ून का हिसाब होगा, तो कॉन्ग्रेस के दाग इतने गहरे हैं कि सर्फ एक्सेल भी न छुड़ा पाए।

डॉक्टर मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते देश की संपत्ति पर पहला हक़ समुदाय विशेष का बताया था। शायद यही कारण था कि उन्होंने उन 25 आतंकियों को रिहा किया जिनमें सभी पाकिस्तानी थे। क्या उनमें से कोई सुधरा? क्या पाकिस्तान सुधरा? इसका हिसाब दीजिए, तब कंधार का नाम भी लीजिए।

AAP की ‘नौटंकी’ चालू: कल तक जिस कॉन्ग्रेस का माँगते थे साथ, अब उसके ख़िलाफ़ कर रहे हैं विरोध प्रदर्शन

लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा होने के एक दिन बाद ही आम आदमी पार्टी ने सोमवार (मार्च, 11 2019) को दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य की माँग को केंद्र में रखते हुए कॉन्ग्रेस मुख्यालय पर जमकर विरोध किया है।

‘आप’ का आरोप है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए कॉन्ग्रेस उसका साथ नहीं दे रही है। अपनी इसी शिकायत को लेकर आम आदमी पार्टी इससे पहले बीजेपी मुख्यालय को भी घेर चुकी है।

पार्टी ने अपने ट्वीट में लिखा है कि अब याचना नहीं, रण होगा। जिस पार्टी से कुछ दिन पहले तक केजरीवाल गठबंधन करने के लिए बेताब हुए जा रहे थे, उसी कॉन्ग्रेस को लेकर आप ने कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के मामले में कॉन्ग्रेस ने दिल्ली वासियों की पीठ पर छूरा घोंपा है।

इस विरोध प्रदर्शन में ‘आप’ के कार्यकर्ताओं ने जमकर नारेबाजी की। साथ ही आरोप लगाया कि दिल्ली के संयोजक गोपाल रॉय ने दिल्ली भाजपा और दिल्ली कॉन्ग्रेस के अध्यक्षों को पूर्ण राज्य मामले पर पत्र लिखकर पक्ष रखने की अपील की थी, लेकिन दोनों ही पार्टियों ने कोई जवाब नहीं दिया।

‘आप’ का दावा है कि यदि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाता है तो दिल्ली के विकास कार्यों में तेजी आएगी। साथ ही केजरीवाल ने हाल ही में यह भी कहा था कि यदि दिल्ली पूर्ण राज्य बनेगा तो 10 साल के अंदर दिल्ली के हर एक परिवार को मकान बनाकर देंगे।

यहाँ बता दें कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए केजरीवाल ने 1 मार्च से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठने का फैसला किया था, लेकिन भारत-पाक के बीच बढ़ते तनावों का हवाला देते हुए, उन्होंने इसे टालने का निर्णय ले लिया था। हालाँकि जिसके बाद भूख हड़ताल कब होगी इसकी कोई खबर नहीं है लेकिन सीट के बंटवारे से गुस्साए ‘आप’ के कार्यकर्ताओं के विरोध की खबरें जरूर हैं।

Facebook की राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल, दक्षिणपंथी आवाज़ें दबाने का आरोप: पूर्व कर्मचारी ने खोली पोल

लोकसभा चुनावों की दुंदुभी बजने के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है जिसके अंतर्गत मीडिया भी किन चुनावी चीज़ों को कवर कर सकता है और किनको नहीं, क्या छाप सकता है और क्या नहीं (मसलन एक्जिट पोल्स, चुनावी प्रचार सामग्री वगैरह) आदि भी तार्किक नियमों के घेरे में है- जिसका उल्लंघन करने पर टीवी चैनलों, अख़बारों, रेडियो चैनलों इत्यादि को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

पर राजनीतिक हलचल में भागीदारी और उस पर असर डाल सकने के हिसाब से सबसे बड़ा और ताकतवर माध्यम- फेसबुक– चुनाव आयोग, और यहाँ तक कि भारत सरकार, की पहुँच के न केवल बाहर है, बल्कि राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप (फेसबुक अधिकारियों द्वारा अपने फेसबुक पद का प्रयोग राजनीति को प्रभावित करने के लिए करना) के लिए कमर कस कर तैयार भी है।   

