अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवाद पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए सख्त हिदायत दी है। अमेरिका ने पाकिस्तान से स्पष्ट कहा है कि वह आतंक के सरगनाओं के खिलाफ ठोस, सटीक एवं निर्णायक कार्रवाई करे और अब अगर भारत पर कोई और आतंकी हमला हुआ तो फिर इस्लामाबाद के लिए ‘बहुत मुश्किल’ हो जाएगी।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने बुधवार को व्हाइट हाउस में संवाददाताओं से कहा, “यह जरूरी है कि पाकिस्तान जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों पर काबू करने के लिए ठोस एवं निर्णायक कार्रवाई करे ताकि क्षेत्र में फिर से तनाव नहीं बढ़े।”
रिपोर्ट के अनुसार, इस अधिकारी ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर कहा, “अगर पाकिस्तान की ओर से इन संगठनों के खिलाफ कोई ठोस एवं गंभीर प्रयास नहीं होते हैं तो कोई भी अन्य हमला पाकिस्तान के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकता है और यह क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़ने का कारण भी बन जाएगा।”
बालाकोट में भारतीय वायुसेना द्वारा की एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान की ओर से उठाए गए कदमों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय देखना चाहता है कि आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस और निर्णायक कार्रवाई हो।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारी ने आगे कहा, “अभी पाकिस्तान की ओर से उठाए गए कदमों को लेकर पूर्ण आकलन करना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में पाकिस्तान ने कुछ ‘शुरुआती’ कदम उठाए हैं। मसलन, कुछ आतंकी संगठनों के सम्पत्तियाँ जब्त की गई हैं और कुछ की गिरफ्तारी भी हुई है और जैश के कुछ ठिकानों को प्रशासन ने अपने कब्जे में लिया है।
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि इन कदमों के अलावा अभी पाकिस्तान की ओर से बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। इसे भारतीय कूटनीति की सफलता माना जा रहा है।
होली के अवसर पर भी आतंकी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। आज गुरुवार (मार्च 21, 2019) को आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर के सोपोर में ग्रेनेड से हमला किया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस हमले में डांगीवाचा थाना के प्रभारी एक अधिकारी सहित दो पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। दोनों घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हमले के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों और सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर, हमलावरों की तलाश कर रही है।
मालूम हो कि बुधवार ( मार्च 20, 2019) को अलगाववादियों की ओर से यहाँ एक युवक की मौत के विरोध में बुलाए गए बंद से कश्मीर घाटी में आम जनजीवन बाधित रहा। बता दें कि युवक की पुलिस हिरासत में सोमवार को मौत हो गई थी। दक्षिण कश्मीर के अवंतीपोरा से गिरफ्तार किए जाने के तीन दिन बाद श्रीनगर में पुलिस हिरासत में रिजवान असद पंडित की मौत हो गई थी।
होली के अवसर पर अधिकारियों ने घाटी में कानून व व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस व अर्धसैनिक बलों की भारी संख्या में तैनाती की है। दक्षिण कश्मीर के जिलों में मोबाइल व इंटरनेट सुविधाएँ निलंबित की गई है, जबकि घाटी के अन्य हिस्सों में सामान्य है।
कल दो घटनाएँ हुईं, और दोनों ही पर मीडिया का एक गिरोह चुप है। अगर यही बात उल्टी हो जाती तो अभी तक चुनावों के मौसम में होली की पूर्व संध्या पर देश को बताया जा रहा होता कि भगवा आतंकवाद कैसे काम करता है। चैनलों पर एनिमेशन और नाट्य रूपांतरण के ज़रिए बताया जाता कि कैसे एक हिन्दू ने ट्रेन में बम रखे और दुसरे समुदाय वालों को अपनी घृणा का शिकार बनाया।
फिर दूसरे हिस्से में बताया जाता कि कैसे एक निर्दोष व्यक्ति को, जो पाँच वक्त का नमाज़ी था, मोदी और अमित शाह ने दस सालों तक प्रताड़ित किया कि गोधरा में रुकी साबरमती एक्सप्रेस में आग उसी ने लगाई ताकि भीतर के हिन्दू जल कर मर जाएँ। बताया जाता कि अल्पसंख्यक कैसे एक सरकारी तंत्र की घृणा का शिकार हो रहा है क्योंकि हिन्दू वोटों का चुनावों के समय ध्रुवीकरण करना है।
लेकिन हुआ इसके उलट कि असीमानंद को बरी किया गया और याकूब को सोलह साल बाद आजीवन क़ैद की सजा मिली। मैं साम्प्रदायिक बात नहीं कर रहा, मैं तो वो कर रहा हूँ जो सबको करना चाहिए। ऐसे मौक़ों पर उन तमाम लोगों से सवाल पूछा जाना चाहिए कि भगवा आतंकवाद कहाँ है? सैफ्रन टेरर के जिस तर्क पर ‘आतंक का कोई मज़हब नहीं होता’ से ‘हिन्दू भी आतंकवाद में संलिप्त हैं’ कहकर, इस्लामी आतंक के समकक्ष हिन्दू आतंकवाद की बात को मेनस्ट्रीम करने की कोशिश की गई थी, वो फुस्स हो चुकी है।
ऐसे में ही कर्नल पुरोहित याद आते हैं। उनको याद करना ज़रूरी है, क्योंकि वो भी चिदम्बरम की शैतानी खोपड़ी से उपजे इन शब्दों के घेरे में काफी समय तक रहे। उनकी वेदना उनके और उनके परिवार के अलावा कोई समझ भी नहीं सकता। असीमानंद को भी यूपीए के कार्यकाल में, कर्नल पुरोहित ही की तरह टॉर्चर किया जाता रहा। वहीं साबरमती ट्रेन में आग लगाकर 59 हिन्दुओं की जान लेने में शामिल याकूब को अल्पसंख्यक होने का सुरक्षा कवच हासिल था।
कर्नल पुरोहित सेना के बेहतरीन अफ़सरों में से एक थे जिन्हें कॉन्ग्रेस के धूर्त नेताओं ने कथित अल्पसंख्यकों के वोटों के लिए ‘सैफ्रन टेरर’ के नाम पर एक उदाहरण बनाने के लिए इस्तेमाल किया। उनकी कहानी जाननी ज़रूरी है, अगर आप नहीं जानते हैं।
मराठा लाइट इन्फैन्ट्री के एक अफसर को साठ किलो आरडीएक्स चुराकर मालेगाँव ब्लास्ट का दोषी बनाया जाता है जिसमें कॉन्ग्रेस की सरकार होने के बावजूद छः सालों तक चार्जशीट दायर नहीं की जा सकी। अफसर का नाम है कर्नल श्रीकांत पुरोहित। नाम तो सबने सुना ही होगा।
एक और टर्म चला था यूपीए के शासनकाल में जब कर्नल पुरोहित को मकोका के अंतर्गत बंद किया गया था: सैफ्रन टेरर, यानि भगवा आतंकवाद। ये टर्म सिर्फ एक, वो भी कल्पनाशक्ति के आधार पर, हिन्दू संगठन द्वारा तथाकथित ब्लास्ट के नाम पर दे दिया गया। जबकि वही व्यक्ति हमेशा ये कहता रहा कि हालाँकि हर आतंकी हमला मजहब विशेष के नाम वाले लोग कर रहे हैं, फिर भी हम उसे इस्लामी आतंक नहीं कहेंगे। भगवा आतंक कहेंगे, हिन्दू आतंकी संगठन कहेंगे, लेकिन समुदाय विशेष वाले हमले में वही विवेचना नहीं होगी।
हिटलर के समय में गोएबल्स ने कहा था कि एक झूठ बोलो, उसे सीधा रखो, उसे बार-बार बोलते रहो, और अंततः लोग उसे सच मान लेंगे। कर्नल पुरोहित और सैफ्रन टेरर का वही हुआ। चिदंबरम जैसे नामी चोर ने ये शब्द बोले, और फिर उसे चाटुकार पत्रकारों ने, जिनकी ज़िंदगी लुट्यन पत्रकारिता की प्रेस्यावृति में बीती, लगातार चलाया। और फिर वो समय भी आया कि भगवा आतंकवाद एक स्थापित वाक्याँश हो गया।
आपको शायद पता नहीं हो, लेकिन आज भी कर्नल पर कोई चार्ज नहीं लगा। कोर्ट को कोई सबूत नहीं मिला। इसके उलट महाराष्ट्र के एटीएस के ऊपर ये आरोप है कि उनके अफ़सर हेमंत करकरे (जो मुंबई हमले में आतंकियों की गोली का शिकार हुए) ने कर्नल पुरोहित को फँसाने के लिए आरडीएक्स ख़ुद रखा था और फिर कर्नल को उसी आधार पर गिरफ़्तार किया गया।
कर्नल पुरोहित सेना के एक बेहतरीन अफ़सर माने जाते हैं। लेकिन उनकी ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्हें देशद्रोही बनाने की कोशिश में तात्कालिक सरकार ने तबाह कर दिया। कभी समय मिले तो कर्नल पुरोहित की पत्नी अपर्णा जी का इंटरव्यू सुनिएगा कि करकरे ने किस-किस तरह की प्रताड़नाएँ दी जेल में। उनके चारों हाथ-पाँव को हर तरफ खींचा जाता था, बेतहाशा पीटा जाता था, और अंततः उनकी स्थिति ये बना दी गई कि उन्हें खड़े होने में परेशानी होती है। उन्हें लगातार धमकी दी जाती रही कि वो क़बूल करे कि वो गुनहगार है वरना उसकी माँ, बहन और पत्नी को उसके सामने नंगा करके परेड कराया जाएगा।
ये सब किस लिए? समुदाय विशेष का वोट लेने के लिए? ये साबित करने के लिए कि हिन्दुओं की एक तथाकथित संस्था समुदाय विशेष के सिमी की समकक्ष है? हिन्दुओं के ख़िलाफ़ एक साज़िश रचने के लिए और अपनी राजनैतिक पहचान बचाए रखने के लिए? तुष्टीकरण की राजनीति और पक्षपाती पत्रकारिता के दौर में याकूब मेमन के ख़िलाफ़ सबूत होने के बावजूद, 22 साल तक ट्रायल चलने के बावजूद सुबह के चार बजे सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खुलवाया जाता है। लेख लिखे जाते हैं कि ये एक्स्ट्राजुडियशियल किलिंग है, और प्रबुद्ध वर्ग मान लेता है कि ऐसा ही है।
आज ये सारे दोगले पत्रकार, नंगे नेता, और छद्मबुद्धिजीवियों की पूरी जमात इस विषय पर कुछ नहीं बोल रही। आज सैफ्रन टेरर नामक परिभाषा को ढोते-ढोते पत्रकारिता चमकाने वाले, डिबेटों की महफ़िल लूटने वाले, प्राइम टाइम शो में बवाल काट देने वाले सब गायब हैं?