प्रोजेक्ट वेरिटास (Project Veritas) के चिंताजनक खुलासे

गैर लाभकारी मीडिया वेबसाइट प्रोजेक्ट वेरिटास ने गत 27 फ़रवरी को फेसबुक की आतंरिक गतिविधियों को लेकर बहुत ही चिंताजनक कुछ दस्तावेज़ जारी किए हैं। इन दस्तावेज़ों के मुताबिक हिंसक, भड़काऊ, और फेक न्यूज़ फैलानी वाली सामग्री रोकने के नाम पर फेसबुक प्रबंधन दक्षिणपंथी सामग्री और व्यक्तियों को बाकायदा निशाना बनाकर वायरल होने से रोक रहा है। (इन्टरनेट की भाषा में इसे टार्गेटेड डीबूस्टिंग कहते हैं)

फ़ेसबुक की ही पूर्व कर्मचारी ने खोली पोल

जिन दस्तावेज़ों के आधार पर वेरिटास ने यह दावा किया है, वह दस्तावेज़ उसे फेसबुक की ही पूर्व कर्मचारी ने उपलब्ध कराए हैं। उसकी सुरक्षा और उसे ऑनलाइन प्रताड़ना से बचाने के मद्देनज़र वेरिटास ने उसकी पहचान गुप्त रखते हुए केवल इतना बताया है कि वह कर्मचारी अब वेरिटास के साथ ही काम कर रही है।

क्या है पूरा मामला

ActionDeboostLiveDistribution लेबल के इस तकनीकी निर्देश को, ‘इनसाइडर’ कह कर रिपोर्ट में जिक्र की गई कर्मचारी के अनुसार, उसने जब माइक सर्नोविच (अमेरिकी लेखक व राजनीतिक टिप्पणीकार), स्टीवेन क्राउडर (अमेरिकी दक्षिणपंथी हास्य-कलाकार और अभिनेता), डेली कॉलर (वॉशिंगटन डीसी से चलने वाली दक्षिणपंथी खबर व ओपिनियन वेबसाइट, जिसे डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञ नील पटेल और दक्षिणपंथी राजनीतिक टिप्पणीकार टकर कार्लसन ने स्थापित किया है) आदि दक्षिणपंथी हैंडल्स पर नोटिस किया तो उसे शक हुआ।

यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि क्राउडर के खिलाफ़ पहले भी इसी प्रकार के गुप्त ‘बैन’ को लेकर फ़ेसबुक विवादों में घिर चुका है। वर्ष 2016 में डिज़ाइन, टेक्नोलॉजी, विज्ञान से जुड़े विषयों की विशेषज्ञ वेबसाइट गिज़्मोडो ने अपनी एक खबर में यह दावा किया था कि स्टीवेन क्राउडर, जो कि फॉक्स न्यूज़ के साथ भी जुड़े रह चुके हैं, क्रिस काइल (भूतपूर्व सील सैनिक, 2013 में जिनकी हत्या हुई), दक्षिणपंथी न्यूज़ एग्रीगेटर द ड्रेज रिपोर्ट, इत्यादि छः विषयों को फ़ेसबुक योजनाबद्ध तरीके से ट्रेंड करने से, लोगों की न्यूज़ फीड में आने आदि से रोक रहा है- गौरतलब है कि सभी छः विषय दक्षिणपंथियों के लिए ही भावनात्मक अपील वाले थे।

इस खबर के सामने आने के बाद क्राउडर ने फ़ेसबुक पर मुकदमा किया था, जिसका निपटारा फ़ेसबुक को आउट-ऑफ़-कोर्ट सेटेलमेंट में करना पड़ा था।

इनसाइडर ने जब अश्वेत अमेरिकी खिलाड़ी कॉलिन केपर्निक, यंग टर्क्स आदि वाम की ओर झुकाव रखने वाले फ़ेसबुक पेजों पर इस ActionDeboostLiveDistribution टैग को ढूँढ़ने का प्रयास किया तो उन्हें यह टैग किसी भी वामपंथी झुकाव वाले व्यक्ति या संस्था के फ़ेसबुक पेज पर नहीं मिला।