असीमानंद, कर्नल पुरोहित, सैफ्रन टेरर आदि इस बात के परिचायक हैं कि कॉन्ग्रेस पार्टी वोट पाने के लिए किस हद तक गिर सकती है। आमतौर पर पार्टियाँ विपक्ष के नेताओं का अपना निशाना बनाती रही हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस के नाम थोड़े अलग तरह की बातें हैं। ये पहली पार्टी होगी जिसने सेना के अफ़सर को, राजनैतिक महात्वाकांक्षा की बलि चढ़ाया। ये पहली पार्टी थी जिसने इस देश में दंगे किए, कराए और एक धर्म विशेष के लोगों की सामूहिक हत्याएँ की। दंगे दो समुदायों में होते हैं, यहाँ एक सत्ताधारी पार्टी ने किया था।
कर्नल पुरोहित और असीमानंद जैसों को फँसाना, उसे चर्चा का विषय बनाकर, भगवा आतंक, हिन्दू टेरर जैसे शब्दों को बोलचाल में लाना, सिर्फ एकेडमिक एक्सरसाइज़ नहीं था। इस पूरे प्रक्रिया में सेना की छवि ख़राब हुई कि एक अफ़सर ही देश में आतंकवादी गतिविधि कर रहा है। इस पूरे प्रक्रिया में पूरे धर्म को, जिसका इतिहास और वर्तमान सहिष्णुता का पैमाना रहा है, आतंकवादी बताने की कोशिश की। जबकि सबको पता है कि आतंक का ठप्पा कहाँ लगा है, और क्यों।
कर्नल पुरोहित को याद रखिए। उन्हें इसलिए याद रखिए कि हमारे-आपके जीवन काल में ही फिर कोई सत्ताधारी पार्टी वोट के लिए नीचे गिरेगी। उन्हें इसलिए याद रखिए ताकि याद रहे कि इस देश की मीडिया, पूरी दुनिया की तरह ही, बिकी हुई है और सत्ता की गोद में पलती है। उन्हें इसलिए याद रखिए ताकि याद रहे कि प्राइम टाइम एंकरों के डिबेटों में कितनी खोखली बातें होती हैं। उन्हें याद रखिए क्योंकि वो फ़ौज के बेहतरीन अफ़सर हैं।
सैफ्रन टेरर को भी याद रखिएगा। वो इसलिए कि इन दो शब्दों से एक पार्टी उस धर्म को बदनाम कर रही थी जिसने हर क़िस्म के लुटेरों को, मंदिर गिराने वालों को, बलात्कारियों की औलादों को, राजा बन गए लुटेरों की सन्तानों और उनकी पीढ़ियों के आतंक को सहा है। सहिष्णुता अगर हिन्दुओं में नहीं है, और हिन्दुस्तानियों में नहीं है तो फिर वो धरती पर कहीं हो ही नहीं सकती। इसलिए हिन्दू टेरर, भगवा आतंकवाद को याद रखिएगा। ये शब्द सिर्फ अक्षरों के झुंड नहीं, ये पूरी राजनीति का वो गंदा चेहरा हैं जो हमारे नेता बार-बार दिखाते रहते हैं।
योगी सरकार ने राज्य के कर्मचारियों को होली का उपहार दे दिया है। राज्य सरकार ने कर्मचारियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी का ऐलान किया है। सबसे खुशी की बात यह है कि महंगाई भत्ता 9 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत कर इसका भुगतान नकद करने का निर्देश दिया गया है।
महंगाई भत्ते में यह बढ़ोतरी 1 जनवरी 2019 से लागू हो गई है। राज्य के करीब 18 लाख सरकारी कर्मचारियों को इस फैसले से फायदा होगा। वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव संजीव मित्तल ने इस बारे में आदेश जारी कर दिया है। आदेश के अनुसार जनवरी और फरवरी का बढ़ा हुआ भत्ता 31 मार्च से पहले नकद देना है। जबकि मार्च का भत्ता अप्रैल में (मार्च के वेतन के साथ) दिया जाएगा।
आपको बता दें कि आचार संहिता लागू होने से पहले ही महंगाई भत्ता 9 प्रतिशत से बढ़ा कर 12 प्रतिशत कराने का आदेश पास करा लिया गया था। लेकिन इसे जारी करने के लिए योगी सरकार को चुनाव आयोग से अनुमति लेनी पड़ी। चुनाव आयोग से अनुमति मिलने के बाद बुधवार को इसे जारी कर दिया गया।
अमेरिका में भारतीयों की धाक बढ़ती जा रही है। अमेरिका में भारतीय मूल की प्रख्यात वकील नेओमी जहाँगीर राव (45 वर्षीय) ने ‘डिस्ट्रिक ऑफ कोलंबिया सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स’ के अमेरिकी सर्किट जज के रूप में शपथ ग्रहण लिया। बता दें कि नेओमी ने विवादों से घिरे ब्रेट केवनॉग का स्थान लिया है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश क्लेरेंस थॉमस ने मंगलवार को व्हाइट हाउस के रूजवेल्ट रूम में राव को शपथ दिलाई।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए। बता दें कि भारत के पारसी डॉक्टर जेरीन राव और जहाँगीर नरिओशांग राव के घर डेट्रॉयट में जन्मीं नेओमी राव, श्रीनिवासन के बाद दूसरी भारतीय अमेरिकी हैं, जो अमेरिका के शक्तिशाली अदालत का हिस्सा बनीं हैं। इस अदालत से अधिक शक्तिशाली केवल अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ही है।
पाकिस्तान में एक छात्र ने अपने प्रोफेसर की हत्या कर दी। प्रोफ़ेसर साहब का गुनाह बस इतना था कि उन्होंने लड़के-लड़कियों को एक साथ फ्रेशर पार्टी की इजाज़त दे दी। यह बहावलपुर के सादिक एगर्टन कॉलेज की घटना है। आज ही 21 मार्च को पार्टी का आयोजन होना था। लड़के और लड़कियों की एक साथ पार्टी को गुनाहे अज़ीम समझ लिया छात्र खतीब हुसैन ने। खतीब ने पार्टी को गैर इस्लामी भी बताया। और इसी बात पर प्रोफेसर खालिद हमीद से बहस हो गई थी।
20 मार्च को जब प्रोफेसर साहब कॉलेज जा रहे थे, तो खतीब ने उन पर चाकुओं से हमला कर दिया। उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया पर बचाया नहीं जा सका। आरोपित छात्र को गिरफ्तार कर लिया गया है।
पुलिस में दर्ज शिकायत के मुताबिक, छात्र इस बात के खिलाफ था कि लड़के-लड़कियों की एक साथ पार्टी हो। वह इस तरह के कार्यक्रम को गैर इस्लामी मानता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को आरोपित ने बताया, “इस तरह की पार्टी इस्लामी शिक्षा के खिलाफ है। मैंने उनको ऐसा नहीं करने की चेतावनी दी थी।”
बता दें कि हमला करने के बाद छात्र खतीब चिल्लाने लगा कि मैंने उसे मार दिया है, मैंने उसे बताया था कि ख़वातीन और मर्द का एक साथ कार्यक्रम में शामिल होना इस्लाम के खिलाफ है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के शैक्षिक संस्थानों में इस तरह के कार्यक्रम आम हैं लेकिन वहाँ छात्राओं पर काफी पाबंदी है। हाल ही में पंजाब की एक यूनिवर्सिटी ने ड्रेस कोड का सर्कुलर जारी किया था। उस सर्कुलर के माध्यम से छात्राओं को टॉप, जींस, बगैर आस्तीन वाली कमीज और टाइट पैंट पहनने पर रोक लगा दी गई थी। यहाँ तक कि कई सरकारी यूनिवर्सिटी में लड़के-लड़कियों के साथ बैठने पर भी रोक है। उनके बीच बातचीत की भी अनुमति नहीं है।
जिन्होंने भारत का इतिहास पढ़ा है, उनके सामने एक न एक बार सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह का नाम आया ही होगा। और होली के बारे में कौन नहीं जानता? रंग-अबीर का यह त्यौहार अब भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फ़ैल चुका है। यहाँ हम भारतीय एवं सिख इतिहास के एक ऐसे अध्याय की तरफ ले जाना चाह रहे हैं, जो दोनों के ही स्वर्णिम युग की याद दिलाता है। महाराजा रणजीत सिंह कोहिनूर धारण किया करते थे। कई हिन्दू, तुर्क और मुस्लिम राजाओं से होते हुए इतिहास के उस काल में कोहिनूर हीरा रणजीत सिंह के पास पहुँचा और क्यों नहीं? रणजीत सिंह की शोभा कोहिनूर से नहीं थी बल्कि कोहिनूर उनके मस्तक पर चढ़ कर इतराया करता था। उनके निधन के बाद धोखेबाज़ अंग्रेजों ने कोहिनूर को जब्त कर लिया और ईस्ट इंडिया कम्पनी ने उसे अपने कब्ज़े में ले लिया।
लाहौर के महल में सबसे भव्य तरीके से मनाए जाने वाले त्योहारों में होली भी शामिल था। होली की तैयारी काफ़ी दिनों पहले से शुरू हो जाया करती थी। उस होली का स्तर कितना भव्य हुआ करता था और उसका ऐश्वर्य और वैभव इतना विशाल था कि रंगों और गुलालों के 300 से भी अधिक टीले खड़े कर दिए जाते थे। होली के दिन इन सबका प्रयोग किया जाता था। शाह बिलावल के बगीचे में महाराजा को होली मनाना अच्छा लगता था। ये उनके पसंददीदा स्थलों में से एक था। बाग में बड़े-बड़े टेंट लगाए जाते थे, इन टेंट्स को काफ़ी अच्छे से सजाया जाता था और दोनों तरफ से सैनिकों से सुसज्जित रखा जाता था। उस दिन बाग की शोभा देखते ही बनती थी। रणजीत सिंह अंग्रेज अधिकारी सर हेनरी के टकले पर गुलाल मल दिया करते थे।
इस होली में महाराजा रणजीत सिंह के दरबारीगण, परिवार के लोग, अंग्रेज, स्थानीय जनता सहित बाहर से आए अतिथि भी होली खेला करते थे। 22 मार्च 1837 में ब्रिटिश आर्मी के कमांडर-इन-चीफ सर हेनरी फेम ने भी इस होली समारोह में शिरकत की, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोग महाराजा रणजीत सिंह की होली के कायल हो गए। उस दिन माहौल कुछ ऐसा हुआ करता था कि पूरा लाहौर रंगों से लाल हो जाया करता था। कहते हैं कि हवा में गुलाल और गुलाबजल का ऐसा सम्मिश्रण घुला होता था कि उस समय रंगीन तूफ़ान आया करते थे। ये सिख सम्राट का ही वैभव था कि उन्होंने सिर्फ़ अंग्रेज अधिकारीयों को ही नहीं रंगा बल्कि प्रकृति के हर एक आयाम को भी रंगीन बना दिया। वातावरण को बदल देने की क्षमता थी महायोद्धा रणजीत सिंह में!
शाहजहाँ द्वारा बनवाए गए लाहौर के किले को लेकर भले ही पाकिस्तान आज इतराता हो लेकिन उस किले की शानो-शौकत महाराजा रणजीत सिंह की देन है। उन्होंने किले के ऊपर कुछ और नए स्ट्रक्चर भी बनवाए। शाह बुर्ज ब्लॉक में स्थित शीश महल ही वह स्थान था, जो महाराजा का सबसे फेवरिट जगह हुआ करता था। शीश महल के ऊपर निर्माण करा कर वे वहाँ पर कोहिनूर हीरा रखा करते थे। जहाँ सालों भर भव्यता और त्यौहार का मौसम रहता था, सोचिए वहाँ होली के समय क्या स्थिति होती होगी? महाराजा ने उस किले को अपने अधिकार में लेने के बाद उसमे राधा-कृष्णा की एक पेंटिंग करवाई। वहाँ की दीवारों पर करवाई गई इस पेंटिंग को महाराजा के दरबारी पेंटरों ने ही बनाया था। कला के भी शौक़ीन थे वो, और धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करने में सबसे अग्रणी।