वेरिटास ने जब अभी भी फ़ेसबुक में कार्यरत अपने एक गुप्त सूत्र से इनसाइडर की खबर और दावों की पुष्टि करनी चाही तो उस सूत्र ने अनाधिकारिक तौर पर इस खबर की पुष्टि करते हुए साथ में यह भी जोड़ा कि यह टैग पूरी तरह से गुप्त होकर अपना काम करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस यूज़र के फ़ेसबुक पेज पर यह टैग लगाया जाता है उसे पता भी नहीं चलता कि उसके पेज पर यह रोक लगाई गई है और उसकी लाइवस्ट्रीम उसके दोस्तों की न्यूज़फ़ीड में दिखनी बंद हो चुकी है, उन्हें उसके लाइव जाने की नोटिफिकेशन नहीं आते, और उसके लाइव वीडियो शेयर भी नहीं हो पाते।

आत्महत्या के लाइव प्रसारण रोकने के लिए बना था यह सिस्टम

वेरिटास के पास मौजूद दस्तावेजों में यह ActionDeboostLiveDistribution लेबल जिस Sigma के बगल में दिख रहा है, वह फ़ेसबुक का एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम है जिसे फ़ेसबुक ने आत्महत्या, सेल्फ़-हार्म जैसी- किसी भी आम इन्सान को विचलित कर सकने वाली सामग्री से कमज़ोर दिल वालों की रक्षा करने के लिए विकसित किया था। पर इन दस्तावेज़ों से यह साफ़ है कि फ़ेसबुक इसका दुरुपयोग राजनीतिक हित साधने के लिए कर रहा है।

‘भड़काऊ सामग्री’ पहचानने का फ़ेसबुक का तरीका और भी चिंताजनक

वेरिटास ने यह भी बताया कि डेटा साइंस मेनेजर सेजी यामामोटो और फ़ेसबुक के चीफ़ डेटा साइंटिस्ट एडूआर्डो एरिनो डे ला रुबिया ने एक चिंताजनक पेपर फ़ेसबुक के आतंरिक चैनल में पेश किया है। वे फ़ेसबुक की सीक्रेट सेंसरशिप को नस्लवादी और होमोफ़ोबिक गालियों से आगे ले जाकर ‘पोटेंशियली हेट्फुल’ (संभावित रूप से नफ़रत फ़ैलाने वाली) कैटेगरी बना कर उसपर भी “लगाम लगाने” की वकालत करते हैं। जिन ‘कीवर्ड्स’ में वह ‘संभावित नफ़रत’ की सम्भावना देखते हैं, उनमें लगभग सभी शब्द दक्षिणपंथी सर्कल्स में आम हंसी-मज़ाक या मुख्यधारा के पॉप-कल्चर और मीम-कल्चर का हिस्सा हैं।

यही नहीं, महत्वपूर्ण चुनावों के पहले चिह्नित दक्षिणपंथी यूज़र्स को तकनीकी खराबियां देने, जैसे कि बार-बार ऑटो-लॉगआउट, उनके कमेन्ट करने में बाधा पैदा करना, आदि शामिल हैं। इसके अलावा किसी भी यूज़र को बैन करने के समय उसकी मित्र-सूची को इसकी नोटिफिकेशन देकर उसकी सोशल शेमिंग और दूसरे “ट्रोल्स” (जिसमें फ़ेसबुक की दुराग्रही परिभाषा के चलते कोई भी दक्षिणपंथी यूज़र शामिल हो सकता है) को आतंकित करने की भी वकालत की गई है।

भारत के लिए इसके मायने

सबसे ज़्यादा फ़ेसबुक यूज़र्स का देश होने के नाते निश्चित तौर पर भारत के लिए यह खुलासा अहम है। 5 साल पहले जब फ़ेसबुक का राजनीतिक प्रभाव इस हद तक नहीं था, तब ही नरेन्द्र मोदी ने शायद आधा चुनाव फ़ेसबुक पर ही जीत लिया था। तब से चुनाव-दर-चुनाव फ़ेसबुक का राजनीतिक महत्त्व बढ़ता जा रहा है।

ऐसे में फ़ेसबुक का एक राजनीतिक विचारधारा और पक्ष की आवाज़ पर रोक लगाना निष्पक्ष चुनाव कराने की हमारी सिस्टम की कोशिश में रुकावट डालने से कम कुछ भी नहीं है। तिस पर से अमेरिका से संचालित होने के कारण फ़ेसबुक भारत के कानून और राजनयिकों की पकड़ से भी कोसों दूर है।

दक्षिणपंथी आवाज़ों को दबाने के लिए जिन तरीकों को इस्तेमाल करने की वकालत इन दस्तावेज़ों में की गई है, वह समस्याएँ, जैसे बार-बार ऑटो-लॉगआउट, कमेन्ट करने में बाधा, इत्यादि एक बड़ी संख्या में भारतीय यूज़र्स काफ़ी समय से झेल रहे हैं। अभी तक तो इन्हें नेटवर्क समस्या, डिवाइस समस्या आदि मानकर हम नज़रंदाज़ करते आए हैं। पर अब यह सवाल बेशक मन में उठेगा कि क्या फ़ेसबुक अपने खुद के देश अमेरिका में जिस तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप करने के बारे में सोच भर रहा है, भारत में क्या उसने चुपचाप उसे लागू भी कर दिया? या फिर भारतीय यूज़र्स उसके ‘गिनीपिग्स’ हैं, जिन पर वह यह सब टेस्ट कर रहा था?

भारत में इलेक्शन वॉर रूम के मायने क्या हैं?

लोकसभा चुनावों की घोषणा होते ही यह खबर आई कि फ़ेसबुक चुनावों में अपने दुरुपयोग और फेक न्यूज़ के फैलाव को रोकने के लिए अमेरिका-सरीखा वॉर रूम बना रहा है, और राजनीतिक विज्ञापनों से जुड़े सारे ब्यौरे साप्ताहिक रूप से सार्वजनिक करेगा।

पर ऑर्गेनिक पोस्ट्स का क्या? क्या फ़ेसबुक यह हलफ़नामा देगा कि वह किसी भी भारतीय यूज़र के राजनीतिक झुकाव के चलते उसकी पोस्ट्स को बूस्ट या डीबूस्ट नहीं कर रहा है?

चुनाव आयोग भी फ़ेसबुक के साथ सहयोग करके चुनाव प्रक्रिया में उसकी भूमिका को मान्यता और स्वीकार्यता पाने में सहयोग कर रहा है। क्या चुनाव आयोग को फ़ेसबुक की यह सच्चाई पता है?

यदि फ़ेसबुक भारत में अपनी निष्पक्षता उपरोक्त हलफ़नामे या किसी अन्य प्रकार से साबित नहीं करता है तो यह मानने के पूरे-पूरे कारण होने चाहिए कि फ़ेसबुक यह इलेक्शन वॉर रूम निष्पक्षता के लिए नहीं बल्कि अपने वामपंथी मित्रों को और सहयोग करने के लिए कर रहा है।

दिग्विजय के ‘ओसामा जी’ के बाद अब राहुल गाँधी का ‘मसूद अज़हर जी’, देखें वीडियो

देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष राहुल गाँधी ने आतंकी मसूद अज़हर को ‘मसूद अज़हर जी’ कह कर सम्बोधित किया है। दिल्ली में कॉन्ग्रेस के ‘मेरा बूथ, मेरा गौरव’ कार्यक्रम के दौरान सभा को सम्बोधित करते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि पिछली भाजपा सरकार ने मसूद अज़हर को रिहा किया। कंधार विमान हाईजैक कांड की चर्चा करते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि अजीत डोभाल ख़ुद ‘मसूद अज़हर जी’ को कंधार छोड़ने एयरक्राफ्ट से गए थे। राहुल गाँधी द्वारा एक आतंकी को सम्मान देने के कारण सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें निशाना बनाया। केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्री स्मृति ईरानी ने राहुल गाँधी पर तंज कसते हुए कहा कि राहुल गाँधी और पाकिस्तान के बीच एक चीज कॉमन है और वह है- आतंकवादियों के प्रति उनका प्रेम।

भारतीय जनता पार्टी ने भी राहुल को निशाना बनाते हुए पूछा कि आख़िर राहुल के मन में आतंकियों के प्रति इतना सम्मान क्यों है?