और आपको पता है कि उस पेंटिंग में क्या था? उस पेंटिंग में श्रीकृष्ण और गोपियाँ आपस में होली खेल रहे थे। पेंटिंग में भी रंग और रंगों के त्यौहार का ऐसा समावेश। होली के प्रति महाराजा के प्रेम को इस पेंटिंग को देख कर ही समझा जा सकता है। महाराजा की मृत्यु के बाद भी होली की भव्यता कम नहीं हुई। कहा जाता है कि उस समय भी इस पर एक लाख रुपए के क़रीब ख़र्च हुआ करते थे। महाराजा की मृत्यु के बाद अंग्रेज लोग को भी अवसर दिखने लगा। सत्ता पाने की लालच में उन्होंने लाहौर को अशांत कर डाला। यह रणजीत सिंह का ही प्रभाव था कि होली का ये भव्य आयोजन लाहौर पार कर जम्मू-कश्मीर पहुँचा। उस समय वहाँ ऐसे हालात नहीं थे। रणजीत सिंह का ऐसा प्रभाव था कि कश्मीरी प्यार से होली खेलते और एक-दूसरे पर रंगों की बौछाड़ किया करते थे।
राधा कृष्णा की होली वाली पेंटिंग
20वीं सदी में सिखों के बीच होला मोहल्ला त्यौहार का अच्छा-ख़ासा प्रचलन था, जो कि होली का ही एक रूप है। अंतरराष्ट्रीय लेखकों द्वारा दक्षिण भारत के इतिहास पर लिखी गई एक पुस्तक से पता चलता है कि उस दिन सिख सैनिकों के बीच तरह-तरह की प्रतियोगिताएँ हुआ करती थीं, जैसे कि घुड़सवारी, पहलवानी, धनुर्विद्या इत्यादि। तीन दिन तक चलने वाले इस त्यौहार में स्वयं गुरु गोविन्द सिंह संगीत और कवी सम्मेलनों का आयोजन करवाया करते थे। कई सारे खेल, गायकी प्रतियोगिता इत्यादि को गुरु काफ़ी बढ़-चढ़ कर बढ़ावा दिया करते थे। पुस्तक में वर्णन है कि आनंदपुर साहिब से शुरू होने वाले इस त्यौहार के दौरान क्या मित्र और क्या अपरिचित, सभी आपस में होली खेला करते थे।
इसका बहुत बड़ा महत्व है। सिखों के इतिहास पर लिखी गई एक अन्य पुस्तक के अनुसार, अगर हम गुरु गोविन्द सिंह की होली को समझें तो पता चलता है कि यह आज भी प्रासंगिक है। एक तरफ जहाँ युद्धकला की प्रतियोगिताएँ होती थीं तो दूसरी तरफ खेल सम्बंधित प्रतियोगिताएँ हुआ करती थीं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि व्यक्ति को अपने शरीर पर तो ध्यान देना ही चाहिए, साथ ही किसी भी प्रकार के आक्रमण के प्रतिघात के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए। यही बात किसी राष्ट्र को लेकर भी लागू होती है। इसके अलावा शांति का सन्देश देने और शांति को बढ़ावा देने के लिए कवि सम्मलेन और गायिकी जैसी प्रतियोगिताओं का सहारा लिया जाता था। शक्ति प्रदर्शन और शांति सिख गुरुओं के काल में एक ही सिक्के के दो पहलू थे, जो आज भी प्रासंगिक है।
शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के निधन के बाद अंग्रेज हावी हो गए। 21 वर्ष की उम्र में ही पंजाब के महाराजा बने रणजीत सिंह शाह महमूद और दोस्त मोहम्मद ख़ान जैसे अफ़ग़ान शासकों को उनकी जगह दिखाई। काबुल नदी के किनारे उन्होंने पश्तूनों के शासक युसूफजई को नाकों चने चबवाया। उनकी शासकीय क्षमता और युद्धकला के आगे उनका होली समारोह कहीं छिप जाया करता था, जिसे हमने आज उभारने की कोशिश की है। तो ये थी महाराजा रणजीत सिंह की होली!
भारत में केवल भाजपा ही वह एकमात्र राजनीतिक दल है, जिसमें ‘कार्यकर्ता’ होते हैं, वरना जितनी भी अन्य राजनीतिक पार्टियाँ हैं, वहाँ कार्यकर्ताओं के स्थान पर सिर्फ गुण्डे, गुर्गे, गुलाम और वंशदास ही होते हैं।
इसकी वजह है कि भाजपा एक ‘विचार’ आधारित पार्टी है। वह विचार है भारत भूमि को ‘माँ’ मानने का, वह विचार है ‘हिंदुत्व’ का, वह विचार है ‘राष्ट्रवाद’ का, वह विचार है ‘सनातन’ का, वह विचार है ‘विश्व बंधुत्व’ और ‘जगत कल्याण’ का।
लेकिन इसके बरक्स आप कॉन्ग्रेस से लेकर सपा, बसपा, राजद, जदयू, बीजद, टीडीपी, द्रमुक, तृणमूल, अन्नाद्रमुक, आम आदमी पार्टी और यहाँ तक कि वाम दलों को भी देख लीजिए; इन दलों में आपको कार्यकर्ता के नाम पर एक परिवार, व्यक्ति और स्वार्थ विशेष को साधने के लिए जुटे हुए लोग ही मिलेंगे।
देश, समाज और राष्ट्र से इनको कोई मतलब नहीं हैं, इनकी महफ़िलों में ऐसी कोई बातें भी नहीं होती हैं। इनको नहीं मतलब है कि सूरत बदले, इनकी पुरजोर कोशिश है कि हंगामा होना चाहिए। हंगामा हो धर्म, जाति, वर्ग की राजनीति करने के लिए, हंगामा हो ठेकेदारी, टेंडर और सरकारी सम्पत्ति में लूट-खसोट के लिए।
वरना आप इनमें से किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता बल्कि उनके मुखिया से पूछ लीजिये कि क्या मतलब है उनकी पार्टी के नाम का और क्या उद्देश्य है उनकी राजनीति का?
क्या राहुल गाँधी और उनकी बहनजी बता सकती हैं, कि कॉन्ग्रेस पार्टी क्यों है इस देश में? यह कैसी पार्टी और कैसा विचार है, जो 70 साल से एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूम रहा है? जब यह परिवार संकट में होता है, तो यह पार्टी भी संकट में आ जाती है? और, जब यह परिवार सत्ता में आ जाता है, तो पार्टी की भी मौज हो जाती है?
क्या अखिलेश यादव बता सकेंगे कि समाजवाद क्या है? इस समाजवाद के तहत वे किस प्रकार के समाज की स्थापना करना चाहते हैं? यह कैसा समाजवाद है कि नगर पालिका से लेकर के प्रदेश के मुख्यमंत्री तक के सभी पद और संसाधन एक ही परिवार और जाति के लिए रिजर्व रहते हैं?