ट्विटर पर कई लोगों ने राहुल को उनके इस बयान के लिए आड़े हाथों लिया। बता दें कि मसूद अज़हर ही आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का संस्थापक है, जिसने पुलवामा आतंकी हमले को अंजाम दिया था। इस हमले में 40 सीआरपीएफ जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इसके अलावा पठानकोट हमले सहित अन्य आतंकी हमलों में भी मसूद अज़हर का हाथ था। ऐसे में उसके लिए सम्मानसूचक शब्द का प्रयोग करना राहुल को चुनावी मौसम में भारी पड़ सकता है।

इस से पहले कॉन्ग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अलक़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को ‘लादेन जी’ कह कर सम्बोधित कर चुके हैं। ओसामा बिन लादेन को दुनिया के सबसे खूँखार आतंकवादियों में से एक गिना जाता है। पाकिस्तान में छिपे ओसामा को अमेरिका ने मार गिराया था। इसके अलावा दिग्विजय सिंह मुंबई हमलों के साज़िशकर्ता आतंकी हाफिज सईद को ‘साहब’ कह कर भी सम्बोधित कर चुके हैं।

जैसा कि आप देख सकते हैं, एक ट्विटर यूजर ने कार्टून के माध्यम से राहुल गाँधी, पाकिस्तान और नवजोत सिद्धू पर निशाना साधा। राहुल गाँधी द्वारा भारत में ख़ून बहाने वाले पाकिस्तानी आतंकी को ‘जी’ कह कर पुकारने पर ट्विटर पर लोगों ने उनकी क्लास लगाई।

‘क्रांतिकारी पत्रकार’ पुण्य प्रसून बाजपेयी ने कर डाला एक और ‘कांड’, IAS अधिकारी ने लगाई लताड़

चुनाव की तारीखों की घोषणा हो चुकी है। तारीखों की घोषणा के साथ ही चुनावी सरगर्मियाँ और भी तेज हो गई हैं।
इस चुनावी मौसम में मीडिया वाले भी कुछ ज्यादा ही सक्रिय और उत्तेजित दिखाई देते हैं। इसी चक्कर में कई बार तो ऐसा देखने को मिलता है कि मीडिया में बैठे वरिष्ठ पत्रकार भी अपनी सूझ-बूझ का परिचय नहीं दे पाते हैं और कुछ ऐसी बातें कह जाते हैं जो कि उनकी काबिलियत और कौशल पर सवाल खड़े कर देता है।

ऐसा ही कुछ कर दिया है जाने-माने पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने। वही बाजपेयी जो ‘आज तक’ और ‘एबीपी’ जैसे न्यूज़ चैनल में काम करने के बाद ‘सूर्या समाचार’ में एडिटर-इन-चीफ के ओहदे पर आसीन हैं। शायद ये इनका ‘कर्म’ ही है कि शीर्ष समाचार चैनलों में काम करने वाले वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार आज एक यू ट्यूब चैनल में काम करने को मजबूर हैं। अभी एक बार फिर से वो निशाने पर आ गए, जब उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि आज शाम से केयर-टेकर की भूमिका में आ जाएगी मोदी सरकार।

बाजपेयी के इस ट्वीट के बाद लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गईं। उनकी बुद्धिमत्ता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। एक आईएएस अधिकारी ने तो यहाँ तक कह दिया, “बाजपेयी जी, एंकरिंग आपको संवैधानिक विशेषज्ञ नहीं बनाती है। लोकसभा भंग होने पर ही सरकार केयर-टेकर बनती है। कृपया भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश का संविधान लागू न करें।”

भारतीय संविधान की बात करें तो पार्लियामेंट के भंग होने के बाद सरकार को केयर-टेकर की भूमिका में रखा जाता है या फिर सरकार को तभी केयर-टेकर के तौर पर रखा जाता है, जब सरकार खुद से इस्तीफा दे दे। इस्तीफा देने के बाद राष्ट्रपति के द्वारा तब तक के लिए सरकार को केयर-टेकर की भूमिका में रखा जाता है, जब तक कि चुनावी प्रक्रिया से नए सरकार की नियुक्ति ना हो जाए।

बाजपेयी ने ये ट्वीट तो मोदी सरकार के खिलाफ में किया था और सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश की, मगर आधी-अधूरी जानकारी के साथ किया गया यह ट्वीट अब इन पर ही भारी पड़ रहा है। चले तो थे मोदी को घेरने पर खुद ही घिरते हुए नज़र आ रहे हैं। लोगों ने तो उन पर तंज कसते हुए ये तक कह दिया कि पैसे लेकर हेडलाइन बदलने वाले बाजपेयी जी पैसे लेकर संविधान भी बदल सकते हैं।

‘चंदामामा’ के मालिकों पर ‘दाग’: मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में स्विस बैंक देगा जानकारी