आप पूछ सकेंगे सुश्री मायावती से कि वे किस बहुजन की राजनीति करती हैं? हज़ारों-हजार करोड़ रुपए खुद और अपने चुनाव चिह्न की मूर्तियों पर बहाकर, अतिशय विलासिता और वैभव पूर्ण जीवन जीकर वे किस बहुजन का भला कर रही हैं, जहाँ छापे में उनके पूर्व निजी सचिव के यहाँ से 50 लाख रुपए का पैन बरामद होता है तो सोचिये कि वह कौन सा ‘विचार’ है जो देश की सत्ता और संसाधनों का ऐसा निर्मम दोहन कर सकता है?
बीजू जनता दल, जिसकी स्थापना ही एक नेता के नाम से कर दी गई और जिसकी बागडोर फिर उस नेता के पुत्र नवीन पटनायक ने संभाल ली, अब चूँकि उनके बाद उनका कोई वंश नहीं है, तो यह ‘विचारहीन’ दल भी खत्म हो जाएगा।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस, जिसकी शुरुआत राज्य से वामपंथियों के कुशासन के खात्मे के लिए हुई थी, वह पार्टी विचार के नाम पर एक कोढ़ और कलंक बन चुकी हैं, जहाँ ‘ममता पूजा’ की हाइट देखिए कि बीते दिनों जब ममता की पार्टी में नम्बर दो उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का जन्मदिन था, तो तृणमूल के सभी सांसद दिल्ली में संसद सत्र को बीच में छोड़कर कोलकाता अपनी अटेंडेंस लगाने के लिए पहुँच गए थे।
ऐसी ही एक पार्टी का रजिस्ट्रेशन शरद पवार साहब ने भी करवाया हुआ है, जिसका नाम उन्होंने ‘राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी’ रखा है, लेकिन यहाँ भी सिर्फ एक ही विचार और उद्देश्य है, ‘परिवारवाद’ और ‘मिल-बाँटकर’ लूटो। बेटी, भाई, भतीजा, भतीजे के भी बच्चों को सेटल करना, इनका घोषणा पत्र है।
यही हाल महाराष्ट्र में दूसरी क्षेत्रीय पार्टी शिवसेना का है, जो राजनीति हिंदुत्व और मंदिर की करते हैं लेकिन अगर सत्ता में उनको अपना हिस्सा नहीं मिले तो वे हिंदुत्व का भी बाजा बजाने से परहेज नहीं करते, और यही वजह रही कि बीते पाँच सालों में जिस प्रकार से भाजपा पर शिवसेना ने हमले किए, वे मुख्य विपक्षी दल कॉन्ग्रेस से किसी भी मायने में कम नहीं थे।
अंत में औकात अनुसार जिक्र वामपंथियों का भी। जहाँ इनकी पार्टी को इस बात के लिए क्रेडिट तो देना पड़ेगा, कि ये लोग व्यक्ति पूजा से परहेज करते हैं, पर जहाँ तक कार्यकर्ता का सवाल है, तो उनका यहाँ इनका कोई काम ही नहीं है, बल्कि यहाँ अर्बन नक्सल होते हैं। बाकी क्षेत्रीय दलों के साथ यह सकारात्मक पक्ष है कि वे जो भी लूट-मार करेंगे, देश में ही करेंगे और देश में समर्पित भी कर देंगे, लेकिन वामपंथियों के साथ यह विडम्बना है कि वे जो कुछ भी करते हैं वह कार्ल मार्क्स, लेनिन और माओ नामक विदेशियों की प्रेरणा से, उनका ही साम्राज्य स्थापित करने के लिए करते हैं।
इसलिए अगर आप भारत में रह रहे हैं, भारतीयता में यकीन रखते हैं तो ‘भारतीय जनता पार्टी’ को लेकर सोचिये। जहाँ भारत पहले है, जनता बाद में और पार्टी सबसे अंत में। अगर हम संघ को ही इसका उद्गम स्थल मान लें, तो सोचिये वह कौन-सी व्यक्ति पूजा और परिवार पूजा है, जिसकी वजह से संघ, जनसंघ से होते हुए आज भाजपा तक का न केवल अस्तित्व कायम है, बल्कि आज वह दल अपनी दम पर देश की सत्ता चला रहा है।
वह क्या कारण है कि इन बीते लगभग सौ सालों में दुनिया में अनेकों धुरंधर लोग और उनके विचार दफ़न हो गए लेकिन 1925 का राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, भारत और सनातन और विश्व बंधुत्व का विचार जस का तस कायम है?
संघ और भाजपा में शीर्ष पदों और ओहदों पर विराज चुके और विराजित लोगों के बारे में सोचिए कि वे वंशवाद की वजह से वहाँ पहुँचे या फिर एक विचार में अपनी आस्था, सेवा और समर्पण से? आप सोच कर भी नहीं सोच पाएँगे कि अमित शाह के बाद भाजपा का अध्यक्ष कौन बनेगा, मोदी के बाद भाजपा का पीएम कौन होगा या फिर यही देख लीजिये कि अटल जी और आडवानी जी की विरासत को कौन आगे बढ़ा रहा है?