दशकों से बच्चों के मनोरंजन के लिहाज़ से पढ़ी जाने वाली चंदमामा मैग्जीन के नए मालिक इस बार मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में बुरी तरह फँसे हैं। दरअसल, 2007 में मुंबई की जियोडेसिक लिमिटेड कंपनी ने इस पत्रिका को खरीद लिया था।

लेकिन अब कंपनी में पैसों की हेर-फेर और अन्य वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर तीनों निदेशकों के ख़िलाफ़ जाँच चल रही है। इस जाँच में सहयोग करते हुए स्विट्जरलैंड ने तीनों के स्विस बैंक के खातों से संबंधित जानकारी देने की सहमति दे दी है।

आधिकारिक कागज़ातों के मुताबिक, स्विट्जरलैंड के टैक्स विभाग ने 5 मार्च को कंपनी और इसके तीनों निदेशकों पंकज कुमार ओंकार श्रीवास्तव, किरण कुलकर्णी और प्रशांत शरद मुलेकर के बैंक खातों में प्रशासनिक सहयोग देने का निर्णय कर लिया है।

स्विटज़रलैंड के कानून के अनुसार कर विभाग के फैसले के ख़िलाफ़ 30 दिनों के भीतर अपील की जा सकती है। इसलिए 2018 में इस विषय पर लिए निर्णय को चुनौती दी गई, लेकिन योग्य प्रमाण न होने के कारण इस अपील को ख़ारिज कर दिया गया। जिसके बाद एक बार दोबारा से यह निर्णय लिया गया है।

चंदामामा मैग्जीन

बता दें कि चंदामामा मैग्जीन को ख़रीदने वाली यह कंपनी विभिन्न नियमों की अनदेखी के आरोप में पहले भी सेबी (Securities and Exchange Board of India) की कार्रवाई का सामना कर चुकी है।

राष्ट्रगान के समय खड़े होने पर राजनीति शुरू… इस बार दक्षिण भारत से आई यह हवा

किसी भी नागरिक के लिए देश सर्वोपरि होता है और होना भी चाहिए, क्योंकि देश है तो हम हैं। हमारी पहचान देश से है। जिस देश में हम सुकून और इज्जत के साथ जीते हैं, जिस देश की हम रोटी खाते हैं, जिस देश की मिट्टी में हम सोते हैं, क्या हमारा उस देश के प्रति कोई फ़र्ज़ नहीं बनता? क्या ये हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि हम देश की अस्मिता और गरिमा का सम्मान करें और अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो हमें इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

दरअसल, हम यहाँ पर बात कर रहे हैं अभिनेता से नेता बने जन सेना प्रमुख पवन कल्याण की, जिन्होंने उच्चतम न्यायालय के उस निर्देश पर सवाल खड़े किए हैं, जिसमें सिनेमा हॉल के अंदर राष्ट्रगान बजाने को अनिवार्य किया गया। पवन कल्याण को सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान पर खड़े होना पसंद नहीं है। पवन ने कहा, “ये मेरी देशभक्ति की परीक्षा नहीं है, सीमा पर युद्ध चल रहा है, यह मेरी देशभक्ति की परीक्षा है। समाज में रूढ़िवाद व्याप्त है, यह मेरी देशभक्ति की परीक्षा है। मैं रिश्वतखोरी को रोक सकता हूँ या नहीं यह मेरी देशभक्ति की परीक्षा है। परिवार और दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने के लिए निकाला गया समय अब देशभक्ति के प्रदर्शन का परीक्षण बन गया है।”

ऐसे में यह सवाल उठना ज़रूरी बन पड़ता है कि क्या राष्ट्रगान पर खड़ा होना आपका कर्तव्य नहीं है? माना कि आप परिवार और दोस्तों के साथ मस्ती करने गए हैं, मगर क्या आप उसमें से 52 सेकेंड का समय अपने देश के लिए नहीं निकाल सकते? 3 घंटे की फ़िल्म के दौरान 52 सेकेंड का समय निकालना आपके लिए देशभक्ति प्रदर्शित करने का परीक्षण बन गया?

हमारे राष्ट्रगान का संबंध राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक देशभक्ति से है। मगर ये देखकर बड़ा ताज्जुब होता है कि कुछ लोगों को हमारे राष्ट्रगान के समय खड़े होने में तकलीफ़ होती है, राष्ट्रगान के समय
उन्हें खड़ा होना पसंद नहीं होता।

बड़ी अजीब सी बात है कि जब हम छोटे थे तो स्कूलों में राष्ट्रगान बजने के दौरान खड़े होते थे। तब हमें उतनी समझ भी नहीं थी, लेकिन फिर भी खड़े हो जाते थे। अब जब समझदार हो गए हैं तो यह जानकर हैरानी होती है कि समाज में ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें राष्ट्रगान के समय आदरपूर्वक खड़े होने में कष्ट होता है।

आमतौर पर यह देखा गया है कि अभी भी घर में बड़ों के सम्मान में लोग खड़े हो जाते हैं, ऑफिस में बॉस के आने पर कर्मचारी जन उनके समक्ष खड़े होकर आदर का भाव व्यक्त करते हैं। ऐसे में मात्र 52 सेकंड के लिए राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होने पर भला क्या आपत्ति हो सकती है? जबकि इसका सीधा संबंध हमारे देश के गौरव से है।

हाँ, अगर किसी को शारीरिक तौर पर कोई परेशानी हो या फिर अस्वस्थ हों तो ये बात समझ में आती है, मगर जानबूझकर राष्ट्रगान के समय खड़ा ना होना शिष्टाचार का प्रतीक तो नहीं है।

अलगाववादी मीरवाइज़ ने NIA की नोटिस को धता बताया, पूछताछ के लिए हाजिर होने से किया इनकार

मीरवाइज़ उमर फ़ारुक़ ने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की नोटिस को धता बताते हुए एजेंसी के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया है। टेरर फंडिंग के मामले में एजेंसी ने मीरवाइज़ को नई दिल्ली समन किया था लेकिन उसने उलटा एनआईए को ही श्रीनगर आकर पूछताछ करने को कहा। टेरर फंडिंग के मामले में चल रही जाँच में सहयोग करने से उसने साफ़ इनकार कर दिया है। सोशल मीडिया पर लोगों ने मीरवाइज़ उमर फ़ारुक़ के इस रवैये पर सवाल खड़ा करते हुए पूछा कि क्या वह अपने आप को क़ानून से ऊपर मानता है? हुर्रियत के प्रवक्ता ने कहा कि मीरवाइज़ एनआईए के समक्ष पेश नहीं होंगे बल्कि लिखित में जवाब देंगे। प्रवक्ता ने कहा कि मीरवाइज़ ने क़ानूनी सलाह लेने के बाद यह निर्णय लिया।

एनआईए द्वारा अलगावादी नेताओं को समन करने के बाद से श्रीनगर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। अलगाववादियों के गुर्गों ने सड़क पर उत्पात मचाया। पिछले सप्ताह एनआईए द्वारा मीरवाइज़ को थमाए गए नोटिस में लिखा था- “एनआईए द्वारा जिस केस की जाँच की जा रही है, आप उसके पहलुओं से परिचित हैं। अतः आपको पूछताछ हेतु एजेंसी के समक्ष 11 मार्च को सुबह 11.30 बजे रिपोर्ट करना आवश्यक है।”

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने मीरवाइज़ को नोटिस देने को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। महबूबा ने एक ट्वीट में लिखा कि एनआईए का समन हमारी धार्मिक पहचान पर भारत सरकार द्वारा बार-बार किए जा रहे चोट का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि सरकार वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए मीरवाइज़ को बलि का बकरा बना रही है।

बता दें कि पुलवामा हमले के बाद सरकार कश्मीर के अलगाववादियों व आतंकियों के प्रति सख़्त रवैया अपनाए हुई है। यासीन मलिक को गिरफ़्तार कर लिया गया है। 150 से भी अधिक अलगाववादियों व अन्य कश्मीरी नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली गई है। कुछ दिनों पहले एनआईए ने मीरवाइज़ के श्रीनगर स्थित आवास की तलाशी भी ली थी। एजेंसी के अनुसार, इस छापे में कई अहम दस्तावेज बरामद हुए। जम्मू-कश्मीर में आतंकी वारदातों को बढ़ावा देने के लिए पाकिस्तानियों से हुए अवैध वित्तीय करार के सम्बन्ध में एनआईए ने 2017 में मीरवाइज़ के प्रवक्ता शहीद-उल-इस्लाम सहित 7 अन्य अलगाववादियों को गिरफ़्तार किया था।