लेकिन जब यही सवाल हम कांग्रेस, सपा, बसपा, तृणमूल, राजद, शिवसेना, नेशनल कांफ्रेंस, टीडीपी, जेडीएस, पीडीपी जैसे दलों के बारे में सोचते हैं, तो हमें दिमाग ही नहीं लगाना पड़ता है कि आगे क्या होगा। इसलिए मैं मानता हूँ और फिर से कह रहा हूँ, कि भाजपा में लोग गलत हो सकते हैं, लेकिन भाजपा गलत नहीं हो सकती, क्योंकि यह गलत उद्देश्य के लिए स्थापित ही नहीं हुई है। इसलिए भाजपा एक ‘विचार’ के तौर पर हमेशा ‘पवित्र’ और ‘प्रासंगिक’ रहने वाली है।
कॉन्ग्रेस का RSS प्रेम आजकल फिर उफान पर आने लगा है। जैसे-जैसे आम चुनावों की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे गाँधी परिवार से लेकर कॉन्ग्रेस के परिवार-परस्त बड़े नेता भी RSS को केंद्र बनाकर अपनी स्वामीभक्ति साबित करने में जुट चुकी है। जमीन घोटालों में हर दूसरे दिन ED ऑफिस का चक्कर काट रहे रॉबर्ट वाड्रा के साले राहुल गाँधी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) की फंडिंग के बारे में अपने विचार दिए हैं, जिसका वीडियो उनको हटाना भी पड़ा है।
वैसे तो किसी भी विषय पर राहुल गाँधी के ज्ञान का नमूना वो स्वयं ही समय-समय पर देते रहते हैं, लेकिन आज आरएसएस के बारे में उनका ज्ञान इस बात से शुरू हुआ है, “किसी ने कहा है कि उनके हजारों संस्थान हैं।” हवा में तीर चलाने में राहुल गाँधी अब पारंगत हो चुके हैं। आज के समय में कॉन्ग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि उनके सबसे वरिष्ठ और ‘कद्दावर पार्टी अध्यक्ष’ का NDA सरकार को घेरने के लिए सबसे बड़े सबूत फोटोशॉप्ड तस्वीरें और ”किसी ने कहा है” होते हैं।
पहली बात यह है कि राफेल की तरह ही यह बात भी उन्हें ‘किसी से’ पता चली है, उसको खुद इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसके बाद भी ये चिरयुवा पार्टी अध्यक्ष अपना अमूल्य, गुप्त ज्ञान देने से रुकता नहीं है। पहला सवाल तो राहुल गाँधी से यही है कि उनकी RSS के बारे में जानकारी कितनी है? क्या उनकी जानकारी बस यहीं तक सीमित है कि आरएसएस में महिलाओं को कोई स्थान नही दिया जाता है, या फिर ये कि उन्होंने किसी लड़की को संघ की शाखा मे शॉर्ट्स पहने नहीं देखा? क्या ये जानकारी भी उनके जैसे ही किसी बुद्धिजीवी ने उन्हें दी है?
अनुभव के सामने आँकड़ों पर बात करना अतार्किक रहता है। मैं अपने अनुभव से कह सकती हूँ, जो मुझे कुछ समय आरएसएस की शाखा में जाने और शिशु मन्दिर, विद्या मन्दिर में अपने अध्ययन के समय प्राप्त हुआ। आरएसएस में मैंने कभी धर्म, जाति जैसे शब्द नहीं सुने, जैसा कि कॉन्ग्रेस नेता और कुछ प्रायोजित बुद्धिजीवी अक्सर कहते सुने जा सकते हैं। मैं और मेरे जैसी कई लड़कियाँ शाखा में समान रूप से गई हैं और हमें उन शाखाओं में कभी भी कुछ ऐसा सुनने या देखने को नहीं मिला जो साम्प्रदायिक सौहार्द से अलग हो।
राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के पास जो सूचनाएँ आती हैं वो शायद किसी दूसरी आकाशगंगा में बैठे फैक्ट चेक रिपोर्टर्स हैं, जो उन्हें बेहतर महसूस करवाने के लिए उन्हीं की भाषा में 2 शब्द एक्स्ट्रा जोड़कर उन्हें पेश करते हैं।अक्सर इन प्रायोजित सुचना के स्रोतों और मीडिया गिरोहों द्वारा आरएसएस पर धार्मिक प्रचार का आरोप लगाया जाता है, लेकिन इसके क्या आधार हैं ये उन्हें खुद मालुम नहीं है।
क्या आरएसएस को हर दिन निशाना बनाना और उसे साम्प्रदायिक संगठन सिर्फ इसलिए माना जाना चाहिए क्योंकि वह ‘नमस्ते सदावत्सले मातृभूमि’ के उद्घोष करता है? हैरानी की बात है कि आज ही उत्तर प्रदेश में एक सरकारी स्कूल को मदरसे में परिवर्तित किए जाने की सूचना आई है, कभी खबर आती है कि कोई शांतिदूत अध्यापक, जिसके नाम और करतबों में उसका मजहब नहीं ढूँढा जाना चाहिए, बच्चों को अपने धर्मविशेष के अनुसार व्यहार करने के लिए मजबूर करता है।
क्या कभी संघ द्वारा संचालित किसी स्कूल से जबरन धार्मिक आचरण व्यवहार में लाने या साम्प्रदायिक शिक्षा के बढ़ावे जैसी कोई शिकायत मिली हैं? संघ कभी भी, किसी को भी बाध्य नहीं करता है, और यह मैं इसलिए कह सकती हूँ क्योंकि मैंने अपने साथ ही मुस्लिम, सिख लोगों को देखा है, जो संघ के कार्यकर्ताओं के रूप मे अपनी धार्मिक मान्यताओं का अनुसरण करते हैं। मैंने कभी किसी मुस्लिम बच्चे को संघ द्वारा संचालित विद्यालयों में वन्देमातरम गाने के लिए बाध्य करते नहीं देखा है।
कॉन्ग्रेस पार्टी संघ की शिक्षा प्रणाली पर सवाल करती रही है कि वहाँ पर इतिहास को बदल कर पढ़ाया जाता है और BJP की सरकार बनने के बाद उसी शिक्षा को देश में फैलाया जा रहा है। मैं इस बात पर सहमत भी हूँ, इसलिए कि आरएसएस के विद्यालय इतिहास के योद्धाओं यानि शिवाजी, महाराणा प्रताप, विक्रमादित्य, छत्रसाल जैसे शूरवीरों को नायक मानकर इतिहास पड़ते हैं ना कि बर्बर आक्रांता, आतताई मुगलों की स्तुति करते इतिहास को, और कॉन्ग्रेस की आपत्ति शायद सिर्फ इसी एक बात से रही है।
संघ ने देशभक्ति, अपने गौरवपूर्ण इतिहास को जानने की दिशा दी है और यह दिशा निरन्तर बनी रहे, इससे किसको आपत्ति हो सकती है। भारत का सत्य भारत ही है, इसके स्मारक, इसकी धरोहरें और बाहर से आए लुटेरे और उनका महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे वीरों द्वारा दमन ही इसकी वास्तविकता हैं। लेकिन प्रश्न ये है कि कॉन्ग्रेस इस धरोहर पर गौरवान्वित क्यों नहीं महसूस करती है। कॉन्ग्रेस और इसके प्रायोजित बुद्दिजीवी क्यों नहीं सहयोग करते हैं आरएसएस के साथ मिलकर भारत को सामाजिक रूप से जाति, धर्म से रहित बनाने का?
लेकिन कॉन्ग्रेस ऐसा कभी नहीं करेगी। कारण हमेशा की ही तरह स्पष्ट है, कॉन्ग्रेस भारतीय लोकतंत्र के पंथनिरपेक्ष, समाजवादी समाज की समुदाय विशेष की पार्टी है जो इस समुदाय विशेष को वर्षों से अशिक्षित और साधनविहीन रखकर उसके वोट के बल पर सत्ता में बनी रही और अभी भी ऐसा ही चाहती है।
चुनाव का समय आते ही सभी पार्टियाँ अपनी अच्छाइयाँ और दूसरी पार्टी की बुराईयाँ, दोनों का हल्ल्ला काटने लगती हैं। हर पार्टी किसी भी तरह से सत्ता पाना चाहती है और उसके लिए कोशिश करती है। इस अभियान में हम वोटर के रूप में अपना फर्ज निभाते हुए ‘ये अच्छा, ये ज्यादा अच्छा’ के निर्णय में न चाहते हुए भी जुड़ जाते हैं।
बात जब प्रधानमंत्री पद की आती है तो वर्तमान परिदृश्य में दो मुख्य पार्टियों, कॉन्ग्रेस और भाजपा, के उम्मीदवारों पर आकर रुकती है। भाजपा के बारे में बात समझी जा सकती है लेकिन सबसे पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस के पास राहुल गाँधी के अतिरिक्त कोई चेहरा क्यों नही है क्या इस बात का जवाब भी उसे आरएसएस से पूछना चाहिए? ये सवाल इसलिए है कि वह भारत देश के बारे में पूछे जाने पर कहते हैं, “अभी समझने की कोशिश कर रहा हूँ।”
राहुल गाँधी जनसभाओं में कहते हैं, “15 मिनट बोलने दो।” और जब कहने की बारी होती है, तब वो अपनी सरकार की योजनाओं का नाम तक ठीक से नहीं ले पाते हैं। जिस राफेल डील का जिक्र वो बार-बार करते हैं , उसकी कीमत को वह हर जनसभा में लगभग ‘पिछत्तिस’ बार अलग-अलग बताते हैं। NRC पर वह रोहिंग्याओं का पक्ष लेते हैं, तो उनके अनुसार नक्सली ‘बुद्धिजीवी’ हो जाते हैं। डोकलाम पर सरकार को कोसते तो खूब हैं, पर जब पूछा जाता है कि चलिए आपकी इस पर क्या नीति रहेगी? तो जवाब होता है, “मुझे इस विषय की अधिक जानकारी नहीं है।”
पार्टी के युवराज राहुल गाँधी कुछ कह देते हैं, और पूरी पार्टी का नेतृत्व दिग्विजय सिंह से लेकर कपिल सिब्बल तक उनके बचाव में अपना सब समय और पूरी ऊर्जा झोंक देते हैं। आरएसएस पर कॉन्सपिरेसी गढ़ने और नरेंद्र मोदी को फ़ासिस्ट घोषित करने के बजाए कॉन्ग्रेस पार्टी क्यों नहीं इस बात के लिए समय निकालती है कि किसी ऐसे योग्य व्यक्ति को आगे किया जाए, जो सही मायनों में सबसे पुरानी पार्टी को आगे बढ़ाए? यदि परिवार की यह पार्टी और इसके भक्त लोग ‘गाँधी’ मोह को छोड़ सकें, तो अधिक उम्मीद है कि कॉन्ग्रेस वाकई कुछ बेहतर कर पाए। वरना कॉन्ग्रेस का मुद्दा सिर्फ बयानों पर बचाव तक ही सीमित हो जाएगा और संसद में बोलने का समय और कम होता जाएगा।
18 फरवरी, 2007 को समझौता एक्सप्रेस में हुए इस धमाके में 68 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें मुख्यतः पाकिस्तानी नागरिक थे। तत्कालीन यूपीए सरकार और जाँच एजेंसियों ने इसके लिए ‘हिन्दू आतंकवादियों’ को दोषी ठहराते हुए उन पर यह धमाका करने का आरोप लगाया था। एनआइए की विशेष अदालत ने स्वामी असीमानंद समेत चारों आरोपियों को इस केस में बरी कर दिया है।
‘कोई दम नहीं ‘मंदिर का बदला’ थ्योरी में’
2011 से इस मामले की जाँच कर रही राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआइए) ने अदालत में यह आरोप लगाया कि गुजरात के अक्षरधाम, जम्मू के रघुनाथ, एवं वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में हुए आतंकी हमलों का बदला लेने के लिए आरोपियों लोकेश शर्मा, कमल चौहान, व राजिंदर चौधरी ने समझौता एक्सप्रेस में इस धमाके को अंजाम दिया। स्वामी असीमानंद पर इस धमाके में शामिल व्यक्तियों को साजिश हेतु आवश्यक सामग्री मुहैया कराने (logistical support) का आरोप था।
पर एनआइए कोर्ट के जज जगदीप सिंह के फैसले के अनुसार उन्हें यह थ्योरी और जाँच एजेंसी द्वारा पेश सबूत इतने ठोस नहीं लगे कि उनके आधार पर आरोपियों को दोषी करार दिया जा सके। उन्होंने एक पाकिस्तानी महिला द्वारा पाकिस्तानी गवाहों को पेश करने की याचिका को भी मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया।
इस मामले के मास्टरमाइंड के तौर पर प्रचारित आरएसएस सदस्य सुनील जोशी की 2007 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस मामले को भी इसी भगवा आतंकवाद नैरेटिव से जोड़ कर देखा गया था। जाँच एजेंसियों ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत 8 लोगों को इस मामले में भी आरोपी बनाया था पर बाद में उनके खिलाफ भी एनआइए दोषी साबित करने लायक सबूत पेश करने में नाकाम साबित हुई।